Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2519, आडियो 3005, दिनांक 16.05.2018
VCD 2519, Audio 3005, Date 16.05.2018
प्रातः क्लास 9.7.1967
Morning Class dated 9.7.1967
VCD-2519-extracts-Bilingual

समय- 00.01-12.42
Time- 00.01-12.42


प्रातः क्लास चल रहा था - 9.7.1967. रविवार को पांचवें पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – जो भी इस द्वैतवादी दुनिया के द्वापरयुग से गुरु आते हैं, जो दो-दो धरम चलाते हैं, दो-दो भाषाएं चलाते हैं, दो-दो राज्य शुरु हो जाते हैं, ऐसे द्वैतवादी गुरु कहलाते हैं अपन को गुरु, लेकिन वास्तव में गुरु कोई भी नहीं है। क्यों? कि गुरु उसे कहा जाता है जिसमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति हो। तो बडे ते बड़ी गुरुत्वाकर्षण शक्ति किसमें कहें? जो सारे संसार का उद्धार कर दे। वो तो नंबरवार धरमपिताएं आते हैं। तो नंबरवार गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। जिसमें जितनी ज्यादा गुरुत्वाकर्षण शक्ति है वो उतने ही हुजूम को इकट्ठा कर पाता है। मान लो क्राइस्ट है। हँ? लेकिन उसका हुजूम तो बहुत बड़ा है। इसका मतलब क्या हुआ? हँ? कि वो जो भी ज्ञान लेता है उस ज्ञान में, उस क्राइस्ट से पहले आने वाली आत्मा का कोई ज्ञान मिक्स होता है कि नहीं होता है? होता है। तो जैसे शुद्ध नहीं रहा। मिक्स हो गया। फिर भी, ज्यादा से ज्यादा 200-250 करोड़ फालोअर्स बनते हैं। इससे ज्यादा तो विदेशी बनते ही नहीं। तो बड़े ते बड़ा गुरु कौन जिसे सद्गुरु कहा जाए? सत माना जो हमेशा रहे। कभी विनाश न हो। उसको सत कहा जाता है।

तो ये तो द्वापरयुग से आए हैं। द्वापरयुग के बाद कलियुग खतम होगा तो ये गुरु लोग भी खतम हो जाएंगे। फिर सारी दुनिया का उद्धार कौन करेगा? वो गुरु चाहिए ना। तो वो कौन है? हँ? वो गुरु है, हँ, जिसको कहते हैं सद्गुरु मिला दलाल। दलाल के रूप में है माना साकार है। और किसकी दलाली करता है? हँ? निराकार की दलाली करता है। वो धरमपिताएं भी निराकार को मानते हैं। लेकिन वो ये नहीं जानते कि बड़े ते बड़ा दलाल कौन है? बड़े ते बड़ा गुरु कौन है? छोटे-छोटे गुरु तो फिर झूठे गुरु हो गए ना। सच्चे तो नहीं हुए ना। सच्चा तो सदाकाल का होना चाहिए। तो सच्चा सदगुरु वो है जो वो जानते भी हैं, नाम भी लेते हैं, आदम। लेकिन उसे पूरा नहीं जानते हैं क्योंकि वो तो सृष्टि के आधे समय के बाद ही आते हैं ना। सृष्टि जब शुरु होती है, आरंभ होती है सतयुग से, तो वो उस समय की तो बात ही उनकी बुद्धि में नहीं है। माना वो तो आते ही हैं नरक की दुनिया में। तो स्वर्ग की दुनिया की बात उनकी बुद्धि में है ही नहीं। और सद्गुरु स्वर्ग में आता है या स्वर्ग से भी पहले आता है, प्रत्यक्ष होता है संसार में? कब प्रत्यक्ष होता है? हाँ। स्वर्ग से भी पहले क्योंकि उस सद्गुरु का काम ही है सद्गति देना। और सद्गति होती है स्वर्ग में। सद्गति कहा ही जाता है – शरीर भी और आत्मा भी, दोनों की सद्गति हो। दोनों सुख-शांति से रहें।

तो वो सद्गुरु जो है; धर्मपिताएं तो विदेशी हैं, स्वदेशी हैं, वो तो मानते हैं निराकार को। लेकिन वास्तव में वो ये नहीं जानते कि वो निराकार कैसे नई दुनिया बनाता है। स्वर्ग को मानते हैं। जैसे आदम को मानते हैं जैसे पैराडाइस को भी मानते हैं, जन्नत को मानते हैं, लेकिन जानते नहीं वो कैसे स्थापना होती है। तो वो आदम जानता है क्या? हँ? आदम, जो सृष्टि का आदि है, आदि पुरुष, आदि मनुष्य, आदि मानव, तो वो जानता है क्या? हँ? वो भी जन्म-मरण के चक्र में आते-आते सब, सब भूल जाता है। उसकी आत्मा भी कमजोर हो जाती, तामसी बन जाती। तो फिर कौन बताएगा? वो ही बताएगा जिसको सब मानते हैं सारी दुनिया में। भारतवासी भी मानते हैं, भारत के जो भारतीय धरम हैं वो भी मानते हैं, विदेशी धरमपिताएं उनके फालोअर्स भी मानते हैं। किसको? निराकार को। तो जो निराकार को सब मानते हैं, वो ही तो वास्तव में मूल है ना। क्यों? क्योंकि वो ज्ञान का अखूट भण्डार है। क्यों अखूट भण्डार है? क्योंकि वो जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता, गर्भ से जन्म नहीं लेता है। वो, जैसे धरमपिताएं प्रवेश करते हैं, जैसे क्राइस्ट ने जीसस में प्रवेश किया, ऐसे ही वो आता है तो आदम में प्रवेश करता है। वो है उसका मुकर्रर रथ। और साकार भी है। तो उसी को कहा जाता है शिव माना निराकार, बाबा माना साकार। तो दोनों रूप उसमें स्थायी हो जाते हैं तब कहा जाता है शिवबाबा। तो वो शिवबाबा ही सारी दुनिया की सद्गति करता है। धरमपिताओं की भी सद्गति करता है। जो बड़े ते बड़े इस दुनिया के गुरु माने जाते हैं।

तो बताया, गुरु कोई को भी नहीं कहा जाता सिवाय एक के। कौन एक? सदा शिव? हँ? सदा शिव कहें? कौन है सदाशिव? हँ? सदा शिव किसे कहें? इस सृष्टि पे सदा कौन है? सदा तो एक अकालमूर्त है जिसे हम शिवबाबा कहते हैं। हँ? उसको काल भी नहीं खाता। अकाल है। और मूर्ति भी। गुरु साकार होना चाहिए ना। मूर्ति माना साकार। तो वो एक ही सद्गुरु है। और फिर ये भी बताया – जो सद्गुरु है वो ही तुम्हारा बाप है, वो ही तुम्हारा टीचर भी है। माने एक ही स्वरूप है साकार निराकार का मेल इस संसार में पार्ट बजाने वाला, जो इस सृष्टि में आदि से लेकर अंत तक साकारी प्लस निराकारी स्टेज में स्थिर रहता है। वो ही सद्गति देने वाला है सारी दुनिया को। सर्व की सद्गति करने वाला। माना? सर्व माने? सबकी सद्गति माने? किनकी सद्गति? हँ? 500-700 करोड़ की सद्गति करता है? अच्छा? माना और जो प्राणी हैं उनकी सद्गति नहीं होती? हँ? क्यों? हँ? अरे, उनकी सद्गति होती है कि नहीं? हँ? सद्गति होती है? वो स्वर्ग में जाते हैं? हँ? जाते हैं। तो बताया, जो श्रेष्ठ प्राणी हैं, वो सद्गति में जाते हैं। पूर्ण सद्गति। उनमें भी नंबरवार हैं। क्या? जैसे कहते हैं ना 84 लाख योनियाँ हैं। तो जनम कितने हैं? मनुष्य के जनम 84 ज्यादा से ज्यादा। तो 84 जन्मों में वो 84 लाख योनियां आती रहती हैं। हर जनम में एक लाख योनि श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ उतरती है। तो सबकी सद्गति। माना ऐसे नहीं कि सिर्फ 8 की सद्गति करता है। हँ? आठ की भी नंबरवार है कि एक जैसी है? 8 की भी कहेंगे नंबरवार। तो इस सृष्टि में जितने भी प्राणी मात्र हैं, जिनमें प्राण वायु चलती है;
(बाबा ने श्वास-प्रश्वास करके दिखाया) ये प्राण वायु है ना। बाहर निकलती है, अन्दर आती है। अपान वायु उपान वायु। तो बताया, जो भी प्राणी मात्र हैं, प्राण शक्ति उनमें काम करती है उन सबकी सद्गति करने वाला एक है। कौन? शिवबाबा। साकार भी है और निराकार ज्योतिबिन्दु आत्मा भी है।

A morning class dated 9.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fifth page was - All the gurus who come from the Copper Age of this dualistic world, who start two religions, two languages, two kingdoms, such dualistic gurus call themselves guru, but actually nobody is a guru. Why? It is because Guru is said to be the one who possesses the power of gravitational pull (gurutwakarshan shakti). So, who will be said to have the biggest gravitational power? The one who uplifts the entire world. Those founders of religions come numberwise. So, they have numberwise gravitational power. The more gravitational power someone has, the more gathering he is able to collect. Suppose, there is Christ. Hm? But his gathering is very big. What does it mean? Hm? That whatever knowledge he obtains, in that knowledge, does the knowledge of any soul which has come prior to Christ get mixed up or not? It gets mixed up. So, it is as if it did not remain pure. It became mixed. Yet, at the most he is able to gather 200-250 crore followers. Souls do not become foreigners in numbers more than this. So, who is the biggest guru who could be called Sadguru? Sat means the one who remains forever. He should never be destroyed. He is called truth.

So, they have come from the Copper Age. When the Iron Age ends after the Copper Age, then these gurus will also perish. Then who will uplift the entire world? That guru is required, is not he? So, who is he? Hm? That guru is, hm, the one who is called 'Sadguru milaa dalaal' (the Sadguru was found in the form of a middleman). He is in the form of a dalaal means that he is corporeal. And whose mediation (dalaali) does he do? Hm? He performs the mediation of the incorporeal. Those founders of religions also believe in the incorporeal. But they do not know that who is the biggest dalaal? Who is the biggest guru? Small gurus are then false gurus, aren't they? They are not the true ones, are they? The true one should be forever. So, the true guru is the one whom they also know and utter his name also; Aadam. But they do not know him completely because they come only after half the time of the world, don't they? When the world starts from the Golden Age, then the topic of that time is not in their intellect. It means that they come only in the world of hell. So, the topic of the world of heaven is not in their intellect at all. And does Sadguru come in heaven or does He come, get revealed before the world even before heaven? When is He revealed? Yes, even before heaven because the task of that Sadguru Himself is to cause true salvation (sadgati). And Sadgati is caused in heaven. Sadgati is said to be when the true salvation of the body as well as the soul takes place. Both should remain in happiness and peace.

So, that Sadguru, the founders of religions are foreigners (videshi), own countrymen (swadeshi); they believe in the incorporeal. But actually, they do not know that how that incorporeal builds a new world. They believe in heaven. Just as they believe in Aadam, just as they believe in Paradise also, believe in Jannat, but they do not know as to how it is established. So, does that Aadam know? Hm? Aadam, who is the beginning, the first man, the first human being, of the world, so, does he know? Hm? He too forgets everything while passing through the cycle of birth and death. His soul also becomes weak, degraded (taamsii). So, then who will tell? He, whom everyone in the entire world believes, will tell. The Indians also believe; the Indian religions of India also believe; the foreign founders of religions and their followers also believe. Whom? The incorporeal. So, the incorporeal, whom everyone believes is the actual origin, is not He? Why? It is because He is the inexhaustible storehouse of knowledge. Why is He the inexhaustible storehouse? It is because He does not pass through the cycle of birth and death; He does not get birth through the womb. Just as other founders of religions enter, just as Christ entered in Jesus, similarly He comes and enters in Aadam. He is His permanent Chariot. And he is corporeal as well. So, He alone is called Shiv, i.e. incorporeal; Baba means corporeal. So, both the forms become permanent in him; then he is called ShivBaba. So, that ShivBaba Himself causes the true salvation of the entire world. He causes the true salvation of the founders of religions as well, those who are considered to be the biggest gurus of this world.

So, it was told that nobody except one is called a guru. Who is that one? Sadaa Shiv? Hm? Can He be said Sadaa Shiv? Who is Sadaa Shiv? Hm? Who will be called Sadaa Shiv? Who is forever in this world? One Akaalmoort, whom we call ShivBaba is forever (sadaa). Hm? Even death does not devour him. He is Akaal (eternal). And a moorti (personality) as well. Guru should be corporeal, shouldn't he be? Moorti means corporeal. So, He is the only Sadguru. And then it was also told - The Sadguru is your Father, He is your teacher as well. It means that there is only one form, the combination of corporeal and incorporeal which plays a part in this world, which remains constant in the corporeal plus incorporeal stage from the beginning to the end in this world. He is the one who cause true salvation of the entire world. The one who causes true salvation of everyone. What does it mean? What does everyone mean? What is meant by the true salvation of everyone? Whose true salvation? Hm? Does He cause the true salvation of 500-700 crores? Achcha? Does it mean that the true salvation of other living beings is not caused? Hm? Why? Hm? Arey, is their true salvation caused or not? Hm? Is their true salvation caused? Do they go to heaven? Hm? They do go. So, it was told, the righteous living beings achieve true salvation. Complete true salvation. Even among them there are numberwise. What? For example, it is said that there are 84 lakh species. So, how many births are there? There are at the most 84 births of human beings. So, those 84 lakh species keep on passing through 84 births. One lakh highest on high species descend in every birth. So, the bestower of true salvation upon everyone. It means it is not as if he causes the true salvation of just eight. Hm? Is it numberwise for eight also or alike? It will be said numberwise even for eight. So, all the living beings in this world, who inhale and exhale oxygen;
(Baba inhaled and exhaled to show) This is the life giving air (praan vaayu), is not it? It comes out; it goes in. Apaan vaayu (inward breath), upaan vaayu (outward breath). So, it was told - The bestower of true salvation upon all the living beings, in whom the life force works, is one. Who? ShivBaba. There is corporeal also and there is incorporeal point of light soul also.
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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 14 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2520, आडियो 3006, दिनांक 17.05.2018
VCD 2520, Audio 3006, Audio 3006, Date 17.05.2018
प्रातः क्लास 9.7.1967
Morning Class dated 9.7.1967
VCD-2520-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.26
Time- 00.01-17.26


प्रातः क्लास चल रहा था - 9.7.67. रविवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – वो जो गुरु लोग होते हैं वो कोई सद्गति थोड़ेही करते हैं। बुद्ध को याद करेंगे, क्राइस्ट को याद करेंगे। अच्छा, माला फेरेंगे। माला में गुरियों को खिसकाते जाएंगे और धर्मपिता को याद करते जाएंगे। जैसे भारत में माला सिमरते जाते हैं, राम-राम बोलते जाते हैं। अरे! सारे ही मणके रूपी आत्मा राम हो गईं क्या? हँ? तो वो माला फेरने से कोई विकर्म थोड़ेही विनाश होंगे। ये तो सुप्रीम बाप आते हैं, तब मालाएं तैयार होती हैं। विकर्म भी विनाश होते हैं। क्योंकि जो आत्माओं का बाप शिव है वो ही तो आकरके कर्म, अकर्म, विकर्म की गति समझाता है। बाकि उन देहधारी धर्मगुरुओं, धर्मपिताओं में तो कुछ भी नहीं होता। भक्ति ही सिखाते रहते हैं। तो ये माला आदि फेरना ये भी भक्ति कहा जाता है।

ये भक्ति की लाइन में हैं, सारे ही देहधारी धर्मगुरु, धर्मपिताएं, उनके फालोअर्स। सिर्फ ज्ञान की लाइन में तुम बच्चे हो। क्योंकि असली जानकारी तो तुमको ही मिलती है। जानकारी माने ही ज्ञान क्योंकि ज्ञान सागर एक है बच्चों का। हँ? कौन? बच्चों का ज्ञान सागर? सब बच्चों का ज्ञान सागर। और शिव को क्या कहेंगे? सागर कहेंगे कि सूर्य कहेंगे? हँ? शिव तो ज्ञान सूर्य है, अखूट रोशनी ज्ञान सूर्य, ज्ञान की रोशनी का भण्डार है। और सबकी ज्ञान की रोशनी तो कम ज्यादा होती रहती है। सागर में भी तो गर्मी कहाँ से आती है? सूर्य से ही तो आती है। हाँ। सागर में गहराइयाँ बहुत होती हैं। काहे की गहराई? ज्ञान की गहराई। क्यों? सागर में ही ज्ञान की गहराई क्यों होती है? क्योंकि सागर मंथन का नाम बाला है। क्या? ऐसे नहीं तालाब, पोखरे, नदियों में मंथन होता है तो उसका नाम बाला है। वो कोई मंथन थोड़ेही करती हैं। विचार सागर मंथन तुम करते हो। सिर्फ तुम ही। इसलिए बोला सिर्फ ज्ञान की लाइन में तुम हो सिर्फ। क्यों? हँ? ज्ञान की बरसात काहे से होती है? हँ? यज्ञ सेवा करते हैं, तो जितनी सेवा करेंगे उतना विचार सागर मंथन चलेगा। विचार सागर मंथन चलेगा तो ज्ञान अपना हो जाएगा।

तो बच्चों को तो मिलता है ज्ञान सागर। तो फिर बाबा कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों। हँ? फिर बाप क्या कहते हैं? हँ? रूहानी बच्चे। बाबा प्यार से समझाते हैं। माया बड़ी कड़ी है, बडी दुस्तर है। हँ? और नदियां तो आसानी से पार कर सकते हो, लेकिन ये मायावी नदी ऐसी है, पार करना, तैरना बड़ा मुश्किल। तो इसके ऊपर ही तुम्हारी लड़ाई है। हँ? किसके ऊपर? जिसको कहते हैं माया बेटी। और फिर? ये माया बेटी है। लड़ाई करती है। तुमको युद्ध करना पड़ता है। फिर शिव की शक्तियाँ कौन हैं? ये आत्माएं हैं शिव की शक्तियाँ, पाण्डव सेना। पाण्डवों की सेना है ना। और तुम सभी पण्डे हो। हँ? नंबरवार हैं कि एक जैसे हैं? नंबरवार पण्डे हो। तुम बच्चे सभी को रास्ता बताते हो ना। कहाँ का रास्ता बताते हो? हँ? मुक्तिधाम और जीवनमुक्तिधाम का रास्ता बताते हो। मुक्तिधाम माना शान्तिधाम। और जीवनमुक्तिधाम माना? सुखधाम। तो तुम बच्चे जानते हो। क्या? शान्तिधाम और सुखधाम का रास्ता तुम बच्चे जानते हो। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि हम रास्ता जानते हैं तो हम सबको शान्तिधाम, सुखधाम पहुँचाने वाले पण्डे हैं, गाइड्स हैं। ऐसे है ना बच्चे। तो हम गाइड्स हैं, लिबरेटर हैं। दुख की दुनिया से छुड़ाते हो ना। शान्तिधाम में ले जाते हो, सुखधाम का रास्ता बताते हो। तो कहाँ से छुटकारा दिलवाते हो? हँ? दुखधाम से छुटकारा दिलवाते हो तो लिबरेटर हो गए। और ये दुखधाम में तो माया है ना।

तो माया से हम हरेक को लिबरेट करके मुक्तिधाम, शान्तिधाम में पहुँचाते हैं। कैसे? हँ? तरीका क्या? बाप को याद करो। क्या करो? बाप को याद करो। क्यों बाप को क्यों याद करें? याद करने से क्या होगा? हँ? बाप न पुण्य करता है न पाप करता है। न किसी के पुण्य लेता है, न पुण्य देता है, न पाप लेता है। हँ? तो जैसे को याद करेंगे वैसे ही तो बनेंगे। हँ? बाप में कर्तापन है क्या? वो कर्ता है? क्या? पाप और पुण्य करता है? तो तुम उसको याद करोगे तो तुम क्या बनोगे? हँ? पाप और पुण्य से परे पहुँच जाओगे ना। तो पाप और पुण्य से छूट जाओगे। शान्तिधाम में तो न पाप होता है और न पुण्य होता है।

तो बाप को याद करो। कोई भी अभी विकर्म तो बिल्कुल न करो। क्या? विकर्म माने विपरीत कर्म। कैसा विपरीत? जो बाप नहीं करता है, या जो बाप का डायरेक्शन नहीं है, बाप की श्रीमत नहीं है, जिस कर्म के लिए वो कर्म न करो। और ऐसे बाप को याद करेंगे तो तुम्हारे विकर्म जरूर विनाश होंगे। तो एक तरफ में तो अपने विकर्मों को, पाप कर्मों को विनाश करने का प्रयत्न करो। और फिर दूसरी तरफ में? अगर विकर्म करते रहे, तो क्या होगा? हँ? तो 63 जन्मों में तो जो पाप कर्म किए, विकर्म किए, तो एक गुना दण्ड चढ़ता था। और यहाँ? यहाँ 100 गुना दण्ड चढ़ेगा, चढ़ जाता है। फिर क्या होता है? फिर तो पाप कर्मों की भरती हो जाती है। तो कहाँ तक माथा मारेंगे? हँ? किस बात में? अरे, इस संगमयुग में जब बाप आया हुआ है कर्म, अकर्म, विकर्म की गति बताने के लिए, फिर भी अगर विकर्म करते रहेंगे तो सौ गुने पाप चढ़ेंगे, तो लम्बे समय तक पुरुषार्थ करना पड़ेगा, कहाँ तक माथा मारते रहेंगे? तो क्या करो? विकर्म को बन्द करो।

अच्छा चलो, जितना हो सके उतना करो। हँ? भले तुमसे याद भी कम होती है, परन्तु फिर? विपरीत कर्म तो न करो। सौ गुना बोझा तो नहीं चढ़ेगा। हँ? सौ गुना बोझा चढ़ेगा तो फिर कितना प्रयत्न, कितना पुरुषार्थ करना पड़ेगा! विकर्म करेंगे, तो एडिशन होता जाता है सौ गुना, सौ गुना, सौ गुना। और फिर क्या होता है? नाम भी बदनाम हो जावेगा। और जिनका शूटिंग पीरियड में नाम बदनाम हो जाएगा तो फिर ब्रॉड ड्रामा में भी नाम बदनाम होगा। क्या? देवताओं का नाम बदनाम होता है कि दैत्यों का, असुरों का नाम बदनाम होता है? कौन पाप कर्म करते हैं ज्यादा? इसीलिए तो गाया जाता है – सदगुरु निंदक ठौर न पावै। वो तो ऐसे ही कह देते हैं सन्यासी लोग। उनके पास कौनसा ठौर है? अपना ही घरबार, ठौर छोड़-छाड़ के भाग खड़े हुए जंगल में। ये तो यहाँ की बात है ना। जो ऊँची स्टेज पानी चाहिए शान्तिधाम में, वो नहीं मिलेगी आत्माओं को। और शान्तिधाम में ऊँची स्टेज नहीं मिलेगी तो इस संसार में भी? क्या? नंबर नीचे हो जाएगा। माला है ना। रुद्र माला तो 500-700 करोड़ की भी है ना। प्रजापिता की भी माला है। तो अगर परमधाम में आत्मा ऊँची स्टेज में न गई, मीडियम में गई, या नीचे स्तर में चली गई। क्या? परमधाम में मालूम है ना कौनसी आत्माएं ऊँची से ऊँची स्टेज में रहती हैं? हँ? जो एकदम पवित्र बुद्धि हो जाती हैं। नहीं तो नीचे चली जाती हैं। तभी तो गाया जाता है – मेरी निंदा कराएंगे अगर, कोई विकर्म करेंगे तो जो ऊँचा ठौर मिलना चाहिए सो नहीं मिलेगा।

A morning class dated 9.7.67 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page on Sunday was - Those Gurus do not cause true salvation (sadgati). They remember Buddha, they remember Christ. Achcha, they will feel the beads of the rosary. They will keep on moving the beads of the rosary and go on remembering the founder of their religion. For example, people keep on feeling the beads of the rosary in India and keep on uttering Ram, Ram. Arey! Are all the bead-like souls Ram? Hm? So, the sins will not be burnt by feeling the beads of that rosary. It is when the Supreme Father comes that the rosaries get ready. The sins are also destroyed because the Father of souls, i.e. Shiv comes and explains the dynamics of karma, akarma and vikarma. But there is nothing in those bodily religious gurus, founders of religions. They keep on teaching Bhakti only. So, this feeling of the beads of rosary is also called Bhakti only.

All these bodily religious gurus, the founders of religions and their followers are in the line of Bhakti. Only you children are in the line of knowledge because it is you alone who get the true information. Information itself means knowledge because the ocean of knowledge for the children is one. Hm? Who? Ocean of knowledge of the children? Ocean of knowledge of all the children. And what will Shiv be called? Will He be called an ocean or the Sun? Hm? Shiv is the Sun of Knowledge, the Sun of inexhaustible light of knowledge, store house of the light of knowledge. The light of knowledge of all others keeps on decreasing or increasing. From where does heat emerge in the ocean also? It comes from the Sun only. Yes. There is a lot of depth in the ocean. Depth of what? Depth of knowledge. Why? Why is there depth only in the ocean? It is because the churning of the ocean is famous. What? It is not as if the churning of the lakes, ponds, rivers is famous. They do not churn. It is you who churn the ocean of thoughts. Only you. This is why it was told that you alone are in the line of knowledge. Why? Hm? How does the rainfall of knowledge take place? Hm? When you perform Yagya service, then the more service you perform, the more churning of the ocean of thoughts (vichaar saagar manthan) will take place. When the churning of the ocean of thoughts takes place then the knowledge will become yours.

So, the children get the ocean of knowledge. So, then Baba says - Sweet-sweet children. Hm? Then what does the Father say? Hm? Spiritual children. Baba explains lovingly. Maya is very hard, very difficult. Hm? You can cross other rivers easily, but this illusive (mayavi) river is such that it is very difficult to cross, to swim across. So, your fight is on this only. Hm? On what? The one who is called daughter Maya. And then? This is daughter Maya. It fights. You have to wage a war. Then who are the Shaktis of Shiv? These souls are the Shaktis of Shiv, the Pandava army. It is an army of Pandavas, is not it? And you all are Pandas (guides). Hm? Are you numberwise or alike? You are numberwise guides. You children show the path to everyone, don't you? You show the path of which place? Hm? You show the path of the abode of mukti (liberation) and the abode of jeevanmukti (liberation in life). Muktidhaam (abode of liberation) means the abode of peace. And what is meant by jeevanmuktidhaam (abode of liberation in life)? Sukhdhaam (abode of happiness). So, you children know. What? You children know the path of the abode of peace and the abode of happiness. It is in the intellect of you children that we know the path, so, we are the Pandas, guides who enable everyone to reach the abode of peace and the abode of happiness. It is like this is not it children? So, we are guides, liberators. You liberate others from the world of sorrows, don't you? You take them to the abode of peace and show the path of the abode of happiness. So, you liberate them from which place? Hm? You liberate them from the abode of sorrows, so you are liberators. And there is Maya in this abode of sorrows, is not it?

So, He liberates each one of us from Maya and enables us to reach the abode of liberation, the abode of peace. How? Hm? What is the method? Remember the Father. What should you do? Remember the Father. Why should we remember the Father? What will happen by remembering? Hm? The Father neither performs noble actions (punya), nor sins (paap). Neither does He take anyone's punya, nor gives punya, nor takes sins. Hm? So, as is the one whom you remember, so you shall become. Hm? Does the Father have the feeling of being the doer (kartaapan)? Is He a doer (kartaa)? What? Does He perform paap and punya? So, what would you become if you remember Him? Hm? You will go beyond paap and punya, will you not? So, you will be free from paap and punya. There is neither paap nor punya in the abode of peace.

So, remember the Father. Do not commit any sin now at all. What? Vikarma means vipreet karma (opposite actions). How opposite? Do not perform actions which the Father does not perform or do not perform the actions for which there is no direction of the Father, no Shrimat of the Father. And if you remember such Father, then your sins will definitely be destroyed. So, on the one hand try to destroy your sins, sinful actions. And then on the other hand? If you keep on committing sins, what would happen? Hm? So, as regards the sins, the sinful actions that you performed in the 63 births, you used to accrue one fold punishment. And here? Here you accrue 100 fold punishments. Then, what happens? Then the sinful actions keep on growing. So, how far will you spoil your head? Hm? In which aspect? Arey, when the Father has come in this Confluence Age to tell the dynamics of karma, akarma and vikarma, still if you keep on committing sins, then you will accrue hundred fold sins; then you will have to make purusharth for a long time; how far will you keep on spoiling your head? So, what should you do? Stop committing sins.

