Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2663, दिनांक 07.10.2018
VCD 2663, Dated 07.10.2018
प्रातः क्लास 1.9.1967
Morning Class dated 1.9.1967
VCD-2663-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-21.45
Time- 00.01-21.45


प्रातः क्लास चल रहा था - 1.9.1967. शुक्रवार को तीसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि भई काला क्यों बनाते हैं? काम चिता पर चढ़करके रसातल में चले जाते हैं। पतित हो जाते हैं। दुखी हो जाते हैं बिल्कुल ही। अभी देखो, ये तो समझाते हैं ना। अभी। संगम में समझाते हैं वर्थ नॉट ए पैनी हो गया है। और ये क्यों पैनी हो गया? क्योंकि वो वाइसलैस दुनिया थी। और ये विशियस दुनिया है। इस दुनिया के संग के रंग में आने से विशियस हो जाते हैं। वर्थ नॉट ए पैनी बन जाते हैं। तो काम चिता पर बाप ने आकरके समझाया अभी अच्छी तरह से बच्चे ऐसे ये चित्र समझाओ। और अभी ये कोई समझानी ऐसे नहीं है कि जन्माष्टमी पर ही समझाई जाएगी कृष्ण का चित्र लेकरके। या रामनवमी पर ही समझाई जाएगी राम का चित्र लेकरके। कभी भी। ऐसे नहीं कि रामनवमी पर ही। नहीं। ऐसे चित्र निकले हैं। चित्र लेकरके समझाने के लिए। राम जयंती भी तो होती है ना। जिसको राम नौमी कहा जाता है। कृष्ण की अष्टमी। और राम की नौमी। हँ? इसका मतलब? शास्त्रों में तो ये दिखाया है कि कृष्ण जैसे आठ बच्चे पैदा हुए। फिर त्रेता में राम का जन्म हुआ पहला। तो राम नौमी मनाई। फिर कृष्ण जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं? हँ? उसका आठवां नंबर क्यों?

तो राम नवमी निकलेगी तभी भी ऐसे ही निकालेंगे। रामचन्द्र का काला चित्र ले जाएंगे। कृष्ण का भी ले जाएंगे। बोलो ये हैं सूर्यवंशी। और ये हैं चन्द्रवंशी। अब वो चाहे सूर्यवंशी हों या चन्द्रवंशी हों। वैश्य वंशी तो बनना ही है जरूर। विशियस बनेंगे तब तो काला बनेंगे ना। 1.9.67 की वाणी का चौथा पेज। क्योंकि सारी दुनिया, भारत; उस समय में तो भारत ही था सूर्यवंशियों, चन्द्रवंशियों के जमाने में। बाद में ये वैश्यवंशी हुए विदेशियों के आने से। भारत सूर्यवंशी सो भारत चन्द्रवंशी। और फिर वो ही भारत हो जाते हैं वैश्यवंशी। सतयुग में सूर्यवंशी, त्रेता में चन्द्रवंशी, और द्वापर में विशियस वंशी। वैश्य वंशी तो फिर देवता तो नहीं कहलाएंगे क्योंकि विशियस हो गए। नहीं कहे जाएंगे। ये तो और भी बाबा इसको अगर उनका चित्र होता, मन्दिर वाला चित्र, वो जगन्नाथ का। हँ? नाम रख दिया है जगन्नाथ। सारे जगत का नाथ। नहीं तो है तो जगन्नाथ का मन्दिर। पीछे जगन कह देते हैं। कोई क्या कह देते हैं, कोई क्या कह देते हैं। अगर उन जगन्नाथ का भी चित्र मिल जाए, समझा ना, वहाँ से। कहाँ से? जगन्नाथपुरी मन्दिर से क्योंकि अभी बाबा वाणी चलाते हैं ना। कलकत्ता है। हँ? नाम पड़ा है कलकत्ता। कलह कलेश कट्टा। कट्ट के तरफ में है ना।

अगर सयाने और समझू होते तो उस मन्दिर का वो चित्र भी ले आते। क्योंकि जगन्नाथपुरी कलकत्ते की तरफ है ना। चित्र मिल सकते हैं मन्दिर का। नहीं मिल सकते हैं, ऐसे तो नहीं। मिल सकते हैं। नहीं मिल सकते हैं तो फोटो भी निकाल सकते हैं। अगर समझो अभी उनका निकाल दिया है वो फोटो, वो ये गंद, हो सकता है उन्होंने छिपाय दिया हो होवे। तो भी तो पहले के चित्र तो होंगे जरूर ना। तो वो उसका छिपाय दिया। पर और भी जगह हैं ना जरूर। क्योंकि उधर वो सूर्य मन्दिर भी तो है ना कोणार्क का। बनारस में भी है ऐसे चित्र। लगे हुए हैं कोई न कोई ऐसे मन्दिर के ऊपर। अच्छा, यहाँ नहीं है चलो। वो वहाँ नेपाल में तो हैं ही हैं। तो कहाँ न कहाँ से तो ये चित्र। अरे, एक जगह नहीं तो बहुत जगह में। तो वो भी चित्र ले आना चाहिए ऊपर में क्योंकि वो बहुत देवताएं हैं इकट्ठे। जैसे कि देवताओं का कुल है। हँ? और वो ऐसे ही गंदा बनाया हुआ है जगन्नाथपुरी की तरह। अभी ड्रेस तो उनकी देवताओं की है। बाकि उनकी एक्टिविटी तो गंदी दिखाते हैं। तो जिसको सर्विस करनी होती है, क्योंकि जिस बात में बाप अटैन्शन खिंचवाते हैं ना तो उसी तरफ अटैन्शन खिंचवाना चाहिए। समझे? मन्दिर में भी जाकरके ये सर्विस कर सकते हैं। काले मन्दिर में भी सर्विस कर सकते हैं जहाँ श्रीनाथ का द्वारा है। अब वहाँ कितनी सर्विस चल सकती है। वो बच्ची वहाँ उदयपुर में है ना। उदयपुर में भी तुम बच्चे जाते तो हैं ना। आते-जाते हैं। कोई ग्राहक भी आते-जाते हैं। तो चलो, वहाँ भी जाना चाहिए। पूछो। कहाँ जाके पूछो? हँ? अरे। उदयपुर में। हँ? भई, इनको काला क्यों बनाया हुआ है इतना? तो वहाँ भी तो जाकर इस बात पर भाषण करना चाहिए ना। इसमें कोई, कोई-कोई वो अच्छा है। कोई खराब तो नहीं है बात को समझाना किसको। ये इसको कहा ही जाता है - कहाँ काले हुए? भई आयरन एज्ड वर्ल्ड में काले हुए। हँ? कौनसा युग? हँ? कलियुग। और वो है गोल्डेन एज वर्ल्ड। सतयुग। हँ?

ये बातें तो तुम बच्चों को बाप ने बहुत अच्छी तरह से समझाया है। भई, कट चढ़ जाती है तो दृष्टांत देते हैं। हँ? तो कट चढ़ जाने से बाप से कोई मिलता ही नहीं है। हँ? बाबा सुई का मिसाल देते हैं ना। सुई पर कट चढ़ी हुई होगी तो बाप खींचेगा ही नहीं। बाप तो चकमक है ना। देखो, अभी यहाँ आते हैं। और यहाँ आते हैं तो कट चढ़ी तो सबको है। सबको कट चढ़ी हुई थी। और अभी तुम्हारी तो कट उतर रही है। हँ? किनकी उतरती है, किनकी नहीं उतरती है। हँ? किसकी नहीं उतरती है? जो याद नहीं करते हैं तो उनकी कट नहीं उतरती है। अब नहीं उतरती है क्योंकि कट बहुत चढ़ी हुई है ना। तो जो बहुत कट चढ़ी हुई होगी तो उनकी फिर दुनिया की तरफ कशिश होगी। हँ? अभी बाप बैठकरके समझाते हैं।

अभी तो जीव आत्माओं को, जो आत्माएं हैं उनको मालूम है कि बरोबर हमको बाबा पढ़ाते हैं। और पहली-पहली बात वो ही। एकदम शुरुआत की ये बात। क्या? वो ही पवित्रता की बात। तो वो तो देखो यज्ञ में शुरुआत से ही झगड़े चले-चले आए हैं पवित्रता के ऊपर। और तो आगे तो पवित्रता का नाम नहीं लेते थे। अच्छा, ज्ञानामृत पीयेंगे। तो जब ज्ञान अमृत पीयेंगे तो पीने वाले फिर विख तो नहीं खाएंगे। तो ज्ञान तो, ज्ञान से तो मनुष्य, हँ, ज्ञान से तो पावन होते हैं ना। ज्ञान जल कहा जाता है। भक्तिमार्ग में तो नदी में स्नान करने जाते हैं। गंगा में स्नान करने जाएंगे। पावन हो जाएंगे। अब यहाँ तो बाप ने समझाया तुम तो आत्मा हो। आत्मा को तो ज्ञान चाहिए। ज्ञान जल की बात है ना। तो ये तो भगवान ही बैठकरके कहते हैं। इसने ही युक्ति रची ना। हँ? कि भई प्रतिज्ञा करके आओ कि मैं ज्ञान अमृत पीने जाता हूँ। वो ज्ञान अमृत तो है अमृत। जो गाया हुआ है अमृत और विष। बाप भी कहते हैं अमृत छोड़ विख काहे को खाए? तो अमृत तो जरूर पावन बनाने की चीज़ है ना। बाकि वो तो ज्ञान अमृत नहीं है ना बच्चे। हँ? वो तो ज्ञान सागर के पास है ज्ञान अमृत।

शास्त्रों में दिखाते हैं ना। सागर मंथन हुआ। हँ? तो मंथन करते-करते अंत में निकला अमृत। या पहले निकला? अंत में निकला। बाकि यहाँ शास्त्रों को तो नहीं कहेंगे। ये तो ज्ञान सागर की बात है यहाँ की। हँ? शास्त्रों में तो ऐसे ही लिख दिया है, हँ, तो स्थूल सागर समझते हैं। नहीं। वो तो मनुष्यों के लिखे हुए शास्त्र हैं। तुम बच्चों को तो ये समझाया गया है कि शास्त्रों को पढ़ने से कभी भी कोई पतित से पावन नहीं बन सकते हैं। क्योंकि शास्त्र लिखने वाले, बनाने वाले वो ऋषि-मुनि खुद ही दाढ़ी-मूँछ वाले विकारी थे। हँ? देवताएं निर्विकारी होते हैं। उनको दाढ़ी-मूंछ होती है क्या? नहीं। तो शास्त्र पढ़ने से कोई पावन नहीं बन सकता। तो भी पतित से पावन बनने के बाद तो फिर पावन दुनिया में जाना है ना। ऐसे थोड़ेही है कि इस समय में पतित से पावन बनें। फिर कहाँ भी जा सकते हैं। हँ? पावन दुनिया में ही जाना पड़े। पावन नहीं बनेंगे तो न मुक्तिधाम में जा सकते हैं, न जीवनमुक्तिधाम में जा सकते हैं। और मुक्तिधाम या जीवनमुक्तिधाम, वहाँ से लौटने का तो है ही नहीं किसी को। (क्रमशः)

A morning class dated 1.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the third page on Friday was that brother, why do they make him dark? They get on to the pyre of lust and go into the abyss (rasaatal). They become sinful. They become completely sorrowful. Now look, this is explained, is not it? Now. It is explained in the Confluence Age that he has become worth not a penny. And why has he become a penny? It is because that was a viceless world. And this is a vicious world. You become vicious by getting coloured by the company of this world. You become worth not apenny. So, the Father has explained now on the [topic of] pyre of lust; children, explain on this picture nicely. And it is not as if this explanation is to be given only on Janmashtami by carrying the picture of Krishna. Or that it will be explained only on Ramnavami by carrying the picture of Ram. Any time. It is not as if only on Ramnavami. No. Such pictures have emerged. To carry the picture and explain. There is Jayanti (birthday) of Ram as well, is not it? It is called Ram Naumi. Krishna's ashtami. And Ram's naumi. Hm? What does it mean? It has been shown in the scriptures that eight children like Krishna were born [before and including Krishna]. Then Ram was born first in the Silver Age (Treta). So Ram Naumi was celebrated. Then why do people celebrate Krishna Janmashtami? Hm? Why is he at the eighth number?

So, when Ram Navami is celebrated, even at that time you will bring it out like this only. You will carry the dark picture of Ramchandra. You will carry that of Krishna as well. Tell - This one is Suryavanshi. And these are Chandravanshis. Well, whether they are Suryavanshis or Chandravanshis, they have to definitely become Vaishyavanshi. They will become dark only when they become vicious, will they not? Fourth page of the Vani dated 1.9.67. It is because the entire world; Bhaarat; at that time, during the times of the Suryavanshis and the Chandravanshis there was Bhaarat (India) alone. Later these Vaishyavanshis emerged after the arrival of the foreigners. Bhaarat becomes Suryavanshi and Bhaarat becomes Chandravanshi. And then the same Bhaarat becomes Vaishyavanshi. Suryavanshi in the Golden Age, Chandravanshi in the Silver Age and Vicious vanshi in the Copper Age. Vaishyavanshi will not be called deities because they became vicious. They will not be called. If there was his picture, the picture with the temple, that of Jagannath, then Baba. Hm? The name coined is Jagannath. The Lord of the entire world. Otherwise, it is the temple of Jagannath. Later, they call him Jagan. Some call him something and some others call him something else. If we can get the picture of that Jagannath also from there, did you understand? From where? From the temple of Jagannathpuri because now Baba narrates the Vani, doesn't He? There is Kalkatta (Calcutta). Hm? The name coined is Kalkatta. Kalah kalesh katta (collection of despair and disputes). It is towards katt, is not it?

Had they been clever and intelligent, they would have brought that picture of that temple also. It is because Jagannathpuri is towards Calcutta, is not it? You can get the picture of the temple. It is not as if you cannot get. You can get. If you cannot get you can take a photo as well. Suppose now they have removed that photo, that obscenity, perhaps they have hidden it. Still, the earlier pictures will definitely be there, will they not be? So, they have hidden those. But there are definitely other places also, aren't there? It is because there is the Sun Temple of Konark as well there. There are such pictures in Benares as well. Some of them are displayed like this on the temples. Okay, they are not available here. They are definitely available there in Nepal. So, these pictures can be obtained from one place or the other. Arey, if not at one place, they can be available at many places. So, that picture should also be brought up because there are many deities together. It is like a clan of deities. Hm? And then they have made obscenely like Jagannathpuri. Now the dress is of the deities. But their activity is shown to be obscene. So, the one who has to do service because the topic on which the Father draws your attention, so, you should also draw attention to the same topic. Did you understand? You can also go to the temple and do this service. You can also do service in the black temple where there is the gate (Dwara) of Shrinath. Well, so much service can be done there. Daughter, that is there in Udaipur, isn’t it? You children go to Udaipur as well, don't you? You come and go. Some customers also visit. So, okay, you should go there also. Ask. Where should you go and ask? Arey! In Udaipur. Hm? Brother, why has he been made so dark? So, you should go there also and deliver lecture on this topic, shouldn't you? In this, it is good. It is not bad to explain the topic to anyone. This itself is called - Where did you become dark? Brother, you became dark in the Iron-Aged world. Hm? Which Age? Hm? Iron Age. And that is a Golden Age world. Satyug. Hm?

The Father has explained these topics to you very well. Brother, when the cut (rust) develops, then an example is given. Hm? So, when the cut develops, then nobody meets the Father at all. Hm? Baba gives the example of a needle, doesn't He? If the needle is covered by rust, then the Father will not pull at all. The Father is a magnet (chakmak), is not He? Look, you now come here. And when you come here, everyone is covered by rust. Everyone was covered with rust. And now your rust is getting removed. Hm? In case of some it gets removed, in case of some it doesn’t get removed. Hm? Whose rust doesn't get removed? Those who do not remember, their rust doesn't get removed. Well, it doesn't get removed because there is a lot of rust, is not it? So, if a lot of rust is covered, then they will be attracted towards the world. Hm? Now the Father sits and explains.

Now the living souls (jeev aatma), the souls know that definitely Baba teaches us. And the first and foremost topic is that only. It is a topic of the very beginning. What? The same topic of purity. So, look, disputes have started on the topic of purity from the beginning of the Yagya itself. And earlier they did not used to utter the name of purity. Achcha, we will drink the nectar of knowledge. So, when you will drink the nectar of knowledge, then those who drink that will not eat poison [of lust]. So, human beings become pure though knowledge, don't they? Knowledge is called water. On the path of Bhakti people go to bathe in the river. They go to bathe in the Ganges. [They think] We will become pure. Well, here the Father has explained that you are a soul. The soul requires knowledge. It is a topic of the water of knowledge, is not it? So, it is God Himself who sits and says. This one only created tact, did not he, hm, that brother, take a vow that I go to drink the nectar of knowledge. That nectar of knowledge is nectar. It is sung - Nectar and poison. The Father also says - Why do you leave the nectar and consume the poison? So, nectar is certainly a thing that makes you pure, doesn't it? As regards that, it is not the nectar of knowledge, isn’t it children? Hm? The nectar of knowledge is available with the ocean of knowledge.

It is shown in the scriptures, isn’t it? Churning of ocean took place. Hm? So, while churning, the nectar emerged in the end. Or did it emerge first? It emerged in the end. Here the scriptures will not be called [nectar]. It is a topic of the ocean of knowledge here. Hm? It has been written in the scriptures, hm, so you think of the physical ocean. No. They are the scriptures written by the human beings. You children have been explained that nobody can become pure from sinful by reading the scriptures because the writers of scriptures, makers of scriptures, those sages and saints were themselves vicious persons with beard and moustache. Hm? Deities are viceless. Do they have beard and moustache? No. So, nobody can become pure by reading the scriptures. Still, after becoming pure from sinful you have to go to the pure world, will you not? It is not as if you will become pure from sinful now. Then you can go anywhere. Hm? You will definitely have to go to the pure world. If you do not become pure, you can neither go to the abode of liberation (muktidhaam) nor the abode of liberation in life (jeevanmuktidhaam). And be it muktidhaam or jeevanmuktidhaam, nobody has to return from there. (Continued)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 15 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2663, दिनांक 07.10.2018
VCD 2663, Dated 07.10.2018
प्रातः क्लास 1.9.1967
Morning Class dated 1.9.1967
VCD-2663-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 21.46-45.13
Time- 21.46-45.13


तो बाप ने बताया कि जो पावन धाम नहीं जाएंगे मुक्तिधाम, जीवनमुक्तिधाम, तो पावन बनेंगे ही कैसे? कोई बना ही कैसे सकता है? जबकि वापस जाने का उनको है ही नहीं। 1.9.67 की वाणी का पाँचवां पेज। न मुक्तिधाम न जीवनमुक्तिधाम। कोई को भी नहीं जाना है। तो फिर उनको पावन बनाएगा कौन? क्योंकि उन्हें जाना ही नहीं है क्योंकि पवित्र बनना ही नहीं है। तो ये तो मनुष्य को मालूम नहीं है ना। क्योंकि वो तो बहुत कह देते हैं। सन्यासी लोग कहते हैं ना फलाना वानप्रस्थ गया। हँ? निर्वाणधाम में गया। फलाना ज्योति-ज्योति समा गया। फलाने ने मोक्ष पाई। अरे! ऐसे कैसे ज्योति-ज्योति में समा जाएंगे? और मोक्ष तो किसी का होता ही नहीं। मोक्ष माने सदाकाल के लिए मुक्ति। भगवान को ही इस सृ्ष्टि पर आना पड़ता है। हँ? लिख दिया है संभवामि युगे-युगे। मैं हर युग में आता हूँ। भगवान को हर युग में आना है। और वो भगत कहते हैं मोक्ष हो गया। ऐसे तो कहते ही रहते हैं। समझा ना? उनको मालूम थोड़ेही है कि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा कहाँ चली गई। नहीं। हँ, वो तो कोई जैनी होगा, बोलेगा ये तो मोक्ष को पाय लिया। अभी उन जैनियों को क्या मालूम कि मोक्ष को पाय लिया या कुछ क्या हुआ। बस बोलते हैं मोक्ष को पा लिया।

आदमी तो बहुत ही हैं ना। दुनिया में आदमियों की संख्या बढ़ रही है? घट रही है? बढ़ रही है। ऐसे मोक्ष को पाते रहें तो दुनिया तो, हँ, आबादी कम हो जानी चाहिए। हँ? ये तो आबादी बढ़ रही है। हँ? पुराने-पुराने जो जन्म लेते चले आ रहे हैं वो तो आ ही रहे हैं। नई-नई आत्माएं ऊपर से और उतर रही हैं, पावरफुल आत्माएं। हँ? और जो पुराने हैं वो नया जनम भी लेते रहते हैं। तो दुनिया की तो वृद्धि होती जा रही है ना। हँ? तो मोक्ष को पाय लिया। अब एक ने मोक्ष को पाय लिया तो अपने फालोअर्स को भी मोक्ष दिलाएगा ना। समझा? सो भी कोई ऐसा अच्छा होगा तभी तो कहेंगे ना, भई ये मोक्ष को पाया। इसने बहुत मेहनत की है। बहुत तपस्या की है। तीव्र तपस्या। हँ? तो जैसे कहते हैं कि ये काली चमड़ी भी हो जाती है। हँ? ये जैनियों की, हँ, इनके मन्दिर देखे हैं? काली चमड़ी वाले जैनियों के? हँ? और ये दिलवाड़ा में दो मन्दिर बने हैं ना। एक गोरी मूर्तियों का, एक काली मूर्तियों का ऊपर बना हुआ है। नंगी मूर्तियाँ। काली चमड़ी हो जाती है ना ये जैनियों की, दिगम्बर जैनियों की। वो तपस्या करते हैं। ऐसी तपस्या करते होंगे। तो जब वो शरीर छोड़ेंगे तो कहेंगे भई ये मोक्ष को पा गया। अभी किसको क्या मालूम क्या मोक्ष को पा लिया? बस समझ लिया। अरे, वो तो गया। जाकरके दूसरा जनम लिया।

और फिर उनको ये समझना कि मोक्ष को पा लिया। हँ? फिर तो उनकी कोई भी; मोक्ष को पा लिया तो फिर उनकी कोई भी क्रिया करम तो नहीं करना चाहिए। हँ? वो तो मोक्ष को पा लिया। श्राद्ध खिलाते हैं ना। तेरहवीं करते हैं। ये करते हैं। मोक्ष को पा लिया तो ये सब कुछ करने की क्या दरकार? हँ? जिस आत्मा ने मोक्ष को पा लिया उसके लिए तो फिर कुछ भी करने की दरकार नहीं है। पा लिया ना। यहाँ तो करते ही हैं कि उनको कोई तकलीफ न हो। ऐसे ढ़ेर सारे क्रिया करम करते रहते हैं ना। हँ? कोई तेरहवें दिन करेंगे। फिर साल में करेंगे। फिर चौवर्षी करेंगे। और फिर देखो भक्ति जगाते रहते हैं। हँ? ज्योति जगाते रहते हैं। इनको कहीं अंधेरा न हो जाए। हं? आत्मा कहीं बिचारी अंधियारे में ठोकरें न खावे। है ना? अभी अंधियारा क्यों? जब मोक्ष पा लिया तो अंधियारे की तो कोई बात ही नहीं रहती है। अब यहाँ तो तुम्हें समझाया है कि आत्मा एक शरीर छोड़ करके ठक् से आकरके दूसरा जनम ले लेती है। अभी टाइम लगा ना एक मिनट। समझा ना? सेकण्ड। अभी इसमें सेकण्ड। तो इसमें अंधियारे की तो कोई बात ही नहीं रहती है। इधर शरीर छोड़ा, उधर एक सेकण्ड में जाके गरभ में प्रवेश कर गई।

