Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2577, दिनांक 13.07.2018
VCD 2577, Dated 13.07.2018
रात्रि क्लास 23.7.1967
Night Class dated 23.7.1967
VCD-2577-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.12
Time- 00.01-15.12


आज का रात्रि क्लास है - 23.7.1967. सर्विस के लिए मुख्य बात है कि बच्चों को भी शौक उठे कि कैसे-कैसे वो सर्विस करते हैं। सर्विस करते हैं तो सर्विस का समाचार आता है ना। तो रूहानी सेवा करनी है। उसका समाचार तो आना है। जब बाप आए हैं सब रूहों की सेवा करने। रूहानी बाप है। और ये सारी सृष्टि के चक्कर का राज़ समझाने के लिए आए हैं। सारी सृष्टि रूपी चक्कर में जो भी आत्माएं पार्ट बजाती हैं सबका राज़ सार में समझाय देते हैं। और फिर डीटेल में भी बताते हैं। क्योंकि पतित से पावन बनाने का भी रास्ता ईज़ी होना चाहिए ना। विस्तार में बुद्धि से बैठता है तो और ईज़ी हो जाता है। हिन्दी में सहज, अंग्रेजी में ईज़ी कहा जाता है ना।

सहज याद। कभी भी कहाँ योग अक्षर नहीं करना। क्योंकि योग अक्षर कहने से वो हठयोगी याद आ जाते हैं। फिर वो हठयोग बैठकरके तुमसे प्रश्न पूछेंगे बहुत। और तुम बच्चों को वास्तव में, कोई आते भी हैं यहाँ तो उन हठयोगियों से जास्ती बात करने की दरकार नहीं है क्योंकि वो तो बहुत वाद-विवाद करेंगे। उनके संस्कार हैं हठयोग के। सहज रास्ता कोई बतावे तुम्हें रास नहीं आवेगा। याद करो। तो जास्ती बात करने की दरकार क्यों नहीं बताई? क्योंकि वो अपनी हठ के पक्के होते हैं। उनके संस्कार हैं जन्म-जन्मान्तर के हठयोग के। सन्यासी हैं ना। मोस्टली तो सन्यासी ही हैं। फारम भराने से भी मालूम पड़ जाता है कि वो अपना गुरु किसको मानते हैं। बाप किसको मानते हैं? वो सुप्रीम सोल बाप परमपिता परमात्मा हमारा क्या लगता है? पूछा जाता है ना बच्चे कि तुम्हारी आत्मा का बाप कौन है।

अब तो ये तो बच्चे जानते हैं कि इस दुनिया में जितने मनुष्य हैं उस बाप के बारे में उतनी ही मतें निकलेंगी। परमपिता के बारे में इतनी मतें! कोई किसको कहेंगे, कोई किसको कहेंगे। कोई हनूमान को कहेंगे, कोई गणेश को कहेंगे, कोई सांप को भगवान मान लेंगे। सर्प की भी पूजा करते हैं ना। फिर कच्छ, मच्छ, पता नहीं क्या-क्या अवतार दिखाय दिये। एक तुम ही बच्चे हो ब्राह्मण जो झट कह देंगे हमारा बाबा तो ऊँचे ते ऊँचा शिवबाबा है। उससे ऊँचा तो कोई है ही नहीं। और उसको कहते भी हैं ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। और निराकार भी वो ही है। ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? ‘भी’ लगाने का क्या मतलब? हँ? इसलिए लगाय दिया कि वो साकार भी बनता है प्रवेश करके। उसकी पूजा वगैरा भी करते हैं। तो पूजा तो साकार की कर सकेंगे या निराकार की करेंगे? पूजा तो साकार की ही हो सकती है। निराकार को तो याद करने की प्रैक्टिस कर सकते हैं। तो उनको ही बैठ करके बेहद का बाबा सिद्ध करना है बच्चों को। कौन? जो निराकार भी और साकार भी है। इसीलिए तो तुलसीदास ने कह दिया - सगुणहि अगुणहिं नहि कछु भेदा, उभय हरैं भव संभव खेदा। संसार के दुखों को साकार और निराकार, दोनों ही दूर करते हैं। साकार को याद करेंगे तो फायदा है। याद करना सहज हो जाएगा। क्यों? क्योंकि जन्म-जन्मान्तर आदत पड़ी हुई है। किसको याद करने की? साकार को याद करने की। तो जो प्रैक्टिस पड़ी हुई है वो प्रैक्टिस करने की ज्यादा दरकार नहीं पड़ेगी। सहज-सहज याद आएगा। और ज्यादा याद आएगा।

बाकि निराकार को याद करना और निराकार तो उसका समझ लेते हैं कोई आकार ही नहीं है। निराकार का मतलब ये नहीं कि कोई आकार नहीं है। आकार तो है। लेकिन बिन्दु है। अरे, बिन्दु का भी तो देखा जाता है। बिन्दु, बड़ा बिन्दु रख दो। तो इन आँखों से देखेंगे ना। छोटा बिन्दु रखो तो जिनकी आँखें धुँधली होंगी, नहीं दिखाई पड़ेगा। और छोटा रख दो तो जैसे वैज्ञानिक लोग होते हैं यंत्रों से देख लेते हैं। और छोटा कर दो। अणु से भी अणु कर दो। तो एक ऐसा रूप है जो अचिंत्य हो जाता है। जिसको चिंतन ही नहीं किया जा सकता। तो वो वहाँ तक पहुँचना थोड़ा सबके लिए सहज नहीं। फिर भी जो ग्रेट फादर्स कहे जाते हैं धरमपिताएं वो तो बड़े अडियल होते हैं। वो फिर उसी निराकार को मानते हैं। वो अपने सामने और किसी को ऊँच ते ऊँच मानते ही नहीं। क्या कहें उनको? बड़े ते बड़े देहअभिमानी हुए कि आत्माभिमानी हुए? हँ? क्या कहें? क्योंकि जो आत्माओं का बाप है उससे ज्यादा तो निराकार कोई बन ही नहीं सकता। वो इतनी निराकारी स्टेज वाला है कि इस सृष्टि पर आती भी है तो भी सदाकाल निराकारी स्टेज में रहता। देहभान तो उसमें आता ही नहीं कभी भी। बाकि जितने भी धर्म स्थापन करने वाले धरमपिताएं हैं ए टू जेड, पुरुषार्थी जीवन में सबको देहभान आता है। आरम्भ में ज्यादा आएगा। फिर प्रैक्टिस करते-3 जितनी जिसकी आत्मा में शक्ति होगी उतनी शक्ति के अनुसार पुरुषार्थ करके वो निराकारी स्टेज में टिकेगा। तो देखने में आता है। जितने भी धरमपिताएं हैं उनके चेहरे को ध्यान से देखो। क्या झलकता है? उनके चेहरे से निराकारी स्टेज दिखाई देती है। ऐसे देखने से लगता है कि वो आत्माएं इस शरीर में जैसे हैं ही नहीं। उपराम स्टेज है।

तो ये जितने भी धरमपिताएं हैं, वो सब निराकार को याद करने से निराकारी स्टेज धारण करते हैं नंबरवार। परन्तु फिर उनमें कोई अव्वल नंबर भी होगा ना। तो जो अव्वल नंबर है उसका नाम शिव के साथ जोड़ा जाता है। शिव ही सुप्रीम सोल गॉड फादर का नाम है। वो नाम कभी बदलता नहीं है। वो सदा शिव है। कभी सदा शंकर, सदा इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट नहीं कहा जाता है। एँ, नहीं कहा जाता। कहा जाता है क्या? सदैव कहेंगे सदा शिव। तो उनको भी बैठकरके बेहद का बाबा सिद्ध करना है। बेहद का बाबा? हँ? बाबा क्यों कहा? बेहद का बाबा उनको तब सिद्ध करना है क्योंकि वो पार्ट भविष्य में बजने वाला है ना। हँ? जो देखेगा उस निराकारी स्टेज को वो कहेगा कि यही है ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। जो कानों से दो शब्द भी सुनेगा तो वो स्वर्ग में चला जाएगा। ऐसा पुरुषार्थ करने लग पड़ेगा कि स्वर्ग में जाएगा जरूर। तो उनको ही बेहद का बाबा कहेंगे। और तो सब हद के बाबाएं हैं।

भले साकार निराकार का मेल तो सभी प्राणीमात्र हैं क्योंकि हर प्राणी में निराकार आत्मा भी है और साकार शरीर भी है। परन्तु वो निराकारी आत्मा निराकारी स्टेज में सदाकाल टिके, सदाकाल, पुरुषार्थी जीवन में और वो भी खास करके जब सुप्रीम सोल बाप जो सदा शिव है, सदा निराकारी, निरहंकारी, निर्विकारी है, वो जब इस सृष्टि पर आकरके ह्यूज ड्रामा की शूटिंग कराते हैं, रिहर्सल कराते हैं, तो उस समय, उस जीवन में हर मनुष्यात्मा को साकारी से निराकारी बनना ही पड़ता है। तो उनकी दौड़ तीखी होती है। किनकी? साकार को याद करने वालों की या निराकार को याद करने वालों की? हँ? बताओ। हाँ। निराकार को याद करने वालों की दौड़ बड़ी तीखी होती है। क्षिप्रम भवति भुक्तात्मा। (गीता 9/31) ऐसे बोला हुआ है गीता में। बहुत जल्दी मुक्त हो जाते हैं, इतनी दौड़ जल्दी-जल्दी लगाते हैं। तीखी दौड़। लेकिन क्लेशो अधिक तरस्तेषाम। (गीता 12/5) उनकी जिंदगी में, पुरुषार्थी जीवन में बहुत परीक्षाएं तो बहुत आती हैं। कठिनाइयां बहुत आती हैं, परिस्थितियाँ बहुत आती हैं। तो वो कठिनाइयां, वो परिस्थितियाँ, वो समस्याएं जो आती हैं वो उनको डिगाने के लिए आती हैं। क्योंकि ऊँचा पद पाना है, ऊँची स्टेज पानी है तो परीक्षा भी तो ऊँची-ऊँची परीक्षा होगी ना। तो सहज कैसे होगा? सहज ये होगा कि साकार में ही निराकार को याद करें और निरन्तर याद करने का प्रयास करें।

Today’s night class is dated 23.7.1967. The main topic for service is that the children should also feel enthusiastic about the ways to do service. When they render service, then the news of the service comes, doesn’t it? So, you have to do spiritual service. Its news is to come. The Father has come to serve all the souls. He is the spiritual Father. And He has come to explain the secret of the cycle of this entire world. He explains in essence form the secret of all the souls which play their part in the entire world cycle. And then He also explains in detail because the path of purifying the sinful ones should be easy, shouldn’t it? When it sits in the intellect in detail, then it becomes easier. It is called ‘sahaj’ in Hindi and ‘easy’ in English, isn’t it?

Easy remembrance. Never use the word ‘Yoga’ anywhere because when you utter the word ‘Yoga’, then those hathyogis (those who perform physical Yoga) come to the mind. Then those hathyogis will sit and ask you a lot of questions. And in reality, you children; even if anyone comes here, then there is no need for you to talk more with those hathyogis because they will debate a lot. They have the sanskars of hathyog. If anyone shows you an easy path, then you will not like it. Remember. So, why was it said that there is no need to talk more? It is because they are firm in their obstinacy (hath). They have sanskars of hathyog since many births. They are sanyasis, aren’t they? They are mostly sanyasis. Just by making them fill up the form you can know as to whom they consider as their guru, whom they consider as their Father. What is our relation with that Supreme Soul Father, the Supreme Father Supreme Soul? It is asked, isn’t it children – Who is the Father of your soul?

Well, the children know that in this world there will be as many opinions about that Father as there are human beings. So many opinions about the Supreme Father! Someone calls someone [as the Supreme Father], someone calls someone else [as the Supreme Father]. Someone says its Hanuman, someone says it is Ganesh, someone accept a snake as God. They worship snakes as well, don’t they? Then they have shown incarnations [of God] as turtle, fish and what not. You are the only children, the Brahmins who say immediately that our Baba is the highest on high ShivBaba. There is nobody higher than Him at all. And He is also called the highest on high God (Bhagwant). And it is He who is also incorporeal. Why was ‘also’ added? Hm? What is meant by adding ‘also’? Hm? It was added because He also becomes corporeal by entering. He is also worshipped, etc. So, will they be able to worship the corporeal or will they worship the incorporeal? Only the corporeal can be worshipped. One can practice remembering the incorporeal. So, it is Him alone, whom the children have to sit and prove to be the unlimited Baba. Who? The one who is incorporeal as well as corporeal. This is why Tulsidas has said – Sagunahi agunahi nahi kachu bheda, ubhay harain bhav sambhav kheda. The sorrows of the world are removed by the corporeal as well as the incorporeal. There is benefit in remembering the corporeal. It will become easy to remember. Why? It is because one is habituated since many births. To remember whom? To remember the corporeal. So, there will not be any need to practice something for which we are already done practice. It will come to the mind easily. And it will come to the mind more.

As regards remembering the incorporeal, people consider it to be incorporeal which does not have any form. Incorporeal does not mean that it does not have any form. It does have a form. But it is a point. Arey, even a point is seen. Point; place a big point. Then it will be seen through these eyes, will it not be? If you keep a small point, then those whose eyes are not clear will not be able to see. If you place a smaller point, then just as there are the scientists; they observe through the instruments. Make it still smaller. Make it smaller than the atom. So, there is a form which becomes unthinkable (achintya). One about which you cannot think at all. So, it is not easy for everyone to reach that stage. However, those who are called great fathers, the founders of religions are very obstinate (adiyal). They then believe in that incorporeal only. They do not consider anyone else to be greatest of all in comparison to themselves. What can be said of them? Are they the most body conscious ones or soul conscious ones? Hm? What should we say? It is because nobody can become more incorporeal than the Father of souls. His stage is so incorporeal that even when He comes to this world, He remains in an incorporeal stage forever. He never becomes body conscious at all. All other founders of religions, A to Z, who establish religions become body conscious during the effort making (purusharthi) life. In the beginning they will be more body conscious. Then, while practicing, the greater the power that a soul possesses, he will become constant in that incorporeal stage by making purusharth. So, it is observed. Look at the faces of the founders of religions carefully. What is the reflection? Incorporeal stage reflects from their faces. It appears as if those souls are not at all in this body. The stage is detached (upraam).

So, all these founders of religions assume numberwise incorporeal stage by remembering the incorporeal. But then there must be someone who is number one among them, isn’t it? So, the name of one who is number one is joined with Shiv. Shiv is the name of the Supreme Soul God Father. That name never changes. He is forever (Sadaa) Shiv. It is never said Sadaa Shankar, Sadaa Ibrahim, Buddha, Christ. It is not said so. What do you say? You will always say Sadaa Shiv. So, you have to sit and prove Him to be an unlimited Baba. Unlimited Baba? Hm? Why was it said ‘Baba’? He has to be then proved to be the unlimited Baba because that part is going to be played in future, isn’t it? Hm? Whoever observes that incorporeal stage will say that He is the highest on high God. Even if someone hears two words [spoken by God] through his ears will go to heaven. He will start making such purusharth that he will definitely go to heaven. So, He alone will be called unlimited Baba. All others are limited Babas.

Although all the living beings are a combination of corporeal and incorporeal because there is an incorporeal soul as well as a corporeal body in every living being, yet that incorporeal soul should remain constant in the incorporeal stage forever in the purusharthi life and especially when the Supreme Soul Father who is Sadaa Shiv, forever incorporeal, egoless, viceless, when He enables the shooting, rehearsal of the huge drama, then at that time, in that life, every human soul has to become incorporeal from corporeal without fail. So, they run fast. Who? Is it those who remember the corporeal or those who remember the incorporeal? Hm? Speak up. Yes. Those who remember the incorporeal gallop very fast. Kshipram bhavati bhuktatma (Gita 9/31). It has been said so in the Gita. They attain liberation (mukti) very soon; they run so fast. Fast run. But, Klesho adhik tarastesham (Gita 12/5). They face a lot of tests in their purusharthi life. They face many difficulties, circumstances. So, those difficulties, those circumstances, those problems that they face, they come to shake them. It is because if one has to achieve a high post, high stage, then the test will also be a high test, will it not be? So, how will it become easy? It will be easy when they remember the incorporeal within the corporeal and try to remember continuously.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 15 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2578, दिनांक 14.07.2018
VCD 2578, Dated 14.07.2018
रात्रि क्लास 23.7.1967
Night Class dated 23.7.1967
VCD-2578-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.15
Time- 00.01-13.15


रात्रि क्लास चल रहा था - 23.7.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – नया ज्ञान देते हैं नई दुनिया के लिए। और एव्रीथिंग न्यू। नई दुनिया के लिए ही बाप आते हैं। तो जो नई दुनिया के मालिक बनते हैं उनको बैठकरके सिखलाते हैं, समझाते हैं। किसको? किसको समझाते हैं और किसको सिखलाते हैं? हँ? क्योंकि और तो कोई भी जान भी नहीं सकते हैं। क्या नहीं जान सकते हैं? हँ? क्योंकि ये नया ज्ञान है नई दुनिया के लिए। ये और कोई नहीं जान सकते। क्योंकि बिल्कुल एब्सोल्यूटली नई बात है। बाप समझाते हैं कि वो है भक्ति भक्तिमार्ग में। और ये है ज्ञान। तो ज्ञान कहाँ से आता है? भक्ति अनेकों से आती है। ज्ञान एक से आता है। और एक भी कौन? वो ज्ञान जानकारी, सारी सृष्टि के आदि, मध्य, अंत की जानकारी, रचयिता और रचना की जानकारी, वो ज्ञान जन्म-मरण के चक्र में आने वालों को तो आ ही नहीं सकता। एक बाप सुप्रीम सोल ही है जो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है। बिन्दु-3 आत्माओं का बाप ज्योतिबिन्दु शिव।

तो विचार करो – सारी दुनिया में भक्ति है। चाहे हिन्दू हों, मुसलमान हों, सिक्ख हों, ईसाई हों जो भी सारी दुनिया में धरम फैले हुए हैं, धरम के फालोअर्स हैं सब भक्तिमार्ग में। बाकि तुम मुट्ठ भर हो। मुट्ठ भर माने? क्या मतलब? वो तो ठीक है मुट्ठ भर। माने थोड़े से हो। कितने हो? वो भी हैं अभी?
(बाबा हंसे।) वो भी तो नहीं हैं। मुट्ठ भर हो जिनको बाबा ज्ञान देते जा रहे हैं। जा रहे हैं। अभी दिया नहीं है सबको। हँ। और तुम वृद्धि को पाते रहेंगे। परन्तु भक्ति तो बहुत बड़ी है ना बच्ची। बहुत बड़ी है? माने कैसे बड़ी है? अकल में बड़ी है? कहते हैं ना अकल बड़ी कि भैंस? क्या बड़ी? अकल बड़ी। भैंस तो देखने में आती है। पॉम्प एण्ड शो है बड़ा भारी। इतना बड़ा हाथी खड़ा हुआ। तो सारा झाड़ है जैसा एक तरफ में और बाकि तुम कितने हो थोड़े। क्या? तुम मुट्ठ भर। और सारी दुनिया? दूसरी तरफ मुट्ठ भर में भी ज्ञान किसको देते हैं? समझाते किसको हैं? सिखलाते किसको हैं नए ज्ञान की बातें? हँ? जो विश्व का मालिक बनते हैं।

तो इसलिए वो बिचारे इतना समझ नहीं सकते हैं। हँ? क्यों नहीं समझ सकते? क्योंकि वो तो छोटे-छोटे एरिया के राजा बनते हैं, मालिक बनते हैं। सारे विश्व के मालिक तो बनते नहीं हैं। तो इतना समझ भी नहीं सकते हैं। और बाप ने समझाया है कि बच्चों, जिन्होंने कलप पहले समझा है वो ही समझेंगे। दूसरे तो समझेंगे ही नहीं। और समझेंगे भी तो लास्ट में समझेंगे। धीरे-धीरे समझेंगे। जिन्होंने कल्प पहले जल्दी समझा है, पहले समझा है, वो ही समझेंगे। इसके लिए तुम लोग फिकर मत करो। क्या? किस बात की फिकर न करो? पढ़ाई, जो पढ़ाई जा रही है, सिखलाई जा रही है, जो बात समझाई जा रही है, उसके लिए ज्यादा फिकर मत करो। आज नहीं तो कल तुमको तो पक्का होना ही है। किस बात के लिए? हँ? जीतेजी नई दुनिया वैकुण्ठ में जाने के लिए तुमको तो तैयार होना ही है। लाख-लाख भी तुम मेहनत करेंगे। क्या? तो भी चिन्ता करने से तुम अपने आप नहीं समझेंगे। क्या? हँ? कोई कहे हम सारा लिटरेचर पढ़ जाएंगे। सारा वो देख लेंगे, ये करेंगे, वो करेंगे। ये तो बाप जब समझायेंगे, तभी समझेंगे। कितनी भी तुम मेहनत करो, लाखों लाख गुनी मेहनत करो, नहीं समझेंगे।

ऐसी तो तुम लोगों ने बहुत मेहनत की है। कैसी? ईश्वरीय सेवा करने की बहुतों से मेहनत किया है। और उसके बाद मुश्किल से पैर टिके हैं। क्या? पैर टिके हैं? क्या एक जगह खड़े हो गए? नहीं। बुद्धि रूपी पाँव तुम्हारा बड़ी मुश्किल से स्थिर हुआ है। नई दुनिया पर पैर धरना है ना बच्चे। तो टिकता नहीं है। जल्दी नहीं टिकता है। हँ? नई दुनिया पर पैर रखने के लिए थिरकता क्यों रहता है? जल्दी टिकता क्यों नहीं है? कारण? हँ? कि कल्प पहले जिनका आत्मा में अनुभव भरा हुआ है वो टिकता है, फिर उसके बाद नंबरवार भी टिकते हैं। पता चला क्यों नहीं टिकता है? हँ? माया उनके पैर उखाड़ देती है। झट से उखाड़ देती है। माया उखाड़ देती है? और जो विश्व का मालिक बनता है उसके नहीं उखाड़ती? हँ? अरे। गीत तो गाती है गांवडों में माताएं – शंकर की दाढ़ी हिलाय गई रे। शंकर को विश्वनाथ कहते हैं। तो दाढ़ी हिलाय गई। पांव थोड़ेही थिरकाया। तो लड़ाई का मैदान है बच्ची। एक तरफ सारी दुनिया का हुजूम। और दूसरी तरफ तुम थोड़े से मुट्ठ भर बच्चे।

अभी तुमको जो सिखलाया जाता है वो तो बिल्कुल राइट बताया जाता है। क्योंकि ये तुमको समझाया जाए। क्या? पहली-पहली बात; क्या? अपन को आत्मा समझो। तुम अपने को देह समझते हो तो वो तो रांग बात है ना। क्योंकि तुम देह थोड़ेही हो। क्या? देह के छूटने के बाद भी आत्मा गरभ में प्रवेश करके अगला जन्म लेती है ना। नहीं लेती? अगर नहीं लेती है तो दुनिया की आबादी कैसे बढ़ रही है? हँ? भले ऊपर से भी आत्माएं उतर रही हैं और नीचे वाली एड होती जा रही हैं, बढ़ती जा रही। हँ, तो अपने को देह समझते हो तो रांग बात हो गई। क्योंकि देह विनाशी है। आज है, कल नहीं रहेगी। और आत्मा? आत्मा तो अविनाशी है। जन्म-जन्मान्तर रहेगी। कल्पांत में भी आत्मा रहेगी। देह नहीं रहेगी। क्या? देह नहीं रहेगी? क्या सबकी देह नहीं रहेगी? फिर देह आएगी कहाँ से? देह, जो पांच तत्वों का पुतला है, वो पांच तत्वों का भी कोई बीज होगा ना। तो वो रहता है एक। और बाकि? आत्मा भी एक स्थिरियम रहती है।

तो देह विनाशी है आत्मा अविनाशी है। अविनाशी आत्मा अविनाशी में जाके बैठेगी। क्या? कैसे बैठेगी? कौनसा मंत्र दिया? मनमनाभव। मेरे मन में, मेरी मन-बुद्धि में, मेरी आत्मा में, जो ज्योतिबिन्दु है, जो बोलने वाला है महामंत्र, मेरे में समा जा, तेरे में क्या है जिसमें समा जा? औरों में नहीं है। क्या है तेरे में? हँ? जो औरों में नहीं है 500-700-750 करोड़ मनुष्यात्माओं में, उनमें नहीं है। तेरे में क्या है? हँ? शिव बाप है? हमेशा रहता है? हँ? हमेशा रहेगा? नहीं। तेरे में ये है – निश्चयबुद्धि विजयते। इस बात पर पक्का निश्चय हो कि मैं आत्मा हूँ। मुझ आत्मा का बाप निराकार ज्योति है। हँ? जिससे हमें समझानी मिलती है। वो ही हमारा बाप भी है, वो ही हमारा टीचर भी है, वो ही हमारा सद्गुरु है। साकार में प्रवेश करके सद्गुरु बनता है ना। तो देह विनाशी, आत्मा अविनाशी। तो अपन को क्या समझना चाहिए? आत्मा अविनाशी समझना चाहिए। उसकी बदली में तुम अपन को देह समझने लग पड़ते हो। घड़ी-घड़ी देहभान आ जाता है। आत्मा भूल जाती है। तो कहते हैं पोतामेल रखो। हँ? अपना चौपड़ा रखो। कितनी देर याद किया? हँ? चौपड़ा रखेंगे तो ध्यान रहेगा – घाटा हो रहा है? हँ? किसकी पाला में शक्ति जा रही है? अगर देहभान में रहेंगे तो देहभानियों के साथ संग लेना पड़ेगा। आत्माभिमान में रहेंगे तो जो आत्माभिमानी आत्माएं हैं उनका संग रहेगा। तो ड्रामा प्लैन अनुसार ये भूल नुंधी हुई है जो तुम देह को याद करने लग पड़ते हो। ड्रामा के ही अन्दर है।

A night class dated 23.07.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was – New knowledge is given for the new world. And everything new. The Father comes only for the new world. So, He sits and teaches, explains to those who become the masters of the new world. To whom? To whom does He explain and to whom does He teach? Hm? It is because nobody else can know as well. What can they not know? Hm? It is because this is a new knowledge for the new world. Nobody else can know this because it is an absolutely new topic. The Father explains that that is Bhakti on the path of Bhakti. And this is knowledge. So, where does the knowledge come from? Bhakti comes from many. Knowledge comes from one. And who is that one too? Those who pass through the cycle of birth and death cannot have that knowledge, the information of the beginning, middle and end of the entire world, the information of the creator and creation. It is one Father, the Supreme Soul alone who is beyond the cycle of birth and death. The Father of the point like souls is the point of light Shiv.