Okay, do as much as you can. Hm? Although you may remember less, but then? At least do not perform opposite actions. You will not accrue hundred fold burdens. Hm? If you accrue hundred fold burdens, then you will have to make so much effort, so much purusharth. You will commit sins, then hundred fold addition keeps on taking place. And then what happens? The name will also be spoiled. And those whose name is spoiled during the shooting period, then the name will be spoiled in the broad drama as well. What? Is the name of the deities spoiled or is the name of the demons spoiled? Who commits more sins? This is why it is sung - The one who defames the Sadguru does not find a destination. Those sanyasis simply say. Which destination do they have? They have left their own household, destination and run away to the jungle. This is about this place, is not it? The souls will not find the high stage in the abode of peace which they should get. And if they do not get the high stage in the abode of peace, then in this world also? What? Their number (rank) will be reduced. It is a rosary, is not it? The Rudramala is of 500-700 crores as well, is not it? There is a rosary of Prajapita as well. So, if the soul does not go to a high stage in the Supreme Abode, if it goes to the medium stage, or to a lower level; what? You know that which souls remain in the highest on high stage in the Supreme Abode? Hm? Those who develop a completely pure intellect. Otherwise, they go down. Only then is it sung - If you cause My defamation, if you commit any sin, then you will not get the high destination that you should get.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2521, आडियो 3007, दिनांक 18.05.2018
VCD 2521, Audio 3007, Date 18.05.2018
प्रातः क्लास 9.7.1967
Morning Class dated 9.7.1967
VCD-2521-Bilingual

समय- 00.01-21.08
Time- 00.01-21.08


प्रातः क्लास चल रहा था - 9.7.1967. रविवार की वाणी, छठे पेज के मध्यांत में चल रही थी – ब्रह्मा बाबा ने बोला – अगर मैं भी कुछ कहूँ तो क्या समझो? कि शिवबाबा कहते हैं। चलो मेरे को तो उड़ाय दियो। एकदम उड़ाय दियो। अभी तो बच्चों को कहते हैं मेरा फोटो भी नहीं रखो क्योंकि मेरा फोटो भी कोई काम का नहीं, बिल्कुल नहीं। अगर कोई भी चीज़ काम की है तो वो ऐसे मत समझो, रथ है इसलिए काम है। नहीं, नहीं। रथ है तो क्या हुआ? रथ तो पांच जड़ तत्वों का है ना। जड़ क्या करेगा? कुछ करते हैं क्या? तो बाबा कहते हैं मैं इसका लोन लेता हूँ। किसका? हँ? ब्रह्मा बाबा के शरीर रूपी रथ का लोन लेता हूँ। बाकि रथ थोड़ेही बादशाही देता है। बच्चों को तो बादशाही मैं देता हूँ ना। मैं माने? रथ वाला रथी या उसको चलाने वाला सारथि शिव? रथ थोड़ेही वर्सा देता है। ये रथ की जो मालिक आत्मा है, घर का मालिक है, वो भी तो बेगर है ना। समझते हैं मैं बाबा से वर्सा लेता हूँ। हँ? किससे वर्सा लेता हूँ? बाबा से। फिर बाबा किसको कहा जाए? ब्रह्मा को बाबा न कहा जाए? क्यों? बूढे को तो बाबा कहा जाता है ना। हँ? ये जो बूढ़ा शरीर है वो तो मकान मालिक का है। और मकान लिया है लोन में। ये तो लोन भर के देना पड़ेगा। तो वर्सा कौन देता है? किसने कहा मैं बाबा से वर्सा लेता हूँ? ब्रह्मा बाबा ने कहा और शिवबाबा ने बताया कि वर्सा देने वाला तो शिवबाबा है।

तो जैसे तुम बच्चे पुरुषार्थ करते हो, वैसे ये भी पुरुषार्थ करते हैं। काहे के लिए? वर्सा पाने के लिए। तो फिर इनका फोटो क्या करेंगे? हँ? ये भी स्टूडेन्ट लाइफ में है तुम्हारे साथ। और तुम भी स्टूडेन्ट लाइफ में हो। पढाने वाली आत्मा है ना। तो बस, खाली बाबा कहते हैं मैंने लोन लिया तो क्या हुआ? अरे, लोन भी किसका लिया? हँ? जिसका लोन लिया वो भी तो तमोप्रधान है ना। तो इनकी क्या महिमा है? हँ? किनकी बताई? एक की बताई कि दो की बताई? दो की। कब बताई? 67 में। माना दोनों रथ की तरफ इशारा किया कि चाहे मुकर्रर रथ हो, और चाहे टेम्पररी लोन लिया हुआ हो, इन दोनों की अभी कोई महिमा नहीं। क्यों? क्यों महिमा नहीं? क्योंकि सतोप्रधान तो नहीं बने। हाँ, पढ़ते हैं। पढ़ाई पढ़ते-पढ़ते पीछे तुम्हारी महिमा होगी इतनी कि जब तुम्हारी महिमा होगी तब तुम पूजे जाएंगे। हँ? क्यों कहा – तुम पूजे जाएंगे? ये नहीं पूजे जाएंगे? क्यों? हँ? इनका भी तो रथ, ब्रह्मा का भी तो रथ लिया है ना? हँ? क्योंकि इनकी प्रत्यक्षता रूपी जनम तो बाद में होगा कि पहले होगा? हँ? कि कौनसे शरीर के द्वारा ये पावन हैं? पूजा किसकी होती है? शरीर की होती है या बिन्दी की होती है? शरीर की होती है।

तो जब पढ़ाई पढ़ते-पढ़ते तुम पावन बन जावेंगे तो तुम्हारी महिमा होगी और पूजे जाएंगे। अभी? अभी क्या हो तुम? अभी तुम भी? पुजारी हो। किसको कहा? हँ? हाँ। ब्रह्मा को कहा पुजारी हो? तुम किसको कहा? तुम भी पुजारी हो। हँ? हाँ। जिनको इमर्ज किया उनसे कहा कि तुम भी पुजारी हो। 9.7.67 की वाणी का सातवां पेज। पूज्य कब बनेंगे? पूज्य तो सत्य का युग आएगा तब बनेंगे। तो ये जो पढ़ाई पढ़ते हो वो पूज्य बनने के लिए पढ़ते हो। सभी। क्या? इसी दुनिया में पूज्य बन जाएंगे? हँ? कि सतयुग में पूज्य बनेंगे? तो ये दुनिया सतयुग कही जाएगी या उनके लिए कलियुग कही जाएगी? पुरुषोत्तम संगमयुग कहेंगे क्योंकि जो पुरुषों, आत्माओं में जो उत्तम-उत्तम आत्माएं हैं वो प्रत्यक्ष होती जाएंगी, लोग समझते जाएंगे, ये देवता है, ये देवता बनने वाले। पूज्य देवी-देवता होते हैं ना। मनुष्य से देवता बनते हैं। ऐसे थोड़ेही कहा कि असुर से देवता बनते हैं? मनुष्य माने? थोड़ा मन-बुद्धि चले, मनन-चिंतन-मंथन करें ज्ञान का, तो मनुष्य से देवता बनें। तो ये बात तो सही है ना बच्चे।

ये तो जानते हैं जरुर मनुष्य होंगे देवता बनने से पहले। देवता तो सतयुग में होते हैं। तो देवता कोई कलहयुग में थोड़ेही होते हैं? हँ? देवताएं कलह करते हैं क्या? कलह माने लड़ाई। नहीं। देवता नहीं हैं तो कलियुग में मनुष्य हैं। ये मनुष्यों की सृष्टि है। हाँ, इसमें फिर अनेक धर्म हैं। क्या? इसलिए तो बोला - सब धर्मों का विनाश करता हूँ। एक सदधर्म की स्थापना करता हूँ। तो अनेक वगैरा-वगैरा हैं। तो ये भी समझने की बात है। क्या? जब सब धर्म इस सृष्टि पर इकट्ठे हो जाएं, आपस में लड़ाई लड़ें, कलह-कलेश का युग बनाएं, सबको पता चले ये तो वाकई पापी युग है, कलह कलेश वाला। तो सबकी बुद्धि में बैठे समझने की बात। और सब बातों को समझना है। और ये सारी बातें सिवाय बाप के तो कोई समझाय नहीं सकता। सो भी सारी दुनिया नहीं समझेगी। तुम बच्चे समझते हो। क्या कहा? तुम बच्चे समझते हो? माना ब्रह्मा बाबा नहीं समझते हैं? हँ? नहीं समझते? बोला है ना मैं तुम बच्चों से बात करता हूँ, ये तो बीच में सिर्फ सुन लेता है। समझता थोडे ही?

तो कोई देखो आते हैं, समझते हैं ना तकदीर में नहीं है तो उनको बहुत संशय पड़ते हैं। अरे, शिवबाबा इनमें कैसे आ सकते हैं? अरे! शिवबाबा आकरके इनके तन में पढ़ाएंगे? हँ? इतने अच्छे-अच्छे साधु-सन्यासी हैं, ज्ञानी-ध्यानी, उनमें नहीं पढ़ाएंगे? नहीं, ये नहीं हो सकता। मैं ये बात नहीं मानता हूँ। ऐसे-ऐसे संशय आते रहते हैं। तो जब ऐसे संशय आते हैं और मैं नहीं मानता हूँ तो फिर यहाँ आएंगे कैसे? कब आएंगे? जब कुछ न कुछ मानेंगे, मान्यता देंगे तो आएंगे। बस, तो बस बाबा कहेंगे ये देखो इनकी तकदीर। अरे, शिवबाबा नहीं आएंगे तो फिर शिवबाबा को याद कैसे करेंगे? हँ? याद किसको किया जाता है? जो पहले कभी मिला हो। होगा ही नहीं तो याद कैसे करेंगे? याद करेंगे तो विकर्म विनाश होंगे। किसको याद करेंगे? शिवबाबा को। क्यों? शिव को याद कर लें तो नहीं चलेगा? विकर्म विनाश नहीं होंगे? हँ? नहीं होंगे? क्यों? शिव में विकर्म हैं क्या? तो जैसे को याद करेंगे वैसे बनेंगे ना। हँ?

ए चलो। कौनसी बिन्दी की बात छोड़ दो। बाबा ने तो बता दिया, जैसी आत्मा बिन्दी वैसे ही, हँ, वैसे ही परमात्मा। ऐसे थोड़ेही कि रूप अलग-अलग है। तो याद करेंगे ना। किसको? अपनी आत्मा बिन्दी को याद करेंगे तो जहाँ बिन्दी आत्मा को याद आई तो प्रैक्टिस नहीं पड़ेगी? हँ? आत्मिक स्थिति की प्रैक्टिस पड़ेगी या नहीं पड़ेगी? पड़ेगी ना। और सतयुग में क्या बनना है? हँ? आत्मा ही तो बनना है। तो यहाँ प्रैक्टिस पक्की हो जाएगी आत्मा को याद करते-करते, 24 घंटे की पक्की प्रैक्टिस हो गई श्वासों-श्वास याद करने की, तो फिर सतयुग में जाएंगे कि नहीं? हँ? नहीं जाएंगे? क्यों? हँ? हां। परमधाम में पहले जाना पड़े ना। तो परमधाम की तो पहचान नहीं हुई। हँ? परमधाम की तो पहचान होनी चाहिए ना। जिसे कहते ही हैं परमब्रह्म। हँ? परिवार होता है, बच्चे बाप को याद करते हैं, जिस बाप से वर्सा लेना है तो क्या उन्हें अपने आप पता चल जाता है ये हमारा बाप है? हँ? माँ बताती है ना। तो फिर बीच को माँ को लाना पड़े ना। हँ? ब्रह्मा चाहिए या नहीं चाहिए? ब्रह्मा तो जरूर चाहिए। अब दादा लेखराज के लिए तो बोल दिया – इनका तो फोटो भी नहीं रखना है। तो फिर? कौनसा ब्रह्मा चाहिए? हँ? ब्रह्मा कोई एक तो है नहीं। ब्रह्मा के तो चार मुख दिखाए जाते हैं। पंचानन कहते भी हैं। तो जो परम पार्टधारी ब्रह्मा है, आदि में भी है, मध्य में भी है, अंत में भी है। टेम्परेरी तो नहीं है। तो उसको पहचानना पड़े ना। पहचानेंगे तो याद करेंगे, जो विकर्म विनाश हो जाएं।

A morning class dated 9.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the sixth page of the Vani on Sunday was - Brahma Baba said - If I too say something, then what should you think? That it is ShivBaba who says. Okay, make me vanish. Make me vanish completely. Now he tells the children - Do not keep even my photo because my photo is of no use either, not at all. If there is anything useful, then do not think that there is a Chariot, so, there is a use. No, no. What happens if he is the Chariot? The Chariot is made up of the five non-living elements, is not it? What will the non-living thing do? Does he do anything? So, Baba says - I take the loan of this one. Whose? Hm? I take the loan of the body like Chariot of Brahma Baba. But the Chariot does not give the emperorship. It is I who give the emperorship to the children. What is meant by 'I'? Is it the rider of the Chariot (rathi) or the one who drives it, the charioteer (saarathi) Shiv? The Chariot does not give inheritance. The owner soul of this Chariot, the master of the house is also a beggar, is not he? He thinks that I obtain inheritance from Baba. Hm? From whom do I obtain inheritance? From Baba. Then who should be called Baba? Shouldn't Brahma be called Baba? Why? An old person is called Baba, is not he? Hm? This old body belongs to the owner of the house. And this house has been taken on loan. This loan will have to be repaid. So, who gives the inheritance? Who said that I obtain inheritance from Baba? Brahma Baba said and ShivBaba told that the giver of inheritance is ShivBaba.

So, just as you children make purusharth, similarly, this one also makes purusharth. For what? To obtain inheritance. So, then what will you do with the photo of this one? This one is also in a student life with you. And you are also in a student life. It is the soul which teaches, doesn't it? So, that is all, Baba just says - what happened if I have taken a loan? Arey, whose loan was taken? Hm? The one whose loan was taken is also tamopradhan, is not he? So, what is the glory of this one? Hm? Whose glory was mentioned? Was it mentioned for one or for two? For two. When was it mentioned? In 67. It means that a hint was given towards both the chariots that be it the permanent Chariot or the temporary loaned Chariot, there is no glory of both of them now. Why? Why is not there any glory? It is because they haven't become satopradhan (pure). Yes, they study. While studying knowledge you will become so glorious that when you are glorified you will be worshipped. Hm? Why was it said - You will be worshipped? Will this one not be worshipped? Why? Hm? The Chariot of this one, the Chariot of Brahma was also taken, wasn't it? Hm? It is because will the revelation like birth of this one take place later on or before? Hm? Through whose body is he pure? Who is worshipped? Is the body worshipped or is the point [like soul] worshipped? The body is worshipped.

So, when you become pure while studying knowledge, then you will be glorified and worshipped. Now? What are you now? Now you too? Are worshippers. Who was addressed? Hm? Yes. Was Brahma told that you are a worshipper? Who was addressed as 'you'? You too are worshippers. Hm? Yes. Those who were emerged were told that you too are worshippers. Seventh page of the Vani dated 9.7.67. When will you become worship worthy? You will become worship worthy when the Age of truth arrives. So, this knowledge that you study is for becoming worship worthy. All. What? Will you become worshipworthy in this world itself? Hm? Or will you become worship worthy in the Golden Age? So, will this world be called the Golden Age or Iron Age for them? It will be called Purushottam Sangamyug because the best souls among the purush, the souls will continue to be revealed, people will go on understanding that this one is a deity, those who are going to become deities. Deities are worship worthy, aren't they? They become deities from human beings. Was it said that they become deities from demons? What is meant by human beings (manushya)? If they use their mind and intellect a little, if they think and churn about the knowledge, then they will become deities from human beings. So, this topic is correct, is not it children?

You know that you will definitely be human beings before becoming deities. Deities exist in the Golden Age. So, will deities exist in an Age of discord (kalahyug)? Hm? Do deities create discord? Kalah means fight. No. When there are no deities, then there are human beings in the Iron Age. This is a world of human beings. Yes, there are many religions in it. What? This is why it was told - I destroy all the religions. I establish one true religion. So, there are many etceteras. So, this is also a topic to be understood. What? When all the religions gather in this world, when they fight each other, when they develop an Age of discord and disputes, when everyone know that this is really a sinful Age of discord and disputes, then the topic to understand will sit in everyone's intellect. And you have to understand all the topics. And all these topics cannot be explained by anyone except the Father. That too, the entire world will not understand. You children understand. What has been said? Do you children understand? Does it mean that Brahma Baba doesn't understand? Hm? Doesn't he understand? It has been said that I talk to you children; this one just listens in between. Does he understand?

So, look, some come; they understand that it is not in their fate, then they develop a lot of doubts. Arey, how can ShivBaba come in this one? Arey! Will ShivBaba come and teach through his body? Hm? There are so many nice sages and sanyasis, knowledgeable ones and dhyanis (those who do meditation), will He not teach through them? No, this cannot be possible. I do not accept this. They keep on getting such doubts. So, when they get such doubts and when [they say that] I do not accept, then how will they come here? When will they come? When they accept to some extent or the other, then they will come. That is all; so, Baba will tell - Look at their fate. Arey, how will you remember ShivBaba if He doesn't come? Hm? Who is remembered? The one who has met in the past. If he doesn't exist at all, then how will you remember? If you remember Him then the sins will be burnt. Whom will you remember? ShivBaba. Why? Will it not suffice if you remember Shiv? Will the sins not be burnt? Hm? Will they not be? Why? Are there sins in Shiv? So, as is the one whom you remember so shall you become, will you not? Hm?

Okay, let's move. Leave the topic of which point it is. Baba has told that just as the soul is a point, similarly, hm, the Supreme Soul is a point. It is not as if the form is different. So, you will remember, would you not? Whom? If you remember your point like soul, then when the point like soul remembers, will it not practice? Hm? Will it practice soul conscious stage or not? It will, will it not? And what do you have to become in the Golden Age? Hm? You have to become a soul only, will you not? So, when your practice becomes firm while remembering the soul, when you firmly practice for 24 hours to remember in every breath, then will you go to the Golden Age or not? Hm? Will you not go? Why? Hm? Yes. You will have to first go to the Supreme Abode, will you not? So, you haven't recognized the Supreme Abode. Hm? You should realize the Supreme Abode, will you not? It is called Parambrahm. Hm? There is a family, children remember the Father from whom they have to obtain the inheritance, so do they get to know on their own that this is our Father? Hm? The mother tells, doesn't she? So, then the mother will have to be brought in between, will you not? Hm? Is Brahma required or not? Brahma is definitely required. Well, it has been said for Dada Lekhraj - You should not even keep the photo of this one. So, then? Which Brahma is required? Hm? There is not one Brahma. Four heads of Brahma are depicted. He is also called Panchanan (five headed). So, the supreme actor Brahma, who is present in the beginning also, middle also and in the end also. He is not temporary. So, you will have to recognize him, will you not? You will remember when you recognize, so that your sins are burnt.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2522, आडियो 3008, दिनांक 19.05.2018
VCD 2522, Audio 3008, Date 19.05.2018
प्रातः क्लास 9.7.1967
Morning Class dated 9.7.1967
VCD-2522-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.34
Time- 00.01-17.34


प्रातः क्लास चल रहा था - 9.7.67. रविवार को आठवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – ये जो लड़ाई होनी है, लड़ाई के बाद विश्व में शान्ति रहेगी। सुख और शान्ति रहेगी। पवित्रता, शान्ति, सुख रहेगा। तो कल्प-कल्प ये लड़ाई से ही स्वर्ग की स्थापना होती है। ऐसे लिखो एकदम कि लड़ाई से ही सुख-शान्ति की स्थापना होती है। लड़ाई में जो जरूर दुख और अशान्ति बहुत होती है। ये लड़ाई लगना जरूर है। बाबा कहते हैं बाबा-बाबा तब कहते हैं; पता नहीं बाबा कहने से बहुत बच्चियाँ हैं, बस शिवबाबा बोला और आँखों से प्रेम के आँसू आ जाते। तुमको नहीं आते हैं। हाँ, बाबा के पास चिट्ठियाँ लिखती हैं बाबा, बस आपका नाम याद आने से ही हमारा प्रेम के आँसू बहता है। हम कब आकरके आपसे मिलेंगे? देखा हुआ भी नहीं है। जिन्होंने देखा हुआ है वो तो ऐसे भी हैं जो कुछ मानते भी नहीं हैं बिल्कुल। और देखा हुआ है फिर भी याद नहीं करते हैं। वो तो बिगर देखे, देखे ही नहीं है कभी बाबा को। और ऐसी-ऐसी चिट्ठियाँ लिखती हैं, बाबा कहते हैं ये ड्रामा में तो बड़ा वंडर है क्योंकि बच्चे ये है तो ड्रामा ना। वंडर है ड्रामा में न देखा कभी कितनी चिट्ठियाँ लिखती हैं। बाबा हमको बंधन से छुड़ाओ। हमने आपको देखा है। आप ब्रह्मा के तन में आते हैं क्योंकि बहुतों को ब्रह्मा का साक्षात्कार होता है। और फिर ब्रह्मा का होकरके फिर बालक कृष्ण बच्चे का भी होता है। समझे ना, क्योंकि तुम ब्रह्मा द्वारा प्रिंस बनते हो ना। बाप बनाते हैं।

तो ये भी बहुतों को आगे चलकरके बहुतों को होगा। और ही जास्ती होगा। फिर भी तो बालक होगा ना, बच्चा बुद्धि। आगे चलकरके पुरुषार्थ करेंगे ना। बच्चे ये तो जरूर है, जितना मनुष्य मरने के समय में होते हैं तो राम-राम-राम उनको बहुत सब आकरके लगते हैं क्योंकि आसपास राम-राम कहते हैं मित्र, संबंधी, गुरु, गोसाइं। कहते हैं मरने के समय राम को याद करो, भगवान को याद करो। तब देखेंगे। अभी तो सबको मरना है ना। तभी मरेंगे जब इनको सब परिचय तो मिलेगा। फिर खूब शिवबाबा को याद करने की कोशिश करेंगे। सोचेंगे अब बाकि टाइम कहाँ है? बस सब कुछ छोड़-छाड़ के बैठ जाएंगे। जैसे बाबा कहते हैं ना मेक अप करो। आपस में मिलकरके घूमो, फिरो, चक्कर लगाओ। इतनी याद करो तो बस कि हम अपना विकर्म तो विनाश कर लेवें बाबा की याद में। टू मेक अप। इसको मेक अप कहते हैं। बाबा ने समझाया है ना कि जब ट्रेन लेट होती है तो मेक अप करते हैं ना। और अब तुम समझते हो कि हमको टाइम नहीं मिलना है। मिलता भी नहीं है। तो जब मौका मिलता है तो मेक अप करो। समझा ना। और यहाँ आकरके भी मेक अप कर सकते हो। हाँ, कोई कम, कोई ज्यादा। यहाँ आने में खर्चा क्या लगता है? 50, 100, 200 रुपया खर्च होगा। परन्तु कमाई कितनी होती है। अरे बच्चे, ये बिचारे गरीब आते हैं। अगर ये अच्छी तरह से ज्ञान लेते हैं तो बड़ी कमाई होती है जन्म-जन्मान्तर की। जांच करनी चाहिए कहाँ हमको शान्ति मिलती है। यहाँ तो शान्ति है ना। और राय भी देते रहते हैं। बाप घड़ी-घड़ी राय देते हैं – ऐसा करो, ऐसे करो। तो यहाँ भी देखो बच्चे आते हैं।

तो यहाँ तो बच्चे आकरके पुरुषार्थ भी करते हैं। बोलते भी हैं जैसे नवधा। वो होते हैं ना। जिसमें सुआ डालो, सुआ निकालो, तो कभी भी छेद न रहे। क्या होता है? वो चीज़ देखी है? 9.7.67 की वाणी का नौवां पेज। एक नवधा जो काश्मीर से आते हैं ना। किसी ने कुछ कहा। हाँ। ऐसे वो होते हैं बनाया हुआ। तो उसमें कोई भी चीज़ डालो तो निकालो तो चीज़, ऐसे बहुत चीज़ें होती हैं। कोई एक चीज़ नहीं होती है। बहुत होती हैं। किसी ने कुछ कहा। हाँ बहुत चीज़ होती हैं। नरम होती है। कोई-कोई सुआ डालो, कोई चक्कर भी कहते हैं। उससे बदन भी साफ करते हैं ऐसे। उसमें सुआ डालो। गोया हमारे पास ऐसे भी बच्चे हैं, कितने भी सुए डालो ज्ञान के, जैसे नबद; कुछ भी सुनेगा नहीं। और कुछ भी मानेगा भी नहीं। कुछ भी अपना सुधार नहीं करेंगे। तो उनको नबद कहा जाता है। ऐसे भी होते हैं ना। हैं ना ऐसे। तो बाबा कहते हैं ऐसे नहीं बनना है। नहीं।

मीठे-मीठे बाप तो बच्चों को कहेंगे ना। देखो अपना कल्याण करो। बाप की मत पर चलो। बाप श्रीमत देते हैं ना। तो चलो। जानते हो कि बरोबर बाप की श्रीमत से हम श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनते हैं। क्या बनते हैं? पुरुषों में उत्तम पुरुषोत्तम बनते हैं ना। किसको कहा जाता है पुरुषोत्तम? हँ? नारायण को कहते हैं। बस। पुरुष से उत्तम बनते हैं। पुरुष माने आत्मा। तो देखो कोई होते हैं ऐसे। भंगी-वंगी होते हैं। मेहतर होते हैं। पढ़ लिख लिया। अभी देखो एम.पी., एम.एल.ए.। ऐसे बन जाते हैं ना। पीछे क्या वो इकट्ठे नहीं रहते होंगे? पार्टियों में नहीं जाते होंगे? ये कितना पुरुषोत्तम बन जाते हैं! यहाँ ही इस दुनिया में ही पुरुषोत्तम बन जाते हैं ना। ये यहाँ अच्छी तरह से पढ़ाई पढ़करके, मैनर्स अच्छी तरह धारण कर-करके क्या बन जाते हैं! और यहाँ तो बाप तुमको पुरुषोत्तम बनाते हैं। ये है तुम्हारी एम-आब्जेक्ट। नर से नारायण बना देते हैं।

तो बाबा बोलते हैं एरोप्लेन के ऊपर सभी बैठकरके ये जो कहते हैं ना, ऐरोप्लेन में बैठकरके हम सेमिनार करें। आपस में राय करें। अरे राय तो बाबा बताते रहते हैं। ये राय देते रहते हैं बच्चों को ये करो, ये करो, ऐसे करो। क्या नहीं कहते हैं? वो बिचारे ने एरोप्लेन में किया। तो तकड़ा-तकड़ा था तब किया। उनमें से एक को मिला और वो जाग गया। यहाँ आया था। ये ऐरोप्लेन का मेरे पास आ गया। गोद में आके पड़ा। और मैं एकदम जाग गया। बाबा है ना। तो यहाँ आया। यहाँ आकरके बताया कि मेरे पास ऐरोप्लेन से पत्र आया। फिर मैं अच्छे से जाग गया। ऐसे नहीं कि कोई नुकसान हो गया। कोई न कोई, कोटन में कोऊ, कोई में भी कोऊ तो कहा ही जाता है ना। तो संदेश तो बच्चों को देना है ना। तो आपस में बैठकरके कौनसा संदेश दें, कैसे ऐरोप्लेन से गिरावें जो सबको मालूम पड़े और वीक तो ऐसी बनावें जो समझें ये बरोबर है। ये लोग तो सच कहते हैं। पैगाम देते हैं। पीछे नहीं सुनेंगा तो पछताएगा, अगर नहीं मानेगा।

तो बाबा तो अभी स्थापन कर रहे हैं ना। लड़ाई के बाद फिर राजाई स्थापन हो जाती है ना। तो ये लड़ाई के बाद ही, इस लड़ाई के बाद ही विश्व में, खास भारत में, विश्व में सुख-शान्ति सभी होते हैं। और फिर शान्तिधाम तो शान्तिधाम ही है जहाँ हम आत्माएं रहते हैं। इनकारपोरियल वर्ल्ड में रहते हैं। हम निराकार आत्माएं हैं ना। ऐसे अच्छी तरह से वो पत्रा बनाय करकरके एकदम पास पर आय के वो पत्र बनाय करके जो फिर काम में आते जावें। तुम एरोप्लेन में कोई वक्त में मिल जाएंगे कोई। कोई भी मिले उनको ऐरोप्लेन में ही एक पत्र थमा दो। पता नहीं चार्ज लिया या नहीं लिया, कुछ मालूम नहीं। किसी ने कुछ कहा। तो ऐसे मिलेंगे तुम बच्चों को कि हाँ-हाँ करेंगे। अच्छा, खर्चा होगा। कोई परवाह थोड़ेही है। 500 रुपया लगे, हज़ार लगे। तो कितनों को पत्री मिल जाएंगे। चलते जाओ, सब भाषाओं में चलते जाओ। जाओ मद्रास तरफ भी जाओ।

A morning class dated 9.7.67 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the eighth page on Sunday was - This war that is going to take place, after this war there will be peace in the world. There will be happiness and peace. There will be purity, peace, happiness. So, heaven is established in every Kalpa (cycle) only through this war. Write like this that happiness and peace is established only through war. There is a lot of sorrow and disturbance in war. This war is bound to break out. Baba says - then they say Baba, Baba; You don't know there are many daughters who just utter Baba, they just utter ShivBaba and the tears of joy roll out from their eyes. You don't get. Yes, they write letters to Baba - Baba, just on remembering your name, tears of love roll out from our eyes. When will we come and meet you? We haven't even seen you. Among those who have seen, there are some such ones also who do not accept at all. And there are some who do not remember despite having seen [Baba]. They (the daughters), even without seeing, they have never seen Baba. And they write such letters; Baba says - This drama is very wonderful because this is a drama, is not it children? It is a wonder in the drama that they have never seen, yet they write so many letters. Baba, make us free from bondages. We have seen you. You come in the body of Brahma because many have visions of Brahma. And then after having the visions of Brahma, they have visions of child Krishna as well. Did you understand? Because you become Prince through Brahma. The Father makes.

So, this would also happen with many in future. It will happen even more. However he will be a child, will he not be? A child like intellect. They will make purusharth in future, will they not? Children, it is sure that when people are about to die, then many people come and tell them Ram, Ram, Ram because the friends, relatives, Gurus, gosains around them say Ram, Ram. It is said that you should remember Ram, God at the time of death. Then it will be seen. Now everyone has to die, will they not? They will die only when all of them get the introduction. Then they will try to remember ShivBaba a lot. They will think - Where is the time now? That is all; they will leave everything and sit. For example, Baba says - 'Make up', doesn't He? Meet each other, visit places, go around. Remember so much that we should destroy our sins in Baba's remembrance. To make up. This is called make up. Baba has explained that when a train is late, then they make up, don't they? And now you understand that we are not going to get time. You don't get as well. So, when you get chance, then make up. Did you understand? And you can make up even after coming here. Yes, some less, some more. What is the expenditure in coming here? You will spend 50, 100, 200 rupees. But you earn so much. Arey, children, these poor people come. If they take up this knowledge nicely, then they earn a big income for many births. You should check where you get peace. There is peace here, is not it? And He also keeps on giving advice. The Father keeps on giving advice every moment - Do like this, do like this. So, look, children come here as well.

So, children come and make purusharth here. It is also said - Navadha. They are there, aren't they? If you put a needle, if you take out a needle, then there should never be a hole. What happens? Have you seen that thing? Ninth page of the Vani dated 9.7.67. One kind of navadha people come from Kashmir, don't they? Someone said something. Yes. It is made like this. So, if you put anything in it, if you take out anything, there are many such things. There is not one thing. There are many. Someone said something. Yes, there are many things. It is soft. If you put a needle; some call it a cycle (chakkar) as well. They clean their body also like this with it. If you put a needle in it. There are such children also with us that however much you prick them with needle of knowledge, it is like naught. He will not listen to anything. And he will not accept anything. They will not improve themselves to any extent. So, they are called naught (nabad). There are such persons also, aren't there? So, Baba says - You should not become like this. No.

Sweet, sweet Father will tell the children, will he not? Look, uplift yourself. Follow the Father's directions. The Father gives Shrimat, doesn't He? So, follow. You know that definitely you become highest on high through the Father's Shrimat. What do you become? You become purushottam, i.e. highest among the purush (souls), don't you? Who is called Purushottam? Hm? Narayan is called [Purushottam]. That is all. You become best from purush. Purush means soul. So, look, there are some such persons. There are bhangis, etc. (people belonging to the lowest caste among the Hindus). There are mehtars (scavangers). They have received education. Now look, [they have become] M.P., M.L.A. They become like this, don't they? Don't they live together? Don't they go to the parties? They become so purushottam (high among men)! They become purushottam here in this world itself, don't they? They study nicely here, inculcate good manners and become what not! And here the Father makes you purushottam. This is your aim-object. He makes you Narayan from nar.

