Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

DEDICATED to PBKs.
For PBKs who are affiliated to AIVV, and supporting 'Advanced Knowledge'.
Post Reply
User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 31 Dec 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
VCD-2387-extracts-Hindi

समय- 00.01-12.02
Time: 00.01-12.02


आज का रात्रि क्लास है – 1.12.1966. पूज्य बना दिया ये पुजारी से। यह भी बताओ। बताओ, कब बना दिया पुजारी से पूज्य? न सतयुग में, न त्रेता में, न द्वापर में, न कलियुग में। अभी कलियुग के अंत और सतयुग आदि के संगम पर जिसका यादगार है भक्तिमार्ग में पुरुषोत्तम संगमयुग। पुरुष माने आत्मा। और आत्माओं में उत्तम। पूज्य 16 कला सम्पूर्ण। ... किसी ने किसी के बारे में कुछ कहा। बोला – ज़ंज़ीर में अच्छी फंसी हुई है बिल्कुल। कौनसी ज़ंज़ीर में? (किसी ने कहा – विकार।) गुरुओं की ज़ंज़ीर में फंसी हुई है। और यहाँ तो पहले ही बताया जाता है कि इन कलियुगी गुरुओं को छोड़ो। ये कलह कलेश कराने वाले गुरू हैं। इसलिए बताया – ये है रूहों का बाप। रूहानी स्टेज धारण करने वाले बच्चों का बाप। और ये रूहानी स्टेज रूहानी यात्रा से ही बन सकती है। ये कलियुगी गुरू तो जिस्मानी यात्रा सिखाने वाले हैं। ये रूहानी यात्रा नहीं सिखाय सकते। क्यों नहीं सिखाय सकते? (किसी ने कुछ कहा।) वो गुरू जो हैं वो सब अपन को जिसम समझते हैं। और दूसरों को भी जो यात्रा कराते हैं वो जिस्मानी यात्रा कराते। तो वो जिस्मानी यात्रा में जाकरके उनको पूजते हैं। पुजारी बनकरके पूजते हैं।

तो देखो पूजा करने के लिए ही जाते हैं ना। हँ? शिव की पूजा करेंगे। पार्वती की पूजा करेंगे। शायद गणेशजी की भी करते होंगे वहाँ मन्दिर में जाकर। और यहाँ है ये पूज्य ते पूज्य। जो सबका पूज्य है। सबका माने? देवात्माओं का भी पूज्य है, मनन-चिंतन-मंथन करने वाले मनुष्यों का भी पूज्य है। और जो मन-बुद्धि का उपयोग भी नहीं करते, ऐसे जानवर जैसे राक्षसों का भी पूज्य है। भक्तिमार्ग में गाया हुआ है। कौन है? हँ? जिसे राक्षस भी मानते हैं, देवताएं भी मानते हैं, ये है। ये माने कौन? किसकी तरफ इशारा किया?
(किसी ने कहा – नारायण की तरफ।) नारायण को भी तो बनाने वाला कोई है नर से नारायण? (किसी ने कहा – शिवबाबा।)

तो ये है कहकरके किसकी तरफ इशारा किया? ये है पूज्य ते पूज्य। (किसी ने कहा – साकार में निराकार है।) साकार में निराकार 1966 में है पूज्य ते पूज्य? पुरुषार्थी है? पुरुषार्थ करने वाला है नर से नारायण बनने का या पूज्य ते पूज्य है? पुरुषार्थी है तो कोई पुरुषार्थ कराने वाला है। जो ब्रह्मवाक्य वेदवाणी मुरली में बोला हुआ भी है। शिवबाबा है पुरुषार्थी, शिवबाबा है पुरुषार्थ कराने वाला। तो कौनसा शिवबाबा? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। सम्पूर्ण स्टेज की बात बताई। वर्तमान पुरुषार्थी की बात नहीं बताई। और इशारा किया शिवलिंग की ओर जो पूज्य है। और वही आत्मा फिर पुजारी भी बनती है। पहला-पहला पूज्य? और फिर? पहला-पहला पुजारी।

कौन है पहला-पहला पुजारी?
(किसी ने कुछ कहा।) द्वापर के आदि में पहला-पहला पुजारी कौन है? (किसी ने कहा – विक्रमादित्य।) विक्रमादित्य। (किसी ने कहा – उसका भी बाप है...) विक्रमादित्य पहला-पहला पूज्य तो नहीं है। क्योंकि विक्रमादित्य तो विकारी राजा है और विकारी राजाएं जानते हैं कि हम विकारी हैं। तो जिन ब्राह्मणों को निर्विकारी समझते हैं, उनको मंत्री, महामंत्री के रूप में रखते हैं या गुरू के रूप में रखते है। तो उनके लिए कौन पूज्य हुआ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। तो वो है सबका पूज्य। और पूज्य ते पूज्य। इसलिए दिखलाते हैं ना। क्या दिखलाते हैं? अरे मन्दिरों में यादगार दिखलाते हैं ना। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, सोमनाथ के मन्दिर में सबसे पहले दिखाते हैं। असली सात्विक यादगार। अभी लिंग सबके आगे है। अभी माने? जैसा ब्रॉड ड्रामा में, पार्ट बजता है, वैसा ही रिहर्सल भी होती है संगम में। कब रिहर्सल होती है? अभी। अभी माने? कलियुग के अंत और सतयुग के आदि में लिंग सबके आगे है।

Today's night class is dated 1.12.1966. You were transformed from worshippers (pujaari) to worshipworthy (poojya). Tell this also. Tell, when were you transformed from worshippers to worshipworthy? Neither in the Golden Age, nor in the Silver Age; neither in the Copper Age, nor in the Iron Age. Now at the confluence of the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age; Its memorial is available on the path of Bhakti as Purushottam Sangamyug. Purush means soul. And best among souls. Worshipworthy, perfect in 16 celestial degrees…. Someone said something about someone. It was told - It (the soul) is completely entangled in chains. In which chain? (Someone said - Vice.) It is bound in the chains of Gurus. And here it is already told that leave these Iron Age Gurus. They are the Gurus who create quarrels and disputes. This is why it was told - This is the Father of souls. The Father of the children who develop spiritual stage. And this spiritual stage can be formed only through spiritual journey. These Iron Age gurus teach physical journey. They cannot teach spiritual journey. Why cannot they teach? (Someone said something.) All those Gurus consider themselves to be bodies. And the pilgrimage that they enable others to perform is also a physical pilgrimage. So, they go on that physical pilgrimage and worship them. They become worshippers and worship.

So, look, they go only to worship, don't they? Hm? They worship Shiva. They worship Parvati. Perhaps they go to the temple there and worship Ganeshji as well. And here is it the most worshipworthy one who is worshipworthy for everyone. What is meant by 'everyone'? He is worshipworthy for the deity souls also, He is also worshipworthy for the human beings who think and churn. And He is worshipworthy for the animal like demons also who do not use their mind and intellect. He is praised on the path of Bhakti. Who is it? Hm? The one who is believed by the demons as well as the deities. It is this one. 'This one' refers to whom? Towards whom was a gesture made?
(Someone said - Towards Narayan.) Is there anyone who transforms even Narayan from a man (nar) to Narayan? (Someone said - ShivBaba.)

So, towards whom was a gesture made by uttering the words 'this one'? This one is most worshipworthy. (Someone said - The incorporeal within the corporeal.) Is the incorporeal within the corporeal most worshipworthy in 1966? Is he a purusharthi (effort-maker)? Does He enable others to become Narayan from nar (man) or is He the most worshipworthy one? He is purusharthi. So, there is someone who enables him to make purusharth. There is a Brahmvaakya (Godly sentence) spoken in the Vedvani Murli. ShivBaba is purusharthi; ShivBaba is the one who enables others to make purusharth. So, which ShivBaba? (Someone said something.) Yes. The topic of perfect stage was mentioned. A topic of the present purusharthi was not mentioned. And a gesture was made towards the Shivling which is worshipworthy. And the same soul then becomes a worshipper as well. First and foremost worshipworthy? And then? First and foremost worshipper.

Who is the first and foremost worshipper?
(Someone said something.) Who is the first and foremost worshipper in the beginning of the Copper Age? (Someone said - Vikramaditya.) Vikramaditya. (Someone said - He is his Father as well…) Vikramaditya is not the first and foremost worshipworthy because Vikramaditya is a vicious king and the vicious kings know that they are vicious. So, the Brahmins, whom they consider to be viceless are kept in the form of a Minister, Prime Minister or in the form of a Guru. So, who is worshipworthy for them? (Someone said something.) Yes. So, He is worshipworthy for everyone. And the most worshipworthy one. This is why it is shown, is not it? What is shown? Arey, a memorial is shown in the temples, is not it? Hm? (Someone said something.) Yes, it is shown first of all in the temple of Somnath. The true pure memorial. Now the ling is before everyone. What is meant by 'now'? As is the part played in the broad drama, so is the rehearsal that takes place in the Confluence Age. When does the rehearsal take place? Now. What is meant by 'now'? The ling is before everyone in the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-university.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-university.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2388-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.20
Time: 00.01-13.20


आज का प्रातः क्लास है – 30.3.1967. आत्मा ही भाग्यशाली बनती है। और आत्मा ही दुर्भाग्यशाली बनती है। किसके द्वारा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) कर्म के आधार पर? कर्म कौन सिखाता है? कर्म, अकर्म, विकर्म की गति कौन बताता है? (किसी ने कहा – शिवबाप।) शिव बाप को तो मुख ही नहीं है। उसको तो शरीर ही नहीं है। बताएगा कैसे? (किसी ने कहा – शिव बाप।) शिव बाप? (किसी ने कहा – शिवबाबा।) हाँ। शिव बाप निराकार आत्माओं का निराकार बाप है। निराकार बाप से तो निराकारी ज्ञान का वर्सा ही मिलता है। और भाग्य? सिर्फ निराकारी ज्ञान से ही बनता है या कोई और भी है जिसके द्वारा आत्मा भाग्यशाली बनती है? मीडिया तो चाहिए ना। नहीं चाहिए? तो मीडिया कौन होना चाहिए? कौन होता है?

