Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2562, दिनांक 28.06.2018
VCD 2562, Dated 28.06.2018
प्रातः क्लास 14.7.1967 और रात्रि क्लास 14.7.1967
Morning class dated 14.07.1967 and Night Class dated 28.06.2018
VCD-2562-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.44
Time- 00.01-15.44


प्रातः क्लास चल रहा था - 14.7.1967. नौवें पेज के मध्य में बात चल रही थी दुकानदारों की, मिल मालिकों की, कि उनको डबल फायदा हो सकता है अगर ये ज्ञान भी सुनावें, ये सौदा भी देते जावें, और वो लौकिक धंधा-धोरी का सेवड़ा भी देते जावें, दोनों में कमाई, डबल कमाई होगी। तो तुम बच्चों को भी जाके समझाना है। ये अंतिम जनम है। अभी तुम और फिर से अभी देवता बन सकते हो मनुष्य से। अरे, तुम बच्चे बहुत सर्विस कर सकते हो। बाप समझाते रहते हैं। तुम सर्विस को कैसे बढ़ावें। अभी तो जो जितना करेगा उतना पाएगा। अच्छा, बच्चे टोली ले आओ। फिर ये ऐसे-ऐसे ये-ये रखो। पोतामेल रखो। कोई हमने दिन में काम तो खराब नहीं किया। दृष्टि ने आज कुछ बुरा काम तो नहीं किया। उसमें भी खास अपनी स्त्री के प्रति तो हमारी वो बुद्धि नहीं गई? क्योंकि बहुत भारी मंजिल है।

अरे, तुम कहते हो कि हम नारायण, विश्व का मालिक बनूंगा। हँ? क्योंकि और नारायण जो बाद वाले होंगे वो तो सतयुग के नंबरवार नारायण होंगे। वहाँ विश्व धरम तो होते भी नहीं हैं। तो तुम कहते हो कि मैं अव्वल नंबर का नारायण, विश्व का मालिक बनूंगा। तो क्या समझते हो? हँ? कि विश्व के मालिक बनने वाले देखो क्या होते हैं? हँ? ये जो दुनिया के बडे ताकत वाले होते हैं ना रूस और अमेरिका, ये जब लड़ेंगे, क्योंकि ये बड़े ताकत वाले हैं ना। वो तो समझते होंगे कि हम जीतेंगे, वो समझते होंगे कि हम जीतेंगे। कौन? रशिया और अमेरिका वाले। अब जीत किस पर पहनेंगे? हँ? अभी सारे विश्व पर जीत पहननी है। सिर्फ अमेरिका, रशिया की बात नहीं। समझा ना।

आओ, मीठे बच्चों। बच्चों को फिर वो भी तो बहुत समझाते हैं। कभी-कभी अपना देखें कि हमारा आफीसर थोड़ा भक्तिमार्ग में है, कुछ अच्छा आदमी है, नेचर अच्छा है, तो ऐसे भक्तों को थोड़ा अच्छी तरह से पकड़ सकते हो। वो तुम्हारी बातें सुनेंगे। सुनकरके खुश होंगे। क्योंकि तुम भगत हो ना। तुम तो बहुत पुराने भगत हो। तो एक जैसे दो मिलते हैं तो बहुत खुश होते हैं। जितना पुराना भगत होगा उतनी उनकी अव्यभिचारी भक्ति होगी। तो वो मिलकर बहुत खुश होंगे सुनकर। थोड़ी भक्ति की होगी तो वो कम खुश होगा। क्यों? भक्ति से क्या ज्ञान का हिसाब? जितनी ज्यादा भक्ति करते हैं उतना ज्ञान उठाते ज्यादा हैं। जितना कम भक्ति करते हैं तो ज्ञान भी कम उठाते हैं। सतोप्रधान भक्त होते हैं, सतोप्रधान भक्ति करते हैं तो ज्ञान भी सत्वप्रधान उठाते हैं। बीच में किसी की मिक्सचरिटी की बात एक कान से सुनेंगे दूसरे कान से निकाल देंगे। और व्यभिचारी भक्ति की होगी तो फिर ज्ञान भी उनको मिक्सचर, मिक्सचरिटी वाला अच्छा लगेगा। तो ये सब होता है ना। तो ये बातें भी बाद में सब बहुत कुछ समझाने की हैं।

अच्छा, चलो बच्चे, आज कोई पार्टी जाती है क्या? किसी ने कहा – जी। कौन? किसी ने कहा – ये कुमारी जाती है। कुमारी, आओ तो बच्चे। खुद ही कहते हैं अभी हम तो जाने वाले हैं जरूर। और घर जाएंगे। यहाँ तो घर ही भूल गया है मनुष्यों को। घर क्या है? कुछ नहीं जानते। अभी तुम बच्चे जानते हो हम घर वापस जाते हैं। क्योंकि तुम तो सुप्रीम सोल बाप के बच्चे आत्मा हो ना। तो आत्माओँ का घर याद आता है। आत्मा के घर में जाने के लिए तो फिर पुराना कपड़ा शरीर यहीं छोड़ना पड़े। ये बच्ची तो रूहानी घर थोड़ेही जा रही है। कहाँ जा रही है? जिस्मानी घर में जा रही है ना। तो इनके लिए तो वो बात नहीं है। इनको तो वो घर याद आएगा। तो नई दुनिया में तुम जानते हो कि हमको तो नया कपड़ा मिलेगा। इसलिए तुम खुशी-खुशी छोड़ देते हो पुराना कपड़ा। नई दुनिया में नया कपड़ा मिलेगा तो फिर हम नई आत्मा बनेंगे तो राज्य करेंगे नई दुनिया में। ये तो खुशी तो तुम लोगों को बहुत रात-दिन खुशी होनी चाहिए। तो बाबा कहते हैं मैं इनको कहता रहता हूँ; क्या? मैं तो अभी-अभी शरीर छोड़ूंगा। क्या कहा? हँ? बाबा ने तो सडसठ में ही बता दिया छह महीने पहले। हँ? छह महीने; एक साल, छह महीने पहले। क्या बता दिया? कि मैं तो अभी शरीर छोड़ूंगा। और मेरे मुँह में तो गोल्डेन स्पून इन माउथ होगा। वाह! सोने का चम्मच होगा। अरे, सोने के चम्मच में कुछ दही, रबड़ी, मलाई होगा तभी तो मज़ा आएगा। हँ? सिर्फ चम्मच का क्या करेंगे? हँ? दांत कुडकवाय देगा।

14.7.1967 की वाणी का दसवां पेज। रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का दिल व जान सिक व प्रेम से यादप्यार, गुडमार्निंग। ये गुडमार्निंग एक अक्षर अच्छा है। क्यों? हँ? गुड ईवनिंग क्यों अच्छा अक्षर नहीं है? और अंग्रेजी में ही क्यों अच्छा है? हिन्दी में क्यों अच्छा नहीं है? हिन्दी में कहते हैं नमस्ते। सवेरे को, तो भी कहेंगे नमस्ते, शाम को हो तो भी कहेंगे नमस्ते। और अंग्रेजी में? सवेरा होगा तो कहेंगे गुडमार्निंग। क्यों? ऐसे क्यों? हँ? ऐसी क्या खास बात? अरे, कोई कारण होगा ना। कोई कारण नहीं? कारण ये है कि तुम बच्चे जो देवी-देवता सनातन धर्म के पक्के बच्चे हो ना, हँ, उऩकी मार्निंग तो सदा गुड ही होगी। क्या? कभी इस दुनिया में बहुत दुख महसूस करेंगे क्या? करेंगे? हँ? नहीं करेंगे। कुछ बच्चों को ये बताया 82-83 जनम भी सुख में रहते हैं। तो एक जनम की बात। वो ऐसे समझ लो कि वो गुड नाइट हो गई। उस गुड नाइट में भी तो साथ ही साथ रहेंगे ना। हँ? कि अलग हो जाएंगे? हँ? तो उनका होता है गुडमार्निंग, गुड ईवनिंग। क्या? जब आत्माएं आएंगी कलियुग के अंत में, कलियुग का अंत तो ईवनिंग है ना। हँ? फिर भी उनके लिए गुड ईवनिंग है क्योंकि पहले-पहले आती हैं तो सतोप्रधान हैं। तो दुखी होंगी या सुखी होंगी? सुखी होंगी ना।

तो गुडमार्निंग उनके लिए एक अच्छा अक्षर है। देखो, सब जाते हैं स्कूल में। सो भी कहेंगे, स्कूल में जाते हैं तो भी कहेंगे, मम्मी गुडमार्निंग। अरे, क्योंकि जानते हैं अब हमको नया संग मिलेगा स्कूल में जाके। हँ? टीचर भी और स्टूडेन्ट्स का संगी-साथी भी। और ये मम्मी तो मम्मी अक्षर बोल दिया ना। बड़ी अच्छी बात। ये तो पुरानी हो गई अब। फिर? बच्चों के लिए गुडमार्निंग कैसे? मम्मी के लिए नहीं? हँ? मम्मी को खुशी होनी चाहिए या परेशान होना चाहिए? हँ? अरे, बच्चा दूर जा रहा है। पता नहीं बच्चा कैसे रहेगा, क्या होगा, कहाँ जाएगा? हँ? तो बच्चे प्यार करके जाते हैं ना। कहाँ? स्कूल में। फादर गुडमार्निंग। अरे, मम्मी-पापा से दूर जा रहे हो तो काहे की गुडमार्निंग? आएंगे रात को तो भी मिलेंगे। जाके सोएंगे तो भी माँ, मम्मी हमको प्यार करो। गुडनाइट। हम तो जा रहे हैं सोने के लिए। तुम बच्चों ने शायद इतना देखा नहीं है। बच्चियाँ हो ना। ये सभी कुछ तुमने नहीं देखा होगा। परन्तु गुडमार्निंग? प्यार बहुत रहता है बच्चों में।

वो बच्चों को इतना नहीं मारते हैं। क्या कहा? हँ? कौन? विदेशी लोग जो गुडमार्निंग कहते हैं वो बच्चों को इतना धुनाई-पिटाई नहीं करते हैं जितना, जितना भारतवासी करते हैं। ऐसे क्यों? हँ? क्यों नहीं करते हैं? कारण? हँ? अरे, कुछ तो कारण होगा। दिमाग में नहीं आया। कारण है कि भारतवासी तो जन्म-जन्मान्तर के हिरे हुए हैं ना कि हमारे भारत के बच्चे अगर कंट्रोल में नहीं रहेंगे तो ये तो कन्वर्ट हो जाएंगे दूसरे धर्मों में जाके दुख भोगेंगे, दास-दासी बनते रहेंगे। इसलिए बहुत डांट-डपट में रखते हैं। और वो? विदेशी? अहा, चले भी जाएंगे तो क्या हुआ? भारत में जाएंगे तो वहाँ भी तो स्वर्ग ही बनेगा ना। जाते हैं तो जाने दो। और हमारा खून दुनिया में फैले तो अच्छा ही है ना। हँ? तो हिन्दुओं को तो हिन्दुस्तानी कहेंगे ना। तो वो तो बहुत मारते हैं। कहाँ के, कहाँ के थानी हैं? रहने वाले? हिन्दू। हिन्दुस्तान के। क्यों मारते हैं? हिन्दुस्तान के क्यों मारते हैं? क्योंकि अपन को हिन्दू समझते हैं ना। कि हम हिंसा को दूर करने वाले हैं। इसलिए अपने बच्चों को बहुत सुरक्षा से रखेंगे। ये हमारे बच्चे भी हिन्दू ही बने रहें। तो वो लोग कभी भी बच्चों को नहीं इतना मारते हैं जितना भारतवासी मारते हैं।

A morning class dated 14.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the ninth page was about the shopkeepers, mill-owners that they can reap double benefit if they also narrate this knowledge, if they keep on giving this deal and keep on offering the services of that worldly business; they will reap income, double income in both. So, you children should also go and explain. This is the last birth. Now you can again become deities from human beings. Arey, you children can do a lot of service. The Father keeps on explaining. How can you increase the service? Now, the more someone does, the more one will achieve. Achcha, children, bring toli (sweets). Then keep this and this like this. Maintain potamail. Did I perform any wrong act in the day time? Did my eyes perform any evil act today? Even in that did my intellect get attracted to especially my wife? It is because the goal is very high.

Arey, you say that I will become Narayan, the master of world. Hm? It is because the other latter Narayans will be numberwise Narayans in the Golden Age. The religions of the world do not even exist there. So, you say that I will become the number one Narayan, the master of world. So, what do you think? Hm? Look, what are those who become the masters of the world? Hm? These big powers of the world, Russia and America; when they fight, because they have a lot of power, don't they? They (the Russians) must be thinking that we will win and they (the Americans) must be thinking that we will win. Who? Russians and Americans. Well, whom will they conquer? Hm? Now you have to conquer the entire world. It is not just about America, Russia. Did you understand?

Come, sweet children. Children are explained a lot on that topic also. Sometimes, when you see that your officer is on the path of Bhakti a little, if he is a nice person, if his nature is good, then you can catch such devotees nicely. They will listen to your topics. They will feel happy on listening because you are devotees, aren't you? You are very old devotees. So, when two persons of the same kind meet, they feel happy. The older a devotee is the more unadulterated Bhakti he must be doing. So, they will feel very happy on meeting and listening. If he/she has performed less Bhakti, then he/she will feel less happy. Why? What is the connection of Bhakti with knowledge? The more Bhakti you perform, the more knowledge you grasp. The lesser the Bhakti you perform, the lesser the knowledge you grasp. If they are satopradhan devotees, if they perform satopradhan Bhakti, then the knowledge that they grasp will also be satwapradhan. If they listen to topics of mixturity in between from anyone, then they will listen through one ear and leave it through the other. And if they have performed adulterated Bhakti, then they will like mixture knowledge, the one with mixturity. So, all this happens, doesn't it? So, all these topics are to be explained later on.

Okay children, is any party departing today? Someone said - Yes. Which one? Someone said - This Kumari (virgin) is going. Kumari, come child. She herself says that now I am going to definitely depart. And I will go home. Here human beings have forgotten their home itself. What is the home? They don't know anything. Now you children know that we go back home because you are soul-like children of the Supreme Soul Father, aren't you? So, you remember the home of the souls. In order to go to the home of the soul, you will have to leave the old cloth here itself. This daughter is not going to the spiritual home. Where is she going? She is going to the physical home, is not she? So, it is not that topic about this one. She will remember that home. So, you know that we will get a new cloth in the new world. This is why you leave the old cloth happily. We will get a new cloth in the new world; then we will become a new soul; then we will rule in the new world. You people should have this joy day and night. So, Baba says I keep on telling this one. What? I will just now leave the body. What has been said? Hm? Baba told in sixty seven itself, six months beforehand. Hm? Six months; one year and six months earlier. What did he tell? That I will now leave the body. And there will be a golden spoon in [my] mouth. Wow! There will be a golden spoon. Arey, there will be some enjoyment only if there is some curd, rabri (a sweet made from milk), cream in the golden spoon. Hm? What will you do just with a spoon? Hm? It will break your teeth.

Tenth page of the Vani dated 14.7.1967. Spiritual Father and Dada's remembrance, love and good morning from their heart and with love to the spiritual children. This good morning is a good word. Why? Hm? Why is not good evening a good word? And why is it good only in English? Why is not it good in Hindi? In Hindi we say Namaste. In the morning also you will say Namaste; even in the evening you will say Namaste. And in English? When it is morning they will say good morning. Why? Why is it so? Hm? What is the specialty? Arey, there must be a reason, will there not be? is not there any reason? The reason is that you children, who are firm children of the ancient deity religion, aren't you? Hm? Your morning will always be good. What? Will you ever experience lots of sorrows in this world? Will you? Hm? You will not. In case of some children it was told that they remain happy even for 82-83 births. So, it is about just one birth. You can think that it is good night for them. Even in that good night they will remain together, will they not? Hm? Or will they separate? Hm? So, for them it is good morning, good evening. What? When the souls come in the end of the Iron Age, then the end of the Iron Age is evening, is not it? Hm? However it is good evening for them because when they come first of all, they are satopradhan. So, will they be sorrowful or happy? They will be happy, will they not be?

So, good morning is a good word for them. Look, everyone goes to school. Even when they go to school, they will say - Mummy, good morning. Arey, it is because they know that they will get a new company when they go to school. Hm? The teacher as well as the students, the companions. And as regards this Mummy, the word Mummy was uttered, wasn't it? It is a good thing. It has now become old. Then? How is it good morning for the children? Is it not for Mummy? Hm? Should Mummy feel happy or distressed? Hm? Arey, the child is going far away. It is not sure how the child will be, what will happen, where will he go? Hm? So, children express their love and go, don't they? Where? To the school. Father good morning. Arey, when you are going far away from Mummy and Papa, then why do you say good morning? When they return in the night they will meet. When they go to sleep, at that time also they say - Mother, Mummy, love me. Good night. I am going to sleep. You children have not seen that much perhaps. You are daughters, aren't you? You must not have seen all this. But good morning? There is a lot of love for the children.

They do not beat the children so much. What has been said? Hm? Who? The foreigners who say good morning do not beat the children as much as the Indians do. Why is it so? Hm? Why don't they beat? What is the reason? Hm? Arey, there must be a reason. Did it not occur in your intellect? The reason is that Indians have been habituated since many births that if our children of India do not remain under control, then they will convert to other religions and experience sorrows, become servants and maids. This is why they scold them a lot. And they? The foreigners? Aha, what will happen even if they go away? Even if they go to India, it is going to become heaven only, is not it? If they wish to go, let them go. And it is good if our blood spreads in the world, is not it? Hm? So, the Hindus will be called Hindustanis, will they not be? So, they beat a lot. They are 'thanis' (residents) of which place? Residents? Hindus. Of Hindustan. Why do they beat? Why do those from Hindustan beat? It is because they consider themselves to be Hindus, don't they? That we are the ones who stop violence. This is why they keep their children very safely. Our children should remain Hindus only. So, those people never beat the children as much as the Indians beat.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2563, दिनांक 29.06.2018
VCD 2563, Date 29.06.2018
रात्रि क्लास 14.7.1967
Night Class dated 14.7.1967
VCD-2563-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.37
Time- 00.01-18.37


रात्रि क्लास चल रहा था - 14.7.1967. पहले पेज के मध्य। मध्य के बाद बात चल रही थी – लौकिक दुनिया में एडॉप्ट करते हैं तो जिनको एडॉप्ट होते हैं उनको देखते हैं कि ये कितने माल-मिल्कियत वाले हैं। धनवान का बच्चा कोई गरीब को तो एडॉप्ट होगा नहीं। और एडॉप्ट भी वो ही होते हैं जो बड़े बच्चे होते हैं समझदार। छोटे बच्चे अगर एडॉप्ट हुए तो उन्हें तो पता ही नहीं है क्या माल-मिल्कियत, क्या बाप? वो तो जिससे पालना लेते हैं, अम्मा ही सब कुछ। तो ये सब समझने की बातें हैं। लौकिक दुनिया से हर बात को टैली भी कर सकते हो। जो एडॉप्ट होते हैं वो धन-दौलत मिल्कियत अच्छी तरह से देखते हैं कि हमको ये वर्सा मिलने का है और देखते भी हैं बड़े बच्चे। जानते हो हमको कोई इस दुनिया का तो वर्सा नहीं है। ये तो क्षणभंगुर वर्सा है। एक जन्म का वर्सा है। क्योंकि जिस्मानी वर्सा है ना। जिसम वालों को जिसम वाले माँ-बाप से वर्सा मिलता है। और यहाँ तो बच्चे भी रूहानी हैं बाप भी रूहानी है। तो रूह का कनेक्शन तो अनेक जन्मों से है ना। तो अनेक जन्मों का वर्सा मिलता है। और इस जनम में भी कोई खूटने वाला वर्सा नहीं। अखूट वर्सा मिलता है। और वर्सा लेते ही हो सुख के लिए। क्षणभंगुर सुख के लिए वर्सा थोड़ेही लेते। नहीं। ये तो उनका वर्सा मिलता है बेहद के बाप से।

तो बाप बेहद का है तो वर्सा भी बेहद का है। इतना बेहद का वर्सा दुनिया में और कोई भी बाप नहीं दे सकता। न जन्म-जन्मान्तर के लौकिक बाप दे सकते हैं। न स्वरग के न नरक के। और नरक की दुनिया में जो भी नारकीय धरमपिताएं आते हैं, बड़े-बड़े मान-मर्तबे वाले, ग्रेट फादर्स कहे जाते हैं वो भी इतना बेहद का वर्सा नहीं दे सकते क्योंकि वो भी तो हद में हैं ना। कैसे? मान लो क्राइस्ट है। 200-250 करोड़ क्रिश्चियंस उसको अपना बाप मानते हैं। वो भी तो हद में है ना। सारी दुनिया तो नहीं मानती। और ये तो है हमारा परमपिता परमात्मा शिव बाप, बेहद का बाप और वर्सा भी देते हैं स्वर्ग का। एक जनम का नहीं। कम से कम कोई ले, पूरा पुरुषार्थ करे तो 21 जन्मों का पक्का वर्सा मिलता है। वो सबको वर्सा मिलता है 21 जन्म सुख-शांति का। इस दुनिया का भी मिलता है। वो हद का वर्सा होता है। मिलता सब बच्चों को है। तो तुम भी जो आत्मा रूपी स्टेज में स्थिर होते हो उन बच्चों को वर्सा तो मिलता ही है। उनको भी वर्सा मिलता है, तुमको भी वर्सा मिलता है। और ये बाप जो बेहद का है, वो तो आए ही हैं नई दुनिया स्थापन करने। वो जो बाप होते हैं पुरानी दुनिया में वो कोई नई दुनिया थोड़ेही स्थापन करते। भले नया मकान बनाते हैं तो कोई नई दुनिया थोड़ेही हो गई। आज बनाते हैं कल पुराना हो जाएगा। तो ये बाप नई, सारी दुनिया ही नई बना देते हैं।

बाप कहते हैं बच्चे, ये बात जानते हैं कि बाप नई दुनिया स्थापन करने आए हैं। बाप का एम आब्जेक्ट बच्चों ने पहचान लिया। किसलिए आए? नई दुनिया बनाने के लिए आए। और? बाकी पुरानी दुनिया? बनी रहेगी? नहीं। बनी नहीं रहेगी। हँ? जिस बड़े बच्चे को निमित्त बनाते हैं नई दुनिया स्थापन करने के लिए, जिसको वो निमित्त बनाते हैं पालना करने के लिए, जिसको निमित्त बनाते हैं स्थापना, पालना, तो विनाश भी उसी से कराएंगे। बाप खुद तो विनाश नहीं करते हैं। खुद विनाश करें तो अपने ऊपर आ जावे। हँ? तो अपने ऊपर आ जावे तो क्या नुकसान? विनाश तो फायदेमंद है ना। नुकसान ये है कि बाप सबका कल्याणकारी साबित नहीं होगा। तो ये तो नाम ही है काम के आधार पर शिव। तो इससे ज्यादा कल्याणकारी तो दुनिया में और कोई आत्मा होती ही नहीं।

तो बच्चे बहुत साधारण हैं। बाप भी बहुत साधारण है। देखो, बच्चों को मर्तबा कितना ऊँच मिलता है। हँ? दुनिया के बड़े-बड़े महत्वाकांक्षी हुए, सारे विश्व के ऊपर कंट्रोल करना चाहा। हँ? अलेक्जेन्डर, हिटलर, नेपोलियन, लेकिन कर तो नहीं सके। हँ? कितना मान-मर्तबा तो भी उनका दुनिया में हो गया हिस्ट्री में। और तुम तो बहुत साधारण। भले बहुत साधारण हो। परन्तु तुमको प्रैक्टिकल में विश्व की बादशाही मिल जाती है। वो तो इतना प्रयास करते हैं फिर भी नहीं मिलती। और ही पापी बनकरके शरीर छोड़ देते। तुम तो हिंसा नहीं करते हो, दुख नहीं देते हो। अहिंसा से अपनी नई बादशाही, नई विश्व की लेते हो। तो बच्चे ये बात समझ गए हैं। अच्छी तरह से समझ गए।

बरोबर इन लक्ष्मी-नारायण की राजाई थी इस भारत में। हँ? इनकी क्यों कहा? इन लक्ष्मी नारायण की राजाई थी भारत में। उन लक्ष्मी-नारायण क्यों नहीं कहा? क्योंकि लक्ष्मी-नारायण की डायनेस्टी चलती है। जैसे अंग्रेजों में किंग एडवर्ड फर्स्ट, सेकण्ड, थर्ड। ऐसे ही सतयुग में नारायणों की बादशाही चली। नारायण दि फर्स्ट, सेकण्ड, थर्ड। लेकिन जिसने नारायण का राज्य स्थापन किया, वो नारायण के बारे में किसी को पता नहीं रहता क्योंकि ये विनाश से पूर्व की बात है ना। तो विनाशकाल के बाद तो सब भूल जाता है। किसी को कुछ याद नहीं रहता। तो वो बात बाप आकर बताते हैं कि जो नई दुनिया की राजाई स्थापन करता है उसको कहते हैं आदि नारायण और इनकी राजाई बताई। इनकी माने एक लक्ष्मी-नारायण की बात नहीं है। ये दो लक्ष्मी-नारायण हैं। क्या? एक बाप के रूप में है और एक बच्चे के रूप में। तो बाप और बच्चे दोनों की ताकत से फिर नई दुनिया की राजाई स्थापन होती है।

कहते हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। तो जो वास्तव में आदि नारायण कहा जाता है वो अकेला काम नहीं कर सकता। इसलिए नई दुनिया में सतयुग में जो बच्चा बनेगा; कौन? दादा लेखराज ब्रह्मा की आत्मा को साक्षात्कार हुआ ना कि मैं सतयुग में कृष्ण बनूंगा। और वो तो उस निश्चय पे पक्के हो गए क्योंकि उनकी भक्ति भावना पक्की थी। क्या? उनको निश्चय बैठने में कितना टाइम लगा? हँ? एक सेकण्ड। उनकी संतुष्टि हुई; किसी ने उनके साक्षात्कारों का सही जवाब दे दिया, उनको एप्लाइ हो गया तो वो एक सेकण्ड में स्थिर बुद्धि हो गए कि मुझे तो क्या बनना है? अब नई सतयुगी दुनिया में मुझे तो प्रिंस बनना ही बनना है। फिर बड़ा होकरके मैं बादशाह बनूंगा। लेकिन ये बुद्धि में नहीं आया किसका बनूंगा, कौन बच्चा, कौन बाप होगा, कौन पैदा करेगा, कौन राजाई स्थापन करेगा, कैसे राजाई मिलेगी। बच्चा बुद्धि थे ना। फिर जब पुरुषार्थ करते-4 ये बात बुद्धि में बैठ जाती है कि वास्तव में नई दुनिया की स्थापना करने वाला साकार में, प्रैक्टिकल में वो ही होता है जिसमें निराकार शिव प्रवेश करते हैं क्योंकि शिव कहते हैं मैं बिना शरीर के कोई काम नहीं करता। तो ये राजाई स्थापन करने का काम कैसे होगा? और वो भी शिव का कहना है कि मैं कुछ नहीं करता हूँ। मैं, मुझे तो अकर्ता कहा जाता है। क्या? अगर मैं कुछ करूं-धरूं तो कर्ता हो गया। मैं तो अकर्ता हूँ। इसलिए जिसमें प्रवेश करता हूँ उसको बुद्धि में सारा ज्ञान चलता है तो वो आत्मा जो मेरा आत्माओं के बीच में बड़ा बच्चा है, वो सारा ज्ञान ग्रास्प करने के बाद एक तरफ ज्ञान ग्रास्प होता है और दूसरी तरफ वो आत्मा संपन्न बन जाती है। कैसे संपन्न बनती है? हँ? कैसे बनती है? मेरे से योग लगाके। कैसे योग लगाकर? वो बडा बच्चा भी आत्मा बिन्दु, बाप भी बिन्दु; तो क्या बिन्दु बिन्दु से योग लगाएगा तो संपन्नता मिल जाएगी? मिल जाएगी? हँ? अरे? क्यों नहीं मिल जाएगी?