So, just think – There is Bhakti in the entire world. Be it the Hindus, be it the Muslims, be it the Sikhs, be it the Christians, all the religions that are spread all over the world, all the followers of those religions are on the path of Bhakti. You are just handful. What is meant by 'handful'? What does it mean? That is correct – Handful. It means you are very few. How many? Do they also exist now?
(Baba laughed.) Even they are not there. You, whom Baba continues to give knowledge, are handful. Continues. It has not been given to everyone now. Hm. And you will grow in numbers. But Bhakti is very big, isn’t it daughter? Is it very big? How is it big? Is she big in intelligence (akal)? It is said – Is intelligence bigger or a buffalo (akal badi ki bhains)? What is bigger? Intelligence is bigger. Buffalo is visible. There is such a big pomp and show. Such a big elephant is standing. So, it is as if the entire tree is on one side and you are very few. What? You are handful. And the entire world? On the other hand, even among that handful, to whom is the knowledge given? To whom does He explain? To whom does He teach the newer topics of knowledge? Hm? Those who become the masters of the world.

So, that is why those poor people cannot understand to that extent. Hm? Why can’t they understand? It is because they become kings, masters of small areas. They do not become the masters of the entire world. So, they cannot understand to that extent. And the Father has explained that only those children, who have understood Kalpa ago, will understand. Others will not understand at all. And even if they understand, they will understand in the end. They will understand gradually. Only those who have understood early, understood first in the previous Kalpa (cycle of 5000 years), will understand. You people don’t worry about this. What? What should you not worry about? Do not worry much about the knowledge which is being taught, explained. If not today, you are bound to become firm tomorrow. In which topic? Hm? You have to get ready to go to the new world, Vaikunth (heaven) while being alive. You may work hard a lakh times. What? Still you will not understand on your own by worrying. What? Hm? Someone may say that I will read the entire literature. I will see that entirely, I will do this, I will do that. You will understand only when the Father explains. Howevermuch you work hard, you may work hard lakh-fold, you will not understand.

You people have worked very hard like this. How? You have worked hard with many people in order to do Godly service. And after that you have been able to hold on to your feet with difficulty. What? Have you held on your feet? Have you stood at one place? No. Your intellect like feet has become constant after a lot of difficulty. Children, you have to place your feet in the new world, will you not? So, it does not hold. It does not hold quickly. Hm? Why does it keep on moving to place the feet in the new world? Why doesn’t it become stable soon? What is the reason? Hm? The souls, which have become experienced in the previous Kalpa become stable; after that others become stable numberwise as well. Did you know why doesn’t it become stable? Hm? Maya uproots their feet. It uproots them immediately. Does Maya uproot? And does it not uproot the one who becomes the master of the world? Hm? Arey! Mothers sing a song in the villages – Shankar ki daadhi hilaay gayi re (She shook the beard of Shankar). Shankar is called Vishwanath (Master of the world). So, she shook the beard. She did not shake the leg. So, it is a battlefield daughter. On the one side is the entire world. And on the other hand are you handful of children.

Whatever you are taught now is completely right because you have to be explained this. What? The first and foremost thing; what? Consider yourself to be a soul. When you consider yourselves to be a body, then that is a wrong thing, isn’t it? Because you are not a body. What? Even after the body is lost, the soul enters into the womb and gets the next birth, doesn’t it? Doesn’t it get? If it doesn’t get, then how is the population of the world increasing? Hm? Although souls are descending from above as well and the below ones are also getting added, increasing. Hm, so if you consider yourself to be a body, then it is a wrong thing because body is perishable. It exists today, it will not exist tomorrow. And the soul? The soul is imperishable. It will exist birth by birth. The soul will exist in the end of the Kalpa as well. The body will not exist. What? Will the body not exist? Will everyone’s body not exist? Then, where will the body come from? The body, which is an effigy of five elements, there must be a seed of those five elements as well, will there not be? So, that one exists. And what about the rest? The soul also remains stable.

So, the body is perishable; the soul is imperishable. The imperishable soul will go and sit in the imperishable one. What? How will it sit? Which Mantra was given? Manmanaabhav. What is there in My mind, in My mind and intellect, in My soul, which is a point of light, the speaker of the Mahamantra ‘merge into Me’ that you should merge in it? It is not present in others. What is in you? Hm? It doesn’t exist in others, in 500-700-750 crore human souls. What is in you? Hm? Is Father Shiv in you? Does He remain forever? Hm? Will He exist forever? No. You know – Nishchaybuddhi vijayate (the one who has a firm faith gains victory). There should be firm faith that I am a soul. The Father of 'Me, the soul' is incorporeal light, hm, The one from whom we get the explanation. He Himself is our Father also, He is our teacher as well and He Himself is our Sadguru. He becomes a Sadguru by entering in the corporeal, doesn’t He? So, the body is perishable, the soul is imperishable. So, what should you consider yourself to be? You should consider yourself to be an imperishable soul. Instead of that you start considering yourself to be a body. You become body conscious again and again. You forget the soul. So, He says – Maintain a potamail. Hm? Maintain your ledger book (chaupada). How long did you remember [God]? Hm? If you maintain a ledger book, you will pay attention – Am I suffering a loss? Hm? In which direction is my energy being spent? If you remain in body consciousness, then you will have to remain in the company of body conscious ones. If you remain in soul consciousness, then you will remain in the company of the soul conscious ones. So, as per the drama plan this mistake is ordained that you start remembering the body. It is fixed in the drama
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2579, दिनांक 15.07.2018
VCD 2579, Dated 15.07.2018
रात्रि क्लास 23.7.1967
Night Class dated 23.7.1967
VCD-2579-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.45
Time- 00.01-14.45


रात्रि क्लास चल रहा था - 23.7.1967. दूसरे पेज के मध्यादि से थोड़ा ऊपर बात चल रही थी – बाप कहते हैं मैंने ये ब्राह्मण धर्म, सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी धर्म स्थापन किया हुआ है। और उसमें अबलाओं के ऊपर अत्याचार असुरों के बहुत होते हैं क्योंकि आधा कल्प के विकार के लिए हिरे हुए हैं। उसको छोड़ना कोई मासी का घर थोड़ेही है। और फिर ऐसी योग की यात्रा तो कोई ने सिखाई नहीं है। वो जो भक्तिमार्ग में यात्राएं होती हैं वो तो जन्म-जन्मान्तर बहुतों ने की हैं। चाहे मुसलमान यात्रा करते हों काबा की, चाहे कोई भी धरम वाले हों, हिन्दू करते हों तीर्थ स्थानों की। चारों धाम की यात्रा करते हैं। परन्तु वो तो जन्म-जन्मान्तर करते आए हैं। और ये यात्रा तो एक ही जनम में कराई जाती है। है तो ये भी यात्रा। कोई और बात नहीं है। उनकी है जिस्मानी यात्राएं। हमारी है रूहानी यात्रा। और अनेक प्रकार की भी नहीं है। एक ही प्रकार की यात्रा है। और यात्रा है किसलिए? यात्रा इसलिए है कि जो जन्म-जन्मान्तर पाप किये हुए हैं वो याद करने से भस्म हो जाएंगे। याद की यात्रा से भस्म हुए।

और ये याद की यात्रा भी कहाँ तक करना है? हँ? जब तक जीना है तब तक पीना है। ये तो ज्ञान की बात हुई। लेकिन जब तक जाना है ठिकाने पर, मुक्तिधाम का ठिकाना है ना। इस देह के बंधन से मुक्त होना। तो जहाँ तक जाना है मुक्त होकरके मुक्तिधाम में पहले; तो पहले तो मुक्तिधाम ही जावेंगे ना। बाद में सुखधाम आवेंगे। और हरेक आत्मा को ये यात्रा तो आगे पीछे करनी ही है। जो पहले मुक्तिधाम जावेंगे वो पहले सुखधाम में उतर के आवेंगे। जो बाद में मुक्तिधाम जावेंगे या बीच में जावेंगे तो बीच में या बाद में उतर के आवेंगे। मुक्तिधाम से सुखधाम आना जरूर है। और सुखधाम से फिर दुखधाम में भी जाना जरूर है। हरेक आत्मा को ये चक्कर लगाना ही है। तो बाबा मुक्तिधाम जाने के लिए ये यात्रा बताते हैं।

तो अन्दर में बाबा-3 रटते रहो। मुख से नहीं बोलना है। मनसा जाप करते रहो। मन-बुद्धि से याद करते-करते आत्मा पवित्र होकरके जाकरके तैयार हो जाएगी। तो फिर उड़ पड़ेंगे। फिर जब उड़ने की प्रैक्टिस पड़ जाएगी ऊँची स्टेज में पहुँच जाएंगे तो फिर उड़ते ही रहेंगे। समझा ना। ऐसे नहीं समझना कि बाबा कोई गोद में लेकरके कोई को चला जावेगा। ऐसे तो होगा नहीं। करना तो है अपनी मेहनत से। ऐसे भी नहीं, हँ, कि बाबा हमको नैनों पर बिठा कर ले जाएगा। हम बड़े सीकिलधे हैं। नहीं। ये तो यात्रा करने का पुरुषार्थ खुद ही करना है। तब ही तो हम पवित्र हो जावेंगे। खुद ही अपवित्र बने हैं अनेकों के संग के रंग से। अनेकों में बुद्धि का लगाव लगाया ना। तो नीचे गिरते रहे। धत तेरे की। नीचे गिरे तो क्या हुआ? पाप का बोझा चढ़ गया। अपवित्र बन गए ना। ये तो है कि अपवित्र होना भी जरूर है। क्योंकि अपवित्र बनेंगे, अपवित्र दुनिया में पार्ट बजाएंगे तब तो नई दुनिया स्थापन होती है। ये दुनिया अपवित्र बने ही नहीं, पुरानी दुनिया में दुख ही भोगते रहें, ऐसे तो हो नहीं सकता। ये है ही सुख-दुख का खेल। किसी की जिंदगी में सदा सुख बना रहे, सदा दुख बना रहे, ऐसे तो एक जीवन में भी नहीं होता। तो अनेक जीवनों में कैसे होगा?

जब सुखधाम था तो नई दुनिया में इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। अभी इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य नहीं है। क्योंकि उन्होंने तो राजयोग से, राज विद्या से ये राजाई पाई थी। अभी तो प्रजा के ऊपर प्रजातंत्र है। प्रजा का राज्य है। हँ? प्रजा वाली आत्माएं पहले कभी राजाई करती रहीं क्या? उन्होंने कोई पुरुषार्थ किया था क्या? नहीं। तो अंत में भी उनको भी कोट-पतलून मिल जाता है। कैसे मिलता है? भगवान बाप देते हैं क्या? नहीं। प्रजा के ऊपर प्रजा का राज्य चलता है। जो है बेकायदे राज्य। तो ये बेकायदे राज्य अभी लक्ष्मी-नारायण का नहीं है। भले मन्दिरों में जाके उनकी पूजा करते हैं। समझते हैं भगवान भगवती हैं। या भगवान ने इनको मनुष्य से देवता बनाया। और बाप ने तो तुमको अच्छी तरह से समझाय दिया है कि ये जो 84 का चक्कर है, 5000 वर्ष का ड्रामा है, ये चक्कर कैसे फिरता है।

अभी तुम बच्चे भी समझते हो। बाबा भी जानते हैं। इन्न्यूमिरेबल टाइम पर तुमने राज्य लिया था। कल्प-कल्प उसी टाइम पर राज्य लेते हो। और कल्प-कल्प तुम उसी टाइम पर जब तुम्हें गुमाया था हर कल्प में उसी टाइम गुमाते हो। तो कितना टाइम तुम्हारा राज्य चलता है जो राजयोग से राज्य लेते हो? हँ? बहुत लंबे समय तक राज्य चलता है। और उसमें भी एक्यूरेट राज्य तो आधा कल्प चलता है। फिर कलियुग में आकरके तुमको पराए राज्य में आना पड़ता है। वहाँ भी तो परायों का भले राज्य चलता है, तो राजाओं का ही राज्य चलता है ना। चलता तो है। परन्तु अन्तर क्या है? हँ? नरक की दुनिया में, द्वैतवादी द्वापरयुग से लेकरके जो दुनिया शुरू होती है उसमें जो राजाओं का राज्य चलता है और स्वर्ग में जो राजाओं का राज्य चलता है, उसमें अंतर क्या है? राजाई तो दोनों में है। अंतर ये है कि भगवान ने जो राज्य स्थापन किया नई दुनिया का वो अटल, अखण्ड राज्य है क्योंकि वहाँ एक की मत पर चलते हैं। एक राजा, एक धर्म, एक भाषा, एक मत, एक कुल। तो एकता रहती है। तुंडे-तुंडे मतिर्भिन्ना होकर नहीं चलते हैं। इसलिए सुख रहता है।

बाद में ये दूसरे-दूसरे धरम आते हैं, धरमपिताएं आते हैं, उनके फालोअर्स आते हैं। उनके प्रभाव में तुम बच्चे आ जाते हो। क्यों आ जाते हैं? हँ? और भी तो दूसरे-दूसरे धरम वाले हैं जो अपने धरम के पक्के रहते हैं। वो नहीं किसी के चंबे में आते। अपने धरम में पक्के रहते हैं। भारतवासी क्यों आ जाते हैं? क्या कारण है? क्योंकि भारत मातृ देश है। दुनिया में इतने देश हैं वो सब मातृ देश नहीं हैं। माताओं की आदत होती है सुनी-सुनाई बातों पे विश्वास कर लेना। और दूसरे देश मातृदेश क्यों नहीं हैं? हँ? क्योंकि जो भी आते हैं धरमपिताएं, वो माता किसमें प्रवेश करती है? उन्हीं भारत माताओं में प्रवेश करते हैं, जो नंबरवार माताएं बनी थीं। लेकिन कम कला की माताएं थी। क्या? और वो ही पहले कन्वर्ट हो जाती हैं। इसलिए ब्राह्मणों में नौ कुरियाँ मानी जाती हैं ब्राह्मण, जो सतयुग, त्रेता में आकरके नौ प्रकार के ब्राह्मण बनते, वो देवताएं बनते हैं। उनमें से जो पहली कुरी है सूर्यवंशियों की वो तो प्रभावित नहीं होती उतनी। थोड़ी बहुत होती है लेकिन उतनी नहीं प्रभावित। बाकि जो आठ हैं वो तो बहुत ही प्रभावित होते हैं। कहाँ-कहाँ भटकते रहते हैं इसलिए काफिर कहते हैं मुसलमान। ये भारत के लोग जो हिन्दू अपन को कहलाते हैं ये तो जन्म-जन्मान्तर कन्वर्ट होते रहे, दूसरे-दूसरे धर्मों में धक्के खाते रहते हैं। पता नहीं कहाँ-कहाँ फिरते रहते हैं। इसलिए नाम क्या रख दिया? काफिर।

अभी तुमने जो राज्य गंवाया था तुम भारतवासियों ने अभी तुम ले रहे हो। तुम्हारा राज्य गुमाया रावण के अनेक सिरों ने। जब अनेक धरमपिताएं इस सृष्टि पर आ गए तो रावण का राज्य हो गया। अनेक सिरों का राज्य हो गया इस दुनिया में। अभी तुम एक बाप को जान चुके हो। जिस एक बाप को सभी धरम वाले याद करते रहे, भले जानते नहीं हैं, तो भी याद तो करते रहे ना। अलग-अलग नामों से याद करते रहे। उन्हें असली रूप का तो किसी को पता ही नहीं। अभी बाप आकरके सबको अपना परिचय देते हैं क्योंकि बाप के अलावा बाप का परिचय तो कोई दे ही नहीं सकता। तो अभी तुम परिचय भी ले रहे हो और परिचय ले करके उस एक बाप को याद करते हो अव्यभिचारी रूप से तो अपनी राजाई भी ले रहे हो। बाप राजयोग सिखाकर राजाई देते हैं ना। तो तुम्हारा पुरुषार्थ चल रहा है।

A night class dated 23.7.1967 was being narrated. The topic being discussed a little above the beginning of the middle portion of the second page was - The Father says - I have established this Brahmin religion, Suryavanshi and Chandravanshi religion. And in that, the demons torture the weaker sex (ablaa) a lot because they are habituated to lust since half a Kalpa. Renouncing it (lust) is not as easy as visiting the maternal aunt's house. And then nobody has taught such journey (yaatra) of remembrance. Those pilgrimages (yaatra) on the path of Bhakti have been performed by many people birth by birth. Be it the Muslims who go on the pilgrimage to Kaba, be it people of any religion, be it the Hindus who visit the centers of pilgrimage. They perform the pilgrimage of four Dhaams (four temples situated in the upper reaches of Himalayan Mountains in the state of Uttarakhand in north India). But those pilgrimages are being performed since many births. And this pilgrimage is enabled only in one birth. This is also a pilgrimage. It is not any other thing. Theirs are physical pilgrimages. Ours is a spiritual pilgrimage. And it is not of many kinds. It is of only one kind. And what is the purpose of this pilgrimage? This pilgrimage is for burning the sins committed since many births through remembrance. They were burnt through the journey of remembrance.

And how long is this journey supposed to be performed? Hm? You have to drink [the water of knowledge] as long as you are alive. This is about knowledge. But until you reach the destination; there is the destination of muktidhaam (abode of liberation), is not it? To be free from the bondage of this body. So, as long as you have to go to the abode of liberation first after being liberated; so, first you will go to the abode of liberation only, will you not? Later on, you will come to the abode of happiness (sukhdhaam). And every soul has to definitely perform this journey, sooner or later. Those who will go to the abode of liberation first will descend to the abode of happiness first. Those who go to the abode of liberation later or go in between, then they will come down in the middle [of the cycle] or later on. You have to definitely come from the abode of liberation to the abode of happiness. And then you have to definitely go from the abode of happiness to the abode of sorrows. Every soul has to definitely pass through this cycle. So, Baba prescribes this journey to go to the abode of liberation.

So, keep on uttering Baba-3 inside [your mind]. You don't have to utter through your mouth. Keep on chanting in the mind. While remembering through the mind and intellect the soul will become pure and get ready. So, then you will start flying. Then, when you will become habituated to practice of flying, when you reach the high stage, then you will keep on flying. Did you understand? Do not think that Baba will take someone in His lap and go away. It will not happen so. You have to work hard yourself for this. It is also not that Baba will make us sit on His eyes and take us along with Him. We are very seekiladhey (dear ones reunited after a long time). No. You have to yourself make the purusharth to perform this journey. Only then will we become pure. We have become impure ourselves by being coloured by the company of many. We attached our intellect with many, did not we? So, we went on experiencing downfall. Dhatt terey ki. What happened if you experienced downfall? You accumulated the burden of sins. You became impure, did not you? It is sure that you also have to definitely become impure because the new world is established only when you become impure, when you play a part in the impure world. It cannot be possible that this world does not become impure at all or that we keep on suffering pains in the old world itself. This is a drama of happiness and sorrows. It does not happen even in one birth that someone remains forever happy in life or remains forever unhappy. So, how can this happen in many births?

When there was an abode of happiness, there was a rule of these Lakshmi and Narayan in the new world. Now there is not a rule of these Lakshmi and Narayan because they had obtained kingship through rajyog, through rajvidya (education of governance). Now there is a rule of subjects over subjects (prajatantra). There is a rule of subjects (praja). Hm? Did the souls of subjects rule in the past? Did they make purusharth? No. So, even in the end, they also get coat and patloon (pantaloon). How do they get? Does God, the Father give? No. There is a rule of subjects over subjects which is an unruly rule (bekaayde raajya). So, this unruly rule is not of Lakshmi and Narayan now. Although people go to the temples and worship them. They think that they are Bhagwaan (God) and Bhagwati (Goddess). Or God has made them deities from human beings. And the Father has explained to you nicely that how this cycle of 84 births, the drama of 5000 years rotates.

Now you children also understand. Baba also knows. You have obtained kingship innumerable times. Every Kalpa (cycle) you obtain at the same time. And in every Kalpa you lose it at the same time when you had lost it in the previous Kalpa. So, how long does your kingship, which you obtain through rajyog, continue? Hm? It continues for a very long time. And even in that, the accurate kingship continues for half a Kalpa. Then after coming to the Iron Age you have to come under an alien rule. Even there, although it is a rule of the aliens, yet, it is a rule of the kings only, isn’t it? It does continue. But what is the difference? Hm? What is the difference between the rule of kings in the world of hell, in the world that starts from the dualistic Copper Age and the rule of kings that exists in the heaven? There is kingship in both. The difference is that the kingship of new world that God created is an unshakeable, unbreakable kingship because there people follow the directions of one. One king, one religion, one language, one opinion, one clan. So, there is unity. There are not as many opinions as the number of people (tundey-tundey matirbhinna). This is why there is happiness.