यहाँ भाग्यशाली और दुर्भाग्यशाली की बात हो रही है। धनवान होगा तो धनवान बनाएगा। ज्ञानवान होगा तो ज्ञानवान बनाएगा। जमीनदार होगा तो जमीनदार बनाएगा। खुद ही नहीं होगा तो दूसरों को बनाएगा क्या? नहीं बनाएगा। तो भाग्यशाली कौन बनाता है? और फिर दुर्भाग्यशाली कौन बनाता है? कहेंगे आत्मा के कर्म ही भाग्यशाली बनाता है और आत्मा का कर्म ही दुर्भाग्यशाली बनाता है। तो वो कर्म की गति प्रैक्टिकल में सिखाने वाला कौन? हँ? जो भाग्यशाली और दुर्भाग्यशाली बने। शिव बाप तो प्रैक्टिकल सिखाय नहीं सकता। क्योंकि वो तो निराकार आत्माओं का निराकार बाप है।

वो तो साफ कहता है मैं त्रिकालदर्शी हूँ। परन्तु मैं मास्टर त्रिकालदर्शी नहीं हूँ। तो फिर मास्टरी हासिल करने वाला कौन? अरे? बताया तो है तुम बच्चे हो नम्बरवार मास्टर त्रिकालदर्शी। तो भी कर्म, अकर्म, विकर्म की प्रैक्टिकल मास्टरी जिसे कहें थ्योरिकल, थ्योरिटिकल मास्टर नहीं सिर्फ। इसके साथ-साथ प्रैक्टिकल में करके दिखाने वाला भी। क्योंकि थियोरी में कोई पास होता है और प्रैक्टिकल में फेल होता है तो क्या माना जाता है? फेल माना जाता है। तो वो प्रैक्टिकल में भाग्यशाली कौन? जो सबको भाग्यशाली बनाए? शिव बाप। सच्चाई का रास्ता बताता है। जिसको कहते हैं सत्य ज्ञान। उस सत्य ज्ञान से ही सतयुग स्थापन होता है। सत्वप्रधान दुनिया बनती है। परन्तु वो आत्माओं का निराकार बाप तो अकर्ता है या कर्ता है? तो जो स्वयं अकर्ता है वो तो प्रैक्टिकल में न कोई को भाग्यशाली बनाय सकता है न कोई को? दुर्भाग्यशाली बनाय सकता है। तो क्या करता है वो?
(किसी ने कहा – मार्ग बताता है।) हाँ।

जो गीता में बोला है अर्जुन से – अर्जुन की तरफ इशारा किया। इदम् शरीरं कौन्तेय। और? क्षेत्रम इति अभिधीयते। (गीता 13/1) हे अर्जुन! तुम्हारा यह जो शरीर है वो कर्म, अकर्म, विकर्म, सिखाने का, प्रैक्टिकल में करने का क्षेत्र है। क्षेत्र माना खेत। उस खेत में युद्ध भी लड़ा जाता है। युद्ध क्षेत्र है। मूल रूप में कर्मक्षेत्र भी है। जो गीता में पहले ही अध्याय में बोला। क्या? धर्मक्षेत्रे? कुरुक्षेत्रे। इस धर्मक्षेत्र में और कुरुक्षेत्र में। कैसा धर्मक्षेत्र? जिसमें सब धर्म समाए हुए हैं। जो भी दुनिया में धर्म फैले हुए हैं, सत धर्म से लेकर असत धर्म तक भी। और उन धर्मों के आधार पर उन धर्म के जो प्रणेता गाए हुए हैं, धर्मपिताएं गाए हुए हैं, उनके द्वारा अथवा उनके फालोअर्स के द्वारा। या गद्दीनशीन गुरुओं के द्वारा। धर्म के आधार पर जो कर्म निर्धारित किए गए हैं, हर धरम में अलग-अलग। उन कर्मों के आधार पर भाग्य बनता भी है और भाग्य? बिगड़ता भी है। अब हिस्ट्री में देखा जाए तो धर्म जितने भी हैं दुनिया में वो सभी धर्म इस संसार में सदाकाल रहते हैं या नंबरवार अल्पकाल रहते हैं?
(सबने कहा – नंबरवार।) लेकिन गीता में कहा है नासतेविद्यते भावो, ना भावो विद्यते सतः। (गीता 2/16) जो सत है माना सतधर्म है उसका इस संसार में कभी अभाव नहीं हो सकता। कि आज है और कल न हो। उस धर्म के धर्मखण्ड का भी कभी विनाश नहीं हो सकता। कि आज वो धर्मखण्ड रहे, सत धर्मखण्ड और कल न रहे।

Today’s morning class is dated 30.3.1967. The soul itself becomes fortunate (bhaagyashaali) and the soul itself becomes unfortunate (durbhaagyashaali). Through whom? Hm? (Someone said something.) On the basis of actions? Who teaches actions? Who teaches the dynamics of karma, akarma and vikarma? (Someone said – Father Shiv.) Father Shiv doesn’t have a mouth at all. He doesn’t have a body at all. How will He tell? (Someone said – Father Shiv.) Father Shiv? (Someone said – ShivBaba.) Yes. Father Shiv is the incorporeal Father of the incorporeal souls. One gets only the inheritance of incorporeal knowledge from the incorporeal Father. And fortune? Is it formed on the basis of only the incorporeal knowledge or is there any one else also through whom the soul becomes fortunate? A media is required, isn’t it? Is it not required? So, who should be the media? Who is it?

Here, the topic of fortunate and unfortunate is being discussed. If someone is wealthy he will make others wealthy. If someone is knowledgeable, he will make others knowledgeable. If someone is a landlord, then he will make others landlords. If he himself is not so, then will he make others? He will not make. So, who makes you fortunate? And then who makes you unfortunate? It will be said that the actions of the soul itself makes you fortunate and the actions of the soul itself makes you unfortunate. So, who teaches the dynamics of those actions in practical? Hm? So that someone becomes fortunate and unfortunate? Father Shiv cannot teach in practical because He is the incorporeal Father of the incorporeal souls.

He says clearly that I am Trikaaldarshi (knower of all the three aspects of time, i.e. past, present and future). But I am not Master Trikaaldarshi. So, then who achieves the mastery? Arey? It has bee told that you children are numberwise Master Trikaaldarshi. So, the practical mastery over karma, akarma and vikarma, not just theorical, theoretical master. Along with that one should also be able to show in practical because if someone passes in theory and fails in practical, then what is he considered? He is considered to be fail. So, who is that fortunate one in practical who makes everyone fortunate? Father Shiv. He teaches the path of truth which is called true knowledge. Golden Age is established through that true knowledge. The world becomes satwapradhan (pure). But is that incorporeal Father of the incorporeal souls akarta (non-doer) or karta (doer)? The one who Himself is akarta (non-doer) can neither make anyone fortunate in practical nor can He make anyone unfortunate. So, what does He do?
(Someone said – He shows the path.) Yes.

Arjun was told in the Gita – a gesture was made towards Arjun. Idam shareeram Kaunteya. And? Kshetram iti abhidheeyate. (Gita 13/1) O Arjun! This body of yours is a field to teach karma, akarma and vikarma, of doing in practical. Kshetra means field. War is also fought in that field. It is a battlefield. Basically it is a field of actions (karmakshetra) also. It was told in the first chapter of the Gita itself. What? Dharmakshetre? Kurukshetre. In this Dharmakshetra (field of dharma) and in Kurukshetra (battlefield). What kind of Dharmakshetra? The one in which all the religions are contained. All the religions which are spread all over the world, from the true religion to the untrue religion. And on the basis of those religions, the propounders of those religions who are praised, the founders of the religions who are praised, through them or through their followers or through the gurus seated on the thrones. The actions that have been prescribed on the basis of religion in different religions. On the basis of those actions fortune is formed as well as ruined. Well, if you look at the history, then do all the religions in the world remain forever in this world or do they remain numberwise temporary?
(Everyone said – Numberwise.) But it has been said in the Gita – Naasateyvidyate bhaavo, naa bhaavo vidyate satah. (Gita – 2/16). There can never be lack of truth, i.e. the true religion in this world that it remains today and does not exist tomorrow. The religious land of that religion can never be destroyed that today that religious land, the true religious land exists and does not exist tomorrow.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-university.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-university.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2389-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.14
Time: 00.01-14.14


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. पहले पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी - आत्मा ही भाग्यशाली बनती है। और आत्मा ही दुर्भाग्यशाली बनती है। भाग्यशाली और दुर्भाग्यशाली बनती है। कौन आत्मा दुर्भाग्यशाली बनना चाहेगी? सभी भाग्यशाली बनना चाहते हैं। फिर बनती कैसे है दुर्भाग्यशाली? भाग्यविधाता तो एक ही गाया हुआ है। भक्तिमार्ग में कहते भी हैं भाग्यविधाता ब्रह्मा ने जब भाग्य बांटा था तो क्या सोए हुए थे? सोए हुए थे माना अज्ञान नींद में थे। क्योंकि ब्रह्मा के मुख से तो वेदवाणी मिलती है। विद माने जानकारी। वेद। जानकारी अर्थात् ज्ञान। सच्चाई का ज्ञान। सत्य क्या है। और जब सत्य की पहचान हो जाती है तो असत्य भी डिक्लेयर हो जाता है। और गीता में तो बताया ही हुआ है सत्य वो है जिसका कभी विनाश नहीं होता।

सत्य अविनाशी है। झूठ विनाशी है। वो चाहे सच्चा धरमपिता हो और चाहे वो देहअभिमानी धरमपिताएं हों, जिनके आने के बाद दुनिया नरक बनती जाती है। क्योंकि नरक नर बनाता है। नर मनुष्य को कहा जाता है। मननात् मनुष्य कहा जाता है। जो मनन-चिंतन-मंथन करता है वो मनुष्य है। नहीं तो जानवर है। और मनुष्य ही भाग्यशाली बनता है। परन्तु दुनिया में, मनुष्य तो कम से कम और ज्यादा से ज्यादा देखे हैं। तो कम से कम, ज्यादा से ज्यादा 500-700 करोड़ तो हैं। तो सारी मनुष्य सृष्टि में सत्य के रूप में स्थायी रहने वाला कोई तो होगा। क्योंकि ये बात पक्की है आत्मा सत्य है। ये देह असत्य है। देह आज है कल नहीं होगी। आत्मा तो अविनाशी है। तो अविनाशी आत्मा का बाप भी अविनाशी। परन्तु आत्माओं का बाप सतधाम का वासी है, सदा सत्य है, क्योंकि वो देह के जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है। जो आत्माएं देह धारण करती हैं और देह के जन्म-मरण के चक्र में आती हैं, वो सदा सतधाम की वासी नहीं हैं। जो सदा सतधाम का वासी है वो ही त्रिकालदर्शी है। तो क्या इस संसार में, जिसे हम स्वर्गलोक या मृत्युलोक कहते हैं, जहाँ देवात्माएं भी रहती हैं, मनुष्यात्माएं भी रहती हैं, और राक्षसी आत्माएं भी रहती हैं, तो इन आत्माओं के बीच में जनम-मरण के चक्र में आने वाला कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो इस संसार रूपी चक्र में सदाकाल रहता हो आत्मिक स्थिति से?

सतधाम का तो नाम ही सत है। उसके असत होने का तो सवाल ही नहीं। और सतधाम में सत आत्माएं ही रहती हैं। पाँच विनाशी जड़ तत्वों की तो बात ही नहीं। क्योंकि वो सतधाम तो तुरीया तत्व है। परन्तु इस संसार को सदा सतधाम नहीं कहा जाता। ये संसार झूठा भी बनता है। झूठखण्ड, जिसे कलियुग कहते हैं। और ये संसार सचखण्ड भी बनता है जिसे सतयुग कहते हैं। क्योंकि ये संसार और इस संसार की हर चीज़ चार अवस्थाओं से जरूर पसार होती है। ऐसी कोई चीज़ नहीं है, ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो सत्वप्रधान, सत्वसामान्य, रजो और तमो से पसार न होता हो। तो क्या तामसी दुनिया से पसार होने के बाद ये दुनिया झूठों के द्वारा सत बनती है? क्योंकि सतधाम का वासी, वो तो सदा सतधाम का वासी है। भले इस तमोप्रधान दुनिया में आता है, तो भी सत की स्टेज में स्थित रहता है। बुद्धि से सतधाम का ही वासी है क्योंकि वो देह से जन्म नहीं लेता। जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता। गर्भ से जन्म नहीं लेता। इसलिए त्रिकालदर्शी है। और सदा त्रिकालदर्शी है। तीनों काल का, भूत का, भविष्य का, वर्तमान का सत ज्ञान उसकी बुद्धि में रहता है। वो सर्वोपरि शुद्ध बुद्धि है। कभी भी बुद्धि मैली नहीं होती। इसलिए उस बुद्धि रूपी आत्मा में सत का ही वास रहता है।


A morning class dated 30.3.1987 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the first page was – The soul itself becomes fortunate. And the soul itself becomes unfortunate. It becomes fortunate and unfortunate. Which soul would like to become unfortunate? All want to become fortunate. Then how does it become unfortunate? The giver of fortune is praised to be only one. It is also said on the path of Bhakti that when the giver of fortune Brahma distributed fortune, then were you asleep? You were asleep, i.e. you were in the slumber of ignorance because Vedvani is received from the mouth of Brahma. Vid means information. Ved. Information means knowledge. The knowledge of truth. What is truth. And when one recognizes the truth, then the untruth is also declared. And it has already been told in the Gita that the truth is one which is never destroyed.

