Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

DEDICATED to PBKs.
For PBKs who are affiliated to AIVV, and supporting 'Advanced Knowledge'.
Post Reply
User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2677, दिनांक 21.10.2018
VCD 2677, Dated 21.10.2018
प्रातः क्लास 18.9.1967
Morning Class dated 18.9.1967
VCD-2677-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.30
Time- 00.01-17.30

प्रातः क्लास चल रहा था - 18.9.1967. पांचवें पेज के मध्य में, मध्यांत में बात चल रही थी – कहते हैं पतित-पावनी गंगा है। तो लोटी भरके इसलिए आते हैं कि रोज उसमें से एक ड्रॉप निकालकरके पानी में मिलाएंगे और फिर स्नान करते हैं। समझते हैं जैसे हमने गंगाजल में स्नान कर लिया। और तुम लोग तो इतने तीर्थ यात्रा नहीं किये हैं। कौन तुम लोग? हँ? तुम लोग माने जो रुद्रमाला के मणके हैं वो इस आखरी जनम में आकरके तो इतना भक्ति-वक्ति नहीं करते हैं। ऐसे संपर्क में तो नहीं आते हैं। बाबा तो ऐसे संपर्क में आते हैं बहुत। हँ? अरे, विलायत में इतने-इतने घड़ा-घड़ा भरकरके ले जाते हैं। जो राजे लोग होते हैं ना वो ऐसे होते हैं। बहुत वैष्णव होते हैं। तो विलायत में भी घड़ा भरकरके साथ में ले जाते हैं। और फिर मंगाते रहते हैं। किसको मंगाते रहते हैं? गंगाजल को मंगाते रहते हैं। जल नहीं कहा, बोला गंगा को मंगाते रहते हैं। हँ? अब शूटिंग से टैली करो। हँ? अब देखो, ये जो गऊ रक्षा आंदोलन चला था तो गउओं की पिकेटिंग में गए थे। जेल में गए थे अभी। तो देखो जेल में भी गंगाजल मंगाने लगे कि हमको गंगाजल दो। तो सरकार को उनको गंगाजल भी देना पड़े क्योंकि जैसी सरकार ऐसी वो भरो। और गंगाजल से क्या करेंगे? हँ? सरकार कैसी है? वो गंगाजल से क्या करेंगे? सरकार नास्तिक है या आस्तिक है?

तो बाप बैठकरके इतना अच्छी तरह से समझाते हैं कि बच्चे गफलत मत करो। किसके पीछे? ये ज्ञान गंगाओं के जल के पीछे गफलत मत करो। ये पानी की गंगाएं हैं। तुमको माया थप्पड़ लगाती रहती है। हँ? वो जल की नदियों के पीछे पड़ते रहते हैं। ऐसे तो तुम विकर्म कर देते हो। हँ? या किसको दुख देते हो। तो ऐसे समझो कि माया ने हमको थप्पड़ लगाय दिया। और हमने पाप कर लिया। क्या पाप कर लिया? गंगा स्नान करने से क्या पाप हो जाता है? हँ? अरे, गंगा में नाक, आँख, कान बंद करो और डुबकी लगाओ। न आँखों से देखने की जरूरत, न कानों से किसी की बातें सुनने की जरूरत। पूरा ही डुबकी लगा दो। पता ही नहीं चलता हमने क्या पाप कर लिया। तो जब पाप कर लिया वो हमको लिखना पड़ेगा कि बाबा हमने ये, ये पाप कर लिया। ये क्या बात हुई? गंगा जल में स्नान करने की बात कर रहे हैं। लोटी भर-भरके ले जाने की बात कर रहे हैं। हँ? घड़े के घड़े भर के ले जाते हैं। फिर खुट जाता है तो फिर गंगा मंगाते हैं।

अच्छा, समझो कोई तुमको नहीं सुनाएगा कि क्या पाप किया? रजिस्टर में तो लिखेगा। तो इस बात में तुम कचहरी करो। हँ? कचहरी माने? हँ। सबके सामने कोर्ट कचहरी करो या वो आपे ही रजिस्टर में लिखें। दोनों में से कोई काम। अपनी कचहरी आपे ही करें तो अच्छा ही है क्योंकि बाप कहते हैं तुम अपने आप को ही तिलक देते हो। राजतिलक देते हो ना। हँ? अपने आपको कैसे देते हो? हँ? इसमें गंगाजल में स्नान करने से क्या कनेक्शन? अपने आपको तिलक देते हो माने; क्या? क्या पुरुषार्थ? जितना खुदका मनन-चिंतन-मंथन करेंगे तब तिलक लगेगा आटोमेटिक। बोला है ना तुलसीदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर। अब कोई तिलक देने के लिए वो थोड़ेही आते हैं? ये तो आटोमेटिक तिलक लग जाता है। तमोप्रधान से सतोप्रधान आपेही बन जाते हैं। तो इसमें तो बाप रस्ता दे। रास्ता बताते हैं ना। श्रीमत देते हैं कि ऐसे-ऐसे करो। कैसे करो? हँ? मनन-चिंतन-मंथन करो। कोई गंगाओं में स्नान करने की बात नहीं है। उसमें तो पाप बन जाएगा। बस।

तो तुम बच्चों को अभी ऐसे करना है। हँ? बोलता है कि तुम अपन को राजधानी का मालिक बनाओ। कैसे? बोलता है कि मुझे याद करो। हँ? जितना मुझे याद करेंगे क्योंकि मैं तो ज्योतिबिन्दु निराकार हूँ ना। तो बुद्धि कैसी बनेगी तुम्हारी? निराकारी सूक्ष्म बुद्धि बनेगी। और उसमें मनन-चिंतन-मंथन चलेगा। सुदर्शन चक्र घुमाओ और दैवी गुण भी धारण करो। अब जो करेगा सो पाएगा। करेगा ही नहीं तो पाएगा कैसे? क्योंकि भक्तिमार्ग में तो आशीर्वाद देते हैं गुरु लोग। यहाँ तो कोई आशीर्वाद की बात ही नहीं है। यहाँ तो पुरुषार्थ की बात है। 18.9.1967 की वाणी का छठा पेज। आशीर्वाद तो बहुत मांगी है। भक्तिमार्ग में गुरुओं से कितने जन्म आशीर्वाद मांगी? 63 जन्म आशीर्वाद ढ़ेर मांगी। और आशीर्वाद लेने के लिए मत्था टेका। हँ? बहुत ही ये पत्थरों में जाके माथा तोड़ा। अभी तो कोई इन पत्थरबुद्धियों से माथा तोड़ने की जरूरत नहीं है। कौनसे पत्थरबुद्धि? हँ? अरे? जिस मनुष्य सृष्टि के बीज में आते हैं वो ही पत्थरबुद्धि बन जाता है। तो बाकी पत्तों का क्या हाल होगा? तो मत्था तोड़ने की दरकार नहीं है।

ये तो बाप और तुम्हारे रोमांच खड़े होने चाहिए, हो जाने चाहिए कि बिल्कुल ही हमको बेहद का बाप मिला है। हँ? बिल्कुल ही माने? हँ? अंशमात्र भी कमी नहीं है हद की। बात ही नहीं। हँ? बिल्कुल ही का मतलब जो देहों का बाप है, मनुष्यों का बाप है वो तो फिर भी हद में आ जाता है अंतिम जनम में। और ये तो बिल्कुल ही आत्माओं का बाप है। बेहद में ही रहता है। हद में तो आता नहीं। अभी उनकी सर्विस में हम मददगार बनेंगे। तो पूछना होता है। ये भी लिखना पड़े कि कुछ बाबा की सर्विस की? हँ? बाबा की सर्विस माने कोई अंधे की लाठी बने? कितने अंधों की लाठी बने? अभी संगमयुग में जितना अंधों की लाठी जास्ती बनेंगे तो वो बहुत अच्छा। अच्छा ही वो अपना कल्याण समझेगा। क्योंकि बहुतों का कल्याण समझते हैं। और घड़ी-घड़ी बाबा को याद करेंगे। हाँ, बाबा को याद करो। खूब बाबा का परिचय दें। तो परिचय देते हैं तो ये भी तो बाबा की याद है ना। हँ? ये कोई निष्ठा की तो बात नहीं है, हँ, कि बैठके याद किया। नहीं। बाबा तो बताते हैं कम कार डे दिल यार डे। हँ? बाप का परिचय देते रहो और बाबा की तो याद होगी ही। बैठ जाने की तो निष्ठा में कोई बात ही नहीं है ना।

ये जो याद है या जो सर्विस है ये तो तुम उठते-बैठते, चलते-फिरते, जाते, तुम कैसे भी सर्विस कर सकेंगे। तभी तो बोला कि रेल में तुम बैठे-बैठे सर्विस कर सकते हो कि रेल में बैठे हो और कोई का गुरु-गोसांई आ गया साथ में – आओ, पूछो तो तुम किसके भगत हो? कहेगा कि भई कृष्ण के भगत हैं। अरे, तो ये तो बताओ कि ऊँचे ते ऊँचा कौन है? हँ? भई ऊँचे ते ऊँचा तो सबका बाप भगवान है। चाहे राम हों चाहे कृष्ण हों ये तो देवी-देवताएं हैं ना। राम कृष्ण 16 कला संपूर्ण, 14 कला संपूर्ण, कलाओं में बंधे हुए हैं। तो देवताएं हैं या भगवान हैं कलातीत? अरे, तो उन बाप को याद करो ना। किन बाप को? हँ? जो देवताओं को भी नर से नारायण जैसा बनाने वाला है ना। तो तुमको भी वर्सा उसी बाप से मिलेगा। हँ? क्या वर्सा? नारायण को स्वरग का वर्सा मिलता है, राम को स्वरग का वर्सा मिलता है। देवी-देवताएं स्वर्ग में होते हैं ना। तो तुमको भी मिलेगा।

A morning class dated 18.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle, in the end of the middle portion of the fifth page was – It is said that the Ganges is the purifier of the sinful ones. So, people bring a tumbler full of its water so that they could take a drop from it every day and mix a drop of it in water and then bathe with it. They think as if they have bathed in the water of the Ganges. And you people have not performed so many pilgrimages. Who ‘you people’? Hm? You people means that those who are beads of the Rudramala do not do so much Bhakti after reaching this last birth. They do not come in such contact. Baba comes in contact with many such persons. Hm? Arey, they carry so many pots full [of Ganges water] even to the foreign countries. The kings are like this, aren’t they? They are very Vaishnav. So, they carry pots full with them to foreign countries as well. And they also keep on ordering for that. What do they order? They keep on ordering for the water of Ganges. He did not say water; they keep on ordering for the Ganges. Hm? Now tally with the shooting. Hm? Now look, there was this movement for the protection of cows; so, people had gone on picketing for cows. They had gone to the jail now. So, look, they started ordering for the water of Ganges in the jail also that provide us the water of the Ganges. So, the government has to provide them the water of the Ganges also because as is the government so shall they fill. And what else will they do with the water of the Ganges? Hm? How is the government? What will they do with the water of the Ganges? Is the government atheist or theist?

So, the Father sits and explains so nicely that children, do not commit mistakes. For whom? Do not commit mistakes for the water of these Gangeses of knowledge. These are Gangeses of water. Maya keeps on slapping you. Hm? They keep on following those rivers of water. You commit sins in this way. Hm? Or you give sorrows to someone. So, think that Maya has slapped us. And we committed sins. What sin did we commit? Which sin do we commit by bathing in the Ganges? Hm? Arey, close your nose, eyes and ears and take a dip in the Ganges. Neither is there any need to see through the eyes, nor is there any need to listen to the words of someone through the ears. Take a complete dip. You do not know at all as to what sin we committed. So, when you committed the sin, then you will have to write that Baba I have committed such and such sin. What is this? The topic of bathing in the water of the Ganges is being discussed. The topic of taking tumblers full of water is being discussed. Hm? People take pots full [of the water of Ganges]. When it exhausts then they again order for the water of the Ganges.

Achcha, suppose someone does not narrate to you as to what sin you committed. He will write in the register. So, you organize a court (kachahari) in this topic. Hm? What is meant by kachahari? Organize a court in front of everyone or they should write themselves in the register. They can do either of these. It is better to organize one’s own court because the Father says that you apply tilak (vermillion mark) to yourself. You apply rajtilak, don’t you? Hm? How do you apply [tilak] to yourself? Hm? What is its connection with bathing in the water of the Ganges? To give tilak to oneself means; what? What purusharth? The more you think and churn yourself, the tilak will be applied automatic. It has been said, hasn’t it been that ‘Tulsidas chandan ghisein tilak det raghubir’ (Tulsidas rubs the sandalwood and Raghubir applies the tilak). Does He come to apply the tilak? This tilak is applied automatically. You become satopradhan from tamopradhan automatically. So, the Father should show the path in this. He shows the path, doesn’t He? He gives Shrimat that do like this, do like this. How should you do? Hm? Think and churn. It is not about bathing in the Gangeses. You will accrue sin in that. That is it.

So, you children should do like this now. Hm? He says that you make yourself master of the kingdom. How? He says – Remember Me. Hm? The more you remember Me, because I am a point of light, incorporeal, am I not? So, how will your intellect become? It will become incorporeal, subtle intellect. And it will think and churn. Rotate the sudarshan chakra (discus of self awareness) and also imbibe divine virtues. Well, the one who does will achieve. If he does not do at all, how will he achieve? It is because Gurus give blessings on the path of Bhakti. Here, there is no question of blessings. Here it is about making purusharth. Sixth page of the Vani dated 18.9.1967. You have sought blessings a lot. For how many births did you seek blessings from the Gurus on the path of Bhakti? You sought a lot of blessings for 63 births. And you bowed your forehead to obtain blessings. Hm? You broke your forehead a lot on these stones [idols].Now there is no need to break your forehead with these persons with stone-like intellects. Which stone-like intellects? Hm? Arey? The seed of the human world in which He comes, he himself develops a stone-like intellect. So, what will be the condition of the remaining leaves? So, there is no need to break your forehead.

This is the Father and you should horripilate that we have completely found the unlimited Father. Hm? What is meant by completely? Hm? There is no trace of limited shortcoming. There is no question at all. Hm? Completely means that the Father of the bodies, the Father of the human beings comes in a limit in the last birth. And this is completely the Father of souls. He lives in limitlessness (behad) only. He does not come in limit at all. Now we will become helpful in His service. So, you have to ask. You should also write whether you have performed Baba’s service to any extent? Hm? Baba’s service means that did you become a blind man’s walking stick? To how many blind people did you become a walking stick? The more you become walking stick of the blind now in the Confluence Age, the better it is. He will understand his benefit the more. It is because he understands the benefit of many. And they will remember Baba every moment. Yes, remember Baba. You should give Baba’s introduction a lot. So, if you give the introduction, then this is also Baba’s remembrance, isn’t it? Hm? This is not about nishtha, hm, that you sit and remember. No. Baba tells that your hands should be busy in work and the heart should be with the friend (kam kaar de, dil yaar de). Hm? Keep on giving the Father’s introduction and then there will definitely be Baba’s remembrance. There is no topic at all of sitting in nishtha, isn’t it?

As regards this remembrance or this service, you can do service while standing and sitting, while moving around. Only then did He say that you can do service even in the rail (train); you are sitting in a rail (train) and if anyone’s guru-gosain comes with you – Come; ask him – Whose devotee are you? He will say – Brother, I am a devotee of Krishna. Arey, so you tell us who is the highest on high? Hm? The highest on high is everyone’s Father, God. Be it Ram, be it Krishna, these are deities, aren’t they? Ram, Krishna are perfect in 16 celestial degrees, 14 celestial degrees, bound in celestial degrees. So, are they deities or God, who is beyond celestial degrees? Arey, so, remember that Father, will you not? Which Father? Hm? The one who makes even the deities as Narayan from nar (man), isn’t He? So, you will also get inheritance from that Father only. Hm? What inheritance? Narayan gets inheritance of heaven; Ram gets the inheritance of heaven. Deities exist in heaven, don’t they? So, you will also get.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 18 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2678, दिनांक 22.10.2018
VCD 2678, Dated 22.10.2018
रात्रि क्लास 18.9.1967
Night Class dated 18.9.1967
VCD-2678-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.15
Time- 00.01-16.15


प्रातः क्लास चल रहा था - 18.9.1967. आठवें पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – ये ब्रह्मा बाबा ये नहीं कहते हैं कि मैं पार नहीं जा सकता हूँ कभी भी। कहते नहीं हैं। क्या? ब्रह्मा बाबा कहते नहीं हैं कि मैं पार नहीं जा सकता हूँ कभी भी। कर्मातीत अवस्था में यानि कोई भी विकर्म मेरे से न हो। ऐसे मैं पार नहीं जा सकता हूँ। ऐसे कहते नहीं हैं। ये हो नहीं सकते हैं। हँ? क्या नहीं हो सकते? हँ? ये किसने कहा ये हो नहीं सकते हैं? ऊपरवाले ने कहा? शिव बाप ने कहा ये हो नहीं सकते हैं? अच्छा? ये कर्मातीत अवस्था में नहीं जा सकते कभी? ब्रह्मा बाबा? माना इनकी आत्मा में ये संस्कार नूंधा हुआ है? कर्मेन्द्रियों से कुछ न कुछ कर्म करते ही रहेंगे। क्या? इस 5000 वर्ष के सृष्टि चक्र में ऐसे नहीं हो सकता कि इन्द्रियों से कर्म करना छोड़ दें। और कर्म करना नहीं छोड़ेंगे तो कर्मातीत अवस्था में जाएंगे? हँ? जा ही नहीं सकते।

तो ये किसने कहा कि मैं पार नहीं जा सकता हूँ कभी भी? बाबा नहीं कहते हैं। माना ब्रह्मा बाबा ये नहीं कहते। क्या? कि मैं कभी भी पार नहीं जा सकता हूँ। फिर ये किसने कहा कर्मातीत अवस्था में यानि कोई भी विकर्म मेरे से न हो ये हो नहीं सकते हैं। ये किसने कहा? दोनों बातें क्रॉस हो गई कि बराबर हैं? क्रॉस हो गई। तो ये किसने कहा ये हो नहीं सकता है? हँ? ये माने कौन? ये कर्मातीत अवस्था में चला जाए ये हो नहीं सकता है। हँ? किसने कहा? हँ? शिव बाप ने कहा कि अगर ये कर्मातीत अवस्था में चला जाएगा तो इसको अपना शरीर नहीं छोड़ना चाहिए। जो स्थूल शरीर है जिससे पुरुषार्थ किया जाता है ना। सूक्ष्म शरीर से तो पुरुषार्थ होता नहीं। न पाप बनता है न पुण्य बनता है।

तो ये नहीं हो सकता। क्या? कि ये कर्मातीत अवस्था में चला जाए और हँ, और रुद्रमाला का मणका बन जाए। क्या बन जाए? रुद्र माला का मणका बन जाए। क्या मतलब? जो रुद्रमाला के मणके शरीर रहते-रहते आत्मिक स्टेज में स्थिर हो जाते हैं, देह के कर्मों की व्यवस्था से परे चले जाते हैं। माना रिजल्ट क्या निकला? कि ब्रह्मा जैसी आत्माएं और ब्रह्मा को पक्का-पक्का फालो करने वाली या कच्चा फालो करने वाली आत्माएं इस पुरुषार्थी जीवन में क्या? कर्मातीत अवस्था को नहीं जा सकेंगी, जीतेजी नहीं जा सकेंगी। जा सकेंगी? नहीं जा सकेंगी। तो ये विकर्म। हँ? ये जो विकर्म, विपरीत कर्म होते हैं कर्मातीत अवस्था आएगी तब शरीर छोड़ना पड़ेगा। हँ? कल बताया कि शरीर तो छोड़ ही दिया उन्होंने 18 जनवरी उनहत्तर को। तो क्या कर्मातीत अवस्था आ गई? नहीं आ गई। स्थूल शरीर छोड़ दिया तो और ही सूक्ष्म स्टेज पकड़ ली। सूक्ष्म शरीर में स्थिर हो गए। तो ये कोई कर्मातीत अवस्था थोड़ेही हुई। हँ?

तभी कुछ न कुछ विकर्म जरूर रहा हुआ है। क्या? जो-जो आत्माएं अकाले मौत में शरीर छोड़ती हैं और सूक्ष्म शरीर धारण करती हैं उनका जरूर कुछ न कुछ विपरीत कर्म रह जाता है। ज़रूर रह जाता है। तो तुम भी ऐसे ही। क्या? क्या बोला? तुम भी। ‘भी’ किसके लिए लगाया? हँ? किसका मिसाल दिया? किसके लिए ‘भी’ लगाया? हँ? ब्रह्मा। तुम भी ऐसे ही खाओ भी। क्या? ऐसे नहीं इन्द्रियों का भोग भोगना छोड़ दो। खाओ भी। शिवबाबा को याद करना है। ऐसे समझो मैं शिवबाबा के भंडारे से खाती हूँ। हँ? क्या? कोई मनुष्य का कमाया हुआ नहीं खाती हूँ। चलो अब ये समझना तो बिल्कुल ईजी है। क्या? कहाँ से खाती हूँ? मैं शिवबाबा के भंडारे से खाती हूँ। तो बिल्कुल ईज़ी बात है और मूँझो मत क्योंकि कोई-कोई आत्माएं हैं जो बिन्दी-बिन्दी कहकरके बहुत मुंझती हैं एकदम। क्या? हँ? बिन्दी का भंडारा होता है क्या? भंडारा किसका होता है? हँ? भंडारा किसका होता है? भंडारा शिवबाबा का होता है। शिव बाप का भंडारे से खाती हूँ। वो तो अलौकिक बात हो गई। शिवबाबा का भंडारा तो ज्ञान रत्नों का भंडारा है। ज्ञान रत्नों को खाने से देह की भूख, शरीर की भूख मिट जाएगी कर्मेन्द्रियों की या ज्ञानेन्द्रियों की?

तो बिन्दी-बिन्दी मत करो। बिन्दी-बिन्दी कहकरके क्यों मुंझते हो? अरे बिन्दी कहने की दरकार ही नहीं है। हँ? क्या? फिर क्या दरकार है? दरकार है हम आत्मा ज्योतिबिन्दु। क्या हैं? हम आत्मा हैं। और वो परमात्मा है। क्या कहा? वो परमात्मा। कौन वो? वो। हँ? कौन परमात्मा है? हँ? वो, वो कहके दूर करके किसकी तरफ इशारा किया? हाँ, जो संसार में, हँ, प्रत्यक्ष होने वाला है, प्रत्यक्षता रूपी जन्म लेने वाला है। वो शिव बाबा, शिव बाप नहीं, परमपिता शिव नहीं, जिसका कोई बाप नहीं। वो परमात्मा है। आत्माओं के बीच में परम पार्टधारी है। हीरो पार्टधारी। क्या? उससे ऊँचा तो कोई और पार्ट होता ही नहीं। तो फिर क्या करो? ऊँचे को याद करोगे तो क्या बनोगे? हँ? ऊँचे ही बनोगे ना। यानि वो तो पवित्र आत्मा है। हँ? परमात्मा। तब ही तो परमपिता के साथ परमात्मा लगाया जाता है। जैसे शिव के साथ शंकर लगाया जाता है। क्यों लगाया जाता है? हँ? बच्चा जो है असली खून का बच्चा है, हँ, नकली खून अम्मा ने धारण नहीं किया है तो बच्चा बाप समान बनेगा या नहीं बनेगा? बनेगा। तो वो परमात्मा है यानि वो तो पवित्र आत्मा है। बस।

बात ही थोड़ी सी है। कोई दूसरी चीज़ थोड़ेही है। क्या? कि तुम समझो कोई दूसरी चीज़ है। दूसरी चीज़ माने? हँ? दूसरी चीज़ माने कोई ऐसी बात नहीं है कि वो आत्मा इस दुनिया का ज्यादा से ज्यादा सुख भोगने वाली नहीं है। तुमको क्या चाहिए? हँ? अरे, तुमको, तुम्हारी आत्मा क्या चाहती है? जन्म-जन्मान्तर क्या? अरे, बताओ ना। हँ? सुख चाहती है। हँ? सुख चाहती है न कोई। हर आत्मा क्या चाहती है? सुख चाहती है। तो वो कोई दूसरी चीज़ नहीं है। इस दुनिया में सुख में शांति तो है ही फिर। ऐसा सुख सतयुग का, झूठ युग का नहीं। कैसा? सत्य युग का सुख। जिसमें शांति तो ज़रूर होती है। अशांति होने का तो सवाल ही नहीं। तो कोई दूसरी चीज़ थोड़ेही है। क्या? हँ? किसको याद करो? कि ये बाबा है। क्या? बस। बाकि वो हम जोर करके बिन्दी को याद करें, हँ, बार-बार पागल होके, हँ, फिर भूल गए। हँ। फिर भूल गए। थकान हो गई। हँ? जोर लगाते हैं ना बिन्दी को याद करने के लिए। बाप कहते हैं ये तो सहज राजयोग है। क्या? खास तुम बच्चों के लिए। क्या? दुनिया वालों के लिए सहज राजयोग नहीं है। दुनिया वालों के लिए है? नहीं। वो सहज राजयोग के गहराई को समझेंगे? नहीं समझेंगे।

तो बहुत मेहनत करने की दरकार नहीं है मन-बुद्धि से। हँ? कि बिन्दी को ही याद करेंगे। और बड़ा बिन्दी को नहीं याद करेंगे? जैसे माताएं कोई एक इंच चौड़ी बिन्दी लगाले, आधा इंच चौड़ी। अरे, बिन्दी का तो लंबाई-चौड़ाई नहीं। कितना भी छोटा बनाय जा सकता है। इतना छोटा हो सकता है कि इन आँखों से दिखाई भी न पड़े। चलो, डॉक्टर लोग जो हैं, वैज्ञानिक लोग जो हैं, हँ, अणु को तोड़ते हैं। गीता में बोला ना अणोणीयांसम। अणु रूप है आत्मा। तो वो तोड़ते हैं एटम को। इन आँखों से तो नहीं दिखाई पड़ता है लेकिन यंत्रों से? यंत्रों से उनको दिखाई पड़ जाता है। लेकिन ये आत्मा तो यंत्रों से भी नहीं दिखाई पड़ती है। अति सूक्ष्म है। तो ये चक्कर छोड़ दो कि बिन्दी को याद करें। क्या कहा? हँ? अरे, ये थोडेही कुछ करना है बैठ करके। क्या? कि हम ओरिजिनल बिन्दी को याद करेंगे। कैसी बिन्दी को? जो दुनिया में पार्ट बजाने वाली आत्माओं के बीच में सबसे जास्ती सूक्ष्म है। हँ? लफड़े में पड़ जाएंगे कि नहीं? पड़ेंगे कि नहीं? हँ? कर पाएंगे? तो ऐसा कुछ बैठकरके नहीं करना है।

A morning class dated 18.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the eighth page was – This Brahma Baba doesn’t say that I cannot go across ever. He does not say. What? Brahma Baba does not say that I can never go across to the karmaateet stage, i.e. I shouldn’t commit any sin. I cannot go across like this. He doesn’t say like this. This cannot be possible. Hm? What cannot be possible? Hm? Who said that this cannot be possible? Did the above one say? Did Father Shiv say that this cannot be possible? Achcha? Can’t this one achieve the karmaateet stage ever? Brahma Baba? Does it mean that this sanskaar is recorded in the soul of this one? We will keep on performing some or the other action through the organs of action. What? In this world cycle of 5000 years it cannot be possible that we stop performing actions through the organs. And if we do not stop performing actions, will we achieve the karmaateet stage? Hm? One cannot achieve at all.

So, who said that I can never go across? Baba doesn’t say. It means that Brahma Baba does not say this. What? That I can never go across. Then who said that it cannot be possible that no sin is committed by me in the karmaateet stage. Who said this? Do both the topics cross each other or are they the same? They are cross (opposite). So, who said that this cannot be possible? Hm? This one refers to whom? It cannot be possible that this one reaches the karmaateet stage. Hm? Who said? Hm? Father Shiv said that if this one achieves the karmaateet stage then this one should not leave his body. The physical body through which purusharth is done, isn’t it? Purusharth is not done through the subtle body. One accrues neither paap (sins), nor punya (fruits of noble actions).

So, this cannot be possible. What? That this one achieves the karmaateet stage and hm, and becomes a bead of the Rudramala. What should he become? He should become the bead of the Rudramala. What does it mean? The beads of the Rudramala become constant in soul conscious stage while being in the body, go across the system of actions of the body. It means that what is the result? The souls like Brahma and the souls which firmly or weakly follow Brahma in this purusharthi life; what? They will not be able to achieve the karmateet stage; they will not be able to achieve that while being alive. Will they be able to? They will not be able to. So, this is a sin. Hm? These sins (vikarma), opposite actions are performed; when the karmaateet stage is achieved then one will have to leave the body. Hm? Yesterday it was told that he left his body on 18th January, 69. So, did he achieve the karmaateet stage? He did not. When he left his physical body, he achieved even more subtle stage. He became constant in subtle body. So, this is not a karmaateet stage. Hm?

That is why some or the other sins are remaining. What? All those souls which leave their bodies in untimely deaths and assume a subtle body, their opposite actions remain to some extent or the other. It definitely remains. So, you too are like this only. What? What has been said? You too. For whom was ‘too’ added? Hm? Whose example was given? For whom was ‘too’ added? Hm? Brahma. You too eat like this only. What? It is not as if you stop enjoying the pleasures of the organs. Eat, too. You have to remember ShivBaba. Think that I eat from ShivBaba’s bhandara (store house). Hm? What? I do not eat through the money earned by any human being. Okay, now it is very easy to understand this. What? From where do I eat? I eat from ShivBaba’s bhandara (store house). So, it is completely easy topic and do not be confused because there are some souls who become very confused by uttering ‘point, point’. What? Hm? Does a point have a store house? Who possesses a store house? Hm? Who possesses the bhandara? Bhandara is of ShivBaba. I eat from ShivBaba’s store house. That is an alokik topic. ShivBaba’s bhandara is a store house of gems of knowledge. Will the hunger of the body’s organs of action or the sense organs satiate by eating the gems of knowledge?

So, do not say ‘point, point’. Why do you get confused by uttering ‘point, point’? Arey, there is no need to utter ‘point’ (bindi). Hm? What? Then what is the need? The need is ‘we are points of light souls’. What are we? We are souls. And that one is the Supreme Soul. What has been said? That Supreme Soul. Who that? Hm? Who is the Supreme Soul? Hm? Towards whom was a gesture made by uttering ‘that one’, by making him distant? Yes, the one who is going to be revealed, going to get the revelation like birth in the world. That ShivBaba, not Father Shiv, not the Supreme Father Shiv, who does not have a Father. He is the Supreme Soul. He is the supreme actor among the souls. Hero actor. What? There is no part greater than that at all. So, then what should you do? What will you become if you remember the higher one? Hm? You will become high only, will you not? It means that he is a pure soul. Hm? Supreme Soul. Only then is the Supreme Soul suffixed to Supreme Father. For example, Shankar is suffixed to Shiv. Why is it suffixed? Hm? If the child is of the true blood, hm, if the mother has not received the duplicate blood, then will the child become equal to the Father or not? He will. So, he is the Supreme Soul, i.e. he is the pure soul. That is it.

The topic itself is small. There is nothing else. What? That you think that it is something else. What is meant by something else? Hm? Something else means there is no such topic that that soul is not the one who enjoys the maximum happiness in the world. What do you require? Hm? Arey, you, what does your soul want? What birth by birth? Arey, speak up, will you not? Hm? It wants happiness. Hm? It wants some happiness, doesn’t it? What does every soul want? It wants happiness. So, that is not any other thing. In this world there is peace in happiness. Such happiness of the Golden Age; not of the false Age. Of what kind? Happiness of the true Age which definitely contains peace. There is no question of disturbance at all. So, it is not something else. What? Hm? Whom should you remember? That this is Baba. What? That is it. But if we remember the point forcibly, hm, by becoming mad again and again, hm, then we forget again. Hm. We forget again. We become tired. Hm? When we apply pressure to remember the point. The Father says that this is easy RajYoga. What? Especially for you children. What? It is not easy RajYoga for the people of the world. Is it for the people of the world? No. Will they understand the depth of easy RajYoga? They will not understand.

So, there is no need to work very hard through the mind and intellect. Hm? That we will remember the point only. And will you not remember the bigger point? For example, some mothers may apply a one inch bindi, half an inch bindi [on their forehead]. Arey, a point does not have any length or breadth. It can be made however small. It can become so small that it is not visible to these eyes. Okay, the doctors, the scientists break the atom. It has been said in the Gita – Anoneeyaamsam, hasn’t it been told? The soul is like an atom. So, they break the atom. It is not visible to these eyes, but through the instruments? It becomes visible to them through the instruments. But this soul is not visible even to the instruments. It is very subtle. So, leave this confusion of remembering the point. What has been said? Hm? Arey, you don’t have to do anything while sitting. What? That we will remember the original point. What kind of a point? The one which is subtlest among the souls playing their parts in the world. Hm? Will you get into confusion or not? Will you or will you not? Hm? Will you be able to? So, you should not sit and do any such thing.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 22 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2679, दिनांक 24.10.2018
VCD 2679, dated 24.10.2018
रात्रि क्लास 18.9.1967
Night Class dated 18.9.1967
VCD-2679-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.20
Time- 00.01-20.20


आज का रात्रि क्लास है - 18.9.1967. बात क्यों बाबा मुरली में अभी बैठकरके समझाते? मुरली में सुनेंगे और ये कापी भी जाएगी सेंटरों में। तुम तो लिखते रहते हो। कॉपी भी मुरली में जाएगी। तो ऐसा ये लिखत किसके नीचे लिखनी है? जहाँ हम दिखलाते हैं गीता का भगवान कौन? लिखा था ना। किताब भी बनाते हैं। जैसे यहाँ बनाके लाया था। मैं बोला तो था किसको कि निकालना। निकालेंगे तो हम उनको डंडी-वंडी लगाएगा। फिर ये भूल हो गई। किसको बोला था कि वो चित्र बनाना। किसी ने कहा – हाँ। तो वो कल फिर याद करना। ये जो भगवानवाडा है ना बढ़ी, अब याद करना बच्चे उसमें लडी लगाने की है। किसी ने कहा – जी बाबा। तो बच्चों ने तो देखा है शायद। दिखलाया है या नहीं दिखलाया है कि नए आए हैं। हो सकता है नहीं देखा हो। किसी ने कहा – दो आए हैं नए। नहीं। आए हैं नए जो देहरादून वाले भी।

तो गीता है, उसके ऊपर कृष्ण। गीता है, उसके ऊपर है त्रिमूर्ति। और उसके नीचे जो लिखत होती है, पीछे वो लिख करके उनकी आक्यूपेशन दोनों की। कृष्ण की और उनकी। कृष्ण के बाप की। फिर नीचे उनमें ये लिखने का है। देखो, तुम पढ़ो या मैं पढ़-पढ़के सुनाऊँ? ये ऊपर में पहेली आई ना। ये पहेली हल करने से क्योंकि ये पहेली अखबार में जानी है। बहुत अच्छे प्रकार से अखबार में जानी है। और इसका बड़ा बोर्ड बनाना है जो लगाना है हरेक के सेंटर के ऊपर। क्योंकि ये मोस्ट प्रिंसिपल है खेंचना। ये पहेली हल करने से मनुष्य ईश्वरीय जन्म सिद्ध अधिकार या भारतवासी भी लिख सकते हैं। या कोई भी नाम लिख सकते हैं। ईश्वरीय जन्म-सिद्ध अधिकार कोई भी मनुष्य भी कह सकते हैं। या भारतवासी भी कह सकते हैं। लेकिन भारतवासी लिखने से फिर भी अच्छा है। भारतवासी ईश्वरीय जन्मसिद्ध अधिकार, सौ परसेन्ट पवित्रता, शांति, सुख संपत्ति संपन्न, सतयुगी डबल सिरताज सूर्यवंशी और चंद्रवंशी। इन दोनों वंशियों का स्वराज्य 21 जन्म के लिए प्राप्त कर सकते हैं। समझा?

