Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 01 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2490, आडियो 2976, दिनांक 17.04.2018
VCD 2490, Audio 2976, Date 17.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning Class dated 18.5.1967
VCD-2490-extracts-Bilingual

समय- 00.01-25.30
Time- 00.01-25.30


आज का प्रातः क्लास है - 18.5.1967. रिकार्ड चला है – तकदीर जगाकर आई हूँ। मैं एक नई दुनिया बसाकर लाई हूँ। हँ? पुराने-पुराने गीत हैं फिल्म के। फिल्में भी पहले सतोप्रधान होती थीं। सत्वप्रधान में जरूर सात्विकता होगी, सच्चाई होगी। हँ? तो ये फिल्मों में भी कहाँ की बातें बताई हैं? जो भी सात्विक दुनिया रची गई थी, उस समय की बात बताई – तकदीर जगाकर आई हूँ। हँ? आने वाला कौन है? मेल है या फीमेल है? हँ? फीमेल है। और तकदीर कैसे जगती है? हँ? अच्छे से अच्छी तकदीर कैसे बनती है? हँ? अच्छे से अच्छी तकदीर बनती है बाप को पहचान करके और बाप के ज्ञान को जीवन में धारण करके। तो जरूर कोई आत्मा है जो तकदीर जगाकर आई है। माना तकदीर बनाके आई हूँ। कहाँ से आई हूँ? हँ? अरे, कहीं से आई हूँ कि नहीं आई हूँ? हँ? ब्रह्मा के लोक से आई हूँ। ब्रह्मलोक कहते हैं ना। तो ब्रह्मा के लोक से तकदीर जगाकर कैसे आई हूँ? हँ? ब्रह्मा है तो दाढ़ी-मूँछ वाला, लेकिन दाढ़ी-मूँछ वाला ब्रह्मा भी शिव का रथ है या नहीं है? हँ? भले टेम्पररी है, सदाकाल का नहीं है; है तो? तो, और, ब्रह्मा की जो बच्चियां हैं, उन बच्चियों में, छोटी बच्ची होगी या बड़ी बच्ची होगी? हँ? और ब्रह्मा भी कौनसा? अव्वल नंबर का ब्रह्मा? कुछ तो बताओ। हँ? कौनसा ब्रह्मा? छोटी ब्रह्मा भी होता है? अव्वल नंबर के ब्रह्मा से आई हूँ तकदीर जगाकर।

अरे, अव्वल नंबर ब्रह्मा कब कहें? वो तो तब कहेंगे जब आदि होता है रुद्र ज्ञान यज्ञ का। कि बाद में? आदि में कहेंगे। माना ओम मण्डली में। तो वहाँ से जगाके आई हूँ? हँ? अरे, वहाँ तो ज्ञान ही नहीं था। वहाँ अधूरा ज्ञान था? पूरा ज्ञान था? अधूरा ज्ञान था। तो कहाँ से तकदीर जगेगी? चलो, बेसिक ज्ञान ही सही, तो बेसिक ज्ञान भी बच्चे लेते हैं। तो उसमें भी तो चार ही प्रकार के सब्जेक्ट हैं। कौन-कौनसे? ज्ञान, योग, धारणा और सेवा। तो जो ज्ञान मिला, ज्ञान के आधार पर बाप को पहचाना। बाप को पहचानकर योग लगाया। नहीं। योग लगाया। और जीवन में ज्ञान और योग की प्रैक्टिकल में धारणा की। और फिर धारणा खुद करने के बाद जो भी दूसरों की सेवा की, तो ये चारों सब्जेक्ट में तकदीर जगेगी या नहीं जगेगी? हँ? तकदीर जगेगी। तो किसकी बात है ये? हँ? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। ये लिखता है चोटी माँ। जैसे चोटी का ब्राह्मण होता है ना। तो उसके साथ चोटी की, चोटी वाली माँ हो गई। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, एडवांस ब्राह्मण ढ़ेर सारे। किस्सा खतम। छोटी माँ के लिए माना जो लक्ष्मी बनने वाली माँ है, जिसे राधा माँ कहा जाता है, ज्ञान की भाषा में, राम को धारण करने वाली राधा माँ। क्योंकि एक ही विशेष है महारानी, बाकी तो सब रानियाँ हैं, नहीं तो पटरानियाँ हैं। तो बढ़िया से बढ़िया तकदीर तो महारानी की जगेगी।

अब, महारानियों में भी, जैसे महाराजाओं में भी ढ़ेर के ढ़ेर महाराजाएं हुए। तो महारानियों की भी पीढ़ियाँ चली होंगी एक के बाद दूसरी, तीसरी, चौथी। सतयुग में कितनी महारानियाँ होती हैं? हँ? 8 होती हैं। तो उन 8 महारानियों से पहले कोई नहीं होती? हँ? होती कि नहीं? कौन? जैसा आदि नारायण वैसे आदि नारी। जिनका कम्बाइन्ड रूप विष्णु दिखाया जाता है। तो उस जैसी तो कोई नहीं हो सकती। और जगी हुई तकदीर किसे कहा जाता है? हँ? तकदीर बढ़िया हो, अव्वल नंबर की तकदीर हो 500-700 करोड़ आत्माओं के बीच में, उसकी क्या परिभाषा? उसकी परिभाषा है जन्म-जन्मान्तर तन से सुखी, मन से सुखी और धन से सुखी। हेल्थ, वेल्थ, हैपीनेस, तीनों हैं। तो क्या कहेंगे? तकदीर जगी हुई है। तो उसका आधार क्या है? हैल्थ, वेल्थ, हैपीनेस – तीनों का आधार है प्योरिटी, पवित्रता। किस तरह की पवित्रता? हँ? पवित्रता कर्मेन्द्रियों की भी होती है, पवित्रता ज्ञानेन्द्रियों की भी होती है, और पवित्रता इन्द्रियों से भी परे अतीन्द्रिय सुख की पवित्रता। उसमें भी तो नंबरवार होंगे ना।

तो जो पवित्र आत्मा है, एक में ही लगन लगी हुई है, तो उसको शास्त्रों में भी दिखाया है राधा। क्यों नाम पड़ा राधा? राम को धारण करने वाली राधा। तो क्या राम की इतनी अच्छी तकदीर नहीं होगी? राधा की ज्यादा अच्छी हो गई? हँ? ये क्या चक्कर? ऐसे हो सकता है क्या? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) राम राजा होता है? अच्छा? कहाँ का राजा? हँ? राम कहाँ का राजा? विनाशी दुनिया का राजा? अविनाशी दुनिया का राजा? कहाँ का राजा? विश्व महाराजन। ओहो। सारी विश्व की आत्माओं को कंट्रोल करने वाली जगदम्बा होगी, राज करेगा खालसा, या राम वाली आत्मा होगी? जैसे, कहते हैं ईश्वर की दो आँखें हैं – राम और कृष्ण। राम को उन्होंने त्रेता में दिखाय दिया और कृष्ण को सतयुग में दिखाय दिया। लेकिन दिखाने वालों को तो ये पता ही नहीं है कि सतयुग में जो पहले पत्ते के रूप में कृष्ण आता है उसको भी जन्म देने वाला कोई बीज तो होगा ना। तो वो बीज कौन है? वो बीज ही वास्तव में राम वाली आत्मा है जो त्रेता का राम नहीं है। क्या? वो राम है, जिसमें सुप्रीम सोल शिव प्रवेश करते हैं और प्रैक्टिकल में राम का अर्थ उसके ऊपर लागू होता है। क्या प्रैक्टिकल अर्थ? रम्यते योगिनो यस्मिन इति रामः। योगी लोग जिसकी याद में रमण करते हैं वो राम। वो वो ही हो गया जिसको दूसरे धर्मों में आदम, एडम कहा जाता है। भारत में उसे आदि देव कहते हैं, शंकर कहते हैं।

तो वो राम वाली आत्मा जो थी वो सतयुग में थी या सतयुग से भी पहले थी? जब नई दुनिया बनाई गई थी। सतयुग के आदि और कलियुग के अंत में 100 साल के पुरुषोत्तम संगमयुगी समय में जब नई दुनिया बनी थी तो वो राम वाली आत्मा ही शंकर का पार्ट बजाती है। और कृष्ण वाली आत्मा ही ब्रह्मा का पार्ट बजाती है। तो ब्रह्मा की आत्मा या ब्रह्मा की सहयोगिनी सरस्वती ओम राधे की आत्मा। इनकी तकदीर जगी हुई कहें या नहीं कहें अव्वल नंबर में?
(किसी ने कुछ कहा।) राम की भी नहीं? राम की भी नहीं, कृष्ण की भी नहीं? जगी हुई नहीं कहें? क्यों? वो 84 जन्म सुख नहीं भोगती है कृष्ण की आत्मा? सतयुग के कृष्ण की आत्मा 84 जन्म सुख नहीं भोगती? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 50 साल का सुख भोगती है? ठीक है। सूक्ष्म शरीर से भी तो मान-मर्तबा लेती है या नहीं लेती है? हँ? नहीं लेती? ब्राह्मणों की दुनिया में सूक्ष्म शरीर से भी मान मर्तबा लेती कि नहीं लेती? लेती है। और राम की आत्मा तो जगतपिता मानी जाती है। तो ये दोनों आत्माएं उतनी तकदीर जगाके नहीं आती हैं जितनी तकदीर विजयमाला की जो मुखिया बनती है, मणका, उसकी बनती है। कैसे? हँ?

(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। रानियाँ महलों में रहके सुख भोगती हैं और राजाएं जो हैं वो द्वापर-कलियुगी द्वैतवादी दुनिया में तो खून-खराबा करते हैं। अपना भी और दूसरों का भी। तो जब घाव लगते हैं तो हाय-हाय तो करेंगे ना। तो तन का सुख हुआ? हँ? नहीं हुआ। और धन? हँ? धन का सुख होता है? युद्धभूमि में धन मिल जाता है? हँ? कि दूसरों पे आश्रित होके रहना पड़ता है युद्धभूमि में? आश्रित होके रहना पड़ता है ना। जो भी धन-संपत्ति की जरूरत है, वो जो महलों में रही पड़ी हैं, भेजेंगी, तो आएगा। नहीं भेजेंगी तो नहीं आएगा। तो तन के लिए कहेंगे जब घाव लगेंगे तो फिर रानियों के घर में पहुँचो और वहाँ जाके ट्रीटमेन्ट कराओ, वैद्य बुलाओ। ये करो, वो करो, दवाइयाँ लाओ। कोई तो या तो बेहोश पड़े रहेंगे या तो घायल पड़े रहेंगे, कुछ कर ही नहीं सकते। तो इसको तकदीर जगी हुई कहेंगे? अच्छा, द्वापर की बात छोड़ दो, कलियुग की छोड़ दो। सतयुग-त्रेता में? सतयुग-त्रेता में ज्ञानेन्द्रियों का सुख भोगेंगे। हँ? भोगेंगे ना। तो सतयुग-त्रेता ज्यादा श्रेष्ठ है जहाँ ज्ञानेन्द्रियों का सुख भोगते हैं या सतयुग-त्रेता से भी पहले जो रिहर्सल का टाइम है, शूटिंग का टाइम है, जहाँ अतीन्द्रिय सुख मिलता है, इन्द्रियों से परे का सुख, वो ज्यादा श्रेष्ठ है? वो ज्यादा श्रेष्ठ हुआ। तो अतीन्द्रिय सुख लेने में भी, इन्द्रियों से परे का सुख लेने में भी जैसी यहाँ शूटिंग होगी वैसी वहाँ 5000 वर्ष ड्रामा का हिसाब-किताब चलेगा।

तो इन्द्रियों से परे का जो सुख है वो लेने के लिए, हाँ, इन्द्रियों से जो परे का सुख है वो लेने के लिए क्या करना पड़ता है? निराकारी स्टेज में रहना पड़े। जिस निराकारी स्टेज में इन्द्रियों का भान होता ही नहीं। जैसे इन्द्रियाँ हैं ही नहीं। जब इन्द्रियाँ ही नहीं हैं तो सुख भोगने का सवाल ही नहीं। तो उसमें क्या कहेंगे? जो राम जैसी आत्माएं हैं रुद्र माला की, जो आत्मिक स्टेज में टिकी, टिक जाती हैं, वो ज्यादा श्रेष्ठ हुई, जिन्हें आत्मिक स्टेज में टिकने के बाद इन्द्रियों का भान ही नहीं, क्योंकि सुख-दुःख शरीर से भोगा जाता है या बिना शरीर के भोगा जाता है? हँ? शरीर से भोगा जाता। और वहाँ तो शरीर का जैसे भान ही नहीं, इन्द्रियों का भान ही नहीं, इसलिए कहते हैं अतीन्द्रिय सुख। तो विजयमाला ज्यादा भोगेगी पुरुषोत्तम संगमयुग में रिहर्सल के टाइम पर या रुद्र माला ज्यादा सुख भोगेगी? रुद्रमाला माने आत्मिक स्टेज में रहने वाली माला। हँ? विजयमाला माने? जो विकारों पर जीत पाए। इन्द्रियाँ रहते-रहते विकारों पर जीत पाए कि इन्द्रियाँ हैं ही नहीं फिर भी जीत पाई तो बड़ी बात? इन्द्रियाँ रहते-रहते। तो वहाँ भी देखा जाए तो जो स्वर्णिम संगमयुग होगा उसमें विजयमाला वाली आत्माएं जो विकारों पर जीत पाती जाएंगी वो सुख भोगेंगी प्रैक्टिकल शरीर से या रुद्रमाला के मणके वो विशेष आत्माएं जो ज्यादा राजाएं बनते हैं पुरुष जन्म लेकरके वो ज्यादा सुख भोगेंगी? हँ? माने रुद्रमाला के मणकों को तो तपस्या भूमि में तपस्या करनी पड़े। और जो विजयमाला के हैं, जिन्होंने शरीर रहते-रहते इन्द्रियों पर जीत पा ली वो फिर स्वर्ग के सुख भोगेंगे। तो वहाँ भी जीत किसकी हुई? हँ? विजयमाला वालों की और विजयमाला की जो हैड रानी मक्खी है।

तो बताया ये तकदीर कहाँ से जगाके आई हूँ? बेसिक नॉलेज से जगाके आई हूँ या एडवांस ज्ञान से जगा के? एडवांस ज्ञान में तो आते ही नहीं। आते हैं? हँ? नहीं। बेसिक ज्ञान से आती हूँ। तो बेसिक का फाउण्डेशन अगर अच्छा होगा, धारणा वाला होगा, प्रैक्टिकल जीवन होगा, स्वयं सुधरे हुए हों व्यवहार में और दूसरों को सुधारें। तो फाउण्डेशन अच्छा है तो बिल्डिंग कैसी रहेगी? बढ़िया ही जाएगी। तो बताया कि जो रुद्र माला के मणके और उनका हैड है वो भी विजयमाला के आधीन हैं। जब तक विजयमाला की आत्माएं नहीं आएंगी तब तक वो भी संपन्न नहीं बन सकते। तो मैं एक नई दुनिया बसाकर लाई हूँ। क्या? नई दुनिया जो बसी हुई होती है उसमें संगठन जो है, जिसे युनिटी कहते हैं, वो बंधी हुई होगी या बिखरी हुई होगी? बंधी हुई होगी। और रुद्रमाला वालों का क्या होता है? हँ? सब बिखरे हुए। हँ? कोई ग्रुप है अभी जो संगठित हो देखने में? कोई संगठित देखने में नहीं आता। तो नई दुनिया बसाकर लाई हूँ का मतलब है कि जब वो रानी मक्खी निकलती है; क्या? चन्द्रवंशियों से निकलकरके सूर्यवंशियों की ओर आती है तो पूरा संगठन लेके आती है। क्या? जो छोटी शहद की मक्खियों का झुण्ड है वो सारा का सारा झुण्ड रानी के पीछे भागता है।

Today's Morning class is dated 18.5.1967. The record played is - Takdeer jagaa kar aayi hoon. Mai ek nayi duniya basaakar laayi hoon (I have come with my fortune awakened. I have come with a new world.) Hm? These are old songs of films. Films also used to be satopradhan (pure) earlier. There will definitely be purity, truth in Satwapradhan. Hm? So, topics of which place have been depicted in these films as well? The topic of the time when the pure world that was created was mentioned - I have come with my fortune awakened. Hm? Who has come? Is it a male or a female? Hm? It is a female. And how is the fortune awakened? Hm? How is the best fortune created? Hm? The best fortune is created by recognizing the Father and by inculcating the Father's knowledge in the life. So, definitely there is a soul which has come with its fortune awakened. It means that I have come with my fortune built. From where have I come? Hm? Arey, have I come from somewhere or not? Hm? I have come from Brahma's abode. It is called the Brahmlok, is not it? So, how have I come from the abode of Brahma with my fortune awakened? Hm? Brahma is the one with beard and moustache. But is even that Brahma with beard and moustache the Chariot of Shiva or not? Hm? Although it is temporary, it is not forever; but it is indeed, is not it? So, and, among the daughters of Brahma, will she be a younger daughter or will she be an older daughter? Hm? And of what kind is the Brahma as well? Is he number one Brahma? Tell something. Hm? Which Brahma? Is there a younger Brahma also? I have come with my fortune awakened from the number one Brahma.

Arey, when will he be called the number one Brahma? Will that be said when the Rudra Gyan Yagya starts or will it be said later on? It will be said in the beginning. It means in the Om Mandali. So, have I come with my fortune awakened from there? Hm? Arey, there was no knowledge at all there. Was there incomplete knowledge? Was there complete knowledge? There was incomplete knowledge. So, from where will the fortune be awakened? Okay, be it the basic knowledge itself, the children obtain basic knowledge also. So, even in that there are four kinds of subjects only. Which ones? Knowledge, Yoga, inculcation and service. So, the knowledge that was received, the Father was recognized on the basis of that knowledge. You recognized the Father and had Yoga. No. You had Yoga. And you inculcated knowledge and Yoga in practical in life. And after inculcating [the knowledge] yourself, whatever service you rendered to others, so, will the fortune be awakened in these four subjects or not? Hm? The fortune will be awakened. So, it is about whom? Hm? Hm?
(Someone said something.) Yes. This one writes 'choti ma' (highest mother). Just as there is the highest Brahmin (choti ka braahman), is not it? So, along with there is a highest mother. (Someone said something.) Yes, there are numerous advance Brahmins. The story ends. For the junior mother (chhoti Maa), i.e. the mother who is to become Lakshmi, who is called Mother Radha, in the language of knowledge, the mother Radha who inculcates Ram because there is only one special Maharani (main queen), otherwise they are Patranis (secondary queens). So, it is the fortune of the Maharani which will be awakened in the best manner.

Well, among the Maharanis (empresses) also, just as there have been numerous Maharajas (emperors). So, even in case of Maharanis there must have been generations, first, second, third, fourth. How many Maharanis are there in the Golden Age? Hm? There are eight. So, are there none before those 8 Maharanis? Hm? Are there or are there not? Hm? Who? As is the Aadi (first) Narayan, so is the Aadi Naari (first woman). Their combined form is shown as Vishnu. So, there cannot be anyone like her. And which is called the awakened fortune? Hm? What is the definition of a good fortune, the number one fortune among the 500-700 crore souls? Its definition is that you should be happy through the body, happy in mind and happy in wealth also birth by birth. If there is health, wealth and happiness, then what will it be called? The fortune is awakened. So, what is its basis? The basis of health, wealth and happiness is purity. What kind of purity? Hm? There is purity of the organs of action also, there is purity of the sense organs also and there is purity of the supersensuous joy also which is beyond the experience of organs. Even in that they will be numberwise, will they not be?

So, the pure soul, the one who is devoted only towards one, has been depicted in the scriptures also as Radha. Why was the name coined as Radha? The one who inculcates Ram (Ram ko dhaaran karne vaali) is Radha. So, will Ram's fortune not be so good? Why is Radha's fortune better? Hm? What is this issue? Can this be possible? Hm?
(Someone said something.) Is Ram the king? Achcha? King of which place? Is he the king of the perishable world? King of the imperishable world? King of which place? World emperor. Oho. Will the one who controls the entire world's souls be Jagdamba, will the pure one rule (raaj karega khaalsaa) or will it be the soul of Ram? For example, it is said that there are two eyes of God - Ram and Krishna. They have shown Ram to be in the Silver Age and they have shown Krishna to be in the Golden Age. But those who have depicted do not know that there must be a seed who gives birth even to the Krishna who comes as the first leaf in the Golden Age, will there not be? So, who is that seed? That seed is actually the soul of Ram who is not the Ram of Silver Age. What? He is the Ram in whom the Supreme Soul Shiv enters and the meaning of Ram applies to him in practical. Which practical meaning? Ramyate yogino yasmin iti Ramah. The one in whose remembrance the yogis enjoy is Ram. He is the same personality who is called Aadam, Adam in other religions. He is called Aadi Dev, Shankar in India.

So, did that soul of Ram exist in the Golden Age or even before the Golden Age when the new world was established? That soul of Ram itself plays the part of Shankar in the beginning of the Golden Age and the end of the Iron Age, during the Purushottam Sangamyugi (elevated Confluence Age) period of 100 years when the new world was established. And the soul of Krishna itself plays the part of Brahma. So, can it be said that the fortune of the soul of Brahma or the soul of Brahma's helper (sahyogini) Om Radhey was awakened at number one position?
(Someone said something.) Not even Ram's soul? Not even Ram's soul, not even Krishna's soul? Will their fortune not be said to be awakened? Why? Doesn't the soul of Krishna enjoy happiness for 84 births? Doesn't the soul of Krishna of the Golden Age enjoy happiness for 84 births? Hm? (Someone said something.) Does it enjoy happiness for fifty years? It is correct. Does it accept respect and position even through the subtle body or not? Hm? Does it not take? In the world of Brahmins, does it accept respect and position through the subtle body or not? It accepts. And the soul of Ram is considered to be the Father of the world. So, both these souls do not come with their fortunes awakened as much as the fortune of the head of the vijaymala (rosary of victory) is built. How? Hm?

(Someone said something.) Yes. The queens enjoy comfort while living in the palaces and the kings indulge in bloodshed of themselves and others also in the dualistic world of Copper Age and Iron Age. So, when they suffer injuries, then they will cry in despair, will they not? So, does it constitute comfort of the body? Hm? It doesn't. And wealth? Hm? Do they have the comfort of wealth? Do they get wealth in the battlefield? Hm? Or do they have to remain dependant on others in the battlefield? They have to remain dependent, do they not? They will get wealth when those ladies living in the palaces send it to them. If they don't send, it will not come. So, it will be said for the body that when they suffer injuries, then you reach the home of the queens and undergo treatment there, call for the Doctor (vaidya). Do this, do that, bring medicines. Some may lie unconscious or lie injured; they cannot do anything at all. So, will this be said to be as 'awakened fortune'? Achcha, leave aside the topic of the Copper Age, leave aside the topic of the Iron Age. In the Golden Age and Silver Age? You will enjoy the joy of the sense organs in the Golden Age and Silver Age. Hm? You will enjoy, will you not? So, is the Golden Age and Silver Age more righteous where you enjoy the pleasure of sense organs or is the time of the rehearsal, the time of shooting even before the Golden Age and the Silver Age where you get supersensuous joy, the joy beyond the perception of the organs, more righteous? That is more righteous. So, even in case of obtaining supersensuous joy, even in case of obtaining the joy beyond the perception of the organs, as is the shooting that we perform here, so shall be the account of the 5000 years drama there.

So, what has to be done in order to obtain the joy beyond the perception of the organs, yes, in order to obtain the joy that is beyond the perception of the organs? You have to remain in an incorporeal stage. An incorporeal stage in which there is no consciousness of the organs at all. It is as if there are no organs at all. When there are no organs at all, then there is no question of experiencing their pleasure at all. So, what will be said about it? The Ram like souls of the Rudramala, who stabilized, become constant in soul conscious stage are more righteous, who do not have the consciousness of the organs at all after stabilizing in the soul conscious stage because is happiness and sorrow experienced through the body or without the body? Hm? It is experienced through the body. And it is as if there is no consciousness of the body there at all, there is no consciousness of the organs at all; this is why it is called supersensuous joy. So, will the Vijaymala experience that joy more at the time of rehearsal in the elevated Confluence Age or will the Rudramala experience more joy? Rudramala means the rosary of those who live in a soul conscious stage. Hm? What is meant by Vijaymala? Those who conquer the vices. Should they gain victory over vices while the organs are in place or is it a big deal if they gain victory even if the organs do not exist? It is while the organs exist. So, if you see, even there, in the golden Confluence Age that exists, will the souls of Vijaymala which go on conquering the vices experience happiness through the practical body or will the beads of the Rudramala, the special souls, which become kings in greater numbers by getting a male birth experience more happiness? Hm? It means that the beads of the Rudramala will have to perform tapasya in the land of tapasya. And those who belong to the Vijaymala, who have conquered the organs while being in the body, will experience the happiness of heaven. So, even in that case, who gained victory? Hm? It is those who belong to the Vijaymala and the head of the Vijaymala, who is the queen bee.

