Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 31 Dec 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
VCD-2387-extracts-Hindi

समय- 00.01-12.02
Time: 00.01-12.02


आज का रात्रि क्लास है – 1.12.1966. पूज्य बना दिया ये पुजारी से। यह भी बताओ। बताओ, कब बना दिया पुजारी से पूज्य? न सतयुग में, न त्रेता में, न द्वापर में, न कलियुग में। अभी कलियुग के अंत और सतयुग आदि के संगम पर जिसका यादगार है भक्तिमार्ग में पुरुषोत्तम संगमयुग। पुरुष माने आत्मा। और आत्माओं में उत्तम। पूज्य 16 कला सम्पूर्ण। ... किसी ने किसी के बारे में कुछ कहा। बोला – ज़ंज़ीर में अच्छी फंसी हुई है बिल्कुल। कौनसी ज़ंज़ीर में? (किसी ने कहा – विकार।) गुरुओं की ज़ंज़ीर में फंसी हुई है। और यहाँ तो पहले ही बताया जाता है कि इन कलियुगी गुरुओं को छोड़ो। ये कलह कलेश कराने वाले गुरू हैं। इसलिए बताया – ये है रूहों का बाप। रूहानी स्टेज धारण करने वाले बच्चों का बाप। और ये रूहानी स्टेज रूहानी यात्रा से ही बन सकती है। ये कलियुगी गुरू तो जिस्मानी यात्रा सिखाने वाले हैं। ये रूहानी यात्रा नहीं सिखाय सकते। क्यों नहीं सिखाय सकते? (किसी ने कुछ कहा।) वो गुरू जो हैं वो सब अपन को जिसम समझते हैं। और दूसरों को भी जो यात्रा कराते हैं वो जिस्मानी यात्रा कराते। तो वो जिस्मानी यात्रा में जाकरके उनको पूजते हैं। पुजारी बनकरके पूजते हैं।

तो देखो पूजा करने के लिए ही जाते हैं ना। हँ? शिव की पूजा करेंगे। पार्वती की पूजा करेंगे। शायद गणेशजी की भी करते होंगे वहाँ मन्दिर में जाकर। और यहाँ है ये पूज्य ते पूज्य। जो सबका पूज्य है। सबका माने? देवात्माओं का भी पूज्य है, मनन-चिंतन-मंथन करने वाले मनुष्यों का भी पूज्य है। और जो मन-बुद्धि का उपयोग भी नहीं करते, ऐसे जानवर जैसे राक्षसों का भी पूज्य है। भक्तिमार्ग में गाया हुआ है। कौन है? हँ? जिसे राक्षस भी मानते हैं, देवताएं भी मानते हैं, ये है। ये माने कौन? किसकी तरफ इशारा किया?
(किसी ने कहा – नारायण की तरफ।) नारायण को भी तो बनाने वाला कोई है नर से नारायण? (किसी ने कहा – शिवबाबा।)

तो ये है कहकरके किसकी तरफ इशारा किया? ये है पूज्य ते पूज्य। (किसी ने कहा – साकार में निराकार है।) साकार में निराकार 1966 में है पूज्य ते पूज्य? पुरुषार्थी है? पुरुषार्थ करने वाला है नर से नारायण बनने का या पूज्य ते पूज्य है? पुरुषार्थी है तो कोई पुरुषार्थ कराने वाला है। जो ब्रह्मवाक्य वेदवाणी मुरली में बोला हुआ भी है। शिवबाबा है पुरुषार्थी, शिवबाबा है पुरुषार्थ कराने वाला। तो कौनसा शिवबाबा? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। सम्पूर्ण स्टेज की बात बताई। वर्तमान पुरुषार्थी की बात नहीं बताई। और इशारा किया शिवलिंग की ओर जो पूज्य है। और वही आत्मा फिर पुजारी भी बनती है। पहला-पहला पूज्य? और फिर? पहला-पहला पुजारी।

कौन है पहला-पहला पुजारी?
(किसी ने कुछ कहा।) द्वापर के आदि में पहला-पहला पुजारी कौन है? (किसी ने कहा – विक्रमादित्य।) विक्रमादित्य। (किसी ने कहा – उसका भी बाप है...) विक्रमादित्य पहला-पहला पूज्य तो नहीं है। क्योंकि विक्रमादित्य तो विकारी राजा है और विकारी राजाएं जानते हैं कि हम विकारी हैं। तो जिन ब्राह्मणों को निर्विकारी समझते हैं, उनको मंत्री, महामंत्री के रूप में रखते हैं या गुरू के रूप में रखते है। तो उनके लिए कौन पूज्य हुआ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। तो वो है सबका पूज्य। और पूज्य ते पूज्य। इसलिए दिखलाते हैं ना। क्या दिखलाते हैं? अरे मन्दिरों में यादगार दिखलाते हैं ना। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, सोमनाथ के मन्दिर में सबसे पहले दिखाते हैं। असली सात्विक यादगार। अभी लिंग सबके आगे है। अभी माने? जैसा ब्रॉड ड्रामा में, पार्ट बजता है, वैसा ही रिहर्सल भी होती है संगम में। कब रिहर्सल होती है? अभी। अभी माने? कलियुग के अंत और सतयुग के आदि में लिंग सबके आगे है।

Today's night class is dated 1.12.1966. You were transformed from worshippers (pujaari) to worshipworthy (poojya). Tell this also. Tell, when were you transformed from worshippers to worshipworthy? Neither in the Golden Age, nor in the Silver Age; neither in the Copper Age, nor in the Iron Age. Now at the confluence of the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age; Its memorial is available on the path of Bhakti as Purushottam Sangamyug. Purush means soul. And best among souls. Worshipworthy, perfect in 16 celestial degrees…. Someone said something about someone. It was told - It (the soul) is completely entangled in chains. In which chain? (Someone said - Vice.) It is bound in the chains of Gurus. And here it is already told that leave these Iron Age Gurus. They are the Gurus who create quarrels and disputes. This is why it was told - This is the Father of souls. The Father of the children who develop spiritual stage. And this spiritual stage can be formed only through spiritual journey. These Iron Age gurus teach physical journey. They cannot teach spiritual journey. Why cannot they teach? (Someone said something.) All those Gurus consider themselves to be bodies. And the pilgrimage that they enable others to perform is also a physical pilgrimage. So, they go on that physical pilgrimage and worship them. They become worshippers and worship.

