Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

DEDICATED to PBKs.
For PBKs who are affiliated to AIVV, and supporting 'Advanced Knowledge'.
Post Reply
User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2608, दिनांक 13.08.2018
VCD 2608, Dated 13.08.2018
प्रातः क्लास 25.8.1967
Morning Class dated 25.08.1967
VCD-2608-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 11.53-30.58
Time- 11.53-30.58


बाबा तो जो कुछ राय देते हैं उस पर चलो। इसी बात में तुम्हारा कल्याण है। तो अपना भी कल्याण है। कल्याण है तो कल्याण करना है ना। बाबा ऐसे नहीं कहेंगे कि ये बीमार होवें, ये सर्विस कर सकेंगे। देखेंगे ना कौन सर्विस कर सकता है। कौन सी सर्विस करने वाला है। वो भी तो समझते हैं ना। समझा ना। क्योंकि अपनी भी वहां वो देखना है ना कि हम तो कुछ सर्विस ही नहीं करते हैं। कभी भी ये भी नहीं कहता हूं कोई को हमको आता नहीं है। हमारे मुख से कुछ ज्ञान निकलता नहीं है। अभी भी नहीं निकलता। काहे का वर्थ है? आई एम नॉट ए पैनी, वर्थ पैनी। सिर्फ यहां भी नाट वर्थ एट ए पैनी। बाप के पास होते हुए भी आई एम नाट ए वर्थ ए पैनी। एक कौड़ी की भी कीमत नहीं। अरे, क्योंकि हम कोई को भी पाउंड नहीं बनाय सकते। खुद ही ऐसे हैं। न मैं पाउंड बनने का लायक हूं। कुछ भी नहीं करता है तो मेरी कोई वैल्यू नहीं रही क्योंकि ये तो समझा जाता है ना कि यहां भी वैल्यू नहीं तो फिर वहां क्या होगा? वहां भी वैल्यू नहीं। जिनकी यहां वैल्यू होगी उनकी वहां भी वैल्यू होगी। यहां तो वैल्यू का मालूम पड़ जाता है कि हां, ये बहुत वैल्युएबल है।

देखो, जैसे ये जगदीश है, हँ, या अपनी ये अपनी मनोहर है। ये जो निर्मलशांता है। अब ये तो महारथियां हैं ना। देखो, ये कितने चक्कर लगाते रहते हैं। जिनकी सर्विस का तुमको समाचार मिला था। आज फलानी जगह गया। आज फलानी जगह गया। कितना शौक है उनको बैठ कर के वो कौड़ी से हीरे जैसे बनाना। तो रहम दिल है ना बच्चे। कल्याणकारी है ना। अच्छा, जो ये सर्विस नहीं करते हैं उनको न रहम दिल कहेंगे, न कल्याणकारी कहेंगे। कुछ भी नहीं कहेंगे बिल्कुल ही। कह देंगे तुच्छ बुद्धि है। तो वो तो स्वच्छ बुद्धि हो गया ना बिल्कुल। किसको बताया? हँ? जगदीश की तरफ बुद्धि है बाबा की। बाकी तो निर्मलशांता का नाम लिया, मनोहर का नाम लिया। मनोहर की वैल्यू। मनोहर दादी को तो किसी सेंटर का इंचार्ज भी नहीं बनाया। जोनल इंचार्ज भी नहीं बनाया। और बाबा इतनी उनकी सच्चाई की महिमा करते हैं। हँ? अरे, बाबा तो बेहद में बोलते हैं। तो वो जगदीश स्वच्छ बुद्धि हो गया ना बिल्कुल। तो स्वच्छ बुद्धि और तुच्छ बुद्धि। और ये स्वच्छ बुद्धि होती काहे से है? स्वच्छ बुद्धि होती है याद से। अगर याद नहीं करते हैं तो जरुर उनकी तुच्छ बुद्धि होगी। और काम भी ऐसे तुच्छ काम करते रहेंगे। जो सर्विसेबुल है, वो स्वच्छ काम करते रहेंगे। और जिनको ना याद है, न सर्विस कर सकते हैं वो तो तुच्छ काम ही करते रहेंगे ना। तो तुच्छ जा करके वहां पद भी ऐसा ही तुच्छ पाएंगे। यह तो बिल्कुल का कामन बातें हैं।

तो जो श्रीमत देते हैं उस श्रीमत पर चलना ही है ना बच्ची। श्रीमत तो कोई प्रेरणा से नहीं आएगा। श्रीमत तो ब्रह्मा द्वारा ही मिलेगी। और अगर कोई ऐसे हैं जो ब्रह्मा को भी नहीं मानेंगे तो श्रीमत नहीं मिलेगी। क्योंकि वो तो फिर कहां न कहां से दुष्ट मत ही पावेंगे ना। ऐसे नहीं कोई मिल सकती है। कोई ऐसे समझें कि नहीं, हमारा तो शिव से योग है। जाओ, शिव के साथ तुम्हारा डायरेक्ट योग है तो चले जाओ शिव के पास। फिर यहां ब्रह्मा के पास क्यों बैठे हुए? जाओ। अरे, टका सा जवाब दे दिया। हँ? शिव के पास नहीं जा सकते? बिंदी है इसलिए नहीं जा सकते? अच्छा? वो धर्मपिताऐं जाते हैं कि नहीं? हँ? धर्मपिताऐं किसी देहधारी के सामने झुकते हैं? तो जाते हैं कि नहीं शिव के पास? जाते तो हैं लेकिन फिर भी उनको आकर के आखरीन किसके सामने झुकना पड़ता है? हँ? उनको भी विश्व पिता के सामने आके झुकना पड़ता है। यहां तो तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी हो ना। समझा ना।

तो जाओ। यहां बहुत ऐसे बैठे हुए हैं जो शिव के पुजारी होते हैं। शिव के ही हैं। वो बोलते हैं हम तो शिव के ही हैं, शिव के। जाओ। जहां चाहो जाओ। शिव के पुजारी तो कहां भी जाकर के रह सकते हैं। यहां क्यों रहते हो? ये तो है ही ब्रहमाकुमार और कुमारियों के बीच में। यहां शिव बाबा ब्रहमा द्वारा ही ज्ञान दे सकते हैं। डायरेक्ट तो कोई को भी नहीं दे सकते। बिल्कुल नहीं। और रोज मुरली भी जरूर पढ़नी होती है। नहीं तो अगर मुरली ना पढ़े ब्रह्मा के मुख कमल से निकली हुई, तो कहां से सुनेगा? क्या कहा? मुरली भी कौन सी? स्पेशलिटी कौन सी मुरली की बताई? हँ? ब्रह्मा के मुख कमल से निकली हुई मुरली नहीं सुनेगा तो कहां से सुनेगा? नहीं सुनेगा तो फिर क्या होगा? सिर्फ शिव बाबा को याद करेंगे। मुरली नहीं सुनेगा। कोई है? हं? ऐसा एडवांस में कोई देखा? हं? नहीं देखा? मुरली नहीं सुनेगा तो उसका नतीजा क्या निकलेगा? हँ? हँ? मुरली नहीं सुनेगा तो हां, सुनते-सुनते स्वर्ग में आएंगे, आय करके कोई कम से कम भील बनेंगे या फलाना बनेंगे। ब्रह्मा के सिवाए मुरली कहां से चलाऐंगे? और कहां से ले आएंगे? ऐसे बहुत हैं जो बस हम तो सिर्फ शिव बाबा को ही जानते हैं। बस। ब्रह्मा से हमारा कुछ लेना-देना नहीं। ब्रह्मा से हमारा क्या काम? हमको तो वर्सा तो शिव बाबा से मिलेगा ना। अरे, पर मुरली कोई निकलेगी तो कहां से निकलेगी? थ्रू कहां से लेंगे?

कोई नहीं है कि फिर सगाई की और शादी हो कहते तो है कि वो दलाल का काम बनाया, खास हुआ, खत्म हुआ। पंडित जी दलाल होते हैं ना। नहीं, नहीं, ऐसे भी नहीं है। दलाल का तो पिछाड़ी तक चलना ही पड़ता है। पिछाड़ी तक चलना ही पड़ता है? 25.08.67 की वाणी का 9वां पेज, तीसरी, चौथी, तीसरी लाइन क्योंकि बाप इस द्वारा ही मुरलियां सुनाते हैं। क्या कहा? किस द्वारा? हं? बाप सुनाते किस द्वारा? ब्रह्मा द्वारा। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा नहीं? सुनाते हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) सुनाते हैं? प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा समझाते हैं। वो तो ठीक है। सुनाते किसके द्वारा है? सुनाते तो सिर्फ ब्रह्मा के द्वारा। तो उस ब्रह्मा भी अंत तक दलाल चलेगा कि नहीं चलेगा? साकार शरीर से नहीं चलेगा तो सूक्ष्म शरीर से चलेगा। ऐसे थोड़े ही कि लोप हो जाएगा। अच्छा, मान लो नहीं पढ़ेगा। पढा तो है थोड़ा। जानते तो है। तो फिर बताओ क्या कर के पद पाऐंगे? क्योंकि ना पढेंगें ना पढायेंगे तो पद क्या पायेंगे? तो ये तो सभी समझ की बात है ना। परंतु बाप समझाते हैं, देखते हैं- ये भी तो बनना है ना। क्या? क्या बनना? अरे, प्रजा वगैरा, नीच पद पाने वाले। ये भी तो बनना है ना। बाकी है तो सबकी तकदीर। ऐसे नहीं सबकी तकदीर ऊंची बनने की है। देखने में तो आते हैं इनकी कहां तक तकदीर बनती है। इनकी तकदीर क्या-क्या दिखाती है। तभी बाप कहते हैं अगर इस समय में ऐसे चलते-चलते शरीर छोड़ दिया तो क्या पद पाएंगे। तो मैं देखूँगा कि किसको-किसको दुख देते हैं? बोले, अभी हम क्या बनेंगे? अरे, तुम जाकर के डेढ़ चमार जाकर के बनेंगे। यानी वहां के लिए तो हम ऐसे ही कहेंगे ना। क्योंकि वहां भी पद तो है ना। कहां? पद कहां है? नई दुनिया में, स्वर्ग में भी तो पद है ना। भले वहां ये नाम नहीं होते हैं। डेड चमार वगैरा-वगैरा। परंतु फिर भी काम तो करते होंगे ना वहां भी।

तो ब्रह्मा बिगर तो किसका वरी कल्याण तो हो ही नहीं सकता है। ये तो सिर्फ खुद बाप ही समझाते हैं ब्रह्मा कि शिव बाबा को याद करो तो तुम्हारा विक्रम विनाश हो जाएगा। तो घड़ी-घड़ी जो प्वांइंटस निकलती हैं अगर शिव बाबा को, तो जाओ शिव बाबा को घर में, बाबा तो बोलते हैं विलायत में भी जाओ। वहां जाकरके शिव बाबा को याद करते रहो तो भी तो तुम्हारा विकर्म तो विनाश हो जावेगा। विकर्म विनाश हो जाऐगा, मुक्त हो जाएंगे इस दुनिया से तो मुक्तिधाम चले जायेंगे। अगर मुक्तिधाम का न होगा, जीवन मुक्तिधाम का होगा तो बरोबर पढ़ाई तो नहीं की ना। तो जीवन मुक्तिधाम में कैसे जावेंगे? हँ? धन तो मिला ही नहीं। ज्ञान धन तो लिया ही नहीं। तो फिर जाकर के, आकर के स्वर्ग में पहुंच जाऐंगे। पहुंच तो जाऐंगे। फिर इतना ही मिलेगा। यानि प्योर तो सबको बनना ही बनना है। प्योर बनेंगे तो मुक्तिधाम भी जाऐंगें। प्योर बनेंगे तो जीवन मुक्तिधाम मे जाऐंगें। तो सब, सब हिसाब-किताब चुक्तु करके, कयामत का समय है ना। आत्मा पवित्र बनने बिगर तो कभी भी शांतिधाम में नहीं जा सकती है। ओम् शान्ति।

Follow whatever directions Baba gives. Your benefit lies in this only. So, your benefit also lies in it. If there is benefit, you have to cause benefit, will you not? Baba will not say that this one should fall ill; this one will be able to do service. He will observe, will He not that who can do service and which kind of service he can do. He also understands that, doesn’t He? Did you understand? It is because you have to observe yourself that I don’t do any service at all. I never tell anyone that I don’t know. No knowledge emerges from my mouth. It does not emerge even now. Of what worth am I? I am not a penny, worth penny. Just even here, ‘not worth at a penny’. Despite being with the Father I am not a worth a penny. My value is not even worth a cowrie (a shell). Arey, because I cannot make anyone worth pound. I am myself like this. Nor am I worthy of becoming a pound. When I don’t do anything then I don’t hold any value because it is understood that if there is no value here, then what will happen there? There will not be any value there as well. Those who hold value here will hold value there as well. Here, one knows about the value that yes, this one is very valuable.

Look, just as there is this Jagdish or our Manohar. This Nirmalshanta. Well, these are Maharathis (elephant mounted warriors or high effort makers), aren’t they? Look, they keep on touring so much. You were given the news of their service. Today he went to such and such place. Today he went to such and such place. They have so much interest in sitting and making them diamonds from cowries. So, they are merciful, aren’t they children? They are benevolent, aren’t they? Achcha, those who do not do this service will neither be called merciful nor benevolent. They will not be called anything at all. It will be said that they have a lowly intellect. So, he happens to have a completely clean intellect. Who was mentioned? Baba’s intellect is thinking about Jagdish. But he also mentioned Nirmalshanta’s name, Manohar’s name. Manohar’s value. Manohar Dadi was not made the incharge of any center. She wasn’t even made zonal incharge. And Baba praises her truthfulness so much. Hm? Arey, Baba speaks in an unlimited sense. So, that Jagdish has a completely clean intellect, doesn’t he? So, clean intellect and lowly intellect. And how does one become clean-intellect? One becomes clean-intellect through remembrance. If one does not remember, then definitely their intellect will be lowly. And the tasks that they perform will also be so lowly. Those who are serviceable will keep on performing pure tasks. And those who neither remember nor can do service will keep on performing lowly tasks only, will they not? They will go and achieve only such lowly post there. These are very common topics.

So, you must follow the Shrimat that He gives, will you not daughter? Shrimat will not come through inspiration. Shrimat will be received only through Brahma. And if there are such persons who do not accept Brahma as well, then they will not get Shrimat because they will get only wicked directions from somewhere or the other, will they not? It is not as if they can get [Shrimat]. Someone may think that no, our Yoga is with Shiv. Go, if you have direct Yoga with Shiv, then go to Shiv. Then why are you sitting here with Brahma? Go. Arey, he was given a negative reply. Hm? Can’t you go to Shiv? Can’t you go because He is a point? Achcha? Do those founders of religions go or not? Do the founders of religions bow before anyone or not? So, do they go to Shiv or not? They do go, however, they have to finally come and bow before whom? Hm? They too have to come and bow before the world Father. Here you are Brahmakumar-kumaris, aren’t you? Did you understand?

So, go. There are many such persons sitting here who are worshippers of Shiva. They belong to Shiv only. They say that we belong to Shiv alone, Shiv. Go. Go wherever you wish. Worshippers of Shiv can go and live anywhere. Why do you live here? This is among the Brahmakumars and Kumaris. Here ShivBaba can give knowledge only through Brahma. He cannot give directly to anyone. Not at all. And you have to definitely read the Murli daily. Otherwise, if you do not read the Murli that emerges from the lotus-like mouth of Brahma, then how will you listen? What has been said? Which Murli? Specialty of which Murli was mentioned? Hm? If you do not listen to the Murli that emerges from the lotus-like mouth of Brahma, then from where will you listen? What will happen if you do not listen? You will just remember ShivBaba. You will not listen to the Murli. Is there anyone? Hm? Did you see anyone in advance [party]? Hm? Did you not see? What will be the result if you do not listen to Murli? Hm? Hm? If you do not listen to Murli, then yes, you will come to heaven while listening; you will come and become at least a tribal (bheel) or something else. How else will Murli be narrated except through Brahma? And from where will you bring [Murli]? There are many such persons who say – We know just ShivBaba. That is all. We don’t have anything to do with Brahma. What do we have to do with Brahma? We will get inheritance from ShivBaba, will we not? Arey, but if Murli emerges, where will it emerge from? Through whom will you get?

It is not as if you get engaged and after marriage you say that the task performed by the dalaal (middleman) is over. There are Pundits who act as dalaals (middlemen), don’t they? No, no, it is not like that as well. Dalaal’s task has to continue till the end. Does it have to continue till the end? 9th page of the Vani dated 25.08.67, third, fourth, third line; because the Father narrates Murlis through this one only. What has been said? Through whom? Hm? Through whom does the Father narrate? Through Brahma. Not through Prajapita Brahma? Does He narrate?
(Someone said something.) Does He narrate? He explains through Prajapita Brahma. That is correct. Through whom does He narrate? He narrates only through Brahma. So, will that Brahma also act as a dalaal till the end or not? If he does not act through the corporeal body, then he will act through the subtle body. It is not as if he will vanish. Achcha, suppose you don’t study. You have studied to some extent. You do know. Then tell, what post will you achieve? It is because if you neither study nor teach, then what post will you achieve? So, all this is a topic to be understood, isn’t it? But the Father explains, observes – You have to become this as well, will you not? What? What do you have to become? Arey, subjects (praja), etc, those who achieve a lowly post. You have to become this as well, will you not? Rest is everyone’s fate. It is not as if everyone is fated to become great. It is observed as to how far they achieve their luck. What all does their fate show! Only then does the Father say – If you leave your body while treading like this, then what post will you achieve? So, I will observe that who all do you give sorrows? He asked, what will I become now? Arey, you will go and become dedh chamaar (a caste among Hindus considered to be lowly and engaged in producing leather from dead animals’ skin). It means that we will say like this only for that place, will we not? It is because there are posts there as well. Where? Where do the posts exist? In the new world, even in heaven there are posts, aren’t there? Although these names don’t exist there. Ded chamaar, etc. But, however they must be performing those tasks there as well, do they not?