So, Baba says - Everyone says that we will sit in the aeroplane, we will sit in the aeroplane and organize a seminar. We will seek each other's advice. Arey, Baba keeps on giving advice. He keeps on giving advice to the children - do this, do this, do like this. What doesn't He say? That poor fellow did on the aeroplane. So, he did when he was strong. One of them got it and woke up. He had come here. I got this from the aeroplane. It fell on my lap. And I woke up suddenly. Baba is there, is not He? So, I came here. He came here and told that I got a letter from the aeroplane. Then I woke up nicely. It is not as if I suffered any loss. Someone or the other, someone among crores, someone among even those some. It is said like this, is not it? So, children have to give message, will they not? So, which message should we sit together and give? How should we drop [pamphlets] from the aeroplane so that everyone gets to know and we should plan the week in such a way that they understand that this is correct? These people speak the truth. They give message. If he does not listen later on, he will repent if he does not accept.

So, Baba is establishing now, is not He? The kingship is established after the war, is not it? So, only after this war, only after this war, there is happiness and peace in the world, especially in India. And then the abode of peace is abode of peace only where we souls live. They live in the incorporeal world. We are incorporeal souls, aren't we? In this manner, you should prepare that pamphlet nicely, come very close and prepare that pamphlet and then put it to use. You may meet someone in the aeroplane at some point in time. Whosoever you meet, you hand them over a pamphlet in the aeroplane itself. You don't know whether you took charge or not, nothing is known. Someone said something. So, such people will meet you children who will say yes, yes. Achcha, expenditure will be involved. There is no worry. It may cost 500 rupees, a thousand rupees. So, so many people will receive the pamphlet. Go on; go on in all the languages. Go towards Madras also.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 18 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2523, आडियो 3009, दिनांक 20.05.2018
VCD 2523, Audio 3009, Date 20.05.2018
रात्रि क्लास 9.7.1967
Night Class dated 9.7.1967
VCD-2523-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-14.04
Time- 00.01-14.04


आज का रात्रि क्लास है - 9.7.1967. मीठे-मीठे बच्चे अपन को भी देख नहीं सकते हैं। घड़ी-घड़ी देह याद आती है। आत्मा को देख नहीं सकते। उनको देह देखने में आती है। अपन को नहीं देखते हैं। माना? दूसरों की देह देखने में आती है? अपनी आत्मा को भी देखते हैं कि नहीं देखते हैं? अपनी देह भी याद आती होगी। तो जैसे अपन को नहीं देख सकते हैं, तो बाप को भी नहीं देख सकते हैं। हँ? मीठे बच्चे, मीठे-मीठे बच्चे अपन से पूछें मैं क्या हूँ? तो मुख से तो बोलेंगे मैं आत्मा हूँ। मैं आत्मा ज्योतिबिन्दु हूँ। मैं आत्मा भृकुटि के बीच में रहती हूँ। फिर देख सकते हैं? और जैसे अपन को देख सकते हैं वैसे बाप को भी देख सकते हैं? बाप को कहाँ देखेंगे? हँ? बाप को देखने के लिए वो देश चाहिए ना, स्थान चाहिए ना? कहाँ देखेंगे? अपनी देह में देखेंगे? कैसे पता चलेगा? ये तो वो ही बात हो गई जो शास्त्रवादी कहते हैं शिवोहम्। मैं आत्मा परमात्मा। ब्रह्मा अस्मि। हँ? मुकर्रर रथ को कैसे पहचानेंगे? मुकर्रर रथ और टेम्पररी रथ सुन लिया है। परन्तु जिस मुकर्रर रथ में रहते हैं, उसे कैसे पहचानेंगे? कौनसे ज्ञान से पहचानेंगे? बाबा की देह को देख सकते हैं। हँ? आत्मा तो देखने में नहीं आती है। ठीक है ना। अब इस बाबा की देह को देख सकते हैं। वो लोन लिया हुआ है। लोन लिया हुआ घर मुकर्रर होता है, परमानेन्ट होता है या टेम्पररी होता है? तो इसमें बच्चों को थोड़ी डिफिकल्टी है। थोड़ी। क्या? क्या डिफिकल्टी है? हँ? जिस तन का लोन लिया हुआ है, उस तन में बाबा को देखें और बाबा तो बताया कि बूढ़े को भी बाबा कहा जाता है। और मुकर्रर रथ के लिए बोला है क्योंकि एक ही मुकर्रर रथ है ना। अनेक तो नहीं हैं।

तो जो मुकर्रर रथ है उसके लिए बोला है; क्या बोला है इस विषय में? हँ? तेरे को बाबा कहने से बिन्दी ही याद आवेगी। औरों को याद नहीं आवेगी। तेरे को याद आवेगी। किसके लिए बोला? हँ? मुकर्रर रथधारी आत्मा के लिए बोला। तो उसके लिए ही ये स्पेशल्टी क्यों रख दी? क्या? कि बाबा कहने से बिन्दी ही याद आवेगी, देह याद नहीं आवेगी। क्यों? ऐसा क्यों? हँ? उसे क्यों नहीं देह याद आवेगी? हँ? अरे, उससे ऊँचा कोई और नहीं है। कैसे पता चले ऊँचा है या नीचा है, पहाड़ पे बैठा है, कैलाश पे बैठा है? हँ? एवरेस्ट चोटी पे बैठा है क्या? कैसे पता चलेगा कि ऊँचा है? थोड़ी डिफिकल्टी है क्योंकि सिर्फ इसी समय में बच्चों को ये समझाया जाता है। क्या? कि बच्चे पहले-पहले अपन को आत्मा निश्चय करो। क्या मतलब है इसका? आत्मा जिनको निश्चय हो जाएगा कि हम आत्मा हैं, बिन्दु हैं, अति सूक्ष्म ज्योतिबिन्दु हैं, स्टार हैं, तो उनमें और जिनको देह याद आती है, उममें क्या अंतर होगा? हँ? जिनको पक्का निश्चय हो गया कि हम आत्मा हैं, तो क्या अंतर है दोनों में? हँ? जिनको निश्चय हो जाएगा उनको क्या याद आएगा? आत्मा याद आएगी ना घड़ी-घड़ी। हँ? घड़ी-घड़ी याद आएगी? सोते-सोते कैसे याद आएगी? हँ? सोते-सोते याद आएगी? हँ? आएगी? वाह! ये तो बड़ा पहुँचा हुआ आदमी निकला। इसको तो सोते-सोते आत्मा याद आती है। हँ? ऐसे होता है? हँ? नहीं।

इसलिए अर्जुन को बोला गीता में – मेरे निद्राजीत बच्चे। क्या? निद्रा को जीतेंगे तो संभव है। क्या? कि आत्मा को याद कर सकते हैं। निद्रा में होंगे, सो जाएंगे और निद्रा भी एक तो स्वप्न वाली निद्रा होती है। हँ? वो कौनसी निद्रा है? सूक्ष्म शरीर की निद्रा है। और एक स्थूल शरीर की निद्रा होती है। थक जाते हैं तो गहरी नींद में सो जाते हैं। कुछ भी याद नहीं रहता। टाइम का भी याद नहीं रहता। और एक होता है आत्मा की ऐसी निद्रा कि जब परमधाम वासी, आत्मलोक वासी हो जाती है, तो कुछ भी याद नहीं रहता। याद रहता है? हँ? जैसे जड़वत्। तो जब परमधाम में ही जड़वत् है जो ओरिजिनल घर है आत्मा का, तो जहाँ शरीर में बैठी हुई आत्मा बंधन में, वहाँ निद्रा में रहते-रहते कैसे याद आएगी? हँ? आती है? निद्रा में रहते-रहते स्टार याद आता है भृकुटि में? अरे। घड़ी-घड़ी ‘आता है’, घड़ी-घड़ी ‘नहीं आता है’? दलबदलू हैं?

तो कहते हैं बच्चे पहले अपन को आत्मा निश्चय करो। जब ये पक्का निश्चय हो जाएगा कि मैं आत्मा हूँ, ज्योतिबिन्दु हूँ, भृकुटि के मध्य में रहने वाला हूँ तो निशानी क्या होगी? हँ? क्या निशानी बताई? हँ? अरे? अरे, निशानी बताई निद्राजीत। क्या? जब निरंतर आत्मा की याद रहेगी तो पक्का है कि निश्चयबुद्धि हो गए कि मैं क्या हूँ? आत्मा हूँ। क्योंकि पता है आत्मा सदाकाल है। अविनाशी है। और देह तो आज है कल? कल नहीं होगी। तो जो विनाशी चीज़ है उसको क्यों याद करें? जो अविनाशी है उसे याद करें। तो कभी-कभी याद करें, कभी-कभी याद न करें, ऐसे नहीं चलेगा? हँ? नहीं। क्यों? क्योंकि अपन को आत्मा ही निश्चय नहीं करेंगे तो आत्मा का बाप कैसे निश्चय हो जाएगा? क्या? घड़ी-घड़ी देह याद आती है अपनी, दूसरों की, जिनको देखते हैं, जैसे ब्रह्मा बाबा को देखते हैं तो उनकी देह याद आती है। लेकिन ये तो पता चल गया कि उनका मुकर्रर रथ तो है नहीं। वो तो छूट गया। मुकर्रर रथ है? वो तो छूट गया ना। तो साबित हो जाता है कि मुकर्रर रथ कोई और है। वो तो तो टेम्पररी रथ है, था। तो इससे साबित हो जाता है कि बच्चे ब्रह्मा की देह को देखते हैं और ब्रह्मा की देह में परमात्मा या बाप को समझ लेते।

तो क्या करें पहले बच्चे जो पहले बाप को याद कर सकें? निरंतर तो उसके लिए लाजमी बात क्या हो गई? अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझें। क्योंकि देह तो विनाशी है ही। जन्म-जन्मान्तर विनाशी रहा। देवताओं का भी देह विनाश होता है। आत्मा जाके जनम लेती है। तो आत्मा ही तो अविनाशी है। और देह विनाशी है। और आत्मा ने ही जन्म-जन्मान्तर देह धारण किये हैं। धारण करती है, छोड़ती है। फिर धारण करती है। तो पक्का-पक्का आत्मा हुए ना।

Today's night class is dated 9.7.1967. Sweet, sweet children cannot even see themselves. They remember the body every moment. They cannot see the soul. They see the body. They do not see themselves. What does it mean? Do they see others' bodies? Do they see their own soul or not? Their body must also be coming to their mind. So, just as they cannot see themselves, they cannot see the Father as well. Hm? Sweet children, sweet-sweet children should ask themselves - What am I? So, they will say through the mouth that I am a soul. I am a point of light soul. I, the soul reside in the middle of the bhrikuti (center of forehead between the eyebrows). Then, can they see? And just as they can see themselves, similarly can they see the Father also? Where will they see the Father? Hm? In order to see the Father, that country, that place is required, is not it? Where will they see? Will they see in their own body? How will they know? This is the same as the shaastravaadis who say Shivohum (I am Shiv). I, the soul, am the Supreme Soul. Brahma asmi (I am brahm). Hm? How will you recognize the permanent Chariot? You have heard about the permanent Chariot and the temporary Chariot. But how will you recognize the permanent Chariot in whom He lives? Through which knowledge will you recognize? You can see Baba's body. Hm? The soul is not visible. It is correct, is not it? Now you can see the body of this Baba. It has been taken on loan. Is the house taken on loan a permanent one, is it permanent or temporary? So, the children have a little difficulty in this. A little. What? What is the difficulty? Hm? The body whose loan He has taken, you should see Baba in that body and Baba has told that an old person is also called Baba. And it has been said for the permanent Chariot because there is only one permanent Chariot, is not it? There aren't many.

So, it has been said for the permanent Chariot; what has been said in this regard? Hm? The point alone will come to your mind when you utter Baba. It will not come to others mind. It will come to your mind. For who was it said? Hm? It was said for the permanent charioteer (mukarrar rathdhaari) soul. So, why was this specialty kept only for him? What? That when you utter Baba, then the point alone will come to your mind. The body will not come to the mind. Why? Why is it so? Hm? Why will the body not come to his mind? Hm? Arey, there is none higher than him. How will it be known whether he is high or low, whether he is sitting on a mountain, whether he is sitting on [Mt.] Kailash? Hm? Is he sitting on the Everest peak? How will you know if he is high? There is a little difficulty because only at this time you children are explained this. What? That children first of all develop the faith that you are soul. What does it mean? Those who develop the faith on the soul that we are souls, we are points, we are the subtlest points of light, stars, then what would be the difference between them and those who remember the body? Hm? Those who developed the firm faith that we are souls, then what is the difference between both of them? Hm? What would come to the mind of those who develop the faith? The soul will come to the mind every moment. Hm? Will it come to the mind every moment? How will it come to the mind while sleeping? Hm? Will it come to the mind while sleeping? Hm? Will it come? Wow! This one has turned out to be a great personality. This one remembers the soul even while sleeping. Hm? Does it happen so? Hm? No.

This is why Arjun was told in the Gita - O My child, the conqueror of sleep (nidraajeet). What? It is possible if you conquer sleep. What? That you can remember the soul. If you are in sleep, if you doze off, and even in case of sleep, one kind of sleep is with dreams. Hm? Which sleep is it? It is the sleep of the subtle body. And one is the sleep of the physical body. When you become tired, then you fall deep asleep. You don't remember anything. You don't remember the time as well. And one is such sleep of the soul that when the soul becomes the resident of the Supreme Abode, the Soul World, then nothing remains in the memory. Do you remember? Hm? It is as if you have become inert. So, when you are inert in the Supreme Abode, which is the original home of the soul, then wherever the soul is in bondage while sitting in the body, then how will one remember [the soul] while sleeping? Hm? Will it come to the mind? Does the star come to the mind in the middle of the forehead (bhrikuti) while sleeping? Arey. One moment you say 'it comes to the mind' and another moment you say ' it doesn't come to the mind'. Are you persons who change parties?

So, He says - Children, first decide yourself to be a soul. When you develop this firm faith that you are a soul, a point of light, residing in the middle of the forehead, then what will be the indication? Hm? What is the indication? Hm? Arey? Arey, the indication was mentioned as the conqueror of sleep. What? When there is the continuous awareness of the soul, then it is sure that you have developed the faith that what am I? I am a soul because you know that the soul is permanent. It is imperishable. And the body exists today and tomorrow? It will not exist tomorrow. So, why should we remember the perishable thing? You should remember the imperishable one. So, will it not do if you remember sometimes and do not remember sometimes? Hm? No. Why? It is because if you do not develop the faith that you are a soul, then how will you develop the faith on the soul’s Father? What? Every moment one’s own body comes to the mind, other’s body, whom we see comes to the mind, for example, we see Brahma Baba; so we remember his body. But you came to know that his body is not the permanent Chariot. That has been lost. Is it a permanent Chariot? It was lost, wasn’t it? So, it is proved that the permanent Chariot is someone else. He is, was a temporary Chariot. So, it proves that children see the body of Brahma and consider the Supreme Soul or the Father to be present in Brahma’s body.

So, what should the children do first so that they could remember the Father continuously? So, what is compulsory for that? You should consider yourself to be a point of light soul because the body is perishable. It has been perishable birth by birth. The body of the deities is also perishable. The soul goes and gets birth. So, the soul itself is imperishable. And the body is perishable. And the soul has assumed bodies birth by birth. It assumes, it leaves. It assumes again. So, you are firmly souls, aren’t you?

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2523, आडियो 3009, दिनांक 20.05.2018
VCD 2523, Audio 3009, Date 20.05.2018
रात्रि क्लास 9.7.1967
Night Class dated 9.7.1967
VCD-2523-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 14.05-27.35
Time- 14.05-27.35


तो अपन को आत्मा समझो। और बाप भी कहते हैं। हँ? कौनसा बाप कहते हैं? कहते हैं कि मैं आया हुआ हूँ। हँ? मैं आया हुआ हूँ? कहाँ आया हुआ हूँ? इस सृष्टि में मैं आया हुआ हूँ। क्योंकि मुझे भी तो देह धारण करनी है ना। देह धारण करूंगा तब ही तो तुमको सच्चाई सुनाऊँगा, सत्य ज्ञान सुनाऊँगा ना। तो देह धारण करूंगा तो तुमसे बात कर सकूंगा। नहीं तो? बात ही नहीं कर सकूंगा। और जब बात नहीं कर सकूंगा तो फिर? तो फिर वार्तालाप होगा ही नहीं। फिर क्या नुकसान होगा? हँ? जब तुमसे वार्तालाप ही नहीं होगा तो तुम्हारे अन्दर जो संशय आते हैं उन संशय का निवारण होगा ही नहीं। और मुझे तो बात करने के लिए मुख चाहिए ही चाहिए। क्योंकि मेरा तो अपना शरीर है ही नहीं। मेरी तो आत्मा का ही नाम बिन्दु है। क्या? नाम कब पड़ता है? हँ? काम के आधार पर नाम पड़ता है। तो मेरा असली, असल में देखा जाए तो मेरा काम क्या है? हँ? मेरा काम क्या है? अरे? मेरा काम इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदाकाल थोड़ेही है। वो तो मैं थोड़े समय के लिए आता हूँ। हँ? तो बाकी समय मेरा काम क्या है? आत्मिक स्थिति में रहना।

आत्मा शान्त स्वरूप है। क्या? ये नहीं कह सकता कि आत्मा सुख स्वरूप है। मैं कह सकता हूँ? हँ? वो सुख भोगता है? सुख नहीं भोगता। शान्तिधाम का रहवासी है तो शान्त में ही रहता है। इस सृष्टि में भी आता है तो कहाँ रहता है? हँ? शान्त देश में रहता है या अशान्त देश में रहता है? हँ? शान्त देश कौनसा है इस सृष्टि में? हँ? परमब्रह्म। परमब्रह्म जिसे कहते हो वो साधु-संत-महात्माएं तो समझते हैं कि ये भगवान है। हँ? परन्तु ब्रह्म क्या भगवान होता है? वो तो ब्रह्म को क्या समझ लेते हैं? हँ? ब्रह्मलोक को भगवान समझ लेते हैं। वास्तव में ब्रह्मलोक कहो या परमब्रह्म कहो या ब्रह्मा नामधारियों में बड़े ते बड़ा, महान ते महान कहो, वो तो आत्मा के रहने का स्थान है ना। तो इस दुनिया में मैं आता हूँ तो कहाँ रहता हूँ? हँ? कहाँ रहता हूँ? शान्त देश में रहता हूँ इस दुनिया में? मुकर्रर रथ में रहता हूँ? शान्तिधाम का वासी नहीं हूँ? हँ? शान्तिधाम का वासी हूँ। तो मुकर्रर रथ जो है वो शान्तधाम कहें? हँ? शान्तधाम कहें। ये कैसे? क्योंकि, हँ, शान्तधाम तब कहें, जब पत्थर की तरह शान्त होके पड़ा रहे। क्या? पत्थर कैसे पड़ा रहता है? हँ? उसको एक ठोकर मारो, थोड़ा लुढ़क जाएगा, फिर, फिर शान्त हो जाएगा। बड़े ते बड़ा पत्थर क्या है? हँ? बड़े ते बड़ा पत्थर है;
(किसी ने कुछ कहा।) ग्रेनाइट पत्थर है? तुम्हारी किचन में भी तो लगा हुआ है। वो बड़े ते बड़ा है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) माउंट आबू है बड़े ते बड़ा पत्थर? अच्छा? उसका विनाश नहीं होगा? टूट-फूट नहीं होगी? हँ? वो सदाकाल है? हाँ, हाँ, पत्थरबुद्धि; पत्थर कहो, पत्थरबुद्धि कहो, पत्थर से तो मिसाल दी जाती है बुद्धि की कि पारसबुद्धि है या पत्थरबुद्धि है।

तो बड़े ते बड़ा पत्थर है कौनसा दुनिया में? हँ? शिवलिंग बड़ा है? अरे, शिवलिंग तो छोटे से छोटा बना दो। असली रूप में देखो तो वो तो बहुत सूक्ष्म है। हँ? ये तो पूजा करने की सुविधा के लिए बड़ा बनाया है। शिवलिंग बनाते हैं ना। उसको तो पूजा करने के लिए बनाया इतना बड़ा। बाकी वास्तव में याद करने के लिए इतना बड़ा है क्या? हँ? कैसा है? हँ? वास्तव में तो शिव जिसे कहते हैं वो भी तो ज्योतिबिन्दु है ना। लेकिन रहता कहाँ है? शान्त स्वरूप है तो कहाँ रहता है? जो है ही शान्त स्वरूप वो शान्त देश में रहना पसन्द करेगा या सदा काल अशान्ति देश में रहना पसन्द करेगा? हँ? अगर सदाकाल अशान्ति देश में रहना पसन्द करता तब तो मान ली जाती बात कि हाँ भगवान द्वापरयुग में आता है। हँ? आता है? नहीं? आता तो है इस दुनिया में जहाँ अशान्ति बहुत बढ़ जाती है। परन्तु जिस मुकर्रर तन में आता है वो तन किसका है? तनधारी कौन है? तन को धारण करने वाला? वो तनधारी पत्थर है। क्या? छोटा-मोटा पत्थर नहीं। क्या? मैं पत्थरबुद्धियों में आता हूँ? ठिक्करबुद्धियों में आता हूँ क्या? हँ? किसमें आता हूँ? हँ? उन्होंने तो दिखा दिया जड़त्वमयी बुद्धि वाले जो जानवर हैं उनमें भी आता हूँ। वो तो फिर भी चैतन्य आत्माएं हैं ही हैं। अब पत्थर में क्या चैतन्य आत्मा होती है? हँ? नहीं होती है। तो मैं पत्थरबुद्धि में आता हूँ या नहीं आता हूँ? हँ? पत्थरबुद्धि में आता हूँ? कहते हैं पत्थर-ठिक्कर-भित्तर में ठोक दिया है। ये तो झूठ बात है। हँ?

इस सृष्टि पर आता हूँ का मतलब क्या है? हँ? इस सृष्टि पर बच्चा आता है तो क्या मतलब हुआ? प्रत्यक्ष होने को ही आना कहते हैं ना। प्रत्यक्ष नहीं हुआ, सबके सामने आया ही नहीं, सब स्वीकार ही नहीं कर सकें। जो देखें, जो सुनें उसके मुँह से निकले ना बच्चा आया। तो ऐसे ही मैं जब आता हूँ तो पत्थरबुद्धि में आता हूँ या चैतन्य में आता हूँ? किसमें प्रत्यक्ष होता हूँ? पत्थरबुद्धि में प्रत्यक्ष होता हूँ? नहीं। इसलिए बोला कि मैं रथ में आता हूँ। शरीर रूपी रथ में आता हूँ। तो ऐरा-गैरा-नत्थू-खैरा कोई भी रथ में आ जाएगा क्या? हँ? कैसा रथ चाहिए? ऐसा रथ चाहिए जिसे सारी दुनिया माने कि भगवान जो मुकर्रर रथ लेता है, वो तो बड़ा भाग्यशाली रथ है। तो भाग्यशाली रथ में आता हूँ। तो वो रथ पहले पत्थरबुद्धि होता है, पत्थर ही होता है या ज्योति रूप बन जाता है, आत्मा बन जाता है? हँ? पहले तो पत्थर ही होता है ना। फिर आत्मा की प्रैक्टिस करते-करते याद की एक टाइम ऐसा आता है कि लगातार आत्मा याद आती है। निरंतर याद आती है। जब निरंतर याद आएगी तो फिर बाप को याद कर सकेगा या निरंतर याद नहीं कर सकेगा? हँ? निरंतर तभी याद कर सकेगा, क्या अर्हता रखी? हँ? कि अपन को आत्मा समझो। पहले-पहले अपन को आत्मा निश्चय करो। इसलिए कहते हैं कि सवेरे उठो तो क्या करो? घोटो। घड़ी-घड़ी घोटो। मैं ज्योतिबिन्दु आत्मा भृकुटि के मध्य में सितारे मुआफिक चमक रही हूँ।

So, consider yourself to be a soul. And the Father also says. Hm? Which Father says? He says that I have come. Hm? Have I come? Where have I come? I have come in this world because I have to assume a body, too, will I not? I will narrate the truth, true knowledge to you only when I assume a body, will I not? So, I will be able to talk to you when I assume a body. Otherwise? I will not be able to talk at all. And when I will not be able to talk at all, then? Then there will not be any conversation at all. Then what will be the harm? Hm? When there will not be any conversation with you at all, then there will be no solution of the doubts which emerge in your mind. And I compulsorily require a mouth to speak because I do not have a body of My own at all. The name of My soul itself is point. What? When is a name coined? Hm? A name is coined based on the task performed. So, if you observe actually, what is My true task? Hm? What is My task? Arey? My task on this world stage is not forever. I come for a little while. Hm? So, what is My task for the remaining time? To be in soul conscious stage.

The soul is an embodiment of peace. What? I cannot say that the soul is an embodiment of happiness. Can I say? Hm? Does He experience happiness? He does not experience happiness. He is a resident of the abode of peace; so He remains in peace only. Where does He live even when He comes in this world? Hm? Does He live in an abode of peace or an abode of disturbance? Hm? Which is the abode of peace in this world? Hm? Parambrahm. As regards the one whom you call Parambrahm, those sages, saints and mahatmas feel that this is God. Hm? But is Brahm God? What do they consider Brahm to be? Hm? They consider Brahmlok (abode of Brahm) to be God. Actually, call it the abode of Brahm or Parambrahm or the biggest, greatest among those who hold the name of Brahma, that is the place of residence of the soul, is not it? So, where do I live when I come in this world? Hm? Where do I live? Do I live in the abode of peace in this world? Do I live in the permanent Chariot? Am I not a resident of the abode of peace? Hm? I am a resident of the abode of peace. So, should we call the permanent Chariot as the abode of peace? Hm? We should call him the abode of peace. How is this? It is because, hm, he will be called an abode of peace when he lies peaceful like a stone. What? How does a stone lie? Hm? If you kick it, it will roll a little, then, then will become idle. What is the biggest stone? Hm? The biggest stone is;
(Someone said something.) Is it the granite stone? It is installed in your kitchen also. Is it the biggest one? Hm? (Someone said something.) Is Mount Abu the biggest stone? Achcha? Will it not be destroyed? Will it not break? Hm? Is it permanent? Yes, yes, stone-like intellect. Call it a stone, call it a stone-like intellect; the intellect is compared with a stone that whether it is an elixir-like intellect (paarasbuddhi) or stone-like intellect (pattharbuddhi).

So, which is the biggest stone in the world? Hm? Is Shivling big? Arey, Shivling can be made in the smallest size. If you see in true form, then it is very subtle. Hm? This has been made big for the convenience of worship. Shivling is sculpted, is not it? So, it has been made so big for the purpose of worship. But is it actually so big for the purpose of remembrance? Hm? How is it? Actually, the one who is called Shiv is also a point of light, is not He? But where does He reside? He is an embodiment of peace, so where does He live? Would the one who is an embodiment of peace, like to live in an abode of peace or would He like to live forever in an abode of disturbance? Hm? If He would have liked to live forever in the abode of peace, then it would have been accepted that yes, God comes in the Copper Age. Hm? Does He come? No? He does come in this world, where disturbance increases a lot. But whose body is the permanent body in which He comes? Who is the holder of the body? The one who holds the body? That holder of the body is a stone. What? He is not a small stone. What? Do I come in those with a stone-like intellect? Do I come in those with a lump-like intellect? Hm? In whom do I come? Hm? They have shown that I come even in the animals with an inert intellect. They are however living souls. Well, does a stone have a living soul? Hm? It doesn't have. So, do I come in the one with stone-like intellect or not? Hm? Do I come in the one with stone-like intellect? It is said that I have been put in stones, lumps and walls. This is a false topic. Hm?