वो सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु और जिसमें प्रवेश करता है उसको भी परिचय दे दिया कि तुम भी ज्योतिबिन्दु हो ओरिजिनली। तुम देह नहीं हो। तो जब उसने समझ लिया मैं भी ज्योतिबिन्दु हूँ तो अपन को ज्योतिबिन्दु समझकरके बाप को याद करो। तो याद करता है तो इसमें क्या कमी है? हँ? पता नहीं चलता। ये कमी है कि जन्म-जन्मान्तर तो साकारियों को याद करते रहे, हँ, और अब इस जनम में पता चला है हम तो निराकारी आत्मा ज्योतिबिन्दु हैं। तो, स्थिरता हो जाएगी? प्रैक्टिस किस बात की पड़ी हुई है जन्म-जन्मान्तर की? हँ? साकार को याद करने की पड़ी हुई है या निराकार ज्योतिबिन्दु? वो तो मालूम ही नहीं था तो याद करने की बात ही नहीं। भले गीता में आया है अणोणीयांसम। (गीता 8/9) अणु से भी अणु रूप है आत्मा। लेकिन फिर? फिर शास्त्रकारों ने मुगालते में डाल दिया, कोई ने कहा अंगुष्ठे मिसल है। लो सब सत्यानाश कर दिया। फिर बता दिया मैं हज़ारों सूर्यों से के समान तेजोमय हूँ। हज़ार सूर्य इकट्ठे कर दो, उनकी जितनी तेज होगा, रोशनी होगी, उतनी तेज मेरे अन्दर। मैं आत्मा। आत्मा में इतनी शक्ति होती है। हँ? सब सत्यानाश करके रख दिया।

अब बाप आके बताते हैं कि मैं जैसे सूक्ष्म ज्योतिबिन्दु आत्मा अणु-अणु, अणु से भी अणु रूप हूँ ऐसे तुम बच्चे सभी आत्मा हो, प्राणी मात्र की आत्माएं अणुरूप हैं। लेकिन इतना सूक्ष्म अणु आत्मा है कि इन आँखों से तो दिखाई पड़ने की बात ही नहीं। लेकिन वैज्ञानिक लोग जिन यंत्रों से अति सूक्ष्म कीटाणुओं को देख लेते हैं वो सूक्ष्म यंत्र भी; क्या? उस आत्मा को देख नहीं सकते। इतनी सूक्ष्म है। क्योंकि बिन्दु कहा ही जाता है कितना भी छोटे से छोटा, छोटे से छोटा, छोटे से छोटा, अणु से भी अणु बनाते चले जाओ, और जितना सूक्ष्म होगा उतना ज्यादा ताकतवर होता है। तो अब आत्माएं तो हैं ही ना नंबरवार। हँ? छोटी बैटरी होगी तो उसमें छोटी ताकत भरी जाएगी। बड़ी बैटरा होगा तो उसमें बड़ा ताकत भरी जाएगी। ऊर्जा है ना।

तो बताया, कि मैं जिसमें प्रवेश करता हूँ, वो सिर्फ मेरे ज्योतिबिन्दु स्वरूप को याद करने से पावरफुल नहीं बन सकता। परन्तु उसे मालूम है ना कि शिव तो साकार में आया है ना। तो उसे और सहज है साकार में निराकार याद करना या कठिन है? सहज है। जब ये बात समझ जाता है तो वो अपनी भृकुटि के मध्य में ही जैसे गीता में लिखा है – भुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक। (गीता 8/10) तो अंतकाल की प्रैक्टिस अभी से करना शुरू। क्या? भृकुटि के मध्य में ज्योतिबिन्दु आत्मा अपने को भी याद करो और बाजू में बैठता है कौन? बाप। जैसे ब्रह्मा के लिए बताते हैं ना – इन ब्रह्मा के बाजू में बैठता हूँ। कौन? शिव बाप। तो ऐसे ही जो पहला ब्रह्मा है मनुष्य सृष्टि का जिसे परमब्रह्म कहा जाता है उस परमब्रह्म में भी शिव बाप प्रवेश करते हैं तो ये तो पक्का हो जाता है कि वो मुकर्रर रथ है। तो मुकर्रर रथ है तो छोड़ के जाएगा या जैसे बोला है तुम मुझे जितना याद करते हो, उतना मैं तुम्हारे साथ हूँ। याद करते हो तो तुम्हारे साथ हूँ। याद नहीं करते हो तो तुम्हारे साथ नहीं हूँ। भले मुकर्रर रथ में आता हूँ मुकरर्र रूप से रहता हूँ, तुम हमेशा समझो शिवबाबा इसी में है। तो बताया; शर्त लगा दी – याद करोगे तो मैं फौरन हाज़िर हूँ। हँ? हाज़िर नाजिर। तो इतनी बात पक्की होने का मतलब है कि याद ही कम्पलसरी है। याद करेंगे तो ताकत मिलेगी। नहीं करेंगे तो ताकत नहीं। और निराकारी स्टेज में सिर्फ निराकार को ज्योतिबिन्दु को याद करना है या साकार शरीर भृकुटि के मध्य साकार शरीर में याद करना है? सहज कौनसा है? सहज है वो। तो अति सहज होने से, ये बात बुद्धि में बैठ जाने से वो आत्मा अव्वल नंबर का योगी बन जाती है।

A night class dated 14.7.1967 was being narrated. Middle of the first page. The topic being discussed after the mid portion was - People adopt [children] in the outside world; so, the ones by whom they are adopted, they see as to how much property he/she has. A child of a prosperous person will not be ready to be adopted by a poor. And only those who are grown-up, intelligent children get adopted. If the young children get adopted, then they do not know at all as to what is the property, who is the Father? For them the one who sustains them, the mother, is everything. So, all these are topics to be understood. You can also tally everything with the lokik world. Those who are adopted see the wealth and property nicely that we are to get this inheritance and it is the elder children who see. You know that we don't have inheritance of this world. This is momentary inheritance. It is an inheritance of one birth because it is a physical inheritance, is not it? Physical people get inheritance from the physical parents. And here the children as well as the Father are spiritual. So, the connection of the soul is with many births, is not it? So, you get inheritance of many births. And it is not an inheritance which is going to exhaust in this birth also. You get inexhaustible inheritance. And you obtain inheritance only for happiness. You don't obtain inheritance for momentary happiness. No. Their inheritance is received from the unlimited Father.

So, when the Father is unlimited, the inheritance is also unlimited. No Father can give such unlimited inheritance in the world. Neither can the worldly fathers of many births can give. Neither those of heaven nor those of hell. And in the world of hell, all the hellish founders of religions with big respect and positions who come and are called great fathers, they too cannot give such unlimited inheritance because they too are in a limited sense, aren't they? How? Suppose there is Christ. 200-250 crore Christians consider him to be their Father. He too is in a limited sense, is not he? The entire world doesn't accept him. And this is our Supreme Father Supreme Soul Father Shiv, the unlimited Father and the inheritance that He gives is also of heaven. Not of one birth. If someone obtains the least, if he makes full purusharth, then he gets firm inheritance of 21 births. That inheritance of happiness and peace is received by everyone for 21 births. They get inheritance of this world as well. That is a limited inheritance. It is received by all the children. So, you children too, who become constant in the soul like stage, do get inheritance. They too get inheritance; you too get inheritance. And this unlimited Father has come only to establish the new world. Those fathers in the old world do not establish a new world. Although they build a new house, it is not a new world. They build it today and it becomes old tomorrow. So, this Father makes the entire world itself new.

The Father says - Children know that the Father has come to establish the new world. The children have recognized the Father's aim and object. Why has He come? He has come to establish a new world. And? The remaining old world? Will it continue? No. It will not continue. Hm? The elder child, whom He makes instrumental to establish the new world, the one whom he makes instrumental to sustain, the one whom he makes instrumental for establishment, sustenance, He causes destruction through the same personality. The Father Himself does not cause destruction. If He causes destruction Himself, then He will be guilty. Hm? So, what is the harm if He becomes guilty? Destruction is beneficial, is not it? The harm is that the Father is not proved to be benefactor for everyone. So, this name Shiv itself is based on the task performed. So, there is no soul more benevolent than Him in the world.

So, the children are very ordinary. The Father is also very ordinary. Look, children get such a high position. Hm? There have been highly ambitious persons in the world who tried to control the entire world. Hm? Alexander, Hitler, Napoleon, but they couldn't control. Hm? They commanded so much respect and position in the world, in the history. And you are very ordinary. Although you are very ordinary, yet you get the emperorship of the world in practical. They make so many efforts, yet they do not get. They become even more sinful and leave their bodies. You do not indulge in violence; you do not cause sorrows. You obtain your new emperorship of the new world through non-violence. So, children have understood this topic. You have understood very well.

Definitely there was kingship of these Lakshmi and Narayan in this India. Hm? Why was it said 'of these'? There was a kingship of these Lakshmi and Narayan in India. Why wasn't it said 'those Lakshmi and Narayan'? It is because the dynasty of Lakshmi and Narayan continues. For example, among the Britishers, there was King Edward the first, second, third. Similarly there was the emperorship of Narayans in the Golden Age. Narayan the first, second, third. But nobody knows about the one who established the kingdom of Narayan because this is a topic pertaining to the time before destruction, is not it? So, everything is forgotten after the period of destruction. Nobody remembers anything. So, the Father comes and tells that topic that the one who establishes the kingship of the new world is called Aadi (first) Narayan and their kingship was mentioned. 'Their' means it is not about one Lakshmi-Narayan. These are two Lakshmi-Narayans. What? One is in the form of the Father and one is in the form of a child. So, the kingship of the new world is established through the power of both the Father and child.

It is said that a single corn cannot become popcorn. So, the one who is called Aadi (first) Narayan in reality cannot work alone. This is why the one who becomes the child in the Golden Age; who? The soul of Dada Lekhraj Brahma had visions that I will become Krishna in the Golden Age. And he developed the firm faith because his feeling of Bhakti was firm. What? How much time did he take to develop faith? Hm? One second. He became satisfied. Someone gave correct reply about his visions; it applied to him; so, his intellect became constant in a second that what am I supposed to become? Now I have to definitely become a prince in the new Golden Age world. Then I will become an emperor after growing up. But it did not occur in the intellect that whose child would I become, who will be the child, who will be the Father, who will give birth, who will establish the kingship, and how the kingship will be received. He had a child like intellect, did not he? Then while making purusharth, this topic sits in the intellect that actually the one who establishes the new world in corporeal form, in practical is the same person in whom the incorporeal Shiv enters because Shiv says that I don't do anything without a body. So, how will this task of establishing the kingship be undertaken? And Shiv also says that I do not do anything. I am called an akarta (non-doer). What? If I do anything, then I will be a karta (doer). I am akarta (non-doer). This is why the one in whom I enter, the entire knowledge rotates in his intellect; so, that soul, who is My eldest child among the souls, after grasping the entire knowledge; on the one hand the knowledge is grasped and on the other hand that soul becomes perfect. How does it become perfect? Hm? How does it become? By having Yoga with Me. By having Yoga in what manner? That elder child is also a point like soul; the Father is also a soul; So, will the perfection be achieved if the point has Yoga with a point? Will it be achieved? Hm? Arey? Why will it not be achieved?

That Supreme Soul point of light and the one in whom He enters was also given the introduction that you are also a point of light originally. You are not a body. So, when he understood that I am also a point of light, then consider yourself to be a point of light and remember the Father. So, if he remembers, then what is the shortcoming in this? Hm? He does not know. The shortcoming is that birth by birth you have been remembering the corporeal persons, hm, and now in this birth you have come to know that we are incorporeal points of light, souls. So, will stability be achieved? What have you practiced since many births? Hm? Have you practiced to remember the corporeal or the incorporeal point of light? That was not known at all; so, there is no question of remembering at all. Although it has been mentioned in the Gita - Anoneeyaamsam. (Gita 8/9) The soul is minuter than an atom. But then? Then the writers of the scriptures have put you in confusion; someone said that He is like a thumb. Look, they have ruined everything. Then it was told that I am as luminous as thousands of suns [put together]. The brightness of a thousand Suns put together is contained in Me. I am a soul. The soul has so much power. Hm? They have ruined everything.

Now the Father comes and tells that just as I am a subtle point of light soul, subtler than an atom, similarly, all of you children are souls, the souls of the living beings are like atoms. But it is such a subtle atom-like soul that there is no question of being visible through these eyes. But the instruments through which the scientists see the most subtle microbes, even those subtle instruments; What? They cannot see that soul. It is so subtle because it is called a point. You may go on making howevermuch small, smaller, smaller than an atom and the subtler it is, the more powerful it is. So, well the souls are anyways numberwise, aren't they? Hm? If the battery is small, then it will be filled with lesser power. If the battery is big, then it will be filled with more power. It is energy, is not it?

So, it was told that the one in whom I enter, cannot become powerful just by remembering My point of light form. But he knows that Shiv has come in a corporeal form, hasn't He? So, is it easier for him to remember the incorporeal within the corporeal or is it difficult? It is easy. When he understands this topic then in the middle of his own forehead, just as it has been written in the Gita - Bhruvormadhye praanamaveshya samyak (Gita 8/10) So, start practicing what you have to do in the end from now onwards. What? Remember your own point of light soul in the middle of your forehead and who sits beside him? The Father. For example, it is said for Brahma that I sit beside this Brahma. Who? Father Shiv. So, similarly, the first Brahma of the human world who is called Parambrahm, even in that Parambrahm Father Shiv enters, then it becomes firm that he is the permanent Chariot. So, if he is the permanent Chariot, then will he leave and go or just as it has been told that the more you remember Me, the more I am with you. If you remember Me, then I am with you. If you don't remember, then I am not with you. Although I come in a permanent Chariot, I live in permanent manner; you always think that ShivBaba is present in this one only. So, it was told; a condition was prescribed - If you remember, then I am present immediately. Hm? Haazir-naazir (present in front of the eyes). So, being firm on this topic means that remembrance is compulsory. If you remember you will get power. If you don't remember you will not get power. And in an incorporeal stage, should you just remember the inocorporeal, the point of light or should you remember in the middle of the forehead in the corporeal body? Which is easier? That is easy. So, because of being very easy, because of this topic sitting in the intellect, that soul becomes number one yogi.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 22 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2564, दिनांक 30.06.2018
VCD 2564, Dated 30.06.2018
रात्रि क्लास 14.7.1967
Night Class dated 14.7.1967
VCD-2564-extracts-Hindi

समय- 00.01-14.44
Time- 00.01-14.44


रात्रि क्लास चल रहा था - 14.7.1967. दूसरे पेज के आदि में बात चल रही थी – एक ही क्रियेटर है इस सारी दुनिया का। और दूसरे का तो कोई क्रियेटर का नाम भी नहीं है। और एक ही क्रियेटर है और एक ही क्रियेशन है। बताओ, कौनसा क्रियेटर है और कौनसी क्रियेशन है? हँ? दोनों एक ही क्यों कह दिये? हँ? बताओ, जल्दी। शिव क्रियेटर है? क्रियेटर साकार होता है या निराकार होता है? तो शिव नाम क्यों दिया फिर? शिव, नीचे शंकर दिया, ऊपर शिव दिया। तो इसमें क्रियेटर कौन है? ऊपर वाला? शिव ऊपर लिखा शंकर नीचे लिखा। शिव क्रियेटर है? शिव क्रियेटर है? अरे, क्रियेटर कौन है? शिव है या शंकर है? हँ? शिवबाबा है क्रियेटर। (किसी ने कुछ कहा।) शंकर क्रियेटर है? शंकर तो तीन देवताओं में से एक देवता है। हँ? तीन देवताओं की तो शिवबाबा है क्रियेटर। फिर क्रियेशन कौन है? परमब्रह्म है क्रियेशन? वो तो एक ही बात हो गई। हँ? उसी का तो नाम रख दिया परमब्रह्म। क्रियेटर का ही तो नाम रख दिया परमब्रह्म। हँ? तो वो ही क्रियेटर, वो ही क्रियेशन? कि अलग-अलग होते हैं? हँ? अरे, सीधा-सीधा समझ लो। कृष्ण बच्चा है क्रियेशन।

अच्छा, ये दुनिया भी एक वसुधैव कुटुम्बकम बनती है, परिवार बनती है। तो उसमें क्रियेटर कौन होता है? बाप ही क्रियेटर होता है। फिर क्रियेशन कौन होती है? अम्मा ही तो क्रियेशन होती है ना। प्रकृति होती है क्रियेशन। तो क्रियेटर भी अव्वल नंबर एक और क्रियेशन भी अव्वल नंबर वन। तो किसको किसके आधीन रहना चाहिए? किसको किसके कंट्रोल में रहना चाहिए? कंट्रोल से बाहर नहीं जाना चाहिए। रचयिता के कंट्रोल में रचना होनी चाहिए। प्रकृति को शिवबाबा के अंडर दि कंट्रोल रहना चाहिए। अब आत्मिक रूप में देखें तो आत्मा तो क्रियेशन तो है ही नहीं क्योंकि क्रियेट नहीं की जाती। आत्मा तो सदाकाल है। जो चीज़ पहले नहीं थी, फिर बाद में बनाई गई, तो कहा जाता है क्रियेशन। कुम्हार है, वो तो पहले से भी है। घड़ा नहीं है। घड़ा बाद में बनाया गया। तो क्रियेट किया गया। तो इससे साबित हुआ कि आत्माओं में क्रियेशन की बात नहीं है। आत्माएं सभी क्रियेटर हैं। नंबरवार। लेकिन अव्वल नंबर कौन? आत्मिक स्थिति में? क्योंकि आत्मा क्रियेट तो नहीं की जाती। आत्मा का परिचय मिलता है। उसी को कह दो। भई, आत्मा तुम्हें किसने बनाया? तो कहेंगे सुप्रीम सोल ने बताया।

तो इससे संबंधित क्लीयर बात हुई कि जो सुप्रीम सोल है आत्मिक स्थिति में सदा रहने वाला वो पक्का, उसको कोई नहीं रचता। बाकि जितनी भी आत्माएं हैं उन आत्माओं को तो रचने वाला, बनाने वाला कोई परिचय देने वाला है ना। तब वो अपन को आत्मा समझती है। तो आत्मिक स्थिति में एक ही क्रियेटर है। हँ? बाकी सब? बाकि सब रचना जैसे क्रियेशन ही कहें बिन्दु-बिन्दु आत्माएं जो भी हैं। तो सभी ज्योति बिन्दु आत्माओं को एक सुप्रीम सोल के अंडर दि कंट्रोल रहना चाहिए। लेकिन रहेंगी तब जब पहचानेंगी। तो पहचानने के लिए साकार शरीर चाहिए।

तो बताया कि मैं जिस तन में प्रवेश करता हूँ वो है अव्वल नंबर क्रियेशन। क्या? अव्वल नंबर क्रियेशन सृष्टि रूपी परिवार है उसको रचने वाले बाप ने, सुप्रीम सोल ने किसको क्रियेट किया? जिस आत्मा को क्रियेट किया कि तुम आत्मा हो, पहले तो नहीं पता था। तो आत्मिक स्थिति पक्की करने के बाद, वो आत्मा जो है वो पहली-पहली क्रियेशन बनती है। आदम। तो चलो क्रियेशन साकार में हुई। वो क्रियेटर साकार में हुआ। निराकार में क्रियेटर तो शिव है आत्माओं का। आत्माएं ऐसे रची नहीं जाती। क्रियेट नहीं की जाती। हैं तो पहले से ही लेकिन पता ही नहीं है तो जैसे नहीं है। तो आत्माओं का बाप ने साकार सृष्टि चलाने के लिए क्रियेट किया। आदम तो पहले से ही था। लेकिन काम की चीज़ नहीं थी। काम का था? आदम काम का था? हँ? क्यों? नक्कामा क्यों? क्योंकि दूसरों-दूसरों के अंडर दि कंट्रोल चला गया। दूसरों-दूसरों की बात को जानकारी ले ली और वो दूसरों की बात को मान लिया, सुनी-सुनी बातों पर विश्वास कर लिया। जो असली बात है वो तो भूल गया कि मैं अपने को ही भूल गया।

तो जो अव्वल नंबर क्रियेशन है वो कौन हुई शिव बाप की? हँ? आदम को ही क्रियेट किया अपनी बड़ी माँ के रूप में। जो बोला है मैं जिसको माता बनाता हूँ उसमें ज्ञान का बीज डालता हूँ। तो आदम में ज्ञान का बीज डाला ना। तो वो माता है। बाकी दूसरा किसी को नहीं कहेंगे क्रियेटर अव्वल नंबर। माने शिव ही शरीर में आकरके क्रियेटर है और शिव ही उस शरीर में जिसको नाम देता है, भारत में परंपरा है ना कन्या जब ससुराल जाती है तो उसका नाम बदल देते हैं। परंपरा यहां से शुरू हुई। हँ? आदम था पहले का नाम, जो लोग बोलते थे ये आदम। लेकिन बाद में क्या नाम दिया? ब्रह्मा। और वो भी पहला नंबर, बीच का या बाद का? पहला नंबर। तो बड़ा ब्रह्मा हो गया। बड़ी अम्मा जैसे परिवार होता है तो जो पहली शादी की पत्नी होती है वो बड़ी माँ कही जाती है। तो एक ही क्रियेटर है और एक ही क्रियेशन है। दूसरा कोई क्रियेटर है भी नहीं। ऐसे भी नहीं है कि बाप ने कोई नीचे या कोई ऊपर या और कोई दुनिया स्थापन की है। नहीं। ऐसा कोई वसुधैव कुटुम्बकम नहीं बनाया। ना।