तो ये दुनिया में रसम-रिवाज़ उल्टी-उल्टी चली आ रही है जो बारह दिन बत्ती जगाते हैं। हँ? और तेरहवें दिन तेरहवीं करते हैं, ब्राह्मणों को खिलाते हैं। अरे, वो आत्मा जो जाना थी वो तो चली गई, पहुँच भी गई। एकदम शरीर में जाके प्रवेश कर लिया क्योंकि उनका शरीर तो उनके वायब्रेशन के अनुसार पहले से ही तैयार हो जाता है। किसका? शरीर छोड़ने वाली आत्मा का 3-4 महीने पहले से ही तैयार होने लगता है गरभ में। जैसे बूट वाले के पास जाओ। उनको आर्डर देकरके आओ। हँ? तो जब जाएंगे तो झट उनके पास तैयार रखा हुआ है। क्या? बूट। हँ? काहे से मिसाल दिया? जूती से मिसाल दिया। किसके लिए? शरीर के लिए। ये आत्मा की जूती हो गई। गरभ में जूती तैयार हो गई। हँ? वो तो बूट वाले के पास जाओ तो आर्डर दिया। हँ? यहां किसको दिया आर्डर? यहाँ आर्डर देने की तो बात ही नहीं। ये तो संस्कारों के अनुसार आटोमेटिक प्रकृति काम करती है। समझा ना? ये बूट का मिसाल दिया। ये भी ऐसे ही है। बस। एक शरीर रूपी जूती छोड़ी और झट, फट से दौड़ करके दूसरी जूती में प्रवेश कर लिया। देरी लगती है क्या? तो पीछे रात-वात तो वहाँ कोई लगती नहीं जो अंधियारा हो जावे। हँ? जो बत्ती जगाने की जरूरत पड़े। हँ? क्यों बारह दिन जगाते हैं? ये सभी क्यों करते हैं? हँ? ये चली आ रही है रसम रिवाज़। कहाँ से चली आ रही है? अभी ये रसम रिवाज़ ऐसे तो नहीं है। कभी कोई मिट जाएंगी। नहीं। ये तो रसम-रिवाज़ चलती रहती है।

फिर जब वो समय आएंगे वा अभी जो भी है, हँ, यानि तुम भी वो रसम रिवाज करते हो। पहले करते थे ना। अभी तुम नहीं करते हो। और तुम तो बिल्कुल ही कुछ भी नहीं करते हो। कोई रसम-रिवाज़ नहीं। हँ? वो सारी रसम-रिवाज़ झट उठाय के रख दिया क्योंकि तुमको तो मालूम है ये शरीर छूटने के बाद ये तो मिट्टी हो गया। तो डालो इसको पानी में डालो, मछलियाँ खा जाएंगी। या वहीं छोड़ दो। घर मे कोई थोड़ेही छोड़ देगा। हँ? उनसे कोई ताल्लुक नहीं रहा। क्योंकि उस मिट्टी शरीर का क्या होगा? वो तो मिट्टी बन गई ना। जलाय दिया तो राख बन गई। हँ? जैसे लकड़ी जली और राख बन गई। ऐसे ये भी शरीर चैतन्य लकड़ी है। हाँ। इसको रखने की चीज़ तो है नहीं। मुसलमान कहते हैं जमीन में गाड़ दो। हँ? हिन्दू कहते हैं - नहीं, उसको जला दो। कीड़े-वीड़े नहीं पड़ेंगे। हँ? छोटी बड़ी होती है ना। क्या? ये शरीर रूपी लकड़ी, लाठी कहो, ये छोटी-बड़ी होती है ना। हँ? कोई की लकड़ी छोटी, कोई की बड़ी। क्योंकि ये तो जानते हैं झाड़ भी पहले छोटा होता है। हँ? वो झाड़ भी बड़ा-बड़ा हो जाता है। तो वो मिट्टी तो मिट्टी में गई। ये है रसम-रिवाज। क्या? कहाँ की रसम-रिवाज है? हँ? संगमयुग में क्या रसम-रिवाज चालू हुई? हँ? अरे? क्या हुआ? हँ? हाँ, क्या रसम-रिवाज़ चालू हुई? यहाँ तो आत्मा योगबल के आधार पर शरीर से डिटैच हो जाएगी। हँ? डिटैच हो जाएगी तो शरीर क्या हो जाएगा? हँ? शरीर मुर्दा हो जाएगा ना। हो जाएगा? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) बर्फ में दब। बरफ में दबे या कुछ भी हो। वो तो बीज रूप आत्माएं की बात है। बाकि सबकी? बाकि सबका तो खलास हो जाएगा। तो मिट्टी मिट्टी में जाती है। तो जाकरके गंगा में डालो, फलाने में डालो।

वहाँ कोई ऐसे रसम-रिवाज़ तो हो नहीं सकती है स्वर्ग में। क्या? हँ? क्या रसम-रिवाज नहीं हो सकती है? हँ? वहाँ तो जब शरीर छोड़ना होता है तो स्वेच्छा से चले जाते हैं समन्दर के किनारे। वो समन्दर की लहर आई और उठा ले गई। मछलियाँ खा जाएंगी। कुछ भी करने की दरकार नहीं है। तो वहाँ तो ऐसी कोई रसम-रिवाज़ नहीं हो सकती। क्योंकि वहाँ समझ है ना। यहाँ तो बेसमझी है। ये सब रसम-रिवाज़ निभाने से क्या होगा? जैसे देखो तुम बच्चों ने देखा होगा ना। हँ? वो राख लेकरके, हँ, कहाँ-कहाँ सारे शहर में डोलते-फिरते हैं। हँ? शरीर छोड़ता है तो उनकी कहते हैं हड्डियाँ ले जाएंगे। हँ? गंगा नदी में डालेंगे।
(किसी ने कुछ कहा।) हां, कोई भी। वो तो मर गया ना। जैसे गुरु गोविन्द सिंह। शरीर भी छोड़ दिया। तो वो थोड़ेही समझते हैं कि गुरु गोविन्द सिंह ने शरीर छोड़ दिया। वो सिक्ख लोग उनके लिए भी कहते हैं भाई हाज़िरा हज़ूर है। ऐसे कहते हैं ना वो हाजिरा हजूर है। जैसे बाप के लिए कहा जाता है ना, हँ, कि बाप हाज़िरा हज़ूर है। हँ? तुम जब-जब याद करते हो तो बाप हाजिर हो जाते हैं। ऐसे उनके लिए भी समझ लिया है कि हाजिरा हजूर है। अभी वो गुरु गोविन्द सिंह तो हाजिरा हजूर नहीं है ना बच्ची। हँ? तो देखो, उनकी तलवार को कितना बरस हो गया, उनकी तलवार। हँ? उनकी तलवार लेकरके सारे भारत में उनको खुजवाते हैं। तलवार को। कितना झुण्ड इकट्ठा होता है। कितना खर्चा करते हैं और क्या-क्या करते हैं। तो ये सब है तो ना बच्चे। हँ?

तो अभी तुम बच्चे समझे। ये सब जो कुछ भी रसम रिवाज है सब फालतू करते हैं क्योंकि सच्ची-सच्ची बात तो अभी बाप आकरके समझाते हैं ना। वो आकरके ये बात बैठ समझाते हैं कि बच्चे इन सब रीति रसम-रिवाज़ों में जो भक्तिमार्ग में चल रही हैं, अलग-अलग संप्रदायों में, अलग-अलग धर्मों में, इनमें कुछ भी रखा नहीं है। हँ? तो काहे में रखा है फिर? हँ? हाँ। बच्चों को चित्र दिखलाया नहीं कल। ये बच्चों ने नहीं दिखलाया। 1.9.67 की वाणी का छठा पेज। वो बैठे हैं कुर्सी पर। या कोई किस किसके ऊपर भी। तो उसने आकरके भेंट दिया। वो बोलता है हम खाता भी नहीं हूँ। पीता भी नहीं हूँ। तो हगता भी नहीं हूँ। बस मेरे में ताकत है। ईश्वरीय ताकत है। और उस ईश्वरीय ताकत से चलता हूँ। अब ये उनके ऊपर तो देखो ऐसे कितने मनुष्य जाकरके उनके पीछे माथा टेकते हैं। और वो कुछ नहीं बोलते हैं। ध्यान-व्यान उनको कुछ भी नहीं है। बस न वो खाता है, न पीता है। हँ? वो देखते हैं और-और कपड़ा सो पड़े हैं। अभी नाम रखा है फलाना-फलाना जगह। खाता है, पीता है। अच्छा वो क्या है फिर? वो क्या सिखलाने आया है? क्योंकि कोई दूसरा तो दुनिया में ऐसे कर नहीं सकेगा। हँ? शिक्षा भी नहीं दे सकेंगे। तो बस भावना बैठ जाती है। महात्मा है। उनके पिछाड़ी दर्शन। कितनी भीड़ लग जाती है। बस दर्शन के लिए बहुत आते रहते हैं। ओमशान्ति। (समाप्त)

So, the Father has told that those who do not go to the pure abode, the abode of liberation (muktidhaam), the abode of liberation in life (jeevanmuktidhaam), then how will they become pure? How can anyone make them [pure] at all when they are not supposed to go back at all? Fifth page of the Vani dated 1.9.67. Neither muktidhaam nor jeevanmuktidhaam. Nobody has to go. So, then who will make them pure? It is because they are not supposed to go at all because they don't have to become pure at all. So, the human beings do not know this, do they? It is because they say a lot. The sanyasis say that such and such person achieved the vaanprastha stage. Hm? He went to the abode of nirvana (nirvaandhaam). Such and such person merged into the light. Such and such person achieved moksha. Arey! How will the light merge into the light? And nobody achieves moksha at all. Moksha means liberation forever. God Himself has to come to this world. Hm? It has been written Sambhavaami Yugey-Yugey. I come in every Age. God has to come in every Age. And those devotees say that moksha was achieved. They keep on telling like this. Did you understand? They do not know as to where the soul went after leaving the body. No. Hm, if there is a Jain person, he will say that he [their guru] achieved moksha. Well, do those Jains know as to whether he achieved moksha or what happened? They just say that he achieved moksha.

There are many people, aren't there? Is the number of people increasing in the world? Is it decreasing? It is increasing. If people keep on achieving moksha like this, then the world population should decrease. Hm? The population is increasing. Hm? The older ones who are getting rebirths are anyway continuing. Newer souls, powerful souls are also descending from above. Hm? And the old ones are also getting newer births. So, the world is growing in numbers, is not it? Hm? So, they achieved moksha. Well, if one person achieved moksha, then he will enable his followers also to achieve moksha, will he not? Did you understand? That too, if there is any such nice one, only then will it be said that brother this one has achieved moksha. This one has worked very hard. He has done a lot of tapasya (penance). Intense tapasya. Hm? So, they say that the skin becomes dark as well. Hm? Have you seen the temples of these Jains? Those of dark-skinned Jains? Hm? And two temples are built in Dilwara, aren’t they? One is of white idols and one is of black idols built above. Naked idols. The skin of these Jains, the Digambar Jains becomes dark, doesn’t it? They perform tapasya. They must be doing such tapasya. So, when they leave their bodies, then it will be said, brother this one has achieved moksha. Well, who knows whether he achieved moksha? They just thought so. Arey, he has departed. He got another birth.

So, then to think that he has achieved moksha, hm, then nothing; if he has achieved moksha then none of his last rites should be performed. Hm? He has achieved moksha. People offer shraaddh, don’t they? They celebrate the thirteenth day. They do this. If he has achieved moksha, then where is the need to do all this? Hm? There is no need to do anything for the soul which has achieved moksha. He has achieved it, hasn’t he? Here, they do so that he doesn’t face any difficulty. They keep on performing many such last rites, don’t they? Hm? Some do on the thirteenth day. Then they do after a year. Then they do every fourth year. And then look, they keep on awakening Bhakti. Hm? They keep on lighting a lamp. He should not remain in darkness. Hm? The poor soul should not stumble in darkness. Isn’t it? Well, why darkness? When it has achieved moksha then there is no question of darkness. Well, here you have been explained that the soul leaves one body and takes another birth immediately. Now it took a time of one minute, didn’t it? Did you understand? A second. Now a second in this. So, there is no question of darkness in it. Here it leaves the body and there it goes and enters into the womb in a second.

So, these opposite traditions are going on in the world that they light the lamps for twelve days. Hm? And on the thirteenth day, they celebrate terahvi, they feed the Brahmins. Arey, the soul which had to leave has left; it has already reached [its destination]. It went immediately and entered a body because its body gets prepared beforehand as per its vibrations. Whose? The body of the soul which has left the body starts getting ready in the womb 3-4 months earlier. For example, if you go to a boot-maker (cobbler). You go and place an order. Hm? So, when you go, then it is immediately available. What? The boot. Hm? With what was a comparison made? A comparison was made with the boot. For what? For the body. This is the boot of the soul. The boot got ready in the womb. Hm? So, if you go to the boot-maker, you place an order. Hm? Whom did you order here? There is no question of placing an order here. The nature works automatically as per the sanskars. Did you understand? An example of the boot was given. This is also like this. That is it. You leave one boot-like body and you immediately run and enter into another boot. Does it take time? So, later there is no night, etc. there to create darkness, hm, or to create the necessity for lighting a lamp. Hm? Why do they light [a lamp] for twelve days? Why do they do all this? Hm? This tradition has been going on. Since when has it been continuing? Well, it is not as if this tradition will end. No. This tradition continues.

Then, when that time comes or whatever it is, hm, it means that you also follow that tradition. Earlier you used to do, didn’t you? Now you don’t do. And you don’t do anything at all. No ritual and tradition. Hm? All that ritual and tradition has been set aside because you know that after this body is gone it becomes soil. So, put this in water, fishes will eat. Or leave it there itself. Will anyone leave it in the house? Hm? There is no connection with it. It is because what will happen of that soil, body? It became soil, didn’t it? When it was cremated, it became ash. Hm? For example, wood is burnt and it becomes ash. Similarly, this body is also a living wood. Yes. It is not a thing to be preserved. Muslims say – Bury it in the Earth. Hm? Hindus say – No, burn it. It will not develop worms. Hm? There are small and big ones aren’t there? What? Call it wood, stick-like body, it is small and big, isn’t it? Hm? The wood of some is small, the wood of some is big. It is because you know that the tree is also initially small. Hm? That tree also becomes big. So, that soil mixed into the soil. This is ritual and tradition. What? It is a ritual and tradition of which place? Hm? Which ritual and tradition started in the Confluence Age? Hm? Arey? What happened? Hm? Yes, which ritual and tradition started? Here the soul will detach from the body on the basis of the power of Yoga. Hm? When it becomes detached, then what will the body become? Hm? The body will become a corpse, will it not? Will it become? Hm?
(Someone said something.) Buried in ice. Whether it gets buried in the ice or whatever may happen. That is about the seed-form souls. What about all others? That of all others will perish. So, the soil merges into the soul. So, go and put it in the Ganges, put it in something else.

No such ritual and tradition can be there in heaven. What? Hm? Which ritual and tradition cannot be there? Hm? When someone has to leave the body there, they voluntarily go to the sea shore. That wave of the ocean comes and takes them away. The fishes will eat up. There is no need to do anything. So, there cannot be any such ritual and tradition there. It is because there is wisdom there, isn’t it? Here, there is foolishness. What will happen by following all these rituals and traditions? For example, you children must have seen, haven’t you? Hm? They take the ashes and keep on wandering at so many places in the entire city. Hm? When someone leaves his body, they say that they will take their bones. Hm? They will put it in the Ganges.
(Someone said something.) Yes, be it anyone. He died, didn’t he? For example, Guru Govind Singh. He left his body as well. So, do they think that Guru Govind Singh left his body? Those Sikhs say for him also that brother he is present practically (haajiraa hajoor). They say that he is ‘haajiraa hajoor’. For example, it is said for the Father that the Father is practically present. Hm? Whenever you remember the Father, He presents Himself before you. Similarly, it has been thought for him that he is practically present. Well, that Guru Govind Singh is not present practically daughter, is he? Hm? So, look, his sword is so many years old; hm? They carry that sword and circumambulate in entire India. The sword. Such a huge gathering takes place. They spend so much and do what all things! So, all this takes place, doesn’t it children? Hm?

So, now you children have understood. All these rituals and traditions that they do are wasteful because the Father now comes and explains the true topic, doesn’t He? He comes and sits and explains the topic that children, the rituals and traditions that are continuing on the path of Bhakti, in different communities, in different religions, there is nothing in them. Hm? Then, what is important? Hm? Yes. Wasn’t a picture shown to you children yesterday? Children did not show this. Sixth page of the Vani dated 1.9.67. He is sitting on the chair. Or on anything. So, he came and gave a gift. He says I do not eat anything. I do not even drink. I do not even excrete. That is it; I have power. I have Godly power. And I walk with that Godly power. Well, look, so many people go and bow before him. And he does not speak anything. He does not do any meditation. He just doesn’t eat or drink anything. Hm? They see that there are clothes lying. Now it has been named such and such place. He drinks, he eats. Achcha, then what is he? What has he come to teach? It is because nobody else will be able to do like this in the world. Hm? He will not be able to teach anything. So, people just develop a feeling. He is a mahatma (great soul). They go to have a glance (darshan). So much crowd gathers. Many people keep coming just for having a glance. Om Shanti. (End)

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2664, दिनांक 08.10.2018
VCD 2664, Dated 08.10.2018
प्रातः क्लास 1.9.1967
Morning Class dated 1.9.1967
VCD-2664-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.30
Time- 00.01-22.30


प्रातः क्लास चल रहा था - 1.9.1967. बात चल रही थी; बाबा के सामने कोई चित्र लाया कोई साधु का। बताया, वो न खाता है, न पीता है। बोलता है – मेरे में ईश्वरीय ताकत है, उस पर चलता हूँ। इतने मनुष्य जाकरके माथा टेकते हैं। ज्ञान-व्यान कुछ नहीं है। कपड़ा-वपड़ा है, सो पड़े हैं फलानी-फलानी जगह में। अच्छा, क्या दिखलाने आया है? देखो, दूसरा तो कोई ऐसे कर भी नहीं सकता। और ऐसे करने की शिक्षा भी नहीं दे सकेंगे। तो बस महात्मा है। उनके पिछाड़ी दर्शन-4. बस, दर्शन के लिए बहुत आते हैं। हैं ना। बात भी करते हैं। वो समझाते, कहते हैं कि कोई भी आवे। किसको शक हो तो मेरे साथ आकरके रहे। और मेरे साथ रहकरके देखे मेरेको। अभी उनमें क्या रखा हुआ है भला। ये तो कोई ज्ञान की बात नहीं हुई ना। न कुछ योग की बात है। बाकि कोई न कोई हठयोग किया होगा, कोई किसम का, कोई प्रकार का। या तो ऐसी कोई चीज़ खाता होगा। हँ? जैसे लोग कहते हैं ना वो चिटचिटा घास होती है, उसके बीज खा ले तो भूख ही नहीं लगेगी कई दिन। आजकल देखो, वो जो भूख मरते हैं तो उनके लिए टिकिया बनाते हैं जो भई ये खाते रहेंगे तो भूख नहीं लगेगी। बनाते हैं ना बच्चे ऐसी टिकिया। अब ये क्या है? ये तो वो लोग समझें।

कई तो होते हैं ना बच्चे। पानी से भी तर जाते हैं। कई आग के ऊपर चले जाते हैं। तो इसके लिए उन्होंने कोई युक्तियाँ देखी होंगी ना, सुनी, की होंगी ना। जैसे मुसलमानों में आग का अलाव जलाते हैं लंबा-लंबा। और उस पर चलते चले जाते हैं, अंगारों के ऊपर। कैसे चले जाते होंगे? कोई मसाला लगाया होगा ना। नहीं तो मनुष्य शरीर ऐसे कैसे हो सकता है? और कोई रिद्धि-सिद्धि की भी बात होती है बहुत। ऐसे नहीं है कि कोई नहीं होती है। बहुत हैं जो उस रिद्धि-सिद्धि का भी साक्षात्कार कराते हैं। ये सब सीखते हैं कुछ। बाकि इन सब बातों में पतित से पावन बनने की तो कोई बात नहीं है। ये तो बात नहीं है कि रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अंत का कोई-कोई जाने या कोई नास्तिक से आस्तिक बन जावे। ऐसे तो कुछ है नहीं। वो तो कोई बात ही नहीं है। और न ये बातें कोई की बुद्धि में है कि सृष्टि का रचयिता कौन है, रचना का आदि, मध्य, अंत क्या है, कोई नास्तिक, आस्तिक कैसे बन सकता है। ये तो सिर्फ तुम बच्चे जानते हो कि ये सारी दुनिया इस समय नास्तिक है। क्योंकि जो वो मुख्य क्रियेटर, डायरेक्टर है, हँ, और मुख्य प्रिंसिपल एक्टर्स हैं, इस दुनिया के हैं ना। उनका तो कोई को पता ही नहीं है। तो मूल बात ये हो जाती है समझाने की। ये भी तो बाबा कहते हैं ना जहाँ भी होवे ये तो बड़े-बड़े अक्षरों में लिख देना चाहिए कि जो अपने को, अपना एक्टर समझ करके इस बेहद ड्रामा में पार्टधारी समझ करके, अगर ये पार्ट ड्रामा के या नाटक के आदि, मध्य, अंत और प्रिंसिपल एक्टर्स को नहीं जानते हैं तो उनको तो फिर जानवर ईडियट कहेंगे ना। और क्या कहेंगे? जैसे सर्कस होता है। उनमें कोई जानवर किसकी महिमा करेंगे? नहीं। जो सर्विस करते हैं, सिर पर चढ़ते हैं, फलाना करते हैं, ये करते हैं, उनकी महिमा होती है।

तो बाप बैठ करके समझाते हैं कि ये सब करने से तो कोई फायदा नहीं है। कुछ भी नहीं फायदा है। क्या सब करने से? हँ? क्या करने से? आग पे चले जाते हैं। पानी के ऊपर चले जाते हैं। हँ? भूखे रहते हैं। खाते-पीते नहीं हैं। इनसे कोई फायदा नहीं। जो कुछ भले या पंख उसको निकल आवे, समझो और कोई उड़ते हैं। जैसे शास्त्रों में जटाऊ के लिए लिखा है। पंख हुआ और उड़ा। अभी ऐसे भी कुछ होवे तो क्या है इससे फायदा? ये तो बात ही नहीं है। बाप आकरके कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारा पाप करम विनाश हो जावे। हँ? मुझे याद करो? किसे याद करो? हँ? बाप कौन? हँ? कौन बाप? निराकार बाप? साकार बाप? अलौकिक बाप? किसको याद करने से विकर्म विनाश हो जावें? हँ? हँ? शिवबाबा को याद करने से विकर्म विनाश हो जावें। शिव? शिव तो बाबा होता ही नहीं। शिव तो आत्माओं का बाप है। बाबा कहाँ से हो गया? हँ? बाबा कहें तो निराकार को साकार में आना पड़े। हँ? और वो साकार कहेंगे मुझे याद करो? हँ? निराकार कहेंगे मुझे याद करो? कौन कहेंगे मुझे याद करो? हँ? निराकार कहेंगे मुझे याद करो? निराकार से क्या मिलेगा? निराकार बाप से तो निराकारी वर्सा मिलेगा। हँ? ऐसे तो कोई याद करते ही नहीं थे कि हमें आकरके निराकारी ज्ञान का वर्सा दो। पतित-पावन आओ, ऐसे बुलाते थे। हम पतितों को आकर पावन बनाओ। हँ?

किसको याद करने से विकर्म विनाश होंगे? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) साकार में निराकार को याद करने से विकर्म विनाश होंगे? अच्छा? जो साकार में बताया उस साकार ने किसको याद किया? अरे, बताओ भाई। हँ? उस साकार ने किसको याद किया जो विकर्म विनाश हुए? (किसी ने कुछ कहा।) निराकार को याद किया। तो वो निराकार को याद करके विकर्म विनाश कर सकता है तो हम नहीं कर सकते? क्यों नहीं कर सकते? हँ? उसको हाथ-पांव और टांगें ज्यादा हैं क्या? आँख, नाक, कान ज्यादा हैं? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) साकार उपासी चरित्रवान होते हैं। अच्छा? तो जो भी धरमपिताएं हैं वो सब साकार ही तो हैं। उनको याद करने वाले सब चरित्रवान हुए होंगे उनके फालोअर्स। हँ? क्यों? कृष्ण साकार नहीं है सतयुग में? तो फिर? कृष्ण को भगवान कहके कितना याद करते हैं। माताएं तो बहुत याद करती हैं। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) वो संपूर्ण नहीं है कृष्ण? 16 कला संपूर्ण नहीं है? वाह भाई। ये नई बात बता रहा। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 16 कला से भी ऊँच को याद करें? अच्छा? 16 कला से ऊँच को याद करेंगे तो क्या 16 कला ऊँच से क्या होता है? ऊँच क्या होता है? 17 कला? हँ? लिमिट नहीं है उसकी। 100 कला, 200 कला, दस। हँ?