What is meant by 'I come in this world'? Hm? What is meant when you say 'a child comes in this world'? Being revealed itself is called arrival, is not it? He has not been revealed, he hasn't come in front of everyone at all, and everyone is not able to accept at all. Whoever sees, whoever hears should say through their mouth that a child has come. So, similarly, when I come, do I come in the one with a stone-like intellect or in a living one? In whom am I revealed? Am I revealed in the one with a stone-like intellect? No. This is why it was said that I come in a Chariot. I come in a body like Chariot. So, will He come in any tom, dick and harry, any Chariot? Hm? What kind of a Chariot is required? Such a Chariot is required whom the entire world believes that the permanent Chariot that God takes is a very lucky Chariot. So, I come in a lucky Chariot. So, is that Chariot initially having a stone-like intellect, is he a stone or does he become a form of light, a soul? Hm? Initially he is a stone only, is not he? Then while practicing to remember the soul one such time comes when he remembers the soul continuously. He remembers it continuously. When the remembrance is continuous, then will he be able to remember the Father continuously or not? Hm? He will be able to remember continuously only when; what is the qualification? Hm? Consider yourself to be a soul. First of all believe yourself to be a soul. This is why it is said that whenever you wake up in the morning what should you do? Think every moment. I am a point of light soul shining like a star in the middle of the forehead.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 21 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2524, आडियो 3010, दिनांक 21.05.2018
VCD 2524, Audio 3010, Date 21.05.2018
रात्रि क्लास 9.7.1967
Night Class dated 9.7.1967
VCD-2524-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.12
Time- 00.01-16.12

रात्रि क्लास चल रहा था - 9.7.67. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – आत्मा निर्लेप नहीं है। आत्मा को ही लेप-छेप लगता है। ये तो शास्त्र बनाने वालों ने बोल दिया है कि आत्मा निर्लेप है, आत्मा को कोई पाप-पुण्य का लेप-छेप नहीं लगता है। अरे! ये तो तुमने साबित कर दिया कि आत्मा को लेप-छेप नहीं लगता है, इसलिए कुछ भी कर्म करते रहो। आत्मा सो परमात्मा तो है ही। वाह भई! बाबा कहते - अभी तुम अपन को आत्मा समझो, आत्मा ही में ही अच्छे-बुरे संस्कार होते हैं। इसलिए आत्मा समझ करके बाप को याद करो। और ये है पुरुषार्थ। बहुत सहज समझाते हैं। बाप को याद करो। जैसे अज्ञानकाल में बाप को याद करते हो। परन्तु वहाँ तो पता नहीं होता है कि बाप क्या है, कब आते हैं, रूप क्या है, कहाँ से आते हैं, क्या करते हैं? कुछ पता नहीं। यहाँ तो ज्ञान मिला हुआ है। भक्तिमार्ग में तो देहभान से आकरके देहभान को देखते हो, मूर्तियों को देखते हो ना। मूर्तियां तो जड़ हैं। और यहाँ तुम अपन को आत्मा समझकरके बाप को याद करते हो। जानते हो कि आत्मा भी चैतन्य है और बाप है आत्माओं का बाप।

तो देखो, न बाप इन आँखों से देखने में आता है और न ये आत्मा इन आँखों से देखने में आती है। और वो बाप और ये बच्चे। अब तुम थोड़ेही कहेंगे कि हम बाप को नहीं देखते हैं। हँ? भक्तिमार्ग में और ज्ञान मार्ग में क्या फर्क हो गया? हँ? वहाँ साक्षात् नहीं देखते हैं। और यहाँ तुम साक्षात् देखते हो। क्या? कैसे देखते हो? आँखें तो वो ही हैं। हँ? आँखें हैं; लेकिन फर्क है ये जानकारी का, ज्ञान का, पहचान का फर्क है। तो अगर ज्ञान न हो, बाप आकर ज्ञान न देवें, तो जैसे अपनी आत्मा को भी नहीं देख सकते; बाप की आत्मा को भी नहीं देख सकते। हाँ, देखा जा सकता है कि हम बिन्दी हैं। कैसे देखेंगे? हँ? प्रैक्टिस करेंगे, क्योंकि 63 जन्मों की प्रैक्टिस पड़ी हुई है अपनी देह को याद करने की, पराई देह को याद करने की। तो ये प्रैक्टिस पक्की हो गई। क्या? देह को याद करने की। तो करना क्या है? अभी पहचान मिली है ना कि हम देह नहीं हैं। हम तो आत्मा हैं। तो भक्तिमार्ग में तो कोई फायदा नहीं होता है। दैहिक मूर्तियाँ बनाय लेते हैं। उनमें समझते हैं भगवान है। अभी तुम तो ये समझते हो कि हम आत्मा हैं, छोटी सी बिन्दी। परन्तु बिन्दी बार-बार भूल जाती है। भूल करते हैं।

वो शास्त्रकार लोग तो समझाते हैं आत्मा अंगुष्ठे मिसल है। परन्तु आत्मा अगर अंगुष्ठे मिसल हो और यहाँ भृकुटि के मध्य में बैठे तो कितना बड़ा गुम्मड़ पड़ जाएगा। समझा ना। इसलिए अभी बच्चे समझते हैं कि बाप ही है जो बैठकरके ये नॉलेज देते हैं। क्या? कि आत्मा बिन्दी है। और जड़ बिन्दी नहीं है। ज्योति स्वरूप है। हँ? ज्योति माने? रोशनी निकलती है ना आँखों से। आदमी मर जाता है तो रोशनी निकलना बन्द हो जाती है। बटन हो जाती है आँखें। तो बाप बैठकरके जो नॉलेज देते हैं, उससे तुम बच्चों को आस्तिक बनाते हैं। तुम्हारी आस्था बैठ जाती है पक्की कि हम आत्मा हैं। हम सदाकाल के लिए देह नहीं हैं। देह तो पाँच तत्वों का पुतला आज बना, कल, कल खतम हो जाएगा। और सबके पुतले खतम होते रहते हैं। आत्माओं के पुतले हैं ना। तो बाप को जो नहीं जानते हैं कि बाप भी पुतले में ही प्रवेश करके पार्ट बजाता है। हँ? तुमको ज्ञान सुनाता है। परन्तु वो पुतला जड़ होता है या चैतन्य होता है? हँ? चैतन्य होता है ना।

तो देखो, भक्तिमार्ग की बातों में और यहाँ ज्ञानमार्ग की बातों में बहुत फर्क हो जाता है। तो जब यहाँ बाप को जान जाते हो तो बाप का ज्ञान होने से तुम पक्के ज्ञानी बन गए। नहीं तो पक्के बन जावेंगे। और बाप को जान जाते हो तो आधा कल्प के लिए सुखी हो जाते हो। भक्तिमार्ग में याद तो करते थे, लेकिन कोई पक्का नहीं था। कोई राम को, कोई कृष्ण को, कोई क्या, कोई क्या, कोई गणेश को, हनूमान को याद करते थे। वहाँ पक्का किसी को पता नहीं। आखरीन भगवान का पक्का रूप क्या है जो कहते हैं सदा शिव। सदा शिव कहते हैं तो सदाकाल का रूप होना चाहिए ना। तो फिर जब रूप का ही पता नहीं होता है भक्तिमार्ग में तो दुखी ही होते जाते हैं क्योंकि याद तो पक्की कर ही नहीं सकते। आत्मा याद में नहीं टिकती है तो भटकती रहती है। तो वहाँ भक्तिमार्ग में ऐसे नहीं कहेंगे कि वहाँ आस्तिक होते हो। हँ? वहाँ कोई पक्की आस्था बैठती थोड़ेही है किसी के ऊपर? बैठती है? हँ? आस्था ही नहीं बैठी तो आस्तिक काहे के? और जो बैठती भी है तो अलग-4; तो पक्का किसी को मालूम नहीं इसलिए आस्था भी नहीं बैठती।

तो वहाँ यहाँ से आस्तिक बनकरके तुम आधा कल्प पहले सुख भोगते हो स्वर्ग में। फिर आधा कल्प के बाद वहाँ भक्तिमार्ग में तुम भूल जाते हो। अपनी आत्मा को ही भूल जाते हो। आत्मिक स्थिति खलास। हँ? तो जो आत्मिक स्थिति में नहीं रहते हैं तो प्रकृति उन्हें सहयोग देना बन्द कर देती है। सबसे पहले क्या होता है? हँ? प्रकृति जोर से हड़कम्प मचाती है। आधा विनाश हो जाता है। कब? आधा कल्प स्वर्ग में बीतने के बाद प्रकृति जो है विकराल रूप धारण कर लेती है। क्यों? क्यों विकराल रूप धारण करती है? क्योंकि आत्मिक स्मृति नहीं रही; आत्मा को भूले तो प्रकृति कंट्रोल से बाहर हो जाती है। तो पहले तुम स्वर्ग में आधा कल्प प्रारब्ध पाते हो। ये है बाप का वर्सा। क्या? कौनसा वर्सा देते हैं? सुख-शान्ति का वर्सा देते हैं। रिंचक मात्र भी दुख-अशान्ति नहीं। तो वो वर्सा तुम पाते हो। किससे पाते हो? कैसा वर्सा? बेहद का वर्सा और बेहद के बाप से पाते हो क्योंकि और तो कोई धरमपिता है ही नहीं। क्या? वो तो सब हैं हद के। सारी मनुष्य सृष्टि के पिता थोड़ेही हैं। सारी मनुष्य सृष्टि कोई उनको अपना बाप थोड़ेही मानती है। तो वो सब हद के होने से बेहद के बाप का तो किसी को पता ही नहीं। बुलाते रहते हैं। परन्तु वो बुलाने से तो आता नहीं। जब इस मनुष्य सृष्टि का जो बीज है। क्या? कोई मनुष्य ही होगा ना। दूसरे धरम के लोग कहते हैं आदम है, एडम है। भारत में कहते हैं आदि देव है। हँ? त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः। तुमस्य जगतस्य परम निधानम्। ऐसे कहते हैं ना। तो कहते तो हैं। फिर और दूसरे-दूसरे रूप भी मान लेते हैं। तो बुद्धि में घपला हो जाता है। वर्सा प्राप्त करने की बात ही नहीं।

अभी तुम बेहद का वर्सा पाते हो क्योंकि बेहद का बाप मिला है। सारी मनुष्य सृष्टि का बाप है ना। सर्व का कल्याणकारी। सर्व का सद्गतिदाता। तो ऐसे नहीं कहा जाएगा कि भक्तिमार्ग में तुम वहाँ आस्तिक होकर रहते हो। क्या? पता ही नहीं है इसलिए आस्था टिकेगी किसके ऊपर? तो वहाँ बाप को जानते हो ऐसे कह ही नहीं सकते। नहीं। वहाँ भक्तिमार्ग में भी नहीं जानते हो। वहाँ कलियुग में सब शूद्र हो जाते हैं ना। तो जब शूद्र हो जाते हो तब भी नहीं जानते हो। क्यों? क्योंकि भगवान शूद्रों को आकर क्या बनाता है पहले? ब्राह्मण बनाता है। तो वहाँ कोई ब्राह्मण हो ही नहीं सकता क्योंकि सारा युग कलियुग में बाप तो आते नहीं। कलियुग तो, कलियुग के अंत में ही आते हैं जबकि सतयुगी नई दुनिया की रचना करनी है। तो उसे कहते हैं कलियुग का अंत आर सतयुग का आदि का संगम। तो सिर्फ इस संगमयुग पर तब आते हैं, प्रैक्टिकल में प्रत्यक्ष होते हैं। जैसे बच्चा लौकिक दुनिया में प्रत्यक्ष होता है तो कहते हैं जनम हुआ। हँ? ऐसे ही तब संगमयुग में आते हैं। जब आते हैं तो एक सेकण्ड में तुम पुरुषोत्तम बन जाते हो नंबरवार। पुरुष माने आत्मा; उत्तम माने श्रेष्ठ। हँ? तुम बनते हो तो तुम्हें पता चलता है कि कौन-कौनसे और श्रेष्ठ हैं? कौन-कौनसी आत्माएं हैं जो हमारे शासन में आने वाली हैं अगले कल्प में। हम उनके राजा बनेंगे। उन्होंने उतना पुरुषार्थ नहीं कर पाया। हमने किया तो हम श्रेष्ठ बनते हैं। तो तुम पुरुषोत्तम संगमयुग पर पुरुषोत्तम बनते हो।

A night class dated 9.7.67 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was - The soul is not nirlep (free from influences). It is the soul which is influenced. The writers of the scriptures have said that the soul is nirlep. The soul does not get affected by sins or noble actions. Arey! You have proved that the soul is not affected; this is why you can go on performing any actions. The soul is anyways Supreme Soul. Wow brother! Baba says - Now you consider yourself to be a soul; there are good and bad sanskars in a soul only. This is why consider yourself to be a soul and remember the Father. And this is the purusharth. He explains in a very easy manner. Remember the Father. For example, during the period of ignorance, you remember the Father. But there you don't know what the Father is, when He comes, what His form is, from where does He come, what does He do? Nothing is known. Here you have received knowledge. On the path of Bhakti, you see the body consciousness while being body conscious; you see the idols, don’t you? The idols are non-living. And here you consider yourself to be a soul and remember the Father. You know that the soul is also living and the Father is the Father of souls.

So, look, neither the Father is visible to these eyes nor is this soul visible to these eyes. And that Father and these children. Well, you will not say that we do not see the Father. Hm? What is the difference between the path of Bhakti and the path of knowledge? Hm? There you don't see in practical. And here you see in practical. What? How do you see? The eyes are the same. Hm? There are the eyes; But there is a difference in regard to information, knowledge, realization. So, if there is no knowledge, if the Father does not come and give knowledge, then just as you cannot see your soul as well; you cannot see the Father's soul as well. Yes, you can see that we are points. How will you see? Hm? If you practice; because you have practiced since last 63 births to remember your body, to remember others' bodies. So, this practice has become firm. What? To remember the body. So, what should you do? Now you have received the realization that we are not a body. We are a soul. So, there is no benefit on the path of Bhakti. You build physical idols. You think that there is God in them. Now you understand that we are souls, a small point. But you forget the point again and again. You commit mistake.

Those writers of the scriptures think that the soul is like a thumb. But if the soul is like a thumb and if it sits here in the middle of the forehead, then there would be such a big protrusion (gummad). Did you understand? This is why now the children understand that the Father Himself sits and gives this knowledge. What? That the soul is a point. And it is not a non-living point. It is a form of light (jyoti swaroop). Hm? What is meant by jyoti? Light emerges from the eyes, doesn't it? When a person dies, then the light stops emerging. The eyes become like buttons. So, the knowledge that the Father sits and gives, He makes you theists (aastik) through it. You develop firm faith (aastha) that we are souls. We are not a body forever. The body is an effigy of five elements; it is formed today, it will perish tomorrow. And everyone's effigy keeps on perishing. There are effigies of souls, aren't there? So, those who do not know the Father that the Father also enters into an effigy and plays His part. Hm? He narrates knowledge to you. But is that effigy non-living or living? Hm? It is living, is not it?

So, look, there is a lot of difference between the topics of the path of Bhakti and the topics of the path of knowledge. So, when you get to know about the Father here, then by knowing about the Father, you became firm knowledgeable ones. Otherwise, you will become firm. And when you know the Father you become happy for half a Kalpa (cycle). You used to remember [Me] on the path of Bhakti, but you were not sure. Someone used to remember Ram, someone used to remember Krishna, someone used to remember someone else, someone used to remember Ganesh, someone used to remember Hanuman. There nobody knew for sure as to ultimately what is the firm form of God who is called SadaaShiv. When He is called SadaaShiv, then He should have a form which is forever. So, then, when you did not know about His form on the path of Bhakti, then you become sorrowful only because you cannot remember with surety. When the soul does not become constant in remembrance, then it keeps on wandering. So, there, on the path of Bhakti it will not be said that there you are theists (aastik). Hm? Do you develop any firm faith (aastha) on anyone? Do you? Hm? When there is no faith at all then how can you be theists? And even if you develop, it is of different kinds; so, nobody knows firmly; this is why the faith does not develop, too.

So, after you become theists here, you enjoy happiness there in heaven for half a Kalpa. Then after half a Kalpa, you forget on the path of Bhakti. You forget your soul itself. The soul conscious stage ends. Hm? So, nature stops helping those who do not remain in soul conscious stage. What happens first of all? Hm? Nature causes a big upheaval. Semi-destruction takes place. When? After passing of half a Kalpa in heaven, nature assumes a dangerous form. Why? Why does it assume a dangerous form? It is because the soul conscious stage is no longer there. When you forgot the soul, then the nature goes out of control. So, first you achieve fruits (praarabdha) for half a Kalpa. This is Father's inheritance. What? Which inheritance does He give? He gives the inheritance of happiness and peace. There is no trace of sorrows and peacelessness. So, you obtain that inheritance. From whom do you obtain? What kind of inheritance? Unlimited inheritance and you obtain from the unlimited Father because there is no other founder of religion at all. What? All those are in a limited sense. They are not the fathers of the entire human world. The entire world does not accept them as their Father. So, as all of them are limited ones, nobody knows about the unlimited Father. They keep on calling. But He does not come on being called. When the seed of this human world. What? It must be a human being only, will he not be? People of other religions say he is Aadam, he is Adam. In India they say he is Aadi Dev. Hm? Twamaadidevah purushah puraanah. Tumasya jagatasya param nidhaanam. They say like this, don't they? So, they do say. Then, they accept other forms also. So, confusion arises in the intellect. There is no question of obtaining inheritance at all.

Now you obtain unlimited inheritance because you have found the unlimited Father. He is the Father of the entire human world, is not He? He is the benefactor of everyone. He is the bestower of true salvation upon everyone. So, it will not be said that on the path of Bhakti you remain theist there. What? You don't know at all; this is why on whom will your faith be focussed? So, it cannot be said at all that you know the Father there. No. You don't know there on the path of Bhakti as well. There everyone becomes a Shudra in the Iron Age, don't they? So, even when you become Shudras, you don't know. Why? It is because what does God come and make the Shudras initially? He makes them Brahmins. So, there cannot be any Brahmin there at all because the Father doesn't come in the entire Age, the Iron Age. He comes only in the end of the Iron Age when the Golden Age, new world is to be created. So, that is called the confluence of the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age. So, He comes only then in this Confluence Age and is revealed in practical. For example, when a child is revealed in the outside world, then it is said that he has been born. Hm? Similarly, He comes then in the Confluence Age. When He comes, then you become numberwise Purushottam in a second. Purush means soul; uttam means righteous. Hm? You become; so, you get to know that who are the other righteous ones? Which souls are going to come under our rule in the next Kalpa (cycle). We will become their kings. They couldn't make purusharth to that extent. We made, so we become righteous. So, you become Purushottam in the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age).

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 22 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2525, आडियो 3011, दिनांक 22.05.2018
VCD 2525, Audio 3011, Date 22.05.2018
रात्रि क्लास 9.7.1967
Night Class dated 9.7.1967
VCD-2525-Bilingual

समय- 00.01-16.02
Time- 00.01-16.02

रात्रि क्लास चल रहा था - 9.7.1967. दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – ये जो शास्त्रों मं गाया हुआ है योगाग्नि, उस अग्नि से खाद निकल जाती है। बाकि सच्चा सोना बन जाता है। सच्चा सोना बनेंगे, तो हल्के, हल्के-फुल्के रहने से उड़ेंगे। बाकि कचड़ा तो सबकी आत्मा में पड़ना जरूर है। तमोप्रधान बनना जरूर है क्योंकि बाप ने कहा है ना कि ये सारा झाड़ मनुष्य सृष्टि का, ये सारा ही झाड़ तमोप्रधान हो गया है। और जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है। तो सारे झाड़ के लिए कहते हैं ना बच्चे। तो इस समय में इनमें सब धर्म, वगैरा आ गए। और सब ये जो टाल-टालियाँ हैं एकदम पूरा अब ये झाड़ झड़कने का है, गिरना, खतम होने का है। और अभी? ये नए झाड़ की सैम्पलिंग भी लग रही है। तो ये सैम्पलिंग संगमयुग पर लगती है। लग-लग करके, लग-लग करके जब यहाँ सभी देवता धरम वाले, सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी सब तैयार हो जाते हैं, जब ये सैम्पलिंग पूरी होती है, तो फिर लड़ाई शुरू हो जाती है। तो जब तक तुम्हारी स्थापना नहीं हुई है, तब तक लड़ाई नहीं लग सकती। पीछे तो बच्चों को नई दुनिया चाहिए। और नई दुनिया भी तो फिर पुरानी जरूर होनी है। पुरानी नई होती है। तो बच्चे समझ गए हैं कि नई दुनिया में सतोप्रधान होते हैं। और पुरानी दुनिया में तमोप्रधान होते हैं। जब सूर्यवंशी होता है तो सूर्यवंशी में चन्द्रवंशी नहीं होते। फिर चन्द्रवंशी चलता है तो सूर्यवंशी नहीं। रजो, तमो में वैश्य, शूद्रवंशी। ये तो बच्चों ने पक्का कर लिया।

और ये शास्त्रों वगैरा में कोई नॉलेज है भी नहीं। कहाँ भी नहीं है। और ये गीता में भी नहीं है। हाँ, गीता में फिर कुछ अच्छा है आटे में लून मिसल। बाकि जो रामायण वगैरा है, उनमें नून मिसल देखो। बाप उनका भी बैठकरके समझाते हैं। अब खुद बैठ करके समझाते हैं कि देखो रामायण में कहते हैं बन्दरों की सेना ली। अभी तुम बन्दर से मन्दिर लायक बन रहे हो ना। तो अपनी जांच करनी पड़ती है कि हमारे में कोई बन्दरपना तो नहीं है। अवगुण तो नहीं है क्योंकि भारत में ये बात गाते हैं। क्या? मुझ निर्गुणहारे में कोई गुण नाहि। हँ? भारत में ही क्यों गाते हैं? हँ? और दूसरे धरमवालों में, दूसरे देशों में क्या गुण आ जाते हैं? हँ? भारत में इसलिए गाते हैं कि भारत में तुम बच्चे हो जो बहुत तमोप्रधान बन जाते हो। नाम ही है रुद्रमाला। रौद्र रूप धारण करने वालों की माला। विकराल रूप धारण करते हैं। तो क्या कहेंगे? निर्गुण माना कोई भी गुण नहीं। सारे ही फिर क्या हुए? गुण नहीं तो क्या हुए? अवगुण ही अवगुण। नहीं तो यहाँ अज्ञान में ये संस्थाएं निर्गुण भी होती हैं। निर्गुण संस्था। अभी निर्गुण अगर संस्थाएं कोई होती हैं तो तुम समझ सकते हो कि उनमें कोई गुण नहीं। वो तो कोई में भी गुण नहीं है। ये तो संस्था वाले सिर्फ अपना नाम रख देते हैं - निर्गुण संस्था। और वो समझ भी नहीं सकते हैं इन अर्थों को।

बाप बैठकरके ये सब बातें समझाते हैं बच्चों को। और आते भी हैं यहाँ सागर पर। देखो, वहाँ सागर में जाते हैं तो वहाँ बीच में एकांत होती है ना बच्चों को। जाते हैं सागर पर घूमने बीच पर, तो शान्ति के लिए जाते हैं ना। तो देखो ये भी सागर है। ज्ञान सागर है। जैसे बीच है यहाँ, शान्ति है। यहाँ कोई झंझट नहीं रहता है। कराची में भी जाते थे। कहाँ? सागर पे। तुम बच्चे सागर पर जाकर तपस्या करते थे। वहाँ ढ़ेर पर, रेती के ढ़ेर पर बैठते थे क्योंकि वायुमण्डल अच्छा रहता है, शान्ति वहाँ रहती है। तो ये ज्ञान सागर भी ऐसे ही है। यहाँ तुमको शान्ति का अनुभव तो अच्छा हो सकता है, भासना आ सकती है। और वहाँ इतनी नहीं आएगी क्योंकि वहाँ सेन्टर पर तो जाएंगे, टाइम देखते रहेंगे, देरी होती है, ये होता है। ये सब बातें हैं। अरे बहुत कुछ याद पड़ेगा। कोई मरा होगा, कोई जिया होगा, फलाना होगा, तो याद तो आएगा ना। अब यहाँ तो एकान्त में कोई याद नहीं पड़ सकते। क्यों? क्योंकि जो भी यहाँ बैठते हैं ये सभी रहते हैं शान्त में। कहाँ रहते हैं? ज्ञान सागर के कंठे पर जो रहते हैं वो सभी शान्त में रहते हैं। तो वायुमण्डल शान्त का हो जाता है। तो वहाँ तो उस दुनिया में याद करके, अक्सर करके शान्ति मिट जाती है। फिर ये है नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार। उसमें भी ऐसे ही है कि जो अभ्यासी, अच्छे बच्चे होते हैं वो तो बाप की याद में अच्छा ही रह सकते हैं। और जो पुरुषार्थ नहीं करते हैं उन्हों को फिर भी वहाँ कुछ न कुछ याद आती रहती है।

9.7.67 की वाणी का तीसरा पेज। बच्चियों को जो माताएं हैं, अपने बच्चे छोड़करके आते हैं। तो वो भी कभी-कभी याद पड़ेंगे। कि बच्चे अपने सुदर्शन चक्रधारी की अवस्था में रहो। इस सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है या इस ड्रामा का चक्कर कैसे फिरता है, इसकी याद में रहो। क्योंकि वो ड्रामा वाले जो होंगे ना बच्चे वो उनके तो बुद्धि में होगा कि मैं तो ड्रामा का एक्टर हूँ। और ड्रामा इतने घंटे में ये चक्कर होता है। तो वो तो निकल जाते हैं। शूट कर देते हैं ड्रामा को। फिर देखो उस ड्रामा का चक्कर फिरता ही रहता है। तुम भी यहाँ अभी प्रैक्टिकल में जो पार्ट बजाय रहे हो, वो ही पार्ट बजाएंगे। एक्यूरेट बजाएंगे। कोई भी, जरा भी फर्क नहीं पड़ेगा। आगे भी गाया हुआ था – आश्चर्यवत् सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती। अभी भी बाप ऐसे ही कहते रहते हैं। देखो बच्चे, कल्प पहले भी ऐसे ही हुआ था कि माया ने बहुतों को गिराय दिया। आश्चर्य। ऐसे बाप को भी समझकरके कि हम बेहद के बाप से बेहद का वर्सा ले रहे हैं, सुप्रीम बाप पढ़ाते हैं, ये बात भी भूल जाते हैं। और घड़ी-घड़ी भूल करके; देखो कितनी पावर मिलती है। तीन पावर मिलती है। क्या? थ्री इन वन। एक में तीन इंजन। कौन-कौनसे तीन इंजन? हँ? ब्रह्माकुमार क्या समझेंगे? एक में तीन इंजन माना? हँ? इंजन। बाप भी है, टीचर भी है, सद्गुरु भी है। तीनों पार्ट अलग-अलग हैं ना।

A night class dated 9.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was - The fire of Yoga, which is famous in the scriptures, causes the alloy (khaad) to be removed. The remaining portion becomes true gold. When you become true gold, then you will fly because of being light. But dirt is bound to be added to everyone's soul. You have to definitely become tamopradhan because the Father has said that this entire tree of human world, this entire tree has become tamopradhan. And it has reached a dilapidated stage. So, children it is said for the entire tree, is not it? So, at this time all the religions etc. have been included in it. And all these branches and sub-branches, this tree is now going to shake, fall, and perish. And now? The sampling (sapling) of this new tree is also being grown. So, this sampling is grown in the Confluence Age. While growing, while growing when all those who belong to the deity religion, the Suryavanshis, the Chandravanshis get ready, when this sampling gets ready, then the war begins. So, as long as your establishment has not taken place, the war cannot break out. Later on the children require a new world. And the new world is also definitely bound to become old. The old becomes new. So, children have understood that people are satopradhan (pure) in the new world. And in the new world they are tamopradhan (degraded). When there are Suryavanshis, then the Chandravanshis are not present among the Suryavanshis. And when there are the Chandravanshis, then the Surayvanshis are not present. In the rajo and tamo stage there are Vaishyas and Shudravanshis respectively. The children have understood this firmly.

And there is not even any knowledge in these scriptures, etc. It is nowhere. And it is not even in this Gita. Yes, there is something good in the Gita, like a little salt in wheat flour. As regards Ramayana, etc. , look, it is like the salt. The Father sits and explains about them also. Now He Himself sits and explains that look, it is said in the Ramayana that He took the army of monkeys. Now you are become worthy of temples from monkeys, aren't you? So, you have to check yourself that is there any monkey like character in us. Are there any vices in us because these topics are sung in India. What? There are no virtues in me, the virtueless one. Hm? Why do they sing only in India? Hm? Do virtues emerge in people of other religions, in other countries? Hm? It is sung in India because you children who become very tamopradhan. The name itself is Rudramala. The rosary of those who assume a fierce form. They assume a dangerous form. So, what will be said? Nirgun means there is no virtue. What is everyone then? If there are no virtues, then what are they? Only vices. Otherwise, here in the period of ignorance, there are these Nirgun organizations as well. Nirgun organization. Well, if there are any virtueless organizations, then you can understand that they do not have any virtue. Nobody has any virtue (gun). These organizations just name themselves - Nirgun sanstha. And they cannot even understand these meanings.

The Father sits and explains all these topics to the children. And He also comes here near the ocean. Look, when they go there to the ocean, then there is solitude for the children on the beach, is not it? People go to the ocean on the beach for peace, don't they? So, look, this is also an ocean. It is an ocean of knowledge. It is like a beach here; there is peace. There is no disturbance here. You used to go in Karachi also. Where? To the ocean. You children used to go near the ocean to do tapasya (penance). There, you used to sit on the mound, on the mound of sand because the atmosphere remains good; there is peace there. So, this ocean of knowledge is also like this. Here, you can experience peace nicely, you can get a feeling. And there you will not get the feeling so much because there you will go to the center, you will keep on seeing the time, you are getting late, this happens. All these topics are there. Arey, many things will come to the mind. Someone must have died, someone must have been born, something will happen; that will come to the mind, will it not? Now here nobody can come to the mind in solitude. Why? It is because whoever sits here lives in peace. Where do they live? Those who live on the shores of the ocean of knowledge remain in peace. So, the atmosphere becomes one of peace. So, there when you remember someone in that world, generally your peace vanishes. Then this is numberwise as per your purusharth. Even in that case, the nice children who practice a lot can remain nicely in the Father's remembrance. And those who do not make purusharth, they keep on remembering someone to some extent or the other there.