Truth is eternal. Falsehood is perishable. Be it the true founder of religion or be it the body conscious founders of religions, after whose arrival the world becomes a hell because a man (nar) make hell (narak). A human being is called nar. It is said – Mananaat manushya – the one who thinks and churns is a human being (manushya). Otherwise, he is an animal. And the human being himself becomes fortunate. But in the world, there are minimum and maximum number of human beings. So, there are minimum, maximum 500-700 crores. So, there must be someone who remains permanently in the form of truth in the entire human world because it is sure that the soul is true. This body is false. The body exists today; it will not exist tomorrow. The soul is imperishable. So, the Father of the imperishable soul is also imperishable. But the Father of the souls is a resident of the abode of truth, He is forever truth because He does not pass through the cycle of birth and death. The souls which assume the body and pass through the cycle of birth and death of the body are not the residents of the abode of truth forever. The one who is a resident of the abode of truth forever is Trikaaldarshi (knower of the three aspects of time). So, in this world, which we call the abode of heaven or the abode of death, where the deity souls as well as the human souls reside, and the demoniac souls also reside, so, isn’t there any person among these souls which pass through the cycle of birth and death, who remains in this world cycle forever through soul conscious stage?

The name of the abode of truth itself is truth (sat). There is no question of its being untruth (asat). And only true souls live in the abode of truth. It is not about the five perishable non-living elements because that abode of truth is a unique element. But this world is not called the abode of truth forever. This world becomes false as well. The abode of untruth, which is called the Iron Age. And this world becomes the abode of truth as well, which is called the Golden Age because this world and every thing of this world definitely passes through four stages. There is nothing, no living being which does not pass through the stages of satwapradhan, satwasaamaanya, rajo and tamo. So, after passing through this degraded (taamsi) world, does this world become true through false ones? Because the resident of the abode of truth is forever a resident of the abode of truth. Although He comes in this tamopradhan world, yet He remains in the stage of truth. He is indeed a resident of the abode of truth through the intellect because He does not get birth through the body. He does not pass through the cycle of birth and death. He is not born through the womb. This is why He is Trikaaldarshi. And He is forever Trikaaldarshi. The true knowledge of all the three aspects of time, of the past, present and future remains in His intellect. He has a supremely pure intellect. His intellect never becomes dirty. This is why the truth alone resides in that intellect like soul.

---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-university.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-university.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2390-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.32
Time: 00.01-19.32


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. पहले पेज की दूसरी लाइन में बात चल रही थी – जो आत्मा भाग्यशाली बनती है या कोई आत्मा दुर्भाग्यशाली बनती है, तो उसका मूल कारण कहाँ से आता है? हँ? (किसी ने कहा – पिछले जन्मों का कर्म।) मूल कारण लिखा भी है – भई, वेदवाणी में लिख दिया, बोल दिया – भई, यह भाग्यशाली रथ है। भाग्यशाली रथ भाग्य बनाने या दुर्भाग्य बनाने का कारण कैसे है? हँ? (किसी ने कहा – कर्मों का हिसाब-किताब।) क्या कर्म? (किसी ने कहा –कर्मों का हिसाब-किताब।) कर्म कौन सिखाता है? कर्म, अकर्म, विकर्म – ये प्रैक्टिकल में सिखाने वाला कौन है? (किसी ने कुछ कहा।) शिव बाप? (किसी ने कहा – शिव बाबा।) शिव बाप तो थ्योरी का ज्ञान देता है। निराकार आत्माओं का निराकार बाप है। निराकार बाप से निराकारी ज्ञान का वर्सा मिलता है। ज्ञान सिर्फ थ्योरी में चाहिए या प्रैक्टिकल जीवन में भी चाहिए? (सबने कहा – प्रैक्टिकल जीवन में भी चाहिए।) तो किससे मिलता है? (किसी ने कुछ कहा।)

शिवबाबा, जिसे हम कहते हैं, उसके लिए गीता में भी लिखा है – भगवान ने अर्जुन से बोला - हे अर्जुन – इदम् शरीरं। ये शरीर। कौन्तेय, क्षेत्रम् इति अभिधीयते। ये जो तेरा शरीर है, ये क्षेत्र है। जो गीता के पहले अध्याय में आया। पहले श्लोक में आया। क्या? धर्मक्षेत्रे। ये धर्म का क्षेत्र है। क्षेत्र माने युद्ध भूमि। खेत जिसमें लड़ाई लड़ी जाती है। धर्म का क्षेत्र है। युद्ध का क्षेत्र है। और अनेक धर्मों का युद्ध क्षेत्र है। इस धर्मक्षेत्र में हरेक युद्धवेत्ता योद्धा अपने को तन से, मन से, धन से कुछ न कुछ परसेन्टेज में स्वाहा जरूर करता है। कौन-कौनसा योद्धा? जो बोला – सर्व धर्मान् परित्यज्य, मामेकम् शरणं व्रज। सब धर्मों को, उन धर्म के धर्मपिताओं को, धर्म के प्रणेताओं को त्याग दे। परित्यज्य। मामेकम् शरणं व्रज। मुझ एक की शरण में आ जा। किस एक की शरण में आ जा? हँ? जो दुनिया में और धरम फैले हुए हैं, वो सब धर्म असत है। इस दुनिया में सत धर्म एक ही है। देवी-देवता सनातन सतधर्म। सत माने सच्चा।

सच्चा किसे कहें? सच्चे और झूठे की पहचान क्या है?
(किसी ने कुछ कहा।) गीता में भी बताया। नासते विद्यते भावो। ना भावो विद्यते सतः। जो सत्य होता है उसकी पहचान है – इस दुनिया में वो सत्य कभी लोप नहीं होता। जो असत है वो लुप्त हो जाता है। माना झूठा भाग खड़ा होता है, और सच्चा? अटल रहता है। सतधर्म है तो किसके द्वारा स्थापन किया हुआ होगा? अरे? क्रिश्चियन धर्म है। क्राइस्ट के द्वारा स्थापन हुआ। बुद्ध धर्म है बौद्ध धर्म के द्वारा स्थापन हुआ। तो जो सत धर्म है, सनातन धर्म है, वो किसके द्वारा स्थापन हुआ? सत के द्वारा स्थापन हुआ या झूठ के द्वारा स्थापन हुआ? और जिस सत ने इस सत धर्म की स्थापना की, वो सच्चा धरमपिता होगा या झूठा धरमपिता होगा? क्योंकि और-और धरमपिताएं तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर बीच में आते हैं और बीच में ही चले जाते हैं। क्यों? क्योंकि सदा सत है ही नहीं। इसलिए उनको भाग खड़ा होना पड़ता है। इस सृष्टि रूपी रंगमंच से भाग खड़ा होना पड़ता है।

और भी हिस्ट्री में देखा जाए तो इस दुनिया में एक ही सत धर्म है। और एक ही धर्मखण्ड है सच्चा। जहाँ ये सत धर्म स्थापन होता है। उस सत धर्मखण्ड का भी कभी विनाश नहीं होता। झूठे धरमखण्डों का विनाश हो जाता है। ये झूठे-झूठे विधर्मी धर्मखण्ड, विदेशी धर्मखण्ड पहले भी नहीं थे। ढाई हज़ार वर्ष से पहले इनके धरमपिताएं भी नहीं थे, धर्मखण्ड भी नहीं थे। न सृष्टि के आदि में थे, न अंत तक रहेंगे। एक भारतखण्ड ही है जो सच्चे धरमपिता के द्वारा स्थापन होता है। और वो धरमपिता सत कैसे है? अभी बताया। क्या पहचान सच्चे की?
(किसी ने कुछ कहा।) कभी उसका नाश? नहीं होता। वो कौनसा धरमपिता है जिसका कभी नाश ही नहीं होता? ऐसा कोई दुनिया में है? इस सृष्टि का विनाश हो और धरमपिता का विनाश न हो। सारी दुनिया नाशवान। और एक अविनाशी। जिसको कहते हैं गॉड इज़ ट्रुथ। ट्रुथ इज़ गॉड।

तो सृष्टि रूपी रंगमंच पर वो कौन है जो तीनों काल में विद्यमान रहता है? वेदवाणी में बताया। क्या बताया? ब्रह्म वाक्य मुरली में बताया।
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? बताया इस सृष्टि पर सदा कायम कोई चीज़ नहीं है। सदा कायम? (सबने कहा – एक शिवबाबा।) एक ही शिवबाबा है। और जो एक शिवबाबा सदाकायम है, वो ही सदा सत्य है। क्यों? शिव बाप सदा कायम नहीं है? हँ? आत्माओं का बाप सदा कायम नहीं है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) अरे? सदा कायम नहीं है? सिर्फ संगम पर ही आता है। बाकी चार युगों में नदारद। होता ही नहीं। तो क्या सन्यासी है? या प्रवृत्ति मार्ग का पक्का है? (सबने कहा – हाँ।) निराकार आत्माओं का बाप? निराकार आत्माओं का बाप प्रवृत्ति का पक्का है? (किसी ने कहा – नहीं।)

निराकार आत्माओं को पुरुष कहा जाता है। पुरु माने शरीर। श माने शयन करने वाला। जो शरीर रूपी पुरी में शयन करते हैं, आराम करते हैं, उनको कहा जाता है पुरुष। और इस सृष्टि के सभी मनुष्यात्माएं जब जीवनमुक्ति प्राप्त करते हैं, जीवन में रहने वाले बाप से, तो उस जीवनमुक्ति के टाइम पर कम से कम एक जन्म के लिए शरीर रूपी पुरी में आराम से नहीं रहते? इसलिए पुरुष कहे जाते हैं। 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएं सब पुरुष हैं। तो अव्वल नंबर पुरुष हैं या नंबरवार पुरुष हैं? हँ? (किसी ने कहा – नंबरवार।) नंबरवार पुरुष हैं।

कोई तो आलराउंड सृष्टि रूपी रंगमंच पर शरीर रूपी पुरी में रहते, सिर्फ बहुत थोड़े समय के लिए या कहें संगम में ही, अंतिम जन्म में, जिसे एक्स्ट्राआर्डिनरी जन्म कहा जाता है, माना उस जनम में ही आधे समय तक बेआरामी में रहते और आधा समय? आराम से रहते। तो बाकी क्या कहें? 84 जन्म आराम से रहेंगे या बेआरामी में रहेंगे? आराम से रहते हैं। उनमें भी नंबरवार होंगे या एक जैसे होंगे?
(सबने कहा – नंबरवार।) नंबरवार होते हैं, क्योंकि वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली आत्माओं के बीच जो परमपुरुष है, कौन? शिव बाप। परे ते परे स्टेज में रहने वाला बाप, जिसका कोई बाप नहीं। वो परमपुरुष सौ परसेन्ट शरीर रूपी पुरी में रहते सौ परसेन्ट आराम का पार्ट बजाता है। कभी भी बेआरामी अनुभव नहीं करता। इसका मतलब क्या हुआ? कि मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर एक परमपुरष के अलावा और कोई मनुष्यात्मा ऐसी नहीं है जो सदा काल शरीर रूपी पुरी में रहते-रहते आराम से रहे सदाकाल।

A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. In the second line of the first page, the topic being discussed was – What is the root cause of any soul becoming fortunate or any soul becoming unfortunate? Hm? (Someone said – The karma of the past births.) The root cause has also been written – brother, it has been written in the Vedvani, it was said – Brother, this is a fortunate Chariot. How is the fortunate Chariot a reason for bringing fortune or misfortune? Hm? (Someone said – The karmic accounts.) Which actions (karma)? (Someone said – The karmic accounts.) Who teaches karma? Karma, akarma, vikarma – who teaches this in practical? (Someone said something.) Father Shiv? (Someone said – ShivBaba.) Father Shiv gives the knowledge of theory. He is the incorporeal Father of incorporeal souls. You get the inheritance of incorporeal knowledge from the incorporeal Father. Do you want knowledge only in theory or in the practical life as well? (Everyone said – It is required in the practical life as well.) So, from whom is it received? (Someone said something.)