बाप आकरके कहते हैं मुझे याद करो। आकरके कहते हैं। कहाँ से आते हैं? हँ? निराकारी धाम से आते हैं। आत्मलोक से आते हैं। कहते हैं मुझे याद करो। तो जैसे को याद करेंगे वैसे ही बनेंगे ना। हँ? कैसे बनेंगे? हँ? और?
(किसी ने कुछ कहा।) कलातीत को याद करो? तो कलातीत हो जाएंगे? हँ? कितने जनम के लिए? (किसी ने कुछ कहा।) एक जनम के लिए? लो, हो गया कबाडा। हँ? अरे, इस दुनिया में आत्माएं 84 के चक्कर में आती है कि एक जनम के चक्कर में आती हैं? हँ? 84 के चक्कर में आती हैं। फिर ये क्या रास्ता बताया? हँ? बाप आकर कहते हैं मुझे याद करो। मुझे याद करो। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) पहला जनम कलातीत बनेगा। अच्छा? माना जो सतयुग में कृष्ण पैदा होता है 16 कला संपूर्ण वो पहला जनम लेता है? वो नहीं लेता। तो उसके पाप करम भस्म नहीं होते? हँ? बड़ी मुसीबत। उसके पाप करम भस्म होते हैं कि नहीं? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) उनको जनम देने वालों की बात है। उनके पाप भस्म होते हैं जनम देने वालों के? और 16 कला संपूर्ण कृष्ण के पाप भस्म नहीं होते? हँ? वाह। माताजी कह रही है उसके भी होते हैं। होते हैं? फिर? जो उनके पाप भस्म होते हैं, विकर्म विनाश हो जावें तो उन्होंने क्या किया? कलातीत बने? हँ?

विकर्म विनाश होंगे ज्ञान चिता पर चढ़ने से। सारी सृष्टि के पाप कर्म भस्म होने हैं। सारी सृष्टि के पाप कर्म भस्म होने के लिए कलातीत बनना पड़ेगा। अरे? हँ? उठाय के रख दिया। हँ? आकरके कहते हैं ज्ञान चिक्षा पर चढ़ो। योग चिता पर चढ़ो। हँ? ज्ञान चिता पर चढ़ो? ये क्या होती है ज्ञान चिता? चिता में तो अग्नि जलती है। हं? ये भी ज्ञान अग्नि है। योगाग्नि है। अग्नि में क्या होता है? अग्नि में जो कुछ भी डाला जाएगा सब भस्म हो जाता है। क्या डाला जाएगा? जो भी स्थूल चीज होगी वो भसम हो जाएगी। और आत्मा तो स्थूल है नहीं। कहते हैं ना प्रह्लाद को उसकी बुआ को वरदान मिला हुआ था। वो आग में भसम नहीं होती। तो वो गोद में लेके बैठ गई। तो प्रह्लाद तो भसम नहीं हुआ। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, होलिका। तो क्या नहीं भसम हुआ? तो ज़रूर आत्मिक स्थिति में था। हँ? नाम ही है प्रह्लाद। प्रः माना प्रकष्ठ, बहुत कुछ अच्छा। आह्लाद माना खुशी देने वाला। बहुत-बहुत खुशी देने वाला तो वो ही हो सकता है जो आत्मिक स्थिति में हो, जैसे देवताएं। फिर कहते हैं योग चिक्षा पर चढ़ो। हँ? तो योग चिक्षा पर चढ़ो। ये योग किससे लगाने की चिता है? हँ? किससे योग लगाना है? हँ? कहते हैं शंकर ने योग लगाया शिव के साथ तो वो शिव समान बन गया। लोग कहने लगे शिव शंकर एक ही है। तो क्या पक्का हो गया किससे योग लगाएं? हँ? नहीं पक्का हुआ? क्या? योग लगाना है, ज्ञानाग्नि में बैठना है, योगाग्नि में बैठना है तो जिसके साथ योग लगाएंगे वैसे ही बनेंगे। तो वो निराकार शिव जिसमें प्रवेश करते हैं, उसको ज्ञान चिक्षा पर बिठाते हैं, योग चिता पर बैठाते हैं, तो वो पवित्र बनता है। क्योंकि योग अक्षर जो है ना ये तो योगाग्नि का नाम है। तो चिता में तो अग्नि होती है ना। योगाग्नि। अभी ये स्थूल अग्नि तो नहीं कहेंगे। हँ? नहीं। ये तो उससे लगन लगाने की बात है जो खुद पवित्र हो।

A morning class dated 1.9.1967 was being narrated. The topic being discussed was; someone brought a picture of a Sadhu (saint) in front of Baba. He said, he neither eats nor drinks. He says – I have Godly power; I live on that power. So many people go and bow before him. He does not have any knowledge. He has some clothes which are lying scattered. Achcha, what has he come to show? Look, nobody else can do like this. And they will not be able to teach anyone to do like this. So, he is just a saint (mahatma). People throng to see him; that is it; many people come to see him, isn’t it? He also talks. He explains; he says that anyone may come. If anyone has a doubt he can come and live with me. And they can live with me and check me. Well, what is there in him? This is not a topic of knowledge, isn’t it? Neither is there any topic of Yoga. He must have done some kind of hathyoga (physical Yoga). Or he must be eating any such thing; hm? For example, Jains say that there is a chitchita grass; if someone eats its seeds, then he will not feel hungry for many days. Look, now-a-days they prepare such a cake for those who starve that brother, if you keep on eating this, you will not feel hungry. Children, they prepare such a cake, don’t they? Well, what is it? Those people should understand this.

Children, there are many who cross river bodies; many walk over fire. So, they must have seen some tact for this; they must have heard, done. For example, Muslims lay long carpets of burning coal and walk on that, on the burning coal. How do they walk? They must have applied some spices. Otherwise, how can the human body be like this? And there is no topic of much riddhi-siddhi (magic). It is not that there is not. There are many who cause visions of that magic. They learn all this. There is no topic of becoming pure from sinful in these topics. There is no topic of making anyone aware about the creator and the beginning, middle and end of the creation or that anyone becomes theist from atheist. There is no such thing. There is no such topic at all. Nor are these topics in anyone’s intellect that who is the creator of the world, what is the beginning, middle and end of the creation or that how anyone can become theists from atheists. Only you children know that this entire world is atheist at this time. It is because that main creator, director, hm and the main principal actors belong to this world, don’t they? Nobody knows about them at all. So, the main topic to be explained is this. Baba also says that wherever possible you should write this in bold letters that if someone considers himself to be an actor, considers himself to be an actor in this unlimited drama and if he does not know about the beginning, middle and end of the drama and does not know about the principal actors of the drama, then he will be called an animal, an idiot only. What else will he be called? For example, there is circus. Will the animals praise anyone? No. Those who do service, climb to the head [of Baba], do this, do that are praised.

So, the Father sits and explains that there is no benefit in doing all this. There is no benefit. By doing what all? Hm? By doing what? They walk on the fire. They walk on water. Hm? They remain hungry. They do not eat or drink. There is no benefit from it. Suppose he develops feathers and starts flying. For example, it has been written for Jatayu in the scriptures. He got feathers and flew. Well, even if any such thing happens then what is its benefit? This is not any important. The Father comes and says – If you remember Me your sins will be destroyed. Hm? Remember Me? Whom should you remember? Hm? Who is the Father? Hm? Which Father? Incorporeal Father? Corporeal Father? Alokik Father? By remembering whom will the sins be burnt? Hm? Hm? The sins will be burnt by remembering ShivBaba. Shiv? Shiv is not Baba at all. Shiv is the Father of souls. How is he Baba? Hm? If you call Him Baba, then the incorporeal has to come in corporeal form. Hm? And will that corporeal say – Remember Me? Hm? Will the incorporeal say – Remember Me? Who will say – Remember Me? Hm? Will the incorporeal say – Remember Me? What will you get from the incorporeal? You will get incorporeal inheritance from the incorporeal Father. Hm? Nobody used to remember like this at all that come and give us the inheritance of incorporeal knowledge. You used to call – O purifier of the sinful ones, come. Come and make us sinful ones pure. Hm?

By remembering whom will the sins be burnt? Hm?
(Someone said something.) Will the sins be burnt by remembering the incorporeal within the corporeal? Achcha? The corporeal that you mentioned, whom did that corporeal remember? Arey, speak up brother. Hm? Whom did that corporeal remember that his sins got burnt? (Someone said something.) He remembered the incorporeal. So, if he can burn his sins by remembering the incorporeal, then can’t we? Why can’t we? Hm? Does he have any extra limbs? Does he have extra eyes, nose, and ears? Hm? (Someone said something.) Those who worship the corporeal are good-charactered (charitravaan). Achcha? So, all the founders of religions are corporeal only. Their followers, who remembered them must have been good-charactered. Hm? Why? Isn’t Krishna corporeal in the Golden Age? So, then? Krishna is remembered so much calling him as God. Mothers remember him a lot. Hm? (Someone said something.) Is that Krishna not complete? Is he not perfect in 16 celestial degrees? Wow brother! He is telling a new thing. Hm? (Someone said something.) Should we remember someone who is higher than 16 celestial degrees? Achcha? If you remember someone who is higher than 16 celestial degrees, then what is higher than 16 celestial degrees? What is higher? 17 degrees? Hm? There is no limit for that. 100 celestial degrees, 200 celestial degrees, ten. Hm?

The Father comes and says – Remember Me. He comes and says. From where does He come? Hm? He comes from the incorporeal abode. He comes from the Soul World. He says – Remember Me. So, you will become like the one whom you remember, will you not? Hm? How will you become? Hm? And?
(Someone said something.) Should you remember the kalaateet (one who is beyond celestial degrees)? So, will you become kalaateet? Hm? For how many births? (Someone said something.) For one birth? Look, everything has been ruined. Hm? Arey, do the souls pass through the cycle of 84 [births] in this world or do they pass through the cycle of one birth? Hm? They pass through the cycle of 84 births. Then what is this path that was narrated? Hm? The Father comes and says – Remember Me. Remember Me. Hm? (Someone said something.) The first birth will become kalaateet. Achcha? Does it mean that the Krishna who is born in the Golden Age as perfect in 16 celestial degrees gets the first birth? He does not get. So, don’t his sins get burnt? Hm? It has become a big problem. Do his sins get burnt or not? Hm? (Someone said something.) It is a topic of the one who gives birth to him. Do the sins of those who give birth get burnt? And don’t the sins of the Krishna perfect in 16 celestial degrees get burnt? Hm? Wow! Mataji says that his sins also get burnt. Do they get burnt? Then? If his sins get burnt, if his sins are burnt, then what did he do? Did he become kalaateet? Hm?

The sins will be burnt by getting on the pyre of knowledge. The sins of the entire world are to be burnt. In order to enable the sins of entire world to be burnt, you will have to become kalaateet. Arey? Hm? You kept it (the blackboard) aside. Hm? He comes and says – Climb on the pyre of knowledge. Climb on the pyre of Yoga. Hm? Should you climb on the pyre of knowledge? What is this pyre of knowledge? There is fire in the pyre. Hm? This is also fire of knowledge. It is a fire of Yoga. What is there in fire? Whatever is put in the fire is burnt. What is put? Whatever physical thing is put will be burnt. And the soul is not physical. It is said that Prahlad’s paternal aunt had received a boon. She does not get burnt in fire. So, she took him in her lap and sat [in fire]. So, Prahlad wasn’t burnt. Hm?
(Someone said something.) Yes, Holika. So, what wasn’t burnt? So, definitely he was in a soul conscious stage. Hm? The name itself is Prahlaad. Prah means prakashth (special), very good. Aahlaad means something that gives joy. Only the one who is in soul conscious stage can be a giver of lot of happiness, like the deities. Then He says – Climb on the pyre of Yoga. Hm? So, climb on the pyre of Yoga. This is a pyre of having Yoga with whom? Hm? With whom should you have Yoga? Hm? It is said that Shankar had Yoga with Shiv, so he became equal to Shiv. People started telling that Shiv and Shankar are one. So, what should you finalise that with whom should you have Yoga? Hm? Haven’t you finalised? What? You have to have Yoga, you have to sit in the fire of knowledge, you have to sit in the fire of Yoga; so, you will become like the one with whom you have Yoga. So, the one in whom that incorporeal Shiv enters, He makes him sit on the pyre of knowledge, pyre of Yoga, so, he becomes pure. It is because the word Yoga is a name of fire of Yoga, isn’t it? So, there is fire in a pyre, isn’t it? Fire of Yoga. Now it will not be called this physical fire. Hm? No. It is about having devotion with the one who is pure himself.
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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2665, दिनांक 09.10.2018
VCD 2665, Dated 09.10.2018
प्रातः क्लास 1.9.1967
Morning Class dated 1.9.1967
VCD-2665-extracts-Bilingual

समय- 00.01-23.29
Time- 00.01-23.29


प्रातः क्लास चल रहा था - 1.9.1967. शुक्रवार को सातवें पेज के लगभग मध्य में बात चल रही थी - माया बड़ी जबरदस्त है। ये बाप ने आकरके समझाया है। दुनिया कोई नहीं कहती है कि एक बाप ही है। वो आकरके साधारण तन में बैठ करके कहते हैं - मीठे बच्चों, ये माया बड़ी दुस्तर है। जबरदस्त है। ये जैसे मैं, मेरे को कहा जाता है वर्ल्ड आलमाइटी अथारिटी। जैसे मेरे को कहा जाता है। कहा जाता है कि है? हँ? जैसे मेरे को कहा जाता है वर्ल्ड आलमाइटी, ऐसे ये रावण भी वर्ल्ड आलमाइटी है। हँ? ये पांच विकार। देखो, ये आधा कल्प पूरा; हँ? किसकी तरफ इशारा किया पांच विकार? हँ? देखो। किसको देखें? पांच विकारों को देखो। आधा कल्प पूरा। वर्ल्ड आलमाइटी। अभी तुमने जाना, हँ, कि अभी भी नहीं जाना आलमाइटी कौन है? हँ? अच्छा! जो वो आलमाइटी है दुश्मन, उनको फिर जलाते भी आते हैं। और दुश्मन की एफिजी को जलाना कहाँ से सीखे? हँ? सो बताओ। हँ? अरे, कुछ भी जवाब नहीं। कहाँ से जलाना सीखे? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, हाँ, रावण की एफिजी को कहाँ से जलाना सीखे? (किसी ने कुछ कहा।) संगम से। कैसे? संगमयुग में तो ब्राह्मणों की दुनिया होती है। ब्राह्मण कहाँ रावण की एफिजी बनाते हैं? हँ? बेसिक में? बेसिक में रावण की एफिजी बनाते हैं। नहीं बनाते? बनाते तो हैं। हँ? जैसे दुनिया वाले रावण की एफिजी बनाते हैं तो बेसिक वाले भी बनाते हैं, जलाते हैं। हँ? कहाँ से सीखे? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) पांच विकारों ने सिखाया? पांच विकारों को जलाते हैं? कौन हैं पांच विकार? हँ?

बताया। ये पांच विकार। देखो, इनको देखो आधा कल्प पूरा ये पांच विकार। पांच विधर्मी। पांच विपरीत धर्मी। अच्छा! तो इनको जलाना कहाँ से सीखे? कहते संगमयुग से। हँ? कौन जलाता है? हँ? और किसको जलाता है संगमयुग में? हँ? कहेंगे बेसिक ज्ञान वाले जलाते हैं। एडवांस वाले नहीं जलाते? हँ? अरे! जलाते हैं ना। तो किसको जलाते? एडवांस वाले किसको जलाते? कहते हैं पांच विकार हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार। इनको जलाते हैं। अच्छा! कहाँ से सीखे? कहते हैं संगमयुग से सीखे। कौन सीखे? बेसिक वाले सीखे कि एडवांस ज्ञान वाले ब्राह्मण सीखे? हँ? किससे सीखे? अरे! चलो एडवांस वाले सीखे? बेसिक वाले नहीं सीखे? वे नहीं सीखे? अच्छा? माताजी कहती बेसिक वालों ने थोड़ेही जलाना सीखा? एडवांस वाले जलाते हैं। तो किससे सीखा एडवांस वालों ने? चलो एडवांस वालों ने ही सही। एडवांस वाले माना बीजरूप दुनिया वाले ब्राह्मण। वो किससे सीखा? हँ? अरे? अरे, उसका नाम तो बताओ, किससे सीखा? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) शिवबाबा से सीखा? वाह! शिवबाबा ये जलाने करने का काम करता है? हँ? एफिजी बनाता है? ये धंधा रह गया बाबा को? हँ? वो भी शिवबाबा? हँ? अकेला बाबा बोला होता तो भी ठीक है। नाम लगा दिया शिवबाबा, जो कल्याणकारी है। शिव माने कल्याणकारी। वो जलाता है? हँ? अरे, किससे सीखे? हँ, कहाँ चक्कर में पड़ गए?

राम से सीखे? हाँ। पहले-पहले कौन जलाता है? रावण? हँ? कौन जलाता है? अरे, राम ही तो रावण बनता है। जब रावण बनता है तो देह अभिमानी है कि आत्म अभिमानी? हँ? देह अभिमानी। वो देह अभिमानी है तब थोड़ेही जलाएगा? वो देह अभिमानी को बाप आकरके बताते हैं तुम तो आत्मा हो। तुम देह थोड़ेही हो? हँ? तुम आत्मा हो। देह पांच तत्वों का पुतला थोड़ेही हो। तो फिर पहले-पहले कौन जलाता है रावण को? जिससे सारी दुनिया ने, भारतवासियों ने खास सीखा? हँ? पहले-पहले कौन जलाता? जिसने पहले जलाया होगा वो ही सिखाएगा। हँ? तो बताया राम ही रावण बनता है। हँ? तो जब राम बना, राम माने योगी। हँ? राम माने योगी कि भोगी? हँ? योगी। तो जब योगी योगाग्नि जलाता है तो रावण जलता है। हँ?

अब समझ में आया ये रावण जलाना कहाँ से सीखे? हँ? रावण से सीखे। क्योंकि ये रावण पुराना दुश्मन है ना। हँ? नया दुश्मन है या पुराना दुश्मन है? कितना पुराना दुश्मन है? हँ? बताओ। तो ढ़ाई हज़ार साल पुराना दुश्मन है। अच्छा? उससे पहले दुश्मन नहीं था? हँ? दुश्मन नहीं था? दोस्त था? कब? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) अनंग था? अच्छा, राम को शरीर ही नहीं था? राम को, राम ही तो रावण बनता है। फिर? हँ? पुराना दुश्मन है। तो अभी भी कोई दुश्मन होते हैं, हँ, तो पुराना दुश्मन है। लेकिन अभी तो जो दुनिया है वो तो नई बन गई ना बाद में। रावण की भी नई दुनिया है। है कि नहीं? पॉम्प एंड शो वाली? दिखावा बहुत करती है। तो अभी भी कोई दुश्मन होते हैं। तो देखो, फिर वो कोई का भी होते हैं दुश्मन। हँ? वो कोई का भी दुश्मन हो। काम के दुश्मन, क्रोध। जैसे वो चीन का है। हँ? 67 में कौन चीन का दुश्मन था? हँ? 67 में, वाणी 67 की है ना। तो 67 में चीन का दुश्मन कौन था? हँ? 67 में? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) वो तो 64 में युद्ध हुआ। ये वाणी तो 67 की चल रही है ना। जैसे वो चीन का है। वो चीन का दुश्मन है। वो। हँ? बाबा तो भारत में बैठ के मुरली चला रहे हैं ना। तो वो किस तरफ, किस तरफ इशारा किया? तो उनका भी एफिजी बना करके वो जलाते रहते हैं। हँ? वो जलाते रहते हैं क्योंकि दुश्मन है। तो एफिजी तो बहुतों की जलाते हैं। हँ? ऐसे नहीं सिर्फ रावण की जलाते हैं कि भई राम ही रावण बनता है।

तो उस रावण की एफिजी जलाते हैं। हँ? जैसे कोई दुश्मन है नेहरू का। हँ? है कोई कि नहीं? नेहरू का कोई दुश्मन है। कोई है। उनकी एफिजी। कोई होएंगे, फलाने, ढ़िकाने। कोई होंगे। हाँ। टीरे, फलाने। तो ये तो बनाते रहते हैं ना। हँ? क्या बनाते रहते हैं? एफिजी बनाते रहते हैं। अब ये रसम कहाँ से पड़ी? हँ? कहाँ से पड़ी? कहाँ माने स्थान बताओ। हँ? ये रसम कहाँ से पड़ी? रसम बताओ कहाँ से शुरू हुई? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) से, में भारत से? हँ? भारत से रसम शुरु हुई? संगम में भारत से शुरू हुई। अच्छा? संगम तो समय का, टाइम नाम हो गया। तो, संगम तो 100 साल का है। तो उसमें फिर खोद के निकालना चाहिए। आखिर सौ साल में क्या हर साल में रसम पड़ती रही? हँ? कि कोई खास टाइम होगा जहाँ से रसम पड़ी? हँ? एक तो संगम टाइम का नाम बताया। (किसी ने कुछ कहा।) यज्ञ के आदि से ही रसम पड़ गई? ओहो! हँ? यज्ञ के आदि से ही रसम पड़ गई? हँ? राम ने अपने दुश्मनों को पहचान लिया उसी समय? हँ? अरे, राम पहले अपने को पहचानेगा, तब अपने अंदर के रावण को पहचानेगा। हँ? तब फिर योगबल से जलाएगा। (किसी ने कुछ कहा।) कलियुग के अंत? अभी संगम बता रहे ये, अभी कलियुग में 1200 वर्ष में पहुँच गए। कलियुग तो साढ़े बारह सौ वर्ष का होता है। (किसी ने कुछ कहा।) 1976 से रसम पड़ी? अच्छा?

अच्छा चलो, ये तो टाइम की बात हो गई। कहाँ से पड़ी? स्थान बताओ। हँ? कहाँ? कहाँ माने स्थान। कहाँ? दिल्ली से पड़ी? ओहो। कह रहे हैं दिल्ली से पड़ी। दिल्ली से रावण जलाना शुरू हुआ? रसम रावण जलाने की दिल्ली से शुरू हुई? हँ? दिल्ली तो कहते हैं स्थापनाकारी है। हँ? दिल्ली नार्थ इंडिया में है या साउथ इंडिया में?
(किसी ने कुछ कहा।) कम्पिला से? आ हा। कम्पिला से रावण को जलाना शुरू किया? अच्छा? कपिल मुनि ने रावण जलाने का धंधा शुरू किया क्या? हँ? विस्तार किया रावण का कौन-कौन से सिर हैं। बम्बई है विनाशकारी। हाँ। नार्थ इंडिया की राजधानी तो खास, पहले तो भारत नार्थ इंडिया में ही था ना। दक्षिण भारत में तो भारत था ही नहीं। तो भारत, दक्षिण भारत तो बाद में निकला ना समन्दर में से। तो वो हो गया दक्षिण भारत, भारत का विदेश। और नार्थ इंडिया हो गया भारत। हँ? तो दिल्ली जो भारत की राजधानी, नई दुनिया में भी थी और अभी पुरानी दुनिया में भी राजधानी है, वो तो स्थापनाकारी है। तो वो स्थापना करेगी या जलाएगी? हँ? जलाएगी? हँ? नहीं भाई, ये तो बात जंची नहीं। कहाँ से रसम पड़ी? भारत में कहाँ से रसम पड़ी? हँ? ये कहाँ से सीखे हैं? स्थान बताओ। हँ? कहते हैं दिल्ली से सीखे। दिल्ली से कैसे? हँ? दिल्ली में रावण बहुत जबरदस्त काम करता है क्या? हँ? और दिल्ली में राम का गायन है क्या? अरे! संगमयुग में जो होता है उसका गायन कहाँ होता है? भक्तिमार्ग में गायन होता है ना। चाहे राम हो और चाहे रावण हो। कहाँ से सीखे? तो दिल्ली से सीखे बता रहे। हँ?