क्रियेटर एक तो फिर ये क्रियेशन भी एक। क्या? ये क्रियेशन। किसकी तरफ इशारा किया? ये क्रियेशन। ये माने कौन? हँ? अव्वल नंबर का नाम होता है। ज्यादा से ज्यादा दोयम नंबर डुप्लिकेट का नाम हो जाएगा। तो इनका ही वर्णन है। किसका? क्रियेटर का और क्रियेशन का। देखो, ये रखे हैं। किसकी तरफ इशारा किया? कोई चित्र की तरफ बाबा ने इशारा किया होगा? हाँ। देखो, ये रखे हैं। कौन रखे हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा रखे हैं? उनको ‘ये’ कहेंगे? हँ? ये तो यह कहें तो एक, और ये कहें तो कम से कम दो। तो देखो ये रखे हैं। कौन रखे हैं? हँ? हाँ। लक्ष्मी-नारायण। और तो कोई चित्र नहीं है जो समझा जाए। किस बात में? हँ? रचयिता और रचना के रूप में। तो ये रखे हैं, तो कौन हैं ये? रचयिता हैं या रचना हैं? हँ? हँ? दोनों रचना हैं? अच्छा रचयिता कौन है? हँ? ये दोनों रचयिता और रचना हैं? फिर इनमें रचयिता कोई है या रचना कोई है या दोनों रचना हैं या दोनों रचयिता हैं? क्या हैं? इनमें रचयिता कौन है रचना कौन है? हँ? भगवान-भगवती बनाते हैं। और भगवान आकर भगवान-भगवती बनाते हैं।

कौन है भगवान फिर रचयिता? रचयिता नारायण है और रचना लक्ष्मी है। अच्छा। चलो ठीक है। थोड़ा बहुत तो सही है। लेकिन रचयिता नारायण को किसने रचा? हँ? भगवान शिवबाबा ने रचा। ठीक है माने शिव जब साकार में आया तो भगवान बना। क्या? धनवान बना कि भगवान बना? हँ? भगवान बना। तो वो भगवान नारायण के द्वारा, लक्ष्मी के द्वारा नहीं, क्या? रचयिता। नारायण कहें। नारायण रचना है या रचयिता है? नारायण क्या है? मुसीबत में पड़ गए। हँ? नारायण भी तो रचना है। क्योंकि नर को नारायण बनाया। नारी को लक्ष्मी बनाया। हँ? तो नर आदम था। वो आदम तो आदमी था। देवता तो नहीं था। तो उसको नारायण बनाया। तो जब बनाया तो रचना हुई। क्या? कुम्हार है, मिट्टी बनाता है कि घड़ा बनाता है? घड़ा बनाता है। तो घड़ा रचना है। मिट्टी जो है वो तो आलरेडी है ही है। सदाकाल है। तो ऐसे ही मनुष्य को देवता बनाने का काम ये भगवान का है। भगवती का नहीं बताया। और भगवान कौन? निराकार और साकार का मेल कहा जाता है। तो देखो, ये साकार में नारायण, ये भी रचना है। और नारायण की रचना? लक्ष्मी है। तो एक अव्वल नंबर औऱ एक को रचना के रूप में। तो और तो कोई चित्र नहीं है।

A night class dated 14.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the second page was - There is only one creator of this entire world. No other creator is famous. And there is only one creator and there is only one creation. Tell, who is the creator and which is the creation? Hm? Why were both mentioned to be only one? Hm? Speak up, fast. Is Shiv the creator? Is the creator corporeal or incorporeal? So, then why was the name Shiv given? Shiv; Shankar was shown below; Shiv was shown above. So, who is the creator in this? The above one? Shiv was written above, Shankar was written below. Is Shiv the creator? Is Shiv the creator? Arey, who is the creator? Is it Shiv or Shankar? Hm? ShivBaba is the creator.
(Someone said something.) Is Shankar the creator? Shankar is one among the three deities. Hm? ShivBaba is the creator of the three deities. Then who is the creation? Is Parambrahm the creation? That is the same topic. Hm? The same person was named Parambrahm. The creator himself was named Parambrahm. Hm? So, he is the creator as well as the creation? Or are they different? Hm? Arey, understand in a simple manner. Child Krishna is the creation.

Okay, this world also becomes vasudhaiv kutumbkam, one family. So, who is the creator in it? The Father himself is the creator. Then who is the creation? The mother herself is the creation, is not she? The nature (Prakriti) is the creation. So, the creator is also number one and the creation is also number one. So, who should remain under whom? Who should remain under whose control? It should not go out of control. The creation should be under the control of the creator. The nature (prakriti) should be under the control of ShivBaba. Well, if we see in soul form, then the soul is not the creation because it is not created. The soul is forever. If something that did not exist earlier is created then it is called creation. There is a potter; he already exists. Pot does not exist. The pot was created later on. It was created. So, it proves that it is not about the creation of the souls. All the souls are creators. Numberwise. But who is number one in soul consciousness? It is because the soul is not created. The introduction of the soul is given. You may call that itself [as creation]. Brother, who made you a soul? So, it will be said that the Supreme Soul told.

So, the clear topic related to this is that the Supreme Soul who remains in soul conscious stage forever, firmly; nobody creates Him. But there is a creator, maker of all other souls, i.e. the one who gives an introduction about them, is not it? It is then that they consider themselves to be souls. So, there is only one creator in soul conscious stage. Hm? All others? All other point-like souls are like creation only. So, all the point of light like souls should remain under the control of one Supreme Soul. But they will remain [under the control] only when they recognize. So, a corporeal body is required to recognize.

So, it was told that the body, in which I enter, is the number one creation. What? Whom did the Father, the Supreme Soul, who created the number one creation, the world family, create? The soul whom He created [by telling him] that you are a soul; he did not know earlier. So, after firming up the soul conscious stage, that soul becomes the first creation. Aadam. So, okay, the creation is in corporeal form. That creator is in a corporeal form. In an incorporeal form the creator of souls is Shiv. Souls are not created. They are not created. They already exist, but when they are not aware of themselves, then it is as if they don't exist. So, the Father of souls created [the souls] to run the corporeal world. Aadam already existed. But he was not a useful thing. Was he of any use? Was Aadam of any use? Hm? Why? Why was he useless? It is because he went under the control of others. He obtained the information of others and accepted the others' words; he believed in hearsay. He forgot the true topic that I have forgotten myself.

So, who is the number one creation of the Father Shiv? Hm? He created Aadam himself as His senior mother (consort). It has been said that the one whom I make a mother, I sow the seed of knowledge in her. So, He sowed the seed of knowledge in Aadam, did not He? So, he is the mother. As such, nobody else will be called number one creator. It means Shiv Himself is the creator by coming in the body and Shiv Himself in that body, whom He gives a name; there is a tradition in India that when a virgin goes to her matrimonial home (sasuraal), then her name is changed. The tradition started here. Hm? Aadam was an earlier name; people used to call him Aadam. But what was the name assigned later on? Brahma. And that too was it number one, the middle one or the latter one? The number one. So, he is the senior Brahma. As regards the senior mother, for example, there is a family and the wife adopted through the first marriage is called the senior mother (bari Maa). So, there is only one creator and only one creation. There is no other creator. It is not as if the Father established any world below or above or any other world. No. He did not create any such vasudhaiv kutumbkam (world family). No.

When the creator is one, then this creation is also one. What? This creation. Towards whom was a hint given? This creation. 'This' refers to whom? Hm? The number one becomes famous. At the most the number two, duplicate will become famous. So, these are only described. Who? The creator and the creation. Look, these are placed. Towards whom was a hint given? Baba must have pointed out towards a picture. Yes. Look, these are placed. Who are placed?
(Someone said something.) Is Brahma placed? Should he be called 'these' (ye)? Hm? If we say 'yah' it is one and if we say 'ye' it is at least two. So, look these are placed. Who are placed? Hm? Yes. Lakshmi-Narayan. There is no other picture which could be understood. In which topic? Hm? In the form of creator and creation. So, these are placed; who are these? Are they creators or creations? Hm? Hm? Are both creations? Okay, who is the creator? Hm? Are these both creators and creations? Then is there anyone creator among them or is there a creation among them or are both of them creations or are both of them creators? What are they? Who is the creator and who is the creation among them? Hm? They are made Bhagwaan-Bhagwati (God-Goddess). And God comes and makes you God-Goddess.

Who then is God, the creator? The creator is Narayan and the creation is Lakshmi. Achcha. Okay, it is correct. It is correct to some extent. But who created the creator Narayan? Hm? God ShivBaba created. It is correct that when Shiv came in corporeal form, then He became God (Bhagwaan). What? Did He become wealthy or did He become God (Bhagwaan)? He became Bhagwaan. So, that Bhagwaan, through Narayan, not through Lakshmi; what? The creator. If we say Narayan, is Narayan a creation or a creator? What is Narayan? You have become confused. Hm? Narayan is also a creation because nar (man) was made Narayan. Naari (woman) was made Lakshmi. Hm? So, nar (man) was Aadam. That Aadam was a man (aadmi). He was not a deity. So, he was made Narayan. So, when he was made, he happens to be a creation. What? There is a potter; does he create clay or does he create a pot? He creates a pot. So, pot is a creation. The clay is already there. It is present forever. So, similarly, to transform human beings to deities is the task of God (Bhagwaan). It was not mentioned to be that of Goddess (Bhagwati). And who is Bhagwaan? The combination of incorporeal and corporeal is called [Bhagwaan]. So, look, this Narayan in corporeal form is also a creation. And the creation of Narayan? It is Lakshmi. So, one is number one and one is in the form of creation. So, there is no other picture.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 24 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2565, दिनांक 01.07.2018
VCD-2565, Dated 01.07.2018
रात्रि क्लास 14.7.1967
Night Class dated 14.7.1967
VCD-2565-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.05
Time- 00.01-13.05


रात्रि क्लास चल रहा था - 14.7.1967. दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – जब ऊँची स्टेज में जाना होता है, जैसे पहाड़ों पर जाते हैं ना भक्तिमार्ग में, तो कहाँ पानी में, कहाँ ठण्डी में कितना सहन करना पड़़ता है। चढ़ाई में थकान भी होती है। तो तुम बच्चों को भी कुछ न कुछ थोड़ा सहन करना पड़ता है, बिल्कुल थोड़ा। क्योंकि भक्तिमार्ग में तो प्रैक्टिकल में बाप नहीं होता है। अभी तो बाप की छत्रछाया है ना। जो सेन्सिबुल अच्छे बच्चे हैं, ड्रामा के ऊपर खड़े हैं, तो बस उनको प्यार से समझाते, हर्षित होते रहते हैं। समझते हैं, जो बच्चे आगे नहीं बढ़ पाते हैं, चाहे ठहर के चलते हैं, तो समझते ड्रामा में इनका पार्ट नहीं है। तो ड्रामा समझ करके तंग नहीं होना चाहिए।

और बाबा ने तो समझाया है अगर कोई अभी नहीं आते हैं और तुम अच्छे से समझाते हो, नहीं सुनते हैं, ध्यान नहीं देते हैं तो भी तुम्हारा किया हुआ प्रयत्न, पुरुषार्थ बर्बाद नहीं जावेगा। आगे चलकरके आवेंगे। कोई बीज है, मौसम नहीं है तो वो पैदा नहीं होगा। या पथरीली जमीन है, बुद्धि पत्थरबुद्धि बना पडा है, तो बुद्धि में नहीं बैठता है। आगे चल करके समय, माहौल उनकी बुद्धि को भुरभुरा बनायेगा। और वो आ जाएंगे। फिर भी कोई का भी कल्याण करने की कोशिश तो बहुत करनी है। ऐसे ही समझाना चाहिए कि हम इनका कल्याण करते हैं क्योंकि हम तो कल्याणकारी बाप के बच्चे हैं ना। तो जो बाप का खून वो हमारे अन्दर खून। वो दुनिया में बाप का खून होता है स्थूल खून। हमारा है संकल्पों का खून। हमारा विश्व का बाप सारी विश्व आत्माओं का बाप है, सबके प्रति कल्याणकारी है तो हमारे संकल्प भी कल्याणकारी हैं। तो हमारे सामने जो भी आएगा हम तो उसका कल्याण ही चाहेंगे ना। हमारा तो धरम ही है, हमारी धारणा है कि किस न किस का कल्याण जरूर करना है। कोई कल्याण करने में, कल्याण होने में टाइम ले लेते हैं। जैसे कोई पौधे होते हैं ना, कोई फसल होती है, लम्बे टाइम में फल देती है। यहाँ भी ऐसे ही है। कोई-कोई पांच-पांच, छे-छे, आठ-आठ साल भी लगेंगे निकलने में। कोई दस बरस भी ले लेंगे। घरवाले होंगे ना मित्र-संबंधी, वो तुम्हारी बात अभी नहीं सुनेंगे। क्या? ऐसे कहते हैं ना कहावत – घर की मुर्गी दाल बराबर। कोई महत्व नहीं देते हैं। हाँ, जब ये तुम्हें देखेंगे कि तुम्हारी वृद्धि होती जा रही है, तब फिर आवेंगे। आते जाएंगे। एक को देख दूसरे आते जावेंगे।

ये तो बच्चों को मालूम है कि बरोबर ये गाया जाता है अंत में कि अहो प्रभु तेरी लीला। गाया जाता है ना। तो ये लीला प्रभु की नहीं है। हँ? प्रभु ने ये लीला की कि वो नहीं आए, बाद में आए, इतना लंबा टाइम लगाया? नहीं। ये वास्तव में तुम्हारी लीला है। क्या? हँ? वो कथा है ना लीलावती, कलावती की। तुम लीलावती के बच्चे हो। हँ? अभी तुम बच्चे जानते हो। कह सकते हो अच्छी तरह से। वाह, वाह बाबा। आप का ये जो समझाने की युक्ति है तो ये तो नाटकशाला है। कितनी बढ़िया युक्ति है कि दुनिया एक रंगमंच है। और ये बात समझाने में आप ही ने समझाई। हँ? भले अंग्रेजों में एक शेक्सपियर है उसने भी लिखा है कि दुनिया एक रंगमंच है। हम सब पार्टधारी हैं। लेकिन डीटेल नहीं समझाया कुछ भी कि उसका डायरेक्टर कौन है, मुख्य एक्टर कौन है? और मुख्य-मुख्य एक्टर्स जो हैं वो क्या हैं, कैसे हैं, कुछ नहीं बताया। आप ही हमें विस्तार में समझाते हो। दूसरों की तो इतनी ताकत ही नहीं है जो इतना विस्तार में समझावें। आप तो सुप्रीम टीचर हो ना। तो व्याख्या करके समझाते हो। उस गीता में नाम दिया है सांख्य। हँ? सह आख्या। व्याख्या के साथ, विस्तार के साथ बैठ समझाना। तो ऐसे-ऐसे बैठकरके समझाते हो। जैसे ये। ये खुद भी जो कुछ करते हैं, उसको बच्चों को समझाते हैं। हँ?

तो बाबा ऐसे-ऐसे ही करते रहते हैं कि ये तो दुनिया नाटक जैसा बना हुआ है। ये कोई बाबा के लिए ऐसे नहीं कहेंगे कोई क्रियेटर है, ये नाटक सारा कोई इसने क्रियेट किया है। कौन नहीं कहेंगे? हँ? अरे, कौन नहीं कहेंगे कि ये, ये क्रियेटर है, नाटक सारा इसने रचा हुआ है? हँ? ब्रह्मा बाबा नहीं कहेंगे ना कि ये नाटक इसने रचा हुआ है। नहीं। फिर किसने रचा हुआ है? हँ? सारी मुरली तो ब्रह्मा के द्वारा सुनाई जा रही है। तो फिर ये नाटक किसने रचा हुआ है? कैसे बताएंगे? हँ? मुरली तो सुनी, मुरली सुनाई उनके मुख से लेकिन उन्होंने गहराई से समझा नहीं ना। ये तो कृष्ण है ना सतयुग का प्रिंस, बच्चाबुद्धि, बात को गहराई से समझा ही नहीं। क्रियेशन और क्रियेटर का हिसाब क्या होता है? क्रियेटर होता है, क्रियेट करता है। तो ये सारा नाटक क्रियेट किया हुआ है ना क्रियेटर का। तो तुमको तो बताय दिया। कौन है बड़ा क्रियेटर? हँ? व्यास। वो तो रटा-रटाया हो गया। हँ? वि आस का मतलब ही है विशेष रूप से इसी बात के लिए बैठ गया, ड्रामाबाजी करने के लिए। ड्रामाबाजी करने के लिए स्पेशल बैठक मार दी।

तो ये ब्रह्मा बाबा क्रियेटर नहीं है। ये तो क्रियेशन है। नई दुनिया में भी ये पहली-पहली क्रियेशन बनेगा। कृष्ण बच्चा है ना। किसने क्रियेट किया? कहेंगे बाप ने क्रियेट किया। कृष्ण बच्चा सतयुग का नारायण बनेगा पहला। तो उसे किसने क्रियेट किया? कहेंगे उससे पहले वाले नारायण ने क्रियेट किया। अपने बाप का टाइटल फिर इसको मिल गया। तो क्रियेशन हुआ ना। ये क्रियेट क्या करते हैं? बताओ। पुरानी दुनिया को क्रियेट करते हैं। अरे, बाप रे। कौन? कौन पुरानी दुनिया को क्रियेट करते? हँ? ये माने कौन? हँ? ब्रह्मा बाबा। किसको क्रियेट करते? पुरानी दुनिया को क्रियेट करते। नई दुनिया को कौन क्रियेट करता? हँ? जिसको ब्रह्मा ने रचा वो नई दुनिया क्रियेट करता। तो ये क्रियेशन नहीं हुआ। हँ? ये चेंज करना होता है। बाप कहते हैं मैं आता हूँ इस दुनिया को चेंज करने। पुरानी दुनिया को नई दुनिया बनाने। सो भी कैसे बनाता हूँ? देखो। कितनी सहज चेंज होती है। और ये चेंज होना ड्रामा में नूंध है। क्या? ये ड्रामा में जो नूंध है उसके अनुसार ये बाप को पार्ट मिला है। क्या? चेंज करने का। जो बैठकरके तुम बच्चों को सिखलाते हैं। क्या? तो चेंज करने का पार्ट मिला हुआ है या सिखलाने का पार्ट मिला हुआ है? और कौनसे बाप की बात है? हँ? जो त्रिकालदर्शी है उस बाप की बात है कि वो सिखलाते हैं। और जिसको सिखलाते हैं, मुकर्रर रूप से जिसमें प्रवेश करके बताते हैं, हँ, वो है पार्टधारी जो कि पुरानी दुनिया को नई दुनिया में चेंज करने के लिए प्रैक्टिकल में निमित्त बनता है।

तो ये बच्चे समझते हैं हमारे कि जबकि हम राजा बनते हैं स्वरग के तो जरूर ये आग लगेगी। क्या? नई दुनिया कब बनेगी? कब देखने में आवेगी? जब तक ये पुरानी दुनिया है, हँ, तब तक नई दुनिया का वर्चस्व देखने में आएगा ही नहीं। तो ये पुरानी दुनिया को आग लगेगी तो नई दुनिया बनेगी। एक तरफ पुरानी दुनिया खलास तो दूसरी तरफ पुरानी (नई) दुनिया तैयार। तो ये सभी आग लगेगी। अभी ये भी तो ड्रामा में है ना। क्या? कि नई दुनिया क्रियेट करना भी ड्रामा में है और पुरानी दुनिया ध्वंस करना भी ड्रामा में है। है ना बरोबर।

Night class dated 14.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was - When you have to go to a high stage, for example, when you go to the mountains on the path of Bhakti, then you have to tolerate so much sometimes in water, sometimes in cold. You also feel tired while climbing up. So, you children also have to tolerate a little, very little because the Father is not present in practical on the path of Bhakti. Now there is a canopy of the Father, is not it? The sensible, nice children, who are standing firm on the drama, He explains to them lovingly and keeps on feeling happy. He thinks that the children who are unable to move ahead, or those who tread slowly, then He thinks that they don't have a part in the drama. So, one should not feel troubled by thinking of the drama.

And Baba has explained that if someone doesn't come now and you explain to them nicely, if they don't listen, do not pay attention, then your efforts, your purusharth will not go waste. They will come in future. There are some seeds, which do not germinate when the climate is not suitable. Or if the land is stony, if the intellect has become stone-like, then it does not sit in the intellect. In future, the time, the atmosphere will make their intellect fertile. And they will come. However, you should make a lot of efforts to cause benefit to someone. You should explain thinking that I am causing benefit to him because we are children of the benevolent Father, aren't we? So, our blood is the same as the Father's blood. In the world, the Father's blood is the physical blood. Ours is the blood of thoughts. Our Father of world is the Father of the souls of the entire world; He is benevolent towards everyone. So, our thoughts are also benevolent. So, whoever comes in front of us, we would like his benefit only, will we not? Our religion itself is, our inculcation itself is that we should cause benefit to someone or the other. Some take time to cause benefit, for the benefit to be caused. For example, there are some plants, some crops, which give fruits after a long time. It is like this here as well. Some will take up to five, six, eight years to emerge. Some will take even ten years. The members of family, the friends and relatives will not listen to you now. What? There is a saying, is not it? Ghar ki murgii daal baraabar (the chicken cooked at home tastes like pulses). They do not give any importance. Yes, when they observe you that you are growing, they will come. They will go on coming. They will keep on coming by seeing each other.

Children know that it is definitely sung in the end that 'O God, your acts are unique' (Aho Prabhu teri leela). It is sung, is not it? So, this act (leela) is not of God. Hm? Did God play the act that He did not come, came later on, or took a very long time? No. Actually this is your act. What? Hm? There is a story of Leelavati, Kalawati, isn’t it? You are children of Leelavati. Hm? Now you children know. You can say nicely. Wow, wow Baba. Your tact of explaining that this is a theatre (naatakshala) is such a nice tact that this world is a stage (rangmanch). And it is you alone who explained this topic. Hm? Although there is one Shakespeare among Britishers who has also written that the world is a stage. We all are actors. But he did not explain anything in detail that who is its director and who is the main actor? And he did not specify as to who and how are the main actors. You alone explain to us in detail. Others don't have that much power to explain in detail. You are the Supreme Teacher, aren't you? So, you give clarification (vyaakhyaa). There is a word 'saankhya' mentioned in that Gita. Hm? Sah aakhya. Explaining along with vyaakhya (clarification), in detail. So, you sit and explain like this. Like this one. Whatever this one does, he explains to the children. Hm?

So, Baba keeps on doing like this that this world is like a drama. It will not be said for Baba that He is a creator or that He has created this entire drama. Who will not say? Hm? Arey, who will not say that this one is a creator or that He has created this entire drama? Hm? Brahma Baba will not say that this one has created this drama. No. Then who has created? Hm? The entire Murli is being narrated through Brahma. So, then who has created this drama? How will you tell? Hm? You have listened to the Murli; Murli was narrated through his mouth, but he did not understand it in depth, did he? This one is Krishna, the Prince of the Golden Age, the one with a child-like intellect (bachchabuddhi); he did not understand the topic in depth at all. What is the account of the creation and the creator? Creator creates. So, this entire drama has been created by the creator. So, you have been told who is the big creator? Hm? Vyas. That is a rote reply. Hm? Vi aas means 'he sat especially for this topic, to enact the drama.' He sat especially to enact the drama.

So, this Brahma Baba is not the creator. This one is a creation. Even in the new world this one will become the first and foremost creation. He is the child Krishna, is not he? Who created? It will be said that the Father created. Child Krishna will become the first Narayan of the Golden Age. So, who created him? It will be said that the Narayan before him created him. He got the title of his Father. So, he is the creation, is not he? What does this one create? Speak up. He creates the old world. Arey! My God! Who? Who creates the old world? Hm? This one (ye) refers to whom? Hm? Brahma Baba. Whom does he create? He creates the old world. Who creates the new world? Hm? The one whom Brahma created, creates the new world. So, this one is not a creation. Hm? This has to be changed. The Father says - I come to change this world, to transform this old world into a new world. That too, how do I make? Look. The change takes place in such an easy way. And this change is fixed in the drama. What? As per whatever is fixed in the drama, the Father has this part to play. What? To change. He sits and teaches you children. What? So, does He have the part to change or the part to teach? And it is about which Father? Hm? It is about the Father who is Trikaaldarshii that He teaches. And the one whom He teaches, the one in whom He enters in a permanent manner and tells, hm, he is the actor who becomes instrumental in practical in changing the old world to new world.