It has been written in the Gita also for the one, whom we call ShivBaba – God said to Arjun – O Arjun – Idam shareeram. This body. Kaunteya, Kshetram iti abhidheeyate. This body of yours is a kshetra (field). It was mentioned in the first chapter of the Gita. It was mentioned in the first shloka. What? Dharmakshetre. This is a field of dharma. Kshetra means battlefield. A field on which a war is fought. It is a field of dharma. It is a battlefield. And it is a battlefield of many religions. Every warrior in this dharmakshetra definitely sacrifices himself through the body, through the mind, through wealth in some percentage or the other. Which warriors? It has been said – Sarva dharmaan parityajya, maamekam sharanam vraj. Abdicate all the religions, the founders of those religions, the propounders of the religions. Parityajya (abdicate). Maamekam sharanam vraj. Come to My asylum only. Come to the asylum of which one? Hm? The other religions which are spread in the world are all untrue religions. Only one religion in this world is true. The Devi-Devataa Sanatan Sat Dharma. Sat means true.

Who should be called true? What is the indication of true and false?
(Someone said something.) It was told in the Gita as well. Naasate vidyate bhaavo. Naa bhaavo vidyate satah. The indication of truth is that that truth never vanishes from this world. Untruth vanishes. It means that untruth runs away and truth? It remains unshakable. If it is true dharma, then through whom would it have been established? Arey? There is Christian religion. It has been established by Christ. There is Buddhism established by Bauddh dharma (Buddha). So, through whom would the true religion, the Sanatan dharma have been established? Was it established through truth or through falsehood? And the truth who established this true religion, will he be true founder of religion or will he be a false founder of religion? Because other founders of religions come on this world stage in between and depart in between. Why? It is because they are not forever truth at all. This is why they have to run away. They have to run away from this world stage.

And if you look further at the history, then there is only one true religion in this world. And there is only one true religious land where this true religion is established. That true religious land is never destroyed. False religious lands are destroyed. These false vidharmi (heretic) religious lands, the foreign religious lands did not exist in the past as well. Neither did their founders of religions exist 2500 years ago nor did those religious lands exist. Neither did they exist in the beginning of the world, nor will they remain till the end. There is only one land of India which is established by the true founder of religion. And how is that founder of religion true? It was told just now. What is the indication of the true person?
(Someone said something.) He is never? Destroyed. Which is that founder of religion who is never destroyed? Is there any such person in the world that the world may be destroyed and the founder of that religion is not destroyed. The entire world is perishable and one is imperishable who is called God is truth, truth is God.

So, who is that one on this world stage who exists in all the three aspects of time? It was told in Vedvani. What has been told? It was mentioned in a Godly sentence (brahm vaakya), the Murli.
(Someone said something.) Hm? It was told that there is nothing permanent in this world. What is permanent? (Everyone said – One ShivBaba.) One ShivBaba alone. And the one ShivBaba who is permanent is forever truth. Why? Isn’t Father Shiv permanent? Hm? Isn’t the Father of souls permanent? Hm? (Someone said something.) Arey? Is He not permanent? He comes only in the Confluence Age. He is absent in all other four Ages. He is not present at all. So, is He a Sanyasi? Or is He firm on the path of household? (Everyone said – Yes.) The Father of incorporeal souls? Is the Father of incorporeal souls firm in household? (Someone said – No.)

Incorporeal souls are called purush. Puru means body. Sha means the one who rests (shayan karne vala). Those who lie, rest in the body like abode are called Purush. And when all the human souls of this world achieve jeevanmukti (liberation in life) from the Father who remains in life (jeevan), then at the time of that jeevanmukti, don’t they live comfortably in the body like abode at least for one birth? This is why they are called Purush. All 500-700 crore human souls are Purush. So, are they number one purush or numberwise purush? Hm? (Someone said – Numberwise.) They are numberwise Purush.

Some live in the body like abode on the world stage allround and for very little time or you may say only in the Confluence Age, in the last birth, which is called an extraordinary birth, i.e. they remain restless for half the time in that birth itself and for half the time? They live comfortably. So, what will be said about the rest [of the births]? Will they live comfortably for 84 births or will they remain restless? They live comfortably. Will they also be numberwise or will they be alike?
(Everyone said – Numberwise.) They are numberwise because the Parampurush among the souls that play their part on this world stage; who? Father Shiv. The Father who lives in the farthest stage and who doesn’t have any Father. That Parampurush plays the part of 100 percent comfort while living 100 percent in the body like abode. He never feels uncomfortable. What does it mean? It means that there is no human soul except one Parampurush on the human world stage who remains comfortably forever while living in the body like abode.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-university.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-university.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Jan 2018

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2391-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.03
Time: 00.01-13.03


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. बात चल रही थी कि आत्मा ही भाग्यशाली बनती है और आत्मा ही दुर्भाग्यशाली बनती है। और ये वेद वाक्य भी है कि ये भाग्यशाली रथ है। आत्मा को भाग्यशाली बनना होता है, दुर्भाग्यशाली बनना होता है। लेकिन आत्मा निराकार है। आत्मा चैतन्य है। और आत्मा स्वतंत्र भी है। कि सदा परतंत्र है? हँ? स्वतंत्र होती है जब पर के संग से परे होती है। पर क्या है? पर है प्रकृति। प्रकृति अर्थात् पाँच तत्वों का संघात – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। जिन पाँच तत्वों से ये शरीर बनता है। और शरीर को रथ कहा जाता है। और रथ, बाप कहते हैं, ये भाग्यशाली रथ है।

गीता में भी लिखा है इदम् शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम् इति अभिधीयते। हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! ये जो शरीर रूपी रथ है तुम्हारा, ये क्षेत्र है। युद्ध क्षेत्र कहो, धर्मक्षेत्र कहो, कर्मक्षेत्र कहो। इस शरीर रूपी रथ का नाम क्या है? हँ? जहाँ दुनिया का बड़े ते बड़ा युद्धक्षेत्र बनाया गया था ड्रामा प्लैन अनुसार। हँ? युद्ध का नाम क्या था?
(सबने कहा – महाभारत।) महाभारी महाभारत युद्ध। जैसा भारी युद्ध दुनिया में न कभी हुआ, और न कभी होगा। इस युद्ध का नाम किसके नाम पर पड़ता है? भारत के नाम पर पड़ता है। और नाम निराकार आत्मा का होता है या साकार शरीर रूपी रथ का होता है? (किसी ने कहा – साकार।) एक ही नाम है मात्र जो निराकार आत्मा के ऊपर होता है। वो है शिव। वो त्रिकालदर्शी है। और बाकी सब नाम? हँ? आत्मा के ऊपर होते हैं या शरीर के ऊपर होते हैं? शरीर के ऊपर होते हैं।

तो उन शरीरधारियों के बीच कौनसा शरीर है जो बाप ने भी, शिव बाप ने, आत्माओं के बाप, बापों का बाप जिसका कोई बाप? है ही नहीं। उस बाप ने उसका टाइटल दे दिया, भाग्यशाली रथ। क्योंकि 84 जन्म के अंत में वो बापों का बाप शिव जिसकी आत्मा का ही नाम शिव है, उसका अपना शरीर? होता ही नहीं। और वो किसमें प्रवेश करके अपना कार्य करता है? नई दुनिया रचने का पुरानी दुनिया विनाश कराने का? जो बापों का बाप है, बाप का काम होता है बच्चों को वर्सा देना। नहीं तो बाप किस बात का? तो वो बाप अपना शरीर न होने से जिस शरीर में मुकर्रर रुप से प्रवेश करता है, उसका टाइटल लेता है भाग्यशाली रथ।

और बताया कि आत्मा ही भाग्यशाली बनती है और आत्मा ही? दुर्भाग्यशाली बनती है। कारण क्या है? बिना कारण के कोई काम होता है क्या? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) क्या बताया? (किसी ने कहा – संग का रंग।) किसके संग का रंग? हँ? (किसी ने कहा – जन्म-मरण।) जन्म-मरण का संग होता है क्या? संग शरीरधारी का होता है, शरीर की कर्मेन्द्रियों से संग लगता है कि बिना शरीर के संग का रंग लगता है? शरीर के द्वारा संग लगता है। और वो बापों का बाप जिसका कोई बाप नहीं है, वो क्या कहता है? हँ? बाप बैठकर कहते हैं – ये भाग्यशाली रथ है। वो त्रिकालदर्शी बाप है। जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है। और बताता है कि ये भाग्यशाली रथ है। गीता में भी उसी को इंट्रोड्यूस किया। अर्जुन की ओर इशारा किया। इदम् शरीरं – ये शरीर। तुम्हारा शरीर या मेरा शरीर? तुम्हारा शरीर। जिसने बोला ‘तुम्हारा शरीर’ उसको अपना शरीर तो होता ही नहीं। वो जिसको बोला उसको स्मृति दिलाई। ये तुम्हारा शरीर जो है निमित्त बनता है अविनाशी ज्ञान यज्ञ कुण्ड के लिए।

ज्ञान यज्ञ का नाम क्या है? अविनाशी रुद्र यज्ञ। शिव रुद्र यज्ञ नहीं। शिव का तो नाम बदलता ही नहीं। शिव तो बिन्दी का नाम है। जिस मुकर्रर शरीर में प्रवेश करते हैं वो आदि में भी रुद्र और महामृत्यु, महाविनाश के समय भी वो रौद्र रूप धारण करता है इसलिए रुद्र। और अविनाशी भी है। कभी विनाश होने वाला नहीं है। और जो भी शरीर हैं मनुष्य मात्र के, देवताओं के, राक्षसों के, प्राणी मात्र के जो भी शरीर हैं वो सब? विनाशी हैं। और ये रुद्र यज्ञ कुण्ड भी विनाशी है या अविनाशी है? अविनाशी है। इस यज्ञ कुण्ड में सारी दुनिया को स्वाहा होना है।


A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed was – The soul itself becomes fortunate and the soul itself becomes unfortunate. And there is a Vedvaakya (sentence of Veda) also that this is a fortunate Chariot. A soul becomes fortunate and unfortunate. But the soul is incorporeal. The soul is living. And the soul is independent (swatantra) as well. Or is it unfree (partantra)? Hm? It is independent when it is free from the company of others (par). What is ‘par’ (alien or unrelated)? Prakriti (nature) is ‘par’. Prakriti means the combination of five elements – Earth, water, air, fire, sky - the five elements with which this body is made up of. And the body is called a Chariot. And the Father says – this Chariot is a fortunate Chariot.