अब सीखे हैं ये। कौन? ये कहके किसकी तरफ इशारा किया? हँ? अब सीखे हैं ये। किसकी तरफ इशारा किया? हँ? ब्रह्मा बाबा की तरफ इशारा किया। जन्म-जन्मान्तर सीखे हैं। और रावण को जलाने की परंपरा चली आ रही है। हँ? जहाँ से शुरुआत की होगी वहाँ से रावण को जलाने की परंपरा। तो ये परंपरा से रावण को जलाते रहते हैं। तो शुरुआत कहीं से तो हुई होगी। हँ? कहाँ से हुई? रावण को जलाते रहते हैं क्योंकि दुश्मुन है ना। अहं। अभी दुश्मुन है। अभी दुश्मन है? पहले नहीं था? अभी बड़ा दुश्मन है कि पहले बड़ा दुश्मन था? हँ? अभी दुश्मन है? अभी बड़ा दुश्मन है – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, हँ, ये कलियुग के अंत तक सब इकट्ठे हो जाते हैं ना। तो अभी बड़ा है। शुरुआत में तो काम विकार ही था। पहले सतो, बाद में तमो। काम विकार का मुखिया कहा जाता है ना। हँ? जो और जो भी विकार हैं उनका मुखिया डकैत कौन है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) गधा? अच्छा? गधा मुखिया है? हँ? गधा कैसे मुखिया है? रावण को कोई गधा कहेगा? रावण ज्ञानी है या गधा है? हँ? बताओ। रावण तो बहुत ज्ञानी था। रावण के ऊपर कंट्रोलर था गधा। तो माना गधा अलग है। रावण अलग है। गधा किसी को रुलाता है बिचारा? हँ? सारा दिन काम करता है और रात को जाकरके धोबी के घर में, कुम्हार के घर में, हँ, गाय भैंस की जो घास पड़ी होती है, जूठी-जाठी, सो बिचारा खाकरके सो जाता है। हँ? गधा दुश्मन है? इतना सीधा-सादा। बताओ। अभी तो कहते थे रावण दुश्मन है। हँ? गधा का पार्ट है। वो आत्मा, उसमें प्यार का पार्ट भरा हुआ है, सहनशक्ति का पार्ट भरा हुआ है, गधा सब कुछ सहन करता है, हँ, या रावण हो गया? बताओ। हँ?

दुश्मुन है अभी। कैसा है? अब आए कैसा पर। कैसा दुश्मन है? हँ? बहुत ऊँचे किसम का दुश्मन है, मीडियम है या नीचे किसम का है? कैसा है? और कब है ये दुश्मन? हँ? ये दुश्मन कबसे है? बिल्कुल कुछ भी नहीं जानते एकदम। लो, अच्छा! वो तो दुनियावाले नहीं जानते हैं। हम ब्राह्मण तो जानना चाहिए ना। हमको तो बाबा ने सारा ज्ञान दे दिया ना। नहीं दे दिया? हँ? एक और प्रश्न कर दिया। कबसे दुश्मन है और कैसा दुश्मन है? हँ। और कहाँ से सीखे जलाना? शुरुआत कहाँ से हुई? दुनिया वाले तो कुछ भी नहीं जानते एकदम।

A morning class dated 1.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in about the middle of the seventh page on Friday was – Maya is very strong. The Father has come and explained this. The world doesn’t say that there is only one Father. He comes and sits in an ordinary body and says- Sweet children, this Maya is very difficult (dustar). It is strong. It is; just as I am called World Almighty Authority, just as I am called; is He called or is He in reality? Hm? Just as I am called World Almighty, similarly this Ravan is also World Almighty. Hm? These five vices. Look, for the entire half a Kalpa. World Almighty. Now you have come to know, hm, or haven’t you still come to know as to who is Almighty? Hm? Achcha! That Almighty who is an enemy is then also burnt. And where have they learnt to burn the effigy of the enemy? Hm? Tell about that. Hm? Arey, there is no reply. Where did they learn to burn? Hm?
(Someone said something.) Yes, yes, where did they learn to burn the effigy of Ravan? (Someone said something.) From the Confluence Age. How? There is a world of Brahmins in the Confluence Age. Do the Brahmins prepare the effigy of Ravan? Hm? In basic? They prepare the effigy of Ravan in basic. Don’t they prepare? They do prepare. Hm? Just as the people of the world prepare the effigy of Ravan, those following the basic [knowledge] also prepare and burn. Hm? Where did they learn? Hm? (Someone said something.) Did the five vices teach? Do they burn the five vices? Who are the five vices? Hm?

It was told. These five vices. Look, look at them; for complete half a Kalpa these five vices. Five vidharmis. Followers of five opposite religions. Achcha! So, where did you learn to burn these? It is said – From the Confluence Age. Hm? Who burns? Hm? And whom does he burn in the Confluence Age? Hm? It will be said that those who follow the basic knowledge burn. Don’t those who follow the advance [knowledge] burn? Hm? Arey! They burn, don’t they? So, whom do they burn? Whom do those who follow the advance [knowledge] burn? They say – there are five vices – Lust, anger, greed, attachment, ego. They burn these. Achcha! Where did they learn? They say – We learnt from the Confluence Age. Who learnt? Did those who follow the basic [knowledge] learnt or did those who follow the advance [knowledge] learn? Hm? From whom did they learn? Arey! Okay, did those who follow the advance [knowledge] learn? Didn’t those who follow the basic [knowledge] learn? Did they not learn? Achcha? Mataji says – Those who follow the basic [knowledge] did not learn to burn. It is those who follow the advance [knowledge] who burn. So, from whom did those who follow the advance [knowledge] learn? Okay, be it those who follow the advance [knowledge]. Those who follow the advance [knowledge] means the Brahmins of the seed-form world. From whom did they learn? Hm? Arey! Arey, tell his name; from whom did they learn? Hm?
(Someone said something.) Did they learn from ShivBaba? Wow! Does ShivBaba perform this task of burning, etc.? Hm? Does He prepare effigy? Is this the only task left to be done by Baba? Hm? That too ShivBaba? Hm? It would have been correct had you uttered just Baba. You named ShivBaba, who is benevolent. Shiv means benevolent. Does He burn? Hm? Arey, from whom did they learn? Hm? Where are you confused?

Did they learn from Ram? Yes. Who burns first of all? Ravan? Hm? Who burns? Arey, Ram himself becomes Ravan. When he becomes Ravan, is he body conscious or soul conscious? Hm? Body conscious. Will he burn when he is body conscious? The Father comes and tells that body conscious one that you are a soul. Are you a body? Hm? You are a soul. You are not a body, an effigy made up of the five elements. So, first of all who burns Ravan, from whom the entire world, especially the Indians learnt to burn? Hm? Who burns first of all? Only the one who burnt first of all would teach. Hm? So, it was told that Ram himself becomes Ravan. Hm? So, when he became Ram; Ram means yogi. Hm? Does Ram mean yogi or bhogi (pleasure-seeker)? Hm? Yogi. So, when the yogi lights the fire of Yoga, then Ravan burns. Hm?

Did you now understand as to where did you learn to burn this Ravan? Hm? You learnt from Ravan. It is because this Ravan is an old enemy, isn’t he? Hm? Is he a new enemy or an old enemy? How old an enemy is he? Hm? Speak up. So, he is 2500 years old enemy. Achcha? Wasn’t he an enemy before that? Hm? Wasn’t he an enemy? Was he a friend? When? Hm?
(Someone said something.) Was he anang (without the organ of lust)? Achcha, didn’t Ram have a body at all? Ram himself becomes Ravan. Then? Hm? He is an old enemy. So, even now there are some enemies, hm, so, he is an old enemy. But now the world has become new later on. There is a new world of Ravan also. Is it or isn’t it? The one with pomp and show? It shows off a lot. So, even now there are some enemies. So, look, then there are enemies of anyone. Hm? Be it anyone’s enemy. Enemy of lust; anger. For example, of that China. Hm? Who was China’s enemy in 67? Hm? In 67; it is a Vani dated 67, isn’t it? So, who was the enemy of China in 67? Hm? In 67? Hm? (Someone said something.) That war took place in 64. This is a Vani dated 67 being narrated, isn’t it? For example, that is of China. That is an enemy of China. That. Hm? Baba is sitting in India and narrating the Murli, isn’t He? So, in which direction was a gesture made? So, they prepare their effigies also and keep on burning them. Hm? They keep on burning because they are enemies. So, effigies of many are burnt. Hm? It is not as if they burn that of just Ravan that brother Ram himself becomes Ravan.

So, they burn the effigy of that Ravan. Hm? For example, there is an enemy of Nehru. Hm? Is there or isn’t there? There is an enemy of Nehru. There is someone. His effigy. There must be someone, XYZ. There must be someone. Yes. Someone, someone. So, they keep on preparing, don’t they? Hm? What do they keep on making? They keep on making effigies. Well, where did this tradition start? Hm? Where did it start? ‘Where’ means tell the name of the place. Hm? Where did this tradition start? Tell, where did this tradition start? Hm?
(Someone said something.) From India? Hm? Did the tradition start from India? It started from India in the Confluence Age. Achcha? Confluence Age is the name of the time. So, the Confluence Age is of 100 years. So, then you should dig up from that. Was the tradition laid in every year of the 100 years? Hm? Or was there a specific time when the tradition was started? Hm? One name was of the time of Confluence Age. (Someone said something.) Was the tradition laid in the beginning of the Yagya itself? Oho! Hm? Was the tradition started in the beginning of the Yagya itself? Hm? Did Ram recognise his enemies at that time itself? Hm? Arey, Ram will recognise himself first; then he will recognise the Ravan within him. Hm? Then he will burn it with the power of Yoga. (Someone said something.) In the end of the Iron Age? Just now you were mentioning Confluence Age; now you have reached the Iron Age within 1200 years. The Iron Age is of 1250 years. (Someone said something.) Was the tradition started from 1976? Achcha?

Okay, this is about the time. Where did it start? Name the place. Hm? Where? ‘Where’ means place. Where? Was it started from Delhi? Oho! He is telling that it started from Delhi. Did people start burning Ravan in Delhi? Did the tradition of burning Ravan start from Delhi? Hm? It is said that Delhi is constructive (sthaapnaakaari). Hm? Is Delhi in north India or in south India?
(Someone said something.) From Kampila? Aa ha. Did people start burning Ravan from Kampila? Achcha? Did Sage Kapil start the business of burning Ravan? Hm? Did he expand the meaning of Ravan as to which all heads he has? Bombay is destructive (vinaashkaari). Yes. The capital of north India especially; in the past India was limited to north India only, wasn’t it? India did not exist in south India at all. So, India, south India emerged later from the ocean, didn’t it? That is south India; India’s abroad. And north India is India (Bhaarat). Hm? So, Delhi which was India’s capital in the new world and is the capital now in the old world as well, is constructive. Will it cause establishment or will it burn? Hm? Will it burn? Hm? No brother, this reply does not appear to be correct. Where did the tradition start? Where did the tradition start in India? Hm? Where did they learn this? Reveal the place. Hm? You say you learnt from Delhi. How did you learn from Delhi? Hm? Does Ravan perform a strong task in Delhi? Hm? And is there the praise of Ram in Delhi? Arey! Where are the acts of the Confluence Age praised? It is praised on the path of Bhakti, isn’t it? Be it Ram or be it Ravan. Where did they learn? So, they say that they learnt from Delhi. Hm?

This one (ye) has learnt now. Who? Towards whom was a gesture made by uttering ‘ye’? Hm? This one has learnt now. Towards whom was a gesture made? Hm? A gesture was made towards Brahma Baba. He has learnt birth by birth. And the tradition of burning Ravan has been going on. Hm? The place from where the tradition of burning Ravan must have started. So, they keep on burning Ravan as per tradition. So, a beginning must have been made from somewhere. Hm? From where was it made? People keep on burning Ravan because he is an enemy, isn’t he? Amhm. He is an enemy now. Is he an enemy now? Wasn’t he earlier? Is he a big enemy now or was he a big enemy earlier? Hm? Is he an enemy now? He is a big enemy now – Lust, anger, greed, attachment, ego, hm, by the end of the Iron Age, all these gather, don’t they? So, he is now big. In the beginning there was only lust. Initially sato and later tamo. The vice of lust is called the chief, isn’t it? Hm? Who is the chief dacoit among all the other vices? Hm?
(Someone said something.) Donkey? Achcha? Is donkey the chief? Hm? How is donkey the chief? Will anyone call Ravan a donkey? Is Ravan knowledgeable or a donkey? Hm? Speak up. Ravan was very knowledgeable. Donkey was the controller over Ravan. So, it means that the donkey is separate. Ravan is separate. Does the poor donkey make anyone cry? Hm? It works the entire day and goes to the washerman’s house, to the potter’s house in the night and eats the grass left-over by the cows and buffaloes and goes to sleep. Hm? Is donkey the enemy? It is so simple. Speak up. Just now you were telling that Ravan is the enemy. Hm? It is the donkey’s part. That soul; the part of love is recorded in that soul; the part of tolerance is recorded in it; does the donkey tolerate everything or is he Ravan? Speak up. Hm?

He is now enemy. How is he? Now you have come to the question of ‘how’? What kind of an enemy is he? Hm? Is he a very high kind of enemy, is he medium or is he of a low kind? How is he? And when is he the enemy? Hm? Since when is he the enemy? They do not know anything at all. Look, achcha! The people of the world do not know. We Brahmins should know, shouldn’t we? Baba has given us the entire knowledge, hasn’t he? Hasn’t he given? Hm? One more question has been raised. Since when is he the enemy and what kind of an enemy is he? Hm. And from where did you learn to burn him? Where was the beginning made? The people of the world do not know anything at all.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 21 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2666, दिनांक 10.10.2018
VCD 2666, Dated 10.10.2018
प्रातः क्लास 1.9.1967
Morning Class dated 1.9.1967
VCD-2666-extracts-Bilingual

समय- 00.01-25.14
Time- 00.01-25.14


प्रातः क्लास चल रहा था - 1.9.1967. शुक्रवार को आठवें पेज के मध्य में बात चल रही थी - जब बन्दर का कपड़ा उतार देंगे ना तो फिर वो मनुष्य का मनुष्य हो गया। परन्तु मनुष्य तो बन्दर आधा कल्प के लिए बन जाते हैं। क्योंकि मुँह भी काला हो जाता है तो फिर काम चिक्षा पर बैठ गया। फिर बैठ गया तो फिर बन्दर बनने लग गया। तहाँ तक बन्दर बन गया पिछाड़ी में आकरके बिल्कुल ही काला बन्दर बन जाते हैं। तमोप्रधान। है ना? तो क्या कहेंगे? अभी वो जो काला मुँह में कुछ किया है, बोला, जैसे बन्दर बन जाते हैं। फिर ऐसे बन्दरों को बाप आय करके और फिर सारी दुनिया को रावण राज्य से छुड़ाते हैं। और मन्दिर लायक बनाते हैं बन्दरों को। कृष्ण भी ये जो पहले गोरा है ना पीछे काला बन्दर के माफिक बन गया एकदम। तो ये समझानी तो समझानी पड़ती है सब बातों में। तो दिन-प्रतिदिन मनुष्य कभी कहाँ, कभी कहाँ सेन्टर तो खुलते रहते हैं। अभी मनुष्य थोड़े ही थोड़े होते हैं। फिर बहुत ही होंगे। तो भी तुम समझते हो बहुत थोड़े तीखे बच्चे हो जाते हैं। जिनकी ताकत से बहुत, बहुतों की ताकत से तुम बच्चे भी पार हो जाते हो। ये तो नंबरवार तो ताकत होगी बच्चों में। ये योग में भी नंबरवार रहेंगे। नंबरवार याद में रहें, नंबरवार ज्ञान उठायकरके फिर नंबरवार बादशाही का पद पावें। देखो कितना पद, कितनी बादशाहियाँ यहाँ स्थापन होती हैं। तो वंडर है ना कि यहाँ बैठकरके और बादशाही स्थापन करे कोई गुप्त वेश में।

ये कोई को बुद्धि में नहीं आवेगा। और यहाँ भी भूल जाते हैं। जो महारथी हैं वो भी भूल जाते हैं। ये तो सभी, ये सभी सेना है ना बच्ची। तो ये सब बैठ सब भूल जाते हैं कि हम कोई गुप्त सेना हैं। और हम योग के बल से हम अपना आत्मा को प्योर बनायकरके और ये 84 का चक्कर लेकरके बुद्धि में धारण करके हम राजा बन रहे हैं। फिर अगले जनम में जाकरके हम गोल्डन स्पून इन माउथ पड़ेगा। अभी अगर किसको रोज याद करते हो; किसको? किसको क्यों? हँ? शिवबाबा को याद करते हो तो खुशी में रहें। जैसे कोई बड़ा इम्तेहान पास करता हो तो बोलेगा हमारी लाइफ तो अभी सुखी गुजरेगी। भाई, मैं बैरिस्टर बनता हूँ। या आई.सी.एस. बनता हूँ, फलाना बनता हूँ। तो वो धैर्य, आथत, दिल में आवेगी ना। तो वो भी समझाना होता है। बड़े इम्तेहान वाला बहुत धनवान बन जाता है। 1.9.67 की वाणी का नौवां पेज। ये जो छोटे-छोटे मैट्रिक करते हैं, फलाना करते हैं, फिर भई क्या जाकरके सिलाई करने लग पड़ेंगे, चले जाएंगे या कोई छोकरों को पढ़ाना सीख जाएंगे। अगर जास्ती पढ़ेगी तो फिर देखो कितना फरक पड़ जाता है। तो ये तो होता है ना बच्चे। जितनी पढ़ाई उतना सुख।

अब ये है भगवानुवाच कि यहाँ भगवान पढ़ाते हैं। तो पहले तो ये ही, ये ही हैं जिनको नशा चढ़ा हुआ है। चोबचीनी मिलती है ना। मक्खन मिलता है बहुत। मक्खन को तो सार कहा जाता है ना। और भगवान पढ़ाते हैं। भगवान जब हमको पढ़ाते हैं तो हम क्या बनेंगे फिर? और वास्तव में भगवान भगवती तो इनको कहा जाता है। तो अब कोई बतावे कि इनको भगवती, भगवान, भगवान के बिगर कौन बनावेगा? तो कब बनाया होगा? क्या सतयुग में बनाया? नहीं। ये तो पतित दुनिया में याद करते हैं - हे पतित-पावन आओ। और आकरके हमको पावन देवी-देवता बनाओ। तो आकरके पावन बनाओ ना। फिर आकरके कैसे बनाते हैं? तो जो प्रैक्टिकल में होंगे बनने वाले वो जानेंगे। बाकि कोई कुछ थोड़ेही जान सकेंगे। बाकि लोगों को तो कुछ भी पता नहीं है क्योंकि प्रैक्टिकल में तो भगवान मिला नहीं।

अभी तुम बच्चों को ये पता है बरोबर कि हम तो भगवान से पतित पावन बन रहे हैं। पतित से पावन बन रहे हैं तो फिर जरूर जन्म-जन्मान्तर फिर सुखी रहेंगे। ऊँचे पद पर रहेंगे ना। और फिर पढ़ाई छोड़ देंगे क्योंकि पढ़ाई छोड़ तो बहुत देते हैं ना बच्ची। पढ़ाई भी छोड़ देते हैं और यहाँ छोड़ भी देंगे। और पढ़ाई छोड़करके फिर जाकरके गंदे भी बन जाएंगे क्योंकि पढ़ाई छूट जाती है तो फिर गंदे बन जाते हैं। ऐसे तो पढ़ाई पढ़ते भी गंदे बन जाते हैं। तो पढ़ाई जो अगर नहीं पढ़ेंगे तो गंदे नहीं बनेंगे तो फिर क्या बनेंगे? ये कोई मासी का घर थोड़ेही ही है जो कोई बच जाते हैं। आजकल तो सन्यासी, गुरु लोग भी बड़े गंदे होते हैं। सो भी वो विकार की बात। परन्तु विकर्म विनाश कैसे हों जन्म-जन्मान्तर के? क्योंकि साधु भी तो इन्द्रियों की साधना करते हैं ना। बाबा ने कहा था ना कि गीता किसके पास हो तो राय देवे। परन्तु यहाँ तो कोई सर्विसेबल बच्चे हैं नहीं जो मैं किसी को राय देऊं। कोई भी सर्विसेबुल नहीं है बाबा के पास इस समय में। नहीं। हाँ, महारथी की तो बात अलग होती है बहुत। चलो, बच्ची टोली ले आओ।

भूल तो हरेक में है। कोई ईश्वर नहीं है। पांच भूत हैं हरेक में। और इसमें भी ये है भूतनाथ-भूतनाथनियों की दुनिया। तो अभी फिर दशहरे के ऊपर बाबा को समझाना पड़ेगा। दशहरे पर चलेगी वाणी। उसके बाद फिर दीपमाला के ऊपर समझाएंगे कि ऐसे-ऐसे समझाओ। फिर उस दीपमाला में ये चित्र छपाना पड़ता है इन लोगों को समझाने के लिए। फिर नए सिरे समझावेंगे। ऐसे वो समझे कि इस समय में बरोबर ये रावण है, रावण का राज्य है। और ये एकदम बन्दर संप्रदाय हैं। हँ? रावण के राज्य में फिर बन्दर संप्रदाय कौन? रावण के राज्य में तो मनुष्य थे। भले आसुरी मनुष्य थे। और इधर बन्दर संप्रदाय एकदम कौन? क्योंकि 5 विकार से भी बदतर बने हुए हैं। देखो हैं ना बरोबर। इनको काम का भूत भी ऐसा ही है बहुत। क्योंकि ये तो तुम बच्चे जानते हैं कि सतयुग में तो ऐसे नहीं होगा। तुम बच्चे किसको भी कहेंगे ना। ये चित्र लेकरके किसको भी समझाओ। ये तो भारत में जब इनका राज्य था तब दूसरा कोई का भी राज्य नहीं था। रावण राज्य में तो बहुतों का राज्य होता है ना। तो रावण को ढेर सिर दिखाए हैं।

और ये लक्ष्मी-नारायण तो भारत में ही थे। भारत में ही इनका, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। क्योंकि भारत में ही इनका राज्य था और भारत में ही इनकी पूजा होती है। प्रूफ है ना। अब जिनकी पूजा होती है वो तो जड़ चित्रों की पूजा होती है। इनका राज्य तो कोई नहीं था। तो इन जड़ चित्रों की वो आत्माएं सब कहाँ थीं? इतनी सब आत्माएं जब इनका राज्य था तो कितनी होएंगी? वहाँ शुरुआत में तो बहुत छोटा झाड़ होगा। पीछे तो झाड़ बढ़ता ही जाता है मनुष्य सृष्टि का। देखो, अभी कितना हुआ है। और वो प्लानिंग में भी बहुत कुछ समझाय सकते हो कि अभी तो पुरानी दुनिया है फिर नई दुनिया में इनका राज्य होता है। तो देखो इनका राज्य लाने के लिए अभी ये राजयोग सिखलाते हैं। और इनको राजयोग सिखलाने से फिर इनको नई दुनिया चाहिए।

और फिर पुरानी दुनिया में तो वो ही महाभारी महाभारत लड़ाई सामने खड़ी है। इस लड़ाई के बाद ही स्वरग के गेट खुलेंगे। तो जितना-जितना तुम बच्चे आगे जाएंगे, इतना ये आवाज महाभारी महाभारत लड़ाई की अखबारों वगैरों में छपती रहेंगी। हाँ, अभी लग जाए। अभी झट। अभी जैसे कि कोई लड़ाई लग जाती है। ऐसे होता रहता है ना। ऐसे नहीं समझो नहीं होता रहता है। होता रहता है क्योंकि आगे भी जब लड़ाई लगी थी तो एक सिर्फ छोटी सी बादशाही थी। उसमें कोई फलाने कोई उनके तो उनको मार डाला था। ऐसे हुआ था। बस, तो ये जरी सी लड़ाई में फिर उससे वो आग लगाई थी। तो इसमें निमित्त बन जाते थे ये भी। नहीं तो थी तो बहुत जरी सी लड़ाई। कोई पुराना अखबार पड़ा होगा इसने तो बाबा को तो नाम भी मालूम नहीं है। सर्विसिया। एक छोटी सी बादशाही थी। सर्विसिया कि सर्बिया? हँ? छोटी सी बादशाही। अभी तो, अभी तो मैं समझता हूँ तीस भई एकदम, नाम ही नहीं सुनते हैं कभी कोई सर्विया है। अभी नक्शे में, नक्शे में है। हाँ, ये तुम देखना।