So, it was told - From which place have I come with my fortune awakened? Have I come awakened from the basic knowledge or have I come awakened from the advance knowledge? They do not come in advance knowledge at all. Do they come? Hm? No. I come from the basic knowledge. So, if the foundation of basic [knowledge] is good, if someone has nice inculcations, if the life is practical, if one is reformed himself in activities and then reform others; so, when the foundation is good, then how will the building be? It will be good only. So, it was told that the beads of the Rudramala and their head are also under the Vijaymala. As long as the souls of Vijaymala don’t come, they too cannot become perfect. So, I have come with a new inhabited world. What? The new world which is inhabited, the gathering in it, which is called unity, will it be united or disintegrated? It will be united. And what happens to those from the Rudramala? Hm? All of them are dispersed. Hm? Is there any group which appears to be united now? Nobody appears to be united. So, 'I have come with a new inhabited world' means that when that queen bee emerges; what? When she comes out from among the Chandravanshis and comes towards the Suryavanshis, then she brings the entire gathering. What? The group of the small honey bees, that entire group runs behind the queen.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2491, आडियो 2977, दिनांक 18.04.2018
VCD 2491, Audio 2977, Date 18.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning class dated 18.5.1967
VCD-2491-Bilingual

समय- 00.01-15.35
Time- 00.01-15.35


प्रातः क्लास चल रहा था - 18.5.1967. रिकार्ड के ऊपर बात चल रही थी। रिकार्ड था – तकदीर जगाकर आई हूँ। मैं एक नई दुनिया बसाकर लाई हूँ। तो ये बात है विजयमाला की हैड की। जब मैदान में आती है। कौनसा मैदान? जिसे गीता में कहा है – धर्मयुद्ध का क्षेत्र। कर्मयुद्ध का क्षेत्र। उस क्षेत्र में कहाँ आती है? किसके पास आती है? आती है रूहानी माला के रुद्र माला के जो मणके हैं, जिन्हें एडवांस पार्टी कहा जाता है, युद्ध स्तर पर जब काम शुरु होता है तो एडवांस पार्टी को आगे बढ़ाया जाता है, फील्ड तैयार करने के लिए। तो उनके पास आती है। बोलती है – तकदीर जगाकर आई हूँ। जो खुद की तकदीर जगाएगा वो दूसरों की भी जगाय सकेगा। खुद की ही तकदीर नहीं जगी होगी तो दूसरों की नहीं जगाय सकता है। मैं एक नई दुनिया बसाकर लाई हूँ। हँ? नई दुनिया बसाने का आधार क्या होता है? प्यूरिटी। जो युनिटी से बनती है। या यूं कहें प्योरिटी से यूनिटी बनती है।

तो बोला – मीठे-मीठे सीकीलधे बच्चों ने ये गीत सुना। मीठे-मीठे सीकीलधे बच्चों से पूछते हैं। कौनसे सीकीलधे? जो शूटिंग पीरियड में भी यज्ञ के आदि में सबसे पहले बिछुड़े थे। लंबे समय से जो बच्चे माँ-बाप से बिछुड़ जाते हैं तो बड़े सिक-सिक से प्यार से मिलते हैं। तो बापदादा पूछते हैं। कौनसे बापदादा? हँ? उन तथाकथित ब्राह्मणों की दुनिया में तो माना जाता है कि बाप शिव ज्योतिबिन्दु निराकार और दादा दादा लेखराज की, ब्रह्मा की आत्मा। उनका तो लौकिक नाम में भी दादा लगा हुआ था। वो ही दादा होंगे। लेकिन नहीं। दादा जिस बड़े भाई को कहा जाता है, वो है बिन्दु-बिन्दु आत्माओं के बीच आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों के बीच जो सुप्रीम बाप का बड़ा बच्चा है आदम या हिन्दुओं में जिसे कहते हैं मूर्तिमान शंकर। मूर्ति वाला है। चैतन्य मूर्ति है। तो वो हुआ बड़ा भाई आत्माओं के बीच में दादा। बाप हुआ शिव। बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का बाप। और दादा हुआ जो आत्मिक स्थिति में टिकने वालों में सबसे पावरफुल बच्चा है। तो वो दोनों कम्बाइन्ड पार्ट बजाते हैं। माना एक ही शरीर में वो निराकार शिव सुप्रीम गॉड फादर और जिसके शरीर रूपी रथ में आते हैं, अर्जुन कहो, आदम कहो, उसके साथ एक रथ के संचालन करने वाली दो आत्माएं। रथ एक ही और उस रथ के संरक्षक के रूप में दो आत्माएं। एक रथी वाला अर्जुन। और दूसरा उस रथ को चलाने वाला। रथ की इन्द्रियों को कंट्रोल करने वाला। शिव बाप।

तो ये बापदादा पूछते हैं। यहाँ बैठे हो? कहाँ बैठे हो? यहाँ माना मधुबन में बैठे हो? हँ? मधुबन किसे कहा जाता है? गायन है मधुबन में मुरलिया बाजे। तो मीठा-मीठा बाप, मीठी-मीठी वाणी सुनाते हैं। उस वाणी का भक्तिमार्ग में नाम रख दिया है मुरलिया। लेकिन दिखाते हैं काठ की मुरलिया। क्या? क्योंकि शिव बाप जब आखरी ब्रह्मा के तन में आते हैं, तो मीठी-मीठी वाणी सुनाते हैं। उसे कहते हैं वेदवाणी। और वो मीठी-मीठी वाणी सुनने में मीठी लगती है। इसलिए भक्तिमार्ग में मुरली की तान बताय दी। लेकिन भक्तिमार्ग वाले जानते नहीं हैं कि हमने काठ की मुरलिया क्यों दिखाय दी? सोने की भी, चांदी की भी तो बताय सकते थे। नहीं। काठ की इसलिए बता दी कि जिस ब्रह्मा नामधारी अंतिम ब्रह्मा के मुख में प्रवेश करते हैं तो कठबुद्धि होता है। माना, वो वेदवाणी तो सारी सुनता है बड़े-बड़े कानों से। क्या? इसलिए महाभारत में सूर्य का जो बड़ा बच्चा है पाण्डवों में उसको कर्ण बताया है। मुसलमानों में भी जो कथाएं दिखाई जाती हैं उनमें एक हीरो पार्टधारी का साथी होता है उसको बड़े-बड़े कानों वाला दिखाते हैं। तो ये भी शिव बाप का बच्चा है गणेश। कैसे कान? बड़े-बड़े कान वाला। सुनता बहुत है। और शिव उसके अन्दर जो वाणी चलाते हैं, बहुत सुनने के साथ-साथ सुनाता भी बहुत है अपने मुख से। तो दोनों काम इस संसार में अगर कोई आत्मा करती है तो सबसे ज्यादा कौन करती? ब्रह्मा उर्फ कृष्ण की सोल, जो इस सतयुग के आदि में पहला पत्ता बनती है सृष्टि रूप वृक्ष का।

तो बताया, यहाँ बैठे हो माने कहाँ बैठे हो? जहाँ मुरलिया बजती है। वो कृष्ण बच्चे की मुरलिया नहीं जो बच्चा बुद्धि है। सुनता-सुनाता तो बहुत है बेसिक नॉलेज लेकिन समझता कुछ भी नहीं है। बेसिक स्कूल में बच्चे पढ़ते हैं ना। तो बहुत रट्टा-रट्टी करते हैं। हँ? लेकिन जो कबीरदास के दोहे, तुलसीदासजी के कवित्त, सूरदास के दोहे, कवित्त सुनते हैं, रटते हैं, सुनाते हैं। उनकी गहराई के अर्थ को नहीं समझते। वो बच्चे जब बड़े क्लास में कोई उनमें से पहुँच जाते, सब तो नहीं पहुँचते, ऊँचे क्लास में पहुँचते हैं तो गहराई से समझते हैं उनका अर्थ। तो बोला – बसिक नॉलेज के बतौर ज्ञान सुनते हैं, सुनाते हैं तो उसे भी मधुबन ही कहा जाता है। मधुबन में मुरलिया बाजे। तो कहाँ बैठे हैं? मधुबन में बैठे हो। हँ? मुरली तो भगवान ही की कही जाएगी। कृष्ण बच्चे की तो नहीं कही जाएगी। क्यों? वो तो बच्चा बुद्धि है। भक्तिमार्ग कृष्ण के बच्चाबुद्धि का रूप पूजा जाता है या बड़ा रूप पूजा जाता है? बच्चाबुद्धि पूजा जाता है। भक्त बिचारे जानते नहीं हैं कि हम बच्चा को क्यों पूजते हैं? अरे! बच्चा कैसे राजयोग सिखाएगा? बच्चा राजयोग; वो क्या जाने राज़ की बात? हँ? कि सृष्टि कैसे चलती है? क्या कर्म करते हैं तब सृष्टि चलती है? इन्द्रियों के सुख लेते हैं तो सृष्टि चलती है। तो बच्चों को तो इस बात का पता ही नहीं। और कैसे योगी बनते हैं ये भी पता नहीं।

तो बताया कि तुम कृष्ण की गीता पाठशाला में नहीं बैठे हो। कहाँ बैठे हो? हँ? शिव जहाँ सुप्रीम टीचर बनकर पढ़ाते हैं वहाँ बैठे हो। तो वो भी मधुबन हुआ या नहीं हुआ? हँ? तुम्हें जो बातें सुनने को मिल रही हैं एडवांस ज्ञान में भी वो तुमको मीठी-मीठी लगती हैं या कड़ुवी-कड़ुवी लगती हैं? मीठी-मीठी लगती हैं। तुमको मीठी-मीठी लगती हैं, उन डुप्लिकेट ब्रह्माकुमार-कुमारों को बड़ी कड़वी लगती हैं। ऐसे तो दुनिया में होता है। कोई की एक बात अच्छी लगती है। बहुत बातें अच्छी लगती हैं। दूसरों को वो ही बातें अच्छी नहीं लगती। तो तुम यहाँ बैठे हो। माने मधुबन में बैठे हो मधुसूदन के मधुबन में बैठे हो, तो तुम्हें ये नशा चढ़ा हुआ है कि अभी हम विश्व का, स्वर्ग का मालिक बनने वाला है। क्या? शिव बाप आते ही हैं। उनको कहा ही जाता है हैविनली गॉड फादर। हँ? ज्ञान सुनाकरके हैविन का रचयिता बनाते हैं। है विन। माना महाभारी महाभारत युद्ध। तृतीय विश्व युद्ध। फिर भले बाद में चतुर्थ विश्व युद्ध भी है यादवों का। लेकिन कोई भी विश्वयुद्ध का टाइम है कल्पांतकाल में, कलियुग के अंत में, सभी युद्धों में तुम बच्चों की विजय होनी है। क्या? क्या बोला? कौन विजयते? निश्चयबुद्धि विजयते। किस बात पर निश्चयबुद्धि? कि वो निराकार इस साकार तन में प्रैक्टिकल पार्ट बजाय रहा है। इस बात पर जो निश्चयबुद्धि अंत तक रहते हैं वो निश्चयबुद्धि विजयते। सब धरम वालों के ऊपर विजय प्राप्त करते हैं।

गीता में कहा ना। क्या? धर्मक्षेत्रे; हँ? माने सभी धर्मों का युद्धक्षेत्र है ना। फिर बोला है – सर्व धर्मान् परित्यज्य। सब धर्मों को त्याग दे। हँ? ये कोई भी धर्म तुमको बादशाही देने वाले नहीं हैं। क्या? चाहे स्वर्ग में जो पहला पत्ता है वो लेने वाला तो है वो भी तुमको देने वाला नहीं है। इसी तरह इस सृष्टि रूपी वृक्ष में जो और डालियाँ हैं दाईं ओर की, बाईं ओर की, उनमें कोई भी पत्ता नहीं है ऐसा आत्मा रूपी जो तुमको बादशाही दे, राजाई दे। ये राजयोग सिखाकर राजाई का वर्सा, स्वर्ग का वर्सा, विश्व की बादशाही का वर्सा मैं ही तुमको देता हूँ। कौन? शिव। निराकार रूप में रहकर देता है या कोई साकार मनुष्य तन में मुकर्रर रूप से प्रवेश करके देता है? हँ? मुरली में आया ना – दो प्रकार के रथ की बात की। मुकर्रर रथ और टेम्पररी रथ।

A morning class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed was about the record (song). The record (song) was - Takdeer jagaakar aayi hoon. Mai ek nayi duniya basaakar laayi hoon. (I have come with an awakened fortune. I have come with a new world inhabited.) So, this topic is about the head of Vijaymala. When she comes to the field. Which field? It has been called in the Gita as the field of war for the sake of dharma (dharmayuddh). Field of war of actions (karmayuddh). Where does she come from in that field? To whom does she come? She comes when the beads of the spiritual rosary, the Rudramala, who are called the Advance Party, when the task begins on a war-footing, then the Advance Party is moved ahead to prepare the field. So, she comes to them. She says - I have come with my fortune awakened. The one who awakens one's own fortune will be able to awaken others' fortune also. If one's own fortune is not awakened, then he cannot awaken others' fortune as well. I have come with a new world inhabited. Hm? What is the basis of inhabiting a new world? Purity which is formed through unity. Or we may say that unity is formed through purity.

So, it was said - Sweet, sweet, long lost and now found (seekiladhey) children heard this song. He asks the sweet, sweet, seekiladhey children. What kind of seekiladhey [children]? The ones who were separated first of all in the beginning of the Yagya, in the shooting period also. Those children, who are separated from the parents since a long time, meet them with a lot of love. So, BapDada asks. Which BapDada? Hm? It is believed in the world of those so-called Brahmins that Baap (Father) is the incorporeal, point of light Shiv and Dada is the soul of Dada Lekhraj, Brahma. Dada was prefixed even to his worldly name. He must be Dada. But no. The elder brother who is called Dada is the eldest son of the Supreme Father among all the point-like souls, among the brother-like souls, who is called Aadam or called personified Shankar among the Hindus. He has a personality. He is a living personality (chaitanya moorti). So, he is the elder brother, i.e. Dada among the souls. Shiv is Baap (Father). Father of point like souls. And Dada is the most powerful child among those who stabilize in the soul conscious stage. So, both of them play a combined part. It means that in the same body, that incorporeal Shiv, Supreme God Father and the body like Chariot in whom He comes, who may be called Arjun, Aadam; two souls which control one Chariot. The Chariot is the same and there are two souls in the form of protectors of that Chariot. One is the rider of the Chariot (rathi), Arjun. And the other is the one who drives the Chariot. The one who controls the organs of the Chariot. Father Shiv.

So, this BapDada asks. Are you sitting here? Where are you sitting? Are you sitting 'here', i.e. in Madhuban? Hm? What is called Madhuban? It is sung that the flute is played in Madhuban. So, the sweet, sweet Father narrates sweet, sweet Vani (versions). That Vani has been named on the path of Bhakti as Muraliya (flute). But a wooden flute is depicted. What? It is because when the Father Shiv comes in the body of last Brahma, then He narrates sweet, sweet Vani. That is called Vedvani. And that sweet, sweet Vani which sounds sweet to the ears. This is why the notes of flute have been mentioned on the path of Bhakti. But those on the path of Bhakti do not know that why have we depicted the wooden flute? They could show a flute of gold, of silver also. No. They depicted a wooden one because the last Brahma, the holder of the title of Brahma in whom He enters has a wood-like intellect. It means that he does listen to the entire Vedvani with his big ears. What? This is why the eldest son of the Sun in the Mahabharata has been mentioned to be Karna (which literally means ears) among the Pandavas. Even among the Muslims, in the stories that are depicted, there is a companion of the hero actor who has big ears. So, this is also a child of Father Shiv, i.e. Ganesh. What kind of ears? The one with big ears. He listens a lot. And the Vani that Shiv narrates through him, he listens a lot and also narrates a lot through his mouth. So, if any soul performs both these tasks the most in this world, who is it? It is Brahma alias the soul of Krishna who becomes the first leaf of the world tree of the beginning of this Golden Age.

So, it was told - Where are you sitting when you say you are sitting here? The place where the flute is played. It is not the flute of that child Krishna who has a child-like intellect. He does listen and narrate a lot of basic knowledge, but he does not understand anything. Children study in the basic school, don't they? So, they learn a lot by heart. Hm? But the Dohas of Kabirdas, the Kavitts of Tulsidasji, the Dohas, Kavitts of Soordas, which they listen, mug up, narrate, they do not understand their meaning in depth. When some of those children reach the higher class, all do not reach, when the reach the higher class, then they learn their meanings in depth. So, it was said - When they listen to knowledge in the form of basic knowledge, when they narrate it, then that is also called Madhuban only. The flute is played in the Madhuban. So, where are you sitting? You are sitting in Madhuban. Hm? Murli will be said to be of God only. It will not be said to be of child Krishna. Why? He has a child like intellect. On the path of Bhakti is the form of Krishna with a child like intellect worshipped or is a grown up form worshipped? The child like intellect is worshipped. The poor devotees do not know that why do we worship a child? Arey! How will a child teach rajyog? Child and rajyog; how will he know the topics of secret (raaz)? Hm? That how does the world run? Which actions do we perform to run the world? The world is sustained when you derive the pleasures of the organs. So, the children do not know about this topic at all. And they also do not know as to how they become yogis.

So, it was told that you are not sitting in the Gitapathshala of Krishna. Where are you sitting? Hm? You are sitting at the place where Shiv teaches as a Supreme Teacher. So, is that also a Madhuban or not? Hm? The topics that you are getting to listen in the advance knowledge, do they also appear sweet to you or do they also appear bitter? They appear sweet. They appear sweet to you; they appear very bitter to those duplicate Brahmakumar-kumaris. It happens like this in the world. One version spoken by a person appears good [to someone]. Many [of his] versions appear good. Others do not like the same versions. So, you are sitting here. It means that you are sitting in Madhuban, in Madhusudan's Madhuban; so, you feel intoxicated that now I am going to become the master of the world, master of heaven. What? Father Shiv comes only to; He is called the heavenly God Father. Hm? He narrates knowledge and makes you the creator of heaven. Hai (it is) win. It means the Mahaabhaari (fiercest) Mahabharata war. The third world. And although there is also the fourth world war of the Yadavas later on. But be it the time of any world war in the end of the Kalpa (Cycle), in the end of the Iron Age, you children are going to gain victory in all the wars. What? What has been said? Who gains victory? The one who has faith [in God] gains victory. Faith in which topic? That that incorporeal is playing His practical part in this corporeal body. Those who keep faith on this topic till the end, they gain victory. They gain victory over people of all the religions.

It has been said in the Gita, hasn't it been? Dharmakshetre; hm? It means it is the battlefield of all the religions, is not it? Then it has been said - Sarva dharmaan parityajya. Renounce all the religions. Hm? None of these religions are going to give you emperorship. What? Be it the first leaf of the heaven, he is a taker; he too does not give you. Similarly, the other branches of this world tree on the right side, on the left side, there is no soul-like leaf among them who could give you emperorship, kingship. I alone teach this rajyog and give you the inheritance of kingship, inheritance of heaven, inheritance of the emperorship of the world. Who? Shiv. Does He give remaining in the incorporeal form or does He give by entering in a corporeal human body in a permanent manner? Hm? It has been mentioned in the Murli about two kinds of chariots - Permanent Chariot (mukarrar rath) and temporary Chariot.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2492, आडियो 2978, दिनांक 19.04.2018
VCD 2492, Audio 2978, Date 19.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning class dated 18.5.1967
VCD-2492-Bilingual

समय- 00.01-16.15
Time- 00.01-16.15


प्रातः क्लास चल रहा था - 18.5.1967. पहले पेज की चौथी लाइन में बात चल रही थी – अभी। कभी? पुरुषोत्तम संगमयुग में। तुम यहाँ ही बैठे हो। कौन तुम? तुम जो रुद्र ज्ञान यज्ञ के पहलौटी के बच्चे हो रुद्र गण, यहाँ ही बैठे हो। कहाँ बैठे हो? जहाँ भी रुद्र ज्ञान यज्ञ कुंड है। हँ? ये रुद्र ज्ञान यज्ञ कुंड कहाँ है? हँ? जो गीता में बोला है – इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। (गीता – 13/1) हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! ये जो तुम्हारा शरीर रूपी रथ है, ये क्षेत्र है। ये युद्ध क्षेत्र कहो, धर्म क्षेत्र कहो, जितने भी दुनिया में धर्म फैले हुए हैं, उन सब धर्मों का युद्ध क्षेत्र है। इसलिए गीता में कहा – सर्व धर्मान् परित्यज्य। (गीता – 18/66) क्या? सब धर्मों को त्याग दे। ऐसे नहीं कि द्वापर के अंत में सब धर्म होते हैं और भगवान आकरके आदेश देते हैं कि सब धर्मों को त्याग दे। नहीं। वहाँ सिक्ख धर्म कहाँ होता है? होता है? सिक्ख धरम, उस धरम का धरमपिता; कौन? गुरु नानक। वो तो अभी 400-500 वर्ष पहले से आया। तो जरूर कलियुग की बात है ना। सब धर्मों को त्याग दे माना सब धरमपिताओं को भी त्याग दे। और कहाँ आकरके बैठ? यहाँ आकरके बैठ, जो सब धर्मों की युद्ध भूमि का सेन्ट्रल प्लेस है। जिसे कहते हैं; क्या कहते हैं? कहाँ है? भक्तिमार्ग में कहाँ दिखाते हैं? युद्ध क्षेत्र? हँ? कर्मक्षेत्र। युद्धक्षेत्रे कर्मक्षेत्रे। धर्मक्षेत्रे कहाँ दिखाते हैं? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, वो तो क्षेत्र है; कुरु माने कर्म। क्षेत्र माने स्थान। युद्धभूमि का स्थान।

ढ़ेर के ढ़ेर धर्म हैं ना। उन धर्मों के आधार पर जो कर्मकाण्ड बनाए हुए हैं ना, उन कर्मकाण्डों को लेकरके सब आपस में झगड़ रहे हैं कि हम सत्य हैं। हमारे कर्मकाण्ड ठीक हैं। ईश्वर तक पहुँचाने योग्य हैं। तो सर्वधर्मान परित्यज्य। उन सब धर्मों को त्याग दे। सब धर्मों के बनाए हुए कर्मकाण्डों को त्याग दे। मैं जो रास्ता बताता हूँ उस पर चल। कहाँ बताता हूँ? यहाँ। यहाँ माने कहाँ? जो ये अर्जुन का शरीर रूपी रथ है, यहाँ बैठकर बताता हूँ। ये यज्ञकुण्ड है। अविनाशी यज्ञकुण्ड। सारी दुनिया इस यज्ञकुण्ड में स्वाहा हो जाएगी। लेकिन ये अविनाशी ज्ञान यज्ञ इस सृष्टि पर चलता ही रहेगा, चलता ही रहेगा। सतयुग, त्रेता रुपी स्वर्ग में भी जो ज्ञान का सार है ज्योतिबिन्दु आत्मा, देवताएं उस आत्मिक स्वरूप में टिकेंगे। और, और ये आत्मा जिस शरीर का आधार लेती है, वो शरीर रूपी प्रकृति, देह रूपी प्रकृति, उसका विकृत रूप द्वैतवादी द्वापरयुग से शुरू हुआ। जिसे गीता में कहा गया अपराप्रकृति, नीची टाइप की। तो दोनों प्रकार की जो प्रकृति है - पराप्रकृति आत्मभाव वाली और अपराप्रकृति देहभाव वाली। ये दोनों ही शरीर रूपी रथ पर मौजूद हैं। जिसे कहा गया रथ को क्षेत्र। क्षेत्र है तो क्षेत्री भी होगा। क्षेत्री हुआ अर्जुन। उस क्षेत्र का जानकार भी होगा क्षेत्रज्ञ। उस शरीर रूपी रथ का जानकार इस सृष्टि पर कोई आत्मा नहीं होती। कि वो शरीर रूपी रथ इस संसार में क्या है, कौन है, क्या पार्ट बजाता है? वो क्षेत्रज्ञ मैं हूँ। मैं कौन? शिव। जो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है। इसलिए उस अविनाशी शरीर रूपी क्षेत्र कहो, रथ कहो, जैसे आत्मा अविनाशी है, लेकिन वो शरीर भी उस आत्मा का अविनाशी है। इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर वो आत्मा जरूर कोई न कोई शरीर लेकरके ही इस सृष्टि पर रहती है। कल्पांतकाल में सब शरीरों का विनाश हो जाएगा। लेकिन उस आत्मा के शरीर का विनाश नहीं होगा।