So, look, they go only to worship, don't they? Hm? They worship Shiva. They worship Parvati. Perhaps they go to the temple there and worship Ganeshji as well. And here is it the most worshipworthy one who is worshipworthy for everyone. What is meant by 'everyone'? He is worshipworthy for the deity souls also, He is also worshipworthy for the human beings who think and churn. And He is worshipworthy for the animal like demons also who do not use their mind and intellect. He is praised on the path of Bhakti. Who is it? Hm? The one who is believed by the demons as well as the deities. It is this one. 'This one' refers to whom? Towards whom was a gesture made?
(Someone said - Towards Narayan.) Is there anyone who transforms even Narayan from a man (nar) to Narayan? (Someone said - ShivBaba.)

So, towards whom was a gesture made by uttering the words 'this one'? This one is most worshipworthy. (Someone said - The incorporeal within the corporeal.) Is the incorporeal within the corporeal most worshipworthy in 1966? Is he a purusharthi (effort-maker)? Does He enable others to become Narayan from nar (man) or is He the most worshipworthy one? He is purusharthi. So, there is someone who enables him to make purusharth. There is a Brahmvaakya (Godly sentence) spoken in the Vedvani Murli. ShivBaba is purusharthi; ShivBaba is the one who enables others to make purusharth. So, which ShivBaba? (Someone said something.) Yes. The topic of perfect stage was mentioned. A topic of the present purusharthi was not mentioned. And a gesture was made towards the Shivling which is worshipworthy. And the same soul then becomes a worshipper as well. First and foremost worshipworthy? And then? First and foremost worshipper.

Who is the first and foremost worshipper?
(Someone said something.) Who is the first and foremost worshipper in the beginning of the Copper Age? (Someone said - Vikramaditya.) Vikramaditya. (Someone said - He is his Father as well…) Vikramaditya is not the first and foremost worshipworthy because Vikramaditya is a vicious king and the vicious kings know that they are vicious. So, the Brahmins, whom they consider to be viceless are kept in the form of a Minister, Prime Minister or in the form of a Guru. So, who is worshipworthy for them? (Someone said something.) Yes. So, He is worshipworthy for everyone. And the most worshipworthy one. This is why it is shown, is not it? What is shown? Arey, a memorial is shown in the temples, is not it? Hm? (Someone said something.) Yes, it is shown first of all in the temple of Somnath. The true pure memorial. Now the ling is before everyone. What is meant by 'now'? As is the part played in the broad drama, so is the rehearsal that takes place in the Confluence Age. When does the rehearsal take place? Now. What is meant by 'now'? The ling is before everyone in the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2388-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.20
Time: 00.01-13.20


आज का प्रातः क्लास है – 30.3.1967. आत्मा ही भाग्यशाली बनती है। और आत्मा ही दुर्भाग्यशाली बनती है। किसके द्वारा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) कर्म के आधार पर? कर्म कौन सिखाता है? कर्म, अकर्म, विकर्म की गति कौन बताता है? (किसी ने कहा – शिवबाप।) शिव बाप को तो मुख ही नहीं है। उसको तो शरीर ही नहीं है। बताएगा कैसे? (किसी ने कहा – शिव बाप।) शिव बाप? (किसी ने कहा – शिवबाबा।) हाँ। शिव बाप निराकार आत्माओं का निराकार बाप है। निराकार बाप से तो निराकारी ज्ञान का वर्सा ही मिलता है। और भाग्य? सिर्फ निराकारी ज्ञान से ही बनता है या कोई और भी है जिसके द्वारा आत्मा भाग्यशाली बनती है? मीडिया तो चाहिए ना। नहीं चाहिए? तो मीडिया कौन होना चाहिए? कौन होता है?

यहाँ भाग्यशाली और दुर्भाग्यशाली की बात हो रही है। धनवान होगा तो धनवान बनाएगा। ज्ञानवान होगा तो ज्ञानवान बनाएगा। जमीनदार होगा तो जमीनदार बनाएगा। खुद ही नहीं होगा तो दूसरों को बनाएगा क्या? नहीं बनाएगा। तो भाग्यशाली कौन बनाता है? और फिर दुर्भाग्यशाली कौन बनाता है? कहेंगे आत्मा के कर्म ही भाग्यशाली बनाता है और आत्मा का कर्म ही दुर्भाग्यशाली बनाता है। तो वो कर्म की गति प्रैक्टिकल में सिखाने वाला कौन? हँ? जो भाग्यशाली और दुर्भाग्यशाली बने। शिव बाप तो प्रैक्टिकल सिखाय नहीं सकता। क्योंकि वो तो निराकार आत्माओं का निराकार बाप है।

वो तो साफ कहता है मैं त्रिकालदर्शी हूँ। परन्तु मैं मास्टर त्रिकालदर्शी नहीं हूँ। तो फिर मास्टरी हासिल करने वाला कौन? अरे? बताया तो है तुम बच्चे हो नम्बरवार मास्टर त्रिकालदर्शी। तो भी कर्म, अकर्म, विकर्म की प्रैक्टिकल मास्टरी जिसे कहें थ्योरिकल, थ्योरिटिकल मास्टर नहीं सिर्फ। इसके साथ-साथ प्रैक्टिकल में करके दिखाने वाला भी। क्योंकि थियोरी में कोई पास होता है और प्रैक्टिकल में फेल होता है तो क्या माना जाता है? फेल माना जाता है। तो वो प्रैक्टिकल में भाग्यशाली कौन? जो सबको भाग्यशाली बनाए? शिव बाप। सच्चाई का रास्ता बताता है। जिसको कहते हैं सत्य ज्ञान। उस सत्य ज्ञान से ही सतयुग स्थापन होता है। सत्वप्रधान दुनिया बनती है। परन्तु वो आत्माओं का निराकार बाप तो अकर्ता है या कर्ता है? तो जो स्वयं अकर्ता है वो तो प्रैक्टिकल में न कोई को भाग्यशाली बनाय सकता है न कोई को? दुर्भाग्यशाली बनाय सकता है। तो क्या करता है वो?
(किसी ने कहा – मार्ग बताता है।) हाँ।