तो ये अक्षर एकदम एक्यूरेट लिखना चाहिए। होवनहार महाभारत विनाश। महाभारत विनाश पहले। 5000 वर्ष पहले मुआफिक। अविनाशी सृष्टि चक्र के प्लैन के अनुसार। समझा? इसको अच्छी तरह से फिर तुम लोगों की ये हिन्दी तो पक्की है ही। अच्छा, ये बड़े-बड़े शीटों पर लिखकरके हरेक जिसका बड़ा सेन्टर है ना तो हरेक सेन्टर पर लगा देना चाहिए। तो ये पढ़ें सबको। या लोहे की शीट के ऊपर। जैसे ये है ना छे बाई चार का चित्र। या ये सीढ़ी से कुछ छोटा। छे बाई चार का जो बनता है कॉमन। तो वो उतना बड़ा बनाय देना चाहिए। और ये है तुम्हारी सच्ची-सच्ची एडवरटाइज़मेन्ट। इसमें आदि सनातन लिखा है? किसी ने कहा – नहीं लिखा है। तो देखो, फिर से देखो, सब भूल तो नहीं गए? किसी ने कहा – उसमें है। पहेली हल करने से ईश्वरीय जन्मसिद्ध अधिकार सौ परसेन्ट पवित्रता, सुख, शान्ति, संपत्ति संपन्न सतयुगी डबल सिरताज - ये लिखना क्यों भूल गया? किसी ने कहा – आदि सनातन। हाँ, आदि सनातन डबल सिरताज, सूर्यवंशी या डबल सिरताज आदि सनातन सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी स्वराज्य 21 जन्म के लिए प्राप्त कर सकते हो। कि वो भी लिखना चाहिए। आदि सनातन देवी-देवता डबल सिरताज। क्योंकि ये तो मालूम है ना कि राज्य था और ये फिर चित्र भी रखना चाहिए। उसके बाजू में ये चित्र। कोई भी वो लिखत का। वो किसको भी समझाने से बिल्कुल सहज हो जाएगा। एकदम सहज हो जाएगा कि ये है स्वराज्य। और ये स्वराज्य भारत में था। अभी तो विदेशियों का राज्य हो गया। तो भारत में स्वराज्य था ये इसके लिए तो कहते हैं ना विश्व में शान्ति। यहाँ एक राज्य हो, एक धर्म हो, एक भाषा हो। तो इसके लिए ही है। दूसरा तो कोई है नहीं।

तो अच्छी तरह से समझाने से वो समझेंगे अच्छी तरह से। क्योंकि तुम कोई की ग्लानि तो करते नहीं हो। कोई भी धरम की कुछ भी ग्लानि नहीं करते हो, बिल्कुल नहीं। कि कोई किसकी ग्लानि करते हैं धर्म की या किसी की। तो फिर वो अखबार में या फलाने में वो नहीं डालते हैं। अब इसमें तो ग्लानि तो कोई की है नहीं। बल्कि ऐसा बिल्कुल फर्स्टक्लास चित्र बनाय करके अगर गोर्मेंट हाउस में भी कोई रखें दिल्ली के। जब ये इतना काम करते हैं तो पहले तैयारी करनी चाहिए इस चीज़ की जो देखें पहले और खुश होवें। 18.9.1967 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। फिर उनको कहना चाहिए कि ये गोर्मेन्ट हाउस में भले ये अपना जो ये बनाते हैं म्यूजियम, हम गवर्मेन्ट को भी एप्लाई कर सकते हैं कि ये म्यूजियम गोर्मेन्ट हाउस में भी होना चाहिए। ये जो म्यूजियम है वो हम फ्री लगावेंगे। चित्र हैं। ये सब फ्री गोर्मेन्ट हाउस में हम अच्छी तरह से डेकोरेट करके एक हॉल में रख सकते हैं। जहाँ विजिटर्स आते हैं क्योंकि ये ही है प्राचीन राजयोग। जो बाहरवाले विलायतवाले, सभी तो धर्म रिलीजियस माइंडेड नहीं होते हैं ना बच्चे। परन्तु फिर भी कई-कई आते हैं जरूर। तो अभी तो वहाँ भभके से बनाते भी रहते हैं ना।

तो बच्ची इसमें अकल चाहिए, बुद्धि चाहिए, विशालबुद्धि। बुद्धि की भी बुद्धि चाहिए। और उनके सिवाय योगबल जरूर चाहिए। बच्चों में योगबल बिल्कुल कम है एकदम। अगर योगबल होवे बाप की याद की यात्रा में तत्पर हो मस्त होवें, हाँ, और कभी भी, कोई भी एक-दो में लूनपानी नहीं होवें। कभी भी कोई भी बच्चा घर में या चाहे कोई से भी लूनपानी कभी नहीं होना। यानि न कोई विकार करे काम, क्रोध, लोभ, आदि। तो उसमें तो फिर सब कुछ आ जाता है क्योंकि विकार को भी तो लूनपानी कहेंगे ना। क्रोध को भी लूनपानी। सबको लूनपानी कहेंगे। सब विकार। क्योंकि ये इस समय में कलियुग है। सारी सृष्टि आपस में। बाप माँ से, बच्चा बच्चे से, फलाने से सब लूनपानी और सतयुग में सब खीरखंड होके रहते हैं।

तो देखो, सतयुग में और कलियुग में रात-दिन का फर्क है ना बच्ची। और क्षीरसागर तो कहते हैं। तो सागर तो क्षीर हुआ। हँ? उस खीरखंड में भगवान को दिखलाते हैं विष्णु को। और ऊपर में है खीरसागर। देखो, सतयुग में खीरसागर है ना। नीचे में है विषय सागर। हँ? तो उसका ये भी तो अर्थ बाप समझाते हैं ना। क्योंकि समझाने की युक्तियाँ चाहिए बच्चों को। और ब्रेन एकदम अच्छा चाहिए। योगबल से तो ब्रेन अच्छी होगी ही। क्योंकि पावन बनते जाएंगे ना बच्ची। वो जो गाया जाता है कि ये शेर का दूध के लिए सोने का बर्तन चाहिए। गायन है ना। शुद्ध सोने का बर्तन होगा तो टिकेगा। मिट्टी, लोहे का होगा तो फोड के निकल जाएगा। तो ये जो है ना बच्ची तुम्हारा ये जो आत्मा है बर्तन जिसमें बुद्धि है। तो वो गोल्डन एज चाहिए। हँ। तभी उस बर्तन में जो इतना अविनाशी ज्ञान रतन है वो ठहर सकेगा। और योग नहीं होगा तो बर्तन सोने का तो बनेगा नहीं। फिर उसमें वो शेरनी का दूध ठहर कैसे सकता है? तो ये योगबल की बहुत कमी है। समझे? याद करने की।

तो बाप रोज समझाते रहते हैं – अरे, बच्चे, ये बिन्दी-बिन्दी क्यों करते रहते हो? अरे, ये याद तो बिल्कुल सहज है। बाप को याद करो। ये तो बुद्धि में समझ गए हो कि बरोबर हम आत्मा भी जैसे छोटी ते छोटी, छोटी-छोटी बिन्दी हैं ना। ऐसे बाप भी यहाँ भृकुटि में छोटे से छोटा। हँ? वो जो लिखा हुआ है शास्त्रों में हज़ार सूर्यों से भी तेजोमय, फलाना। नहीं, नहीं, बाप कहते हैं मेरे में, ज्ञान का सागर हूँ, शांति का सागर हूँ, प्यार का सागर हूँ। तो इस फलाने का सो आकरके वर्सा देता हूँ। सुख-शांति और प्यार का। तो वो सब चीज अच्छी-अच्छी हमारे पास है।

Today’s night class is dated 18.9.1967. Why does Baba now sit and explain in the Murli? You will listen to the Murli and this copy will also go to the centers. You keep on writing. The copy would also go in the Murli. So, below what should this write-up be written? Is it the place where we depict as to who is the God of Gita? It was written, wasn’t it? A book is also made. For example, it was made and brought here. I had asked someone to publish. If you publish, we will get it bound. Then this mistake was committed. Someone was asked to make that picture. Someone said – Yes. So, remind about that tomorrow. Children, remember that we have to put a thread in the bhagwanwada, the badhi. Someone said – Yes, Baba. So, children have perhaps seen. I don’t know whether it has been shown or not as you are newcomers. It is possible that you must not have seen. Someone said – Two newcomers have come. No. Newcomers have come from Dehradun as well.

So, there is the Gita; above that is Krishna. There is the Gita; above that is Trimurti. And the write-up below that; later you should write the occupation of both of them. Of Krishna and of that one. Krishna’s Father. Then below that you should write this. Look, will you read or should I read it out? This riddle has been mentioned above, hasn’t it been? By solving this riddle because this riddle is to be published in the newspaper. It is to be published nicely in the newspapers. And its big board should be prepared which should be displayed above every Center. It is because it is most principal (important) to draw this. By solving this riddle human beings can attain their Godly birth right. Or you can write ‘Bhaaratwaasis’ (residents of India) also. Or you can write any name. You can also say ‘the Godly birth right of any humanbeing’. Or you can say ‘Bhaaratwaasis’ (residents of India) also. But it is better to write ‘Bhaaratwaasis’. Bhaaratwaasis can achieve Godly birthright, hundred percent purity, peace, happiness, property, Golden Aged double crowned Suryavanshi and Chandravanshi, the sovereignty of both these dynasties for 21 births. Did you understand?

So, you should write these words very accurately. Forthcoming Mahabharata destruction. First the Mahabharata destruction like 5000 years ago as per the plan of the imperishable world cycle. Did you understand? This should be done nicely. Then your Hindi is anyways good. Achcha, write this on big sheets and everyone whose center is big, you should display this on every center so that everyone can read. Or you can make it on an iron sheet. For example this picture of six by four. Or a little smaller than this ladder. The one that is commonly prepared in the size of six by four. So, you should make that much big. And this is your true advertisement. Has ‘aadi sanatan’ been written in it? Someone said – It has not been written. So, look; look again; have you all forgotten? Someone said – It is mentioned in it. By solving the riddle; Godly birthright, Golden Age double crowned with hundred percent purity, prosperity, peace, property – why did you forget to write this? Someone said – Aadi sanatan. Yes, You can achieve the Aadi sanatan (first and ancient) double crowned, Suryavanshi or double crowned aadi sanatan Suryavanshi and Chandravanshi swarajya (sovereignty) for 21 births. You should write that also. Aadi sanatan deity double crowned. It is because you know that the kingdom existed and then you should keep this picture as well. Beside that this picture. Of any write up. It will be completely easy by explaining this to anyone. It will become completely easy that this is swarajya. And this swarajya was in India. Now it is the kingdom of foreigners. So, there was swarajya in India; for this it is said – Peace in the world. Here, there should be one kingdom, one religion, one language. So, it is for this only. There is nothing else.

So, if you explain nicely, they will understand well. It is because you do not defame anyone. You do not defame any religion in any way, not at all. If you defame any religion or anyone, then they do not publish it in the newspaper, etc. Well, this doesn’t contain anyone’s defamation. Rather you should prepare such completely first class picture and place it at a government house of Delhi. When they work so much, then you should first make preparations for this thing so that people observe and feel happy. Second page of the night class dated 18.9.1967. Then they should be told that in the Government House or whatever museum we build; we can apply to the government also that this museum should be available in the Government House also. We will establish this museum free of cost. There are pictures. We can keep all these free of cost in the Government House by decorating them in a hall where visitors come because this is ancient RajYoga. The outsiders, the foreigners are not so religious minded, are they children? But yet some definitely come. So, now they keep on preparing with pomp and show there, don’t they?

So, daughter, wisdom, intellect, a broad intellect is required in this. Intellect of even the intellects is required. And apart from that the power of Yoga is also required. The power of Yoga is very less in the children. If they have the power of Yoga, if they remain busy in the Father’s remembrance, yes, and at anytime, nobody should fight with each other. No child should ever become saltwater (loonpaani) with anyone either at home or with anyone. It means you should not succumb to any vice like lust, anger, greed, etc. So, then everything is included in it because lust will also be called saltwater, will it not be? Anger will also be called saltwater. All the vices. It is because it is the Iron Age at this time. The entire world with each other. Everyone becomes saltwater (fights); Father with mother, child with child, with someone. And in the Golden Age everyone remains like porridge (kheerkhand).

So, look, there is a world of difference between the Golden Age and the Iron Age, isn’t it daughter? And people say ‘ksheersaagar’ (ocean of milk). So, ocean is milk. Hm? God Vishnu is shown in that abode of milk (kheerkhand). And above is the ocean of milk. Look, there is an ocean of milk in the Golden Age, isn’t it? Below is the ocean of vices (Vishay saagar). Hm? So, the Father explains this meaning also for that, doesn’t He? It is because children should have tact to explain. And their brain should be very nice. Through the power of Yoga the brain will become nice only. It is because you will go on becoming pure, will you not daughter? It is sung that a golden utensil is required to store the milk of a lioness. It is famous, isn’t it? It can be stored if the utensil is made up of pure gold. If it is made up of clay, iron, then it will break the utensil and come out. So, daughter, your utensil like soul which contains intellect should be like the Golden Age. Hm. Only then will so many imperishable gems of knowledge remain stored in it. And if there is no Yoga, then the utensil of gold will not be prepared. Then how can the milk of the lioness be stored in it? So, there is a lot of deficiency of power of Yoga. Did you understand? In remembrance.

So, the Father keeps on explaining everyday – Arey, children, why do you keep on uttering this ‘point, point’? Arey, this remembrance is completely easy. Remember the Father. You have understood through the intellect that definitely we souls are also smallest, small, small points, aren’t we? Similarly, the Father is also a smallest one here in the bhrikuti (middle of the forehead between the eye brows). Hm? It has been written in the scriptures that He is more luminous than a thousand Suns, etc. No, no, the Father says – I am an ocean of knowledge, ocean of peace, ocean of love. So, I come and give the inheritance of this. Of happiness, peace and love. So, we have all those nice things with us.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 24 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2680, दिनांक 25.10.2018
VCD 2680, Dated 25.10.2018
रात्रि क्लास 18.9.1967
Night Class dated 18.9.1967
VCD-2680-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-25.10
Time- 00.01-25.10


रात्रि क्लास चल रहा था - 18.9.1967. तीसरे पेज पे बात चल रही थी – कि गोर्मेन्ट से मांगते रहते हैं। कोई चीज़ न मिली तो भूख हड़ताल, सियापा, फलाना, टीरा। पत्थर मारना, आग लगाना। ये सब सीखा है गांधीजी से। फिर अपने साथ करते हैं। जैसे बाबा कहते हैं – देखो, तुम पूज्य थे। फिर पुजारी बनते हो। अपन को ही चमाट लगाते हो। पूज्य बनकरके फिर पुजारी बन जाते हो। यहाँ तक कि जाकरके ऐसे करते हो कि ग्लानि करते हो। जो तुमको विश्व की बादशाही देते हैं उनकी भी ग्लानि करते हो। शंकर की ग्लानि। शंकर-पार्वती के पीछे फिदा हुआ, फलाना हुआ। सीता उनकी चुराई गई। तो ये सब ग्लानि अपनी ही है ना। ये हुआ अपने को चमाट मारना। अपनी ही ग्लानि करना। 18.9.67 की रात्रि क्लास का चौथा पेज। अब इन बन्दरों को पता ही नहीं पड़ता है कि हम अपनी ही ग्लानि कर रहे हैं।

तो देखो, इन की कितनी कथाएं हैं ऐसे। ये इसकी कथा सीता भगाने की। कितना लंबा रामायण बनाया है। एक वाल्मीकी रामायण, एक फलाने का रामायण। तो वो देखो कितना पढ़ते हैं। और कितनी निंदा कराते हैं। बाप कहते हैं ये कितनी मूर्खता होती है। जब तुम कोई विलायत में जाओ और ये बैठकरके वहाँ सुनाओ - ये सभी बातें भारत में होती हैं। अभी देखो, ये दशहरा होता है ना। तो देखो वहाँ मैसूर में वो लोग बहुत बनाते हैं। क्या बनाते हैं? हँ? रावण की एफिजी बनाते हैं। मेघनाद, कुंभकर्ण की। अभी ये जब लडाई लगी थी थोड़ी तो बंद कर दिया था। अभी फिर और अच्छा मनाते हैं। और वहाँ भी एग्जिविशन करते हैं। फिर ये वहाँ हम ये ले गए हैं दुकान वहाँ मैसूर में। दुकान के लिए एप्लाइ कर रहे हैं कि थोड़ी सेवा हो जाए। तो बाबा ये बताय सके ना कि तुम वहाँ बैठ करके समझाओ। समझे ना? कि ये कोई सीता नहीं चुराई गई थी। ये तो दंत कथाएं बैठ बनाई हैं। ये तो रावण राज्य अभी सारी सृष्टि पर है। और ये जो भी भक्ति चल रही है ये सभी सीताएं हैं। और राम भी है। राम आया हुआ है जो लिबरेट करते हैं रावण के पंजे से सीताओं को। समझा ना? बाकि तो वो कोई भी सीता-वीता सूर्यवंशी राज्य में रामराज्य, क्या-क्या गाते हैं, राम राजा राम प्रजा राम साहूकार है। फिर कहते हैं बसे नगरी जिये दाता धर्म का उपकार है। वाह रे, धरम का उपकार। राजा की रानी सीता ही चुराय ले गए। अरे, जहाँ धरम का उपकार है वहाँ अधरम की बात कैसे हो सकती है? जहाँ भगवान और भगवती का राज्य होता है वहाँ भगवान की भी जो स्त्री, वो भी कोई चुराय ले जाए ये कैसी बुराई?

यही क्रिश्चियन लोग के जो पादरी लोग जो होते हैं ना, तो यही वो सारी बातें उठा करके समझाते रहते हैं। कन्वर्ट करते रहते हैं। और उनको ऐसी-ऐसी बातें समझाय-समझाय के क्रिश्चियन धरम में ले आते हैं। बाबा ने तो उनके बहुत लेक्चर्स सुने हैं। जब क्रिश्चियन्स का राज्य था ना तब सुने। अभी कोई ऐसे लेक्चर नहीं देंगे। नहीं। आगे वो लोग लेक्चर देते थे। और इनका लेक्चर सुनने के लिए बहुत आ जाते थे। और फिर वहीं लेक्चर के टाइम वो बोल देते-2 थे और उनका लेक्चर सुनने के लिए बहुत आ जाते थे और फिर वहीं लेक्चर के टाइम वहाँ वो बोल देते थे कि जो क्रिश्चियन धरम में आते हैं उनको देखो कितना सुख होता है। बताते हैं कि देखो, क्राइस्ट हमारा कितना अच्छा है। ये कोई बात थोड़ेही है। कृष्ण ने 84 जनम, कृष्ण ने ये 108 रानियाँ रखीं। क्या तुम्हारा कृष्ण ऐसा था? उनको भी तुम भगवान कहते हो? वो तो पूरा विषयी-विकारी ठहरा। और देखो, ये है तुम्हारा धरम। और हमारे क्राइस्ट की देखो कितनी महिमा है। बिल्कुल ही ब्रह्मचारी। बाबा के होते-होते देखते-देखते कितने नाम दे देते थे उनको। तो फिर सुनने वाले बोलते थे हम क्रिश्चियन बनने के लिए आएंगे। वहाँ तुम्हारे चर्च में आएंगे क्रिश्चियन बनने के लिए।

ऐसे तुम बच्चों को, बच्चियों को तो इतना मालूम नहीं है। हाँ, इनमें कोई होगा जो अम्बेडकर होकरके गया है एक ये बॉम्बे का, महाराष्ट्र का। उन्होंने वो बौद्धी धर्म का था। समझा ना? तो उसने एक लेक्चर से; कोई मैं कितना समझाता हूँ। छिहत्तर हज़ार बौद्धी बन गए। एक ही लेक्चर दिया था। तो देखो, कितना-कितना ये सभी दूसरे-दूसरे धरम में चले जाते हैं। बस मानते हैं सब वैसे ही। घरबार सब ऐसे ही। फिर मानते हैं बुद्ध को। और फिर बुद्ध की बड़ी महिमा करते हैं। बुद्ध का चित्र बनाय रखते हैं। अब तो देखो बहुतों के पास बुद्ध का चित्र रहता है। बुद्ध का चित्र, क्राइस्ट का चित्र। तुम देखेंगे तो बहुतों के पास रहता है।

बाकि मुसलमान तो जबरदस्ती से बने थे। तलवार के जोर से बनाया था। फिर ये, ये ग्लानि, अपनी ग्लानि बताय करके उनको, फिर वो क्रिश्चियन धर्म में ले आते हैं। बाकि मुसलमानों ने तो तलवार के जोर से बहुतों को मुसलमान बनाया। खुशी-खुशी से नहीं बनाया। अगर कोई ये शादी-वादियां कर देते थे, मुसलमानों के साथ तो फिर धरम बदलाना पड़ता है। वो जो कभी-कभी कहते हैं ईसाई हैं, हम ईसाई धरम वाले हैं। ये पता नहीं कहाँ से आए हैं। ये इनको विलायत से पैसा मिलते हैं। इनको मुसलमान पैसा देते हैं। अरे, कितनी बातें बोलते रहते हैं। बहुत बकवास करते हैं तुम बच्चों के लिए कि पैसों के पीछे धरम परिवर्तन कर देते हो। तो ये होगा ना बच्ची। सबके पास बड़े-बड़े एकदम। अभी शीट लिया है दिल्ली में। ऐसे बनाते रहते हैं। तो बाबा वाणी चलाते हैं ना। तो पहले तुमको ये बताना है। बाबा हमेशा तुमको समझाते हैं। इसी बात में तुम्हारी विजय होनी है कि गीता का भगवान कौन? तो उसमें लिखते हैं ना। पहेलियाँ लिखते हैं। जो हल करेंगे। बस, वो पहेलियाँ हल करें और विश्व के मालिक बन सकते हैं। तो ये टेम्पटेशन है ना बच्ची। जब तलक फिर आकरके समझें। टेम्प्टेशन होगी उनको समझाने के लिए।

तुम्हारे पास बिल्कुल ही किलियर लगा हुआ है। और ये है कि इसको 5000 वर्ष हुआ है। और तुम बच्चे समझाय सकते हो कि क्राइस्ट से 3000 वर्ष पहले भारत हैविन था। समझा ना? हाँ, स्वर्ग था। या वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में? हाँ, पैराडाइस। हैविन था। 18.9.67 की रात्रि क्लास का पांचवां पेज। तो हैविन या पैराडाइज़; कहते हैं ना हैविनली गॉड फादर। तो है ना? तभी बाबा ने लिखा था - प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय। और उसके नीचे फिर लिखो - गॉड फादरली वर्ल्ड यूनिवर्सिटी। और हम उसका अर्थ भी लिखते हैं। आगे सिर्फ लिखते थे ना उनका। गॉडली विश्व विद्यालय। आइ मीन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी। तो उनसे फिर लिखा-पढ़ी हो गई। तो बोला - यूनिवर्सिटी नहीं लिख सकते हो। ये यूनिवर्सिटी तो गोर्मेन्ट ही लिख सकती है। तुम लोग नहीं लिख सकते हो। तो बहुत लिखा-पढ़ी चली। जब ये आखरीन बोला कि अगर नहीं, तो फिर केस करना पड़ेगा तुम्हारे ऊपर। तो बोला, ये बैठकरके इनसे। ये बहुत दिन की बात है। तो उसके बाद तो अभी तुम पक्के भी हुए हो। और युक्ति से भी लिखते हो। अर्थ ठीक लिखते हो। ईश्वरीय विश्व विद्यालय लिखना तो कोई बड़ी बात नहीं है। तो उसको वो है अंग्रेजी - यूनिवर्सिटी; है ना? वो होता है ना किसको ऐसे खिलाना, किसको ऐसे खिलाना। तो इनको, इनको ये हो जाए। इसको ऐसे खिलाना, फिर ठीक होते हैं। अरे, बात तो फिर एक ही रहती है - ऐसे खिलाओ कि वैसे खिलाओ।

तो मीठे-मीठे बच्चों की जबकि अपने भारत के लिए ही है, अपने ही भाई-बहनों के लिए। देखो भारतवासी बहन ही बहन, भाई-बहन, हैं ना। सो देखो जब बाप आकरके पढ़ाते हैं तो वो कितना अच्छी तरह से बाप के मददगार बन जाते हैं। और बनना भी चाहिए ना। दिल्ली वाले बहुत, सबसे जास्ती मुझे देखने में आया दिल्ली सबसे नंबरवन में जा रही है इस समय में क्योंकि वहाँ सेंटर्स भी बहुत हैं। और बाबा को लिखते हैं कि बाबा ये कोई बात नहीं। हम अपने सेंटर्स ये सब आपको पैसा इकट्ठा करके भेज देते हैं। तो बाबा लिख देते हैं - नहीं। हिम्मते मर्दा मददे बाप। और फिर ये भी बताते हैं कि आधा में जाम आधा में रैयत। समझा ना? तुम सब मिलकरके आधा निकालो। और ये जो बाबा हैं ना तुमको आधा की मदद करेंगे। इतना तो उनको कहाय दिया, समझाय दिया। परन्तु वो तो कहते हैं - नहीं बाबा, हम आपसे मदद क्यों लेवें। हम अपने ही जो सेन्टर्स हैं मिलकरके हम पैसा निकाल लेंगे। और ये सब सेन्टर्स और भी खोलकरके दिखलाएंगे। तो बाबा आफरीन लिखते हैं ना ऐसे-ऐसे को।

ये सिर्फ दिल्ली है, एक दिल्ली। दूसरा है कलकत्ता। और बॉम्बे में जरा ऐसे नहीं है। तुम क्या समझती हो? भले कि दो, एक हैं बॉम्बे में। कोई जास्ती नहीं हैं। हिम्मवाले नहीं हैं ऐसे। हाँ, कलकत्ते में हिम्मतवाले हैं। दिल्ली में हैं। बाकि कोई बोले ब्राह्मणी कि हाँ, हमारे देहरादून वाले बोलके दिखलावें। नहीं, वहाँ हैं। वहाँ बहुत सेन्टर्स हैं ना बच्चे। तो बाबा उनको आफरीन देते हैं। बाबा, ये क्या बात है? हम कहते हैं कोई हर्जा थोड़ेही है? हम बाबा के बनें। जब है ही सब कुछ बाबा आपका तो सब कुछ बाबा के ही कार्य में लगाने का है ना। क्योंकि है ना ऐसा। ऐसे बाबा के पास बहुत बच्चे हैं। तब तो बाबा कहते हैं ना ये सांवलशाह की हुंडी भरी रहेगी। जो फिर अभी गोरेशाह बनेंगे। तो ऐसे है ना - पहले सांवरा और फिर गोरा। वो है ना गाया हुआ कि सांवलशाह की हुंडी बाप भरते रहेंगे। और ये सांवलशाह तो है ना ये। बाप तो कोई सांवलशाह नहीं है। शिवबाबा सांवलशाह हो सकते हैं क्या? नहीं। तो ये सभी बातें बच्ची बड़ी मीठी और खुशी की बातें रहती हैं। (क्रमशः)

A night class dated 18.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third page was – People keep on seeking from the government. If they do not get anything, they organize hunger strike, etc. Stoning, arson. They have learnt all this from Gandhiji. Then they do with themselves. For example, Baba says – Look, you were worshipworthy. Then you become worshippers. You slap yourselves. After becoming worshipworthy you become worshippers again. You stoop to the level of defaming. You defame even the one who gives you the emperorship of the world. Defamation of Shankar. Shankar lost his heart to Parvati, did such and such thing. His Sita was stolen (abducted). So, all this is one’s own defamation, isn’t it? This is like slapping oneself, defaming oneself. Fourth page of the night class dated 18.9.67. Well, these monkeys do not realize that they are defaming themselves.

So, look there are numerous such stories. The story of abduction of Sita. Such a long Ramayana has been written. One is Valmiki Ramayana, one is the Ramayana of such and such person. So, look, they read so much. And they cause so much defamation. The Father says – This is so much foolishness. When you go to a foreign country and if you sit and narrate this there – All these things happen in India. Now look, this Dussehra is celebrated, isn’t it? So, look, there those people make a lot in Mysore. What do they make? Hm? They make the effigy of Ravana. Of Meghnad, Kumbhakarna. Well, when this war had broken out a little, they had stopped that. Now they celebrate even more grandiosely. And they also organize an exhibition there. Then we took this shop there to Mysore. We are applying for a shop so that a little service can be done. So, Baba can tell that you should sit there and explain. Did you understand? That this Sita was not abducted. These are mythological stories which have been written. Now the Ravana is in the entire world. And the Bhakti that is prevalent now, all these are Sitas. And there is Ram as well. Ram, who liberates the Sitas from the clutches of Ravana has come. Did you understand? As regards that Sita-Vita, the kingdom of Ram in the Sun dynasty; what all they keep on singing! Ram Raja Ram Praja Ram Saahookaar hai. (The king is Ram, the subjects are Ram, and the prosperous ones are Ram) Then they say – Basey nagari jiye daataa dharma ka upkaar hai (The city was inhabited, may the giver live long and there is glory of religion). Wow, the glory of religion! They abducted the queen Sita of king. Arey, how can there be a topic of irreligion at the place where there is glory of religion? How can there be the evil of someone abducting even the wife of God where there is the rule of God and Goddess?

These fathers (paadris) of the Christians quote these very topics and keep on explaining. They keep on converting people. And they explain them such topics and bring them to the fold of Christianity. Baba has heard many of their lectures. He heard when there was the rule of the Christians. Now nobody will deliver such lectures. No. Earlier those people used to deliver lectures. And many people used to come to listen to their lectures. And then at the time of the lecture itself they used to speak and many people used to come to listen to their lectures. And then they used to tell at the time of lecture itself that look, those who embrace Christianity experience so much happiness. They tell that look, our Christ is so nice. This is not a topic. Krishna got 84 births, Krishna had 108 queens. Was your Krishna like this? Do you call even him as God? He is completely vicious and lustful. And look this is your religion. And look our Christ is praised so much. He is completely celibate. During Baba’s lifetime he used to be given so many names. So, then the listeners used to say that they will come to become Christians. We will come there to your Church to become Christians.

You sons and daughters do not know so much. Yes, there must be someone among them who was Ambedkar from Bombay, Maharashtra. He belonged to Buddhism. Did you understand? So, with his one lecture; I explain so much. Seventy six thousand people became Buddhists. He had delivered only one lecture. So, look, all these people move to other religions so much. They just believe them. All the households like this. Then they believe in Buddha. And then they praise Buddha a lot. They keep the picture of Buddha. Now look, many have the picture of Buddha. Picture of Buddha, picture of Christ. If you observe, many people have that.

As regards the Muslims, they were made forcibly. They were converted on the basis of fear of the sword. Then, these, these people narrate the defamations and bring them to the Christian fold. As regards the Muslims, they converted many as Muslims on the basis of fear of the sword. They did not make them happily. If anyone gets married with the Muslims, then they have to change their religion. They sometimes say that we are Christians, we belong to Christianity. Who knows where they have come from? These people get money from abroad. The Muslims give them money. Arey, they keep on speaking so many things. They speak a lot of wasteful things for you children that you change your religion for money. So, this will happen, will it not daughter? Everyone has completely big ones. Now a sheet has been obtained in Delhi. They keep on making like this. So, Baba narrates Vani, doesn’t He? So, first of all you should tell this. Baba always explains to you. You are going to achieve victory on this topic itself that who is the God of Gita? So, you write in that, don’t you? You write riddles. Whoever solves them. That is it. They should solve the riddles; and they can become the masters of the world. So, this is a temptation, isn’t it daughter? Until they come and understand. There will be temptation to explain to them.

It is displayed very clearly at your place. And it has been 5000 years. And you children can explain that India was heaven 3000 years before Christ. Did you understand? Yes, it was heaven. Or what do they say in English? Yes, Paradise. It was heaven. Fifth page of the night class dated 18.9.67. So, heaven or paradise. People say ‘heavenly God Father’. So, He is, isn’t He? Only then did Baba write – Prajapita Brahmakumari Ishwariya Vishwavidyalay. And then write below it – God Fatherly World University. And we also write its meaning. Earlier we used to just write about them. Godly world university. I mean world university. So, then some correspondence took place with them. So, they said – You cannot write University. Only the Government can write university. You people cannot write. So, a lot of correspondence took place. Then, when he finally said that if you don’t agree, then we will have to file a case against you. So, he sat and said this to this one. This was many days ago. So, after that now you have become strong. And you also write tactfully. You write the meaning correctly. It is not a big deal to write Ishwariya Vishwavidyalay. So, its English version is – University; is it not? It happens like this, doesn’t it? To feed someone like this; to feed someone else like this so that this happens to them. Feed this one like this, then he becomes okay. Arey, the matter remains the same – Feed like this or feed like that.