तो तुम कहाँ बैठे हो? जहाँ मैं बैठा हूँ, शरीर रूपी रथ पर वहीं पर तुम्हारी आत्मा मन-बुद्धि रूपी; क्या? डेरा जमाके बैठी हुई है। जिस शरीर रूपी साकार रथ को और उस साकार रथ में बैठे हुए निराकार शिव को, दोनों के कम्बिनेशन को तुम कहते हो शिवबाबा। हँ? जिसका यादगार भारत में ढ़ाई हज़ार वर्ष से शिवालयों में दिखाया जाता है शिवलिंग। शिवलिंग में लिंग रूप बड़ा शरीर भी दिखाया गया। परन्तु उसको कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं दिखाते। माना वो ऐसी स्मृति की स्टेज में टिकता है, ऐसी ऊँची स्टेज है कि उसे कर्मेन्द्रियों का, ज्ञानेन्द्रियों का उस आत्मा को भान ही नहीं रहता, तो वो लिंग हो गया देह रूपी प्रकृति की यादगार, जो देह इस सृष्टि पर कल्पांतकाल में भी मौजूद रहती है। इसलिए उसको कहा जाता है कालों का काल महाकाल। जिसको कोई काल खा नहीं सकता। सारी दुनिया को काल खाएगा लेकिन उस शरीर रूपी लिंग को कोई नहीं खा सकता। तो कहाँ बैठे हो? हँ? रुद्र यज्ञ कुण्ड में बैठे हो। आस-पास बैठे हो आहुति देने के लिए। काहे की? तन की, मन की, धन की, समय, संपर्क और संबंधियों की आहुति देने के लिए तुम बच्चे यहाँ बैठे हो। बैठे ही हो। किसके पास बैठे हो? स्वर्ग रचने वाले के पास बैठे हो। हँ? स्वर्ग रचने वाला या स्वर्ग रचने वाले? हँ? स्वर्ग रचने वाले। ‘वाले’ का मतलब दो हैं। एक पुरुष रूपी आत्मा भी है; हँ? जो पुरुषार्थ करती है। नाम है अर्जुन। क्या? ज्ञान का अर्जन करती है। उसके शरीर रूपी रथ में भगवान प्रवेश करता है ना गीता ज्ञान सुनाने के लिए। तो वो अर्जुन आत्मा है ज्योतिबिन्दु। हँ? कौनसी आत्मा है? मनुष्यात्माएं तो इस सृष्टि पर ढ़ेर हैं 500-700 करोड़। लेकिन ये वो आत्मा है जो इस शरीर रूपी रंगमंच पर टाइम टू टाइम 84 के चक्र में 84 प्रकार के शरीर रूपी कपड़े बदलकरके पार्ट बजाती है, हीरो पार्टधारी।

तो इस हीरो पार्टधारी का जो रथ है जिसमें ऊँच ते ऊँच भगवान; कौन? परमेश्वर उससे ऊँचा ईश्वर कोई, शासनकर्ता कोई होता ही नहीं। वहाँ बैठे हो। और ये स्वर्ग रचने वाला कौन है? मैं इस रथ में बैठा हूँ, रथ को चलाने के लिए, इन्द्रियों को चलाने के लिए। तो गीता ज्ञान सुनाने के लिए बैठा हूँ। बाकी, स्वर्ग रचने वाला मैं नहीं हूँ। क्यों? मैं रचयिता हूँ? हँ? नहीं। ये सृष्टि में रचयिता साकार होना चाहिए या निराकार होना चाहिए? सृष्टि कैसी है? साकार। तो रचयिता भी साकार होना चाहिए। तो ये जो अर्जुन है यही साकार शरीर धारण करने वाली आत्मा है। और कैसी है? इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदा सत्य पार्ट बजाने वाली है। हीरो पार्टधारी मुख्य एक्टर। तो ये अकेला है क्या? हँ? आत्मा रूपी जो पुरुष है अर्जुन, ये अकेला सृष्टि रचता है क्या? नहीं। इसको शरीर रूपी प्रकृति, सात्विक प्रकृति लेता है नई सृष्टि रचने के लिए। क्या? योगबल से सात्विक बन जाती है। तो दो हो गई। कौन? एक आत्मा; हँ? ये दोनों ही मेरी प्रकृति हैं। प्रकृति माने स्वभाव। हँ? बाकी मैं तो आत्मभाव वाला हूँ। सिर्फ आत्मभाववाला। पांच तत्वों का मेरे में तो नाम-निशान नहीं है। मैं इस जब सृष्टि पर आता हूँ तो इस पांच तत्व के शरीर का आधार लेता हूँ। जो गीता में लिखा है – प्रकृतिम स्वाम् अवष्ठाय। (गीता 4/6) इस प्रकृति को, देहभाव वाली प्रकृति को कंट्रोल करता हूँ। ऐसे भी बोला है – अवष्ठम्य। (गीता 9/8) कंट्रोल करता हूँ। अर्जुन की आत्मा को कंट्रोल नहीं करता हूँ। उसको स्वतंत्र छोड़ता हूँ। कंट्रोल किसको करता हूँ? शरीर को, शरीर की इन्द्रियों को।

A morning class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the fourth line of the first page was - Now. When? In the Purushottam Sangamyug. You are sitting here only. Who you? You, who are the first lot of children of the Rudra Gyan Yagya, the Rudragans are sitting here only. Where are you sitting? Wherever there is the Rudra Gyan Yagya Kund. Hm? Where is this Rudra Gyan Yagya Kund? Hm? It has been said in the Gita - Idam shareeram kaunteya kshetramityabhidhiiyate. (Gita -13/1) O Arjun, the son of Kunti, your body like Chariot is a field. Call it the battle field (yuddh kshetra), call it the field of religion (dharma kshetra), this is a battlefield of all the religions which are existent in the world. This is why it has been said in the Gita - Sarva dharmaan parityajya. (Gita 18/66) What? Renounce all the religions. It is not as if all the religions exist in the end of the Copper Age and God comes and gives an order that you renounce all the religions. No. Does the Sikh religion exist there? Does it exist? Sikhism; the founder of that religion; who? Guru Nanak. He came just 400-500 years ago. So, it is definitely about the Iron Age, is not it? Renounce all the religions, i.e. renounce all the founders of the religions also. And where should you come and sit? Come and sit here, which is the central place of the battlefield of all the religions which is called; what is it called? Where is it located? Where is it located on the path of Bhakti? The battlefield? Hm? Karmakshetra (field of action). Yuddhakshetre karmakshetre. Where is the field of religion depicted? Hm?
(Someone said something.) Yes, that is a field. Kuru means karma (actions). Kshetra means place. The place of battlefield.

There are numerous religions, aren't there? On the basis of those religions, the rituals that have been framed, everyone is fighting with each other on the issue of those rituals that we are true. Our rituals are correct. They are capable of taking you to God. So, Sarvadharmaan parityajya. Renounce all those religions. Renounce all the rituals formed by all the religions. Follow the path that I show. Where do I show? Here. 'Here' refers to which place? I sit here in the body like Chariot of Arjun and narrate. This is a yagyakund. It is an imperishable yagyakund. The entire world will be sacrificed in this yagyakund. But this imperishable Gyan Yagya will continue in this world. Even in the heaven in the form of Golden Age and Silver Age, the essence of knowledge, the point of light soul, the deities will become constant in that soul form. And, and the body whose support this soul takes, that body like nature (prakriti), its deformed form started from the dualistic Copper Age. It was called Aparaprakriti, of lower type in the Gita. So, the Prakriti of both kinds - Paraprakriti, with soul conscious stage and Aparaprakriti, with body consciousness. Both of them are present in the body like Chariot which Chariot has been called kshetra (field). When there is a kshetra (field), there will be a kshetri (owner of the field) also. Kshetri is Arjun. There will be one Kshetragya also who knows about that kshetra. There is no soul who is knowledgeable about that body like Chariot that what or who is that body like Chariot in this world and what part does he play? I am that Kshetragya. I refers to whom? Shiv, who is beyond the cycle of birth and death. This is why that imperishable body like field, Chariot, just as the soul is imperishable, but that body of that soul is also imperishable. That soul definitely remains in this world only by assuming one or the other body on this world stage. In the end of the Kalpa everyone's body will be destroyed. But the body of that soul will not be destroyed.

So, where are you sitting? The body like Chariot where I am sitting, in the same body your mind and intellect like soul; what? It is sitting with its tents pinned. That body like corporeal Chariot and the incorporeal Shiv who sits in that corporeal Chariot, you call the combination of both as ShivBaba. Hm? Its memorial is shown as a Shivling in the Shivalayas (temples of Shiv) in India since 2500 years. A big body like ling has also been shown in the Shivling. But it is not shown to have organs of action, the sense organs. It means that He becomes constant in such stage of remembrance, his stage is so high that that soul does not have any consciousness of the organs of action, the sense organs. So, that ling happens to be the memorial of the body like nature; that body remains present in this world even in the end of the Kalpa. This is why he is called the 'kaalon ka kaal Mahaakaal'. The one who cannot be devoured by death (kaal). Death will devour the entire world, but nobody can devour that body like ling. So, where are you sitting? Hm? You are sitting in the Rudra Yagya Kund. You are sitting around to make offerings in it. Offerings of what? You children are sitting here to make the offerings of the body, mind, wealth, time, contacts and relationships. You are sitting. With whom are you sitting? You are sitting near the one who creates heaven. Hm? The one who creates heaven or those who create heaven? Hm? Those who create heaven. 'Those' means there are two. There is one purush like soul also, hm, who makes purusharth. The name is Arjun. What? The one who earns knowledge. God enters in his body like Chariot to narrate the knowledge of the Gita. So, that soul Arjun is the point of light. Hm? Which soul? There are numerous, 500-700 crore human souls in this world. But this is that soul, the hero actor, which plays its part on this body like stage from time to time in the cycle of 84 births by changing 84 kinds of cloth like bodies.

So, the Chariot of this hero actor in whom the highest on high God; who? Parmeshwar (supreme God); there is no God, no governor higher than him. You are sitting there. And who is this creator of heaven? I am sitting in this Chariot to run this Chariot, to control the organs. So, I am sitting to narrate the knowledge of Gita. But, I am not the creator of heaven. Why? Am I a creator? Hm? No. Should the creator be corporeal or incorporeal in this world? How is the world? Corporeal. So, the creator should also be corporeal. So, this Arjun is the soul that assumes the corporeal body. And how is it? It plays a true part forever on this world stage. The hero actor, the main actor. So, is he alone? Hm? Does the soul like Purush Arjun create the world alone? No. He adopts the body like nature, the pure nature to create the new world. What? It becomes pure through the power of Yoga. So, it is two. Who? One is the soul; hm? Both of them are My Prakriti. Prakriti means nature. Hm? Otherwise, I am soul conscious. Only soul conscious. There is no name or trace of the five elements in Me. When I come in this world, then I take the support of this body made up of the five elements, which has been written in the Gita as - Prakritim swam avashthaay. (Gita 4/6) I control this nature, this body conscious nature. It has also been said - Avashthamya (Gita 9/8) I control. I do not control the soul of Arjun. I leave it free. Whom do I control? The body, the organs of the body.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2493, आडियो 2979, दिनांक 20.04.2018
VCD 2493, Audio 2979, Date 20.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning Class dated 18.5.1967
VCD-2493-Bilingual

समय- 00.01-15.30
Time- 00.01-15.30


प्रातः क्लास चल रहा था - 18.5.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – दुनिया की जो स्टूडेन्ट लाइफ है उसमें तो जिस्म पढ़ते हैं। और जिस्म पढ़ाते हैं। क्योंकि पढ़ने और पढ़ाने वालों में देह अभिमान तो होता ही है। और यहाँ तो तुम मीठे बच्चे जानते हो कि हम आत्माएं हैं। देह अभिमान तो होता ही नहीं। उन स्टूडेन्ट्स को देही अभिमानी बनना तो मुश्किल है। जानते ही नहीं। हमको तो आत्माओं का बाप पढ़ाते हैं। देखो, ये बड़ी महीन बात है याद करने की। रूहानी स्टेज में बैठेंगे तो रूहानी बाप की बातों को पकड़ेंगे। जब हम आत्माएं योग में रहते हैं, आटोमेटिकली हमारी तंदुरुस्ती भी ऊँची फर्स्टक्लास हो जाती है। यहाँ भी तंदुरुस्ती अच्छी रहती है। और फिर आत्मा पावरफुल होने से जन्म-जन्मान्तर भी तंदुरुस्ती अच्छी रहेगी। ठीक है ना बच्चे।

तो जब यहाँ क्लास में बैठे हो खास। ये बाबा जानते हैं कि जब तुम करम में चले जाते हो, अपने धंधे-धोरी में चले जाते हो, तो ये स्टूडेन्ट लाइफ भूल जाती है जो भूलना तो नहीं चाहिए। क्योंकि इस स्टूडेन्ट लाइफ में वो कौन पढ़ाते हैं? स्टूडेन्ट लाइफ का अर्थ क्या है? स्टूडेन्ट किसको याद करते हैं? अपने टीचर को याद करते हैं। पहले-पहले अपने टीचर को याद करते हैं। और पीछे वो जानते हैं कि हम फलाना इम्तेहान दे रहे हैं फलाना-फलाना बनने के लिए। ये बात तो ठीक है ना बच्ची। और तुम भी स्टूडेन्ट हो। एक तो तुम बच्चे हो बाप के। जरूर बच्चे हो अभी। तो बाप को याद करते रहेंगे और दूसरा स्टडी को पीछे याद करेंगे। क्योंकि तुम्हारा तो बाप भी है वो, और टीचर भी वो ही है। तो स्टडी में तो सभी आ जाता है। योग भी आ जाता है। जिसको याद कहा जाए। और स्टडी में ज्ञान भी आ जाता है।

तो देखो, कितना बाप को याद करने से कितना फायदा रहता है। क्या तुम बच्चों को फायदा रहता है? और बाप को याद करने से ये जानते हो कि हमको वर्सा मिलना है बाप से। बेहद का बाप है, बेहद का वर्सा है तो खुशी का पारा चढ़ जाना चाहिए। तो खुशी में आकरके तुम लोगों को अंदर में जैसे डांस होती है खुशी की। इतना डांस करने जैसी खुशी तुम बच्चों को होनी चाहिए। परन्तु ये हम स्टूडेन्ट हैं, पढ़ाने वाला बेहद का बाप है। और हमारा स्टेटस ये है। वो स्टेटस तो भूल जाते हो। ऐसे स्टूडेन्ट को कभी भूलना नहीं चाहिए कि हम रूहानी स्टूडेन्ट हैं। रूहानी टीचर है।

तो बाबा कहते हैं पहले-पहले तुम्हारा फर्ज़ है अपने बाप को याद करो। जो बाप तुम्हारा सब कुछ है। टीचर भी है, सद्गुरु भी है, और वो ही फिर है भी सब कुछ। तो वो तो और ही सहज हो जाता है। वहाँ तो तीन को अलग-अलग याद करो। बाप अलग होता है। टीचर अलग होता है। और गुरु अलग होता है। बाप को याद करो, टीचर को याद करो, गुरु को याद करो। और उनके अलग-अलग नाम, रूप, देश, काल बुद्धि में लाय करके अलग-अलग याद करो। तो बुद्धि तो भटक जाती है। और यहाँ तो तुमको कितना सहज बताय दिया। क्या सहज बताय दिया? हँ? कि बाप भी एक, टीचर भी एक और सद्गुरु भी एक ही है। तो यहाँ तुमको तो इतनी तकलीफ नहीं करनी पड़ती है। बुद्धि को अलग-अलग नाम, रूप, देश, काल में भटकना तो नहीं पड़ता है। बाप की तरफ जाना चाहिए बुद्धि। देखो, अच्छी तरह से खयाल करो। स्टूडेन्ट है। टीचर की ओर बुद्धि जाएगी। बाप की तरफ में भी तो बुद्धि जाएगी ना बरोबर। मास्टर की तरफ जाएगा। फिर गुरु किया होगा तो उस तरफ में भी जाएगा।

तो दुनिया में तो तीन अलग-अलग रूप साकार में याद करने पड़ते हैं बच्चे। और फिर उसके सिवाय बहुत ही मामा, काका, चाचा, नाना, ताऊ, फलाना, ढिकाना। कहाँ-कहाँ बुद्धि भटकती रहती है। अभी तो बाप कहते हैं – बच्चे, ये तुम्हारे मामा, काका, चाचा, बाबा, उस तरफ में बुद्धि मत भटकाओ। 18.5.67 की वाणी का दूसरा पेज। मैं एक ही हूँ जो तुमको इतना सहज कर देता हूँ। बिल्कुल भटकने से छुड़ाय देता हूँ। बहुत देहधारियों के पिछाड़ी मत पड़ो। मत भटको। एक जो तुम्हारा है विदेही; क्या? जिसको अपना शरीर ही नहीं है। उनको याद करो। और अपन को भी आत्मा समझो। तो ये एक प्रैक्टिस करो बच्चे। और प्रैक्टिस तुम सवेरे में ही अच्छी कर सकते हो। या फिर तुम्हारा दिन में भी चलता रहेगा। क्योंकि तुम तो कहलाती ही हो शिव शक्ति। देखो, कितनी अच्छी बात है। अभी तुम शिव से शक्ति लेते हो। और हर बात की शक्ति लेते हो। उस शिव में सब शक्ति भरी हुई है। देखो, है ना बच्ची सब तरह की शक्ति।

देखो, अभी पहले-पहले से शुरू ही होते हैं - ज्ञान का सागर है, शान्ति का सागर है, सुख का सागर है। तो सागर में कितनी शक्ति हुई। और सागर से क्या होते हैं? सागर से कितनी शक्ति! पानी निकालते हो, सो पीते हैं और जीते हैं। अगर सागर न होता तो फिर तुमको पानी कहाँ से मिलता? बहुत बच्चियाँ हैं जिनको ये मालूम ही नहीं है कि दुनिया में जितना भी पानी बरसता है वो सागर से आता है। और वो पानी ऊपर से आता है। बरसता है ऊपर में। तो देखो, अगर सागर न हो तो पानी मिल सकता है? और ये है ज्ञान सागर। उनसे ज्ञान की खेती होती है। पानी न हो तो खेती तो हो ही नहीं सकती। कुछ भी नहीं। तो देखो सागर एक है और उससे क्या-क्या होता है। कितनी सारी सृष्टि की पालना होती है। तो अब टैली करो। ये है ज्ञान सागर। क्योंकि वो ज्ञान सागर की इतनी महिमा कोई जानते नहीं हैं। शास्त्रों में सागर मंथन दिखाय दिया है तो सागर की महिमा करते हैं। अब ये है ज्ञान सागर। वो है पानी का सागर। और सागर से मिलता क्या है? सागर से ही तो ये शरीर चलता है। हँ? सागर का पानी न हो तो तुमको अन्न मिलेगा? यहाँ फिर तुम्हारा अन्न क्या है? वो जिस्मानी अन्न। जिस्मानी सागर से जिस्मानी अन्न। ये है रूहानी सागर। इससे कौनसा अन्न मिलता है? याद का अन्न मिलता है। तो सब कुछ सागर से मिलता है। तो सागर में कोई कम खूबियाँ हैं? बहुत खूबियाँ हैं।

A morning class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was - in the student life of the world, it is the bodies which study. And it is the bodies which teach because there is body consciousness in those who study and teach. And here you sweet children know that we are souls. There is no body consciousness at all. It is difficult for those students to become soul conscious. They do not know at all. It is the Father of souls who teaches us. Look, this is a very minute topic to remember. If you sit in a spiritual stage, then you will grasp the topics of the spiritual Father. When we souls remain in Yoga, then automatically our health also becomes high, first class. The health remains good here as well. And then, when the soul is powerful, the health would also be good birth by birth. It is correct, is not it children?

So, when you are sitting here especially in the class. This Baba knows that when you start performing actions, when you go for your occupations, then you forget this student life which you shouldn't forget because who teaches in this student life? What is the meaning of student life? Whom do the students remember? They remember their teacher. First of all they remember their teacher. And later on they know that we are giving such and such exam to become such and such thing. This topic is correct, is not it daughter? And you are also a student. On the one hand you are children of the Father. You are definitely children now. So, if you keep on remembering the Father and secondly if you remember the study later on because He is your Father as well as teacher. So, everything is included in study. Yoga is also included which may be called remembrance. And knowledge is also included in study.

So, look, there is so much benefit in remembering the Father. What is the benefit that you children get? And you know that by remembering the Father we have to get inheritance from the Father. When the Father is unlimited, when the inheritance is unlimited, then the mercury of joy should rise. So, it is as if you people dance in joy inside. You children should feel so happy that you start dancing. But you forget that we are students, the one who teaches us is the unlimited Father and this is our status. You forget that status. Students should never forget that we are spiritual students. Our teacher is spiritual.

So, Baba says - First of all it is your duty to remember your Father, the Father who is everything for you. He is a teacher as well as Sadguru; and then He is everything for you. So, that becomes easier. There you have to remember all the three separately. The Father is different. The teacher is different. And the guru is different. Remember the Father, remember the teacher, remember the guru. And remember them separately by bringing their different names, forms, countries, time to the mind. So, the intellect wanders. And here you have been told in such a simple manner. What has been told in a simple manner? Hm? That the Father is also one, the Teacher is also one and the Sadguru is also one. So, here you don't have o face much difficulties. The intellect need not wander in different names, forms, countries, times. The intellect should go towards the Father. Look, think carefully. There is a student. His intellect will go towards the teacher. The intellect will also definitely go towards the Father, will it not? It will go towards the master. Then, if he has become the disciple of a guru, then it will go towards him also.

So, children, you have to remember three different forms in corporeal form in the world. And then apart from that there is the maternal uncle (Mama), paternal uncle (kaka, chacha), maternal grandfather (nana), Father's elder brother (taau), etc. The intellect keeps on wandering in so many. Now the Father says - Children, do not wander your intellect towards your Mama, Kaka, Chacha, Baba. Second page of the Vani dated 18.5.67. I am the only one who makes it so easy for you. I make you completely free from wandering. Do not run after many bodily beings. Do not wander. The one bodiless (videhi) who belongs to you; what? Remember the one who does not have a body of His own. And consider yourself also to be a soul. So, practice this children. And you can make good practice in the mornings only. Or you can think in the daytime also because you are known as Shivshaktis. Look, it is so nice. Now you obtain power from Shiv. And you obtain power in every aspect. The entire power is contained in that Shiv. Look, daughter, it is all kinds of power, is not it?