जो गीता में बोला है अर्जुन से – अर्जुन की तरफ इशारा किया। इदम् शरीरं कौन्तेय। और? क्षेत्रम इति अभिधीयते। (गीता 13/1) हे अर्जुन! तुम्हारा यह जो शरीर है वो कर्म, अकर्म, विकर्म, सिखाने का, प्रैक्टिकल में करने का क्षेत्र है। क्षेत्र माना खेत। उस खेत में युद्ध भी लड़ा जाता है। युद्ध क्षेत्र है। मूल रूप में कर्मक्षेत्र भी है। जो गीता में पहले ही अध्याय में बोला। क्या? धर्मक्षेत्रे? कुरुक्षेत्रे। इस धर्मक्षेत्र में और कुरुक्षेत्र में। कैसा धर्मक्षेत्र? जिसमें सब धर्म समाए हुए हैं। जो भी दुनिया में धर्म फैले हुए हैं, सत धर्म से लेकर असत धर्म तक भी। और उन धर्मों के आधार पर उन धर्म के जो प्रणेता गाए हुए हैं, धर्मपिताएं गाए हुए हैं, उनके द्वारा अथवा उनके फालोअर्स के द्वारा। या गद्दीनशीन गुरुओं के द्वारा। धर्म के आधार पर जो कर्म निर्धारित किए गए हैं, हर धरम में अलग-अलग। उन कर्मों के आधार पर भाग्य बनता भी है और भाग्य? बिगड़ता भी है। अब हिस्ट्री में देखा जाए तो धर्म जितने भी हैं दुनिया में वो सभी धर्म इस संसार में सदाकाल रहते हैं या नंबरवार अल्पकाल रहते हैं?
(सबने कहा – नंबरवार।) लेकिन गीता में कहा है नासतेविद्यते भावो, ना भावो विद्यते सतः। (गीता 2/16) जो सत है माना सतधर्म है उसका इस संसार में कभी अभाव नहीं हो सकता। कि आज है और कल न हो। उस धर्म के धर्मखण्ड का भी कभी विनाश नहीं हो सकता। कि आज वो धर्मखण्ड रहे, सत धर्मखण्ड और कल न रहे।

Today’s morning class is dated 30.3.1967. The soul itself becomes fortunate (bhaagyashaali) and the soul itself becomes unfortunate (durbhaagyashaali). Through whom? Hm? (Someone said something.) On the basis of actions? Who teaches actions? Who teaches the dynamics of karma, akarma and vikarma? (Someone said – Father Shiv.) Father Shiv doesn’t have a mouth at all. He doesn’t have a body at all. How will He tell? (Someone said – Father Shiv.) Father Shiv? (Someone said – ShivBaba.) Yes. Father Shiv is the incorporeal Father of the incorporeal souls. One gets only the inheritance of incorporeal knowledge from the incorporeal Father. And fortune? Is it formed on the basis of only the incorporeal knowledge or is there any one else also through whom the soul becomes fortunate? A media is required, isn’t it? Is it not required? So, who should be the media? Who is it?

Here, the topic of fortunate and unfortunate is being discussed. If someone is wealthy he will make others wealthy. If someone is knowledgeable, he will make others knowledgeable. If someone is a landlord, then he will make others landlords. If he himself is not so, then will he make others? He will not make. So, who makes you fortunate? And then who makes you unfortunate? It will be said that the actions of the soul itself makes you fortunate and the actions of the soul itself makes you unfortunate. So, who teaches the dynamics of those actions in practical? Hm? So that someone becomes fortunate and unfortunate? Father Shiv cannot teach in practical because He is the incorporeal Father of the incorporeal souls.

He says clearly that I am Trikaaldarshi (knower of all the three aspects of time, i.e. past, present and future). But I am not Master Trikaaldarshi. So, then who achieves the mastery? Arey? It has bee told that you children are numberwise Master Trikaaldarshi. So, the practical mastery over karma, akarma and vikarma, not just theorical, theoretical master. Along with that one should also be able to show in practical because if someone passes in theory and fails in practical, then what is he considered? He is considered to be fail. So, who is that fortunate one in practical who makes everyone fortunate? Father Shiv. He teaches the path of truth which is called true knowledge. Golden Age is established through that true knowledge. The world becomes satwapradhan (pure). But is that incorporeal Father of the incorporeal souls akarta (non-doer) or karta (doer)? The one who Himself is akarta (non-doer) can neither make anyone fortunate in practical nor can He make anyone unfortunate. So, what does He do?
(Someone said – He shows the path.) Yes.

Arjun was told in the Gita – a gesture was made towards Arjun. Idam shareeram Kaunteya. And? Kshetram iti abhidheeyate. (Gita 13/1) O Arjun! This body of yours is a field to teach karma, akarma and vikarma, of doing in practical. Kshetra means field. War is also fought in that field. It is a battlefield. Basically it is a field of actions (karmakshetra) also. It was told in the first chapter of the Gita itself. What? Dharmakshetre? Kurukshetre. In this Dharmakshetra (field of dharma) and in Kurukshetra (battlefield). What kind of Dharmakshetra? The one in which all the religions are contained. All the religions which are spread all over the world, from the true religion to the untrue religion. And on the basis of those religions, the propounders of those religions who are praised, the founders of the religions who are praised, through them or through their followers or through the gurus seated on the thrones. The actions that have been prescribed on the basis of religion in different religions. On the basis of those actions fortune is formed as well as ruined. Well, if you look at the history, then do all the religions in the world remain forever in this world or do they remain numberwise temporary?
(Everyone said – Numberwise.) But it has been said in the Gita – Naasateyvidyate bhaavo, naa bhaavo vidyate satah. (Gita – 2/16). There can never be lack of truth, i.e. the true religion in this world that it remains today and does not exist tomorrow. The religious land of that religion can never be destroyed that today that religious land, the true religious land exists and does not exist tomorrow.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2389-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.14
Time: 00.01-14.14