So, nobody can be benefited except through Brahma. The Father Brahma himself explains that if you remember ShivBaba, then your sins will be burnt. So, the points that emerge again and again, then even if you go home and remember ShivBaba; Baba says – Go even to the foreign countries. Even if you go and remember ShivBaba there, your sins will be burnt. Sins will be burnt; you will be liberated from this world and go to the abode of liberation. If you do not belong to the abode of liberation (muktidhaam), if you belong to the abode of jeevanmukti (liberation in life), then you haven’t studied properly, have you? So, how will you go to the abode of jeevanmukti? Hm? You did not get wealth at all. You did not obtain the wealth of knowledge at all. So, then you will come and reach heaven. You will reach. Then you will get only to that extent. It means that everyone has to definitely become pure. If you become pure, then you will go to the abode of mukti as well. If you become pure, then you will go to the abode of jeevanmukti. So, after clearing all the karmic debts; it is the time of destruction, isn’t it? The soul can never go to the abode of peace without becoming pure. Om Shanti.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2609, दिनांक 14.08.2018
VCD 2609, Dated 14.08.2018
प्रातः क्लास 25.8.1967
Morning Class dated 25.8.1967
VCD-2609-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-16.45
Time- 00.01-16.45


प्रातः क्लास चल रहा था - 25.8.1967. शुक्रवार को नौवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – जो पढ़ाई नहीं पढ़ते हैं, धन नहीं मिलता है, आते तो हैं, तो फिर वो स्वर्ग में पहुँच जाएंगे, पर प्रजा पद पाएंगे। बाकि प्योर तो सबको होना है हिसाब-किताब चुक्तु करके क्योंकि कयामत का समय है ना। आत्मा पवित्र बनने बिगर तो कभी शान्तिधाम में जा ही नहीं सकती है। तो फिर कैसे पवित्र बनेंगे? ज्ञान लिया नहीं। याद में क्या बैठेंगे? जितना ज्ञान गहरा होता है याद भी उतनी गहरी होती है। कयामत के समय में सज़ाएं खाएंगे। भला अगर अच्छा पाप का घड़ा भरा हुआ है और ज्ञान है नहीं, योग नहीं है तो फिर क्या होगा? अगर ज्ञान भी नहीं, योग भी नहीं, समझो वो तो बाहरवाले हैं। जिनको नहीं है वो दूसरे-दूसरे धर्मों वाले हैं। किनको कहा होगा? हँ? जो सतयुग के दूसरे जनम से नारायण और उनके फालोअर्स आते हैं वो नंबरवार बाद वाले नारायण हैं ना। तो वो दूसरे धरम में चले जावेंगे। वो बाहरवाले हुए ना। बाकि यहाँ तो जो आ गया वो तो हुआ ही। ब्राह्मण बना। ब्राह्मण तो बना। जैसे कि ब्राह्मण बना एक दफा क्योंकि जरूर पक्का है कि शिवपुरी है। वो विष्णुपुरी में आएंगे जरूर जो शिवपुरी के भांती हैं कि ब्राह्मण बने ना। बाकि जितनी सर्विस की है उतना पद पाते हैं। सर्विस नहीं की तो ऊँच पद क्या पावेंगे? सर्विस करने वालों में और न करने वालों में कुछ तो फर्क होगा।

तो समझाते रहते हैं बच्चे, तुम कहते, आओ, न सुने, फिर भी ये तो पक्का है कि आगे चलकरके सुनेंगे जरूर। आगे चलकरके सुनेंगे तो अंतर क्या पड़ेगा जो पहली-पहली बार ही आते हैं अच्छे से सुनते हैं, पुरुषार्थ करते हैं, लगे रहते हैं निरंतर, जो अभी नहीं सुनते हैं ध्यान से आगे चलकरके सुनेंगे तो उनमें क्या अंतर होगा? आगे चलकरके सुनेंगे तो अगले जनम में जाकरके ऊँच पद बनेगा। बाकि सुनेंगे जरूर क्योंकि दिन-प्रतिदिन तुम्हारा प्रभाव वृद्धि को पाता रहेगा। अभी तुम्हारा प्रभाव नहीं पड़ता है तो आगे चलके पड़ेगा। जब प्रभावित होंगे तो उस डायनेस्टी में आ जाएंगे। राजाओं की डायनेस्टी होती है ना। जैसे क्रिश्चियन्स में किंग एडवर्ड दि फर्स्ट, सेकण्ड, थर्ड। ऐसे सतयुग में फर्स्ट नारायण, सेकण्ड नारायण, थर्ड नारायण।

तो तुम्हारा प्रभाव निकलेगा तो भले बाद में आवेंगे, भले कितना भी रोड़ा आएगा, वो स्टीमर बूढ़ने तक आ जा करके रहेंगे स्टीमर में। फिर भी ये गाया जाता है ना। तूफान आता है तो बहुत जोर से लोढ़ेंगे। क्योंकि नए धरम की स्थापना होती है ना बच्ची। तो जो पुराने-पुराने धरम वाले हैं वो बहुत अपोजिशन करते हैं। तुम क्या समझते हो? अपोजिशन नहीं करेंगे? करेंगे। तुम लोग बैठकरके अपने लिए गुप्त वेश में राजधानी स्थापन करते हो। तो लोढ़े तो आएंगे ना। दूसरे धरम वाले विघन तो डालेंगे ना बच्चे। और आते तो हैं ही। ये विघन को और कोई यज्ञ में या पढ़ाई में या कोई चीज़ में इतने ऐसे विघन तो नहीं पड़ते हैं कभी। वो हो ही नहीं सकते। तो यहाँ इतने विघन क्यों पड़ते हैं? क्या कारण बताया? हँ? क्योंकि और सब धर्मों वालों के मुकाबले नई बातें हैं ना। और-और धरम वालों की कुछ न कुछ, कोई न कोई बातें बहुत कुछ मिलती-मिलती हैं। यहाँ तो बाप दिन-प्रतिदिन नई-नई बातें सुनाते रहते हैं।

तो वो धर्म के धक्के तो सभी धरमपिताओँ को खाने पड़े। उनको जो फालो करते हैं सक्रिय रूप से उनको भी धक्के तो खाने पड़े ना। ऊँच पद पावेंगे। देखो, स्वतंत्रता संग्राम हुआ। तो जिन्होंने बहुत लोड़े खाए उनको, उनके परिवार वालों को देखो अभी तक भी कितना सहयोग मिलता है गोर्मेन्ट से। तो और धरम वालों को इतने विघन नहीं पड़ते हैं। पड़ ही नहीं सकते। कोई ने जो यज्ञ रचा है ना बच्चे उसमें विघ्न पड़ ही कैसे सकते हैं? और इस यज्ञ में? उस यज्ञ में तो विघन की बात ही नहीं है वास्तव में। विघन इस ज्ञान यज्ञ में पड़ते हैं क्योंकि ज्ञान की नई-नई बातें हैं ना। वहाँ कोई बरसात होवे तो भी वो मंडप बनाय देते हैं जो पानी-वानी न पड़े, आग-वाग जो यज्ञ में जलाते हैं, वो बुझ न जावे। क्योंकि यहाँ तो पानी की बाढ़ भी आनी है। कौनसे पानी की? ज्ञान जल की बाढ़ आवेगी। ढ़ेर के ढ़ेर बोडमबोड़ होकरके मरने वाले हैं।

वहाँ तो कोशिश करते हैं यज्ञ में आग जो यज्ञकुंड में जल रही है वो बुझ न पाए। नहीं तो वो जो यज्ञकुंड बनाते हैं ना वो आग कभी बुझ नहीं सकती है क्योंकि उसमें वो घी डालते ही रहते हैं। तुमको भी क्या करना है? हँ? घी किसे कहा जाता है? हँ? याद को घी नहीं कहा जाता सिर्फ। अव्यभिचारी याद को घृत कहा जाता है। व्यभिचारी याद को घृत नहीं कहेंगे। तो वो घृत डालते रहते हैं। तुम्हारी अव्यभिचारी याद का घृत पड़ता रहेगा तो विघन नहीं पड़ेंगे। समझा ना? तो ऐसे फकीर होते हैं। उनके पास जो उनकी वो रहती है ना धुनि वो कभी धूपती ही रहती है एकदम। धुनि रमाए ही रहते हैं। जभी इनका ब्रह्म मन्दिर है कि उसमें ज्योति जगती रहती है। कभी बन्द नहीं होती है क्योंकि उसमें घी डालना पड़ता है। ब्रह्म मन्दिर में ज्योति जगती है। घी जलता ही रहता है। वो कभी आग को बुझाने नहीं देंगे। यहाँ कौनसी आग है? हँ? यहाँ है योगाग्नि की आग। बुझने न पाए। समझा ना। ना। वो तो कि जैसे कि बहुत उपद्रव हो गया। समझते हैं आग अगर बुझ गई तो बड़ा भारी अपशगुन हो गया। उपश्रोव हो गया। तो ये भारत को भी उपतश्रोण है। अभी। तब तो ये हालत हुई है ना। क्योंकि ज्योति उझानी पड़ गई है। बहुत नींद आती है। हँ? ज्योति उझानी है। कहेंगे तमोप्रधान बन गई है।

तो देखो कितना हालात खराब होते जाते हैं। 25.8.67 की वाणी का दसवां पेज। तो अभी ये तुम जानते हो कि आत्मा ही तमोप्रधान बन गई है। इसलिए एकदम वर्थ नाट ए पैनी बन गई। और अभी तुम समझते हो कि अभी हम हैं वर्थ नॉट ए पैनी। और अभी हम जाकरके वर्थ पाउण्ड बनने वाले हैं। क्योंकि ये तो जानते हो ना हमारी ज्योति उझानी हुई है। और ज्योति के लिए भी तो कहते हैं ना। ज्योति को कभी शमा कह देते हैं। ज्योति भी कह देते हैं। तो उस ज्योति को याद करने से ये जानते हो बच्चे कि हम हमारी ज्योति जगाते आए। अब हमारी ज्योति जगती जाती है। हाँ, बस ये है कि और कोई द्वारा तो जग नहीं सकती है। हँ? क्योंकि यहाँ जगाने वाला एक ही है बाप। और वो बाप और किसी युग में आते नहीं हैं। इस पुरुषोत्तम संगमयुग पर ही आते हैं। फिर सबकी ज्योति जगाय देते हैं नंबरवार। जैसा जिसका पुरुषार्थ वैसी ज्योति जगती रहती है।

A morning class dated 25.8.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the ninth page on Friday was – Those who don’t study, do not get wealth, do come; so then, they will reach heaven, but they will achieve the post of subjects. But everyone has to become pure after clearing their karmic debts because it is the time of destruction, isn’t it? The soul can never go to the abode of peace without becoming pure. So, then how will you become pure? You haven’t obtained knowledge. How will you sit in remembrance? The deeper the knowledge is, the deeper will be the remembrance. They will suffer punishments at the time of destruction (kayaamat). Suppose the pot of sins is completely filled up and if there is no knowledge, no Yoga, then what will happen? If there is neither knowledge nor Yoga, then you think that they are outsiders. Those who don’t have that belong to other religions. About whom must He have said? Hm? Narayan and his followers, who come from the second birth of the Golden Age are numberwise latter Narayans, aren’t they? So, they will go to other religions. They are outsiders, aren’t they? As regards the one who came here became a Brahmin. He did become a Brahmin. It is as if he became a Brahmin once because it is sure that it is the abode of Shiva (Shivpuri). Those who are members of the abode of Shiva will definitely come to the abode of Vishnu (Vishnupuri) because they became Brahmins, didn’t they? But they achieve post in accordance with the service they have done. If they haven’t done service, then how will they achieve a high post? There must be some difference between those who do service and those who don’t do.

So, He keeps on explaining – Children, you ask them to come and if they don’t listen, then it is sure that they will definitely listen in future. If they listen in future then what will be the difference? What will be the difference between those who come for the first time, listen nicely, make purusharth, and remain steadfast and those who do not listen now carefully and will listen in future? If they listen in future, then they will achieve a high post in the next birth. But they will definitely listen because day by day your influence will keep on increasing. Now you don’t cast an influence, but you will cast in future. When they are influenced, then they will come in that dynasty. There is a dynasty of kings, isn’t it? For example, there is King Edward the first, second, third among the Christians. Similarly, there is the first Narayan, second Narayan, third Narayan in the Golden Age.

So, when your influence is visible, then they may come later; although many obstacles may emerge, they will join the steamer by the time the steamer is ready to leave. Then this is also sung, isn’t it? When storms come, then they will shake vigorously because a new religion is being established, isn’t it daughter? So, those who belong to the old religions indulge in a lot of opposition. What do you think? Will they not indulge in opposition? They will. You people sit and establish kingdom for yourselves in an incognito form. So, obstacles will emerge, will they not? People belonging to other religions will create obstacles, will they not children? And they do emerge. These obstacles are never created in any other Yagya or study or in any other thing. It cannot be possible at all. So, why do so many obstacles emerge here? What is the reason? Hm? It is because these are newer topics when compared to all other religions, aren’t they? Some topics of other religions match with each other a lot. Here the Father keeps on narrating newer topics every day.

So, all the founders of religions had to suffer the pangs of religion. Those who actively follow them also had to suffer the pangs, did they not? They will achieve a high post. Look, freedom struggle took place. So, those who suffered a lot, look, their family members get so much support till now from the government. So, people of other religions do not face that many obstacles. They cannot face at all. Children, if anyone has created the Yagya, then how can obstacles be created in it? And in this Yagya? There is no question of obstacles in that Yagya in reality. Obstacles are created in this Yagya of knowledge because there are new topics of knowledge, aren’t there? If rainfall takes place there [at the site of Yagya], then they erect a tent (mandap) so that water doesn’t fall so that the fire that they ignite in the Yagya does not extinguish. Because here a flood of water is also going to come. Of which water? The flood of water of knowledge will come. Numerous people are going to die due to submergence.

There, they try to prevent the fire raging in the yagyakund (the site of Yagya) from getting extinguished. Otherwise, the yagyakund that they build, that fire can never extinguish because they keep on putting ghee (purified butter or ghrit) in it. What do you also have to do? Hm? What is meant by ghee? Hm? Remembrance alone is not called ghee. Unadulterated remembrance is called ghrit. Adulterated remembrance is not called ghrit. So, they keep on adding ghrit. If the ghrit of your unadulterated remembrance continues to be added, then obstacles will not be created. Did you understand? So, there are such fakirs (mendicants). Their dhuni (a place where they burn firewood) keeps on burning. They keep the fire burning. They have a Brahm temple, where the lamp continues to burn. It never extinguishes because they have to put ghee in it. A lamp burns in the Brahm temple. The ghee continues to burn. They will never allow that fire to extinguish. Which fire is it here? Hm? Here it is the fire of Yoga. It should not get extinguished. Did you understand? No. That is like a blunder (upadrav). They think that if the fire gets extinguished, then it will be a very bad omen (apshagun). It is a bad omen (upshrov). So, this is also a bad omen (upatshron) for India. Now. Only then that the situation has come to this pass because the light has diminished. You feel very sleepy. Hm? The light has diminished. It will be said that it has become tamopradhan (degraded).

So, look, the situations keep on worsening so much. Tenth page of the Vani dated 25.8.67. So, now you know that the soul itself has become tamopradhan. This is why it has become completely worth not a penny. And now you feel that now we are worth not a penny. And now we will go and become worth pound. You know that our light has diminished. And it is also said for the light, isn’t it? Sometimes they call the lamp (jyoti) as shamaa. They call it jyoti as well. So, children, you know that we have been igniting our lamp by remembering that light. Now our lamp keeps on burning. Yes, it is sure that it cannot be lighted by anyone else. Hm? It is because here the one who lights the lamp is only one Father. And that Father does not come in any other Age. He comes only in this Purushottam Sangamyug. Then He lights the lamp of everyone numberwise. The lamp keeps on burning depending upon the individual purusharth.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2609, दिनांक 14.08.2018
VCD 2609, Dated 14.08.2018
प्रातः क्लास 25.8.1967
Morning Class dated 25.8.1967
VCD-2609-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 16.46-37.50
Time- 16.46-37.50


है सबकी इस समय उझानी हुई ज्योति। सब पतित हुए पड़े हैं। सब काम चिक्षा पर बैठ करके अभी, अभी साफ करते हैं बाप। क्योंकि काम चिक्षा पर बैठ करके जल मरे हैं ना। ये भी तो शास्त्रों में अक्षर है ना। क्या? क्या अक्षर? हँ? कि भागीरथ के पुरखे भस्मीभूत हो गए। सागर के पुत्र भस्मीभूत हो गए। हँ? कहाँ? कहाँ भस्मीभूत हो गए? अरे, कोई स्थान में भस्मीभूत हुए दिखाए गए हैं? हँ? कहीं नहीं? पाताल में? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। कहते हैं कपिल मुनि के आश्रम में कपिल मुनि ने श्राप दिया तो सब भसम हो गए। बाबा कहते हैं कपिल हैं। ये युगल। युगलमूर्त। कपल को युगल कहा जाता है। तो जो भस्मीभूत हो गए। ये अक्षर हैं ना। तो उनको सामने मुँह में देना होए ना। तुम कहते हो वहाँ सतयुग में, सतयुग में थोड़ेही कोई जल मरते हैं। वहाँ तो सतोप्रधान स्टेज होती है। कब जल मरे? जब कलियुगी शूटिंग हुई होगी तमोप्रधान दुनिया की तब जल मरे होंगे। सतयुग में तो कोई जले हुए थोड़ेही होते हैं, रहते हैं? यहाँ सड़े हुए होते हैं तो यहाँ हैं ना। काम विकार से सड़े हुए। अरे काले-काले तो यहाँ कहते हैं ना। सतयुग में कोई काले होते हैं क्या?