Later on these other religions come, other founders of religions come, their followers come. You children come under their influence. Why do you come [under their influence]? Hm? There are people of other religions as well who remain steadfast in their religion. They do not come under anyone’s clutches. They remain firm in their religion. Why do the residents of India come in their clutches? What is the reason? It is because India is a motherland. There are so many countries in the world; all of them are not motherlands. It is the habit of the mothers to believe in hearsay. Why aren’t other countries motherlands? Hm? It’s because all the founders of religions who come; in whom does that mother enter? They enter in the same mothers of India who had become numberwise mothers. But they were mothers with fewer celestial degrees. What? And it is they who convert first. This is why there are believed to be nine categories among Brahmins; these nine categories of Brahmins become deities in the Golden Age and Silver Age. Among them, the first category, the Suryavanshis, does not get influenced so much. They are influenced to some extent, but not to that extent. The remaining eight are influenced a lot. They keep on wandering so much; that is why the Muslims call them Kafirs. These people of India who call themselves Hindus have been getting converted since many births; they have been running from pillar to post in other religions. They keep on wandering (firtey rahtey hain) at so many places. This is why what were they named? Kaafir.

The kingdom that you residents of India lost, you are now obtaining it. Many heads of Ravan made you lose your kingdom. When many founders of religions came in this world, then it became a kingdom of Ravan. There was a rule of many heads in this world. Now you have come to know of one Father, the Father whom people of all the religions used to remember; although they do not know, yet they kept on remembering, didn’t they? They continued to remember Him by different names. Nobody knows His original form. Now the Father comes and gives His introduction to everyone because nobody except the Father can give you the Father’s introduction at all. So, now you are also obtaining the introduction and after obtaining the introduction, you remember that one Father in an unadulterated form; so you are obtaining your kingdom also. The Father teaches Rajyog and gives the kingship, doesn’t He? So, you are making purusharth.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2580, दिनांक 16.07.2018
VCD 2580, Dated 16.07.2018
रात्रि क्लास 23.7.1967
Night Class dated 23.7.1967
VCD-2580-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-14.39
Time- 00.01-14.39


रात्रि क्लास चल रहा था - 23.7.1967. तीसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – पवित्रता के ऊपर ही बहुत गिरते हैं क्योंकि काला दाग तो लग ही जाता है। बाकि तुम बच्चे कोई वो मिलेट्री तो नहीं हो जिस्मानी जो किसको मारते हो, हिंसा करते हो। इसीलिए इस ज्ञान को पवित्र ज्ञान, सहज राजयोग, सहज ज्ञान कहा जाता है। अरे, क्या ज्ञान है? हाँ, 84 पूरी हुई। अब चलो घर। ये ज्ञान है। सबको ऐसे ही बोलना होता है। अभी 84 का चक्कर पूरा हुआ। अब घर चलना है। चलना तो सभी को है। कोई पहले जाएंगे। कोई बाद में जाएंगे। जो पहले पहुँचेंगे वो पहले नई दुनिया में आवेंगे। बाद में पहुँचेंगे तो बाद में तो नई दुनिया होती नहीं। पुरानी दुनिया में ही आना पड़ेगा। तुमको चलना है तो कोई ऐसे नहीं कि और रह जाएंगे। नहीं। भले तुम पहले चलेंगे। परन्तु ऐसे नहीं समझो कि और दूसरे इधर ही रह जाएंगे। नहीं। सबको जाना होगा। तो सबको बोलो अभी नई दुनिया स्थापन हो रही है। तो नई दुनिया भी थी तो सब घर में लौटे थे ना। तो चलो घर। रेडी हो जाओ। तो रेडी हो तो फिर जाय सकेंगे। लेज़ी हो तो नहीं जाय सकेंगे। जब तलक पवित्र नहीं बनेंगे तब तक जा ही नहीं सकेंगे।

तो सबको ये ही पैगाम दो कि अभी घर को याद करो, बाप को याद करो। नहीं तो सज़ा खानी पड़ेगी। एक तो नई दुनिया में भी नहीं आय सकेंगे। ऊँच पद पाना तो बहुत दूर की बात नई दुनिया में। दूसरे फिर सज़ा भी खाएंगे। और पुरानी दुनिया में आना पड़ेगा। कोई बाबा कोई डिफिकल्ट बातें नहीं बताते हैं। हाँ, एक बात है डिफिकल्ट। याद की। और ये याद का तरीका बाप समझाते हैं। और याद बहुत सहज भी है क्योंकि बाप तो विश्व की बादशाही देते हैं ना। तो कितना लगाव होना चाहिए। उनको याद क्यों नहीं करना जो विश्व की बादशाही देते हैं। क्योंकि बाप ही आकरके पढ़ाते हैं ना बच्ची। और तो कोई ये पढ़ाई पढ़ाय नहीं सकता। कोई दुनिया में किसी ने ऐसी पढ़ाई पढ़ाई है राजा बनने की? राजा माने स्वतंत्र। कोई का आक्षेप नहीं। तो हर 5000 वर्ष के बाद बाप आकरके ये पढ़ाई पढ़ाते हैं। राजयोग की पढ़ाई जिससे राजाई मिलती है। तो नई बात हुई ना। और सभी बातें नई हैं। नई-नई बातें सुना करके नई दुनिया की स्थापना करते हैं। ऐसे नहीं कि उन साधु, सन्यासी, पण्डितों के मुकाबले कोई वो ही शास्त्र की पुरानी बातें सुनाते रहते हैं। हाँ, 5000 वर्ष के अन्दर कोई भी ये नॉलेज जानते ही नहीं हैं बिल्कुल। बाप ने आकर समझाया है कि ये नॉलेज तो देवी-देवताएं भी नहीं जानते थे। हाँ, सिर्फ इस ज्ञान के सार में टिकते थे। जो पहली पढ़ाई है कि मैं आत्मा हूँ। वो पक्की थी।

तभी बच्चे कहते हैं कि स्वर्ग से फिर भी यहाँ अच्छा है। कहाँ? संगमयुग में। संगमयुग स्वर्ग से भी अच्छा है। क्यों? इसलिए अच्छा है कि यहाँ बाप भी मिला, बाप का ज्ञान भी मिलता है। वहाँ तो बुद्धु हो जावेंगे नई दुनिया में। और फिर नई दुनिया में जो सुख होगा उससे कई गुना सुख यहाँ संगमयुग पुरुषोत्तम में मिलता है। ये जो टाइम है संगमयुग का, उसमें भी ये पुरुषोत्तम संगमयुग का टाइम बहुत अच्छा पास होता है क्योंकि हम ईश्वरीय परिवार हैं। दैवी परिवार तो फिर नीचे हो गया। ऋषि मुनियों का भी परिवार होता है। वो भी फिर द्वापरयुग में आते हैं। फिर होता है राक्षसी परिवार। तो आसुरी परिवार से अभी तुम ईश्वरीय परिवार में जा रहे हो। सारी दुनिया पर रावण का राज्य था ना। तो सारी दुनिया असुर ही हो गई ना। यथा राजा तथा प्रजा। ईश्वरीय परिवार से फिर देखो डिग्री कम हो जावेगी दैवी परिवार में। फिर और तुम क्षत्रीय बनेंगे। फिर द्वापर में वैश्य बनेंगे। फिर कलियुग में शूद्र। फिर संगमयुग में ब्राह्मण। ये चक्कर भी सिर्फ याद करके दिखाओ तो चक्कर फिर प्रैक्टिस पड़ने से अपने आप बुद्धि में चलता रहेगा। अरे भक्तिमार्ग में बायजोली करते हैं ना। चक्कर काटते हैं ना। परिक्रमा लगाते हैं ना। तो देखो ये तुम्हारा ही यादगार है परिक्रमा लगाना। ये 84 का चक्कर है। इस चक्कर में तुम बाप की परिक्रमा लगाते हो प्रैक्टिकल में। तुम्हारा सारा ज्ञान बुद्धि में चक्कर लगाय लेवे।

तो जैसे बच्चों को समझाया जाएगा वैसे तुमको भी समझाया जाएगा। ऐसे बताओ। नहीं तो ये बच्चे तो ये खेलते हैं। उस खेल के ऊपर भी बाप कितना समझाते हैं बच्चों को। बाकि ये जो पांच विकार हैं इनको तो वश में करना ही है। कुछ न कुछ ये खुद-खुद करते हैं जरूर। ये भी तुम्हारे पात्र से चुराय बहुत कुछ ले लेते हैं। छोटे बच्चे हैं ना। बाद में आते हैं। और तुम बच्चे अपना पॉकेट भरना चाहते हो। परन्तु तुम्हारे पीछे जो आएंगे वो तो चोर हैं। तुम्हारी पॉकेट से निकालेंगे। चोरी करेंगे। चोरी में लगे हुए हैं ना। कौन? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) बीके वाले हैं? बीके वाले पहले नहीं आए थे हमसे? कुछ बीके वाले हमसे पहले
(किसी ने कुछ कहा।) इस्लामी, हाँ। उसके बाद जैसे-जैसे पीछे-पीछे आते जाते हैं वो सारे और ज्यादा चोर। सबसे ज्यादा चोर कौन? हँ? मुख्य धर्मों में बताओ। क्रिश्चियन्स। कितनी चोरी करते हैं। ये पांच चोर लगे हुए हैं तुम्हारे पीछे। देह अभिमान और वो। वो तुमको घड़ी-घड़ी तंग करते हैं। कभी तो, कभी तो तुम्हारा सारा पॉकेट काट ले जाते हैं। सब उड़ाय दिया। आजकल की दुनिया में पॉकेट चोर बहुत होते हैं ना। शूटिंग कहाँ होती है? यहाँ शूटिंग होती है।

देखो, बहुत करके तो बहुत ऐसे समाचार आते हैं अखबारों में। या तो बच्चों के भी आते हैं। आज फलाने की पर्स गुम हो गई। 3000 रूपया उसमें पड़ा हुआ था। आज फलाने के बक्स में से एक हज़ार रुपया चोरी हो गया। एक फलाने के कपाट में ऊपर रखा हुआ था। कई चीज़ें उनमें रखी हुई थी। भाई उसमें से 200 रुपये निकल गए। कोई ले गया। अभी बच्चों को ये मालूम भी है तो इस समय बड़ी खबरदारी करनी चाहिए। ये चोर-चक्कार, ये वो ही हैं ना सब। क्योंकि इस समय तुम्हारा जो बच्चों का, गरीबों का पैसा है, ये तो मोस्ट वैल्युबल है। और जो इस सर्विस में लगाते हो नई दुनिया की स्थापना में और वो चोरी कर लेते हैं तो पुरानी दुनिया में ही जावेंगे ना। पुरानी दुनिया में कोट-पतलून मिल जावेगी। और लगाना भी तुमको ही है। और तो कोई को लगाना नहीं है ना ईश्वरीय सेवा में। नहीं। तुम ब्राह्मणों को ही अपना पैसा तन-मन-धन सभी ब्राह्मणों को लगाना है क्योंकि बादशाही भी तो तुम ही लेते हो ना। तो कोई बात के लिए पैसा लेना पड़ता है। किससे लेना पड़ता है? नहीं। देखो, कितना फर्क है रात-दिन का। फर्क है ना।

A night class dated 23.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the third page was - Many suffer downfall only on the topic of purity because a black stain is affixed. You children are not that physical military who kill someone or indulge in violence. This is why this knowledge is called pure knowledge, easy RajYoga, easy knowledge. Arey, what is knowledge? Yes, 84 (births) were completed. Now let's go home. This is knowledge. You have to tell everyone like this only. Now the cycle of 84 births is over. Now we have to go home. Everyone has to go. Some will go first. Some will go later. Those who reach first will come to the new world first. As regards those who reach [home] late, the new world does not exist later on. They will have to come to the old world only. You have to go; so, it is not as if others will remain. No. Although you will go first, yet, do not think that others will remain here. No. Everyone will have to go. So, tell everyone - Now the new world is being established. So, when everyone had returned, then new world also existed, did not it? So, let's go home. Be ready. So, be ready and then you will be able to go. If you are lazy you will not be able to go. You will not be able to go until you become pure.

So, give this message to everyone that now remember the home, remember the Father. Otherwise you will have to suffer punishments. Firstly, you will not be able to come to the new world also. Achieving a high post in the new world is a far-off proposition. Secondly, you will also suffer punishments. And you will have to come to the old world. Baba doesn't narrate any difficult topics. Yes, one thing is difficult. Of remembrance. And the Father explains the method of this remembrance. And remembrance is also very easy because the Father gives the emperorship of the world, doesn't He? So, one should have so much attachment. Why shouldn't we remember the One who gives us the emperorship of the world? It is because the Father Himself comes and teaches, doesn't He daughter? Nobody else can teach this knowledge. Has anyone taught such knowledge to become kings in the world? King means independent. Nobody's interference. So, the Father comes and teaches this knowledge after every 5000 years. The knowledge of Rajyog through which we get kingship. So, it is a new thing, is not it? And all the topics are new. He establishes the new world by narrating newer topics. It is not as if He narrates the same old topics of the scriptures like those sages, sanyasis, pundits. Yes, nobody knows this knowledge for 5000 years. The Father has come and explained that even the deities did not know this knowledge. Yes, they used to just become constant in the essence of this knowledge which is the first teaching that I am a soul. That was firm.

Only then do the children say that this place is better than heaven. Where? In the Confluence Age. Confluence Age is better than heaven. Why? It is better because here we also meet the Father, we also get the Father's knowledge. There we will become fools in the new world. And then when compared to the happiness that will exist in the new world, you get many fold happiness here in the elevated Confluence Age (purushottam Sangamyug). This time of the Confluence Age, even in that this time of Purushottam Sangamyug passes very well because we belong to a Godly family. Divine family is comparatively lower. There is a family of sages and saints as well. They also come in the Copper Age. Then there is the demoniac family. So, now you are going from a demoniac family to a Godly family. There was a kingdom of Ravan in the entire world, wasn't it there? So, the entire world is a demon, is not it? As is the king, so are the subjects. Look, when compared to the Godly family a degree is reduced in the divine family. Then you will become Kshatriyas. Then you will become Vaishyas in the Copper Age. Then Shudras in the Iron Age. Then Brahmins in the Confluence Age. If you remember just this cycle, if you practice this, then your intellect will keep on thinking of it automatically. Arey, you roll your body [while circumambulating a temple] on the path of Bhakti, don't you? You make rounds, don't you? You circumambulate, don't you? So, look this circumambulation (parikrama) is your memorial only. This is a cycle of 84 [births]. In this cycle, you circumambulate in practical. Your entire knowledge should revolve in your intellect.

So, just as the children are explained, you will also be explained. Tell them like this. Otherwise, these children play. The Father explains to the children so much on that play also. As regards these five vices, they have to be brought under control. They definitely do something or the other on their own. They also steal many a things from your plate. They are small children, aren't they? They come later on. And you children want to fill your pocket. But those who come after you are thieves. They will take out from your pocket. They will steal. They are involved in stealing, aren't they? Who? Hm? (Someone said something.) Are they BKs? Hadn't the BKs come before us? Some BKs before us
(Someone said something.) Islamic people, yes. After that as and when they keep on coming later on, they are bigger thieves. Who is the biggest thief? Hm? Tell among the main religions. Christians. They steal so much. These five thieves (vices) are chasing you. Body consciousness and that. They trouble you again and again. Sometimes, sometimes they pick your entire pocket. They stole everything. Now-a-days there are many pick-pocketers in the world, is not it? Where is the shooting performed? The shooting takes place here.

Look, many such news items are published in the newspapers often. Or the news of the children also comes. Today, such and such person's purse was lost. It contained 3000 rupees. Today one thousand rupees was stolen from the box of such and such person. It was placed above the cupboard (kapaat) of a particular person. Many things were kept in it. Brother, they took away 200 rupees from it. Someone took it away. Now children also know this; so, they should be very careful at this time. These thieves are the same persons, aren't they? Because at this time the money of you children, the poor ones is most valuable. And you invest the amount in this service of establishing the new world and they steal it; so they will go to the old world only, will they not? They will get coat and patloon (pantaloon) in the old world. And it is you alone who has to invest. Others will not invest in Godly service. No. You Brahmins, all of you Brahmins have to invest your body, mind and wealth because you alone obtain the emperorship, don't you? So, you have to take money for some purpose. From whom do you have to take? No. Look, there is a difference of day and night. There is a difference, is not it?

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2580, दिनांक 16.07.2018
VCD 2580, Dated 16.07.2018
रात्रि क्लास 23.7.1967
Night Class dated 23.7.2018
VCD-2580-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 14.40-28.39
Time- 14.40-28.39


तुमको योगबल के, योगबल से विश्व की बादशाही मिल जाती है। और ये तो जानते हो कि हिस्ट्री में बाहुबल से किसी को विश्व की बादशाही मिल नहीं सकी। कोशिश तो बहुतों ने की। लेकिन विश्व की बादशाही बाहुबल से, हिंसा के बल से कोई ले तो नहीं सके ना। तो इस समय में देखो बाहुबल का भी बहुत ही है। और एक तरफ में तुम हो योग बल वाले। जिसको साइंस का बल कहा जाता है वो है उनका। और तुम्हारा है साइलेंस का बल। और इसमें बुद्धि का योग एक बाप के साथ है। इसमें चाहिए सत से संग।। किसका? आत्मा ही सत है। तो आत्मा का सत बाप से संग चाहिए। 23.7.1967 की रात्रि क्लास का चौथा पेज। तो अपने को आत्मा जब समझो तब ही तो आत्मा का बाप याद आवेगा ना।

बाप से जब याद करो तभी तुम पार जा सकोगे। बाप खिवैया है ना। तो तुम्हारी जीवन रूपी नैया को खे करके इस विषय सागर से पार ले जावेगा। और तुम पवित्र बन सकते हो। क्योंकि पवित्र बनने से ही तुम इस विषय वैतरणी नदी से पार होते हो। हाँ, यहाँ आकरके बैठ जाया करो। आकरके बाप को याद करो। हाँ, ये भी है कि ये सीखो। बाप ने समझाया था ना – यहाँ जो आते हैं पादरी लोग, यहाँ क्राइस्ट को याद करने के लिए भी, वो भी ऐसे बाप तुम बच्चों को सिखलाते हैं। वो नहीं ये बातें बताएंगे। जब बाबा के सामने हो तो आँखें खोल करके बैठना है क्योंकि बाप ने समझाया है। कहते हैं ना नज़र से निहाल किंदा प्यारा सद्गुरु। तो गुरु नहीं। गुरु किसी को निहाल नहीं कर सकते हैं। वो गुरु तो निहाल कर ही नहीं सकते। ये तो सद्गुरु की बात है। गुरु तो निहाल करने की बजाय और ही बेहाल कर देते हैं। हँ? गिराय देते हैं। सद्गुरु निहाल करते हैं। क्योंकि तुम उनको देखते हो। किनको? सद्गुरु को। और तुमको देखते हो। तो उसमें बहुत बल भरता है। तुमको शक्ति भरती है। बाबा को याद करने से शक्ति भरेगी ना। क्योंकि बाबा ही तो सर्वशक्तिवान है।

तो अभी तुम जानते हो कि हमारी आत्मा सतोप्रधान बनती है। एक सत के संग से। तो ये बात तो जरूर समझो। अगर हमको सतोप्रधान बनना है तो हमको बहुत याद करना है। और सतोसामान्य बनना है तो थोड़ा कम कर लेना। हँ? रजो बनना है तो याद की बात ही नहीं। फिर किसको याद करेंगे? हँ? रजो में दुनिया में सुख नहीं होता? वहाँ भी तो सुख भी होता है, बादशाही भी तो होती है। वहाँ फिर अलग-अलग धरमपिताएं, छोटे-बड़े नंबरवार, उनको याद करेंगे। यहाँ तो बताया जाता है कम से कम एवरेज 8 घंटा जरूर बाप की सर्विस में लगाना चाहिए। याद में और सेवा में। और न सिर्फ याद से, सर्विस में जरूर लगाना है। नहीं तो दिल में हमेशा समझ लो कि हम बहुत इम्तेहान में अपना ऊंच पद नहीं पाय सकेंगे। इम्तेहान में ऊँचा नंबर लेना है और ऊँच पद पाना है तो सर्विस के ऊपर सारा मदार है। जितना हम कहते हैं कि हम नर से नारायण बनें, नारी से लक्ष्मी बनें या तो उनकी डायनेस्टी में आवें। मेहनत करने से सब कुछ मिलता है। मेहनत बिगर तो कोई फल मिलता ही नहीं।

तो इसमें मेहनत है। और ये तुम्हारी मेहनत गुप्त है। तुमको समझाया गया है क्योंकि तुम हो अनमोल वारियर्स और अननोन वारियर्स भी हो। दुनिया तुमको नहीं जानती है। पर बाप कहते हैं तुम वेरी वैल नोन हो। सारी दुनिया तुमको जान जाएगी। तो तुम वारियर्स जरूर हो। कौनसे वारियर्स पास होते हैं? फुल पास। सूर्यवंशी वारियर्स होते हैं फुल पास। और फिर देखो कोई हथियार आदि भी हाथ में नहीं हैं। तुम्हारे बुद्धि रूपी हाथ में ये ज्ञान के शस्त्र हैं। और ये भी जानते हो कि रामचन्द्र फेल हो गया। तो तो बाबा ने समझा ही दिया है कि देखो वो फेल हो जाते हैं तो उनको बाण दे देते हैं। हँ? क्षत्रीयपने की निशानी दे देते हैं। फेल हुए तो चन्द्रवंशी में चले गए। ऐसे कितने हैं सतयुग में देवताएं जो त्रेता में जाके क्षत्रीय नहीं बनते हैं? कोई हैं? अरे? तो फिर राम का नाम क्यों आ गया? हँ? क्योंकि वो तो जो भी युग नीचे आता है हर युग में वो पहले आ जाता है। क्या? सतयुग के आदि में भी, त्रेता के आदि में भी, कलियुग के आदि में भी, द्वापर के आदि में भी। इसलिए भक्तिमार्ग में उन्होंने गीत बनाय दिया। क्या? चारों युग परताप तुम्हारा, हँ, प्रसिद्ध जगत उजियारा। अरे, फिर दिखाय दिया उसको बन्दर हनूमान। हनूमान की स्तुति करते हैं ना। तो उसमें हनूमान चालीसा में ये बात आती है। क्या? चार युग परताप तुम्हारा है प्रसिद्ध। तो क्या राम वाली आत्मा बन्दर थी? फिर? फिर क्यों ऐसे बताया? बन्दर थी नहीं। कोई ने प्रवेश किया जो हनूमान के रूप में पूजा जाता है।

तो देखो, माया कोई को नहीं छोड़ती है। माया सबको पकड़ती है। हाँ, खयालात आया बहुत अच्छा। परन्तु नहीं बाबा। हम तो उसको महावीर बनकरके उड़ाय दिया माया को। हाँ। आज क्रोध आया था। किसी के ऊपर आ गया। पर फिर हमने अपन को संभाल लिया। ऐसे-ऐसे अपना पोतामेल देते हैं। तो वो सब बताना चाहिए। ये हम यहाँ हैं ना। यहाँ तो घर में हैं। और बाहर में रहते हैं तो उनकी बातें कुछ और हो जाती हैं। लिखो, बाबा, आज हमको ये हवस हुई। कोई चीज़ के ऊपर दिल आ गई। बाप कहते हैं यज्ञ के प्रसाद के सिवाय और कोई चीज़ पर दिल नहीं आनी चाहिए। सिवाय एक के प्रसाद के कोई और चीज़ पर दिल हुई, ये खाऊँ, वो खाऊँ, सारा दिन खाऊँ-3. है ना। पीछे को खाया भी। तो भी पता तो है ना बच्चे। उसे फिर कहा जाता है लोभ। लोभ अति का हो जाता है ना। यहाँ हैं। बाबा के पास हैं ऐसे जिनको, ऐसे बहुत बच्चे हैं जिनको खाने-पीने का बहुत लोभ है। ये खाऊं, वो खाऊं। ये बाबा मेरे पेट में। अरे, क्या पेट में? बलाऊं। बलाऊं क्या होता है? पेट में कीड़े पड़ जाते हैं ना। तो उनको बोला बलाऊं। ऐसे कहा जाता है ना। बलाऊँ तुम बच्चे समझते हो? बला। बला किसको कहा जाता है? साँप को बला कहा जाता है। वो लंबे-लंबे पेट में से कीड़े निकलते हैं ना सांप जैसे, तो बलाऊँ। अरे! कभी सर्प तुमने देखा है? तुम्हें मालूम है पेट में सर्प जैसे पड़ जाते हैं। बलाएं पेट में रहती हैं। अरे, इतनी-इतनी बड़ी-बड़ी निकलती हैं बलाएं पेट में, लंबी-लंबी बांह करके बाबा ने बताया। अच्छा, मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का यादप्यार और गुडनाइट। मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चों प्रति रूहानी बाप की नमस्ते। ओमशान्ति।

You can get the emperorship of the world through the power of Yoga. And you know that nobody could achieve the emperorship of the world through physical power in the history. Many tried. But nobody could achieve the emperorship of the world through physical power, through the power of violence. So, look, at this time there is a lot of dominance of physical power. And on the one side you are the ones with the power of Yoga. The one which is called the power of science is theirs'. And yours' is the power of silence. And in this the connection of the intellect is with one Father. In this one requires the company of truth. Whose? The soul itself is truth. So, the soul requires company of the true Father. Fourth page of the night class dated 23.7.1967. So, the Father will come to the mind only when you consider yourself to be a soul, will He not?