So, the children understand that while we become kings of heaven, then definitely this arson will take place. What? When will the new world be established? When will it be visible? As long as this old world exists, hm, the dominance of the new world will not be visible at all. So, the new world will be established when this old world is set on fire. On the one side the old world will end and on the other side the old (new) world will be ready. So, all this will be set on fire. Now this is also fixed in the drama, is not it? What? That to create the new world is also [fixed] in the drama and to destroy the old world is also [fixed] in the drama. It is correct, is not it?

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2566, दिनांक 02.07.2018
VCD 2566, Dated 02.07.2018
रात्रि क्लास 17.7.1967
Night Class dated 17.7.1967
VCD-2566-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.28
Time- 00.01-15.28


आज का रात्रि क्लास है - 17.7.1967. ये जानते तो होंगे कि ये बेहद का बाप है। और स्वर्ग की स्थापना करने आए हुए हैं। कौन बेहद का बाप? जरूर कहेंगे आए हुए हैं और पहले नहीं थे। आत्माओं का बाप ये है। जो नरक की दुनिया को स्वर्ग बनाने आए हैं। तो जब वो आए हैं तो हम स्वर्ग में जाएंगे जरूर। क्योंकि सर्वशक्तिवान बाप आया हुआ है। वो तो त्रिकालदर्शी है। जानता है कि अब मुझे जाकरके नरक को स्वर्ग बनाना है ज्ञान की पावर से। परन्तु ये भी बताय देते हैं कि स्वर्ग में तो जाना है। ये कोई बड़ी बात नहीं। स्वर्ग में जाना और प्रजापद पाना और प्रजा में भी कैटागरीज़ होती हैं। फर्स्ट क्लास प्रजा, सेकण्ड क्लास प्रजा, थर्ड क्लास, फोर्थ क्लास। प्रजा तो आधीन होगी। तो बाप क्या आधीन बनाने आया हुआ है? नहीं। बाप तो खुद स्वाधीन है। किसी के आधीन नहीं। और स्वाधीन ही बनाने आता है। परन्तु बच्चे जो तमोप्रधान बने हैं वो सतोप्रधान बनने का पुरुषार्थ ही नहीं करते। जो रास्ता बाप बताते हैं उस रास्ते पर पूरा चलते ही नहीं। तो ऊँच पद कहाँ से पाएंगे? तो यहाँ ऊच पद नहीं पाते हैं तो फिर कमजोरी रह जाती है, आत्मा रूपी रिकार्ड में। और फिर जब द्वापर, कलियुग आ जाता है, द्वैतवादी द्वापर, द्वैतवादियों का युग, दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो भाषाएं, दो-दो कुल, दो-दो मतें चलाते हैं तो फिर आराम से उनके मत में कन्वर्ट हो जाते हैं। विधर्मी बन जाते हैं।

ये तो सबको मालूम है कि सारी दुनिया तमोप्रधान है। सारी दुनिया के मनुष्य मात्र तमोप्रधान हैं। तो झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है। अर्थात् एकदम पुराना हो गया। तो पुरानी चीज़ तो विनाश होती है। लेकिन पुराने झाड़ में ही नए झाड़ की सैम्पलिंग लगाई जाती है। लेकिन नया झाड़ आए कहाँ से? तो ज़रूर कुछ ऐसी आत्माएं हैं जो बाप को पहले पहचानती हैं। और पहचानकरके बाप की मत पर पूरा चलने का प्रयास करती हैं। परन्तु वो हैं सबसे जास्ती तमोप्रधान। तो उन्हें पुरुषार्थ भी जास्ती करना पड़ता है। तो उनका पुरानापन पहले समाप्त होना चाहिए। क्योंकि जो जितना पुराना होगा उसका विनाश पहले होगा। तो बच्चे समझते हैं कि अब विनाश भी होने वाला है। ‘भी’ क्यों लगा दिया? कि जरूर विनाश होने से पहले स्थापना भी होने वाली है। तुम बच्चे, हाँ, तुम बच्चे स्थापना और विनाश में, दोनों में आगे जावेंगे। वो पुरानी दुनिया का ही तो विनाश होना है जरूर। और होता भी है। तो पुरानी दुनिया में तुम ही सबसे जास्ती पुराने हो। और विनाश तभी होगा जब पहले स्थापना हो जाए। आत्मा में जब तक दिव्य गुणों की स्थापना नहीं हुई है, आत्मा आत्मिक स्थिति में स्थित नहीं हुई है, देहभान को नहीं त्यागा है, तब तक नई दुनिया स्थापन नहीं हो सकती। और जब नई दुनिया स्थापन हो जाती है खास तुम बच्चों के संगठन के लिए तो फिर पुरानी दुनिया का विनाश होता है।

योगबल से तुम्हारी स्थापना भी होती है। विनाश भी होता है। पहले तो आत्मा सतोप्रधान बने ना। और जब आत्मा बीज सतोप्रधान बनेगा तो शरीर रूपी झाड़ भी सतोप्रधान बनता है क्योंकि योगबल से आयु बड़ी हो सकती है तो योगबल से शरीर के पांच तत्व चेंज नहीं हो सकते? हँ? हो सकते हैं। पांच तत्व भी तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हैं। तो शरीर जो है निरोगी कंचनकाया बनती है। तो पहले तो अपने अन्दर का, पुरानेपन का विनाश हो। और जरूर होता भी है। हर 5000 वर्ष के बाद पुरानी दुनिया विनाश होती है। और तुम ये जानते हो कि तुम बच्चों की संगठन की दुनिया सबसे पुरानी है। लेकिन पुरानी दुनिया का विनाश होने से पहले नई दुनिया की स्थापना होना बहुत जरूरी है। जभी किसको समझाना होता है बच्चों को तो ऐसे नहीं कहना कि पुरानी दुनिया का विनाश होना है। नहीं। कोई को घबराहट पहले नहीं करनी है। पहले क्या बताना है? नई दुनिया की स्थापना हो रही है। जब तक नई दुनिया की स्थापना नहीं हुई है तब तक पुरानी दुनिया खलास नहीं हो सकती। जब तक नई दुनिया की राजधानी स्थापन नहीं हुई है तब तक पुरानी राजधानियों में आग नहीं लगेगी। नहीं। तो हमेशा पहले कहना चाहिए कि नई दुनिया स्थापन हो रही है।

और ब्रह्मा द्वारा स्थापना। हँ? नई दुनिया की स्थापना ब्रह्मा द्वारा, तो ब्रह्मा के तो अनेक रूप दिखाते हैं। तो कौनसे मुख के द्वारा नई दुनिया की स्थापना? हँ? ऊपरवाले के द्वारा नई दुनिया की स्थापना। वो तो काट दिया जाता है। वो तो उसका तो कंटा ही कट गया। हँ? ब्रह्मा नामधारियों से ही कट्टा कट गया। वो तो आदि ब्रह्मा गया। हँ? उस पर तो ब्रह्मा नाम ही नहीं रह गया तो दूसरे का नाम पड़ता है ब्रह्मा। जिनके अन्दर प्रवेश करते हैं शिव बाप तो उसका नाम ब्रह्मा देते हैं। तो नंबरवार ब्रह्मा हुए ना। तो नई दुनिया की स्थापना कौनसे ब्रह्मा के द्वारा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) लो? इतने दिनों के बाद अटक गए। कोई जवाब नहीं। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) परमब्रह्म के द्वारा स्थापना। वाह रे परमब्रह्म। उनका सर ही कट गया। अब वो कैसे स्थापना; क्या स्थापना करेंगे? (किसी ने कुछ कहा।) जगदम्बा के द्वारा स्थापना। वाह भैया। हँ? जगत की अंबा। भंगियों की भी अंबा। हँ? शूद्रों की भी अंबा। नास्तिकों की भी अंबा। हँ? नीच ते नीच धर्मों की भी अंबा। वो स्थापना करेगी? अरे, स्थापना पवित्रता से; (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। जो नारायण के साथ लक्ष्मी दिखाते हैं ना, नर से नारायण बने, नारी से लक्ष्मी बने। तो पहले-पहले जो आदि लक्ष्मी बनी होगी वो ही तो अपनी पवित्रता के बल से नई दुनिया की स्थापना करेगी ना।

और नई दुनिया स्थूल में, साकार में होगी या निराकारी होगी? ऐसे निराकारी आत्माओं का तो जखीरा नहीं माना जाएगा नई दुनिया। तो जो साकार दुनिया है तो उसका रचयिता भी साकार ही होना चाहिए ना। तो वो संगठन पहले कौन तैयार करती है? हँ? नई दुनिया का, जिसे कहते हैं विजयमाला। तो विजयमाला भी तब स्थापन होती है; विजय काहे से होगी? ज्ञान से (होगी या) अज्ञान से? हँ? काहे से विजय होती है? ज्ञान से विजय होगी। जानकारी नहीं होगी तो विजय कहाँ से हो जाएगी? तो जब पहले पूरी जानकारी हो, तो विजयमाला का श्रेय जाता है पवित्र आत्मा के ऊपर। जिसके लिए शास्त्रों में लिखा है – जन्म-जन्म लगी रगर हमारी वरहूँ शंभु न तु रहहूं कुंवारी। तो जिसके जीवन का लक्ष्य ही है कि जब कभी भी जन्म लूं तो शंभु को वरण करूं। हँ? जो जगतपिता है उसी का वरण करूँ। कोई और का वरण न करूं। अगर पुरुष का जन्म मिलता है तो कुंवारा रहना, बाल ब्रह्मचारी बनके रहना। वाह भई। तो बाल ब्रह्मचारी बनके रहेंगे तो भी तो कोई न कोई के साथ संग के रंग में आएंगे ना कि जंगल में रहेंगे? हँ? तो जरूर जिसके संग के रंग में आएंगे वो नजदीकी उपासना करने वाला होगा। हँ? कि दूर वाला होगा? नजदीक ही होगा। तो वो गुरु हो गए वो चेला हो गए। क्या? गुरु के रूप में कौन हुआ? बाबा क्या कहते हैं? किसको गुरु बनाना पड़े? माता गुरु बिगर उद्धार हो न सके।

तो देखो, वो ही आत्मा निमित्त बनती है जो साकार में प्रैक्टिकल जीवन धारण करके एक का संग मन से, बुद्धि से, तन से, धन से, समय से, संपर्क से, संबंधियों से, हर जनम में जास्ती लेती है तो पवित्रता की ज्यादा भासना कौनसी आत्मा से आएगी? हँ? उसी आत्मा से आएगी ना। परन्तु ज्ञान नहीं है तो कोई भासना नहीं। जब ज्ञान होता है तब वो पवित्रता का बीज है अपना प्रभाव दिखाना शुरु करता है। तब नई दुनिया की स्थापना होती है। इसलिए कहते हैं कि जब तक शादी, विवाह नहीं हुआ है तब तक स्त्री पुरुष कम्पलीट? कम्पलीट नहीं होता। तो, तो पुरानी दुनिया का विनाश तो बाद में होगा। पहले ब्राह्मणों के नए संगठन की स्थापना हो। ऐसा संगठन बने कि जिस संगठन में एक भी विकारी पांव भी नहीं रख सके। क्या? स्थूल पांव की बात नहीं। बुद्धि रूपी पांव भी न रख सके। कोई कनेक्शन में न आ सके। संकल्पों में भी कनेक्शन में न आए। तो ऐसी प्यूरिफाय होगी दुनिया।

Today's night class is dated 17.7.1967. You must be aware that this is the unlimited Father. And He has come to establish heaven. Which unlimited Father? It will definitely be said that He has come and was not present earlier. This is the Father of souls who has come to transform the world of hell to heaven. So, when He has come, then we will definitely go to heaven because the Almighty Father has come. He is Trikaaldarshii (knower of the past, present and future). He knows that now I have to go and transform hell to heaven through the power of knowledge. But He also tells that you have to go to heaven. This is not a big issue. Going to heaven and achieving the post of subjects (praja) and even among the subjects there are categories. First class subjects, second class subjects, third class, fourth class. Subjects will be subordinates (aadheen). So, has the Father come to make you subordinates? No. The Father is Himself independent (swaadheen). He is not under anyone. And He comes to make you independent only. But children, who have become tamopradhan do not make purusharth to become satopradhan at all. They do not completely follow the path that the Father shows. So, how will they achieve the high post? So, when they do not achieve the high post here, then the weakness remains in the record-like soul. And then, when the Copper Age, Iron Age starts, the dualistic Copper Age, the Age of dualists, two religions, two kingdoms, two languages, two clans, two opinions, then they conveniently convert to their opinions. They become heretics (vidharmis).

Everyone knows that the entire world is tamopradhan. The human beings of the entire world are tamopradhan. So, the Tree has reached a dilapidated stage, i.e. it has become completely old. So, the old thing is destroyed. But the sampling (sapling) of the new tree is attached to an old tree only. But where will the new tree come from? So, definitely there are some such souls which recognize the Father first. And after recognizing, they make efforts to follow the Father's directions completely. But they are most tamopradhan. So, they have to make more efforts. So, their oldness should end first because the older someone is, the earlier he/she will be destroyed. So, children understand that now the destruction is also going to take place. Why did He add 'also'? It is because definitely establishment is also going to take place before destruction. You children, yes, you children will be ahead in both establishment and destruction. That old world is certainly going to be destroyed. And it does take place. So, you alone are the oldest ones in the old world. And the destruction will take place only when establishment takes place. Until the divine virtues are not established in the soul, until the soul has not become constant in soul conscious stage, unless it has shed the body consciousness, the new world cannot be established. And when the new world is established, especially for the gathering of 'you children', then the old world is destroyed.

Your establishment also takes place through the power of Yoga. Destruction also takes place. First the soul should become satopradhan, should it not? And then the soul, the seed becomes satopradhan, then the body like tree also becomes satopradhan because when the age can increase through the power of Yoga, then why cannot the five elements of the body change through the power of Yoga? Hm? They can. The five elements also become satopradhan from tamopradhan. So, the body becomes healthy, kanchankaya (gold-like). So, first the destruction of your inner oldness should take place. And it definitely takes place. The old world is destroyed after every 5000 years. And you know that the world of gathering of you children is the oldest. But before the destruction of the old world, it is very important for the establishment of the new world to take place. Whenever children have to explain to someone, then you should not say that the old world is to be destroyed. No. You should not instill fear in anyone first. What should you tell them first? The new world is being established. Unless the new world is established, the old world cannot be destroyed. Until the kingdom of the new world is established, the old kingdoms will not be set on fire. No. So, you should always say that the new world is being established.

And establishment through Brahma. Hm? Establishment of the new world through Brahma; so, many forms of Brahma are depicted. So, establishment of new world through which head/face (mukhh)? Hm? Establishment of new world through the upper one. So, that is cut off. His obstacle (kaanta) itself was cut. Hm? His name was cut off from all those who hold the title of Brahma. That first (aadi) Brahma departed. Hm? He no longer holds the title of Brahma, so the second one assumes the title Brahma. The ones in whom Father Shiv enters, He names them Brahma. So, there are numberwise Brahmas, aren't there? So, establishment of new world through which Brahma? Hm? (Someone said something.) Look? You have been stuck up after so many days. No reply. Hm?
(Someone said something.) Establishment through Parambrahm. Wow Parambrahm! His head itself was cut. Well, how will he establish, what will he establish? (Someone said something.) Establishment through Jagdamba. Wow brother! Hm? Mother of the World. She is the mother of Bhangis also. Hm? She is the mother of the Shudras as well. She is the mother of the atheists as well. Hm? She is the mother of the lowest of all religions. Will she establish? Arey, does establishment take place through purity? (Someone said something.) Yes. Lakshmi, who is depicted along with Narayan, is not she? Nar (man) should become Narayan, naari (woman) should become Lakshmi. So, only the one who would have become the first (aadi) Lakshmi first of all will establish the new world through the power of her purity, will she not?

And will the new world be in physical, corporeal form or in an incorporeal form? The new world will not be considered as the group of such incorporeal souls. So, the creator of the corporeal world should also be corporeal only, shouldn't He be? So, who readies that gathering first, hm, of the new world, which is called Vijaymala (rosary of victory)? So, the vijaymala is also established when; how will victory (vijay) be achieved? Through knowledge [or] through ignorance? Hm? How is victory achieved? Victory will be achieved through knowledge. How will victory be achieved when there is no information? So, when there is complete information, then the credit for the vijaymala goes to the pure soul for whom it has been written in the scriptures - Janma-janma lagi ragar hamaari, varahun Shambhu na tu rahahun kunwaari (It has been my resolve since many births that either I shall marry Shambhu or I shall remain a virgin.) So, the one whose goal of the life itself is that whenever I get birth, I should marry Shambhu (Shankar). Hm? I should marry the Father of the world. I should not marry anyone else. Even if I get the birth of a male, I should remain unmarried, remain celibate by birth (baal-brahmachaari). Wow brother! So, even if you remain a baal-brahmachaari, will you get coloured by the company of someone or the other or will you live in a jungle? Hm? So, definitely the one in whose company you will be coloured will be someone who worships nearby? Hm? Or will he be distant? He will be close only. So, he happens to be the guru and he happens to be the disciple. What? Who is in the form of a guru? What does Baba say? Who will have to be made a guru? One cannot be uplifted without mother guru.

So, look, the same soul becomes instrumental which inculcates in her practical life in corporeal form and receives the company of one through mind, through intellect, through wealth, through time, through contacts, through relatives the most in every birth. So, the feeling (bhaasnaa) of purity will be experienced more through which soul? Hm? It will come through the same soul, will it not? But if there is no knowledge, then there is no feeling. When there is knowledge, then that seed of purity starts showing its effect. Then the new world is established. This is why it is said that as long as a person is not married, a man or a woman is not complete. So, so, the destruction of the old world will take place later on. First the establishment of new gathering of Brahmins should take place. Such a gathering should be formed that not even a single vicious person is able to step inside that gathering. What? It is not about the physical feet. He should not be able to set even his intellect like foot inside. He should not be able to come in any connection. He should not come in connection even in thoughts. So, the world will be purified in such a manner.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2567, दिनांक 03.07.2018
VCD 2567, Dated 03.07.2018
रात्रि क्लास 17.7.1967
Night Class dated 17.7.1967
VCD-2567-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.25
Time- 00.01-16.25


रात्रि क्लास चल रहा था। पहले पेज पर, तारीख 17.1967, पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – वानप्रस्थ के बाद गुरु किया जाता है। तो वानप्रस्थ के बाद भी। इनकी वानप्रस्थ अवस्था है, वो तो आटोमेटिकली सद्गुरु आ गया, इसलिए वानप्रस्थ अवस्था हो गई। तो जब सद्गुरु आ गया है तो और सब गुरुओं को तलाक दे दिया। छुट्टी दे दी। सबको। क्योंकि सब गुरुओं के लिए बाप बोलते हैं – गुरु जिनके अंधले चेले सत्यानाश। और ये तो है सद्गुरु। ज्ञान का सागर और ये जो है गुरु ये कोई ज्ञान के सागर थोड़ेही हैं। अभी बच्चों को मालूम पड़ा है कि ज्ञान का सागर वो ही है। कौन? वही है, यही नहीं, माना ज्ञान का सागर ब्रह्मा बाबा नहीं। वो है जो यज्ञ के आदि में भी था। और तो सभी भक्ति के सागर हैं। हाँ, सागर तो हैं जरूर। तो ये गुरु लोग अपन को आलमाइटी नहीं कह सकते। वो जो सदगुरु है जो ज्ञान का सागर है वो आलमाइटी अथार्टी है। अथार्टी कहते हैं क्योंकि शास्त्रों में बहुत अच्छी तरह से पढ़ते हैं। तो वो गुरु हो गए शास्त्रों की अथार्टी। तो वो शास्त्रों की अथार्टी हैं और बाप को भी अथार्टी कहा जाता है। तो वो फिर कहते हैं – ये जो अथार्टी है, जो दुनियावी गुरु लोग हैं उनके वेद शास्त्र, ग्रंथ, आदि पढ़े हुए हैं, उनकी अथार्टी हैं। हम न पढ़े हुए। भले नहीं पढ़े हुए हैं लेकिन अब हम सबको जान गए हैं। क्या जान गए? ये सब झूठे गुरु हैं। उनमें वेद ग्रंथ उपनिषद शास्त्र वगैरा ये हैं तो सभी। लेकिन भक्तिमार्ग के लिए हैं।

भक्तिमार्ग माना अंधा मार्ग। क्योंकि भक्ति तो अनेकों से आती है ना। और अनेकों की बुद्धि में तुंडे-तुंडे मतिर्भिन्ना। अलग-अलग बातें हो जाती हैं। तो ये मैं जानता हूँ। लेकिन वेद, ग्रंथ, शास्त्र, उपनिषद पढ़ने से अथवा भक्ति करने से या भक्ति के कर्मकांड के शास्त्र पढ़ने से क्योंकि वेदों में तो सारी कर्मकाण्डों की बातें आई हैं ना। तप करो, जप करो। आसन लगाओ। प्राणायाम करो, यज्ञ करो। स्वाहा करो। तो ये कर्मकाण्ड के शास्त्र हैं। और इन कर्मकाण्डों को करने से मेरे को कोई नहीं मिलते। अब वो शास्त्र चाहे स्वधर्मियों के हों, चाहे विधर्मियों के हों। वो भी तो कर्मकाण्ड करते हैं ना। कोई मरने के बाद जलाते हैं। कोई मरने के बाद जमीन में गाड़ते हैं। कोई जो हैं, तालाब के किनारे, कुएं के किनारे छोड़ देते हैं। तो ये सब कर्मकाण्डी हैं ना। शास्त्रों के आधार पर ये कर्मकाण्ड बनाए हैं। ये बच्चे जानते हैं कि शास्त्र किसके हाथ में देते हैं। हँ? कौनसा चित्र है प्रसिद्ध जिसके हाथ में शास्त्र देते हैं? हँ? ब्रह्मा के हाथ में शास्त्र देते हैं। और किसके हाथ में शास्त्र देते हैं? रावण के हाथ में शास्त्र देते हैं। तो क्या ये, ये ऐसे क्यों दिखाया? हँ? इसका मतलब क्या हुआ? हँ? सद्गुरु के हाथ में तो शास्त्र नहीं होता। वो तो शास्त्र पढ़के नहीं सुनाते हैं। वो तो अजन्मा है। इसलिए उनको त्रिकालदर्शिता का ज्ञान है। तीनों कालों का ज्ञान रहता है। जन्म-मरण के चक्र में आते नहीं। इसलिए कुछ भूलते नहीं। तो उन्हें पढ़ने की कुछ दरकार ही नहीं।

तो बताया कि उस एक से ही आती है ज्ञान की अथार्टी। और सब गुरुओं से आती है भक्तिमार्ग की अथार्टी। माने शास्त्रों की अथार्टी। ये मैं जानता हूँ कि इन्हें पढ़ने से अथवा भक्ति करने से कर्मकाण्ड करने से, इन शास्त्रों से कोई भी मिलता नहीं है। कोई को मिला हो तो बताए। ऐसे ही कह देते हैं पार निर्वाण गया। अगर एक पार निर्वाण जाए तो अपने फालोअर्स को भी ले जाए ना। वो तो कोई नहीं ले जाते। दुनिया की आबादी तो बढ़ती जाती है ना। क्योंकि ऊपर से नई-नई आत्माएं आती रहती हैं और पुरानी यहीं जन्म-मरण के चक्र में चलती रहती हैं। कोई को रास्ता मिलता ही नहीं जो निर्वाणधाम चला जाए। और वहाँ मेरे को मिले। कोई मिलते ही नहीं हैं। तो ये बच्चे जानते हैं कि बरोबर ब्रह्मा को शास्त्र हाथ में देते हैं। क्या? कि ब्रह्मा ने जो भी सुनाया वो क्या सुनाया? हँ? कहते हैं ब्रह्मा के मुख से वेद निकले। तो वेदों में वो ही कर्मकाण्ड की बातें हैं। क्योंकि शास्त्रों को पढ़के जो ज्ञान आता है वो अपना क्रियेट किया हुआ थोड़ेही है। अपना ज्ञान क्रियेट किया हुआ अपना कब बनता है? कब बनता है? जब मनन-चिंतन-मंथन करके अपना बनाया जाए। तो ज्ञान अपना बनता है।