Third page of the Vani dated 9.7.67. Daughters, who are mothers, leave their children [at home] and come. So, sometimes they [the children] will come to the mind. Children, remain in your stage of Sudarshan Chakradhari. Remain in the remembrance of how does this world cycle rotates or how the cycle of this drama rotates because children, those people performing a drama think that I am an actor of the drama. And the drama repeats in such and such hours. So, they go out. They shoot the drama. Then look, the cycle of that drama keeps on rotating. You will also play the same part that you are playing now here in practical. You will play it accurately. There will be no difference, not even a slight difference. In the past also it was sung - Aashcharyavat sunanti, kathanti, bhaaganti (People listen surprisingly, speak about it and then run away). Even now the Father keeps on saying like this. Look, children, it had happened like this Kalpa ago too that Maya had made many people to fall. Surprise. Even after realizing such Father that we are obtaining unlimited inheritance from the unlimited Father, the Supreme Father is teaching, you forget this topic also. And after forgetting every moment; look, you get so much power. You get three powers. What? Three in one. Three engines in one. Which three engines? Hm? What will the Brahmakumars think? What is meant by three engines in one? Hm? Engine. There is the Father, the Teacher, the Sadguru as well. All the three parts are separate, aren't they?
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 23 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2526, आडियो 3012, दिनांक 23.05.2018
VCD 2526, Audio 3012, Date 23.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.7.1967
VCD-2526-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.08
Time- 00.01-19.08

आज का प्रातः क्लास है 10.7.1967. सोमवार को रिकॉर्ड चला है ये कौन आया आज सवेरे सवेरे कि दिल चौंक उट्ठा सवेरे-सवेरे? ओमशांति। मीठे मीठे रूहानी बच्चों प्रति बाप बैठ करके समझाते हैं। और याद की युक्तियां बताय रहे हैं, समझाय रहे हैं। बैठे रहते हैं बच्चे। ये अंदर में ये कहते हैं कि शिवबाबा कुछ बोले। तो इंतजार करते बैठे रहते हैं ना। बाबा नहीं बोलते हैं और बैठ कर के यहां बैठ जाते हैं। तो अंदर के, अंदर से आवाज करेंगी यानी आत्मा कहेगी बैठकर के कि शिवबाबा कुछ बोलें। तो ये जो तुम अंदर से आवाज देते हो ये भी तुम्हारा शिवबाबा की याद हुई। तो ये भी नोट करना चाहिए। अच्छा बाबा, शिवबाबा एक, आधा घंटा नहीं बोलते हैं। और तुम बैठ करके अंदर में कि शिव बाबा कुछ बोलें। अंदर में रहता है। और जानते हैं कि शिव बाबा तन में विराजमान हैं। और आत्माएं कहती हैं कि कुछ बोलें। तो ये भी तुम्हारी याद की यात्रा का जो बल है वो मिल सकता है क्योंकि ये मदद देते हैं तुम बच्चों को। ये याद की मदद हुई ना कि बाबा कुछ बोलें।

अंदर में ये तो जानते हो मीठे बाबा कुछ बोलें, कुछ हमको ये ज्ञान रतन देवें। और बाप भी आते हैं तुम बच्चों को कुछ ज्ञान रतन देने। तो अभी उन ज्ञान रत्नों में पहला नंबर रतन क्या है? एक ज्ञान है ना बच्ची। जो कुछ भी बोलते हैं मनुष्य ज्ञान या अज्ञान, ये बाप जो कुछ भी बोलेंगे वो तो ज्ञान का सागर है ना बच्चे। तो ये बोलेंगे बच्चे देही अभिमानी हो करके बैठो। हँ? अव्वल नंबर का पहले नंबर का ज्ञान क्या हुआ? हँ? मैं आत्मा ज्योतिबिंदु हूँ, देह नहीं हूँ। ये हुआ आत्माभिमानी होकर बैठना। तो ये ज्ञान कहा। तो बाप कहेंगे कि बच्चे बाप को याद करो। ये ज्ञान हुआ ना। अपनी आत्मा को याद करो और जिस बाप से वर्सा लेना है उस बाप को याद करो। अच्छा, बाप कहते हैं कि बच्चे ये सीढ़ी के चक्कर को याद करो। इस सीढी में 84 का चक्कर है ना। सीढ़ियां हैं 84।

तो ये बात बुद्धि में है ये भी ज्ञान हुआ क्योंकि ये सब ज्ञान है ना। जो कुछ भी कहेंगे और जो कुछ भी समझाएंगे उसको ज्ञान कहेंगे। कहेंगे और समझाएंगे में क्या अंतर हुआ? हँ? हँ? कहना होता है और सुनना होता है। तो ये तो मुख से कहना हुआ और कान से सुनना हुआ। फिर समझाएंगे में क्या अंतर हुआ? समझ की बात तो बुद्धि से समझी जाती है ना। ऐसे थोड़े ही सिर्फ कान से सुन लिया, मुख से सुन लिया और सुनाए दिया। तो जो बात गहराई से समझाई जाती है तो वो बुद्धि की बात है। उसको भी ज्ञान कहेंगे ना। याद की भी यात्रा समझाते तो हैं ना। हँ? समझाते हैं कि सिर्फ सुनाते हैं? हँ? समझाते भी हैं और ज्ञान भी सुनाते हैं। तो हैं ये सभी रचना। चाहे सुनाएं और चाहे गहराई से समझाएं। उसमें भी बाप कहते हैं कि याद का जो रतन देते हैं अथवा समझाते हैं तो एक रतन ऐसे होते हैं जो याद के लिए ही देते हैं। याद के लिए बहुत अच्छे रतन होते हैं।

और फिर ये ज्ञान देते हैं कि अपने 84 जन्मों को याद करो क्योंकि 84 जन्मों को याद करेंगे तो ये याद आएगा कि अभी 84 जन्म पूरे हुए। अब क्या करना है? हँ? अब घर वापस जाना है। घर वापस जाना है। जब आए थे तब कैसे आए थे? और वापस जाएंगे तो कैसे जाएंगे? कहते हैं नंगे आए थे। शरीर रूपी वस्त्र लेके नहीं आए थे और जाएंगे तो भी? हँ? तो भी बाप क्या करेंगे? हँ? हां, यह कपड़ा उतरवाय देंगे। क्या? चलो, नंगे आए थे तो नंगे वापस जाना है। उन्होंने फिर भक्ति मार्ग में दिखाय दिया है कि कृष्ण क्या करते हैं? हँ? जब गोपियां स्नान करती हैं, ये भी ज्ञान स्नान है ना। तो उनसे कहते बाहर निकलो। हँ? तो वह कहती हैं कि अरे ऐसे कैसे निकलें? कपड़े हमारे कहां गए? हमारे कपड़े दे दो तो हम बाहर निकलें। तो ऐसी कथाएं बना दी हैं। कहते हैं कृष्ण भगवान गोपियों को नंगा करते थे। अब है ये देह रूपी वस्त्र की बात। नंगे आए थे माने पवित्र आत्मा आई थी, पवित्र आत्मा को वापस जाना है। क्योंकि अभी ये लास्ट जन्म है ना। अब आत्मा तो अपवित्र हो गई। तो अपवित्र आत्मा को तो जाना नहीं है।

अपवित्र किसे कहेंगे और पवित्र किसे कहेंगे? हँ? देह, देह के संबंधी, देह के पदार्थ याद आते हैं तो अपवित्र हैं। और? देह भी भूल जाए और देह के संबंधी भी भूल जाएं, पदार्थ भी भूल जाएं, कोई की भी दरकार ना रहे, तो कहेंगे आत्मा अब पवित्र हुई। तो अपवित्र को तो कोई वापस जाना नहीं है। तो सबको अभी वस्त्र याद आ रहा है या नहीं आ रहा है? वस्त्र याद आ रहा है। तो अपवित्र कोई नहीं वापस जाएंगे। नहीं। अभी पवित्र हो करके ही जाना है। जबकि कर्मातीत अवस्था में जाना है। ये भी परीक्षा। क्या? कर्मेन्द्रियों से कर्म करते रहें और कर्म करते हुए भी देह में बुद्धि न जाए, तो कहेंगे कर्मातीत अवस्था। कर्मेन्द्रियों में बुद्धि ना जाए तो कहेंगे कर्मातीत अवस्था।

तो ऐसी कर्मातीत अवस्था में जाएंगे तो फिर कोई पाप कर्म बनेगा नहीं और बाप से पूरा वर्सा लेंगे। पूरा माने? बाप है आत्मा। बाप को तो इंद्रियां है ही नहीं जैसे। तो पूरा वर्सा का मतलब क्या हुआ? हँ? अतींद्रिय सुख का वर्सा। जैसे बाप को इंद्रिया नहीं है तो बच्चों को भी इंद्रियों की महसूसता नहीं होनी चाहिए। तो उसे कहेंगे अतींद्रिय सुख का वर्सा, जो शास्त्रों में गाया हुआ है कि अतींद्रिय सुख की बात पूछनी हो तो गोप-गोपियों से पूछो। तो जब ऐसी स्टेज बनावेंगे तब ही पूरा वर्सा मिलेगा। तब क्या हो जाएगा? तब पूरा वर्सा मिलेगा जबकि आत्मा सतोप्रधान हो जाएगी। कैसे हो जाएगी? इस योग के द्वारा या याद बल के द्वारा। किससे योग लगा के? हँ? उसी से योग लगाके जिसकी यादगार मंदिर में रखी हुई है शिवालय में। इंद्रियां जैसे कि हैं ही नहीं। हँ? तो, इंद्रियां नहीं हैं? अरे, लिंग इंद्रिय नहीं है क्या? बाप तो कहते हैं ना मेरे तो लिंग की ही पूजा की जाती है। परंतु भले की जाती है लिंग की पूजा लेकिन पूजा पवित्र की की जाती है या अपवित्र की की जाती है? पवित्र की की जाती है। तो जरूर पूजा करते हैं और दुनिया में जितने भी देवताओं के मंदिर होते हैं और मूर्तियां होती हैं उनमें सबसे जास्ती मंदिर और मूर्तियां शिव की दिखाते हैं। खुदाईयों में भी शिवलिंग सबसे ज्यादा ही मिले हैं। इससे क्या साबित होता है? कि वो पवित्रता की स्टेज की यादगार है। क्या पवित्रता? कि इंद्रियों से कर्म करते हुए भी न इंद्रियों की याद रहती है ना देह की याद रहती है ना संबंध जिससे जोड़ा जाता है उसकी याद रहती है।

तो ये अक्षर बहुत वैल्युबल है। बिल्कुल ही वैल्यूबल। जो बाप समझाते हैं वो तो अच्छी तरह से नोट कर लेना चाहिए। हँ? कहां नोट कर लेना चाहिए? नोटबुक में? नहीं।
(किसी ने कुछ कहा।) हां। बुद्धि की जो नोटबुक है वो बुद्धि रूपी पॉकेट में रखी रहती है ना। उस आत्मा के अंदर अच्छी तरह नोट कर लेना चाहिए क्योंकि समझाया किसने? ये गहरी बातें बाबा, ये ब्रह्मा बाबा नहीं समझाते हैं। और समझाते किसको हैं? आत्माओं को समझाते हैं ना। तो जरूर आत्माओं के बाप ने समझाया। सुप्रीम टीचर भी तो है ना। और ये शरीर के तो आर्गन्स हैं। यह आर्गन्स तो मैटेरियल है। मैटर होता है ना। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। हँ? ये पांच तत्वों से बना हुआ शरीर और इसके मटेरियल से बनी हुई इंद्रियां। तो मैटेरियल तो एक जैसा दिखाई नहीं देता। हँ? दिखाई देता है? नहीं। विनाश हो जाता है। स्थाई तो रहता नहीं। तुम तो जानते हो आत्मा तो अविनाशी है। तो जो विनाशी चीज है उसे याद थोड़े ही किया जाता है। अविनाशी को याद करना है। अविनाशी आत्मा भी है, आत्माओं का बाप भी अविनाशी है। बाप से वर्सा लेना है आत्मा को।

Today's morning class is dated 10.7.1967. The record (song) played on Monday was - Ye kaun aaya aaj saverey-saverey ki dil chaunk uttha saverey-saverey? (Who has come early in the morning that my heart was astonished early in the morning?) Om Shanti. The Father sits and explains to the sweet-sweet, spiritual children. And He is telling, explaining the methods of remembrance. Children remain sitting. They say in their mind that ShivBaba should speak something. So, they keep on sitting, waiting, don't they? Baba does not speak and sit here. So, a sound emerges from inside, i.e. the soul will say while sitting that ShivBaba should speak something. So, the sound that emerges from inside is also like your remembrance of ShivBaba. So, you should note this also. Achcha, Baba, ShivBaba does not speak for one hour, half an hour. And you sit and think inside that ShivBaba should speak something. And you know that ShivBaba is present in the body. And the souls say that He should speak something. So, in this manner also you can get the power of the journey of your remembrance because this one helps you children. This is a help of remembrance that Baba should speak something.

You know inside that sweet Baba should speak something, He should give us these gems of knowledge. And the Father also comes to give you children some gems of knowledge. So, now what is the number one gem among those gems of knowledge? There is one knowledge, is not it daughter? Whatever human beings speak is either knowledge or ignorance; whatever this Father speaks; He is an ocean of knowledge, is not He children? So, He will say - Children, sit in soul conscious form. Hm? What is number one knowledge? Hm? I am a point of light soul; I am not a body. This is to sit in soul conscious form. So, this is called knowledge. So, the Father says - Children, remember the Father. This is knowledge, is not it? Remember your soul and the Father from whom you have to obtain the inheritance, remember that Father. Achcha, the Father says - Children, remember this cycle of ladder. There is a cycle of 84 in this ladder, is not it? There are 84 steps.

So, this topic is in the intellect; this is also knowledge because all this is knowledge is not it? Whatever He speaks and whatever He explains will be called knowledge. What is the difference between speaking and explaining? Hm? Hm? One speaks and one listens. So, this speaking takes place through the mouth and listening takes place through the ears. Then what is the difference in explaining? The topic to be understood is understood through the intellect, is not it? It is not as if you just listen through the ears, listen through the mouth and narrate. So, the topic that is explained deeply is a topic of intellect. That will also be called knowledge, will it not be? The journey of remembrance is also explained, is not it? Hm? Is it explained or just narrated? Hm? It is explained and the knowledge is also narrated. So, all these are creations. Whether they narrate and whether they explain deeply. Even in it the Father says - the gems of remembrance which He gives or explains, then one kind of gems are such that are given only for remembrance. There are many good gems for remembrance.

And then He gives the knowledge that you remember your 84 births because if you remember the 84 births, then it will come to your mind that the 84 births are now about to be over. What do you have to do now? Hm? Now you have to go back home. You have to go back home. How had you come when you had come? And how will you go when you go back? It is said that we had come naked. We had not brought the body like dress and even when we return? Hm? Even at that time, what will the Father do? Hm? Yes, He will make you remove this [body like] cloth. What? Come on, you had come naked, so you have to go back naked. They have then shown on the path of Bhakti that what did Krishna used to do? Hm? When the Gopis bathe; this is also a bath of knowledge, is not it? So, they are told to come out. Hm? So, they say - Arey, how can we come out like this? Where did our clothes go? Give us our clothes so that we could come out. So, such stories have been made. It is said that God Krishna used to disrobe the Gopis. Well, it is about this body like dress. We had come naked means that the soul had come in a pure form, the soul has to go back in a pure form because now this is the last birth, is not it? Now the soul has become impure. So, the impure soul is not supposed to go.

Who will be called impure and who will be called pure? Hm? If the body, the relatives of the body, the things related to the body come to the mind, then you are impure. And? If you forget the body also and if you forget the relatives of the body also, if you forget the things also, if there is no need for anything, then it will be said that the soul has now become pure. So, the impure one is not supposed to go back. So, is everyone remembering the cloth or not now? The cloth is coming to the mind. So, no impure ones will go back. No. Now you have to go only after becoming pure. You have to achieve the karmaateet stage. This is also a test. What? You should go on performing actions through the organs of action and despite performing actions the intellect should not be diverted towards the body, then it will be called a karmaateet stage. If the intellect does not go towards the organs of action, then it will be called karmaateet stage.

So, you will not accrue any sins if you achieve such karmaateet stage and you will obtain complete inheritance from the Father. What is meant by complete? The Father is a soul. It is as if the Father does not have organs at all. So, what is meant by complete inheritance? Hm? The inheritance of super sensuous joy. Just as the Father does not have any organs, the children should not have any feeling of organs either. So, that will be called the inheritance of super sensuous joy, which has been praised in the scriptures that if you wish to ask about the topic of super sensuous joy, then ask the Gop-Gopis. So, you get complete inheritance only when you develop such stage. What will happen after that? Then you will get complete inheritance when the soul becomes satopradhan. How will it become? Through this Yoga or through the power of remembrance. By having Yoga with whom? Hm? By having Yoga with the one whose memorial has been placed in the temple, in the temple of Shiv (Shivaalay). It is as if there are no organs at all. Hm? So, are there no organs? Arey, is there not the organ of ling? The Father says, doesn't He, that My ling alone is worshipped. But although the ling is worshipped, yet, is a pure thing worshipped or an impure thing worshipped? A pure thing is worshipped. So, definitely it is worshipped and among all the temples and idols of all the deities in the world, the maximum number of temples and idols are depicted to be those of Shiv. Even in the excavations the Shivlings have been found the most. What does it prove? That it is the memorial of the stage of purity. Which purity? That despite performing actions through the organs, neither is there any remembrance of the organs nor is there a remembrance of the body. Nor is there any remembrance of the one with whom a relationship is established.

So, this word is very valuable. It is indeed valuable. Whatever the Father explains should be noted very nicely. Hm? Where should you note? In the notebook? No.
(Someone said something.) Yes. The notebook of intellect remains in the pocket-like intellect, is not it? You should note it nicely in that soul because who explained? These deep topics are not explained by this Baba, this Brahma Baba. And who is given the explanation? The souls are explained, aren't they? So, definitely the Father of souls explained. He is also the Supreme Teacher, is not He? And these are the organs of the body. These organs are material. There is matter, is not it? The Earth, water, air, fire, sky. Hm? The body made up of these five elements and the organs made up of its material. So, material does not appear to be alike. Hm? Does it appear? No. It is destroyed. It does not remain forever. You know that the soul is imperishable. So, a perishable thing is not remembered. You should remember the imperishable. The soul is also imperishable; the Father of souls is also imperishable. The soul has to obtain inheritance from the Father.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 24 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2527, आडियो 3013, दिनांक 24.05.2018
VCD 2527, Audio 3013, Date 24.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.7.1967
VCD-2527-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.25
Time- 00.01-15.25

प्रातः क्लास चल रहा था - 10.7.1967. सोमवार को दूसरे पेज की तीसरी-चौथी लाइन में बात चल रही थी – सोने और जेवर का मिसाल बाबा ने दिया कि जैसा सोना होगा वैसा ही जेवर बनेगा। तो ऐसे ही आत्मा जितनी सतोप्रधान, रजोप्रधान, तमोप्रधान होगी वैसे ही शरीर का निर्माण होता है। तो ये समझने की बात है बच्चे। आजकल गवर्मेन्ट ने भी तुमको आँख खोल दी है कि 14 कैरट का अर्थात् सोना हलके जेवर का पहनो। उसमें अलॉय डालो क्योंकि अलॉय डालने से भाव कमती हो जाता है। ड्रामा प्लैन अनुसार सृष्टि का भी ऐसा ही तमोप्रधान टाइम चल रहा है। आत्माओं में दूसरे-दूसरे धर्मों के संग के रंग की खाद पड़ गई। अब आदमी की उतनी कीमत थोड़ेही है। देखा जाए तो जानवरों की कीमत ज्यादा हो गई। कुत्तों को देखो। कारों में घूमते हैं। हँ? एरोप्लेन में घूमते हैं। अरे, ए.सी. में पालना होती है। तो देखो, मनुष्य तो जानवर से भी बदतर हो गया। अभी मनुष्य की कीमत कम हो गई ना। देखो, ऐसे ही है। इस समय में देखो बहुत कमती है। ये तुम्हारी ये सोने की, आत्मा के लिए बाबा बोलते हैं बहुत कमती है। वहाँ नई दुनिया में देखो तुम जब सोने की चिडिया बनती हो, तो देखो कितना सब सोना ही सोना की थी। तो इस समय कलियुग में तो तुम्हारा भाव बहुत कम हो गया। कोई पूछने वाला नहीं। तमोप्रधान बन गए हो ना।

तो बाबा आत्मा की बात करते हैं। जैसे सोने में खाद पड़ती है, आत्मा में भी खाद पड़ती है। कौनसी खाद पड़ती है? हँ? नीच किसम की आत्माएं इस सृष्टि पर आती रहती हैं और उनके संग के रंग की खाद पड़ती रहती है। देखो, अब ये भारतवासी मनुष्य भी कोई काम के नहीं रहे। और वहाँ नई दुनिया में जब तुम रहेंगे, तो फिर प्योर बनके रहेंगे। तुम्हारा भाव बहुत ऊँचा हो जावेगा। और वहाँ तो कोई सोना वगैरा बिकता ही नहीं है। हँ? क्या? ये तो यहाँ इस दुनिया की बात है कि लोगों को बेच दिया जाता है। मनुष्यों को भी बेच दिया जाता है दास-दासी बनाकरके। वहाँ तो सोना बिकता ही नहीं। अब ये बातें बाबा नहीं करते। सोना और जेवर की बातें कौन करता है फिर? ब्रह्मा बाबा करते हैं। तो वैल्यू ही नहीं रही अभी तो। जब तुम्हारी आत्मा 9 कैरट की बन गई तो तुम्हारा जेवर, शरीर भी ऐसा ही। अभी सोने के जेवर की कोई वैल्यू नहीं, बिल्कुल ही वैल्यू नहीं है। कोई काम का नहीं। कितना अलॉय डालते रहते हैं। इसलिए अभी तुम्हारी बुद्धि में बैठ गया है कि आत्मा को जितना पवित्र बनाएंगे। कैसे बनाएंगे? हँ? ये जो देह बनी है ना तमोप्रधान, इस देह को भूल जाओ, देह के संबंधियों को भूल जाओ, पदार्थों को भूल जाओ। हँ? एक शिवबाबा दूसरा न कोई। और शिवबाबा तो प्योर सोना। और वो सबको मिलता थोड़ेही है।

तो ये ज्ञान कभी कोई दे ही नहीं सकता है। भल कहते हैं गीता में कि भगवान ने कहा था, फादर ने कहा था मनमनाभव, मध्याजीभव। हँ? परन्तु कोई नहीं जानते हैं कौनसे फादर ने कहा था। हँ? कोई को पता है? अपन को आत्मा ही नहीं समझते। तो कैसे जानेंगे आत्माओं के फादर ने कहा था? देखो गीता में तो नाम ही बदल दिया है। हँ? क्या नाम डाल दिया? अरे, उसका नाम डाल दिया जो जबसे इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाता है नई दुनिया में, तबसे नीचे गिरना शुरू हो जाता है। कौन? हँ? कौनसी आत्मा की बात हुई?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। ब्रह्मा बाबा वाली आत्मा, वो ही फिर जाकरके फिर कृष्ण बनेगी क्योंकि लम्बे समय तक ज्ञान की गहराइयों को तो पकड़ता ही नहीं। देहभान रह जाता है। बाप को जैसे याद ही नहीं करते। किसको याद करते हैं? हँ? निराकार को याद करते हैं। जैसे और धरमपिताएं निराकार को याद करते, वैसे ये भी याद करते। तो देखो, ये कमजोरी की शूटिंग हो जाती है आत्मा में। तो फिर गिरती कला की दुनिया में जन्म लेते हैं। बाप आए हैं तुमको चढ़ती कला में ले जाने के लिए। हँ? तो चढ़ती कला में जाना चाहिए ना। हँ? उसके लिए क्या करना पड़े? हँ? उसके लिए अपनी देह से, देह के संबंधियों से नफरत आनी चाहिए।

अभी तो तुमने पहचान लिया ना। शिवबाबा को जान लिया। ऊँच ते ऊँच बाप को पहचान लिया। तो अब तो बुद्धि में से बात निकल गई कि गीता का ज्ञान कृष्ण ने दिया। अभी तो तुमने गीता के भगवान का नाम ही बदल दिया। क्या नाम कर दिया? हँ? भक्तिमार्ग वालों ने कृष्ण का नाम डाल दिया। तुमने क्या नाम डाल दिया? हँ? गीता के भगवान का नाम शिवबाबा डाल दिया। शिव माना ज्योतिबिन्दु। उनकी बिन्दी का ही नाम शिव है। और बाबा माने कोई शरीर में मुकर्रर में प्रवेश करते हैं तो बाबा बनते हैं। तो वो बाबा कहते हैं मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। हँ? शिव को मन है क्या? शिव का तो कोई मन ही नहीं होता जो चंचल हो। और उनको तो सोच-विचार करने की दरकार ही नहीं। क्यों? क्योंकि त्रिकालदर्शी है। वो तो जन्म-मरण के चक्कर में ही नहीं आता है। चक्कर में न आने कारण उन्हें सब याद रहता है। बाकि ये थोड़ेही है कि सिर्फ निराकार शिव को याद करने से आत्मा सुधर जाएगी। पतित से पावन बन जाएगी। नहीं। पतित कैसे बने? हँ? पावन आत्मा पतितों के संग में आई तभी पतित बनी ना। तो प्रैक्टिस पड़ी हुई है ना। क्या? नीचे गिरने की प्रैक्टिस ढ़ाई हज़ार साल की जो पड़ी है, कैसे पड़ गई? और पहले भी, स्वर्ग में भी, नीचे गिरे, तो क्यों गिरे? क्योंकि जो नई-नई आत्माएं आती हैं, हँ, कम पावर वाली, उनके संग के रंग में आते-आते नीचे गिरे।

तो अभी सही बात बुद्धि में बैठी है। क्या? कि कौनसा फादर कहता है मनमनाभव? हँ? अभी बुद्धि में आ गया। क्या? कौनसा फादर कहता है मनमनाभव? जो मनुष्य सृष्टि का बाप है वो कहता है मनमनाभव। क्यों? क्यों कहता है? मनुष्य सृष्टि का बाप इस समय पतित है या पावन है? वो तो पतित है। वो क्यों कहता है? इसलिए कहता है कि शिव उसमें प्रवेश है मुकर्रर रूप से। तो ऐसे समझो तुम। कौन कहता है? शिवबाबा कहते हैं। हँ? माने शिव को नहीं निकालना है। शिव को अगर बाबा से अलग कर देंगे तो मुर्दा हो जाएगा। फिर कहते हैं मध्याजीभव। जो भी सेवा करें, जो भी कर्म करें वो मेरे लिए कर। हँ? उन्होंने तो यज्ञ का अर्थ लगाय लिया स्वाहा-स्वाहा। जाने क्या अनाज, घी, जाने क्या-क्या डालते रहते हैं। सब जला देते हैं। बर्बाद कर देते हैं। अरे, वो अनाज, वो घी डालने की बात नहीं है। ये तो कौनसा घी है? स्मृति का घी। हँ? योग अग्नि में डालो। क्या? योग किससे? जो ऊँच ते ऊँच बाप हमको मिला है उसके साथ योग। तो जिसका संग करेंगे मन-बुद्धि से वैसे ही बनेंगे।

A morning class dated 10.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third-fourth line of the second page on Monday was - Baba gave an example of gold and jewellery that the jewellery will be in accordance with the gold used. So, similarly, the more satopradhan, rajopradhan, tamopradhan a soul is, the formation of the body will be accordingly. So, this is a topic to be understood children. Now-a-days, the government has also opened your eyes that you should wear 14 carat gold, i.e. jewellery made up of cheaper gold. Add some alloy to it because when you add alloy, then its price decreases. As per the drama plan, the world is also going through a tamopradhan time. The alloy of the colour of company of other religions was added in the souls. Well, a person's value is not so much. If you observe, then the price of animals has increased. Look at the dogs. They move in cars. Hm? They move in aeroplanes. Arey, they are sustained in A.C. So, look, a human being has become worse than animals. Now the value of human beings has decreased, hasn't it? Look, it is like this only. Look, at this time, it is very less. At this time [the value of] your gold, Baba says for your soul that it is very less. Look, there in the new world when you become sparrows of gold, then look, there was so much gold everywhere. So, at this time in the Iron Age, your value has decreased a lot. There is nobody to ask for it. You have become tamopradhan, haven't you?

So, Baba speaks about the soul. Just as alloy is mixed in gold, alloy is mixed in the soul also. Which alloy is added? Hm? Low kind of souls keep on coming in this world and the alloy of the colour of their company keep on getting added. Look, now these Indian human beings are no longer of any use. And there, when you will be in the new world, then you will remain pure. Your value will rise very high. And there gold etc. is not sold at all. Hm? What? This is about this world here that people are sold. Human beings are also sold as servants and maids. There, gold is not sold at all. Well, Baba does not talk about these topics. Who then speaks about gold and jewelry? Brahma Baba talks. So, now there is no value. When your soul has become worth 9 carat then your jewellery, body is also like this only. Now there is no value of the golden jewellery. There is absolutely no value. It is of no use. So much alloy is added. This is why now it has sat in your intellect that the purer you make the soul. How will you make? Hm? Forget this tamopradhan body, forget the relatives of the body, forget the things [related to the body]. Hm? One ShivBaba and none else. And ShivBaba is pure gold. And everyone doesn't find Him.

So, nobody can ever give this knowledge at all. Although they say in the Gita that God had said, Father had said - Manmanaabhav, Madhyaajibhav. Hm? But nobody knows which Father had said. Hm? Does anyone know? They do not consider themselves to be a soul at all. So, how will they know that the Father of souls had said? Look, the name itself has been changed in the Gita. Hm? Which name has been inserted? Arey, the name of that person has been inserted who starts experiencing downfall ever since he starts playing his part in the new world on this world stage. Who? Hm? Which soul was mentioned?
(Someone said something.) Yes. The soul of Brahma Baba himself will become Krishna because he does not catch the depths of knowledge for a long time. Body consciousness remains. It is as if he doesn't remember the Father at all. Whom does he remember? Hm? He remembers the incorporeal. Just as other founders of religions remember the incorporeal, similarly, he too remembers. So, look, the shooting of this weakness takes place in the soul. So, then, he gets birth in the world of declining celestial degrees. The Father has come to take you to increasing celestial degrees. Hm? So, you should go to increasing celestial degrees, shouldn't you? Hm? What will you have to do for that? Hm? For that you should feel hatred for your body, the relatives of your body.

Now you have recognized, haven't you? You have known ShivBaba. You have recognized the highest on high Father. So, now the topic has been removed from the intellect that Krishna gave the knowledge of the Gita. Now you have changed the name of the God of Gita Himself. What is the name that you have given? Hm? The people on the path of Bhakti have inserted the name of Krishna. Which name have you inserted? Hm? You have inserted the name of the God of Gita as ShivBaba. Shiv means point of light. The name of His point itself is Shiv. And Baba means that when He enters in a body in a permanent manner, then He becomes Baba. So, that Baba says - Manmanaabhav. Merge into My mind. Hm? Does Shiv have a mind? Shiv does not have a mind to become inconstant. And He need not think at all. Why? It's because He is Trikaaldarshii (One who knows past, present and future). He does not pass through the cycle of birth and death at all. Because of not entering the cycle He remembers everything. But it is not as if your soul will reform, become pure from sinful by remembering just the incorporeal Shiv. No. How did you become sinful? Hm? A pure soul became sinful only when it came in the company of the sinful ones, did not it? So, you have practiced, haven't you? What? How did you practice downfall since 2500 years? And even earlier, even in heaven, when you underwent downfall, why did you fall? It is because the newer souls which come, with lesser power, you underwent downfall while being coloured by their company.