मन्दिरों में जाके देखो देवताओं को भई काला बनाया हुआ है। अरे देवताओं को क्यों काला बनाया हुआ है? देवताएं तो सतयुग में गोरे होते हैं। वो कोई काले करम थोड़ेही करते हैं छुपा-छुपा के। नहीं। और कोई को काला नहीं बनाया है वहाँ। कहाँ? सतयुग, त्रेता में कोई को काला थोड़ेही बनाया है किसी ने। कभी क्राइस्ट, वगैरा इनको कोई काला बनाएगा क्या? हँ? क्राइस्ट को काला नहीं बनाएंगे। ये देवी-देवता धरम के, इनको देखो पूरा काला बनाय दिया। राम को भी काला, कृष्ण को भी काला। अरे, शिवबाबा को भी काला। शिवलिंग भी काला बनाय दिया। हँ? देखो जाके और दूसरे धर्मों में। न क्राइस्ट को काला बनावेंगे, न बुद्ध को काला बनावेंगे। क्यों? क्यों? क्योंकि वो इतना पुराने हैं ही नहीं। न ज्यादा गोरे बनते हैं न ज्यादा इतने काले बनते हैं। नहीं। अब इन भारतवासी देवी-देवताओं को तो एकदम नाम रख दिया है, हँ, महाकाल, कालेश्वरजी महाराज। हँ, जगन्नाथ के मन्दिर में जाके देखो। गोरा है? काला है? कितना भयंकर काला! और बरोबर चित्रों को बनाते हैं काला। चित्र किस बात की यादगार है? हँ? चित्र हैं चरित्र की यादगार। जब ये विष्णु का चित्र बनाते हैं मन्दिर में वास्तव में तो विष्णु को काला नहीं दिखाते। क्या? क्यों? क्यों करते? वो ब्राह्मणों का ऐसा संगठन का स्वरूप दिखाया गया है जहाँ कोई काले कर्म करने वाला पांव भी नहीं रख सकता है। चोरी-चकारी, लुच्चे-लफंगों का वहाँ काम ही नहीं। कहाँ? विष्णुपुरी में। हाँ। विजयमाला विजय पाती है ना विकारों पर।

तो देखो विष्णु को काला नहीं बनाते हैं। वो तो मिलजुलकरके एक हो गए ना। विष्णु की भुजाएं चार दिखाते हैं। तो चारों सहयोगी के स्वभाव-संस्कार मिलकरके एक हो गए और उनको कंट्रोल करने वाला वो तो सबसे ऊपर का मुख है। जो ब्रह्मा सो विष्णु कहा जाता है। अब देखो लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाते हो। तो काला नहीं। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिरों में लक्ष्मी-नारायण को काला दिखाते हैं क्या? नहीं। लेकिन चित्रों में? चित्रों में काला दिखाय दिया है। बनाय देते हैं। तो वो बनाते हैं। जैसे बड़े-बड़े तीर्थ हैं तो उनमें भी काला है। देखो, ये तीर्थ हैं ना यहाँ। हँ? चार धाम की यात्रा करते हैं। ये रामचन्द्र को काला बनाया। जगन्नाथपुरी में काला बनाया। कारण क्या है? ये तो कभी कोई नहीं जान सकता सिवाय तुम बच्चों के। क्या जानते हो तुम बच्चे? इनको काला क्यों दिखाया है? क्योंकि इनका धरम बहुत पुराना है ना। हँ? बहुत पुराने हैं तो ज्यादा तमोप्रधान भी बनते हैं। जो ज्यादा सतोप्रधान बनते तो ज्यादा तमोप्रधान भी बनते हैं। तो तुम बच्चों को पता है। कारण ये है कि तुम सब भी समझाय सकते हो कि क्यों काला बनाया? कारण क्या है? क्योंकि वो आधा कल्प के बाद काम चिक्षा पर चढ़ना ही होता है। हँ? आधा समय सात्विक, सतोप्रधान, आधा समय तमोप्रधान। और धरम वाले न इतने आधा समय सतोप्रधान बनते। कोई 16 कला संपूर्ण थोडेही बनते हैं दूसरे धरमवाले। बनते हैं क्या? नहीं। न इतने ज्यादा तमोप्रधान बनते हैं।

देवी-देवता सनातन धर्म वाले हैं वो ही सबसे ज्यादा सतोप्रधान थे। उन्हीं को तो भगवान आके नर से नारायण बनाते हैं। दूसरे धरमवाले तो ज्ञान सुनते भी नहीं हैं। वो तो अपने धर्मग्रंथ को छोड़करके दूसरे अलग ग्रंथ। उनके संस्कार हैं जन्म-जन्मान्तर के। ये तो भारतवासी हैं जो आया सबकी बातें सुनते रहते हैं। सत्य वचन महाराज। ठीक है कृपानिधान। सत्य है दयानिधान। सबसे प्रभावित होते रहते हैं। तो फिर ज्ञान चिक्षा पर जो गोरा बन जाते हैं और काम चिक्षा पर काले बन जाते हैं। तो अभी ज्ञान चिक्षा पर चढ़ने से तुम गोरे बन रहे हो। और काम चिक्षा पर तुम जानते हो काम चिक्षा पर चढ़ेंगे तो हम काले बन जाएंगे। पर ये तो कोई भी नहीं जानते हैं सिवाय तुम्हारे कि काम चिक्षा पर चढ़ने से काले बनते हैं क्योंकि और धरमवाले तो जब इस दुनिया में आते हैं तो काम चिक्षा के लिए दुनिया होती है। उनकी बुद्धि में ये बात नहीं बैठ सकती। फिर तुम जिनको समझाते हो वो फिर समझते हैं और दूसरों को समझाते रहते हैं।

तो समझाने के वक्त में ये सब तुम समझते हो और किसलिए समझते हो? हँ? तुम ये सब जो समझते हो ये सब बातें किसलिए समझते हो? दूसरों को समझाने के लिए समझते हो। अभी समझते हैं और दूसरे को नहीं समझाते हैं उनको फिर क्या कहा जाता है? हँ? उनको कहा जाता है कंजूस। मनहूस। हँ? जो खुद तो ज्ञान धन लेते हैं, इकट्ठा करते हैं, अपने अन्दर भरते हैं, दूसरों को बांटते ही नहीं, मुख से ज्ञान की बातें निकलती ही नहीं। अरे, कोई धनवान हो, उसके पास धन है। लेकिन वो किसी को देता नहीं है। तो उनको दुनियावाले भी क्या कहते हैं? बड़ा मनहूस आदमी है। बड़ा कंजूस है। बाबा नहीं समझाते हैं कि भई बहुत सेठ लोग ऐसे होते हैं। हँ? समझाते हैं क्या? नहीं समझाते? अरे, बाबा तो सेठ लोगों की बात समझाते हैं। बड़े मनहूस होते हैं। हँ? सेठ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास लाखों हैं। उस समय का लाखों और इस समय के सेठियों के पास करोड़ों से भी ऊपर। परन्तु वो कपड़ा भी पाई-पैसे के पहनेंगे। घरवालों को भी पाई-पैसे के कपड़े पहनाएंगे। ऐसे मनहूस हैं। किसको दान देने जाएगा ना। क्या? कोई दान लेने के लिए दरवाजे पे आएगा कुछ भी नहीं देगा। गालियाँ देकर धक्का देके निकाल देगा। और, और गया बिचारा। बाद में क्या होता है? सारा धन इकट्ठा करके गया और मर गया। और बच्चों ने खूब बर्बाद किया। बहुत पैसा छोड़ कर जाते हैं। ऐसे का वरी पैसे में लड़ाई लगकरके तो पैसा ही वो बर्बाद हो जाता है। बच्चे आपस में लड़ते हैं, झगड़ते हैं, कोर्ट कचहरी में खर्चा करते हैं। ऐसे-ऐसे मनहूसों का पैसा लड़ाई-झगड़े में बर्बाद हो जाता है। उसमें सब खलास हो जाता है।

तो ये तो बाबा का अनुभव है ना। खुद का भी अनुभव है। सब कुछ देखा हुआ है। तो ये तो समझ सकते हैं कि मेरे में ज्ञान है। मैं किसको भी समझाय सकता हूँ। अगर ज्ञान नहीं है, नहीं किसको समझाय सकता हूँ, ज्ञान नहीं है तो ये पक्का है कि मैं पद भी बहुत कम पाऊँगा। तो क्यों नहीं हम ऐसे अपना ज्ञान पूरा पढ़करकरके अच्छी तरह से पढ़ाई पढ़करके जावें। और दूसरों को देवें। जितनों को देवेंगे तो वो हमारे फालोअर्स बनेंगे। प्रजा बनेगी। ज्यादा को देंगे तो बहुत बड़ी प्रजा बन जावेगी। बहुत बड़े राज्य के राजा बनेंगे। तो कुछ तो देना चाहिए ना। कुछ तो अच्छा मिल जाएगा। परन्तु नहीं। जिनकी तकदीर में नहीं है वो जैसे कि यहाँ से सुनते हैं और यहाँ से ही निकल जाता है। क्या? जैसे भक्तिमार्ग में होते हैं ना भक्ति में कथा सुनने जाते हैं पण्डितजी की, हँ, लाखों की तादाद में जाते हैं और बस उठे और वहीं का वहीं झाड़ दिया।

बैठे हैं। तो कोशिश करनी पड़े ना अच्छी तरह से। और श्रीमत पर भी चलना पड़े। श्रीमत कहे ये करो तो फिर वो काम करके दिखलाना चाहिए ना। अपना हठ नहीं दिखलाना चाहिए। मुफ्त में अपन को घाटे में नहीं डालना चाहिए। तो बाप फिर क्या करेंगे? देखेंगे जास्ती कहता हूँ तो रूठ करके चले जाएंगे। या रूठ करके चली जाएगी। चली जाएगी रूठ के अपना सत्यानाश कर देगी। और क्या करेंगे? तो कोई अपनी सत्यानाश न करे इसके लिए भी बाबा को थोड़ा खुद झुकना पड़ता है। हाँ, कि कोई भी प्रकार से इनको खुश करके रखो भाई। आज नहीं तो कल सुधर ही जाएंगे। नहीं तो ये तो झट छुट्टी लेके भागेंगे। भागने में देरी थोड़ेही करेंगे। अच्छा, चलो बच्ची टोली ले आओ। परन्तु अभी अच्छे से सेवा होने में देरी है। राजाओं को देरी से, सन्यासियों को देरी से प्राप्त होगा। क्यों? हँ? क्योंकि ये सन्यासियों को तो बड़ा घमंड रहता है अपने ज्ञान का। और राजाओं को अपनी धन-संपत्ति का बड़ा ज्ञान-मर्तबा रहता है। मान-मर्तबे में चूर रहते हैं। तो जब वक्त बहुत रेवोल्यूशन हो जाएगा, आवाज़ मच जाएगा तब देरी से आवेंगे। अभी नहीं आवेंगे। तो ऐसे अभी जल्दी मचने का आवाज़ तो है नहीं। अभी क्या इतना आवाज हुआ है? नहीं हुआ है। अभी थोड़ा बहुत तो आवाज़ हुआ होगा। तुम्हारे ज्ञान का आवाज़ हुआ क्या? कि ग्लानि का आवाज़ हुआ? ग्लानि का आवाज़ हुआ। ज्ञान का तो आवाज़ नहीं हुआ। तो समझते हैं अभी देरी है। ओमशान्ति।

Everyone’s lamp is diminished at this time. All have become sinful by sitting on the pyre of lust. Now, now the Father cleans them because they have burnt and died by sitting on the pyre of lust, haven’t they? These are also the words of the scriptures, aren’t they? What? What words? Hm? That the ancestors of Bhaagirath were burnt to ashes. The sons of Saagar were burnt to ashes. Hm? Where? Where did they burn to ashes? Arey, have they been shown to have burnt to ashes at any place? Hm? Nowhere? In the nether world (paataal)? Hm?
(Someone said something.) Yes. It is said that in the hermitage of Sage Kapil; Sage Kapil gave a curse; so, everyone was burnt. Baba says – They are couple. These yugal (couples). Yugalmoort (couple form). Couples are called yugal. So, those who were burnt to ashes. These are the words, aren’t they? So, they have to be told on their face, will you not? You say that they do not get burnt there in the Golden Age. There is a satopradhan stage there. When did they get burnt and die? They must have died by burning where the Iron Age shooting of the tamopradhan (degraded/impure) world must have taken place. Do they remain burnt in the Golden Age? Here they are rotten, so they are here, aren’t they? Rotten due to the vice of lust. Arey, here people call others dark ones, don’t they? Are there any dark ones in the Golden Age?

Go and see in the temples; they have made the deities black. Arey, why have the deities been made black? Deities are fair in the Golden Age. They do not perform any dark actions stealthily? No. And no one has been made dark there. Where? In the Golden Age, Silver Age, has anyone been made dark by anyone? Will anyone ever make Christ, etc. dark? Hm? They never make Christ dark. Look, these people belonging to the deity religion have been made completely dark. Ram has also been made dark, Krishna has also been made dark. Arey, ShivBaba has also been made dark. Shivling has also been made dark. Hm? Go and look in other religions. Neither Christ is made dark, nor is Buddha made dark. Why? Why? It is because they are not so ancient. They neither become fairer nor become darker. No. Well, these deities, the residents of India (Bhaaratwaasis) have been named – Mahaakaal, Kaleshwarji Maharaj (the darkest one). Hm. Go and observe in the temple of Jagannath. Is he fair? Is he dark? He is so frighteningly black! And definitely the pictures are made dark. Whose memorial is the picture? Hm? The pictures (chitra) are a memorial of the character (charitra). When they make the picture of Vishnu in the temple actually, then Vishnu is not depicted to be dark. What? Why? Why do they do so? That form of such gathering of Brahmins has been shown where those who perform dark acts cannot even step inside. They have nothing to do with the people who steal, scoundrels and bums (luchchey-lafangey). Where? In the abode of Vishnu. Yes. The rosary of victory (vijaymala) gains victory over the vices, doesn’t it?

So, look, Vishnu is not made dark. They together became one, didn’t they? Four arms of Vishnu are depicted. So, the natures and sanskars of the four helpers became one and the one who controls them is the topmost head, the one who is called Brahma who becomes Vishnu. Now look, you go to the temple of Lakshmi-Narayan. So, he is not dark. Are Lakshmi-Narayan shown to be dark in the temples of Lakshmi-Narayan? No. But in the pictures? They have been shown to be dark in the pictures. They make them. So, they make. For example, in the big pilgrimage centers also they are dark. Look, there are pilgrimage centers here, aren’t there? Hm? They perform the pilgrimage of four Dhaams (famous Hindu temples). This Ramchandra was made dark. He was made dark in Jagannathpuri. What is the reason? Nobody can know this except you children. What do you children know? Why have they been shown to be dark? It is because their religion is very old, isn’t it? Hm? When they are very old, then they also become more tamopradhan. Those who become more satopradhan become more tamopradhan as well. So, you children know. The reason is that you can explain to everyone that why have they been made dark? What is the reason? It is because you have to definitely climb on the pyre of lust after half a Kalpa (cycle of 5000 years). Hm? Pure, satopradhan for half the time and tamopradhan (impure) for half the time. People of other religions do not become satopradhan for half the time like this. The people of other religions do not become perfect in 16 celestial degrees. Do they become? No. Nor do they become more tamopradhan.

Only those who belong to the ancient deity religion were more satopradhan. God comes and makes them alone Narayan from nar (man). People of other religions do not even listen to the knowledge. They have scriptures different from our religious scriptures. They have the sanskars since many births. It is the residents of India who keep on listening to the topics of everyone. Satya vachan maharaj (whatever you say is the gospel truth O preceptor) Thik hai kripanidhaan (It is correct O Merciful). Satya hai Dayaanidhaan (It is true O Merciful). They continue to be influenced by everyone. So then, those who become fair on the pyre of knowledge, become dark on the pyre of lust. So, now you are becoming fair by getting on to the pyre of knowledge. And you know that if you get on to the pyre of lust, you will become dark. But nobody except you knows that one becomes dark by getting on to the pyre of lust because when people of other religions come to this world, then the world exists for the pyre of lust. This topic [of purity] cannot sit in their intellect. Then the people whom you explain, understand themselves and then keep on explaining to others.

So, you understand all this at the time of explaining and why do you understand? Hm? Why do you understand all these topics? You understand to explain to others. Well, what are those people called who do understand but do not explain to others? Hm? They are called misers (kanjoos) ill-fated person (manhoos). Hm? Those who obtain the wealth of knowledge themselves, collect it, fill themselves with it and do not distribute it to others at all, topics of knowledge do not emerge from their mouth at all. Arey, if there is a wealthy person, he possesses wealth. But he doesn’t give to anyone. So, what do people of the world call him? He is ill-omened person (manhoos). He is very miser (kanjoos). Doesn’t Baba explain that brother, there are many such wealthy persons (seth). Hm? Do they explain? Don’t they explain? Arey, Baba explains about the topic of wealthy persons. They are very miser. Hm? There are such wealthy persons who have lakhs of rupees. The lakhs of that time [when Brahma Baba was alive] and the present day wealthy persons have more than crores. But they wear clothes worth pie-paise. They make their family members also wear clothes worth pie-paise. They are so miser. And if he goes to give donation to anyone; what? If anyone comes to his door to seek donation, he will not give anything. He will abuse and throw them out. And, and the poor fellow goes [dies]. What happens later on? He collects the entire wealth and dies. And the children spoil it a lot. They die leaving behind a lot of money. Such wealth gets wasted in disputes. Children fight, quarrel with each other, and spend money on courts. The money of such ill-fated ones is wasted on fights and quarrels. Everything perishes in it.

So, this is Baba’s experience, isn’t it? It is one’s own experience as well. Everything has been observed. So, you can realize whether you have knowledge. Can I explain to anyone? If I don’t have knowledge, if I cannot explain to anyone, if there is no knowledge, then it is sure that I will achieve a very low post. So, why not we study our knowledge completely, study nicely and then go. And then give to others. The more we give to others, they will become our followers. Our subjects (praja) will be formed. If we give to more, then more subjects will be formed. You will become kings of very big kingdom. So, you should give something, will you not? You will gain something good. But, no. Those who are not fated, it’s as if they listen here and it vanishes from their intellects here itself. What? For example, there are people on the path of Bhakti; they go to listen to lectures of Panditji in Bhakti; hm, they go in lakhs and as soon as they get up, they dust everything [that they have received] there itself.