तो बताया, शास्त्र इसलिए दिये हैं ब्रह्मा के हाथ में क्योंकि बुद्धि में जो वेदवाणी सुनाई गई मुख से बस उतना ही रहता है। खुद का मनन-चिंतन कुछ भी नहीं। तो बताओ ब्रह्मा फिर किसका बच्चा हुआ? हँ? उसी का बच्चा हुआ जिसने उनको पहले-पहले सुनाया। हँ? और पहले-पहले जो सुना वो, सुनने का आधार पर उनको पक्का निश्चय बैठ गया कि मैं आज ये आत्मा हूँ, मेरा ये पार्ट है। तो भगवान ही ज्ञान का सागर हुआ ना। हाँ, वो ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों, ग्रंथों, शास्त्रों, वगैरा, वगैरा का राज समझा देते हैं बच्चों को। कौनसे ब्रह्मा के द्वारा राज समझा देते? हँ? जिसके हाथ में वेद-शास्त्र देते हैं उसके हाथ में है? नहीं। जो पहला-पहला ब्रह्मा है उसकी बात है जो आदि में था, वो अंत में भी प्रत्यक्ष होता है, समझता है तो दूसरों को समझाता है। हाँ, पढ़ाते नहीं हैं तुमको। कहते हैं कि ये शास्त्र आदि पढ़ने से, ये कागज की छपी मुरलियाँ आदि पढ़ने मात्र से कुछ भी प्राप्ति नहीं होती है कि पढ़ लिया, पढ़करके दूसरों को सुना दिया। जैसे कोई होते हैं। बहुत सुनते हैं। बहुत पढ़ते हैं। ज्यों का त्यों सुना देते हैं। शास्त्रों को रट भी लेते हैं। जैसे कहते हैं शंकराचार्य को आठ साल की उमर में सारे वेद याद हो गए।

तो तुम बच्चे, भल बच्चों ने बहुत पढ़े हैं शास्त्र, समझा ना। चलो, इस जनम में नहीं पढ़े हुए हैं, तो आगे जन्मों में जो पास्ट के जनम हो गए, उनमें तो बहुत ही शास्त्र वगैरा पढ़े हैं, सुने भी हैं। लेकिन प्राप्ति तो कुछ भी नहीं हुई ना। सुनते हैं, सुनाते आए हैं, परन्तु कोई भी मेरे को तो प्राप्त हुआ ही नहीं। क्योंकि बाप के सिवाय बाप का ज्ञान कोई दे ही नहीं सकता। इसलिए मुझे ही आना पड़ता है। ऐसे कोई जाकरके भगवान से मिले ऐसे नहीं हो सकता है। फिर तो भगवान को इस सृष्टि पर आने की दरकार ही नहीं। क्योंकि मैं आता हूँ, सुनाने के लिए थोड़े ही आता हूँ। सिर्फ ज्ञान सुनाने के लिए आता हूँ? किसलिए आता हूँ? हँ? मेरा लक्ष्य जो है आने का ज्ञान सुनाना है या ऐसे कहते हैं हे पतित पावन आओ और हमको ज्ञान सुनाके चले जाओ? नहीं। हम पतितों को आकर पावन बनाओ। तो पावन बनाने का रास्ता ज्ञान में बताते हैं। बाकि ज्ञान कोई साध्य थोड़ेही है? हँ? ज्ञान सुनकरके, समझकरके साधक बनते हैं। साधक बनते हैं तो इन्द्रियों को साधने का पुरुषार्थ करते हैं। इन्द्रियाँ सधी हुई रहती हैं तो शक्ति क्षीण नहीं होती।

तो मैं आता हूँ। किसलिए? पतितों को पावन बनाना मेरा लक्ष्य है। ज्ञान सुनाना लक्ष्य नहीं है। आता हूँ इनको पवित्र बनाने के लिए। हँ? इनको माने किनको? हँ? पहले-पहले किनको? लक्ष्मी-नारायण को। इनको पवित्र बनाने के लिए आता हूँ। तो कब तक काम पूरा कर लेते हैं? हँ? उनका जो काम है वो कब तक पूरा हो जाता है? हँ? उन्नीस सौ,
(किसी ने कुछ कहा।) 2026 में पूरा हो जाता है? अरे, आत्माओं को पवित्र बनाने के लिए आता हूँ कि शरीर को पवित्र बनाने के लिए आता हूँ? हँ? किसलिए आता हूँ? आत्माओं को पवित्र बनाता हूँ तो कब तक बनाता हूँ? 1976 में। 1976 में जिन आत्माओं के लिए बोला है। क्या? आता हूँ इनको पवित्र बनाने के लिए। इनको कहके किस तरफ इशारा किया? लक्ष्मी-नारायण की तरफ। तो ये पवित्र बन जाते हैं तो उनके द्वारा फिर सारी दुनिया पवित्र बनती है। फिर जब तलक आत्मा पवित्र नहीं बनी है और पवित्र नहीं बनी है तब तलक ये आत्मा वापस नहीं जा सकती। क्योंकि; क्यों नहीं जा सकती? क्योंकि पवित्र बनेगी तो हलकी बनेगी। अपवित्र रहेगी, व्यभिचार में रहेगी या विकारी बनी रहेगी तो भारी बनी रहेगी विकारों से। विकारी संकल्पों से भारी हो जाएगी। वाचा भी विकारी होती रहेगी। कर्मेन्द्रियों के कर्म भी विकारी होते रहेंगे। तो हल्की बनेगी कि भारी बनेगी? भारी हो जावेगी। वापस जा ही नहीं सकती। जैसे कोई के ऊपर ढ़ेर सारा वजन डाल दो। और फिर कहो दौड़ो। तो उसकी दौड की जो स्पीड है वो कम हो जाएगी कि बढ़ जाएगी? कम हो जाएगी। जिनके ऊपर वजन नहीं होता है तो वो तेजी से दौड सकते हैं। तो इसलिए मुझे बुलाते हैं। किसलिए? कि मैं आकरके ऐसा ज्ञान सुनाऊँ जिससे तुम बच्चे पवित्र बन जाओ।

A night class was being narrated. On the first page, date 17.1967, in the middle of the first page the topic being discussed was - One becomes the disciple of a guru after attaining the age of vaanprastha (60 years). So, even after vaanprastha. This one is in a vaanprasth stage; so, that vaanprasth stage was achieved because the Sadguru came automatically. So, when the Sadguru has come, then all other gurus were divorced. They all were left because the Father says for all the gurus that - Such disciples, whose gurus are in darkness, will be ruined. And this is Sadguru. Ocean of knowledge. And this guru is not an ocean of knowledge. Now you children have come to know that He alone is the ocean of knowledge. Who? It is He, not this one; It means that Brahma Baba is not the ocean of knowledge. It is the one who was in the beginning of the Yagya also. All others are oceans of Bhakti. Yes, they are definitely oceans. So, these gurus cannot call themselves Almighty. That Sadguru, who is the ocean of knowledge, is the Alimighty Authority. They are called authority because they study the scriptures well. So, those gurus are an authority of scriptures. So, they are authorities of scriptures and the Father is also called an Authority. So, He then says - These authorities, the worldly gurus have studied Vedas, scriptures, books, etc.; they are an authority on those scriptures. We have not studied. Although we have not studied [the scriptures] yet we have now come to know everything. What have you come to know? All these are false gurus. All these Vedas, books, Upanishads, scriptures are included in them. But they are for the path of Bhakti.

Path of Bhakti means blind path because Bhakti comes from many, doesn't it? And in the intellects of many there are as many opinions as there are heads (tunde-tunde matirbhinna). There are different topics. So, I know this. But by reading Vedas, books, scriptures, Upanishads or by doing Bhakti or by reading the scriptures of the rituals of Bhakti because all the topics of rituals have been mentioned in the Vedas, haven't they been? Do tap (penance), do jap (chanting). Do asanas (yogic postures). Do pranayama, do Yagya. Make offerings (swaha). So, these are the scriptures of the rituals. And nobody meets Me by doing these rituals. Well, be it the scriptures of the swadharmis or those of the vidharmis. They also perform rituals, don't they? Some cremate (burn) after death. Some bury in the Earth after death. Some leave it at the shores of lakes, on the edges of wells. So, all these are people who follow rituals (karmakaandi), don't they? These rituals have been framed on the basis of scriptures. Children know as to who is shown to be holding scriptures. Hm? Which picture is famous about a person holding the scriptures? Hm? Brahma is shown to be holding scriptures. Who else is shown to be holding scriptures? Ravan is depicted to be holding scriptures. So, why has it been shown like this? Hm? What does it mean? Hm? There are no scriptures in the hands of Sadguru. He does not hold scriptures and narrate. He is ajanma (one who is not born). This is why He possesses the knowledge of Trikaaldarshitaa (three aspects of time, i.e. past, present and future) He possesses the knowledge of all the three aspects of time. He does not pass through the cycle of birth and death. This is why He does not forget anything. So, there is no need for Him to read anything.

So, it was told that the authority of knowledge comes only from that One. From all other gurus comes the authority of the path of Bhakti, i.e. the authority of scriptures. I know that by reading them or by doing Bhakti or by doing rituals, nobody meets [God] through these scriptures. If anyone has found [God], then he should tell. They simply say that a person went to the other world (paar nirvaan). If one can go to the other world, then he should take his followers also, shouldn't he? Nobody takes anyone along. The population of the world keeps on increasing doesn't it, because newer souls keep on coming from above and the old ones keep on passing through the cycle of birth and death here. Nobody finds the path to go to the Supreme Abode (nirvaandhaam) and meet Me there. Nobody meets Me at all. So, the children know that definitely Brahma is shown to be holding scriptures. What? That what did Brahma narrate? Hm? It is said that Vedas emerged from the mouth of Brahma. So, the same topics of rituals are contained in the Vedas because the knowledge that one gets by reading the scriptures is not something created by oneself. When does the knowledge created by oneself become one's own? When does it become one's own? It is when one thinks and churns to make it one's own. Then the knowledge becomes one's own.

So, it was told that the scriptures have been depicted in the hands of Brahma because the Vedvaani remains in his intellect only to the extent it was spoken through his mouth. There is no thinking and churning of his own. So, then tell whose child is Brahma? Hm? He is the child of the one who narrated to him first of all. Hm? And whatever he heard first of all, on the basis of that listening, he developed the firm faith that today I am this soul, this is my part. So, God Himself is the ocean of knowledge, is not He? Yes, He explains the secret of all the Vedas, books, scriptures, etc. etc. to the children through Brahma. Through which Brahma does He explain the secrets? Hm? Is it through the one in whose hands the scriptures are depicted? No. It is about the first Brahma who was in the beginning, is revealed in the end as well; when he understands, he explains as well. Yes, he does not teach you. He says that nothing is achieved just by reading these scriptures, by reading the Murlis printed on paper, etc. that you read them and read it out for others. For example, there are some who listen a lot. They read a lot. They narrate as it is. They also learn the scriptures by heart. For example, Shankaracharya memorized all the Vedas at the age of eight.

So, you children, although children have read many scriptures, did you understand? Okay, you might not have read in this birth, but in the past births you have read and listened to many scriptures. But you did not achieve anything, did you? They listen, they have been listening, but nobody achieved Me at all because nobody except the Father can give the Father's knowledge. This is why I have to come. Nobody can go and meet God like this. Then God need not come to this world at all because when I come, I do not come just to narrate. Do I come only to narrate knowledge? Why do I come? Hm? Is My goal of coming just to narrate knowledge or do they say 'O Purifier of the sinful ones! Come' and narrate knowledge to us and go away? No. Come and make us sinful ones pure. So, He narrates the path of purification in the knowledge. But knowledge is not the goal to be achieved (saadhya). Hm? You become effort-makers (saadhak) by listening to and understanding the knowledge. When you become effort-makers, then you start making purusharth to control the organs. When the organs remain under control, then the vigour does not decrease.

So, I come. Why? My aim is to purify the sinful ones. The aim is not to narrate knowledge. I come to make these (inko) pure. Hm? ‘Inko’ refers to whom? First of all whom? To Lakshmi-Narayan. I come to make these pure. So, by when does He complete His task? Hm? By when is His task completed? Hm? Nineteen hundred,
(Someone said something.) Is it completed in 2026? Arey, do I come to make the souls pure or do I come to make the bodies pure? Hm? Why do I come? I make the souls pure; so, by when do I make them [pure]? In 1976. The souls for whom it has been said ‘in 1976’. What? I come to make these pure. Towards whom was a gesture made by uttering ‘these’ (inko)? Towards Lakshmi-Narayan. So, when they become pure, then through them the entire world becomes pure. Then as long as the soul hasn’t become pure and until it has become pure this soul cannot go back. Because; why can’t it go [back]? It is because it will become light when it becomes pure. If it remains impure, if it remains in adultery (vyabhichaar) or if it remains vicious, then it will be heavy due to vices. It will become heavy through vicious thoughts. The conversation will also keep on becoming vicious. The actions through the organs of action will also keep on becoming vicious. So, will it become light or heavy? It will become heavy. It cannot go back at all. For example, you put a lot of weight on a person. And then ask him to run. So, will his speed of running decrease or increase? It will decrease. Those who do not carry any weight can run faster. So, this is why I am called. Why? So that I come and narrate such knowledge that you children could become pure.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2568, दिनांक 04.07.2018
VCD 2568, Dated 04.07.2018
रात्रि क्लास 17.7.1967
Night Class dated 17.7.1967
VCD-2568-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.55
Time- 00.01-14.55


रात्रि क्लास चल रहा था - 17.7.1967. दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी, बाबा बताना चाहते थे कि सन्मुख मुरली सुनने से क्या फायदा है और कागज़ पे पढ़ने से या कागज़ की मुरली सुनने से क्या फायदा है? क्योंकि बाप ने तो बताय दिया – फर्स्ट क्लास है सन्मुख सुनना। सेकंड क्लास है टेप रिकार्डर से सुनना। क्योंकि टेप रिकार्डर भी एक्यूरेट सुनाता है। जैसा बोला है वैसा ही सुनावेगा। और तीसरा है कागज की मुरली में पढ़ना या कागज़ की मुरली से सुनना, सुनाना। वो थर्ड क्लास है। क्यों? क्योंकि बताया – यहाँ बैठने से तुम बच्चों को बाप याद आता है। अब जब बाप याद आता है, बाप सामने हैं, विश्वास, पक्का निश्चय बैठा हुआ है, तो बाप का वर्सा भी याद आता है। बाप का वर्सा है स्वर्ग। बेहद का बाप है ना। तो वर्सा भी बेहद का। लौकिक बाप से तो एक जनम का वर्सा मिलता है। और ये बाप तो अनेक जन्मों का सुख का वर्सा देते हैं। वो भी पक्का सुख का वर्सा। जिसमें दुख का नाम-निशान नहीं।

और फिर बाप का घर भी याद आता है। तभी बाप कहते हैं समझाकरके बच्चे कि शान्तिधाम को भी याद करो अर्थात् बाप के घर को याद करो। तुम्हारा अपना घर भी है। उसे याद करो। फिर धंधेधोरी में भी तो जाएंगे। घर में ही थोड़ेही पड़े रहेंगे। तो सुखधाम को भी याद करो। क्या धंधा-धोरी? अपने आत्मा के स्वरूप को याद करो। दूसरों को देखो तो भी आत्मिक स्वरूप में देखो। बस यही तुम्हारा धंधा है। स्वर्ग में और कोई और धंधा नहीं। और फिर जो अंदरूनी चीज़ है वो भूल जाओ। क्या? देहभान। है ना? कोई समझो पुराने मकान में बैठे हैं। ऐसे बहुत हैं जो बड़े-बड़े पुराने मकान में बैठे होते हैं। और नया मकान भी बड़ा बनाना चाहते हैं। है ना। किसके पास बहुत नया, किसके पास पुराना मकान पड़ा है। पूरी हवेली है। तो हवेली से भी बड़ा मकान उनको बनाना पड़े। क्योंकि परिवार बढ़ गया ना। तो देखो, ये दुनिया में भी मकान बनाने में कितना टाइम लगता है। चलो, आजकल मकान बनाने में ज्यादा टाइम नहीं लगता, लेकिन पैसा इकट्ठा करने में तो टाइम लगता है ना। यहाँ तो देखो 7-8 बरस लग गए। ठीक है ना।

तो ये कर्मातीत अवस्था बने तो तुम नए मकान में जावेंगे। और फिर तुम जानते हो तुमको अमरलोक में ही आना है। क्या? इस मृत्युलोक में वापस नहीं आना है। बेहद बाप के घर में गए तो ये दुखधाम आधा कल्प के लिए खलास। मान लो कोई आधा कल्प सुखधाम में नहीं रहता है। कम जन्म लेता है। तो भी दुखधाम में तो नहीं आवेगा। शांति में ही पड़ा रहे। बाद में सुखधाम आ जाए। हाँ, ये बात तो पक्की है कि इस मृत्युलोक में तो आना ही नहीं है। यहाँ तो मृत्यु का दुख भोगना पड़ता है। मरते समय कैसे-कैसे घाबड़े आते हैं। मौत से तो सभी डरते हैं। हाँ, ये है कि कोई-कोई ब्राह्मण बीच में टाइम में छोड़ के चले जाते हैं, फेल हो जाते हैं, तो अगर आएंगे भी तो कोई सदाकाल के लिए थोड़ेही आएंगे। थोड़े टाइम के लिए आएंगे फिर वापस जावेंगे। तब तलक ये पुरानी छी-छी दुनिया, इस दुनिया के मनुष्य चले जाएं और फिर नए मनुष्य। यहाँ खाली जाकरके बाकि नए बचें। पुराने चले जाएं। क्योंकि पुराना नए के साथ नहीं रहना है। तो जैसे अभी भी पुराने, नए इकट्ठे हैं ना। रास्ते बदल अदल सदल होती रहेगी। ऐसे करके बाकि जाकरके नई दुनिया बनेगी।

इस नई दुनिया में सभी नए बन जाएंगे। नए बन जाएंगे? आत्मा भी नई तो शरीर भी नया। उसमें सबसे नया कौन बनेगा? हँ? कोई तो होगा ना जो सबसे नया बनेगा। हँ? क्या कहा? उसका नाम क्या? टाइटल क्या दिया? बाबा ने नाम दिया है, नाम दिया है न्यू मैन आफ दि वर्ल्ड। इस दुनिया में ही प्रसिद्ध हो जाएगा। और वो सबसे पुराना। और वो सबसे नया पहले-पहले बन जाएगा। हँ? उनके साथ-साथ कौन होंगे? उनके साथ-साथ ये तुम भी होंगे। कहाँ की बात बताई? हँ? कौनसे धाम की बात बताई? वैकुण्ठ की बात बताई। हँ? वैकुण्ठ में विष्णु का राज्य होगा ना। कहते हैं कृष्ण का राज्य होगा। नारायण का राज्य। परन्तु संगमयुगी कृष्ण की बात है। सतयुग में जो नारायण बनेंगे वो तो बाद में नंबरवार बनेंगे। परन्तु, यहाँ पुरुषोत्तम संगमयुग में जो पुरुषों में उत्तम बनते हैं, वो तो सबसे नया मकान हो गया। नई दुनिया हो गई। और वो सबसे पुराना सो सबसे नया बन गया। क्या बन गया? हँ? ऊँच ते ऊँच पदधारी बन गया। विष्णु पद।

तो देखो, चित्र बने हुए हैं ना भक्तिमार्ग में। हँ? विष्णु के चित्र बने हैं कि नहीं? तुम भी होंगे। अभी भी तुम्हारे साथ हैं ना। कौन? हँ? दुनिया का सबसे पुराना मैन, ओल्ड मैन है, वो अभी भी तुम्हारे साथ है ना। तो तुम्हारे बिगर तो क्या चलेगा? हँ? वो अकेला जाना चाहे तो चला जाएगा? नहीं। तो ऐसे थोड़ेही है कृष्ण। तो प्रजा होगी नहीं। बाबा को वैकुण्ठ में कृष्ण ही याद आता है। अब वैकुण्ठ में कृष्ण की बात थोड़ेही है। वो अपन को समझते हैं। क्या? कि सतयुग की आदि में जो जनम मिलेगा वो हमारा वैकुण्ठ में जनम होगा। जो अंग्रेजों में गाया जाता है पैराडाइज, हैविनली पैराडाइज। मुसलमानों में गाया जाता है जन्नत। तो क्या मुसलमान और वो क्रिश्चियन्स जो अपने धरम के पक्के होते हैं उनको भी उसकी भनक लग जाती है क्या? कि इसी दुनिया में वैकुण्ठ भी है, इसी दुनिया में वो स्थिति भी है जहाँ दुख का नाम-निशान नहीं है। सारी दुनिया हाहाकार करेगी, उन्होंने तो अपने शास्त्रों में भी लिख दिया - कयामत के समय खुदा के बंदे बड़े मौज में रहेंगे। तो क्या वो क्रिश्चियन्स और वो मुसलमान जो अपने धरम के पक्के हैं, कभी कन्वर्ट नहीं होते, उनको भी पता चलता है जो उनके शास्त्रों में लिखा हुआ है? हाँ, पता तो चलेगा ना। दुनिया तो एक ही है।

बाप आकरके नरक की दुनिया के बीच तुमको स्वरग के सुख देते हैं। तो उसे स्वर्ग नहीं, स्वर्ग से भी ऊँचा, ब्रह्मा कुमारियाँ गीत गाती हैं ना - स्वर्ग से सुन्दर संगमयुग है। गीत गाती हैं लेकिन उन्हें पता नहीं है कौनसा संगम। वो समझती हैं हमने महल माडियाँ अटारियाँ बना लिए। बस ये ही संगमयुग सबसे ऊँचा है। ये ही हमारा वैकुण्ठ है। अभी थोड़े दिन के, थोड़े टाइम के बाद पता चलेगा क्या वैकुण्ठ है और क्या कुंठा है? तो प्रजा भी होगी। नहीं, प्रजा जरूर होगी। तो प्रजा होगी। ये अदल-बदल कैसे होती है? सो तो तुम आगे चलकरके देखेंगे। कि ये अदलबदल कैसे होती है? हँ? जो रावण संप्रदाय वाले हैं वो सब चले जाएंगे। कौन-कौनसे सिर बताए रावण के? कामी इस्लामी; क्रोधी क्रिश्चियन्स; लोभी मुस्लिम; हैं या नहीं? कोई कहे कि मुसलमान लोभी नहीं। नहीं? क्यों? क्या लोभ करते हैं? बढ़िया-बढिया माल तो सभी बना-बना के खाते हैं। क्या बात हो गई? हँ? हाँ। वो लूटपाट करते हैं। वो हिंसा करते हैं। हिंसा करके, दुख देकरके भी वो अपने लोभ की पूर्ति करते हैं। तो ये तो अंधकार में आ गए। ऐसे फिर स्वर्ग में कैसे जा सकते? वैकुण्ठ की बात तो छोड़ो। बस, कानों से सुनेंगे, अखबारों में पढ़ेंगे, रेडियो में सुनेंगे, टेलिविजन में देखेंगे कि हाँ, ऐसी भी दुनिया। लेकिन जाय नहीं सकते। क्यों? बताय दिया। क्या बताय दिया? क्यों नहीं जा सकते? हँ? बताय दिया कि तुम ब्राह्मणों का संगठन ऐसा बन जावेगा जिसमें एक भी विकारी प्रवेश कर नहीं सकेगा। तो बताया कि रावण संप्रदाय सभी चले जावेंगे। और राम संप्रदाय जभी फिर कैसे यहाँ आ जाती है वो फिर आगे चलकरके देखना। अभी ब्रह्मा बाबा के थ्रू नहीं बताएंगे। हँ? और देखना तो सबको है जरूर।

A night class dated 17.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was, Baba wanted to tell that what is the benefit in listening to the Murli face to face (sanmukh) and what is the benefit in reading or listening to the Murlis printed on paper. It is because the Father has told that to listen face to face is first class. Listening through tape recorder is second class because tape recorder also narrates accurately. It will play in the same way as has been spoken. And third is to read the Murli printed on paper or to listen or narrate from Murli printed on paper. That is third class. Why? It is because it was told - The Father comes to the mind of you children when you sit here. And when the Father comes to the mind, when the Father is in front of you, when you have faith, firm faith, then the Father's inheritance also comes to the mind. The Father's inheritance is heaven. He is an unlimited Father, is not He? So, the inheritance is also unlimited. You get inheritance of one birth from the lokik (worldly) Father. And this Father gives the inheritance of many births. That too the inheritance of firm happiness which does not contain any name or trace of sorrows.