You will be able to go across only when you remember the Father. The Father is a boatman (khivaiyya), is not He? So, He rows your life-like boat across this ocean of vices. And you can become pure because only by becoming pure that you sail across this river of vices (Vishay vaitarni nadi). Yes, you should come and sit here. You should come and remember the Father. Yes, it is also necessary that you learn this. The Father had explained - The Christian Fathers (Paadris) who come here to remember Christ; the Father also teaches you like this. They will not teach you these topics. When you are in front of Baba, you should sit with your eyes open because the Father has explained. It is said, is not it that 'nazar se nihaal kinda pyara sadguru' (Dear Sadguru enlightened us just by His glance). So, not guru. Gurus cannot enlighten anyone. Those gurus cannot enlighten at all. It is about the Sadguru. The gurus trouble you instead of enlightening you. Hm? They make you fall. Sadguru enlightens you because you see Him. Whom? The Sadguru. And when you see Him, you get a lot of power. You are filled with might. You will be filled with power when you remember Baba, will you not? It is because Baba Himself is Almighty.

So, now you know that our soul becomes satopradhan through the company of one truth So, you should definitely understand this topic. If we have to become satopradhan, then we should remember [Him] a lot. And if you have to become satosaamaanya, then you can remember a little less. Hm? If you have to become rajo, then there is no question of remembering [Him] at all. Then whom will you remember? Hm? Is there no happiness in the world in the rajo stage? There is happiness there as well; there is emperorship there as well. Then there you will remember various founders of religions, numberwise small and big ones. Here it is told that you should definitely devote at least average 8 hours in the Father's service. In remembrance and service. And not just in remembrance; you should definitely invest in service. Otherwise, always think in your heart that you will not be able to achieve a high post in the examination. If you have to achieve higher number in the exam and a high post, then everything is dependent on service. We say that we should become Narayan from nar (man), Lakshmi from naari (woman) or come in their dynasty. You get everything by working hard. No fruit is achieved without hard work.

So, there is hard work involved in it. And this is your incognito hard work. You have been explained because you are valuable warriors and unknown warriors also. The world does not know you. But the Father says - You are very well known. The entire world will know about you. So, you are definitely warriors. Which warriors pass? Full pass.Suryavanshi warriors pass fully. And then look, there are no weapons etc. in your hands. Your intellect like hand holds these weapons of knowledge. And you also know that Ramchandra failed. Baba has already explained about it that look, when he fails, he is given the arrows (baan). Hm? A symbol of Kshatriyas is given. When they failed, they became Chandravanshis. How many such deities exist in the Golden Age who do not become Kshatriyas in the Silver Age? Are there any? Arey? So, then why was the name of Ram mentioned? Hm? It is because whichever Age starts, in every Age he comes first. What? In the beginning of the Golden Age also, in the beginning of the Silver Age also, in the beginning of the Iron Age also, in the beginning of the Copper Age also. This is why they have penned a song on the path of Bhakti. What? Chaaron yug partaap tumhara, hm, prasiddh jagat ujiyara (Your glory shines in every Age, your light is famous all over the world). Arey, then that monkey Hanuman has been depicted. Hanuman is praised, is not he? So, in the Hanuman Chalisa, this topic is mentioned. What? Your glory in four Ages is well-known. So, was the soul of Ram a monkey? Then? Then why was it mentioned like this? It was not a monkey. Someone entered in him, who is worshipped in the form of Hanuman.

So, look Maya does not spare anyone. Maya catches everyone. Yes, a very good thought came to the mind. But, no Baba. I acted like a Mahavir (bravest one) and made Maya to vanish. Yes. Today, I got angry. I got angry on someone. But then I controlled myself. They give such potamail. So, all that should be revealed. We are here, aren't we? Here, we are at home. And the case of those who live outside is different. Write, Baba, today I succumbed to this greed. My heart was attracted to something. The Father says - One should not feel attracted to anything except the Prasad (food items) of Yagya. If, except for the Prasad of One, you feel attracted to eat this, eat that, feel like eating throughout the day and later you also ate. Still, you know child, don’t you? That is then called greed. There is too much greed, is not it? You are here. There are persons with Baba, there are many children who have a lot of greed of eating. I should eat this, I should eat that. Baba, this is in my stomach. Arey, what is in the stomach? Balaaun (worms). What is balaaun? Worms develop in the stomach, don't they? So, they were called balaaun. It is said so, is not it? Do you children understand balaaun? Balaa. What is meant by balaa? A snake is called balaa. Long snake-like worms emerge from the stomach, don't they? So, balaaun. Arey! Have you ever seen a snake? Do you know that snake like things emerge in the stomach. Worms live in the stomach. Arey, such big worms emerge from the stomach! Baba stretched his arms and showed. Achcha, remembrance love and goodnight from the spiritual Father (Baap) and Dada to the sweet-sweet, seekiladhey (reunited after a long time) children. Spiritual Father's Namaste to the sweet-sweet, seekiladhey children. Om Shanti.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 22 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2581, दिनांक 17.07.2018
VCD 2581, Dated 17.07.2018
रात्रि क्लास 31.7.1967
Night Class dated 31.7.1967
VCD-2581-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.35
Time- 00.01-13.35


आज का रात्रि क्लास है - 31.7.1967. सुनते हैं, कभी समझते हैं, ये नई बातें सुन रहे हैं। ये नए किस्म का ज्ञान है और मीठा भी लगता है। कुछ सेन्स भी है। परन्तु अगर उनको और भी कुछ कहें कि बड़े आदमी भी तो राजा ही कहे जाते हैं। या वहाँ गुजराती में मान्यवर बहुत कहते हैं। ये जो अभी ये समझाय रहे हैं ये कोई नई बात नहीं है। ये प्रदर्शनी या चित्र आपको आज से 5000 वर्ष पहले भी इसी समय में आपको सुनाए थे। अभी ये नहीं बताया होगा कोई ने कि 5000 वर्ष पहले भी ये ज्ञान सुनाया था, ये नई बातें बताई थीं। मैं समझता हूँ, ऐसे नहीं कोई समझेगा। अगर ये बताते हैं तो वंडर खावें। ये कैसे हो सकता है? यानि हम जो यहाँ सेन्टर खोला है, और आप आए हैं, जो कुछ भी अभी हुआ है, ये 5000 वर्ष पहले भी हुआ था? अरे! हर 5000 वर्ष पहले इस समय में आपको आकरके समझाएंगे कि महाराजन अभी फिर से अपना राजयोग से ये प्राचीन भारत का राजयोग, क्योंकि अभी तो कलियुग है ना। राजाई तो है नहीं देवताओं की। तो वो राजाओं की देवताई कहाँ गई? आपको हम हिस्ट्री बताय रहे हैं। उन्होंने लक्ष्मी-नारायण की कि कैसे पहले आप ही डबल सिरताज थे। फिर जरूर 84 के चक्र में आते-आते आपको जनम लेते-लेते नीचे गिरना है।

अभी अंत में तो प्रजा के ऊपर प्रजा का राज्य है। राजाओं का राज्य तो है नहीं। क्योंकि राजाई करना तो कोई सिखाते ही नहीं हैं। ये तो बाप का ही काम है राजयोग से राजा बनाना। तो देखो, अभी आपका भी राज्य नहीं है। भले आप पूज्य थे। बाद में पुजारी भी बने। अभी प्रजा का प्रजा के रूप में आ गए। और फिर आप अभी ये नया ज्ञान सुनेंगे तो आप राजन बन सकते हो। क्योंकि यहाँ सिखाया ही जाता है राजयोग। इससे वो ही डबल सिरताज बनते हैं। एक सारे राज्य की जिम्मेवारी, विश्व के ताजधारी। दूसरा पवित्रता का ताज। मिलता उन्हीं को है जो यहाँ यज्ञ सेवा की जिम्मेवारी उठाते हैं। तो ये है जिम्मेवारी का ताज। जैसे हम पढ़ रहे हैं, ऐसे तुम भी पढ़ सकते हो। हम ईश्वर का सिखाया हुआ ज्ञान पढ़ रहे हैं ना। और एक ही ईश्वर से पढ़ते हैं। वो ही हमारा बाप है, वो ही हमारा सुप्रीम टीचर है। तो तुम भी ऐसी अव्यभिचारी पढ़ाई पढ़ सकते हो। पीछे तुम राजा थे आगे या प्रजा थे। सो तो तुम्हारी पढ़ाई से मालूम पड़ेगा। तुम जितनी तीव्रता से पढ़ाई पढ़ेंगे तो उतना ऊँच पद पाएंगे। अगर बुद्धि में बैठ गया कि बरोबर ये जो कहती है ये ड्रामा है दुनिया, ठीक कहती है। ये एक बड़ा ड्रामा है, ह्यूज ड्रामा और उसकी रिहर्सल होती है। मैं हो सकता हूँ कि मैंने रिहर्सल में अच्छी पढ़ाई पढ़ी हो। अच्छी पढ़ाई पढ़करके डबल सिरताज बना। हो सकता है। बता तो रास्ता देते हैं। फिर उनकी बुद्धि में बैठे या न बैठे।

अभी इसके पीछे क्या हाल रहता है, क्या होता है, जो भी होता है इतना तो पक्का है कि गिरना तो सभी को है। क्या? कहाँ गिरना है? हँ? 5000 वर्ष के ह्यूज ड्रामा में गिरना है या रिहर्सल के टाइम पर भी गिरना है? दोनों में गिरना है। यहाँ गिरेंगे रिहर्सल में तो वहाँ भी गिरेंगे। हाँ, ये हो सकता है कोई धीरे-धीरे धीमी गति से गिरे, कोई तीव्र गति से गिरे। तो जो तीव्र गति से गिरते हैं उसका कारण क्या? उसका कारण है जो बाप पढ़ाई पढ़ाते हैं, श्रीमत देते हैं, उसकी बरखिलाफी। तो गिरते हैं। तो गिरना तो सभी को है। हाँ, अभी संगमयुग है, रिहर्सल का टाइम है, अभी समय है ऊँचा चढ़ने का। हाँ, अभी तमोप्रधान से सतोप्रधान तो बनना ही है। क्योंकि अभी हम कलियुग से सतयुग तक ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं ना। तो ये बुद्धि में रहना चाहिए कि अभी तो हमें ऊपर चढ़ना है क्योंकि हमें सच्चा ज्ञान मिल चुका। पहले तो हमें सृष्टि का ज्ञान ही नहीं था ना।

और अभी तमोप्रधान तो सभी हैं। सारी दुनिया के मनुष्यमात्र तमोप्रधान हैं। सारी दुनिया ही तमोप्रधान है। पांच तत्व भी तमोप्रधान हैं। पांच तत्वों से बना हुआ ये शरीर भी तमोप्रधान है। हाँ, ये जान गए कि पहले भारत सतोप्रधान था। सारी दुनिया की जो मनुष्यात्माएं हैं वो उस समय नहीं थीं। तो सतोप्रधान होने का सवाल ही नहीं। हाँ, अभी तमोप्रधान हैं तो तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना सभी को है। जो आत्माएं कलियुग में उतरती हैं वो भी पहले सतोप्रधान फिर वो भी अभी तमोप्रधान बन गईं अंत में। तो ये चक्कर को याद करना कि सतोप्रधान से तमोप्रधान, तमोप्रधान से सतोप्रधान। तो ये याद की यात्रा ठहरी। हँ? ये याद की यात्रा ठहरी? माना अपन को आत्मा समझ बाप को याद नहीं करना? हँ? तो ये क्या बताया कि मनन-चिंतन-मंथन करते हैं ड्रामा का, सृष्टि चक्र का, तो वो भी याद की यात्रा ठहरी।

बाप कहते हैं मुझे याद करो। तो तुम्हारा इस योग अग्नि से पूर्व जन्मों के जो पाप कर्म हैं, विकर्म हैं, और जन्म-जन्मान्तर के विकर्म हैं, वो विनाश हो जाएंगे। क्या? बाकि क्या करो? मुझे याद करने से तुम्हारे पूर्व जन्मों के पाप कर्म भस्म होंगे। और चक्कर को याद करने से क्या होगा? हँ? तुमको स्मृति आएगी कि हम सतोप्रधान थे। तो जिस स्टेज में हम थे उसी स्टेज में अभी फिर से हमको पहुँचना है। तो आपको हम बहुत अच्छी तरह से बैठकरके समझाएंगे अगर टाइम देंगे तो। और आप समझाने का टाइम ही नहीं देंगे तो टाइम तो थोड़ा बचता जाता है ना। विनाश सामने खड़ा है। पुरानी दुनिया भस्म होने वाली है। तो टाइम तो बनता जाता है ना। फिर तो जल्दी आ जाएगा विनाश सामने। और मंजिल बहुत ऊँची है। कितनी ऊँची है? विश्व का महाराजन बन सकते हो। और बाबा कहते हैं कि आत्मा को, अपन को अभी आत्मा समझो। और फिर माम एकम याद करो।

Today's night class is dated 31.7.1967. People listen; sometimes they feel that they are listening to new topics. This is a new kind of knowledge and it also appears to be sweet. There is some sense as well. But if they are told something else also that big personalities are also called kings. Or there in Gujarati, they frequently say 'maanyavar' (Sir). Whatever is being explained now is not a new thing. This exhibition or these pictures were narrated to you 5000 years ago as well at this time. Now nobody would have told that he/she had narrated this knowledge 5000 years ago as well or that he/she had narrated these new topics. I understand; nobody would understand like this. If these people tell, then they wonder. How can this be possible? Does it mean that the center that we have opened here and you have come here, whatever has happened now had happened 5000 years ago as well? Arey! Every 5000 years ago at this time we will come and explain to you that Maharajan, now again our rajyog, the rajyog of ancient India; because it is the Iron Age now, is not it? It is not the kingship of the deities. So, where did that divinity of kings go? We are narrating the history to you. The history of Lakshmi-Narayan that how you yourselves were double crowned (double sirtaaj). Then while passing through the cycle of 84 [births], you have to get rebirths and suffer downfall.

Now there is a rule of subjects over subjects (praja) in the end. There is no rule of the kings because nobody teaches how to rule. It is the task of only the Father to make someone a king through rajyog. So, look, now it is not your rule. Although you were worshipworthy and later on you also became worshippers. Now you have come in the form of subjects of subjects. And then, if you now listen to this new knowledge, then you can become a king because here it is rajyog alone which is taught. It is through this that they become double crowned. One is the responsibility of the entire kingdom, the bearer of the crown of the world. Second is the crown of purity. Only those people, who take up the responsibility of Yagya service here, get it. So, this is the crown of responsibility. Just as we are studying, you can also study. We are studying the knowledge taught by God, aren't we? And we study only from one God. He alone is our Father; He alone is our Supreme Teacher. So, you can also study such unadulterated knowledge. Whether you were king or a subject in the past will be known through your learning. The more intensely you study the knowledge, the higher the post that you will achieve. If it sits in your intellect that definitely whatever she says that this world is a drama is correct. This is a big drama, huge drama and its rehearsal takes place. It is possible that I have studied well during the rehearsal. I studied well and became double crowned. It is possible. I show the path. Then, it is up to them whether it sits in their intellect or not.

Well, whatever will be the condition after this, what happens, whatever happens, one thing is sure that everyone has to undergo downfall. What? Where do you have to fall? Hm? Do you have to fall in the huge drama of 5000 years or do you have to fall even at the time of rehearsal? You have to fall in both. If you fall here in rehearsal, then you will fall there as well. Yes, it is possible that some fall gradually, some fall quickly. So, what is the reason for those who fall quickly? Its reason is violation of the teachings, Shrimat of the Father. So, they fall. So, everyone has to fall. Yes, now it is the Confluence Age, a time for rehearsal; now it is the time to rise high. Yes, now you have to definitely become satopradhan from tamopradhan because now we are climbing upstairs from the Iron Age to the Golden Age, aren't we? So, your intellect should be aware that now we have to rise up because we have received the true knowledge. Earlier we did not have the knowledge of the world, did we?

And now everyone is tamopradhan. The human beings of the entire world are tamopradhan. The entire world itself is tamopradhan. The five elements are also tamopradhan. This body made up of the five elements is also tamopradhan. Yes, you have come to know that earlier India was satopradhan. The human souls of the entire world did not exist at that time. So, there is no question of being satopradhan at all. Yes, now you are tamopradhan; so, everyone has to become satopradhan from tamopradhan. The souls which descend in the Iron Age were also satopradhan earlier; they too have become tamopradhan in the end. So, to remember this cycle that we become tamopradhan from satopradhan and then satopradhan from tamopradhan. So, this is the journey of remembrance. Hm? Is this the journey of remembrance? Does it mean you should not consider yourself to be a soul and remember the Father? Hm? So, what did He say that if you think and churn the drama, the world cycle, then that also constitutes the journey of remembrance.

The Father says - remember Me. Then, through this fire of Yoga, the sins of your past births, and the sinful actions of many births will be burnt. What? What should you do? By remembering Me the sins of your past births will be burnt. And what will happen by remembering the Cycle? Hm? You will recollect that we were satopradhan. So, we have to once again reach the stage in which we had been. So, we will sit and explain to you very nicely if you spare some time. And if you do not at all give us time to explain, then very little time is left, is not it? Destruction is staring at you. The old world is going to be destroyed. So, the time is getting finished, is not it? Then, you will face the destruction very soon. And the goal is very high. How high is it? You can become the emperor of the world. And Baba says that you consider yourself to be a soul now. And then remember Me alone.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 24 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2582, दिनांक 18.07.2018
VCD 2582, Dated 18.07.2018
रात्रि क्लास 31.7.1967
Night Class dated 31.7.1967
VCD-2582-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.02
Time- 00.01-14.02

रात्रि क्लास चल रहा था - 31.7.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – नए-नए जिज्ञासु आते हैं। कोई कहते हैं कि हमको फुर्सत नहीं है। बात साबित करने के लिए बहुत प्रूफ देते हैं। बाबा कहते हैं तुम तकर-तकर बहुत करते हो। हँ? तकर-तकर कर रहे हो परन्तु नहीं, हम तो आपको रास्ता बताते हैं। अभी तो तुम्हारा ये धंधे-धोरी से तुमको कुछ नहीं है। हम जो रास्ता बताते हैं उसमें तुम विश्व के मालिक बनने के लिए बन सकते हो क्योंकि ये लक्ष्मी-नारायण थे ना। ये विश्व के मालिक थे। हँ? कौनसे लक्ष्मी-नारायण? हँ? जो लक्ष्मी-नारायण, संवत, जो लक्ष्मी-नारायण आदि वाले थे। संगम नहीं पुरुषोत्तम संगमयुग के। संगमयुग तो साधारण बात हो जाती है। क्योंकि संगम तो त्रेता सतयुग का भी संगम। त्रेता द्वापर का भी संगम। द्वापर कलियुग का भी संगम। संगम नहीं। और संगम में भी जब पुरुषोत्तम प्रत्यक्ष हो। पुरुषों में उत्तम आत्मा कब प्रत्यक्ष होती है? हँ? कब? नाइनटीन सेवेन्टी सिक्स। क्या? ठीक है।

तो ये थे विश्व के मालिक। क्योंकि सतयुग में तो विश्व होता ही नहीं है। सतयुग में जो पहला नारायण बनेगा वो तो दादा लेखराज कृष्ण की आत्मा। जहाँ तक ऋषि-मुनियों की बुद्धि पहुँचती है। ऋषि-मुनियों की बुद्धि जो है वो कल्प पूर्व में जो विनाश हुआ था, महाविनाश, उस समय तक नहीं पहुँचती। वो तो बहुत बड़ा एक्सीडेन्ट है। अरे, सामान्य मृत्यु होती है तो भी किसी को कुछ याद नहीं रहता। और ये तो 84 जन्मों में 84 शरीर छोड़े। वो भी सामान्य बात हो गई। लेकिन पुरुषोत्तम संगमयुग जब होता है, उसके बाद, जोर से विनाश होता है। सारी सृष्टि का विनाश। चैतन्य आत्माएं भी शरीर छोड़ देती हैं। पांच तत्व भी तामसी बन जाते हैं। भयंकर रूप धारण कर लेते। और उनकी शक्ति भी नष्ट जैसे हो जाती। वो भी बीज रूप में समाय जाते। किस बीज रूप में समाय जाते? हँ? पांच तत्व कौनसे बीज में समा जाते? हँ? परमब्रह्म में समाय जाते क्योंकि परम माने परमपुरुष और ब्रह्म माने ब्रह्मा। जो लौकिक दुनिया में भी जो बच्चे की पैदाइश होती है तो पहले जो बच्चे का शरीर बनता है, क्योंकि आत्मा तो बाद में प्रवेश करती है। तो शरीर काहे से बनता है? पांच तत्वों से बनता है। वो पांच तत्व कहाँ से आते हैं? ऊपर से आते हैं? नीचे से आते हैं? बाहर से आते हैं? हँ? माँ से आते हैं। वो पांच तत्वों का संघात है माता। और फिर उसमें बाप का बीज जो था, उस बीज ने विस्तार किया माता के गर्भ में। बाकि आत्मा तो किसका बच्चा है? परमपिता परमात्मा का। लेकिन परमपिता जिसे कहा जाता है वो तो सुप्रीम सोल। परमपुरुष परमात्मा किसे कहा जाए? जो परम पार्टधारी है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर। तो वो बाप समान बनता है। बाप माना आत्माओं का बाप, सुप्रीम सोल। बाकि बाप नहीं बनता है। बाप समान बनता है। तो दोनों ही चीज़ें उसमें हो गईं। आत्मा भी है सुप्रिमेसी का पार्ट बजाने वाली हीरो पार्टधारी, और शरीर का बीज, पांच तत्वों का भी बीज उसी में समाय जाता।