When you are sitting, you should try well. And you should also follow the Shrimat. If Shrimat says – Do this, then you should do that task and show, shouldn’t you? You shouldn’t show your obstinacy. You should not put yourself in loss for no reason. So, then what will the Father do? He will observe. If I say more, then they will leave in anger. Or she may leave in anger. If she leaves in anger, then she will ruin herself. What else will they do? So, in order to ensure that someone does not ruin himself/herself, Baba Himself has to bend/bow a little. Yes, brother, keep him/her happy in any manner. They will reform tomorrow if not today. Otherwise, they will take permission and immediately run away. They will not wait to run away. Achcha, daughter bring tolii (sweets). But now there is time left for good service to happen. Kings, sanyasis will receive late. Why? Hm? It is because these sanyasis have a lot of ego of their knowledge. And the kings have a lot of knowledge (ego), position of their wealth and property. They remain intoxicated in their respect and position. So, when a big revolution occurs, when the sound [about this knowledge] spreads everywhere, then they will come late. They will not come now. So, now the word is not going to spread very soon. Has the word spread so much so far? The word must have spread to some extent till now. Has the word about your knowledge spread? Or has the defamation spread? The word about defamation has spread. The word about your knowledge hasn’t spread. So, we think that there is still some time left. Om Shanti.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2610, दिनांक 15.08.2018
VCD 2610, Dated 15.08.2018
प्रातः क्लास 25.8.1967
Morning Class dated 25.08.2018
VCD-2610-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-11.55
Time- 00.01-11.55


प्रातः क्लास चल रहा था - 25.8.1967. शुक्रवार को ग्यारहवें पेज के आदि में बात चल रही थी – बड़े-बड़े राजाएं निकलें, सन्यासी निकलें, वो अभी टाइम नहीं है। देरी से निकलेंगे क्योंकि उनके निकलने से तो बहुत रिवोल्यूशन हो जावेगा। आवाज मच जाएगी। ऐसे अभी जल्दी मचने का आवाज नहीं है। समझा ना। अभी देरी है। हँ। कितनी देरी है? हँ? अभी तो सडसठ की मुरली तो सुनी। लेकिन देरी कितनी है। मुरली में बोला है कोई के 50 वर्ष भी कम हो जावेंगे। 67 में तो वो बात ही नहीं थी। 68 के बाद शरीर छोड़ दिया ब्रह्मा बाबा ने। तो उनके वो 50 वर्ष एड किये जाते हैं। जब तक उनका सूक्षम शरीर है तब तक तो आवाज नहीं निकलेगी। अब वो सूक्ष्म शरीर भी खलास हो, ज्ञान की, अज्ञान की गलतफहमियाँ दूर हों, तो सूक्ष्म शरीर का सारा हिसाब-किताब पूरा हो। फिर बिन्दु। तो वो तो कृष्ण वाली आत्मा है नई सृष्टि की। अपना शरीर तो है नहीं। तो जरूर कोई में प्रवेश करके पार्ट बजाएगी। जिसके द्वारा क्लेरिफिकेशन मिलता है, उसी में प्रवेश करके पार्ट बजाती है। परन्तु, आत्मा का तो नाम होता नहीं। आत्मा का नाम बाला होता है क्या? फिर? शरीर का नाम बाला होता है। शरीर का नाम पड़ता है।

यही तो एक अंतर है ऊँच ते ऊँच भगवान में और मनुष्यात्माओं या देवताओं में। क्या? क्या अंतर है? कि शिव जो सदा कल्याणकारी है वो कोई भी मनुष्य मात्र में प्रवेश करेगा तो पता नहीं चलता है। और ब्रह्मा की सोल जब बीजरूप बन जाएगी तो भी पता नहीं चलेगा। लेकिन अंतर ये है कि एक शिव की आत्मा ही ऐसी है जो भल प्रवेश करती है, मुकर्रर रूप से भी प्रवेश करती है, लेकिन उसका नाम जो है वो संसार में आत्मा का बाला होता है। निराकार का। और कोई आत्मा ऐसी नहीं है संसार में जिसकी आत्मा का नाम, निराकार का नाम बाला हो। औरों को तो शरीर लेना पड़ता है। शरीर का ही नाम बाला होता है। और शिव जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं उसका भी नाम बाला तो होता है परन्तु उतना बाला नहीं हो सकता जितना निराकार शिव का नाम बाला होता है संसार में। सभी धरमपिताएं किसको मानते हैं? निराकार को मानते हैं।

तो ब्रह्मा की सोल भी भल बच्चा है ना। किसका बच्चा है? ज्ञान चन्द्रमा है ना। ज्ञान चन्द्रमा तो माँ और बाप का बच्चा है। माँ हो गई धरणी माता। बाप हो गया ज्ञान सूर्य। तो जब टोटल विनाश होता है, सारे ग्रह-उपग्रह आपस में टकराते हैं, तो बच्चा तो कहाँ जाके छिपके बैठेगा? हँ? बाप की गोद में जाके छुपता है। तो समझ जाता है ना कि बाप के सिवाय अभी संसार में रक्षा करने वाला कोई नहीं है। माँ की गोद में तो तब तक जब तक ज्ञान नहीं है पूरा। माँ से कुछ भी वर्सा नहीं मिलता। माँ से प्रोटेक्शन सीमित मिलता है। पूरा प्रोटेक्शन किससे मिलता? माँ को भी किससे प्रोटेक्शन मिलता है? बाप से मिलता है। तो ऊँच ते ऊँच बाप की तरफ बुद्धि धुर जाती है। तो परन्तु नाम बाला नहीं होता कृष्ण का संगम में। नाम किसका बाला होता है? हँ? नाम तो जिस शरीर में प्रवेश करता है उसका नाम बाला होता है। उसे कहेंगे संगमयुगी कृष्ण।

तो बुद्धि से अगर काम लो, कोई भी महात्मा अच्छा है और उनके 2-5 हज़ार शिष्य हैं। अगर वो समझा देते हैं कि नहीं, ये ब्रह्माकुमारियाँ बिल्कुल सत्य कहती हैं। क्या? कि गीता का भगवान वो निराकार है। गीता का भगवान कोई भी साकार मनुष्य मात्र या कृष्ण नहीं हो सकता। कृष्ण तो पूरा ही टोटल साकारी। तो सतयुग में प्रिंस के रूप में जन्म लेता है। और वो तो राज्य का मालिक भी नहीं है। तो भगवान कहाँ से हो गया? भगवान तो आते हैं तो नर को प्रिंस बनाते हैं क्या? नहीं। नर को सीधा नारायण बनाते हैं। इसी जन्म में नर से नारायण बनते हैं। कोई सतयुग में डायरेक्ट नर से नारायण कोई नहीं बनता। जितने भी डायनेस्टी में नारायण होंगे सतयुग में वो सब पहले प्रिंस बनेंगे और बाद में राजा-महाराजा बनेंगे। तो साबित ये हुआ कि गीता ज्ञान का जो मुखिया है, मुख्य आत्मा, वो निराकार है। और वो निराकार प्रत्यक्ष कैसे हो? जब किसी मुकर्रर रथ में प्रत्यक्ष हो तभी तो पता चलेगा।

तो पहचान क्या होगी, हँ, कि निराकार शिव इसमें काम कर रहा है परमानेन्ट्ली? क्या पहचान होगी? ज्ञान से पहचान होगी। अरे, ज्ञान तो दुनिया में बहुत कुछ सुनाते हैं लोग। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) नई-नई बातें सुनाएगा। अब ऐसे भी दुनिया में गुरु लोग होते हैं नई-नई बातें विवेकानन्द, जैसी बहुत अच्छी-अच्छी बातें बताई, लोग आकर्षित हो गए। और जितने भी धरमपिताएं आते हैं कुछ न कुछ नया ही तो सुनाते हैं। तब ही तो लोग आकर्षित होते हैं। प्रत्यक्षता तो नहीं होती। प्रत्यक्षता तो तब होती है जब निराकारी स्टेज उनकी प्रत्यक्ष होती है। जीसिस था। निराकारी स्टेज थोड़ेही थी? जब सोल ने प्रवेश किया क्राइस्ट ने तो निराकार ने प्रवेश किया तो निराकारी स्टेज हो गई। तो ऐसे ही कृष्ण कहो या दादा लेखराज कहो, उनकी आत्मा का जो स्वरूप था बड़े ढ़ेर सारे फोटो खींचे गए। लेकिन उनमें एक भी क्राइस्ट, बुद्ध, गुरु नानक की तरह निराकारी स्टेज दिखाई नहीं देती। और वो निराकारी स्टेज जब शिव बाप प्रवेश करते हैं तो ऐसी निराकारी स्टेज किसी भी धरमपिता की प्रत्यक्ष नहीं हुई। इसलिए बोला कि गोरे ते गोरा देखना हो तो इस पुरुषोत्तम संगमयुग में प्रत्यक्ष होता है। और काले से काला देखना हो तो इस संगमयुग में प्रत्यक्ष होता है। तो वो है वो निराकरी स्टेज वाला ऊँचे ते ऊँचा भगवंत जो गीता का भगवान गाया हुआ है। और उनके द्वारा ही सर्व की सद्गति होगी। (क्रमशः)

A morning class dated 25.8.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the eleventh page on Friday was – Big, big kings should emerge; Sanyasis should emerge; the time for that has not yet come. They will emerge late because a big revolution will take place when they emerge. A sound will spread. Such sound is not going to spread now. Did you understand? There is still time. Hm. How much time is left? Hm? Now you have heard the Murli dated sixty seven. But how much time is left? It has been said in the Murli – 50 years will be reduced in the case of some. That topic did not exist in sixty seven at all. Brahma Baba left his body after sixty eight. So, 50 years are added in his case. As long as his subtle body exists, the sound will not spread. Now that subtle body should also end, the misunderstandings related to knowledge and ignorance should be cleared, then the karmic accounts of the subtle body will be over. Then point. So, that is the soul of Krishna of the new world. He does not have a body of his own. So, definitely it will enter in someone and play its part. It plays a part only by entering in the one through whom clarification is received. But the soul does not become famous. Does the soul become famous? Then? The body becomes famous. The body is named.

This is the one difference between the highest on high God and human souls or deities. What? What is the difference? When that Shiv, who is forever benevolent, enters in a human being, then one cannot know. And even when the soul of Brahma becomes seed-form, then one will not know. But the difference is that Shiv’s soul is the only one, which although enters in someone, enters in permanent manner also, but the name of His incorporeal soul becomes famous in the world. There is no other soul in the world whose soul’s name, the name of the incorporeal becomes famous. Others have to take up a body. The name of their body becomes famous. And even the name of the one in whom Shiv enters in a permanent manner becomes famous but it does not become as famous as the name of incorporeal Shiv becomes famous in the world. Whom do all the founders of religions believe in? They believe in the incorporeal.

So, although Brahma’s soul is also a child, isn’t it? Whose child is it? It is the Moon of knowledge, isn’t it? The Moon of knowledge is the child of the Mother and the Father, isn’t it? The Mother is the Mother Earth. The Father is the Sun of Knowledge. So, when total destruction takes place, when all the planets and satellites clash with each other, then where will the child hide? Hm? He goes and hides in the lap of the Father. So, it is understood that there is no one other than the Father who could protect in the world now. He remains in the mother’s lap as long as he does not have the complete knowledge. One does not get any inheritance from the mother. One gets limited protection from the mother. From whom does he get complete protection? From whom does even the mother get protection? She gets it from the Father. So, the intellect is diverted towards the highest on high Father. So, but the name of Krishna does not become famous in the Confluence Age. Whose name becomes famous? Hm? The name of the one in whose body he (soul of Krishna) enters becomes famous. He will be called the Confluence Age Krishna.

So, if you use your intellect; if there is a good mahatma (saint) and if he has 2-5 thousand disciples, if he explains that no, these Brahmakumaris speak the truth; what? That the God of Gita is that incorporeal. No corporeal human being or Krishna can be the God of Gita. Krishna is totally corporeal. So, he gets birth as a Prince in the Golden Age. And he is not even the master of the kingdom. So, how can he be God? When God comes, does He transform a man to a Prince? No. He transforms a man directly to Narayan. We become Narayan from nar (man) in this very birth. Nobody becomes direct Narayan from nar (man) in the Golden Age. All the Narayans who will exist in the Golden Age will become Prince first and then become Kings or Emperors (Raja-Maharaja). So, it is proved that the chief, the chief soul of the knowledge of the Gita is that incorporeal. And how will that incorporeal be revealed? It will be known only when He is revealed in a permanent Chariot.

So, what will be the indication that incorporeal Shiv is working in this one permanently? What will be the indication? The indication will be through knowledge. Arey, many people narrate lot of knowledge in the world. Hm?
(Someone said something.) He will narrate newer topics. Well, there are such gurus like Vivekananda also in the world who narrated new topics, many nice topics and people were attracted. And all the founders of religions who come, they too narrate something or the other new only. Only then are people attracted to them. But revelation does not take place. Revelation takes place when their incorporeal stage is revealed. There was Jesus. Did he have an incorporeal stage? When the soul of Christ entered, when the incorporeal entered then the incorporeal stage was developed. So, similarly call him Krishna or Dada Lekhraj, the form of his soul; a lot of his photos were clicked. But not even a single one of them appears to be in an incorporeal stage like Christ, Buddha, Guru Nanak. And when Father Shiv enters then that incorporeal stage; no founder of religion was revealed with such incorporeal stage. This is why it was said that if you wish to see the fairest one, then he is revealed in this elevated Confluence Age (Purushottam Sangamyug) and if you want to see the darkest one, then he is revealed in this Confluence Age. So, He is the highest on high God with incorporeal stage who is sung as the God of Gita. And it is through him that everyone will achieve true salvation (sadgati). (Continued)
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 09 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2610, दिनांक 15.08.2018
VCD 2610, Dated 15.08.2018
प्रातः क्लास 25.8.1967
Morning Class dated 25.8.1967
VCD-2610-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 11.56-27.47
Time- 11.56-27.47


तो ऐसे-ऐसे गुरु लोग कहेंगे तो सबसे बड़ा गुरु कौन हुआ फिर? कि उन गुरुओं के द्वारा ही प्रत्यक्षता होगी? हँ? वो गुरु तो कलियुगी गुरु हैं। हँ? ऊँच ते ऊँच तो सतयुग होता है। सतयुग में, सतयुग में कहाँ से शंकर आ गया? शंकर तो तब कहते हैं जबकि आत्माओँ का संकरण हो। संगमयुग है ऊँच ते ऊँच। तो ऊँच ते ऊँच संगमयुग में ऊँच ते ऊँच गुरु कौन है देहधारी? नारायण तो गुरु बनता ही नहीं। नारायण तो विष्णु कहा जाता है। गुरु तो देहधारी होते हैं। देह में बुद्धि धरी हुई होती है। स्वार्थी होते हैं। तो इस दुनिया का बड़े ते बड़ा गुरु कौन हुआ? परमब्रह्म गुरु हुआ? परमब्रह्म गुरु हुआ। लेकिन परमब्रह्म तो शिव बाप की, शिव बाप का रथ है। हँ? वो तो निराकार स्वयं ही है। वो तो परमब्रह्म भी है तो बाप भी है। बड़ा ब्रह्मा, बड़ा अम्मा भी है बड़े ते बड़ी, तो बड़े ते बड़ा बाप नहीं है? बाप भी है। उसकी तो बात ही छोड़ो। वो क्या साकारी स्टेज में होगा? देहभान की स्टेज में रहेगा? तो गुरु कहेंगे? देहधारी धरमगुरु? (किसी ने कुछ कहा।) साक्षात् परमात्मा देहधारी धरमगुरु है? देह धारण करता है परमब्रह्म? परमब्रह्म देह धारण करता है? अरे, उसकी बुद्धि देह में धरी रहती है? हँ? जिसके लिए बोला गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुर्साक्षात् परमब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नमः। उसी को नमन करना चाहिए, झुकना चाहिए। तो किसको झुकेंगे? देह में जिनकी बुद्धि धरी रहती है उन देहधारी गुरुओं को झुकेंगे? हँ? वो तो ऊँच ते ऊँच सद्गुरु हो गया। फिर?