So, sweet, sweet children, when it is for our India only, for our brothers and sisters only. Look, there are Indian sisters and sisters, brothers and sisters, aren’t there? So, look, when the Father comes and teaches, they become helpful to the Father so nicely. And they should indeed become, shouldn’t they? I have observed that those from Delhi are becoming number one at this time because there are a lot of centers also there. And they write to Baba that Baba, this is not a big deal. All of us centers will collect money and send it to you. So, Baba writes – No. Himmatey marda madadey baap (if a man shows courage, the Father helps). And He also says that ‘aadha me jaam, aadha me raiyat’ (the kings enjoy half the fruits and the subject the remaining half) Did you understand? You all collect half. And this Baba will help you for the remaining half. They were told, explained this much. But they say – No Baba, why should we seek your help? We centers will collectively manage the money. And we will open more centers and show. So, Baba writes congratulatory messages to such ones.

This is just Delhi, one Delhi. Second is Calcutta. And it is not so in Bombay. What do you think? There are two, one in Bombay. There aren’t more. They are not so courageous. Yes, there are courageous ones in Calcutta. There are in Delhi. But if a Brahmani says that yes, our people from Dehradun should speak. No, there are there. There are many centers there, aren’t there children? So, Baba congratulates them. Baba, what is this? I say – What is wrong in it? We should become Baba’s children. When Baba everything belongs to you, then everything has to be invested in Baba’s task only, shouldn’t it be? It is because it is like this, isn’t it? Baba has many such children. Only then does Baba says that Saanwalshah’s hundi (money box) will remain full. They will then now become Goreshaah. So, it is like this, isn’t it? First dark (saanwara) and then fair (gora). It is famous that the Father will keep on filling Saanwalshaah’s hundi. And this one is Saanwalshaah, isn’t he? The Father isn’t Saanwalshah. Can ShivBaba be Saanwalshah? No. So, children, all these topics are very sweet and joyful. (Continued).

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2680, दिनांक 25.10.2018
VCD 2680, Dated 25.10.2018
रात्रि क्लास 18.9.1967
Night Class dated 18.9.1967
VCD-2680-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 25.11-43.07
Time- 25.11-43.07


बाप बैठकरके, बेहद का बाप बैठकरके पढ़ाते हैं, बहलाते हैं, समझाते हैं। तो तुम बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। रोमांच खड़े हो जाने चाहिए। जो कि तुमको वहाँ खयाल भी आते हैं कि हम बाबा बहुत सर्विस करें। तो एकदम रोमांच खड़े हो जाते हैं। दुनिया में कोई नहीं है जिसको ये मालूम होवे कि भगवान आया हुआ है। आकरके भारत को एकदम स्वर्ग बनाय देते हैं। विश्व का मालिक बनाय देते हैं। नशा ऐसा कोई को भी नहीं है। बिल्कुल ही नहीं। कुछ भी नहीं। और सिर्फ तुम्हारे पास नशा है। सो भी ऐसे नशे वाले बहुत थोड़े हैं जिनको ये नशा कायम रहता है। जब बाबा आते हैं, पूछते हैं, नारायणी नशा चढ़ा हुआ है तुमको? समझा ना? तो उनको तो गद्गद् हो जाता है। उनको नशा चढ़े और क्या चाहिए? और ये नशा चढ़ना कोई नई बात थोड़ेही है। बाबा हम आपसे कल्प-कल्प वर्सा लेते हैं। सो अभी तो हम पूरा वर्सा लेंगे। कुछ भी हो जाए हम पूरा वर्सा लेके छोड़ेंगे। है ना? श्रीमत पर चलेंगे। तूफान आएंगे बहुत। तो गद्गद् होता है।

फिर बोलते हैं बच्चे की शादी करनी है, फलाना करना है। अरे! तुम फालो करो ना फादर को। ब्रह्मा बाप ने क्या किया? बाबा को भी तो कुटुम्ब परिवार बाबा को था ना। तो वो सबको बोल दिया कि बाबा से अब कोई को एक पैसा नहीं मिलना है। हमने अपने हाथ से कमाया हुआ है। ये हमारे पास कोई डाडे की मिल्कियत थोड़ेही है। हम नहीं देने वाला हूँ। जाओ, भागो यहाँ से। तुमको शादी कराना है ना। जाओ, आपे ही जाके शादी करो। कहाँ से भी करो। जाओ। समझा? और जब ज्ञान में आए; पहले की तो बात अलग है। हम क्यों बैठेंगे? और हम हंस और वो बगुला बैठा है। फिर उनकी कौन चुम-चुम सहेंगे? क्योंकि उनमें सब, सब क्रोध वगैरा-वगैरा बकवास करने में देरी नहीं करते हैं आजकल के बच्चे। अरे, आजकल के बच्चे तो खून भी कर देते हैं बाप का। जहर की गोली भी खिलाय देते हैं कि कहाँ ये मर जाए तो पैसे हमारे हाथ आ जावें। फिर हम मौज उड़ावें। ऐसे ढ़ेर हैं बच्चे।

बाबा ने तो ऐसे बहुत देखे हुए हैं। समझा ना? क्योंकि ये रथ भी तो अनुभवी है ना। हँ? कौनसा रथ? ब्रह्मा की तरफ इशारा किया। बाजू में बैठा है ना। 'भी' क्यों लगा दिया? हँ? हाँ। कि भविष्य में और पास्ट में भी जो था वो भी तो अनुभवी मुकर्रर रथ है ना। तो ये भी ऐसे कम थोड़ेही है बच्ची। ये गरीब एकदम। बाबा कहते हैं ना गांवड़े का छोरा। ये कोई किसको मालूम है गांवड़े का छोरा कृष्ण को क्यों कहते हैं? हं? जबकि विश्व का मालिक। हँ? क्यों कहते हैं उसको गांवड़े का छोरा? विश्व का मालिक? हँ? किसके लिए बोला? हँ? अरे, स्वरग का मालिक, उसको गांवड़े का छोरा क्यों कहते? हँ? कौनसे कृष्ण की बात हो रही थी? हँ? सतयुग में स्वरग के कृष्ण की बात हो रही थी या विश्व के मालिक की बात हो रही थी? हँ? ये किसी को नहीं मालूम है कि बाप आकरके गरीबों को विश्व की बादशाही देते हैं।

बोला - उसको गांवड़े का छोरा क्यों कहते? तो तुमको बताया ना - देखो, पहले वो कहाँ था विश्व का मालिक? हँ? कहाँ इनका जनम है गांवड़े में। बूट, टोपी भी नहीं थी। समझा ना? तो गांवड़े का छोरा ठीक है। अभी अर्थ तुमने समझा है कि हाँ; किसने समझा है? तुमने। हँ? इसने नहीं। तुमने अर्थ समझा है कि सचपच गांवड़े का छोरा बनता है अंतिम जनम में। फिर गांवड़े का छोरा सो फिर विश्व का मालिक बनते हैं। हँ? बोला तत् त्वम। ये क्या बात? ये कैसे? हँ? समझा ना तत् त्वम्? कैसे? अरे दोनों कृष्ण कैसे बनते हैं? संगमयुगी कृष्ण और सतयुगी कृष्ण दोनों गांवड़े का छोरा सो फिर विश्व का मालिक बनते हैं। दोनों बनते हैं विश्व का मालिक? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। प्रवेश करके बनते हैं। क्योंकि ये तो है ही। गांवड़ा बन गया ना। हँ? क्या बन गया गांवड़ा? हँ? अभी क्या है? अरे! स्वर्ग के आगे ये भारत क्या है? है ना? ये तो वैश्यालय है ना। और वो शिवालय। कहाँ उनका राज्य था! अभी मनुष्य क्या हैं? छी-छी।

अच्छा, चलो बच्चे। पहले महंगाई होगी, पीछे आहिस्ते-आहिस्ते सस्ता होगा। वो भी जो साहूकार होंगे, तो जब महंगा होगा तो हिम्मत कर-करके ले लेंगे। फिर बहुत ही काम। उसमें सुनेंगे, देखेंगे। तो जब निकलेंगे तो वो भी लेंगे। फिर, फिर जैसे यहाँ बैठे हो ना वहाँ बैठे हुए होंगे। फिर बाबा को देखते भी रहेंगे। ऐसे कुछ सुना है। बाबा ने देखा नहीं है अभी। तो वो भी ले लेंगे। न ले सकते हैं क्या? क्योंकि ऐसी तो चीज़ बनाए जो, जो आम आदमी भी ले सके। अच्छा भई 50-60 हज़ार रुपये कीमत। और क्या करेगा? नहीं तो लेंगे कौन? ऐसी-ऐसी चीज़ें कौन लेंगे? तो वो तो कोई परवाह ही नहीं है। 50 हज़ार होगा, हँ, तो टेलीविजन ले लेंगे। और ले लिया तो क्या? अरे, दरकार है तो दो-चार भी ले लेंगे। बड़े-बड़े शहरों में सर्विस के लिए काम आएंगे। क्योंकि नई चीज़ तो निकलेगी ना बच्ची। क्योंकि फिर भी देखेंगे किसको? उफ! हाइएस्ट अथार्टी को देखेंगे। तो ये कोई कम थोड़ेही है। अरे बच्चे, तुम्हारे में बहुत थोड़े हैं जिनको नशा है। नहीं तो कोई को इतना नशा थोड़ेही रहता है। अंदर में मुरझाए हुए रहते हैं, बात मत पूछो। आये थे जब तो विश्व का ये, ये स्वरग का मालिक बनने के लिए आए थे। तो थे ना खुशी में। अभी नहीं हो। फिर अभी बनते तो हो। खुशी तो होनी चाहिेए कि हम फिर भी बाबा के बनते हैं, शिवबाबा के। हम तो जरूर पूरा वर्सा लेंगे। राजा-रानी बनेंगे। हम क्यों कमती बनेंगे? हँ? कोई तकलीफ थोड़ेही है? हाँ, ये तो पाई-पैसे की पढ़ाई है।

और योग भी ऐसे ही सहज है, बिल्कुल सहज। बाबा कहते क्या हैं? अपन को आत्मा समझो और बाप को याद करो। बस। तो सिर्फ आत्मा समझ आत्मा समझकरके बाप को याद करना ये कोई मुसीबत की बात है क्या? अरे, कोई भी नहीं याद कर सकते हैं। घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। फिर आगे चलके ऐसे भी तुम देखेंगे तीव्र वेगी। जो तुम बहुतों से तीखे हो जाएंगे। बोले - वाह! इतने तीखे हो जाएंगे जो सोचेंगे ये कोई बड़ी बात थोड़ेही है। हम तो एकदम खाते-पीते उठते-बैठते सारा दिन यही धंधा करते हैं। मैं दूसरा धंधा छोड़ ही देता हूँ। ऐसे भी नशे वाले निकल पड़ेंगे। कोई निकलेंगे। पीछे तुम्हारे से देखो कैसे सीधे आगे बढ़ते हैं। कोई कहे कि हमको देरी से खबर मिली। ऐसा क्यों हुआ? हमको मालूम होता तो हम बाबा से योग लगाके वर्सा ले लेते। तो बाबा कहते हैं अभी भी कोई हर्जा थोड़ेही है। वो पिछाड़ी में, पिछाड़ी में तो फिर ऐसे भी निकलेंगे बहुत-बहुत कि टाइम बहुत थोड़ा है। बस हमको और कुछ नहीं करना है। खाने पर भी वो प्रैक्टिस करने से क्या नहीं हो सकती है? पहले बैठ कर कि हाँ, मैं आत्मा हूँ, आत्मा हूँ, आत्मा हूँ। मैं बाबा का बच्चा हूँ, आत्मा हूँ। सारा दिन ऐसे करते-करते, ऐसे अन्दर में कहेंगे ना बच्ची। तो अन्दर में कहते रहेंगे। टेव पड़ जाएगी एकदम। चलो बच्ची। म्यूजिक बजाओ। मीठे-मीठे सीकिलधे रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का यादप्यार, गुडनाइट। (समाप्त)

The Father, the unlimited Father sits and teaches, entertains, explains. So, you children should feel so happy. You should horripilate. You even get thoughts that Baba we should do a lot of service. So, you horripilate immediately. There is no one in the world who knows that God has come. He comes and makes India heaven completely. He makes you masters of the world. Nobody has such intoxication. Not at all. Nothing at all. And only you have this intoxication. That too, those with such intoxication are very few whose intoxication remains constant. When Baba comes, he asks whether you feel the Narayani intoxication? Did you understand? So, they feel excited. If they feel intoxicated, what else do they require? And it is not a new thing to get this intoxication. Baba, we obtain the inheritance from you every Kalpa. So, now we will obtain complete inheritance. Whatever may happen, we will obtain complete inheritance. Is it not? We will follow the Shrimat. You will face a lot of storms. So, you feel excited.

Then children say that we want to perform the marriage of our son, we want to do such and such thing. Arey! You follow the Father, will you not? What did Father Brahma do? Baba also had a family, didn’t he? So, he said to everyone that nobody will get even a paisa from Baba. I have earned it with my own hands. This is not my grandfather’s property. I am not going to give. God, run away from here. You want to get married, don’t you? Go, go and get married yourself. You may get married to anyone. Go. Did you understand? And when he entered the path of knowledge; the topic of the past is different. Why will we sit? And we are swans and that one is a heron sitting. Then, who will tolerate his rumblings? It is because they have everything, anger, etc.; children now-a-days do not hesitate in speaking inappropriately. Arey, today’s children even murder their fathers. They also give him capsule of poison thinking that if he dies I could get his money. Then we will enjoy. There are numerous such children.

Baba has seen many such persons. Did you understand? It is because this Chariot is also experienced, isn’t it? Hm? Which Chariot? A gesture was made towards Brahma. He is sitting beside, isn’t he? Why was ‘also’ added? Hm? Yes. The one in future and the one was in the past was also an experienced permanent Chariot, wasn’t he? So, this one is also no less daughter. This one is completely poor. Baba says, ‘the village boy’, doesn’t He. Does anyone know why Krishna is called a village boy? Hm? Whereas he is a master of the world. Hm? Why is he called a village boy? Master of the world? Hm? For whom was it said? Hm? Arey, why is the master of the world called a village boy? Hm? Which Krishna was being discussed? Hm? Was the Krishna of the Golden Age being talked about or was the master of the world being talked about? Hm? Nobody knows that the Father comes and gives the emperorship of the world to the poor.

It was said – Why do you call him the village boy? So, you were told, weren’t you? Look, was he the master of the world earlier? Hm? He was born in a village. He did not even have a boot or a cap. Did you understand? So, it is correct that he was a village boy. Now you have understood the meaning that yes; who understood? You. Hm? Not this one. You have understood the meaning that really he becomes a village boy in the last birth. Then the village boy then becomes the master of the world. Hm? It was said – Tat twam (So be you). What is this? How is this? Hm? Did you understand ‘tat twam’? How? Arey, how do both become Krishna? The Confluence Age Krishna and the Golden Age Krishna, both become village boys and then the masters of the world. Do both become masters of the world? Hm?
(Someone said something.) Yes. He becomes by entering. It is because this one is. It became a village, didn’t it? Hm? What became a village? Hm? What is it now? Arey! What is this India in comparison to heaven? It is, isn’t it? This is a brothel, isn’t it? And that is Shivaalay (house or temple of Shiv). There was their kingdom! What are human beings now? Dirty.

Achcha, okay daughter. First there will be price rise, then gradually it will become cheap. Those who are prosperous will buy by showing courage when it is costly. Then it will be very useful. They will listen, see in it [on TV]. So, when they emerge, then they will also procure. Then, then, just as you are sitting here, you will be sitting there. Then you will also keep on seeing Baba. It has been heard like this. Baba hasn’t seen yet. So, we will buy that also. Can’t we buy? It is because they should make something that the common man can also buy. Achcha brother, it costs 50-60 thousand. And what will they do? Otherwise who will buy? Who will buy such things? So, it doesn’t matter at all. If we have fifty thousand we will buy television. And what if we buy? Arey, if it is required we will even buy two or four. They will be useful for service in the big cities. It is because new things will emerge, will they not daughter? It is because whom will you see? Uff! You will see the highest Authority. So, this is no less. Arey, children, there are very few among you who have the intoxication. Otherwise, anyone doesn’t have that much intoxication. They remain wilted inside; just don’t ask. When they had come, they had come to become the master of the world, the heaven. So, you were in joy, weren’t you? Now you aren’t. Now you become again. You should feel joyful that we become Baba’s children, ShivBaba’s children again. We will definitely obtain complete inheritance. We will become kings and queens. Why will we become less? Hm? Is there any difficulty? Yes, this is a study worth pie-paise.

And similarly Yoga is also easy, very easy. What does Baba say? Consider yourself to be a soul and remember the Father. That is it. So, is it difficult to just consider yourself to be a soul and remember the Father? Arey, nobody can remember. You forget every moment. Then in future you will also see such fast ones. You will gallop faster than many. He said – Wow! You will become so fast that you will think this is not a big issue. We do the same business while eating, drinking, standing and sitting. I leave all other businesses. Those who feel such intoxication will also emerge. Some will emerge. Later, look, how they will move ahead of you. Someone may say that I got the news late. Why did it happen so? Had I known, I would have had Yoga with Baba and obtained the inheritance. So, Baba says – Is there any problem even now? Later on, later on, such ones will also emerge who will say that there is very less time. That is it; now we shouldn’t do anything else. Can’t that happen if we practice doing that even while eating? First you sit and think that yes, I am a soul, I am a soul, I am a soul. I am Baba’s child, I am a soul. While doing so throughout the day, you will say like this inside, will you not daughter? So, you will keep on telling inside. You will practice completely. Let’s proceed, daughter. Play the music. Remembrance, love and goodnight from the spiritual Father and Dada to the sweet-sweet, long lost and now found (seekiladhey) spiritual children. (End)

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2681, दिनांक 26.10.2018
VCD 2681, Dated 26.10.2018
प्रातः क्लास 19.9.1967
Morning Class dated 19.9.1967
VCD-2681-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.48
Time- 00.01-17.48


आज का प्रातः क्लास है - 19.9.1967. रिकार्ड चला है - रात के राही थक मत जाना, सुबह की मंजिल दूर नहीं है। कौनसी रात के राही? हँ? कहते हैं ब्रह्मा की रात, ब्रह्मा का दिन। अब ब्रह्मा के दिन की तो कोई बात ही नहीं है थकने की। वो तो है ही स्वर्ग। तो रात की बात है। रात में अंधेरा होता है अज्ञान का तो ठोकरें खानी पड़ती है। तो बोला - थक मत जाना क्योंकि वो सतयुग रूपी सवेरे की मंजिल नजदीक ही है। दूर नहीं है। अब ये गीत का अर्थ और कोई तो समझ नहीं सकते हैं। कौनसी रात है और कौनसी मंजिल है और कौन मंजिल पर जाने वाले हैं। कोई नहीं समझ सकता। इससे सिद्ध होता है कि ड्रामा के प्लैन अनुसार कोई-कोई गीत ऐसे ही बने हुए हैं। हँ? ऐसे ही माने? ऐसे ही माने तेरे फायदे के लिए बने हुए हैं। बनाए मनुष्यों ने हैं। तेरे को मदद करते हैं क्योंकि दुनिया में और जो भी गीत हैं उनमें कोई रात के राही की बात नहीं आती है। नहीं।

ये तो बाप आकरके समझाते हैं। सुप्रीम सोल गॉड फादर निराकार आके समझाते हैं निराकारी धाम से। और समझाते किसको हैं? निराकार के निराकारी स्टेज में टिकने वाले बच्चे यहाँ बैठे हैं। नंबरवार हैं। कहाँ बैठे हैं? क्लास में। तो ये बच्चे समझते हैं कि हम अभी सो रात के राही हैं। जैसे स्कूल होते हैं ना, कॉलेज होते हैं, तो वो समझते हैं हम अभी सो बैरिस्टर बन रहे हैं। पढ़ाई पढ़ रहे हैं तो ध्यान में आएगा ना हम क्या बन रहे हैं। हँ? मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे होंगे तो कहेंगे हम अभी सो डॉक्टर बन रहे हैं, सर्जन बन रहे हैं। तो अब तुम्हारी बुद्धि में क्या है? हँ? हम सो देवी-देवता बन रहे हैं। सो माने जो मंदिरों में पूजे जाते हैं। क्योंकि ये तो पुरानी दुनिया है। और अंधेरी रात है। हम सो देवी-देवता बन रहे हैं, जो नई दुनिया के थे। नई दुनिया के लिए सिर्फ तुम्हारी ही बुद्धि में आता है। और दुनियावी मनुष्यों को तो नई दुनिया की बात नहीं बुद्धि में आती है। वो तो समझते हैं कि हम यहीं राम राज्य ला रहे हैं। और तुम समझते हो कि हम मनुष्य हैं। सो देवी-देवता बन रहे हैं। क्योंकि भगवान आया हुआ है हमको मनुष्य से देवता बनाने के लिए। और बनेंगे कहाँ? इस मृत्युलोक में नहीं बनेंगे। अमरलोक में बनेंगे। वो नई दुनिया है ना। तो नई दुनिया में और नई दुनिया को तो सतयुगी कहेंगे। ये तो पुरानी दुनिया है कलह-कलेश वाली। इसको कलियुग ही कहेंगे। और नई दुनिया में है सतयुग। झूठ का नाम निशान नहीं क्योंकि वहाँ तो आदि सनातन देवी-देवताएं रहते थे ना।

अभी तो कहेंगे कि न सतयुग है न कोई देवी-देवताओं का राज्य है। देवी-देवताओं का राज्य हो ही नहीं सकता है अभी। क्यों? क्योंकि ये तो राक्षसों की दुनिया है। राक्षसों को तो दिखाते ही हैं पाताल लोक में रहते हैं जहाँ अंधेरा ही अंधेरा है। तो ये सब बातें तुम बच्चे जानते हो कि कौनसी रोशनी की दुनिया है, कौनसी अंधेरे की दुनिया है। अभी रोशनी की दुनिया से चक्कर घूमते हुए हम अभी कलियुग में आ गए। ऐसी बात तो कभी भी कोई की बुद्धि में आ ही नहीं सकेगी। ये दुनिया, ये सृष्टि एक चक्कर है। चक्कर की अरें घूमती हैं। नीचे की अर ऊपर जाती है, फिर नीचे आती है। ज्यों-ज्यों चक्कर घूमता जाएगा ऐसे ही होता रहेगा। तो तुम्हारी बुद्धि में ये बात आती है। ये सृष्टि चक्कर ऐसा है जो कल्प-कल्प ऐसे ही घूमता है। उनकी बुद्धि में नहीं आएगा। क्यों नहीं आएगा? क्योंकि उन्होंने तो सतयुग को लाखों वरष दे दिये हैं। तो बुद्धि में बात कैसे आएगी? और तुम्हारी बुद्धि में तो है कि ये लाखों वरष की सृष्टि थोड़ेही है। इस सृष्टि का चक्कर तो सतयुग से लेकर कलियुग के अंत तक सिर्फ पांच हज़ार वर्ष का है। तो है तो बात छोटी सी। बिल्कुल छोटी सी, छोटी सी बात है साधारण बात। और उन विद्वान, पंडित, आचार्यों ने साधारण सी छोटी बात को लाखों बरस में डालकरके कितना लंबा-चौड़ा कर दिया।

तुम बच्चों को तो ये निश्चय भी होता है। पक्का निश्चय बैठा है कि हम हर 5000 वर्ष के बाद ऐसे ही अंधेरे की दुनिया में आ जाते हैं। फिर बाप आकर हमको नई दुनिया में ले जाते हैं। तो पांच हज़ार वर्ष से जास्ती तो ये चक्कर हो ही नहीं सकता है क्योंकि 84 का चक्कर गाया हुआ है। उन्होंने फिर 84 के चक्कर को भी 84 लाख योनियों में डाल दिया। छोटी सी बात को फिर बड़ा कर दिया। अब बाप कहते हैं कि मनुष्य मात्र के लिए ज्यादा से ज्यादा ये 84 जनम ही हैं एक चक्कर में। सो भी उसके लिए जो इस सृष्टि चक्र में ऊँचे ते ऊँचा पार्ट बजाता है। बहुत में बहुत कितने जनम? उसके लिए 84 जनम। तो ये भी हिसाब रखना होता है बुद्धि में कि चारों युगों में कैसे 84 के चक्कर में आते हैं। और उसको अद्वैत धरम कहते हैं। किसको? नई दुनिया को। अद्वैत क्यों कहते हैं? क्योंकि वहां देवताओं का राज्य होता है। न इस्लामी, न बौद्धी, न क्रिश्चियन। ‘अ’ माने नहीं, ‘द्वैत’ माने दूसरा। माना दूसरा कोई धरम नहीं। न दूसरा राज्य, न दूसरी भाषा, न दूसरा कुल, न दूसरे मत-मतान्तर।

तो नई सृष्टि को जिसे राम-कृष्ण की दुनिया कहा जाता है भक्तिमार्ग में, वो है अद्वैत धर्म। और अद्वैत को सीधा करो तो देवता बन जाता है। हँ? दूसरा है ही नहीं। दूसरा हो तो फिर भई ये तो दूसरा है। अपने को पहले देना चाहिए कि दूसरों को देना चाहिए? दाता किसके लिए बनना है? पहले अपने लिए घर का सुधार या पर का सुधार? अपने घर का सुधार। तो बुद्धि में वो बात आती है द्वैतवाद की। तो देवता के बदले दैत्य बन जाते हैं कि भई इनको देना है उनको नहीं देना है। और हमारा तो अद्वैत धर्म है ही देवता। तो तुम्हारा शास्त्र भी? हँ? अद्वैत या द्वैत? कहेंगे अद्वैत। दूसरा कोई शास्त्र नहीं। हँ? अभी तो देखो, हँ, ये भक्तिमार्ग है अंधियारे की दुनिया। सब ठोकरें खाते हैं। कितने शास्त्र बनाए हुए हैं। हँ? एक शास्त्र तो है नहीं। और कितने मनुष्यों ने बनाए हुए हैं। तो अद्वैत शास्त्र भी एक नई दुनिया में। और दूसरे धरम जो हैं वो तो अनेक हैं। उनके फिर अनेक-अनेक शास्त्र। हर धर्म का एक शास्त्र। तो जैसे एक है अद्वैत धरम देवता। वो ही है अद्वैत जहाँ दूसरा धरम नहीं, दूसरा राज्य नहीं, दूसरी भाषा नहीं, दूसरा कुल नहीं। बाकि तो फिर देखो इस दुनिया में अनेक धर्म हो जाते हैं। अनेक राज्य हो जाते हैं। अनेक भाषाएं, अनेक कुल, अनेक मत-मतान्तर। है ना बच्चे? तो अनेक धर्म हो जाते हैं वैसे शास्त्र भी फिर अनेक। और तुम हो अभी एक। हँ? तुम एक हो? हँ? एक माने? तुम्हारी बुद्धि में है कि हम सब आत्मा हैं। उनकी बुद्धि में है कि हम देह हैं। और देह में तो फिर अनेकता आ जाती। कोई कहे मैं बुड्ढा हूँ, कोई कहे मैं डॉक्टर हूँ, कोई कहे मैं क्या हूँ, मैं राजा हूँ, मैं रंक हूँ। तो तुम हो अभी एक। एक द्वारा एक मत तुमको मिलती है।

Today’s morning class is dated 19.9.1967. The record played is – Raat ke raahi thak mat jana, subah ki manzil door nahi hai (O traveler of the night! Do not feel tired. The destination of dawn is not far away). Traveller of which night? Hm? It is said – Brahma’s night, Brahma’s day. There is no topic of tiredness in Brahma’s day. That is heaven only. So, it is a topic of the night. There is darkness of ignorance in the night; so, you have to stumble. So, it was said – Do not feel tired because that destination of Golden Age like dawn is close only. It is not far away. Well, nobody else can understand the meaning of this song. Which is the night and which is the destination and who is going to move towards the destination? Nobody can understand. It proves that some songs are penned like this only as per the drama plan. Hm? What is meant by ‘like this only’? ‘Like this only’ means they are made for your benefit. It is the human beings who have made. They help you because the topic of traveler of the night does not emerge in other songs of the world.

The Father comes and explains this. The incorporeal Supreme Soul God Father comes from the incorporeal world and explains. And whom does He explain? The children of the incorporeal who become constant in the incorporeal stage are sitting here. They are numberwise. Where are you sitting? In the class. So, the children understand that now we are travelers of the night. For example there are schools, colleges; so, they think that now we are becoming Barristers. When they are studying then it will come to their mind as to what we are going to become. Hm? If they are studying in a medical college, then they will say that we are becoming doctors, surgeons. So, what is in your intellect now? Hm? We are becoming those deities. ‘Those’ means the ones who are worshipped in the temples. It is because this is an old world. And it is a dark night. We are becoming those deities who belonged to the new world. It is only your intellect which thinks of the new world. And the topic of the new world does not strike the intellect of the worldly people. They think that we are bringing the kingdom of Ram here itself. And you think that we are human beings. We are becoming deities because God has come to make us deities from human beings. And where will we become? We will not become in this abode of death. We will become in the abode of eternity. That is a new world, isn’t it? So, in the new world; and the new world will be called Golden Aged. This is an old world of disputes and despair. This will be called Iron Age only. And there is Golden Age in the new world. There is no trace of falsehood because there it was the Aadi Sanatan (ancient) deities who existed, didn’t they?

Now it will be said that it is neither the Golden Age nor the kingdom of deities. There cannot be the kingdom of deities now at all. Why? It is because it is a world of demons. It is shown for the demons that they live underground (paataal lok) where there is just darkness. So, you children know all these topics as to which the world of light is and which the world of darkness is. While passing through the world of light now we have reached the Iron Age. Such topic can never occur in the intellect of anyone. This world is a cycle. The spokes of the wheel rotate. The spoke below goes up and then comes down again. As the wheel rotates it will happen like this. So, this topic occurs in your intellect. This world is such a cycle that it rotates like this every Kalpa. It will not occur in their intellect. Why will it not occur? It is because they have given lakhs of years to the Golden Age. So, how will the topic strike the intellect? And it is in your intellect that this is not a world of lakhs of years. The cycle of this world is of just five thousand years from the Golden Age to the end of the Iron Age. So, the topic is small. It is very small topic, an ordinary topic. And those scholars, pundits, teachers have made such an ordinary, small topic into such a big topic by mentioning lakhs of years.

You children also have this faith. You have developed firm faith that we come into the world of darkness like this after every 5000 years. Then the Father comes and takes us to the new world. So, the duration of this cycle cannot be more than five thousand years at all because the cycle of 84 is famous. They have then put even the cycle of 84 into 84 lakh species. They have turned a small topic into a big one. Now the Father says that there are at the most 84 births for the mankind in one cycle. That too for the one who plays the highest on high part in this world cycle. How many births at the most? 84 births for him. So, you have to maintain this account also in the intellect as to how you pass through the cycle of four Ages? And that is called advait (monist) religion. What? The new world. Why is it called advait? It is because there is a kingdom of deities there. Neither Islamic people, neither Buddhists nor Christians. ‘A’ means ‘no’, ‘dwait’ means ‘other/second’. It means there is no other religion. Neither another kingdom, neither another language, neither another clan, nor other opinions.

So, the new world which is called the world of Ram and Krishna on the path of Bhakti is adwait religion. And if you take the opposite of adwait, then it becomes deity. Hm? There is no one else at all. If there is another one, then brother, this is another one. Should you give to yourself first or should you give to others? For whom should you become a giver? Should you reform your house for yourself or should you reform others? You should reform your own house. So, the topic of that dualism (dwaitwaad) come to the intellect. So, instead of deities you become demons that brother we should give to this one, we shouldn’t give to that one. And ours monist religion is deity [religion]. So, your scripture also? Hm? Adwait or dwait? It will be said ‘Adwait’. There is no other scripture. Hm? Now look this path of Bhakti is a world of darkness. Everyone keeps on stumbling. They have prepared so many scriptures. Hm? There isn’t one scripture. And so many human beings have made! So, there is one adwait scripture in the new world. And the other religions are many. They then have numerous scriptures. There is a scripture of every religion. So, one monist religion is deity. That itself is adwait where there is no other religion, no other kingdom, no other language, no other clan. And you can see there are numerous religions in this world. There are numerous kingdoms. There are numerous languages, numerous clans, numerous opinions. Is it not children? So, just as there are numerous religions, there are numerous scriptures as well. And you are now one. Hm? Are you one? Hm? What is meant by one? It is in your intellect that we all are souls. It is in their intellect that we are bodies. And there is plurality in the body. Someone may say that I am old, someone may say I am a doctor, someone may say I am this, I am a king, I am a poor man. So, now you are one. You receive one direction through One.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 29 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2682, दिनांक 27.10.2018
VCD 2682, Dated 27.10.2018
प्रातः क्लास 19.9.1967
Morning Class dated 19.9.1967
VCD-2682-extracts-Bilingual


समय- 00.01-17.00
Time- 00.01-17.00


प्रातः क्लास चल रहा था - 19.9.1967. दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी कि अपने बाप, टीचर और सद्गुरु को याद करना है। परन्तु बच्चे तीनों ही भूल जाते हैं। घड़ी-घड़ी कहते हैं बाबा हम बाप, टीचर, सद्गुरु को भूल जाते। और तो है तो एक ही। परन्तु नहीं। एक ऐसे जो बलवान है, तीनों ही है। बाप भी है, टीचर भी है, सदगुरु है। उनको बाबा भूल जाते हैं। तो जो लड़ाई कही जाती है रावण के साथ, अभी नाम तो बहुत लेते हैं – रावण-वावण। यहाँ तुम क्या करती हो? सिम्पुल बात। वो भी बात नहीं चल सकती। बच्चे जानते हो बाप आके कहते हैं - हे आत्मा! तुम सतोप्रधान थे ना। अच्छा, अभी तमोप्रधान हो। और सबको कहेंगे तमोप्रधान। तुम सब जो भी धरम वाले हैं, सबको ये कहना कि जब शांतिधाम में थे या मुक्तिधाम में थे तो पवित्र थे जरूर। प्योर थे। सतोप्रधान थे। अच्छा, गोल्डन एज में थे - ऐसे ही कहेंगे क्योंकि आत्मा बनेंगे तो गोल्डन एज में तो सबकी आत्मा होगी ना। कोई भी धरम वाला हो। गोल्डन एज माने सबसे अच्छी, बढ़िया एज। सुख ही सुख। पहले जनम में तो सब सुखी ही होंगे ना।

तो बच्ची जो भी पिछाड़ी में होगा ना और एक भी जो वहाँ पड़ा रहा होगा। कहाँ? हँ? कहाँ? अरे? प्योरिटी में पड़ा रहा होगा परमधाम में। बाबा ने कहा है ना प्योरिटी बिगर तो कोई भी आत्मा ऊपर में नहीं जाय सकती। पवित्र बनेंगी तो जाय सकेगी। इसमें सभी आत्माएं गरीब, गुरबा, छोटे-मोटे सभी पतित-पावन, उस एक पतित-पावन को ही बुलाते रहते हैं। एक कैसे? पतित में आके प्रवेश करता है पावन, जो सदा पावन है। उस एक को बुलाते रहते हैं। क्यों? क्योंकि सभी आत्माएं पतित हो जाती हैं। चाहे वो कोई धरम की हों। जड़जड़ीभूत अवस्था में आ जाती हैं। ऐसे नहीं कोई एक आत्मा जड़जड़ीभूत अवस्था में आ जाती होगी। सभी। तभी बाप आते हैं। कहते हैं कि मैं तुमको फिर से पावन, सतोप्रधान बनाता हूँ। तो मुख्य बात ये है बच्ची सतोप्रधान बनने की। और ये तो बहुत ही है। हँ? कहते हैं ना खिवैया है, फलाना है, बागवान है। ये तो भक्तिमार्ग में बहुत ही नाम गाए हुए हैं। हँ? काहे का खेवैया है? खेवैया है नैया का खेवैया। शरीर रूपी नैया। और नैया पार जाएगी तो खेवैया तो ले ही जाएगा। किसको? बिठैयों को। बिठैया भी पार जाएगा। तो गाया हुआ है भक्तिमार्ग में खिवैया। बागवान। हँ? ऐसे नहीं कहा जंगलवान। नहीं। बाग तो फूलों के बगीचे को कहा जाता है ना बाग। फूलों का बगीचा बनाने वाला है। नाम तो बहुत हैं। कहते हैं हैविनली गॉड फादर। ये सब नाम भक्तिमार्ग में गाए हुए हैं। तो यहाँ उन भक्तिमार्ग का वो लेकरके तुम कहो। अरे, वो सभी बातें फालतू हैं। हँ? कौनसी बातें? जो गाते रहते हो खिवैया है, फलाना है, बागवान है। ये सब भक्तिमार्ग की टू मेनी बातें हैं। नहीं तो इसमें है ही क्या?