1.9.67 की वाणी का दसवां पेज। अभी तो बिल्कुल ही देखने में आते हैं। बहुत लड़ेंगे। और जरूर लडेंगे आपस में। क्योंकि बॉम्ब्स भी तो तैयार हैं। और फिर सभी एक दो में झगड़ते रहते हैं। हँ? ऐसा तो कोई दिन होता ही नहीं है कि लड़ाई कहाँ बंद हो जाए। लड़ाई तो कहाँ न कहाँ एक बंद होती है तो दूसरा चालू। दूसरा तो तीसरा चालू। और फिर लड़ाई में तो एक दो के मददगार बनते ही रहते हैं। वो ऐसे नहीं थी जब पहले लड़ाई लगी थी। नहीं। ये तो ऐसी है बिल्कुल ही जब एक बॉम्ब छोड़ा था जापान में। अभी तो देखो कितने बॉम्ब्स बने पड़े हैं। और फिर एक दो को धमकाते भी रहते हैं। हँ? अभी कौन किसको धमकाय रहा है? हँ? नार्थ कोरिया? कभी-कभी धमकाय देता है।

और तुम पढ़ रहे हो। तुमको भी राज्य चाहिए। तुमको तो अपनी नई दुनिया चाहिए। तुमको लड़ाई-झगड़ा नहीं चाहिए। और फिर ये पुरानी दुनिया खतम भी होनी चाहिए। क्योंकि पुरानी दुनिया में ही लड़ाई झगड़ा होता है। क्योंकि दुनिया तो ये मालूम ही नहीं है कि जब पुरानी दुनिया लड़ाई-झगड़े की खतम होती है तो फिर नई दुनिया स्थापन होती है सतयुग की। झूठ की दुनिया होती है तो लड़ाई होती है। और सतयुग की सत्य की दुनिया होगी तो लड़ाई की बात ही नहीं। और वो तो शास्त्रों में दिखाया है महाभारी महाभारत लड़ाई लगी। तो लगी है ना। वो तो है। इसमें गीता में, महाभारत की लड़ाई, अच्छा, बाप कहते हैं ना। रूहानी बच्चों को कहते हैं अगर तुम बाप को याद करते रहो और तुम पावन बनते रहो। अभी कोई पावन बना तो नहीं है ना। फिर भी पतित से पावन बनने की अंगुली तो देना है ना। तो ये भी थोड़ी सी अंगुली वो भी काम में आ जाती है। हँ? भक्तिमार्ग में भी कहते हैं ना एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आध। तुलसी संगत साधु की हरे कोटि अपराध। अच्छा मीठे-मीठे बच्चों प्रति, रूहानी बच्चों के प्रति रूहानी बाप वा दादा का यादप्यार, गुडमार्निंग। रूहानी बाप के साथ रूहानी लगाते हैं, दादा के साथ रूहानी क्यों नहीं लगाते? हँ? ओमशान्ति।

A morning class dated 1.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the eighth page on Friday was – When you remove the clothes of a monkey, then you become a human being again. But a human being becomes a monkey for half a Kalpa because his face also becomes dark; so, then he sits on the pyre of lust. Then, when he sat on it he started becoming like a monkey. He became a monkey to the extent that in the end he becomes a completely dark monkey. Tamopradhan (degraded). Is it not? So, what will be said? Now whatever he has done with a dark face, it was said that he becomes like a monkey. Then the Father comes and liberates such monkeys and then the entire world from the kingdom of Ravan. And He makes the monkeys (bandar) worthy of being worshipped in the temples (mandir laayak). Krishna, who was also fair initially became completely like a monkey later. So, this explanation has to be given in all the topics. So, day by day people keep on opening centers somewhere or the other. Well, human beings are not less. They will be more only. Yet, you understand that very few children become sharp with whose power, with the power of many you children also sail across. Children will have this numberwise power. They will also remain in Yoga numberwise. They will remain numberwise in remembrance, grasp the knowledge numberwise and then achieve the emperorship numberwise. Look, so many posts, so many emperorships are established here. So it is a wonder that someone establishes emperorships while sitting here in an incognito form.

This will not strike anyone’s intellect. And you forget here as well. Even the maharathis (Seniors) forget. All these, all these are an army, aren’t they daughter? So, all these sit and forget that we are an incognito army. And we make our souls pure through the power of Yoga and after passing through the cycle of 84 births we are becoming kings. Then we will go and get a golden spoon in mouth in the next birth. Well, if you remember someone everyday; whom? Why someone? Hm? If you remember ShivBaba then you will remain in joy. For example, if someone passes a big examination, he will say that our life will pass in happiness. Brother, I become a Barrister. Or I become ICS, I become such and such thing. So, you will get that solace, satisfaction in your heart, will you not? So, that should also be explained. The one who passes a big examination becomes very wealthy. Ninth page of the Vani dated 1.9.67. These small matric exams or something else that people pass, then brother they start tailoring, they will go or they will start teaching kids. If they study more then look there is such a big difference. So, this happens, doesn’t it children? The more you study, the more happiness you get.

Well these are words of God that God teaches here. So, first it is these, it is only these who are intoxicated. They get chobchini (a sweet), don’t they? They get a lot of cream. Cream is called essence, isn’t it? And God teaches. When God teaches us, then what will we become? And actually these are called God-Goddess. So, will anyone now tell that who apart from God will make them God-Goddess? So, when would He have made? Did He make in the Golden Age? No. People remember in the sinful world – O purifier of the sinful ones! Come. And come and make us pure deities. So, come and make us pure, will You not? Then how does He come and make? So, those who are to become in practical will know. Others will not be able to know. Other people do not know anything because they did not get God in practical.

Now you children know that definitely we are become pure from sinful through God. When we are becoming pure from sinful, then definitely we will remain happy for many births. We will hold high posts, will we not? And then if we stop studying because many people leave studies, don’t they daughter? They leave studies also and they will leave here as well. And after leaving the studies, they will also become dirty because when someone leaves studies, they become dirty. Otherwise people become dirty even while studying. So, if you don’t study, if you don’t become dirty, then what else will you become? This is not like going to maternal aunt’s house that someone will be saved. Now-a-days the sanyasis, gurus are also very dirty. That too, the topic of lust. But how will the sins of many births be burnt? It is because the sages also try to control their organs, don’t they? Baba had said that if someone has the Gita, then we can give advice. But there are no serviceable children here that I would give advice to anyone. There is no serviceable one with Baba at this time. No. Yes, the topic of Maharathis is very different. Okay, daughter bring tolii.

There is mistake in everyone. Nobody is God. There are five ghosts in everyone. And even in this, it is a world of Bhoothnaath-Bhoothnaathinis. So, then now Baba will have to explain on the topic of Dussehra. Vani will be narrated on Dussehra. After that it will be explained on Deepmala that you should explain in such and such manner. Then you have to publish this picture on that Deepmala to explain to these people. Then you will be explained afresh. They should understand that at this time definitely this is Ravan, kingdom of Ravan. And these are completely monkey community. Hm? Then who is monkey community in the kingdom of Ravan? There were human beings in the kingdom of Ravan, although they were demoniac people. And who is complete monkey community here? It is because you have become worse due to the five vices also. Look, you indeed are, aren’t you? They have a lot of ghost of lust as well because you children know that it will not be like this in the Golden Age. You children will tell anyone, will you not? Take these pictures and explain to anyone. When there was the kingdom of these in India there was kingdom of no other person. There are kingdoms of many in the kingdom of Ravan, isn’t it? So, Ravan is shown to have numerous heads.

And these Lakshmi and Narayan were in India only. There was a kingdom of Lakshmi-Narayan in India only. It is because there was their kingdom in India only and they are worshipped in India only. There is a proof, isn’t it? Well, those who are worshipped, it is the non-living pictures which are worshipped. There wasn’t a kingdom of these persons. So, where were all those souls depicted in these pictures? When there was their kingdom then how many souls would exist? There would be a very small tree in the beginning there. Later on the tree of the human world keeps on growing. Look, now it has grown so much. And you can also explain a lot on that planning that now there is an old world; then there will be a kingdom of these persons in the new world. So, now this Rajyog is being taught to bring their kingdom. And by teaching them Rajyog a new world is required for them.

And then in the old world, the same fiercest Mahabharata war is staring at you. It is only after this war that the gate of heaven will open. So, the more you children come forward, the more this word about the fiercest Mahabharata war will keep on getting published in the newspapers, etc. Yes, it may start just now. Now, immediately. For example, now the war breaks out. It keeps on happening like this, doesn’t it? Do not think that it keeps on happening. It keeps on happening because in the past also when the war had broken out, there was only a small emperorship. In that someone from among them was killed. It had happened like this. That is it. So, then in just this small war that fire had been lighted. So, these people also used to become instrumental in it. Otherwise, it was a small war. There must be an old newspaper; Baba does not know the name as well. Servicia. It was a small emperorship. Servicia or Serbia? Hm? Small emperorship. Now, now I think thirty; brother, we haven’t even heard the name ‘Servia’ at all. Now it is on the map. Yes, you look at it.

Tenth page of the Vani dated 1.9.67. Now it is completely visible. Many will fight. And they will definitely fight with each other because the bombs are also ready. And then everyone keeps on fighting with each other. Hm? There is no such day that the war stops somewhere. If one war stops at one place, then the other one begins. If the second ends, the third one begins. And then they keep on becoming helpful to each other in the war. It was not like the earlier war. No. This one is completely such that, when the bomb was dropped on Japan. Now look so many bombs are ready. And then they also keep on warning each other. Hm? Now who is warning whom? Hm? North Korea? Sometimes it warns.

And you are studying. You also want kingdom. You want your own new world. You do not want fights and quarrels. And then this old world should also end because fights and quarrels take place in the old world only. It is because the world does not know at all that when the old world of fights and quarrels ends, then the new world of the Golden Age is established. When there is a world of falsehood, then there is fight. And if there is a world of truth of the Golden Age, then there is no question of fights at all. And it has been shown in the scriptures that the fiercest Mahabharata war broke out. So, it has broken out, hasn’t it? That is there. In this, in the Gita the war of Mahabharat, achcha, the Father says, doesn’t He? He tells the spiritual children that if you keep on remembering the Father and keep on becoming pure; now nobody has become pure, has anyone? Yet, you have to lend your finger in becoming pure from sinful, will you not? So, even this little finger proves useful. Hm? It is also said on the path of Bhakti that ‘ek ghari, aadhi ghari, aadhi me pun aadh. Tulsi sangat saadhu ki harey koti apraadh.’ (One moment, half a moment, half of even that half. Tulsi says that the company of sages liberates you from a crore offences). Achcha, remembranace, love and good morning of the spiritual Father (Baap) and Dada to the sweet-sweet children, spiritual children. He prefixes spiritual with the spiritual Father; why doesn’t He prefix spiritual with Dada? Hm? Om Shanti.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 23 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2667, दिनांक 11.10.2018
VCD 2667, Dated 11.10.2018
रात्रि क्लास 2.9.1967
Night Class dated 2.9.1967
VCD-2667-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.10
Time- 00.01-17.10


आज का रात्रि क्लास है - 2.9.1967. उनकी जो मूल बात है कि हम आत्मा हैं। किनकी? हँ? किनकी मूल बात है कि हम आत्मा हैं? और बाप आ गया है। कौनसा बाप आ गया है? और अगर ये ऐसे कहते हैं, जरूर आया है, तब तो कहते हैं ना कि एक वो बाप भी है, और ये भी पता नहीं समझाते हैं या नहीं समझाते हैं कि वो बाप भी है, टीचर भी है। क्योंकि ये ज्ञान वो ही सिखलाते हैं। और सर्व की सद्गति दाता भी वो ही है। ये कौन बोल रहा है? हं? अरे? शिव बाप बोल रहा है? तो ये वो, वो कहके किसकी तरफ बोल रहा है? हँ? बीके की तरफ बोल रहा है? उनकी जो मूल बात है कि हम आत्मा हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिवबाबा के लिए बोल रहा है। शिव बाप ब्रह्मा के तन में प्रवेश हो करके बताय रहा है कि ये समझाने की बात है कि समझाते हैं या नहीं समझाते हैं कि वो बाप भी है, टीचर भी है, और ये ज्ञान वो ही सिखलाते हैं। किसको? क्या ज्ञान? कि सर्व की सद्गतिदाता वो ही है। सर्व की सद्गतिदाता। सर्व में कितने आ जाते? 500-700 करोड़ की सद्गतिदाता वो ही है। कौन? बोलने वाला शिव बाप या ब्रह्मा, जिसके तन में बोल रहा है? शिवबाबा के लिए बोला।

वो ही सद्गति दाता है। सारी दुनिया की सद्गतिदाता। और वो ही हम सभी आत्माओं का बाप है। ये किसने बोला? हँ? ये किसने बोला - वो ही हम सभी आत्माओं का बाप है? शिव ने बोला? अरे, शिव का भी बाप है वो? वाह भइया। शिव बाबा शिव का भी बाप है? ये होता है क्या? हत तेरे की नहीं। ब्रह्मा बाबा ने बोला और वो ही शिवबाबा हम सभी आत्माओं का, हँ, बाप है। तो इन तीनों में से; हँ? क्या कहा? इन तीनों में से भी ये बाप है, टीचर है, गुरू है। भला तीनों में से भी नहीं समझते हैं। हँ? कौन तीनों? बाप, टीचर, सद्गुरु। ऐसी पत्थरबुद्धि है। क्या? कि ये नहीं समझते हैं कि बाप का पार्ट वर्सा देने वाला, हँ, नई दुनिया का और टीचर, क्लेरिफिकेशन देने वाला, और गुरु। गुरु तो दलाल होता है ना। सदगुरु मिला दलाल। किसके-किसके बीच में? हँ? सद्गति करने वाला सद्गुरु सुप्रीम सोल बाप और जो भी सद्गति में जाने वाले बच्चे हैं उनके बीच में कौन है? दलाल है।

तो देखो, कितनी बार बताया कि वो बाप भी है, टीचर भी है, सद्गुरु भी है। एक ही है। फिर भी नहीं समझते हैं। ऐसी पत्थरबुद्धि है जो पता नहीं समझाने में गडबड़ है या बाबा जैसे कहते हैं कि योगयुक्त नहीं हैं। हँ? समझाने वाला योगयुक्त नहीं होगा तो भी नहीं समझेगा कोई क्योंकि सिर्फ ज्ञानयुक्त बन करके समझाते हैं। योगयुक्त होकर नहीं समझाते हैं। हँ? योगयुक्त माने? एक बाप के लगावपूर्वक। हँ? तो बाप के प्रति लगाव न होने से, लगन न होने से उनको तीर नहीं लगता है। किनको? समझने वालों को। ऐसा तीर नहीं लगता है जैसा बाबा समझाते हैं। तो कुछ दाल में काला है जरूर समझाने वालों में। ये क्या दाल में काला होता है? माने जो समझाने वाले हैं, उनकी बुद्धि, उनकी लगाव व्यभिचारी है। हँ? इसलिए तीर नहीं लगता है।

बाबा कहते हैं मामेकम याद करो। नहीं तो ये समझाना इतना सहज है। समझाते हैं - ओ बाबा। आत्माएं तो सभी हैं। और बाबा ही है शिवबाबा। क्योंकि बाबा ही तो जब जयंती होती है, हँ, जयजयकार होती है तो भारत को स्वर्ग बनाते हैं। जयंती किसकी होती है? बाबा की जयंती होती है या आत्माओं के बाप शिव बाप की जयंती होती है? जयजयकार किसकी? हँ? शिव बाप की कभी हार होती है? नहीं। उनकी तो न हार होती है न जीत होती है। तो जिसमें प्रवेश करते हैं तब कहा जाता है शिवबाबा। तो उनकी प्रत्यक्षता रूपी जब जन्म होता है तो उसकी जयंती होती है। जयजयकार होती है कि भारत को स्वर्ग बनाते हैं। सारी दुनिया को स्वर्ग नहीं बनाते हैं। हँ? और भारत में ही ये स्वर्ग का राज्य था। कोई दूसरे देशों में, विदेशों में जहाँ विदेशी धरमपिताएं, विधर्मी धरमपिताएं आते हैं वहाँ ये स्वर्ग का राज्य नहीं था। हँ? क्यों नहीं था? हँ? उन्होंने क्या पाप कर दिया? हँ? क्या पाप कर दिया? हँ? कुछ गडबड़ कर दिया क्या? हँ? विनाशी खण्ड क्यों हो गए? क्या गडबड़ कर दिया? हँ? भारत अविनाशी खण्ड क्यों हो गया? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) विधर्मी है? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, मुख्य बात तो याद ही नहीं रहती है। जो अव्यभिचारीपना है, पवित्र हैं, वो रहते ही नहीं हैं। पवित्रता को उतना महत्व नहीं देते दूसरे धरमखंड। हँ? बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। उनकी जन्म-जन्मान्तर की आदत पड़ी हुई है व्यभिचारी याद की, व्यभिचारी दृष्टि की, व्यभिचारी वृत्ति की। तो उनसे पुसाता ही नहीं है।

अभी 84 जन्म के बाद बाप कहते हैं। हँ? अभी, संगमयुग में। 84 जनम पूरे होने के बाद फिर संगमयुग में बाप कहते हैं मैं आया हुआ हूँ। हँ? क्या? अब नहीं कहा शिवबाबा। कौन आया हुआ हूँ? मैं आया हुआ हूँ। क्यों? शिवबाबा आया हुआ हूँ ऐसे नहीं कहते? हँ? शिवबाबा के लिए तो बताया कि सृष्टि पर सदा कायम एक शिवबाबा ही है। वो तो इसी सृष्टि पे हमेशा रहता है। आने-जाने की बात ही नहीं। तो मैं आया हुआ हूँ। और फिर संगम पर ही यहीं तुम बच्चों को, हँ, यही बादशाही स्वर्ग की देता हूँ। हँ? ऐसे नहीं कि सतयुग त्रेता में देता हूँ। सतयुग त्रेता में भी स्वर्ग तो होगा, लेकिन बादशाही तुमको इसी जनम में, इसी शरीर से, इस नरक की दुनिया के बीच स्वरग की बादशाही देता हूँ। किसको? इनको नहीं। इनके फालोअर्स को भी नहीं। उनको भी नहीं। हँ? कौन? जो विदेशी धरमखंड वाले हैं। उनको भी नहीं। तुमको देता हूँ। जो सन्मुख बैठे हैं।

अभी ये बातें सुनते तो हैं कान से। हँ? जो बाबा बोलते हैं वो बातें कान से तो सुनते हैं। परन्तु देखा जाता है फिर एक की भी बुद्धि में ठक् से नहीं बैठता है। हँ? कि धक् से बैठ जाए कि ये बात तो बिल्कुल सत्य कहते हैं। क्या बात? कि नरक की दुनिया के बीच स्वरग की बादशाही तुम बच्चों को यहीं पुरुषोत्तम संगमयुग में देता हूँ। और तुमको देता हूँ। और किसी को नहीं। ये बात ठक् से बुद्धि में बैठती नहीं। और अच्छी ही बात बताती है कि बाप आ गया है। 5000 वर्ष पहले भी आया था। हँ? जो यादगार मनाते रहते हैं। हँ? शिव जयंती की यादगार मनाते रहते हैं कि नहीं? हँ? किसकी यादगार? हँ? बाप के आने की यादगार मनाते रहते हैं कि बाप जिस तन में आता है, हँ, उसकी प्रत्यक्षता रूपी जन्म दिवस की यादगार शिव जयंती मनाते रहते हैं। मनाते तो आते हो। वो ही शिवबाबा। क्या? कौनसे शिवबाबा? 5000 वर्ष पहले जिन्हें शिवबाबा ने हमको पढ़ाया था प्रैक्टिकल में। क्या कहा? प्रैक्टिकल में पढ़ाना कैसे होता है? और इम्प्रैक्टिकल में पढ़ाना कैसे होता है? हँ? कैसे होता है? हँ। प्रैक्टिकल में पढ़ाने का मतलब ये हुआ कि शरीर में प्रवेश करता हूँ जिसके तो वो प्रैक्टिकल हो गया शरीर के द्वारा। हँ? और तुम बच्चों को पढ़ाते हैं, पढ़ाय रहे हैं। हँ? अभी शिवबाबा हमको पढ़ाय रहे हैं।

Today’s night class is dated 2.9.1967. His main topic is that we are souls. Whose? Hm? Whose main topic is that we are souls? And the Father has come. Which Father has come? And if He says like this, He has definitely come; only then does He say that that one is Father also; and it is not known whether you explain or not that He is the Father as well as teacher because it is He alone who teaches this knowledge. And it is He who is the bestower of true salvation upon everyone. Who is speaking this? Hm? Arey? Is Father Shiv speaking? So, towards whom is He hinting by uttering He, He (vo, vo)? Hm? Is He speaking towards the BKs? Is their main topic is that we are souls?
(Someone said something.) Yes, He is speaking for ShivBaba. Father Shiv is entering in the body of Brahma and telling that it is a topic to be explained that whether they explain or not that He is the Father also, Teacher also; and it is He alone who teaches this knowledge. To whom? What knowledge? That He alone is the bestower of true salvation upon everyone. The bestower of true salvation upon everyone. How many are included among everyone? He alone is the bestower of true salvation upon 500-700 crores. Who? Is the speaker Father Shiv or Brahma in whose body He is speaking? It was said for ShivBaba.

He alone is the bestower of true salvation (sadgatidaataa). The bestower of true salvation upon the entire world. And He alone is the Father of us all souls. Who said this? Hm? Who said that He alone is the Father of us all souls? Did Shiv speak? Arey, is he the Father of Shiv as well? Wow brother! Is ShivBaba the Father of Shiv as well? Does it happen so? Damn it. Brahma Baba said and the same ShivBaba is the Father of us all souls. So, among these three souls; hm? What has been said? Even among these three this is the Father, teacher, guru. You do not understand from among these three also. Hm? Who three? Father, Teacher, Sadguru. The intellect is such stone-like intellect. What? That they do not understand that the Father’s part is the giver of inheritance of the new world and the teacher is the giver of clarification and Guru. Guru is a middleman (dalaal), isn’t he? Sadguru milaa dalaal (The true guru was found in the form of a middleman). Between whom? Hm? Who is between the Sadguru Supreme Soul Father who causes sadgati (true salvation) and all the children who achieve sadgati? The middleman (dalaal).

So, look, it has been told so many times that He is the Father also, Teacher also and Sadguru also. He is only one. Yet, they do not understand. The intellect is such stone-like intellect that it is not known whether there is any shortcoming in explaining or just as Baba says that you are not yogyukt (meditative). Hm? Even if the explainer is not yogyukt, then he will be able to understand because they explain only as gyaanyukt (knowledgeable). They do not explain as yogyukt. Hm? What is meant by yogyukt? Having attachment for only one Father. Hm? So, when you do not have attachment, devotion for the Father, then the arrow doesn’t hit them. Whom? To those who understand. The arrow doesn’t hit in such a manner as Baba explains. So, there is definitely some shortcoming (daal me kaala) in those who explain. What is this ‘daal me kaala’ (literally meaning dark stones found among pulses)? It means that the intellect, the attachment of those who explain is adulterous (vyabhichaari). Hm? This is why the arrow doesn’t hit the target.