And then the Father's home also comes to the mind. Only then does the Father explain and say that children remember the abode of peace also, i.e. remember the Father's home. It is your own home as well. Remember it. Then you will go for business, etc. also. Will you remain at home? So, remember the abode of happiness as well. Which business? Remember the form of your soul. Even when you see others, see them in their soul form. That is all; this alone is your business. There is no other business in heaven. And then forget the internal thing. What? Body consciousness. is not it there? Suppose someone is sitting in an old house. There are many who sit in big, old houses. And they also want to build a big, new house. Is it not? Some have a very new and some have an old house. They have a complete haveli (an old style residential building). So, they have to build a house bigger than the haveli because the family has grown bigger, hasn't it? So, look, it takes so much time to build a house in this world also. Okay, now-a-days it does not take much time to build a house, but it does take time to collect money, doesn't it? Look, here, it took 7-8 years. It is correct, is not it?

So, you will go to the new house when you achieve this karmaateet stage. And then you know that you have to come to the abode of eternity only. What? You don't have to come back to this abode of death. If you go to the unlimited Father's home, then this abode of sorrows ends for half a Kalpa. Suppose someone does not live in the abode of happiness for half a Kalpa. Suppose he gets fewer births. Yet, he will not come to the abode of sorrows. He may remain in peace. And then come to the abode of happiness. Yes, it is sure that he doesn't have to come to this abode of death. Here you have to suffer the sorrows of death. One fears so much at the time of death. Everyone fears death. Yes, it happens that some Brahmins leave in between at some time, fail, then even if they come, they will not come forever. They will come for some time and then go back. Until then the human beings of this old, dirty world, this world depart and then new human beings. Only the new ones should remain. The old ones should depart. Because the old is not supposed to remain with the new. So, just as even now old and new are together, aren't they? The paths will keep on changing. In this manner the new world will be established.

Everyone will become new in this new world. Will they become new? The soul as well as the body will be new. Who will become the newest among them? Hm? There must be someone who becomes the newest. Hm? What has been said? What is his name? What was the title given? Baba has given a name; the name assigned is ‘new man of the world’. He will become famous in this world itself. And he is the oldest one. And he will become the newest one first of all. Hm? Who all will be with him? Along with him, you will also be there. It is a topic of which place? Hm? Topic of which abode was mentioned? The topic of Vaikunth was mentioned. Hm? There will be a kingdom of Vishnu in Vaikunth, will there not be? It is said that there will be a kingdom of Krishna. The kingdom of Narayan. But it is about the Confluence Age Krishna. Those who become Narayans in the Golden Age will become numberwise later on. But, here, in the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age) the one who becomes the highest one among all souls (purush) happens to be the newest house. It is the new world. And that oldest one became the newest one. What did he become? Hm? He became the holder of the highest post. The post of Vishnu.

So, look, pictures have been made on the path of Bhakti, haven’t they been? Hm? Have the pictures of Vishnu been made or not? You will also be there. Even now he is with you, isn’t he? Who? Hm? The oldest man, old man of the world is now with you, isn’t he? So, will he go without you? Hm? Will he go if he wishes to go alone? No. So, it is not as if Krishna. So, there will not be the subjects (praja). Whenever Baba thinks of Vaikunth he remembers Krishna only. Well, it is not about Krishna in Vaikunth. He thinks of himself. What? That the birth that I will get in the beginning of the Golden Age will be my birth in Vaikunth. It is praised among the Englishmen as Paradise, heavenly paradise. It is praised among the Muslims as Jannat. So, do the Muslims and the Christians also, who are firm in their religion, get the inkling that there is Vaikunth also in this very world, that stage also exists in this world itself where there will not be any name or trace of sorrows. The entire world will be crying in despair; they have even written in their scriptures – The people of Khuda (Allah) will be very happy at the time of destruction (kayamat). So, do those Christians and those Muslims, who are steadfast in their religion and never convert, get to know whatever has been written in their scriptures? Yes, they will do know, will they not? The world is one only.

The Father comes and gives you the joys of heaven amidst the world of hell. So, it is not called just heaven, but higher than heaven; Brahmakumaris sing a song, don’t they? Swarg se sundar Sangamyug hai (The Confluence Age is more beautiful than heaven). They sing the song, but they do not know as to which Confluence Age it is. They think that they have built palaces and buildings. That is all. This Confluence Age itself is the highest one. This itself is our Vaikunth (heaven). They will know after a few days, after a little time as to what Vaikunth is and what is kuntha (frustration)? So, there will be subjects (praja) as well. No, praja will definitely be there. So, there will be praja. How does this transformation (adal-badal) take place? You will see that in future that how this transformation will take place? Hm? All those who belong to the Ravana community will depart. Which all heads of Ravan have been described? Lustful Islamic people, wrathful Christians; greedy Muslims; are they or are they not? Someone may say that Muslims are not greedy. Are they not? Why? Which greed do they show? Everyone cooks and eats nice delicacies. What is this? Hm? Yes. They loot. They indulge in violence. Even by indulging in violence, by causing sorrows they satiate their greed. So, they came in darkness. How can such persons then go to heaven? Leave alone the topic of Vaikunth. They will just listen through the ears, read in newspapers, listen on the radio, see in the television that yes, there is one such world also. But they cannot go. Why? It was told. What has been told? Why can’t they go? Hm? It was told that the gathering of you Brahmins will become such that not even a single vicious person will be able to enter in it. So, it was told that all those who belong to the Ravana community will depart. And you observe in future as to how the Ram community comes here. It will not be told now through Brahma Baba. Hm? And everyone has to definitely observe.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 31 May 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2569, दिनांक 05.07.2018
VCD 2569, Dated 05.07.2018
प्रातः क्लास 23.7.1967
Morning Class dated 23.7.1967
VCD-2569-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.32
Time- 00.01-13.32


आज का प्रातः क्लास है – तारीख 23.7.1967. मंगलवार को वाणी चली है, ब्रैकेट में लिख दिया है रविवार। मीठे बच्चे, कभी सन्मुख हैं कभी दूर चले जाते हैं। हँ? ये कैसे? सन्मुख हो जाते हैं और कभी दूर चले जाते हैं। ये कैसे? हँ? मनसा से दूर चले जाते हैं? माने शरीर से बाबा के पास रहते हैं? हँ? गो सून, कम सून। माने शरीर से गो सून कम सून? जो कम सून करते हैं तो बाबा के सन्मुख आ जाते हैं और गो सून करते हैं तो दूर चले जाते हैं। ये मतलब? लेकिन बोला है मीठे बच्चे। हँ? मीठे बच्चे कभी भूत-प्रेत बनते हैं क्या? हँ? बनते हैं? नहीं। फिर? यहाँ तो सन्मुख ब्रह्मा बाबा बैठा हुआ है देह से। ब्रह्मा बाबा के बच्चे भी ऐसे ही होंगे। देह से सन्मुख बैठे हैं, बुद्धि पता नहीं कहाँ जाती है। ज्ञान की बात तो पकड़ती नहीं पूरी। (किसी ने कुछ कहा।) सर्विसेबुल बच्चे मीठे हैं? अच्छा? इसका मतलब विजयमाला की जो हैड है, जो ब्रह्मा बाबा के सन्मुख ही रहती है देह से भी, आत्मा से भी, वो सर्विसेबुल नहीं है? या है? वो है सर्विसेबुल। और जो मीठे बच्चे हैं वो? मीठे बच्चे किस अर्थ में कहा? हँ? मीठे बच्चे किस अर्थ में कहा? रूहानी स्टेज में मीठे बच्चे। और देहभान आया, देहअहंकार आया तो फिर मीठे थोड़ेही रहेंगे। फिर तो कडुवे हो जाते हैं।

तो मीठे बच्चों की खासियत बताई कि कभी सन्मुख हैं, कभी दूर चले जाते हैं। तो वो अपने आप दूर चले जाते हैं या नज़दीक आते हैं, या बाबा उन्हें याद करते हैं तो इमर्ज हो जाते हैं? हँ? चलो, कुछ भी समझ लो। इसको सन्मुख तो नहीं कहेंगे। क्या? कभी नज़दीक आएं कभी दूर चले जाएं। तो सन्मुख किसको कहेंगे? हँ? तो सन्मुख फिर वो ही रहते हैं जो याद करते हैं। श्वासों श्वास याद करते हैं। निरंतर याद करते हैं तो वो सन्मुख रहते हैं। बाकि देह से सन्मुख रहना, कंधे पे चढ़े बैठे रहना, वो कोई नज़दीक आना नहीं है, सन्मुख होना नहीं है। क्योंकि याद की यात्रा में ही सब कुछ समाया हुआ है। क्या? रेल की यात्रा करके आते हैं, बस की यात्रा करके आते हैं। हवाई जहाज़ की यात्रा करके आते हैं। उसमें सब कुछ नहीं समाया हुआ है। हँ? ये जो गाया जाता है बच्ची नज़र। अभी आत्मा की तो नज़र जाती है। अभी देह में जाती है। परमपिता में। और तो उनको कुछ अच्छा ही नहीं लगता है। क्योंकि उनको वो याद करने से ये विकर्म विनाश होने हैं। हँ? क्या याद करने से? हँ? उनको अच्छा ही नहीं लगता है। क्या अच्छा नहीं लगता है? हँ? उनकी नज़र कहाँ जाती है? नज़र से निहाल किंदा प्यारा सद्गुरु। जिनको नज़र में ही सब कुछ नज़र आता है तो नज़र उनकी नज़र में तो, दिल से दिल को राहत होती है ना।

तो अभी देही में, आत्मा में नज़र जाती है। आत्मा अर्थात् ब्रह्मा के अन्दर परमपिता। सुप्रीम सोल। वो तो देही है ना। कि देह है? नहीं। वो तो देही है। देही माने देह को धारण करने वाली। तो इनकी बच्चों की नज़र परमपिता में जाती है। उनको दुनिया में कुछ और अच्छा ही नहीं लगता। तो उन परमपिता को याद करने से विकर्म विनाश होने हैं। क्या? इस देहधारी ब्रह्मा को याद करने से नज़र, पाप कर्म विनाश नहीं होंगे। तो कितनी अपने ऊपर खबरदारी रखनी चाहिए। क्या? कहीं हमारी नज़र ये गोरे-चिट्ठे, लम्बे-चौड़े ब्रह्मा के ऊपर तो नहीं जाती है? हँ? नज़दीक रहें या दूर हैं तो जो हमारी तीसरी आँख है, आत्मा की आँख वो किसको याद करती है? हँ? क्योंकि ये पता है इनको, परमपिता सुप्रीम सोल की आत्मा को याद करेंगे, तो विकर्म विनाश होंगे।

और हाँ, परमपिता पिता है ना। तो अम्मा के द्वारा प्रत्यक्ष होगा या पिता के द्वारा प्रत्यक्ष होगा? इस सृष्टि का भी जो मनुष्य सृष्टि का परमपिता है वो तो आदम है, एडम, आदम, आदि देव, आदि नाथ। उसी के द्वारा प्रत्यक्ष होगा ना। क्योंकि सारी सृष्टि बाप को पहचानेगी ना। इसीलिए तो बोला है फादर कहे और फादर कभी मिले ही नहीं, फादर कैसे हो सकता है? सारी दुनिया की जितनी भी आत्माएँ हैं सबसे आकर मिलते हैं। तो कैसे? क्या सुप्रीम सोल मिलता है उनके द्वारा? हँ? सुप्रीम सोल तो नहीं मिल पाता है। हाँ, वो आदम सुप्रीम सोल की याद से जैसी सुप्रीम सोल की रूह है उसके समान रूह बन जाती है। तो समान बन जाती है। सुप्रीम सोल बाप तो नहीं बन जाती? नहीं। और बनना भी नहीं है। क्यों नहीं बनना है? क्योंकि सुप्रीम सोल बाप तो बड़ा सन्यासी है। दुनिया का सबसे बड़ा सन्यासी जिनका बहुत मान होता है। हँ? बड़े ते बड़े सन्यासी का नाम क्या है भारत में? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) बड़े से बड़े सन्यासी का नाम शंकर है? वो सन्यासी है? तुम्हारी की मैंने कही थी। हँ? भीष्म पितामह। तो, तो भीष्म पितामह का देखो कौरवों में भी मान है, पाण्डवों में भी मान है, कितना मान होता है। और जो यादवों का हैड है, जिसे भगवान श्री कृष्ण कह दिया शास्त्रों में, वो भी कितनी मान्यता देता है! हाँ। तो देखो, सन्यासियों का तो बहुत मान होता है। सं माने संपूर्ण, न्यासी माने त्यागी। संपूर्ण त्यागी। क्या? न देह चाहिए, न देह का सुख चाहिए, न कर्मेन्द्रियां चाहिए, न कर्मेन्द्रियों का सुख चाहिए। न ज्ञानेन्द्रियाँ चाहिए, न ज्ञानेन्द्रियों का सुख चाहिए। क्या? बस। एकांतवासा, न झंगड़ न झांसा। अब, वो तो ठीक है। लेकिन सृष्टि तो चलेगी कि विनाश हो जाएगी? सृष्टि को तो चलाना ही है।

तो ये सृष्टि का चलाना ही वास्तव में ऊँचे ते ऊँचे भगवन्त का काम है। तो इस सृष्टि पर आकरके वो चैतन्य बर्तन तैयार करता है नए-नए। क्या? वो कहते हैं कुम्हार। संस्कृत में उसका शुद्ध शब्द है – कुंभकार। क्या करता है? कुंभ माने घड़ा बनाता है। मिट्टी का घड़ा। तो मिट्टी का घड़ा बनाने के लिए क्या करता है इस सृष्टि में आकरके? वो उसके पास क्या चीज़ है जो मिट्टी के घड़े बनाता है और वो घड़े, बर्तन, जिन्हें पात्र कहा जाता है, बस, बढ़िया-बढ़िया ज्ञान सुनाते रहते हैं। कुंभ में जल भरा जाता है ना। तो नंबरवार ज्ञान जल भरा हुआ है। मनुष्यों में, देव आत्माओं में, राक्षसी आत्माओं में भी। तो वो ज्ञान जो है उसको कहा जाता है दंड। क्या? अगर प्यार से माने तो अच्छी बात है। और अगर नहीं मानते तो प्यार से जो नहीं मानेगा वो मार से तो मानना ही पड़ेगा। तो कहते हैं डंडे से तो खुद भूत भी भाग जाते हैं।

तो वो डंडा ज्ञान का लेके आता है और इस सृष्टि चक्कर में जोर से घुमाता है। क्या? एक बार ज्ञान का चक्कर घुमा दिया अच्छी तरह से, फिर वो 5000 साल तक वो चक्कर घूमता रहता है, घूमता रहता है, घूमता रहता है। पहले-पहले बड़ा मटका तैयार करता है। क्या? छोटा मटका नहीं। क्योंकि मीठे बच्चे बनाने हैं कि कड़ुवे ही बन जाएंगे? मीठे बच्चे वो जिनमें बहुत ज्यादा ज्ञान जल समा जाए। तो बड़ा मटका तैयार करता है। और, तो जो छोटे-बड़े बर्तन बनते हैं, वो अपने-अपने तरीके से पात्र हैं। ड्रामा में पात्र होते हैं ना ड्रामा करने के। तो अपना-अपना तरीके का पार्ट बजाते हैं। उनमें पहचान देता है कि तुम मि्ट्टी के पात्र नहीं हो। क्या? तुम तो आत्मा हो। रूह हो, रूह। तो परमपिता का कहना है तुम रूह को याद करेंगे, लेकिन अकेली रूह को याद करने से कुछ बात बनेगी नहीं। रूह को याद करने के साथ-साथ पहले अपनी आत्मा को याद करो। अपनी रूह को याद करो। और फिर जिसमें मैं प्रवेश करता हूँ, जिस बड़े मटके में पहले उसको पहचानो। और फिर उसमें मेरे को याद करो।

Today's morning class is dated 23.7.1967. The Vani was narrated on Tuesday; it has been written Sunday within brackets. Sweet children are sometimes face to face (sanmukh) and sometimes they go far away. Hm? How does this happen? They come face to face and sometimes go far away. How does this happen? Hm? Do they go far away through their mind? Does it mean that they remain close to Baba through body? Hm? Go soon, come soon. Does it mean go soon, come soon through body? Those who come soon, come face to face with Baba and those who go soon become distant. Does it mean so? But it has been said - Sweet children Hm? Do sweet children ever become ghosts and devils (bhoot-pret)? Hm? Do they become? No. Then? Here Brahma Baba is sitting face to face through his body. Brahma Baba's children will also be like that only. They are sitting face to face through the body; it is not sure where their intellect roams. It does not grasp the topic of knowledge completely.
(Someone said something.) Are the serviceable children sweet? Achcha? Does it mean that the head of Vijaymala (rosary of victory), who remains face to face with Brahma Baba through the body as well as the soul, is not serviceable? Or is she? She is serviceable. And what about the sweet children? In what sense was it said 'sweet children'? Hm? In what sense was it said 'sweet children'? Sweet children in spiritual stage. And if body consciousness emerges, ego of the body emerges then will they remain sweet? Then they become bitter.

So, a specialty of the sweet children was mentioned that they are sometimes face to face and sometimes they go far away. So, do they go far away or come close on their own or do they emerge when Baba remembers them? Hm? Okay, you may think as you wish. This is not called face to face (sanmukh). What? Someone may come close sometimes and go far away sometimes. So, who will be called sanmukh? Hm? So, only those who remember Him remain sanmukh. They remember in every breath. When they remember continuously, they remain sanmukh. But remaining face to face physically, to sit on someone's shoulders is not called coming close or coming face to face because everything is contained in the journey of remembrance only. What? People come after performing rail journey, bus journey. They come after performing journey by airplane. Everything is not contained in that. Hm? Daughter, 'nazar' (vision) is praised, is not it? Now the soul observes. Now it observes the body. It observes the supreme Father. And they don't like anything else because these sins are to be burnt by remembering Him. Hm? By remembering what? Hm? They do not like at all. What do they not like? Hm? Where do their eyes turn? Nazar se nihaal kinda pyara sadguru (Dear Sadguru uplifted me by glancing at me). Those who see everything in the eyes, if the eyes are looking at the eyes, the heart feels comfort through another heart, doesn't it?

So, now the eyes look at the dehi, the soul. The soul, i.e. the Supreme Father within Brahma. The Supreme Soul. He is dehi (soul) is not He? Or is He a body? No. He is a soul. Dehi means the one who assumes the body. So, the eyes of the children look at the Supreme Father. They do not like anything else in the world. So, the sins are to be burnt by remembering that Supreme Father. What? The sins will not be burnt by remembering this bodily being, Brahma. So, one should be so careful about oneself. What? Do our eyes look at this fair and handsome, tall and sturdy Brahma? Hm? We may be close or far away, but whom does our third eye, the eye of the soul remember? Hm? It is because they know that if we remember the soul of the Supreme Father Supreme Soul, then our sins will be burnt.

And yes, the Supreme Father is a Father, is not He? So, will He be revealed through the mother or through the Father? The Supreme Father of this world, this human world is Aadam, Adam, Aadi Dev, Aadinath. He will be revealed through him only, will He not be? It is because the entire world will recognize the Father, will it not? This is why it has been said that how can the one who calls himself a Father and that Father never meets [the children] be a Father? He comes and meets all the souls of the entire world. So, how? Does the Supreme Soul meet through them? Hm? The Supreme Soul is unable to meet. Yes, that Aadam becomes a soul equal to the Supreme Soul by being in the remembrance of the Supreme Soul. So, it becomes equal. Does it become Supreme Soul Father? No. And he is not going to become as well. Why is he not going to become? It is because the Supreme Soul Father is the biggest Sanyasi. He is the biggest Sanyasi of the world who commands a lot of respect. Hm? What is the name of the biggest Sanyasi in India? Hm?
(Someone said something.) Is the name of the biggest Sanyasi Shankar? Is he a Sanyasi? I had told you. Hm? Bhishma Pitamah. So, so, look, Bhishma Pitamah is respected by the Kauravas as well as the Pandavas. He is respected so much. And the head of the Yadavas, who has been called God Shri Krishna in the scriptures, also gives him so much respect. Yes. So, look, the Sanyasis are given so much respect. Sam means sampoorna (perfect/complete), nyasi means 'tyaagi' (one who sacrifices/renounces). Complete tyaagi. What? Neither the body is required, nor the pleasures of the body are required, neither the organs of action are required nor the pleasures of the organs of action are required. Neither the sense organs are required nor are the pleasures of the sense organs required. What? That is all. Ekaantvasa, na jhangar na jhaansaa (Living in solitude, neither dispute nor delusion) Well, that is correct. But, will the world continue or will it be destroyed? The world is to be definitely continued.

So, to run this world itself is the task of the highest on high God. So, after coming to this world He prepares new living utensils. What? They call him kumhaar (potter). Its original word in Sanskrit is - Kumbhkaar. What does he do? He prepares kumbh, i.e. pots. Clay pot. So, what does He do to prepare clay pot by coming to this world? What does He have that He prepares clay pots and those pots, those utensils, which are called actors (paatra), keep on narrating nice knowledge. Water is filled in a pot, is not it? So, numberwise water of knowledge is contained in them. In the human beings, in the deity souls, in the demoniac souls also. So, that knowledge is called dand (stick). What? If they obey lovingly, then it is good. And if they do not obey, if someone does not obey lovingly, then he will definitely have to obey on being beaten. So, it is said that even the ghosts run away through sticks.