बाबा तो कहते हैं कि बुद्धि को ही आत्मा कहा जाता है। वो बुद्धि कहती है बरोबर बाबा कहते कि हरेक आत्मा जब ऊपर में रहती है तो वो पवित्र है। हँ? तो क्या करना चाहिए? हँ? आत्मा को ऊपर ही रखना चाहिए, ऊपर ले जाना चाहिए या नीचे जाने देना चाहिए? ऊपर ही रहे। हं? वैसे आत्मा रहती भी शरीर में ऊपर ही है। कहाँ? भृकुटि में रहती है। परन्तु वो भृकुटि में भी जहाँ रहती है वो भी तो पांच तत्वों का पुतला है ना। हँ? तो आत्मा तो पवित्र ही है। ऊँची स्टेज वाली है। फिर भी रहने वाली कहाँ की है? हँ? इस पतित दुनिया की रहने वाली तो नहीं है। अच्छा। पावन दुनिया स्वर्ग में रहने वाली है सदाकाल? नहीं। वहाँ भी नीचे उतरती रहती है। तो ऐसी जगह कौनसी है जहाँ एकरस रहती है? नीचे ऊपर जाने, नीचे उतरने की बात ही नहीं। हँ? कहाँ रहती है? परमधाम। ऐसा धाम जो परम पवित्र है। परे ते परे है।

बाबा कहते हैं ना तुम जब आते हो आत्माएं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर तो नंगे आते हो। क्या? आत्मा कोई कपड़ा-वपड़ा नहीं शरीर का लेके आते हो। वहाँ है ही नहीं कपड़ा। कपड़े, ये शरीर रूपी वस्त्र तो बनते ही हैं पांच तत्वों से। और वहाँ तो पांच तत्व हैं ही नहीं। कहाँ? परमधाम में। वहाँ तो तुरीया तत्व है। कौनसा तुरीया तत्व बताया? हँ? कहते हैं ब्रह्मलोक। परन्तु उन शास्त्रकारों ने ब्रह्मलोक भगवान को मान लिया। क्या? कि ब्रह्मलोक भगवान है। हँ? अरे! जब नाम ही है ब्रह्म, ब्रह्म माने बड़ी, मा माने माँ। तो माँ में से तो पैदाइश होती है ना। आत्मा बाहर आती है तो शरीर रूपी वस्त्र, हँ, इस संसार में लेकर आती है, हँ, कि नहीं? लेके आती है। तो इस संसार में तो शरीर रूपी वस्त्र ही चाहिए। बाकि जहाँ से आती है वहाँ तो नंगी आत्मा आती है या कपड़े लेके आती है? हँ? नंगी जाती और नंगी ही आती है।

तो देखो, तुम पहले प्योर थे ना। हँ? जब इस सृष्टि पर नहीं थे, परमधाम में थे, तो पवित्र थे। तो ऐसे समझते हो कि वहाँ सब प्योर रहते हैं। कोई अपवित्र आत्मा वहाँ नहीं रहती। क्या? पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, पतंगे, कोई भी आत्मा वहाँ अपवित्र नहीं होती। हँ? अच्छा? लेट्रीन के कीड़े होते हैं, नाली के कीड़े होते हैं, वो? हँ? नहीं होते हैं? नाली के कीड़े नहीं होते? होते तो हैं। लेकिन उनमें भी जो आत्मा होती है वो भी पवित्र धाम की रहने वाली। हँ। तो इम्प्योर वहाँ कोई आत्मा नहीं रह सकती। सभी आग में जल करके और सज़ाएं भोग-भोग करके प्योर जरूर बनना है। हँ? सभी आत्माएं आग में जल करके? हँ? सभी आत्माएं आग में जलती हैं? हँ? योगाग्नि में सब आत्माएं जलती हैं? हँ? सब आत्माएं योगाग्नि में जलती हैं? आत्माएं? कि शरीर जलते हैं? अग्नि में कौन जलता है? हँ? अग्नि में शरीर जलता है कि आत्मा जलती है? स्थूल अग्नि में शरीर जलता है और आत्मा योगाग्नि में। तो योगाग्नि में, अग्नि है ना। अग्नि तो पवित्र कर देती है ना। तो सभी भोग-भोग करके प्योर जरूर बनती हैं।

बाकि तो है ही सबका पार्ट नंबरवार। हँ? एक जैसे तो हैं नहीं। हाँ, ये बात तो पक्की हो गई कि बाकि मुक्तिधाम या निर्वाणधाम में तो आत्मा प्योर बनने सिवाय जाय ही नहीं सकती है। इसलिए बाप कहते हैं कि बच्चों, कोई एक भी वापस नहीं आ सकते हैं। हँ? कहाँ नहीं वापस आ सकते हैं? कौन बाप कहते हैं? आत्माओं का बाप सुप्रीम सोल कहते हैं कि जो मेरा धाम है उस धाम में कोई भी वापस पवित्र बने बगैर नहीं आ सकती। पीछे तो कोई फालतू कहते हैं कि हम ब्रह्म में लीन हो जाते हैं। हँ? जो कहते हैं उन्होंने कहाँ से सीखा? हँ? उनकी आत्मा ने ब्रॉड ड्रामा में ये जो कहने का पार्ट बजाया हम ब्रह्म में लीन हो जाते हैं। हँ? परमधाम की स्मृति आई? हँ? ब्रह्म में लीन हो जाने की बात वास्तव में ब्रह्म में लीन होने की बात नहीं है। हँ? ये तो, हाँ, याद में, स्मृति में लीन हो जाते हैं। हँ? ब्रह्म में लीन होना माने आत्मिक स्मृति में, हाँ, आत्माएं-3 ही रहती हैं, उस धाम में स्थिर हो जाते हैं।

A morning class dated 19.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the second page was that you have to remember your Father, Teacher and Sadguru. But children forget all the three. They tell every moment that Baba we forget the Father, Teacher and Sadguru. And it is only one. But no. The one who is brave is all the three. He is the Father also, He is the Teacher also and He is the Sadguru also. They forget Baba. So, the war that is said to have been fought with Ravan; well, people utter the name of Ravan a lot. What do you do here? It is a simple topic. That topic also cannot work. Children know that the Father comes and tells – O soul! You were satopradhan (pure), weren’t you? Achcha, now you are tamopradhan (degraded or impure). And everyone will be called tamopradhan. You should tell everyone who belongs to any religion that when you were in the abode of peace or in the abode of liberation you were definitely pure. You were pure. You were satopradhan. Achcha, it will be said that you were in the Golden Age because when you become a soul, then everyone’s soul will exist in the Golden Age, will it not? Be it anyone belonging to any religion. Golden Age means good, nice Age. Happiness and only happiness. In the first birth everyone will be happy only, will they not be?

So, daughter, whoever will exist in the end and even a single person who exists there; where? Hm? Where? Arey? He would be lying there in the Supreme Abode in purity. Baba has said that no soul can go up without purity. They can go if they become pure. This includes all the souls, poor ones, small and big ones, all of them keep on calling that one Purifier of the sinful ones only. How one? The pure one, the one who is ever pure enters in the sinful one. They keep on calling that one. Why? It is because all the souls become sinful. They may belong to any religion. They enter the dilapidated state. It is not as if any one soul enters the dilapidated stage. Everyone. Only then does the Father come. He says that I make you pure, satopradhan once again. So, daughter, the main topic is of becoming satopradhan. And this is very much main. Hm? People say that He is a boatman (khivaiyya), such and such thing, the owner of a garden (baagvaan). Many such names are sung on the path of Bhakti. Hm? He is a boatman of what? He is a boatman of the boat. The boat like body. And when the boat sails across, then it is the boat man who will take you across. Whom? The passenger (bithaiyya). The passenger will also sail across. So, it is sung on the path of Bhakti that He is a boatman. Owner of the garden (baagvaan). Hm? It is not said ‘junglevaan’ (owner of a jungle). No. Garden is a garden of flowers, isn’t it? He is the one who creates the garden of flowers. There are many names. He is called the Heavenly God Father. All these names are sung on the path of Bhakti. So, you can quote from that path of Bhakti here. Arey, all those topics are wasteful. Hm? Which topics? The topics that you keep on singing that He is the boatman, such and such thing, the owner of a garden. All these are too many topics of the path of Bhakti. Otherwise, what is there in it?

Baba says that the intellect itself is called the soul. That intellect says that definitely Baba says that when every soul remains up above, it is pure. Hm? So, what should you do? Hm? You should keep the soul above only; should you take it up or should you allow it to go down? It should remain up only. Hm? Even otherwise, the soul remains up only in the body. Where? It resides in the bhrikuti (middle of the forehead between the eyebrows). But the bhrikuti where it lives is also an effigy of five elements only, isn’t it? Hm? So, the soul is pure only. It is in a high stage. However, where does it live? Hm? It is not a resident of this sinful world. Achcha. Does it reside forever in the pure world heaven? No. Even there it keeps on descending. So, which is the place where it remains in a uniform stage (ekras)? There is no question of going down or up, coming down. Hm? Where does it live [in such a stage]? The Supreme Abode. Such an abode which is supremely pure. It is the farthest one.

Baba says that when you souls come to this world stage, you come naked. What? The soul doesn’t bring any body like cloth. There is no cloth there at all. The clothes, these body-like clothes are formed only with the five elements. And the five elements do not exist there at all. Where? In the Supreme Abode. That is a unique element. Which unique element was mentioned? Hm? It is called the Brahmlok. But those writers of the scriptures considered God to be Brahmlok. What? That Brahmalok is God. Hm? Arey! When the name itself is Brahm; Brahm means senior; ma means mother. So, the creation takes place from the mother, doesn’t it? When the soul comes out, then does it bring the body like cloth to this world or not? It brings. So, the body like cloth is required in this world. But the place from where it comes, does it come as a naked soul or does it bring the clothes? Hm? It goes naked and comes naked only.

So, look, you were pure earlier, weren’t you? Hm? When you were not in this world, when you were in the Supreme Abode, you were pure. So, you understand that everyone remains pure there. No impure soul remains there. What? Animals, birds, worms, insects, flies, no soul remains impure there. Hm? Achcha? There are worms of the latrine, there are worms of the drain, what about them? Hm? Don’t they exist? Aren’t there worms of the drain? They do exist. But the soul which exists in them also is a resident of the pure abode. Hm. So, no impure soul can live there. All of them have to burn in fire and suffer punishments and definitely become pure. Hm? Do all the souls burn in fire? Hm? Do all the souls burn in fire? Hm? Do all the souls burn in the fire of Yoga? Hm? Do all the souls burn in the fire of Yoga? Souls? Or do the bodies burn? Who burns in the fire? Hm? Does the body burn in fire or does the soul burn? The body burns in the physical fire and the soul in the fire of Yoga. So, in the fire of Yoga; it is a fire, isn’t it? The soul makes you pure, doesn’t it? So, everyone definitely becomes pure after suffering.

As such everyone’s part is numberwise. Hm? They are not alike. Yes, one thing is sure that the soul cannot go to the abode of liberation or the abode of silence without becoming pure. This is why the Father says, children, nobody can come back. Hm? Where can’t they come back? Which Father says? The Father of the souls, the Supreme Soul says that nobody can come to My abode without becoming pure. Later on some say wastefully that we merge in Brahm. Hm? Where did those who say so learn? Hm? The part that their soul played in the broad drama of saying that they merge in Brahm; Hm? Did they recollect the Supreme Abode? Hm? The topic of merging into Brahm is actually not a topic of merging into Brahm. Hm? Yes, they merge in remembrance. Hm? Merging in Brahm means that they become constant in the awareness of the soul, yes, in the abode where only the souls live.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 31 Mar 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2683, दिनांक 28.10.2018
VCD 2683, Dated 28.10.2018
प्रातः क्लास 19.9.1967
Morning Class dated 19.9.1967
VCD-2683-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.07
Time- 00.01-16.07


प्रातः क्लास चल रहा था - 19.9.1967. तीसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी - शास्त्रों में तो बड़ी-बड़ी कथाएं लिख दी हैं लंबी-चौड़ी। हँ? लिख दिया है राम की सीता चुराई गई। उनके राज्य में रामराज्य था। सब सुखी थे। फिर लिख दिया है द्रौपदी को पांच पति थे। और लिखा है कि द्रौपदी को जुए में दांव में लगाया। अब ये सब बात कैसे हो सकती है? अरे, बादशाह लोग अपने घरवाली को जुए पर कैसे रखेंगे? ऐसी कोई बादशाही खेलता है क्या जुए वाली? ये सारी गंद शास्त्रों से निकली है। जिन गंद की बातों को उठाकर आज सारी दुनिया उनको फालो करके गंदी बन गई, व्यभिचारी बन गई। तो बेहद का बाप आकरके समझाएंगे इन बातों को। और तो कोई समझाय नहीं सकते। जुआरी तो बहुत पक्के होते हैं ना। अरे, वो हद के जुआरी हों या बेहद के जुआरी हों। शूटिंग तो सारी ब्राह्मणों की दुनिया में होती है ना। परन्तु आजकल की दुनिया में गंद भी बहुत ही है। बच्ची बहुत गंद है। बिल्कुल गंद है। ब्राह्मणों की दुनिया में भी ऐसी गंद है। और विलायत वालों में तो इतना गंद है बात मत पूछो। वो विलायत की बदबू तो फिर यहाँ भी आती रहती है। इन बातों में। कहाँ? ब्राह्मणों की दुनिया में।

तो बाप बैठ करके समझाते हैं इन सब बातों को। ये शूटिंग तो सारी यहाँ होती है ना। जानते हो कि हमको बाबा, बेहद का बाबा, सो वो समझाने वाला बेहद का बाबा टीचर भी है। तो ये बात तो घड़ी-घड़ी घर में बैठे, उठते, चलते भी तुम बच्चों को याद करना है। तो बाप को याद करना है और उस बाप ने ये तो कह ही दिया है कि श्रीमत पर चलो। सब बच्चे जो तुम यहाँ आते हो जो दुनिया से बाप ने तुमको चुन-चुन कर उठाया हुआ है अनेक मत वाले तो हो ना। क्योंकि कलियुग के अंत में आकरके कोई एक भी देवी-देवता धरम वाला तो नहीं होता। ब्राह्मण धरम वाला भी तो नहीं था ना। ब्रह्मा हो तो ब्राह्मण धरम वाला हो। नहीं तो वो भी झूठा ब्राह्मण धरम। कह देते हैं हम ब्राह्मण हैं। अरे, ब्राह्मण तो ब्रह्मा की औलाद होते हैं ना। ब्रह्मा ही नहीं तो ब्राह्मण कहाँ से आ गया? तो उन दुनियावी ब्राह्मणों को भी तुम अच्छी तरह से समझाय सकते हो। बोलो - ब्राह्मण। बाबा ने तो बहुत बारी समझाया है कि ब्राह्मणों को तो तुम बहुत अच्छी तरह समझाय सकते हो क्योंकि पहले-पहले तो इस दुनिया में एक ब्राह्मण चोटी ही थी, एकदम ब्राह्मण चोटी क्योंकि ब्रह्मा के वंशावली चाहिए ना। तो पहले-पहले तो कोई एक ही होगा ना।

तो देखो, तुम बच्चे पहली-पहली वंशावली हो। क्या? ये नहीं। कौन? ये बाजू वाले। जिनके बाजू में मैं बैठके बोल रहा हूँ। ये नहीं। इनके फालोअर भी नहीं। और वो दुनियावाले दूसरे-दूसरे धरम के, हँ, जो दूसरे धर्म में कन्वर्ट हो गए। पहले ब्राह्मण थे। फिर देवता बने। देवता से फिर दूसरे धर्मों में कन्वर्ट हो गए। वो भी पहली-पहली वंशावली नहीं। फिर कौन है? तुम हो। तो ये तुमको पक्का है ना कि बाबा की वंशावली हो ना। तुमको सतयुग में तो बाबा की वंशावली नहीं कहेंगे। कहेंगे? हँ? बाबा की वंशावली नहीं कहेंगे? हं? वहाँ तो सतयुग में तो बाबा को जानते भी नहीं होंगे। हँ? वहाँ जभी सतयुग में चलेंगे तो सारा ज्ञान भूल जाएगा। हँ? क्योंकि सतयुग से पहले तो पुरानी चतुर्युगी का, पुराने कल्प का विनाश हो जाता है ना। तो सब भूल जाते हैं। यहाँ तुम जानते हो बाप को। और ये जानते हो कि हम बरोबर बाबा की ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण वंशावली हैं। हँ? फिर वो ही ब्राह्मण वंशावली सतयुग त्रेता में देवता बनने के बाद द्वापर में भक्तिमार्ग में जाकरके पुजारी बनते हैं। अभी? अभी तुम क्या बन रहे हो? तुम ब्राह्मण पुजारी से पूज्य बन रहे हो। और अभी सब नहीं बन रहे हो। जो सच्चे-सच्चे ब्राह्मण हैं वो पुजारी से पूज्य बन रहे हो। बाकि का नंबर तो बाद में लगेगा। तो जो अभी ब्राह्मण बन रहे हो, हँ, ब्रह्मा के मुख वंशावली, इसको कहेंगे प्रजापिता ब्रह्मा के सच्चे-सच्चे ब्राह्मण। क्या? बाकि? बाकि जो प्रजापिता को मानते ही नहीं, जानते ही नहीं, हँ, नाम ही नहीं लेते, वो कोई सच्चे-सच्चे ब्राह्मण थोड़ेही हुए?

तो बाबा ने इसके ऊपर बहुत समझाया है। किसके ऊपर? प्रजापिता के ऊपर बहुत समझाया है कि प्रजापिता तो सूक्ष्मवतनवासी हो ही नहीं सकता। क्या? प्रजापिता तो इस दुनिया में ही रहता है आदि से लकरके हाँ, सृष्टि में सदाकाल रहता है। तो तुम ब्राह्मणों को भी उठाय सकते हो। क्या? वो ब्राह्मण जो सच्चे-सच्चे ब्राह्मण नहीं बने हैं, हँ, झूठे-झूठे हैं, उनको तुम उठाय सकते हो। अच्छी तरह से उठाय सकते हो। बताओ कि बाबा ने तो देखो ऐसे-ऐसे बोला है। हँ? क्योंकि ब्राह्मण कोई सन्यासी तो नहीं हो ना। हँ? नहीं। ब्राह्मण तो क्या होते हैं? सन्यासी होते हैं कि गृहस्थी होते हैं? गृहस्थी होते हैं। हाँ। गृहस्थी माना? हँ? उनकी पति-पत्नी की गृहस्थी होती है। और ये सन्यासी हैं। कौन? ये सन्यासी हैं। इनके फालोअर भी क्या हैं? सन्यासी हैं कि इनकी गृहस्थी है? नहीं। हाँ, सन्यासी भांति-भांति के होते हैं। कोई लाल कपड़े वाले, कोई काले कपड़े वाले, कोई गेरुआ कपड़े वाले, कोई सफेद कपड़े वाले। तो, ये कौनसे सन्यासी हैं? हँ? सफेद कपड़े वाले सन्यासी हैं।

तो इनका नाम ही है सन्यास धर्म। हठयोगी सन्यासी हैं। हठ पकड के बैठे हुए हैं। क्या? क्या हठ पकड़ के बैठे हैं? कि हमको राजयोग सिखाने वाला कौन है? राजयोगी (किसी ने कुछ कहा।) ऊपरवाला? अरे? किनकी बात हो रही है? अरे, झूठे ब्राह्मणों की बात हो रही है। हँ? बात हो रही है कि ये तो सन्यासी हैं सन्यास धरम के सफेद कपड़े वाले। ये हठ पकडके बैठे हैं। क्या हठ पकड़ के बैठे हैं? भगवान बाप तो कहते हैं भगवान के सिवाय कोई और राजयोग सिखाय ही नहीं सकता। और ये क्या कहते हैं? नहीं। ब्रह्मा भी कहाँ है? ब्रह्मा तो शरीर छोड़ गया ना। हँ? कहते हैं ब्रह्मा जो सूक्ष्मवतनवासी बन गया ना जैसे भूत-प्रेत होते हैं ना सूक्ष्मवतनवासी। तो वो गुल्जार दादी में प्रवेश करके हमको राजयोग सिखा रहे हैं। वाह! हँ? अरे! राजयोग सिखाने के लिए बाप आते हैं इस सृष्टि पर तो वो निराकार बाप साकार में प्रवेश करके सर्व संबंध जोड़ते हैं, हँ, कि नहीं जोड़ते हैं? हँ? जोडते हैं ना। तो कन्या माता के तन में प्रवेश करके सर्व संबंध जोड़ेंगे क्या? जोड़ेंगे? नहीं। हँ? राजयोग सिखाएंगे? हँ? इन्द्रियों को कंट्रोल करना सिखाएंगे मन-बुद्धि के द्वारा? कैसे सिखाएंगे? हँ? तो ये तो हठ पकड़ के बैठे हैं। और हठ भी क्यों कहते हैं? हँ? घरबार छोड़ देना ये हठ ही तो है ना। और फिर हठ भी है और दूसरों को हठयोग सिखलाते भी हैं। क्या? क्या सिखलाते हैं? हँ? राजयोग में मन को कंट्रोल करना सिखाया जाता है कि आँखों को कंट्रोल करना सिखाया जाता है? हँ? या इन्द्रियों को कंट्रोल करना सिखाया जाता है? सिखाया जाता है। लेकिन वो इन्द्रियाँ भी कंट्रोल तब होती हैं जब मन एकाग्र हो जाए। बहुत ही हठयोग सिखाते हैं।

A morning class dated 19.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the third page was – long, long, big, big stories have been written in the scriptures. Hm? They have written that Ram’s Sita was abducted. There was a kingdom of Ram in his kingdom. Everyone was happy. Then they have written that Draupadi had five husbands. And they have written that they put Draupadi on stake in the game of dice. Well, how can all this be possible? Arey, how will emperors put their wife on stake in the game of dice? Does anyone run emperorship on the basis of game of dice? All this dirt has emerged from the scriptures. Today’s world picks up these topics of dirt and follows them and has become dirty, adulterous. So, the unlimited Father comes and explains these topics. Nobody else can explain. Gamblers are very strong, aren’t they? Arey, be it the limited gamblers or the unlimited gamblers. The entire shooting takes place in the world of Brahmins only, doesn’t it? But in today’s world there is a lot of dirt. Daughter there is a lot of dirt. There is complete dirt. There is such dirt in the world of Brahmins as well. And there is so much dirt among the foreigners that just do not ask. That bad odour of the foreign countries keeps on coming to this place as well. In these topics. Where? In the world of Brahmins.

So, the Father sits and explains all these topics. The entire shooting takes place here, doesn’t it? You know that the one who explains to us is that Baba, the unlimited Baba; He is our teacher as well. So, you children should remember this topic every moment while sitting, while getting up, while moving at home. So, you have to remember the Father and that Father has already told that you should follow the Shrimat. All of you children, who come here, the Father has picked you from the world; you follow different opinions, don’t you? It is because by the end of the Iron Age, there is not even a single person belonging to the deity religion. There wasn’t anyone belonging to the Brahmin religion as well. If there is Brahma, there will be someone belonging to the Brahmin religion. Otherwise, that is also a false Brahmin religion. They say that we are Brahmins. Arey, Brahmins are the children of Brahma, aren’t they? If there is no Brahma at all, then where did Brahmin emerge from? So, you can explain very well to those worldly Brahmins also. Tell – Brahmin. Baba has explained many times that you can explain very well to the Brahmins because first of all there was only one Brahmin peak in this world, completely Brahmin peak because the descendants of Brahma are required, aren’t they? So, first of all there will be only one, will there not be?

So, look, you children are the first and foremost descendants (vanshavali). What? Not this one. Who? Those sitting beside. The one on whose side I sit and speak. Not this one. Not even his followers. And those people of the world belonging to other religions, who have converted to other religions. Earlier they were Brahmins. Then they became deities. They then converted from deities to other religions. That too, not the first and foremost descendants. Then who are the ones? It is you. So, you are sure that you are Baba’s descendants, aren’t you? In the Golden Age you will not be called Baba’s descendants. Will you be called? Hm? Will you not be called Baba’s descendants? Hm? There in the Golden Age you will not even know Baba. Hm? There, when you go to the Golden Age, then the entire knowledge will be forgotten. Hm? It is because before the Golden Age, the old four Ages, the old Kalpa is destroyed, isn’t it? So, you forget everything. Here you know the Father. And you know that definitely we are Brahmin descendants of Baba through Brahma. Hm? Then the same Brahmin descendants become deities in the Golden Age and the Silver Age and then become worshippers on the path of Bhakti in the Copper Age. Now? What are you becoming now? You Brahmins are becoming worshipworthy from worshippers. And now everyone of you are not becoming. The true Brahmins are becoming worshipworthy from worshippers. Others will get the number later on. So, you, who are becoming Brahmins now, hm, Brahma’s mouth born progeny will be called the truest Brahmins of Prajapita Brahma. What? The rest? The rest do not believe in Prajapita at all, do not know him at all, hm, they do not utter his name itself; so, are they truest Brahmins?

So, Baba has explained a lot on this. On what? He has explained a lot on Prajapita that Prajapita cannot be a Subtle Region dweller. What? Prajapita lives in this world only from the beginning, yes, he remains forever in the world. So, you can uplift the Brahmins also. What? Those Brahmins who have not become true Brahmins, hm, those who are false ones, you can uplift them. You can uplift them well. Tell them that look Baba has said like this. Hm? It is because you Brahmins are not Sanyasis, are you? Hm? No. What are Brahmins? Are they Sanyasis or householders (grihasthis)? They are householders. Yes. What is meant by grihasthi? They have a household of husband and wife. And these are Sanyasis. Who? These are Sanyasis. What are the followers of this one as well? Are they Sanyasis or do they have a household? No. Yes, there are different kinds of Sanyasis. Some wear red clothes, some wear black clothes, some wear ocher (gerua) clothes, some wear white clothes. So, which Sanyasis are these? Hm? They are Sanyasis who wear white clothes.

So, its name itself is Sanyas religion. They are hathyogi Sanyasis. They have become obstinate. What? Which obstinacy do they have? That who is the one who teaches us rajyog? Rajyogi (Someone said something.) The above one? Arey? Whose topic is being discussed? Arey, the topic of false Brahmins is being discussed. Hm? The topic being discussed is that these are Sanyasis belonging to the Sanyas religion who wear white clothes. They have become obstinate. What is their obstinacy? God, the Father says that nobody except God can teach RajYoga at all. And what do these people say? No. Where is Brahma as well? Brahma left his body and departed, didn’t he? Hm? They say that Brahma who became a Subtle Region dweller, just as there are ghosts and devils who reside in the Subtle Region. So, he enters in Gulzar Dadi and is teaching us RajYoga. Wow! Hm? Arey! When the Father comes to this world to teach RajYoga, then does that incorporeal Father enter in the corporeal and establish all the relationships or not? Hm? He establishes, doesn’t He? So, will He establish all the relationships by entering in virgins and mothers? Will He establish? No. Hm? Will He teach RajYoga? Hm? Will He teach you to control the organs through the mind and intellect? How will He teach? Hm? So, these people have become obstinate. And why do they become obstinate? Hm? To leave the household is obstinacy only, isn’t it? And then they have obstinacy also and teach hathyog (obstinate Yoga) to others as well. What? What do they teach? Hm? Are you taught to control the mind in RajYoga or are you taught to control the eyes? Hm? Or are you taught to control the organs? You are taught. But those organs also come under control when the mind becomes focused. They teach a lot of hathyoga.
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 Apr 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2684, दिनांक 29.10.2018
VCD 2684, Dated 29.`0.2018
प्रातः क्लास 19.9.1967
Morning Class dated 19.9.1967
VCD-2684-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.52
Time- 00.01-18.52


प्रातः क्लास चल रहा था - 19.9.1967. पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी - लड़ाई के बाद सब यहाँ से, मृत्युलोक से जाएंगे। हँ? कहाँ जाएंगे? कोई अमरलोक में जाएंगे, कोई वानप्रस्थ में जाएंगे। माना सब नहीं जाएंगे अमरलोक? हँ? अमरलोक माने जहाँ मरना, जीना नहीं होता है क्योंकि जहाँ जन्म होता है वहाँ मृत्यु जरूर होती है। गीता में भी तो कहा है - ध्रुवम जन्म मृतस्य च। तो कहाँ नहीं होता है मरना जीना? और मरना कोई आत्मा को थोड़ेही होता है। ये तो शरीर को मरना होता है। शरीर से जीना होता है। तो ऐसा लोक कौनसा है जहाँ अमर ही रहते हैं, मरने की बात ही नहीं है? कोई जाएंगे अमरलोक, परमधाम। और कोई वानप्रस्थ में जाएंगे। वानप्रस्थ? माना। वान माने वाणी। प्र माने प्रकष्ठ रूप से। स्थ माने स्थिर हो जाएंगे। हँ? वाणी से प्रकष्ठ रूप से परे की स्टेज में चले जाएंगे। माना मरेंगे नहीं। हँ? शरीर से नहीं मरेंगे? शरीर रहेगा? हाँ, शरीर रहेगा। देहभान से मरेंगे। और देहभान ही जब खत्म हो जाएगा तो वाणी की भी दरकार नहीं।

बताया कोई अमरलोक में जाएंगे, कोई वानप्रस्थ में जाएंगे। दोनों में अंतर है? हँ? कोई अंतर नहीं? अंतर है। हँ? अमरलोक उसे कहेंगे जहाँ मनुष्य मात्र तो क्या, देवात्मा तो क्या, पशु-पक्षी, प्राणी, सभी की आत्माएं वहाँ जाती हैं। और वहाँ जाती हैं तो मरने-जीने का सवाल ही नहीं। वो तो अमरलोक में जाती हैं। हँ? और कोई वानप्रस्थ में जाएंगे। वानप्रस्थ माने शरीर तो रहेगा, लेकिन वाणी से परे की स्टेज में हो जाएंगे। ये बात तुम्हारी बुद्धि में रहनी चाहिए हर वक्त। क्या? क्या रहनी चाहिए? क्योंकि शास्त्रों में तो ये बातें कोई लिखी नहीं हैं, हँ, कि कोई को मालूम पड़े। ये कोई बातें हैं ही नहीं।

तो तुम बच्चों को समझाते रहते हैं कि अभी देखो तुमको घर, घर प्यारा है ना। सबको प्यारा है बच्ची। सब माथा, माथा मारते रहते हैं। जप-तप करते हैं। क्यों? कि भई ब्रह्म में या तत्व में या फलाने में जाने में। ब्रह्म तत्व को समझते हैं भगवान समझ लेते हैं। अरे, वो तो जड़ तत्व है ना। और वानप्रस्थ तो बिल्कुल ही नामीग्रामी है। क्या? क्यों नामीग्रामी है? क्योंकि वाणी से परे होने की बात है। कोई शरीर छोड़ने की बात नहीं है। शरीर में भी रहेंगे लेकिन ये जो इन्द्रियां हैं, मुख से वाणी चलाई जाती है ना। ये भी इन्द्रिय है ना। तो ये काम नहीं होगा। वाणी चलाने का काम नहीं होगा। फिर कैसे होगा? हँ? वहाँ विष्णुलोक में कैसे होगा?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, वायब्रेशन से सारा काम होगा। इशारे की भाषा होगी। वाणी से परे। तो वाणी से परे तो आवाज़ नहीं है ना बच्ची। आत्मा आवाज़ करती है जब शरीर में है। और शरीर से परे की स्टेज का अनुभव करती है तो आवाज़ की दरकार है ही नहीं। शरीर से निकले फिर आवाज़ निकलता है कुछ? हँ? आत्मा जो आवाज़ करने वाली है, हँ, वो तो भाग गई। शरीर को, देह को त्याग दिया। मन-बुद्धि से आत्मा को त्यागने की बात है ना। तो त्याग दिया। निकल गया शरीर से।