It has been written in the Gita also – Idam shareeram kaunteya kshetram iti abhidheeyate. O Arjun, the son of Kunti! Your body like Chariot is a field (kshetra). Call it a battlefield, a field of dharma, a field of karma. What is the name of this body like Chariot? Hm? The place where the biggest battlefield of the world was set up as per the drama plan. Hm? What was the name of the battle?
(Everyone said – Mahabharata.) Mahaabhaari Mahabharata war – such a fierce war which was never been fought in the world nor will it ever be fought. On whose name is the name of this war coined? It is based on the name of Bhaarat. And does the name belong to the incorporeal soul or to the corporeal body like Chariot? (Someone said – Corporeal.) There is only one name which is based on the incorporeal soul. That is Shiv. He is Trikaaldarshi (knower of past, present and future). And the names of all others? Hm? Are they based on the soul or on the body? They are based on the body.

So, which is the body among those bodily beings which the Father, the Father Shiv, the Father of souls, the Father of fathers, who does not have any Father at all, that Father gave him the title – fortunate Chariot because in the end of the 84 births that Father of fathers, i.e. Shiv, whose name of the soul itself is Shiv, does not have His body at all. And in whom does He enter and perform His task of creating the new world and destroying the old world? The Father of fathers; the task of the Father is to give inheritance to the children. Otherwise, what for is He a Father? So, that Father, because of not having a body of His own, He gives the title of ‘fortunate Chariot’ to the body in which He enters enters permanently.

And it has also been told that the soul itself becomes fortunate and the soul itself? Becomes unfortunate. What is the reason? Is any task performed without any reason? Hm?
(Someone said something.) What has been told? (Someone said – The colour of company.) The colour of whose company? Hm? (Someone said – Birth and death.) Do you get the company of birth and death? Is there company of bodily beings, is the company given through the organs of action of the body or is the colour of company applied without a body? The company is given through the body. And what does that Father of fathers, who does not have any Father say? Hm? The Father sits and says – This is a fortunate Chariot. He is a Trikaaldarshi Father. He does not pass through the cycle of birth and death. And He says – This is a fortunate Chariot. It is he alone who has been introduced in the Gita as well. A gesture was made towards Arjun. Idam shareeram – This body. Your body or My body? Your body. The one who said ‘your body’ does not have a body of his own at all. The one who was addressed like that was reminded. Your body becomes instrumental for the imperishable Gyan Yagya Kund (sacrificial altar of knowledge).

What is the name of the Gyan Yagya? Imperishable Rudra Yagya. Not Shiv Rudra Yagya. The name of Shiv does not change at all. Shiv is the name of the point. The permanent body in which He enters was Rudra in the beginning also and he also assumes a fierce form (Raudra roop) at the time of Mahamrityu (large scale deaths), Mahaavinaash (mega-destruction). This is why He is Rudra. And he is also imperishable. All other bodies of the human beings, of the deities, of the demons, of the living beings are all perishable. And is this Rudra Yagya Kund also perishable or imperishable? It is imperishable. The entire world is to get sacrificed in this Yagya Kund.

---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-university.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-university.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2392-extracts-Bilingual

समय- 00.01-09.50
Time: 00.01-09.50


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. बात चल रही थी - आत्मा ही भाग्यशाली बनती है और आत्मा ही दुर्भाग्यशाली बनती है। तो लिखा हुआ भी है कि भाग्यशाली रथ। जो बाप बैठकर कहते हैं कि ये भाग्यशाली रथ है। 84 जन्म के अंत के भी अंत में मैं इनमें प्रवेश किया। किसलिए? फिर वही भाग्यशाली बनाने के लिए। और फिर कहते हैं तत् त्वम्। वो ही तुम हो। ऐसे कहते हैं। तो तुम किसको कहा और तत् किसको कहा? तत् कहा ‘वह’। और तुम कहा सामने बैठे को। बच्चे ऐसे कहते हैं ना। कि इनका सुनाया। तो कहते तुम्हारा भी ऐसे ही 84 जन्म होता है। इनका माने किनका? इशारा किया बाजू में। बोलने वाला कौन? शिव बाप। और उनकी बाजू में कौन? जिसके द्वारा बोलते हैं। हँ? (किसी ने कहा – प्रजापिता।) ब्रह्मा। बाजू में बैठा है ब्रह्मा। और सामने बैठे हो तुम। जो बताया, मैं तुमको सुनाता हूँ ये बीच में सुन लेता है। तो एक ही बात जब तुम बच्चे समझाएंगे किसी को तो बोलेंगे कि बस, कि भगवान ही तो हमको समझाते हैं। कोई दाढ़ी मूँछ वाला मनुष्य तो हमको नहीं समझाते हैं। भगवान ही तो सुप्रीम सोल है। सुप्रीम बाप है रूह का। सुप्रीम टीचर भी है। और सदगुरू भी है।

तो देखो वो ही भगवान हमको समझाते हैं। और भगवान ही हमको पढ़ाते हैं। तो भगवान तो आय करके राजयोग सिखलाते हैं। क्योंकि नर को नारायण बनाना, विश्व का मालिक बनाना, ये कोई भी धरमपिताओं का तो काम है नहीं। जो सारे विश्व का मालिक बनाय सके। क्यों? कारण? क्योंकि धरमपिताओं में तो देह अभिमान होता है। और शिव बाप में तो देह अभिमान का? नामोनिशान नहीं। वो तो जनम-मरण के चक्र में ही नहीं आता। तो जो सदैव स्वस्थिति में रहता है वो ही स्वर्ग की बादशाही दे सकता है। और स्वस्थिति में रहने वाला ही, कभी भी देहभान में न आने वाला, अहिंसक बनाय सकता है। जो खुद देहभान में रहने वाला हो। वो देहभान से हिंसा होती है या अहिंसा होती है? हिंसा होती है। तो विश्व की बादशाही देने वाला, स्वस्थिति से स्वर्ग की स्थापना करने वाला, एक ही बाप है जो राजयोग से राजाई देते हैं। एक जन्म की नहीं, इक्कीस जन्म की नहीं, 21 जन्मों के आधार पर 63 जन्मों का भी हिसाब बनता है। इसलिए सिद्ध होता है कि बरोबर जब वो आते हैं, तब ही स्वर्ग की स्थापना करने आते हैं। आते ही क्या करते हैं? हँ? स्वर्ग स्थापन कर देते हैं। गायन भी है। एक सेकण्ड में? जनक को जीवनमुक्ति मिली। जीवन में रहें और दुख-दर्दों से मुक्ति मिले, सुख ही सुख मिले। दुःख का नाम-निशान न हो। तो उसको कहते हैं जीवनमुक्ति।

और फिर बताया – स्वर्ग के लिए ये राजा रानियाँ भी चाहिए। जो सभी देवताएं हों, देवी-देवताएं। तो आदि सनातन देवी-देवता धर्म चाहिए ना। क्योंकि नई दुनिया में तो सुख ही होगा ना। हर चीज़, दुनिया की कोई भी चीज़ हो, आदि में सतोप्रधान, मध्य में रजोप्रधान और अंत में? तमोप्रधान बनती है। तो ये दुनिया भी पहले? पहले सतोप्रधान। और सतोप्रधान दुनिया की स्थापना करने वाला सत ही होगा कि झूठ होगा? वन परसेन्ट झूठ होगा? वन परसेन्ट भी झूठ नहीं हो सकता। तो नाम ही है आदि सनातन देवी-देवता धर्म। सनातन माने पुराना। और पुरानों में भी आदि का। तो देखो आदि सनातन देवी-देवता धर्म – ये कोई सतयुग में तो बैठके नहीं सिखलाएंगे। सतयुग के आदि में सिखलाएंगे क्या? जो कहते हैं शास्त्रों में – सतयुग के आदि में नारायण का राज्य था, 16 कला सम्पूर्ण सतयुग होता है तो नारायण भी? 16 कला सम्पूर्ण। तो 16 कला सम्पूर्ण सतयुग में, पहले जनम में नारायण था, तो सतयुग की स्थापना करने वाला पहले हुआ होगा या सतयुग में हुआ होगा? तो सतयुग में बैठ नहीं सिखलाएंगे। सत्वप्रधान होते हैं देवताएं। और देवताओं को सत्वप्रधान बनाने वाला स्वयं भी कैसा होना चाहिए? हँ? सदैव सत् होना चाहिए या कभी झूठा भी होना चाहिए? झूठा तो हो ही नहीं सकता। सत्वप्रधान दुनिया की स्थापना करने वाला सदा सत्। कहते भी हैं सत् चित आनन्द।


A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed was – The soul itself becomes fortunate and the soul itself becomes unfortunate. So, it has also been written – Fortunate Chariot (bhaagyashaali rath). The Father sits and says that this is a fortunate Chariot. I entered in this one at the end of the end of 84 births. Why? To make him the same fortunate one again. And then He says – Tat twam. You too are that. He says so. So, whom did He say ‘you’ (tum) and whom did He say ‘that’ (tat)? Tat was said to ‘that one’. And ‘tum’ was said to the one who is sitting in the front. Children say like this, don’t they? That You narrated about this one. So, He says you also get 84 births like this. ‘Inka’ (this one) refers to which person? A gesture was made towards the side. Who is the speaker? Father Shiv. And who is beside Him? The one through whom He speaks. Hm? (Someone said – Prajapita.) Brahma. Brahma is sitting in the side. And you are sitting in the front. It was told that I narrate to you, this one listens in between. So, when you children explain only one thing to someone then it will be said – that is all, God Himself explains to us. A person with beard and moustache does not explain to us. God Himself is the Supreme Soul. He is the Supreme Father of the soul. He is also the Supreme Teacher. And He is Sadguru as well.

So, look, that same God explains to us. And God Himself teaches us. So, God comes and teaches rajyog because to transform a nar (man) into Narayan, to make him the master of the world is not the task of the founders of religions to make anyone the master of the entire world. Why? What is the reason? It is because the founders of religions have body consciousness. And there is no name or trace of body consciousness in Father Shiv. He does not pass through the cycle of birth and death at all. So, the one who always remains in the stage of the soul (swasthiti) can give the emperorship of heaven. And the one who remains in swasthiti, the one who never becomes body conscious can make non-violent. The one who remains in body consciousness Himself; does body consciousness cause violence or non-violence? It causes violence. So, the one who gives the emperorship of the world, the one who establishes heaven through swasthiti is only one Father who gives kingship through rajyog. Not of one birth, not of 21 births, but the accounts of 63 births are also formed on the basis of the 21 births. This is why it proves that definitely when He comes, only then does He come to establish heaven. What does He do as soon as He comes? Hm? He establishes heaven. There is a praise also. In a second? Janak got jeevanmukti (liberation in life). One should be alive and get liberation from sorrows and pains; one should get only happiness. There should not be any name or trace of sorrows. So, that is called jeevanmukti.

And then it was told – These kings and queens are also required for heaven. All should be deities. So, Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma is required, isn’t it? Because there will be only happiness in the new world, will there not be? Everything, anything in the world is satopradhan in the beginning, rajopradhan in the middle and in the end? It becomes tamopradhan. So, this world also? Is initially satopradhan. And will the one who establishes a satopradhan world be only true or will He be false? Will He be one percent false? He cannot be even one percent false. So, the name itself is Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma. Sanaatan means ancient. And the first one among the old ones. So, look, Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma – this will not be taught sitting in the Golden Age. Will it be taught in the beginning of the Golden Age? It is said in the scriptures – There was a rule of Narayan in the beginning of the Golden Age, there was Golden Age perfect in 16 celestial degrees and Narayan also? Is perfect in 16 celestial degrees. So, he was Narayan in the first birth in the Golden Age which was perfect in 16 celestial degrees; so, did the one who establish the Golden Age exist prior to that or would he have existed in the Golden Age? So, He will not sit and teach in the Golden Age. Deities are satwapradhan. And how should the one who makes the deities satwapradhan be himself as well? Hm? Should he always be true or should he be sometimes false as well? He cannot be false at all. The one who establishes the satwapradhan world is always true. It is also said – Sat chit anand (true, living and blissful).