So, now the correct topic has sit in the intellect. What? That which Father says Manmanaabhav? Hm? It has come to the intellect now. What? Which Father says Manmanaabhav? The Father of the human world says Manmanaabhav. Why? Why does He say? Is the Father of the human world now sinful or pure? He is sinful. Why does he say? He says because Shiv has entered in him in a permanent manner. So, you think like this. Who says? ShivBaba says. Hm? It means that Shiv should not be removed. If you separate Shiv from Baba, then he will become a corpse. Then He says Madhyajibhav. Whatever service you render, whatever actions you perform, do it for Me. Hm? They have interpreted Yagya to be swaha-swaha (words uttered while making offerings in a Yagya). You don’t know what all they keep on putting in it like grains, ghee, etc.? They burn everything. They spoil it. Arey, it is not about putting that grain, that ghee. Which ghee is this? The ghee of remembrance. Hm? Put it in the fire of Yoga. What? Yoga with whom? Yoga with the highest on high Father whom we have found. So, you will become like the one whose company you keep through the mind and intellect.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 25 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2528, आडियो 3014, दिनांक 25.05.2018
VCD 2528, Audio 3014, Date 25.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.07.1967
VCD-2528-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.38
Time- 00.01-20.38

प्रातः क्लास चल रहा था - 10.7.1967. सोमवार को दूसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – देखो, कितना बैठकरके बाप समझाते हैं। और ये भी जानते हो बच्चे कि पढ़ाई में ये बहुत ही मेहनत चाहिए। कौनसी मेहनत? हँ? कौनसी मेहनत बताई? ज्ञान की गहराइयों को समझने की बहुत मेहनत चाहिए। एक तो ये मेहनत सिर्फ ये है कि अपनी जो आत्मा अपवित्र बन गई है वो सिवाय याद के तुम्हारी आत्मा पवित्र नहीं बन सकती। और याद करने के लिए कौन चाहिए, जिसकी याद से आत्मा पवित्र बन जाए? हँ? ऐसा चाहिए जो एवर प्योर हो, एवर प्योर दुनिया का वासी हो। कौन है? शिव बाप है एवर प्योर दुनिया का वासी, आत्मलोक का वासी। कहते हैं सुप्रीम एबोड। उससे ऊँचा धाम कोई होता नहीं। तो क्या सदा वहाँ का वासी है? हँ? अरे, नाम है सदा शिव तो सदा का वासी होना चाहिए ना। हँ? है? अरे? सदा का वासी है? नहीं? है? सदा वासी है? अच्छा? फिर ये पतित दुनिया में आने की क्या दरकार है जब सदाकाल के लिए पवित्र धाम का वासी है? हँ? क्योंकि पतित दुनिया को पावन बनाना ही उसका काम है।

तो पावन कैसे बनाता है? हँ? क्या चीज़ है उसके पास पावन बनाने की? हँ? जैसे सुनार होते हैं, सोने को पवित्र बनाते हैं, तो उनके पास क्या होता है जो पवित्र बनता है सोना? हँ? अरे, क्या होता है?
(किसी ने कुछ कहा।) अच्छा? सोनार लोगों के पास अखूट भण्डार होता है? काहे का अखूट भण्डार होता है? हँ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) ज्ञान का? सुनारों के पास? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) आग का भण्डार होता है? अच्छा? उनके पास आग का भण्डार होता है अखूट? हँ? हँ। बताया – योग से पवित्र बनती है आत्मा। हँ? तो एक होती है योगाग्नि। और एक होती है कामाग्नि। कामाग्नि से आत्मा अपवित्र बनती है। और योगाग्नि से पवित्र बनती है। कामाग्नि कहाँ से शुरु होती है? हँ? कहते हैं द्वापरयुग से जब इब्राहिम आया तो कामाग्नि की दुनिया शुरू हुई। उसके पहले तो योगाग्नि थी या कामाग्नि थी? क्या कहेंगे? हँ? उससे पहले कामाग्नि थी? वाह भई। उससे पहले देवात्माओं की दुनिया थी। वो तो हमेशा याद में ही रहते थे। हँ? थे तो भल शरीर। पाँच तत्वों का शरीर तो था। भले सात्विक तत्वों का था। लेकिन आत्मा थी ना। तो दोनों का योग रहता था। शरीरधारी आत्मा की स्मृति में रहता था। तो योगाग्नि थी या कामाग्नि थी देवताओं में? योगोग्नि थी।

फिर जबसे ये धरमपिताएं आए, दूसरे-दूसरे धरम के, वो तो आत्माभिमानी होते हैं कि काम, काम विकार को बढ़ाने वाले देह अभिमानी होते हैं? हँ? देह अभिमानी होते हैं ना। देह के अंगों को ज्यादा महत्व देते हैं ना। क्या? सुख लेने के लिए उन्हें आत्मिक स्थिति चाहिए या देह चाहिए, देह के अंग चाहिए? क्या है उनके लिए अनिवार्य अगर सुख भोगना है तो? हँ? देह। तो देह अभिमानी धरमपिताएं जबसे आए, उनके संग के रंग से देवात्माएं पतित बन गईं। ऐसे नहीं कि उससे पहले पतित नहीं बनी थी। लेकिन पता नहीं चलता था क्योंकि जैसे तराजू के दो पलड़े होते हैं ना। कौनसा भारी है, कौनसा हल्का है, ये कैसे पता चलता है? एक पलड़ा नीचे बैठ जाता है या थोड़ा नीचे होता है तो समझते हैं ये भारी है। और दूसरा वाला हलका।

तो योगाग्नि जिनमें थी देवात्माओं में, आत्मिक स्मृति में पक्के थे वो योगाग्नि उनकी हलकी हो गई। पलड़ा हल्का हो गया। और देह अभिमानियों के संग में आने से; पहला-पहला धरमपिता कौन आया? इब्राहिम। बस। देहभान बढ़ गया। पहले किसका बढ़ता है देहभान? कोई तो मुखिया होना चाहिए शुरुआत करने वाला। हँ? अरे! कोई होता है या नहीं होता है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) पहले-पहले आदम? वाह। उसमें देहभान आता है? अच्छा। मुसलमान लोग तो कहते हैं कि आदम और हव्वा को अल्ला मियाँ ने जन्नत में भेजा। ताकीद कर दिया था कि ऐसे नहीं करना। तो उन्होंने वैसे ही कर दिया। आप तो घड़ी-घड़ी बदल जाते हैं। तो हव्वा की नीयत खराब हो गई। हँ? सगं के रंग में आके नीयत खराब हुई कि ऐसे ही? हँ? संग के रंग मे आने से नीयत (खराब हुई)। किसके संग के रंग में नीयत आने से खराब हुई? हँ? माया। माया बेटी है ना। बेटी कहते हैं ना माया को। माया बेटी में ज्यादा पावर होती है। और, और प्रकृति माता में कम पावर होती है क्या? हँ? प्रकृति, जो सारे जगत की माता है, सारा जगत प्रकृति के वशीभूत होता है, तो वो कम पावरफुल होती है? हँ? हाँ। बहुत बच्चे पैदा करती है ना। माता है ना बड़े ते बड़ी। तो कमजोर हो जाती है। बुद्धि कमजोर हो जाती है। और जो पहली बच्ची पैदा हुई उसका नाम है माया बेटी। तो माया बेटी जो है पवित्र बुद्धि होगी माँ के मुकाबले या अपवित्र बुद्धि होगी? हँ? पवित्र बुद्धि होती है।

तो वहाँ तो पवित्र बुद्धि होती है। सतयुग, त्रेता में, स्वर्ग में, देवताओं की पवित्र बुद्धि होती है। फिर द्वापर में ऐसा क्या हो जाता है जो अपवित्र हो जाती है? हँ? क्योंकि वो माया बेटी, जब इस सृष्टि पर देवात्माएं उतरती हैं, तो ऊपर से आने वाली आत्मा पावरफुल को पकड़ेगी या कमजोर को पकड़ेगी? हँ? क्या? ऊँच ते ऊँच बाप को जरूर ऊँच ते ऊँच में प्रवेश करना पड़े। नियम बना दिया। क्या? जितनी ऊँची आत्मा होगी उतनी शक्तिशाली में प्रवेश करेगी। तो बताओ पवित्रता की पावर में ज्यादा शक्तिशाली कौन हुई? हँ? जो बाप से भी टक्कर ले लेती है। परमपिता से भी टक्कर ले लेती है।
(किसी ने कुछ कहा।) नहीं। माया बेटी टक्कर लेती है। तो माया बेटी को जब इब्राहिम कैप्चर कर लेता है, तो माया बेटी कहती है मेरे में ज्यादा पावर होनी चाहिए। तो वो परमपिता के परिवार को ध्वस्त करने की सोचती है। क्या? मैं दुनिया का मालिक बनूंगी, कंट्रोलर बनूंगी। हँ? जो परिवार है दुनिया का उसका कंट्रोलर कमजोर को बनना चाहिए या पावरफुल को बनना चाहिए? हँ? किसको बनना चाहिए? पावरफुल को बनना चाहिए। तो माया बेटी को क्या उस समय बाप याद रहता है? हँ? बाप तो याद नहीं रहता। कि बाप भी कोई है इस मनुष्य सृष्टि का। वो तो पता ही नहीं चलता है। द्वापर में भी नहीं, कलियुग में भी नहीं, सतयुग में भी नहीं, त्रेता में भी नहीं कि मनुष्य सृष्टि का मुखिया, बड़े ते बड़ा हीरो पार्टधारी कौन है, ये तो किसी को पता नहीं रहता। तो बस वो चाल चलती है। क्या? जो माता है इस मनुष्य सृष्टि में, द्वैतवादी द्वापरयुग आते-आते उस माता को हाथ कर लेती है। माने हाथ मिलाय लेती है। हँ?

ये हाथ मिलाने की जो परंपरा है वो कहाँ से शुरू हुई? हँ? ये माया बेटी जो है ना ये बुद्धि रूपी हाथ मिलाती है। हँ? कहाँ से शुरुआत करती है? हँ? वो किससे बुद्धि रूपी हाथ मिलाती है? हँ? श्रीमत पर चलने वालों से हाथ मिलाती है या श्रीमत पर न चलने वालों पर हाथ मिलाती है? हँ? कोई भी हो। उसको तो डायरेक्शन मिला हुआ था डायरेक्टर का। क्या? जो श्रीमत पर नहीं चलते हैं, क्या करो? हँ? उनको खूब फथकाओ। तो वो बुद्धियोग से ही फथकाएगी। और श्रीमत पर न चलने वालों में अव्वल नंबर किसको कहें? और श्रीमत क्या है? श्रीमत क्या है? अव्वल नंबर श्रीमत क्या है? वो ही नहीं पता। अव्वल नंबर श्रीमत है पवित्रता। अव्वल नंबर श्रीमत है अपन को आत्मा समझो। क्या? पहली-पहली श्रीमत क्या है? अपन को; पहली पढ़ाई है। तो जो प्रकृति है वो तो पांच तत्वों का संघात है, पांच तत्व जड़ हैं या चैतन्य हैं? हँ? जड़त्वमयी हैं ना। तो प्रकृति जो स्वरूप है वो जड बुद्धि है। इसीलिए आत्मिक स्वरूप को सबसे पहले भूल जाती है। क्या? और देहभानी सबसे जास्ती होने के कारण शक्ति क्षीण हो जाती है आत्मा की या बनी रहती है? क्षीण हो जाती है। तो कमजोर देख करके माया उस प्रकृति माता को हाथ कर लेती है।

तो बताया, अब किससे योग लगाएंगे? ये तो बताय दिया कि माया क्या है? हँ? माया है कमजोरी। क्या? ऊपर से आने वाले धरमपिताएं भले पावरफुल आत्माएँ उतरती हैं परमधाम से, लेकिन कोई में भी प्रवेश कर सकती हैं क्या? कोई में भी? कोई को भी कैप्चर कर सकती हैं क्या? नहीं। जो कमजोर होगा उसी को कैप्चर करेंगी ना। हँ? और ये भी देखेगा कि मेरे टक्कर की है कि नहीं? तो किस बात में कमजोरी देखी और किस बात में पावरफुल देखी? हँ? क्योंकि देहभान की कमजोरी ही देखेगी आत्मा या अपने समान पावरफुल आत्मा को भी देखेगी?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। तो अब सवाल ये है कि जो पांच विकारों का संघात है जिसे माया कहा जाता है उससे योग लगाना है, प्रकृति से योग लगाना है, जो पांच तत्वों का संघात है या कोई और है इन दोनों को कंट्रोल करने वाला, उससे योग लगाना है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। नहीं। द्वापर कलियुग में तो सब अज्ञानी होते हैं क्योंकि मुख से कहते हैं शिवबाबा-शिवबाबा भारत में खास। लेकिन जिसको शिवबाबा कहते हैं उसको जानते हैं वो क्या है? हँ? एक है कि दो है? एक शरीर है कि दो शरीर हैं? एक आत्मा है कि दो आत्माएं हैं? कुछ जानते हैं? कुछ भी नहीं जानते हैं। तो वो तो जब आएगा; मुसलमान उसका नाम ही देते हैं खुदा। जब वो खुद आएगा। बुलाने से तो आता नहीं। सभी मुसलमान 4-5 बार दिन में बुलाते रहते हैं, याद करते रहते हैं। तो वो बुलाने से नहीं आता है। जब आता है तो खुद आता है। और कब आता है? जब ये सारी दुनिया देह अभिमानी धरमपिताओं से अच्छे से प्रभावित हो जाती है, खास भारतवासी, तब आता है।

A morning class dated 10.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle of the second page on Monday was - Look, the Father sits and explains so much. And children, you also know that the hard work that you need to put in studies. Which hard work? Hm? Which hard work was mentioned? You need to work very hard to understand the depths of knowledge. One hard work is just that your soul which has become impure cannot become pure except through remembrance. And who is required for remembrance, the one through whose remembrance the soul becomes pure? Hm? Such a person is required who is ever pure, a resident of a pure world. Who is it? Father Shiv is the resident of the ever pure world, the resident of the Soul World. It is called the Supreme Abode. There is no abode higher than it. So, is He a resident of that place forever? Hm? Arey, when the name is Sadaashiv, then He should be a resident forever, shouldn't He? Hm? Is He? Arey? Is He a resident forever? Is He not? Is He? Is He a resident forever? Achcha? Then where is the need for Him to come to this sinful world when He is a resident of the pure abode forever? Hm? It is because His task is only to purify the sinful world.

So, how does He make you pure? Hm? What does He have to make you pure? Hm? For example, there are goldsmiths, they purify the gold; so, what do they have to make the gold pure? Arey, what do they have?
(Someone said something.) Achcha? Do the goldsmiths have inexhaustible stock? They have an inexhaustible stock of what? Hm? Hm? (Someone said something.) Of knowledge? With the goldsmiths? Hm? (Someone said something.) Do they have a store of fire? Achcha? Do they have an inexhaustible storehouse of fire? Hm? Hm. It was told - The soul becomes pure through Yoga. Hm? So, one is the fire of Yoga. And one is the fire of lust. The soul becomes impure through the fire of lust. And it becomes pure through the fire of Yoga. Where does the fire of lust start? Hm? It is said that ever since Ibrahim came in the Copper Age, the world of fire of lust started. Before that, was there the fire of Yoga or the fire of lust? What will be said? Hm? Was there fire of lust before that? Wow brother! There was a world of deity souls before that. They used to remain in remembrance always. Hm? They were bodies. There was a body made up of the five elements. Although it was made up of pure elements. But there was a soul, wasn't it? So, there used to be a Yoga of both of them. The holder of the body used to remain in the remembrance of the soul. So, was there the fire of Yoga or the fire of lust in the deities? There was the fire of Yoga.

Then, ever since these founders of other religions came, are they soul conscious or are they body conscious who increase lust, the vice of lust? Hm? They are body conscious, aren't they? They give more importance to the organs of the body, don't they? What? Do they require soul conscious stage to derive happiness or do they require body, the organs of the body? What is compulsory for them to experience pleasures? Hm? The body. So, ever since the body conscious founders of religions came, the deity souls became sinful through the colour of their company. It is not as if they had not become sinful before that. But it was not discernible because just as there are two pans (paldey) of a balance (taraazu). How will you know as to which one is heavy, which one is light? When one pan goes down or goes down slightly, then you think that this is heavy. And the other one is light.

So, the deity souls, who had the fire of Yoga and were firm in soul consciousness, their fire of Yoga became weak. The pan became lighter. And by coming in the company of the body conscious ones; which founder of religion came first? Ibrahim. That is all. The body consciousness increased. Whose body consciousness increases first? There should be a head who starts it. Hm? Arey! Is there anyone or not? Hm? (Someone said something.) First of all Aadam? Wow! Does he become body conscious? Achcha. Muslims say that Allah Miyaan sent Aadam and Havva to Jannat (heaven). He had cautioned them that you should not do like this. So, they did exactly that. You change every moment. So, Havva developed bad intentions. Hm? Did her intentions become bad on being coloured by company or simply like that? Hm? The intentions became bad on being coloured by company. The intentions became bad on being coloured by whose company? Hm? Maya. Maya is a daughter, is not she? Maya is called a daughter, is not she? Daughter Maya has more power. And, and does Mother Nature have lesser power? Hm? Nature (Prakriti), who is the mother of the entire world, the entire world is subservient to the nature, so, is she less powerful? Hm? Yes. She gives birth to a lot of children, doesn't she? She is the biggest mother. So, she becomes weak. The intellect becomes weak. And the name of the first daughter born is daughter Maya. So, will daughter Maya have a purer intellect when compared to the mother or will she have an impure intellect? Hm? She has a pure intellect.

So, there the intellect is pure. The intellect of deities is pure in the Golden Age, Silver Age, in heaven. Then what happens in the Copper Age that it becomes impure? Hm? It is because that daughter Maya; when the deity souls descend on this world, then will the soul coming from above catch a powerful one or a weak one? What? The highest on high Father will have to enter in the highest on high. A rule was framed. What? The higher a soul is, the more powerful one it will enter. So, tell, who is more powerful in terms of power of purity? Hm? The one who clashes even with the Father. She confronts even the Supreme Father.
(Someone said something.) No. Daughter Maya confronts. So, when daughter Maya captures Ibrahim, then daughter Maya says - I should have more power. So, she thinks of destroying the family of the Supreme Father. What? I will become the master, controller of the world. Hm? Should the controller of the family of the world be a weak one or a powerful one? Hm? Who should become? The powerful one should become. So, does daughter Maya remember the Father at that time? Hm? She does not remember the Father that there is a Father of this human world. That cannot be known at all. Not even in the Copper Age, not even in the Iron Age, not even in the Golden Age, not even in the Silver Age that who is the chief of the human world, the biggest hero actor; nobody knows this. So, she plays a trick. What? She joins hands with the mother in this human world when the dualistic Copper Age starts. It means that she joins hands. Hm?

Where did this tradition of joining hands start? Hm? This daughter Maya joins intellect-like hand. Hm? Where does she make a beginning? Hm? With whom does she join her intellect like hand? Hm? Does she join hand with those who follow Shrimat or does she join hand with those who don't follow Shrimat? Hm? Be it anyone. She had received the direction of the Director. What? What should you do with those who do not follow the Shrimat? Shake them a lot. So, she will shake with the connection of intellect (buddhiyog) only. And who will be called number one among those who don't follow Shrimat? And what is Shrimat? What is Shrimat? What is number one Shrimat? You don't know that at all. The number one Shrimat is purity. The number one Shrimat is to consider oneself as a soul. What? What is the first and foremost Shrimat? Yourself; First is the studies. So, nature (prakriti) is the combination of five elements; are the five elements non-living or living? Hm? They are non-living, aren't they? So, the form of nature is inert intellect. This is why she forgets the spiritual form first of all. What? And because of being most body conscious, does the power of the soul reduce or does it remain intact? It becomes weak. So, on seeing her to be weak, Maya controls that Mother Nature.

So, it was told; with whom will you have Yoga now? It was told that what is Maya? Hm? Maya is weakness. What? Although the founders of religions who come from above are powerful souls descending from the Supreme Abode, but can they enter in anyone? In anyone? Can they capture anyone? No. They will capture only the one who is weak, will they not? Hm? And it will also see whether this one is equally powerful or not? So, in which aspect did she see weakness and in which aspect did she see powerful? Hm? It is because will the soul see only the weakness of body consciousness or will it also see a soul which is powerful like it?
(Someone said something.) Yes. So, now the question is that should we have Yoga with the combination of five vices, which is called Maya, should we have Yoga with nature, which is the combination of five elements or should we have Yoga with anyone else who controls both of them? Hm? (Someone said something.) Yes. No. Everyone is ignorant in the Copper Age and Iron Age because they utter 'ShivBaba, ShivBaba' through their mouths, especially in India. But do they know the one who is called ShivBaba as to what He is? Hm? Is He one or are they two? Is it one body or two bodies? Is it one soul or two souls? Do they know anything? They do not know anything. So, when He comes; Muslims name Him Khuda. When He comes Himself. He does not come on being called. All the Muslims keep on calling 4-5 times in a day; they keep on remembering Him. So, He does not come on being called. Whenever He comes, He comes on His own. And when does He come? He comes when this entire world, especially the residents of India become nicely influenced by the body conscious founders of religions.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2529, आडियो 3015, दिनांक 26.05.2018
VCD 2529, Audio 3015, Date 26.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.7.1967
VCD-2529-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.35
Time- 00.01-16.35


ओमशान्ति। आज की प्रातः क्लास चल रही थी - 10.7.1967. सोमवार को दूसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी, याद की बात चल रही थी – याद नहीं करेंगे अर्थात् योग नहीं लगावेंगे; किससे योग? बाप से योग नहीं लगावेंगे, लगाव नहीं लगावेंगे, तो योगाग्नि प्रज्वलित नहीं होगी। पुराने जमाने में आग प्रज्वलित करने के लिए क्या करते थे? दो लकड़ियों को घिसते थे। एक-दूसरे के ऊपर रख करके और उसकी लकड़ी के घिसने से आग पैदा हो जाती थी। तो ये भी याद का रहस्य है। हँ? लक्कडबुद्धि की तो बात हो सकती है कि कोई लक्कडबुद्धि, पत्थरबुद्धि आत्मा है परन्तु शिव बाप तो उसे ज्ञान देकरके पारसबुद्धि बनाते हैं ना। हँ? तो जिसको पारसबुद्धि बनाते हैं अव्वल नंबर में, वो आत्मा में शिव बाप की याद की पावर समाय जाती है। कैसी पावर? शिव भी ज्योतिबिन्दु और वो पत्थरबुद्धि बनी हुई आत्मा भी ज्योतिबिन्दु। और बिन्दु, बिन्दु से घिसेंगे तो जैसे लकड़ी, लकड़ी में घिसते हैं तो आग पैदा हो जाती है, ऐसे बिन्दु बिन्दु को घिसा तो आग पैदा हो गई। योगाग्नि कहते हैं उसको।

अब जो लक्कडबुद्धि है; लकड़ी तो जल जाएगी। क्या? मान लो पत्थरबुद्धि है, तो पत्थर का क्या होगा? हँ? पत्थर को आग में डालेंगे तो क्या होगा? तेज अग्नि में डालेंगे तो क्या होगा? हँ? लावा बन जाता है पत्थर। जैसे भूकम्प बड़े-बड़े आते हैं ना विनाशकाल में। और अभी भी। तो जो धरती के अन्दर है, पत्थर, मिट्टी नहीं है, आग भरी हुई है। अग्नि प्रज्वलित हो रही है। क्या? किसके अन्दर? धरणी माता के अन्दर। वो ज्वाला देवी बनी हुई है। क्या? वो अन्दर जो पत्थर हो, मिट्टी हो, कुछ भी हो, वो सब लावा बन जाएगा। और लावा तो बहुत तेज अग्नि होती है। हँ? हाँ। पत्थरबुद्धि आत्मा भी अग्नि बन जाती है। इसलिए जो शिवलिंग सात्विक यादगार बनाई गई थी द्वापर के आदि में वो लाल पत्थर का दिखाया जाता है। हँ? पीले पत्थर भी तो होते हैं। सफेद पत्थर भी तो होते हैं। लाल पत्थर का क्यों दिखाया गया? इसीलिए दिखाया गया कि लोग समझें कि कोई पत्थरबुद्धि आत्मा है तो क्या बन जाती है? लाल अंगारा बन जाती है, अग्नि की तरह। और उस अग्नि को जो याद करेंगे; लिंग क्या हुआ? जो लाल पत्थर का लिंग है वो क्या है? शिवलिंग है? शिव को लिंग होता है क्या? शिव को तो होता ही नहीं। वो जिसमें प्रवेश करता है उसको इन्द्रियाँ होती हैं। तो वो कामेन्द्रिय को जीतना मुश्किल होता है। कामजीते जगतजीत कहा जाता है। ऐसे थोड़ेही कहा जाता है क्रोधजीते जगतजीत। लोभजीते जगतजीत। नहीं। कामेन्द्रिय जीते, इन्द्रिय जीते जगतजीत। तो कामेन्द्रिय की बात है।

तो शिव की तो बात है ही नहीं। वो तो इन्द्रियाँ और देह धारण ही नहीं करता। इस पतित दुनिया में, पतित तन में प्रवेश करता है तो भी धारण नहीं करता। हाँ, जिसमें प्रवेश करता है वो आत्मा संग करते-करते इस सृष्टि में नीचे गिरती जाती है। भले धीमी गति से नीचे गिरती है, तो भी एक टाइम ऐसा आता है कि वो आत्मा चैतन्यता से नीचे गिर जाती है। पत्थर को चैतन्य कहेंगे? पत्थर तो चैतन्य नहीं है। तो एकदम पत्थरबुद्धि बन जाती है। और उस पत्थरबुद्धि में जब शिवबाप आते हैं, ये ज्ञान देते हैं; क्या? कि तुम मिट्टी नहीं हो, पत्थर नहीं हो; तुम क्या हो? तुम तो चैतन्य ज्योतिबिन्दु आत्मा हो। हँ? तो वो जब पहचान मिलती है। किसके द्वारा? हँ? उसको पहचान किसके द्वारा मिलेगी? शिव अन्दर प्रवेश करता है तो वो बताता है? हँ? कैसे पहचान मिलेगी? कहते हैं शिव तो प्रवेश करता है पत्थरबुद्धि में ही, लेकिन वो पत्थरबुद्धि आत्मा जल्दी तो नहीं समझेगी।

तो, अरे, मुरलियाँ कहाँ से आईं? ब्रह्मा के मुख से आईं ना। वो कौनसा ब्रह्मा? शास्त्रों में तो दिखाते हैं ब्रह्मा के चार मुख, पाँच मुख। तो जरूर जिसमें भी प्रवेश करते हैं शिवज्योतिबिन्दु निराकार, उसका नाम ब्रह्मा रखते हैं। तो नंबरवार होंगे ना। तो आखरीन, जो ब्रह्मा रह जाता है और उसके मुख से जो वाणी निकलती है उसे वेदवाणी कहा जाता है। तो वो वेदवाणी ही वास्तव में मुरली कही जाती है। आज की दुनिया में कोई वेदवाणी पढ़ता है? पढ़ता ही नहीं। क्यों नहीं पढ़ता?
(किसी ने कुछ कहा।) नहीं। हाँ। बुद्धि में कुछ बैठती नहीं। उनको बुद्धि में नहीं बैठती है जिन्होंने मंथन कर लिया। मुरलियों की बातों को जो सुना, जो वेदों की बातें सुनीं, उन बातों पर गहराई से मंथन हुआ। कहते हैं बाद में जो मंथन हुआ उससे वेदों की व्याख्याएं निकलीं। आरण्यक निकले, ब्राह्मण बने, शतपथ ब्राह्मण, आदि ग्रंथ बने। फिर पुराण बने। बड़े-बड़े, छोटे-छोटे ढ़ेर के ढेर पुराण बने। उपनिषद बने। तो वो जो विस्तार हुआ ना वेदों की ऋचाओं का, तो उस विस्तार से आदमी की बुद्धि विशाल बनेगी या संकुचित बनेगी? कैसी बनेगी? विशाल बुद्धि बनती है। लेकिन ये बात है उस समय की जिस समय धरमपिताएं दूसरे-दूसरे धरम के देहअभिमानी इस सृष्टि पर आ जाते हैं। तो बुद्धि तो विशाल बनती है लेकिन देहअभिमान उसमें मिक्स हो जाता है तो बुद्धि सात्विक बनेगी या तामसी बनती है? तामसी बुद्धि बनती है। किसकी सबसे जास्ती तामसी बनेगी? हँ? जो ज्यादा से ज्यादा लोगों के संसर्ग-संपर्क में आएगा, उसकी बुद्धि ज्यादा तामसी बनेगी। वो ही आत्मा जो मनुष्य सृष्टि का बीज है, बाप है, आत्माओं का बाप नहीं, मनुष्य सृष्टि का बीज, वो है जिसमें शिव आते हैं।

कहते हैं शिव भारत में आते हैं। तो उन्होंने समझ लिया शिव कोई जड़ जमीन में आते हैं भारत। ऐसे थोड़ेही है। हँ? तो उन लोगों ने तो, मनुष्यों ने तो विकारी बुद्धि होने से देखो क्या-क्या समझ लिया? जड़ जमीन में भगवान आते हैं। हँ? पत्थर ठिक्कर में भी ठोंक दिया। जानवरों में ठोंक दिया। माछलियों में ठोंक दिया। भगवान आते हैं। अरे, ऐसे थोड़ेही है। मनुष्य में ही आवेंगे ना। लेकिन मनुष्य उसमें आवेंगे जो दूसरों के बुद्धि के संग के रंग में आते-आते उसकी अपनी बुद्धि काम ही नहीं करती। संसार में सबकी बुद्धि में बैठ गया आत्मा सो परमात्मा। शिवोहम्, ब्रह्मा अस्मि। अपने को ही सब कुछ समझ लिया। ऐसे ही उस आत्मा की भी बुद्धि में यही बैठता है। क्या? जो मनुष्य सृष्टि का बीज है, ये पक्का हो जाता है। वो तो हर बात में आगे जाएगी ना। ज्यादा पक्का हो गया कि क्या? आत्मा सो परमात्मा। शिवोहम्। तो उसको क्या कहेंगे? पत्थरबुद्धि कहेंगे टोटल या सोच-विचार करने वाली कहेंगे? हँ? सोच-विचार तो कुछ भी नहीं चलता। जैसा सुना दिया वैसा सुन लिया। तो बाप कहते हैं जब ऐसी आत्मा जो इस मनुष्य सृष्टि का बीज है, जिसमें मैं आता हूँ, नाम ब्रह्मा देता हूँ, पहला ब्रह्मा महतब्रह्म, परमब्रह्म, वो आत्मा भी पहले कुछ समझ नहीं सकती। हाँ, फिर जिन-जिन बच्चों में प्रवेश करता है और उनका नाम रखता है ब्रह्मा; क्या?

तो बताया, ब्रह्मा सो ही विष्णु बनते हैं। तो जो चार भुजाएं दिखाई जाती हैं, वो ब्रह्मा की चार सहयोगी भुजाएं हैं। किसकी? परमब्रह्म की। वो परमब्रह्म वो संपन्न तब बने, कहते हैं शास्त्रों में उसका मुख ही काट दिया। क्या? ब्रह्मा का मुख चार दिशाओं में चार तरफ मुख चार। और एक ऊपर की तरफ। लेकिन जो ऊपर वाला मुख है वो वेदों की ग्लानि करने लगा। वेदों से सत्यानाश हुआ है। वेदों से कर्मकाण्ड निकले हैं। इन कर्मकाण्डों ने सत्यानाश कर दिया, सारी दुनिया बर्बाद हो गई। ये ब्रह्मा ऐसा ही है, वैसा ही है, कैसा ही है। तो उऩ्होंने क्या समझ लिया कि शंकर ही शिव है। शिव शंकर को एक मान लिया। तो शंकरजी गुस्से में आके उसका सर उड़ाय देते हैं। अब दुनिया को तो ये पता नहीं है कि शंकर नाम से ही साबित होता है मिक्स। कैसा-कैसा मिक्स? एक तो वो पत्थरबुद्धि आत्मा जिसका अपना कुछ मनन-चिंतन-मंथन चलता ही नहीं लास्ट में। दूसरी, जो द्वापर की आदि में इतना मनन-चिंतन-मंथन वाला था; क्या नाम था? हँ? महर्षियों में सबसे ऊँचा माना जाता है। व्यास। क्या? वो ही लास्ट कलियुग में आकरके एकदम पत्थरबुद्धि बन जाता है। दूसरों से प्रभावित होते-4. तो वो तो पहला ब्रह्मा हुआ लेकिन फिर और नंबरवार जो ब्रह्मा के पार्ट बजाने वाली आत्माएं हैं वो भी पार्ट बजाती हैं और पार्ट बजाते-बजाते टाइम पूरा होता है। हर चीज़ का तो टाइम होता है अपना। तो लास्ट जो ब्रह्मा है; क्या? जो सुनी-सुनाई बातों पर एकदम, बहुत श्रुति। क्योंकि श्रुतियां तो उसी के मुख से निकली थीं। जिस ब्रह्मा के मुख से श्रुतियाँ माना वेद निकले थे वो ही ब्रह्मा वाली आत्मा अंत में आकरके पांचवाँ मुख बनती है। और उस पाँचवें मुख से फिर वेद फिर निकलते हैं। जो आदि में हुआ सो अंत में होता है। और वो वेदवाणी को ही कहा जाता है मुरली।

Om Shanti. The morning class being narrated today is dated 10.7.1967. The topic being discussed in the end of the middle portion of the second page on Monday was; a topic of remembrance was being narrated - If you do not remember, i.e. if you do not have Yoga; Yoga with whom? If you do not have Yoga with the Father, if you do not develop attachment for Him, then the fire of Yoga will not be ignited. What did people used to do to ignite fire in the olden days? They used to rub two sticks. They used to keep one over the other and by the rubbing of that stick, fire used to emerge. So, this is also a secret of remembrance. Hm? It could be a topic of a person with wood-like intellect (lakkadbuddhi) that there is a soul with wood-like intellect, stone-like intellect (pattharbuddhi), but Father Shiv gives him knowledge and makes him elixir-like intellect (paarasbuddhi), doesn't He? Hm? So, the one who is made number one Paarasbuddhi, that soul assimilates the power of remembrance of Father Shiv. What kind of power? Shiv is also a point of light and that soul which has become stone-like intellect is also a point of light. And if you rub a point with a point, then just as when you rub a stick with a stick, then fire emerges, similarly, when you rub a point with a point, then fire emerges. It is called the fire of Yoga (yogaagni).