देहधारी गुरुओं में सबसे बड़ा गुरु कौन?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ। ब्रह्मा बाबा। सबसे पावरफुल। वो चाहे तो जिस गुरु में प्रवेश करके उसको उठा सकता है। तो वो गुरु उस समय कहने लग पड़ेंगे हम गुरु नहीं हैं। गीता का भगवान वो निराकार है जो सर्व की सद्गति करने वाला है। हम तो अपनी भी सद्गति नहीं कर पाए तो अपने फालोअर्स की भी सद्गति नहीं कर पाए। वो बोलेंगे हम किसी की भी सद्गति नहीं कर सकते हैं। क्या? देवात्माएं भी हैं इस दुनिया में। सत्य सनातन धर्म के फालोअर्स हैं। ऋषि-मुनियों की आत्माएं भी हैं। वो भी कलियुग में आके नीचे गिर जाती हैं। और मनुष्यात्माएं भी हैं। वो बहुत भूलें करती हैं, बहुत विकारी हैं। और राक्षस तो हैं ही हैं विकारी, दुखदायी। लेकिन इन सबकी सद्गति करने वाला वो एक ही है जो निराकारी स्टेज में रहता है। खास संगमयुग में प्रत्यक्ष होता है। जो देखे, जो सुने, दो शब्द भी सुने, तो उसके मुँह से निकले हमारा बाप आ गया। ऊँच ते ऊँच बाप। तो वो सद्गति दाता एक ही है। वो ही सद्गुरु है। इसलिए तो सिक्खों में गाते हैं सबका सद्गुरु एक भगवान। एक सद्गुरु को मानते हैं। बाकि गुरु हो गए झूठे। जब है ही एक सद्गुरू तो बाकि तो कोई को गुरु कह ही नहीं सकते। गुरु उसे कहा जाता है जो मुक्ति-जीवनमुक्ति का रास्ता दिखाए।

समझा ना। अगर ऐसे कह देवें कोई भी बड़े महात्मा, सन्यासी, जिनके 2-5 हज़ार शिष्य हों, तो अखबार में पड़ जावेगा बड़े आदमियों का। थरथल्ला मच जावेगा; हो हल्ला मच जावेगा। फिर ब्रह्माकुमारियों का वो रुतबा होगा। परन्तु आहिस्ते-आहिस्ते, धीरे-धीरे होगा बच्ची। अभी नहीं होगा। अच्छा चलो, सन्मुख रहते हैं ना बच्ची। किसको बीमारी-शीमारी है, चलो। उस बीमारी-शीमारी में थोड़ी महसूसता आ जाती है कि हाँ, भगवान आया हुआ है। उसी ने हमको सहयोग किया। बाकि जब बैठे हैं ज्ञान में चलते हैं तो ज्ञान में चलने वालों को तो अन्दर में बहुत खुशी होनी चाहिए ना। वो देखने में आता है ये खुशी में आकर कैसे-कैसे समझाते हैं। कितना अच्छा समझाते हैं। और उन सर्विस करने वालों को फिर सर्विस के बगैर आराम ही नहीं आवेगा। कई तो ऐसे-ऐसे बच्चे हैं बाबा के पास। स्टूडेन्ट्स को टीचर भी तो ऐसे अच्छे-अच्छे चाहिए ना। और स्टूडेन्ट भी चाहिए। उन स्टूडेन्ट्स से कहें अरे पढ़ो, अच्छी तरह से गैलप करो। और गैलप करके पास विद आनर हो जाओ।

वहाँ तो उस दुनिया में पास विद आनर की सर्टिफिकेट मिलती है ना। और वो क्या बोलते हो? पेंशन। स्कॉलरशिप याद आया। क्या बोलते हैं स्कॉलरशिप? हाँ। पास विद आनर्स को बड़ी अच्छी स्कॉलरशिप मिलती है। अब ये तो पता नहीं है कितने समय के लिए मिलती है। हँ? अच्छा बेहद में तो पता है? जो पास विद आनर्स होते हैं उनको कितने समय के लिए स्कॉलरशिप मिलती है? ये बाबा को तो मालूम नहीं होता। न हद का मालूम है, हद के स्टूडेन्ट्स का मालूम है स्कॉलरशिप लेने वालों का और न बेहद का मालूम है। परन्तु पढ़ाई की स्कॉलरशिप मिलती तो है। तो तुमको पता है? कितनी स्कॉलरशिप मिलती है? कितने समय के लिए? समय बताओ। हँ? बताओ।
(किसी ने कुछ कहा।) 18-20 साल की स्कॉलरशिप मिलती है? अच्छा वो तो हो गई हद की। बेहद में? अगर रिसर्च स्टूडेन्ट रहेंगे 18-20 साल तो उनको मिलेगी। और बेहद में? (किसी ने कुछ कहा।) 10 से 50 साल स्कॉलरशिप मिलती है? 40 साल मिलती है? अरे, बेहद ब्रॉड ड्रामा में कितनी मिलेगी? (किसी ने कुछ कहा।) जबसे 8 प्रत्यक्ष होते हैं। वो 8 कोई इकट्ठे थोड़ेही प्रत्यक्ष होते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, 21 जनम की स्कॉलरशिप तो सारे ही 8-10 करोड़ को मिलेगी। वो क्या नाम 9 लाख को मिलेगी। वो क्या बड़ी बात? वो कोई स्कॉलरशिप लेने वाले होंगे? वो 9 लाख तो सारे ही प्रजा हो गए। उसमें थोड़े से अधिकारी हैं जिनमें स्कॉलरशिप लेने वाले भी हैं। (किसी ने कुछ कहा।) 84 जनम की तो किसी को नहीं मिलती। 84 जनम की मिलेगी तो फिर वो पतित ही नहीं बनेंगे तो पावन कैसे बनेंगे? तो पूरे पतित बनें, पतितपने का ग्रहण लगने के लिए एक जनम चाहिए कि नहीं चाहिए? भले कोई का एक्स्ट्राआर्डिनेरी जनम मिलता है। क्योंकि इस संगमयुग में कोई-कोई के दो-तीन जनम भी होते हैं। हँ?

कितनी स्कॉलरशिप बताई?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, कोई-कोई हैं जिनके लिए बोला है मुरली में 82-83 जनम भी स्कॉलरशिप मिलती है। अरे! विलायत से भी स्कॉलरशिप आती है। क्या? जो विलायती लोग हैं, कौन से धरम के हैं? इस्लामी, क्रिश्चियन ये सारा विलायत ही तो है। तो वो लोग भी सहयोगी बनते रहते हैं स्कॉलरशिप देने के लिए। परन्तु तुम लोगों को तो इन विलायत वालों की, मनुष्यों की, स्कॉलरशिप लेने की दरकार ही नहीं है। तुम तो ब्राह्मण हो। ब्रह्मा की औलाद हो। ब्रह्मा के तन में तो बाप आते हैं। बाप से ऊँची स्कॉलरशिप और कौन देगा? इस जनम तुमको जो बाप से स्कॉलरशिप मिलती है विश्व की बादशाही की वो तो और कोई दे ही नहीं सकता। तुमको कोई दरकार नहीं है उन विलायत वालों से कुछ भी लेने की। तुमको तो, तुम बच्चों को तो पक्का है कि 21 जन्म के लिए तो स्वर्ग की स्कॉलरशिप सबको मिलनी है। क्या? जो भी ज्ञान में चलते हैं, विलायत माने दूसरे धर्म के लोग, धर्मखण्ड, वो सब विलायत ही तो हो गए। अमेरिका है, विलायत है, यूरोप है, विलायत है।

तो कोई तो एक स्कॉलरशिप नहीं है। स्कॉलरशिप तो बहुत प्रकार की हैं। बहुत ही स्कॉलशिप्स हैं। हैं ना। डायनेस्टी में जाना ये बड़ी स्कॉलरशिप है। अव्वल नंबर डिनायस्टी, दोयम नंबर, किंग एडवर्ड दि फर्स्ट, सेकण्ड, थर्ड। ये सब स्कॉलरशिप हैं ना लेने वाले नंबरवार। वो हद की दुनिया में भी और यहाँ ब्राह्मणों की दुनिया में भी। सो भी जल्दी। ऐसे नहीं समझना कि अच्छा हम पिछाड़ी में जाकरके त्रेता के अंत में ताज-तख्त ले लेंगे। कोट-पतलून ले लेंगे। नहीं। पिछाड़ी में ताज मत्थे पे उतारे और फिर खुद भी उतर जाते हैं सबको ही नीचे उतार देते हैं। उससे क्या फायदा है? तो पिछाड़ी की स्कॉलरशिप नहीं लेना। क्या? सतयुग में? कौनसे धरम वाले लेते हैं पिछाड़ी की स्कॉलरशिप? खुद भी उतर जाते हैं और सारी दुनिया में किसी को भी राज्य करने ही नहीं देते। टोटल खेल खलास। तो उससे कोई फायदा नहीं। कौन है पता है?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ, आर्य समाजी, हाँ। अच्छा, मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। ओमशान्ति। आज तो 15 अगस्त है।

So, the Gurus will say like this. So, who is the biggest Guru then? Will the revelation take place through those Gurus only? Hm? Those Gurus are Iron-Aged Gurus. Hm? The highest on high is Golden Age. How did Shankar emerge in the Golden Age? Shankar is said to exist when there is a mixture (sankaran) of souls. Confluence Age is the highest on high. So, who is the highest on high bodily Guru in the highest on high Confluence Age? Narayan does not become a Guru at all. Narayan is called Vishnu. Gurus are bodily beings. Their intellect is focused in the body. They are selfish. So, who is the biggest Guru of this world? Is Parambrahm the Guru? Parambrahm is the Guru. But Parambrahm is Father Shiv's Chariot. Hm? He is Himself incorporeal. He is Parambrahm as well as the Father. He is the senior Brahma, senior mother also, the senior most one; so is he not the senior most Father? He is the [senior most] Father as well. Leave aside his topic. Will he be in a corporeal stage? Will he be in a stage of body consciousness? So, will he be called a guru? A bodily religious guru?
(Someone said something.) Is the practical Supreme Soul himself a bodily religious guru? Does Parambrahm assume a body? Does Parambrahm assume a body? Arey, does his intellect remain engrossed in the body? Hm? For him it has been said - Gururubrahma Gururvishnu Gururdevo Maheshwarah. Gurursaakshaat Parambrahm tasmaishri guruve namah. One should bow only before him. So, before whom will you bow? Will you bow before the bodily religious gurus whose intellect remains engrossed in the body? Hm? He is the highest on high Sadguru. Then?

Who is the biggest Guru among the bodily religious gurus?
(Someone said something.) Hm. Brahma Baba. Most powerful. If he wishes, he can enter in any guru and uplift him. So, at that time those gurus will start telling that we are not gurus. The God of Gita is that incorporeal who causes true salvation of everyone. We could not cause sadgati of even ourself, and we couldn't cause sadgati of our followers as well. They will say that we cannot cause the sadgati of anyone. What? There are deity souls also in this world. There are followers of true Sanatan Dharma. There are souls of sages and saints as well. They also suffer downfall after coming to the Iron Age. And there are human souls as well. They commit a lot of mistakes; they are very vicious. And the demons are anyways vicious and cause sorrows. But the one who cause sadgati of all these is that one who remains in an incorporeal stage. He is revealed especially in the Confluence Age. Whoever sees, whoever listens, even if he listens to two words, it should emerge from his mouth that our Father has come. The highest on high Father. So, that bestower of true salvation (sadgatidaataa) is only one. He Himself is the Sadguru. This is why it is sung among the Sikhs that everyone's Sadguru is one God. They believe in one Sadguru. All other Gurus are false. When there is only one Sadguru, then nobody else can be called a guru. Guru is said to be the one who shows the path of mukti (liberation) and jeevanmukti (liberation in life).

Did you understand? If any big saint (mahatma), sanyasi, who has 2-5 thousand disciples, says like this, then the statements of big personalities will be published in the newspapers. A big uproar will take place. Then the Brahmakumaris will have that position (rutbaa). But daughter it will happen gradually. It will not happen now. Okay, you remain face to face, don't you daughter? Someone is suffering from illness, etc. In that illness, they get some feeling that yes, God has come. He Himself helped me. But when they are sitting, when they are treading the path of knowledge, then those who follow the path of knowledge should feel very happy, shouldn't they? It is visible that they happily explain in such and such way. They explain so nicely. And those who do service will feel restless without service. Baba has many such children. Students require such nice teachers, don't they? And [such] students are also required. If you tell those students - Arey, study, gallop well. Gallop and pass with honour.

There in that world you get the certificate of pass with honour, don't you? And what do you call it? Pension. You recollected - Scholarship. What do they call it? Scholarship? Yes. Those who pass with honours get a nice scholarship. Well, it is not known as to how long they get it. Hm? Achcha, do you know in an unlimited sense? How long do those who pass with honours in an unlimited sense get the scholarship? This Baba does not know. Neither does he know in a limited sense, about the limited students who obtain scholarship nor does he know in an unlimited sense. But one does get scholarship for studies. So, do you know? How much scholarship do you get? Achcha, that is in a limited sense. Hm? Speak up.
(Someone said something.) Do they get scholarship for 18-20 years? Achcha, that is a limited one. In an unlimited sense? If they remain a research student, they will get for 18-20 years. And in an unlimited sense? (Someone said something.) Do they get a scholarship for 10 to 15 years? Do they get for 40 years? Arey, how much will they get in the unlimited broad drama? (Someone said something) Ever since eight get revealed. Do those eight get revealed simultaneously? (Someone said something.) Yes, all the 8-10 crores will get scholarship for 21 births. It will be received by nine lakhs. Is that a big deal? Are they the ones who obtain scholarship? All those 9 lakhs are subjects. Among them some are officers including those who obtain scholarship. (Someone said something.) Nobody gets for 84 births. If they get for 84 births, then they will not become sinful at all; then how will they become pure? So, they should become completely sinful; is one birth required for them to be eclipsed by sinfulness or not? Although someone gets an extraordinary birth because some get two-three births in this Confluence Age. Hm?

How much scholarship was mentioned?
(Someone said something.) Yes, there are some, for whom it has been said in the Murli that they get scholarship even for 82-83 births. Arey! They get scholarship from abroad as well. What? To which religion do the foreigners belong? All these Islamic people, Christians are from abroad only, are they not? So, those people also keep on becoming helpful in giving scholarship. But you people need not take scholarship from these foreigners, these people. You are Brahmins. You are Brahma's children. The Father comes in the body of Brahma. Who will give a scholarship higher than that the Father gives? Nobody can give you the scholarship of the emperorship of the world that you get in this birth from the Father. You need not take anything from those foreigners. It is sure for you, for you children that you all are to get scholarship of heaven for 21 births. What? All those who tread the path of knowledge; foreign (vilaayat) means the people of other religions; other religious lands are foreign only. There is America, it is foreign; there is Europe, it is foreign.

So, there is not one scholarship. There are many kinds of scholarships. There are many scholarships. Are there not? To be part of the dynasty is a big scholarship. Number one dynasty, second number, King Edward the first, second, third. All these are the ones who obtain numberwise scholarships. In that limited world also and here in the world of Brahmins also. That too early. Do not think that okay we will obtain crown and throne (taaj-takht) later in the end of the Silver Age. We will obtain coat and patloon (pantaloon). No. In the end, they take down the crown from the head and then get down (abdicate the throne) themselves; they make everyone abdicate. What is the use? So, do not obtain the scholarship of the end. What? In the Golden Age? People of which religion obtain the scholarship of the end? They abdicate [the throne] themselves and then they do not allow anyone to rule in the entire world. The total drama ends. So, there is no use of it. Do you know who is it?
(Someone said something.) Hm, Arya Samaji, yes. Achcha, remembrance, love and good morning of the spiritual Father and Dada to the sweet-sweet, seekiladhey (long lost and now found) children. Om Shanti. Today is 15th August.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2611, दिनांक 16.08.2018
VCD 2611, Dated 16.08.2018
रात्रि क्लास 25.8.1967
Night Class dated 25.8.1967
VCD-2611-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.20
Time- 00.01-15.20


आज का रात्रि क्लास है - 25.8.1967. स्थापना हो रही है। और अवश्य होनी है। कोई-कोई बच्चों को संशय आ रहा है, इतने बखेड़े पड़ रहे हैं, झगड़े-टंटे, कैसे स्थापना होगी? वो भी नई राजधानी की। बाबा आथत देते हैं। अवश्य होनी है। और ये निश्चय है कि स्थापना अवश्य होनी है तो अन्दर में खुशी होनी चाहिए कि मोहरा लटक जाना चाहिए? क्योंकि ये तो निश्चय की बात है। माया निश्चय की परीक्षा लेती है। जानते हो कि बादशाही तो जरूर स्थापन होनी है। बाकि क्या करें? बादशाही में जाने लायक पुरुषार्थ करना है। राजा बनना है ना। राजा तो स्वतंत्र होते हैं। उनके ऊपर तो कंट्रोल करने वाला कोई होता नहीं। अभी तो दुनिया में प्रजा के ऊपर प्रजा का राज्य है। राजा कोई है नहीं। इसलिए नई बात हो गई ना। तो उसके लिए पुरुषार्थ करना है। पीछे यहाँ पुरुषार्थ करें या वहाँ कांटों के जंगल में जाके पुरुषार्थ करें क्योंकि वो दुनिया तो कांटों का जंगल है ना।

बाबा ने बीच में बोल के कहा – अरे, फिर क्या हुआ? कोई नई पार्टी आ गई। अरे हम, हम बैठे हैं बच्चे। तो बैठो-3. वास्तव में ये बगीचा भल छोटा है, और ये नया है बिल्कुल। फिर भी बगीचा तो है ना बच्ची। अब इस ब्राह्मण के बगीचे में ट्रांसफर होना है। कहाँ? ब्राह्मणों को ट्रांसफर होना है देवताओं के बगीचे में। और देवताएं तो यहाँ हैं नहीं। पर देवता तो बन रहे हो ना यहाँ। देवता किसे कहा जाता है? देवता में, लेवता में अंतर है ना। देवता सबको देंगे या कोई को देंगे, कोई को नहीं देंगे? विरोधियों को? विरोधियों को भी देंगे। निंदा करने वालों को भी देंगे। तो ऐसे देवता बने हो? बन रहे हो। मनुष्य से देवता बन रहे हो। मनुष्य से क्यों टैली कर दिया? हँ? क्योंकि मनुष्य जो होता है, विरोधी सामने आता है तो दिमाग चलने लग पड़ता है। देवताएं तो हैं बिन्दु, आत्मिक स्मृति में सदा रहने वाले। कोई मन चलायमान नहीं होता। ये ऐसा है, वो वैसा है, तो हम ऐसे कैसे करें, वैसे कैसे करें? तो तुम अभी मनुष्य से देवता बन रहे हो।

तो ये अगर यहाँ रहना, और फिर अगर बाहर की सर्विस नहीं की है तो बाहर सर्विस न करने से तो अच्छा यहाँ रहें। यहाँ रहना फिर अच्छा है। वो बाहर सर्विस न करेंगे तो डिससर्विस ही करेंगे। तो फिर यहीं रहें। नहीं तो अगर बाहर की सर्विस कर सकते हैं, तब तो बहुत अच्छा है। किसका न किसका जाके कल्याण करें। नहीं करते हैं तो यहाँ बहुत अच्छा है। सन्मुख में बैठें। और यहाँ सन्मुख में आने के लिए तो देखो कहाँ-कहाँ से, दूर-दूर से आना पड़ता है। और ऐसे बहुत आते हैं। तो दिल है, उनकी दिल होती है तो हम जावें बाबा के पास कुछ न कुछ वक्त तो रहकरके जावें। परन्तु बिचारे जास्ती दिन रह नहीं सकते हैं। परन्तु यहाँ तो इसको कहा जाएगा कि अपरमअपार खुशी बच्चों के लिए क्योंकि बाहर की दुनिया में भागते हैं, बुद्धि में धंधा-धोरी रहता है। और बाप के पास तो दुनियावी धंधा तो कोई है ही नहीं। तो जो बाप के पास बैठे हैं वो बाबा के ही बच्चे हैं ना।

तो अपरमअपार खुशी है बच्चों के लिए कि हमारी तो राजधानी स्थापन हो रही है। जरूर स्थापन हो रही है। भगवान आया हुआ है। जिसका साथी है भगवान उसको क्या रोके आंधी और क्या रोके तूफान। राजधानी तो जरूर स्थापन होगी। तो जिन बच्चों को ये निश्चय है कि हम विश्व के मालिक बनते हैं क्योंकि वहाँ तो यथा राजा तथा प्रजा होगी ना। तो राजा ही समझेगा हम विश्व के मालिक हैं? नहीं। जैसे परिवार होता है। तो बड़े परिवार में बच्चा कहेगा ये दुकान हमारी है। हमारे बाप की है। ये कारखाना हमारा है। ऐसे थोड़ेही कहेगा - ये कारखाना हमारे बाप का है, हमारा नहीं है। ऐसे तो नहीं कहेगा। तो अपनापन महसूस होता है ना। ऐसे तो नहीं कि आज की प्रजातंत्र गोर्मेन्ट में अपनापन महसूस होगा। नहीं। यहाँ थोड़ेही कह सकते हैं यथा राजा तथा प्रजा? बहुत अंतर है।