तो ये लक्ष्मी नारायण का स्वरूप दिखाया हुआ है कि ये विश्व का मालिक थे। बाकि विश्व का मालिक तो एक ही होता है। जैसे गॉड फादर एक ही होता है। हाँ, ये है गॉड फादर जब आते हैं तो भगवान; भगवान आएगा तो भगवान-भगवती ही बनाएगा ना। बाकि भगवान तो एक ही होता है। तो विश्व का मालिक भी एक ही हुआ। तो अब नहीं है। अब कौन हैं? अभी तो विश्व का मालिक कोई हो ही नहीं सकता। क्योंकि ये सारी दुनिया हिंसकों की बन गई। हिंसा से, देह अभिमान से कोई विश्व का मालिक नहीं बन सकता। तो 84 जन्म के बाद अभी ये भी तामसी बन गए। ये भी 84 जन्म के बाद 84 जन्म लेते-लेते भिन्न-भिन्न नाम-रूप से यहाँ आ गए हैं पुरुषोत्तम संगमयुग में। और पुरुषोत्तम बन रहे हैं। पढ़ाई पढ़ रहे हैं। हँ? कैसे कह दिया सन् 67 में पढ़ाई पढ़ रहे हैं? हँ? सन् 67 में नारायण वाली आत्मा, आदि नारायण, पढ़ाई तो नहीं पढ़ रही थी। वो नहीं पढ़ रही थी पढ़ाई; बेसिक भी पढ़ाई कहाँ पढ़ रही थी? वो तो ब्रह्मा बाबा के शरीर छोड़ने के बाद ही तो आएगी। जंगल में एक शेर जाएगा तभी तो दूसरा शेर जंगल का राजा बनेगा। ये दुनिया भी जैसे कांटों का जंगल है। इस कांटों के जंगल में सब जानवर ही जानवर। लेकिन जानवरों में भी शेर जैसा दहाड़ मारने वाला, ज्ञान की दहाड़ ऐसी जिसका कोई जवाब न दे सके। जब तक ब्रह्मा बाबा थे तब तक ब्रह्मा बाबा को कोई जवाब नहीं दे सका ज्ञान की बातों का। उनके जाने के बाद जो शेर आता है उसकी बातों का भी कोई जवाब नहीं। कोई सानी नहीं।

लेकिन वो भी पढ़ रहे हैं। तो कौन पढ़ रहा है? हँ? वो जो विश्व का मालिक कहा जाता है, आदि नारायण, वो तो 67 में था ही नहीं। तो कैसे कह दिया पढ़ रहे हैं? हँ? अरे? माता पढ़ती है तो माता के पेट में बच्चा पढ़ता है कि नहीं? हँ? अभिमन्यु की कहानी आती है ना। कहाँ से सीख ली बाण विद्या? पेट में ही सीख ली। तो माँ के जो संस्कार हैं, स्वभाव हैं, गुण हैं, उनका असर पड़ता है बच्चे पर। तो पढ़ रहे हैं। माता कौन हुई? हँ? अरे? माता कोई हुई या नहीं हुई? पराप्रकृति। परे ते परे रहने वाली प्रकृति। प्रकृति माने प्रकष्ठ रूप की कृति। जिसको प्रकष्ठ रूप में रचा। कृति माने रचना। तो जो बच्चा पैदा होता है वो साकार में हुआ या निराकार में हुआ? सोमनाथ मन्दिर बनता है तो सोमनाथ के साथ सोमनाथनी भी चाहिए। तो दोनों इकट्ठे प्रत्यक्ष होते हैं। तो बच्चा काहे से पैदा होता है? बच्चे को बीज किसने डाला कि तुम आत्मा हो? किसी ने डाला या नहीं डाला? किसने डाला? माता ने ही। माता ने ही ये ज्ञान दिया। तो बच्चा। तो बच्चा तो बाद में पैदा हुआ ना। लेकिन बुद्धि रूपी पेट में था तब पैदा हुआ कि बिना पैदा, बिना हुए पैदा हो गया? था ना। तो कैसे था? हँ? शिव बाप जब आते हैं तो बच्चों को ब्रह्मा के द्वारा पढ़ाई पढ़ाते भी हैं बेसिक की तो बच्चों को इमर्ज करते हैं। तो इमर्ज भी कहाँ करेंगे? हँ? जैसे लौकिक दुनिया में माता के पेट में बच्चा होता है। आत्मा कहाँ से इमर्ज हुई? पेट में ही इमर्ज हुई ना। तो अनुभव किसको होता है? माता को अनुभव होता है।

तो ये बात बहुत जरूरी है समझना। क्या? कि ये लक्ष्मी-नारायण हैं। नाम रूप इनका भिन्न हो गया है। परन्तु जैसे ये पद पाय सकते हैं विश्व की बादशाही का तो तुम भी? नंबरवार पा सकते हो ना। नहीं पा सकते? जैसे राजा होता है राज्य में तो सारा कारोबार राजा संभालता है या महामंत्री संभालता है? हँ? राजा संभालता है? नहीं। जितनी जानकारी महामंत्री को होती है उतनी राजा को नहीं होती। सारी कंट्रोलिंग पावर किसके हाथ में रहती है? महामंत्री के हाथ में रहती है। तो ऐसे न समझो कि तुम नहीं बन सकते हो। ये भी पढ़ रहे हैं। तुम भी पढ़ रहे हो। बहुत जरूरी है ये बात समझना।

Night Class dated 31.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was - Newer students come. Some say that we don't have time. They give many proofs to prove their point. Baba says - You speak a lot. Hm? You are speaking a lot, but no, we show you the path. Now you don't get anything from your business. By following the path that we show you can become the masters of the world because these were Lakshmi and Narayan, weren't they? They were masters of the world. Hm? Which Lakshmi-Narayan? Hm? The Lakshmi-Narayan, samvat (era), the Lakshmi-Narayan who were in the beginning. Not of the Confluence Age, but of the elevated Confluence Age (Purushottam Sangamyug). Confluence Age is an ordinary thing because as regards confluence, the confluence of Silver Age and Golden Age is also a confluence. The confluence of Silver Age and Copper Age is also a confluence. The confluence of Copper Age and Iron Age is also a confluence. Not confluence. And even in the Confluence Age, when the Purushottam is revealed. When is the highest soul among the purush (human beings or souls) revealed? Hm? When? Nineteen seventy six. What? It is correct.

So, these were the masters of the world because the world does not exist at all in the Golden Age. The one who becomes the first Narayan in the Golden Age is the soul of Dada Lekhraj Krishna. The intellect of the sages and saints reaches up to that time. The intellect of the sages and saints does not reach up to the time when the destruction, the mega-destruction had taken place Kalpa ago. That is a very big accident. Arey, even when ordinary death takes place, nobody remembers anything. And you have left 84 bodies in 84 births. That is also an ordinary thing. But when it is the Purushottam Sangamyug, then after that, severe destruction takes place. The destruction of the entire world. Living souls also leave their bodies. The five elements also become degraded. They assume a dangerous form. And it is as if their power is also destroyed. They too merge into the seed form. In which seed form do they merge? Hm? In which seed do the five elements merge? Hm? They merge into the Parambrahm because Param means Parampurush and Brahm means Brahma. Even in the lokik world, when a child is born, then first the body of the child gets ready because the soul enters in it later on. So, how is the body formed? It is formed with the five elements. From where do those five elements come? Do they come from above? Do they come from beneath? Do they come from outside? Hm? They come from the mother. Mother is the combination of those five elements. And then the Father's seed which was present in her, that seed underwent expansion in the mother's womb. As regards the soul, whose child is it? Of the Supreme Father Supreme Soul. But the one who is called the Supreme Father is the Supreme Soul. Who will be called Parampurush Parmatma? The one who is the supreme actor on this world stage. So, he becomes equal to the Father. Father means the Father of souls, the Supreme Soul. But he does not become Father. He becomes equal to the Father. So, both the things are included in him. There is the soul also, which plays the part of supremacy; the hero actor and the seed of the body, the seed of the five elements also merges in him.

So, this form of Lakshmi-Narayan has been shown that they were masters of the world. As regards the Master of the world, it is only one. Just as the God Father is one. Yes, it is correct that when God Father comes, then God; When God comes He will make God and Goddess only, will He not? As regards God, He is only one. So, the master of the world is also only one. So, they are not so now. Who are present now? Now nobody can be the master of the world because this entire world has become a world of violent persons. Nobody can become the master of the world through violence, through body consciousness. So, after 84 births, now these have also become degraded. After getting 84 births, while getting 84 births, they have come here in the Purushottam Sangamyug with different names and forms. And they are becoming Purushottam (highest among souls). They are studying knowledge. Hm? How did He say that they are studying knowledge in 67? Hm? The soul of Naryan, the first Narayan was not studying knowledge in 67. It was not studying knowledge; was it studying even the basic knowledge? It will enter [the path of knowledge] only after Brahma Baba leaves his body. Only when one lion departs from a jungle that another lion will become the king of the jungle. This world is also like a forest of thorns. In this forest of thorns everyone is an animal. But even among animals, it should be someone who roars like a lion; such roar of knowledge, which cannot be countered by anybody. As long as Brahma Baba was alive, nobody could counter Brahma Baba on the topics of knowledge. Nobody counters even the lion, who comes after his departure. There is nobody equal to him.

But they are also studying. So, who is studying? Hm? He, who is called the master of the world, the first Narayan, was not present in 67 at all. So, how was it told that 'are studying'? Hm? Arey? If a mother studies, then does the child in her womb also study or not? Hm? There is a story of Abhimanyu, is not it? From where did he learn archery? He learnt it in the womb itself. So, the sanskars, natures, virtues of the mother have an influence on the child. So, they are studying. Who is the mother? Hm? Arey? Is there any mother or not? Paraaprakriti. The Prakriti (nature) who lives in the highest stage. Prakriti means a special creation. The one who was created in a special manner. Kriti means creation. So, is the child who is born, in a corporeal form or an incorporeal form? When the temple of Somnath is built, then along with Somnath, Somnathni is also required. So, both of them are revealed together. So, how is the child born? Who sowed the seed in the child that you are a soul? Did anyone sow or not? Who sowed? The mother herself. The mother herself gave this knowledge. So, child. So, child was born later on, wasn't he? But was he born when he was in the womb-like intellect or was he born without coming into existence? He existed, did not he? So, how was he? Hm? When Father Shiv comes and when He also teaches basic knowledge to the children through Brahma, He causes the children to 'emerge'. So, where will He cause them to 'emerge'? Hm? For example, in the lokik (outside) world, there is a child in the mother's womb. Where did the soul emerge from? It emerged in the womb only, did not it? So, who feels? The mother feels.

So, it is very important to understand this topic. What? That these are Lakshmi and Narayan. Their name and form have changed. But just as they can achieve a post of the emperorship of the world, you too? You can achieve numberwise, cannot you? cannot you achieve? For example, there is a king in the kingdom; so, does the king take care of the entire administration or does the Prime Minister (Mahamantri) look after it? Hm? Does the king look after? No. The king does not have as much information as the Prime Minister has. In whose hands is the entire controlling power? It remains in the hands of the Mahamantri. So, do not think that you cannot become. These are also studying. You are also studying. It is very important to understand this topic.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2583, दिनांक 19.07.2018
VCD 2583, Dated 19.07.2018
रात्रि क्लास 31.7.1967
Night Class dated 31.7.1967
VCD-2583-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.45
Time- 00.01-13.45


रात्रि क्लास चल रहा था - 31.7.1967. पहले पेज के लगभग अंत में बात चल रही थी – स्वर्ग बनने की कौनसी चाल बताई? मनमनाभव मध्याजीभव और मामेकम याद करो। और फिर इतना करने से क्या होगा? पवित्र बनेंगे, पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। पवित्र दुनिया है ही स्वर्ग। स्वस्थिति में स्थित हो गए माना पवित्र हो गए। देह की स्थिति में स्थित हैं, देहभान में हैं, तो देह तो विनाशी है, सड़ जाती है, कीड़े पड़ते हैं, बदबू निकलती है। उसको तो नहीं कहेंगे पवित्र। वो तो अपवित्र दुनिया की बात हो गई जहाँ देहभान में बुद्धि धरी रहती है। देह में बुद्धि लिप्त रहती है। वो हुए फिर नरक के मालिक। यहाँ तक कि कोई तो रौरव नर्क के मालिक बन जाते हैं। तो ये अगर उनको समझाया है तो जरूर उनको बुद्धि में बैठेगा। क्या-क्या समझाया? मनमनाभव की बात महामंत्र। और फिर महामंत्र धारण करेंगे तो मन-बुद्धि जब एक में लगेगी तो रिजल्ट आएगा – तन, मन, धन सब इस ज्ञान यज्ञ में स्वाहा करेंगे। मध्याजीभव हो जाएगा। फिर एक बात और भी है। मामेकम याद करो। औरों-औरों को याद करते रहेंगे तो पक्के मनमनाभव नहीं बनेंगे। हँ।

तो बात है ऊँच ते ऊँच पद पाने हैं, नंबरवार तो होंगे ही, तो मामेकम याद करो। फिर उसी स्टेज में पवित्र बनेंगे। और उसी स्थिति में निश्चित हो जाएगा कि कितनी पवित्र आत्माओं के इर्द-गिर्द रहेंगे जो तुम्हारे राज्य का संचालन करेंगे राज्याधिकारी बनकरके। तो ये बात जो भी समझने वाले हैं उनको समझाने से उनकी बुद्धि में बैठेगा। और फिर वो यहाँ के ब्राह्मण कुल का बन जावेगा। क्योंकि ब्राह्मण कुल की तो सारी दुनिया बननी है ना। तो उनको भी कुछ लगेगा। पीछे ऐसे नहीं कहा जा सकता है कि वो राजा कोई सचपच राजा बनेगा। बन भी सकते हैं। नहीं भी बन सकते हैं। सुना है, दिलचस्पी दी है। और फिर भी आने का है दशहरे पर।

इसलिए बाबा ने आज लिखा उनको दशहरे पर तुम ये पूरा ये म्यूजियम या तो इसी हाल में पूरा ये म्यूजियम अच्छे से देखो। 31.7.1967 की वाणी का दूसरा पेज, रात्रि क्लास। बाकि कोई समाचार नहीं लिखा है कि ये जो हॉल है एक कबूतरखाना बना हुआ है। तो क्या ये सदैव कबूतरखाना है? कौनसा हॉल? हँ? कौनसा हॉल बना हुआ है 67 में? हँ? जो, जहाँ पर बाबा का स्टैच्यू रखा हुआ है, बाजू में वो हॉल के बाजू में है। प्रांगण में है। और जो हॉल बना हुआ है वहाँ उस समय क्लास होता था हॉल में। तो ये कबूतरखाना बन गया। माना उसमें जो बैठने वाले हैं वो कौन हैं? कबूतर और कबूतरी। तो बाबा को प्रश्न पैदा (हुआ) क्या ये सदैव कबूतरखाना ही बना रहेगा? हँ? नहीं। जो मुखिया कबूतरी है वो खतम होगी, उसके बाद प्रभाव कम होता जाएगा। होते-होते एक दिन ऐसा आएगा कि ये तोतों का खाना-खजाना वो बन जाएगा हॉल। अरे, ये हॉल तो ऐसे ही पडा हुआ है। जैसे ये भी तो एक जैसे कबूतरखाना था ना। बस, कबूतर ही रहते थे। जब बाबा आए थे उस समय की बात बताई। उस जगह दो, चार, पांच या कौआ भी रहते होंगे। और कौन रहते होंगे? तो अगर ऐसा ही वो कबूतरखाना है और कोई नहीं लेते हैं या पता नहीं क्या बात है कोई क्यों नहीं लेते हैं।

अगर बनाया होगा तो बहुत करके ये शादी के लिए ही होगा। अक्सर करके या तो साधु-संत-महात्मा आकरके वहाँ अपना प्रवचन सुनाते होंगे। अभी क्यों है? टाइन, टाउन हॉल क्या बंद है? क्यों ये कबूतरखाना पड़ा है? कोई भी नहीं आते हैं उनके पास। ये पूरा समाचार नहीं दिया है। सो बाबा अभी उस कबूतरखाने के बारे में बात भी करते रहते हैं। किसके बारे में? कबूतरखाना तो बताया। लेकिन जगह कौनसी है? हँ? जहाँ म्यूजियम बना है। 1967 में म्यूजियम नहीं बना था। आबू में नहीं, माउंट आबू में सनसेट प्वाइंट रोड पर। तो बाबा बात करते रहते हैं। बात करते-करते सुनेंगे भी। और फिर पूरा समाचार देंगे। अगर ऐसा कबूतरखाना वाला भी टाउनहॉल मिल जाए उसमें म्यूजियम खुल जाए तो, तो फिर यही म्यूजियम, वो ही कबूतरखाना म्यूजियम बन जाए सुन्दर-सुन्दर चित्रों का, तो वो ही समझने की जगह भी हो जाए।

और वहीं हॉल में जहाँ म्यूजियम खोला जाए वहाँ रहने का भी प्रबंध किया जाए। तो अच्छा काम हो जावेगा। क्योंकि ये म्यूजियम की सर्विस तो बहुत अच्छी है। क्या कहा? बहुत अच्छी माने? क्या अच्छी है? हँ? बाबा की बुद्धि में म्यूजियम में कौनसे चित्र थे रखने के लिए?
(किसी ने कुछ कहा।) चैतन्य चित्र थे बुद्धि में रखने के लिए ब्रह्मा बाबा की बुद्धि में? अरे, उनकी बुद्धि में कहाँ चैतन्य चित्र थे? लक्ष्मी-नारायण के जड़ चित्र थे या उस समय झाड़ का, सीढ़ी का भी बन चुका था। जो मुख्य-मुख्य चित्र और भी बन चुके थे। जैसे कृष्ण हाथ में स्वरग का गोला लेके आ रहे हैं, नरक के गोले को लात मार रहे हैं। तो ऐसे-ऐसे चित्र बाबा की बुद्धि में आए। और बोला कि ये सर्विस सबसे अच्छी है। क्योंकि सर्विस की फिर कोई कभी भी गिट-गिट नहीं कर सकेंगे। अभी तो ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ गिट-गिट करते हैं। चित्र होंगे तो चित्रों के आधार पर समझाएंगे। करीने से समझाएंगे। अभी तो ये दुश्मन हैं थोड़े। आगे चलके भविष्य में तो बहुत विघन पड़ने के हैं। बाप ने समझाया कि इसी यज्ञ में अनेक प्रकार के बच्चों का विघन पड़ेगा। हँ? अनेक प्रकार में कौन-कौन होंगे? बताओ भई। अनेक प्रकार के माने अनेक धर्मों में कन्वर्ट होने वाले जो होंगे वो द्वापरयुग से दूसरे धर्मों में कन्वर्ट होंगे ना ब्राह्मण बच्चे ही। तो वो ही अपनी शूटिंग करेंगे। क्या? विघन डालने की। तो अनेक प्रकार के बच्चों का विघन पड़ेगा।

A night class dated 31.7.1967 was being narrated. The topic being discussed at almost the end of the first page was - Which method was mentioned for the establishment of heaven? Manmanaabhav Madhyajibhav and remember Me alone (Maamekam). And then what will happen by doing all this? You will become pure, become masters of the pure world. The pure world itself is heaven. You became constant in swasthiti (soul conscious stage) means that you became pure. If you are constant in the stage of the body, if you are in body consciousness, then the body is perishable, it rots, it develops worms, it emanates bad odour. It will not be called pure. That is about the impure world where the intellect remains immersed in body consciousness. The intellect remains immersed in body. They are then masters of hell. Some even become the masters of extreme hell (raurav narak). So, if they have been explained this, then it will definitely sit in their intellect. What all did you explain? The topic of Manmanaabhav, the mahamantra. And then when you inculcate the mahamantra, and when the mind and intellect remains focused on one, then the result will be that you will sacrifice your body, mind, wealth, everything in this Yagya. You will become Madhyajibhav. Then, there is another aspect also. Remember Me alone (maamekam Yaad karo). If you keep on remembering others, then you will not become firm Manmanaabhav. Hm.

So, the matter is that if you wish to achieve the highest posts, you will be numberwise only, then remember Me alone. Then you will become pure in the same stage. And in the same stage it will be decided as to how many pure souls will remain around you and manage your kingdom by becoming the officers of your kingdom (raajyaadhikaari). So, all those who are to understand this topic, if you explain to them, then it will sit in their intellect. And then he will become a member of the Brahmin clan of this place because the entire world is going to become a member of the Brahmin clan, is not it? So, they will also feel something. Later, it cannot be said that that king [of this world] will really become a king [in heaven]. They may become. They may not become. They have heard. They have shown interest. And then they are supposed to come on Dussehra (festival).

This is why Baba wrote to them today on Dussehra - You go through this museum entirely or observe the entire museum nicely. Second page of the Vani dated 31.7.1967, night class. But they have not written any information that this hall has become a kabootarkhana (a room occupied by pigeons). So, is it forever a kabootarkhana? Which hall? Which hall existed in 67? Hm? The place where Baba's statue has been installed is beside a hall. It is in the premises. And class used to be conducted in the hall that exists. So, it has become a kabootarkhana. It means that who are the people who sit in it? He and she pigeons. So, Baba got a doubt - Will this always remain a kabootarkhana? Hm? No. When the main she-pigeon (kabootari) perishes, then after that the influence will go on decreasing. Gradually, a day will come when this hall will become a treasure house of parrots. Arey, this hall is lying unutilized. For example, this was also like a kabootarkhana, wasn't it? That is all. Only the pigeons used to live. A topic about the time when Baba arrived there was mentioned. At that place, two, four, five or a crow must also be living. Who else must be living? So, if it is such a kabootarkhana, and if someone does not buy it or who knows why anyone is not buying it.

If it was built, most probably it was built for the purpose of marriages. Mostly sages, saints, mahatmas might have been coming there to deliver lectures. Why is it so now? Is the tine, town hall closed now? Why has it become a kabootarkhana? Nobody comes to them. This entire news hasn't been given. So, Baba keeps on talking about that kabootarkhana now. About whom? It was indeed described as a kabootarkhana. But which place is it? Hm? It is the place where the museum is built. The museum was not built in 1967. Not in Abu; on the Sunset Point road in Mount Abu. So, Baba keeps on talking [about it]. He also listens while talking. And then he gives the complete report. Even if we get a town hall which has become a kabootarkhana, then a museum could be opened in it. Then the same kabootarkhana will become a museum of beautiful pictures; so, that will become a place to understand as well.