Well, the one who has a stone-like intellect; wood will burn. What? Suppose someone has a stone-like intellect, then what will happen to the stone? Hm? What will happen if you put the stone in fire? What will happen if you put it in intense fire? Hm? The stone becomes lava. For example, big earthquakes occur in the period of destruction. And even now. So, whatever exists within the Earth, it is not stone, soil, it is full of fire. There is fire raging. What? Within what? Within Mother Earth. She has become Jwala Devi. What? Whatever may be there inside, be it a stone, be it soil, all that will turn into lava. And lava is very intense fire. Hm? Yes. A soul with stone-like intellect also becomes fire. This is why the pure memorial of Shivling made in the beginning of the Copper Age is shown to be of red stone. Hm? There are yellow stones also. There are white stones also. Why was a red stone depicted? It was depicted so that people could understand that there is a soul with stone-like intellect; what does it become? It becomes red ball of fire; like fire. And whoever remembers that fire; What is the ling? What is the red stone ling? Is it Shivling? Does Shiv have ling? Shiv does not have at all. The one in whom He enters has organs. So, it is difficult to conquer that organ of lust. It is said that the one who conquers lust is the conqueror of the world. It is not said that the one who conquers anger is the conqueror of the world. The conqueror of greed is the conqueror of the world. No. The one who conquers the organ of lust, the one who conquers organs is the conqueror of the world. So, it is about the organ of lust.

So, it is not about Shiv at all. He does not assume organs and a body at all. Even when He enters in this sinful world, in a sinful body, He does not assume. Yes, the one in whom He enters, that soul goes on suffering downfall in this world while keeping company [of others]. Although it falls gradually, yet, one such time comes when that soul falls from chaitanyata. Will a stone be called living (chaitanya)? A stone is not living. So, it develops a completely stone-like intellect. And when Father Shiv comes in that person with stone-like intellect, He gives this knowledge; what? That you are not soil, you are not a stone; what are you? You are a living point of light soul. Hm? So, when he gets that realization. Through whom? Hm? Through whom will he get the realization? Does Shiv tell when He enters? Hm? How will He get the realization? It is said that Shiv does enter in a person with stone-like intellect, but that soul with stone-like intellect will not understand easily.

So, arey, where did the Murlis come from? They came from the mouth of Brahma, did they not? Which Brahma? It is shown in the scriptures that Brahma had four heads, five heads. So, definitely whichever person the point of light, incorporeal Shiv enters, He names him Brahma. So, they will be numberwise, will they not be? So, ultimately, the Brahma who survives and the Vani (speech) that emerges through his mouth is called Vedvani. So, that Vedvani itself is called Murli. Does anyone read Vedvani in today's world? Nobody reads at all. Why don't people read?
(Someone said something.) No. Yes. Nothing sits in the intellect. It does not sit in the intellect of those who churned. Deep churning took place on the topics of Murli, the topics of Vedas which they heard. It is said that later on the churning that took place gave rise to the clarifications of Vedas. Aranyakas emerged, Brahmanas were written, scriptures like Shatpath Brahmanas, etc were written. Then Puranas were written. Numerous big and small Puranas were written. Upanishads were written. So, the expansion of the Richas (hymns) of the Vedas which took place, will a person's intellect become broad-minded or narrow through that elaboration? How will it become? It becomes broad-minded. But it is about that time when the body conscious founders of other religions come to this world. So, the intellect does become broad, but when body consciousness mixes in it, then will the intellect become pure or degraded? The intellect becomes degraded. Whose intellect will become the most degraded? Hm? The one who comes in contact with the maximum number of people, his intellect will become more degraded. It is the same soul, which is the seed, Father of the human world, not the Father of souls, the seed of the human world, in whom Shiv comes.

It is said that Shiv comes in India. So, they thought Shiv comes on a non-living land, India. It is not so. Hm? So, those people, the human beings have understood things in different ways because of having a vicious intellect. God comes on a non-living land. Hm? They have put Him even in stones and mounds of mud. They have put Him in animals. They have put Him in fishes. God comes [in them]. Arey, it is not so. He will come only in human beings, will He not? But He comes in a human being, whose intellect does not work at all while getting coloured by the company of others' intellects. It has sit in the intellect of everyone in the world that the soul itself is Supreme Soul. Shivohum, Brahma asmi. They considered themselves to be everything. Similarly, it sits in the intellect of that soul also. What? In the seed of the human world; it becomes sure. It will be ahead in every aspect, will it not be? It became surer that; what? The soul itself is the Supreme Soul. Shivohum. So, what will he be called? Will he be said to have a totally stone-like intellect or will he be said to have an intellect that thinks? Hm? He does not think anything. He listens whatever is narrated to him. So, the Father says - When such a soul, which is the seed of this human world, in whom I come, I name him Brahma, the first Brahma, the Mahatbrahm, the Parambrahm, that soul too cannot understand anything initially. Yes, then, whichever child He enters and He names them Brahma; what?

So, it was told that Brahma himself becomes Vishnu. So, the four arms which are depicted are the four helper arms of Brahma. Whose? Of Parambrahm. That Parambrahm becomes perfect when; it is said in the scriptures that his head itself was cut. What? Brahma had four faces in four directions and one was upwards. But the upward face started defaming the Vedas. The Vedas have caused ruination. Rituals have emerged from the Vedas. These rituals have caused ruination; entire world has been ruined. This Brahma is like this only, like that only, whatever he is. So, what he thought was that Shankar himself is Shiv. He considered Shiv and Shankar to be one. So, Shankarji beheads him in anger. Well, the world does not know that the name Shankar itself proves mix. What kind of mix? One is that soul with a stone-like intellect, which cannot think and churn on its own in the last. Secondly, the one who used to think and churn so much in the beginning of the Copper Age; what was the name? Hm? He is considered to be the highest one among the Maharshis (great sages). Vyas. What? He himself develops a completely stone-like intellect in the last Iron Age while being influenced by others. So, he is the first Brahma, but then there are other souls which play the numberwise parts of Brahma, they too play their parts and while playing their parts, their time is over. Everything has its own time. So, the last Brahma; what? The one, who listens to a lot of hearsay, listens a lot. The shrutis (hymns transmitted from one generation to the other through the word of the mouth) had emerged from his mouth only. The Brahma, through whose mouth the shrutis emerged, the Vedas emerged, the same soul of Brahma becomes the fifth head in the end. And then the Vedas emerge from that fifth mouth. Whatever happens in the beginning happens in the end. And that Vedvani itself is called Murli.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 27 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2530, दिनांक 27.05.2018
VCD 2530, Date 27.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.7.1967
VCD-2530-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.54
Time- 00.01-17.54


प्रातः क्लास चल रहा था - 10.7.1967. सोमवार को दूसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी, एक ही प्रसंग चल रहा था याद का – याद करेंगे तो खाद निकल जाएगी। याद को योगाग्नि कहते हैं ना। हँ? ज्ञानाग्नि भी कहते हैं परन्तु ज्ञान तो बहुत विस्तार में भी होता है, गहराई में भी होता है और याद तो शार्टकट है। वो भी मनन-चिंतन-मंथन किया जाए, उसे कहेंगे मद्धम। और तीव्र याद है जिसमें एक शिवबाबा दूसरा न कोई, कोई संकल्प नहीं, मनमनाभव, तीखी याद करेंगे तो जल्दी-जल्दी खाद निकलेगी। वो तो कुछ काम नहीं रह गया। खाद रहेगी तो कुछ काम का भी नहीं हुआ क्योंकि प्योर तो नहीं बनेंगे ना। कहाँ तक प्योर बनना है? वहाँ तक प्योर बनना है कि जब आए थे आत्मलोक से तब जैसे प्योर थे इतना ही प्योर बनना है। हँ?

कैसे पता चलेगा कि हम इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कब आए थे? जिन्होंने ज्ञान लिया होगा वो तो जान गए कि 5000 वर्ष का सृष्टि चक्र है। चार सीन हैं। तो कौनसे सीन में आए थे? कैसे पता चलेगा? हँ? पता तो चलना चाहिए ना। हँ? अगर आत्मा को तो बेसिकली जान लिया कि आत्मा ज्योति बिन्दु है। फिर उस ज्योतिबिन्दु आत्मा में पावर कहाँ तक भरी है? और जो पावर भरी है, जो निमित्त बनता है, उसी को याद रहती है। मालूम पड़ता है ना कि हम ज्ञान में जो बुद्धि जा रही है वो कौनसे साकार के पास ज्यादा जा रही है? हँ? हँ? जैसे मान लो ब्रह्माकुमार-कुमारी है तो उनकी बुद्धि ज्यादा किसके पास खिंचती है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। बढ़िया होंगे तो ब्रह्मा के पास, मध्यम होंगे तो दीदी-दादी-दादाओं के पास, नहीं तो फिर आपस में ही एक दूसरे को गुरु बना के बैठ जाते हैं। सीढ़ी में दिखाया है ना। क्या? मनुष्य मनुष्य का गुरु बनके बैठ जाता है। तो पता तो लग जाएगा ना।

तो ब्रह्मा की सोल के बारे में तो पक्का पता चल गया सबको। तो वो कृष्ण के रूप में जन्म लेगी सतयुग में। क्या साबित हुआ? कि अगर उनको ही कोई बहुत याद करता है तो कबसे आएगा? हँ? सतयुग के पहले जन्म से, पहले चरण से आएगा। तो पहले सीन में कितने कला संपूर्ण होते हैं प्योर? हँ? 16 कला संपूर्ण। कृष्ण को याद करने वाले जिनकी बुद्धि कृष्ण में ज्यादा लटकती है, खिंचती है तो वो वहाँ जरूर जाएंगे। तो फिर उतना फिर प्योर भी तो बनना है ना खुद। ऐसे नहीं कि मार-पीट के बने वो हिसाब-किताब खलास करके बने धर्मराज के पास जाके। तो अच्छे से याद करना है। वो याद नहीं होगी तो फिर सज़ा खाएंगे। क्योंकि बच्चे जाना तो सभी को है वापस ना। हँ? कोई, कोई आत्माएं ब्रह्मा के पीछे जाएंगी, माना कृष्ण वाली आत्मा के पीछे जाएंगी। कोई आत्माएं उनकी डायनेस्टी में आने वाले नारायणों के पीछे जाएंगी। जाएंगी ना। कोई, कोई फिर, फिर किसके पीछे जाएंगे? कोई दादी, परदादी तो हो गई ना। नारायण के राज्य में आने वाली, पीढ़ियों में आने वाली। फिर? फिर त्रेतायुग आता है तो त्रेतायुग में आने वाली आत्माएं किसके पीछे जाएंगी? अरे, अटक गए। हँ? त्रेतायुग में जो आएंगी, हँ, कम कला वाले देवता, वो तो सभी जानते हैं कि हाँ, सतयुग के बाद कम कलाएं हो जाएंगी। जाएंगी किसके पीछे? हँ?

दो तरह की हैं। एक तो वो आत्माएं हैं जो पहले से जन्म लेती हुई आ रही हैं त्रेता में। सतयुग से ही जन्म लेती हुई आ रही हैं। हँ? और दूसरी? दूसरी वो हैं जो एकदम सतयुगी दुनिया को भी क्रॉस करके, पूरा कल्प क्रॉस करके वैकुण्ठलोक से आती हैं। क्या? सतयुग से भी पहले क्या होगा? वैकुण्ठ होगा। उसे मुसलमान लोग कहते हैं जन्नत। क्रिश्चियन्स कहते हैं पैराडाइस। तो जिन्होंने पहचाना होगा; किसको? हँ? जिन्होंने पहचाना होगा; अच्छा, मान लो लक्ष्मी को पहचाना होगा; बुद्धि ज्यादा लक्ष्मी में खिंच रही है। तो त्रेता के फर्स्ट जन्म में नहीं आएँगे? ये क्या कह दिया शिवबाबा? हँ? अच्छा, सतयुग के आदि में, जो कृष्ण वाली आत्मा है, उसके साथ वो आत्माएं नहीं आएंगी? लक्ष्मी, आदि लक्ष्मी वाली, जो वैकुण्ठ में अतीन्द्रिय सुख भोगती है, हँ, क्या? कलातीत स्टेज में। वो आत्माएं नहीं आएंगी सतयुग में? हँ? तो बोला क्यों नहीं वो भी आएंगी? हँ?

खैर, और द्वापर में भी इस्लाम धरम की होंगी वो इब्राहिम के पीछे जाएंगी। जब ज्ञान मिलेगा तो उन्हें पता तो लग जाएगा; क्या? हँ? कि हम इब्राहिम के पीछे जाने वाले हैं या इब्राहिम जिनमें प्रवेश करता है उनके पीछे जाने वाले हैं? हँ? वो जिनमें प्रवेश करता है नारायणों में, कोई एक नारायण है सतयुग का, हँ, ऊँची स्टेज वाला ही होगा ना कि मध्यम का होगा? ऊँचा होगा। तो उसको जो पहचान लेंगे उसके नज़दीक जो रहे होंगे वो फिर उसी के पीछे जाएंगे। हँ? जैसे क्रिश्चियन धर्म है, तो क्राइस्ट के पीछे जाने वाली आत्माएं, जबसे क्राइस्ट आया है, तबसे जान जाएंगी। क्या जान जाएंगी? कि हमको क्राइस्ट के पीछे जाना है। लेकिन जिन्होंने जान लिया वो क्राइस्ट तो जीसस में प्रवेश करता है, जीसस तो उससे भी ज्यादा पुराना हो गया, हँ, और ज्ञान मिलेगा तो वो ये भी जान जाएंगे वो जीसस वाली आत्मा सतयुग में आती है कि नहीं आती है। जानेंगी ना। तो वो है, उस नारायण को पहचान लेंगी। कहाँ? संगम में ही। और उसके पीछे जाएँगी।

तो वापस जाते समय सबके अपने-अपने ग्रुप होते हैं। क्या? हँ? हां। राम-सीता वाली आत्माएं किसके पीछे जाएंगी? हँ? अरे, किसके पीछे जाएंगी? हँ? लक्ष्मी-नारायण के? लक्ष्मी-नारायण अलग हैं? और लक्ष्मी-नारायण ऊँचे हो गए? और राम वाली आत्मा नीची हो गई? हँ? ये क्या बात हुई? और लक्ष्मी-नारायण; लक्ष्मी-नारायण में भी तो अव्वल नंबर का लक्ष्मी-नारायण या बाद वाले लक्ष्मी-नारायण? अव्वल नंबर का तो आदि नारायण कहा जाता है। तो? आदि नारायण ऊँचे हो गये और राम वाली आत्मा नीची हो गई? ये तो बहुत बढ़िया ज्ञान उठाया। हँ? अरे? राम वाली आत्मा, सीता वाली जिसको कहते हैं राम-सीता; त्रेता में पहला गद्दी जब जमाई जाएगी, तो उसमें जो राम-सीता नाम पड़ेगा, तो वो आत्माएं तो कलप पूर्व से ही हैं, हँ, सतयुगी दुनिया को बनाने वाली ही हैं मिलजुलकरके। उनमें जिनकी बुद्धि लटकी रही होगी वो तो उन्हीं के पीछे जाएंगे। लेकिन फिर जिनको राम-सीता कहा जाता है या कोई दूसरा नाम भी है, तो वो किसके पीछे जाएगी? और उनमें भी दो नंबर हैं ना। हँ? एक राम वाली आत्मा और सीता वाली आत्मा। तो वो राम वाली आत्मा किसके पीछे जाएगी, वो सीता वाली आत्मा किसके पीछे जाएगी?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? वाह भई। बड़ी-बड़ी देर लगा दी। राम वाली आत्मा, हां, क्या? राम वाली आत्मा शिवबाबा के पीछे जाएगी। वाह भइया! वो कौनसा शिव बाबा है जिसको दादा भी कहा जाए? कोई और शिवबाबा है? हँ? राम वाली आत्मा खुद शिवबाबा नहीं बनती है? तो और कोई शिवबाबा के पीछे जाएगी? वाह भई? अरे, शिव बाप के पीछे जाएगी ना। हाँ।

तो वापस तो सबको जाना है। लेकिन अभी ये पता लगाना है कि हमें किसके पीछे जाना है, वापस जाना है तो किसके पीछे जाना है? सबको जाना है वापस। सब। सारी दुनिया की आत्माओं को वापस जाना है। और जाना है नंबरवार। एक के पीछे एक। जैसे माला होती है ना। एक दाना ऊपर, एक दाना नीचे। फिर उसके नीचे। फिर उसके नीचे। तो नंबर बन गए ना। तो ऐसे ही सबको जाना है। रुद्र माला बड़े ते बड़ी कितने की है? हँ? बड़े ते बड़ी रुद्रमाला, बड़े ते बड़ी पूछ रहे हैं, तो वो रुद्र माला बड़े ते बड़ी कितने की है, कितनी संख्या की है? हँ? रुद्र माला बड़े ते बड़ी 500-700 करोड़ की, सारी रुद्र माला है। क्योंकि शिव ही जब प्रवेश करते हैं तो उनका नाम ही रुद्र है, जिनके नाम से रुद्र ज्ञान यज्ञ शुरु होता है। देने वाला कौन? शिव या शंकर, जिसमें प्रवेश करते हैं? तो फिर? उनकी माला कितने की हुई? शिव की माला? सारी सृष्टि। 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएं सारी रुद्र माला हो गई। अच्छा। तो जो भी वहाँ की आत्माएं हैं, वो सब जाएंगी। कहाँ की आत्माएँ? हँ? कहाँ की आत्माएं? हँ? कहाँ की आत्माएं? वहाँ की। वहाँ की माने? परमधाम की, सुप्रीम एबो़ड की जो भी आत्माएं हैं ऊपर सब वापिस जाएंगी। अच्छा, शरीर तो नहीं जाएँगे ना बच्ची? हँ? शरीर जाएंगे या आत्माएं जाएंगी बिन्दु-बिन्दु-बिन्दु? आत्माएं जाएंगी। जीव को शरीर कहते हैं ना। क्योंकि जीव आत्मा शरीर में है तो जीव आत्मा कही जाती है। हँ? और परमधाम में कहेंगे तो आत्मा। इस सृष्टि पर आई तो जीवन धारण करती है। पांच तत्वों का शरीर लेती है तो जीव आत्मा।

तो अभी बाप किसके लिए आते हैं? हँ? किसको वापस ले जाने के लिए आए हैं? हँ? जीव आत्मा को वापिस ले जाने के लिए आए हैं? हँ? या किसको वापस लेने के लिेए आए हैं? हँ? आत्माओं को वापस ले जाने के लिए आए हैं। जीव आत्माएं, जिनको शरीर है, उनको जीव आत्मा कहा जाता है, जीवित आत्मा। आत्मा बाहर निकल गई, परमधाम में पहुंच गई, एक सेकण्ड में आना-जाना होता है आत्मा का। तो फिर वो जडवत् हो जाती है। तो जीवन नहीं कहेंगे। तो बच्चे अपन को अभी आत्मा समझो। क्यों? क्योंकि जल्दी वापस जाना है तो नंबर बढ़िया बनेगा सृष्टि रूपी रंगमंच पर। और बाद में जाएंगे तो नंबर नीचे। जो नंबर, जो आत्माएं पहले इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आती हैं वो ज्यादा फायदे में रहेंगी, सुख-शान्ति में रहेंगी या जो बाद में आती हैं वो ज्यादा सुख में रहेंगी? बाद में आने वाली? जो पहले आती हैं वो ज्यादा सुख भोगती हैं। तो अपन को आत्मा समझो।

A morning class dated 10.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the second page on Monday was; only the context of remembrance was being discussed - If you remember the alloy (khaad or mixturity) will be removed. Remembrance is called the fire of Yoga, is not it? Hm? Fire of knowledge is also mentioned, but knowledge is very elaborate as well as deep. And remembrance is a shortcut. Even in that if you think and churn, then it will be called medium. And if the remembrance is intense, in which there is one ShivBaba and none else, no thought, Manmanaabhav, if you remember intensely, then the alloy will be removed quickly. That does not remain of any use. If there is alloy, then it is of no use because you will not become pure, will you? How far do you have to become pure? You have to become pure to the extent to which we were pure when we had come from the Soul World. Hm?

How will you know when we had come on this world stage? Those who have obtained knowledge have come to know that this is a world cycle of 5000 years. There are four scenes. So, in which scene had we come? How will you know? Hm? You should know, shouldn't you? Hm? If you know the soul basically that we are points of light souls. Then how far there is power filled in that point of light soul. And the power that has been filled remains in the memory of only the one who becomes instrumental. You get to know that the intellect which is thinking of knowledge, that intellect is moving more towards which corporeal medium? Hm? Hm? Suppose there is a Brahmakumar-kumari; their intellect is pulled towards which person more? Hm?
(Someone said something.) Yes. If they are good, then they will be pulled towards Brahma, if they are medium, they will be pulled towards Didis, Dadis, Dadas, otherwise, they sit as Gurus of each other amongst themselves. It has been shown in the Ladder, hasn't it been? What? A human being sits as the guru of another human being. So, you can know, cannot you?

So, everyone has come to know firmly about the soul of Brahma. So, it will get birth in the form of Krishna in the Golden Age. What has been proved? If someone remembers him alone a lot, then from which time onwards will he come? Hm? He will come from the first birth, first phase of the Golden Age. So, in the first scene, you are pure and perfect in how many celestial degrees? Hm? Perfect in 16 celestial degrees. Those who remember Krishna, those whose intellect hangs, pulls more in Krishna, then they will definitely come there. So, then one has to become pure to that extent as well. It is not as if you become after being beaten, after settling your accounts by going to Dharmaraj. So, you should remember nicely. If you do not have that remembrance, then you will suffer punishments because children, everyone has to go back, will you not? Hm? Some souls will go behind Brahma, i.e. the soul of Krishna. Some souls will go behind the Narayanas who come in their dynasty. They will go, will they not? Then, some, some will go behind whom? Some became grandmother (daadi), great-grandmother (pardaadi), did not they? Those who come in the kingdom, generations of Narayan. Then? Then, when the Silver Age comes, then behind whom will the souls coming in the Silver Age go? Arey, you got stuck. Hm? Those who come in the Silver Age, hm, the deities with fewer celestial degrees, that everyone knows that yes, the celestial degrees will reduce after the Golden Age. Behind whom will they go? Hm?

They are of two kinds. One is those souls which have been getting birth from the past in the Silver Age. They have been getting birth from the Golden Age itself. Hm? And the other? The other is those who cross the Golden Age world, cross the entire Kalpa and come from the abode of Vaikunth. What? What will exist before the Golden Age also? There will be Vaikunth. Muslims call it Jannat. Christians call it Paradise. So, those who have recognized; whom? Hm? Those who had recognized; achcha, suppose they have recognized Lakshmi; if their intellect is getting pulled more towards Lakshmi, then will they not come in the first birth of Silver Age? What did ShivBaba say? Hm? Achcha, will those souls not come with the soul of Krishna in the beginning of the Golden Age? Lakshmi, the first Lakshmi, who experiences super sensuous joy in Vaikunth, hm, what? In the kalaateet stage. Will those souls not come in the Golden Age? Hm? So, why did not you say that they will also come? Hm?

Anyways, and even in the Copper Age, those who belong to the religion Islam will go behind Ibrahim. When they get knowledge, they will know; what? Hm? That whether we are the ones who are going to go behind Ibrahim or whether we are the ones who go behind the one in whom Ibrahim enters? Hm? The one in whom he enters among the Narayans; there is a Narayan of the Golden Age, hm, he will be in a high stage only, will he not be? Or will he be in a medium stage? He will be high. So, those who recognize him, those who might have been closer to him, will go behind him only. Hm? For example, there is Christianity, so, the souls who go behind Christ will know ever since Christ has come. What will they know? That we have to go behind Christ. But those who have known that that Christ enters in Jesus; Jesus is older than him, hm, and when they get knowledge, they will also know whether the soul of Jesus comes in the Golden Age or not. They will know, will they not? So, they will recognize that Narayan. Where? In the Confluence Age itself. And they will go behind him.

So, while going back, everyone has his own group. What? Hm? Yes. Behind whom will the souls of Ram and Sita go? Hm? Arey, behind whom will they go? Hm? Behind Lakshmi-Narayan? Are Lakshmi and Narayan different? And are Lakshmi and Narayan higher? And is the soul of Ram lower? Hm? What is this? And Lakshmi-Narayan; even among Lakshmi and Narayan; is it the number one Lakshmi-Narayan or is it the latter Lakshmi-Narayans? The number one is called the first (aadi) Narayan. So? Is the Aadi Narayan higher and the soul of Ram lower? You have grasped this knowledge very well! Hm? Arey? The soul of Ram and Sita which are called Ram-Sita; when the first throne of Silver Age is set-up, then the name Ram-Sita which will be coined, those souls are from the previous Kalpa itself, hm, they are the ones who together establish the Golden Age world. Those, whose intellect is entangled in them will go behind them. But then those who are called Ram-Sita or if there is any other name, then behind whom will they go? And even among them there are two numbers, aren't there? Hm? One is the soul of Ram and the soul of Sita. So, behind whom will that soul of Ram go? Behind whom will that soul of Sita go?
(Someone said something.) Hm? Wow brother! You have taken a lot of time. The soul of Ram, yes; what? The soul of Ram will go behind ShivBaba. Wow brother! Which is that ShivBaba who will be called Dada as well? Is there any other ShivBaba? Hm? Doesn't the soul of Ram himself become ShivBaba? So, will it go behind any other ShivBaba? Wow brother? Arey, it will go behind Father Shiv, will it not? Yes.

So, everyone has to go back. But now you should know that behind whom do we have to go; when we have to go back, then behind whom do we have to go back? Everyone has to go back. Everyone. Souls of the entire world have to go back. And you have to go numberwise. One behind the other. For example, there is a rosary, is not it? One bead is above, one bead is below. Then below it. Then below it. So, numbers were formed, weren't they? So, similarly, everyone has to go. The biggest Rudramala consists of how many? Hm? The biggest Rudramala; I am asking about the biggest one, so, that biggest Rudramala consists of how many? What is the number? Hm? The biggest Rudramala is of 500-700 crores; it is the entire Rudramala because when Shiv Himself enters, then his name is Rudra; in his name the Rudra Gyan Yagya starts. Who is the giver? Shiv or Shankar, in whom He enters? So, then? His rosary consists of how many? Shiv's rosary? The entire world. All the 500-700 crore human souls constitute the Rudramala. Achcha. So, all the souls there will go. Souls of which place? Hm? Souls of which place? Hm? Souls of which place? Of that place (vahaan ki)? What is meant by 'that place'? All the souls of the Paramdham, the Supreme Abode will go back above. Achcha, the bodies will not go, will they daughter? Hm? Will the body go or will the point-like souls go? The souls will go. Jeev is called body, is not it? It is because when the jeev aatma (living soul) is in the body, then it is called jeev aatma. Hm? And when you speak of the Supreme Abode, they will be called aatma (soul). When they came to this world, then they assume life. When they assume the body of five elements, then they are jeev aatma.