तो अभी बच्चों को तो पूरा मालूम पड़ा कि वो हमारा स्वीट होम है। क्या? दूर क्यों कर दिया? हँ? वो दुनियावालों के लिए भी, जिसे ब्रह्मलोक कहते हैं, अमरलोक कहते हैं, उनके लिए भी दूर। हमको भी दूर कर दिया। क्यों? हँ? कहते हैं तुम्हारा बाप भी है, घर भी है। तो दूर होने की बात क्या है? अरे, बाप तो हमको टीचर बनके पढ़ा रहे हैं ना। तो दूर हैं कि नज़दीक हैं? अरे? बाप, टीचर, घर एक ही है कि अलग-अलग है? एक ही है। तो उसको स्वीट होम कहा जाता है। फिर उसको कहा जाएगा स्वीट राजधानी देवताओं की। हँ? क्या चीज़? राजाओं की धारणा शक्ति। राजधानी। हँ? राजाओं की धारणा शक्ति क्या होती है? हँ? सन्यासियों की होती है धारणा शक्ति? सन्यासियों की धारणा शक्ति हो तो उनकी भी राजधानी तैयार हो जाए। हँ? वो तो छोड़छाड़ के भाग जाते हैं। तो राजधानी देवताओं की, उसको कहते हैं अद्वैत राजधानी। कैसी राजधानी? हँ? राजा की धारणा शक्ति, उसको कहते हैं राजधानी। और धारणा शक्ति राजाओं में होती है कि रानियों में होती है? किस चीज़ की धारणा शक्ति? मुख्य क्या है? मुख्य क्या है? पवित्रता। हँ? और पवित्रता आती है एक की याद से। जो ऊँच ते ऊँच एक है उसकी याद से आती है पवित्रता। तो वो भारत की कन्याओं-माताओं में होती है कि वो विदेशियों में होती है? नहीं।

तो अद्वैत शास्त्र सुनने की बात है। क्या? कैसा शासन? अद्वैत। दूसरा न हो। बस एक ही बात हो। एक ही नियम-कानून हो। ऐसे नहीं आज एक मिनिस्टर बैठा, एक कानून बनाय दिया। कल दूसरा मिनिस्टर आया, दूसरा कानून बनाय दिया। रोज कानून बदलते रहते हैं। नहीं। एक ही, उसको कहते हैं अद्वैत। तो वो शास्त्र बाप आकरके सुनाते हैं। कौनसा शास्त्र? जिसको कहते हैं भगवान का बोला हुआ गीत। श्रीमत भगवत गीता। हं? आके सुनाते हैं कि लिखापट्टी करके देते हैं? हँ? सुनाते हैं। सभी धरमपिताओं ने आके मुख से ओरली, वर्बली सुनाया ना। न कि उस समय उन्होंने कोई शास्त्र बैठकरके लिखे? नहीं। सुनाते हैं। तो देखो, अभी शास्त्र तो नहीं सुनाते हैं ना जो मनुष्यों के लिखे हुए हैं।

तुम जानते हो कि बरोबर बाबा आकरके हमको ये राजयोग, जिस राजयोग के नाम पर कहा है एक ही शास्त्र है गीता शास्त्र जो बाबा स्वयं ही आकरके सुनाते हैं। हँ? ऐसे नहीं कि कोई गुरुजी बैठ जाएं, मनुष्य गुरु, व्यास गद्दी, बनाई है ना भक्तिमार्ग में। तो जो बैठे सो व्यास भगवान। ऐसे समझो। नहीं। यहाँ तो बाबा स्वयं आकरके सुनाते हैं। सुनाने वाला कौन? हँ? बाप या बाबा? बाप कहेंगे, हँ, दो बेहद के बाप बताए - आत्माओं का बाप, निराकार आत्माओं का निराकार बाप और साकार बाप। यादगार बनी है ना शिव मंदिर में। हँ? बीच में शिवलिंग रखा होता है। अभी तो तमोप्रधान दुनिया बन गई। तो यादगार भी तमोप्रधान बनाए। जब द्वापरयुग था तो सतोप्रधान यादगार बनाई थी। तो उसमें ये दिखाया गया कि वो सतोप्रधान शिवलिंग में सोमनाथ मन्दिर में ज्योति की यादगार भी थी। निराकार ज्योति शिव बाप की यादगार वो ज्योति हीरा दिखाया गया। यादगार थी। और लिंग भी दिखाया गया। लिंग माने? चैतन्य था कि पत्थर था? पत्थर था ना। तो वो साकार रूप हो गया। जो सुख भोगते-भोगते 84 चक्कर में अंतिम जनम में आकरके पत्थरबुद्धि बन जाता है। तो दो हो गए। एक साकार एक निराकार।

तो कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के संगम पर पुरुषोत्तम संगमयुग में बाप जब उस पत्थरबुद्धि के द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं संसार में तो उस स्वरूप की यादगार बनाई जाती है मन्दिरों में। क्या? लिंग बनाते हैं पत्थर का बड़ा, हँ, और फिर उसमें वो पत्थर में वो तो दिखाई नहीं पड़ता। कौन? निराकार। कलियुग में दिखाई पड़ता है? नहीं। तमोप्रधान बन गए तो यादगार भी तमोप्रधान बन गई। हाँ, जब सतोप्रधान भक्ति थी द्वापर के आदि में तो वहाँ सच्चाई थी कि साकार भी दिखाया और निराकार भी। तो यहाँ की यादगार है संगम की कि संगम में निराकार बाप आते हैं शिव और साकार मनुष्य शरीर में प्रवेश करते हैं। कैसा साकार? वो ही साकार जिसके लिए बोला कि वो निराकारी स्टेज धारण कर लेता है बाप समान स्टेज धारण करता है, निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी।

तो वो स्वरूप के लिए बताया। क्या? दूर करके इसलिए बता दिया कि वो बाबा आकरके राजयोग सिखलाते हैं। और हमको स्वयं आकरके सुनाते हैं। कौन? वो बाबा। बाबा माने साकार और निराकार का मेल। पीछे भक्तिमार्ग में वो लोगों ने ये गीता बनाई है। हँ? ज्ञान मार्ग में थोड़ेही बनाई। क्या? इस दुनिया में भी दो मार्ग हो गए। क्या? 5000 वर्ष की दुनिया है ना। उसमें दो मार्ग हो गए। ढ़ाई हज़ार वर्ष ज्ञानमार्ग और ढ़ाई हज़ार वर्ष भक्तिमार्ग। ज्ञान आता है एक के द्वारा। और भक्ति आती है अनेकों के द्वारा। उसको कहते हैं व्यभिचारी भक्ति।

तो भक्तिमार्ग में वो लोगों ने वो गीता बनाय दी। कागज़ की कहो, भोजपत्रों पे कहो। रामायण-वामायण बनाई। तो ये सब ज्ञानमार्ग में नहीं बनाए हैं। भगवान ने आकरके जो ज्ञानमार्ग, गीता ज्ञान सुनाया, उससे जो स्वर्ग स्थापन हुआ, स्वस्थिति में जो गए उसकी यादगार है; क्या? क्रिश्चियन्स में भी मनाते हैं यादगार और मुसलमानों में भी मनाते हैं। कहते हैं ना पैराडाइज़। वो कहते हैं जन्नत। तो वो ये बताया कि भक्तिमार्ग में ये रामायण-वामायण ये सब पीछे बने। अभी? अभी तुमको कुछ पढ़ने की दरकार नहीं। क्यों? अरे, ये रामायण-वामायण और ये बनाई हुई मनुष्यों की कागज़ की गीता ये सब गड्ढे-गढ़ीचियां हो गए। क्या? जैसे किसी को बहुत ऊँची स्टेज में बना हुआ स्वच्छ जल का मानसरोवर मिल जाए, ज्ञान मान सरोवर, जिसमें देह अभिमान की मिट्टी का नाम-निशान न हो, पारदर्शी। क्या? किसकी यादगार? उसी बाप की यादगार है जो बड़े ते बड़ा क्या बनता है? हँ? बड़े से बड़ा, हँ, भूल गए? शीशा, दर्पण बनता है। जैसे कहते हैं ना तुम्हारे मिनीमधुबन हैं क्या? शीशमहल। लेकिन सबसे बड़ा, मिनीमधुबनों से भी बड़ा, हँ, पारदर्शी वो शीशा कौनसा है? उसको कहेंगे बाप। वो हमारा बाप भी है, टीचर भी है, सद्गुरु भी है। तो उस एक ने जो ज्ञान सुनाया, हँ, उससे ज्ञानमार्ग में स्वर्ग स्थापन हुआ।

A morning class dated 19.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page was – After the war everyone will move from here, depart from the abode of death (mrityulok). Hm? Where will they go? Some will go to the abode of eternity (amarlok), some will go to vaanprasth (stage of silence). Does it mean that everyone will not go to the abode of eternity? Hm? Amarlok means the place where there is no dying and living because the place where there is birth, there will definitely be death. It has also been said in the Gita – Dhruvam janma mritasya cha. So, which is the place where death and birth doesn’t occur? And it is not the soul that dies. It is the body which dies. It is the body that gets birth. So, which is the abode where you remain eternal, there is no question of death at all? Some will go to the abode of eternity, the Supreme Abode. And some will go to vaanprasth. What is meant by vaanprasth? It means. Vaan means speech (Vani). Pra means in a special way. Sth means ‘you will become constant’. Hm? You will achieve the stage beyond speech in a special manner. It means that you will not die. Hm? Will you not die physically? Will the body remain? Yes, the body will remain. You will die through body consciousness. And when the body consciousness itself ends then there is no need for speech as well.

It was told that some will go to the abode of eternity; some will go to the stage of vaanprasth. Is there a difference between both? Hm? Is there no difference? There is a difference. Hm? Amarlok is said to be that where not just the mankind, not just the deity souls, but the souls of everyone including the animals, birds and living beings go. And when they go there, there is no question of dying and living at all. They go to the abode of eternity. Hm? And some will go to vaanprasth. Vaanprasth means that the body will remain, but they will go to a stage beyond speech. This topic should remain in your intellect all the time. What? What should remain? It is because these topics have not been written in the scriptures so that people get to know. These topics are not there at all.

So, He keeps on explaining to you children that now look, the home is dear to you, isn’t it? Daughter, it is dear to everyone. Everyone keeps on spoiling his/her head. They keep on chanting and doing penance. Why? To go to Brahm or tattwa or to something else. They consider Brahm tattwa to be God. Arey, that is a non-living element, isn’t it? And vaanprastha is very famous. What? Why is it famous? It is because it is about going beyond speech (Vani). It is not about leaving the body. You will live in the body also but these organs; speech is delivered through the mouth, isn’t it? This is also an organ, isn’t it? So, this task will not be done. The task of delivering speech will not be done. Then how will it happen? How will it happen there in the abode of Vishnu?
(Someone said something.) Yes, the entire task will be performed through vibrations. There will be a language of gestures. Beyond the speech. So, there is no sound beyond speech, isn’t it daughter? A soul creates sounds when it is in the body. And when it experiences a stage beyond the body, then there is no need for sound at all. Does any sound emerge when it comes out of the body? Hm? The soul which creates the sound has run away. It renounced the body. It is about renouncing the soul through the mind and body, isn’t it? So, it renounced. It came out of the body.

So, now children have come to know completely that that is our sweet home. What? Why was it made distant? Hm? Even for those people of the world, which is called Brahmlok, Amarlok, it was made distant for them as well. We were also made distant. Why? Hm? It is said that He is your Father as well as home. So, what is the topic of being distant? Arey, the Father is teaching us as a Teacher, isn’t He? So, is He far or close? Arey? Is the Father, Teacher and Home same or different? It is one only. So, that is called sweet home. Then that will be called sweet capital (raajdhaani) of deities. Hm? What thing? The dhaarnaa shakti (power of inculcation) of kings (raja). Raajdhaani. Hm? What is the dhaarnaa shakti of kings? Hm? Do the sanyasis have dhaarnaa shakti? If the sanyasis have a dhaarnaa shakti, then their raajdhaani (capital) would also get ready. Hm? They leave and run away. So, the capital of deities is called adwait raajdhaani (monist capital). What kind of raajdhaani? Hm? A king’s dhaarnaa shakti is called raajdhaani. And do the kings have power of inculcation or do the queens have? Dhaarnaa shakti of what? What is main? What is main? Purity. Hm? And purity comes through the remembrance of one. Purity comes through the remembrance of the highest of high. So, is it contained in the virgins and mothers of India or in the foreigners? No.

So, it is about listening to adwait shaastra (monist scriptures). What? What kind of governance (shaasan)? Adwait (monist). There should not be two. There should be the topic of only one. There should be only one rule and law. It should not be the case that one Minister sat and made one kind of law. Tomorrow another Minister came; he made another law. The laws keep changing every day. No. Only one; that is called adwait (monist). So, the Father comes and narrates that scripture. Which scripture? The one which is called the song sung by God. Shrimat Bhagwat Gita. Hm? Does He come and narrate or does He write and give? Hm? He narrates. All the founders of religions came and spoke orally, verbally through their mouth, didn’t they? Or did they sit and write any scripture at that time? No. They narrate. So, look, now He doesn’t narrate the scriptures written by the human beings, does He?

You know that Baba rightly teaches us this RajYoga; it has been said for this RajYoga that there is only one scripture, the Gita scripture which Baba Himself comes and narrates. Hm? It is not as if any Guruji sits, human guru, Vyaas gaddi (seat); it has been made on the path of Bhakti, hasn’t it been? So, whoever sits [on it] is God Vyas. Think like this. No. Here Baba Himself comes and narrates. Who is the narrator? Hm? Father or Baba? The Father says, hm, two unlimited Fathers have been described – The Father of souls, the incorporeal Father of incorporeal souls and the corporeal Father. A memorial has been made in the temple of Shiva, hasn’t it been? Hm? The Shivling is placed in the center. Now the world has become tamopradhan. So, the memorials that have been made are also tamopradhan. When it was the Copper Age, then a satopradhan (pure) memorial was built. So, it was shown in it that there was a memorial of light also in the satopradhan Shivling in the temple of Somnath. The memorial of that incorporeal light Father Shiv was depicted in the form of the light, the diamond. It was a memorial. And the ling was also depicted. What is meant by ling? Living or made up of stone? It was a stone, wasn’t it? So, that was a corporeal form which develops a stone-like intellect in the last birth while enjoying pleasures in the cycle of 84 [births]. So, there are two. One corporeal and one incorporeal.

So, when the Father is revealed through that stone-like intellect in the confluence of the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age, in the Purushottam Sangamyug, then the memorial of that form is made in the temples. What? A big ling of stone is made and then He is not visible in that stone. Who? The incorporeal. Is He visible in the Iron Age? No. When you became tamopradhan, then the memorial also became tamopradhan. Yes, when the Bhakti was satopradhan in the beginning of the Copper Age, then there was truth there that the corporeal was also depicted and the incorporeal was also depicted. So, it is a memorial of this time of Confluence Age that the incorporeal Father Shiv comes in the Confluence Age and enters in a corporeal human being. What kind of corporeal? The same corporeal for whom it was said that he attains an incorporeal stage, achieves a stage equal to the Father – Incorporeal, viceless and egoless.

So, it was said for that form. What? It was made distant because that Baba comes and teaches Rajyog. And He Himself comes and narrates to us. Who? That Baba. Baba means the combination of corporeal and incorporeal. Later those people made this Gita on the path of Bhakti. Hm? It wasn’t made on the path of knowledge. What? There are two paths in this world as well. What? It is a world of 5000 years, isn’t it? Two paths were formed in it. Path of knowledge for 2500 years and path of Bhakti for 2500 years. Knowledge comes from one. And Bhakti comes from many. It is called adulterous Bhakti.

So, on the path of Bhakti those people made that Gita. Call it of paper or on bhojpatra. They wrote Ramayana, etc. So, all these have not been formed on the path of knowledge. It is a memorial of the heaven that was established through the path of knowledge that God came and established, the knowledge of Gita that He narrated and of those who achieved swasthiti (soul conscious stage); what? The memorial is celebrated among the Christians as well as the Muslims. They say Paradise, don’t they? They [the Muslims] say ‘Jannat’. So, it was told that these Ramayana, etc. were formed on the path of Bhakti later on. Now? Now there is no need for you to read anything. Why? Arey, these Ramayana, etc. and this paper Gita made by the human beings are all pits. What? For example, if someone gets the Mansarovar of clean water formed in a very high stage, the Gyan Mansarovar, which does not contain any trace of body consciousness; transparent. What? Whose memorial? It is a memorial of the same Father who becomes what in a biggest way? Hm? Biggest; hm? Did you forget? He becomes a glass (sheesha), mirror (darpan). For example, He says, doesn’t He that what are your mini-Madhubans? Sheeshmahal (glass houses). But the biggest one, bigger than the mini-Madhubans, hm, who is that transparent glass? He will be called the Father. He is our Father as well as Teacher and Sadguru. So, heaven was established on the path of knowledge through the knowledge that that One narrated.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Apr 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2685, दिनांक 30.10.2018
VCD 2685, Dated 30.10.2018
रात्रि क्लास 19.9.1967
Night Class dated 19.9.1967
VCD-2685-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.37
Time- 00.01-18.37


आज का रात्रि क्लास है - 19.9.1967. हर एक अपने लिए बादशाही स्थापन करते हैं ना। हँ? बादशाही किसके लिए? अपने लिए। स्थापन करते हैं। हँ? माने पहले, पहले स्थापन नहीं हुई थी। फिर? फिर स्थापन करते हैं। माने पहले हिल रही थी बादशाही। स्थिर नहीं थी। हँ? फिर समझ में आता है कि इसको स्थिर करें बादशाही। तो बादशाह की राजधानी होती है कोई कि नहीं? राजधानी होती है। राजा की धारणा शक्ति। तो वो हिलती-डुलती रहती है। तो उसको स्थापन कर देते हैं, स्थिर कर देते हैं। लेकिन किसके लिए? अपने लिए। हर एक। ये तो बड़े स्वार्थी हैं। हँ? क्यों? हँ, माताजी? स्वार्थी हैं या परमार्थी हैं? हँ? बड़े स्वार्थी हो गई ये बादशाही। अच्छा? स्वार्थी नरक की दुनिया में होते हैं या स्वरग की दुनिया में होते हैं? नरक की दुनिया में स्वार्थी होते हैं। हँ? वहाँ भी स्थापन होती तो है ना राजाई, बादशाही। नाम बादशाही क्यों दिया? बाद में शाह बनते हैं। क्या? बाद में शाह बनते हैं? क्यों? पहले क्या करते? पहले कुछ थैली डालेंगे तब तो थैला मिलेगा। हँ? तन, मन, धन अर्पण करते हैं तो बादशाही मिलती है।

हरेक अपने लिए करते हैं। हँ? अच्छा? हर एक। हाँ। आत्माओं का बाप शिव बाप करते हैं अपने लिए? हँ? हरेक करते हैं। शिव बाप नहीं करते हैं अपने लिए बादशाही स्थापन? करते हैं कि नहीं? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? नहीं करते? अच्छा! एक शिव बाप तो है जो अपने लिए बादशाही स्थापन नहीं करते हैं। अच्छा। तो शिव बाप जब इस सृष्टि पर आते हैं तो कोई को आप समान नहीं बनाते? तो जिसको आप समान बनाएंगे वो अपने लिए बादशाही स्थापन नहीं करेगा? अरे! जल्दी बताओ। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) करेगा। तो कैसे करेगा? हँ? कैसे करेगा? हँ? बादशाही बाद में स्थापन होती है। क्या? पहले थैली डालो तो फिर थैला? थैला मिलेगा। हँ? तो क्या थैली डालो? थैली में क्या-क्या हो? हँ? सो लगा दो। (किसी ने कुछ कहा।) बस पैसा? हँ? पैसा भी हद का और पैसा बेहद का। क्या? कौन-कौन सा पैसा? एक तो होता है हद का पैसा। हँ। कौड़ियाँ। सोना-चांदी, वगैरा। और एक होता है; बेहद का पैसा कौनसा होता है? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। ज्ञान धन। तो वो अपने लिए वो थैली लगाओ। वो थैली में चाहे ज्ञान धन हो, चाहे स्थूल धन हो, वो अर्पण करो तो बादशाही स्थापन हो।

दूसरी बात, तन अर्पण करो। जितना करेगा उतना बादशाही मिलेगी। तन हो गया, धन हो गया। अब? हँ? अब क्या? मन रह गया। अच्छा मन में क्या? जो भी संकल्प आएं वो किसके लिए अर्पण करो? हँ? अपने लिए बादशाही स्थापन करनी है तो वो संकल्प भी वो थैली में जो हैं दे दो। किसको दे दो? हँ? किसको दे दो?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिवबाबा को दे दो। तो तन भी हो गया, मन भी हो गया, धन भी हो गया, हँ, संबंधी भी हो गए। और जो इस जनम में संपर्की आए हैं थोड़े समय के लिए संपर्क में उनकी ताकत भी अर्पण कर दो। और सबसे वैल्यूबल चीज़ क्या रह गई फिर? (किसी ने कुछ कहा।) मन रह गया? हँ? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) संबंध रह गया? वो सबसे वैल्यूबल है? धत् तेरी की। इस दुनिया के संबंध सारे धोखेबाज़। हँ? एक भी काम नहीं आएगा। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, समय। समय की बहुत वैल्यू कलियुग के अंदर। तो वो एक-एक सेकण्ड समय की वैल्यू है। क्या? और खास जब सुप्रीम सोल बाप आते हैं तब तो एक-एक सेकण्ड की बहुत वैल्यू है। तो वो भी अर्पण करो। तो अपने लिए बादशाही स्थापन हो जाएगी। हँ? राजधानी स्थापन होगी कि नहीं? बादशाही राजधानी के बिना? राजधानी होगी तो बादशाही होगी कि राजधानी के बिना बादशाही हो जाएगी? हँ? राजधानी चाहिए। राजा की, वो शाह की हां, वो चाहिए धारणा शक्ति।

तो ये तो यहाँ जो बच्चे आते हैं; कहाँ? वहाँ नहीं। उस दुनिया में। कहाँ? यहाँ। वहाँ माने कहाँ-कहाँ? न तो वो स्थूल दुनिया की बात और न वहाँ वो सूक्ष्म वतन में जाती हैं साक्षात्कार में वहाँ की भी बात नहीं। कहाँ आते हैं? यहाँ। यहाँ माने? यहाँ माने कहाँ? हँ? इस हॉल के अन्दर। हँ? यहाँ माने कहाँ? हँ? जो बच्चे आते हैं
(किसी ने कुछ कहा।) इस सृष्टि में आते हैं? अंहं। यहाँ माने जो बच्चे आते हैं यहाँ; हँ? यहाँ आते हैं जो बच्चे; बच्चे किसके पास आते हैं? हँ? अरे! बच्चे बाप के पास आते हैं। कौनसे बाप की बात हो रही है? हँ? वो सारी सृष्टि के बाप की बात आ रही, हो रही है? अभी तो सारी सृष्टि का बाप कोई है ही नहीं। कोई है? हँ? कि प्रजातंत्र राज्य है? प्रजा के ऊपर प्रजा का राज्य है सब देशों में। इस सृष्टि मं सारी सृष्टि के ऊपर कोई बाप है जिसका राज्य हो? किसी का राज्य नहीं। तो यहाँ जो बच्चे आते हैं माने कहाँ आते हैं? हँ? ओहो! इतनी देर! (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिवबाबा के पास जो बच्चे आते हैं उनको ये तो निश्चय जरूर है। क्या? क्या निश्चय? ये हमारा बाबा जो शिवबाबा है, साकार और निराकार का मेल है और बाबा भी है, टीचर भी है और गुरु भी है। हँ? ये तीनों है। क्या? कौनसे बाबा की बात हो रही है? हँ? टीचर भी है, बाबा भी है, गुरु भी है। गुरु अंत का पार्ट होता है कि शुरुआत या बीच का पार्ट होता है? अंत का पार्ट होता है।

तो ये किसको कहा - ये हमारा बाबा भी है? अरे! किसको कहा?
(किसी ने कुछ कहा।) शिवबाबा को कहा? यहाँ है शिवबाबा जहाँ बोल रहे थे 67 में? हँ? वहाँ शिवबाबा था? फिर? शिवबाबा से तो वर्सा मिलता है बाप से वर्सा मिले या न मिले, लेकिन शिवबाबा से तो वर्सा मिलता है। और हरेक बच्चे को मिलता है। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, इमर्ज करके बोला होगा। ये हमारा बाबा है। अच्छा? बोला किसने? शिव बाप ने बोला ये हमारा बाबा है? किसने बोला? ब्रह्मा बाबा ने बोला - ये हमारा बाबा। ब्रह्मा बाबा शिवबाबा को पहचानते थे? पहचाना उन्होंने? हँ? नहीं पहचाना? हँ? अरे! ऐसे ही शिवबाबा-शिवबाबा बोलते थे? हँ? अरे, उन्होंने तो बिन्दी को शिवबाबा मान लिया। लेकिन जो उनके मुख से वाणी बोली गई उस वाणी में तो, मुरली में क्या बोला? मुरली में क्या बोला? शिवबाबा किसे कहेंगे? हँ? शिवबाबा उसे कहेंगे जिससे वर्सा मिलता है। काहे का? मुक्ति और जीवनमुक्ति का वर्सा मिलता है। एक बात। दूसरी बात शिवबाबा उसे कहेंगे जो बच्चों को जन्म देता है। जन्म देना माने? संसार में प्रत्यक्ष कर देना। क्या? कि ये जो बाप आकरके कोर्स देते हैं ना। आत्मा का कोर्स है ना ज्ञान का उसमें एडवांस कोर्स है रियलाइजेशन कोर्स। तो हर आत्मा को रियलाइज़ होगा ना मैं कौनसी आत्मा हूँ? नहीं होगा? तो मुख्य पार्ट बजाने वाली मैं आत्मा सृष्टि रूपी रंगमंच पर कौनसी आत्मा हूँ? और कौनसे नंबर की आत्मा हूँ? हँ? तो ये बात हर आत्मा को पता चलनी चाहिए कि नहीं? तभी तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच का एक्टर कहा जाएगा। नहीं? और उसको अपना पार्ट ही याद न रहे तो तो, तो पक्का एक्टर हुआ ही नहीं। जब पक्का एक्टर नहीं हुआ तो फिर उससे तो बार-बार रिहर्सल कराई जाएगी। है ना?

तो ये हमारा बाबा, जो शिवबाबा है, और बाबा भी है, टीचर भी है, गुरू भी है। ये कौनसी आत्मा बोल रही है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा के लिए। क्या ब्रह्मा बाबा? ये ब्रह्मा बाबा दाढ़ी-मूंछ वाला थोड़ेही हो सकता है उस समय 67 में? वो तो न बाबा साबित होता है; क्या? हँ? शिवबाबा साबित होता है? नहीं साबित होता। टीचर? हँ? जो क्लेरिफिकेशन दे एक-एक शब्द का, एक-एक वाक्य का हिज्जे-हिज्जे करके बताया, वो भी नहीं। और? सद्गुरु सद्गति करे। उनकी अपनी ही सद्गति नहीं हो पाती तो सद्गुरु कहाँ से साबित हुआ? तो कौन कह रहा है? ये बोल कौन रहा है ये हमारा बाबा जो शिवबाबा है, बाबा भी है, टीचर भी है, और गुरु भी है? हँ? जो बच्चे आते हैं उनको ये तो निश्चय है कि ये हमारा बाबा है। तो किसकी तरफ से बोला? बोलने वाले ने बच्चों की तरफ से बोला। हँ? तो किसने बोला? कौनसी आत्मा ने बोला? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। शिव सुप्रीम सोल ने बोला। बच्चों की तरफ से बोल दिया। ये हमारा बाबा भी है। ये कहके किस तरफ इशारा किया? हँ? तो उन पीछे की तरफ तो ये थोड़ेही कहेंगे? ये का मतलब है कि है। हं? तो शिवबाबा, अरे ये किसके लिए कहा? ये? वो नहीं ये। किसके लिए कहा? अरे! चक्कर में पड़ गए। हँ? अरे! (किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा के लिए कहा ये हमारा बाबा भी है, टीचर भी है, और ये हमारा गुरु भी है? वाह रे माताजी। अभी तक ब्रह्मा बाबा ही चल रहा है। तब ये, ये है मौजूद? (किसी ने कुछ कहा।) बच्चों की तरफ से बोल रहे हैं? हाँ, वो तो इमर्ज, बच्चे थोड़ेही कर पाते हैं? इमर्ज कौन करता है? इमर्ज तो शिव न किया। शिव ने इमर्ज किया और बोला कि ये, ये बच्चे जानते हैं, उनको निश्चय जरूर है; किनको? बच्चों को।

अब बताओ कि शिव बाप के बच्चे कौन हैं, हँ, जिनको निश्चय है? हँ? सन् 67 में कोई बच्चे हैं जिनको निश्चय है कि ये हमारा शिवबाबा भी है, क्लेरिफिकेशन देने वाला टीचर भी है और गति-सद्गति करने वाला गुरु भी है। आत्मिक स्थिति में टिकने वाले बच्चे थे वहाँ? अरे! थे? अरे, बच्चों को भी इमर्ज किया। क्या? उस रथ को भी जो मुकर्रर रथ है, उसको भी इमर्ज किया। और जिनको इमर्ज किया उन्हीं की तरफ से बोल रहे। क्या? कि यहाँ जो बच्चे आते हैं। यहाँ माने किसके पास? हँ? जो बोल रहा है। कौन बोल रहा है? शिव बाप बोल रहा है ना। तो शिव बाप के पास यहाँ जो बच्चे आते हैं उनको तो ये निश्चय है। जो आते हैं उनको। अब आए हैं प्रैक्टिकल में या नहीं आए हैं वो बात एक अलग। लेकिन जो आते हैं उनको तो ये निश्चय जरूर है। क्या? पहले से ही निश्चय है कि अभी निश्चय है? हँ? यज्ञ के आदि से ही निश्चय है कि अभी निश्चय है?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। जिन बच्चों ने आदि में भी निश्चय किया था। कब? कहाँ की बात? ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालय की बात? नहीं। वो तो बाद में स्थापन हुआ। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ओम मंडली की बात। कलकत्ता नहीं। कलकत्ते में ओम मंडली नहीं थी। ओम मंडली कहाँ थी? हाँ। ओम मंडली सिंध, हैदराबाद में थी। तो उन्हीं बच्चों से बाप इमर्ज करके बताते हैं कि ये, ये तो बच्चों को निश्चय जरूर है कि ये तो हमारा बाबा, शिवबाबा, हँ, टीचर है, गुरु है। ये तो सबको निश्चय है ना बच्चे।

Today’s night class is dated 19.9.1967. Each one establishes emperorship for himself, doesn’t he? Hm? Emperorship for whom? Establishes for himself. Hm? It means that it hadn’t been established earlier. Then? They establish again. It means that the emperorship was shaking earlier. It was not constant. Hm? Then it is understood that the emperorship should be stabilized. So, does an emperor have a capital or not? There is capital (raajdhaani). Dhaarna shakti (power of inculcation) of a king. So, that keeps on shaking. So, they establish it, make it constant. But for whom? For themselves. Each one. They are very selfish. Hm? Why? Hm, mataji? Are they selfish (swaarthi) or philanthropist (parmaarthi)? Hm? This emperorship has become very selfish. Achcha? Do selfish people exist in the hell or in the world of heaven? There are selfish people in the world of hell. Hm? Even there the kingship, the emperorship is established, isn’t it? Why was the name ‘baadshaahi’ (emperorship) coined? They become Shaah (emperor) later on (baad me). What? Do they become Shaahs later on? Why? What do they do initially? If you put a bag (thaili), then you will get a purse (thaila). Hm? You get emperorship when you dedicate your body, mind, wealth.

Each one does for himself. Hm? Achcha? Each one. Yes. Does the Father of souls Father Shiv does for Himself? Hm? Each one does. Doesn’t Father Shiv establish emperorship for Himself? Does He or doesn’t He? Hm?
(Someone said something.) Hm? Doesn’t He? Achcha! It is Father Shiv alone who does not establish an emperorship for Himself. Achcha. So, when Father Shiv comes to this world, doesn’t He make anyone equal to Himself? So, will not the one whom He makes equal to Himself, establish emperorship for himself? Arey! Speak up fast. Hm? (Someone said something.) He will. So, how will he? Hm? How will he? Emperorship is established later on. What? First put a bag, then the purse? You will get the purse. Hm? So, what bag should you put? What all should be there in the bag? Hm? So, put that. (Someone said something.) Just money? Hm? Money is also in a limited sense and in an unlimited sense. What? Which all money? One is limited money. Hm. Cowries. Gold, silver, etc. And one is; what is unlimited money? (Someone said something.) Yes. The wealth of knowledge. So, put that bag for yourself. If you surrender either the wealth of knowledge or the physical wealth in that bag, then the emperorship will be established.

Second thing – Surrender your body. The more you do the more emperorship you will get. Body was discussed; wealth was discussed. Now? Hm? What now? The mind remains. Okay, what in the mind? To whom should you dedicate all the thoughts that emerge? Hm? If you want to establish emperorship for yourself, then give those thoughts contained in that bag. To whom should you give? Hm? Whom should you give?
(Someone said something.) Yes, give to ShivBaba. So, body has also been discussed, mind has also been discussed, wealth has also been discussed, hm, relatives have also been discussed. And all those who have come in contact in this birth for some time, surrender their power also. And what is the most valuable thing that remains? (Someone said something.) Is the mind left? Hm? Arey? (Someone said something.) Is relationship left? Is that most valuable? Damn it. All the relations in this world are cheats. Hm? Not even a single one will prove useful. (Someone said something.) Yes, time. There is a lot of value of time in the Iron Age. So, there is a value of each second. What? And especially when the Supreme Soul Father comes, then there is a lot of value of each second. So, surrender that as well. Then the emperorship will be established for yourself. Hm? Will the emperorship be established or not? Emperorship without capital (raajdhaani)? Will there be emperorship if there is a capital or will there be emperorship without a capital? Hm? A capital is required. That power of inculcation (dhaarnaa shakti) of the king, the Shah is required. Yes.