Baba says – Remember Me alone. Otherwise, it is so easy to explain this. He explains – O Baba. All are souls. And Baba is ShivBaba only. It is because when His birthday (jayanti) takes place, hm, when His victory is hailed (jayjaykaar), then He makes India as heaven. Whose jayanti is it? Is it the jayanti of Baba or the jayanti of the Father of souls, Father Shiv? Whose victory is hailed? Hm? Does Father Shiv ever suffer defeat? No. He neither suffers defeat nor gains victory. So, the one in whom He enters, then He is called ShivBaba. So, when His revelation-like birth takes place, then His jayanti takes place. His victory is hailed that He makes India heaven. He does not make the entire world heaven. Hm? And there was a kingdom of heaven in India only. This kingdom of heaven did not exist in any other country, in the foreign countries where the foreign founders of religions, vidharmi founders of religions come. Hm? Why wasn’t it there? Hm? Which sin did they commit? Hm? Which sin did they commit? Hm? Did they do anything wrong? Hm? Why did they become perishable religious lands? Which wrong did they commit? Hm? Why did Bhaarat (India) become an imperishable land? Hm?
(Someone said something.) Are they vidharmi? (Someone said something.) Yes, you don’t remember the main topic itself. They do not remain non-adulterous (avyabhichaari), pure. The other religious lands do not accord that much importance to purity. Hm? The Father says – Remember Me alone. They are habituated to adulterous remembrance, adulterous vision, adulterous vibrations since many births. So, they are unable to do at all.

Now the Father says after 84 births. Hm? Now, in the Confluence Age. After the completion of 84 births, then the Father says in the Confluence Age that I have come. Hm? What? Now He did not say ShivBaba. Who has come? I have come. Why? Doesn’t He says I, ShivBaba have come? Hm? It was said for ShivBaba that it is ShivBaba alone who is permanent in this world. He remains in this world forever. There is no question of coming and going at all. So, I have come. And then in the Confluence Age itself I give the emperorship of heaven to you children. Hm? It is not as if I give in the Golden Age, Silver Age. There will be heaven in the Golden Age, Silver Age also, but I give you the emperorship of heaven in this very birth, in this very body in the midst of the world of hell. To whom? Not to this one. Not even to the followers of this one. Not even to them. Hm? Who? Those who belong to the foreign religious lands. Not even to them. I give to you who are sitting face to face.

Now these topics are heard through the ears. Hm? Whatever Baba says, they do hear those topics through the ears. But it is observed that it does not sit immediately in the intellect of even one person. Hm? It should sit immediately that this topic that He narrates is absolutely correct. Which topic? That I give the emperorship of heaven amidst the world of hell in this Purushottam Sangamyug itself. And I give to you. Not to anyone else. This topic does not sit in the intellect immediately. And she narrates a nice topic only that the Father has come. He had come 5000 years ago as well. Hm? The memorial is celebrated. Hm? Is the memorial of Shivjayanti celebrated or not? Hm? Whose memorial? Hm? The memorial of the arrival of the Father is celebrated that the body in which the Father comes, hm, his revelation like birthday’s memorial is celebrated in the form of Shivjayanti. You do keep on celebrating. The same ShivBaba. What? Which ShivBaba? The ShivBaba who had taught to us in practical 5000 years ago. What has been said? How does one teach in practical? And how does one teach in impractical way? Hm? How is it? Hm. The meaning of teaching in practical is that the body in which I enter, so that is in practical through a body. Hm? And He teaches you children; He is teaching. Hm? Now ShivBaba is teaching us.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2668, दिनांक 12.10.2018
VCD 2668, Dated 12.10.2018
रात्रि क्लास 2.9.1967
Night Class dated 2.9.1967
VCD-2668-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.50
Time- 00.01-20.50


रात्रि क्लास चल रहा था - 2.9.1967. समझाने जाते हैं, नहीं समझते हैं, इसका कारण है योग नहीं है। योग की ताकत ही नहीं है। बच्चों को है बाप से वर्सा लेने की बात। और बाप तो आए ही हैं वर्सा देने के लिए। तो जिसकी तकदीर में जो है, कैसे लेते हैं बाबा समझ जाते हैं। भले आते हैं इतना बाहर वाले भी। उनमें भी बाबा जांच लेते हैं कि कौन अच्छा समझदार है। किससे बात करते हैं तो क्या कहती है? तो वो लोग खुद कहती है बाबा बस बंधायमान हूँ। बंधी हुई हूँ। यहाँ नहीं आ सकती हूँ क्योंकि घर छोड़ने का तो हुकुम ही नहीं है। बाकि मैं याद बहुत करती हूँ। उन बांधेलियों में भी कोई ऐसे ही, कोई कैसे, कोई कैसे। सब एक जैसी तो नहीं होती हैं ना। जैसे यहाँ भी बच्चे कोई एक जैसे थोड़ेही हैं। ज्ञान की गंगाएं भी हैं। घर के भी हैं। याद नहीं कर सकते। और बाहर वाले फिर भी देखो आते हैं वहाँ से।

तुम जैसे कि हरिद्वार में बैठने वाले हो। हरिद्वार में बैठने वाले पण्डित होते हैं ना। और बाहरवाले तो बिचारे यहाँ आते हैं। क्योंकि हरिद्वार में महिमा तो सबसे जास्ती गंगाजी की है ना। सभी नदियों से महिमा इस गंगा की जास्ती है। महिमा सबसे जास्ती है। नहीं तो सबसे वास्तव में जास्ती बड़ी गंगा तो ब्रह्मपुत्रा है। और वो ब्रह्मपुत्रा ऐसे नहीं है। नहीं। गंगा से उनका जास्ती मान है। नहीं तो बड़ी तो ब्रह्मपुत्रा नदी है। और ज्ञान तो उनमें कोई है नहीं। उनमें माने? नदियों में। कुछ भी नहीं। तो ये ड्रामा के प्लैन अनुसार ये ऐसा नुंधा हुआ है। जैसे कि नूंध है। और यहाँ तो जमुना तो और ही अच्छी है। हँ? क्यों? क्योंकि गंगा के किनारे पर कोई कृष्ण के महल नहीं होते हैं। हँ? कृष्ण के संगठन रूपी महल कहो, किले कहो, वो तो जमुना के किनारे पर ही होते हैं। तो जब ये जमुना के किनारे पे ये परिस्तान बनता है, ये दिल्ली परिस्तान बनती है ना। तो भला क्यों? हँ? इस यमुना नदी की महिमा क्यों नहीं जास्ती होनी चाहिए? महिमा जास्ती गंगा नदी की है। तो वहाँ क्या है? गंगा में है क्या? क्योंकि ये तो है कि बरोबर ये दिल्ली परिस्तान रहती है। ये तो पीछे जमुना सीधी नार्थ से आती है तो बोड़-बोड़ सब हो जाते हैं। काहे में बोड़-बोड़ हो जाते हैं? हँ? विकारों में बोडमबोड़ हो जाते हैं ना बच्ची। और कोई हैं उसमें जो खबरदार हो जाते हैं। तो वो खबरदार होने वाले समझ जाते हैं कि भगवान तो पहले ही आना चाहिए इससे। बोडमबोड होने से बचाने वाला पहले आना चाहिए ना।

तो उनको तो मालूम ही नहीं है ना कि भगवान बैठकरके योग सिखलाते हैं। और उसके लिए टाइम बहुत चाहिए। गीता में तो ऐसी कोई बात है नहीं। हँ? बस। वो तो लड़ाई लगी और लगी। भगवान बैठकरके कितना लंबा समय राजयोग सिखलाते हैं। कोई को पता भी नहीं है किसका भी। तो वहाँ गीता में कोई योग की बात थोड़ेही है। भले बाप कहते हैं मनमनाभव, मध्याजीभव। वो तो समझने की बात है कि कैसे मनमनाभव? पहले मनमनाभव, फिर, फिर मध्याजीभव। जो भी अर्पण करना है, जो भी स्वाहा करना है, तन, मन, धन, मेरे लिए यजन कर। पहले तो मन लगेगा, तब यजन करेगा ना। जहाँ मन लग जाता है, दिल लग जाता है, तो तन, मन, धन तो स्वतः ही अर्पण होता है। तो वो समझ की बात है। समझ सकते हैं। परन्तु जरा भी अर्थ नहीं समझ सकते। हँ? वो, वो ज्ञान लेने में, योग की प्रक्रिया समझने में तो टाइम लग जाता है ना बच्ची।

और ऐसे भी नहीं है कि याद की यात्रा कोई इतनी सहज है जो मनुष्य तमोप्रधान से एक ठक से सतोप्रधान बन जावें। हँ? हाँ, ये तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाएगा एक ठक् से। ये माने कौन? हँ? ये कहकर किसकी तरफ इशारा किया?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा ठक् से बन गया? हँ? 80 साल हो गए और वो बन गया एक ठक् से? हँ? ये तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाएगा। नहीं। ऐसे भी नहीं हो सकता। क्योंकि तुम बच्चे तो अनुभव कर रहे हो, हँ, कि एक ठक् से तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाना बड़ा मुश्किल है। भले कोई गपोड़े मार लेवे कि हम इतने घंटा याद में बैठते हैं। ये गपोड़े मारते हैं। बाप तो समझाया ना, हँ, वो गोर्मेन्ट भी, गोर्मेन्ट की नौकरी करते हैं ना। तो कितना घंटा काम करवाती है? हँ? आठ घंटे काम करवाती है। हँ? घंटा पुरुषार्थ करके तैयार करना पड़ेगा ना। हँ? तैयारी कितने घंटे की होनी चाहिए? 8 घंटे की तैयारी होनी चाहिए। सो भी कह देते हैं कि ऐसे नहीं है कि कोई 8 घंटा लगातार रह सकते हैं। ना। वो तो पिछाड़ी की बात बोलते हैं। यहाँ तक आकरके अगर कोई 8 घंटा रह जावे तो अहो सौभाग्य। क्योंकि फिर तो गोर्मेन्ट की सर्विस में तैयार हो गए। तो वो तो टाइम होगा ना धीरे-4. क्योंकि दूसरी बात है अगर कोई कर्मातीत अवस्था में आ जाए तो वापस चला जावे।

और अभी वापस तो कोई बाप के बिगर जा ही नहीं सकता। क्योंकि बाप जाएगा तब तो दूसरा कोई वापस जाएगा ना। पहले तो ये कहा जाता है कि बरात पीछे-पीछे जाएगी। हँ? पहले कौन जाएगा? हँ? आगे-आगे कौन जाएगा? आगे-आगे, हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) आगे-आगे शंकर जाएगा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) भूत-प्रेत जाएगा आगे-आगे? बरात में कहीं कोई आगे-आगे भूत-प्रेत जाते हैं क्या? हँ? बरात तो पीछे-पीछे जाएगी ना शिव बाबा की। हँ? शिवबाबा की बरात? शिवबाबा के पीछे-पीछे जाएगी? शिवबाप के पीछे-पीछे नहीं जाएगी? हँ? जब घर जाएंगे तो बाप के पीछे-पीछे बरात नहीं जाएगी? शिव बाप के पीछे? (किसी ने कुछ कहा।) जाएगी। अच्छा? शिव बाप दूल्हा भी बनता है? हँ? जो आत्माओं का बाप है। हँ? तो ये भी तो है ना गाया जाता है ना। शिव बाबा की बरात। और विवेक भी कहता है। जब बाबा जाएगा तब हम उसके पिछाड़ी-पिछाड़ी जाएंगे। हँ? जो जो जाकरके वहाँ सारा वो झाड़ फिर बन जाएगा। जो झाड़ अभी वहाँ है नहीं। जो झाड़। कौनसा झाड़? हँ? बिन्दु-बिन्दु आत्मा बने हुओं का झाड़ अभी वहाँ है नहीं। हाँ, वहाँ बाकि कुछ थोड़ा बच्चर-फक्चर होगी। सो तो फिर आते रहेंगे। आते रहते होंगे जिससे ये संस्था की वृद्धि होती रहती है मनुष्यों की। हँ? कौनसी संस्था की? हँ? कौनसी संस्था तैयार हो रही है? हँ? ऊँच ते ऊँच कौन है? ब्राह्मणों की संस्था ना। तो भी देखो कितने मरते होंगे। क्या बोलते हैं कि भई ये एक लाखों रोज आते रहते हैं वृद्धि को। सारी दुनिया में। तो फिरता भी तो होगा ना। ये भी तो समझ की बात है ना बच्चे। तो बाबा तो वंडर खाते हैं।

A night class dated 2.9.1967 was being narrated. You go to explain; people don’t understand; its reason is that there is no Yoga. There is no power of Yoga at all. Children have to obtain inheritance from the Father. And the Father has come only to give inheritance. So, whatever anyone’s fated to get, Baba understands how they obtain it. Although so many outsiders also come. Among them also Baba checks as to who is nice, intelligent. What does she say when she talks to someone? So, those people say – Baba, I am just bound. I am bound. I cannot come here because I am ordered not to leave the house. But I remember a lot. Among those baandhelis (the ladies in bondage) also there are some are like this, some are like that, and some are like something else. All are not alike, are they? For example, even here children are not alike. There are Gangeses of knowledge also. There are also those living at home [here]. They cannot remember. And look, however the outsiders come from there.

You are like the ones living in Haridwar. There are pundits living in Haridwar, aren’t there? And poor outsiders come here. It is because the Ganges is glorified the most in Haridwar, isn’t it? When compared to all the rivers the glory of this Ganges is more. It is the most glorified one. Otherwise, actually Brahmaputra is bigger than the Ganges. And that Brahmaputra is not like this. No. It is praised more than the Ganges. Otherwise it is the river Brahmaputra which is bigger. And they don’t have any knowledge. ‘They’ refers to whom? The rivers. Nothing. So, as per this drama plan it is fixed. It is as if it is fixed. And here Jamuna is better. Hm? Why? It is because Krishna’s palaces are not located on the banks of the Ganges. Hm? Call it the gathering like palace or fort of Krishna; they are located only on the banks of Jamuna. So, when this abode of angels (paristaan) is established on the banks of Jamuna; this Delhi becomes Paristaan, doesn’t it? So, why? Hm? Why shouldn’t this river Yamuna be praised more? River Ganga is praised more. So, what is there? What is there in the Ganges? It is because it is correct that this Delhi remains Paristaan. Later, when this Jamuna comes straight from north, then everyone is flooded. In what are they flooded? Hm? Daughter, they are flooded in vices, aren’t they? And there are some among them who become careful. So, those who become careful understand that God should come before that. The one who saves us from being flooded should come first, shouldn’t He?

So, they do not know at all that God sits and teaches Yoga. And a lot of time is required for that. There is no such thing in the Gita. Hm? That is it. That war is about to break out. God sits and teaches rajyog for such a long period. Nobody knows about anyone. So, there is no topic of Yoga in the Gita there. Although the Father says – Manmanaabhav, Madhyajibhav. That is a topic to be understood as to how do we become Manmanaabhav? First Manmanaabhav and then Madhyajibhav. Whatever you wish to dedicate, whatever you have to sacrifice, body, mind, wealth, make efforts for Me. First you will invest your mind; then you will make efforts, will you not? The body, mind and wealth gets sacrificed automatically wherever your mind is attracted, heart is attracted. So, that is a topic to be understood. You can understand. But you cannot understand the meaning even a little. Hm? Daughter, it takes time to obtain the knowledge, to understand the process of Yoga, doesn’t it?

And it is not as if the journey of remembrance is so easy that the tamopradhan human beings become satopradhan immediately. Hm? Yes, this one will become satopradhan from tamopradhan immediately. ‘This one’ (ye) refers to whom? Hm? Towards whom was a gesture made by uttering ‘this one’?
(Someone said something.) Did Brahma become immediately? Hm? 80 years have passed and has he become immediately? Hm? This one will become satopradhan from tamopradhan. No. It cannot happen like this. It is because you children are feeling that it is very difficult to become satopradhan from tamopradhan immediately. Someone may boast that we sit in remembrance for so many hours. They boast. The Father has explained, hasn’t He that that Government also; people work for the government, don’t they? So, how many hours does it make you work? Hm? It makes you work for eight hours. Hm? You have to make purusharth for an hour and prepare, will you not? Hm? How many hours’ preparation should you make? There should be preparation of eight hours. That too He says that it is not as if someone can remain continuously for eight hours. No. That is a topic of the end that He speaks. If someone remains for even 8 hours then it is a great fortune. It is because then you have become ready in the service of the government. So, that time will come gradually. It is because the other topic is that if someone achieves the karmaateet stage, then he will go back.

And now nobody can go back without the Father at all. It is because anyone else can go only when the Father goes. First it is said that the marriage party (baraat) will follow. Hm? Who will go first? Hm? Who will move in the front? In the front; Hm?
(Someone said something.) Will Shankar be in the front? Hm? (Someone said something.) Will the ghosts and devils be in the front? Do ghosts and devils move in the front in a marriage party? Hm? The marriage party will go behind ShivBaba, will it not? Hm? ShivBaba’s marriage party? Will it go behind ShivBaba? Will it not go behind Father Shiv? Hm? When you go home, then will the marriage party not go behind the Father? Behind the Father Shiv? (Someone said something.) It will go. Achcha? Does Father Shiv become a bridegroom as well? Hm? The one who is the Father of souls. Hm? So, this is also there; it is praised, isn’t it? Marriage party of ShivBaba. And conscience also says. When Baba goes then we will go behind Him. Hm? Then the entire tree will develop there. That tree is not there now. That tree. Which tree? Hm? The tree of those persons who have become souls is not there now. Yes, some remain there. They will then keep on coming. They must be coming so that this institution of human beings keeps on increasing. Hm? Which institution? Hm? Which institution is getting ready? Hm? Who is the highest on high? The institution of Brahmins, isn’t it? Yet, look, so many must be dying. They say, brother, lakhs of people keep increasing everyday in the entire world. So, it must also be rotating, doesn’t it? This is also a topic to be understood, isn’t it children? So, Baba wonders.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Feb 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2669, दिनांक 13.10.2018
VCD 2669, dated 13.10.2018
प्रातः क्लास 17.9.1967
Morning Class dated 17.9.1967
VCD-2669-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.50
Time- 00.01-17.50


आज का रात्रि क्लास है – 17.9.1967. ए विषनी, कोई ने कहा – थोड़ा-थोड़ा। हाँ, थोड़ा-थोड़ा करती है। ये मम्मा-बाबा भी तो सर्विस में हैं। तो बच्चे भी अगर महिमा करते हैं माँ और बाप की तो महिमा वो कर ही तब सकते हैं जबकि माँ और बाप के लिए फिर से ये सर्विस करते रहें। फिर-फिर के सर्विस करते रहें, औरों का कल्याण करते रहें। ये तो बच्चे जानते हैं कि सर्विस बहुत-बहुत वृद्धि को पानी है जरूर। हँ? क्यों ऐसे कहा? क्योंकि विश्व की बादशाही स्थापन हो रही है। और होगी जरूर। तो सर्विस को बहुत वृद्धि को पाना है। तो कभी भी हार्टफेल नहीं होना चाहिए। और सर्विस में ही लगे रहने का पुरुषार्थ करना चाहिए। अपनी जांच करनी है कि मैं सर्विस कर रही हूँ? जिसके हम संतान हैं उनके मददगार हैं? किस हद तक हैं मददगार? कहाँ तक मददगार हैं? क्योंकि ये गाया जाता है फालो फादर मदर। तो फालो करती हूँ?

भले बाप तो कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रह। और ये बच्चियाँ आजकल ये व्यवहार कर रही हैं। क्योंकि अभी ये गृहस्थ में नहीं कहेंगे। व्यवहार में हैं। और वो फिर जो गृहस्थ में भी हैं, व्यवहार भी करते हैं, अपनी गृहस्थी को सपोर्ट करने के लिए, संभालने के लिए। अभी इनको कोई गृहस्थ तो है नहीं। बाकि हाँ, ये ब्रह्मचारिणी है। और व्यवहार भी करती है। और आजकल तो सभी व्यवहार तो करते ही हैं। माताएं हों, कन्याएं हों, बहुत व्यवहार करते हैं। धंधे-धोरी करते हैं ना। बड़े-बड़े दुकान संभालते हैं। हीरे-जवाहरातों के भी दुकान संभालते हैं। तो अभी तो बच्चों को मालूम है कि ये जो व्यवहार है अविनाशी ज्ञान रत्नों का, तो फिर उसमें ध्यान लग जाना चाहिए कि हम कहाँ तक ये इस अविनाशी ज्ञान रत्नों के व्यवहार में तीखे हैं। फिर मिसाल जैसे कि वहाँ बॉम्बे में ये रहने वाली ये तो जानती है। ये नलिनी बड़ी अच्छी है। अच्छा, वो नलिनी की वो उनकी बड़ी बहन, नहीं, उनकी छोटी बहन इन्द्रा देखो बच्ची है, वो भी तो अच्छी संभाल करती है। बड़ा अच्छा भाषण करती है। तो देखना चाहिए अपन को, मैं अभी ऐसा करती हूँ? ये कहेंगे – नहीं, मैं तो सर्विस करती हूँ इसलिए नहीं करती हूँ। अरे, तो सर्विस करती है तो क्या हुआ? वो तो नौकरी है आठ घंटे की। तो बाकि टाइम कहाँ लगाती? तो बाकि टाइम तो इस ईश्वरीय सर्विस में लगाना चाहिए ना। टाइम निकाल करके अपना भी कल्याण करना चाहिए और औरों का भी कल्याण करना चाहिए। अगर औरों का कल्याण नहीं करेंगे, तो गोया अपना कल्याण नहीं करेंगे। अपना कल्याण है तो फिर औरों का भी कल्याण करना चाहिए।

तो रूहानी सर्विस का, जैसे बीमारी बहुत होती है ना बच्चे, तो बीमारी जब बहुत फैलती है तो बहुत डॉक्टरों की जरूरत होती है। अब तुम तो जानते हो कि बेहद की बात में तो सारी दुनिया बीमार है। सारी दुनिया रोगी है बिल्कुल। कौनसी बेहद की बात में? ये विकारों की जो बीमारी है ना, हँ, जब नई दुनिया थी तो सारी दुनिया नीरोगी थी। हँ? उस समय इतनी बड़ी सारी दुनिया तो नहीं थी जब नीरोगी थे। क्योंकि वहाँ तो छोटी सी दुनिया थी। और ये इनकी दुनिया थी लक्ष्मी-नारायण की। क्यों ये आज बंद है दोनों, बीमार हैं? बीमार हैं क्या? किसी ने कुछ कहा। क्यों? कल तो ठीक थी। कौन नहीं पढ़े हुए हैं? अगर कोई विद्वान बड़ा होगा और उसको समझाने वाली कोई कच्ची ब्राह्मणी होगी तो फिर उनको समझाय नहीं सकेगी। हँ? और फिर तो और ही सब ब्राह्मणियों का नंबरवार कर देगी ऐसे। न खुद समझाय सकेगी और उसे देखकर दूसरे भी ऐसे ही बनेंगे। और ये तो ऐसे होता रहता है क्योंकि बड़ा कोई आ जाता है और उनको संभालने वाली, समझाने वाली कोई हल्की ब्राह्मणी मिलती है तो फिर वो वायब्रेशन, इम्प्रेशन लेकरके जाते हैं, बैड इम्प्रैशन। पीछे वो औरों को भी जाकरके खराब कर देते हैं। फालतू है वहाँ जाना।

बाबा तो कहते हैं ये जो कुछ भी पास्ट में हो गया रात को बैठ करके पोतामेल लिखो। तभी तो कहते हैं ना बच्चे रात को बैठ करके अपनी रोज की सर्विस का पोतामेल निकालो कि सारे दिन में हमने क्या-क्या किया? सर्विस में रहा या दैवी गुणों की धारणा की? क्या-क्या किया? हँ? वो रात को बैठ करके रोज अपना पोतामेल, अपनी कमाई का पोतामेल निकालना चाहिए ना। अब जिनको कुछ कमाई करनी है वो तो करेंगे। क्योंकि ये तो सबके लिए है ना बच्ची। कोई भी समझते हैं कि हम तो बहुत अच्छा नामीग्रामी हूँ। और जैसे समझो रमेश है, हँ, हँ, क्या समझो? क्या बताया? जो अपन को समझते हैं हम तो बहुत नामीग्रामी हैं। जैसे रमेश है, कुमारका है या देखो कितने बड़ों का नाम बाबा ले लेते हैं। वास्तव में उनको भी ये चाहिए जरूर। क्या? क्या चाहिए? हँ? ये सारे दिन की कमाई का पोतामेल रात को बैठ करक लिखना चाहिए क्योंकि ये नियम है ना। जैसा करम मैं करूंगा या करूंगी, मुझे देखकरके और भी करने लग पड़ेंगे। हँ? तो हैड्स, अपन को देखना चाहिए मैं हैड्स हूँ ना। तो उनको जरूर कुछ करना है। लिखकरके, रात को लिखकरके, देखना चाहिए मेरे से कोई भूल तो नहीं हुई है। और सारा दिन में मैंने कितना याद किया। बाप को लिखेंगे, तो बोलो, हम भी लिखते हैं तुम भी लिखो। तो जब ब्राह्मणी खुद लिखती है तो फिर सबको बोल सकती है। तुम भी लिख करके आओ पोतामेल। हम भी लिखती हैं।

तो बाबा तो यहाँ सुनाते रहते हैं पोतामेल लिखने के बारे में। समझे ना। बाबा कहते हैं ना भई तुम बच्चे जो अनन्य हो अच्छे-अच्छे जो अपना चार्ट लिखते हैं। मैं इतना नहीं याद कर सकता हूँ, हँ, क्योंकि मुझे तो बहुत कुछ देखना पड़ता है। माना? 17.9.1967 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। अब ये देखो दिल्ली में सेन्टर्स खुल रहे हैं। हँ? तो मुझे तो बहुत कुछ देखना पड़ता है ना। तो उनका ख्याल बाबा को कितना रहता होगा। रात को नींद भी फिट जाती। कोई-कोई समय में ख्याल करते-करते सारी रात नींद नहीं आती। कोशिश भी करते हैं बाप को याद करें, जैसे बच्चे बाबा के पास आके कहते हैं बाबा हम कोशिश करते हैं। हमसे याद करना भूल जाता है। बाबा भी कहते हैं मेरे को इतना सारा राय निकालना पड़ता है। ख्याल भी करता हूँ। नहीं, हमको तो बाबा को याद करना है। बाबा को याद करूं। नहीं। अब ये इतने ढ़ेर हैं। इतने ढ़ेर बच्चे हैं। सेन्टर खुलते जाते हैं। उनका ख्याल ले आते हैं। बहुतों के समाचार आते रहते हैं बाबा के पास। बहुत सेन्टर्स के समाचार आते रहते हैं ना, कहाँ-कहाँ खिटपिट है, कहाँ क्या हो रहा है, कहां-कहां क्या है, कहां से क्या समाचार आते हैं। कहां झगड़े हैं, कहां क्या लगा पड़ा है। तो बाबा को तो इन बच्चों का ख्याल रहेगा ना। इसलिए मैं बच्चों की महिमा करता हूँ कि बच्चे जास्ती मददगार हैं इन बातों में। किन बातों में? हँ? याद करने में, सेवा करने में, पोतामेल लिखने में।

Today’s night class is dated 17.9.1967. O Vishni! Someone said – Little, little. Yes, she does little, little. These Mama and Baba are also on service. So, even if children praise the mother and the Father, then they can praise only when they keep on doing this service for mother and Father. They should keep on touring and doing service and should keep on benefiting others. Children know that service is bound to grow. Hm? Why was it said so? It is because the emperorship of the world is being established. And it will definitely be established. So, service is bound to increase a lot. So, you should never suffer a heart fail. And you should make efforts to do service only. You should check whether I am doing service? Are we helpers of the one whose children we are? To what extent are we helpers? To what extent are we helpers? It is because it is sung follow Father, mother. So, do I follow?