---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-university.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-university.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 12 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2393-extracts-Bilingual


समय- 00.01-17.12
Time: 00.01-17.12


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – दो चीज़ हैं मुख्य। गेटवे आफ इंडिया और दिल्ली गेट। दिल्ली गेट किसकी यादगार है और गेटवे आफ इंडिया किसकी यादगार है? दिल्ली गेट कहाँ है दिल्ली में? हँ? जिस एरिया में है उस एरिया का नाम है दरियावगंज। दरिया माने? समंदर। काहे का समंदर? दरियावगंद। गंद का दरिया। और दूसरा नाम बताया – गेटवे आफ इंडिया। किसकी यादगार में बनाया गया था? (किसी ने कहा – शहीदों का यादगार।) (किसी ने कहा – महारानी विक्टोरिया।) हाँ। विक्टरी यह। कौनसे धर्म से कनेक्टेड है? हँ? (किसी ने कहा – क्रिश्चियन धर्म।) क्रिश्चियन धर्म से कनेक्टेड है। और ब्राह्मणों की दुनिया में क्रिश्चियन्स ने, क्राइस्ट ने जिसको फोलो किया है और जिससे राशि मिलाई जा सकती है, वो ब्राह्मणों की दुनिया में कौन है? हँ? जो सतयुग के पहले जनम में कृष्ण की आत्मा कही जाती है। सतयुग के फर्स्ट पीढी का फर्स्ट नारायण। कीर्तन में गाते हैं – हे कृष्ण नारायण वासुदेव, 16 कला सम्पूर्ण। वो कृष्ण की राशि क्राइस्ट से मिलाई जाती है। तो कृष्ण की दुनिया में कौन आत्मा निमित्त है? जिसका नाम काम के आधार पर विक्टरी यह – विक्टोरिया। बेहद ब्राह्मणों की दुनिया में विक्टोरिया कौन है? हँ? (किसी ने कहा – छोटी माँ।) हाँ। जो छोटी माँ कही जाती है लक्ष्मी का पार्टधारी, उसका आना हुआ और ये रही विक्टरी।

इसलिए अव्यक्त वाणी में क्या बोला? किसका आवाहन करो?
(सबने कहा – विजय माला।) विजय माला का आवाहन करो। माला माने संगठन। माला के हरेक मणके का तो आवाहन नहीं किया जा सकता। लेकिन जैसे शहद की मक्खियों की रानी होती है उसका आवाहन कर लिया जाए तो सारा छत्ता उड़के वहीं जाता है। तो किस आत्मा को आवाहन करने की बात है? (किसी ने कहा – लक्ष्मी।) हाँ, जी। जो विजयमाला की हेड है वो है गेटवे आफ इंडिया। उसका आना हुआ और राजधानी स्थापन हो जावेगी। कौनसी राजधानी? नई दुनिया की राजधानी या पुरानी दुनिया की राजधानी? (सबने कहा – नई दुनिया।) नई दुनिया की राजधानी स्थापन करने की साकार कौन निमित्त बनती है? ब्राह्मणों की दुनिया में बेहद की विक्टोरिया। उसका यादगार है – क्या? गेटवे आफ इंडिया। जो स्वर्ग के गेट खोलने की माताएं निमित्त बनती हैं उनकी मुखिया कौन हुई? गेटवे आफ इंडिया। स्वर्ग का गेट खोलने वाली मुखिया। उस गेट में क्या खासियत है? हँ? उस गेट की यही खासियत है – दुनिया के सारे काम किस चीज़ से होते हैं, किस शक्ति से? (सबने कहा – पवित्रता।) पवित्रता की शक्ति से। उस गेट में वो पवित्रता की शक्ति है। मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई।

भक्तिमार्ग में ऐसे कौनसी आत्मा का गायन है?
(किसी ने कहा – मीरा।) जिसके लिए बोलते हैं, गायन है – जनम-जनम लगी रगर हमारी वरहुं शंभु न तो रहुं कुंवारी। ऐसी आत्मा जो 84 जन्मों में से कोई जन्म ले कन्या-माता के रूप में, तो एक ही आत्मा का वरण करती है। किसी दूसरे का संकल्प भी नहीं करती। कहाँ की बात है? शूटिंग की बात है या ब्रॉड ड्रामा की बात है? हँ? शूटिंग पीरियड की बात है कि मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई। तो भक्ति मार्ग में भी देखो यादगार बनी है गेटवे आफ इंडिया, जहाँ स्मृति की ज्योति सदैव जगी रहती है। किसकी स्मृति? शिवबाबा की स्मृति। शिव बाप की स्मृति नहीं। शिव बाप और शिव बाबा में क्या अंतर है? कोई अंतर है या नहीं है? (किसी ने कहा – शिवबाप है निराकार।) शिव बाप निराकार आत्माओं का निराकार बाप। और शिवबाबा? साकार मनुष्यात्माओं का साकार बाप। संगमयुग में ये शक्ति धारण करनी है जो बोला है भल द्वापरयुग से, द्वैतवादी युग से पतित तो सब बनते हैं, परन्तु एक से पतित बनना चाहिए या अनेकों से पतित बनना चाहिए? एक से पतित बनना चाहिए। सिक्ख लोगों में भी क्या गायन है? जो एकमात्र धर्म है दुनिया में, देवी-देवताओं का सहयोगी धर्म, क्या गायन है? एक नारी? सदा ब्रह्मचारी। तो उसका यादगार आज भी चल रहा है गेटवे आफ इंडिया।

ये ऐसा गेट है जिसका उद्घाटन का निमित्त वो ही आत्मा बन सकती है जो जीवन में ऐसी पवित्रता धारण करे। कौनसी पवित्रता? साकारी शरीर की साकारी पवित्रता। और निराकार आत्मा की निराकारी पवित्रता। निराकार आत्मा को निराकार शक्ति मिलती है। निराकार की प्रापर्टी। शिवबाबा को, जिसे साकार निराकार का मेल कहा जाता है, उसमें जो निराकार आत्मा है, चैतन्य आत्मा, उस चैतन्य आत्मा को कौनसी प्रापर्टी मिलती है? निराकार आत्मा को निराकार बाप से निराकारी ज्ञान का अखूट भंडार मिलता है। परन्तु जिस तन के द्वारा वो निराकार ज्ञान का अखूट भण्डार का वर्सा मिलता है, अखूट शक्ति मिलती है, जिस ज्ञान की शक्ति के लिए, ईश्वरीय ज्ञान के लिए गीता में भी बोला है – न हि ज्ञान सदृशम् पवित्रम् इहि विद्यते। इस संसार में ईश्वरीय ज्ञान के समान पवित्र कोई भी चीज़ हो ही नहीं सकती।

वो पवित्रता का वर्सा, वो अखूट शक्ति का वर्सा आत्माओं में जो बड़ा भाई है जन्म मरण के चक्र में आने वाली आत्माओं के बीच जो बड़ा भाई है, कौन? हँ? जो पूरे 84 जन्म लेता है। कुछ भी कम नहीं। आलराउण्ड पार्टधारी है। हीरो पार्टधारी। उस आत्मा को बापों के बाप का वर्सा मिलता है। जिस बाप का कोई बाप नहीं। ऊँचे ते ऊँचा बाप। तो वर्सा भी कैसा होगा? ऊँचे ते ऊँचा। क्या वर्सा हुआ ऊँचे ते ऊँचा? हँ? विश्व की बादशाही का वर्सा। विश्व में जो भी धन-संपत्ति है स्थूल, उसका वर्सा या उससे भी कोई ऊँचा वर्सा? त्रिकालदर्शिता का वर्सा। और त्रिकालदर्शी मात्र नहीं। क्योंकि शिव बाप का कहना है – मैं तो सिर्फ त्रिकालदर्शी हूँ। परन्तु तुम बच्चे नंबरवार मास्टर त्रिकालदर्शी बनते हो। मास्टर माने जो प्रैक्टिकल में करके दिखाए क्योंकि प्रैक्टिकल शरीर और शरीर की इन्द्रियों के द्वारा होता है। शिव बाप को न शरीर है और न शरीर की? हँ? इन्द्रियाँ हैं। इसलिए बताया कि बाप के अखूट ज्ञान का भण्डार का वर्सा एक आत्मा को बनता है, जिस त्रिकालदर्शिता की पावर के आधार पर वो सारे विश्व का विजयी बन जाता है। विश्व पिता कहो, विश्वपति कहो, जगतपिता कहो, जगतपति कहो।


A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. In the beginning of the middle of the first page, the topic being discussed was – Two things are main. Gateway of India and Delhi Gate. Whose memorial is the Delhi Gate and whose memorial is the Gateway of India? Where is Delhi Gate situated in Delhi? Hm? The area where it is situated, that area is called Dariyawganj. What is meant by dariya? Ocean. Ocean of what? Dariyavgand. An ocean (dariya) of dirt (gand). And the other name was mentioned as – Gateway of India. In whose memory was it built? (Someone said – It is a memorial of the martyrs.) (Someone said – Queen Victoria.) Yes. Victory yah (this is victory). She is connected to which religion? Hm? (Someone said – Christianity.) She is connected with Christianity. And the one whom the Christians, Christ of the world of Brahmins has followed and the one with whom his zodiac signs can be matched, who is that person in the world of Brahmins? Hm? The one who is called the soul of Krishna in the first birth of the Golden Age. First Narayan of the first generation of the Golden Age. It is sung in the prayers – O Krishna Narayana Vasudev, the one who is perfect in 16 celestial degrees. The zodiac signs of that Krishna is matched with Christ. So, which soul is instrumental in the unlimited world of Krishna? She is named ‘Victory yah’ – Victoria on the basis of the task performed. Who is the Victoria in the unlimited world of Brahmins? Hm? (Someone said – The junior mother.) Yes. As soon as the one who is called the junior mother, the actor playing the part of Lakshmi arrives and you achieve this victory.

This is why what has been said in the Avyakt Vani? Whom should you invoke?
(Everyone said – The rosary of victory.) Invoke the rosary of victory (vijaymala). Rosary means gathering. You cannot invoke every bead of the rosary. But just as there is the queen of the honey bees; if you invoke it, then the entire bee-hive will fly in the same direction. So, it is about invoking which soul? (Someone said – Lakshmi.) Yes. The head of Vijaymala is the Gateway of India. As soon as she arrives the kingdom will be established. Which kingdom? Is it the kingdom of the new world or the kingdom of the old world? (Everyone said – The new world.) Who becomes instrumental in establishing the kingdom of the new world in corporeal form? The unlimited Victoria in the world of Brahmins. What is its memorial? Gateway of India. Who is the head of the mothers who become instrumental in opening the gate of heaven? Gateway of India. The head who opens the gate of heaven. What is the specialty of that gate? Hm? The specialty of that gate is - With which thing, with which power are all the tasks of the world performed? (Everyone said – Purity.) Through the power of purity. That gate has the power of purity. One ShivBaba and none else belongs to me.