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. पहले पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी - आत्मा ही भाग्यशाली बनती है। और आत्मा ही दुर्भाग्यशाली बनती है। भाग्यशाली और दुर्भाग्यशाली बनती है। कौन आत्मा दुर्भाग्यशाली बनना चाहेगी? सभी भाग्यशाली बनना चाहते हैं। फिर बनती कैसे है दुर्भाग्यशाली? भाग्यविधाता तो एक ही गाया हुआ है। भक्तिमार्ग में कहते भी हैं भाग्यविधाता ब्रह्मा ने जब भाग्य बांटा था तो क्या सोए हुए थे? सोए हुए थे माना अज्ञान नींद में थे। क्योंकि ब्रह्मा के मुख से तो वेदवाणी मिलती है। विद माने जानकारी। वेद। जानकारी अर्थात् ज्ञान। सच्चाई का ज्ञान। सत्य क्या है। और जब सत्य की पहचान हो जाती है तो असत्य भी डिक्लेयर हो जाता है। और गीता में तो बताया ही हुआ है सत्य वो है जिसका कभी विनाश नहीं होता।

सत्य अविनाशी है। झूठ विनाशी है। वो चाहे सच्चा धरमपिता हो और चाहे वो देहअभिमानी धरमपिताएं हों, जिनके आने के बाद दुनिया नरक बनती जाती है। क्योंकि नरक नर बनाता है। नर मनुष्य को कहा जाता है। मननात् मनुष्य कहा जाता है। जो मनन-चिंतन-मंथन करता है वो मनुष्य है। नहीं तो जानवर है। और मनुष्य ही भाग्यशाली बनता है। परन्तु दुनिया में, मनुष्य तो कम से कम और ज्यादा से ज्यादा देखे हैं। तो कम से कम, ज्यादा से ज्यादा 500-700 करोड़ तो हैं। तो सारी मनुष्य सृष्टि में सत्य के रूप में स्थायी रहने वाला कोई तो होगा। क्योंकि ये बात पक्की है आत्मा सत्य है। ये देह असत्य है। देह आज है कल नहीं होगी। आत्मा तो अविनाशी है। तो अविनाशी आत्मा का बाप भी अविनाशी। परन्तु आत्माओं का बाप सतधाम का वासी है, सदा सत्य है, क्योंकि वो देह के जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है। जो आत्माएं देह धारण करती हैं और देह के जन्म-मरण के चक्र में आती हैं, वो सदा सतधाम की वासी नहीं हैं। जो सदा सतधाम का वासी है वो ही त्रिकालदर्शी है। तो क्या इस संसार में, जिसे हम स्वर्गलोक या मृत्युलोक कहते हैं, जहाँ देवात्माएं भी रहती हैं, मनुष्यात्माएं भी रहती हैं, और राक्षसी आत्माएं भी रहती हैं, तो इन आत्माओं के बीच में जनम-मरण के चक्र में आने वाला कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो इस संसार रूपी चक्र में सदाकाल रहता हो आत्मिक स्थिति से?

सतधाम का तो नाम ही सत है। उसके असत होने का तो सवाल ही नहीं। और सतधाम में सत आत्माएं ही रहती हैं। पाँच विनाशी जड़ तत्वों की तो बात ही नहीं। क्योंकि वो सतधाम तो तुरीया तत्व है। परन्तु इस संसार को सदा सतधाम नहीं कहा जाता। ये संसार झूठा भी बनता है। झूठखण्ड, जिसे कलियुग कहते हैं। और ये संसार सचखण्ड भी बनता है जिसे सतयुग कहते हैं। क्योंकि ये संसार और इस संसार की हर चीज़ चार अवस्थाओं से जरूर पसार होती है। ऐसी कोई चीज़ नहीं है, ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो सत्वप्रधान, सत्वसामान्य, रजो और तमो से पसार न होता हो। तो क्या तामसी दुनिया से पसार होने के बाद ये दुनिया झूठों के द्वारा सत बनती है? क्योंकि सतधाम का वासी, वो तो सदा सतधाम का वासी है। भले इस तमोप्रधान दुनिया में आता है, तो भी सत की स्टेज में स्थित रहता है। बुद्धि से सतधाम का ही वासी है क्योंकि वो देह से जन्म नहीं लेता। जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता। गर्भ से जन्म नहीं लेता। इसलिए त्रिकालदर्शी है। और सदा त्रिकालदर्शी है। तीनों काल का, भूत का, भविष्य का, वर्तमान का सत ज्ञान उसकी बुद्धि में रहता है। वो सर्वोपरि शुद्ध बुद्धि है। कभी भी बुद्धि मैली नहीं होती। इसलिए उस बुद्धि रूपी आत्मा में सत का ही वास रहता है।


A morning class dated 30.3.1987 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the first page was – The soul itself becomes fortunate. And the soul itself becomes unfortunate. It becomes fortunate and unfortunate. Which soul would like to become unfortunate? All want to become fortunate. Then how does it become unfortunate? The giver of fortune is praised to be only one. It is also said on the path of Bhakti that when the giver of fortune Brahma distributed fortune, then were you asleep? You were asleep, i.e. you were in the slumber of ignorance because Vedvani is received from the mouth of Brahma. Vid means information. Ved. Information means knowledge. The knowledge of truth. What is truth. And when one recognizes the truth, then the untruth is also declared. And it has already been told in the Gita that the truth is one which is never destroyed.

Truth is eternal. Falsehood is perishable. Be it the true founder of religion or be it the body conscious founders of religions, after whose arrival the world becomes a hell because a man (nar) make hell (narak). A human being is called nar. It is said – Mananaat manushya – the one who thinks and churns is a human being (manushya). Otherwise, he is an animal. And the human being himself becomes fortunate. But in the world, there are minimum and maximum number of human beings. So, there are minimum, maximum 500-700 crores. So, there must be someone who remains permanently in the form of truth in the entire human world because it is sure that the soul is true. This body is false. The body exists today; it will not exist tomorrow. The soul is imperishable. So, the Father of the imperishable soul is also imperishable. But the Father of the souls is a resident of the abode of truth, He is forever truth because He does not pass through the cycle of birth and death. The souls which assume the body and pass through the cycle of birth and death of the body are not the residents of the abode of truth forever. The one who is a resident of the abode of truth forever is Trikaaldarshi (knower of the three aspects of time). So, in this world, which we call the abode of heaven or the abode of death, where the deity souls as well as the human souls reside, and the demoniac souls also reside, so, isn’t there any person among these souls which pass through the cycle of birth and death, who remains in this world cycle forever through soul conscious stage?