So, for whom does the Father come now? Hm? Whom has He come to take back? Hm? Has He come to take back the jeev aatma? Hm? Or who has He come to take back? Hm? He has come to take back the souls. The jeev aatmas, who have a body, are called jeev aatma, living soul. When the soul went out, when it reached the Supreme Abode; the soul comes and goes in a second. So, then it becomes non-living. So, it will not be called life. So, children consider yourself to be a soul now. Why? It is because you have to go back soon; then you will get a nice number (rank) on the world stage. And if you go late, then the number will go down. The number; will the souls which comes on this world stage first reap more benefit, live in happiness and peace or will those who come later on, enjoy more happiness? Those who come later on? Those who come first enjoy more happiness. So, consider yourself to be a soul.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2531, दिनांक 28.05.2018
VCD 2531, Date 28.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.7.1967
VCD-2531-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.15
Time- 00.01-20.15

प्रातः क्लास चल रहा था - 10.7.1967. सोमवार को तीसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – जो राज्य तुमने गंवाया है अभी फिर से प्राप्त करना है। और ये तुम बच्चों को पहचान मिली। अरे वाह! हम तो बहुत ही ऊँचे मालिक थे। तुम बच्चों को आगे मालूम था क्या कि तुम बच्चों को हम सूर्यवंशी देवी-देवता थे तो फिर से बनेंगे? बाप ने आकर बताया। अभी निश्चय कराया ना। अभी हरेक बच्चा कहते हैं - हां, बरोबर हम आगे देवी-देवता थे। कितने कहते हैं कि हम आगे भी सूर्यवंशी, लक्ष्मी व नारायण थे, फिर बनेंगे। ये मुरारी भी कहते हैं ना। हम श्री लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। तो ये भी तो उनकी बुद्धि में आता है ना कि हम कल्प पहले भी लक्ष्मी-नारायण थे, फिर से बनेंगे। क्यों? क्यों कहते हैं? क्यों कहते थे? क्योंकि यहाँ तुम सत्य नारायण की कथा सुन रहे हो, सच्चे-सच्चे बाप के द्वारा। जो सच्चा बाप आकरके सतयुग स्थापन करते हैं। सच्चे-सच्चे हम सत्य नारायण बनेंगे। कहते हैं कि हम नर से नारायण कैसे बनें? वो तो तुम अभी समझते हो ना। भक्तिमार्ग में तो वो झूठ सुनते थे कथा। अभी बाबा आकरके हमको राजयोग सिखलाते हैं। और कायदे से सिखलाते हैं। वो तो सुनाते रहते थे कथा। कोई राज़ की बातें थोड़ेही बतलाते थे। भक्तिमार्ग में ऐसे ही चलता है।

10.7.67 की वाणी का चौथा पेज। अभी तुम बच्चे जानते हो कि सामने ये लक्ष्मी-नारायण खड़े हैं। और हमको तो बाप, टीचर, सदगुरु मिला है। वो दुनिया में तो कोई मनुष्य को बाप, टीचर, सद्गुरु नहीं कहा जा सकता। तो भक्तिमार्ग में सिर्फ पढ़ाइयां पढाते हैं। पुरानी आखानियाँ सुनावेंगे। आखानियाँ सुनाते हैं ना एक-दो को। बुड्ढियाँ-बुड्ढियाँ होती हैं ना। ये माइयाँ, पुरानी बुड्ढी, वो बुड्ढियाँ, दादी अम्मा बच्चों को बैठकरके पुरानी-पुरानी आखानियाँ सुनाती हैं ना। गोद में सुलाय लेती हैं। तो बच्चे कहते हैं – नानी, अब हमको आखानी तो सुनाओ। तो हमको तुम्हारी गोद में नींद आ जावे। तो वो आखानी सुनाती है नींद कराने के लिए। अच्छा, तुम बच्चों को भी ये बाप आखानी सुनाते हैं कि बिल्कुल ही तुम 21 जन्मों के लिए विश्राम पावेंगे। वहाँ कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। राज करने के लिए भी कोई मेहनत नहीं। तो ये हुई आखानी। ये बेहद के माँ-बाप हैं ना। तो बच्चे कहते हैं - मात-पिता, हमको ऐसी आखानी सुनाओ जो हम 21 जन्मों के लिए स्वर्ग में जैसे कि आराम से रहें। तो देखो, तुम बच्चों को, बच्चे और बच्चियों को मात-पिता सुनाते हैं ना। आखानी सुना रही है बड़े आराम से, अच्छी-अच्छी तरह से। तो तुम पवित्र बनकरके पवित्र दुनिया में जावेंगे।

और पवित्र दुनिया में जाने के लिए पवित्र बनना पड़ेगा ना। तो फिर जो कहेंगे सो मानेंगे लोग ना। तो जो बाबा कहते हैं उस पर ध्यान देना चाहिए। और बाबा कोई बुरी बात तो नहीं कहते हैं। नहीं। सिर्फ इतना ही तो बोलते हैं – बच्चे, अपन को आत्मा समझो। ये सच्च-सच्च समझते हैं। ये तो बहुत राइट बात है। अब बरोबर आधा कल्प ये ड्रामा के प्लैन अनुसार हम रावण के राज्य में आधा कल्प देह अभिमानी होकर रहे। फिर स्वर्ग में? आत्माभिमानी होके रहे। ऐसे क्यों हुआ अंतर? हँ? बाप आकरके आत्माभिमानी बनाते हैं। तुम आधा कल्प आत्माभिमानी रहते हो। वो देहधारी धरमगुरु आते हैं तो उनके संग के रंग से देह अभिमानी बन जाते। और अभी ये बाप तो सिर्फ एक ही बार आते हैं। वो धरमपिताएं तो एक के बाद एक आते रहते हैं। बेहद का बाप है। ये जो सीन चलती है ना ड्रामा में, ये पुरानी दुनिया को बदलकरके नई दुनिया बनाना, अब वो तो समझते हैं कि स्वर्ग कोई ऊपर है। और राक्षस कोई पाताल में रहते हैं, नरक में रहते हैं। अरे, नहीं। दुनिया तो एक ही है ना बच्चे। ये ही दुनिया नई, नई सो फिर पुरानी होती है। और दुनिया कोई दो तो नहीं होती है ना बच्ची। तो ये एक ही दुनिया है जो दुनिया पुरानी भी, फिर नई भी बनेगी। पुरानी कौन बनाते हैं? नई कौन बनाते हैं? हँ? और-और धरमपिताएं आते हैं विधर्मी, वो पुरानी दुनिया बनाय देते हैं। और बाप आकरके नई दुनिया बनाते हैं। दुनिया वो ही है।

ये ही दुनिया जिसमें ये ही भारत है। स्वर्ग में भी ये ही भारत था। अभी नरक में भी ये ही भारत है। हँ? स्वर्ग में सारा भारत स्वर्ग था। और अभी नरक में सारा भारत नरक। तो अभी जानते हो कि नई दुनिया में नया भारत होगा। हँ? कारण क्या हुआ? हँ? कि बाप आकरके नई-नई बातें सुनाते हैं ना। तो फिर नई दुनिया में नई बातें तुम सुनते हो तो देवी-देवताएं बन जाते हो। द्वापर-कलियुग में तो वो ही शास्त्रों की पुरानी बातें सुनाते रहते हैं। सुनाते हैं - क्या? गीता का भगवान कृष्ण। सब उल्टी-उल्टी बातें। और तुम ये भी जानते हो कि नई दुनिया में तुम्हारी कैपिटल कहाँ होगी? यही यमुना का कण्ठा। उसको फिर परिस्तान कहते हैं। हँ? परिस्तान? पूरे स्वर्ग को परिस्तान कहते हैं क्या? हँ? कि बाप ने जो नई दुनिया स्थापन की उसको परिस्तान कहते हैं? नई दुनिया तो 21 जनम चलती है ना। तो 21 जन्मों में परिस्तान रहती है क्या? हँ? रहती है? अरे नहीं। ये ज्ञान, योग के पंखों से उड़ने वाली परियों का स्थान तो यहाँ बनता है जब बाप आते हैं। फिर वहाँ कोई परिस्तान थोड़ेही कहेंगे? हाँ, स्वर्ग तो है। सुखी तो रहेंगे। वहाँ कोई ज्ञान, योग के पंखों से उड़ेंगे थोड़ेही? हँ? यहाँ तो बाप आकर परिस्तान कहो, वैकुण्ठ कहो स्थापन करते हैं। तो परिस्तान वहाँ कहा जाता है जहाँ ज्ञान, योग के पंखों से उड़ने वाली परियाँ होती हैं। वो वहाँ रहती हैं। बच्चे, ये परियां जब वहाँ रहती हैं, तो देखो वहाँ कितने राजाएं हुए हैं ब्यूटिफुल। ज्ञान, योग से बने ना।

बाबा ने समझाया था। क्या समझाया था? हँ? समझाया था कि बाबा की आत्मा तो प्योर है ना। हँ? बाबा की आत्मा प्योर है? आत्मा प्योर है? फिर तन कैसा है? ऐसे थोड़ेही हो सकता कि आत्मा प्योर हो और तन पतित हो? हँ? यहाँ कौन बोला? ये बात कौन बोला? हँ? बाबा की आत्मा तो प्योर है ना। हाँ। ब्रह्मा बाबा तो निराकार को याद करते ना। तो उन्होंने उनको बाबा कह दिया। तो हुसैन हसीन हुए ना। अब तुम देखो, तुम बच्चे प्योर बनते जाएंगे। वहाँ तु्म्हारा शरीर कैसे मिलेगा? मिलता है ना सुन्दर शरीर। उन शरीरों में कितनी कशिश रहती है, खिंचाव रहता है। क्यों? यहाँ के शरीरों में इतनी कशिश क्यों नहीं रहती? वहाँ क्यों होती है? हँ? क्योंकि, क्योंकि आत्मा आत्मिक स्टेज में होती है। और यहाँ तो घड़ी-घड़ी देह याद आती है, देह के संबंधी याद आते हैं। तो सारी कशिश उन संबंधियों में चली जाती है। अनेकों की याद से फिर आत्मा पतित बनती रहती है। तो, एकदम प्योर आत्मा आवे तब तुमको पवित्र बनावे ना। हँ? तो आई है। कैसे पवित्र बनाती है? हँ? कहते हैं मामेकम् याद करो। औरों को याद मत करो।

तो वो आत्मा आती है ना। हँ? जिसको परमात्मा कहा जाता है। हँ? कहाँ से आती है? वो आत्मा आती है जिसको परमात्मा कहा जाता है, हँ, उसके संग के रंग से, उसकी याद से तुम पावन बनेंगे तो वो परमात्मा कब आती है आत्मा? हँ? कब आती है? 1976 में आती है? 1936 में आती है? अरे? कोई कहेगा, नहीं, 1947 में आती है। तो एक बात बताओ पक्की। हँ? 1976 में आती है? तो उसके संग के रंग से तुम पतित से पावन बनने लगते हो? हँ? 1936 में आती है परमात्मा की आत्मा? हँ? परमात्मा कहा किसे जाता है? और परमपिता किसको कहा जाता है? कहते हैं परमपिता परमात्मा। हँ? कभी ऐसे कहते हैं परमात्मा परमपिता? हँ? जैसे कहते हैं शिव-शंकर। ऐसे कभी नहीं कहेंगे शंकर-शिव। क्यों? क्यों ऐसे कहते? हँ? शिव है परमपिता। फिर परमात्मा? हँ? आदम वाली आत्मा परमात्मा है? हँ? परमात्मा है? है? अरे? पहचान लिया? कैसे पहचानेंगे? हँ? परमात्मा हीरो पार्टधारी। परम माने परम। परम श्रेष्ठ। तो उसको पहचाना कब जाए? जब उसमें जोर से कशिश होने लगे। धरमपिताएं आते हैं तो उनमें कशिश होती है ना, आकर्षण होता है ना। हँ? तो वो आत्मा आती है और पहचान क्या बताई उसकी? जो देखे, जो सुने, तो ऐसी आकर्षण होती है देखने वालों को, उनके शब्द सुनने वालों, दो शब्द भी सुनेंगे, तो ऐसा उन शब्दों को सुनकर आकर्षण होता है कि उन सबकी पहचान में आ जाती है। कशिश होती है ना आत्मा में। तो उनको परमात्मा कहा जाता है। तो वो आत्मा जब आए तब तुम गोरे बनो।

A morning class dated 10.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the third page on Monday was - You have to now once again obtain the kingdom that you have lost. And you children have got this realization. Wow! We were very high masters! Did you children know earlier that we children were Suryavanshi deities and we will become so again? The Father came and told. Now He enabled you to develop faith, did not He? Now every child says - Yes, definitely we were deities earlier. So many people say that we were Suryavanshi Lakshmi and Narayan and we will become again. This Murari also says, doesn't he? I will become Shri Lakshmi-Narayan. So, this also comes in his intellect that he was Lakshmi-Narayan Kalpa ago too and will become once again. Why? Why does he say so? Why did he say so? It is because here you are listening to the story of the true Narayana through the truest Father. That true Father comes and establishes Golden Age. We will become truest Satya Narayan. They say - How can we become Narayan from nar (man)? That you understand now, don't you? On the path of Bhakti, you used to listen to false stories. Now Baba comes and teaches us Rajyog. And He teaches properly. They used to narrate stories. They did not used to narrate any topics of secret. It goes on like this only on the path of Bhakti.

Fourth page of the Vani dated 10.7.67. Now you children know that this Lakshmi and Narayan are standing in front of you. And we have found the Father, Teacher, Sadguru. In that world, no human being can be called Father, Teacher, Sadguru. So, on the path of Bhakti you study only knowledge. They will narrate old stories. They narrate stories to each other, don't they? There are aged ladies, aren't there? These mothers, old ladies, those aged ladies, grandmothers sit and narrate old stories to the children, don't they? They make them sleep in their laps. So, children say - Grandmother (naani), now narrate a story to me so that I can go to sleep in your lap. So, she narrates a story to make him/her go to sleep. Achcha, this Father also narrates stories to you children so that you will get complete rest for 21 births. You will not have to do any hard work there. There will be no hard work involved even in governance. So, this is the story. These are the unlimited mother and Father, aren't they? So, the children say - Mother and Father, narrate such story to us so that we can live comfortably in heaven. So, look, the Mother and Father narrates to you children, sons and daughters, don't they? She is narrating a story very comfortably, nicely. So, you will become pure and go to the pure world.

And in order to go to the pure world, you will have to become pure, will you not? Then people will believe whatever you say, will they not? So, you should pay attention to whatever Baba says. And Baba does not speak anything wrong. No. He just says - Children, consider yourself to be a soul. They understand it truly. This is a very right thing. Now definitely, for half a Kalpa, as per this drama plan, we have been body conscious for half a Kalpa in the kingdom of Ravan. Then, in the heaven? We had been soul conscious. Why did this difference emerge? Hm? The Father comes and makes you soul conscious. You remain soul conscious for half a Kalpa. When those bodily gurus come, then you become body conscious on being coloured by their company. And now this Father comes only once. Those founders of religions keep on coming one after the other. He is an unlimited Father. This scene that is played in the drama, to transform the old world to a new world, well, they think that heaven is somewhere above. And the demons live somewhere underground (paataal), in hell. Arey, no. The world is only one, is not it children? The same world becomes new and then the new one becomes old. And there are not two worlds, daughter? So, this is only one world which becomes old as well as new. Who makes it old? Who makes it new? Hm? When other heretic founders of religions (vidharmi dharampitaaen) come, they make the world old. And the Father comes and establishes the new world. The world is the same.

It is the same world in which there is the same Bhaarat. It was the same Bhaarat in heaven as well. Now even in hell, it is the same Bhaarat. Hm? The entire India was heaven in heaven. And now the entire India is hell in hell. So, now you know that there will be a new India in the new world. Hm? What was the reason? Hm? The Father comes and narrates newer topics, doesn't He? So, then, when you listen to newer topics in the new world, you become deities. The same old topics of the scriptures are narrated in the Copper Age and Iron Age. They narrate - What? God of Gita Krishna. All meaningless topics. And you also know that where will be your capital in the new world? It is the same banks of river Yamuna. That is then called Paristaan (abode of angels). Hm? Paristaan? Is the entire heaven called Paristaan? Hm? Or is the new world established by the Father called Paristaan? The new world continues for 21 births, doesn't it? So, is there Paristaan for 21 births? Hm? Does it remain? Arey, no. This place of angels flying with the wings of knowledge and Yoga is formed here when the Father comes. Then, will that be called Paristaan? Yes, it is heaven indeed. You will definitely remain happy. Will anyone fly with the wings of knowledge and Yoga there? Hm? Here the Father comes and establishes Paristaan, Vaikunth. So, Paristaan is a place where there are angels flying with the wings of knowledge and Yoga. They live there. Children, when these angels live there, then look, there have been so many beautiful kings there. They became so through knowledge, Yoga, did not they?

Baba had explained. What did He explain? Hm? He had explained that Baba's soul is pure, is not it? Hm? Is Baba's soul pure? Is the soul pure? Then how is the body? Can it be possible that the soul is pure and the body is sinful? Hm? Who spoke here? Who spoke this? Hm? Baba's soul is pure, is not it? Yes. Brahma Baba remembers the incorporeal one, doesn't he? So, he called Him Baba. So, Hussain in handsome (haseen), is not He? Now you see, you children will go on becoming pure. What kind of a body will you get there? You get a beautiful body, don't you? There is so much attraction, appeal in those bodies. Why? Why is not there so much attraction in the bodies here? Why is it there? Hm? It is because the soul is in a soul conscious stage. And here the body comes to the mind every moment; the relatives of the body come to the mind. So, the entire attraction goes into those relatives. Then the soul keeps on becoming sinful through the remembrance of many. So, when the completely pure soul comes, then He will make you pure, will He not? Hm? So, it has come. How does it make pure? Hm? He says - Remember Me alone. Don't remember others.

So, that soul comes, doesn't it? Hm? The one who is called the Supreme Soul. Hm? From where does it come? That soul, which is called the Supreme Soul, comes. Hm? You will become pure through the colour of His company, through His remembrance. So, when does that soul, the Supreme Soul come? Hm? When does it come? Does it come in 1976? Does it come in 1936? Arey? Someone may say - No, it comes in 1947. So, tell one thing firmly. Hm? Does it come in 1976? So, do you start becoming pure from sinful ones through the colour of His company? Hm? Does the soul of the Supreme Soul come in 1936? Hm? Who is called the Supreme Soul? And who is called the Supreme Father? It is said - Supreme Father Supreme Soul. Hm? Do you ever say - Supreme Soul Supreme Father? Hm? For example, they say - Shiv-Shankar. It will never be said - Shankar-Shiv. Why? Why do they say like this? Hm? Shiv is the Supreme Father. Then Supreme Soul? Hm? Is the soul of Aadam the Supreme Soul (Parmatma)? Hm? Is he the Supreme Soul? Is he? Did you recognize? How will you recognize? Hm? Supreme Soul, the hero actor. Param means supreme. Supremely righteous. So, when can you recognize him? When he starts pulling you strongly. When the founders of religions come, they have an appeal; they have attraction, don't they? Hm? So, that soul comes and what is his indication? Whoever sees, whoever listens, then the observers, the listeners of his words have such attraction that even if they listen to two words, then they have such attraction by listening to those words that they all recognize him. There is a pull in the soul, is not it? So, he is called the Supreme Soul. So, when that soul comes, then you will become fair.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 29 Mar 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2532, दिनांक 29.05.2018
VCD 2532, Date 29.05.2018
प्रातः क्लास 10.7.1967
Morning Class dated 10.7.1967
VCD-2532-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.29
Time- 00.01-15.29


प्रातः क्लास चल रहा था - 10.7.1967. सोमवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी कि तुमने राजाई गंवाई किससे है? ये ड्रामा में लॉ बना हुआ है। जरूर हार-जीत होगी। रावण द्वारा हार क्योंकि वो दुश्मन है ना। हँ? किसका दुश्मन है? कितनों का दुश्मन है? सारी दुनिया का दुश्मन है। कल तो बताया था रावण के दस सिर होते हैं। हँ? होते हैं ना। तो दस होते हैं कि ग्यारह होते हैं? हँ? रावण के सिर पे गधा भी तो दिखाते हैं। एक गधे का सिर नहीं होता है? हँ? वो भी होता है? अच्छा। तो बाकि पांच विकारों का तो बताय दिया कि ये हैं रावण के सिर खास पुरुष रूप में। फिर वो ग्यारवां सिर किसका है? हँ? देह अभिमान का। हाँ। परिवर्तन तो सारी दुनिया हो जाती है। ये क्या खास बात हो गई? हँ? इस दुनिया में कोई है जो आत्मा रावण का पार्ट बजाती हो और फिर परिवर्तन न हो? कोई है? हँ? कोई नहीं है। तो ग्यारवां सिर रावण का बता दिया देह अभिमान।

अच्छा। अब बताइये कि फिर राम ही रावण बनता है ये क्यों कहा? हँ? ऐसे क्यों कहा? अरे, राम का सिर तो पहले होना चाहिए। हँ? लास्ट में तो बारहवां सिर होगा? हँ? अच्छा। जैसे रावण को सिर दिखाते हैं अनेक, ऐसे ब्रह्मा को भी अनेक मुख दिखाते हैं। दिखाते हैं ना? विष्णु को भुजाएं दिखाएंगे और ब्रह्मा को और रावण को मुख दिखाते हैं। ब्रह्मा को थोड़े मुख कम दिखाते हैं। रावण को ज्यादा दिखाते हैं। तो वो ठीक है। परिवर्तन होते हैं। ब्रह्मा सो विष्णु बनता है। तो ब्रह्मा को भी जो मुख दिखाए जाते हैं, उनमें कोई मुखिया मुख होगा या नहीं होगा? हँ? मुखिया मुख कौनसा होगा? जो सामने है? अच्छा? महत् ब्रह्म। महत माने बड़ा, महान। हँ? तो वो तो चित्रों में भी देखने में नहीं आता। देखने में आता है? अरे? बाबा ने तो यही बताया है कि जिसके चित्र होते हैं तो चरित्र करने वाला भी होता है। और उनका तो चित्र ही नहीं मिलता। फिर? तो कहाँ चला जाता है? हँ? बताओ। कहाँ चला जाता? मर्ज हो जाता है? अच्छा? काटा जाता है। काटा क्यों? कौन काटता है? काट के खाते हैं क्या कीमा बनाके? हँ? हँ। अरे ब्रह्मा अलग है, शंकर अलग है, विष्णु अलग है। ये क्या ब्रह्मा और शंकरजी को लाके रख दिया? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) तो हाँ, ये बात सही है। तो रावण में अहंकार का मुख नहीं होता? हँ? वहाँ भी होता है? लो। तो शंकर का ही सिर काट दिया? शास्त्रों में लिखा है ब्रह्मा का सिर काटते हैं। हँ?

तो ये तो विष्णु में दिखाते हैं चार भुजाएं। लेकिन भुजाओं को चलाने वाला कोई तो होगा ना। तो वो देखने में नहीं आता है। देखने में आता है? हँ? जैसे, मनुष्य होता है, इन्द्रियाँ तो दिखाई देती हैं। हँ? लेकिन उन इन्द्रियों को चलाने वाला दिखाई देता है? नहीं दिखाई देता। तो ऐसे ही रावण में भी जो देह अहंकार रूपी गधा है और दस सिर हैं उनको जो असली चलाने वाला वो तो देखने में नहीं आता। छुपा रुस्तम बाद में खुले। खुलता भी किसलिए है? दुनिया का क्या करने के लिए? विनाश कराने के लिए। दुनिया में विनाश होता है तो सारी दुनिया बहुत दुःखी होती है। दुःख तो होता है ना। चलो, आठ को सज़ा नहीं मिलती होगी। दुख नहीं होता होगा। फिर भी, इतना बड़ा परिवार होता है ब्राह्मणों का। हँ? वसुधैव कुटुम्बकम कहा जाता है। तो ऐसे कुटुम्ब में सब का खेल खलासा हो जाए तो दुख नहीं होगा उनको? हँ? होगा।

तो, बताया कि रावण को जलाते रहते हैं। क्या-क्या जलाते हैं? गधे का सिर भी जलता है। जलता है कि नहीं? जलता है? कैसे? संगमयुगी शूटिंग में कैसे जलता है? हँ? अरे? वो तीखे-तीखे बाण होते हैं ना, उनमें एक होता है अग्निबाण। क्या? आग की तरह तीखा। ऐसा बाण लगता है बातों का तो बहुत जलती है आत्मा। क्योंकि जवाब भी कुछ आता नहीं। किसको भी समझ में नहीं आता है बच्ची। और है ये बात पाई पैसे की। क्या? हँ? किसके मुख दिखाते हैं? महाकाली का? महाकाली के कितने मुख होते हैं? ब्रह्मा को महाकाली का मुख दिखाते हैं क्या? नहीं। रावण को भी नहीं दिखाते। दिखाते हैं? नहीं दिखाते? अरे! मंदोदरी के किसके हैं? नाम मंदोदरी क्यों पड़ा? मंद उदरी। उदर माने पेट। क्या? बुद्धि रूपी पेट मंद है। तो उसका नाम मंदोदरी पड़ गया। मंदबुद्धि है तो क्या करती है? हँ? असल कर्ता-धर्ता कौन है उसको पहचान ही नहीं पाती। तो कोई समझ सकते हैं ये क्या करते हैं हम, रावण को जलाने का धंधा? ये रावण क्या है? हँ? ये कौन है? बताओ। और ये कबकी बात है? ये तो पुतला बनाके जलाते रहते हैं। असली भी तो कुछ हुआ होगा। हँ? जैसे चौराहों पर, तिराहों पर नेताओं की मूर्तियाँ बनाके खड़ी कर देते हैं। हँ? बड़े-बड़े विद्वान, आचार्य होते हैं, उनकी मूर्तियाँ बनाके खड़ी कर देते हैं। कोई बड़ा वीर योद्धा होता है राणा प्रताप, महारानी लक्ष्मी जैसा तो उनकी मूर्तियाँ खड़ा कर देते हैं बना के। तो कभी हुए तो हैं ना। अरे! मूर्ति बनाई है, चित्र बनाते हैं तो कभी हुए तो हैं ना। यादगार हैं ना। तो ये कब हुए? ये किसी को पता नहीं कि असली रूप में कब हुए? अब तुम बच्चों को तो पता है। कब हुए? हँ? जब ये ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग होती है ना, तब हुए।

कैसे हुए? हँ? जो रावण के सिर हैं जो दिखाते हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार। इस्लामी, क्रिश्चियन्स, मुस्लिम, हँ, और वो वोटिंग करने वाले कौन होते हैं? आर्य समाजी। हँ? और वो रशिया के नास्तिक, अहंकारी। ये तो जाना। तो संगमयुग में कौन होते हैं? हँ? संगमयुग में वो आत्माएं होती हैं, जो आत्माएं यहाँ पुरुषार्थ तो ब्राह्मण का करती हैं, हँ, जिस नंबर के वे धरमपिताएं बनते हैं, उसी नंबर के आधार में प्रवेश करते हैं, देव आत्मा में, तो वो देवात्माएं तो सतयुग, त्रेता में होती हैं ना। हँ? द्वापर में उतरते-उतरते जब पहुंचती हैं तो ऋषि-मुनि बन जाती हैं। तो शूटिंग होती है यहाँ रिहर्सल। कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के सौ साल में, तो जब वो काटा हुआ मुख है ना, जिसका नाम दिया परमब्रह्म, बड़ा ब्रह्म, तो वो आत्मा वास्तव में भक्तिमार्ग में क्या नाम गाया जाता है उसका जिसने रावण को मारा? हँ? अरे, रावण को मारा उसका नाम ही नहीं मालूम? राम। तो राम वाली आत्मा है मनुष्य सृष्टि का बीज। हँ? और उस बीज में आत्माओं का बाप प्रवेश करके ज्ञान के प्वाइंट, ज्ञान के बाण पूर्व जन्म में दे देता है वर्से में। कौनसे पूर्व जन्म में? हँ? यज्ञ के आदि में जब ओम मंडली का संगठन चला था, तो वो आत्मा, संगठन में उसका किसी ने साथ नहीं दिया, और विरोधियों ने उसकी लाश भी गुम कर दी। तो वो बच्चा, बाप का वो बड़ा बच्चा ब्राह्मण परिवार से अलग हो गया। तो बताया कि वो ही बच्चा है मनुष्य सृष्टि का बीज। सतोप्रधान है तो राम, और अति का तमोप्रधान बनता है तो रावण।

Morning class dated 10.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page on Monday was - How did you lose the kingship? This is a law framed in the drama. Definitely there will be defeat and win. Defeat through Ravan because he is an enemy, is not he? Hm? Whose enemy is he? For how many people is he an enemy? He is the enemy of the entire world. It was told yesterday that there are ten heads of Ravan. Hm? There are, aren't there? So, are there ten or eleven? Hm? A donkey is also shown on the head of Ravan. is not there a head of donkey? Hm? Is it also there? Achcha. So, as regards the five vices it was told that these are the heads of Ravan especially in male form. Then whose head is that eleventh head? Hm? Of body consciousness. Yes. The entire world is transformed. What is this special thing? Hm? Is there a soul in this world that plays the part of Ravan and doesn't get transformed? Is there anyone? Hm? There is not anyone. So, the eleventh head of Ravan was mentioned as body consciousness.

Achcha. Now tell, then why was it said that Ram himself becomes Ravan? Hm? Why was it said so? Arey, Ram's head should be first. Hm? Will it be the twelfth head in the last? Hm? Achcha. Just as Ravan is shown to have many heads, similarly, Barhma is also shown to have many heads. He is shown, is not he? Vishnu will be shown to have [four] arms and Brahma and Raavan are shown to have [many] heads. Brahma is shown to have fewer heads. Ravan is shown to have more. That is okay. They transform. Brahma becomes Vishnu. So, among the heads of Brahma which are depicted, will there be any chief head or not? Hm? Which one will be the chief head? The one which is in the front? Achcha? Mahat Brahm. Mahat means big, great. Hm? So, he is not visible even among the pictures. Is he visible? Arey? Baba has told that the one who has a picture (chitra) will also have a character (charitra). And his pictures are not found at all. Then? Then where does he go? Hm? Tell. Where does he go? Does he merge? Achcha? He is cut. Why is he cut? Who cuts? Do they cut it and eat it as [a delicacy of] keema? Hm? Hm. Arey, Brahma is separate, Shankar is separate, and Vishnu is separate. What is this; you have brought Brahma and Shankarji here? Hm?
(Someone said something.) So, yes, this topic is correct. So, is not there a head of ego in Ravan? Hm? Is it present there also? Look. So, was Shankar's head itself cut? It has been written in the scriptures that Brahma's head is cut. Hm?

So, four arms are shown for Vishnu. But there must be someone who controls the four arms, will there not be? So, he is not visible. Is he visible? Hm? For example, there is a human being; his organs are visible. Hm? But is the one who controls the organs visible? He is not visible. So, similarly, the one who actually controls the donkey like body consciousness and ten heads in Ravan is not visible. The hidden rustom is revealed in the end. Why is he revealed? To do what with the world? To cause destruction. When destruction takes place in the world, then the entire world becomes very sorrowful. Sorrow is experienced, is not it? Okay, eight must not be experiencing punishments. They must not be experiencing sorrows. Yet, there is such a big family of Brahmins. Hm? It is called Vasudhaiv Kutumbkam. So, will they not feel sorrowful if everyone perishes in such family? Hm? They will.

So, it was told that they keep on burning Ravan [every year]. What all is burnt? Donkey's head is also burnt. Is it burnt or not? Is it burnt? How? How is it burnt in the Confluence Age shooting? Hm? Arey? There are sharp arrows, aren't there? Among them one is the arrow of fire (agnibaan). What? It is intense like fire. The soul burns a lot when it is hit by such arrows of words because one does not get any answer. Nobody understands daughter. And this topic is worth just pie-paise. What? Hm? Whose heads are shown? Of Mahakali? How many heads does Mahakali have? Is Brahma shown to have the head of Mahakali? No. Ravan is also not shown to have that. Is he shown? Is he not shown? Arey! Whose are Mandodari's? Why was the name Mandodari coined? Mand udari. Udar means stomach. What? The stomach (udar) like intellect is weak (mand). So, she was named Mandodari. She has a weak intellect, so what does she do? Hm? She is unable to recognize the actual controller (karta-dharta). So, can anyone understand as to what is this business of burning Ravan that we are doing? What is this Ravan? Who is this Ravan? Hm? Who is this? Tell. And it is about which time? They keep on burning by making effigies. Something must have happened in reality also. Hm? For example, idols of leaders are installed on cross roads, at T-points. Hm? The idols of great scholars, teachers are installed. Idols of big, brave warriors like Rana Pratap, Maharani Lakshmi are sculpted and installed. So, they have existed in some point of time, haven't they? Arey! When they have built an idol, when they prepare pictures, then they have existed at some point in time, haven't they? There are memorials, aren't there? So, when did they exist? Nobody knows that when they existed in reality? Now you children know. When did they exist? Hm? They existed when the shooting of the broad drama took place.

How did they exist? Hm? The heads of Ravan, which are depicted as lust, anger, greed, attachment, ego. Islamic people, Christians, Muslims, hm, and who are those who do voting? The Arya Samajis. Hm? And those atheists, egotists of Russia. You have known this. So, who exists in the Confluence Age? Hm? Those souls exist in the Confluence Age, which do make purusharth as Brahmins here, hm, whichever number of founder of religion they become, they enter in the same number of aadhaar (base), the deity soul; so, those deity souls exist in the Golden Age and Silver Age, don't they? Hm? When they reach the Copper Age while descending, then they become sages and saints. So, the shooting, rehearsal takes place here. In the hundred years during the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age; so when that head which was cut, which was named Parambrahm, the senior Brahm, so, by which name is that soul actually praised on the path of Bhakti who killed Ravan? Hm? Arey, don't you know the one who killed Ravan? Ram. So, the soul of Ram is the seed of the human world. Hm? And the Father of souls enters in that seed and gives the points of knowledge, arrows of knowledge in inheritance in the past birth. In which previous birth? Hm? In the beginning of the Yagya when the gathering of Om Mandali was running, then nobody gave company to that soul in the gathering and the opponents even made his corpse to vanish. So, that child, that eldest child of the Father separated from the Brahmin family. So, it was told that that child is the seed of the human world. When he is satopradhan, he is Ram and when he becomes too tamopradhan, he is Ravan.

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