On the path of Bhakti, which soul is praised like this?
(Someone said – Meera.) The one for whom it is said, it is praised – Janam-janam lagi ragar hamaari, varahun Shambhu na to rahun kunwaari. (It has been my vow in every birth; either I shall wed Shambhu or I shall remain unmarried.) Such soul, which may get any birth as a virgin or a mother in any of the 84 births, she marries only one soul. She does not even think of anyone else. It is about which place? Is it about the shooting or is it about the broad drama? Hm? It is about the shooting period that one ShivBaba and none else belongs to me. So, look at the path of Bhakti as well – a memorial has been formed on the path of Bhakti – Gateway of India where the light of remembrance keeps burning forever. Whose remembrance? ShivBaba’s remembrance. Not the remembrance of Father Shiv. What is the difference between Father Shiv and ShivBaba? Is there any difference or not? (Someone said – Father Shiv is incorporeal.) Father Shiv is the incorporeal Father of the incorporeal souls. And ShivBaba? The corporeal Father of the corporeal human souls. You have to inculcate this power in the Confluence Age, for which it has been said that although everyone becomes sinful from the Copper Age, from the dualistic Age, yet should you become sinful with one or should you become sinful with many? You should become sinful with one. What is praised even among the Sikhs? It is the only religion in the world acting as the helper religion of the deities; what is praised [about it]? Ek naari? Sadaa Brahmachaari. (The one who remains faithful to his wife throughout his life is like a celibate person.) Her memorial is continuing to this day as the Gateway of India.

This is such a gate for whose inauguration only that soul can become instrumental who imbibes such purity in her life. Which purity? Corporeal purity of the corporeal body. And the incorporeal purity of the incorporeal soul. The incorporeal soul gets the incorporeal power. The property of the incorporeal one. ShivBaba, the one who is called the combination of the corporeal and the incorporeal, the incorporeal soul in it, the living soul, which property does that living soul get? The incorporeal soul gets the inexhaustible storehouse of incorporeal knowledge from the incorporeal Father. But the body through which it gets the inheritance of the inexhaustible stockhouse of incorporeal knowledge, the power of knowledge, the Godly knowledge for which it has been said in the Gita also – Na hi gyaan sadrisham pavitram ihi vidyate. There cannot be anything as pure as the Godly knowledge in this world.

That inheritance of purity, that inheritance of inexhaustible power; the elder brother among the souls, the one who is the elder brother among the souls which pass through the cycle of birth and death; who? Hm? The one who gets complete 84 births. Nothing less. He is an allround actor. The hero actor. That soul gets the inheritance of the Father of fathers. The Father who does not have any Father. The highest on high Father. So, how will the inheritance also be? Highest on high. Which inheritance is the highest on high? Hm? The inheritance of the emperorship of the world. Is it the inheritance of the physical wealth and property of the world or is there any higher inheritance? The inheritance of knowledge of the three aspects of time (trikaaldarshitaa). And not just Trikaaldarshi because Father Shiv says – I am just Trikaaldarshi. But you children become numberwise Master Trikaaldarshi. Master means the one who shows in practical because practical takes place through the body and through the organs of the body. Father Shiv neither has a body nor the organs of the body. This is why it was told that one soul gets the inheritance of the inexhaustible stockhouse of knowledge; on the basis of that power of trikaaldarshitaa, he becomes victorious over the entire world. Call him Vishwapita (the Father of the world), call him Vishwapati (the Lord of the world), call him Jagatpita (the Father of the world) or call him Jagatpati (the Lord of the world).


---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2394-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.55
Time: 00.01-17.55


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – गेटवे आफ इंडिया और दिल्ली गेट। कहाँ हैं? दिल्ली में दोनों ही हैं। दिल्ली गेट भी है और गेटवे आफ इंडिया भी है। ये दो चीज़ मुख्य हैं। गेटवे आफ इंडिया सागर से आती है। कौन है? उसकी यादगार बम्बई में भी है गेटवे आफ इंडिया। उसकी यादगार में जो गेट बनाया गया वो गेट समंदर के रास्ते से आने वाले, क्रिश्चियन खंड से आने वाले, महारानी विक्टोरिया। क्या नाम दिया? विक्टरी यह। विक्टरी माने गेट। ये रही जीत। वो है हद की विक्टोरिया। और यहाँ ब्राह्मणों की दुनिया में है बेहद की विक्टोरिया। जिसके आने से ही जो बोला है वरदान – विजय तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। तो वो हम ब्राह्मणों के बीच आती है और विजय हो जाती है। पूरी पाँच विकारों की दुनिया के ऊपर विजय हो जाती है। वो सागर से होती हुई आती है। उसका रास्ता है सागर, बेहद की विक्टोरिया का सागर, चैतन्य ज्ञान सागर, जहाँ की वो सदा मन-बुद्धि से वासी है।

और दूसरा है दिल्ली गेट। दिल्ली में कहाँ बना हुआ है? दिल्ली के उस एरिया में बना हुआ है जिस एरिया का नाम है दरियावगंद। अर्थात् गंद का दरियाव। दरिया भी समंदर को कहा जाता है। ये दोनों मुख्य हैं। एक विजय दिलाने वाली है। पूरी विकारों की दुनिया पर विजय दिलाने वाली। और दूसरी है गंद के दरियाव में डुबोने वाली। ये दोनों मुख्य हैं। एक है – जो शास्त्रों में भी प्रसिद्ध है – महागौरी। और दूसरी है महाकाली। अभी इन दोनों के ऊपर विचार सागर मंथन तो होता रहेगा। जो मुंझे हुए हैं बहुत लिस्ट बनाकरके भेजी हुई है। रियली गेट आफ मुक्ति और जीवनमुक्ति। ये नाम लिखे हैं। तो आज खयाल हुआ जैसे गेट आफ इंडिया। तो ये है रियली गेट आफ मुक्ति एंड जीवनमुक्ति। क्योंकि दो गेट्स हैं। और हमेशा दो गेट्स होते हैं कोई भी मकान को। ये है सृष्टि रूपी मकान। इन गेट एण्ड आउट गेट। ये अंग्रेजी में भी सुना है ना। एक तरफ से आएंगे, दूसरे तरफ से चले जाएंगे। तो ये बेहद के गेट भी ऐसे ही हैं। हम आय करके और फिर यहाँ से वापस चले जाते।

तो ये है गेट आफ, गेट आफ दि वर्ल्ड। और ये अपना घर। तो घर में ले जाने के लिए गाइड चाहिए। अभी गाईड तो तुम बच्चों को मिला है। कहाँ ले जाने वाला? गेट आफ मुक्ति एंड जीवनमुक्ति। तो गाइड मिला है जो हमें रास्ता बताते हैं। मिला है ना बच्चे। कहाँ जाने का रास्ता बताते हैं? बच्चे जान गए हैं कि मुक्ति और जीवनमुक्ति का रास्ता बताते। कौन? हँ? गेट वे आफ इंडिया। उसको कहा जाता है शान्ति और सुख का रास्ता। तो गेट आफ स्वर्ग लिखें क्योंकि विचार सागर मंथन करना है ना। तो इस बात पर बहुत विचार चलता है, बहुत खयाल चलता है। ये विचार सागर मंथन की बात बाप देते हैं। इसका आवाहन करो। किसका? हँ? गेटवे आफ इंडिया।

ऐसे निबंध लिखें कि क्या नाम रखें? टीचर्स सबको तो नहीं सुनाए जाते हैं ना। कोई कोई को सुनाते भी हैं। टीचर्स को भी सुनाते हैं। स्टूडेंट्स को भी देते हैं कि जाओ विचार सागर मंथन करके आओ। तो बहुत बच्चे हैं विचार सागर मंथन करते हैं कि हम इस गेट का क्या नाम रखें? तो बाबा को आज ख्याल आया कि गेट टूवर्ड्स मुक्ति-जीवनमुक्ति रखें या मुक्ति और जीवनमुक्ति? माना शान्ति और सुख। मुक्ति माना दुख-दर्दों से मुक्ति। जैसे बुखार आता है सारा शरीर नसें, नसें टूटती हैं, हड्डी-हड्डी दर्द होता है। कितना दुःख महसूस होता है। बुखार उतर जाता है तो मुक्ति हुई या नहीं हुई? छुटकारा मिला। इन बातों को वो बन्दरबुद्धि कैसे समझेंगे कि वो चैतन्य में वो गेट आफ इंडिया कौन है? हैं तो दो गेट। एक है गेट आफ नरक। और दूसरा है – गेट आफ स्वर्ग। वो स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने वाली है। उसकी सहयोगी भी है – वो भी स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने वाले हैं। और वो नरक का दरवाज़ा खोलने वाले। तो कोई स्वर्ग का दरवाज़ा खोलके रहते हैं। कोई नरक का दरवाज़ा खोल के बैठ जाती है। ये बातें बन्दरबुद्धियों को जल्दी समझ में नहीं आवेंगी। तुम बच्चे तो अच्छी तरह से समझते हो, समझाते हो। पर ये है बुद्धि की बात।


A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was – Gateway of India and Delhi Gate. Where are they located? Both are located in Delhi itself. There is Delhi Gate as well as the Gateway of India. These two things are main. Gateway of India comes from the ocean. Who is it? Its memorial is in Bombay as well – the Gateway of India. The Gate that was built in its memory was for Queen Victoria who came from the sea way, from the Christian land. What is the name given? Victory yah (this is victory). Victory means gate. This is the victory. That is a limited Victoria. And here, in the world of Brahmins, there is an unlimited Victoria. Just on her arrival, a boon that has been mentioned – Victory is your birth right. So, as soon as she comes amidst us Brahmins, and we gain victory. You gain victory over the entire world of five vices. She comes via the ocean. Her path is the ocean, the ocean of the unlimited Victoria, the living ocean of knowledge where she resides permanently through her mind and intellect.

And the other is the Delhi gate. Where is it built in Delhi? It is built in that area of Delhi which is named Dariyavgand, i.e. an ocean of dirt. An ocean is called dariya. Both of these are main. One fetches victory. The one who fetches victory over the entire world of vices. And the other is the one who drowns in the ocean of dirt. Both these are main. One is – the one who is famous in the scriptures as well – Mahagauri. And the other is Mahakali. Now thinking and churning will keep on taking place on both of these. Those who are confused have sent a big list. Really gate of mukti (liberation) and jeevanmukti (liberation in life). These names are written. So, a thought arose that just as there is the Gate of India. So, this really is the gate of mukti and jeevanmuktii. Because there are two gates. And any house always has two gates. This is a world like house. In gate and out gate. This has been heard in English as well, hasn’t it been? You will come from one side and you will depart from the other side. So, these unlimited gates are also like this. We come and then depart from here.

So, this is gate of, gate of the world. And this is our house. So, a guide is required in order to take you home. Now you children have found the guide. He takes you to which place? Gate of mukti and jeevanmukti. So, we have found the guide who shows us the path. You have found him, haven’t you children? He shows the path to which place? Children have come to know that He shows the path of mukti and jeevanmukti. Who? Hm? Gateway of India. That is called the path to peace and prosperity. So, you should write gate of heaven because you have to churn the ocean of thoughts, shouldn’t you? So, we think a lot on this topic. This topic of churning the ocean of thoughts is given by the Father. Invoke this. Whom? Hm? Gateway of India.

You should write an essay, nibandh that which name should be coined? All the teachers are not told, are they? Some are told. Teachers are also told. Students are also given [a topic] that go and churn the ocean of thoughts. So, there are many childern who churn the ocean of thoughts that what name should we coin for this gate? So, Baba thought today that should I name it ‘gate towards mukti-jeevanmukti’ or mukti and jeevanmukti, i.e. peace and prosperity? Mukti means liberation from sorrows and pains. For example, when you suffer from fever, then the entire body, every nerve, every bone feels painful. One feels so painful. When the fever subsides, then did you become free or not? You became liberated. How will those people with a monkey-like intellect understand these topics that who is that gate of India in living form? There are two gates. One is the gate of hell. And the other is gate of heaven. She opens the gate of heaven. There is her helper as well – They also open the gate of heaven. And they (others) open the gate of hell. So, some keep the gate of heaven open. Some sit with the gate of hell open. Those with a monkey-like intellect will not understand these topics easily. You children understand and explain well. But this is a topic of the intellect.