And in the same hall where the museum is to be opened, arrangements should be made for lodging as well. Then it would be a good thing because this service through museum is very good. What has been said? What is meant by 'very good'? What is good? Hm? Which pictures was Baba's intellect thinking of keeping in the museum?
(Someone said something.) Were there living pictures to be kept in the intellect, in Brahma Baba's intellect? Arey, were there living pictures in his intellect? There were the non-living pictures of Lakshmi-Narayan or at that time the picture of the Tree, the Ladder must have also been prepared. Some more main pictures had been prepared. For example, Krishna is bringing the sphere of heaven in his hand and kicking the sphere of hell. So, such pictures came to Baba's intellect. And he said that this service is the best one because then nobody will be able to complain about service. Now the Brahmakumar-kumaris complain. If there are pictures, they will explain on the basis of the pictures. They will explain tactfully. Now there are some enemies. In future a lot of obstacles are going to be created. The Father has explained that obstacles will be created by various kinds of children in this very Yagya. Hm? Who all are included among many kinds? Tell brother. 'Of many kinds' means those who are to convert to other religions will be the Brahmin children only who convert to other religions from Copper Age. So, they will only perform their shooting. What? Of creating obstacles. So, obstacles will be created by many kinds of children.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2584, दिनांक 20.07.2018
VCD 2584, Dated 20.07.2018
रात्रि क्लास 31.7.1967
Night Class dated 31.7.1967
VCD-2584-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.47
Time- 00.01-13.47


रात्रि क्लास चल रहा था - 31.7.1967. दूसरे पेज के अंत में बात चल रही थी – जैसे बाप बैठकरके समझाते हैं आत्मा क्या है, इस अपने लिए भी कहते हैं। ये ‘इस’ कौन है? हँ? और वो बाप जो बैठ के समझाते हैं वो कौन है? हँ? जैसे बाप बैठकरके समझाते हैं। मिसाल दिया बाप का। हँ? कोई जवाब नहीं। इस अपने लिए भी कहते हैं मैं जो हूँ, जैसा हूँ, मुझे कोई नहीं जान सकते हैं सिवाय तुम बच्चों के। कौन बच्चों के? हँ? जब मैं उन बच्चों को सुनाता हूँ, हँ, कैसे सुनाता हूँ, कौनसे बच्चों को सुनाता हूँ, जो जान सकते हैं कि मैं जो हूँ, जैसा हूँ। जब मैं उन बच्चों को सुनाता हूँ, तो कोई तन के द्वारा सुनाता हूँ ना। हँ? कौनसे तन के द्वारा सुनाता हूँ? हँ? अरे, बेसिक में भी तो सुनाता हूँ बच्चों को। हँ? नहीं सुनाता हूँ? बेसिक में भी सुनाता हूँ। लेकिन बेसिक में ब्रह्मा के द्वारा सुनाता तो हूँ। लेकिन सुनकरके समझता कौन है? मुकर्रर रथ समझता है। फिर ‘उन बच्चों को सुनाता हूँ’ ऐसे क्यों कहा? हँ? कोई एक बच्चा थोड़े ही है। उन बच्चों को सुनाता हूँ। माना दो हैं कम से कम। एक तो ब्रह्मा के द्वारा सुन कर समझ लेता है। और दूसरा है जो समझ लेता है, वो समझा हुआ सुनाता है रुद्र माला के बच्चों को।

तो बच्चे पहचान तो लेते हैं। सुनाने मात्र से ही पहचान लेते हैं। बोला ना - जब मैं उन बच्चों को सुनाता हूँ। अब सुनाता तो कोई शरीर के द्वारा ही होगा। कौनसे तन के द्वारा? बेसिक में तो ब्रह्मा के द्वारा सुनाया। और फिर ऊँची पढ़ाई? ऊँची पढ़ाई के लिए मुकर्रर रथ। तो टीचर है क्लेरिफिकेशन देने वाला। तो उन बच्चों को सुनाता हूँ तो वैसे ही आत्मा क्या है, वो क्या कि ये कितना वो जन्म लेती है। और वो आत्मा कैसे-कैसे पार्ट बजाती है। ये बात तो किसी को बुद्धि में नहीं है। जिन बच्चों को सुनाता हूँ उनमें से कोई की बुद्धि में है, हँ, कि आत्मा कितने जन्म लिए, कैसे पार्ट बजाती है, वो क्या है, किसको भी बुद्धि में नहीं है। बिल्कुल भी नहीं बैठता। तो कौनसे बच्चे हैं वो? हँ? तो न आत्मा के लिए कोई को ज्ञान है और न परमात्मा के लिए ज्ञान है। इसलिए बाप आकरके आत्मा का भी ज्ञान देते हैं। पूरा ज्ञान देते हैं कि आत्मा कैसे पुनर्जन्म लेती है और लेते-लेते आती है। और कैसा ये पार्ट सारा आत्मा में नूंधा हुआ है 84 जन्मों का। और ये बात तो कोई भी नहीं जानता होगा। सुनाते तो हैं। परन्तु सुनाने मात्र से कोई जानता होगा क्या? बेसिक में भी सुनाते हैं। एडवांस में भी सुनाते हैं।

31.7.1967 की वाणी का तीसरा पेज, रात्रि क्लास। अभी बताने से, अभी ये बताते हैं, याद भी बताते हैं। ये माने कौन? किसकी तरफ इशारा? ब्रह्मा बाबा। ये आत्मा में ये सभी नूंध है। इनकी आत्मा में भी नूंध है। हाँ, कोई एक्टर मोक्ष तो नहीं पाय सकते हैं कभी भी। मोक्ष माना सदाकाल के लिए मुक्ति हो जाए। फिर कभी भी लौटकर इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर न आवें क्योंकि ऐसे एक-एक करके सब आत्माएं जाती रहेंगी तो फिर सृष्टि रूपी रंगमंच पर ड्रामा में पार्ट कैसे चलेगा? सृष्टि ही खतम हो जाएगी। परन्तु आत्माएं तो अविनाशी हैं। उनका पार्ट भी? अविनाशी है। ये जो कोई कहते हैं, जैनी लोग वगैरा कि नहीं, मोक्ष भी मिल सकता है। आत्मा सदाकाल के लिए मुक्त हो सकती है। मोक्ष कैसे? जबकि ड्रामा प्रीओर्डेन्ट इम्पेरिशेबल ड्रामा है। वो दुनिया में जो ड्रामा होते हैं, नाटकबाजी करते हैं वो तो ऐसे नहीं होता है। वो तो अदली-बदली भी हो जाते हैं। और विनाश भी हो जाता है। लेकिन ये तो इम्पेरिशेबल ड्रामा है। इसमें मोक्ष कैसे हो सकता है? और कोई भी आत्मा का भी मोक्ष नहीं हो सकता। सब इम्पेरिशेबल तो ये इम्पॉसिबल है मोक्ष हो जाना, सदाकाल की मुक्ति हो जाना।

बाकि इतना जरूर है कि इस समय में रावण का राज्य है। तो अक्सर करके सभी दुखी हैं। जो बहुत दुखी होते हैं तो कहते हैं हमारा सदाकाल के लिए मुक्ति हो जाए। हमें नहीं चाहिए ये दुनिया। अकाले मृत्यु भी उनको हो सकती है। जिनके ऐसे-ऐसे संकल्प चलते हैं कि दुनिया ही नहीं चाहिए, हम अपनी जिंदगी ही खतम कर देंगे। ऐसे भी हो जाता है। ऐसे तो कोई भी नहीं होगा जो समझता होगा, हाँ, मैं ये शरीर छोड़करके दूसरा शरीर लेता हूँ। अपनी आत्मा को ही नहीं जानते हैं। अपने को देह समझते हैं। तो किसकी बुद्धि में थोड़ेही बैठा होगा। अभी तुम्हारी बुद्धि में है कि ये पुराना शरीर लेकरके नया लेना है। और फिर जब नया मिलेगा और वो नया भी फिर ऐसे ही उतरते-उतरते जनम लेते रहेंगे, जैसे सर्प लेता है, पुरानी खल त्याग देता है, नई खल आ जाती है। ऐसे ही, तुम पुराना शरीर छोड़ते रहेंगे, नया शरीर लेते रहेंगे।

अब अभी के वास्ते तो डिफरेन्ट कहते हैं क्योंकि अभी तो ये शरीर बहुत ही पुराने हो गए। आत्मा रूपी बीज पुराना हो गया तो शरीर भी पुराना हो गया। बीज तामसी तो शरीर भी तामसी। तो उनको खलास करना है। बीज को नहीं, आत्मा को नहीं खलास करना है। किसको खलास करना है? हँ? शरीर को खलास करना है। ये तामसी शरीर हो गया ना। वो है एक जनम का पुराना। फिर वो दो जनम का पुराना। तीन जनम का, चार जनम का। ऐसे-ऐसे तुम 84 के चक्कर में 84 शरीर छोड़ देते हो। तुम छोड़ते आते हो ना। अभी तुमको ज्ञान हुआ है कि ऐसे करकरके इस प्रकार से हमने 84 शरीर छोड़े हैं जरूर। और ये है हमारा अंतिम 84वां जनम। ये तुमको ज्ञान है। सबको तो नहीं है। क्योंकि सबने तो पूरे 84 जन्म इस सृष्टि में लिए भी नहीं हैं। कोई आत्मा में कम पावर है तो कम जन्म। ज्यादा पावर है तो ज्यादा जन्म। और तुम्हारी आत्मा तो वो ही है। जन्म लेते-लेते नीचे उतरती आती है। वही एक आत्मा और ये शरीर छोड़ते-छोड़ते आत्मा भी तामसी बन गई तो शरीर भी तामसी बन गया। दुनिया की हर चीज़ चार अवस्थाओं से पसार होती है ना। ये ड्रामा ही दुनिया ही ऐसी बनी हुई है। पहले सतोप्रधान, फिर सतोसामान्य, रजो और फिर तमो। इसलिए ये सृष्टि भी चार भागों में बंटी हुई है। सतयुग सतोप्रधान, त्रेता सतोसामान्य, द्वापर रजोप्रधान और कलियुग तमोप्रधान।

A night class dated 31.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the second page was - For example, when the Father sits and explains as to what a soul is, then He tells for this oneself as well. Who is 'this'? Hm? And who is the Father who sits and explains? Hm? Just as the Father sits and explains. The example of the Father was given. Hm? No reply. He says for this oneself also that nobody except you children can know Me as to what I am, how I am. Except which children? Hm? When I narrate to those children, hm, how do I narrate? To which children do I narrate? To those who can know as to what I am, how I am. When I narrate to those children, then I narrate through a body, don't I? Hm? Through which body do I narrate? Hm? Arey, I narrate to the children in the basic as well. Hm? Don't I narrate? I narrate in the basic as well. But I do narrate through Brahma in basic. But who listens and understands? The permanent Chariot (mukarrar rath) understands. Then why was it said 'I narrate to those children'? Hm? It is not any one child. I narrate to those children. It means that there are at least two. One listens through Brahma and understands. And the other is the one who understands, narrates whatever he has understood to the children of the Rudramala.

So, children do recognize. They recognize just by [His] narration. It was said, wasn't it that when I narrate to those children; well, He must be narrating through a body only. Through which body? In the basic [path of knowledge], He narrated through Brahma. And then the higher studies? The permanent Chariot for the higher studies. So, the teacher gives clarification. So, I narrate to those children; so, similarly, what a soul is and how many births it gets and how that soul plays its part. This topic is not in anybody's intellect. Among the children whom I narrate, hm, is it in anyone's intellect that how many births a soul has got, what kind of a part it plays, what it is? It is not in anyone's intellect. It does not sit at all. So, which children are they? Hm? So, neither does anyone have knowledge of the soul nor anyone have knowledge of the Supreme Soul. This is why the Father comes and gives the knowledge of the soul as well. He gives the entire knowledge that how a soul gets rebirth and how it has been getting. And what kind of a part of 84 births is recorded in the soul. And nobody else must be aware of this topic. They do narrate. But does anyone know just by narration? He narrates in the 'basic' also. He narrates in the 'advance' also.

Third page of the Vani, night class dated 31.7.1967. By telling now; now this one tells; He tells about remembrance as well. 'This one' refers to whom? Towards whom was a gesture made? Brahma Baba. All this is recorded in this soul. It is recorded in the soul of this one as well. Yes, an actor can never achieve moksha (permanent liberation from the cycle of birth and death). Moksha means liberation forever. One shouldn't come back to this world stage because if all the souls keep on going one by one, then how will the part continue on this world stage? The world itself will end. But the souls are imperishable. Their part also? Is imperishable. These people, the Jains, etc. say that one can also achieve moksha. A soul can be liberated forever. How can one achieve moksha when the drama is a pre-ordained imperishable drama. Those dramas in the world, the dramas which they enact are not like this. There, interchange of roles (adli-badli) also takes place. And destruction also takes place. But this is an imperishable drama. How can one achieve moksha in this? And no soul can achieve moksha. Everything is imperishable; so, it is impossible to achieve moksha, liberation forever.

But it is sure that there is rule of Ravan at this time. So, mostly everyone is sorrowful. When someone becomes very sorrowful, then they say that we should be liberated forever. We don't want this world. They can also suffer untimely death. Those who get such thoughts that we don't want the world at all; I will end my life. Such things also happen. There will not be anyone who thinks that, yes, I leave this body and take up another body. They do not know their soul itself. They consider themselves to be a body. So, nobody's intellect must be aware. Now it is in your intellect that we have to leave this old body and take up a new one. And then, when we get a new one and even that new one also, while descending, while getting birth, just as a snake gets; it sheds the old skin and develops a new one. Similarly, you will keep on leaving the old body and keep on getting a new body.

Well, it is called different for the present because now these bodies have become very old. The seed like soul has become old, so the body has also become old. When the seed is degraded, then the body is also degraded. So, they have to be destroyed. The seed, the soul is not to be destroyed. What has to be destroyed? Hm? The body has to be destroyed. This body has become degraded, hasn't it? That is one birth old. Then that is two births old. Three births old, four births old. In this manner you leave 84 bodies in the cycle of 84. You keep on leaving, don't you? Now you have come to know that we have definitely left 84 bodies in this manner. And this is our last 84th birth. You have this knowledge. Everyone does not have because everyone has not even taken complete 84 births in this world. Some souls have less power, so they get fewer births. If they have more power, then they get more number of births. And your soul is the same. It has been undergoing downfall while getting rebirths. It is the same soul and while leaving these bodies, the soul as well as the body has become degraded. Everything in the world passes through four stages, doesn't it? The drama of this world itself is formed like this. First satopradhan, then satosaamaanya, then rajo and then tamo. This is why this world is also divided into four parts. Golden Age satopradhan, Silver Age satosaamaanya, Copper Age rajopradhan and Iron Age tamopradhan.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 Jun 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2585, दिनांक 21.07.2018
VCD 2585, Dated 21.07.2018
रात्रि क्लास 31.7.1967
Night Class dated 31.7.1967
VCD-2585-extracts-Bilingual

समय- 00.01-24.07
Time- 00.01-24.07


रात्रि क्लास चल रहा था - 31.7.1967. तीसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – तुम बच्चे गुप्त वेश में सर्विस कर रहे हो। कितनी सर्विस कर रहे हो! भारत को फिर से स्वर्ग बनाय रहे। ये तो बहुत ही खुशी की बात हुई। और उनको बनाने वाला बाप है। बच्चे मददगार तो जरूर चाहिए। और बच्चों को ही बैठकरके पढ़ाते हैं। बच्चे फिर औरों को पढ़ाते हैं। ये औरों में कौन-कौन शामिल हैं? हँ? हँ। तो बात हो रही थी – बच्चे, औरों को पढ़ाते हैं। औरों में कौन-कौन शामिल हुए? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हँ। सारी दुनिया कौन? सारी दुनिया में कौन-कौन हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। जो पहले आए उनको पहले पढ़ाते हैं? सारी दुनिया को नहीं पढ़ाते बच्चे? वो तो ठीक है। पहले जो राजपरिवार में आने वाले भातीं हैं, सहयोगी हैं, उनको पढ़ाते हैं। फिर प्रजावर्ग की आत्माओं को भी संदेश मिलता है। वो भी आते रहते हैं। ऐसे एक-दो को पढ़ाते-पढ़ाते ये सब इतने इकट्ठे होते जाते हैं। देखो, ये सब जो भी यहाँ आते हैं उन सबको पढ़ाते हैं। और तो कोई ये नॉलेज पढ़ा ही नहीं सकते हैं दुनिया में।

ये श्रीमत है। श्री कहा ही जाता है श्रेष्ठ। तो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ तो एक शिवबाबा ही है। ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त है। उस श्रीमत से ऊँचे ते ऊँचा पद मिलता है। सबसे ऊँचा पद। कौनसा? नर से नारायण। कौनसे युग का नारायण? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। विश्व की बादशाही कोई सतयुग में तो होती नहीं। विश्व धरम तो कलियुग के अंत में ही होते हैं। तो सबसे ऊँचा पद है। अब ये तो समझते हो कि ये लक्ष्मी-नारायण राजयोग की पढ़ाई से बने। राजयोग भी कब? हँ? राजाई दिलाने वाला योग कब आकर सिखाते हैं? इस कलियुग का अंत हो, जबकि लड़ाई लगी है और सभी विनाश हो जाएंगे। तो ये सतयुग आने के लिए ये लड़ाई बनी है। तो ये अच्छी तरह से किसको समझावें। क्या? कि जब तक ये लड़ाई नहीं होगी, महाभारी महाविनाश नहीं होगा तब तक नई दुनिया सतयुग नहीं आ सकता।

और समझाते भी होंगे बच्चे। समझा ना? तुम पढ़ा है। और कैसे उन्हें समझाया है? बाप कैसे समझाते हैं? ये बाप कहते हैं, क्यों कहते हैं? कि तुम जब पढ़ाई पढ़ाते हो तब मैं होता तो फिर ऐसे-ऐसे उनको समझाते। 31.7.1967 की रात्रि क्लास का चौथा पेज। क्योंकि कोई तो समझने वाले राजा या रजवाडा जो साधु-संत होते हैं, रजवाड़े के राजाएं होते हैं, महात्मा होते हैं, उनके आग अदब करते हैं क्योंकि समझते हैं पता नहीं इन्होंने कोई बददुआ दे दी। परन्तु यहाँ तो बददुआ की बात ही नहीं है। समझाने में बड़ी युक्ति भी चाहिए। और फिर वंडरफुल बातें सुनानी चाहिए। सुनानी चाहिए ना कि हम जो सारा ये ज्ञान आपको देते हैं, आपको यही कपड़ा पहने हुए हैं जो ना और आज आए हुए हैं ना, फिर 5000 वर्ष के बाद इसी कपड़े में, इसी नमूने में, इसी वेश-भूषा में फिर इसी जगह आएंगे। ये सृष्टि चक्र ही 5000 वर्ष का है। और हूबहू ऐसे ही घूमता रहता है। शास्त्रों में तो लाखों वर्ष कितनी लंबी आयु सृष्टि की बताय दी है। कोई काउँट भी न कर सके कितने जनम होते हैं। नहीं तो कोई पूछेगा कितने जनम होते हैं तो कैसे बताएंगे? तो उन्होंने ये लफड़ा कर दिया है कि लाखों वर्ष की सृष्टि होती है तो कोई पूछेगा ही नहीं। नहीं तो ये बात समझने की है क्योंकि वर्ल्ड की हिस्ट्री जॉग्राफी रिपीट होती है कि कैसे सतयुग, त्रेता, फिर द्वापर, फिर कलियुग। फिर संगम के बाद सतयुग वो ही रिपीट होगा।

अरे देखो, अभी फिर ये सूर्यवंशी राज्य की स्थापना होती है। पहले तो ऊँच वंश की ही स्थापना होगी ना। फिर सृष्टि नीचे गिरती जाती है तो वंश भी नीचे गिरते जाते हैं क्योंकि अभी तो वो सूर्यवंशी राज्य संसार में नहीं है। अभी किसके-किसके राज्य हैं? चन्द्रवंशियों का भी राज्य नहीं है। तो सारी दुनिया में विधर्मियों का राज्य है। किसी धर्मखण्ड में इस्लामी, किसी खण्ड में बौद्धी, किसी धर्मखण्ड में क्रिश्चियन्स। अब ये सब खलास हो जावेंगे। फिर क्या होगा? फिर एक ही सूर्यवंश की स्थापना रह जावेगी। क्योंकि साक्षात सूर्य ही आकरके, ज्ञान सूर्य आकरके ये राज्य, सूर्यवंशी राज्य की स्थापना करते हैं ना। फिर अगली पीढ़ी आवेगी तो ज्ञान चन्द्रमा की आत्मा मुखिया बनके बैठेगी नारायण के रूप में। वो फिर चन्द्रवंशी राज्य चलेगा। ऐसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी और-और धर्मों की आत्माएं निमित्त बनती जावेंगी। परन्तु सतयुग में प्रत्यक्ष नहीं होती हैं। मर्ज रहते हैं। और जब द्वैतवादी दुनिया आती है, जहाँ दो-दो धर्म होते हैं, दो-दो राज्य होते हैं, दो-दो भाषाएं, दो-दो कुल, दो-दो मतें, तो उस समय ये कम कलाओं वाले जो नारायण सतयुग में होते हैं, बाद वाली पीढ़ियों में नंबरवार, वो सब प्रत्यक्ष होने लग पड़ते हैं क्योंकि उन्हीं में ही दूसरे धर्म के धरमपिताएं और उनके फालोअर्स प्रवेश करते हैं।

तो भारतवासी ही कन्वर्ट होते हैं। दूसरे धर्म के कन्वर्ट नहीं होते क्योंकि ये जो देव आत्माएं हैं ना वो तो बड़ी भोली-भाली, सीधी-सादी होती हैं। और असुरों के सामने कमजोर भी होती हैं। जब तक भगवान न आए तब तक वो जीत नहीं पा सकते इन असुरों से। कौन? देवताएं, देव आत्माएं। तो कलियुग के अंत में और सतयुग की आदि में जब पुरुषोत्तम संगमयुग होता है तो पुरुषोत्तम और पुरुषोत्त्मनी नई सृष्टि के आदि वाले पहले प्रत्यक्ष होते हैं जो डायरेक्ट इसी जनम में नर से नारायण बनते हैं, नारी से लक्ष्मी बनते हैं। किसके द्वारा बनते हैं? डायरेक्ट ज्ञान सूर्य के द्वारा बनते हैं। ज्ञान सूर्य तो सदा रोशनी वाला होता है या कभी रोशनी और कभी अंधेरा? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। जब सूर्य ग्रहण पड़ता है तो अंधेरा भी होता है ना। हँ? परन्तु सूर्य को तो कभी ग्रहण पड़ता ही नहीं। वास्तव में चन्द्रमा बीच में आ जाता है। और पृथ्वी और सूर्य चन्द्रमा के दोनों ओर रहते हैं। तो चन्द्रमा का परछाया पड़ता है सूर्य के ऊपर। तो पृथ्वीवासी ये समझते हैं कि अंधेरा हो गया सूर्य में। ये है बेहद की बात। सूर्य को कभी थोड़ेही अंधेरा होता है। सूर्य तो अपनी जगह सदैव ही रोशनी में चमकता रहता है। अरे, वो तो आग का गोला है। वहाँ अंधेरे की संभावना कैसे हो सकती है? परन्तु वो रोशनी का राज्य वो सूर्यवंशी राज्य अभी तो नहीं है। अभी तो दुनिया में अज्ञान का अंधेरा है या सवेरा है? हँ? तो लोग कहते हैं कि राहू का ग्रहण लग गया। हँ? सबसे खराब दशा है राहू की। राहू का परछाया पड़ा तो सारी दुनिया अज्ञान अंधेरे में आ जाती है।