Look, now first of all it starts - He is ocean of knowledge, ocean of peace, ocean of happiness. So, there is so much power in the ocean. And what else is there in the ocean? There is so much power in the ocean! You extract water, which you drink and live. Had the ocean been non-existent, then where would you have obtained water from? There are many daughters who do not know that whatever rainfall happens in the world comes from the ocean. And that water comes from above. It falls from above. So, look, had the ocean not existed, can you get water? And this is an ocean of knowledge. Farming of knowledge takes place through it. There cannot be any farming if there is no water. Nothing. So, look, ocean is one and what all happens through it. The entire world is sustained through it. So, now tally. This is an ocean of knowledge because nobody knows the glory of that ocean of knowledge. Churning of ocean is shown in the scriptures; so, ocean is praised. Well, this is an ocean of knowledge. That is an ocean of water. And what is obtained from the ocean? This body functions because of ocean only. Hm? If there is no water of ocean, then will you get food grains? Then, what is your food grain? That is physical food grain. You get physical food grain from physical ocean. This is spiritual ocean. Which food grain do you receive from it? You get the food grain of remembrance. So, you get everything from ocean. So, are there any less specialties in the ocean? There are many specialties.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 06 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2494, आडियो 2980, दिनांक 21.04.2018
VCD 2494, Audio 2980, Date 21.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning Class dated 18.5.1967
VCD-2494-Bilingual

समय- 00.01-19.54
Time- 00.01-19.54


प्रातः क्लास चल रहा था 18.5.1967. पांचवें पेज के आदि में बात चल रही थी - यहां बाबा तुमको रिफ्रेश करते हैं और डायरेक्शन देते हैं ना। तो बाबा ने जो डायरेक्शन दिया तो तुमको नशा रहेगा। जो डायरेक्शन देते हैं ये नशा रहना चाहिए बुद्धि में कि हमको किसने डायरेक्शन दिया। एक तो पहले नशा बताया कि हम यहां बैठे हैं गॉड फादरली यूनिवर्सिटी में। और पढ़ाते कौन हैं? ऊँच ते ऊँच सुप्रीम टीचर। और हम पढ़ते हैं। और क्या पढ़ते हैं? हम कोई विनाशी पढ़ाई नहीं पढ़ते हैं। दुनिया में तो पंच भूतों की पढ़ाई पढ़ाई जाती है। इन पंच भूतों से ये देह बनती है। देह तो विनाशी है। और आत्मा तो अविनाशी है। तो हम तो आत्मा के रिफ्रेश होने की पढ़ाई पढ़ते हैं। और ये रिफ्रेश एक बार ही होती है। जन्म-जन्मांतर फिर यह रिफ्रेशनेस चलती रहती है। तो कितना क्या होना चाहिए।

और गीत भी पहले ऐसे है ना - तकदीर जगा कर आई हूँ। तकदीर यहां जगती है। तो पूरे कल्प में एक ही बार तकदीर जगती है जन्म-जन्मांतर के लिए। गीत में क्या सुनाया? किसी ने कहा - तकदीर जगा कर आई हूँ। तकदीर? अरे, तकदीर तो देखो अपनी कैसी है? तुम्हारी जैसी तकदीर तो दुनियावी कोई स्टूडेंट्स की हो ही नहीं सकती। और इस अंतिम जन्म में देखो माया ने पूरी लकीर लगा दी। माया की दुनिया में तो मायावी पढ़ाई है ना। एकदम लकीर लगा दी। बिल्कुल ही कमबख्त बना दिया है। देखो, भारत कितना कमबख्त हो पड़ा है। और कितना बख्तावर बनाया था बाप ने। कमबख्त के अगेंस्ट बख्तावर। कितना जमीन आसमान का अंतर है। उफ! बात मत पूछो।

भारत में अरे यह चित्र ही देखो ना बच्चे। कैसे जिंजे हुए रहते हैं। और उसके बदली में ये ऐसी सभी क्या-क्या चित्र बनाय दिया है। वंडरफुल बनाय दिया। अभी देखो जो बनाते हैं, अच्छे-अच्छे बनाते हैं। ये बिड़ला है। कितने ऑल इंडिया में बिड़ला मंदिर बनाए हैं। अभी वो इनके भी कान पर पड़ेंगे ना कि भई बिड़ला मंदिर में जो चित्र बनाए हैं लक्ष्मी-नारायण के ये तो अभी इस समय में ही तैयार हो रहे हैं। ये भारत फिर स्वर्ग बन जाएगा। और भारत में लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन हो रहा है। और वो सोचेंगे हम तो ये पत्थर के बैठ बनाते हैं बिड़ला मंदिर में। और यहां तो देखेंगे कि चैतन्य में लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन हो रहा है। वो पत्थर के बनाते हैं। समझा? और बाप आकर पत्थर से पारस बुद्धि बनाय देते हैं। देखो मनुष्यों ने क्या बनाय दिया और बाप आकर क्या बनाय देते हैं। समझा ना। और बाप ने जो बनाया सतयुग आदि में सोलह कला संपूर्ण, सर्वगुण संपन्न, संपूर्ण अहिंसक, मर्यादा पुरुषोत्तम। अभी 84 जनम भोग नीचे उतरते-उतरते अभी फिर से ये बन रहे हैं। अभी 84वें अंतिम जन्म में हैं।

बाबा ने समझाया ना। मातेश्वरी जगदंबा, जगतपिता। तो अभी जगदंबा जगतपिता, बरोबर आत्माओं का पिता। किन आत्माओं का पिता? मनुष्य आत्माओं का पिता। सारे जगत के सारे मनुष्य आत्माओं का पिता। ये हुआ मनुष्यों का पिता। फिर सारे जगत की जो आत्माएं हैं उनका पिता शिव। अच्छा! फिर जगदंबा। अभी अंबा का। वो तो हुई जिस्मानी। क्योंकि महाकाली का रूप धारण करती है तो मारामार, काटाकाट, कितनी हिंसक बन जाती है। जिस्मानी है ना। तो पिता भी जिस्मानी चाहिए। तो बरोबर कहा जाता है जगदंबा, प्रजापिता ब्रह्मा। वो भी तो हो गया ना। सारी प्रजा का पिता। बाप एक ही हुआ ना। जगत का बाप हो गया ना। अच्छा, अभी ये तुम जानते हो कि बरोबर उनसे ये वर्सा मिलता है। किनसे? जगतपिता, जगदंबा से। क्या वर्सा मिलता है? नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनते हैं। परंतु ये तो कल्प-कल्प बनते हैं। ये कोई नई बात तो नहीं है। तो देखो अंबा सारे जगत की। और बाबा, सो भी सारे जगत का। तो ज़रूर अंबा बाबा है। तो उनको इतना वर्सा भी तो मिलता होगा ना। और कोई तो इनको वर्सा होगा ना। हँ? क्या वर्सा होगा? जगदंबा, जगतपिता का वर्से का क्या वैल्यू? कितना बड़ा? हँ? जगत का पिता है तो जगत का पति भी होगा। विश्व का मालिक हुआ ना।

तो देखो, इस समय में वो जगदंबा बाप से वर्सा लेती है। कौन सा वर्सा? हँ? जो सिक्खों में गाया जाता है - राज करेगा खालसा। जगत की महारानी बन जाती है। जगतपिता महाराजा बन जाते। फिर उस अंबा और बाबा के बच्चे तो होने ही है ना। सारे जगत का राज्य, वो एक ही तो नहीं संभालेंगे ना। देखो, कितने ढेर के ढेर बच्चे हैं। तुम क्या करते हो? हम, हम विश्व का मालिक बनते हैं क्योंकि मम्मा बाबा भी मालिक बनते हैं, तो हम भी मालिक बनते हैं। गाया हुआ है यथा राजा तथा प्रजा। सच्चा-सच्चा वसुधैव कुटुंबकम ये हुआ। बच्चे कहते हैं ना। क्या कहते हैं? कि बाप की प्रॉपर्टी सो हमारी प्रॉपर्टी। हम भी मालिक।

अच्छा, ये बैठकरके बाबा कहते हैं कि सुबह को उठो और इन बातों पर बैठ कर के विचार करो कि तुम क्या पढ़ाई पढ़ते हो और कौन सा पद पाते हो। विचार सागर मंथन इसको कहा जाता है क्योंकि एक तो वो तो लिख दिया है शास्त्रों में। वो सागर मंथन हुआ। फिर वो रस्सी बनाई। हँ? काहे की रस्सी बनाई? हँ? सांप की रस्सी बनाई। फिर वो फलाना बनाया। क्या? मेरु पर्वत की मथानी बनाई और मथानी कछुए के ऊपर लगा दी। देखो क्या क्या बनाया है! फिर उनको बैठ करके घुमाया तो वो ज्ञान कलश निकला, अमृत कलश। वो बैठा तो वो असुर भी बैठ करके सुनते थे। देवताओं के साथ-साथ असुर भी बैठ पीते थे अमृत। तो बात कहां की है? यहां की बात है ना। तो देखो कितनी वाह्यात कथाएं बना दी हैं। ये भक्ति मार्ग की कथाएं हैं ना बच्चे। अभी बैठे हो। गीत सुनते हो तो हम तकदीर बना कर आई हूँ। कौन सी तकदीर? हँ? तकदीर बना कर आई हूँ। तो मंथन किया हुआ माल मिलता है या मंथन करना पड़ता है? हँ? करना पड़ता है? जो तकदीर जगा कर आई हूं, जो कहने वाली है, उसको मंथन करना पड़ता है कि मंथन किया हुआ मिलता है? तो ये भी तकदीर जगा कर आई हूं। स्कूल में जब भी बैठा जाता है तो तकदीर बनाई जाती है। बैठकर के पढ़ाई पढ़ते हैं ना। जब जाते हैं गुरु के पास, वो दुनिया में गुरु के पास जाते हैं, गुरु करते हैं तो क्या तकदीर बनाते हैं? कुछ नहीं। बिल्कुल कोई तकदीर नहीं बनती। जरा भी नहीं बनती। और यहां? यहां तुम ऐसी तकदीर बना कर आई हो कि तुम्हें सारा माल तैयार मिलता है।

A morning class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the fifth page was - Here Baba refreshes you and gives directions, doesn't He? So, when Baba gave directions, then you will feel intoxicated. He gives directions; so you should feel intoxicated in the intellect that who has given us directions? The first intoxication that was mentioned was that we are sitting here in the God Fatherly University. And who teaches us? The highest on high Supreme Teacher. And we study. And what do we study? We do not study any perishable knowledge. Knowledge of the five elements is taught in the world. This body is made up of these five elements. The body is perishable. And the soul is imperishable. So, we study knowledge for the refreshment of the soul. And this refreshment takes place only once. Then this refreshness continues birth by birth. So, one should feel so much.

And the song is also initially like this - Takdeer jagaakar aayi hoon (I have come with my fortune awakened). The fortune is awakened here. So, the fortune is awakened for many births only once in the entire Kalpa. What was narrated in the song? Someone said - I have come with my fortune awakened. Fortune? Arey, look how your fortune is? No worldly students can have a fortune like you. And look, in this last birth Maya has completely cut your fortune. There is an illusive (mayavi) knowledge in the world of Maya, is not it? It has completely cut it. She has made you a complete wretch (kambakht). Look, India has become such a wretch. And the Father had made you so worthy (bakhtaawar). Bakhtaawar is against kambakht. There is a difference of Earth and sky. Uff! Just don't ask.

Children, just look at this picture in India. ... And instead of it they have made all these pictures. They have made it wonderful. Now look, whatever they make, they make nice ones only. There is this Birla. He has built so many Birla temples all over India. Now, the word will reach his ears also, that brother, the pictures of Lakshmi-Narayan that have been drawn in the Birla temples are getting ready now. This India will then become heaven. And the kingdom of Lakshmi-Narayan is getting ready in India. And they will think that we are sitting and preparing idols of stone in the Birla Temple. And here, they will see that the kingdom of Lakshmi-Narayan is getting established in a living form. They build with stones. Did you understand? And the Father comes and transforms you from stone-like intellect (pattharbuddhi) to elixir-like intellect (paarasbuddhi). Look, what did the human beings make and what does the Father comes and makes. Did you understand? And the Father made you perfect in 16 celestial degrees, perfect in all the virtues, completely non-violent, Maryadas Purushottam (highest among all souls). Now, after passing through 84 births, while descending, we are once again becoming this. Now we are in the 84th last birth.

Baba has explained, hasn't he? Mateshwari Jagdamba, Jagatpita. So, now Jagdamba, Jagatpita, definitely the Father of souls. Father of which souls? Father of human souls. Father of all the human souls of the entire world. This is the Father of human beings. Then Shiv, the Father of the souls of the entire world. Achcha! Then Jagdamba. Now, of Amba. She is physical because when she assumes the form of Mahakali, then she indulges in bloodshed, she becomes so violent. She is physical, is not she? So, the Father is also required to be physical. So, definitely it is said - Jagdamba, Prajapita Brahma. He also happens to be the Father of all the subjects (praja), is not he? The Father is only one, is not He? He is the Father of the world, is not he? Achcha, now you know that definitely we get this inheritance from them. From whom? From Jagatpita, Jagdamba. What inheritance do you get? You become Narayan from nar (man) and Lakshmi from naari (woman). But you become this every Kalpa. This is not a new thing. So, look, the mother (Amba) of the entire world. And Baba, that too for the entire world. So, definitely they are Amba, Baba. So, they must also be getting so much inheritance also, will they not? And they must have some inheritance, will they not? Hm? What inheritance will they have? What is the value of the inheritance of Jagdamba, Jagatpita? How big? Hm? When he is the Father (pita) of the world, then he would also be the husband (pati) of the world. He is the master of the world, is not he?

So, look, at this time that Jagdamba obtains inheritance from the Father. Which inheritance? Hm? It is sung among the Sikhs - Raaj karega khaalsaa. She becomes the Empress of the world. Jagatpita becomes the Emperor of the world. Then that Amba and Baba will definitely have children, will they not? The kingship of the entire world will not be handled by them alone, will they? Look, there are numerous children. What do you do? We, we become masters of the world because Mama Baba also become masters of the world; so, we too become masters. It is sung - As is the king, so are the subjects. This is the true Vasudhaiv Kutumbkam (one world family). Children say, don't they? What do they say? That the Father's property is our property. We too are masters.

Achcha, this Baba sits and says - Wake up in the morning and sit and think over these topics that what is the knowledge you study and what is the post that you achieve. This is called the churning of the ocean of thoughts (vichaar saagar manthan) because on the one hand it has been written in the scriptures that the churning of ocean took place. Then that rope was made. Hm? The rope was made with what? Hm? The rope of snake was made. Then that thing was made. What? Mount Meru was made the churning stick (mathaani) and the churning stick was fixed on the turtle. Look, what all have been made! Then they sat and rotated it; so, the pot of knowledge emerged, the pot of nectar. When he sat, then those demons also used to sit and listen. Along with the deities, the demons also used to drink the nectar. So, it is a topic of which place? It is a topic of this place, is not it? So, look, these are such meaningless stories that have been penned. These are stories of the path of Bhakti, aren't they children? Now you are sitting. You listen to the song that I have come with my fortune awakened. Which fortune? Hm? I have come with my fortune awakened. So, do you get churned material or do you have to churn? Hm? Do you have to? The one who says that I have come with my fortune awakened, does she have to churn or does she get churned material? So, this is also a fortune that I have come awakened with. When someone sits in a school, then the fortune is built. They sit and study knowledge, don't they? When they go to the Guru, when they go to the Guru in the world, when they become disciples of a Guru, then what is the fortune that they build? Nothing. They do not build any fortune absolutely. Not even slightly. And here? Here you have come with such fortune awakened that you get everything readymade.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2495, आडियो 2981, दिनांक 22.04.2018
VCD 2495, Audio 2981, Date 22.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning Class dated 18.5.2018
VCD-2495-Bilingual

समय- 00.01-17.35
Time- 00.01-17.35


प्रातः क्लास चल रहा था - 18.5.1967. छठे पेज की अंतिम लाइन में बात चल रही थी – हम बाबा के बच्चे हैं। हँ? किसके बच्चे हैं? बाबा के या बाप के? किसके बच्चे हैं? हँ? हँ। शिवबाबा। हँ? तो हम शिवबाबा के बच्चे हैं। हँ? और बाबा हमको अभी वर्सा देने आए हैं। हँ? बाबा हमको वर्सा दने आए। कहाँ से आए हैं? हँ? अरे! बाबा कहाँ से? (किसी ने कुछ कहा।) परमधाम से आते हैं? वाह भई। बाबा तो ग्रैण्डफादर को कहा जाता है। ग्रैण्डफादर परमधाम में बैठता है? हँ? ग्रैण्डफादर? बाबा? हँ? और? (किसी ने कुछ कहा।) ऊँची स्टेज में बैठता है? बाबा? बाबा ऊँची स्टेज में बैठता है? लो! अरे एक बात करो ना। कभी कहते हो कि साकार आत्मा और निराकारी आत्मा जो सदा शिव है, वो कभी साकारी बनती नहीं, इन दोनों आत्माओं का मेल बाबा कहा जाता है। कभी कहते बाबा ऊपर से आता है। अरे! जो ऊपर से आऩे वाला, सूरज, चाँद, सितारों की दुनिया से पार से आता है, वो तो आत्माओं का, बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का बाप है। उसको शरीर तो है ही नहीं। तो वो तो ऊपर से आता है। लेकिन यहाँ ऊपर से आने वाले को, जिसको बाप कहा जाता है, सुप्रीम फादर, उसकी बात थोड़ेही पूछी जा रही है? यहाँ तो बाबा की बात पूछी जा रही है। बाबा हमको अभी संगम में वर्सा देने आए हैं। हँ? बताओ। अरे? अरे? इस पहेली का कोई हल नहीं है? हँ?

अरे, बाबा हमको अभी वर्सा देने आए हैं। कौन बोल रहा है? अरे! कौन बोल रहा है? ये भी भूल गए। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा वर्सा देते हैं? लो। एक नई बात और सुनो। वो दाढ़ी-मूँछ वाले ब्रह्मा बाबा से वर्सा लेना है। दाढ़ी-मूँछ वाले खुद ही विकारी होते हैं तो वो काहे का वर्सा देंगे? ले लो।
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? शिवबाबा बोल रहे हैं? कहाँ से आए शिवबाबा? हँ? अरे शिवबाबा कहाँ से आए? जिसको हम शिवबाबा कहते हैं वो इस सृष्टि की बात है या परमधाम की बात है? आत्माओं के लोक की बात है? हँ? तो इसी सृष्टि पे हैं तो आए कहाँ से? अच्छा, यही बता दो कि ये वाक्य कौन आत्मा बोल रही है? अरे, आत्मा बोलती है कि शरीर बोलता है जड़? शिव बाप की आत्मा बोल रही है? वो, उसको वर्सा मिलेगा? बाबा हमको अभी वर्सा देने आए हैं। शिवबाबा बोल रहा है? शिव बाप? शिव बाप? हँ? शिव बाप की तो यहाँ बात ही नहीं हो रही है। यहाँ तो बाबा की बात हो रही है। अरे, ये वाक्य बोलने वाला है मनुष्य सृष्टि का बाप। क्या? जिसमें शिव बाप प्रवेश करते हैं। वो बोलता है बाबा। किसको बोलता है बाबा? वो बिन्दी को बोलता है बाबा या साकार मनुष्य सृष्टि में किसी व्यक्ति को बोलता है बाबा? बिन्दी को बोलता है।

बाबा हमको अभी। अभी माने संगमयुग में; हमको। हमको माने? हँ? हमको माने किसको? एक को या ज्यादा को? हँ? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) ज्यादा बच्चों को? ज्यादा बच्चों को हम कहा जाता है। एक को कहा जाता है मैं, मुझको। तो बाबा हमको। हमको में कम से कम दो तो होंगे। तो कौन-कौन हैं दो? (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा? ये बातें सब लक्ष्मी के सामने बैठ के बोलते हैं? हँ? लक्ष्मी सामने बैठती है? बैठती है? अरे! लक्ष्मी नारायण से वर्सा लेती है या लक्ष्मी ज्ञान का वर्सा बिन्दु-बिन्दु आत्माओं के बाप से लेती है डायरेक्ट? (किसी ने कुछ कहा।) जगदंबा के लिए बोला? माना जगदम्बा अभी घूंघट में नहीं है। तुम्हारे सामने घूंघट खोल दिया है। हे भगवान! (किसी ने कुछ कहा।) हँ। हमको का माने एक व्यक्ति नहीं है। कम से कम दो हैं। ज्यादा भी हो सकते हैं। तो बोलने वाली आत्मा कौन? आदम। और हमको किसके लिए कहा? हँ? ये क्या? आठ के लिए कहा ज्यादा से ज्यादा। माना जो वर्सा देंगे हमको। बाबा बोला माना आदम की आत्मा बोली कि हमको जो अभी संगम में वर्सा देते हैं वो वर्सा कौनसा वर्सा है? हँ? स्वर्ग का वर्सा है? कि कोई और वर्सा है? ज्ञान का वर्सा देने आए हैं। क्या? ये अखूट ज्ञान का भण्डार है ना शिव बाप ज्योति बिन्दु। जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है इसलिए सारा ज्ञान उसकी आत्मा में भरा हुआ है, जन्म-जन्मान्तर का भरा हुआ है।

तो वो ज्ञान का अखूट वर्सा देने के लिए बाबा अभी संगमयुग में आए हैं। हँ? कहाँ से आए हैं? बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का जो धाम है गीता में बताया – तद्धाम परमम मम। जहाँ सूरज, चाँद, सितारों का प्रकाश नहीं पहुँचता। उससे भी जो पार है पारलोक, ब्रह्मलोक, सुप्रीम अबोड, मुसलमान कहते हैं अर्श, वहाँ से आए हैं। आत्मा को तो आत्मा ही कहेंगे। हँ? आत्मा को कोई देह तो नहीं कहेंगे। तो ये ज्ञान का वर्सा कौन लेती है? आत्मा ही लेती है ना। तो जो आत्मिक स्थिति में पूरे टिकते हैं वो ही वर्सा लेते हैं। हँ? अपनी-अपनी दुनिया का अखूट वर्सा लेते हैं। कितने हैं वर्सा लेने वाले ज्यादा से ज्यादा? आठ। उनका नाम होता है शास्त्रों में वसु। वसु माने धन-संपत्ति। क्या? निराकार में कहें तो एक ही है धन-संपत्ति स्वरूप शिव। और इस साकार सृष्टि में आता है, तो कोई आठ सितारे हैं जिनकी अपनी-अपनी दुनिया है। क्या? उस दुनिया में जो अपनी-अपनी दुनिया का अखूट ज्ञान का भण्डार है वो आठ लेते हैं। इसलिए उनका नाम आठ वसु गाये जाते हैं। तो आत्मा का अभिमानी बनना। क्या? वर्सा तो ज्ञान का देने आए हैं ना। तो जिनको ज्ञान का वर्सा मिलता है, उनकी संख्या ज्यादा से ज्यादा आठ है। और नंबरवार है। आठों वसु जो हैं; छोटे-बड़े तो होंगे ना। तो जो आत्मिक स्थिति का वर्सा लेते हैं, उनके लिए शर्त ये है कि आत्मा का अभिमानी बनना पड़े। क्या? उनको देह का अभिमान नाम मात्र भी न रहे। देह का कोई अहंकार न रहे। तब वो वर्सा मिलता है, उनको अपनी-अपनी दुनिया का; वो सितारे हैं ना आत्मा रूपी। तो उनको अपनी-अपनी दुनिया का वर्सा मिलता है।

और इस आत्माभिमानी बनने में थोड़ी मेहनत है। क्या? बाबा बहुत मेहनत नहीं देते हैं। थोड़ी मेहनत दे देते हैं। क्या? कि अपनी देह को भूल जाओ। क्या? ये जो देह रूपी दुंब लटका हुआ है ना आत्मा के पीछे, इसको भूल जाओ। 18.5.67 की वाणी का सातवाँ पेज। तो फिर उनको पहले-पहले ये भूल जाकर बताओ समझाने वालों को। जो समझने के लिए आतुर हैं लेकिन आते नहीं हैं; बड़ी कुर्सी वाले होंगे आज की दुनिया के। तो उनको पहले-पहले ये भूल जाकर बताओ। क्या भूल? बड़े ते बड़ी भूल क्या बताई ज्ञान की? हँ? एकज भूल है जिस भूल के कारण सारी दुनिया भूली हुई है। हँ? वो भूल है गीता का भगवान बच्चे को बताय दिया जिस बच्चे की पूजा करते हैं। कृष्ण बच्चा। पूजा तो पवित्र की ही की जाएगी ना। हँ? जिसमें पवित्रता नहीं होती है वो तो राक्षस कहे जाते हैं। हँ? जो कर्मेन्द्रियाँ हैं ना उन कर्मेन्द्रियों का राक्षसी कर्म करते हैं। जैसे कामेन्द्रिय। तो जो हिंसक हैं उनको बताया कि सारी सृष्टि हिंसक बनाय दी। तो बच्चों को बताया कि तुम्हें आज की दुनिया के जो गद्दीनशीन हैं, चाहे समाज में, चाहे वो धर्मक्षेत्र में, चाहे राज्यक्षेत्र में गद्दियों पर बैठे हुए हैं, वो तुम्हारे पास मारे अहंकार के नहीं आ रहे; देह अहंकार चढ़ा हुआ है।

तो पहले-पहले तुम उनको ये भूल जाके बताओ। क्या? गीता खण्डन की हुई है। कैसे खण्डन कर दी? गीता, जिसमें राजयोग का ज्ञान है, राजाई कैसे प्राप्त होती है इस ज्ञान से वो राज़ भरा हुआ है। क्या राजाई? दुनिया में जो राजाइयाँ चली हैं वो राजाइयाँ तो हिंसक युद्ध करके उन्होंने राजाइयाँ प्राप्त की हैं। लेकिन भगवान इतनी ऊँची चीज़ हिंसा करना थोड़ेही सिखाएगा? तो ये भूल जाकर बताओ कि भगवान ने तो जो राजयोग की बात सिखाई थी वो हिंसा की बात नहीं सिखाई। वो तो ये बताया है गीता में काम एश क्रोध एश रजोगुण समुद्भव। ये काम और क्रोध जो हैं ये रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। और रजोगुण देवताओं में नहीं होता। सात्विक गुण प्रधान होता है उनमें। तो ये जो कृष्ण का नाम डाल दिया है वो तो बच्चा है। भले 16 कला संपूर्ण पवित्र है। हँ? तो उस पवित्र की पूजा होती है। बड़े कृष्ण की तो पूजा नहीं होती। क्यों? कहते हैं बड़ा कृष्ण था तो उसको तो 8 पटरानियाँ थीं, 16000 रानियाँ थीं, ये था, वो था, इतने बच्चे थे। तो पवित्र थोड़ेही रहा। उस पवित्र की पूजा करते हैं, बच्चा की। वो तो ठीक है। लेकिन बच्चा राज़ की बातें क्या जानेगा? क्या राज़? कि इन्द्रियों के ऊपर जीत पाएंगे तो विश्व की बादशाही मिलेगी। इन्द्रिय जीते जगत जीत। अब बच्चा इस बात को क्या जाने कि इन्द्रियों को कैसे जीतना होता है। हँ? तो ये भूल जाके उनको बताओ कि गीता में जो कृष्ण का नाम डाल दिया है ये बड़ी भारी भूल हो गई। ये भूल करने से दुनिया के जो और धर्म के धरमपिताएं और उनके फालोअर्स हैं वो कृष्ण को भगवान मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होते।

A morning class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last line of the sixth page was - We are Baba's children. Hm? Whose children are we? Of Baba or of the Father? Whose children are we? Hm? Hm. ShivBaba. Hm? So, we are ShivBaba's children. Hm? And Baba has come to give us inheritance now. Hm? Baba has come to give us inheritance. From where has He come? Hm? Arey! From where Baba?
(Someone said something.) Does He come from the Supreme Abode? Wow brother! Grandfather is called Baba. Does a grandfather sit in the Supreme Abode? Hm? Grandfather? Baba? Hm? And? (Someone said something.) Does He sit in a high stage? Baba? Does Baba sit in a high stage? Arey! Stick to one topic, will you not? Sometimes you say corporeal soul and incorporeal soul, who is Sadaa Shiv, never becomes corporeal; the combination of both these souls is called Baba. Sometimes you say that Baba comes from above. Arey! The one who comes from above, the one who comes from across the world of the Sun, the Moon, the stars, is the Father of souls, the point like souls. He does not have a body at all. So, He comes from above. But here, the topic of the one who comes from above, who is called the Father, the Supreme Father is not being asked. It is the topic of Baba is being asked. Baba has now come to give us inheritance in the Confluence Age. Hm? Tell. Arey? Arey? Is there no solution to this riddle? Hm?