The children who come here; where? Not there. In that world. Where? Here. ‘There’ refers to which all places? Neither is it about that physical world nor is it about that Subtle Region where they go in visions. Where do they come? Here. What does ‘here’ mean? ‘Here’ refers to which place? Hm? In this hall. Hm? ‘Here’ refers to which place? Hm? The children who come
(Someone said something.) Do they come in this world? Amhm. ‘Here’ means the children who come here; hm? The children who come here; Whom do the children come to meet? Hm? Arey! Children come to the Father. Which Father is being discussed? Hm? Is the Father of the entire world being discussed? Now there is no Father of the entire world at all. Is there anyone? Hm? Or is there democratic rule (prajatantra raajya)? There is the rule of subjects (praja) over subjects in all the countries. Is there any Father who rules this world, rules over the entire world? There is nobody’s rule. So, the children who come here, i.e. to which place? Hm? Oho! So late! (Someone said something.) Yes, the children who come to meet ShivBaba definitely have this faith. What? What faith? Our Baba, who is ShivBaba, the combination of corporeal and incorporeal and is Baba as well as teacher and a guru as well. Hm? He is all the three. What? Which Baba is being discussed? Hm? He is a teacher as well as Baba and Guru as well. Is the part of the Guru in the end or in the beginning or in the middle? It is the part of the end.

So, to whom was it said that this is our Baba also? Arey! To whom was it said?
(Someone said something.) Was it said to ShivBaba? Was ShivBaba at the place where He was speaking in 67? Hm? Was ShivBaba present there? Then? You get inheritance from ShivBaba; you may or may not get inheritance from the Father, but you do get inheritance from ShivBaba. And every child gets. Hm? (Someone said something.) Yes, He must have caused to emerge and said. This is our Baba. Achcha? Who spoke? Did Father Shiv say that this is our Baba? Who said? Brahma Baba said – This is our Baba. Did Brahma Baba used to recognize ShivBaba? Did he recognize Him? Hm? Did he not recognize? Hm? Arey! Did he used to utter ‘ShivBaba, ShivBaba’ just like that? Hm? Arey, he considered a point to be ShivBaba. But the Vani that was spoken through his mouth, what did he say in that Vani, in the Murli? What did He say in the Murli? Who will be called ShivBaba? Hm? ShivBaba is said to be the one from whom you get inheritance. Of what? You get the inheritance of mukti (liberation) and jeevanmukti (liberation in life). One thing. The second thing is that ShivBaba is the one who gives birth to the children. What is meant by giving birth? To reveal in the world. What? The course that the Father comes and gives, doesn’t He? It is the course of knowledge of the soul; in that the Advance Course is the realization course. So, every soul will realize that which soul am I? Will it not realize? So, which soul am I on this world stage playing a main part? And what is my soul’s number? Hm? So, should every soul know this topic or not? Only then will he/she be called an actor of this world stage. Is it not? And if he doesn’t remember his part itself, then, then he is not a firm actor at all. When he isn’t a firm actor, then he will be made to do the rehearsal again and again. Is it not?

So, this one, our Baba, ShivBaba is Baba as well as a teacher and guru as well. Which soul is speaking? Hm?
(Someone said something.) For Brahma Baba. What Brahma Baba? Can it be this Brahma Baba with beard and moustache at that time in 67? He proves to be neither Baba; what? Hm? Does he prove to be ShivBaba? He is not proved. Teacher? Hm? The one who gives the clarification of every word, the one who dissects each sentence; not even that. And? Sadguru who causes true salvation (sadgati). When they cannot cause their own true salvation, then how will they prove to be Sadguru? So, who is speaking? Who is saying that this one, our Baba, ShivBaba is Baba as well as a teacher and guru as well? Hm? The children who come have faith that this is our Baba. So, on whose behalf did he speak? The speaker spoke on behalf of the children. Hm? So, who spoke? Which soul spoke? Hm? (Someone said something.) Yes. The Supreme Soul Shiv spoke. He spoke on behalf of the children. This is out Baba as well. Towards whom was a gesture made by uttering ‘this’? Hm? So, will He say ‘this’ for those at the backside? The meaning of ‘this’ is; Hm? So, ShivBaba, arey, for whom did He say ‘this’? This? Not ‘that’, ‘this’. For whom did He say? Arey! You are confused. Hm? Arey! (Someone said something.) Did He say for Brahma Baba that this one, our Baba, ShivBaba is Baba as well as a teacher and guru as well? Wow mataji. Till now you are stuck up with Brahma Baba only. Is this, this one present at that time? (Someone said something.) Is He speaking on behalf of children? Yes, are the children able to emerge? Who causes to emerge? It is Shiv who caused to emerge and said that these, these children know; they definitely have faith; who? The children.

Now tell as to who are the children of Father Shiv, hm, who have faith? Hm? There are some children in 1967 who have the faith that this is our ShivBaba also, our Teacher also who gives clarification and our Guru also who causes gati-sadgati. Were there children who used to be constant in soul conscious stage there? Arey! Were they? Arey, children were also made to emerge. What? That Chariot also which is the permanent Chariot was also made to emerge. And He was speaking on behalf of those whom He made to emerge. What? That the children who come here; ‘Here’ refers to whom? Hm? The one who is speaking. Who is speaking? Father Shiv is speaking, isn’t He? So, the children who come to meet Father Shiv have the faith. Those who come. Well, whether they have come in practical or not is a different issue. But those who come do have this faith. What? Do they have faith beforehand or do they have faith now? Hm? Do they have faith from the beginning of the Yagya itself or do they have faith now?
(Someone said something.) Yes. Those children who had developed faith in the beginning also. When? It is about which place? Is it about the Brahmakumari Vidyalaya? No. That was established later on. (Someone said something.) Yes, it is about Om Mandali. Not Calcutta. There wasn’t Om Mandali in Calcutta. Where did Om Mandali exist? Yes. Om Mandali existed in Sindh, Hyderabad. So, the Father causes only those children to emerge and tells that children do have the faith that this is our Baba, ShivBaba, hm, teacher, guru. Children, all of you have this faith, don’t you?
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 06 Apr 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2686, दिनांक 31.10.2018
VCD 2686, Dated 31.10.2018
रात्रि क्लास 19.9.1967
Night Class dated 19.9.1967
VCD-2686-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.43
Time- 00.01-16.43


रात्रि क्लास क्लास चल रहा था - 19.9.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – ऐसे कहेंगे कि बरोबर बाबा ने जिस प्रकार से समझाया है कि तुम देवताओं का अपकार करते आए हो, मेरा अपकार करते आए हो। और मैं तुम्हारे ऊपर उपकार कर रहा हूँ। देखो, ये सभी छप रहे हैं। उन चित्रों में लक्ष्मी-नारायण का ऐसा चित्र आ जाते हैं। एक-एक चित्र। तो बड़ा चित्र बाबा को बनाना है। हँ? एक-एक चित्र छोटे-छोटे आ जाते हैं। बाबा को बड़ा चित्र बनाना है। इसमें दो तो हैं चित्र। लक्ष्मी-नारायण के चित्र मं एक चित्र है या दो हैं? दो हैं चित्र। अब ये देखो ये साइज़ इसका बढ़ाते हैं। शीट के ऊपर, लोहे के शीट होते हैं ना। उनके ऊपर। बाबा लिखते हैं। दिल्ली के जो भी बड़े-बड़े हैं रेलवे स्टेशन, वो होते हैं ना बड़े-बड़े। अंदर रखा जाता है।

तो ये चित्र बनाय और फिर उसका वैल्यू दिखलाए, समझाएं आफीसरों को क्योंकि वो इन चित्रों से समझते तो कुछ हैं नहीं। और बिड़ला मन्दिरों में जो बनाई जाती हैं मूर्तियां वो दाम तो बहुत लगता है। तो फिर इन आफीसरों को जब समझाएं कि हम भारत का कल्याण कर रहे हैं। ऐसे नहीं समझो हम कोई कमाई के लिए यहाँ बैठे हैं। यहाँ इस दुनिया में दूसरे तो जो भी हैं चित्र लेकरके बैठने वाले, मूर्तियाँ बनाके रखने वाले, वो सब कमाई के लिए एडवर्टाइज़मेन्ट करते हैं। और हम तो कोई कमाई के लिए एडवर्टाइज़मेन्ट नहीं करते हैं। हम तो खर्चा अपना अपने आप करके और फिर रास्ता बताते हैं भारतवासियों को कि फिर से तुम अपना राजभाग ले सकते हो। कैसे ले सकते हो सो आकर समझो। तो तुम्हारे पास ये चीज़ तैयार होगी तभी तो लेके जाएंगे। और लेके जाएंगे, फिर किसको सुनाएंगे। ऐसे ही तो सुनाने से वो समझते नहीं हैं बिना चित्रों के। अभी कोई आफीसर समझे या ना समझे। अगर आफीसर बड़ा है, नहीं समझा। चलो फिनिश। खेल खतम। जबकि कोई दूसरा आफीसर या कोई बड़ा किसको जाके टच करावे, जो भी उनका बड़ा होवे। तो ये समझाने में मेहनत लगती है ना बच्ची। हरेक बात में मेहनत है।

देखो, वो राजोरी गार्डन का, वो जो प्लॉट लिया हुआ है, वो जमीन अभी तक पड़ी हुई है। आफीसर आ गया क्योंकि प्रजा का प्रजा पर राज्य है। बस, अच्छा कोई आफीसर आया, काम निकल गया। अगर वहाँ कोई ऐसा-वैसा आफीसर आ जाता तो काम लटक जाता। तो देखो काम तो कितने लटके हुए हैं। नहीं तो आर्डर ही दिया था कि भले बनाओ। बनाय तो सकते हो। और फेन्स भी निकाला था। पीछे देरी की थोड़ी। कोई कोने वाले के लिए, कोने-वोने के लिए ठहर गए। तो फिर वो बीच में ही रह गया। विघन पड़ गया। बंद हो गया। 19.9.67 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। नहीं तो वो कोना-वोना में छोड़ देते थे। तो ये तो ड्रामा में हो गया सो तो हो ही गया। पीछे ख्याल आता है ना, ये करते थे, वो करते थे तो खतम हो जाता। परन्तु फिर ड्रामा का ख्याल करके कोई बात बुद्धि में नहीं रहती। ड्रामा। सिर्फ 25-50 गज छोड़ देना पड़ता जमीन। और पीछे फिर अटक गया।

तो अभी ये जो बाबा घेराव ऊपर लगाय रहे हैं, तो बाबा ने दिल्ली वालों को ये लिखा है ना कि ये तो नहीं। चार सेन्टर, एक बीच में। है ना। बहुत जहाँ सब नज़दीक में आ सकें और आकरके समझ सकें। क्योंकि दूर-दूर होने से दस-दस माइल दूर एक-एक सेन्टर लगता है। समझे ना। बहुत माइल होती है। तो ये दिल्ली कितनी माइल होगी? बहुत लंबी दिल्ली है। तो एक एक तरफ में और एक दूसरी तरफ में, एक इस तरफ में, एक बीच में, तो फिर बहुत लोग आके समझेंगे। और आजकल खर्चा तो होते ही हैं। देखो, दिल्ली में जमीन कितनी महंगी। और किराये पे लें तो वो कितना महंगा। है ना। और अपना कोई ऐसा तो कोई साहूकार बच्चा है नहीं जो इतना सारा खर्च फट से कर देवे। अभी ऐसे नहीं आए हैं। आने के हैं। पर टू लेट। फिर तो उनसे पीछे काम में नहीं आएंगा। समझा ना। जहाँ तक आएंगे और क्या करना है? कोई बारूद तो नहीं बनाने का है। टैंकर्स, सब सामिग्रीयुक्त फौज, गाड़ी, वो तो नहीं चाहिए तुम लोगों को। ऐसा तो कुछ भी नहीं चाहिए। बस योग बल। बाबा की याद।

अब याद की यात्रा में तुम बच्चों को क्योंकि ये तो अनुभवी है ना। कहते हैं – बच्चे, इस याद की यात्रा में बहुत मेहनत है। है ना? देह अभिमानी हो जाने से फिर मिस्टेक्स बहुत होती है। उसमें भी बाप कहें और तो कोई मिस्टेक की हर्जा नहीं है। बाकि जो पतित से पावन बनते हैं, प्रतिज्ञा करते हैं पावन बनेंगे, फिर भी अगर कोई पतित बनते हैं, तो बच्ची उनको बहुत नुकसान हो जाता है। ये जैसे कि दिवाला। चलते-चलते दिवाला। कमाई में दिवाला पड़ जाता है। तो तुम्हारी कमाई में चलते-चलते अगर विकार में गया ना तो जैसे कि दिवाला मार दिया। फिर अभी कोशिश करें। ऐसे नहीं कि दिवाला मारा-मारा तो कभी चढ़ नहीं सकते हैं। नहीं। फिर भी पुरुषार्थ। और बाबा को कभी ऐसे लिखते भी हैं वैसे शर्म से - मैं सेन्टर में नहीं आऊंगा। तो मैं लिख देता हूँ – नहीं, सेन्टर में नहीं जाएंगे तो फिर सॉल्वेंट तो बन नहीं सकेंगे। इन्सॉल्वेन्ट रह जावेंगे। यहाँ कोई बाबा मना नहीं करते हैं ना। उनको अच्छी तरह से समझाय करके फिर लिख देते हैं। ऐसे बहुत केसेस होते हैं बच्ची। ऐसे कोई एक दो केस नहीं आते हैं।

बाबा के पास बहुत आते हैं क्योंकि सबसे जास्ती बड़े ते बड़ी चोट लगती है इसमें। क्रोध वगैरा करने में, ये खान-पान आदि में ये कोई बहुत चोट की बात नहीं है। जबकि तुम बच्चे जन्म-जन्मान्तर के पाप याद की यात्रा से काट सकते हो। तो अभी खाना कभी किसका खाया या किसके हाथ का खाया, फलाना खाया, थोड़ा खाया, सो भी लाचारी। तो इसमें कोई इतना नहीं होता है। हत् तेरे की मैंने कही थी। हँ? क्या बोला? क्या बोला? हँ? कि बड़ा ते बड़ा चोट लगती है काम विकार की। बाकि कभी किसका खाना खाया, फलाना खाया, थोड़ा खाया, लाचारी में कोई हाथ का खाया तो इतना नहीं लगता है। वो तो पाई-पैसे की बात है। बाकि अगर कोई चोट लगती है तो इसमें खबरदारी रखनी है बहुत। किसमें? काम विकार की चोट में। इसमें ही बच्चे बहुत घाटा डालते हैं। और कोई चीज़ में इतना घाटा नहीं है। तो वो बाबा ने समझाया ना बच्चों को याद में बहुत कमाई है। तो वो कमाई कराने वाला फिर वरी कौन है? हँ? ईश्वर। कितना बड़ा नाम है बिल्कुल ही। हँ? ईश्वर माने? ईश माने शासन। वर माने श्रेष्ठ। श्रेष्ठ शासनकर्ता। भगवान, ईश्वर, प्रभु परमात्मा, खुदा, अल्लाह, गॉड। देखो एक के ही कितने बड़े-बड़े नाम हैं।

A night class dated 19.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was – It will be said that just as Baba has rightly explained that you have been defaming the deities, defaming Me and I have am causing benefit (upkaar) to you. Look, all these are being printed. Among those pictures, such pictures of Lakshmi-Narayan are included. Some pictures. So, Baba wants to make a big picture. Hm? Some pictures are received in small sizes. Baba wants to make big pictures. In this, there are two pictures. Is there one picture or two pictures in the picture of Lakshmi-Narayan? There are two pictures. Now look, this size is increased. On the sheet; there are iron sheets, aren’t there? On them. Baba writes. In all the big railway stations of Delhi; there are big ones, aren’t there? It is placed inside.

So, this picture should be made and then its value should be shown, explained to the officers because they do not understand anything through these pictures. And the idols which are made in the Birla temples are very costly. So, then when you explain to these officers that we are causing benefit to India. Do not think that we are sitting here to earn money. Here in this world all others who are sitting with pictures, those who sculpt idols, all of them do advertisement to earn money. And we don’t do advertisement for earning income. We spend our own money and then show the path to the residents of India that you can obtain your kingship once again. Come and understand as to how you can obtain. So, they will take and go only when this thing is readily available with you. And they will take and then narrate to someone. They do not understand if you simply narrate without pictures. Well, any officer may or may not understand. If the officer is big and hasn’t understood, okay finish. The drama is over. If there is any other officer or any big personality, who can go and touch someone (i.e. explain to someone), so, it requires efforts to explain, doesn’t it daughter? There is effort involved in every topic.

Look, that plot of Rajouri Garden that has been procured is still lying vacant. The officer came because it is a rule of subjects over subjects. That is it. If a nice officer comes, the work is done. Had any other kind of officer come, the task would have been stuck up. So, look so many tasks are stuck up. Otherwise, they had issued an order to construct. You can construct. And the fence was also erected. Later some delay happened. You waited for a corner one (corner plot). So, then that remained stuck up in between. An obstacle was created. It stopped. Second page of the night class dated 19.9.67. Otherwise, they used to leave in the corner. So, whatever was to happen in the drama happened. Later one thinks that it would have finished if we had done like this, like that. But then no topic remains in the intellect after thinking of the drama. Drama. We would have had to forego just 25-30 square yards of land. And later it got stuck up.

So, the gherao (encirclement) that Baba is organizing above, so Baba wrote to those from Delhi that this is not so. Four centers; one in the middle. Is it not so? The place where everyone can come from nearby places and understand. It is because if it is far away, then each center is ten miles apart. Did you understand? There are many miles. So, how many miles long is Delhi? Delhi is very long. So, on one side is one
and on the other side is another one; one on this side, one in the middle; then many people will come and understand. And now-a-days expenditure does take place. Look, land is so costly in Delhi. And if you take on rent, then that is so costly. Is it not? And we don’t have any such rich child who could spend so much immediately. Now such persons have not emerged. They are to come. But too late. Then, later they will not prove useful. Did you understand? As long as they come what else do you have to do? You don’t have to build any ammunition. Tankers, well-armed army, vehicles; you people don’t require that. You don’t require any such thing. Just the power of Yoga. Baba’s remembrance.

Now you children have to be on the journey of remembrance because this one is experienced, isn’t he? He says – Children there is a lot of effort involved in this journey of remembrance. It is not? When you become body conscious, you commit a lot of mistakes. Even in that the Father says that there is no problem in other mistakes. But as regards becoming pure from sinful, you promise that you will become pure, still, if anyone becomes sinful, then daughter they suffer a lot of loss. It is as if they become insolvent. They become insolvent while treading. One suffers insolvency in income. So, if you indulge in lust while earning income, then it is as if you become insolvent. You should try again now. It is not that if you have become insolvent, you cannot rise again. No. Still make purusharth. And Baba some even write to Baba out of guilt – I will not come to the center. So, I write – No, if you don’t go to the center, then you will not be able to become solvent. You will remain insolvent. Baba doesn’t stop you here, does He? He explains to them nicely and writes to them. Daughter, there are many such cases. There are not just one or two such cases.

Many such persons come to Baba because you suffer the biggest injury in this topic. There isn’t much injury involved in becoming angry, in eating, drinking, etc. You children can cut the sins of many births through the journey of remembrance. So, if you eat food cooked by someone or if you eat something, if you ate a little, that too under helpless conditions, then it does not cause much loss. Damn it. Hm? What has been said? What has been said? Hm? The biggest injury is suffered due to the vice of lust. But if you eat food cooked by someone else, if you eat something, if you eat a little, if you eat food cooked by someone in helpless condition, then it does not accrue much sins. That is a topic worth pie-paise. But if you suffer any injury, then you should be very careful in this. In what? In the injury due to the vice of lust. Children suffer a lot of loss in this only. There is not much loss involved in any other thing. So, Baba explained that there is a lot of income for the children in remembrance. So, who then causes such income? Hm? God (Ishwar). It is such a big name. Hm? What is meant by Ishwar? Ish means governance. Var means righteous. Righteous governor. Bhagwaan, Ishwar, Prabhu, Parmatma, Khuda, Allah, God. Look, only One has so many big names.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 Apr 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2687, दिनांक 01.11.2018
VCD 2687, Dated 01.11.2018
प्रातः क्लास 20.9.1967
Morning Class dated 20.09.1967
VCD-2687-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.40
Time- 00.01-19.40


आज का प्रातः क्लास है - 20.9.1967. गुरुवार को रिकार्ड चला है – निर्बल से लड़ाई बलवान की। ये कहानी है दीये की और तूफान की। ये कलहयुगियों का गीत है। बहुत कलह-कलेश करते हैं। तो गीत का अर्थ नहीं समझते हैं। तुम बच्चे जानते हो और तुम पुरुषोत्तम संगमयुगी हो। वो कलहयुगी हैं। संगमयुग को पुरुषोत्तम ज़रूर लिखना चाहिए। देखो, कितना दफा बाबा समझाते हैं तो भी जब ये चित्र वगैरा बैठकरके समझाते हैं ज्ञान की प्वाइंट याद न रहने के कारण फिर वो भूल जाते हैं लिखने को। हँ? क्या लिखना भूल जाते हैं? संगमयुग के साथ पुरुषोत्तम लिखना भूल जाते हैं। ऐसे तो है कि भूलना तो ज़रूर होता है। मनुष्यों से ही भूल होती है। देवताओं से तो भूल नहीं होती। तो देवता बनेंगे तो अभूल हो जावेंगे। परन्तु जबकि चित्र बनते हैं तो 2, 4, 5, 7 बार उसको सुपरवाइज करते हैं, देखते हैं। उनको दिखलाना होता है कि कोई भूल तो नहीं हो गई है। फिर 5-5, 6-6 का भी ख्याल नहीं आता है उसमें। पीछे ऐसे ही आ जाते हैं क्योंकि मेन तो ये मुख्य अक्षर है। क्या? क्या? पुरुषोत्तम संगमयुग। और ये सबको लिखना ही है। सब चित्रों में। जहाँ-जहाँ जरूरत [है] तहां-तहां ये पुरुषोत्तम संगमयुग लिखना ही है। क्योंकि इनका अर्थ भी तुम ही समझते हो। साधारण संगमयुग तो होते ही हैं। सतयुग, त्रेता का संगम; त्रेता, द्वापर का संगम; द्वापर, कलियुग का संगम। हँ? और ये तो है पुरुषोत्तम संगमयुग। उन संगमों में कोई पुरुषोत्तम थोड़ेही बनते हैं। और ही नीचे गिरते जाते हैं।

तो इस अर्थ को कोई दूसरा नहीं सीखेंगे कि पुरुषोत्तम संगमयुग क्या होता है? वो बोला ये क्या होता है? पुरुषोत्तम मास तो होते हैं। पुरुषोत्तम संगमयुग? तो पुरुषोत्तम अर्थ मास का अर्थ कोई निकलता नहीं है। हँ? हाँ, ये कहेंगे ये भी एक यादगार है। क्योंकि पुरुषोत्तम युग भी है और पुरुषोत्तम बनने का मास भी है। पुरुषोत्तम बनने की पुरुषोत्तम घड़ी भी है। तो कभी हुई है तो यादगार मनाते हैं पुरुषोत्तम मास। तो पुरुषोत्तम अर्थ बुद्धि में आना चाहिए कि ये कबकी यादगार है? जैसे त्यौहारों की लिस्ट बनाते हो। तो ये भी एक त्यौहार मनाते हैं संगमयुग का। और वास्तव में तो ये त्यौहार बहुत ऊँचा है। क्या? बहुत ऊँचा है? तो फिर और धर्मों में भी इसकी यादगार होना चाहिए। है? हँ? है या नहीं है? हाँ, मुसलमान भी तो मनाते हैं। क्या? हर साल क्या मनाते हैं? एक महीना पूरा। रामजान। नाम देते हैं रामजान महीना। हमारी जान है राम क्योंकि बहुत ऊँचा है ना। संगमयुग भी सबसे ऊँच है ऐसे कहेंगे।

तो ये पुरुषोत्तम संगमयुग, इसे तुम बच्चे जानते हो। जानते हो कि अब हम सभी इस युग में नंबरवार पुरुषोत्तम बन रहे हैं। हँ? उत्तम ते उत्तम पुरुष बन रहे हैं। किससे उत्तम? हं? किससे उत्तम से उत्तम? हँ? जो नरक की दुनिया में आके पार्ट बजाएंगी आत्माएं, उनसे भी उत्तम। और स्वर्ग की दुनिया में जो आत्माएं पार्ट बजाएंगी कम कलाओं वाली, उनसे भी उत्तम। ऐसे कहेंगे ना। तो तुम हो उत्तम ते उत्तम पुरुषोत्तम। तो फिर क्या कहेंगे? तुम साहूकार ते भी साहूकार हो। किस बात के साहूकार? हँ? यहाँ संगम में बनते हैं ज्ञान रत्नों के साहूकार। फिर ब्रॉड ड्रामा में ये ज्ञान रतन ही स्थूल रतन बन जावेंगे। तो गाएंगे ना उत्तम ते उत्तम, साहूकार से साहूकार, ऊँच ते ऊँच हम हैं नंबरवन। क्या? हँ? कौनसे धरम के? हँ। और धरम तो सब नंबरवार हैं। हम हैं ऊँच ते ऊँच नंबरवन। अल्लाह अव्वलदीन मुसलमान कहते हैं।

अव्वल नंबर। कब बनते हैं? जब प्रलय होने वाली होती है ना तब हम ऊँच ते ऊँच बन जाते हैं। परन्तु ये प्रलय अक्षर कह दिया है। प्र माने प्रकष्ठ रूप से; लय माने लीन हो जाना। परन्तु प्रलय तो होती नहीं है कि सदाकाल के लिए सृष्टि लीन हो जाए। परन्तु वो लोग प्रलय में दिखलाया है। क्या? जब प्रलय हुई तो ये है नंबरवन। हँ? कौन? प्रलय के बाद कौन नंबर वन? जिसको कहते हैं पुरुषोत्तम; क्या कहते हैं? किसको कहते हैं पुरुषोत्तम? हँ? अब ये राम की बात आई ना। तो कुछ कहते हैं ना मर्यादा पुरुषोत्तम। फिर नारायण के लिए कहते हैं पुरुषोत्तम। परन्तु वो ये नहीं जानते कि जिस नारायण को 16 कला संपूर्ण, संपूर्ण अहिंसक, मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं उनको कोई जनम देने वाला भी उनसे ऊँचा होता है। वो बात वो, वो नहीं जानते कि नंबरवन आखरीन आते कहाँ से हैं? दुनियावाले जानते हैं? हँ? वो तो सागर में कृष्ण को दिखाय देंगे। 16 कला संपूर्ण कृष्ण को। हँ? सतयुग में दिखाय देंगे लक्ष्मी-नारायण 16 कला संपूर्ण को।

तो ये नहीं जानते कि वो कहाँ से शुरू होते हैं। कहाँ से आते हैं? नंबरवन कहते हैं। क्या कहते हैं? कहाँ देखने में आया? हँ? नंबरवन कहाँ? हाँ, पुरुषोत्तम तो ठीक है। पुरुषोत्तम। देखने में कहाँ से आया? कहते हैं सागर में पीपल के पत्ते पर। पीपल के पत्ते पर बड़े आराम से अंगूठा चूसते हुए आया। हँ? क्या मतलब हुआ? वो तो मतलब नहीं जानते। तुम्हारी बुद्धि में तो आ गया। ये ज्ञान सागर की बात है। हँ? हाँ। ये जब जलमई हो जाती है, सब डूब मरते हैं जलमई में, हँ, तो वो आत्मा; कौनसी जलमई? स्थूल कि ज्ञान जल की जलमई? हँ? ज्ञान की जलमई हो जाती है। सब उसमें डूब उतराते हैं, डूबते हैं, अंधे हो जाते हैं। तो अंत में सागर में, ज्ञान सागर में वो भी पीपल के पत्ते पर; हँ? अरे? पीपल का पत्ता पहले या पीपल के पत्ते से भी पहले कोई पत्ता; हँ? कोई है कि नहीं है? क्या? अरे! पीपल वृक्ष बताया। पीपल जो है, उसके तो पत्ते बहुत हिलते-डुलते रहते हैं। हँ? कहते हैं उसपे भूत-प्रेत चढ़ बैठे रहते हैं। किसपे? हँ? पीपल के ऊपर। तो लोग बहुत डरते हैं पीपल के पास कहीं जाकर कोई ने थूक-थाक दिया, पेशाब-वेशाब कर दी तो भूत ऊपर चढ़ बैठेंगे।

तो ये नहीं जानते हैं कि पीपल से भी ज्यादा महत्व कौनसे पेड़ का है? हँ? जिसको दिखाते हैं वट वृक्ष। हँ? बरदग का वृक्ष। बड़। बड़ माने बड़ा वृक्ष। दुनिया में ये सृष्टि वृक्ष ही तो सबसे बड़ा वृक्ष है। हँ? तो फिर सृष्टि वृक्ष के जो पत्ते होते हैं वो हिलने-डुलने वाले होते हैं या कितनी भी हवा चले, उनकी डंडी तो मोटी होती है, हँ, क्या? उनकी जो स्मृति रूपी डंडी है ना वो हिलती-डुलती नहीं है। मोटी होती है और छोटी भी होती है। क्या? तो पत्ता हिलने का सवाल है ही नहीं। तो उन्होंने पीपल के पत्ते पर दिखाय दिया। वास्तव में है वो पीपल का पत्ता जिसको कहा, शास्त्रों में भी बोल दिया है - पीपल पात सरिस मन डोला। क्या? ये जो मनुआ है ना मन। हे मनुआ! ये बच्चा पीपल के पत्ते की तरह डोलने लगा। अरे! और पीपल के पत्ते के ऊपर जब बच्चा दिखाएंगे तो सागर की लहरों में ऊँची-ऊँची लहरों में जब पत्ता हिलेगा तो वो बच्चा नहीं हिलेगा? हँ? नहीं हिलेगा? अरे! कौन है बच्चा? हँ? वो बच्चा है कौन? बच्चा है कि पूरा हो गया नौजवान?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, कृष्ण बच्चा है। तो वो जो कृष्ण बच्चा है जो पीपल के पत्ते; (किसी ने कुछ कहा।) संगमयुगी कृष्ण? हँ? अरे? संगमयुगी कृष्ण है पीपल के पत्ते पर आधार लेके बैठा है? हँ? संगमयुगी कृष्ण या वो सतयुगी कृष्ण को समझते हैं? सतयुग के अंदर की बात है। वो समझते हैं कि वो ही पहला-पहला है। पहली-पहली आत्मा है इस सृष्टि रूपी वृक्ष की।

तो वास्तव में वो चन्द्रमा की बात है जो अधूरा दिखाया जाता है। क्या? छोटा बच्चा होगा और पूरा चन्द्रमा होगा। अंतर क्या हुआ? पूरा चन्द्रमा हो गया तो उसमें रोशनी ज्यादा होती है। कहेंगे 16 कला संपूर्ण और जब छोटा बच्चा है तो 16 कला संपूर्ण कैसे? मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे कहेंगे? वो क्या जाने मर्यादा क्या होती है? तो वास्तव में वो जगदंबा की बात है। जगदंबा रूपी धरणी माता, हँ, जिसका बच्चा चंद्रमा है ना, यादगार भी चन्द्रमा की दिखाते हैं ना आकाश में। हँ? तो वो कौनसे ग्रह का उपग्रह है? हँ? कहते हैं वो पृथ्वी ग्रह का उपग्रह है। माने पृथ्वी का बच्चा है पृथ्वी से पैदा हुआ। छिटक गया। तो दिखाते हैं कि वो सागर में; कौन? पीपल का पत्ता जो बहुत हिलता-डुलता है। घड़ी-घड़ी हिलता-डुलता है। निश्चय-अनिश्चय, निश्चय-अनिश्चय। जैसे कोई नांव होती है ना। और जोर से लहरें उठ रही हों तो नांव भी डगमगाती है। लोग कहते हैं – अरे, डूबी कि डूबी। तो ये कोई को पता नहीं है, हँ, कि उस नवैया का खिवैया कौन है? वो तो ऊंच ते ऊंच करतार। तो जगदम्बा रूपी पीपल का वृक्ष और उसके पहले पत्ते पर; कौन? अंगूठा चूसता हुआ कृष्ण बच्चा। माने वो ही ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा वाली आत्मा जो जगदम्बा महाकाली का रूप धारण करती है तो उसके मस्तक पर चन्द्रमा दिखाते हैं ना।


Today’s morning class is dated 20.09.1967. The record played on Thursday is – Nirbal se ladaai balwaan ki. Ye kahaani hai deeye ki aur toofaan ki. (It is a fight between the weak and the strong. This story is about the lamp and the storm.) This is a song of those in the Age of disputes (kalahyugi). They cause a lot of disputes and despair. So, they do not understand the meaning of the song. You children know and you are Purushottam Sangamyugi. They are Kalahyugi. You should definitely write Purushottam before Sangamyug. Look, Baba explains so many times; yet when He sits and explains these pictures etc. then because of not remembering the points of knowledge you forget to write that. Hm? What do you forget to write? You forget to write Purushottam along with Sangamyug. It is correct that you definitely have to forget. Hm? It is the human beings only who commit mistakes. Deities do not commit mistakes. So, if you become deities, then you will become free from mistakes. But when the pictures are formed, then they are supervised, observed 2, 4, 5, 7 times. They have to be shown lest any mistake is committed. Then, the thought of 5-5, 6-6 also doesn’t occur in it. Later, they simply come because these words are main. What? What? Purushottam Sangamyug. And everyone has to write this. In all the pictures. Wherever it is required you should write this Purushottam Sangamyug because it is you alone who understand its meaning also. There are ordinary Confluence Ages. Confluence of the Golden Age and Silver Age; Confluence of Silver Age and Copper Age; Confluence of Copper Age and Iron Age. Hm? And this is Purushottam Sangamyug. One does not become Purushottam (highest among the human beings) in those confluences. You undergo further decline.