तो देखो तुम्हारी बुद्धि में रहता है हम विश्व के मालिक बनते हैं। तो उनसे बढ़करके और क्या चाहिए? इससे बढ़कर और खुशी कोई होती है? दुनिया में इतने बड़े-बड़े महत्वाकांक्षी आए, हिटलर, नेपोलियन, कोई भी विश्व के मालिक नहीं बन सके। कितनी मेहनत की। टांय-टांय फिस्स। निकला कुछ भी नहीं। और तुमको तो पक्का निश्चय है हम विश्व के मालिक बने कि बने। बाकि बाबा कहते हैं पुरुषार्थ करके विश्व की राजधानी में आओ। सूर्यवंशी राजधानी में आना है ना। विश्व की राजधानी। कोई एक देश की राजधानी नहीं कि सिर्फ भारत की राजधानी दिल्ली। नहीं। सारे विश्व की राजधानी दिल्ली बनेगी। तो फिर इतना नशा चाहिए। पुरुषार्थ करके अपना ऊँचा पद पाना चाहिए ना। और फिर तकलीफ तो कोई नहीं है। कोई तकलीफ है बच्चे? हाँ, अपनी-अपनी बुद्धि की तकलीफ है। कोई की बुद्धि में बैठ गया निश्चय ज्ञान के आधार पर, बाप का पक्का निश्चय कर लिया कि हमको सुप्रीम सोल गॉड फादर मिला, हैविनली गॉड फादर। कोई तो अपनी बुद्धि इधर लगाते हैं कोई की नहीं लगाई जाती है। ऐसे तो दुनिया में बहुत हैं। तुम किसके भी पास जाओ।

आगे चलके देखेंगे जब ये थोड़ा महत्व बढ़ जाएगा ना बच्चों का और सबको मालूम हो जाएगा कि तुम कोई कार्ड अन्दर भेजेंगी, ब्रह्माकुमारी फलानी आई है, तो जरूर वो अपनी कुर्सी से उठकर तुमको दर पर आएंगे, दरवाज़े पर रिसीव करने के लिए। क्योंकि तुम बच्चियाँ हो कोई का भी जीवन हीरे समान बनाने वाली। तो जैसे-जैसे ये अपना, ये अपना ज्ञान का विस्तार बढ़ता जावेगा बड़े-बड़े सेन्टरों में, ये दिल्ली जैसे शहर में, बड़े-बड़े म्यूजियम खुल जावेंगे। और वहाँ अच्छी तरह से लिखेंगे, बड़े-बड़े आदमी भी लिखेंगे कि भारत को फिर से स्वर्ग की बादशाही मिल रही है। अथवा भारत को विश्व की बादशाही मिल रही है। ये भी बुद्धि में बैठेगा कि पहले भी मिली थी और अभी फिर से मिल रही है। क्योंकि ये तो तुम बच्चे सभी जानते हैं – बाबा ने बीच में उठकरके कहा – अरे, फिर जाती हो? भारत। बैठे। भारत को विश्व की बादशाही 5000 साल पहले मिसल कैसे मिल रही है ये कोई का लिखना कम नहीं है ये लिखत। जो लिख कर जाते, तो उस लिखत को देखकरके सब खुशी होंगे। और ये होगी खुशी की अनाउन्समेन्ट या कहो गॉडली अनाउन्समेन्ट कि भारत को फिर से सतयुगी विश्व की बादशाही मिल रही है क्योंकि सतयुग में तो होती ही है विश्व की बादशाही।

Today’s night class is dated 25.8.1967. Establishment is taking place. And it is definitely going to take place. Some children doubt; so many obstacles are being created; fights and quarrels are taking place. Then how will establishment take place? That too of the new kingdom. Baba gives solace. It is bound to happen. And you have the faith that establishment is bound to happen; so, should there be happiness inside or should the face droop? It is because this is a topic of faith. Maya tests your faith. You know that establishment is bound to take place. But what should we do? We have to make purusharth worthy of going to the emperorship. You have to become a king, will you not? Kings are independent. There is no controller over them. Now there is a rule of subjects over subjects in the world. There is no king. This is why it is a new topic, isn’t it? So, we have to make purusharth for that. Later on we should make purusharth either here or by going to that jungle of thorns because that world is a jungle of thorns, isn’t it?

Baba interrupted to say – Arey, then what? A new party has arrived. Arey, children, I am sitting. So, sit, sit, sit. Actually, although this garden is small and this is completely new. Yet it is a garden, isn’t it daughter. Now we have to be transferred to this garden of Brahmins. Where? Brahmins have to get transferred to the gardens of deities. And deities do not exist here. But you are becoming deities here, aren’t you? Who is called a deity? There is a difference between a devata (deity or giver) and levata (seeker), isn’t it? Will deities give to everyone or will they give to some and not give to someone else? To the opponents? They will give to the opponents also. They will give even to those who defame. So, have you become such a deity? You are becoming. You are becoming deities from human beings. Why did He tally with the human beings? Hm? It is because whenever an opponent comes in front of a human being, then the intellect starts working. Deities are a point; they always remain in soul consciousness. The mind does not become inconstant. This one is like this, that one is like that; so, how can we do like this; how can we do like that? So, now you are becoming deities from human beings.

So, if you live here and if you have not done service outside, so, if you do not do any service outside, then it is better to live here. It is better to live here. If they do not do service outside, then they will do disservice only. So, then they should live here only. Otherwise, it is very good if you can do service outside. You should go and cause benefit to someone or the other. If you don’t do, then it is very good here. Sit face to face (sanmukh). And look, in order to come face to face you have to come from such and such place, from distant places. And many such persons come. So, they feel – We should go to meet Baba. Let us stay for some time and go. But poor fellows cannot live for more days. But here this is called unlimited joy for the children because when you run to the outside world, then the intellect remains occupied with business and occupation. And the Father does not have any other worldly business at all. So, those who are sitting with the Father are Baba’s children only, aren’t they?

So, children have immeasurable joy that a kingdom is being established for us. It is definitely being established. God has come. How can storms and cyclones stop the one whose companion is God? The kingdom will definitely be established. So, those children who have this faith that we are going to become the masters of the world because there as is the king, so shall be the subjects, will they not be? So, will the king alone think that I am a master of the world? No. For example, there is a family. So, in a big family the child will say that this shop is mine. It belongs to our Father. This factory is ours. He will not say that this factory belongs to my Father and not me. He will not say like this. So, there is a sense of belonging, isn’t it? It is not like today’s democratic government where one does not have the feeling of belongingness. No. Can you say here – As is the king, so are the subjects? There is a lot of difference.

So, look your intellect remains aware that we become the masters of the word. So, what else do you want? Is there any joy greater than this? So many big ambitious people came in the world like Hitler, Napoleon; nobody could become the masters of the world. They worked so hard. It went down the drain. Nothing emerged out of it. And you have firm faith that we are about to become the masters of the world. Baba says - You should make purusharth and come in the world's capital (raajdhaani). You have to come in the Suryavanshi capital, will you not? The world's capital. Not the capital of any one country that it is the capital Delhi of just India. No. Delhi will become the capital of the entire world. So, then you should have so much intoxication. You should make purusharth and achieve a high post, should you not? And then there is no difficulty. Is there any difficulty children? Yes, it is the difficulty of individual intellects. Some developed faith in their intellect on the basis of knowledge; they developed firm faith on the Father that we have found the Supreme Soul God Father, Heavenly God Father. Some focus their intellect here; some are unable to focus. There are many such persons in the world. You may go to anyone.

You will see in future that when the importance of the children increases a little and everyone comes to know [about you], then if you send your card to someone inside conveying that a particular Brahmakumari has come, then definitely he/she will get up from his chair and come to the door to receive you because you daughters are the ones who make anyone's life like a diamond. So, as and when our knowledge starts spreading in big centers, in cities like Delhi, then big museums will open. And there people will write nicely; big personalities will also write that India is once again get the emperorship of heaven. Or India is getting the emperorship of the world. It will also sit in the intellect that it was received in the past also and it is being received once again now because you all children know; Baba got up in between and said - Arey, where are you going? Bhaarat. He sat. It is not any less if anyone writes that how India is getting the emperorship of the world like 5000 years ago. If they write like this and go, then everyone will be happy on seeing that write-up. And this will be a joyful announcement or you may call it a Godly announcement that India is once again getting the emperorship of the Golden Age world because in the Golden Age there is only world emperorship.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 14 Sep 2020

VCD-2612-English
VCD-2612-English.pdf
(277.35 KiB) Not downloaded yet
शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2612, दिनांक 17.08.2018
प्रातः क्लास 26.8.1967
VCD-2612-extracts-Hindi

समय- 00.01-15.35


आज का प्रातः क्लास है - 26.8.1967. रिकार्ड चला है – दुनिया रंग-रंगीली बाबा, दुनिया रंग-रंगीली। क्या? कौन-कौनसे रंग की है? हँ? अरे, सफेद भी है, कोई काला भी है, कोई एकदम गहरा काला, कोई एकदम गहरा सफेद, कोई एकदम पीला है, कोई लाल है। कितने रंग होते हैं? सात रंग होते हैं। और सातों रंगों को मिला दो तो कितने रंग होते हैं? एक रंग होता है। कौनसा? काला रंग होता है। चलो। तो ये काले रंग का कौन है? हँ? निजात काले रंग का, फिर निजात गोरे रंग का कौन है दुनिया में? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। हँ? प्रजापिता पतित का नाम है तो कहता है गोरा है। सब उल्टा ही उठाता है। छी। प्रजापिता पतित नहीं है? (किसी ने कुछ कहा।) कृष्ण? लो। उन्हें कृष्ण दिखाई पड़ रहा है। (किसी ने कुछ कहा।) काली? हँ? क्या पूछा सो याद रहा? क्या याद रहा? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, सफेद नंबरवन कौन? नंबरवन क्या? नंबर तो उसमें हो ही नहीं सकता। हँ? एवर सफेद कौन? और एवर काला कौन? हँ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। एवर सफेद है शिव बाबा। हँ? अगर कहें शिव तो उसको तो टैली ही नहीं किया जा सकता किसी से। शिव को किसी रंग से टैली कर सकते हैं? नहीं। वो जब आता है तो पता चलता है ये एवर सफेद है, एवर प्योर है। उसके मुकाबले और इस दुनिया में कोई एवर प्योर नहीं होता। जिसमें प्रवेश करता है वो भी? सदा काल एवरप्योर होता है क्या? नहीं होता है।

तो, अब दूसरा नंबर क्या बताया, पूछा? एवर काला कौन है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, एवर काला जो है, वो वो ही है जिसमें वो प्रवेश करता है। क्या सदा एवर काला है? हँ? सदा एवर काला नहीं है। तो कितने टाइम के लिए एवर काला है? और कितने टाइम के लिए एवर सफेद है? हँ? 40 से 50 वर्ष सिर्फ काला है? कौनसे 40 से 50? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 1976 से 2019 तक काला है? एवर काला। माना 76 में नारायण का जन्म नहीं हुआ? आत्मा ही का तो बात पूछ रहे हैं और क्या? जो पूछ रहे हैं सो देह की बात समझ रहे हो? सब कुछ आत्मा ही तो पूछ रहे हैं। हँ? बेहद की दुनिया में बैठे हो कि हद की दुनिया में? देह की दुनिया में बैठे कि आत्मलोक की दुनिया में? हँ? शिवबाबा आत्मा देखते हैं या देह देखते हैं?

हाँ, तो आत्मिक रूप में जो पार्ट बजाने वाली आत्मा है वो एवर काली कब है और एवर गोरी कब है? क्या बताया? हँ? और कब से कब तक काली है और कब से कब तक गोरी है? एवर काली, एवर गोरी? इस दुनिया में, साकार रूप में? कोई कुछ नहीं बता रहा है जल्दी।
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? प्रत्यक्षता होने तक। वो तो टाइम ही नहीं फिक्स, फिक्स हुआ कब होगी प्रत्यक्षता? (किसी ने कुछ कहा।) आठ 84 जनम में। एक जनम ही इतना लंबा होता है। प्रत्यक्षता होने तक काला। अच्छा? उसके बाद गोरा हो जाएगा हमेशा के लिए? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? हमेशा के लिए गोरा हो जाएगा? हो जाएगा? फिर आगे शूटिंग की तो जरूरत नहीं? अरे, रिहर्सल फिर आगे चलेगी 2028 के बाद? हँ? चलेगी या नहीं चलेगी? तो रिहर्सल में, वो रिहर्सल से अलग कर दिया जाएगी हीरो पार्टधारी? बिना हीरो पार्टधारी के रिहर्सल होगी? तो वो रिहर्सल में सतोप्रधान से तमोप्रधान नहीं बनेगा? हँ? बनेगा। तो फिर एवर काला तब बनेगा जब आखरी शूटिंग लास्ट बार होगी। (किसी ने कुछ कहा।) 2027 में एवर काला बनेगा? एवर गोरा बनेगा? 28 में एवर गोरा बनेगा? उसके बाद काला नहीं बनेगा? उसके बाद काला बनेगा कि नहीं बनेगा? नहीं बनेगा? अच्छा? तो शूटिंग कैसे होगी? फिर शूटिंग की दरकार है? फिर रिहर्सल की दरकार है? हीरो पार्टधारी के बगैर रिहर्सल होती है? वो तो नहीं होती। वो तो हीरो पार्टधारी जरूर चाहिए। हँ।

(किसी ने कुछ कहा।) सारे संसार का हत्या करे तो एवर काला। सारे संसार की हत्या करे? मैं विनाश ऐसे से कराता हूँ जिस पर कोई पाप न लगे। उसका क्या होगा? हँ? पाप कब लगता है? भाव देखा जाता है कि कर्म देखा जाता है? हँ? भाव देखा जाता है। तो भाव क्या है हत्या करने का? हँ? क्या कल्याण होगा हत्या करने से? तो हत्या करना शुरू कर दो आज से। जो सामने आए उसकी हत्या करते जाओ। कल्याण ही कल्याण हो जाएगा। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। पुरानी दुनिया में, तमोप्रधान दुनिया में सब काले हो जाते हैं। आत्माएं सब काली, कुंजर, सब पापी। वो पापी दुनिया का खलासा हो तब नई दुनिया प्रत्यक्ष हो प्रैक्टिकल में। अब यहाँ बात दुनिया के खलास होने की, न होने की नहीं है। बात है एवर काला कब होता है? (किसी ने कुछ कहा।) द्वापर में एवर काला होता है? और कलियुग में नहीं एवर काला होता है? वाह भैया! कलियुग ज्यादा तमोप्रधान कि द्वापर ज्यादा तमोप्रधान? हाँ। अच्छा, ये बताओ एकदम संगमयुग जो 100 साल का है, आत्माओं के हिसाब से, उसमें आदि संगमयुग का जो हिस्सा है, आदि काल उसमें तमोप्रधान कब हुआ? अति का तमोप्रधान? हुआ ही नहीं? 1942 में तमोप्रधान नहीं हुआ?

आत्मा सतोप्रधान होगी, जब सोना सतोप्रधान होगा तो जेवर कैसा मिलेगा? जेवर बढ़िया 24 कैरट का बनेगा या लो कैरेट का बनेगा? 24 कैरट का बनेगा। तो जो हत्या हुई यज्ञ के आदि में वो आत्मा की कमजोरी से हत्या हुई कि अपने आप हो गई? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) अँहँ।16000 गोप-गोपियां तो, वो तो दास-दासियाँ हैं मोस्ट्ली उनमें। उनकी तो बात ही छोड़ दो। अरे, इससे तो अच्छा राजाओं की बात करो। बाप राजयोग सिखाने आये हैं ना कि दासी योग सिखाने आए हैं? 16000 में जाने से अच्छा साहूकार बनो वो अच्छा। दास-दासी क्यों बनो? तो 16000 की बात नहीं है। जो भी थीं, जो अमेरिका के अखबार में निकला कि कलकत्ते का एक जोहरी है वो कहता है मुझे 16108 चाहिए। और अभी अखबारों में क्या निकला? हँ? वो ही बात अभी अखबारों में निकल गई। अभी ‘कलकत्ते का जौहरी’ नाम नहीं निकला। हँ? ज्ञान रतनों का जौहरी होगा या स्थूल रत्नों का जौहरी? ज्ञान रतनों का जौहरी है। उसका नाम भी लिख दिया। वो कहता है मेरा टार्गेट 16108 गोपियों का है। तो उसको, इतना बड़ा जबरदस्त गुंडा, तो उसके पकड़ने के लिए तो नॉन-बेलेबल वॉरंट निकलना चाहिए। तो निकाल लिया। तो उस समय तो उसकी हत्या कर दी। शरीर की हत्या की या आत्मा की? शरीर की हत्या कर दी। इसका मतलब आत्मा भी संपूर्ण नहीं बनी थी या बनी थी? नहीं। आदि में भी काला हुआ कि नहीं? तो अंतिम शूटिंग में भी काला होगा या गोरा होगा? हँ? काला होगा और टाइम क्या है उसका? वर्ष तो बताओ कम से कम। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। 2036-37 का टाइम है जब वो आत्मा घोर काली बन जाएगी।
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 15 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2613, दिनांक 18.08.2018
VCD 2613, Dated 18.08.2018
प्रातः क्लास 26.8.1967
Morning Class dated 26.08.1967
VCD-2613-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.50
Time- 00.01-16.50