तो देखो, जब सूर्यवंशी राज्य नहीं है तो और सभी कुछ हैं। इस्लामी भी हैं, बौद्धी भी हैं, क्रिश्चियन्स और उनके सहयोगी धर्म भी हैं। ये बड़े का दृष्टांत दिया जाता है। कौनसा बड़ा पेड होता है? बनियन ट्री कहते हैं, बरगद। नाम ही उसका बड़। बड़ माने बड़ा। उसका दृष्टांत दिया जाता है। ये सृष्टि रूपी वृक्ष भी बहुत बड़ा है। ह्यूज वृक्ष है। जैसे पेड़ का थुर। देखा होगा कलकत्ते में। ये लोग सब आते-जाते रहते होंगे देखने के लिए। तो थुर जो है वो तो देखने में आता है। लेकिन उसकी जड़ें नहीं, जड़ें लोप हो जाती हैं, सड़ जाती हैं। ऐसे ही ये सूर्यवंशी सनातन देवी-देवता धर्म अब प्रायःलोप हो गया। प्रायः लोप का मतलब बिल्कुल लोप नहीं है। वो जाकर बनियन ट्री की कलकत्ते में खुदाई की जाए तो गहराई में जहाँ नमी होगी, पानी होगा, वहाँ वो जड़ें निकलेंगी। लेकिन ऊपर-ऊपर तो सड़ जाती हैं क्योंकि; क्यों? क्योंकि पानी, ज्ञान जल मिलता ही नहीं। तो कलकत्ते में ये लोग जब जाते-आते रहते होंगे, बुजुर्ग तो जाते होंगे। उन्हों को टाइम बहुत होता है। तो देखा तो जरूर होगा। बड़ा शहर है ना। और राजाएं जितने होते हैं वो तो सब जाते ही हैं घूमने के लिए। चक्कर लगाते हैं।

तो देखो, वो गहराई का थुर नहीं है। सो फिर स्थापन हो रहा है। अब बाप आकर स्थापन कर रहे हैं। थुर में क्या होता है? हँ? जो नीचे का थुर होता है वो मोटा तना होता है। उसमें डाल-डालियां नहीं होती हैं। एक ही धर्म, एक ही राज्य, एक ही कुल, एक ही भाषा। फिर बाद में जब द्वापरयुग शुरु होता है तो द्वैतवादी दुनिया शुरू हो जाती है। हर बात में दो-दो। तो लड़ाई-झगड़े की दुनिया। दो होंगे तो लड़ेंगे। चार होंगे तो और लड़ेंगे। इसलिए ये विनाश का भी नुंधा हुआ है। ये लड़ाई-झगड़े की दुनिया सब खलास हो जावेगी। लड़ाई-झगड़ा कौन करते हैं? यही द्वैतवादी जो धरम हैं, इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन्स जबसे आते हैं, तबसे, ढ़ाई हज़ार वर्ष से लड़ाई शुरू होती है। नहीं तो ढ़ाई हज़ार वर्ष तो कितना सुख रहता है।

तो ये आधा सुख और आधा दुःख का खेल है। ये दुनिया है ही सुख-दुख की। देखो, अभी तो कितना दुःख हो गया है। कितनी घबराहट है। वो ही 5000 वर्ष पहले वाले मिसाइल्स, वगैरा, एटम बम्ब, और फिर हम तो बोल देते हैं - अगर अभी नहीं आकरके सुनेंगे, ईश्वरीय ज्ञान नहीं लेंगे तो फिर आगे बहुत पछताना पड़ेगा। क्यों? इसलिए पछताना पड़ेगा कि जो अभी नहीं सुनेंगे तो जो खुदा के बंदे तो नहीं कहे जाएंगे। और खुदा के बंदे जो अभी बनेंगे वो तो कयामत के समय में सुखी रहेंगे। तो फिर बहुत पछताएंगे ना। तो, कब पछताएंगे? अगर कम से कम सात दिन का रोज़ का टाइम भट्ठी करने के लिए नहीं देंगे। अच्छा, भट्ठी छोड़ो। सात दिन कम से कम आकरके सात दिन का कोर्स तो ले लेवें; पढ़ाई तो पढ़ लें। सात रोज़ में सृष्टि का चक्कर कैसे फिरता है वो सारी बात बुद्धि में समझ में आ जाती है। इस सृष्टि का रचयिता कौन है और रचना के आदि, मध्य, अंत का ज्ञान भी क्या है क्योंकि रचयिता तो इस सृष्टि पर प्रत्यक्ष नहीं होता है। वो तो अभी संगमयुग में ही प्रत्यक्ष है। होता है। रचयिता तो तुम बच्चों ने अच्छी तरह से जाना कि रचयिता है शिवबाबा। शिवबाबा या शिव बाप? शिव बाबा रचयिता है क्योंकि सृष्टि साकार है तो रचयिता भी साकार होगा।

तो रचयिता का परिचय पूरा मिला तो फिर अच्छे से याद आती रहेगी। और वर्सा मिल जावेगा। रचयिता तो बाप ही होता है ना। बाप का तो वर्सा होता है क्योंकि बाप कहे और बाप कभी मिले ही नहीं वो फिर बाप कैसे हो सकता? इसीलिये बताते हैं कि सारी दुनिया की जो भी 500-700 करोड़ आत्माएं हैं उन सबसे आकर मिलते हैं। कोई से क्लोज़ कांटैक्ट में मिलते हैं, कोई से क्लोज़ कांटैक्ट में नहीं मिल पाते हैं। अखबारों में पढ़ लिया, फोटो देख लिया, बस, इतना ही उनकी बुद्धि में बैठता है। तो ये रचयिता का माना शिवबाबा का और उनकी रचना का आदि, मध्य, अंत का ज्ञान अच्छी तरह से आपके कान में फूंकेंगे अगर आप सात दिन के लिए आवेंगे तो। क्योंकि जो द्वापरयुग के ऋषि-मुनि हुए थे वो भी तो कहते थे कि सृष्टि के आदि, मध्य, अंत का राज़ हम नहीं जानते। नेति-नेति। इस सृष्टि की आदि, मध्य, अंत की इति नहीं है। आदि का भी पता नहीं तो अंत का भी पता नहीं। हम नहीं जानते हैं। न रचयिता को, न रचना की आदि, मध्य, अंत को। तो उनको बताना पड़े कि अभी हम आपको रचयिता, रचना के आदि, मध्य, अंत का पूरा ज्ञान देंगे। अगर तुम पूरा टाइम देंगे तो देंगे सात दिन के अंदर। फिर भले नहीं आइयो। नहीं भी आएंगे तो भी प्रजा वर्ग में तो आ ही जावेंगे। पुरुषार्थ करेंगे तो, तो ऊँच पद भी पा सकते हैं राजाई में। तो पूरा ज्ञान मिलेगा। म्यूजिक बजा। अच्छा मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। गुडनाइट।

A night class dated 31.7.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the third page was - You children are doing service in an incognito guise. You are doing so much service! You are transforming India into heaven once again. This is a matter of lot of joy. And their maker is the Father. Children are definitely required as helpers. And it is the children themselves who are taught. Children then teach others. Who all are included among others? Hm? Hm. So, the topic being discussed was - Children teach others. Who all are included among others? Hm?
(Someone said something.) Hm. 'Whole world' refers to whom? Who all are included among the 'whole world'? (Someone said something.) Yes. Do they teach first to those who came first? Don't the children explain to the entire world? That is correct. First they teach to the members, the helpers who are going to be included among the royal family. Then the souls belonging to the subjects category also get message. They also keep coming. In this manner, while teaching each other, so many gather. Look, they teach all those who come here. Nobody else in the world can teach this knowledge at all.

This is Shrimat. Shri means righteous only. So, only one ShivBaba is the most righteous one. He is the highest on his God. One gets highest on high post through that Shrimat. The highest post. Which one? Narayan from nar. Narayan of which Age? Hm?
(Someone said something.) Yes. The emperorship of the world does not exist in the Golden Age. World religions exist only in the end of the Iron Age. So, it is the highest post. Well, you understand that this Lakshmi-Narayan became so through rajyog. When is rajyog also taught? Hm? When does He come and teach the Yoga which fetches kingship (raajaai)? This Iron Age should end; when the war has broken out and everyone will be destroyed. So, this war is destined to bring the Golden Age. So, you should explain this very nicely to anyone. What? As long as this war does not break out, as long as the fiercest mega-destruction doesn't take place, the new world, the Golden Age cannot start.

And the children must also be explaining. Did you understand? You have read. And how have they been explained? How does the Father explain? This Father says; Why does He say? That when you teach the knowledge, at that time, had I been present, I would have explained to them in such and such manner. Fourth page of the night class dated 31.7.1967 because some kings or statesmen who understand bow before the sages, saints, mahatmas because they feel that they may curse them. But here there is no question of cursing at all. One should also have a lot of tact of understanding. And then wonderful topics should be narrated. It should be narrated, shouldn't it that this entire knowledge that we give you; whatever clothes you are wearing now and you have come today, haven't you, then after 5000 years, you will come to this place in the same clothes, in the same manner, in the same dress. This world cycle is of 5000 years. And it keeps on revolving exactly in the same manner. In the scriptures the duration of the world has been mentioned to be so long, lakhs of years. One cannot count as to how many births he/she gets. Otherwise, if someone asks about the number of births, then how will they tell? So, they have devised this method that the world's duration is lakhs of years; so, nobody will ask at all. Otherwise, this topic is to be understood because the history, geography of the world repeats; Golden Age, then Silver Age, then Copper Age, then Iron Age. Then after the Confluence Age, the same Golden Age will repeat.

Arey, look, now this Suryavanshi kingdom is being established. First the higher dynasty will only be established, will it not be? Then, when the world goes on undergoing downfall, then the dynasties also keep on undergoing downfall because now that Suryavanshi kingdom does not exist in the world. Who all are ruling now? The kingdom of the Chandravanshis also does not exist. So, there is a rule of the vidharmis in the entire world. In one religious land there are Islamic people, in one land there are Buddhists, in one religious land there are the Christians. Well, all these will perish. What will happen after that? Then only one Sun dynasty (Surya vansh) will remain because the Sun Himself, the Sun of Knowledge Himself comes and establishes this kingdom, the Suryavanshi kingdom, doesn't He? Then, when the next generation starts, then the soul of the Moon of knowledge will sit as the head in the form of Narayan. Then that Chandravanshi rule will continue. In this manner, generation by generation the souls of other religions will keep on becoming instrumental. But they are not revealed in the Golden Age. They remain merged. And when the dualistic world starts, where there are two religions, two kingdoms, two languages, two clans, two opinions, then at that time these numberwise Narayans with fewer celestial degrees in the Golden Age in the latter generations, all of them start getting revealed because it is in them only that the founders of other religions and their followers enter.

So, it is the residents of India (Bhaaratwaasis) only who convert. People of other religions do not convert because these deity souls are very innocent, simple. And they are also weak when compared to the demons. Unless God comes, they cannot gain victory over these demons. Who? The deities, the deity souls. So, in the end of the Iron Age and in the beginning of the Golden Age, when it is the Purushottam Sangamyug, then that Purushottam and Purushottamni, who existed in the beginning of the new world, are revealed. They become Narayan from nar (man), Lakshmi from naari (woman) direct in this birth. Through whom do they become? They become through the direct Sun of Knowledge. Does the Sun of Knowledge have light forever or does He have light sometimes and darkness sometimes? Hm?
(Someone said something.) Yes. When the solar eclipse takes place, then there is darkness as well, is not it? Hm? But the Sun is never eclipsed at all. Actually, the Moon comes in between [the Sun and the Earth]. And the Earth and the Sun remain on both sides of the Moon. So, the shadow of the Moon falls on the Sun. So, the residents of the Earth think that the Sun has been covered by darkness. This is an unlimited topic. There is never darkness in the Sun. The Sun keeps on shining in light at its place always. Arey, it is a ball of fire. How can there be a possibility of darkness there? But that rule of light, that Suryavanshi kingdom does not exist now. Is there now darkness of ignorance in the world or is there morning? Hm? So, people say that it has been eclipsed by Rahu. Hm? The worst planetary influence is that of Rahu. When the shadow of Rahu falls, then the entire world is covered by the darkness of ignorance.

So, look, when there is not Suryavanshi rule, then there are all others. There are Islamic people also, Buddhists also, Christians and their helper religions also. The example of the big ones is given. Which tree is very big? It is called Banyan tree, bargad. Its name itself is bar. Bar means 'baraa' (big). Its example is given. This world tree is also very big. It is a huge tree. For example the stem of a tree. You must have seen in Calcutta. These people must be visiting to see. So, the stem is visible. But not its roots. The roots vanish, rot. Similarly, this Suryavanshi Sanatan Devi-Devata Dharma has become almost extinct (praayah lop). Praayah lop means that it has not vanished completely. If you go and dig up the banyan tree in Calcutta, then wherever there is humidity, water in depths, you will find those roots there. But they rot above (just below the ground level) because; why? It is because they do not get water, the water of knowledge at all. So, when these people must be visiting it in Calcutta; the senior citizens must be going there. They have a lot of time. So, they must have definitely seen. It is a big city, is not it? And all the kings go for sight-seeing. They visit.

So, look that deep stem is not existent. It is then being established. Now the Father has come and is establishing. What is in a stem? Hm? The stem below is a thick (big) stem. It does not have branches and sub-branches. There is only one religion, one kingdom, one clan, one language. Then, later on, when the Copper Age starts, then the dualistic world starts. There is duality in everything. So, the world of fights and quarrels. If there are two persons, they will fight. If there are four persons, they will fight even more. This is why this destruction is also fixed. This world of fights and quarrels will end. Who fights and quarrels? Ever since the dualistic religions, Islamic people, Buddhists, Christians come, the fighting begins from two thousand five hundred years. Otherwise, there is so much happiness for two thousand five hundred years.

So, this is a drama of happiness and sorrows for each half. This world itself is of happiness and sorrows. There is so much sorrow now. There is so much fear. The same missiles, etc. atom bombs of 5000 years ago and then we say - If you don't come and listen now, if you don't obtain Godly knowledge, then you will have to repent a lot. Why? You will have to repent because if you don't listen now, then you will not be called the people of God (Khuda ke bandey). And those who become people of God now will remain happy at the time of destruction (kayamat). Then they will repent a lot, will they not? So, when will they repent? If they do not give at least seven days time to attend the bhatti. Achcha, leave about bhatti. At least they should come and attend the seven days course and study the knowledge. The intellect understands entirely within seven days as to how the world cycle rotates. Who is the creator of this world and what is the knowledge of the beginning, middle and end of the creation because the creator is not revealed on this world. He is revealed only now in the Confluence Age. He is revealed. You children have known very well that ShivBaba is the creator. ShivBaba or Father Shiv? ShivBaba is the creator because when the world is corporeal then the creator will also be corporeal.

So, one will keep on remembering nicely when the introduction of the Creator is received completely. And the inheritance will be received. The Father Himself is the creator, is not He? A Father has the inheritance because if someone calls himself a Father and if the Father never meets [his children], then how can he be a Father? This is why it is said that He comes and meets all the 500-700 crore souls of the entire world. With some He meets in close contact and with some He is not able to meet in close contact. One may read in the newspapers, see the photo; that is all. It sits in their intellect only to that extent. So, if you come for seven days, then we will whisper nicely the knowledge of the Creator, i.e. ShivBaba and the beginning, middle and end of His creation because the sages and saints who existed in the Copper Age also used to say that we don’t know the secret of the beginning, middle and end of the world. Neti-neti (Neither this nor that). There is no knowledge of the beginning, middle and end of this world. We don’t know the beginning and the end as well. We don’t know the Creator or the beginning, middle and end of creation. So, they have to be told that now we will give you the complete knowledge of the Creator and the beginning, middle and end of the creation if you give us full time of seven days. After that if you wish you may discontinue. Even if you don’t come, you will come in the subjects’ category. If you make purusharth, you can achieve a high post in the kingdom. So, you will get complete knowledge. Music was played. Achcha, remembrance, love and good morning from the spiritual Father and Dada to the sweet, sweet, seekiladhey children (reunited after a long time). Good night.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 Jul 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2586, दिनांक 22.07.2018
VCD 2586, Dated 22.07.2018
प्रातः क्लास 24.8.1967
Morning Class dated 24.8.1967
VCD-2586-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.23
Time- 00.01-19.23

आज का प्रातः क्लास है – 24.8.1967. गुरुवार को रिकार्ड चला है – ओम नमः शिवाय। पितु मातु सहायक स्वामी सखा तुम ही सबके रखवारे हो। जिनका कोई और अधार नहीं, उनके तुम एक ही सहारे हो। ओमशान्ति। ओम का अर्थ तो बच्चों को समझाया। मैं आत्मा हूँ। मैं आत्मा अपने अन्दर दिव्य गुणों, दिव्य शक्तियों की स्थापना करने वाली हूँ। दुर्गुणों को विनाश करने वाली हूँ। और जो सद्गुण आए हैं उनकी पालना करना मेरा काम है। तो ब्रह्मा, विष्णु, शंकर तीनों का पार्ट बजाते हैं। तो कहते हैं अउमशान्ति। माना अ से ब्रह्मा, उ से विष्णु, म से महेश। तीनों कार्य करने वाली मैं आत्मा हूँ। शान्त स्वरूप। अभी कहते तो सभी ऐसे हैं कि हरेक जीव में, जंतु में, प्राणी मात्र में आत्मा है क्योंकि अगर आत्मा न होती तो ये जीव जंतु, प्राणी मात्र हरकत कैसे करते? आवाज़ करते हैं, चलते-फिरते हैं, माना इनमें कोई चैतन्य है शक्ति। वो जो चैतन्य शक्ति है उसी का नाम आत्मा। तो वो आत्मा शरीर के साथ पार्ट बजाती है तो जीव आत्मा कही जाती है।

और ये बात तो सभी जानते हैं कि सभी प्राणी मात्र आत्माएं हैं जरूर। और फिर उनका एक बाप भी है। सब आत्माओं का एक बाप। पर शरीर जो हैं उनका अलग-अलग बाप है। हर जनम में अलग-अलग बाप। कोई के 84 जन्म होते हैं तो 84 बाप। ये बात समझने की बिल्कुल सहज है। आत्मा सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाती है तो जितना पार्ट बजाती है, जितने जन्म लेती है उतने बाप। और फिर बच्चों की बुद्धि में ये भी है कि हद के बाप से हद का वर्सा मिलता है। एक जनम का वर्सा मिलता है। वो भी किसी को थोड़ा, किसी को ज्यादा। कोई को तो कुछ भी नहीं। और बेहद का जो बाप है, सभी मनुष्यात्माओं का बाप, बेहद के बाप से बेहद का वर्सा मिलता है। और वो तो प्राणीमात्र की आत्माओं का बाप है। तो बाप तो कल्याणकारी होता है ना। बाप तो परिवार में सभी बच्चों का कल्याण ही चाहता है। ये बेहद का बाप क्या चाहता है? हँ? सभी प्राणी मात्र की आत्माओं का कल्याण हो या कोई दुखी हो जाए? कल्याण ही कल्याण चाहता है। परन्तु ड्रामा ऐसा बना हुआ है कि वो बेहद का बाप इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदाकाल नहीं आता। जब बच्चे बहुत दुखी हो जाते हैं, सतो से रजो, रजो से तमो बन जाते हैं, क्योंकि सतोप्रधानता में सुख होता है, सुख की प्रधानता होती है। रजोप्रधानता में थोड़ा दुख भी, सुख भी। और तमोप्रधानता में तो दुख ही दुख। जितना तमो होते जाते हैं उतना दुख बढ़ता जाता है। और जो बेहद का बाप है वो तो इन तीनों गुणों से परे है। इसलिए उसको त्रिगुणातीत कहा जाता है। और पार्ट भी तीन गुणों से अतीत का बजाता है। उसको कभी नहीं कहेंगे कि वो सत्वप्रधान है। नहीं। वो तो सदा सत है। प्रधान होने की बात, न्यूनतम होने की बात, मध्यम होने की बात ही नहीं।

तो ऐसे बेहद के बाप से सभी प्राणीमात्र को बेहद का वर्सा मिलता है। और मिलता कब है? मिलता तब है जब सारे ही प्राणीमात्र इस सृष्टि में दुखी-दुखी हो जाते हैं। तब वो बाप आकरके नई सृष्टि की रचना रचता है। अभी इस समय में मनुष्य चाहते हैं कि विश्व में शांति हो जाए। इस समय में ही क्यों चाहते हैं? हँ? क्योंकि जब नई सृष्टि होती है तो विश्व में शान्ति, सुख होता ही है। चाहना की बात ही नहीं। जब कलियुग का अंत होता है, तामसी दुनिया बनती है, पाप बढ़ जाते हैं तो अशान्ति हो जाती है। तो मनुष्य शान्ति चाहते हैं। ठीक है ना बच्चे। अगर इन चित्रों पर समझाया जाए तो ये शान्ति के लिए एकदम ले आना चाहिए फट से कि कलियुग और सतयुग के संगमयुग पर ये शान्ति मिलती है। जब कलियुग का अंत हो और सतयुग की आदि हो। संगम भी नहीं कहना चाहिए। क्योंकि संगम तो सतयुग-त्रेता का भी संगम है, त्रेता द्वापर का भी संगम है, द्वापर कलियुग का भी संगम है। परन्तु क्या कहें? पुरुषोत्तम संगमयुग।

तो उनको बताय देना चाहिए। देखो, ये है सतयुग। इस सतयुग को गोल्डन एज कहा जाता है। गोल्ड की वैल्यू बहुत ज्यादा होती है ना। तो ये गोल्डन एज में जो वैल्यूबल आत्माएं हैं वो ही आ पाती हैं। सब थोड़े ही जाएंगे? वैल्यूबल किसे कहें? नॉन-वैल्यूबल किसे कहें? हँ? इसकी पहचान क्या? जो जितना कल्याणकारी उतने वैल्यूबल और जितने अकल्याणकारी उतने नॉन-वैल्यूबल। तो बताओ, दुनिया में सबसे जास्ती वैल्यूबल कौन हुआ? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। दुनिया में कहेंगे तो शिवबाबा सबसे जास्ती वैल्यूबल। और शान्तिधाम में कौन ज्यादा वैल्यूबल? ये बाप कहते हैं मैं तो ब्रह्माण्ड का मालिक हूँ जहाँ अण्डे-अण्डे मिसल आत्माएं रहती हैं। वहाँ शरीर तो होते ही नहीं। शरीर हो तो सुख भी हो, दुख भी हो। वहाँ तो आत्माएं हैं ही शान्त स्वरूप। तो मैं तो शान्तिधाम का रहने वाला हूँ। हाँ, इस सृष्टि पर भी आता हूँ, अशान्त दुनिया में, दुखी संसार में आता हूँ तो भी मैं शान्त स्टेज में रहता हूँ। मुझे अशान्ति नहीं होती। लेकिन शान्ति और सुख की दुनिया की स्थापना करता हूँ। अकेले करता हूँ क्या? नहीं। सृष्टि तो अकेले से पैदा होती ही नहीं। सृष्टि एक परिवार है ना भगवान का। उस परिवार की वृद्धि करने के लिए, नई सृष्टि बनाने के लिए भी अकेले चना थोड़ेही काम करेगा।

ये सारी सृष्टि जो है वो कलियुग के अंत में कैसी बन जाती है? अंग्रेज लोग कहते हैं हैल। हिन्दुओं में कहते हैं भाड़। आग जलती रहती है। आग ही आग। आग ही आग। तो ऐसी दुनिया जहाँ आग चारों ओर अपना काम करती है, यहाँ तक कि संपूर्ण सौरमंडल में आग ही आग। तो, मैं तो शान्त धाम का रहने वाला हूँ। तो ये आग कहाँ से आती है फिर? हँ? तो
(किसी ने कुछ कहा।) द्वापर से आग आती है? अच्छा? ये आग द्वापर से आती है। कहेंगे कामाग्नि भी द्वापर से आती है। स्थूल अग्नि भी द्वापर से आती है। तो क्या पांच तत्वों में ये अग्नि सतयुग त्रेता में नहीं होती, स्वर्ग में नहीं होती क्या? होती तो है लेकिन वहाँ मर्ज रूप में होती है, इमर्ज हो जाती है। ऐसी-ऐसी आत्माएं निमित्त बनती हैं जो स्वर्ग में नहीं आती। उसका कारण ये बनता है कि वो टोटल रजोप्रधान आत्माएं हैं। उन्हें सत्वप्रधान नहीं कहेंगे। इसलिए वो द्वापर में आकरके अलगाववाद पैदा कर देती हैं। द्वैतवाद। द्वैतभाव। और जहाँ दो होते हैं, दो-दो बातें होती हैं, दो-दो भाषाएं होती हैं, दो-दो मतें होती हैं, दो-दो धर्म होते हैं तो आपस में टकराते हैं। और ज्यों-ज्यों धर्मों की शुरुआत बढती जाती है त्यों-त्यों ये झगड़ा फसाद टंटा बढ़ता ही जाता है। तो उसको फिर गोल्डन एज कैसे कहेंगे?