So, nobody else will learn this meaning as to what is Purushottam Sangamyug? He said what is this? There are Purushottam months. Purushottam Sangamyug? So, one cannot derive any meaning of the Purushottam month. Hm? Yes, it will be said that this is also a memorial. It is because there is Purushottam Age also and there is also a month to become Purushottam. And there is a Purushottam moment of becoming Purushottam. So, it must have happened some time, which is why the memorial is celebrated as the Purushottam month. So, the meaning of Purushottam should come to the intellect that this is a memorial of which time? Just as you make a list of festivals. So, this is also a festival of Confluence Age that is celebrated. And actually this festival is very high. What? Is it very high? So, then its memorial should be there in other religions as well. Is it there? Hm? Is it there or not? Yes, Muslims also celebrate. What? What do they celebrate every year? One complete month. Ramjaan. They name it the month of Raamjaan. Ram is our life (jaan) because he is very high, isn’t he? It will be said that the Confluence Age is also highest.

So, you children know this Purushottam Sangamyug. You know that now we all are becoming numberwise Purushottam in this Age. Hm? We are becoming the highest on high men. Higher than whom? Hm? Highest when compared to whom? Hm? Higher than the souls which will come and play their part in the world of hell. And higher than the souls with fewer celestial degrees who will play their part in the world of heaven. It will be said like this, will it not be? So, you are highest of high, Purushottam. So, then what will be said? You are richest of rich as well. Rich in what aspect? Hm? Here in the Confluence Age you become rich in the gems of knowledge. Then, in the broad drama these very gems of knowledge will become physical gems. So, it will be sung that we are number one, highest on high, richest of rich, highest on high. What? Hm? Belonging to which religion? Hm. Other religions are all numberwise. We are highest on high number one. Muslims call it Allah Avvaldeen.

Number one. When do you become? When inundation (pralai) is to take place, then we become highest on high. But they have uttered this word pralai. Pra means in a special manner; lai means to merge. But pralai does not take place in a way that the world merges permanently. But those people have depicted pralai. What? When pralai took place then these are number one. Hm? Who? Who are number one after pralai? The ones who are called Purushottam; what do you call? Whom do you call Purushottam? Hm? Now the topic of this Ram has been mentioned, hasn’t it been? So, some say ‘Maryadas Purushottam’, don’t they? Then they say Purushottam for Narayan. But they do not know that the Narayan who is called perfect in 16 celestial degrees, completely non-violent, Maryadas Purushottam, there is someone higher than them who gives birth to them. They do not know that topic as to where do the number one emerge from? Do the people of the world know? Hm? They will depict Krishna in the ocean. The Krishna perfect in 16 celestial degrees. Hm? They will show Lakshmi-Narayan perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age.

So, they do not know as to where they start from. Where do they come from? They say ‘number one’. What do they say? Where was he visible? Hm? Where is he ‘number one’? Yes, Purushottam is okay. Purushottam. Where was he visible? It is said ‘on a fig (peepal) leaf in the ocean’. He came licking his thumb very comfortably on a fig leaf. Hm? What is the meaning? They do not know the meaning. It has struck your intellect. This is about the ocean of knowledge. Hm? Yes. When inundation takes place, when everyone dies by drowning in the inundation, hm, then that soul; which inundation? Physical or the inundation of the water of knowledge? Hm? Inundation in water of knowledge takes place. Everyone sinks in that, becomes blind. So, in the end, in the ocean, in the ocean of knowledge, that too on a fig leaf; hm? Arey? Is the fig leaf first or is there any leaf even before that fig leaf? Hm? Is there anyone or not? What? Arey! Fig tree was mentioned. The leaves of the fig tree shake a lot. Hm? It is said that ghosts and devils reside on it. On what? Hm? On the fig. So, people fear a lot that if they go and spit or urinate near the fig tree, then the ghosts will enter in them.

So, they do not know as to which tree is more important than the fig tree? Hm? It is shown as the banyan tree (vat vriksh). Hm? Banyan tree (bargad ka vriksh). Bar. Bar means big tree. In the world, it is the world tree itself which is the biggest tree. Hm? So, then are the leaves of the world tree shaky or despite any amount of wind; their twig is thick; hm? What? Their remembrance like twig does not shake. It is thick as well as small. What? So, there is no question of the leaf shaking at all. So, they have shown on the fig leaf. Actually, that is a fig leaf, which has been called; it has even been said in the scriptures – Peepal paat saris man dola (the mind wavered like a fig leaf). What? This manua, the mind, O Manua! The child started wavering like a fig leaf. Arey! And when you show a child on a fig leaf, and when the leaf shakes in the high tides of the ocean, then will that child not shake? Hm? Will it not shake? Arey! Who is the child? Hm? Who is that child? Is he a child or has grown into a youth?
(Someone said something.) Yes, Krishna is a child. So, that child Krishna on the fig leaf; (Someone said something.) Confluence Age Krishna? Hm? Arey? Is the Confluence Age Krishna sitting on the fig leaf taking its support? Hm? Do they think of the Confluence Age Krishna or the Golden Age Krishna? It is about the Golden Age. They think that he is the first and foremost one. He is the first and foremost soul of this world tree.

So, actually it is about that Moon which is shown to be incomplete. What? Somene is a small child and someone is a full moon. What is the difference? Once the Moon becomes full, it has more light. It will be said that it is perfect in 16 celestial degrees. And when a child is small how can he be perfect in 16 celestial degrees? How will he be called Maryadas Purushottam (highest among human beings in following the code of conduct)? How will he know as to what is Maryadas (code of conduct)? So, that is actually about Jagdamba. Jagdamba like Mother Earth, hm, whose child is the Moon, isn’t it? The memorial of the Moon is also depicted in the sky, isn’t it? Hm? So, it is a satellite of which planet? Hm? It is said that it is a satellite of the planet Earth. It means that it is a child of Earth, born from the Earth. It separated. So, it is depicted that in that ocean; who? The fig leaf which shakes a lot. It shakes every moment. Faith-doubt, faith-doubt. Take for example, a boat. And when the tides are high the boat also shakes. People say – Arey, it is about to sink. So, nobody knows as to who is the boatman of that boat? He is the highest on high enabler (kartaar). So, Jagdamba like fig tree and on its first leaf; who? Child Krishna suckling the thumb. It means that the same soul of the Moon of knowledge Brahma, when it assumes the form of Jagdamba, Mahakali, then the Moon is depicted on her forehead, isn’t it?

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 10 Apr 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2688, दिनांक 02.11.2018
VCD 2688, Dated 02.11.2018
प्रातः क्लास 20.9.1967
Morning Class dated 20.9.1967
VCD-2688-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.58
Time- 00.01-14.58


प्रातः क्लास चल रहा था - 20.9.1967. बुधवार को पहले पेज के अंतिम लाइनों में बात चल रही थी – आज के मनुष्यों को, दुनिया में जो भी मनुष्य मात्र हैं, हँ, उनको उत्तम पुरुष कहेंगे, मध्यम पुरुष कहेंगे या कनिष्ठ, नीच कहेंगे? कनिष्ठ माने? नीच पुरुष कहेंगे। क्या कहेंगे? कनिष्ठ कहेंगे। तो वो जो कनिष्ट हैं सो पुरुषोत्तम बनते हैं। क्या? जो नीच मनुष्य हैं वो क्या बनते हैं? हँ? पुरुषोत्तम। पुरुषों में उत्तम बनते हैं। अच्छा! पुरुष माने क्या है? आत्मा। शिव सुप्रीम सोल को आत्मा कहें कि न कहें? आत्मा है कि नहीं? आत्मा है। तो उसको पुरुषोत्तम नहीं कहेंगे? क्यों? पुरुष माने आत्मा। आत्माओं में उत्तम नहीं है? क्यों? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। उसका कम्परिज़न किसी के साथ नहीं कर सकते। वो तो तुरीया है। क्या? हँ? तो इस सृष्टि पर जो भी मनुष्य मात्र हैं, उनमें नंबरवार नीच होंगे ना। कि एक जैसे? नंबरवार नीच होंगे।

तो सबसे नीच कौन? हँ? अरे, कोई तो सबसे नीच होगा। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा सबसे नीच आत्मा? अरे, ब्रह्मा नामधारी तो बहुत हैं। कौनसा ब्रह्मा सबसे नीचा है? जो पूछा जा रहा है सो बताओ। सबसे नीचा कौन? सबसे ऊंच। ये नहीं पूछा सबसे ऊँच कौन बनते हैं? ये पूछा सबसे नीच कौन है? फिर सबका जवाब (किसी ने कुछ कहा।) प्रजापिता। हाँ। जो सबसे ऊँच था, जो 500-700 करोड़ जो भी प्रजा है मनुष्य मात्र उनमें जो सबसे ऊँच था कभी इस सृष्टि पर, हँ, बना था ना। कब बना था? इस कल्प में बना था, इस चतुर्युगी में बना था कि इससे पहले ही बन गया था? इससे पहले ही बन गया था। शूटिंग हुई थी ना। रिहर्सल हुई थी ना पूरे ब्रॉड ड्रामा की, चारों सीन की, चारों युगों की।

तो उस समय जो शूटिंग कराने वाला एम.डी. है ना, मैनेजिंग डायरेक्टर, वो आता है इस स्पेशल। अब वो 24 घंटे इस सृष्टि पर रहेगा मैनेजिंग डायरेक्टर, सृष्टि बनाने का जो कारखाना है ना, नई सृष्टि बनाने का। तो 24 घंटे चढ़ा रहेगा या थोड़े टाइम के लिए आता है? हँ? थोड़े टाइम के लिए आता है। बाकि जो और असिस्टैंट हैं, ऐसे थोड़ेही कि एक ही डायरेक्टर होता है। और भी तो डायरेक्टर होते हैं ना। तो उनमें कोई चीफ भी होगा। हँ? तो वो आता है और इस सृष्टि पर किसी को चीफ डायरेक्टर बनाता है। हँ? इस दुनिया में डायरेक्टर, डायरेक्टिंग करने वाले तो बहुत हैं। हँ? और सतयुग में जैसे 16 कला संपूर्ण कृष्ण, जिसको संगम में ब्रह्मा कह दिया, हँ, और उन द्वापर में कौन? इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, ये हैं ना। तो अपनी-अपनी जेनरेशन को कंट्रोल करते हैं ना। डायरेक्टर हैं ना। तो उन सब डायरेक्टर्स के बीच में जो मुख्य डायरेक्टर हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, हँ, लंबा-लंबा पार्ट बजाने वाला, तो उसको चुनते हैं। क्यों उसको क्यों चुनते हैं? हँ? दूसरों को क्यों नहीं चुना? अरे भई, जो सबसे जास्ती नीच बनेगा उसको अगर सुधार लिया, हँ, तो फिर? बाकि सब? अपने आप सुधर जाएंगे।

तो बताया कि इस सृष्टि पर जो कनिष्ट मनुष्य हैं नीच। हैं नंबरवार ना। तो सबसे नीच ते नीच, तुमने तो सही बताया कि प्रजापिता। तो वो प्रजापिता सबसे नीच बनता है। कैसे कहें नीच बनता है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। कहते हैं वो बुद्धि जो है वो हज़ार नियामत है। मनुष्य के पास सबसे बड़ी ताकत कौनसी है? बुद्धि। हज़ार नियामत है। तो अंतिम जनम में वो पत्थरबुद्धि बन जाता है। क्या? और आत्माओं के मुकाबले। और आत्माएं भी होती हैं पत्थरबुद्धि। ऐसे नहीं कि वो ही अकेला है। लेकिन औरों के मुकाबले वो सबसे जास्ती पत्थरबुद्धि बन जाता है। तो नीच हुआ कि ऊँच हुआ? क्या कहेंगे? नीच ही कहें। मनुष्य, सारी मनुष्य सृष्टि की दृष्टि में तो नीच ही हुआ ना। लेकिन सुप्रीम सोल बाप तो हर आत्मा के अनेक जन्मों की हिस्ट्री जानता है कि नहीं? हाँ।

तो वो इस सृष्टि पर आता है तो वो तो जानता है। क्या? कि वास्तव में इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कौनसी आत्मा रूपी बैटरी है जो कभी सबसे जास्ती पावरफुल थी। हँ? पावरफुल बैटरा होता है ना। बैटरी कि बैटरा? वो अंग्रेजी में क्या कहते हैं उसको? हँ? अंग्रेजी में कुछ कहते हैं उसको स्पेशल।
(किसी ने कुछ कहा।) जेनरेटर तो जेनरेट करता है। जेनरेटर जो है वो तो ऊर्जा को जनरेट करता है, बनाता है। लेकिन जिसमें बैटरी सबसे जास्ती भरी रहती है उसको क्या कहते हैं बड़ा बैटरा को? कुछ कहते हैं कि नहीं? अरे? कुछ कहते हैं तुमको मालूम नहीं है। ऐसा भी तो बैटरा (होता)। देखो, आजकल छोटे-छोटे सैल निकलते हैं ना। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। पावर स्टेशन। हाँ। कुछ न कुछ तो कहते होंगे। ये भी दो अक्षर, दो शब्द हैं। पावर, फिर स्टेशन। नहीं, कोई एक शब्द भी होगा। पता नहीं। कोई बात नहीं। डिक्शनरी तो बहुत बड़ी होती है ना। सारी डिक्शनरी तो किसी को याद नहीं होती। तो (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, बैटरी बैंक। अच्छा? ये जो बैटरी बैंक आजकल निकाली हैं उनमें तो बहुत (थोड़ी), बार-बार उन्हें फिर जेनरेटर से चार्ज करते रहो। ये, ये तो खास नहीं है। लेकिन जिस बैटरी में, आत्मा रूपी बैटरी है ना बेहद की, तो उसमें सबसे जास्ती, हँ, जेनरेटर जो है वो पावर भरे, ऊर्जा।

तो वो जानता है कि ज्यादा ताकत कौनसी में है बैटरी में ज्यादा भरने की। भई जैसे रंगमंच होता है ना। तो पात्र होते हैं। ऊँचे ते ऊँचा पात्र होता है हीरो पार्टधारी। तो ऐसे ही, हँ, कलियुग के अंत, सतयुग के आदि में संगम में, पुरुषोत्तम संगम में जब भगवान बाप आते हैं सुप्रीम सोल गॉड फादर तो वो उस बैटरी को चुनते हैं जो बिल्कुल खाली हो जाती है। थोड़ा सा कहीं अंशमात्र कहने के लिए कि हाँ, भई बुद्धि है तो, ऐसा तो नहीं कि बुद्धि नहीं है क्योंकि बुद्धि ही नहीं होगी तो तो जानवर कहा जाएगा। हँ? क्या कहा जाएगा? हँ। और बुद्धि है और फिर उल्टे-उल्टे काम कर रहा है, बहुत उल्टे काम करेगा तो कहेंगे जानवर से भी बदतर है। है ना।

तो इस दुनिया के जितने भी मनुष्य मात्र हैं उनमें सबसे नीच मनुष्य, हँ, किसके आधार पर? बुद्धि के आधार पर। बताया ना बुद्धि हज़ार नियामत है। हँ? और वो हज़ार नियामत मिलती किससे है? हँ? जानते तो सब होंगे कि जो जन्म लेते ही हर आत्मा को, मनुष्य को बुद्धि मिलती है वो बुद्धि कहाँ से लेकर आया? कहेंगे पूर्वजन्मों से लेकर आया। हजार नियामत माना, नियामत माना सबसे बड़ा खज़ाना। उससे बड़ा खजाना कोई चीज और दुनिया में होता ही नहीं। क्या? बुद्धि का खजाना बहुत बड़ा होगा तो वो दुनिया में कोई न कोई खजाना होगा वो भी अपनी बुद्धि की ताकत से अपने अन्डर में कर लेगा। तो बुद्धि का बड़े से बड़ा खजाना, बड़े से बड़ा कहेंगे तो फिर वो टैली करना हो गया। और शिव बाप को किसी से टैली कर सकते हैं? कर सकते हैं? हँ? शिव बाप को नहीं कहना चाहिए कि बड़े ते बड़ा खजाना। वो तो, ओहो, अखूट भंडार है। उसमें (से) सारा खजाना निकाल लो तो भी सारा ज्यों का त्यों बचता है।

तो वो आता है, जानता है कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, हाँ, कौनसी आत्मा रूपी बैटरी, कौनसी पात्र है, हँ, ड्रामा में पात्र होते हैं ना फिल्मों में, तो कोई पात्र उन्हें सिखाया जाता है तो बहुत होशियार हो जाते हैं। तो वो बैटरी, वो पात्र चुन लेता है। अब कोई बड़ा पात्र, कोई छोटा पात्र। बड़े से बड़े पात्र को दुनियावाले कहते हैं हीरो पार्टधारी। हँ? तो वो जानता है कि हीरो किसे कहा जाता है। चार सीन ड्रामा के हैं उसमें एक ही सीन में पार्ट बजाए, बाकि तीन सीन में पार्ट ही न बजाए तो हीरो कहा जाएगा? नहीं। हीरो माने आदि से लेकरके और बस वो हीरो है। हँ? आलराउंड पार्टधारी है। आलराउंड पार्टधारी माने जो भी सृष्टि का चक्कर है ना सृष्टि रूपी ड्रामा का उसमें सारे में पार्ट बजाता है। ऐसे नहीं पूरा पार्ट बजाया और कहीं एक जगह आके रुक जाए। नहीं। वो, हँ, चक्कर, बड़ा भारी घनचक्कर है। दुनिया नहीं जानती। तो वो बाप ने बताया। क्या? कल बताया ना इस दुनिया में जो भी मनुष्य हैं वो सब कनिष्ट हैं। नंबरवार तो हैं। तो उन कनिष्टों में से उस कनिष्ट को पकड़ा। किसको? हाँ, जो सबसे जास्ती नीच, सबसे जास्ती पत्थरबुद्धि बन जाता है। उसको, वो सर्वोत्तम बनते हैं। क्या? वो जानता है सृष्टि के आदिकाल में कौन सबसे ऊँच था, कौन सबसे पावरफुल पात्र था, बैटरी थी, जो बड़ी पावरफुल बैटरी बन जाती है, सर्वोत्तम बनते हैं। सर्वोत्तम का मतलब ही है सबसे जास्ती उत्तम। टैली किया गया ना। तो उनको कहते हैं सर्वोत्तम। पुरुषोत्तम।

A morning class dated 20.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last lines of the first page was – Today’s human beings, all the human beings in the world, will they be called best human beings (uttam purush), medium human beings (madhyam purush) or degraded, lowly (kanishth, neech)? What is meant by kanishth? They will be called lowly human beings. What will they be called? They will be called lowly. So, those who are lowly become Purushottam (highest among all the human beings). What? What do the lowly human beings become? Hm? Purushottam. They become highest among the souls (purush). Achcha! What is meant by purush? Soul. Will the Supreme Soul Shiv be called a soul or not? Is He a soul or not? He is a soul. So, He will not be called Purushottam? Why? Purush means soul. Is He is not highest among the souls? Why? Hm?
(Someone said something.) Yes. A comparison cannot be made between him and anyone. He is unique (turiya). What? Hm? So, all the human beings in this world will be numberwise lowly, will they not be? Or will they be alike? They will be numberwise lowly.

So, who is lowliest? Hm? Arey, someone must be lowliest. Hm?
(Someone said something.) Is Brahma the lowliest soul? Arey, there are many with the name Brahma. Which Brahma is lowliest? Tell whatever is being asked. Who is the lowliest? Highest. It is not asked as to who become highest? It was asked as to who is the lowliest one? Then everyone’s reply (Someone said something.) Prajapita. Yes. The one who was highest, the one who was highest among all the 500-700 crore subjects, human beings in this world; he had become, hadn’t he? When did he become? Did he become in this Kalpa, in this chaturyugi (cycle of four Ages) or had he become before that? He had become before that itself. Shooting had taken place, hadn’t it? Rehearsal of the entire broad drama, all the four scenes, all the four Ages had taken place.

So, at that time, the M.D., the Managing Director, who causes the shooting, comes in a special manner. Well, will that Managing Director remain in this world for 24 hours a day; the factory to make the world, the new world; so, will he sit there for 24 hours a day or does He come for some time? Hm? He comes for some time. As regards the other Assistants; it is not as if there is only one Director. There are other Directors as well, aren’t there? So, someone will also be a chief among them. Hm? So, He comes and makes someone a Chief Director in this world. Hm? There are many Directors in this world who ‘direct’. Hm? And just as Krishna, perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age, who has been called Brahma in the Confluence Age, hm, and who are in the Copper Age? There are these Ibrahim, Buddha, Christ, aren’t they? So, they control their individual generations, don’t they? They are Directors, aren’t they? So, among all those Directors, the main Director on this world stage, who plays a long, long part, He chooses him. Why does He choose him? Hm? Why did He not choose others? Arey brother, if you reform the one who becomes lowest, then? Then all others? They will reform automatically.

So, it was told that the lowly human beings in this world; they are numberwise, aren’t they? So, you told rightly that Prajapita is the lowliest one. So, that Prajapita becomes the lowliest one. How can it be said that he becomes lowly? Hm?
(Someone said something.) Yes. It is said that the intellect is the biggest gift (hazaar niyaamat). Which is the biggest strength of the human beings? Intellect. It is the biggest gift. So, he develops a stone-like intellect in the last birth. What? In comparison to other souls. Other souls also have a stone-like intellect. It is not as if he is the only one. But when compared to others he develops the most stone-like intellect. So, is he lowly or high? What will be said? He will be called lowly only. In the eyes of the human beings, in the eyes of the entire human world he is lowly only, isn’t he? But the Supreme Soul Father knows the history of many births of every soul, doesn’t He? Yes.

So, He comes to this world; so, He knows. What? That actually which is that soul-like battery on this world stage which was most powerful at point in time. Hm? There is a powerful battera, isn’t it? Battery or battera? What is it called in English? Hm? It is called something special in English.
(Someone said something.) Generator generates. Generator generates, creates energy. But what is that big battera called which contains the maximum battery? Do you call it something or not? Arey? It is called something. You don’t know. There is one such battera also. Look, now-a-days small cells emerge, don’t they? Hm? (Someone said something.) Yes. Power station. Yes. They must be calling it something or the other. These are also two alphabets, two words. Power and then station. No, there must be one word as well. We don’t know. It doesn’t matter. Dictionary is very big, isn’t it? Nobody remembers the entire dictionary. So, (Someone said something.) Yes, battery bank. Achcha? These battery banks that have been invented recently have to be charged through a generator again and again. This, this is not special. But the battery, the unlimited soul-like battery should be filled with maximum power, energy by the generator.

So, He knows as to which battery has more power to fill up. Brother, just as there is a stage, isn’t it? So, there are actors. The hero actor is the highest actor. So, similarly, in the confluence of the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age, in the Purushottam Sangam, when God, the Father, the Supreme Soul God Father comes, then He chooses that battery which becomes completely empty. A little trace remains for namesake somewhere that yes, brother, the intellect does exist; it is not as if the intellect does not exist because if there is no intellect then he will be called an animal. Hm? What will he be called? Hm. And if there is an intellect and if he is performing opposite tasks, if he performs a lot of opposite tasks, then it will be said that he is worse than an animal. Is it not?

So, the lowliest human being among all the human beings of this world, hm, on the basis of what? On the basis of intellect. It was told that intellect is the biggest gift (hazaar niyaamat). Hm? And from whom do we get that biggest gift? Hm? Everyone must be aware that as soon as every soul, every human being gets birth, it gets an intellect; where did he bring that intellect from? It will be said that he brought it from the past births. Hazaar niyaamat means; niyaamat means the biggest treasure. There is no treasure, nothing bigger than that in the world at all. What? If the treasure of intellect is very big, then he will he will take any treasure in the world under his control with the power of the intellect. So, the biggest treasure of intellect; if you call it biggest of all, then that is like tallying. And how can Father Shiv be tallied with anyone? Can you? Hm? It cannot be said for Father Shiv that He is the biggest treasure. Oho! He is an inexhaustible treasure house. Even if you extract the entire treasure from Him, He is left with the entire treasure as it is.

So, He comes; He knows that who is that soul-like battery, which is that actor on this world stage; hm, there are actors in dramas, films, aren’t there? So, when some actors are taught, they become very clever. So, He chooses that battery, that actor. Well, some actors are big, some actors are small. The biggest actor is called by the people of the world as a hero actor. Hm? So, He knows as to who is called hero. There are four scenes in the drama; if someone plays a part in only one scene and does not play a part in the other three scenes at all, then will he be called a hero? No. Hero means that he is a hero from the beginning to the end. Hm? He is allround actor. Allround actor means that he plays a part in the entire world cycle, the world drama. It is not as if he plays the complete part and then stops at a particular place. No. That is a cycle, a big cycle. The world doesn’t know. So, the Father has told. What? He told yesterday, didn’t He that all the human beings in this world are lowly. They are numberwise, aren’t they? So, He caught hold of that lowly one from among those lowly ones. Whom? Yes, the one, who becomes the lowliest, most stone-like intellect. He becomes the highest. What? He knows as to who was the highest one in the beginning of the world, who was the most powerful actor, battery, who becomes a big powerful battery, becomes highest (sarvottam). Sarvottam means best. He was tallied, wasn’t he? So, he is called Sarvottam (best), Purushottam (highest among souls).

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 12 Apr 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2689, दिनांक 03.11.2018
VCD 2689, Dated 03.11.2018
प्रातः क्लास 20.9.1967
Morning Class dated 20.9.1967
VCD-2689-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.31
Time- 00.01-20.31


प्रातः क्लास चल रहा था - 20.9.1967. बुधवार को तीसरे पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी - विकारी और निर्विकारी जन। विकारी उनको कहा जाता है जो विकार से पैदा होते हैं। वि माने विपरीत; कार माना कार्य। जो कार्य नहीं करना चाहिए उससे पैदा होते हैं। और निर्विकारी अर्थात् विकार की बात ही नहीं। विकार कहा ही जाता है किसी को दुख देना। और ये हिन्दी अक्षर है। और उसमें फिर भई विशियस और वाइसलैस की बात है। विशियस विषय से भरे हुए। और वाइसलैस माना निर्विकारी। तो ये आधा कल्प तुम बच्चे जानते हो कि ये विशियस है। और आधा कल्प निर्विकारी हैं जिन्हें देवताएं कहा जाता है। निर्विकारी हैं तो पूजे जाते हैं। पूजा तो पवित्र की ही होती है। और जब विशियस हैं तो वाइइसलैस तो नहीं कहेंगे क्योंकि रावण राज्य है ना। फिर जब वहाँ वाइसलैस है, निर्विकारी है स्वर्ग में। देखो, गाता है ना विकारी है। तो निर्विकारियों की महिमा करते हैं, पूजन करते हैं।

तो निर्विकारी माना ही वाइसलैस। कोई भी विकार नहीं। तो उनको, उनका जन्म विकार से नहीं होता है। हँ? जो विपरीत कार्य कहा गया श्रीमत के बरखिलाफ उससे उनका जन्म नहीं होता है। तो इस तरह बिल्कुल बाप ने सिद्ध करके समझाया है कि वहाँ स्वर्ग में विकार होता ही नहीं। क्यों नहीं होता है? क्योंकि वहाँ राम राज्य कहा जाता है। वहाँ रावण राज्य होता ही नहीं। रावण माना ही दस सिरों का राज्य। हँ? दुनिया में रावण राज्य में रावण के दस मुख दिखाए जाते हैं ना। तो मुख्य-मुख्य दस धरम हैं। अपनी-अपनी धारणाएं हैं। इनको कहते हैं पांच विकार वाला रावण। और फिर उनकी सहयोगिनी दिखाते हैं मंदोदरी। उदर माने बुद्धि रूपी पेट। मंदबुद्धि है। क्योंकि पांच तत्वों का संघात है ना। इसे देहभान कहते हैं। इसलिए उन रावण को और मंदोदरी को भ्रष्टाचारी कहा जाता है। और इन देवताओं को श्रेष्ठाचारी कहा जाता है। देखो निराकारी; क्योंकि देवताएं निराकारी स्थिति में रहते हैं ना। माना आत्मिक स्थिति में रहते हैं। आत्मा निराकारी होती है ना। तो कहेंगे ये निर्विकारी। और श्रेष्ठाचारी। फिर अभी इस समय में रावण राज्य में कहेंगे भ्रष्टाचारी। आचारी का मतलब ही है आचरण करने वाले। कैसा आचरण करने वाले? भ्रष्ट इन्द्रियों से भ्रष्ट आचरण करने वाले। भ्रष्ट इन्द्रियां कौनसी कही जाती हैं? हँ? ये भ्रष्ट इन्द्रिय जो कही जाती है वो तो मन्दिर में पूजी भी जाती है। हँ? शिवलिंग बनाते हैं ना। नाम क्या दिया? लिंग। तो लिंग की शुमार भ्रष्ट इन्द्रियों में होती है ना फिर। तो फिर उनकी पूजा क्यों होती है? हँ? उनको तो भ्रष्टाचारी नहीं कहेंगे। पूजा होती है माना श्रेष्ठाचारी हैं। हँ? और सबसे जास्ती पूजा होती है माना सबसे बड़ा देवता हैं। कहते ही हैं देव-देव-महादेव। तो वो तो सबसे जास्ती श्रेष्ठाचारी हुए।

तो मूल हुआ विकार। विपरीत कार्य। क्या विपरीत कार्य? अनुकूल कार्य क्या? किसी को दुख देना विपरीत कार्य। और दुख न देना, सिर्फ सुख देना तो अनुकूल कार्य। सुख का भाव, दुख देने का भाव। तो अभी ये भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचारी बन्द कैसे करें? हँ? और ये गोर्मेन्ट तो कहती है कि ये सन्यासी श्रेष्ठाचारी हैं। हँ? क्योंकि इन्होंने तो घरबार ही छोड़ दिया। हँ? बीबी बाल-बच्चे छोड़ दिये। तो ये तो श्रेष्ठाचारी हो गए। अरे! घरबार छोड़ देने से, इन्द्रियों का भ्रष्ट आचरण छोड़ देने से क्या मन पवित्र हो जाता है? हँ? मन में गंदे संकल्प नहीं चलते? विकारी संकल्प तो चलते हैं ना। गीता में तो लिखा हुआ है। और सन्यासी गीता पढ़के भी सुनाते हैं। हँ? उसमें तो, श्लोक में साफ लिखा हुआ है, न हि असंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन्। (गीता 6/2) जिसने संकल्पों का त्याग नहीं किया है वो योगी कैसे हो सकता है? और ये तो फिर भ्रष्ट इन्द्रियों का संकल्प भी करते हैं।

तो समझ में आया अब श्रेष्ठाचार क्या है? हँ? इस दुनिया का वायब्रेशन श्रेष्ठाचारी बनेगा या भ्रष्ट आचरण करने वाला ही बनाएगा? हं? बाप आकरके समझाते हैं। क्या? कि ये भ्रष्ट आचरण क्या होता है और श्रेष्ठ आचरण क्या होता है? भ्रष्ट भाव क्या होता है और श्रेष्ठ भाव क्या होता है? अरे बच्चे, ड्रामा के प्लैन अनुसार ये सबसे भ्रष्टाचारी कहेंगे। हँ? सबसे माने? सबसे माने किससे? हँ? सबसे माने उन देव आत्माओं से भी ज्यादा भ्रष्टाचारी, जो देव आत्माएं देव तो बनते हैं लेकिन कम कला के बनते हैं। और उन देवताओं के मुकाबले जो देवताएं जो भ्रष्ट आचरण में कन्वर्ट होते हैं, दूसरे धर्मों में कन्वर्ट हो जाते हैं, उनको भी तो भ्रष्टाचारी कहेंगे। क्यों? हँ? क्योंकि कन्वर्ट हो गए। प्रभाव में आ गए।

भले सन्यासी हैं। पवित्र रहते हैं। इन्द्रियों से पवित्र रहते हैं। तो जो इन्द्रियों से अपवित्र बनते हैं वो इनको माथा झुकावें। अब माथा नहीं झुकावेंगे तो बिचारे करेंगे ही क्या? क्या कर सकते हैं? घरबार छोड़करके करते क्या हैं? बस उनका एक ये मठ स्थापन हो जाता है। हँ? मठ-पंथ हो जाता है, धरम हो जाता है। अब पवित्र हैं इन्द्रियों से। अब ये तो कायदा है कि पवित्र के आगे कोई भी अपवित्र, जो इन्द्रियों से अपवित्र होते हैं वो मत्था टेकते हैं। बस। सो तो बाबा ने बहुत ही समझाया कि बच्चे, कुमारियां भी तो पवित्र होती हैं। हँ? कुमारियाँ पवित्र होती हैं और उनको तो सन्यासी भी माथा टिकाते हैं। हँ? तो पवित्र के आगे कोई भी अपवित्र माथा टेकते हैं। क्या मतलब हुआ? कन्याओं को कुछ अनुभव ही नहीं है विकार का। तो उनके अन्दर संकल्प भी विकार के नहीं चलते हैं। तो संकल्प से भी पवित्र हो गए ना। इसलिए फिर सन्यासी भी माथा झुकाते हैं क्योंकि वो कन्याएं तो जब तक कन्याएं हैं तब तक निर्विकारी हैं। मन से भी निर्विकारी और तन की इन्द्रियों से भी निर्विकारी। तो ये बात तो समझते हो ना बच्चे।

तो यही बातें सुनकरके नॉलेज ये तो तुम्हारी बुद्धि में 84 जन्मों की नॉलेज बैठी होगी। क्या? जो 84 जन्म हैं उनमें पहला-पहला जनम कहाँ होता है? हँ? बताओ। हँ? पहला-पहला जनम संगम में नहीं, पुरुषोत्तम संगमयुग में। क्या? सबका नहीं होता है। सब देवताओं का भी नहीं होता है। किनका होता है? हँ? जो देवताएं 16 कला संपूर्ण कहे जाते हैं, उनको जन्म देने वालों का। है ना? पुरुषोत्तम संगमयुग में कहेंगे उनका 84 में से पहला जनम। अव्वल नंबर जनम। हाँ। तो जिन्होंने ऐसा जनम लिया है, ऐसा तुम्हारी बुद्धि में है। और उनकी बुद्धि में नहीं आता है। तुम्हारी बुद्धि में तो अच्छी तरह से बैठेगा। हँ? ऐसे नहीं कि बुड्ढियों को नहीं बैठेगा। हँ? वो बुड्ढियों को भी बैठी होगी कि हमारा 84 जन्म पूरा हुआ। माना ये नहीं समझना कि बुड्ढियाँ वो वैकुण्ठ वाले जनम में नहीं जा सकती हैं, जो सतयुग से भी पहले होता है पुरुषोत्तम संगमयुग में। हँ? वो तो सतयुग है। और वो? संगमयुग। संगमयुग में भी कौनसा? पुरुषोत्त्म संगमयुग। तो 84 जन्म पूरा हुआ। तो अब हम जाते हैं घर। क्योंकि ड्रामा का आखरी सीन अब पूरा होता है। हम घर जाते हैं। तो ड्रामा पूरा होता है तो घर जाते हैं ना। हँ? कि रंगमंच पर ही बैठे रहते? नहीं। घर जाते हैं। पीछे फिर आएंगे स्वर्ग में। हँ? क्या पार्ट बजाने के लिए? सुख का पार्ट बजाने के लिए सुख की दुनिया का सुख लेने के लिए आएंगे।

अभी हमारा है स्वर्ग में पार्ट। तो वहाँ स्वर्ग में भी कौनसा दर्जा पाएंगे? वहाँ भी स्वर्ग में दर्जे हैं दर्जे। क्या? क्या दर्जा? हँ? वो सतयुग में जनम होंगे न ज्यादा। त्रेता में और ज्यादा जनम होंगे। तो दर्जे बन गए ना। जितने जनम नीचे उतरते जाएंगे सीढ़ियाँ नीचे उतरेंगी उतना और दर्जा नीचे चला जाएगा। तो देखना है कि हमारी आत्मा कौनसे दर्जे में जाएगी? हँ? नीचे दर्जे में जाएगी या ऊँचे ते ऊँचे दर्जे में जाएगी? निशानी क्या होगी? हँ? ऊँचे ते ऊँचा जो दर्जा बताया पुरुषोत्तम संगमयुगी जनम का श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ जनम। और देवताओं के नंबरवार जनम। हँ? नंबरवार जनम माने कोई का ऊँचा दर्जा, कोई का नीचा दर्जा। तो पहचान क्या होगी? यहाँ संगमयुग में क्या पहचान होगी? हँ?