प्रातः क्लास चल रहा था - 26.8.1967. शनिवार को रिकार्ड चला था – दुनिया रंग-रंगीली बाबा, दुनिया रंग-रंगीली। ये किन्होंने कहा बाबा को? हँ? दुनिया रंग-रंगीली? हँ? कि बाबा दुनिया रंग-रंगीली। (किसी ने कुछ कहा।) हँ। ढ़ेर सारों ने कहा? ढ़ेर सारे तो अलग-अलग ग्रुप के हैं। जो जिस ग्रुप का है वो तो अंधों जैसी बात हो गई। ढ़ेर सारे अंधे इकट्ठे हुए। उनको पूछा हाथी कैसा है? तो कहा – लाओ, हमें दिखाओ हाथी कैसा है? तो किसी ने देखा पेट, तो कहता बड़ा भारी है ये तो। किसी ने पकड़ी पूंछ तो कहता अरे, ये तो ऐसे पूंछ जैसा है। पूंछ ही तो है हाथी। किसी ने पकड़ी सूंढ़। कहता हैं, बड़ा गुदगुदा है, लंबा-लंबा है। तो ऐसे है। जो दूसरे-दूसरे धरम के रुद्रमाला के मणके हैं वो तो बस अपने तक ही सीमित हैं। वो जानेंगे दुनिया रंग-रंगीली? हँ? वो तो नहीं जानेंगे।

फिर बताओ, बाबा को किसने कहा कि दुनिया रंग-रंगीली? ये सारी दुनिया
(किसी ने कुछ कहा।) बच्चों ने कहा। वो तो 500 करोड़ बच्चे हैं। तुम्हारा और विस्तार कर दिया माताजी ने। हँ? किसी एक ने कहा होगा। (किसी ने कुछ कहा।) 8 ने कहा फिर भी? (बाबा हंसे।) फिर भी ग्रुप हो गया। 8 भी तो अलग-अलग धर्मों के बीज हैं, पूर्वज हैं। वो जो जिसका पूर्वज है वो उसी अपने ही कुल को, अपने परिवार को ही जानेगा ना पूरा-पूरा। तो किसने कहा? (किसी ने कुछ कहा।) अब प्रजापिता ने बाबा को कहा? वो तो खुद ही बाबा है। बाबा किसे कहते हैं? बाबा निराकार को कहते हैं या साकार को कहते हैं? साकार को बाबा कहते हैं (किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा ने कहा? अभी भी नहीं पहुँचे हिसाब से। हँ? ब्रह्मा बाबा ने कहा ब्रह्मा बाबा की भी कोई अम्मा है। कोई अम्मा है या नहीं है? (किसी ने कुछ कहा।) जगदम्बा। हाँ। सारी दुनिया की अम्बा है ना। तो सबको जानती है। तो अनुभव करके फिर बोलती है – बाबा दुनिया रंग-रंगीली। बाबा दुनिया रंग-रंगीली। अच्छी तरह से देख ली। फिर लास्ट में बोलेगी। क्या? एक शिवबाबा दूसरा न कोई। शिवबाबा माने क्या अभी तक समझती थी? अभी तक समझती थी कि शिवबाबा बिन्दी। अब क्या समझती है? हँ? एक शिवबाबा दूसरा न कोई? (किसी ने कुछ कहा।) अरे, बिन्दी-बिन्दी तो ढ़ेर सारे, कौनसी बिन्दी पे उंगली रखें एक शिवबाबा दूसरा न कोई? हँ? जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है वो ही हुआ बाबा, सारी दुनिया का बाबा।

अभी दुनिया रंग-रंगीली इसका अर्थ तो कोई दूसरा समझ नहीं सकता है। हँ? कौन दूसरा नहीं समझ सकता है? हँ? दूसरे में कौन-कौन आ जाते हैं?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। समझाने वाला समझ सकता है या नहीं समझ सकता है? हँ? तो समझाने वाला कौन है? सुनाने वाला कौन है? हँ? सुनाने वाला शिव। वो ब्रह्मा के द्वारा सारा सुनता है। अम्मा के द्वारा सुनाता है। फिर समझाता किसके द्वारा है? टीचर के द्वारा समझाता है। हँ? तो जिस टीचर के द्वारा समझाता है, वो जितनी गहराई से समझेगा टीचर उतना कोई स्टूडेन्ट तो नहीं समझेंगे। तो जगदम्बा स्टूडेन्ट हुई या टीचर हुई? हँ? जगदम्बा भी तो स्टूडेन्ट है ना। और? और जो ब्रह्मा बताया वो जगदम्बा का भी स्टूडेन्ट है, बच्चा है या बड़ा है? बच्चा है। तो इसका अर्थ, दूसरा माना कोई नहीं समझ सकते हैं बच्चे। दूसरा माने? दूसरे में कौन-कौन आ गए? जो अपने आप समझ जाएं? कितने आ गए? जो दूसरे समझ ही नहीं सकते। वो सब दूसरे हो गए। अरे, जल्दी बताओ। (किसी ने कुछ कहा।) 8 नहीं समझ सकते? ये क्या बोला? किदम्बी? मिदम्मी। 7 विधर्मी? और 33 करोड़ देवताएं समझ सकते हैं? हँ? अरे, 500-700 करोड़ में से कोई नहीं समझ सकता सिवाय एक के। कौन एक? हँ? कौन एक? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। अरे, जिसको शिव बाबा कहते हो वो आत्मा कौन है? जिसको शिवबाबा कहते हो वो आत्मा कौन है? एक है या दो हैं? शिवबाबा? प्रजापिता आत्मा है? शिवबाबा माने शिव की आत्मा। प्रजापिता का शरीर है। अरे, सारा गड़बड़ कर रहे।

जो शिवबाबा कहते हो तो शिवबाबा जिसे हमने कहा वो आत्मा के ऊपर नज़र जानी चाहिए। कौन है आत्मा शिवबाबा? शिव बाबा माना शरीर लिया है इसलिए बाबा है। बाकि ओरिजिनल क्या है? शिव है। तो वो तो समझने वाला नहीं है। वो तो समझा-समझाया है। उसको कोई, उसको समझाने की बात है? समझने वाला है वो? कि समझाने वाला है? शिव? शिव तो समझाने वाला है। लेकिन बिना शरीर के कैसे समझाएगा? वो आत्मा बिन्दु है। वो समझा ही नहीं सकती, सुना ही नहीं सकती। सुनाने के लिए, टोटल सारी बात सुनाने के लिए दादा लेखराज ब्रह्मा के तन में आता है। उसे कहते हैं वेदवाणी। हँ? और उसका सार सुनाने के लिए यज्ञ के आदि में ही आया। किसके तन में? जो मनुष्य सृष्टि का बीज है उसमें आया तो लेकिन नाम क्या दिया उसका भी? ब्रह्मा। परमब्रह्म। तो वो बीज हो गया। सुनाने का बीज हो गया। और दादा लेखराज। तो उसमें तो सारे ही ब्रह्मा आ गए। हँ? क्योंकि प्रजापिता भी जब तक दूसरा जन्म लेकर आकर सुनेगा नहीं, दादा लेखराज ब्रह्मा से तब तक उसको भी ज्ञान हो सकता है? ज्ञान नहीं हो सकता।

तो ये तो सुनाने की बात हुई। दूसरा कौन है जो समझ ही नहीं सकता। उसमें 500 करोड़ सभी आ गए एक को छोड़करके। वो नहीं समझ सकते कोई भी। अब तुम जानते हो कि बाप ने बैठ करके समझाया है। ये तुम किससे कहा? हँ? तुम जानते हो कि बाप ने बैठकर समझाया है। हँ? माने जो भी बच्चे हैं रुद्रमाला के, विजयमाला के वो जान जाते हैं कि ये बात जो है दुनिया रंग-रंगीली – किसने बैठ समझाया? हँ? ये अर्थ जो है, हँ, जिसको मिक्स कहते हैं, बापदादा कहें, शिवबाबा कहें, क्योंकि शिव है आत्मा, असली समझाने वाली। और बाबा माने शरीर बुड्ढा। बुड्ढे को ही बाबा कहा जाता है। या तो बाप के बाप को बाबा कहा जाता है। ग्रांडफादर को।

समझाया है ये खेल जो है, ये रंग-रंगीला खेल है। हँ? ब्रॉड ड्रामा। हँ? उसका ड्यूरेशन कितना है? 5000 वर्ष। इस 5000 वर्ष में बड़े रंग-रंगीले आते हैं इस दुनिया में। कहाँ से लेकर शुरू होते हैं? हँ? कहाँ-कहाँ से शुरू होते हैं? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) देवता धरम से शुरू होते हैं। देवता धरम से तो 33 करोड़ है। कोई खास। शुरुआत कहाँ से? सूर्यवंश। सूर्यवंश में भी ढ़ेर सारे हैं। जिन्हें सूर्यवंश पक्का कहें तो रुद्रमाला सारी ही सूर्यवंशी हो गई। एक को बताओ ना। भले एक में कम्बीनेशन हो ढ़ेरों का। कम्बीनेशन से भी पता लग जाएगा। उसमें भी तो एक होगा ना सूर्य। सारे सूर्य थोड़ेही हो जाएंगे। (किसी ने कुछ कहा।) विष्णु। हाँ। विष्णु है। हँ। वहाँ से शुरूआत होती है। कौनसा रंग है? सफेद। यहाँ से हुआ। बाप आकरके जो दुनिया रचते हैं, शिव बाप आकरके जो दुनिया रचते हैं, हैविनली गॉड फादर, वो फर्स्टक्लास हैविन वो है, जिसे कहते हैं वैकुण्ठ, मुसलमान लोग कहते हैं जन्नत। अंग्रेज लोग कहते हैं हैविन। जीत पाई है उन्होंने सारी दुनिया के ऊपर। किन्होंने? विष्णुलोक में रहने वालों ने। विष्णु ने। और विष्णु की जो भी भुजाएं हैं उनको कंट्रोल करने वाले।

तो खेल है, इसकी शुरुआत किसने की? पहले-पहले खेल खेलने वाला कौन?
(किसी ने कुछ कहा।) शिवबाबा। अरे, बाबा तो है ठीक। शिव कहाँ विष्णुलोक में जाता है? शिव विष्णुलोक में जाता है? फिर? विष्णुलोक है (किसी ने कुछ कहा।) वो रंग है। उसमें कोई रंग नहीं है। उसको किसी से टैली नहीं किया जा सकता। किसको? शिव को। हँ। तो ये हुआ शरुआत। फिर उसके बाद। उसके बाद कौन? इसके बाद क्या कहें? वो जो, वो जो सफेद से मिलता-जुलता होता है, वो कौनसा रंग होता है? (किसी ने कहा – पीला।) क्रीम कलर। क्या? क्रीम कलर जो है थोड़ा सा हल्का पीला होता है ना, हल्का पीला। लेकिन बाकि लगता जैसे सफेद है। तो वो पार्ट कहाँ से शुरू हुआ? सतयुग के फर्स्ट नारायण से। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, कृष्ण से, सतयुग का कृष्ण।

तो देखो कोई भी बाइस्कोप या जो वो होते हैं ना। तो वो फिलम बनाने वाले बहुत अच्छा बनाते हैं खेल। बहुत रंग रूप दिखाते हैं। पर्दे वगैरा दिखाते हैं। सीन-सीनरी दिखाते हैं। वो ड्रामाबाजी करते हैं, नाटक करते हैं तो दुनिया में ऐसे होता है ना। अभी बेहद की दुनिया को तो कोई जानते नहीं हैं। वो तो हद की दुनिया के नाटकबाज, ड्रामाबाज, फिलमबाज, वो करते रहते हैं, दिखाते रहते हैं। लेकिन बेहद की दुनिया 5000 वर्ष की। इस बेहद के ह्यूज ड्रामा में भी ये रंग-रंगीली दुनिया है। क्या? इसका फाउण्डेशन कहाँ पड़ता है? संगमयुग में पड़ता है।

A morning class dated 26.8.1967 was being narrated. The record played on Saturday was – Duniya rang-rangili Baba, duniya rang rangili. (This world is colourful, O Baba, this world is colourful) Who said this to Baba? Hm? Is the world colourful (rang-rangili)? Baba the world is colourful.
(Someone said something.) Hm. Did many people say? Numerous people belong to different groups. To whichever group one belongs; that is like blind persons. Numerous blind persons gathered. They were asked – How is the elephant? So, he said – Come, show me how the elephant is. So, someone saw the abdomen; So, he says – It is very heavy. Someone grasped the tail, so he says, arey, it is like a tail. The elephant is a tail only. Someone caught the trunk. He says – It is fleshy (gudgudaa), long. So, it is like this. The beads of the Rudramala belonging to other religions are limited to themselves. Will they know that the world is colourful? Hm? They will not know.

Then tell, who said to Baba that the world is colourful? This entire world
(Someone said something.) Children said. There are 500 crore children. Mataji has expanded your topic futher. Hm? One person must have said. (Someone said something.) Did 8 say? (Baba laughed.) Still it is a group. 8 are also seeds, ancestors of different religions. Whomsoever’s ancestor someone is, he will completely know only his clan, his family, will he not? So, who said? (Someone said something.) Well, did Prajapita say to Baba? He himself is Baba. Who is called Baba? Is the incorporeal one called Baba or is the corporeal one called Baba? The corporeal one is called Baba. (Someone said something.) Did Brahma Baba say? You haven’t yet reached [the final answer] properly. Hm? Did Brahma Baba say or is there any mother of Brahma Baba as well? Is there any mother or not? (Someone said something.) Jagdamba. Yes. She is the mother of the entire world, isn’t she? So, she knows everyone. So, she experiences and then says – Baba the world is colourful. Baba, the world is colourful. I have seen it very nicely. Then, she will tell in the last. What? One ShivBaba and none else. What did she think of ShivBaba so far? So far she used to think that ShivBaba is a point. What does she think now? Hm? One ShivBaba and none else? (Someone said something.) Arey, there are numerous points (souls); on which point should we keep our finger to point out one ShivBaba and none else? Hm? The permanent Chariot in which He enters is Baba, the Baba of entire world.

Well, nobody else can understand the meaning of the world being colourful. Hm? Who else cannot understand? Hm? Who all are included among others?
(Someone said something.) Yes. Can the one who explains understand or not? Hm? So, who is the one to explain? Who is the one to narrate? Hm? The narrator is Shiv. He listens to everything through Brahma. He narrates through the Mother. Then through whom does He explain? He explains through the teacher. Hm? So, the teacher through whom He explains, the depth at which the teacher understands, no student will understand to that extent. So, is Jagdamba a student or a teacher? Hm? Jagdamba is also a student, isn’t she? And? And the Brahma, who was mentioned, is also a student, a child of Jagdamba; or is he grown-up? He is a child. So, children, others, i.e. nobody else can understand its meaning. What does ‘others’ mean? Who all are included among others? Is it those who understand on their own? How many are included? It is those others who cannot understand at all. All those are others. Arey, speak up fast. (Someone said something.) Can’t eight understand? What did you say? Kidambi? Midammi? 7 Vidharmi (heretics)? And can 33 crore deities understand? Hm? Arey, nobody except one from among 500-700 crores can understand. Who one? Hm? Who one? (Someone said something.) Yes, arey, who is the soul whom you call ShivBaba? Who is the soul whom you call ShivBaba? Is it one or two? ShivBaba? Is it the soul of Prajapita? ShivBaba means the soul of Shiv. Prajapita has the body. Arey, you are spoiling everything.

The one whom you call ShivBaba, the one whom we called ShivBaba, our eye should look at the soul. Who is the soul ShivBaba? ShivBaba means that He has taken up a body; that is why He is Baba. But what is He in original form? He is Shiv. So, He is not the one who understands. He has already understood. Is there any issue of explaining to Him? Does He understand? Or does He explain? Shiv? Shiv is the one who explains. But how will He explain without a body? That soul is a point. It cannot explain, narrate at all. In order to narrate, in order to narrate the entire thing in total, He comes in the body of Dada Lekhraj Brahma. That is called Vedvani. Hm? And in order to narrate its essence, He came in the beginning of the Yagya itself. In whose body? He did come in the seed of the human world, but what did He name him as well? Brahma. Parambrahm. So, he happens to be the seed. He happens to be the seed for narration. And Dada Lekhraj. All the Brahmas are included in him. Hm? It is because unless even Prajapita gets another birth and comes and listens from Dada Lekhraj Brahma, can he get knowledge? He cannot get knowledge.

So, this is about narration. Who else cannot understand at all? All the 500 crores except one are included in that. None of them can understand. Now you know that the Father sat and explained. To whom did He say ‘You’? Hm? You know that the Father sat and explained. Hm? It means that all the children of the Rudramala, Vijaymala get to know that who sat and explained the topic of the world being colourful? Hm? This meaning; the one who is called mix - BapDada, ShivBaba; because the one who explains actually is the soul of Shiv. And Baba means the old body. The old one is called Baba. Or the Father’s Father, the grandfather is called Baba.

It has been explained that this game is a colourful game. Hm? Broad drama. Hm? What is its duration? 5000 years. In these 5000 years very colourful ones come in this world. From where do they start? Hm? From where all do they start? Hm?
(Someone said something.) They start from the deity religion. There are 33 crores from the deity religion. Any special? From where? The Sun dynasty. There are numerous in the Sun dynasty as well. If the Sun dynasty is said to be firm, then the entire Rudramala belongs to the Sun dynasty. Tell about one, will you not? There may be a combination of many in one. One can know from the combination as well. Even in it, there will be one Sun. Will everyone become Suns? (Someone said something.) Vishnu. Yes. It is Vishnu. Hm. The starting is from there. Which colour? White. It is from here. The world that the Father comes and creates, the world that Father Shiv, the heavenly God Father comes and creates, that first class heaven is the one which is called Vaikunth, which Muslims call as Jannat. The Britishers call it Heaven. They have conquered the entire world. Who? The residents of the abode of Vishnu. Vishnu. And the one who controls all the arms of Vishnu.

So, it is a game; who started it first? Who plays the game first of all?
(Someone said something.) ShivBaba. Arey, Baba is correct. But does Shiv go to the abode of Vishnu? Does Shiv go to the abode of Vishnu? Then? The abode of Vishnu (Someone said something.) Is it a colour? There is no colour in it. It cannot be tallied with anyone. Who? Shiv. So, this is the beginning. Then after that. Who after that? What will be said after this? Which colour is similar to white? (Someone said - Yellow.) Cream colour. What? Cream colour is slightly yellow, is not it? Slightly yellow. But it appears to be white. So, where did that part begin? From the first Narayan of the Golden Age. (Someone said something.) Yes, from Krishna, the Krishna of the Golden Age.