So, He comes with the stick of knowledge and rotates it strongly in this world cycle. What? He rotates the cycle of knowledge nicely once and then that cycle keeps on rotating, keeps on rotating, keeps on rotating for 5000 years. First of all He prepares a big pot. What? Not a small pot because are sweet children to be produced or will they be prepared as bitter ones? Sweet ones, in whom a lot of water of knowledge can assimilate. So, He prepares a big pot. Other small and big utensils that are prepared are actors (paatra) of their own kind. There are actors who enact a drama, aren't there? So, they play their individual parts. He enables them to realize that you are not utensils (paatra) made up of clay. What? You are a soul (aatma). You are a soul, soul (rooh). So, the Supreme Father says - If you remember the soul, but if you remember the soul alone, then it will not suffice. Along with remembering the soul, first you remember your soul. Remember your soul. And then first realize the big pot in which I enter. And then remember Me in him.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 01 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2570, दिनांक 06.07.2018
VCD 2570, Dated 06.07.2018
प्रातः क्लास 23.7.1967
Morning Class dated 23.7.1967
VCD-2570-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.24
Time- 00.01-14.24


प्रातः क्लास चल रहा था - 23.7.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – सद्गुरु की निंदा कराने वाले, वो जो ठोर कहते हैं, वो क्या है? हँ? वो तो सन्यासी लोग ऐसे ही बोलते रहते हैं – ठौर नहीं मिलेगा, हमारी निंदा कराएंगे (तो)। हम सद्गुरु बनके बैठे हैं। अब वो सद्गुरु तो कोई होते नहीं हैं। सब झूठे गुरु। सिक्खों में तो गाया हुआ है – सद्गुरु एक अकालमूर्त। तो जो एक सदगुरु है उसकी क्या ठौर है? हँ? उसके भी पास क्या ठौर है? वो तो खुद ही परमधाम का वासी है। शांतिधाम ठौर है? हाँ। लेकिन हिसाब ये है कि जो जितना पहले जाएंगे उतना ऊँचा ठौर मिलेगा। इस संसार में भी पार्ट बजाएंगे तो नीचा पार्ट नहीं बजाएंगे। जो पहले पुरुषार्थ करके पहुँचेंगे वो।

तो जो वो कहते हैं कि ठौर नहीं मिलेगा कि हम नारायण बनेंगे या लक्ष्मी बनेंगे। भई, वो नहीं तुमको मिल सकेगा। इसलिए अभी से ही पुरुषार्थ करते रहो क्योंकि इसमें तुम बहुत शीतल बन जाएंगे। किसमें? हँ? जो याद का पुरुषार्थ है उस याद के पुरुषार्थ में तुम बहुत शीतल बन जावेंगे। तुम्हारे ये जो भी अन्दर में ये पांच विकार की ये अभी सभी बातें हैं वो सब निकल जाएंगी ऐसे करने से। कैसे करने से? याद में रहने से। तो बाप ही बाप। बाप के अलावा और कोई बात ही नहीं। जहाँ देखने में आए वहाँ बाप। जैसे वो भक्तिमार्ग में कहते हैं ना राधे ही राधे। जहाँ देखो वहाँ राधे। अब बाप कहते हैं कि मेरे को याद करने के लिए तुम बुद्धियोग लगाएंगे तो वो ताकत मिल जाएगी। और बहुत ताकत मिल जाएगी। तो बाप ही बाप को याद कर। हँ? ये क्या बात? इसका क्या मतलब कि बाप ही बाप को याद करें? हँ? इसका मतलब है एक निराकार बाप और एक साकार सृष्टि का बाप।

तो साकार सृष्टि का बाप, अगर इस दुनिया में सन्यासियों जैसा मान-मर्तबा जो मिलता है उन्हें, कितना मान-मर्तबा मिलता है! ऐसी स्टेज अगर बनानी है तो इस साकार मनुष्य सृष्टि के बाप को भी बाप ही को याद करना पड़े। सुप्रीम सोल को याद करना (पड़े)। या कोई भी धरमपिताएं अगर वो अपने जेनरेशन में ऊँच पद पाना चाहते हैं तो क्या करना पड़े? निराकार को याद करना पड़े। फिर साकार को छोड़ दिया जाए? छोड़ते नहीं हैं? वो धरमपिताएं निराकार को याद करते हैं या साकार को याद करते हैं? तो निराकार को याद करने से उन्हें प्राप्ति हो जाती है? कर पाते हैं? हँ? कर पाने वाले पात्र हैं? जैसे उन्होंने नाम रख दिया कडपात्री जी महाराज। तो कड़पात्री महाराज तो वो तो झूठे हो गए। वास्तव में बाप को याद करने वाली जो परसेन्टेज की बात है वो प्राप्ति के ऊपर है आधारित। क्या? जितनी जिसको प्राप्ति हुई है उतनी ही याद भी आवेगी। तो अभी करना क्या है? अभी काम करते रहना है। क्या? कर्मधारा को नहीं छोड़ना है। ऐसे नहीं कि कर्मेन्द्रियों के कर्मों को छोड़ देना, खाना नहीं बनाना, कोई धंधाधोरी नहीं करना। नहीं। कर्मेन्द्रियों के कर्म करते रहना है। ऐसे भी बाबा नहीं कहते हैं कि कर्म न करो। कोई भी कर्मेन्द्रिय की बात। ऐसे नहीं कोई एक कर्मेन्द्रिय से कर्म करो, दूसरों से न करो। सभी कर्मेन्द्रियों से कर्म करो क्योंकि ये है पुरुषोत्तम संगमयुग। क्या? पुरुषों में उत्तम ते उत्तम बनाने वाला युग। तो कितने हैं पुरुषोत्तम? हँ? इस मनुष्य सृष्टि में कितने पुरुषोत्तम देखने में आते हैं? पुरुष माने आत्मा। उन आत्मा, देहधारी को आत्मा कहा जाता है। तो वो कितने देहधारी हैं इस दुनिया में जो उत्तम कहे जाएं? हँ? बताओ।
(किसी ने कुछ कहा।) आठ। ये तो गिनती गिना दी। पता कैसे चलेगा आठ में कौन-कौन हैं? (किसी ने कुछ कहा।) एक ही पुरुषोत्तम है? नंबरवार नहीं हैं? उनकी डायनेस्टी नहीं चलेगी? हँ? माने एक ही धरमपिता है? वो पुरुषोत्तम है? और बाकि कोई भी पुरुषोत्तम नहीं बनते? नंबरवार तो बनते हैं ना?

तो याद की यात्रा में भी नंबरवार हैं। क्या? कोई शार्टकट रास्ता पकड़ने वाले होंगे, कोई सहज रास्ता पकड़ेंगे। तो जल्दी कौन पहुँचेंगे? हँ? शार्टकट वाले जल्दी पहुंचेंगे कि सहज रास्ता पकड़ेंगे, वो जल्दी पहुँचेंगे? जैसे हाइवे होते हैं। तो बड़े घूमघाम के बड़े-बड़े शहरों में तब हाइवे से जाना होता है। और एक शार्टकट रास्ता होता है, छोटे-छोटे रास्तों में से होते हुए फटाक से निकल गए। अब कठिनाई किसमें होगी? हँ? और कठिनाई क्यों होगी? शार्टकट तो सहज होना चाहिए। हँ? कठिनाई इसलिए होगी कि शार्टकट रास्तों से वो ही जा सकेगा, छोटे-छोटे रास्तों से जिसको जानकारी होगी। जानकारी माने ज्ञान। ज्ञान होगा तो शार्टकट पकड़ सकेंगे। और ज्ञान धरमपिताएं धारण नहीं करते। क्या? रास्ता शार्टकट पकड़ते हैं। क्या? अगर जो बहुत पावरफुल बन गया तो वो किसकी याद से पावरफुल बन गया? हँ? इस सृष्टि में जितने साकार हैं वो तो सब भोगी। इस सृष्टि में पार्ट बजाने वाली एक ही आत्मा है जो अभोक्ता है लेकिन थोड़े समय के लिए आके पार्ट बजाती है। बाकि तो कुंभकर्णी नींद में सो जाती हैं। कुंभकर्ण कैसा पार्ट बजाता था? हँ? छह महीने सोता था और बस एक दिन के लिए जागा और धड़ाधड़ उसने सोने की लंका बनाय दी। ऐसा ही शिवबाबा का पार्ट है। अब वो पार्ट निराकार का है कि साकार का है? निराकार का है? अच्छा? निराकार कैसे पार्ट बजाएगा? फुदक-फुदक के? वाह भई। वो बिन्दी फुदक-फुदक के पार्ट बजाती है? हँ? वो बिन्दी किसी स्वरूप में प्रवेश करती है। और जिसमें परमानेन्ट प्रवेश करती है, मुकर्रर रथ कहा जाता है उसके द्वारा संग का रंग ऐसा लगता है कि वो भी निराकारी हो जाती है। हँ? जो गुरु के नज़दीक ज्यादा बैठेगा वो गुरु से ज्यादा प्राप्ति करेगा ज्ञान की या जो कभी-कभी घंटे दो घंटे के लिए आके बैठ गया तो ज्यादा ज्ञान की प्राप्ति होगी? हँ? अरे? कोई जवाब नहीं? न हाँ, न ना? हँ?

कहते हैं कि तोते थे अमरनाथ के मन्दिर में। उन्होंने थोड़ा टाइम बस ज्ञान सुना और थोड़ा सुनने के बाद चले गए बाहर की दुनिया में मन्दिर से। और जो कबूतर थे वो लगातार बैठे रहते थे। तो ज्यादा ज्ञान कौन सुनेंगे? हँ? कबूतर सुनेंगे कि तोते सुनेंगे? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) तोता में? थोड़ा टाइम आया? इसीलिए माताजी एक घंटा जाती है, बाकि सब अपने सगे-संबंधियों से बातें करने में ज्यादा टाइम लगा देती। हैं माताजी? बताओ। बात सही है। माताजी तोता है। बहुत सुनाती है ज्ञान। ट्यूं-5. हँ? ज्ञान की कंठी पड़ी रहती है। ये तो ठीक बात है। बताया, भले एक घण्टे भी आते हों तो भी अगर बाहर जाकरके बुद्धियोग लगा रहता है, मनन-चिंतन-मंथन में बुद्धि रहती है, मन भी लगा रहता है जो बाबा ने सुनाया, मनन-चिंतन-मंथन करने में, हँ, नए-नए प्वाइंट्स निकालने में, और वाचा भी लगी रहती है दूसरों को ज्ञान सुनाने में। क्या? और दृष्टि में भी बाबा की याद होने से दृष्टि भी चारों तरफ जहाँ जाएगी वो याद की दृष्टि जाएगी। कान भी दूसरों से जो सुनेंगे, हियर नो ईविल, फालतू बातें नहीं सुनेंगे। सुनी अनसुनी कर देंगे। कोई ज्ञान की बातें सुनाएगा तो लेन-देन करेंगे। क्या? वार्तालाप करेंगे। तो सभी इन्द्रियां जो हैं अगर ईश्वरीय कार्य मंी ही लगी हुई हैं तो बाहर जाकरके बाहर की दुनिया में भी संग किसका किया? एक का किया ना। तो यही बात है। वो जो करम बनेगा बाहर की दुनिया में वो कर्म अकर्म हो जाएगा क्योंकि ये पुरुषोत्तम संगमयुग है, पुरुषों में उत्तम बनाने वाला युग। और कोई संगमयुग इतना उत्तम नहीं होता है। वैसे तो सतयुग, त्रेता का भी संगम होता है, त्रेता द्वापर का भी संगम होता है, द्वापर, कलियुग का भी संगम होता है। लेकिन उन, वो संगम जो हैं उनमें कोई पुरुषोत्तम प्रसिद्ध नहीं होता पुरुषार्थ करके। और इस युग में? नंबरवार पुरुषोत्तम प्रत्यक्ष होते हैं।

A morning class dated 23.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was - Those who cause the defamation of the Sadguru, what they call destination (thaur); what is that? Hm? Those sanyasis simply keep on telling - You will not find the destination/place (thaur) if you cause our defamation. We are sitting as Sadguru. Well, they are not Sadgurus. All are false gurus. It is sung among the Sikhs - Sadguru ek akaalmoort (One eternal personality is the Sadguru). So, what is the destination of one Sadguru? Hm? Does He too have any destination? He Himself is a resident of the Supreme Abode. Is the abode of peace a destination? Yes. But the account is that the earlier someone goes there, the higher the place that they will get. Those who make purusharth and reach first will not play a low part, even when they play a part in this world.

So, they say that you will not find the destination that you will become Narayan or Lakshmi. Brother, you will not be able to get that. This is why keep on making purusharth from now onwards because you will become very calm (sheetal) in this. In what? Hm? In the purusharth of remembrance you will become very calm. All these topics of five vices within you will be removed by doing so. By doing what? By remaining in remembrance. So, Father and only Father. There should not be anything except the Father. Wherever you see you should find Father. For example, they say on the path of Bhakti 'Radhe and only Radhe'. Wherever I see I find Radhe. Now the Father says that if you connect your intellect to remember Me, then you will get that power. And you will get a lot of power. So, remember only the Father. Hm? What is this? What is meant by remembering only the Father? Hm? It means one incorporeal Father and one Father of the corporeal world.

So, the Father of the corporeal world; if the respect and position that the sanyasis in this world get; they get so much respect and position! If the Father of the corporeal human world has to achieve such a stage, then he will also have to remember the Father only. He will have to remember the Supreme Soul. Or if any founders of religions wish to achieve a high post in their generation, then what will they have to do? They will have to remember the incorporeal. Then, should you leave the corporeal? Do they not leave? Do those founders of religions remember the incorporeal or the corporeal? So, do they achieve attainments by remembering the incorporeal? Are they able to do? Hm? Are they the actors (paatra) who can do so? For example, they have coined a name - Kadpaatri ji Maharaj. So, that Kadpatri Maharaj is false. Actually, as regards the percentage of remembrance of the Father is concerned, it is dependent on the attainments. What? The more someone has attained, the more he/she will remember [the Father]. So, what should you do now? Now you have to go on working. What? You should not abandon the flow of actions (karmadhara). It is not as if you have to abandon the actions of the 'organs of action', you should not cook food, should not do any business. No. You have to go on performing actions through the 'organs of action'. Baba doesn't say that you should not perform actions. It could be the topic of any organ of action. It is not as if you perform actions through one organ of action, and don't perform actions through others. Perform actions through all the organs of action because this is Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age). What? The Age which makes you the highest ones among all purush (souls). So, how many are purushottam (highest among all the souls)? Hm? How many purushottams are visible in this human world? Purush means soul. That soul; the bodily being is called soul. So, how many bodily beings in this world can be called high (uttam)? Hm? Speak up.
(Someone said something.) Eight. You have given a number. How will you know that who all are included among the eight? (Someone said something.) Is only one Purushottam? Are they not numberwise? Will their dynasty not continue? Hm? Does it mean that there is only one founder of religion? Is he purushottam? Doesn't anyone else become purushottam? They become numberwise, don't they?

So, they are numberwise in the journey of remembrance also. What? Some catch a shortcut path, some choose an easy path. So, who will reach earlier? Hm? Will those one who choose the shortcut reach earlier or will those who choose an easier [but longer] route reach earlier? For example, there are highways. So, one reaches the highway after a long circuitous route in the big cities. And one is a shortcut route, passing through the small roads from where you can come out easily. Well, which one will be difficult? Hm? And why will it be difficult? Shortcut should be easy. Hm? It will be difficult because only the one who has the information about the smaller roads will be able to pass through the shortcut routes. Information means knowledge. If you have knowledge you will be able to catch the shortcut. And the founders of religions don't inculcate knowledge. What? They catch the shortcut path. What? If someone has become very powerful, then through whose remembrance did he become powerful? Hm? All the corporeal persons in this world are pleasure-seekers (bhogi). There is only one soul playing its part in the world which is abhokta (non-pleasure seeker), but it comes and plays its part for a short period. All others sleep in the Kumbhakarna-like slumber. What kind of a part did Kumbhakarna used to play? Hm? He used to sleep for six months and used to wake up for just one day and then he built the golden Lanka hurriedly [in a day]. Similar is the part of ShivBaba. Well, is it that part that of the incorporeal or the corporeal? Is it of the incorporeal? Achcha? How will the incorporeal play His part? By jumping around? Wow brother! Does that point jump around and play its part? Hm? That point enters in a form. And the form in which it enters permanently, which is called the permanent Chariot (mukarrar rath), He applies such colour of company through him that he too becomes incorporeal. Hm? Will the one, who sits for a longer period close to the Guru, achieve more attainments of knowledge or will the one who sometimes comes and sits for an hour or two achieve more attainments of knowledge? Hm? Arey? Don't you have any reply? Neither 'yes' nor 'no'? Hm?

It is said that there were parrots in the temple of Amarnath. They heard knowledge for some time and after listening a little, they went away from the temple to the outside world. And the pigeons used to sit continuously. So, who will listen to more knowledge? Hm? Will the pigeons listen or will the parrots listen? Hm?
(Someone said something.) In the parrot? Did He come for some time? This is why mataji goes for an hour; and for the rest of the time she devotes more time in talking to her relatives. Is it so mataji? Speak up. The topic is correct. Mataji is a parrot. She narrates lot of knowledge. Tyu, tyu-4. Hm? The necklace of knowledge keeps hanging around the neck. This is correct. It was told - Even if someone comes for an hour, yet, after going outside, if the intellect remains connected, if the intellect remains busy in thinking and churning, if the mind also remains busy in thinking and churning about whatever Baba has narrated, hm, in churning out newer points, and if the mouth also remains busy in narrating the knowledge to others. What? And in the vision also, because of the remembrance of Baba, wherever the eyes look, the vision will be full of remembrance. Whatever the ears listen, hear no evil, they will not listen to wasteful topics. They will ignore [whatever wasteful topics they hear]. They will exchange views if anyone narrates the topics of knowledge. What? They will discuss. So, if all the organs are busy in Godly tasks, then even after going outside, in the outside world, whose company did they have? They had the company of one, did not they? So, this is the issue. That action which will be performed in the outside world will become akarma (actions without any fruits) because this is Purushottam Sangamyug; the Age which makes you highest among the purush (souls). Other Confluence Ages are not so highest. There is a confluence of Golden Age and Silver Age also, there is a confluence of Silver Age and Copper Age also and there is a confluence of Copper Age and Iron Age also. But, in those confluences, nobody becomes famous as Purushottam by making purusharth. And in this Age? The numberwise Purushottams are revealed.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2571, दिनांक 07.07.2018
VCD 2571, Dated 07.07.2018
प्रातः क्लास 23.7.1967
Morning class dated 23.7.1967
VCD-2571-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.51
Time- 00.01-14.51

प्रातः क्लास चल रहा था - 23.7.1967. रविवार को दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – आत्मा का स्वरूप है शांत। जब आत्मा अपने स्वधर्म में टिकती है शांति में तो उसको कुछ होता थोड़ेही है। तो तुम जानते हो कि हमको शांतिधाम में जाना है यानि घर जाना है उस अवस्था में। यहाँ हमारी आत्मा शांत रहेगी। तो तुम जानते हो कि हमको शांतिधाम में यानि घर में जाना है उस अवस्था में। शांति जैसा तो पुरुषार्थ फिर और कोई भी नहीं है। क्योंकि बाप ही है शांति का सागर। और वो ही तो कहते हैं कि मेरे मिसल तुमको शांति का सागर बनना चाहिए। वाह्यात फालतू बातें, यहाँ की बातें, वहाँ की बातें, झरमुई-झगमुई। ये तो सब बहुत नुकसान कराती हैं। और फिर अपने बाप जो डायरेक्शन देते हैं ऐसे बातें नहीं करना चाहिए। सुप्रीम बाप डायरेक्शन देते हैं। इससे तो शांत कर देना ठीक है। उन बातों में तो किसी न किसी की निंदा करते हो ना। बच्चे, जो शांत स्वरूप आत्मा होती है वो शांति में कोई की निंदा थोड़ेही करती है। किसकी भी नहीं। शांति में भी विकर्म होता नहीं है। और बाप ने बताया है मुझे याद करते रहोगे तो और ही तुम्हारे विकर्म विनाश होते रहेंगे।

तो व्यापारी अपनी बही रखते हैं ना। तो अपने विकर्मों का विनाश करता रहे, रोज़ का रोज़ बही में लिखता रहे। न खुद अशांत होवे, न औरों को अशांत करे। ये याद रख देना चाहिए। किसको भी दुख देना तो वो आत्मा नाराज़ होती है। समझा ना। और कभी–कभी बहुत हैं जो बाबा को लिखते भी रहते हैं - बाबा, ये बहुत आते हैं। जब आते हैं तो घर में बहुत धमचक्कर मचाय देते हैं। तो आप उनको लिखते भी हैं। तुम भी वो शांति में रहो। क्योंकि शांति और अशान्ति का ये ऊपर हातिमताई का भी किस्सा बना हुआ है ना। शान्ति, अशान्ति का ही तो किस्सा है। वो भी कहते हैं मुँह में मुलहरा डाल दो। तो वो मुलहरा डाल देते थे। जैसे बाबा ने कहा था एक दो आपस में लड़ती हैं तो उनको जाकरके बताया कि ये लड़ाई झगड़ा होते हैं। तो बोला, अन्दर में एक तावीज़ डाल दिया। फिर बोला वो निकालना नहीं। तो वो डाल दिया। तो कोई बहुत बात करे तो सिर्फ ये कर न सके क्योंकि वो निकालने का नहीं। ये तो ताबीज है। निकालेगी नहीं तो वो बिचारी बोलेगी कैसे? बोल न सके। तो ये तो दृष्टांत देते हैं। मुँह में मुलहरा डाल दिया। समझा ना। ये दृष्टांत भी है। क्योंकि बच्चों को शांति में रहना है। शांति जितना सुख देखो शांति-3 के लिए बहुत धक्का बिचारे खाते रहते।

ये तो तुम बच्चे जानते हो कि बाबा, हमारा मीठा बाबा शान्ति का सागर है बरोबर। पुरुषार्थ कराते-कराते शान्ति ही विश्व में स्थापन कर देते हैं। ये तो जानते भी हो ना बच्ची क्योंकि याद करो अपने भविष्य मर्तबे को कि जब एक धर्म होता और वहाँ दूसरा धर्म तो होता ही नहीं है। तो देखो उसी को ही शांत, विश्व में शांति कहा जाता है। तो ये समझना चाहिए ना बुद्धि में। बच्चे देखो, और धरम वाले कितने भी होंगे, उनको तुम समझाएंगे तो शांति जिसको चाहिए, इस विश्व में शांति चाहिए वो तो सिर्फ जब एक होता है धर्म जिसको देखो हैविन, पैराडाइज़, जन्नत, वगैरा, वगैरा सब बहुत कहते हैं। तब शांति होती है ना। फिर दूसरे धरम जो सभी आते हैं तो फिर हंगामा हो जाता है। माना एक धर्म है तो शांति। और दो, द्वैतवाद आ जाता है तो अशान्ति। इसलिए देवताओं को अद्वैत कहा जाता है। एक धरम को मानने वाले। एक राजा। देखो, अभी तो दुनिया में कितनी अशान्ति है। और तुम बच्चे जानते हो कि जब तुम अपना बाप का वर्सा पाते हो सारे विश्व का राज्य लेते हो तो फिर वहाँ कितनी शान्ति होती होगी। ये समझ गए हो बच्चे कि हमारा घर तो शान्ति का ही रूप है। और वहाँ तो हम हैं ही शान्त। हमारा स्वधर्म ही शांत है। अभी ऐसे तो नहीं कहेंगे शरीर का स्वधर्म शान्त है। नहीं। आत्मा की शान्ति कहेंगे। शरीर कैसे शान्त? वो तो विनाशी है। आज है कल नहीं रहेगा। और वो आत्मा तो अविनाशी चीज है। वो जितना समय शान्तिधाम में रहती है, जितना भी समय।

देखो, दूसरे धरम जो पीछे-पीछे आते हैं तो देखो जितना समय वो शान्त आत्माएं अपने घर में रहते हैं, तो कितना शान्ति में रहते हैं! देखो, अभी तो सभी यहाँ हैं। सभी धर्मवाले यहाँ हैं ना। तो यहाँ तो बहुत अशान्ति है। सारी दुनिया में अशान्ति ही अशान्ति। तो बाप समझाते हैं कि शान्ति-3 मांगते रहते हैं क्योंकि घर जाने के लिए सब कोई भागते हैं। हँ? बैलगाड़ी में बैल भी ले जाएंगे कहीं, लौटते समय कितनी जल्दी भाग के आते हैं। घर पसन्द है ना। सबको घर पसन्द है। बोलते हैं घर ही अच्छा है। वहाँ भी तो फिर सुख लेंगे। तो फिर सुनते हैं ना कि भई सुख तो बाद में होता है। पहले तो शान्ति। सुख से पीछे एक डिग्री कम। फिर तो कम-4 ही होती रहती है। ये तो अभी तुम बच्चों को पता पड़ा है। तो कोई भी धर्म चाहे कि नहीं, हम तो सदाकाल शान्ति में ही रहेंगे, तो वो भी उसको कहे ये तो हो नहीं सकता है कि सदाकाल जैसे कोई एक शान्ति एक जैसी में रहे। भले तुम 83 जन्म शान्ति में रहते हो। हँ? कहाँ? शान्तिधाम में। वहाँ जनम तो होते ही नहीं। इस दुनिया में जब तक 83 जन्म हों तब तक उनको बताओ कि तुम वहाँ शान्तिधाम में रहते हो। फिर भी तो तुम्हें आना ही पड़ेगा ना। और आय करके इस दुनिया में अपना-अपना पार्ट बजाना पड़ेगा। शान्ति का और अशान्ति का पार्ट बजाएंगे। धारणा करके फिर चले जाएंगे। कोई अशान्ति की धारणा बहुत करते हैं। कोई शान्ति की करते हैं। क्योंकि पिछाड़ी तक ये ड्रामा को बड़ा अच्छी तरह से ध्यान में भी रखना होता है।

23.7.67 की प्रातः क्लास का तीसरा पेज। उसमें भी तुम बच्चों को तो बहुत ध्यान देना होता है कि हमको बाबा दो वरदान देते हैं। क्या? हँ? वो जो लंबे समय तक परमधाम में, शान्तिधाम में पड़े रहते हैं, उनको तो शान्ति का वरदान और तुमको तो शान्ति और सुख का भी वरदान। हँ? तो ये तो समझते हो कि देने वाला तो वो ही है। और वो एक ही है।

A morning class dated 23.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was - The form (swarup) of a soul is peaceful. When the soul becomes constant in its swadharma in peace, then nothing happens to it. So, you know that we have to go to the abode of peace, i.e. we have to go home in that stage. Here, our soul will remain peaceful. So, you know that we have to go to the abode of peace, i.e. we have to go home in that stage. There is no purusharth like being peaceful because the Father Himself is an ocean of peace. And He Himself says that you should become an ocean of peace like Me. Wasteful topics, topics of this place, topics of that place, wasteful talks - all these cause a lot of harm. And then our Father gives directions that you should not talk like this. The Supreme Father gives directions. It is better to be quiet. In those topics, you defame someone or the other, don't you? Children, a peaceful soul does not defame anyone in peace. It doesn't defame anyone. One does not commit sins in peace also. And the Father has said that if you continue to remember Me then your sins will keep on burning.