The name of the abode of truth itself is truth (sat). There is no question of its being untruth (asat). And only true souls live in the abode of truth. It is not about the five perishable non-living elements because that abode of truth is a unique element. But this world is not called the abode of truth forever. This world becomes false as well. The abode of untruth, which is called the Iron Age. And this world becomes the abode of truth as well, which is called the Golden Age because this world and every thing of this world definitely passes through four stages. There is nothing, no living being which does not pass through the stages of satwapradhan, satwasaamaanya, rajo and tamo. So, after passing through this degraded (taamsi) world, does this world become true through false ones? Because the resident of the abode of truth is forever a resident of the abode of truth. Although He comes in this tamopradhan world, yet He remains in the stage of truth. He is indeed a resident of the abode of truth through the intellect because He does not get birth through the body. He does not pass through the cycle of birth and death. He is not born through the womb. This is why He is Trikaaldarshi. And He is forever Trikaaldarshi. The true knowledge of all the three aspects of time, of the past, present and future remains in His intellect. He has a supremely pure intellect. His intellect never becomes dirty. This is why the truth alone resides in that intellect like soul.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
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समय- 00.01-19.32
Time: 00.01-19.32


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. पहले पेज की दूसरी लाइन में बात चल रही थी – जो आत्मा भाग्यशाली बनती है या कोई आत्मा दुर्भाग्यशाली बनती है, तो उसका मूल कारण कहाँ से आता है? हँ? (किसी ने कहा – पिछले जन्मों का कर्म।) मूल कारण लिखा भी है – भई, वेदवाणी में लिख दिया, बोल दिया – भई, यह भाग्यशाली रथ है। भाग्यशाली रथ भाग्य बनाने या दुर्भाग्य बनाने का कारण कैसे है? हँ? (किसी ने कहा – कर्मों का हिसाब-किताब।) क्या कर्म? (किसी ने कहा –कर्मों का हिसाब-किताब।) कर्म कौन सिखाता है? कर्म, अकर्म, विकर्म – ये प्रैक्टिकल में सिखाने वाला कौन है? (किसी ने कुछ कहा।) शिव बाप? (किसी ने कहा – शिव बाबा।) शिव बाप तो थ्योरी का ज्ञान देता है। निराकार आत्माओं का निराकार बाप है। निराकार बाप से निराकारी ज्ञान का वर्सा मिलता है। ज्ञान सिर्फ थ्योरी में चाहिए या प्रैक्टिकल जीवन में भी चाहिए? (सबने कहा – प्रैक्टिकल जीवन में भी चाहिए।) तो किससे मिलता है? (किसी ने कुछ कहा।)

शिवबाबा, जिसे हम कहते हैं, उसके लिए गीता में भी लिखा है – भगवान ने अर्जुन से बोला - हे अर्जुन – इदम् शरीरं। ये शरीर। कौन्तेय, क्षेत्रम् इति अभिधीयते। ये जो तेरा शरीर है, ये क्षेत्र है। जो गीता के पहले अध्याय में आया। पहले श्लोक में आया। क्या? धर्मक्षेत्रे। ये धर्म का क्षेत्र है। क्षेत्र माने युद्ध भूमि। खेत जिसमें लड़ाई लड़ी जाती है। धर्म का क्षेत्र है। युद्ध का क्षेत्र है। और अनेक धर्मों का युद्ध क्षेत्र है। इस धर्मक्षेत्र में हरेक युद्धवेत्ता योद्धा अपने को तन से, मन से, धन से कुछ न कुछ परसेन्टेज में स्वाहा जरूर करता है। कौन-कौनसा योद्धा? जो बोला – सर्व धर्मान् परित्यज्य, मामेकम् शरणं व्रज। सब धर्मों को, उन धर्म के धर्मपिताओं को, धर्म के प्रणेताओं को त्याग दे। परित्यज्य। मामेकम् शरणं व्रज। मुझ एक की शरण में आ जा। किस एक की शरण में आ जा? हँ? जो दुनिया में और धरम फैले हुए हैं, वो सब धर्म असत है। इस दुनिया में सत धर्म एक ही है। देवी-देवता सनातन सतधर्म। सत माने सच्चा।

सच्चा किसे कहें? सच्चे और झूठे की पहचान क्या है?
(किसी ने कुछ कहा।) गीता में भी बताया। नासते विद्यते भावो। ना भावो विद्यते सतः। जो सत्य होता है उसकी पहचान है – इस दुनिया में वो सत्य कभी लोप नहीं होता। जो असत है वो लुप्त हो जाता है। माना झूठा भाग खड़ा होता है, और सच्चा? अटल रहता है। सतधर्म है तो किसके द्वारा स्थापन किया हुआ होगा? अरे? क्रिश्चियन धर्म है। क्राइस्ट के द्वारा स्थापन हुआ। बुद्ध धर्म है बौद्ध धर्म के द्वारा स्थापन हुआ। तो जो सत धर्म है, सनातन धर्म है, वो किसके द्वारा स्थापन हुआ? सत के द्वारा स्थापन हुआ या झूठ के द्वारा स्थापन हुआ? और जिस सत ने इस सत धर्म की स्थापना की, वो सच्चा धरमपिता होगा या झूठा धरमपिता होगा? क्योंकि और-और धरमपिताएं तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर बीच में आते हैं और बीच में ही चले जाते हैं। क्यों? क्योंकि सदा सत है ही नहीं। इसलिए उनको भाग खड़ा होना पड़ता है। इस सृष्टि रूपी रंगमंच से भाग खड़ा होना पड़ता है।