Arey, Baba has come to give us inheritance now. Who is speaking? Arey! Who is speaking? You have forgotten this also. Hm?
(Someone said something.) Does Brahma Baba give inheritance? Look. Listen to one more new topic. You have to obtain inheritance from that Brahma Baba with beard and moustache. Those with beard and moustache are themselves vicious; so, what inheritance will they give? Obtain. (Someone said something.) Hm? Is ShivBaba speaking? From where did ShivBaba come? Hm? Arey, where did ShivBaba come from? The one whom we call ShivBaba, is that about this world or about the Supreme Abode? Is it about the abode of the souls? Hm? So, if He is in this world itself, then where did He come from? Achcha, at least tell that which soul is speaking this sentence? Arey, does the soul speak or does the non-living body speak? Is the soul of Father Shiv speaking? He? Will He get inheritance? Baba has now come to give us inheritance. Is ShivBaba speaking? Father Shiv? Father Shiv? Hm? The topic of Father Shiv is not being discussed here. Here, the topic of Baba is being discussed. Arey, the one who is speaking this sentence is the Father of human world. What? The one in whom the Father Shiv enters. He says - Baba. Whom does He call Baba? Does he utter Baba for a point or does he call any person in the corporeal human world as Baba? He calls a point [as Baba].

Baba, now, to us. 'Now' means 'in the Confluence Age'. Us. What is meant by us? Hm? Us refers to whom? To one or to more? Hm? Hm?
(Someone said something.) To more children? More children are called 'us'. One is called I, Me. So, Baba, to us. 'Us' will include at least two. So, who are the two? (Someone said something.) Achcha? Are all these topics spoken sitting in front of Lakshmi? Hm? Does Lakshmi sit in the front? Does she sit? Arey! Does Lakshmi obtain inheritance from Narayan or does Lakshmi obtain the inheritance of knowledge direct from the Father of point like souls? (Someone said something.) Was it said for Jagdamba? It means that Jagdamba is not under a veil (ghoonghat) now. She has opened the veil in front of you. O God! (Someone said something.) Hm. Us means it is not one person. There are at least two. There could be more. So, which soul is speaking? Aadam. And for whom was 'us' said? Hm? What is this? It was said for at the most eight. It means the one who will give us inheritance. He said Baba means that the soul of Aadam said that the one who gives us inheritance now in this Confluence Age, gives us which inheritance? Hm? Is it the inheritance of heaven? Or is it any other inheritance? He has come to give the inheritance of knowledge. What? This Father Shiv, the point of light is an inexhaustible store house of knowledge, is not He? He does not pass through the cycle of birth and death. This is why the entire knowledge of birth by birth is contained in His soul.

So, Baba has now come in the Confluence Age to give that inexhaustible inheritance of knowledge. Hm? Where has He come from? The abode of the point like souls, which has been mentioned in the Gita as - Tad dhaam paramam mam. The place where the light of the Sun, the Moon, the stars does not reach. The place farther from that, the Paarlok, the Brahmlok, the Supreme Abode, the Muslims call it Arsh; He has come from there. The soul will be called a soul only. Hm? Soul will not be called a body. So, who obtains this inheritance of knowledge? It is the soul only which obtains, doesn't it? So, only those who become completely constant in soul conscious stage obtain inheritance. Hm? They obtain inexhaustible inheritance of their individual worlds. How many obtain inheritance at the most? Eight. They are named in the scriptures as Vasu. Vasu means wealth and property. What? If you speak in terms of incorporeal, then there is only one embodiment of wealth and property, i.e. Shiv. And when He comes in this corporeal world, then there are some eight stars, who have their own individual worlds. What? In that world, those eight obtain the inexhaustible stock house of knowledge of their own worlds. This is why their name is sung as the eight Vasus. So, become conscious of the soul. What? He has come to give the inheritance of knowledge, hasn't He? So, those who get the inheritance of knowledge, their number is at the most eight. And they are numberwise. All the eight Vasus; they will be small and big, will they not be? So, for those who obtain the inheritance of soul conscious stage, there is a condition that they have to become soul conscious. What? There should not be any trace of body consciousness even for name sake. There should not be any ego of the body. Then they get that inheritance of individual worlds; they are the soul like stars, aren't they? So, they get inheritance of their own worlds.

And there is a little difficulty in becoming soul conscious. What? Baba does not give you much difficulty. He gives you a little difficulty. What? That forget your body. What? Forget this body like tail which hangs behind the soul. Seventh page of the Vani dated 18.5.67. So, then first of all go and tell about this mistake to them, i.e. those who explain. Those who are eager to understand, but do not come; they must be holding big posts in today's world. So, first of all go and tell them this mistake. Which mistake? Which is the biggest mistake of knowledge? Hm? The only mistake because of which the entire world has forgotten. Hm? That mistake is that the child, who is worshipped, has been mentioned to be the God of Gita. Child Krishna. It is the pure one only who will be worshipped, will he not be? Hm? Those who do not have purity are called demons (raakshas). Hm? They perform demoniac actions through the organs of action, don't they? For example, the organ of lust. So, it has been mentioned that those who are violent have made the entire world violent. So, children were told that those who are holding high seats in today's world, either in the society, be it those holding seats in the field of religion or politics, do not come to you out of ego. They are body conscious.

So, first of all you go and tell them about this mistake. What? The Gita has been impaired. How has it been impaired? The Gita, which contains the knowledge of the Gita, how is kingship obtained through this knowledge, that secret is contained in it. Which kingship? The kingships which have been in existence in the world, those kingships were obtained by waging violent wars. But God is such a high entity; will He teach violence? So, go and tell them the mistake that the topic of rajyog that God taught was not the topic of violence. It has been told in the Gita - Kaam esh krodh esh rajogun samudbhav. This lust and anger are born out of rajogun. And deities do not have rajogun. The satwik gun (pure attributes) are dominant in them. So, this Krishna whose name has been inserted is a child. Although he is perfect in 16 celestial degrees. Hm? So, that pure one is worshipped. The grown-up Krishna is not worshipped. Why? It is said that when Krishna grew up, he had 8 Patranis (queen consorts), 16000 queens, he had this, he had that, he had so many children. So, did he remain pure? That pure one, the child is worshipped. That is correct. But will the child know the topics of secret? Which secret? That when you achieve victory over the organs you will obtain the emperorship of the world. When you conquer the organs you will conquer the world. Well, how will a child know that how are the organs to be conquered? Hm? So, go and tell them about this mistake that the name of Krishna which has been inserted in the Gita is a big mistake. By committing this mistake the founders of other religions of the world and their followers are not at all ready to accept Krishna as God.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2496, आडियो 2982, दिनांक 23.04.2018
VCD 2496, Audio 2982, Date 23.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning Class dated 18.05.1967
VCD-2496-Bilingual

समय- 00.01-18.12
Time- 00.01-18.12


प्रातः क्लास चल रहा था 18.5.1967। सातवें पेज के आदि में बात चल रही थी - जो गीता में बड़ी से बड़ी भूल हुई है, शिव बाबा की जगह कृष्ण का नाम डाल दिया बच्चे का, उस भूल को गवर्नमेंट तक पहुंचाना है। परंतु गवर्नमेंट कोई एक नहीं है। वो तो पंचायती राज्य है। प्रजा के ऊपर प्रजा का राज्य है। तो भले तुम लोग जाओ, बड़े के पास जाओ। तो भी वो तुमको भेज देंगे पंचायतों में। नाम ही है पंचायती राज। समझा ना। इन बड़े से बड़े के पास जावेंगे तो भी वह छोटी-छोटी कमेटियों में भेज देंगे। नहीं। तुम ठोको एकदम। बड़ा मजा आएगा।

देखो, विदेशियों के अधीन हो गए। विदेशियों में पावर आ गई। और भगवान ने तुमको पावर दी थी राजाई की। तो तुमने जन्म-जन्मांतर राजाई की। अभी अंत में तुम कमजोर हो गए। कारण क्या हुआ? हँ? तुम अपने बाप को भूल गए। बाप ने जो ज्ञान दिया, गीता का ज्ञान, वो भी भूल गए। अपनी भाषा भूल गए, अपना कुल भूल गए। जबकि और और धर्म पिताओं को और उनके फॉलोअर्स को अभी इस अंतिम जनम में भी अपने धर्मग्रंथ के ऊपर नाज़ है। विदेशी, विधर्मी धर्म सब एक धर्मग्रंथ को, धर्म शास्त्र को मानते हैं, एक बाप को मानते हैं इसलिए उनमें ताकत है। एक धर्म को मानते हैं। ये तो उनके प्रभाव में आकर के सब कुछ भूल गए। हिंदुओं को अपने धर्मपिता का पता नहीं। कभी कहते हैं राम, कभी कहते कृष्ण, कभी कहते शंकर। तो ये भी पता नहीं कि वो किस टाइम पर आते हैं। सब धर्मावलंबियों को मालूम है कि हमारा धर्मपिता किस टाइम पर आया। पता ही नहीं है पिता का। तो उसके आने के टाइम का भी पता नहीं है। इसीलिए भारतवासी बहुत कमजोर हो गए। भीख मांगते रहते हैं। किस बात की? हँ? लोन लेना भी तो भीख मांगना है ना।

तो ठोकते जाओ। बड़ा मजा आवेगा। समझा ना। और तुम्हारा नाम एकदम बाला हो जावेगा। बड़ा नाम हो जावेगा। फिर तुम्हारे को कोई भी, कोई भी ऐसे नहीं कहेंगे - ये प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारी जादू लगाते हैं, फलाना करते हैं। कभी भी नहीं कहेंगे। कोई भी नहीं कहेंगे। एक बात समझ जाएंगे कि ये कोई, ये कोई बहुत गुप्त लोग हैं। एकदम अच्छी तरह से गुप्त हैं। और वो तो गीता में लिखा ही हुआ है गुह्यात् गुह्यतरम ज्ञानम। तो देने वाला भी तो गुह्य होगा ना, गुप्त होगा ना। फिर दिखाते हैं पार्वती को गुफा में ज्ञान दिया। कभी भी ये बात होगी, आवाज निकलेगा। कह नहीं सकते हैं कि कब आवाज निकलेगा। परंतु पुरुषार्थ तो करना चाहिए ना। हर बात में पुरुषार्थ। फेल होते हैं फिर भी पुरुषार्थ। फेल होने के बाद भी तो पुरुषार्थ होता है ना।

पीछे जाएगा, देखो। पहाड़ पर जाते हैं एवरेस्ट चोटी पर। और जितना ऊंचाइयों पर चढ़ते हैं जोर से तूफान लगते हैं। कितने तूफान लगते हैं। बहुत ऊपर जाकर के देखते हैं कि बहुत नुकसान। ज्यादा नुकसान होता है तो नीचे उतर आते हैं। फिर इंतजार करते हैं कि अच्छा वायुमंडल हो जावेगा, तो अच्छा देख करके फिर चढ़ाई करते हैं। ये भी तुम्हारी रूहानी चढ़ाई है। वो जिस्मानी पंडित जिस्मानी चढ़ाईयों पर ले जाते हैं, पहाड़ों पर ले जाते हैं। तीर्थ यात्राओं पर ले जाते हैं। तुम्हारी तो रूहानी चढ़ाई है। रूहें तो एकदम ऊँची जगह रहती हैं ना, जिसे कहते ही हैं परमधाम आत्माओं का लोक। तो ऊँची चढ़ाई है ना। भई सुनते हो, ये बातें अखबार में पढ़ते हो। बाबा इसलिए अखबार और ये भी सुनते हैं। ये ब्रह्मा भी सुनते हैं तो तुम बच्चों को समझावें। वो जब देखते हैं कि ऊँचाई पर चढ़ने में बड़ा खौफनाक है तो सोचते हैं और थोड़ा ठहर जाएं क्योंकि वायुमंडल ठीक देखने में नहीं आती है तो थोड़ा नीचे उतर जाएगा। जब देखेंगे अभी वायुमंडल ठीक है फिर शुरू करेगा। तो ये भी ऐसे है आत्मा का पुरुषार्थ। वो देह की तीर्थ यात्राएं हैं। ये आत्माओं को पार लगाने की बात है। तीर माना ही पार, एक किनारा।

बाबा कहते हैं कोशिश करो। इस समय में अच्छे रिलीजियस, उनको पकड़ो। नहीं तो पीछे आता है; जितना टाइम बीतता जावेगा, कोई मुसलमान को बैठाय देंगे। ये तो 67 की वाणी है ना। तो मुसलमान को बैठाय दिया ना फखरुद्दीन अली अहमद। प्रेसिडेंट बनाय के बैठाय देंगे क्योंकि नेक्स्ट में वो है ना। लक्कड़ लक्का। तो; किसी ने कुछ कहा। क्योंकि टर्न तो उनका है ना। तो फिर वो इन बातों को जानती भी नहीं है। किसका नाम लिया? क्या कहा? लक्कड़ लक्का। माने बुद्धि कैसी होती है? लक्कड़ बुद्धि। समझा ना। कौन नहीं जानती है? हँ? फखरुद्दीन अली अहमद को प्रेसिडेंट बनाने के बाद किसकी बात आई? हँ? वो तो जाति ही अलग है। किसकी? फिरोज़ गांधी की पत्नी थी ना। इसलिए बाबा कहते हैं कि हर बात में कोशिश करो।

बच्चियां मिलकर के आपस में लेन-देन करें और बाबा को याद करें। तुम स्टूडेंट तो हो ही। तो बाबा को याद कर लो, फिर टीचर को याद करो। तुम्हारा तो बाप, टीचर, सतगुरु एक ही है। तो तीनों को देखो कितना सहज बाबा ने कर दिया। तुम्हारा दुनिया वालों से बुद्धि योग कितना तोड़ दिया। एक संग जोड़ और संग तोड़ो। नहीं तो भक्तिमार्ग में तो जन्म-जन्मांतर बाप अलग होता है, टीचर अलग होता है, गुरु अलग होता है। तीनों को अलग-अलग याद करना पड़ता है। तो बुद्धियोग बंट गया ना। यहां तो तुमको तीन नहीं है; नहीं, एक को याद करो। क्या? यहां क्या है अंतर? यहां पुरुषोत्तम संगम युग में तुमको 3 नहीं हैं, हँ, जो समझो ब्रह्मा है, विष्णु है, शंकर है, तीन मूर्तियां हैं। नहीं। एक को, एक को याद करो जो ही तीन हैं। कौन है एक जो तीन है? वो एक कौन जो तीन हैं? हँ? वो एक का पता होना चाहिए ना पक्का कि एक है। वो ही एक तीन है। हँ? ये तो बाप, टीचर, सद्गुरु, ये तो तीन हो गए। तीन नाम हो गए। वो आत्मा एक कौन है? हँ? वो एक आत्मा को बताओ।
(किसी ने कुछ कहा।) आदम? आदम की तीन मूर्तियां हैं? हँ? आदम तो पतित को कहा जाता है। शिवबाबा की तीन मूर्तियां हैं? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) शंकर? शंकर तो तीन मूर्तियों में से एक मूर्ति है। हँ? एक को ही याद करना है जो तीन है।

वो तथाकथित ब्रह्माकुमारों ने चित्र बनाया 32 किरणों का। उसमें गुण दिखाए। अब जिसको वो निराकार समझते हैं उसके गुण कैसे होंगे? उसको तो कहा ही जाता है निर्गुण, निराकार। गुण और अवगुण साकार में होते हैं या निराकार में होते हैं? हँ? तो वो संपन्न रूप की बात है। जो आदम है वो
(किसी ने कुछ कहा।) नारायण की तीन मूर्तियां हैं? वाह भई। तो तीन मूर्तियां तो हैं, शिव की कही जाती हैं और वो शिव नहीं जिसकी आत्मा का ही नाम शिव है। उस एक आत्मा को कैसे याद करेंगे? हँ? वो भी तो बिंदु है तुम्हारी तरह। तो कैसे पता चलेगा कौनसी बिंदु को याद किया? हँ? तो वो एक है हीरो पार्टधारी इस मनुष्य सृष्टि रंगमंच पर जिसमें वो निराकार शिव, निर्गुण जिसे कहा जाता है, अजन्मा प्रवेश करता है और प्रवेश करके उसको आप सामान बनाता है। कैसे? ज्ञान देता है। उस ज्ञान के आधार पर पुरुषार्थ करता है। पुरुषार्थ क्या करता है? एक को याद करने का कि अनेक को याद करने का? हँ? तो बताता है तुम आत्मा हो और आत्माओं का बाप है सुप्रीम सोल। तो वो एक को याद करता है। स्वयं अपन को निराकार समझ और निराकार बाप को याद करता है।

A morning class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the seventh page was - The biggest blunder that has been committed in the Gita that child Krishna's name has been inserted instead of ShivBaba's name, that mistake should be conveyed to the Government. But Government is not one. That is a Panchayati Raajya (Rule of five persons). It is a rule of subjects over subjects. So, you people may go, you may go to big personalities. Yet, they will send you to the Panchayats. The name itself is Panchaayati Raaj. Did you understand? Even if you go to the highest personality, he will send you to the smaller committees. No. You hit them hard. You will enjoy a lot.

Look, you have become subservient to the foreigners. The foreigners got the power. And God had given you the power of kingship. So, you have ruled birth by birth. Now you have become weak in the end. What is the reason? Hm? You have forgotten your Father. You have also forgotten the knowledge, the knowledge of the Gita which the Father had given. You forgot your language, you forgot your clan whereas other founders of religions and their followers feel proud of their religious scripture even in this last birth. The videshis, vidharmi religions believe in one religious scripture, one Father; this is why they have power. They believe in one religion. These people have forgotten everything under their influence. The Hindus do not know about the founder of their religion. Sometimes they say Ram, sometimes they say Krishna, sometimes they say Shankar. So, they do not even know as to what time He comes. People of all the religions know the time when the founder of their religion came. These people do not know about their Father at all. So, they do not know about the time of His arrival as well. This is why the Indians have become very weak. They keep on begging. For what? Hm? To seek loan is also like begging, is not it?

So, go on hitting. You will enjoy a lot. Did you understand? And you will become very famous. Then nobody, nobody will tell you - These Prajapita Brahmakumar-kumaris play magic, do such and such thing. They will never say. Nobody will say. They will understand one thing that these people are some very secret people. They are completely incognito. And that has been already written in the Gita - Guhyaat guhyataram gyaanam. So, the giver will also be incognito, will He not be? Then it is shown that He gave knowledge to Parvati in a cave. One day this topic will be raised, the word will spread. You cannot say that when will the word spread. But one should make purusharth, shouldn't one? Purusharth in every topic. You should make purusharth even if you fail. One makes purusharth even after he/she fails.

Later on he will go, look. They go to the mountains, to the peak of Mt. Everest. And the higher they climb, the stronger the storms that they face. They face so many storms. After reaching very high they see that there is a lot of harm. If there is more harm, then they come down. Then they wait for the climate to improve; then, when they find it suitable, they resume the climb. This is also your spiritual climb. Those physical pundits take you on physical climbs, to mountains. They take you on pilgrimages. Yours is a spiritual climb. The souls live at a completely high place, don't they? It is called the Supreme Abode, the abode of souls. So, it is a high climb, is not it? Brother, you listen, you read these topics in the newspaper. This is why Baba reads these newspapers and this one also listens. This Brahma also listens so that he could explain to you children. When they see that it is very dangerous to climb up, then they think that they should stop a while because the climate does not appear to be suitable, so, they come down a little. When they see that the climate is good, then they will resume. So, the soul's purusharth is also like this. Those are the pilgrimages (teerth yatraaen) of the body. This is about taking the souls across. Teer means across, one shore.

Baba says - Try. Catch the nice religious one at this time. Otherwise, in future, the more the time passes, they will make a Muslim to occupy the seat. This is a Vani dated 67, is not it? So, a Muslim Fakhruddin Ali Ahmed was made to sit, wasn't he? They will make him President because he is next in line, is not he? Lakkad, lakka. So; someone said something. Because it is their turn, is not it? So, then she doesn't know these topics. Whose name was uttered? What has been said? Lakkad lakka. It means that how is the intellect? Wood like intellect (lakkad buddhi). Did you understand? Who doesn't know? Hm? After making Fakhruddin Ali Ahmed as President, whose topic was mentioned? Hm? That caste itself is different. Whose? She was the wife of Feroze Gandhi, wasn't she? This is why Baba says - Make effort in every topic.

Daughters should meet each other and exchange views and remember Baba. You are anyways students. So, remember Baba, then remember the teacher. Your Father, Teacher, Sadguru is one only. So, look Baba has made all the three so easy. He has made the connection of your intellect break from the people of the world so much. Connect with one and break with others. Otherwise, on the path of Bhakti, birth by birth, the Father is separate, the teacher is separate, the guru is separate. All the three have to be remembered separately. So, the intellect was diverted, wasn't it? Here, you don't have three; no, remember one. What? What is the difference here? Here, in the Purushottam Sangamyug, you don't have three, hm, so that you think that there is Brahma, there is Vishnu, there is Shankar; there are three personalities. No. Remember one who is three. Who is the one who includes all the three? Hm? You should know that one firmly that who is he? That one himself is three. Hm? This Father, teacher, sadguru are three. They are three names. Who is that one soul? Hm? Tell the name of that one soul.
(Someone said something.) Aadam? Are there three personalities of Aadam? Hm? The sinful one is called Aadam. Are there three personalities of ShivBaba? Hm? (Someone said something.) Shankar? Shankar is one among the three personalities. Hm? You have to remember only one who is three.