(किसी ने कुछ कहा।) आत्मिक स्थिति? अच्छा? वो तो सतयुग में भी आत्मिक स्थिति होगी और वैकुण्ठ में भी आत्मिक स्थिति होगी। अंतर क्या हुआ? हँ? सतयुग में जो नीचा दर्जा पाएंगे त्रेता में भी जो नीचा दर्जा पाएंगे उनकी आत्मिक स्थिति नहीं होगी? अरे? होगी कि नहीं होगी? (किसी ने कुछ कहा।) पवित्रता? अरे, जो नीचा दर्जा पाएंगे वो भी पवित्र रहेंगे। (किसी ने कुछ कहा।) नष्टोमोहा? अरे। अरे, स्वर्ग में तो चाहे नीचा दर्जा पाने वाले हों, चाहे ऊँचा दर्जा पाने वाले, सब नष्टोमोहा होते हैं। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) ज्ञान? अच्छा? तो सतयुग में नीचा-ऊँचा दर्जा पाने वाले होते हैं ना। हँ? उनमें ज्ञान नहीं होता है। क्या ज्ञान नहीं होता है? ज्ञान का सार होता है कि नहीं? अरे! जब मक्खन होता है तो वो तो दूध की क्या जरूरत? मक्खन तो और जल्दी ही पचेगा ना। (किसी ने कुछ कहा।) पहचान नहीं होती? किसकी पहचान? हँ? सतयुग के पहले जनम में जो ऊँचा दर्जा पाएगा सतयुग में और सतयुग के आखरी जनम में जो नीचा दर्जा पाएगा उनको पहचान नहीं होगी? हँ? होगी कि नहीं होगी? (किसी ने कुछ कहा।) जैसे को याद करेंगे वैसे बनेंगे। वो तो आत्मा को याद करते हैं सतयुग में। त्रेता में भी आत्मा को याद करते हैं। नीचे, ऊँचे कैसे बनेंगे? उसकी निशानी संगमयुग में क्या देखने में आती है? हँ? क्या निशानी देखने में आती है? हँ?

ये लो। ये किसी को पता ही नहीं? अरे! जो बाप को पहचान करके और फिर भाग जाते हैं, दूसरे-दूसरे ग्रुप में चले जाते हैं तो कन्वर्ट हो गए ना। तो नीचा दर्जा हो गया कि ऊँचा दर्जा हुआ? हँ? नीचे दर्जे में चले गए। तो ये भागंती वाले सारे नीचे दर्जे के हो गए। सतयुग के पहले जनम में जो आएंगे उनको क्या कहेंगे? हँ? उनका नीचा दर्जा कहेंगे स्वर्ग वालों में, रहने वालों में नीचा दर्जा होगा या स्वर्ग में तो आएंगे लेकिन ऊँचे दर्जे में ही आएंगे। नीचे नहीं जाएंगे।

A morning class dated 20.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the third page on Wednesday was – Vicious and viceless people. Those who are born through vices (vikaar) are called vicious (vikaari). Vi means vipreet (opposite); kaar means task (kaarya). They are born through the task that should not be performed. And viceless means that there is no question of vice at all. Vice means causing sorrows to someone. And this is a Hindi word. And in that [English] there is a topic of vicious and viceless. Vicious, those who are filled with vices. And viceless means devoid of vices (nirvikaari). So, you children know that these are vicious for half a Kalpa. And they are viceless for half a Kalpa who are called deities. When they are viceless, they are worshipped. It is the pure ones only who are worshipped. And when they are vicious, they will not be called viceless because it is a kingdom of Ravan, isn’t it? Then, when you are viceless, devoid of vices (nirvikaari) in the heaven; look, man sings that he is vicious. So, they praise, worship the viceless ones.

So, nirvikaari itself means viceless. There is no vice. So, they are not born through vice (vikaar). Hm? They are not born through the task that is said to be opposite, against the Shrimat. So, in this manner, the Father has proved and explained that there is no vice at all there in heaven. Why doesn’t it exist? It is because it is called the kingdom of Ram there. The kingdom of Ravan does not exist there at all. Ravan itself means the kingdom of ten heads. Hm? Ten heads of Ravan are shown in the kingdom of Ravan in the world, aren’t they? So, there are ten main religions. They have their own inculcations. He is called Ravan with five vices. And then his helper is shown to be Mandodari. Udar means the intellect-like stomach. She has a dull intellect. It is because it is a combination of five elements, isn’t it? This is called body consciousness. This is why that Ravan and Mandodari are called unrighteous. And these deities are called righteous. Look incorporeal; it is because deities remain in an incorporeal stage, don’t they? It means that they remain in a soul conscious stage. The soul is incorporeal, isn’t it? So, it will be said these viceless. And righteous. Then, now at this time in the kingdom of Ravan, they will be called unrighteous (bhashtaachaari). Aachaari itself means those who act. What kind of action do they perform? They act in an unrighteous manner through the unrighteous organs. Which organs are called unrighteous organs? Hm? This organ which is called unrighteous organ is even worshipped in the temple. Hm? Shivling is sculpted, isn’t it? What is the name coined? Ling. So, then ling (phallus) is counted among the unrighteous organs, isn’t it? So, then why is it worshipped? Hm? He will not be called unrighteous. He is worshipped means that he is righteous. Hm? And he is worshipped more than anyone else means that he is the biggest deity. He is called Dev-Dev-Mahadev (highest among all deities). So, he is the most righteous one.

So, the root is vice (vikaar). Vipreet kaarya (opposite task/act). Which opposite task? What is acceptable (anukool) task? To give sorrows to someone is an opposite task. And not giving sorrows, giving just happiness is an acceptable task. The attitude of giving happiness, the attitude of giving sorrows. So, how can now the unrighteous ones stop this unrighteousness? Hm? And this government says that these Sanyasis are righteous. Hm? It is because they have renounced the household itself. Hm? They have left the wife and children. So, they are righteous. Arey! Does the mind become pure by leaving the household, by leaving the unrighteous act of the organs? Hm? Doesn’t the mind create dirty thoughts? Vicious thoughts emerge, don’t they? It has been written in the Gita. And the Sanyasis also read out the Gita. Hm? It has been written clearly in it, in a shloka (verse) – na hi asanyastasankalpo yogi bhavati kashchan. (Gita 6/2) How can the one who hasn’t renounced his thoughts be a yogi? And these then create thoughts about unrighteous organs as well.

So, did you now understand as to what is righteousness? Hm? Will the vibration of this world become righteous or will it make the behavior unrighteous? Hm? The Father comes and explains. What? That what is unrighteous act and what is righteous act? What is unrighteous attitude and what is righteous attitude? Arey, children, as per the plan of the drama, these will be called the most unrighteous ones. Hm? What is meant by ‘most’? ‘Most’ means when compared to whom? Hm? ‘Most’ means more unrighteous than those deity souls who do become deity souls but become ones with fewer celestial degrees. And when compared to those deities, the deities who convert to unrighteous acts, convert to other religions, they will also be called unrighteous. Why? Hm? It is because they converted. They were influenced.

Although there are sanyasis. They lead a pure life. They remain pure through organs. So, those who become impure through organs should bow their heads before them. Well, if they don’t bow their heads what will those pure ones do? What can they do? What do they do by leaving their households? That is it; their math (sect) is established. Hm? Math-panth (sect) is established, religion is established. Well, they are pure through organs. Well, it is a rule that any impure one, those who become impure through organs bow their heads before the pure ones. That is it. Baba has explained a lot that children, virgins are also pure. Hm? Virgins are pure and even the Sanyasis bow their heads before them. Hm? So, any impure one bows his head before the pure one. What is the meaning? Virgins do not have any experience of vice at all. So, they do not get any thought of vice. So, they are pure even through thoughts, aren’t they? This is why the Sanyasis also bow their heads because as long as those virgins are virgins, they are viceless. Viceless through the mind also and viceless through the organs of the body also. So, children you understand this topic, don’t you?

So, by listening to these very topics, the knowledge of 84 births must have sit in your intellect. What? Where does the first birth among the 84 births take place? Hm? Speak up. Hm? The first and foremost birth is not in the Confluence Age, but in the elevated Confluence Age (Purushottam Sangamyug). What? Everyone doesn’t get. All the deities also don’t get. Who get? Hm? It is those who give birth even to the deities perfect in 16 celestial degrees, isn’t it? Their first birth among the 84 births will be said to be in the Purushottam Sangamyug. Number one birth. Yes. So, those who have taken such birth; that is in your intellect. And it does not occur in their intellect. It will sit very nicely in your intellect. Hm? It is not as if it will not sit in the intellect of the aged ladies. Hm? Even those aged ladies must have understood that we have completed 84 births. It means that do not think that aged ladies cannot get birth in Vaikunth, which is even before the Golden Age, in the Purushottam Sangamyug. Hm? That is Golden Age. And that? The Confluence Age. What even in the Confluence Age? Purushottam Sangamyug. So, 84 births are over. So, now we go home. It is because the last scene of the drama is now about to be over. We go home. So, when the drama ends, then we go home, don’t we? Hm? Or do you continue to sit on the stage? No. You go home. Later you will come to heaven. Hm? To play what part? You will come to play the part of happiness, to obtain happiness in the world of happiness.

Well, our part (role) is in heaven. So, which grade will you achieve even in the heaven? There are grades even there in heaven. What? What grade? There will be more births in the Golden Age. There will be even more births in the Silver Age. So, grades were created, weren’t they? The more the number of births you go down, when you climb down the Ladder, the grade will become lower. So, you have to check as to which grade my soul will achieve? Hm? Will it achieve lower grade or highest on high grade? What is the indication? Hm? The highest on high grade was said to be the highest on high birth of the Purushottam Sangamyugi birth. And the deities have numberwise births. Hm? Numberwise birth means some have a high grade, some have a low grade. So, what will be the indication? What will be the indication in the Confluence Age? Hm?


(Someone said something.) Soul conscious stage? Achcha? The soul conscious stage will be there in the Golden Age as well as in Vaikunth. What is the difference? Hm? Will not those who achieve a lower grade in the Golden Age and those who achieve a lower grade in the Silver Age also remain in a soul conscious stage? Arey? Will they or will they not be? (Someone said something.) Purity? Arey, those who achieve a lower grade will also remain pure. (Someone said something.) Detached? Arey? Arey, be it those who achieve a lower grade or be it those who achieve a higher grade in the heaven, all are detached. Hm? (Someone said something.) Knowledge? Achcha? So, there are those who achieve lower or higher grade in the Golden Age, aren’t there? Hm? They don’t have knowledge. What knowledge do they not have? Do they have the essence of knowledge or not? Arey! When they have the cream then where is the need for milk? Cream can be digested more quickly, can’t it be? (Someone said something.) Don’t they recognize? Recognize whom? Hm? The one who achieves a higher grade in the Golden Age and the one who achieves a low grade in the last birth of the Golden Age, will they not recognize? Hm? Will they recognize or not? (Someone said something.) You will become like the one whom you remember. They remember the soul in the Golden Age. They remember the soul in the Silver Age also. How will they become low and high? What is their indication in the Confluence Age? Hm? What is their indication? Hm?

Look. Doesn’t anyone know? Arey! Those who recognize the Father and then run away, go to other groups, so they converted, didn’t they? So, is their grade low or high? Hm? They went to the lower grade. So, all these who run away belong to the lower grade. What will those who come to the first birth of the Golden Age be called? Hm? They will be said to belong to the lower grades among the residents of heaven, their grade will be low or they will come to heaven but they come to the higher grade only. They will not go down.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11897
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 14 Apr 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2690, दिनांक 04.11.2018
VCD 2690, Dated 04.11.2018
प्रातः क्लास 20.9.1967
Morning Class dated 20.9.1967
VCD-2690-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.49
Time- 00.01-16.49


प्रातः क्लास चल रहा था - 20.9.1967. बुधवार को तीसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि सुप्रीम सोल बाप इतना पार्ट बजाय करके भक्तिमार्ग का और इस ज्ञानमार्ग का, फिर शान्ति में बैठ जाते हैं। हँ? पार्ट बजाते? भक्तिमार्ग का पार्ट बजाते? हँ? बजाते हैं? हाँ, भक्तिमार्ग में भक्तों को साक्षात्कार कराते हैं। बाकि शूटिंग पीरियड में भक्तिमार्ग कराते हैं क्या? हँ? नहीं कराते? साक्षात्कार नहीं कराते हैं? साक्षात्कार कराना भक्तिमार्ग या ज्ञानमार्ग? हँ? भक्तिमार्ग। तो कब तक कराते हैं भक्तिमार्ग की शूटिंग? हँ? अरे, कब तक कराते हैं? बताओ भाई। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 76 तक कराते हैं। हाँ। इतना पार्ट माना 40 साल का पार्ट भक्तिमार्ग का बजाय करके और फिर ज्ञान मार्ग का पार्ट। माना ज्ञान सुनाने करने का पार्ट बजाय करके फिर शांति में बैठते। ये ड्रामा में बाबा का पार्ट है। हँ? बाबा खुद बैठके कहते हैं। बच्ची मेरा पार्ट ये ड्रामा में भक्तिमार्ग में और इस ज्ञान मार्ग में मेरा ये पार्ट नूंधा हुआ है जो एक्ट में आता है। एक्ट में कहाँ आता है? हँ? ज्ञान मार्ग में एक्ट में आता है कि भक्तिमार्ग में एक्ट में आता है? हँ? ज्ञान मार्ग में भी एक्ट में आता है। और भक्तिमार्ग में भी जिनको साक्षात्कार होता है तो एक्ट में तो वो आते हैं ना। हँ। अभी मेरा पार्ट नूंधा हुआ है। अभी संगमयुग में। सो एक्ट में आता है।

ये विश्व को फिर से चेंज करने का पार्ट है। भक्तिमार्ग में तो नहीं चेंज करते हैं। कहाँ चेंज करते हैं? ज्ञानमार्ग में चेंज करते हैं। नया बनाना। हँ? किसको नया बनाना? सारे विश्व को नया बनाना। इसलिए मेरे ऊपर नाम भी ऐसे पड़े हुए हैं। क्या? नाम काहे के आधार पे पड़ते हैं? काम के आधार पर नाम पड़ते हैं। तो क्या काम किया? हँ? ऐसे माना कैसे नाम पड़े हुए हैं? हँ? हँ? भारत में खास क्या नाम है? हँ? विश्व को नया बनाने के संबंध में बाबा का क्या नाम है? हँ? अरे! अरे! विश्वनाथ नाम है ना। सारे विश्व को नाथ लिया ना। हँ? सारे विश्व की नाक में नथनिया डाल दी कि नहीं डाल दी? अरे! मेरा पार्ट है कि नहीं? हँ? है? सारे विश्व के नाक में नथनिया डाल दी? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) डालेंगे आगे। अभी नथनिया डाली थोड़ेही है? अभी तो हम स्वतंत्र हैं मनमाने काम करेंगे, बोलेंगे। हँ? है ना। अभी हम थोड़ेही किसी की सजनिया-पजनिया बनेंगे। हँ? पुरुष कोई सजनिया बनते हैं? मैं पुरुष हूँ। हँ? लेकिन अंग्रेजी में नाम बहुत अच्छा है। क्या नाम है? हैविनली गॉड फादर। क्या? कैसा गॉड फादर? हैविन बनाने वाला गॉड फादर। अच्छा! हैविन स्थापन करते हैं। करते हैं? हँ? कौन करते हैं? कौनसी आत्मा हैविन स्थापन करती है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) शिवबाबा स्थापन करते हैं। शिवबाबा में कितनी आत्माएं हैं? (किसी ने कुछ कहा।) दो आत्माएं हैं। वो कहते हैं तीन आत्माएं हैं। अच्छा तीन भी आत्माएं हैं। लेकिन हैविन कौन स्थापन करते हैं? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) राम वाली आत्मा। हं? हैविन कौन स्थापन करते हैं तीन में से? हँ? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) नारायण वाली आत्मा। वाह भाई। हँ? अरे! अपने हमजिन्स का ही नाम लो। (किसी ने कुछ कहा।) लक्ष्मी वाली आत्मा। तीनों बातें बता दो। अच्छा।

हैविनली गॉड फादर वास्तव में क्या राम स्थापन करते हैं? हँ? क्या नारायण स्थापन करता है? अरे, नारायण को नारायण बनाया किसने, हँ, जो स्वर्ग में नारायण बनता है? हँ? या वैकुण्ठ में भी नारायण बनता है? बनाया किसने? वो भूल गए। अच्छा! तो कौनसी आत्मा है जो हैविन स्थापन करती है? असल में कौनसी आत्मा है?
(किसी ने कुछ कहा।) शिव? कैसे? अच्छा, ये नहीं तो वो, वो नहीं तो वो, वो नहीं तो वो। अच्छा, शिव ही सही। तो बताओ कैसे? हँ? शिव कैसे? हँ? शिव तो निराकार है। साकार में आकर क्या करता है? साकार में आकर क्या करता है? वो तो अकर्ता है। क्या करता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) नर से नारायण बनाता है? अच्छा, नारायण का काम के आधार पर नाम पड़ गया कि नार माने ज्ञान जल और अयन माने घर। ज्ञान जल में रहता है तो नारायण नाम पड़ गया। सारी सृष्टि को परिवर्तन करता है शिव निराकार। परिवर्तन करता है? सारी सृष्टि को? कि एक को परिवर्तन करता है? अरे! हँ? सारी सृष्टि का परिवर्तन करता है? (किसी ने कुछ कहा।) साकार में? साकार। वो तो ठीक है साकार में बिन्दी, बिन्दी कैसे फुदुक-फुदुक के करेगी कुछ भी? बोलेगी कैसे? ज्ञान भी सुनाएगी तो कैसे सुनाएगी? हँ? लेकिन वो जो हैविन बनाती है वो सारी सृष्टि को हैविन बनाती है क्या? सुप्रीम सोल? बनाती है? अरे! न हां न। बनाती है? हँ? नीचे जाएगी तब बनाएगी। कहाँ नीचे पाताल में जाएगी? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) भारत को? अच्छा? भारत को तो माता कहा जाता है। हँ? अरे! माता बड़ी या पिता बड़ा? हँ? ज्यादा गिरता कौन है? नीचे कौन गिरता है? पिता गिरता है। तो फिर माता क्यों बताय दिया भारत माता? भारत पिता तो कोई नहीं कहता। कोई कहता है भारत पिता? कोई नहीं कहता। (किसी ने कुछ कहा।) एक को परिवर्तन करके उसके बहाने सबका भला करता है। चलो। हाँ।

बताया, कि वो शिव सुप्रीम सोल जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करता है उसको ही ये तुम्हारा समझाता है कि ये तुम्हारा हैविन भी है, सुखधाम भी है, बाप भी है और क्या-क्या है? टीचर भी है। और सद्गति करने वाला सद्गुरु भी है। वो एक में सब कुछ है। क्या? दुनिया की कोई ऐसी बात नहीं जो तेरे पर लागू न होती हो। तेरे पर माने उस एक के ऊपर। तो हैविनली गॉड फादर यानि बाप हैविन स्थापन करते हैं। तो जिन क्रिश्चियन्स ने, अंग्रेजों ने बोला हैविन स्थापन करते हैं, उनकी बुद्धि में हैविन कौन है बैठा हुआ? उनकी बुद्धि में है कि हाँ, एक बाप भी है, टीचर भी है, सद्गुरु भी है, तुम्हारा सुखधाम, हैविन भी है। उनकी बुद्धि में है? नहीं। बिल्कुल नहीं। अर्थात् क्रियेटर है। क्रियेशन। क्रियेटर और क्रियेशन साकार होती है कि निराकार? साकार होती है। तो, तो जिसमें प्रवेश करता है वो साकार होता है या सिर्फ निराकार होता है? हँ? साकार होता है। उसको निराकारी स्टेज में स्थिर कराया जाता है। पर है तो साकार ना। ऐसे तो नहीं कि साकार शरीर छूट जाता है। जैसे और आत्माओं का साकार शरीर इस सृष्टि पर विनाश काल में छूट जाता है महाविनाश में तो क्या वो एक का भी छूट जाता है? नहीं, वो तो बीज है। बीज का विनाश तो होता ही नहीं। तो उस बीज में प्रवेश करके उसको क्रियेटर बनाता है। किसका क्रियेटर है? हँ? रचता किसका है? क्रियेटर किसका क्रियेटर है? हँ? भई रचता
(किसी ने कुछ कहा।) ज्ञान का क्रियेटर है? हँ? ज्ञान तो निराकार होता है। निराकार तो निराकारी ज्ञान देगा। निराकारी ज्ञान सुनाएगा। हँ? क्रियेटर साकार होता है या निराकार होता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, साकार होता है। तो ज्ञान कैसे? ज्ञान क्रियेट करेगा? साकार? अरे? ज्ञान तो निराकार होता है। निराकार को निराकार ही क्रियेट करेगा। निराकार आत्मा उसकी पहचान निराकार ही देगा। और ज्ञान भी निराकार देगा। तो साकार सृष्टि है तो उसका क्रियेटर कौन? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जिसको कहते हैं आदम, आदि पुरुष, आदि देव। हँ।

तो कहेंगे भई स्वरग का रचयिता है। काहे का रचयिता? स्व ग। स्व माने आत्मा और ग माने कहाँ गया? ग - कहाँ गया? ग माने गया। कहाँ गया? स्वर्ग में गया? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, आत्मिक स्थिति? अच्छा? आत्मिक स्थिति का ज्ञान सबने लिया नहीं अभी? अभी कोई आत्मिक स्थिति में कोई नहीं जा रहा है? अरे? कोई नहीं जा रहा? (किसी ने कुछ कहा।) याद? एक जा रहा है। और बाकि सब देह भान में? पक्का कर लिया? हँ? जमी जुम्मद में जुम्मद, गुल मुहम्मद। (किसी ने कुछ कहा।) बाप की असली पहचान? अच्छा? असली पहचान बनाती है स्वर्ग? माना असली पहचान ही नहीं हुई किसी को? चलो, ब्रह्माकुमारियों को नहीं हुई। वो तो कहती हैं बिन्दी। और बिन्दी तो क्रियेटर नहीं हो सकती। बिन्दी तो साकार नहीं है। बिन्दी तो निराकार है। वो तो निराकारी ज्ञान सुना सकती है। अकूट ज्ञान का भंडार दे सकती है। लेकिन जिसको अकूट ज्ञान का भंडार देती है वो नंबरवार हैं कि एक जैसे हैं? हँ? नंबरवार हैं ना। तो उनमें जो अव्वल नंबर है, जिसको मुसलमान भी कहते हैं अल्लाह अव्वलदीन। अल्लाह माने ऊँचे ते ऊँचा। तो ऊँचे ते ऊँचा इस दुनिया की बात है या कोई वो जो कहते हैं अर्श, हँ, रूहानी दुनिया, वहाँ की बात है? नहीं।

तो वो निराकार बाप शिव निराकारी ज्ञान देता तो सबको है। एक जैसा ही देता है लेकिन जो सबसे जास्ती उठाता है, हँ, और वो ही जास्ती प्रैक्टिकल में सिर्फ सुनने, सुनाने, समझने, समझाने से काम होता है क्या? प्रैक्टिकल में स्थिर भी हो जाए। स्थिर होना माने? क्या स्थिर होना? कि आत्मिक स्थिति में सदाकाल के लिए चला जाए। लो। ऐसे नहीं कि आधे घंटे बैठे हैं, एक घंटे बैठे और फिर कितनी याद रही बिन्दी की? हँ? थोड़ी सी। थोड़ी सी रही न रही, मिनट, दो मिनट, आधा घंटा। आधा घंटा हो जाए तो फिर वो भी बहुत बड़ी बात। तो वो जब लगातार निराकारी स्टेज में चला जाए तो क्या कहेंगे? स्व ग। कहाँ गया? स्व माने आत्मा, ग माने कहाँ गई? आत्मिक स्थिति में गई। तो बाप कहते हैं किसका रचयिता है? भई स्वरग का रचयिता है।

A morning class dated 20.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the third page on Wednesday was that the Supreme Soul Father plays such part of the path of Bhakti and the path of knowledge and then sits in silence. Hm? Does He play a part? Does He play the part of the path of Bhakti? Hm? Does He play? Hm? Yes, He causes visions to the devotees on the path of Bhakti. As regards the shooting period, does He cause the path of Bhakti in it? Hm? Doesn’t He cause? Doesn’t He cause visions? Is causing visions path of Bhakti or path of knowledge? Hm? Path of Bhakti. So, until when does He cause the shooting of the path of Bhakti? Hm? Arey, until when does He cause? Speak up brother. Hm?
(Someone said something.) He causes till 76. Yes. So much part means He plays the part of the path of Bhakti of 40 years and then plays the part of the path of knowledge. It means that He plays the part of narrating the knowledge and then sits in silence. This is Baba’s part in the drama. Hm? Baba Himself sits and tells. Daughter, this part of Mine is fixed in this drama on the path of Bhakti and the path of knowledge, which comes into act. Where does it come into act? Hm? Does it come into act on the path of knowledge or does it come into act on the path of Bhakti? Hm? It comes into act on the path of knowledge as well. And even on the path of Bhakti, those who have visions, so, He comes into that act, doesn’t He? Hm. Now My part is fixed. Now in the Confluence Age. So, that comes into act.

This is a part to change the world once again. He does not change [the world] on the path of Bhakti. Where does He change? He changes on the path of knowledge. To make it new. Hm? To make what new? To make the entire world new. This is why I have been given such names. What? What is the basis of coining names? The names are coined based on the tasks performed. So, what was the task performed? Hm? ‘Such [names]’ refers to what kind of names? Hm? Hm? What is the name especially in India? Hm? What is Baba’s name in relation to making the world new? Hm? Arey! Arey! There is the name ‘Vishwanath’, isn’t it? He controlled the entire world, didn’t He? Hm? Did He put the nose-ring in the nose of the entire world or not? Arey! Is it my part or not? Hm? Is it? Did He put the nose ring in the nose of the entire world? Hm?
(Someone said something.) He will put in future. Has the nose ring been put now? Now we are free; we will act, we will speak as we wish. Hm? Is it not? We will not become anyone’s wife (sajaniya) now. Hm? Does a man become a wife? I am a man. Hm? But the name in English is very good. What is the name? Heavenly God Father. What? What kind of God Father? God Father who makes heaven. Achcha! He establishes heaven. Does He? Hm? Who establishes? Which soul establishes heaven? Hm? (Someone said something.) ShivBaba establishes. How many souls are there in ShivBaba? (Someone said something.) There are two souls. That one says there are three souls. Achcha, there are three souls as well. But who establishes heaven? Hm? (Someone said something.) The soul of Ram. Hm? Who establishes heaven among the three? Hm? Arey? (Someone said something.) The soul of Narayan. Wow brother! Hm? Arey! Utter the name of your humjins (peer group). (Someone said something) The soul of Lakshmi. Tell all the three. Achcha.

Does the heavenly God Father, does Ram actually establish? Hm? Does Narayan establish? Arey, who made Narayan as Narayan, the one who becomes Narayan in heaven? Hm? Or the one who becomes Narayan in Vaikunth as well? Who made him? You forgot that. Achcha! So, which soul establishes heaven? Which soul is it in reality?
(Someone said something.) Shiv? How? Achcha, if not this, then that; if not that, then that; if not that, then that. Achcha, be it Shiv only. So, tell how? Hm? How Shiv? Hm? Shiv is incorporeal. What does He come and do in corporeal form? What does He come and do in corporeal form? He is non-doer (akarta). What does He do? Hm? (Someone said something.) Does He make Narayan from nar (man)? Achcha, Narayan’s name was coined on the basis of the task performed that naar means the water of knowledge and ayan means home. He lives in the water of knowledge; so he got the name Narayan. Incorporeal Shiv transforms the entire world. Does He transform? The entire world? Or does He transform one? Arey! Hm? Does He transform the entire world? (Someone said something.) In corporeal form? Corporeal. That is correct that how will the point do anything in corporeal form by jumping around? How will it speak? Even if it has to narrate knowledge how will it narrate the knowledge? Hm? But the one who establishes heaven, does He transform the entire world into heaven? The Supreme Soul? Does it make? Arey! Neither ‘yes’ nor ‘no’. Does it make? Hm? It will make when it goes down. Where will it go? To the nether world underground? Hm? (Someone said something.) Bhaarat? Achcha? Bhaarat is called mother. Hm? Arey! Is the mother elder or the Father elder? Hm? Who suffers more downfall? Who suffers downfall? The Father suffers downfall. So, then why was the mother described as Mother India? Nobody utters Father India. Does anyone say Father India? Nobody says. (Someone said something.) He transforms one and through him He causes the benefit of everyone. Okay. Yes.

It was told that the one in whom that Supreme Soul Shiv enters in a permanent manner, He explains that this is your heaven also, abode of happiness also, Father also and what all is he? He is a teacher as well. And he is the Sadguru also who causes sadgati (true salvation). He is everything in one. What? There is nothing in the world which is not applicable to you. ‘On you’ means on that one. So, Heavenly God Father, i.e. the Father establishes heaven. So, the Christians, the Britishers who said that He establishes heaven, who is sitting in their intellect as heaven? Is it in their intellect hat yes, one is Father also, teacher also, Sadguru also, he is your abode of happiness, heaven also? Is it in their intellect? No. Not at all. It means that he is the Creator. Creation. Is the Creator and creation corporeal or incorporeal? It is corporeal. So, so, is the one in whom He enters corporeal or just incorporeal? Hm? He is corporeal. He is made to become constant in the incorporeal stage. But he is corporeal, isn’t he? It is not as if the corporeal body is lost. Just as other souls lose their corporeal body in this world during the period of mega destruction, so, does that one also loses? No, he is the seed. The seed is not destroyed at all. So, He enters in that seed and makes him the creator. Whose creator is he? Hm? Whose rachata (creator) is he? Whose creator is the creator? Hm? Brother creator
(Someone said something.) Is he the creator of knowledge? Hm? Knowledge is incorporeal. The incorporeal will give incorporeal knowledge. He will narrate incorporeal knowledge. Hm? Is the creator corporeal or incorporeal? Hm? (Someone said something.) Yes, he is corporeal. So, how does he give knowledge? Does he create knowledge? Corporeal? Arey? Knowledge is incorporeal. Incorporeal will only create incorporeal. The incorporeal will only give the introduction of the incorporeal soul. And the knowledge that He gives will also be incorporeal. So, when the world is corporeal, then who is his creator? Hm? (Someone said something.) Yes, the one who is called Aadam, Aadi Purush, Aadi Dev. Hm.

So, it will be said that brother, he is the creator of heaven. Creator of what? Swa Golden Age. Swa means soul and Golden Age means ‘where did he go’? Golden Age means gaya (went). Where did he go? Hm?
(Someone said something.) Yes, soul conscious stage? Achcha? Hasn’t everyone obtained the knowledge of soul conscious stage now? Isn’t anyone reaching the soul conscious stage now? Arey? Isn’t anyone reaching? (Someone said something.) Remembrance? One is reaching. And are the rest in body consciousness? Are you sure? Hm? Jami jummad me jummad, gul mohammad. (Someone said something.) True introduction of the Father? Achcha? Does the true introduction make the heaven? Does it mean that nobody has had the actual realization? Okay, Brahmakumaris did not have. They say ‘point’ (bindi). And the point cannot be a creator. Point is not corporeal. Point is incorporeal. It can narrate incorporeal knowledge. It can give the inexhaustible storehouse of knowledge. But the one to whom it gives the inexhaustible storehouse of knowledge, are they numberwise or alike? Hm? They are numberwise, aren’t they? So, the one who is number one among them, whom the Muslims also called Allah Avvaldeen; Allah means highest on high. So, is highest on high a topic of this world or is it about Arsh, the spiritual world? No.

So, that incorporeal Father Shiv does give incorporeal knowledge to everyone. He gives equally but the one who grasps the most and inculcates the most in practical. Is the task accomplished just by listening, narrating, understanding or explaining? He should also become constant in practical. What is meant by becoming constant? To make what constant? He should achieve the soul conscious stage forever. Look. It is not as if we sit for half an hour, we sit for one hour and then for how long do we remember the point? Hm? A little. It remained a little for a minute, two minutes, half an hour. It is a big achievement even if it is for half an hour. So, when he achieves that incorporeal stage continuously, then what will it be said? Swa Golden Age. Where did he go? Swa means soul, Golden Age means ‘where did it go’? It went into the soul conscious stage. So, the Father says – Whose creator is he? Brother, he is the creator of heaven.

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

Post Reply

Who is online

Users browsing this forum: No registered users and 21 guests