So, businessmen maintain their ledger books (bahi), don't they? So, one should go on burning one's sins and go on writing in one's ledger book every day. Neither should one become disturbed himself nor should one disturb others. If you give sorrows to anyone, then that soul becomes angry. Did you understand? And sometimes there are many who also keep on writing to Baba - Baba, this one [husband] comes many times. When he comes, he creates a lot of ruckus at home. So, you also write to him. You also remain peaceful because there is a story of Hatimtai on peace and disturbance, is not it? The story is all about peace and peacelessness. He too says that keep a thing (mulahara) in the mouth. So, he used to put a mulahara. For example, Baba said that when two ladies quarrel, then they went and told him, so he said these quarrels occur; so he said; he put a taaveez inside (their mouth). Then he said - Do not take it out. So, if anyone talks a lot, then they will not be able to do this because that thing is not supposed to be removed. This is a taabeez. If she does not take it out [of her mouth] how will the poor lady speak? She cannot speak. So, this is an illustration (drishtaant). A mulahara was put in the mouth. Did you understand? This is also an illustration because children have to be in peace. Look, they wander so much for peace, peace, peace.

You children know that Baba, our sweet Baba is definitely an ocean of peace. While enabling us to make purusharth, He establishes peace in the world. You also know daughter because remember your future post that when there is one religion and there is no other religion at all, so, look, that itself is called peace in the world. So, you should understand this in the intellect, shouldn’t you? Children, look, there may be any number of people of the other religions; if you explain to them, then those who want peace, those who want peace in this world, then that happens only when there is one religion which is called heaven, paradise, jannat, etc. by everyone. There is peace at that time, isn’t it? Then, when all other religions come, then there is uproar. It means there is peace when there is one religion. And if there are two, when there is duality, there is disturbance. This is why deities are called adwait, those who believe in one religion. One king. Look, now there is such disturbance in the world. And you children know that when you obtain your Father's inheritance, when you obtain the kingship of the entire world, then there is so much peace there. Children, you have understood that our home is a form of peace only. And there we are indeed peaceful. Our swadharma (religion of the soul) itself is peace. Now it will not be said that the swadharma of the body is peace. No. It will be said peace of the soul. How can the body be peaceful? That is perishable. It exists today, it will not exist tomorrow. And that soul is an imperishable thing. As long as it remains in the abode of peace.

Look, other religions which come later on, so, look, as long as those peaceful souls remain in their home, they remain so peaceful. Look, now all of them are here. People of all the religions are here, aren't they? So, there is a lot of disturbance here. There is disturbance in the entire world. So, the Father explains that they keep on seeking peace, peace, peace because everyone wants to run towards his home. Hm? Even when they take the bulls in a bullock cart somewhere, they come running so fast while returning. They like the home, don't they? Everyone likes home. They say that only the home is good. You will enjoy happiness there too. So, then they hear that brother, happiness comes later on. First there is peace. Later, the happiness decreases by one degree. Then it goes on decreasing. Now you children have come to know of this. So, if any religion wishes that no, we will remain in peace forever, then they will be told that it is not possible that someone remains in uniform peace forever. Although you remain in peace for 83 births; Hm? Where? In the abode of peace. There are no births there at all. Tell them that in this world, by the time 83 births pass, you remain there in the abode of peace. However, you will definitely have to come, will you not? And after coming to this world you will have to play your part [for one birth]. You will play the part of peace and peacelessness. You will inculcate and depart. Some inculcate disturbance a lot. Some inculcate peace. You have to keep this drama in account very nicely till the end.

Third page of the morning class dated 23.7.67. Even in that you children have to pay a lot of attention that Baba gives us two boons. What? Hm? Those who remain in the Supreme Abode, in the abode of peace for a long time, they get the boon of peace and you get the boon of peace as well as the boon of happiness. Hm? So, you understand that He alone is the giver. And He is only one.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2572, दिनांक 08.07.2018
VCD 2572, Dated 08.07.2018
प्रातः क्लास 23.7.1967
Morning class dated 23.7.1967
VCD-2572-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.17
Time- 00.01-17.17


प्रातः क्लास चल रहा था - 23.7.1967. रविवार को चौथे पेज पर मध्यादि में बात चल रही थी – ये अविनाशी नाटक बना हुआ है। हाँ, इसकी कभी इंड नहीं होती है। क्योंकि इसकी आदि ही नहीं है। न इंड है, न आदि है। ड्रामा की इंड नहीं है, ड्रामा की आदि नहीं है। जो ड्रामाकार कहा जाता है उसकी इंड और आदि है? उसकी भी नहीं है। जो आत्माओं का बाप है उसका इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जो पार्ट चलता है उसकी इंड और आदि है? हँ? है या नहीं है? उसकी इंड और आदि का पता कैसे चलेगा? वो तो निराकार है। कब आता है कब जाता है, पता ही नहीं लगता। हाँ, दादा लेखराज ब्रह्मा के तन में पार्ट बजाता था तो वाणी चलती थी तो पता लगता था कि आया। शरीर छोड़ दिया तो पता ही नहीं कहाँ आया, कहाँ गया। क्या चला गया? नहीं चला गया? तो कहाँ फिर कहाँ पार्ट बजाता? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, मुकर्रर रथ में पार्ट बजाता जो यज्ञ के आदि से ही मुकर्रर है। और उसके अलावा बच्चों में भी प्रवेश करता है। वो सोल सुप्रीम सोल किन बच्चों में कब प्रवेश करता है किसी को पता नहीं। लेकिन वो सब हैं टेम्पररी। कोई कह भी नहीं सकता मेरे में कब आए, कब चले गए।

तो तुम मीठे बच्चों को बाप समझाते हैं – देखो, तुम कल पढ़ रहे थे हमारे पास। समझा ना। ऐसे ही कहेंगे कि कल पढ़ रहे थे। क्यों? ऐसे क्यों कहते? क्योंकि उनके लिए कल्प पूर्व की बात ऐसे हो गई जैसे कल की थी। वो तो परमधाम जाके सो जाते हैं। तो सुषुप्ति अवस्था में तो पता ही नहीं चलता। कब आयाराम कब गयाराम। तो तुम यही पढ़ रहे थे राजयोग। कल। अभी राजयोग तो बरोबर है। और भगवान राजयोग सिखलाते हैं। राजाओं का राजा बनाते हैं। हँ? अब तुम किसको भी कहें राजाओं का राजा तो बिचारा मूँझ जाएगा। क्यों? क्योंकि आज की दुनिया में तो कोई राजा और महाराजा है ही नहीं। जैसे भूटान छोटा सा देश है। उसका तो राजा है। तो वहाँ भी प्रजातंत्र राज्य तो चल गया। हाँ, वहाँ की जो प्रजा है वो आज भी उन्हीं को राजा मानती है। तो ये क्या कहते हैं? लोग पूछेंगे राजाओं का राजा। ये फिर कौन होते हैं?

तो तुम बच्चों को समझाय दिया है कि हाँ, बरोबर पतित राजाएं पावन राजाओं को मन्दिरों में मूर्ति बनाकर बैठाय पूजा करते हैं। हँ? तो समझ में आ जाएगा? हँ? ये बात कहने से समझ में आ जाएगी राजाओं का राजा हैं या नहीं हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) नहीं हैं? अच्छा? शूटिंग पीरियड में हैं ही नहीं? हँ? चक्कर में पड़ गए? ब्रॉड ड्रामा में हैं और शूटिंग पीरिय़ड में नहीं हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हैं? कैसे? हँ? शूटिंग कैसे होती है फिर? अगर हैं नहीं तो ये रिहर्सल, शूटिंग कैसे होगी? हँ? लक्ष्मी-नारायण सामने हैं? और कोई राजाएं नहीं जब लक्ष्मी-नारायण होते हैं उसके बाद? सारे संगमयुग में लक्ष्मी-नारायण ही चलते रहते हैं? हँ? तो जो मन्दिर में मुखिया बनके बैठते हैं वो ही राजाएं हैं? जो राजा बनते हैं उनके मन्दिर बनाते हैं। राजाओं के बड़े-बड़े महल बनाते हैं कि नहीं? बड़े-बड़े महल बनाने की बात नहीं है यहाँ। तो तुमको पावन बनाते हैं। पावन कैसे बनाते हैं? हँ? कौन पावन बनाते हैं? हँ? पावन तो शिवबाबा बनाते हैं। वो राजाएं थोड़ेही पावन बनाते हैं? इसलिए जोर रखते हैं कि बच्चे इस जनम में तुमको एक ही जन्म में फिर पतित से पावन हो राजा बनना है। नई दुनिया में तो पावन राजाएं होंगे ना।

तो इतना जनम तो तुमको समझाया ना बच्चे। एक्यूरेट समझाया कि 63 जन्म तुम ये गटर में पड़े हुए थे। और तुमको उस गटर में बड़ा सुख आता था। वहाँ बहुत सुख आता था। इतना सुख उस गटर में रहने का भासता है जो बाहर में निकलकरके, गटर से बाहर अच्छी जगह में जाऊँ तो वहाँ दिल ही नहीं लगता। अरे, आफिस में जाते हैं, घर में दिल भागती रहती है। ये क्या? धोबी का धंधा करने वाला होगा, घाट से घर में भागेगा। ये क्या बात हुई? कहीं दिल ही नहीं लगता। एकदम नहीं लगता। और घड़ी-घड़ी वो ही गटर याद आता रहता है। घड़ी-घड़ी गटर याद आता। तो ये तो होगा ना। क्यों होगा? हँ? लिख दिया ना व्यासजी भगवान ने। क्या? संगात संजायते कामः। जितना संग करेंगे बुद्धि के लगाव से, मन के लगाव से, इन्द्रियों के लगाव से, तन के लगाव से जितना संग करेंगे उतना याद आएगा। तो ये तो होगा।

बाबा कहते हैं अभी तो तुमको माया और भी याद दिलाएगी। क्यों भई? अभी क्यों याद दिलाएगी? हँ? क्योंकि अभी माया का दुश्मन आया हुआ है। कौन है माया का दुश्मन? हँ? बाप। बाप माया का दुश्मन है? माया बेटी नहीं है बाप की? हँ? बेटी तो है लेकिन अपना कंट्रोल चाहती है। मायावी दुनिया में माया रच के। तो वो तो तुमको और ही याद दिलाएगी गटर की बात। परन्तु तुमको तो करना क्या है? तुमको, तुमको खबरदार रहना है। क्योंकि तुम्हारी तो इसी बात के ऊपर युद्ध है। जो मेहनत तुम बच्चों को कराती है। कितनी मेहनत कराती है। इतनी मेहनत कराती है कि घड़ी-घड़ी तुमको गिराते रहते हैं।

ये आँखें गिराते हैं, ये कर्मेन्द्रियाँ गिराती हैं, मन गिराता है, बुद्धि गिराती है; बुद्धि फैसला ही ऐसा करती है जो तुम घड़ी-घड़ी गिरते रहो। तो देखो, उनमें आँखें हैं सबसे मुख्य। देखती हैं और एकदम रफूचक्कर हो जाती हैं। किसको देखते हैं? आँखें किसको देखती हैं? हँ? आँखें माया के भिन्न-भिन्न रूप होते हैं ना, कब क्या बनके आती है, कभी क्या बनके आती है, औरत बनके आती है, कन्या बनके आती है, कभी भाई बनके आती है, नौजवान बनके आती है। और जैसे फरार हो जाते हैं। इसलिए इन आँखों को बहुत कब्जे में लाना है। कैसे लाएंगे? सो भी तो बताया। क्या बताया? इन आँखों को कब्जे में लाने के लिए क्या बताया? अरे, कुछ बताया कि नहीं बताया ज्ञानमार्ग में? हँ? हाँ, बताया। क्या बताया? अरे, बताया कि तुम एक बाप के बच्चे हो, रूहानी बच्चे हो तो भाई-भाई हो। तो रूह की दृष्टि से देखो ना। हँ? देह की दृष्टि से देखते ही क्यों हो? फिर ब्रह्मा के बच्चे हैं। ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं तो भी भाई-बहन हैं। दूसरा तो कोई संबंध नहीं है ना। तो देखो, ये युक्ति बताई है कि इन आँखों को कैसे कब्जे में लाना है। अपन को ब्रह्माकुमार-कुमारी भाई-बहन समझो या तो रूहानी भाई ब्रदर्स-ब्रदर्स समझो। तो भी देखा कि नहीं, ये ब्रह्माकुमार-कुमारी बनके चलते हैं, तो बहन-भाई में भी ठीक नहीं चलते। क्या? जैसे दुनिया में भी होता है। मुसलमानों में क्या हुआ हिस्ट्री में? भाई बहनों में शादी करने लगे। भाई बहन में भी ठीक नहीं चलता। वो जो शूटिंग यहाँ होती है वो ही शूटिंग में फिर वहाँ कनवर्ट होकरके चले जाते हैं।

चलो, भला भाई-भाई हैं, है तो ये कॉमन बात कि सब आत्माएं भाई-भाई हैं। मनुष्यात्माएं ही भाई-भाई कहेंगे। सबको यहाँ कहते हैं। जब आते हैं भाई, आल इंडिया से भी आते हैं, विदेशों से भी आते हैं, रशियन्स आते हैं, हिन्दू भाई-भाई आते हैं, पाकिस्तानी आते हैं, तो इन सबके लिए ऐसे ही कहते हैं तुम क्या हो आपस में? आपस में आत्मा-आत्मा भाई-भाई हो। हँ? तो बजाय कोई तो आत्मा-आत्मा भाई-भाई समझने के फिर गीत गाने लग पड़ते हैं। जैसे भक्तिमार्ग में होता है ना, गीत बहुत गाते हैं। क्या? प्रैक्टिकल में बनते नहीं, बनने की कोशिश नहीं करते। ऐसे ही यहाँ भी शूटिंग करते हैं कोई-कोई। कौन-कौन कोई? हम हैं आत्मा तुम हो आत्मा आपस में भाई-भाई। खूब गीत गाएंगे, नाचेंगे, डांस करेंगे, तबला बजाएंगे। अरे? पर जो कुछ कहते हैं, जो बोलते हैं, जो गीत गाते हैं उनको समझते नहीं हैं। खुद समझेंगे नहीं तो दूसरों को समझाय भी नहीं सकेंगे। इसलिए कहा जाता है कि ढेंढरों मिसल ऐसे ही चिल्लाते रहते हैं। ढ़ेंढर क्या? मेंढक। जैसे मेंढक बरसात के होते हैं ना। तो ये भी ज्ञान बरसात का मौसम है संगमयुग। सतयुग-त्रेता तो ठण्डी का मौसम है। हँ? और द्वापर, कलियुग गर्मी का मौसम है। दिमाग में गर्मी चढ़ी रहती है। तन में भी गर्मी, मन में भी गर्मी, बुद्धि में भी गर्मी। और ये संगमयुग होता है तो ज्ञान की बरसात होती है।

तो वो ढ़ेंढर होते हैं ना बरसात के टाइम पर मेंढ़क। फालतू ट्रां-ट्रां-ट्रां करते ही रहेंगे। अर्थ कुछ भी नहीं, समझेंगे कुछ भी नहीं। तो ट्रां-ट्रां करते हैं। कैसे ट्रां-ट्रां करते हैं? कैसे बताया अभी? हँ। कैसे? हम हैं? हम हैं आत्मा। ये बताएगा। तुम हो आत्मा, आपस में भाई-भाई। चिल्लाते रहेंगे, एक दूसरे को सुनाते रहेंगे। पब्लिक आएगी, उसको भी ये ही। तो जो भी कुछ अक्षर मुख से निकालते हैं उनके अर्थ में टिकते ही नहीं हैं। अर्थ क्या है, मतलब क्या है। अभी तुम क्या करते हो? तुम तो अर्थ में टिकते हो ना। आत्मा-आत्मा भाई-भाई तो क्या मतलब हुआ? हम बिन्दु आत्मा वास्तव में तुम भी बिन्दु आत्मा। ये भी बिन्दु आत्मा। आपस में जो भी मिलते हैं तो बिन्दु आत्मा के रूप में देखते हैं। बिन्दु आत्मा वो विनाशी है कि अविनाशी है? अविनाशी है। और ये देह? देह तो आज है, कल मुर्दा हो जाएगी। कल क्या, क्या पता आज ही मुर्दा हो जाए। कुछ पता है किसी को? कुछ नहीं। तो अभी तुम तो अर्थ को समझते हो कि यथार्थ रीति में अभी तुम ये बात जान गए हो कि हम आत्मा हैं और जब ब्रह्मा की संतान हैं तो हम भाई-बहन हैं। तो बाबा ने आकरके हमको, सब कुछ अच्छी तरह से मीठे-मीठे बच्चों को समझाय दिया है।

A morning class dated 23.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fourth page on Sunday was - This is an imperishable drama. Yes, it never ends because it does not have any beginning at all. It neither has an end nor a beginning. There is no end of the drama; there is no beginning of the drama. Is there an end and beginning of the one who is called the creator of the drama (dramakaar)? He too does not have [any end or beginning]. Is there an end and a beginning of the part that the Father of souls plays on this world stage? Hm? Is it there or is it not there? How will you know about its end and beginning? He is incorporeal. One cannot know at all as to when He comes and when He departs. Yes, when He used to play a part in the body of Dada Lekhraj Brahma, then one used to know that He came when the Vani used to be narrated. After he left his body, then it is not known as to where He came and where He went. Did He depart? Did He not depart? So, then where does He play His part? Hm?
(Someone said something.) Yes, He plays a part in the permanent Chariot, which is appointed (mukarrar) since the beginning of the Yagya. And apart from him, He enters in the children also. Nobody knows as to when that soul, the Supreme Soul enters and in which children He enters. But all those are temporary. Nobody can say as to when He came in me and when He departed.

So, the Father explains to you sweet children - Look, you were studying with us yesterday. Did you understand? It will be said that we were studying yesterday. Why? Why do you say like this? It is because for them the topic of Kalpa ago is as if it happened yesterday. They go and sleep in the Supreme Abode. So, one does not know at all in the stage of deep sleep (sushupti avastha) as to when someone came and when someone departed. So, you were studying this very rajyog. Yesterday. Now rajyog is correct. And God teaches rajyog. He makes you king of kings. Hm? Well, if you call anyone 'king of kings', then the poor fellow will be confused. Why? It is because there are no kings (raja) and emperors (maharaja) in today's world. For example, Bhutan is a small country. It has a king. So, democracy (prajaatantra) started there as well. Yes, the subjects (praja) there consider him to be the king. So, what do they say? People will ask - King of kings. Who are these?

So, you children have been explained that yes, definitely the sinful kings make the idols of pure kings and worship them in temples. Hm? So, will they understand? Hm? Will they understand if you say that they are kings of kings or not?
(Someone said something.) Are they not? Achcha? Are they not in the shooting period at all? Hm? Are you confused? Are they [king of kings] in the broad drama and not in the shooting period? (Someone said something.) Hm? How? How does the shooting take place then? If they are not, then how will this rehearsal, shooting take place? Hm? Are Lakshmi and Narayan in front of you? Are there no other kings after Lakshmi and Narayan? Do Lakshmi and Narayan continue to rule during the entire Confluence Age? Hm? So, are the kings only those who sit as heads in the temples? Those who become kings build temples. Do they build big palaces for kings or not? It is not about building big palaces here. So, He makes you pure. How does He make you pure? Hm? Who makes you pure? Hm? It is ShivBaba who makes you pure. Do those kings make you pure? This is why He stresses that children, you have to become kings by changing from sinful ones to pure ones in this single birth. There will be pure kings in the new world, will there not be?

So, children you were explained about so many births. It was explained accurately that you were lying in a gutter for 63 births. And you used to feel very happy in that gutter. You used to feel very happy. You feel so happy while living in that gutter that after coming out, if you come out of the gutter to a nice place you will not find it enjoyable at all. Arey, when you go to office your heart keeps running to home. What is this? If someone runs the business of laundry, he will run from the ghat (the site of washing clothes) to home. What is this? His heart does not find enjoyment anywhere. Not at all. And every moment that gutter keeps on coming to the mind. Every moment the gutter comes to the mind. So, this will happen, will it not? Why will it take place? Hm? It was written by God Vyasji, wasn't it? What? Sangaat sanjyaate kaamah. The more we keep company of someone through the attachment of the intellect, through the attachment of mind, through the attachment of organs, through the attachment of body, the more he/she will come to the mind. So, this will happen.

Baba says - Now Maya will remind you even more. Why brother? Why will it remind? Hm? It is because now Maya's enemy has come. Who is Maya's enemy? Hm? Father. Is Father Maya's enemy? is not Maya the daughter of the Father? Hm? She indeed is a daughter, but she wants her control by creating Maya (illusion) in the mayavi (illusive) world. So, she will remind you the topic of gutter even more. But what should you do? You, you have to remain careful because your fight is on this topic only. She makes you children to work so hard. She makes you work so hard. She makes you work so hard that they make you fall again and again.

These eyes cause downfall, these organs of action cause downfall, the mind causes downfall, the intellect causes downfall; the intellect makes such a decision that you keep on falling every moment. So, look, the eyes are the most important. They observe and become overwhelmed immediately. Whom do they see? Whom do the eyes see? Hm? The eyes; there are different forms of Maya, aren't there? Sometimes she comes in one form, sometimes she comes in some other form, she comes as a lady, she comes as a virgin, sometimes she comes as a brother, and sometimes she comes as a young man. And it's as if they vanish. This is why the eyes should be brought very much under control. How will you bring? That was also told. What has been told? What has been told to bring these eyes under control? Arey, was anything told or not on the path of knowledge? Hm? Yes, it was told. What was told? Arey, it was told that you are children of one Father. You are spiritual children; so you are brothers. So, look with a spiritual eye, will you not? Hm? Why do you look through physical eyes at all? Then we are Brahma's children. Even as Brahmakumar-kumaris we are brothers and sisters. There is no other relationship at all, is not it? So, look, this tact has been narrated to bring these eyes under control. Consider yourselves to be Brahmakumar-kumaris, brothers and sisters or consider yourselves to be spiritual brothers. Even then, it was observed that no, when they act as Brahmakumar-kumaris, then they do not act properly even as sisters and brothers. What? For example, it happens in the world also. What happened among Muslims in the history? Marriages started taking place between brothers and sisters. Even among brothers and sisters, the behavior isn’t proper. In the shooting which takes place here, in the same shooting, they convert and go there.

Okay, you are brothers; it is a common thing that all the souls are brothers. Human souls will only be called brothers. All are told here. When brothers come, they come from all India as well, they come from abroad as well, Russians come, Hindu brothers come, Pakistanis come; so, for all of them it is said like this only - What is your mutual relationship? You are soul brothers. Hm? So, instead of considering someone as soul brothers they start singing songs. For example, it happens like this on the path of Bhakti, doesn’t it? They sing a lot of songs. What? They do not become in practical; they do not even try to become. Similarly, some people perform the shooting here as well. Who are those 'some'? 'Hum hain aatma tum ho aatma aapas me Bhai-Bhai.' (I am a soul; you are a soul; we are brothers) They sing the song a lot, they dance, they beat the drums (tablaa). Arey? But whatever they say, whatever they speak, they don't understand the song that they sing. When they do not understand themselves they will not be able to explain to others as well. This is why it is said that they keep on shouting like the frogs (dhendar). What are dhendars? Frogs. For example, there are frogs that emerge in the rainy season, aren't there? So, this Confluence Age is also a season of rain of knowledge. Golden Age and Silver Age is a season of cold (winter). Hm? And Copper Age, Iron Age are season of heat (summer). The brain remains hot. There is heat in the body also, there is heat in the mind also, and there is heat in the intellect also. And when it is the Confluence Age, the rainfall of knowledge takes place.

So, there are those frogs at the time of rains. They keep on creating a noise 'tra, tra, tra' wastefully. There is no meaning; they don't understand anything. So, they keep on shouting wastefully. How do they keep on shouting wastefully? How was it described just now? Hm. How? I am? ‘I am a soul’ (hum hain aatma). This one will tell. 'You are a soul; we are brothers'. (tum ho aatma, aapas me Bhai-Bhai). They will keep on shouting; they will keep on narrating to each other. When the public comes, they tell them also the same thing. So, whatever words they utter through the mouth, they do not become constant in their meaning. What is the meaning, what is the intent? What do you do now? You become constant in the meaning, don’t you? When you are soul brothers, then what does it mean? I am a point like soul and actually you are also a point like soul. This one is also a point like soul. Whoever meets we see them as point like souls. Is the point like soul perishable or imperishable? It is imperishable. And this body? The body exists today; it will become a corpse tomorrow. Leave aside tomorrow. Who knows it may become a corpse today itself. Does anyone know anything? Nothing. So, now you understand the meaning that actually you have now come to know that we are souls and when we are Brahma's children, we are brothers and sisters. So, Baba has come and has explained everything nicely to us sweet-sweet children.

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