Those so-called Brahmakumars prepared the picture of 32 rays. They showed the virtues on them. Well, how will the one, whom they consider to be incorporeal, have virtues? He is called nirgun (without any attributes), nirakaar (incorporeal). Are virtues and vices present in the corporeal or in an incorporeal? Hm? So, that is about the perfect form. The one who is Aadam
(Someone said something) Are there three personalities of Narayan? Wow brother! So, there are three personalities and they are said to be of Shiv and it is not that Shiv whose soul's name itself is Shiv. How will you remember that one soul? Hm? He is also a point like you. So, how will you know as to which point you remembered? Hm? So, that one is the hero actor on this human world stage, in whom that incorporeal Shiv, who is called nirgun, ajanma (one who does not get birth) enters and after entering He makes him equal to Himself. How? He gives knowledge. He makes purusharth on the basis of that knowledge. What purusharth does He make? To remember one or to remember many? Hm? So, He tells that you are a soul and the Father of souls is the Supreme Soul. So, he remembers one. He considers himself to be incorporeal and remembers the incorporeal Father.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 10 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2497, आडियो 2983, दिनांक 24.04.2018
VCD 2497, Audio 2983, Daate 24.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning Class dated 18.5.1967
VCD-2497-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.13
Time- 00.01-20.13


प्रातः क्लास चल रहा था 18.5.1967. आठवें पेज के आदि में बात चल रही थी, बोला कि इनके द्वारा तुमको खिलाता हूं। माना दो हैं। जिनके द्वारा खिलाता हूँ वो एक नहीं है, दो हैं। नहीं तो बोलता इसके द्वारा खिलाता हूं। तुम्हीं से बैठूं, तुम्हीं से खाऊं। अब तुम्हीं से कैसे खाऊंगी? जब तक कोई शरीर में न आएंगे तो तुम्हीं से कैसे खाऊंगी? तो बाबा सब एक्टिविटी अपनी जो कल्प वाली है हूबहू प्रैक्टिकल में लेकर आ रहे हैं। कल्प पहले भी ऐसे ही किया था। तो समझने की बातें हैं। इसलिए मीठी-मीठी अच्छी-अच्छी बातें आपिये समझाएगा ना। समझाएगा कौन? ये बाप समझाएगा। गुलगुल बनो और खुद कहते हैं – देखो, अब मुझ अपने परलोकिक बाप को याद करो। पारलौकिक बाप को याद करो? लौकिक किसे कहें? पारलौकिक किसे कहें? अलौकिक बाप किसको कहें? हँ? अलौकिक वो है जो न इस दुनिया का है न पारलोक का है। बीच में है। माने सूक्ष्मवतनवासी है। तो अलौकिक हो गया। पारलौकिक वो है - इस सुख की दुनिया और दुख की दुनिया, दोनों से पार है। सुख और दुख से कौन सी आत्मा पार है? कहेंगे जिसको सुख भी व्याप्त नहीं होता, दुख भी व्याप्त नहीं होता। वो एक ही आत्मा है शिव, जिसकी आत्मा का ही नाम शिव है। बिंदु-बिंदु आत्माओं का बाप है।

तो मुझ अपने पारलौकिक बाप को याद करो। आधा कल्प दुखी थे। अभी वो आया ही है तुमको सुख का मालिक, सुखधाम का मालिक बनाने के लिए। आधा कल्प दुखी क्यों थे? हँ? क्योंकि दुख होता ही है देहभान से। आधा कल्प है आत्माभिमानियों की दुनिया और आधा कल्प है देह अभिमानियों की दुनिया। आत्मा अभिमानी बनाने वाला भी होगा। तो सुख में रहते हो। फिर देह अभिमानी बनाने वाला भी होगा। वो कौन? हँ? देखो, रामलीला दिखाते हैं। तो रावण को बड़ी देह दिखाते हैं। कुंभकरण को, मेघनाद को बड़ी लंबी-चौड़ी देह दिखाते हैं ताकि साबित हो जाए देह अभिमानी हैं। और राम को छोटा दिखाते हैं। मतलब? मतलब कि शिव बाप सबसे छोटा। इस सृष्टि पर भी आकर पार्ट बजाता है तो कैसे बजाता? बच्चे आई एम योर मोस्ट ओबिडिएंट सर्वेंट। बच्चों का अहंकार नहीं छूटता। और बाप कहते हैं तुम्हारा मैं मोस्ट ओबिडियंट सर्वेन्ट हूँ।

तो जो दुख आता है वो देह भान से आता है। सुख आता है आत्माभिमान से। आत्माभिमानियों की दुनिया, जो सदा आत्माभिमानी है; कौन? शिव सुप्रीम सोल। इस पाप की दुनिया में आता भी है, पतित तन में भी आता है, फिर भी देहभान में, कभी देह अहंकार में नहीं आता। आत्माभिमानी होकर रहता है। तो ऐसी आत्मा जो कभी भी देह भान में ना आए लेकिन इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाये और जो भी पार्ट बजाये वो आत्माभिमान में रहकर के पार्ट बजाए। तो वो जब इस सृष्टि पर आती है साकार तन में तो सुख की दुनिया बनाती है।

और? फिर दुख की दुनिया कौन बनाता है? कौन बनाता है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा) ये कौन होता है रावण? हँ? रावण माना रावयते लोकान इति रावण। जो लोगों को रुलाता है वो है रावण। अच्छा, अब इस दुनिया में, दुख की दुनिया में कोई ऐसा है जो कभी किसी को न रुलाता हो? हँ? इस दुनिया में, जिसे दुखधाम कहा जाता है इस दुखधाम की दुनिया में कोई आत्मा ऐसी है जो कभी भी किसी को दुख ना देती हो? (किसी ने कुछ कहा।) अगर कहें, बाबा लगा दिया, शिव के साथ बाबा लगा देंगे तो साकार निराकार का मेल हो गया। तो साकार निराकार का मेल इस सृष्टि पर सदा काल रहता है क्या? हँ? कि जब वो निराकार इस सृष्टि पर आता है, किसी मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है, तब साकार निराकार का मेल होता है? हँ? उससे पहले? उससे पहले कहें कि साकार निराकार का मेल है? हँ? नहीं है? अच्छा? हँ? जिसमें प्रवेश करता है वो मुकर्रर रथधारी इस सृष्टि पर मुकर्रर रूप से रथ के साथ पार्ट बजाने वाला तो है। क्या अंतिम जन्म में वो आदि वाला पार्ट नहीं बजाता? जो आदि सो अंत। तो आदि का पार्ट क्या है? सृष्टि के आदिकाल का पार्ट क्या है उस आत्मा का? हँ? आदिकाल का पार्ट तो सबसे ऊँचा होगा ना। हँ? सृष्टि के आदि में सबसे ऊँचा पार्ट होगा ना। नारायण तो बहुत होते हैं। जैसे क्रिश्चियन्स ने कृष्ण को फॉलो किया है किंग एडवर्ड फर्स्ट, दी सेकंड एंड थर्ड होते ही चले जाते हैं। आदिनारायण। तो आदि नारायण और आदि नारायणी के स्वभाव-संस्कार मिलकर के एक हो जाते हैं तो विष्णु रूप हैं सृष्टि की आदि में। तो आदि सो अंत के हिसाब से अंत में भी विष्णु रूप होंगे या नहीं होंगे? हँ? होंगे। तो क्या कहें? आत्मिक स्थिति बरकरार है या नहीं है? हँ? आत्मिक स्थिति बरकरार ही कहेंगे ना।

फिर?
(किसी ने कुछ कहा।) हां। लास्ट जनम में, लास्ट जनम में भी तो दो हिस्सों में बंट जाता है ना। कलियुग का अंत और सतयुग का आदि। तो वो तो कंबीनेशन हो गया दुख की दुनिया और सुख की दुनिया, दोनों का कंबीनेशन हो गया। तो शिव जब प्रवेश करते हैं तो उस समय वो श्रेष्ठ पार्टधारी है या निकृष्ट पार्टधारी है? हीरो पार्ट धारी है या जीरो पार्ट धारी है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) जीरो? जीरो कहें? हीरो कहें? क्यों? हीरो तो तब कहें जब अच्छा ही अच्छा पार्ट बजाए। अंतिम जन्म में दुनिया के हिसाब से ऊँच कहा जाता है या नीच है? दुनिया के हिसाब से? हँ? गरीब है या साहूकार है? क्या कहेंगे? है तो गरीब। लेकिन गरीब होने पर भी क्या श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाले नहीं होते हैं? शास्त्रों में सुदामा के लिए क्या कहा? हँ? गरीब था या साहूकार था? हँ? गरीब था। बाल बच्चों के पोषण के लिए रोटी भी नहीं। तो वो पार्ट है; क्या? दुनिया की दृष्टि कुछ भी हो लेकिन जो ऊंच ते ऊंच सुप्रीम सोल है, इस सृष्टि पर ऊँचे ते ऊँच पार्ट बजाने वाली, उसकी दृष्टि में तो सुदामा का पार्ट श्रेष्ठ हुआ या निकृष्ट हुआ? हँ? श्रेष्ठ ही कहेंगे। क्योंकि सत्य पार्ट बजाया या झूठा पार्ट भी बजाया? सत्य बजाया।

तो बताया कि वो बाप जब आता है तो गरीब निवाज बाप है। हँ? जीवन में कोई गरीब काम भले अच्छा करता है, कर्म अच्छे करे लेकिन फिर भी पूर्व जन्म के हिसाब से क्या होता है? गरीब बन सकता है। कर्म अच्छे करता है। तो दुखधाम का मालिक कहें या सुखधाम का मालिक कहें? क्या कहें उसे? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) दुखधाम का मालिक? दुख धाम का मालिक माने दुखी है? दुखी नहीं होगा? कहते हैं यज्ञ के आदि में जो निमित्त बना रथ सेवकराम वो हीरों का दुकानदार था। तो दुकान तो चलती नहीं थी, छोटी सी दुकान। भले सच्चे हीरे ही बेचता था। झूठे हीरे रखता भी नहीं था। तो दुनिया क्या समझती? झूठे ही हीरों का व्यापारी होगा। तो कोई ध्यान नहीं देता। बिक्री होती नहीं। तो गरीब।

तो बाप कहते हैं अभी वो आया हुआ है तुमको सुखधाम का मालिक बनाने। अभी माने कभी? जैसे और धर्मपिताएँ आते हैं, 100 साल के अंदर अपना धर्म स्थापन करते हैं, ऐसे ही वो सुप्रीम सोल भी इस सृष्टि पर 100 वर्ष के अंदर नर्क, दुख की दुनिया को पलट के संपूर्ण सुख की दुनिया बना देता है, जिसे कहते हैं वैकुंठ, विष्णु लोक। तो बोला कि सुख धाम का मालिक तुमको बनाने आया है तो भी तुम याद नहीं करेंगे? वाह! ये भी कोई बात हुई? तो मीठे बनो और देह अभिमान छोड़ो। हँ? मीठे बनें? कोई कड़वी बातें करता है, गालियां देता है, ग्लानि करता है तो भी मीठे बनें? हँ? ऐसे? वो कब होगा? वो तो तब ही होगा जब अंदर देह भान, देह अहंकार नहीं होगा। तो अपन को आत्मा समझो। आत्मा की, आत्मा समझेंगे तो कोई ग्लानि महसूस नहीं होगी। ग्लानि कब महसूस होती है? जब देह अहंकार है तो ग्लानि महसूस होती है, वो गाली महसूस होती है। तो ये देहभान छोड़ दो।

A morning class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the eighth page was - It was said that I feed you through them (inke dwara). It means there are two. Those through whom I feed is not one, but two. Otherwise, He would have said - I feed through this one (iske dwara). I shall sit with you, I shall eat only through you. Well, how will I eat only through you? As long as He doesn't come in a body, how will I eat only through you? So, Baba is bringing all His activity of the Kalpa ago into practical in exactly the same way. He had done so Kalpa ago as well. So, these are topics to be understood. This is why He will explain the sweet-sweet, nice-nice topics on His own, will He not? Who will explain? This Father will explain. Become flowers and He Himself says - Look, remember Me, the Paarlokik Father now. Remember the Paarlokik Father? Who will be called lokik? Who will be called Paarlokik? Who will be called the Alokik Father? Hm? Alokik is the one who neither belongs to this world not to the other world (paarlok). He is in between. It means that he is a Subtle Region dweller. So, he is alokik. Paarlokik is the one who is beyond this world of happiness as well as the world of sorrows. Which soul is beyond joys and sorrows? It will be said that the one who does not experience happiness as well as sorrows. That is only one soul Shiv, whose soul's name itself is shiv. He is the Father of point like souls.

So, remember Me, the Paalokik Father. You were sorrowful for half a Kalpa. Now He has come only to make you the master of joys, master of the abode of happiness. Why were you sorrowful for half a Kalpa? Hm? It is because sorrow is caused only due to body consciousness. For half a Kalpa it is a world of soul conscious ones and for half a Kalpa it is a world of body conscious ones. There must be someone who makes you soul conscious as well. So, you live in happiness. Then there will be someone who makes you body conscious as well. Who is that? Hm? Look, Ramleela (enactment of the epic Ramayana on stage) is depicted. So, Ravan is shown to have a big body. Kumbhakaran, Meghnad are shown to have a big, bulky body so that it is proved that they are body conscious. And Ram is shown to be short. What does it mean? It means that Father Shiv is the smallest one. Even when He comes in this world and plays His part, what kind of a part does He play? Children, I am your most obedient servant. Children do not leave their body consciousness. And the Father says - I am your most obedient servant.

So, the sorrow comes from body consciousness. Happiness comes from soul consciousness. The world of soul conscious ones; the one who is forever soul conscious; who? Supreme Soul Shiv. He even comes in this world of sins, comes in a sinful body as well, yet He never becomes body conscious, never becomes egotistic of the body. He remains soul conscious. So, such soul which never becomes body conscious, but plays a part on this world stage and whatever part He plays, he should play His part in soul consciousness. So, when He comes in this world, in a corporeal body, He makes a world of happiness.

And? Then who makes the world of sorrows? Who makes? Hm?
(Someone said something.) Who is this Ravan? Hm? Ravan means - Ravayate lokaan iti Ravan. The one who makes people cry is Ravan. Achcha, well, is there anyone in this world, in the world of sorrows who never makes anyone cry? Hm? In this world, which is called the abode of sorrows, in this world of abode of sorrows, is there any soul which never gives sorrows to anyone? (Someone said something) If we say, word 'Baba' has been used, if you add Baba to Shiv, then it is a combination of corporeal and incorporeal. So, does the combination of the corporeal and incorporeal remain forever in this world? Hm? Or does the combination of the corporeal and the incorporeal take place when that incorporeal comes in this world and enters in a permanent Chariot? Hm? Before that? Will it be said before that that it is a combination of corporeal and incorporeal? Hm? is not it? Achcha? Hm? The one in whom He enters, that permanent Chariot holder does play a part with the Chariot in a permanent manner in this world. Does He not play a part of the beginning in the last birth? Whatever happens in the beginning happens in the end. So, what is the part of the beginning? What is the part of the beginning of the world in case of that soul? Hm? The part of the beginning will be the highest part, will it not be? Hm? The part will be the highest one in the beginning of the world, will it not be? There are many Narayans. For example, the Christians followed Krishna. There was King Edward First, the Second and third and so on and so forth. Aadi Narayan (the first Narayan). So, when the natures and sanskars of the first Narayan and the first Narayani become one, then it is a form of Vishnu in the beginning of the world. So, from the point of view of 'as is the beginning, so is the end' will they be a form of Vishnu even in the end or not? Hm? They will be. So, what will be said? Is the soul conscious stage constant or not? Hm? It will be said that the soul conscious stage is constant, is not it?

Then?
(Someone said something.) Yes. In the last birth, the last birth is also divided into two parts, is not it? The end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age. So, that is a combination of the world of sorrows and the world of happiness. It is a combination of both. So, when Shiv enters then is he a righteous actor or a degraded actor at that time? Is he a hero actor or a zero actor? Hm? (Someone said something.) Zero? Will he be called zero? Will he be called a Hero? Why? He will be called a hero when he plays only a good part. In the last birth, from the point of view of the world, is he called the highest one or is he low? From the point of view of the world? Hm? Is he poor or rich? What will be said? He is poor. But despite being poor, don't people play a righteous part? What has been said for Sudama in the scriptures? Hm? Was he poor or rich? Hm? He was poor. There was no roti (bread) even for the sustenance of children. So, that is the part; what? Whatever may be the view of the world, but the highest on high Supreme Soul, who plays the highest on high part on this world, in his view, was Sudama's part righteous or degraded? Hm? It would be called righteous only. Did he play a true part or did he play a false part also? He played a true part.

So, it was told that when that Father comes, He is a Garibniwaaz Father (one who cares for the poor). Hm? Although a poor person do a good work in his life, he may do good work, yet, what happens as per the accounts of the past births? He may become poor. The actions that he performs are good. So, will he be said to be the master of the abode of sorrows or will he be said to be the master of the abode of happiness? What should he be called? Hm?
(Someone said something.) Master of the abode of sorrows? Does 'master of the abode of sorrows' mean that he is sorrowful? Will he not be sorrowful? It is said that in the beginning of the Yagya the Chariot of Sevakram which became instrumental was a diamond shopkeeper. So, the shop did not used to earn profits, it was a small shop. Although he used to sell true diamonds only. He did not even used to keep fake diamonds. So, what does the world think? He must be a businessman dealing with fake diamonds only. So, nobody pays attention. Sale does not take place. So, he remains poor.

So, the Father says, now He has come to make you the masters of the abode of happiness. Now refers to which time? Just as other founders of religions come and establish their religion within 100 years, similarly that Supreme Soul also transforms the world of sorrows into a world of complete happiness, which is called Vaikunth, Vishnulok within 100 years in this world. So, it was told that will you not remember Him despite the fact that He has come to make you the master of the abode of happiness? Wow! Is there any meaning in it? So, become sweet and leave body consciousness. Hm? Should we become sweet? Should you become sweet even if someone speaks bitterly, hurls abuses, defames? Hm? Is it so? When will that happen? That will happen only when there is no body consciousness, ego of the body inside. So, consider yourself to be a soul. If you consider yourself to be a soul, then you will not be affected by the defamation. When does one feel defamed? When there is body consciousness, then you feel the defamation, you feel the abuses. So, leave this body consciousness.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2498, आडियो 2984, दिनांक 25.04.2018
VCD 2498, Audio 2984, Date 25.04.2018
रात्रि क्लास 18.5.1967
Night Class dated 18.5.1967
VCD-2498-Bilingual

समय- 00.01-15.08
Time- 00.01-15.08


आज का रात्रि क्लास है - 18.5.1967. बच्चों को स्मृति आती है अभी संगमयुग में कि जिस निराकार बाप के साथ हम निराकार आत्माएं परमधाम में रहते थे, अभी वो समय आया है कि हम भी यहाँ संगमयुग पर शरीर में हैं। तो बाप भी आकरके शरीर में विराजमान होकरके हमारे से मिल रहे हैं। क्या स्मृति की बात बताई? हँ? हम देह नहीं हैं। हम आत्माएं हैं निराकार बिन्दु-बिन्दु और ये स्मृति अब आई है इस जनम में जबकि हमें पता चला है कि ये संगमयुग है 5000 वर्ष के ब्रॉड ड्रामा का रिहर्सल पीरियड। तो ये स्मृति आई कि बिन्दु-बिन्दु आत्माएं हम परमधाम में रहते थे। अभी फिर वो समय आ गया कि हम यहाँ शरीर में हैं संगमयुग पर तो बाप भी आकरके शरीर में विराजमान होकरके हमसे मिल रहे हैं। निराकार धाम, निराकार आत्माओं का घर। बाप का भी घर। और यहाँ? यहाँ बाप आए और हम आत्माएं भी निराकार हैं, तो हमें पता चल गया या नहीं चल गया कि यहाँ इस दुनिया में हमारा घर कहाँ है? हँ? कौनसा घर है? जिस घर में बाप को भी रहना होता है और हम बच्चों को भी रहना होता है?

तो ये रूहानी मिलन है। और वो होता है जिस्मानी मिलन। तो जैसे वो जिस्मानी मिलन होता है, ऐसे इस दुनिया में भी जिस मुकर्रर रथ में बाप आते हैं वो बाप का भी घर और हम आत्माओं का भी घर। जिसम में आते हैं ना। ठीक है? तो वो तो जिस्मानी घर होते हैं। ये तो, ये कौनसा घर है जिसमें बाप भी आते हैं, बच्चे भी याद करते हैं, घर को याद करते हैं, बाप को याद करते हैं, नई दुनिया के स्वर्ग के वर्से को याद करते हैं? सुखधाम भी है, शान्तिधाम भी है। आत्मा शान्त स्वरूप है ना। और बाप भी बैठा है। और ये मिलन पूरे 5000 वर्ष के ह्यूज ड्रामा में एक ही बार होता है। किसके साथ? सुप्रीम सोल गॉड फादर के साथ। वो एक ही सुप्रीम सोल है जिसका कोई बाप नहीं होता। वो सब बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का बाप। और वो 5000 वर्ष में एक ही जनम, एक ही बार आते हैं क्योंकि फिर से बाप आकरके सभी बच्चों को; फिर वहाँ जाकरके बच्चों के साथ रहेंगे। फिर वहाँ से भेजना शुरू कर देंगे। तो एक ही बार सभी बच्चों से मिलते हैं। पूरे कल्प में एक बार। तो शास्त्रों में भी लिख दिया है कल्प-कल्प लगि प्रभु अवतारा।

प्रभु क्यों कह दिया? प्रभु इसलिए कह दिया कि भु माने जन्म लेना। प्रभु माना प्रकष्ट रूप से जन्म लेते हैं। दुनियावी तरीके से जन्म नहीं लेते हैं। तो जो भी यहाँ मनुष्य मात्र हैं वो सब शरीरधारी हैं। दुनियावी तरीके से जन्म लेते हैं। गर्भ में आते हैं। लेकिन आत्माओं का बाप तो गर्भ में नहीं आता है। उसका जन्म लेना माना प्रत्यक्षता रूपी जन्म तुरीया है। किसी से मिलता-जुलता नहीं है। सूक्ष्म शरीरधारी आत्माएं भूत-प्रेत होती हैं, वो भी कोई शरीर में प्रत्यक्ष होती हैं। परन्तु उनसे भी नहीं मिलता। क्यों? वो भी प्रवेश करती हैं। मैं भी प्रवेश करता हूँ। बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का बाप शिव प्रवेश करते हैं ना। उनका भी कोई मुकर्रर रथ होता है। सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं का, भूत-प्रेत हों, चाहे फरिश्ताएं हों। अंतर क्या है? हँ? उनका जन्म-मरण का चक्र चलता है। पूर्व जन्मों और इस जनम के पाप-पुण्यों का बोझ रहता है। इसलिए वो आत्माएं हल्के-फुल्केपन का अनुभव नहीं करतीं। भूत-प्रेत आत्माएं या फरिश्ता आत्माएं। और मैं तो गर्भ से जन्म लेता ही नहीं। अनेक जन्म मुझे लेने नहीं होते हैं। शिव को अनेक जन्म लेने होते हैं ना। लेने होते हैं? नहीं। वो तो एक ही बार आते हैं और आते भी हैं तो देहभान का संग का रंग तो उनको लगता ही नहीं। जैसे और धरमपिताएं आते हैं तो उनको देह का संग का रंग लगता है। वो भी नीचे गिरते चले जाते हैं, जन्म-मरण के चक्र में आते हैं। मैं तो एक ही बार आता हूँ।

तो शिवबाबा भी इस समय में शरीरधारी टेम्परेरी हैं। क्या कहा? हँ? कौन? किसकी बात की? हँ? अरे? बात बदल गई क्या? अभी तक किसकी बात हो रही थी? शिव सुप्रीम सोल की बात हो रही थी। उसकी आत्मा का ही नाम शिव है। वो कभी बदलता नहीं। अब ये किसकी बात की? तो शिवबाबा भी इस समय में शरीरधारी टेम्परेरी है। क्या मतलब? हँ? टेम्परेरी है? किस समय में? संगमयुग में? हँ? ब्रह्मा बाबा में टेम्परेरी है? शिवबाबा? हँ? शिवबाबा इस समय में। ‘इस समय में’ माना संगमयुग में शरीरधारी तो है। शरीर धारण तो किया। लेकिन टेम्परेरी। माना 1967 की वाणी है ना। दादा लेखराज ब्रह्मा के तन में बोल रहे हैं ना। तो टेम्परेरी प्रवेश किया या जब तक संगमयुग चलेगा तब तक प्रवेश करेंगे? हँ? टेम्परेरी प्रवेश कर रहे हैं। तो बात भी सच्ची निकली कि सन् 67 में बात बोली और 68 के बाद 18 दिन के बाद शरीर छोड़ दिया। टेम्पररी तो साबित हो गया। मुकर्रर रथ होता तो आदि मध्य, अंत तीनों समय में मौजूद रहना चाहिए।

लेकिन बताया कि मैं मुकर्रर रथ भी लेता हूँ। इसका मतलब हुआ कि बाबा ने तो बच्चों को बता दिया। शिव सुप्रीम सोल ने बच्चों को बता दिया। क्या बता दिया? कि मुकर्रर रथ भी अभी प्रत्यक्ष होना है इस रथ के बाद। तो ब्रह्माकुमार-कुमारियों ने समझ लिया गुल्ज़ार दादी का रथ। अब गुल्ज़ार दादी का रथ। लेकिन मैं तो ब्रह्मा में आता हूँ। क्या? जिस तन में आता हूँ उसका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। तो गुल्ज़ार दादी को कोई ब्रह्मा बाबा कहता है क्या? नहीं। चलो, उनमें जिस तरह प्रवेशता होती है, वो तो सूक्ष्म शरीरधारियों की प्रवेशता से मिलती-जुलती है। सूक्ष्म शरीरधारी आत्माएं प्रवेश करती हैं तो झटका लगता है, चेहरा-मोहरा बदल जाता है। ऐसे ही गुल्ज़ार दादी का चेहरा-मोहरा बदल जाता है। इससे ये साबित होता है कि शिव सुप्रीम सोल, जो जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता, उसकी हल्की-फुल्की आत्मा गुल्ज़ार दादी में नहीं आती है। हाँ, ब्रह्मा बाबा की सोल जरूर आती होगी। और आती भी है क्योंकि मुरली में पहले ही बता दिया था कि ब्रह्मा बाबा का लगाव गुल्ज़ार बच्ची से बहुत पहले से ही लगा हुआ था। ये मुरली में ही बोल दिया। तो गुल्ज़ार दादी तो भाग जाती थी। बाबा के पास आती नहीं थी, ब्रह्मा बाबा के पास। वो लगाव अंत तक लगा रहा। और बाबा ने शरीर छोड़ दिया। तो अंत मते सो गते हो गई। ब्रह्मा की सोल गुल्ज़ार दादी में प्रवेश कर गई। तो इससे ये साबित हुआ कि गुल्ज़ार दादी का रथ भी न टेम्पररी रथ है शिवबाबा का, शिव बाप का और न मुकर्रर रथ है।

Today's night class is dated 18.5.1967. Children remember now in the Confluence Age that the incorporeal Father with whom we incorporeal souls used to live in the Supreme Abode, now that time has come that we are also here in a body in the Confluence Age. So, the Father is also sitting in a body and meeting us. What is the topic of remembrance? Hm? We are not a body. We are incorporeal point-like souls. And we have recollected this now in this birth when we have come to know that this is a Confluence Age, the rehearsal period of the broad drama of 5000 years. So, we have recollected that we point like souls used to live in the Supreme Abode. Now that time has come again that we are now in the body in the Confluence Age and the Father has also come and is sitting in a body and meeting us. The incorporeal abode is the home of incorporeal souls. It is the Father's home also. And here? Here the Father has come and we souls are also incorporeal; so have we come to know or not as to where is our home in this world here? Hm? Which home? The home where the Father also has to live and we children also have to live.