और भी हिस्ट्री में देखा जाए तो इस दुनिया में एक ही सत धर्म है। और एक ही धर्मखण्ड है सच्चा। जहाँ ये सत धर्म स्थापन होता है। उस सत धर्मखण्ड का भी कभी विनाश नहीं होता। झूठे धरमखण्डों का विनाश हो जाता है। ये झूठे-झूठे विधर्मी धर्मखण्ड, विदेशी धर्मखण्ड पहले भी नहीं थे। ढाई हज़ार वर्ष से पहले इनके धरमपिताएं भी नहीं थे, धर्मखण्ड भी नहीं थे। न सृष्टि के आदि में थे, न अंत तक रहेंगे। एक भारतखण्ड ही है जो सच्चे धरमपिता के द्वारा स्थापन होता है। और वो धरमपिता सत कैसे है? अभी बताया। क्या पहचान सच्चे की?
(किसी ने कुछ कहा।) कभी उसका नाश? नहीं होता। वो कौनसा धरमपिता है जिसका कभी नाश ही नहीं होता? ऐसा कोई दुनिया में है? इस सृष्टि का विनाश हो और धरमपिता का विनाश न हो। सारी दुनिया नाशवान। और एक अविनाशी। जिसको कहते हैं गॉड इज़ ट्रुथ। ट्रुथ इज़ गॉड।

तो सृष्टि रूपी रंगमंच पर वो कौन है जो तीनों काल में विद्यमान रहता है? वेदवाणी में बताया। क्या बताया? ब्रह्म वाक्य मुरली में बताया।
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? बताया इस सृष्टि पर सदा कायम कोई चीज़ नहीं है। सदा कायम? (सबने कहा – एक शिवबाबा।) एक ही शिवबाबा है। और जो एक शिवबाबा सदाकायम है, वो ही सदा सत्य है। क्यों? शिव बाप सदा कायम नहीं है? हँ? आत्माओं का बाप सदा कायम नहीं है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) अरे? सदा कायम नहीं है? सिर्फ संगम पर ही आता है। बाकी चार युगों में नदारद। होता ही नहीं। तो क्या सन्यासी है? या प्रवृत्ति मार्ग का पक्का है? (सबने कहा – हाँ।) निराकार आत्माओं का बाप? निराकार आत्माओं का बाप प्रवृत्ति का पक्का है? (किसी ने कहा – नहीं।)

निराकार आत्माओं को पुरुष कहा जाता है। पुरु माने शरीर। श माने शयन करने वाला। जो शरीर रूपी पुरी में शयन करते हैं, आराम करते हैं, उनको कहा जाता है पुरुष। और इस सृष्टि के सभी मनुष्यात्माएं जब जीवनमुक्ति प्राप्त करते हैं, जीवन में रहने वाले बाप से, तो उस जीवनमुक्ति के टाइम पर कम से कम एक जन्म के लिए शरीर रूपी पुरी में आराम से नहीं रहते? इसलिए पुरुष कहे जाते हैं। 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएं सब पुरुष हैं। तो अव्वल नंबर पुरुष हैं या नंबरवार पुरुष हैं? हँ? (किसी ने कहा – नंबरवार।) नंबरवार पुरुष हैं।

कोई तो आलराउंड सृष्टि रूपी रंगमंच पर शरीर रूपी पुरी में रहते, सिर्फ बहुत थोड़े समय के लिए या कहें संगम में ही, अंतिम जन्म में, जिसे एक्स्ट्राआर्डिनरी जन्म कहा जाता है, माना उस जनम में ही आधे समय तक बेआरामी में रहते और आधा समय? आराम से रहते। तो बाकी क्या कहें? 84 जन्म आराम से रहेंगे या बेआरामी में रहेंगे? आराम से रहते हैं। उनमें भी नंबरवार होंगे या एक जैसे होंगे?
(सबने कहा – नंबरवार।) नंबरवार होते हैं, क्योंकि वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली आत्माओं के बीच जो परमपुरुष है, कौन? शिव बाप। परे ते परे स्टेज में रहने वाला बाप, जिसका कोई बाप नहीं। वो परमपुरुष सौ परसेन्ट शरीर रूपी पुरी में रहते सौ परसेन्ट आराम का पार्ट बजाता है। कभी भी बेआरामी अनुभव नहीं करता। इसका मतलब क्या हुआ? कि मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर एक परमपुरष के अलावा और कोई मनुष्यात्मा ऐसी नहीं है जो सदा काल शरीर रूपी पुरी में रहते-रहते आराम से रहे सदाकाल।

A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. In the second line of the first page, the topic being discussed was – What is the root cause of any soul becoming fortunate or any soul becoming unfortunate? Hm? (Someone said – The karma of the past births.) The root cause has also been written – brother, it has been written in the Vedvani, it was said – Brother, this is a fortunate Chariot. How is the fortunate Chariot a reason for bringing fortune or misfortune? Hm? (Someone said – The karmic accounts.) Which actions (karma)? (Someone said – The karmic accounts.) Who teaches karma? Karma, akarma, vikarma – who teaches this in practical? (Someone said something.) Father Shiv? (Someone said – ShivBaba.) Father Shiv gives the knowledge of theory. He is the incorporeal Father of incorporeal souls. You get the inheritance of incorporeal knowledge from the incorporeal Father. Do you want knowledge only in theory or in the practical life as well? (Everyone said – It is required in the practical life as well.) So, from whom is it received? (Someone said something.)

It has been written in the Gita also for the one, whom we call ShivBaba – God said to Arjun – O Arjun – Idam shareeram. This body. Kaunteya, Kshetram iti abhidheeyate. This body of yours is a kshetra (field). It was mentioned in the first chapter of the Gita. It was mentioned in the first shloka. What? Dharmakshetre. This is a field of dharma. Kshetra means battlefield. A field on which a war is fought. It is a field of dharma. It is a battlefield. And it is a battlefield of many religions. Every warrior in this dharmakshetra definitely sacrifices himself through the body, through the mind, through wealth in some percentage or the other. Which warriors? It has been said – Sarva dharmaan parityajya, maamekam sharanam vraj. Abdicate all the religions, the founders of those religions, the propounders of the religions. Parityajya (abdicate). Maamekam sharanam vraj. Come to My asylum only. Come to the asylum of which one? Hm? The other religions which are spread in the world are all untrue religions. Only one religion in this world is true. The Devi-Devataa Sanatan Sat Dharma. Sat means true.