Although the Father asks you to lead a household life (grihasth vyavhaar) and these daughters are now-a-days involved in these activities (vyavhaar) because now they will not be said to be in a household. They are in activity. And then those who are in a household also and are involved in activity as well to support, to take care of their household. Well, these [people living in Madhuban] do not have a household. But yes they are spinsters (brahmachaarini). And they also involve themselves in activity. And now-a-days everyone is involved in activity. Be it the mothers, be it the virgins, they do a lot of activity. They pursue business, etc., don’t they? They take care of big shops. They manage shops of diamonds and jewellery also. So, now children know that this is an activity of imperishable gems of knowledge; so then you should pay attention to it that how sharp we are in the activity of these imperishable gems of knowledge. Then, for example, this one living there in Bombay knows. This Nalini is very good. Achcha, Nalini’s elder sister, no, her younger sister Indra, look, she is a daughter; she too takes very good care. She delivers good lectures. So, you should check yourself – Do I do like this now? They will say – No, I do service (job); this is why I don’t do. Arey, what happened if you do service? That job is for eight hours. So, where do you spend the rest of the time? So, you should invest the remaining time in this Godly service, shouldn’t you? You should spare time and cause benefits to yourself also and cause benefit to others as well. If you do not cause benefit to others, then it is as if you will not cause benefit to yourself. If you have benefited yourself, then you should benefit others as well.

So, as regards the spiritual service; for example, children, when there is a lot of illness, when the disease spreads a lot, then there is a need for many doctors. Now you know that the entire world is ill in an unlimited sense. The entire world is completely ill. In which unlimited sense? As regards this disease of vices, hm, when there was a new world, then the entire world was healthy (nirogi). Hm? At that time such a big world did not exist when you were healthy. It is because it was a small world there. And it was the world of these Lakshmi and Narayan. Why are these two closed? Are they ill? Are they ill? Someone said something. Why? She was alright yesterday. Who isn’t educated? If there is a big scholar and if the Brahmani who explains to him is weak, then she will not be able to explain to her. Hm? And then she will make other Brahmanis also numberwise like this. Neither will she be able to explain herself and by observing her, others will also become like this only. And this keeps on happening like this because when someone big arrives and if the one who attends to him, explains to him is a light (not so knowledgeable) Brahmani, then they (the students) carry that vibration, impression, bad impression. Later they go and spoil others as well. It is a waste going there.

Baba says – Whatever has happened in the past, you should sit and write potamail (account) in the night. Only then does He say that children you should sit in the night and draw the potamail of your daily service that what all did I do in the entire day? Was I busy in service or did I inculcate divine virtues? What all did I do? Hm? You should sit and write that potamail daily in the night; you should draw the potamail of your income, will you not? Well, those who have to earn something will do. It is because this is for everyone daughter, isn’t it? Some think that I am very famous. And for example, suppose there is Ramesh, hm, hm, what should you suppose? What has been mentioned? Those who think that we are very well-known. For example, there is Ramesh, there is Kumarika or look Baba utters the name of so many big ones. Actually they also definitely require this. What? What do they require? Hm? You should sit in the night and write the potamail (account) of the income of the entire day because this is a rule, isn’t it? As is the action I perform, others will observe me and start doing the same thing. Hm? So, the heads should check themselves. I am a head, am I not? So, they should definitely do something. After writing; after writing in the night you should check whether I have committed any mistake. And how long did I remember throughout the day. If you write to the Father, then tell, I also write; you also write. So, when the Brahmani herself writes then she can tell everyone. You also write and bring the potamail. I also write.

So, Baba keeps on narrating here about writing potamail (account of one’s actions). Did you understand? Baba says, doesn’t He that brother, you children, who are unique, nice ones, who write your charts. I cannot remember so much because I have to look after many things. What does it mean? Second page of the night class dated 17.9.1967. Now look, Centers are getting opened in Delhi. Hm? So, I have to look after many things, don’t I? So Baba must be thinking so much about them. Even the sleep vanishes in the night. Sometimes I don’t get sleep while thinking throughout the night. Even if we try to remember the Father, just as children come to Baba and say – Baba we try. We forget to remember. Baba also says – I have to give so many advices. I also think. No, I should remember Baba. Let me remember Baba. No. Well, these are so many. There are so many children. Centers keep on opening. Their thoughts come to the mind. News of many persons keeps on coming to Baba. News of many centers keeps on coming, doesn’t it? There is a problem somewhere; something is happening somewhere; something else happens somewhere else; some news comes from some other place. Somewhere there are fights; somewhere there’s something else. So, Baba will think about these children, will he not? This is why I praise the children that children are so helpful in these topics. In which topics? Hm? In remembering, in doing service, in writing potamail.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2670, दिनांक 14.10.2018
VCD 2670, Dated 14.10.2018
रात्रि क्लास 17.9.1967
Night Class dated 17.9.1967
VCD-2670-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.30
Time- 00.01-19.30


रात्रि क्लास चल रहा था - 17.9.1967. चौथे पेज के सातवीं-आठवीं लाइन में बात चल रही थी - इस ब्रह्मा को भी बड़ी अच्छी तरह से, सिर्फ अच्छी तरह से नहीं, बड़ी अच्छी तरह से और युक्ति से समझाना होता है। युक्ति से नहीं समझाएंगे तो योग अटक जाएगा। इसलिए वो सुदामा का भी अक्षर डाल दिया। ये सुदामा नहीं। वो सुदामा का अक्षर। हं? ये 'वो' कहके सुदामा को दूर क्यों कर दिया? हँ? क्योंकि (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, भविष्य में पार्ट प्रत्यक्ष होने वाला है ना। हँ? सुदामा का क्या अर्थ बताया? हँ? सु माना सुंदर, दामा माने धन-संपत्ति। ज्ञान की धन-संपत्ति की बात है। तो अक्षर डाल दिया है कि बचपन में कृष्ण का साथी था। गरीब था। लेकिन समझदार हुआ तो बड़ा विद्वान था। तो बताया कि बड़ा युक्ति से समझाना होता है। बड़ी अच्छी तरह से। किसको? हँ? इसको। इसको माने ब्रह्मा बाबा को। है ना। अभी चावल तो कोई दो मुट्ठी थोड़ेही ले आते हैं। हँ? ये तो देह अभिमान उतरी हुई चावल जैसी आत्माओं की बात है। टीका लगाते हैं तो चावल भी भृकुटि में लगाते हैं ना। आत्मा की निशानी है। तो यहाँ कोई स्थूल चावलों की बात नहीं है। ये तो चैतन्य आत्माओं की बात है।

बाबा ने नहीं सुनाया, वो पैसा भी भेज देते हैं एक मनी आर्डर करके। हँ? कौन भेज देते हैं? हँ? एक मनीआर्डर करते हैं। कहते हैं दो पैसा हमारी ईंट की टुकड़ी भी लगाय दो। नई दुनिया बन रही है ना। तो हमारी भी टुकड़ी लगा दो, फलाना कर दो। ये हमारी भी मिट्टी लगा दो। ऐसे भी कभी-कभी करते हैं। ये देह अभिमान की मिट्टी है ना। तो काम में लगा दो। हमेशा नहीं करते हैं ऐसे। कभी-कभी। पीछे कभी भले कोई वो, कोई के पास बिल्कुल नहीं है। वो ऐसे करते हैं। क्या करते हैं? हँ? वो बताया ना वो। वो ही सुदामा की बात। चावल मुट्ठी ले आते हैं क्योंकि ये तो बच्चे समझते हैं ना। ये चावल मुट्ठी क्या है? बाबा ने तो बहुत बारी समझाया। ये भक्तिमार्ग है। तभी भी तो ईश्वर अर्थ करते हैं ना। तो ज्ञान मार्ग में क्यों नहीं करेंगे? अभी ईश्वर को क्या देंगे? ईश्वर तो दाता है ना। हँ? वो तो किसी से लेने वाला नहीं ना। हँ? किस बात का दाता है? अरे, उसके पास जो होगा उसी का दाता है ना। निराकार है तो निराकारी ज्ञान रत्नों का दान ही देता है। तो ऐसे करते हैं ना बच्चे। माना ज्ञान रत्नों का दान देते हैं ना बच्चे। किसको देते हैं? हँ? साहूकारों को नहीं देते हैं। इस दुनिया में जो साहूकार हैं ना, ब्रह्मा बाबा जैसे हीरों के व्यापारी, उनको नहीं देते हैं। ज्ञान रत्नों का भंडार किसको देते हैं? किसकी बात हो रही थी? हँ? सुदामा की बात हो रही थी ना।

तो गरीब सुदामा को देते हैं ज्ञान रत्नों का भंडार। क्योंकि अभी संगमयुग में ईश्वर तो डायरेक्ट नहीं है ना। हँ? ईश्वर डायरेक्ट है क्या? वो तो पर्दे के पीछे ही डायरेक्टरी करता है। हँ? अभी माने कभी? 67 में इनडायरेक्ट है ना। इनडायरेक्ट माने? हँ? अरे, ब्रह्मा के थ्रू है ना, दादा लेखराज के थ्रू। हाँ, तो भी देने वाले किसको समझ के देते हैं? ब्रह्मा बाबा को देते हैं या ईश्वर को देते हैं? ईश्वर को ही देते हैं। तो बाबा ने समझाया कि ईश्वर को देते हैं, ऐसे समझ कर देते हैं तो दूसरे जनम में मिल जाता है। जैसे गाते हैं ना - इसने पूर्व जनम में ऐसा कर्म किया है तो साहूकार बना अर्थात् साहूकार घर में जन्म लिया। साहूकारों के घर में जन्म मिल जाता है ना। तो जरूर दान-पुण्य करके आए होंगे क्योंकि गाते हैं ना इसने कर्म ऐसा किया है। हँ? कैसा कर्म किया है? धन दान दिया है तो साहूकारी मिल गई। उनको मेहनत नहीं करनी पड़ी। साहूकारों के घर में जन्म लेते हैं तो उन्हें कोई मेहनत करनी पड़ती है? नहीं। और इसने ऐसा किया कि गरीब घर में जन्म मिल गया। ऐसे भक्तिमार्ग में कहते हैं ना। तो पूर्व जन्म का हिसाब-किताब भी तो होता है ना।

अब यहाँ तो शूटिंग की बात है। शूटिंग में, हँ, क्या बात है? सुदामा गरीब क्यों बना? और बाप आकरके उस गरीब को ही ज्ञान रत्नों का दान क्यों देते हैं? हँ? गरीब बना तो अच्छा हुआ या खराब हुआ? क्या हुआ? अच्छा हुआ। लेकिन गरीब बनके आया है इस जनम में तो इससे तो साबित होता ही है कि पूर्व जनम में कोई ऐसा चालाकी का काम किया है। जैसे आजकल के बड़े-बड़े साहूकार होते हैं ना। वो मेहनत से बनते हैं, पसीने की कमाई से बनते हैं या चालाकी से बनते हैं? चालाकी से बनते हैं। तो ऐसी चालाकी, छल, फरेब करते हैं तो गरीब घर में जनम मिलता है। अब करम किया है ना। इन्होंने करम किया है तो दान किया है, तो मिलता है। किन्होंने? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा के लिए कहा उनको दान मिल गया ज्ञान रत्नों का? वाह भइया। हँ? कर्म किया है ना। दान किया है ना। हँ? हाँ। ब्रह्मा बाबा ने काहे का दान किया पूर्व जनम में? स्थूल धन का दान किया तो स्थूल धन के साहूकार बन गए। हँ? और सुदामा ने क्या किया? हँ? गीता ज्ञान का दान दिया तो बेहद के ज्ञान रत्नों का दान मिल गया। हँ? सुदामा अर्थात् कौनसी माला का मणका? रुद्र माला का मणका बना ना। हँ? तो रुद्र गण तो डायरेक्ट भगवान की औलाद। वो है ही रुद्र ज्ञान यज्ञ। तो बाप आते हैं, कहते हैं, अभी एक ही बात है। क्या? क्या एक बात है? हँ? अभी जितना ज्ञान रत्नों का दान करेंगे तो जन्म-जन्मान्तर यही रतन स्थूल रतन बन जावेंगे। स्थूल रतन भी बन जावेंगे। और फिर भक्तिमार्ग में ज्ञान रतन भी बन जावेंगे। समझा ना?

तुम जो आगे करते थे। ये नहीं। तुम। हँ? कौन तुम? रुद्र माला के मणके। तुम जो आगे करते थे पूर्व जनम में, वो ही करो। क्या? स्थूल रत्नों का दान करते थे कि ज्ञान रत्नों का दान करते थे? हँ? स्थूल रत्नों का दान नहीं करते थे। ज्ञान रत्नों का दान करते थे। कहाँ? हँ? ओम मंडली में ना। तो तुम्हारा वो दान का उजूरा दूसरे जनम में मिलता है। माने ओम मंडली के बाद अगला जनम जो होता है ना। हँ? कहाँ होता है? ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में दुबारा ब्राह्मण जनम लेते हैं ना। हँ? जो एक बार ईश्वरीय ज्ञान ले लेते हैं, शरीर छोड़ते हैं तो निश्चित है कि उनको दुबारा फिर ब्राह्मण बनके आना है। तो फिर दूसरे जनम में जो मिलता है उजूरा, हँ, वो फिर 21 जन्म के लिए मिल जाएगा। हँ? 8 जनम सतयुग के, 12 जनम त्रेता के और एक जनम ये संगमयुग का, उजूरा मिल जाता है ना। हाँ। तो ऐसे ही करो।

और फिर ये समझते हो कि वहाँ जो करते थे तभी तो कोई विनाश तो सामने नहीं था। हँ? वहाँ माने कहाँ? हँ? ओम मंडली में जो तुम करते थे, तो विनाश सामने था ऐसा कुछ बताया था? नहीं। हँ? यज्ञ के आदि में विनाश सामने था ऐसा बताया? नहीं। और अभी तो? अभी तो बताय दिया ना विनाश सामने खड़ा है। हँ? दुनिया के विनाश की बारूद तैयार हो गई ना। क्या? एटम बम, हाइड्रोजन बम्ब। तो अभी तो सामने खड़ा है। तो क्या करोगे? इसलिए फिर, हँ, दान धरम जास्ती करोगे, धरम की स्थापना में जास्ती सहयोग दोगे, हँ, ज्ञान रत्नों का दान जास्ती करोगे या कम करोगे पूर्व जनम के मुकाबले? ज्यादा ही करोगे ना क्योंकि अब सब कुछ विनाश तो होने का ही है। क्या? कुछ भी नहीं बचेगा। जब पता लग गया कुछ भी नहीं बचेगा, न ये तन बचेगा, न धन बचेगा, हँ, न मन बचेगा, हँ, तो इससे तो अच्छा स्वाहा ही कर दें ज्ञान यज्ञ में। तो जरूर कोशिश करेंगे कि जितना कुछ हम कर सकें, इतना करें। हँ? जितना कर सकें? क्योंकि जितना करेंगे वो ही तो हम साथ में ले जाएंगे 21 जन्म के लिए। हँ? तो क्या करेंगे? जितना कुछ करेंगे या सब कुछ करेंगे? हँ? तन की सेवा, मन की सेवा, धन की सेवा, हँ, जितना इस ईश्वरीय यज्ञ में स्वाहा करेंगे तो वहाँ 21 जन्म के लिए प्राप्ति हो जाएगी।

A night class dated 17.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the seventh-eighth line on the seventh page was – You should explain about this Brahma also very nicely; not just nicely but very nicely and tactfully. If you do not explain tactfully, then the Yoga will be obstructed. This is why the word of that Sudama has also been mentioned. Not this Sudama. The word of that Sudama. Hm? Why Sudama was made distant by uttering ‘that’? Hm? It is because
(Someone said something.) Yes, the part is going to be revealed in future, isn’t it? Hm? What is the meaning of Sudama? Hm? Su means sundar (beautiful), dama means wealth and property. It is about the wealth and property of knowledge. So, the word has been inserted that he was the childhood companion of Krishna. He was poor. But when he grew up, he was a big scholar. So, it was told that you have to explain very tactfully. Very nicely. To whom? Hm? This one. This one means Brahma Baba. Is it not? Well, does anyone bring two hands full of rice [for donating]? Hm? This is about the rice-like souls whose body consciousness [like peel] has been removed. When they apply teeka, they also affix rice in the bhrikuti [middle of the forehead between the eyebrows], don’t they? It is the symbol of a soul. So, here it is not about physical rice. It is about the living souls.

Didn’t Baba narrate that they also send money through money order? Hm? Who sends? Hm? They send one money order. They say – Use our two paise also in the form of a piece of brick. New world is being established, isn’t it? So, use our piece also, do such and such thing. Use our soil also. Sometimes they do like this also. This is mud of body consciousness, isn’t it? So, use it. They do not do so always. Sometimes. Later, someone may not have anything at all. They do like this. What do they do? Hm? That was mentioned, wasn’t it? The same topic of Sudama. They bring handful of rice because children understand this, don’t they? What is this handful of rice? Baba has explained many times. This is path of Bhakti. Only then do people do in the name of God, don’t they? So, why will they not do on the path of knowledge? What will they give to God now? God is a giver, isn’t He? Hm? He does not take from anyone, does He? Hm? He is a giver of what? Arey, He is a giver of whatever He possesses, isn’t He? He is incorporeal; so, He gives the donation of the incorporeal gems of knowledge only. So, children do like this, don’t they? It means that children donate the gems of knowledge, don’t they? To whom do they give? Hm? They do not give to the rich persons. He does not give to the rich persons in this world, like the diamond-merchants like Brahma Baba. To whom does He give the store-house of the gems of knowledge? Whose topic was being discussed? Hm? Sudama’s topic was being discussed, wasn’t it?

So, He gives the store-house of the gems of knowledge to the poor Sudama. It is because God is not direct now in the Confluence Age, is He? Hm? Is God direct? He performs the task of director while remaining behind the curtains. Hm? Now refers to which time? He is indirect even in 67, isn’t He? What is meant by indirect? Hm? Arey, He is through Brahma, isn’t He, through Dada Lekhraj. Yes, yet, what do givers think while giving? Do they give to Brahma Baba or to God? They give to God only. So, Baba has explained that if you give to God, if you think like this while giving then you get the returns in the next birth. For example, it is sung, isn’t it? This one has performed such actions in the past birth that he has become prosperous, i.e. he has got birth in a prosperous person’s house. They get birth in rich households, don’t they? So, they must have given donations and performed noble acts because it is sung that this one has performed such actions [in the past births]. Hm? What kind of action has he performed? He has donated wealth; so, he got prosperity. He did not have to work hard. If someone is born in the house of prosperous persons, does he have to work hard? No. And this one has done some such thing that he got birth in a poor man’s house. It is said like this on the path of Bhakti, isn’t it? So there is karmic account of the past births as well, isn’t it?

Well, here it is a topic of shooting. During shooting, hm, what is the topic? Why did Sudama become poor? And why does the Father come and give the donation of the gems of knowledge only to that poor man? Hm? If he became poor was it good or bad? What is it? It is good. But he has come as a poor person in this birth; so, it proves that he has performed some such task of deceit in the past birth. For example, there are big prosperous persons now-a-days, aren’t there? Do they become [prosperous] through hard work, through income earned by sweating or through deceit? They become through deceit. So, when they do such deceit, cheating, dishonesty, they get birth in a poor man’s house. Well, they have performed [such] actions, haven’t they? They have performed [such] actions, they have donated, so they get. Who? Hm?
(Someone said something.) Was it said for Brahma that he got the donation of the gems of knowledge? Wow brother! Hm? He has performed actions, hasn’t he? He has donated, hasn’t he? Hm? Yes. What did Brahma Baba donate in the past birth? He donated the physical wealth, so he became prosperous in physical wealth. Hm? And what did Sudama do? Hm? He donated the knowledge of the Gita; so, he got the donation of the gems of knowledge. Hm? Sudama means the bead of which rosary? He became the bead of the rosary of Rudra (Rudramala), didn’t he? Hm? So, the Rudragans are the children of direct God. It is the Rudra Gyan Yagya. So, the Father comes; He says, now there is only one topic. What? What is the one topic? Hm? The more you donate the gems of knowledge now, these very gems will become the physical gems birth by birth. They will become physical gems as well. And then, they will also become the gems of knowledge on the path of Bhakti. Did you understand?

Whatever you used to do earlier. Not this one. You. Hm? Who you? The beads of the Rudramala. Whatever you used to do in the past birth, do the same. What? Did they used to donate the physical gems or did they used to donate the gems of knowledge? Hm? They did not used to donate the physical gems. Where? Hm? In the Om Mandali, isn’t it? So, you get the returns of donation in the next birth. It means the next birth after Om Mandali; hm? Where does it happen? They get birth again as Brahmins in the Brahmakumari Ishwariya Vishwavidyalaya, don’t they? Hm? Those who obtain Godly knowledge once, leave their bodies, then it is certain that they have to become Brahmins again and come. So, then the returns that they get in the next birth, will be received for 21 births. Hm? 8 births of the Golden Age, 12 births of the Silver Age and one birth of this Confluence Age; they get the returns, don’t they? Yes. So, do like this only.