So, this is a spiritual meeting. And that is a physical meeting. So, just as that physical meeting takes place, similarly, in this world also, the permanent Chariot in which the Father comes, that is the Father's home as well as the home of us souls. He comes in a body, doesn't He? Is it correct? So, those are physical homes. This one; which is this home in which the Father also comes, the children also remember, they remember the home, they remember the Father, they remember the inheritance of heaven of the new world? It is the abode of happiness as well as the abode of peace. The soul is a form of peace, is not it? And the Father is also sitting. And this meeting takes place only once in the huge drama of entire 5000 years. With whom? With the Supreme Soul God Father. He is the only Supreme Soul who does not have any Father. He is the Father of all the point like souls. And He comes only once in one birth in 5000 years because the Father comes again and all the children; then He will go there with the children and live there. Then He will start sending from there. So, He meets all the children only once. Once in the entire Kalpa. So, it has been written in the scriptures also - Kalpa Kalpa lagi prabhu avatara (God incarnates every Kalpa).

Why was the word 'prabhu' (God) used? It was said 'prabhu' because 'bhu' means 'to get birth'. Prabhu means He gets birth in a special manner. He does not get birth in a worldly manner. So, all the human beings here are bodily beings. They get birth in a worldly manner. They enter in a womb. But the Father of souls does not enter in a womb. His birth, i.e. revelation like birth is unique. It does not match with anyone. Subtle bodied souls are ghosts and devils; they too get revealed in a body. But it does not match even with them. Why? They too enter. I too enter. Shiv, the Father of point like souls also enters, doesn't He? They too have a permanent Chariot. The subtle bodies souls, be it the ghosts and devils or be it the angels. What is the difference? Hm? They pass through the cycle of birth and death. They carry the burden of sins and noble actions of the past births and this birth. This is why those souls do not experience lightness. The souls of ghosts and devils or the angelic souls. And I do not get birth through the womb at all. I do not have to get many births. Shiv has to get many births, doesn't He? Does He get? No. He comes only once and even when they come, they are not at all coloured by the company of body consciousness. For example, when other founders of religions come, they are coloured by the company of the body. They too go on experiencing downfall; they pass through the cycle of birth and death. I come only once.

So, ShivBaba is also a bodily being, temporary at this time. What has been said? Hm? Who? Whose topic was mentioned? Hm? Arey? Did the topic change? Whose topic was being mentioned till now? The topic of Supreme Soul Shiv was being mentioned. The name of His soul itself is Shiv. That never changes. Now, whose topic was mentioned? So, ShivBaba is also a bodily being, temporary at this time. What does it mean? Hm? Is He temporary? At which time? In the Confluence Age? Hm? Is He temporary in Brahma Baba? ShivBaba? Hm? ShivBaba at this time. 'At this time' means He is indeed a bodily being in the Confluence Age. He did assume a body. But temporary. It means it is a Vani dated 1967, is not it? He is speaking in the body of Dada Lekhraj Brahma, is not He? So, did He enter temporarily or will He enter as long as the Confluence Age continues? Hm? He is entering temporarily. So, the topic also turned out to be true that the topic was uttered in 67 and after 68, he left his body after 18 days. He was proved to be temporary. Had he been a permanent Chariot, he should have been present in the beginning, middle and end, during all the three times.

But it was told that I also assume a permanent Chariot. It means that Baba told the children. Supreme Soul Shiv told the children. What did He tell? That the permanent Chariot is also to be revealed now after this Chariot. So, Brahmakumar-kumaris thought about the Chariot of Gulzar Dadiji. Now the Chariot of Gulzar Dadi. But I come in Brahma. What? Whichever body I enter, I name him Brahma. So, does anyone call Gulzar Dadi as Brahma Baba? No. Okay, the manner in which the entry takes place in her is similar to the entry of subtle bodied souls. When the subtle bodied souls enter, then the body shakes, the facial expressions change. Similarly, the facial expressions of Gulzar Dadi change. It proves that the Supreme Soul Shiv, who does not pass through the cycle of birth and death, His light soul does not enter in Gulzar Dadi. Yes, the soul of Brahma Baba must be definitely entering in her. And it also enters because it has already been told in the Murli that Brahma Baba had an attachment with Gulzar Dadiji already. This was told in the Murli itself. So, Gulzar Dadiji used to run away. She did not used to come near Baba, near Brahma Baba. That attachment remained till the end. And Baba left his body. So, as were the thoughts in the end, so was his fate. Brahma's soul entered in Gulzar Dadi. So, it proved that Gulzar Dadi's Chariot is also neither the temporary Chariot of ShivBaba, of Father Shiv, nor is it a permanent Chariot.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 12 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2499, आडियो 2985, दिनांक 26.04.2018
VCD 2499, Audio 2985, Date 26.04.2018
प्रातः क्लास 18.5.1967
Morning Class dated 18.05.1967
VCD-2499-Bilingual

समय- 00.01-15.22
Time- 00.01-15.22


रात्रि क्लास चल रहा था 18.5.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – पतित-पावन को परमधाम से आना पड़े। और जरूर पतित-पावन कोई छूमंतर तो नहीं आकरके करते होंगे। आते होंगे, आकर के पावन दुनिया में चलने का लायक बनाते होंगे। तो देखो, तुम्हारा ये बाप, टीचर, गुरु कहां से रोज आकरके तुम्हारे से मुलाकात करते हैं? हँ? कहेंगे परमधाम से आते हैं। परंतु मुरली में तो बोला है कि तुम मुझे ऊपर याद करते हो या नीचे याद करते हो? मैं तो यहां नीचे इस सृष्टि में आया हुआ हूँ। फिर परमधाम में ऊपर क्यों याद करेंगे? हँ? ये दोनों बातें तो कंट्राडिक्ट्री हो गई। फिर समाधान क्या है? हँ? ऊँची स्टेज ही तो है परमधाम। परमधाम, जो आत्माओं का घर है, सूरज, चांद, सितारों की दुनिया से पार, वहां बुद्धि से ही तो ऊँची स्टेज में जाया जाएगा। हँ? परंतु बोला तो ये है कि मैं तो इस दुनिया में आया हुआ हूँ। जो मुझे ऊपर याद करते हैं वो तो शूद्र संप्रदाय हैं। फिर? हँ? दो बातें कैसे? अरे, इस सृष्टि में भी आते हैं तो कोई ना कोई घर लेते होंगे ना। परम ब्रह्म। नाम ही देते हैं ब्रह्मा। तो पहला-पहला ब्रह्मा परमब्रह्म हो गया।

परमानेंटली वहां रहते हैं। फिर रोज आकर तुम्हारे से मुलाकात करते हैं। ये वंडर की बात नहीं है? हँ? क्या है वंडर की बात? हँ? कोई आत्म लोक से नहीं आते हैं रोज़-रोज़। वास्तव में इस दुनिया में ही आ गए तो काम पूरा करके जाएंगे ना। तो जिस तन में आते हैं वो तन ही उनका धाम हो गया। तो इसमें कोई वंडर खाने की बात नहीं है। इस दुनिया का ये मुकरर्र रथ परमानेंट है, घर हो गया। ये बातें कोई कहाँ लिखी हुई थोड़े ही हैं शास्त्रों में। कृष्ण थोड़े ही ऐसे कहेगा कि मैं परमधाम से आता हूँ। हँ? क्या कहेगा? कहाँ से आता हूं? हँ? वो तो सतयुगी दुनिया में प्रिंस होता है पहला। तो इस दुनिया में अगर कृष्ण की आत्मा है, जन्म लेती हुई आई है तो स्वर्ग लोक से आई है ना। परमधाम से तो नहीं कहेंगे। और कृष्ण की आत्मा तो बच्चे के रूप में पूजी जाती है। वो कैसे पढ़ाने आएगी? हो सकता है कभी? नहीं हो सकता। देखो, ये कितनी वंडरफुल पढ़ाई है। दुनिया कहती है गीता का भगवान कृष्ण है गीता ज्ञान की पढ़ाई पढ़ाने वाला। और हम कहते हैं कृष्ण तो बच्चा है। वो गीता की राजयोग की पढ़ाई कैसे पढ़ाएगा?

तो वंडरफुल पढ़ाई है। वो तो मनुष्य पढ़ाते हैं। शास्त्र पढ़ावेंगे, किताबें पढ़ावेंगे। यहां कोई बाप शास्त्रों को रेफर थोड़े ही करते हैं। यहां तो निराकार परमपिता परमात्मा परमधाम से आ करके इसमें प्रवेश करते हैं। किसमें? कृष्ण के अंतिम 84वें जनम में जब इनका नाम देते हैं ब्रह्मा, दादा लेखराज का, तो इसमें प्रवेश करके पढ़ाय करके और फिर चले जाते हैं। कहां चले जाते हैं? कितना दूर घर में चले जाते हैं! हँ? कब की बात है? 67 की बात है। 67 में दूर क्यों कहा? हँ? क्यों कहा दूर? जिस तन में मुकर्रर रूप से काम करते हैं, रहते हैं, वो दूर क्यों कह दिया? हां, वो तो ज्ञान में उस समय तो नहीं था। बाकी इमर्ज करने की बात दूसरी है। ... हां, मैं बोलता हूं। और मैं फिर चला जाता हूं। जब बच्चे याद करते हैं तो मैं आ भी जाता हूं। बोला ना - तुम मुझे जितना याद करते हो मैं तुम्हारे साथ ही होता हूं। ये तो नहीं समझते हो कि सारा दिन इस मकान में बैठा रहता है? किस मकान में? हँ? इस मकान में। हां, वो तो दूर हो गया। मुकर्रर रथ। हां, इस ब्रह्मा के शरीर रूपी मकान में बैठा रहता हूं। ऐसा तो नहीं समझते हो? नहीं, सारा दिन नहीं बैठता हूं बच्चे।

बहुत दूर से आते हैं। हँ? और फिर यहां बहुत ही सर्विस करते हैं। कहां? जिस तन में बैठ, दादा लेखराज ब्रह्मा के तन में पढ़ाते हैं, यहीं बहुत सर्विस करते हैं। आते हैं यहां सर्विस करने, पढ़ाई पढ़ाने और रहते हैं वहां जाकर के। कहां? हँ? कहां जाकर के रहते हैं? हँ? हां, मुकर्रर रथ में, जिसको कहा परमब्रह्म, जिस रथ में पहले-पहले आते हैं। अगर रात को याद करें तो आ सकते हैं। क्या? तुम रात को भी उठ के बैठ के याद करेंगे तो तुम्हारे पास आ सकते हैं। परंतु उनको आने-जाने में कोई देरी नहीं लगती है। क्यों? हँ? क्योंकि वो तो अति सूक्ष्म आत्मा है ना। उनको देरी कैसे लगेगी? वो तो सिर्फ सात्विक बुद्धि है। कौन? शिव। उसमें मन तो है ही नहीं जो रजोगुण से तमोगुण, रजोगुण बने, सतोगुण बने। तो मन ही इतना तीव्र होता है, तो वो तो प्रबल आत्मा है। सबसे ज्यादा प्रबल आत्मा कौन सी? शिव सुप्रीम सोल। इसीलिए तो गीता में लिखा है। क्या? इंद्रियाणि पराण्याहु। इंद्रियां बड़ी प्रबल हैं। इंद्रियेभ्यः परं मनः। इंद्रियों से परे मन है। मनसस्तु परा बुद्धि। (गीता 3/42) मन से भी जो मनुष्यों की बुद्धियां हैं, उन बुद्धियों में कोई मनुष्य है जिसकी बुद्धि बहुत प्रबल है। किसकी?
(किसी ने कुछ कहा।) उसकी नहीं। मनुष्य सृष्टि के बाप की। और फिर उससे भी प्रबल मेरी बुद्धि है। उसको कहा जाता है बुद्धिमानों की बुद्धि।

जैसे कि आत्मा को भी आने-जाने में देरी लगती है। हँ? देरी लगती है? आत्मा जो मन बुद्धि स्वरूप कोई भी मनुष्य की, उसकी आत्मा को आने जाने में देरी लगती है? नहीं लगती। यहां शरीर छोड़ा और फटाक से जाके गर्भ में 1 सेकंड में प्रवेश कर लेती है। समझो, आज कोई शरीर छोड़ते हैं और उनका जनम लंदन में होना है तो कितना देरी में वहां चले जाएंगे? हँ? चुटकी में क्योंकि सेकंड की बात है हर बात में। तो अब उनका तो। किनका? ऊपर वाले का? ऊपर है? ऊपर नहीं। उनका मन दूर है कहीं। उनका तो अपना सेकंड है। तो उनका आना भी सेकेंड में, हँ, और जीवन मुक्ति भी एक सेकंड में देते हैं। अरे, जब 1 सेकंड में आना जाना होता है तो 100 साल क्यों लगाते हैं? हँ? वो धर्म पिताएं तो मनुष्य धर्मपिताएं हैं। उनके तो लिए बात अलग है। वो तो कोई मन चलाने की उनको दरकार नहीं। इंद्रियों के बंधन में भी हैं नहीं। तो उनको 1 सेकेंड लगता है। किस बात में? जीवन मुक्ति देने में। तो क्यों कहा ऐसे? 100 साल क्यों लगाते फिर? हँ? इस सृष्टि में आते हैं तो मुकर्रर रथ में जो-जो मिलते जाएं, 1 सेकंड में जीवन मुक्ति देते जाएं। हँ? क्यों देर लगाते हैं? क्योंकि जीवन मुक्ति देने के लिए हर आत्मा को संपूर्ण बनना पड़े ना। हँ? निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी स्टेज मंम स्थित होना पड़े ना। फिर? जीवन मुक्ति भी नंबरवार मिलेगी कि सबको एक साथ मिलेगी? नंबरवार मिलेगी। तो नंबरवार में अव्वल नंबर कोई होगा? हँ? पहले तो अव्वल नंबर जो होगा उसको जीवन में रहते मुक्ति मिले। तो वो जनक की गाई हुई है। क्या? पहला नंबर होता है, उसका गायन हो जाता है। तो आना भी सेकंड में, जीवन मुक्ति देना भी सेकंड में।

A night class dated 18.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was - The purifier of the sinful ones has to come from the Supreme Abode. And the purifier of the sinful ones doesn’t do any magic after coming. He must be coming; He must be making us worthy of going to the pure world after coming. So, look, your Father, Teacher, Guru comes from such a faraway place to meet you! Hm? It will be said that He comes from the Supreme Abode. But it has been said in the Murli that do you remember Me above or below? I have come down here in this world. Then why will you remember above in the Supreme Abode? Hm? Both these topics are contradictory. Then what is the solution? Hm? The high stage itself is the Supreme Abode. The Supreme Abode, which is the home of the souls, beyond the world of the Sun, the Moon and the stars, one can reach there to a high stage only through the intellect. Hm? But it has been said that I have come to this world. Those who remember Me above belong to the Shudra community. Then? Hm? How are these two topics? Arey, even when He comes to this world, He must be taking one or the other home, doesn't He? Param Brahm. The name itself is assigned as Brahma. So, the first and foremost Brahma is the Parambrahm.

He lives there permanently. Then He comes everyday and meets you. Is this not a wonder? Hm? What is the topic of wonder? Hm? He doesn't come every day from the Soul World. Actually, when He has come to this world, He will go only after completing His task, will He not? So, the body, in which He comes, that body itself is His abode. So, there is nothing to wonder in this. This permanent Chariot of this world is the home. These topics are not written anywhere in the scriptures. Krishna will not say that I come from the Supreme Abode. Hm? What will He say? From where do I come? Hm? He is the first prince of the Golden Age world. So, if there is the soul of Krishna in this world, if it has been getting birth, then it has come from the heavenly abode, hasn't it? It will not be said that he has come from the Supreme Abode. And the soul of Krishna is worshipped in the form of a child. How will it come to teach? Can it ever be possible? It cannot be. Look, this is such a wonderful teaching. The world says that Krishna is the God of Gita, the teacher of the knowledge of the Gita. And we say that Krishna is a child. How will He teach the knowledge of Rajyog?

So, it is a wonderful teaching. That is taught by the human beings. They will teach scriptures, books. Here, the Father does not refer to the scriptures. Here, the incorporeal Supreme Father Supreme Soul comes from the Supreme Abode and enters in this one. In whom? In the last 84th birth of Krishna, when He names him, Dada Lekhraj as Brahma, then He enters in this one, teaches and then departs. Where does He go? He goes so far away to home! Hm? It is about which time? It is about 67. Why did He say 'far' in 67? Hm? Why did He say 'far'? Why did He call the body in which He works, lives permanently as 'far'? Yes, there was no knowledge at that time. But the topic of causing to emerge is different.... Yes, I speak. And then I depart. When children remember, then I also come. It was said that the more you remember Me, the more I am with you only. Do you think that He keeps on sitting in this house throughout the day? In which house? Hm? In this house. Yes, that is far away. The permanent Chariot. Yes, I keep on sitting in this body like house of Brahma. Do you think so? No child, I do not sit throughout the day.

He comes from far away. Hm? And then He renders a lot of service here. Where? The body, the body of Dada Lekhraj Brahma in which He sits and teaches, He renders a lot of service here. He comes here to do service, to teach knowledge and goes to live there. Where? Hm? Where does He go and live? Hm? Yes, in the permanent Chariot, which is called Parambrahm, the Chariot in which He comes first of all. He can come if you remember in the night. What? Even if you wake up in the night, sit and remember, He can come to you. But it doesn't take time for Him to come and go. Why? Hm? It is because He is a very subtle soul, is not He? How will He take time? He is just a pure intellect. Who? Shiv. He does not have mind to become tamogun from rajogun, to become rajogun, to become satogun. So, the mind itself is so intense; so, He is a strong soul. Which is the most powerful soul? Supreme Soul Shiv. This is why it has been written in the Gita. What? Indriyani paraanyaahu. The organs are very strong. Indriyebhyah param manah. Mind is beyond the organs. Manasastu paraa buddhi. (Gita 3/42) The intellects of the human beings are stronger than the mind; among those intellects, there is a human being whose intellect is very strong. Whose?
(Someone said something.) Not his. That of the Father of the human world. And then My intellect is stronger than his intellect. He is called the intellect of the intellectual ones (buddhimaanon ki buddhi).

For example, does a soul take time to come and go? Hm? Does it take time? The soul of any human being, which is in the form of mind and intellect, does that soul take time to come and go? It does not. It leaves the body here and enters in the womb immediately in a second. Suppose, someone leaves his body today and he is to be born in London, then in what time will he go there? Hm? In a trice (chutki), because it is a topic of a second in every topic. So, now His. Whose? Of the above one? Is He above? He is not above. His mind is somewhere far away. He has His own second. So, His arrival is also in a second, hm, and he gives jeevanmukti also in a second. Arey, when the arrival and departure takes place in a second, then why does it take 100 years? Hm? Those founders of religions are human founders of religions. It is a different topic for them. There is no need for them to use their mind. They are not under the bondage of the organs as well. So, it takes a second for them. In which aspect? In giving jeevanmukti. So, why was it said so? Then, why does He take 100 years? Hm? When He comes in this world, then whoever goes on meeting through the permanent Chariot, He should go on giving jeevanmukti in a second. Hm? Why does He take time? It is because every soul has to become perfect for receive jeevanmukti, will it not? Hm? It has to become constant in the incorporeal, viceless and egoless stage, will it not? Then? Will jeevanmukti also be received numberwise or will everyone get it simultaneously? It will be received numberwise. So, will there be anyone number one among the numberwise? Hm? Firstly, the one who is number one should get mukti while being alive. So, that is famous for Janak. What? The one who is number one is praised. So, the arrival is also in a second, the grant of jeevanmukti is also in a second.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2500, आडियो 2986, दिनांक 27.04.2018
VCD 2500, Audio 2986, Date 27.04.2018
रात्रि क्लास 18.5.1967
Night Class dated 18.05.1967
VCD-2500-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.05
Time- 00.01-16.05


रात्रि क्लास चल रहा था - 18.5.67. तीसरे पेज के आदि में बात चल रही थी – माया खीरखण्ड से लूनपानी बनाय देती है। अच्छों-अच्छों को भी बनाय देती। जिनको बाबा महारथी-महारथी कहते हैं उनको भी माया छोड़ती नहीं है। उनको कोई न कोई वक्त में, कोई न कोई प्वाइंट से, जब वो गफलत में रहते हैं, याद नहीं रहती है, तो फिर कुछ न कुछ आपस में लूनपानी हो पड़ते हैं। बाबा उन बच्चों को भी गुप्त में रखते हैं। पर कोई समय में आएंगे तो बताय देंगे बच्चों को कि बच्चे, क्योंकि बाप है ना। बाप है तो बच्चों को गुण छिपाय जायकरके थोड़ेही समझाएंगे। एक-एक को तो नहीं समझाएंगे। देखो, कितने बच्चे हैं। ढ़ेर के ढ़ेर हैं। तो एक-एक को कहाँ छिपाय करके और समझाएंगे। तो बाबा सबके सामने बताय देंगे। फलाने के ऊपर ग्रहचारी बैठी हुई है। और माया ने नाक से पकड़ा हुआ है। फिर पीछे बाबा नाम भी बताय देंगे। अभी नाम गुप्त रखते हैं। सिर्फ ऐसे ही कहते रहते हैं। नहीं तो तुम बच्चों को बहुत लव चाहिए एक दो में। क्योंकि तुम चलते ही हो मोस्ट लवली वर्ल्ड के बच्चे। और ये दुनिया कोई लवली वर्ल्ड थोड़ेही है। लवली वर्ल्ड है? एक दो में लवली हैं? नहीं। बच्ची, बिल्कुल लव नहीं है। स्वर्ग को मोस्ट लवली कहा जाता है। क्योंकि स्वर्ग है ही मोस्ट बिलवेड की रचना।

इस समय कोई रावण को बिलवेड मोस्ट तो नहीं कहेंगे। नहीं। किस समय की बात बताई? हँ? पुरुषोत्तम संगमयुग की बात बताई कि ये मोस्ट बिलवेड बाप आकरके मोस्ट बिलवेड स्वर्ग की स्थापना करते हैं। बाकि रावण को नहीं कहेंगे। नहीं। मोस्ट बिलवेड अगर कहते होते उनको तो फिर जलाते क्यों हैं? रावण को जलाते हैं ना। तो जरूर मोस्ट बिलवेड तो नहीं है ना। भक्तिमार्ग में स्थूल आग में जलाते हैं। यहाँ कौनसी जलाने की बात है? हँ? यहाँ दिल जलता है। तो बाबा पूछते हैं तो भला इन रावण को क्यों जलाते हो? कोई को पता नहीं है कि रावण को क्यों जलाते हैं? अभी अच्छी ये भारत में फैक्ट्स है ना। कि बरोबर रावण को बरस-बरस जलाते हैं। हँ? कहाँ की यादगार? हँ? जरूर संगमयुग पर शूटिंग हुई है, बरस-बरस रावण बढ़ता जाता है। और फिर जलाते भी जाते हैं।

अच्छा, पौना दस बजे हैं अभी। और तो कोई से मिलना नहीं है। आज मिलना है? जाकरके हाथ भी लगाया तो भी ठीक है। परन्तु फिर भी अभिमान टूटेगा। नहीं हो, नहीं अच्छी है। बाबा अभी तुम बच्चों की इतनी परीक्षा नहीं लेते हैं। हँ? माना आगे चलके परीक्षाएं और तेज़ होती जाएंगी। नहीं तो कल फिर कहेंगे, परीक्षा लेंगे ना, तो कहेंगे गोबर का छेणा बैठकरके बनाओ। तो तुम्हारा देह अहंकार टूटे। पाकिस्तान में तुम्हारे मम्मा बाबा ने और इन सब बच्चों ने देहभान तोड़ने के लिए पाकिस्तान में ऐसा बहुत किया था ना। अब यहाँ तो मोटर भी नहीं है जो उनकी सफाई करवावें। पाकिस्तान में तो मोटरें, बसें अपनी बहुत थीं। एक अलग जैसे कोई कॉलोनी थी। और जात पांत सब अलग थी। सारी कराची में। तो भी देखो, शाम हुआ, अपना कपड़ा-वपड़ा पहन करके मोटरें आए, बसें आए, घूमने गए। अच्छा। दिन में सुबह को चलो भई प्रैक्टिस करो। फिर छेना बनाओ। समझा ना। और फिर कोयले बहुत आते थे। ये जो पत्थर के कोयले चूरा मंगाते हैं ना। तो, तो उनको गोबर में मिलाके उनकी भौंर बनाते थे। तो उनको बोलते थे छेने बनाओ, कंडे। फिर वो कंडे भी बहुत अच्छी तरह से काम में आवेंगे। अच्छा। फिर ये बच्चियाँ भट्ठी चलाती थीं। और पता है भट्ठी कितनी होती थी? वहाँ बताया है इन बच्चों ने तुमको; बताया है? यहाँ से लेकरके यहाँ तक। और वो सारा नीचे आग जलती थी। और उनको कपड़ा निकालना डालना, घुमाना, फिराना, रपटना, कितनी मेहनत लगी होगी। यानी बहुतों के तो ये केस हैं ना। आग से पक्के हो गए। कोई ने कहा – हाँ बाबा, दाग के केस होते हैं ना। हाँ।