Who should be called true? What is the indication of true and false?
(Someone said something.) It was told in the Gita as well. Naasate vidyate bhaavo. Naa bhaavo vidyate satah. The indication of truth is that that truth never vanishes from this world. Untruth vanishes. It means that untruth runs away and truth? It remains unshakable. If it is true dharma, then through whom would it have been established? Arey? There is Christian religion. It has been established by Christ. There is Buddhism established by Bauddh dharma (Buddha). So, through whom would the true religion, the Sanatan dharma have been established? Was it established through truth or through falsehood? And the truth who established this true religion, will he be true founder of religion or will he be a false founder of religion? Because other founders of religions come on this world stage in between and depart in between. Why? It is because they are not forever truth at all. This is why they have to run away. They have to run away from this world stage.

And if you look further at the history, then there is only one true religion in this world. And there is only one true religious land where this true religion is established. That true religious land is never destroyed. False religious lands are destroyed. These false vidharmi (heretic) religious lands, the foreign religious lands did not exist in the past as well. Neither did their founders of religions exist 2500 years ago nor did those religious lands exist. Neither did they exist in the beginning of the world, nor will they remain till the end. There is only one land of India which is established by the true founder of religion. And how is that founder of religion true? It was told just now. What is the indication of the true person?
(Someone said something.) He is never? Destroyed. Which is that founder of religion who is never destroyed? Is there any such person in the world that the world may be destroyed and the founder of that religion is not destroyed. The entire world is perishable and one is imperishable who is called God is truth, truth is God.

So, who is that one on this world stage who exists in all the three aspects of time? It was told in Vedvani. What has been told? It was mentioned in a Godly sentence (brahm vaakya), the Murli.
(Someone said something.) Hm? It was told that there is nothing permanent in this world. What is permanent? (Everyone said – One ShivBaba.) One ShivBaba alone. And the one ShivBaba who is permanent is forever truth. Why? Isn’t Father Shiv permanent? Hm? Isn’t the Father of souls permanent? Hm? (Someone said something.) Arey? Is He not permanent? He comes only in the Confluence Age. He is absent in all other four Ages. He is not present at all. So, is He a Sanyasi? Or is He firm on the path of household? (Everyone said – Yes.) The Father of incorporeal souls? Is the Father of incorporeal souls firm in household? (Someone said – No.)

Incorporeal souls are called purush. Puru means body. Sha means the one who rests (shayan karne vala). Those who lie, rest in the body like abode are called Purush. And when all the human souls of this world achieve jeevanmukti (liberation in life) from the Father who remains in life (jeevan), then at the time of that jeevanmukti, don’t they live comfortably in the body like abode at least for one birth? This is why they are called Purush. All 500-700 crore human souls are Purush. So, are they number one purush or numberwise purush? Hm? (Someone said – Numberwise.) They are numberwise Purush.

Some live in the body like abode on the world stage allround and for very little time or you may say only in the Confluence Age, in the last birth, which is called an extraordinary birth, i.e. they remain restless for half the time in that birth itself and for half the time? They live comfortably. So, what will be said about the rest [of the births]? Will they live comfortably for 84 births or will they remain restless? They live comfortably. Will they also be numberwise or will they be alike?
(Everyone said – Numberwise.) They are numberwise because the Parampurush among the souls that play their part on this world stage; who? Father Shiv. The Father who lives in the farthest stage and who doesn’t have any Father. That Parampurush plays the part of 100 percent comfort while living 100 percent in the body like abode. He never feels uncomfortable. What does it mean? It means that there is no human soul except one Parampurush on the human world stage who remains comfortably forever while living in the body like abode.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2391-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.03
Time: 00.01-13.03


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. बात चल रही थी कि आत्मा ही भाग्यशाली बनती है और आत्मा ही दुर्भाग्यशाली बनती है। और ये वेद वाक्य भी है कि ये भाग्यशाली रथ है। आत्मा को भाग्यशाली बनना होता है, दुर्भाग्यशाली बनना होता है। लेकिन आत्मा निराकार है। आत्मा चैतन्य है। और आत्मा स्वतंत्र भी है। कि सदा परतंत्र है? हँ? स्वतंत्र होती है जब पर के संग से परे होती है। पर क्या है? पर है प्रकृति। प्रकृति अर्थात् पाँच तत्वों का संघात – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। जिन पाँच तत्वों से ये शरीर बनता है। और शरीर को रथ कहा जाता है। और रथ, बाप कहते हैं, ये भाग्यशाली रथ है।

गीता में भी लिखा है इदम् शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम् इति अभिधीयते। हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! ये जो शरीर रूपी रथ है तुम्हारा, ये क्षेत्र है। युद्ध क्षेत्र कहो, धर्मक्षेत्र कहो, कर्मक्षेत्र कहो। इस शरीर रूपी रथ का नाम क्या है? हँ? जहाँ दुनिया का बड़े ते बड़ा युद्धक्षेत्र बनाया गया था ड्रामा प्लैन अनुसार। हँ? युद्ध का नाम क्या था?
(सबने कहा – महाभारत।) महाभारी महाभारत युद्ध। जैसा भारी युद्ध दुनिया में न कभी हुआ, और न कभी होगा। इस युद्ध का नाम किसके नाम पर पड़ता है? भारत के नाम पर पड़ता है। और नाम निराकार आत्मा का होता है या साकार शरीर रूपी रथ का होता है? (किसी ने कहा – साकार।) एक ही नाम है मात्र जो निराकार आत्मा के ऊपर होता है। वो है शिव। वो त्रिकालदर्शी है। और बाकी सब नाम? हँ? आत्मा के ऊपर होते हैं या शरीर के ऊपर होते हैं? शरीर के ऊपर होते हैं।

तो उन शरीरधारियों के बीच कौनसा शरीर है जो बाप ने भी, शिव बाप ने, आत्माओं के बाप, बापों का बाप जिसका कोई बाप? है ही नहीं। उस बाप ने उसका टाइटल दे दिया, भाग्यशाली रथ। क्योंकि 84 जन्म के अंत में वो बापों का बाप शिव जिसकी आत्मा का ही नाम शिव है, उसका अपना शरीर? होता ही नहीं। और वो किसमें प्रवेश करके अपना कार्य करता है? नई दुनिया रचने का पुरानी दुनिया विनाश कराने का? जो बापों का बाप है, बाप का काम होता है बच्चों को वर्सा देना। नहीं तो बाप किस बात का? तो वो बाप अपना शरीर न होने से जिस शरीर में मुकर्रर रुप से प्रवेश करता है, उसका टाइटल लेता है भाग्यशाली रथ।