गोल्डन एज। फिर होती है सिल्वर एज। सिल्वर की भी वैल्यू है। परन्तु वो तो तांबे का युग कहा जाता है क्योंकि काम, क्रोध, लोभ, अहंकार की दुनिया है। काम की आस पूरी नहीं होती है तो क्रोध आ जाता है। चेहरा तांबे जैसा हो जाता है लाल-लाल। तो फिर उसको पुरानी दुनिया कहा जाता है। दुख की दुनिया शुरू हो गई ना। कि नई दुनिया में तो शान्ति ही शान्ति, सुख ही सुख क्योंकि वहाँ पवित्रता है। पवित्रता में सुख और शान्ति होती है। अपवित्रता में दुख और अशान्ति होती है। तो सतयुग में शान्ति भी है और सुख भी है, तो उसको कहा ही जाता है स्वर्ग। नरक तो नहीं कहा जाता। क्योंकि नरक नर बनाता है। जो नरक बनाने वाला नर है वो अपन को देह समझता है। आत्मा समझता ही नहीं है। आत्मिक स्थिति में रहता ही नहीं है। पता ही नहीं है। जो स्वर्ग है वो सदैव स्वस्थिति में रहने वाली आत्मा बनाती है।

Today's morning class is dated 24.8.1967. The record played on Thursday is - Om Namah Shivay. Pitu maatu sahayak swami sakha, tum hi sabke rakhwaarey ho. (I bow to you O Shiva! You are my Father, mother, helper, lord, friend; you are everyone's protector). For those who do not have any other support, you are his/her support. Om Shanti. Children have been explained the meaning of Om. I am a soul. I, the soul establish divine virtues, divine powers within myself. I destroy the evils. And it is my task to sustain the virtues which I have inculcated. So, we play the part of Brahma, Vishnu as well Shankar. So, we say Aumshanti. It means Brahma from 'a', Vishnu from 'u' and Mahesh from 'm'. I, the soul perform all the three tasks. peaceful. Well, everyone says that there is a soul in every living being because had there been no soul, how would these living beings move? They speak, they walk and move; it means that there is a living power in them. The name of that living power is soul. So, when that soul plays a part with the body, then it is called a living soul (jeev aatma).

And everyone knows that all the living beings are definitely souls. And then they have a Father as well. One Father of all the souls. But the fathers of the bodies are different. Different fathers in every birth. Some have 84 births, so they have 84 fathers. This is a completely easy topic to understand. The soul plays a part on the world stage; so, as many parts it plays, as many births it gets, so many fathers it has. And then it is also known to children's intellect that we get limited inheritance from the limited Father. We get inheritance for one birth. That too, some get less, some get more. Some don't get anything. And one gets unlimited inheritance from the unlimited Father, the Father of all human souls, the unlimited Father. And he is the Father of the souls of all the living beings. So, a Father is benevolent, is not he? A Father desires the benefit of all the children in the family. What does this unlimited Father want? Hm? Should benefit be caused to the souls of all the living beings or should anyone become sorrowful? He wants their benefit only. But the drama is such that the unlimited Father does not come on the world stage forever. When the children become very sorrowful, when they become rajo from sato, tamo from rajo, because there is happiness in satopradhaanata (purity), there is dominance (pradhaanataa) of happiness. In rajopradhaanata, there is a little sorrow as well as happiness. And there is just sorrow in tamopradhaanata. The more we go on becoming tamo, the more the sorrows increase. And the unlimited Father is beyond these three attributes. This is why He is called Trigunaateet. And He plays the part of being beyond the three attributes. It will never be said for Him that He is satwapradhan. No. He is always sat (ever pure). There is no question of being pradhaan (dominant), nyuunatam (minimum), madhyam (medium) at all.

So, all the living beings get unlimited inheritance from such unlimited Father. And when do they get? They get it when all the living beings become sorrowful in this world. Then that Father comes and creates a new world. Now at this time human beings want that there should be peace in the world. Why do they want only at this time? Hm? It is because when there is a new world, then there is peace, happiness in the world anyways. There is no question of desire at all. When it is the end of the Iron Age, when the world becomes degraded, when the sins increase, then there is peacelessness. So, people want peace. It is correct, is not it children? If they are explained on these pictures then you should bring immediately on the topic of peace that this peace is achieved at the confluence of the Iron Age and the Golden Age, when the Iron Age ends and the Golden Age begins. One should not say [just] 'sangam' (confluence) as well, because there is a confluence of the Golden Age and Silver Age also, there is a confluence of the Silver Age and the Copper Age also; there is a confluence of the Copper Age and the Iron Age also. But what should we say? Purushottam Sangamyug.

So, they should be told. Look, this is the Golden Age. This Satyug is called the Golden Age. The value of gold is very high, is not it? So, only the valuable souls are able to come in the Golden Age. Will everyone go [there]? Who will be called valuable? Who will be called non-valuable? Hm? What is its indication? The more benevolent someone is, the more valuable he is. And the more non-benevolent someone is, the more non-valuable he is. So, tell, who is the most valuable in the world? Hm?
(Someone said something.) Yes. If you speak of the world, then ShivBaba is most valuable. And who is most valuable in the abode of peace? This Father says - I am the master of Brahmaand (Supreme Abode), where the egg-like (andey-misal) souls live. The bodies don't exist there at all. If there is a body, then there will be happiness as well as sorrows. There the souls are just peaceful. So, I am a resident of the abode of peace. Yes, even when I come in this world, in the world of disturbance (ashaant duniya), in the sorrowful world, I remain in a peaceful stage. I don't experience peacelessness. But I establish a world of peace and happiness. Do I establish it alone? No. The world is not born through a single person at all. The world is a family of God, is not it? In order to make that family grow, in order to create the new world, a single corn will not work.

How does this entire world become in the end of the Iron Age? The Britishers call it hell. The Hindus call it 'bhaar'. Fire keeps on raging. Fire and just fire. Fire and just fire. So, such a world where fire performs its task everywhere, to the extent that there is just fire in the entire solar system (saurmandal). So, I am a resident of the abode of peace (shaant dhaam). So, where does this fire come from? Hm? So
, (Someone said something.) Does the fire start from the Copper Age? Achcha? This fire comes from the Copper Age. It will be said that the fire of lust also comes from the Copper Age. The physical fire also comes from the Copper Age. So, doesn't this fire exist in the five elements in the Golden Age and the Silver Age? Does it not exist in heaven? It does exist, but it is in a merged form there; it emerges [in the Copper Age]. Such souls become instrumental [in starting the fire] who do not come in heaven. Its reason is that they are totally rajopradhan souls. They will not be called satwapradhan. This is why they come in the Copper Age and create separatism. Duality (dwaitwaad). Feelings of duality (dwaitbhaav). And wherever there are two persons, two topics, two languages, two opinions, two religions, they clash with each other. And as and when the number of religions increases this quarrel and fight goes on increasing. So, how will it be called the Golden Age?

Golden Age. Then next is the Silver Age. There is a value of silver as well. But that [Dwaparyug] is called an Age of copper because it is a world of lust, anger, greed, ego. When the desire for lust is not fulfilled, then one becomes angry. The face becomes red like copper. So, then that is called an old world. The world of sorrows started, did not it? There is just peace, just happiness in the new world because there is purity there. There is happiness and peace in purity. There is sorrow and peacelessness in impurity. So, there is peace as well as happiness in the Golden Age. So, that is called heaven. It is not called hell because a man (nar) makes hell (narak). The nar who establishes narak considers himself to be a body. He does not consider himself to be a soul at all. He does not remain in soul conscious stage at all. He does not know that the soul which always remains in soul consciousness establishes heaven (swarg).

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Jul 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2587, दिनांक 23.07.2018
VCD 2587, Dated 23.07.2018
प्रातः क्लास 24.8.1967
Morning Class dated 24.8.1967
VCD-2587-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.40
Time- 00.01-14.40


प्रातः क्लास चल रहा था - 24.8.1967. गुरुवार को पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – जब भी कहाँ भाषण आदि में जाना होता है तो बच्चियों को पहले-पहले ये समझाना है भिन्न-भिन्न जगह में जाती हैं तो पहले-पहले विश्व में शान्ति का ही क्वेश्चन उठाना चाहिए। जबकि प्राइज़िज मिल रही हैं विश्व शान्ति के लिए प्रयास करने वालों को। तो शान्ति वाले मनुष्यों को, जो ये शान्ति के लिए दौड़-दौड़ करते हैं और अभी शान्ति के लिए कोई दौड़ा-दौड़ी करने की जगह है नहीं। यहाँ जाओ, वहाँ जाओ, यहाँ जाओ। और ये शान्ति के लिए तो है शान्ति से बैठना। कोई भागदौड़ करने से विश्व में शान्ति नहीं होगी। क्योंकि बेसिक में भी देखा, बहुत भागदौड़ की ब्रह्माकुमार-कुमारियों ने। यहाँ प्रोजेक्टर शो करो, वहाँ प्रदर्शनी करो, वहाँ कान्फ्रेन्स करो, मेले-मलाखड़े करो। शहर-शहर में मेले-मलाखड़े होने लगे, दौडम-दौड। परन्तु बाप तो समझाते हैं कि ये वाचा की सेवा, ये तो भक्तिमार्ग में भी बहुत करते रहे। कितना कीर्तन गाते हैं, कितनी प्रार्थनाएं करते हैं। गुरुद्वारों में कितनी संगत बजाते रहते हैं। आवाज़ ही आवाज़। और बाप तो कहते हैं तुम्हारी वायब्रेशन की एकाग्रता से शान्ति स्थापन होगी।

तो जो बाप सिखलाय देते हैं अपने स्वधर्म में टिको; स्व माने आत्मा, धरम माने धारणा। अपनी आत्मा के धरम में टिको, धारणा में टिको। सिर्फ जानना पड़े कि मैं कौन हूँ। देह हूँ या आत्मा हूँ? स्व आत्मा का धर्म है शान्त स्वरूप। तो पहले तो फाउण्डेशन वहाँ से पड़ेगा ना। उस शान्ति स्वरूप आत्मा के स्थिति में टिकना पड़े। तो विकर्म विनाश हो जाएगा। जब स्वधर्म में टिकेंगे तो शान्ति हो जाएगी। पहले अपने अन्दर शान्ति चाहिए। नहीं तो कितना संकल्पों का, विकल्पों का घुम्माड़ा चलता रहता है। मन कभी शान्त होके बैठता नहीं। तो बाप कहते हैं कि तुम बच्चे तो फिर हो ही एवर शान्ति के बाप के बच्ची। क्या? जो बाप आत्मा है और वो एक ऐसी आत्मा है जो एवर शान्ति में रहती है। कैसे? हँ? तुम तो इस त्रिगुण वाली दुनिया में आते हो। सत, रज, तम की दुनिया तो परिवर्तन होती रहती है। लेकिन बाप तो सदा शान्त, सत धाम में रहते हैं। चतुर्युगी में भी वहीं रहते हैं। एवर शान्ति तो उन्हीं में हुई ना। बाकि आत्माएं तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आकरके पार्ट बजाती है तो कितनी धमचक्करी में आ जाती हैं। तो तुम अपन को ये याद रखो कि हम किसके बच्चे हैं। तो जो बाप का खून वो बच्चे में जाएगा। वो दुनिया में खून देह का होता है। देह में अच्छा खून भी नसों में बहता है, बुरा खून भी बहता है। ये है तुम्हारा संकल्पों का खून, आत्मा का खून – शुद्ध संकल्प और अशुद्ध संकल्प।

तो ये चलते ही रहते हैं। शान्ति होती नहीं। तो ये शान्ति का वर्सा जो एवर शान्ति का बाप है, उससे ही मिल सकता है। हँ? ‘उससे’ कहके दूर क्यों कर दिया? बोलने वाला तो शिव है। वो स्वयं ही तो सदा शान्ति में रहता है, सदा शिव है। क्योंकि वो निराकार इस सृष्टि में आता है और साकार मनुष्य तन में मुकर्रर रूप से आता है। तो उसके द्वारा ही शान्ति के वायब्रेशन फैलते हैं। कोई मीडिया तो चाहिए ना। पूछना चाहिए उन साधु, संत, महात्माओं से कि उनको कोई को मोक्ष मिला है क्या? सदाकाल के लिए मुक्ति हुई क्या? ऐसे ही बोलते रहते हैं। बुद्ध भगवान पार निर्वाण गया। अरे, वो पार निर्वाण गया होता तो उनके फालोअर्स भी तो गए होते ना। दुनिया में तो बौद्धियों की संख्या कितनी बढ़ती जा रही है। अरे, सीधी सी बात है – जब इतना ऊँच ते ऊँच शान्ति का सागर, अखूट शान्ति का भण्डार, उसको ही इस सृष्टि पर बार-बार आना पड़ता है, उसको ही मोक्ष नहीं है तो दूसरी आत्माओं को कहाँ से मोक्ष हो जाएगा? तो अब सवाल है - बच्चों को मुक्ति कैसे मिले? इस दुनिया के बंधन में हैं। देह के बंधन में हैं। इन्द्रियों के बंधन में हैं। मन के बंधन में हैं। तो मुक्ति मिलने का रास्ता भगवान ही आकरके बताते हैं।

तो वो भगवान आया हुआ है। देखो, भगवान को तो आना है ना। और तो कोई है ही नहीं जो सदा मुक्त हो। तो कल्प-कल्प के संगमयुगे-युगे मैं आता हूँ। ऐसे नहीं कि हर युग के बाद आता हूँ, हर युग के अंत में आता हूँ। जो लिख दिया गीता में – संभवामि युगे-युगे। ऐसे नहीं है। ‘संभवामि युगे-युगे’ का अर्थ है – दो युगों के बीच में आता हूँ। कौनसे दो युग? जिसमें एक है गिरती कला की अति वाला युग। और उस गिरती कला के अति वाले युग को भगवान आकरके चढ़ती कला की अति वाला युग बनाय देते हैं। माना कलियुगी झूठखण्ड को सचखण्ड बनाय देते हैं। तो उस संगम में आता हूँ। कलियुग और सतयुग के संगम में। ऐसे तो नहीं है कि सतयुग-त्रेता के संगम में, त्रेता-द्वापर के संगम में या द्वापर-कलियुग के संगम में आता हूँ। उन्होंने तो शास्त्रों में क्या-क्या लिख दिया। सतयुग में हिरण्याकश्यप के रूप में आया, त्रेता में राम के रूप में आया। द्वापर में कृष्ण के रूप में आया। कलियुग में कलंकीधर बनके आया। जब-जब सृष्टि का चक्कर फिरता है तो चक्कर पूरा होता है, फिर मैं आता हूँ। ऐसे थोड़ेही कि मैं बार-बार आता ही रहूँगा।

तो देखो, ये पुरानी, पतित, तमोप्रधान दुनिया को, कलियुगी, पापी दुनिया को पलट कर पुण्यात्मा देवताओं की दुनिया बनाने का पार्ट भगवान को ही मिला हुआ है। तो फिर बच्चे कहें कि हमको मोक्ष चाहिए। अरे, भगवान जब बार-बार इस सृष्टि पर आ रहा है तो तुमको मोक्ष कैसे मिल जाएगा? कहते हैं हमको पार्ट ही नहीं बजाना है इस सृष्टि में। अरे, पार्ट ही नहीं बजाना तो क्या तुम्हारी आत्मा विनाशी हो गई? नहीं। आत्मा तो अविनाशी है। अविनाशी आत्मा का पार्ट भी अविनाशी है। तो पार्ट तो बजाना पड़ेगा ना। ये कैसे हो सकता है, हँ, कि ड्रामा में से पार्ट ही कैन्सल हो जाए। अरे, वो दुनियावी ड्रामा होते हैं। उनकी रिहर्सल भी होती है। और फिर ड्रामाबाजी खेलते हैं तो क्या एक ही बार खेलके बन्द कर देते हैं क्या? बार-बार रिपीट करते हैं। जैसे हद का ड्रामा बार-बार, वो तो है विनाशी ड्रामा। कोई जरूरी नहीं है कि हर युग में, हर कल्प में वो चलता ही रहेगा। लेकिन ये तो ऐसा ड्रामा है जो अविनाशी ड्रामा है। अविनाशी आत्माओं का पार्ट है। हाँ, ये जरूर है कोई आत्माओं का पार्ट थोड़ा है, सृष्टि रूपी रंगमंच पर, चतुर्युगी में, कोई का पार्ट लंबा समय का है। बाकि पार्ट तो बजाना ही पड़ेगा। ये कैसे हो सकता है कि पार्ट ही न बजाएं। अब ये बातें तो जो सारा दिन विचार सागर मंथन करते हैं, दूसरों को समझाने के लिए; अभी बाप क्यों समझाने के लिए आया हुआ है? अरे, बाप तुमको समझाते हैं। तुम फिर औरों को समझाते हो।

A morning class dated 24.8.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page on Thursday was - Whenever you have to go somewhere to deliver lectures, etc., then daughters should first of all explain this. When they go to different places, then they should first of all raise the question of world peace. Those who are making efforts for world peace are getting prizes. So, people who want peace, those who are running around for peace and now there is no place for running around for peace. Go here, go there, go here. And for this peace you have to sit in peace. Peace will not be established in the world by running around. In the basic [knowledge] also you have seen that Brahmakumar-kumaris have run around a lot. Do a projector show here, organize an exhibition there, organize a conference there; organize fairs. Fairs began to be organized in every city by running around. But the Father explains that you have been doing this service through speech on the path of Bhakti a lot. They sing devotional songs so much; they pray so much. They keep on singing sangat at the Gurudwaras so much. There is just sound everywhere. And the Father says that peace will be established through the concentration of your vibrations.

So, the Father teaches to become constant in your swadharma (soul consciousness); swa means soul, dharm means dharana (inculcation). Become constant in the dharma (religion), inculcation (dharana) of your soul. You have to just know who am I. Am I a body or a soul? The religion of the swa, i.e. soul is peaceful. So, first the foundation will be laid from there, will it not be? You have to become constant in the stage of that peaceful soul. So, the sins will be burnt. When you become constant in the swadharma, then there will be peace. First there should be peace within. Otherwise, the cyclone of good and bad thoughts keeps on revolving in the mind so much. The mind never sits peacefully. So, daughter, the Father says that you children belong to the ever peaceful Father. What? The Father is a soul and He is such a soul, which remains in ever peace. How? Hm? You come to this world of three attributes. The world of sat, raj, tam keeps on changing. But the Father is ever peaceful and lives in the abode of truth (sat dhaam). Even during the four Ages, He remains there only. Ever peace is only in Him, is not it? As regards the souls, when they come to this world stage and play their part, then they are surrounded by so many disturbances. So, you remember whose children you are. So, the Father's blood will pass into the child. In that world, the blood is physical. In a body, the pure blood also flows through the arteries and the impure blood also flows through the veins. This is your blood of thoughts, the blood of soul - the pure thoughts and impure thoughts.

So, this continues. Peace is not established. So, this inheritance of peace can be obtained only from that one (us say), the Father of ever peace. Hm? Why was He made distant by uttering 'that one' (us say)? The speaker is Shiv. He Himself remains in peace forever. He is Sadaa Shiv. It is because that incorporeal comes in this world and comes in a corporeal human body in a permanent manner. So, the vibrations of peace are spread only through Him. A media is required, is not it? It should be asked from those sages, saints and mahatmas - has any one of them achieved moksha? Has anyone achieved liberation forever? They keep on speaking just like that. God Buddha went to the other world (paar nirvana). Arey, had he gone to the other world, his followers must have also gone, would they not have? The number of Buddhists in the world is increasing. Arey, it is a simple thing. When the highest on high ocean of peace, the inexhaustible stock house of peace Himself has to come to this world again and again, when He Himself does not get moksha (permanent liberation), then how will other souls get moksha? So, now the question is - How will the children get mukti (liberation)? They are in the bondage of this world. They are in the bondage of the body. They are in the bondage of organs. They are in the bondage of the mind. So, God Himself comes and shows the path of achieving mukti.

So, that God has come. Look, God has to come, will He not? There is nobody else who is liberated forever. So, I come in every Confluence Age (Sangamyuge-yuge) of a Kalpa (cycle of 5000 years). It is not as if I come after every Age, at the end of every Age, which has been written in the Gita - Sambhavaami yugey-yugey. It is not so. The meaning of 'sambhavaami yugey-yugey' is - I come in between two Ages. Which two Ages? Among them one is an Age of extreme descending celestial degrees. It means that He transforms the Iron-Aged land of untruth (jhoothkhand) to a land of truth (sachkhand). So, I come in that Confluence Age. In the confluence of the Iron Age and the Golden Age. It is not that I come in the confluence of the Golden Age and Silver Age, Silver Age and Copper Age or Copper Age and Iron Age. What not have they written in the scriptures! He came in the form of Hiranyakashyap in the Golden Age; He came in the form of Ram in the Silver Age. He came as Krishna in the Copper Age. He came as Kalankidhar in the Iron Age. Whenever the world cycle repeats, when the cycle is about to be completed, then I come. It is not as if I will keep on coming again and again.

So, look, God Himself has got the part (role) of transforming this old, impure, tamopradhan world, Iron-Aged, sinful world to a world of noble souls, deities. So, then children say that we want moksha (permanent liberation from the cycle of birth and death). Arey, when God is coming to this world again and again, then how can you get moksha? They say that we don't have to play a part at all in this world. Arey, when you don't have to play a part at all, then is your soul perishable? No. The soul is imperishable. The part of the imperishable soul is also imperishable. So, one will have to play his part, will he not? How can it be possible, hm, that someone's part itself is cancelled from the drama. Arey, those are worldly dramas. Their rehearsal also takes place. And then, when they enact the drama, do they enact it only once and stop it? They repeat it again and again. Just as the limited drama is repeated again and again; that is a perishable drama. It is not necessary that it will continue in every Age, every Kalpa. But this is a drama which is imperishable. There is a part of the imperishable souls. Yes, it is sure that some souls play a little part on the world stage, in the four Ages, and some play part for a longer time. But everyone has to play his part. How can it be possible that one does not play a part at all? Well, these topics; those who churn the ocean of thoughts throughout the day in order to explain to others; why has the Father come now to explain? Arey, the Father explains to you. You then explain to others.
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