And then you understand that whatever you used to do there, at that time destruction was not staring at you. Hm? ‘There’ refers to which place? Hm? Whatever you used to do in Om Mandali, were you told that destruction is staring at you? No. Hm? Was it told in the beginning of the Yagya that the destruction is staring at you? No. And now? Now it has been told that destruction is staring at you. Hm? The ammunition for the destruction of the world is ready, isn’t it? What? Atom bomb, hydrogen bomb. So, now it is staring at you. So, what will you do? This is why then, hm, if you give more donations, perform more religious activities, if you extend more cooperation in the establishment of religion, hm, will you donate the gems of knowledge more or will you donate less when compared to the past birth? You will donate more because now everything is going to be destroyed. What? Nothing will be saved. When you have come to know that nothing will survive, neither this body will survive, neither the wealth will survive, hm, nor will the mind survive, so it is better to sacrifice these in the Gyan Yagya. So, you will definitely try that we should do as much as we can do. Hm? Whatever we can do? It is because the more we do, the more we will carry with us for 21 births. Hm? So, what will you do? Will you do whatever you can do or will you do everything? Hm? Service through the body, service through the mind, service through the wealth, the more we donate in this Godly Yagya, we will get attainments for 21 births there.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2671, दिनांक 15.10.2018
VCD 2671, Dated 15.10.2018
रात्रि क्लास 17.9.1967
Night Class dated 17.9.1967
VCD-2671-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.06
Time- 00.01-22.06


रात्रि क्लास चल रहा था - 17.9.1967. चौथे पेज की अंतिम तीसरी लाइन में बात चल रही थी - बाबा कहते हैं ये साधु, संत, महात्माएं खुद ही अंधे हैं। तो दूसरों को कैसे समझाय सकते हैं? दूसरों की अंधे की लाठी कैसे बनेंगे? परन्तु इन बातों को दूसरा तो कोई समझ ही नहीं सकता तुम बच्चों के सिवाय। तुमको समझाया गया है कि अंधे कैसे हैं? सूर्य है तो सबको सोझरा देखने में आता है। वो तो जड़ सूर्य है। यहाँ तो है ज्ञान सूर्य की बात। और वो ज्ञान सूर्य स्थूल सूर्य की तरह इस दुनियावालों से किसी से अटैच होके नहीं रहता है। वो तो सदा डिटैच है। तो तुमको तो समझाया गया है कि तुम बच्चों को ये ज्ञान सूर्य की दिव्य दृष्टि मिली हुई है। हँ? बुद्धि का तीसरा नेत्र, ज्ञान का नेत्र मिला हुआ है ना। तो तुम अभी त्रिनेत्री हो। अभी। क्योंकि और युगों में तो ज्ञान सूर्य इस सृष्टि पर आता ही नहीं है। ये तो कलियुग के अंत में ही आता है। सतयुग की नई दुनिया बनाने के लिए और सतधाम बनाने के लिए।

तुम बच्चे सतधाम को इस सृष्टि पर उतारेंगे ना। हँ? अरे, वो जड़ सूर्य भी निकलता है तो चारों ओर लाल-लाल प्रकाश होता है ना। पहले तो तुम बच्चे परमधाम को इस सृष्टि पर उतारेंगे। घर बनावेंगे, तब तो आत्मा घर में रहेगी। तुमको अभी ज्ञान नेत्र मिला है। दूसरे सभी बाहर की आँखों से देखते हैं। हँ? तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। सब साधु, संत, महात्माएं बाहर की आँखों से देखते हैं। हँ? तुमको अंतःचक्षु मिला हुआ है। ज्ञान का तीसरा नेत्र। क्योंकि इस दुनिया में तो कोई ज्ञानी आत्मा है ही नहीं। सब जनम-मरण के चक्र में आते हैं। चाहे देव आत्माएं हों, ऋषि-मुनि आत्माएं हों, मनुष्यात्माएं हों, राक्षसी आत्माएं हों, या कोई भी प्राणियों की, जीव-जंतु की आत्माएं हों, सब बाहर की आँखों से देखते हैं। तुमको ये तीसरा नेत्र मिला है ज्ञान सूर्य बाप से। वो तो कलियुग अंत में ही आता है सतयुग का आदि बनाने के लिए। वो तीसरा नेत्र तुमको परमपिता परमात्मा ने ही दिया ना। 17.9.1967 की वाणी का पांचवां पेज। रात्रि क्लास। और तो दुनिया में कोई भी किसी को ज्ञान का नेत्र दे ही नहीं सकता। क्योंकि सृष्टि के आदि, मध्य, अंत का ज्ञान कोई के पास नहीं है। ऋषि-मुनि भी कहते आए नेति-नेति। हम आदि, मध्य, अंत को नहीं जानते। गीता में भी तो लिखा है - अहम आदिर्हि देवानाम् महर्षीणाम् च सर्वशः। (गीता 10/2) सृष्टि में सतयुग के आदि में तो 16 कला संपूर्ण देवताएं ही थे ना। हँ? और फिर ज्ञानी इन ऋषि मुनियों को माना जाता है, महर्षियों को माना जाता है। वास्तव में जो महान ऋषि होते हैं महर्षि, वो तो तुम बनते हो संगमयुग में, हँ, क्योंकि तुम जो मनन-चिंतन-मंथन करते हो, आत्मा के बारे में, परमपिता परमात्मा के बारे में, सृष्टि के आदि, मध्य, अंत के बारे में, हँ, वो ज्ञान का नेत्र तुमको किसने दिया? बाप ने दिया ना। तो समझाय दिया जाता है।

जो भी जाते हैं जयपुर में, बनारस में जाते हैं, फलानी-फलानी जगह घूमने जाते हैं। अरे, जहाँ भी घूमने जाते हो यहाँ से, बाबा के पास से ये त्रिमूर्ति का बैज तो ले जाओ। तुम्हारे पास नहीं हो तो बाबा से ले जाओ ना। इस बैज से समझाय सकते हो। और तुम सभी कुछ समझाय सकते हो। हँ? और ये बुड्ढियाँ-2 ये भी सब समझाय सकती हैं दो अक्षर। इतना तो समझा ही सकती हैं ऊँचे ते ऊँचा भगवंत। इस दुनिया में ही ऊँचे ते ऊँचा और नीच ते नीच कहा जाता है ना। हँ? कोई आत्मलोक की बात थोड़ेही है। वहाँ सब आत्माएं-2 बिन्दु-बिन्दु, ऊँचा-नीचा का सवाल ही नहीं। कोई मर्तबा नहीं। इस दुनिया में बाप भी आते हैं तो मनुष्य तन में प्रवेश करेंगे और जिसमें प्रवेश करते हैं उस नर को नारायण जैसा ऊँच बनाते हैं। तो कोई नारायण भी तो एक नहीं हुआ ना। अनेकों का गायन थोड़ेही होता है। जिसका टाइटल सबको मिलता है वो आदि का नारायण होगा। उसी को कहेंगे ना ऊँचे ते ऊँचा भगवंत। तो इस त्रिमूर्ति के चित्र पर ये तुम समझाय सकते हो कि इसमें ऊँचे ते ऊँचा भगवंत कौन है? ब्रह्मा है, विष्णु है, शंकर है या तीनों मूर्तियों से परे की स्टेज जो बनाता है, बाप समान अमूर्त बन जाता है, हँ, मूर्ति की अर्थात् देह की कोई स्मृति नहीं रहती। तो बाप समान निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बन गया ना। तो ऊँच ते ऊँच हुआ ना।

नारायण तो बाद में। फिर नारायण को भी तो बनाने वाला चाहिए ना। नारायण स्वयं तो नहीं नारायण बन जाता है। जो नाम रख दिया नारायण। नार माने ज्ञान जल, अयन माने घर। जिसका ज्ञान जल में ही घर है। ज्ञान की रोशनी के वायब्रेशन में ही रहता है। पहले तो नहीं रहता था। हँ? तो ऐसा वायब्रेशन, हँ, बनाने के लिए, उसमें ये ज्ञान कहाँ से आया? कोई ने तो दिया होगा ना। तो बैज पर समझाएंगे तो समझ में आवेगा। हँ? तो ये है ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त इस संसार में जिसमें वो जनम-मरण से न्यारी निराकार ज्योति प्रवेश करती है। तभी तो यादगार में कहते हैं ना ज्योतिर्लिंगम। ज्योति अकेली नहीं। लिंगम भी कहते हैं। हँ? तो ऊँचे ते ऊँचा भगवान है। वो ऊँचे ते ऊँचा भगवान एक ही है जो तुम्हारा बाप है। सारी सृष्टि का बाप है। इसमें निराकार आत्मा भी है, इस मनुष्य सृष्टि का। तो मनुष्य साकार होते हैं। उनका साकार बाप भी है। साकारी देह और निराकारी आत्मा का कम्बिनेशन है ना। तो ये रचयिता है। हँ? रचयिता एक ही होता है ना। रचयिता बाप को कहा जाता है ना। क्रियेटर है। हँ? कोई भी बच्चे का, एक्स, वाई, जेड़ कोई भी हो। उससे पूछो तुम्हारा बाप कौन है, कितने हैं? तो क्या कहेगा? क्या कहेगा? मेरा बाप अनेक हैं कि एक है? एक ही बतावेगा।

तो एक है सारी मनुष्य सृष्टि का बाप। हम कहेंगे हमारा बाप है। हँ? क्यों? और कोई प्राणी मात्र में से निकले वो कहे हमारा बाप है तो नहीं चलेगा? हँ? क्यों? तुम कहेंगे और प्राणियों में तो मन-बुद्धि होती ही नहीं है उतनी। ये तो हम मनुष्यों की बात है। तो हमारा बाप है। हँ? मन-बुद्धि के बगैर उस बाप को कोई पहचान थोड़ेही सकते हैं। हँ? जिसको कहते हैं तुमेव माता च पिता त्वमेव। तुम हमारी माता भी हो, पिता भी हो। तो एक ही कैसे हो सकता है? माता-पिता अलग-अलग होते हैं कि एक होता है? हँ? एक होता है क्या? हँ? अरे, एक से सृष्टि बनेगी क्या? नहीं। दो चाहिए। तो ये बाप ऐसा है जिसे गीता में भी कहा है अव्यक्तमूर्तिना। (गीता 9/4) मूर्ति तो है लेकिन अमूर्त भी है। हँ? मूर्ति माने साकार और अमूर्त माने? हँ? जो देखने में न आए। अव्यक्त। और व्यक्त। व्यक्त माना व्यक्ति। अव्यक्त माने जो व्यक्ति देखने में ना आए। आत्मा अव्यक्त होती है। शरीर व्यक्त होता है। देखने में आता है। तो जो बाप व्यक्ति भी है और अव्यक्त भी है। क्या? व्यक्त माने? उसका शरीर है। ऐसे नहीं (कि) नहीं है। बड़ा रूप है। आत्मा छोटी होती है। शरीर तो बड़ा होता है ना। लेकिन फिर भी अमूर्त है। मूर्त का मतलब, मूर्ति में जो लिंग रूप दिखाया जाता है, उसमें इन्द्रियाँ नाक, आँख, कान, हाथ, पांव हैं ही नहीं। तो इन्द्रियों की स्मृति ही नहीं है। इसलिए अमूर्त कहा जाता है।

तो वो बाप कहते हैं जिनके लिए भक्तिमार्ग में मन्दिर में जाके कहते हैं तुम हमारे माता भी हो, तुम हमारे पिता भी हो। एक को ही कहते हैं ना। तो वो बाप कहते हैं मुझे याद करो। क्या? हँ? मामेकम् याद करो। मुझ एक को याद नहीं किया और दूसरों को कोई को याद किया तो क्या हो जाएगा? हँ? व्यभिचारी याद हो जाएगी। तुम्हारा ज्ञान ही सारा व्यभिचारी हो जाएगा। व्यभिचारी ज्ञान तो ऐसे ही हो गया जैसे दूध के भरे हुए घड़े में एक बूंद सरप का विष डाल दो तो सारा मिक्स हो गया ना। विष ही हो गया ना। तो वो जो भी पीयेगा, वो तो अपना असर करेगा ना विष का। हँ? तो मैं तो इस संसार को विषय विकारों से छुड़ाने के लिए, निर्विष बनाने आता हूँ। कैसा निर्विष? हँ? जैसे चंदन का पेड़ होता है ना। उसमें ढ़ेर सारे सर्प लिपटे रहते हैं। और सर्पों के अंदर ढ़ेर सारा विष होता है। लेकिन उस चंदन के वृक्ष की लकड़ी लेके आओ। हँ? उस चंदन को घिसो और अपने सारे शरीर में पोत लो। विष काम करेगा? नहीं काम करेगा।

तो कवियों ने तो बात बना दी कविता में। क्या? चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग। अरे, वो तो भुजंग जानवर की बात हो गई। चंदन का वृक्ष वो जड़ वृक्ष हो गया। हँ? ये कोई चैतन आत्मा की बात थोड़ेही है। अरे, है। वो तो मिसाल दिया। असली बात क्या है? असली बात तो ये है कि इस सृष्टि पर आत्माओं का बाप जब इस सृष्टि पर आते हैं तो तुम बच्चों को प्योर आत्मा बनाते हैं। क्या? ऐसी आत्मा बनाते हैं जिसको देह की स्मृति का नाम-निशान नहीं होता, देहभान से परे। अब कोई कहे कि देह ही नहीं होगी तो सुख कैसे भोगेंगे? हँ? हमें नहीं ऐसा भगवान चाहिए। क्या? जो इन्द्रियों के भोग भोगने से ही अलग कर दे।

तो बाप कहते हैं इन्द्रियों के भोग जो होते हैं वो तो थोड़े समय के होते हं। सदाकाल के नहीं होते हैं। जीवन में सदाकाल के होते हैं क्या? नहीं। मैं जो सुख देता हूँ आत्मिक स्थिति में रहने का, वो तो अतीन्द्रिय सुख है। इन्द्रियों की दरकार ही नहीं। सदाकाल का सुख। जब तक रहेंगे। क्या? उस विष्णुलोक में, नाम ही है विष्णु, जहाँ नो विष एट आल, विषय विकार का नाम-निशान नहीं। अरे, विषय विकार का नाम निशान नहीं तो क्या इस दुनिया में नहीं रहते? हँ? अरे, इस दुनिया में तो जीव-जंतु प्राणी ढ़ेर सारे हैं ना जिनमें विषय-विकार भरे हुए हैं। प्राणी होते हैं, हँ, पक्षी होते हैं, पशु होते हैं, कीड़े-मकोड़े होते हैं, क्या वो व्यभिचारी नहीं बनते? हँ? वो तो बनते हैं। तो इसका मतलब इस दुनिया में नहीं रहेगा क्या विष्णु? अरे, रहेगा, लेकिन जिनके साथ भी रहेगा उनको भी निर्विष बना देगा। क्या? हाँ, दिखाते हैं। विष्णु को कैसा दिखाते हैं? सांपों की शैया पर आराम से लेटा हुआ दिखाते हैं ना। हँ? क्या? जड़ चंदन का वृक्ष है क्या? हँ? कोई प्राणी सांप है क्या? नहीं। कोई पशु थोडेही है। हँ? मनुष्य है। तो कहते हैं ऐसे निर्विष पतित से पावन बनने के लिए मुझे याद करो। तो तुम विष्णु लोक में रहने काबिल, यथा राजा तथा प्रजा, हँ, विष्णु के परिवार के भांती बन जावेंगे, पतित से पावन बन जावेंगे।

A night class dated 17.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last but three line on the fourth page was – Baba says – These sages, saints, mahatmas are themselves blind. So, how can they explain to others? How will they become the walking stick of the blind for others? But no other person except you children can understand these topics. You have been explained as to how they are blind? When there is the Sun everyone observes light. That is a non-living Sun. Here it is about the Sun of Knowledge. And like the physical Sun, that Sun of Knowledge does not remain attached to any of the people of this world. He is always detached. So, you have been explained that you children have received this divine vision of this Sun of Knowledge. Hm? You have received the third eye of intellect, the third eye of knowledge, haven’t you? So, now you are three-eyed (trinetri). Now. It is because the Sun of Knowledge doesn’t come to this world in other Ages at all. He comes only in the end of the Iron Age in order to establish the new world of Golden Age and the abode of truth (Satdhaam).

You children will bring the abode of truth down to this world, will you not? Hm? Arey, even when that non-living Sun emerges, then there is red light everywhere, isn’t it? First you children will bring the Supreme Abode down to this world. The soul will live in the house only when you build a house. You have now received the eye of knowledge. All others see through the external eyes. Hm? You have received the third eye of knowledge. All the sages, saints, mahatmas see through the external eyes. Hm? You have received the inner eyes, the third eye of knowledge because there is no knowledgeable soul in this world at all. Everyone passes through the cycle of birth and death. Be it the deity souls, be it the souls of sages and saints, be it the human souls, be it the demoniac souls, or be it the souls of any living being, any organism or animal, everyone sees through the external eyes. You have received this third eye from the Sun of Knowledge Father. He comes only at the end of the Iron Age to commence the Golden Age. The Supreme Father Supreme Soul Himself gave you that third eye, didn’t He? Fifth page of the Vani dated 17.9.1967. Night class. Nobody else can give the eye of knowledge to anyone else in the world at all. It is because nobody possesses the knowledge of the beginning, middle and the end of the world. The sages and saints also have been telling – Neti-neti (neither this nor that). We do not know the beginning, middle and the end. It has also been written in the Gita – Aham aadirhi devaanaam maharshiinaam ch sarvashah. (Gita 10/2) In the world, in the beginning of the Golden Age there were deities perfect in 16 celestial degrees only. Hm? And then these sages and saints, great saints are considered to be knowledgeable ones. Actually it is you who become the great sages, the Maharishis in the Confluence Age because you think and churn about the soul, about the Supreme Father Supreme Soul, about the beginning, middle and the end of the world; who gave you that eye of knowledge? The Father gave, didn’t He? So, you are explained.

Whoever goes to Jaipur, to Benares, or to any other place to visit; arey, wherever you go to visit from here, from Baba’s place, you carry this badge of Trimurti. If you don’t have you can take it from Baba, will you not? You can explain on this badge. And you can explain everything. Hm? And these aged ladies can also explain everything in two words. They can at least explain that God is the highest on high. The terms ‘highest on high’ and ‘lowest on low’ are used in this world only, aren’t they? Hm? It is not about the Soul World. There all the souls are like points; there is no question of being high and low. There is no post. Even when the Father comes to this world, He will enter in a human body only and in whomsoever He enters He makes that man high like Narayan. So, Narayan is also not one, is he? Many are not praised. The one whose title is received by everyone is the first Narayan. He will be called the highest on high God (oonchey te ooncha bhagwant). So, you can explain this on the picture of Trimurti that who is the highest on high God in this? Is it Brahma, is it Vishnu, is it Shankar or the one who achieves a stage higher than all the three personalities and becomes amoort (formless) like the Father. He does not have any awareness of the moorty, i.e. the body. So, he became incorporeal, viceless and egoless like the Father, didn’t He? So, He is highest on high, isn’t he?

Narayan is later. Then the maker of Narayan is also required, isn’t He? Narayan does not become Narayan by himself. The name has been coined as Narayan. Naar means the water of knowledge, ayan means home. The one whose home is located in the water of knowledge only. He lives in the vibrations of light of knowledge only. He did not used to live [like that] earlier. Hm? So, in order to create such vibrations, where did this knowledge emerge in him? Someone must have given. So, they will understand if you explain on the badge. Hm? So, this is the highest on high God in this world in whom that incorporeal light who is beyond the cycle of birth and death enters. Only then do people say in His memory – Jyotirlingam (lingam of light). Not the light (jyoti) alone. He is called lingam (phallus) also. Hm? So, He is the highest on high God. That highest on high God is only one who is your Father. He is the Father of the entire world. There is the incorporeal soul also in it; of this human world. So, human beings are corporeal. Their Father is also corporeal. It is a combination of the corporeal body and the incorporeal soul, isn’t it? So, this is the creator. Hm? The creator is only one, isn’t He? The Father is called the Creator. He is the Creator. Hm? Be it any child, X, Y, Z, anyone. If you ask him, who is your Father, how many [fathers do you have]? So, what will he say? What will he say? Do I have many fathers or one? He will tell only one.

So, one is the Father of the entire human world. We will say he is our Father. Hm? Why? If someone emerges from among the living beings to say that he is our Father, then will it not do? Hm? Why? You will say that there is not much mind and intellect in other living beings. This is about us human beings. He is our Father. Hm? Can anyone recognize Him without the mind and intellect? Hm? The one who is called ‘tumev mata ch pita twamev’. You are our mother as well as Father. So, how can he be one? Are mother and Father different or one? Hm? Are they one? Hm? Arey, will the creation begin with one? No. Two are required. So, this Father is such that he has been called Avyaktmoortina (Gita 9/4) in the Gita also. He is indeed a personality (moorty), but he is amoort (without a personality) as well. Hm? Moorty means corporeal and what does amoort mean? Hm? The one who is not visible. Avyakt (unmanifest). Vyakt means vyakti (person). Avyakt means the person who cannot be seen. The soul is Avyakt. The body is vyakt. It is visible. So, the Father who is a person (vyakti) as well as unmanifest (Avyakt). What? What is meant by vyakt? He has a body. It is not as if he does not have. It is a big form. The soul is small. The body is big, isn’t it? But, still he is amoort (without a personality). Moort means, the ling form which is shown in the moorty does not have the organs – nose, eyes, ears, hands, legs at all. So, there is no awareness of the organs at all. This is why he is called amoort.

So, that Father says, for whom you go to the temple on the path of Bhakti that you are our mother as well as Father. You say that to only one, don’t you? So, that Father says – Remember Me. What? Hm? Remember Me alone. If you did not remember Me, the One and if you remember others, then what will happen? Hm? The remembrance will become adulterous. Your entire knowledge itself will become adulterous. Adulterous knowledge is like putting a drop of snake’s venom in a pot full of milk; then the entire thing gets mixed, doesn’t it? It became poison only, didn’t it? So, whoever drinks that, it will have an effect of poison, will it not? Hm? So, I come to liberate this world from the vices, to make them nirvish (free from poison). How nirvish? Hm? For example, there is a sandalwood tree, isn’t it? Numerous snakes remain entangled to it. And there is a lot of poison in the snakes. But you bring the wood of that sandalwood tree. Hm? You rub that sandalwood and rub that paste on your entire body. Will the poison work? It will not work.

So, the poets made a topic in the poem. What? Chandan vish vyaapat nahi liptey rahat bhujang (Poison doesn’t enter the sandalwood even if snakes remain entwined around it). Arey, that is about the animal snake (bhujang). The sandalwood tree is a non-living tree. Hm? It is not about the living soul. Arey, it is. That was an example given. What is the true thing? The true thing is that when the Father of souls comes to this world, then He makes you children pure. What? He makes you such a soul who does not have any trace of the memory of the body, remains beyond body consciousness. Well, someone may say that if there is no body at all, then how will we enjoy the pleasures? Hm? We don’t want such God. What? The one who separates us from enjoying the pleasures of the organs.

So, the Father says – The pleasures of the organs are temporary. They are not permanent. Are they permanent in the life? No. The happiness of being in soul conscious stage that I give is a super sensuous joy. There is no need for the organs at all. Permanent happiness. As long as you live. What? In that abode of Vishnu; the name itself is Vishnu, where no vish (poison) at all; there is no trace of vices. Arey, if there is no trace of vices, then don’t they live in this world? Hm? Arey, there are numerous organisms and living beings in this world which are full of vices. There are living beings, hm, there are birds, there are animals, there are worms and insects; do they not become adulterous (vyabhichaari) Hm? They do become. So, does it mean that Vishnu will not remain in this world? Arey, he will remain, but with whomsoever he remains, he will make them nirvish (devoid of poison) as well. What? Yes, it is shown. How is Vishnu shown to be? He is shown to be lying comfortably on the bed of snakes, isn’t he? Hm? What? Is he a non-living sandalwood tree? Hm? Is he a living being snake? No. He is not an animal. Hm? He is a human being. So, it is said that remember Me to become nirvish, pure from sinful ones. Then you will become worthy of living in the abode of Vishnu, as is the king, so are the subjects, hm, you will become members of the family of Vishnu, you will become pure from sinful.

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