और बताया कि आत्मा ही भाग्यशाली बनती है और आत्मा ही? दुर्भाग्यशाली बनती है। कारण क्या है? बिना कारण के कोई काम होता है क्या? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) क्या बताया? (किसी ने कहा – संग का रंग।) किसके संग का रंग? हँ? (किसी ने कहा – जन्म-मरण।) जन्म-मरण का संग होता है क्या? संग शरीरधारी का होता है, शरीर की कर्मेन्द्रियों से संग लगता है कि बिना शरीर के संग का रंग लगता है? शरीर के द्वारा संग लगता है। और वो बापों का बाप जिसका कोई बाप नहीं है, वो क्या कहता है? हँ? बाप बैठकर कहते हैं – ये भाग्यशाली रथ है। वो त्रिकालदर्शी बाप है। जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है। और बताता है कि ये भाग्यशाली रथ है। गीता में भी उसी को इंट्रोड्यूस किया। अर्जुन की ओर इशारा किया। इदम् शरीरं – ये शरीर। तुम्हारा शरीर या मेरा शरीर? तुम्हारा शरीर। जिसने बोला ‘तुम्हारा शरीर’ उसको अपना शरीर तो होता ही नहीं। वो जिसको बोला उसको स्मृति दिलाई। ये तुम्हारा शरीर जो है निमित्त बनता है अविनाशी ज्ञान यज्ञ कुण्ड के लिए।

ज्ञान यज्ञ का नाम क्या है? अविनाशी रुद्र यज्ञ। शिव रुद्र यज्ञ नहीं। शिव का तो नाम बदलता ही नहीं। शिव तो बिन्दी का नाम है। जिस मुकर्रर शरीर में प्रवेश करते हैं वो आदि में भी रुद्र और महामृत्यु, महाविनाश के समय भी वो रौद्र रूप धारण करता है इसलिए रुद्र। और अविनाशी भी है। कभी विनाश होने वाला नहीं है। और जो भी शरीर हैं मनुष्य मात्र के, देवताओं के, राक्षसों के, प्राणी मात्र के जो भी शरीर हैं वो सब? विनाशी हैं। और ये रुद्र यज्ञ कुण्ड भी विनाशी है या अविनाशी है? अविनाशी है। इस यज्ञ कुण्ड में सारी दुनिया को स्वाहा होना है।


A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed was – The soul itself becomes fortunate and the soul itself becomes unfortunate. And there is a Vedvaakya (sentence of Veda) also that this is a fortunate Chariot. A soul becomes fortunate and unfortunate. But the soul is incorporeal. The soul is living. And the soul is independent (swatantra) as well. Or is it unfree (partantra)? Hm? It is independent when it is free from the company of others (par). What is ‘par’ (alien or unrelated)? Prakriti (nature) is ‘par’. Prakriti means the combination of five elements – Earth, water, air, fire, sky - the five elements with which this body is made up of. And the body is called a Chariot. And the Father says – this Chariot is a fortunate Chariot.

It has been written in the Gita also – Idam shareeram kaunteya kshetram iti abhidheeyate. O Arjun, the son of Kunti! Your body like Chariot is a field (kshetra). Call it a battlefield, a field of dharma, a field of karma. What is the name of this body like Chariot? Hm? The place where the biggest battlefield of the world was set up as per the drama plan. Hm? What was the name of the battle?
(Everyone said – Mahabharata.) Mahaabhaari Mahabharata war – such a fierce war which was never been fought in the world nor will it ever be fought. On whose name is the name of this war coined? It is based on the name of Bhaarat. And does the name belong to the incorporeal soul or to the corporeal body like Chariot? (Someone said – Corporeal.) There is only one name which is based on the incorporeal soul. That is Shiv. He is Trikaaldarshi (knower of past, present and future). And the names of all others? Hm? Are they based on the soul or on the body? They are based on the body.

So, which is the body among those bodily beings which the Father, the Father Shiv, the Father of souls, the Father of fathers, who does not have any Father at all, that Father gave him the title – fortunate Chariot because in the end of the 84 births that Father of fathers, i.e. Shiv, whose name of the soul itself is Shiv, does not have His body at all. And in whom does He enter and perform His task of creating the new world and destroying the old world? The Father of fathers; the task of the Father is to give inheritance to the children. Otherwise, what for is He a Father? So, that Father, because of not having a body of His own, He gives the title of ‘fortunate Chariot’ to the body in which He enters enters permanently.

And it has also been told that the soul itself becomes fortunate and the soul itself? Becomes unfortunate. What is the reason? Is any task performed without any reason? Hm?
(Someone said something.) What has been told? (Someone said – The colour of company.) The colour of whose company? Hm? (Someone said – Birth and death.) Do you get the company of birth and death? Is there company of bodily beings, is the company given through the organs of action of the body or is the colour of company applied without a body? The company is given through the body. And what does that Father of fathers, who does not have any Father say? Hm? The Father sits and says – This is a fortunate Chariot. He is a Trikaaldarshi Father. He does not pass through the cycle of birth and death. And He says – This is a fortunate Chariot. It is he alone who has been introduced in the Gita as well. A gesture was made towards Arjun. Idam shareeram – This body. Your body or My body? Your body. The one who said ‘your body’ does not have a body of his own at all. The one who was addressed like that was reminded. Your body becomes instrumental for the imperishable Gyan Yagya Kund (sacrificial altar of knowledge).

What is the name of the Gyan Yagya? Imperishable Rudra Yagya. Not Shiv Rudra Yagya. The name of Shiv does not change at all. Shiv is the name of the point. The permanent body in which He enters was Rudra in the beginning also and he also assumes a fierce form (Raudra roop) at the time of Mahamrityu (large scale deaths), Mahaavinaash (mega-destruction). This is why He is Rudra. And he is also imperishable. All other bodies of the human beings, of the deities, of the demons, of the living beings are all perishable. And is this Rudra Yagya Kund also perishable or imperishable? It is imperishable. The entire world is to get sacrificed in this Yagya Kund.

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