म्यूजिक बजा। बच्चों को देखकरके बाबा को खुशी भी बहुत होती है क्योंकि कल्प के बाद फिर मिलना हुआ। ये खुशी की बात नहीं है? फिर म्यूजिक बजा। मीठे-मीठे सीकिलधे ज्ञान सितारों प्रति मात-पता बापदादा का दिल व जान, सिक व प्रेम से यादप्यार और गुडनाइट। ऐसे भी कहेंगे सलाम मालेकुम। यानी अर्थ है इनमें सब। इसलिए कहते हैं तुमको सलाम है। क्यों सलाम करते हैं? हँ? क्योंकि तुम विश्व के मालिक बनते हो। इसीलिए तुमको सलाम करते हैं। तुम कहते हो – हाँ, बाबा। हम तो विश्व के मालिक बनते हैं। और आप तो ब्रह्माण्ड के मालिक हो। हँ? ब्रह्मलोक में अण्डे मिसल आत्माएं रहती हैं ना। समझा? तो वास्तव में तुम ब्रह्मा के, ब्रह्माण्ड के भी मालिक बनते हो। कौन? ब्रह्माण्ड का मालिक कौन? हँ? आत्माओं का बाप। फिर ‘वास्तव में’ क्यों कहा? हँ? वास्तव में इसलिए कहा कि वास्तव तो इस दुनिया की बात है। ब्रह्माण्ड के मालिक तुम बच्चे भी तो बनते हो ना। ना? नहीं? क्यों ऐसे कहा? हम बच्चे नहीं बनते हैं ब्रह्माण्ड के मालिक? अण्डे-अण्डे मिसल जो बिन्दु-बिन्दु आत्माएं होती हैं वो ब्रह्मा; ब्रह्मा जिसे कहते हैं ना; ब्रह्म, अण्ड। तो ब्रह्मा के बुद्धि रूपी पेट में वो अण्डे इकट्ठे नहीं होते? कहते हैं ना परमब्रह्म।

तो तुम भी ब्रह्माण्ड के मालिक हो। कैसे? तुम कौनसे ब्रह्माण्ड के मालिक हो? और विश्व के मालिक हो? हँ? जिसे तुम कहते हो परमब्रह्म, बड़े ते बड़ा ब्रह्मा, तो वो भी तो स्थान हुआ ना। जैसे बाप का घर है तुम बच्चों का भी घर है। तो तुम वहाँ के भी मालिक हो। विश्व के भी मालिक बनते हो। और तुम्हारा बाबा सिर्फ ब्रह्माण्ड का मालिक। विश्व का मालिक नहीं है। कौनसे ब्रह्माण्ड की मालिक हुई, मालिक होने की बात है? हँ? कैसे? तुम्हारा बाबा, बाप नहीं। हँ? तुम्हारा बाबा सिर्फ ब्रह्माण्ड का मालिक है। माना जहाँ अण्डे मिसल आत्माएं बिन्दु-बिन्दु रूप स्टेज में इकट्ठी होती हैं संगठन में, वहाँ का मालिक तुम्हारा बाबा। बाबा या बाप? बाबा। विश्व का मालिक नहीं। विश्व का मालिकपना तुम बच्चे संभालते हो। इसलिए भक्तिमार्ग में क्या दिखाते हैं? हँ? कहते तो हैं विश्वनाथ, जगन्नाथ, जगतपिता। लेकिन हालत क्या दिखाते हैं? ताज वाज है कुछ? कोई ताज-वाज नहीं। फकीर जैसा दिखाते हैं। तो है ना ब्रह्माण्ड का मालिक। विश्व के मालिक तुम बच्चे बनते हो। देखो, तुमको कितना ऊँच बनाते हैं। इसको कहा जाता है निष्काम सेवा। हँ? कोई कामना नहीं। जो अपने से ऊँच बनावें। अच्छा। अभी बच्चों को विदाई देंगे।

A night class dated 18.5.67 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the third page was - Maya makes you loonpaani (saltwater) from kheerkhand (milk porridge). She makes even the nice ones. Maya doesn't leave even those whom Baba calls Maharathi. At some point in time, through one point or the other, when they commit mistakes, when they are not in remembrance, then they become saltwater with each other to some extent or the other. Baba keeps those children also incognito. But at some point in time, when they come, He will tell the children that children; because He is the Father, is not He? When He is the Father, then will He hide the virtues of the children and explain? He will not explain to each and everyone. Look, there are so many children. There are numerous [children]. So, how far will He hide each and everyone and explain. So, Baba will explain in front of everyone. That particular person is under ill planetary influence. And Maya has caught them by their nose. Then later on Baba will also reveal the names. Now He keeps the names incognito. He just keeps on telling like this. Otherwise, you children should have a lot of love for each other because you are the children of the most lovely world. And this world is not a lovely world. Is it a lovely world? Are they lovely towards one another? No. Daughter, there is absolutely no love. Heaven is called most lovely because heaven itself is the creation of the most beloved one.

At this time Ravan will not be called beloved most. No. It is about which time? Hm? It was mentioned about the Purushottam Sangamyug that this most beloved Father comes and establishes the most beloved heaven. Ravan will not be said so. No. If he is called most beloved, then why is he burnt? Ravan is burnt, is not he? So, definitely he is not the most beloved one, is he? On the path of Bhakti, they burn him in physical fire. Here, it is about which burning? Hm? Here the heart burns. So, Baba asks - Why do you burn this Ravan? Nobody knows that why is Ravan burnt? Now these are nice facts in India, aren't they? Definitely Ravan is burnt every year. Hm? It is a memorial of which place? Definitely the shooting has taken place in the Confluence Age; Ravan keeps on growing every year. And then people also go on burning him.

Achcha, it is 9.45 PM now. We don’t have to meet anyone else. Is anyone supposed to meet today? Even if you go and touch with your hand it's okay. But, however the ego will break. It shouldn't be there, no, it is good. Baba does not test you children so much now. Hm? It means that the tests will become faster in future. Otherwise, He will tell tomorrow again; He will test, will He not? He will say - Sit and prepare cow dung cakes so that your body consciousness breaks. Your Mama Baba and all these children had done many such things in Pakistan to break their body consciousness, did they not? Now there are not even motors (vehicles) here to ask you to clean them. In Pakistan we had a lot of our own motors, buses. It was like a separate colony. And the castes and creeds were separate. In the entire Karachi. Yet, look, as soon as the evening started, you used to wear your own clothes and sat in the motors, buses and went around. Achcha. Brother, practice in the day, in the mornings. Then prepare cow dung cakes. Did you understand? And then you used to get a lot of coal. We used to procure the powder of stones, coal, did we not used to? So, so, they used to be mixed with cow dung and we used to prepare cow dung cakes with it. So, they used to be asked to prepared cow dung cakes. Then those cow dung cakes will prove very useful. Achcha. Then these daughters used to organize bhattis. And do you know the extent of the bhatti (furnace)? These children have told you there. Did they tell? From this place to this place. And beneath that entire area the fire used to burn. And they used to put clothes, rotate it, knead it; they must have worked so hard. It means that there are cases of many people, aren't they? They became strong in fire. Someone said - Yes, Baba, there are cases of stains, aren't they? Yes.

Music was played. Baba feels very happy on seeing the children because you have met after a Kalpa. Is it not a topic of joy? The music was played again. BapDada's remembrance, love and good night from the heart and soul, with love and affection to the sweet-sweet, long lost and now found stars of knowledge. It will also be said - Salaam Malekum. It means - All of them. This is why He says - I salute you. Why does He salute? Hm? It is because you become the masters of the world. This is why He salutes you. You say - Yes, Baba. We become the master of the world. And You are the master of the Brahmaand (universe). Hm? Egg-like souls reside in the Brahmlok (abode of Brahm), don't they? Did you understand? So, actually you become the masters of Brahma, Brahmaand also. Who? Who is the master of Brahmaand? Hm? The Father of souls. Then why did He say 'actually'? He said 'actually' because 'actually' is about this world. You children also become the masters of Brahmaand, don't you? Don't you? No? Why did He say so? Don't we children become the masters of Brahmaand? The point like, egg like souls are; that Brahma. The one who is called Brahma, is not he? Brahm, and (egg). So, don't those eggs collect in the womb-like intellect of Brahma? It is said - Parambrahm, is not it?

So, you are also masters of Brahmaand. How? You are masters of which Brahmaand? And are you masters of the world? Hm? The one whom you call Parambrahm, the biggest Brahma, so, he too is a place, is not he? Just as it is the Father's home, it is the home of you children as well. So, you are masters of that place as well. You become the masters of the world as well. And your Baba is just the master of Brahmaand. He is not the master of the world. It is about being the master of which Brahmaand? Hm? How? Your Baba, not Baap (Father). Hm? Your Baba is just the master of Brahmaand. It means that your Baba is the master of that place where all the egg-like souls gather in a gathering in a point form stage. Baba or Baap (Father)? Baba. Not the master of the world. You children take care of the ownership of the world. This is why, what is shown on the path of Bhakti? Hm? It is said - Vishwanath, Jagannath, Jagatpita. But what is His condition shown as? Does He have any crown, etc? He does not have any crown. He is shown like a fakir (saint). So, he is the master of Brahmaand. You children become the master of the world. Look, you are made so high. This is called selfless service. Hm? There is no desire. He makes you higher than Himself. Achcha. Now I shall take leave from the children.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 Feb 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2501, आडियो 2987, दिनांक 28.04.2018
VCD 2501, Audio 2987, Date 28.04.2018
रात्रि क्लास 27.5.1967
Night Class dated 27.5.1967
VCD-2501-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.02
Time- 00.01-14.02


रात्रि क्लास चल रहा था - 27.5.1967. दूसरे पेज के मध्य आदि में बात चल रही थी – कि आजकल के जो पंडित, विद्वान, आचार्य हैं वो दुनिया की दृष्टि में कुछ भी नहीं। हैं सभी दो पैसे के। वर्थ नाट ए पैनी। क्योंकि जब तक बाप न आवे तो राजयोग कौन सिखावे? बाप के सिवाय तो कोई राजयोग सिखाय नहीं सकता। और असली गीता ज्ञान सुनाय भी नहीं सकता। तो तुम बच्चे जानते हो कि हम जो स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी में बनते हैं नर से नारायण जैसे, नारी से लक्ष्मी जैसे वहाँ भक्तिमार्ग के पण्डित, विद्वान, पंडित, आचार्यों से तो नहीं बन सकते। वो तो वर्थ नॉट ए पैनी बनाते हैं। वर्थ पाउंड हम बन ही नहीं सकते। वो क्या करते हैं? वो तो शरीर निर्वाह के लिए अपना धन कमाते हैं। अपना अल्पकाल क्षणभंगुर के लिए पढ़ाई पढ़ते हैं और दूसरों को पढ़ाते हैं। वो तो एक जनम की पढ़ाई हुई। अभी तो बाप आए हैं तुम आत्माओं को पढ़ाने के लिए। आत्माओं का कनेक्शन तो अनेक जन्मों से है। तो बाप तुमको आत्मा का ज्ञान देकरके आत्मा ऊँच ते ऊँच पद कैसे पाय सकती हैं, वो बताते हैं। ये कोई क्षणभंगुर के लिए पढ़ाई नहीं है, एक जनम के लिए नहीं है। अनेक जन्मों की पढ़ाई है। 21 जन्मों की तो पक्की है, सुख ही सुख मिलेगा। दुख का नाम-निशान नहीं।

अभी तुम बच्चे जानते हो कि अभी संगमयुग में बाप आए हुए हैं। किसका बाप? हँ? वो धरमपिताएं नहीं जिनके फालोअर्स उन्हें अपने धरम का बाप मानते हैं। वो तो हद के हो गए। भले क्राइस्ट है, 200-300 करोड़ क्रिश्चियन्स उन्हें अपना बाप मानते हैं। परन्तु सारी दुनिया के लोग तो उन्हें बाप नहीं मानते ना। वो तो बेहद का बाप एक ही है। सभी आत्माओं का बाप। सुप्रीम गॉड फादर कहा जाता है। उनको दुनिया नहीं जानती है। कोई भी नहीं जानते। तुम बच्चे जानते हो कि वो ही सुप्रीम सोल बाप पढ़ाय रहे हैं। तो जो जन्म-जन्मान्तर के लिए अमर देवता बनाने की पढ़ाई पढ़ाते हैं वो सच्ची-सच्ची अमरकथा पढ़नी पडे ना। जिस पढ़ाई से, जिस कथा को सुनने से हम अमरपुरी में जाते हैं। ये तो है ही मृत्युलोक। जब हम अमरपुरी में जाएंगे तो इस मृत्युलोक में वापस नहीं आएंगे। बरोबर वहाँ अमर रहेंगे। क्या? हम मरेंगे नहीं स्वर्ग में? शरीर नहीं छोड़ेंगे? शरीर ही तो मरता है। शरीर छोड़ेंगे। लेकिन अपनी स्वेच्छा से शरीर छोड़ेंगे। वहाँ कभी भी अकाले मृत्यु नहीं होती है। इस दुनिया में तो अकाले मौत हो जाती है। कोई बहुत पाप करते हैं तो पापों का बोझा इतना बढ़ जाता है कि अकाले मौत हो जाती है। सूक्ष्म शरीर धारण करना पड़ता है भूत-प्रेतों का। भटकते हैं। पीछे ये थोड़ेही होंगी मृत्यु आदि। ये सब भक्तिमार्ग में होता है। एक भी, जरी भी भक्तिमार्ग की कोई बात नहीं होगी।

बच्चों की बुद्धि में आया है कि एक बाप आकर जो ज्ञान देते हैं तो एक के दिये हुए गीता ज्ञान से सतयुग त्रेता स्वर्ग स्थापन होता है। राम-कृष्ण की दुनिया कही जाती है। फिर त्रेता के बाद द्वैतवादी द्वापरयुग आता है। वहाँ भक्ति में हम नीचे गिरते हैं। नीचे क्यों गिरते हैं? क्योंकि देहधारी धरमपिताएं इस दुनिया में आते हैं, द्वैतवाद फैलाते हैं। दो-दो धर्म, दो-दो राजाइयां, दो-दो भाषाएं, दो-दो कुल, दो-दो मतें, बढ़ती चली जाती हैं। तो झगड़े बढ़ते हैं। तो भक्ति में हम नीचे आ जाते हैं। वहाँ भक्तिमार्ग में द्वापरयुग से सबकी बुद्धि भागती रहती है। एक जगह ठिकाना नहीं मिलता। यही चक्कर फिरता रहता है। तो अभी तुम बच्चे जान गए हो कि हम आत्माएं इस दुनिया में एक्टर्स हैं। कोई छोटे एक्टर कोई बड़े एक्टर। कोई ज्यादा जन्म लेते, ज्यादा चोले बदलते, कोई कम चोले बदलते। तो जब एक्टर्स हैं तो एक्टर्स को अपने पार्ट का मालूम तो होना चाहिए ना। आत्मा एक्टर है। तो तुम क्या एक्ट बजाना है, क्या एक्ट इस दुनिया में आकर बजाया है पास्ट में, क्या बजावेंगे, ये तो कुछ पता ही नहीं। तो बेवकूफ एक्टर्स हुआ ना। एक्टर्स को तो जरूर मालूम होना चाहिए कि हमारा पार्ट क्या है जन्म-जन्मान्तर। ये बात जन्म-जन्मान्तर का हिसाब-किताब एक के ज्ञान से मिलता है।

देखो, वोही, वोही एक्टर्स, बार-बार कल्प में पार्ट बजाते हैं। वो ही कल्प चार युगों का। और वो एक्टर्स भी कौन हैं देखो। मिचनू-मिचनू, छोटी-छोटी आत्माएं एक्टर हैं। तो ये नई बातें सुनते हैं। अभी पुरुषोत्तम संगमयुग में जबकि 5000 वर्ष के चार युगों के ड्रामा की अभी शूटिंग हो रही है, रिहर्सल हो रही है। अभी हम जानते हैं कि हम आत्मा हैं। पहले हम भी भक्तिमार्ग में थे, जानते नहीं थे। तो समझते थे हम देह हैं। कोई पूछता था – तुम कौन हो, तो बताते थे – हम नौजवान हैं, बुड्ढे हैं, हम बालक हैं, मास्टर हैं, टीचर हैं। अभी यहाँ बाप के पास आए हो तो तुम्हें नॉलेज मिली है कि ये टीचर, ये डाक्टर, ये इंजीनियर, ये तुम जब पैदा हुए थे तब थोड़ेही थे। तुम परमानेन्ट क्या हो? तो बाप बताते हैं तुम तो परमानेन्ट आत्मा हो। ज्योतिबिन्दु आत्मा हो। जिस ज्योतिबिन्दु की यादगार भारत में माताएं आज भी बिन्दी लगाती हैं। कहाँ? नाक पे क्यों नहीं लगाती? हँ? क्योंकि आत्मा उत्तमांग में रहेगी ना। उत्तमांग में ही भृकुटि है। भरी पूरी कुटि जहाँ आत्मा रूपी राजा रहता है पूरे शरीर रूपी राज्य को कंट्रोल करने के लिए।

तो ये नॉलेज बाप के पास है। कौनसे बाप के पास? हँ? धरमपिताओं के पास नहीं। हँ? हाँ। वो ब्रह्मा के पास भी नहीं। जिस ब्रह्मा से सारी दुनिया ब्राह्मण बनती है। क्या? सारी दुनिया ब्राह्मण बनेगी। सबको अपनी आत्मा का पार्ट का पता चलेगा। ये नॉलेज ब्रह्मा के पास भी नहीं है। किसके पास है? जो ब्रह्मा का भी बाप है, विष्णु का भी बाप है। कहा ही जाता है त्रिमूर्ति बाप। त्रिमूर्ति शिव। हँ? क्यों कहते हैं त्रिमूर्ति शिव? हँ? शिव को मूर्ति होती है क्या? हँ? शिव तो खुद ही बिन्दी है। सदाकाल बिन्दी है। वो तो कभी भी शरीर धारण करता ही नहीं। गर्भ से जन्म लेता ही नहीं। तो त्रिमूर्ति शिव क्यों कहते हैं? इसीलिए कहते हैं कि वो जब इस सृष्टि पर आता है तो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है वो रथधारी याद की शक्ति से बाप समान बनता है। कौनसे बाप समान? शिव बाप के समान निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनता है और फिर उसका नाम जोड़ा जाता है शिव के साथ। और किसी का नाम नहीं जोड़ा जाता। क्या बोलते हैं? शिव शंकर। तो वोही शंकर नाम रूप से प्रसिद्ध होने वाली आत्मा, जिसे दूसरे धर्मों में आदम, एडम भी कहते हैं, हँ, वो बाप समान, शिव समान निराकारी बनती है। और उसके लिए कहा जाता है त्रिमूर्ति शिव। उसके पास ये नॉलेज है। जैसे मेरे पास नॉलेज है, उसके पास भी नॉलेज है। कब? सारी दुनिया की त्रिकालदर्शिता की नॉलेज कब है? पुरुषार्थी जीवन में? नहीं। जब पुरुषार्थ संपन्न होता है, वो बाप समान बनता है, तब कहा जाता है त्रिमूर्ति शिव असली। तीन मूर्तियों के साथ प्रत्यक्ष होता है संसार में।

A night class dated 27.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was - The present day pundits, scholars, acharyas (teachers) are nothing in the eyes of the world. All are worth two paise. Worth not a penny because unless the Father comes who will teach Rajyog? Nobody except the Father can teach Rajyog. And nobody can narrate the true knowledge of Gita as well. So, you children know that we become Narayan from nar (man), Lakshmi from naari (woman) in this school, college, university; but you cannot become so there through the pundits, scholars and teachers on the path of Bhakti. They make you worth not a penny. We cannot become worth pound at all. What do they do? They earn their wealth for the sustenance of their body. They study knowledge temporarily, momentarily and teach others. That is a study of one birth. Now the Father has come to teach you souls. The connection of the souls is with many births. So, the Father gives you the knowledge of the soul and tells you how the soul can achieve the highest on high post. This is not a momentary knowledge, not for one birth. It is a knowledge of many births. It is sure for 21 births that you will get only happiness. There will not be any name or trace of sorrows.

Now you children know that now the Father has come here in the Confluence Age. Whose Father? Hm? Not those founders of religions whose followers consider them to be the Father of their religions. They are in a limited sense. Although there is Christ, 200-300 crore Chrisians consider him to be their Father. But the people of the entire world do not consider him to be their Father, do they? The unlimited Father is only one. The Father of all the souls. He is called the Supreme God Father. The world does not know about Him. Nobody knows. You children know that that Supreme Soul Father is teaching. So, the knowledge that He teaches for making us imperishable deities for many births, you have to study that true Amarkatha (the story of eternity), will you not? The knowledge, the story by listening to which we go to the abode of eternity (Amarpuri). This is an abode of death. When we go to the abode of eternity, then we will not come back to the abode of death. Definitely we will be eternal there. What? Will we not die in heaven? Will we not leave our bodies? It is the body itself which dies. We will leave our bodies. But we will leave bodies voluntarily. Untimely death never occurs there. Untimely deaths occur in this world. If someone commits a lot of sins, then the burden of sins increases so much that untimely death occurs. One has to assume the subtle body of ghosts and devils. They wander. Later on this death, etc. will not occur. All this happens on the path of Bhakti. There will not be any, even a little topic of the path of Bhakti.

It has occurred in the intellect of the children that the knowledge that one Father comes and gives, then heaven in the form of Golden Age and Silver Age is established through the knowledge of the Gita given by one. Then the dualistic Copper Age comes from the Silver Age. There we fall in Bhakti. Why do we fall? It is because when bodily founders of religions come to this world, they spread dualism. Two, two religions, two-two kingdoms, two-two clans, two-two opinions keep on increasing. So, the fights increase. So, we undergo downfall in Bhakti. There, on the path of Bhakti, everyone's intellect keeps on running from the Copper Age. They do not find destination at one place. This circle keeps on revolving. So, now you children have come to know that we souls are actors in this world. Some are small actors, some are big actors. Some get more births, some change more dresses (bodies), some change fewer dresses. So, when you are actors, the actors should know about their part, shouldn't they? A soul is an actor. So, you do not know at all as to what act you have to play, which act you have played by coming to this world in the past, and which part will you play. So, they are foolish actors, aren't they? The actors should definitely know as to what is our part birth by birth. This account of birth by birth is received from the knowledge of one.

Look, the same, the same actors play their part in the Kalpa again and again. The same Kalpa consisting of four Ages. And look, who are those actors? Tiny, tiny, small, small souls are actors. So, you listen to these new topics. Now, in the Purushottam Confluence Age, when the shooting, the rehearsal of the 5000 years drama of all the four Ages is taking place, now we know that we are souls. In the past we too were on the path of Bhakti, we did not used to know. So, we used to think that we are bodies. When someone used to ask - Who are you, then we used to tell - We are young, we are old, we are children, we are masters, we are teachers. Now when you have come to the Father, you have received the knowledge that were you this teacher, doctor, engineer when you were born? What are you permanently? So, the Father tells that you are a permanent soul. You are a point of light. In memory of that point of light mothers apply bindi even to this day. Where? Why don't they apply on the nose? Hm? It is because the soul will reside in the highest organ, will it not? The bhrikuti is located in the highest organ only. It is a 'bhari-poori kuti' where the soul like king resides to control the entire body-like kingdom.

So, the Father has this knowledge. Which Father? Hm? Not the founders of religions. Hm? Yes. Not even that Brahma. That Brahma through whom the entire world becomes a Brahmin. What? The entire world will become Brahmin. Everyone will know about the part of their soul. Even Brahma doesn’t have this knowledge. Who possesses [this knowledge]? The one who is Brahma's Father, Vishnu's Father as well. It is said - Trimurti Father. Trimurti Shiv. Hm? Why do you say Trimurti Shiv? Hm? Does Shiv have a personality? Hm? Shiv is Himself a point. He is forever a point. He never assumes a body. He does not get birth through a womb at all. So, why is He called Trimurti Shiv? It is said because when He comes in this world, then the permanent Chariot in which He enters, that owner of the Chariot (rathdhaari) becomes equal to the Father through the power of remembrance. Equal to which Father? He becomes incorporeal, viceless, egoless like the Father Shiv and then his name is joined with Father Shiv. The name of nobody else is joined. What do you say? Shiv Shankar. So, the same soul which becomes famous through the name and form of Shankar, who is also called Aadam, Adam in other religions, hm, becomes incorporeal like the Father, like Shiv. And it is said for him - Trimurti Shiv. He has this knowledge. Just as I have knowledge, he too has knowledge. When? When does he have the knowledge of the three aspects of time of the entire world? In the purusharthi life? No. When the purusharth becomes complete, when he becomes equal to the Father, then it is said Trimurti Shiv in reality. He is revealed with three personalities in the world.

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