So, look, any bioscope or anything that exists. So, those film producers make a very nice drama. They show a lot of colours and forms. They show curtains, etc. They show scenes and sceneries. When they enact dramas, then it happens like this in the world, doesn't it? Now nobody knows in the unlimited world. The dramatists, film makers of the limited world keep doing so, keep on showing this. But in case of unlimited world of 5000 years. In this huge unlimited drama also this world is colourful. What? Where is its foundation laid? It is laid in the Confluence Age.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11796
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Sep 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2614, दिनांक 19.08.2018
VCD 2614, Dated 19.08.2018
प्रातः क्लास 26.8.1967
Morning Class dated 26.8.1967
VCD-2614-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.10
Time- 00.01-17.10


प्रातः क्लास चल रहा था - 26.8.1967. शनिवार को पहले पेज के अंत में बात चल रही थी श्री कृष्ण जन्माष्टमी की। बात चल रही थी – कल जन्माष्टमी है। ये जन्माष्टमी के बारे में जरूर समझाते होंगे। समझाने वाले भी वो होंगे जिनमें ज्ञान होगा। बाकि जिनमें ज्ञान नहीं होगा या अधूरा ज्ञान होगा, थोथा होगा, बित्त-4 करके कुछ न कुछ किसको समझाय देगा। बाकि जो होशियार होंगे, अच्छी तरह से कुछ न कुछ समझाएंगे। अच्छा समझाएंगे कि तभी वंडर की बात है ये जो जन्माष्टमी है ये श्री कृष्ण कौन था? ये तो सतयुग का। किसने बोला? हँ? ये किसने बोला ये तो सतयुग का? ब्रह्मा बाबा ने बोला। वंडर आफ दि वर्ल्ड का शहजादा था। अब किसने बोला कि वंडर आफ दि वर्ल्ड का शहजादा था? शिवबाबा ने बोला। क्योंकि वंडर आफ दि वर्ल्ड तो पूरी वर्ल्ड तो तभी होती है। तो कलियुग का अंत होता है, नई दुनिया की शुरुआत होने वाली होती है तभी ये वंडर आफ दि वर्ल्ड प्रगट होते हैं।

तो फिर उन समझने वालों को कथा सुनानी चाहिए कि वंडरफुल वर्ल्ड, वो वंडरफुल वर्ल्ड, वो सतयुग, सत्य का युग वो कहाँ गया? 100 परसेन्ट सत्य का युग कहेंगे या कुछ परसेन्टेज कम कहेंगे? हँ? जब 16 कला संपूर्ण कृष्ण पैदा होगा तब कहेंगे स्वयंवर के बाद कि परसेन्टेज कम होने लगी। बाकि 100 परसेन्ट वहाँ ये तो विष्णुलोक की बात है। वो कहाँ गया? गया थोड़ेही? वो वैकुण्ठ लोक तो वायब्रेशन की दुनिया है ना। अभी तो कलियुग है। ये जो सतयुग की सीढी है ये सीढी कैसे उतरी जाती है? जब इन्द्रियों से भोग भोगते हैं तो सीढ़ी नीचे उतरते हैं। चाहे ज्ञानेन्द्रियों से भोगते हैं, चाहे कर्मेन्द्रियों से भोगते हैं। तब सीढ़ी नीचे उतरते हैं। विष्णुलोक में तो नीचे उतरने की बात ही नहीं। नीचे उतरेंगे तब जब सतयुग का पहला जन्म शुरू होगा 16 कला संपूर्ण देवात्माओं का।

ये तो सूर्यवंशियों की दुनिया है ना। असल सूर्यवंशी। सूर्य को कोई कलाओं में थोड़ेही बांधा जाता है? तो ये जो सूर्यवंशी असल हैं उनको कलाओं में नहीं बांधा जा सकता। तो नीचे उतरने का सवाल ही नहीं। चन्द्रमा की कलाएं नीचे उतरती हैं। सतयुग से फिर कलियुग कैसे आ गया? यानि वो उतरती कला कैसे आ गई? कैसे का क्या जवाब हुआ? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। देवताएं भी भोगी होते हैं। भल 16 कला संपूर्ण होते हैं, तो भी ज्ञानेन्द्रियों का भोग तो भोगते हैं। तो नीचे गिरते हैं। कलाएं कम होती जाती हैं। ऐसे कला कम आ गई। क्योंकि बाप समझाते तो सभी हैं बच्चों को। तो जरूर बच्चों को बुद्धि में आएगा कि हम समझावें; क्या? कि इन्द्रियों का भोग भोगने से नीचे उतरते हैं। चाहे आँखें हों, चाहे मुख हो, चाहे जीभ हो, चाहे कान हों, एक-दूसरे की बात सुनने के लिए, उससे नीचे ही उतरते जावेंगे।

समझावें खुशी से। बोध से समझावें। बोध माने? जो बुद्धि लगाकरके जो बात समझाई जाती है उसे बोध कहा जाता है। जैसे कहते हैं बोध गया। हँ? महात्मा बुद्ध को गया में बोध हो गया। तो एकदम समझावें की अभी ये कृष्ण भी देखो हुआ। कब हुआ? हँ? दिखलाते भी हैं, हँ, कृष्ण आ रहा है। श्री कृष्ण आ रहे हैं। कहाँ दिखलाते हैं? हँ? सभी ब्रह्माकुमारी सेन्टरों में पहले बड़ा बोर्ड लगाते थे दरवाजे पर। तो रास्ते में निकलते लोग देखते जावें कि यहाँ तो श्री कृष्ण आ रहे हैं। अब ये आ रहा है। कृष्ण का राज्य स्थापन हो रहा है। ये सुनकरके तो भारतवासियों को बहुत खुशी होनी चाहिए। हँ? परन्तु ब्रह्माकुमारियों ने तो वो बोर्ड ही उतार के फेंक दिया। तो खुशी हुई या खुशी गायब हो गई? खतम। हँ? तो भारतवासी कहें या विदेशी वासी कहें? हँ? दिल उनका कहाँ बसा हुआ है? विदेशियों के साथ या भारतवासियों के साथ? उमंग उत्साह सारा खलास हो गया। क्यों खलास हो गया? क्योंकि पत्थरबुद्धि हैं। उमंग तो उनको ही आएगा थोड़ा-थोड़ा जो होएंगे वारिस। ज्ञान सूर्य आया हुआ है। तो सूर्य के बच्चे सूर्यवंशी ही वारिस बनेंगे। ऐसे थोड़ेही कि जो इस्लाम धर्म में कन्वर्ट होने वाले ब्राह्मण होंगे, 9 कुरियों के ब्राह्मण होते हैं ना। तो जो नीची कुरी के ब्राह्मण होंगे, जिन्होंने कम ज्ञान लिया है वो तो करम भी उल्टे-पल्टे करेंगे। ऐसों का ही संग मिल जाएगा फिर। जैसा संग वैसा रंग। तो फिर उमंग कहाँ से आएगा ऐसों में? वारिस कैसे बनेंगे विश्व के?

चाहे भी कोई भी धरम के हों, उन धर्मों में जो भी ब्राह्मण सो देवता बनने वाले, सतयुग त्रेता में थे, वो द्वापर से जब कन्वर्ट होते हैं दूसरे धर्मों में तो वो कोई विश्व के मालिक थोड़ेही बन सकते हैं। चाहें क्रिश्चियन्स में हों, चाहे मुसलमानों में हों, हिम्मत तो बहुत करते हैं कि हम विश्व के मालिक बनें। जो इतने तकदीरवान होंगे वो ही तो बनेंगे विश्व के मालिक। नहीं तो सुनी-सुनाई बातों पर भारतवासियों ने दुर्गति पाई। बस, जैसे बन्दर लोग होते हैं ना। क्योंकि ये तो इनको तो अविनाशी ज्ञान रतन कहा जाता है। बन्दरों को तो भुंगरे चाहिए। उन्हें चने डाल दो भुने हुए तो वो चबेंगे और रतनों को, हीरे जवाहरातों को छोड़ देंगे। फेंक के भाग जाएंगे। चाहे कितने भी चमकीले हों, रोशनी फेंकने वाले हों। ये बन्दर लोग हैं। और ये भांति-भांति के बन्दर होते हैं। हँ? कभी वहाँ जाके देखा है चिडियाघर में? भांति-भांति के बन्दर। कोई काले मुंह वाले, कोई गोरे मुंह वाले। कोई लंबी पूंछ वाले, कोई छोटी पूँछ वाले। ये बन्दरों के आगे ये रखो तो वो समझेगा कि ये तो जैसे पत्थर हैं रतन। ये ज्ञान रतन की उनको कदर ही नहीं जो ब्रह्मा मुख से निकलते हैं। बस, देहधारियों का ही संग करेंगे। देह अभिमान में फूले-फलते हैं। और जो-3 हैं, असुल लायक उसके; किसके? हीरे-जवाहरातों के, वो समझते हैं।

अरे, ये तो रतन हैं। और साधारण रतन नहीं हैं। वो रतनों का तो कभी ना कभी विनाश ही हो जाएगा। हँ? भूकम्प आएगा तो जमीन में कहाँ के कहाँ चले जाएंगे। ये रतन तो अविनाशी ज्ञान रतन हैं। जो ज्ञान सूर्य बाप आकरके देते हैं। ये रतन तो जन्म-जन्मान्तर काम आवेंगे क्योंकि इन रतनों की धारणा तो आत्मा करेगी ना। देह अभिमानी सांढ़े थोड़ेही करेंगे। ये ज्ञान रतनों का सागर है ही बाप। क्या? सागर है कि सूर्य है? हँ? क्या है? सागर है? निराकार है या साकार है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) साकार है? सागर साकार है? हँ? और सूर्य? सूर्य निराकार? वो जो सूर्य है, स्थूल सूरज, चांद, सितारे, वो तो साकार हैं, लेकिन उनमें आत्मा नहीं है। उनके मिसल आत्मिक रूप में पार्ट बजाने वाली जो आत्माएं हैं वो चैतन्य सूरज, चांद, सितारे अलग हैं, धरती के सितारे। उनमें भी कोई जल देवता है, कोई वायु देवता है, कोई पृथ्वी देवता है। भांति-भांति के देवताएं हैं। सागर भी है।

तो वो ज्ञान रतनों का सागर है बाप। उस ज्ञान रत्न के सागर में गोते लगाते है। गहराई में जाने वाला गोताखोर होगा तो ढ़ेर सारे रतन लाएगा। और जो डरते होंगे – अरे, ज्यादा गहराई में नहीं जाना ज्ञान की। डूब मरोगे। तो ये जो अभी ज्ञान रतन हैं ये कोई सब नहीं धारण करते। बाकि ये कोई स्थूल रतन तो हैं नहीं बच्चे। नहीं। ये तो ज्ञान के रतन हैं जिनकी इतनी वैल्यू है। कितनी? हँ? वो रतनों की वैल्यू तो एक जनम के लिए। और इन रतनों की वैल्यू तो जन्म-जन्मान्तर के लिए रहेगी। यही रतन स्थूल रतन भी बन जावेंगे। इन रतनों को जो जितना धारण करेगा वो स्थूल रतन का साहूकार भी बनेगा। अच्छा। तो फिर वो वैल्यू क्या है ज्ञान रतनों की? ये कोई बेचने की चीज़ है क्या? हँ? नहीं, नहीं, ये तो धारण करने की चीज है। हँ? और ये दूसरों को धारण कराने की, बांटने की चीज़ है। दान करने की चीज है।

A morning class dated 26.8.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the first page on Saturday was about Shri Krishna Janmashtami (birthday). The topic being discussed was – Tomorrow is Janmashtami. You must be definitely explaining about Janmashtami. Only those who have knowledge must be explaining. But as regards those who do not have knowledge or have incomplete knowledge, surface-level knowledge, will explain something or the other to someone. But those who are intelligent will explain something or the other nicely. They will explain well; only then it is a wonder that as regards this Janmashtami, who was this Shri Krishna? He belonged to the Golden Age. Who said? Hm? Who said that he belonged to the Golden Age? Brahma Baba said. He was a Prince of the wonder of the world. Now who said that he was a Prince of the wonder of the world? ShivBaba said because as regards wonder of the world, the entire world exists only when it is the end of the Iron Age, when the new world is about to begin; only then does this wonder of the world get revealed.

So, then those who understand, should be narrated the story as to where did that wonderful world, the wonderful world, the Golden Age, the Age of truth went? Will it be called 100 percent Age of truth or will it be said to be some percentage less? Hm? When the Krishna perfect in 16 celestial degrees is born, then after his swayamwar (marriage) it will be said that the percentage started decreasing. But as regards 100 percent there, it is a topic of the abode of Vishnu. Where did it go? Did it go? That abode of Vaikunth is a world of vibrations, isn’t it? Now it is the Iron Age. How do you come down the steps of the Ladder of Golden Age? When you enjoy the pleasures of the organs, then you descend the Ladder. When you enjoy the pleasure of the sense organs or the organs of action, then you come down the Ladder. There is no question of coming down in the abode of Vishnu at all. You will come down when the first birth of the Golden Age of the deity souls, perfect in 16 celestial degrees, starts.

This is a world of the Suryavanshis, isn’t it? True Suryavanshis. Is the Sun bound in celestial degrees? So, these true Suryavanshis cannot be bound in celestial degrees. So, there is no question of coming down at all. The celestial degrees of the Moon decreases. How did then the Golden Age change to the Iron Age? It means that how did the celestial degrees decrease? What is the reply of ‘how’? Hm?
(Someone said something.) Yes. The deities are also pleasure seekers. Though they are perfect in 16 celestial degrees, yet they enjoy the pleasures of the sense organs, don’t they? So, they suffer downfall. The celestial degrees keep on decreasing. In this manner the celestial degrees decreased. The Father does explain everything to the children. So, definitely it will strike the intellect of the children that we should explain; what? That you descend by enjoying the pleasure of the organs. Be it the pleasure of the eyes, the mouth, the tongue, the ears to listen to the words of each other; you will go on descending through that only.

You should explain happily. You should explain intelligently (bodh se). What is meant by bodh? The topic that is explained by using our intellect is called bodh. For example, people say ‘Bodh Gaya’. Hm? Mahatma Buddha achieved wisdom in Gaya. So, you should immediately explain that now look, this Krishna also existed. When did he exist? Hm? It is also showed that Krishna is coming. Shri Krishna is coming. Where is he depicted? Hm? Earlier they used to display a big board on the gate at all the Brahmakumari centers. So, people passing through that way should observe that Shri Krishna is coming here. Now this one is coming. Krishna’s kingdom is being established. The residents of India should feel very happy on listening to this. Hm? But the Brahmakumaris removed that board and threw it away. So, did they feel happy or did the happiness vanish? It vanished. Hm? So, should they be called Indians or foreigners? Hm? Where is their heart based? With the foreigners or with the Indians? The entire zeal and enthusiasm ended. Why did it end? It is because they have a stone-like intellect. Those who are heirs will get some enthusiasm. The Sun of Knowledge has come. So, only the children of the Sun, the Suryavanshis will become heirs. It is not as if the Brahmins who are to convert to Islam; there are nine categories of Brahmins, aren’t there? So, the Brahmins of the lower category, who have obtained lesser knowledge, will perform opposite actions. They will then get the company of such persons. As is the company so is the colour. So, then how will such persons feel enthusiastic? How will they become the heirs of the world?

They may belong to any religion; those who are to become Brahmins and then deities in those religions and who existed in the Golden Age and Silver Age, when they convert to other religions, then they cannot become the masters of the world. Be it the Christians, be it the Muslims, they do try a lot to become the masters of the world. Only those who are so fortunate will become masters of the world. Otherwise, the residents of India have undergone degradation on hearsay. Just like there are monkeys, aren't there? It is because these are called the imperishable gems of knowledge. Monkeys want peas. If you put fried peas in front of them, then they will chew them and they will leave the gems, diamonds and jewels. They will throw them and run away. They (the gems) may be howevermuch shining, luminous. These are monkeys. And these are different kinds of monkeys. Hm? Did you ever go and see in the zoo? Different varieties of monkeys. Some with a black face, some with a light face. Some with long tail, some with short tail. If you keep these in front of the monkeys, then they will think that these gems are like stones. They do not value these gems of knowledge which emerge from the mouth of Brahma. That's it. They will keep the company of the bodily beings only. They prosper in body consciousness. And those who are actually worthy of it; of what? Of the diamonds and jewels; they understand.

Arey, these are gems. And these are not ordinary gems. Those gems will definitely be destroyed at one point of time or the other. Hm? When earthquake occurs, then they will move from one place to another in the Earth. These gems are imperishable gems of knowledge which the Sun of Knowledge, the Father comes and gives. These gems will prove useful birth by birth because it is the soul which inculcates these gems, doesn't it? Body conscious bulls will not inculcate them. The Father himself is the ocean of these gems of knowledge. What? Is he ocean or Sun? Hm? What is he? Is he ocean? Is he incorporeal or corporeal? Hm?
(Someone said something.) Is he corporeal? Is the ocean corporeal? Hm? And the Sun? Is the Sun incorporeal? Those Sun, the physical Sun, the Moon, the stars are corporeal, but they do not have souls. The souls which play a part in spiritual form like them, those living Sun, Moon, Stars are different, the stars of the Earth. Among them someone is a deity of water, someone is a deity of wind, and someone is a deity of Earth. There are different kinds of deities. There is ocean as well.

So, the Father is an ocean of those gems of knowledge. You dive in that ocean of gems of knowledge. If someone is a deep sea diver, then he will bring a lot of gems. And those who fear - Arey, do not go into greater depths of knowledge. You will drown and die. So, everyone doesn't inculcate these gems of knowledge now. But these are not physical gems children. No. These are gems of knowledge which hold so much value. How much? The value of those gems is for one birth. And the value of these births will remain for many births. These very gems will become physical gems as well. The more someone inculcates these gems; he/she will become prosperous in those physical gems as well. Achcha. So, then what is the value of the gems of knowledge? Is it a thing to be sold? Hm? No, no, this is a thing to be inculcated. Hm? And this is a thing which you have to enable others to inculcate and distribute to others. It is a thing to be donated.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

Post Reply

Who is online

Users browsing this forum: No registered users and 4 guests