---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2395-extracts-Hindi

समय- 00.01-11.07
Time: 00.01-11.07


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – कि जब बाप आए, नई दुनिया में पीस एण्ड प्रासपेरिटी थी। कब थी? जब बाप आए। कहाँ आए? नई दुनिया में। कौनसा बाप आए? बेहद के दो बाप हैं। एक आत्माओं का बाप, एक मनुष्य सृष्टि का बाप। तो नई दुनिया में जब पीस एंड प्रासपर्टी थी, जब बाप आए तो नई दुनिया स्थापन करने वाला भी तो चाहिए ना। कौन? हँ? स्थापन करने वाला कौन नई दुनिया में? अरे? (किसी ने कहा – साकार लक्ष्मी-नारायण।) सिर्फ साकार? उसमें निराकारी स्टेज वाला नहीं? हँ? (किसी ने कहा – साकार-निराकार का मेल।) हाँ। साकार निराकार का मेल। जो निराकारी वर्सा ज्ञान का देने वाला निराकारी बाप कहता कि मैं तुम बच्चों को आप समान नंबरवार बनाकर जाऊँगा। तो नई दुनिया, जो नंबरवार बच्चे होंगे उनके द्वारा स्थापन होगी या अव्वल नंबर के द्वारा स्थापन होगी? इसलिए मुसलमान भी आज कहते हैं अल्लाह अव्वलदीन। अल्लाह ने आकरके अव्वल नंबर दीन अर्थात् धर्म की स्थापना की।

तो जो नई दुनिया स्थापना करने वाला था, वो पतित-पावन है। फादर है। अंग्रेज लोग कहते हैं गॉड फादर। गॉड फादर कहते हैं या सुप्रीम गॉड फादर कहते हैं? हँ? सुप्रीम गॉड फादर नई दुनिया में आते हैं? आते हैं? नहीं आते। गॉड फादर आते हैं। जो गॉड फादर इस नई दुनिया में आते हैं, नई दुनिया स्थापन करने वाला है तो अभी हमको इस पुरानी दुनिया से निकल करके पहले घर जाना पड़े। किसको जाना पड़े। किसको जाना पड़े? हम कौन हैं? आत्मा। हम आत्माओं को आत्माओं के घर जाना पड़े। पीछे आना पड़े। कहाँ आना पड़े? पीस एंड प्रासपर्टी की दुनिया में। तो जिस पीस एंड प्रासपर्टी की दुनिया में आना पड़े, वो गेट हुआ ना। पीस एंड प्रासपर्टी की दुनिया का गेट। तो विचार सागर मंथन भी करना पड़े।

पोस्ट आ जाएगी तो बाबा लिख देंगे – बाबा को तो ये अच्छा लगता है। क्या? गेट आफ प्यूरिटी, पीस एंड प्रासपरिटी। तो उस गेट का करके उद्घाटन करें, ओपनिंग करें। कौन आकरके ओपनिंग करे? हँ? अभी तो बताया बाबा को ये अच्छा लगता है। गेट आफ प्यूरिटी, पीस एंड प्रासपर्टी उस गेट का आकरके ओपनिंग करें। कौन? अरे?
(किसी ने कहा – बापदादा।) बापदादा? बाबा। बापदादा और बाबा में अंतर नहीं पता चला? हँ? मूल रूप में बापदादा किसे कहें? अरे? बाप किसे कहें? जिसका कोई बाप नहीं। और जिसका कोई बाप नहीं, वो आत्माओं का बाप, सुप्रीम सोल, उसके सब आत्माएं बच्चे हैं। उन बच्चों में बड़ा बच्चा कौन? हँ? कौन? मनुष्य सृष्टि का बाप। तो जो बड़ा बच्चा है, वो बड़ा बच्चा बाप की प्रापर्टी का पहले-पहले हकदार होता है या नहीं होता है? कब होता है? पुरुषार्थी जीवन में जब तक साकार शरीर का भान रहता है तब होता है या साकार शरीर का भान खत्म हो जाता है, 100 परसेन्ट आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाता है, तब गेट का ओपनिंग करता है? (किसी ने कहा – देहभान खत्म हो जाता है।)

तो बताया, आकरके ओपनिंग करे। किसका ओपनिंग करे? प्यूरिटी, पीस एंड प्रासपरिटी के गेट का ओपनिंग करे जिसकी यादगार बनी हुई है दिल्ली में इंडिया गेट। अभी ओपन तो बाबा करते हैं। कौन करते हैं? (सबने कहा – बाबा।) बाबा किसे कहा जाता है? (सबने कहा – साकार निराकार का मेल।) साकार और निराकार के मेल को बाबा कहा जाता है। तो मेल हो गया? हँ? सदा काल का मेल हो गया? हँ? निराकार आत्माओं के बाप और मनुष्य सृष्टि के साकार मनुष्य का, मनुष्यात्मा का मेल हो गया? हो गया? हँ? कहेंगे – नहीं हो गया। पहली बार जो थोड़े समय के लिए मेल हुआ, वो तारीख याद है? पाँच? (सबने कहा – दिसम्बर।) दिसम्बर। कौन-कौनसी आत्माओं का मेल बताया? हँ? मनुष्यात्माओं के बाप और आत्माओं के बाप सुप्रीम सोल का मेल बताया पहली बार। तो देखो वो तो आरम्भ था। सदा काल के लिए कहें? 5 दिसम्बर का मेल सदा काल के लिए कहें या प्रैक्टिस आरम्भ होने की बात है? हँ? (किसी ने कहा – प्रैक्टिस की बात है।) हाँ, जी।

A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page was that when the Father came, there was peace and prosperity in the new world. When did it exist? When the Father came. Where did He come? In the new world. Which Father came? There are two unlimited Fathers. One is the Father of souls, one is the Father of the human world. So, when there was peace and prosperity in the new world, when the Father came, then the one who establishes the new world is also required, isn’t He? Who? Hm? Who establishes in the new world? Arey? (Someone said – The corporeal Lakshmi-Narayan.) Just corporeal? Isn’t the one with incorporeal stage included in that? Hm? (Someone said – The combination of the corporeal and incorporeal.) Yes. The combination of corporeal and incorporeal. The incorporeal Father who gives the incorporeal inheritance of knowledge says that I will make you children numberwise equal to Myself and depart. So, will the new world be established by the numberwise children or by the number one? This is why the Muslims say even to this day – Allah Avvaldeen. Allah came and established the number one deen, i.e. religion.

So, the one who established the new world is the purifier of the sinful ones (patit-paavan). He is the Father. The Englishmen say – God Father. Do they say ‘God Father’ or do they say ‘Supreme God Father’? Hm? Does the Supreme God Father come in the new world? Does He come? He does not come. God Father comes. God Father, who comes in this new world, the one who establishes the new world, so, now we have to come out of this old world and go home first. Who will have to go? Who will have to go? What are we? Soul. We souls have to go to the home of the souls. Later on we will have to come. Where will we have to come? In the world of peace and prosperity. So, the world of peace and prosperity where we have to come is the gate, isn’t it? The gate of peace and prosperity. So, one should also churn the ocean of thoughts.

When the post (letter) comes, then Baba will write – Baba likes this. What? Gate of purity, peace and prosperity. So, He should come and open that gate, perform the opening. Who should come and perform the opening? Hm? It was told just now – Baba likes this. Gate of purity, peace and prosperity. He should come and perform the opening of that gate. Who?
(Someone said – BapDada.) BapDada? Baba. Didn’t you understand the difference between BapDada and Baba? Hm? Who should be called BapDada in original form? Arey? Who should be called the Father? The one who does not have any Father. And the one who does not have any Father, that Father of souls, the Supreme Soul, all the souls are His children. Who is the eldest child among those children? Hm? Who? The Father of human world. So, the eldest child, is that eldest child entitled to the Father’s property first of all or not? When is he entitled? Is he entitled [to the property] as long as he is conscious of the body in the purusharthi life or does he perform the opening of the gate when the consciousness of the corporeal body ends completely, when he becomes 100 percent constant in the soul conscious stage? (Someone said – When the body consciousness ends.)

So, it was told that He should come and perform the opening. Whose opening should he perform? He should perform the opening of the gate of purity, peace and prosperity whose memorial is made in Delhi as India Gate. Well, it is Baba who opens. Who opens? (Everyone said – Baba.) Who is called Baba? (Everyone said – The combination of corporeal and incorporeal.) The combination of corporeal and incorporeal is called Baba. So, did the combination take place? Hm? Did they combine forever? Hm? Did the Father of the incorporeal souls and the corporeal human being, the human soul of the human world combine? Did they? Hm? It will be said – They did not. The combination that took place for the first time for some time, do you remember that date? Fifth? (Everyone said – December.) December. Combination of which two souls was mentioned? Hm? The very first meeting of the Father of human souls and the Father of souls, the Supreme Soul was mentioned. So, look, that was the beginning. Will it be said forever? Will the meeting of 5th December be said forever or is it about the beginning of the practice? Hm? (Someone said – It is about practice.) Yes.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2396-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.00
Time: 00.01-14.00


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. चौथे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – बाप बच्चों को कहते हैं कि तुम भी ये बताओ कि दो गेट्स हैं। एक तो होता है स्वर्ग में प्यूरिटी, पीस एण्ड प्रासपेरिटी का गेट जिसकी यादगार में ब्रॉड ड्रामा में इंडिया गेट बनाया गया जब उस दुनिया की महारानी विक्टोरिया आई थी विदेश से। वहाँ उस पीस, प्रासपर्टी एंड प्यूरिटी की गेट में कैसे जाते हो और वो गेट कैसे खोलते हो क्योंकि तुम बच्चे तो जानते हो, गेटवे टू हेविन इज़ महाभारत। महाभारी महाभारत गृह युद्ध स्वर्ग के गेट खोलता है क्योंकि भारत में और भारत की राजधानी में सभी धर्म पनप रहे हैं। और बाप कहते हैं – सर्व धर्मान् परित्यज्य। इन सब धर्मों को छोड़ दो। धर्मों को छोड़ दो, धर्मपिताओं को छोड़ दो। गीता में भी बोला – मामेकम् शरणं ब्रज। मुझ एक बाप की शरण में आ जा। जो ऊँच ते ऊँच अल्लाह अव्वलदीन गाया हुआ है। अल्लाह ऊँचे ते ऊँचे को कहा जाता है। और उस अल्लाह ने आकरके अव्वल अर्थात् नंबर वन धर्म की स्थापना की थी। दीन धर्म को कहा जाता है। तो बाबा को ध्यान में आया क्योंकि ये सभी विचार सागर मंथन चलता है ना बच्चे। तो गेट टूवर्ड्स मुक्ति जीवनमुक्ति, शांति और सुख। ‘फॉर 21 जेनरेशन’ भी लिख सकते हो। समझा ना।

तो भई अभी बरोबर ये दरवाज़ा खुलते हैं। आधा कल्प के लिए खुलते हैं। हाफ कल्प भी लिख सकते हो क्योंकि बहुत सारे अक्षर गेट में नहीं लिख सकते हैं ना। तो सिर्फ लिख देना चाहिए – गेट टूवर्ड्स प्यूरिटी, पीस एण्ड प्रासपेरिटी फॉर हाफ कल्प। और ये हाफ कल्प की बात भी बंदर तो समझेंगे नहीं। क्योंकि उन्हों को तो हिस्ट्री इस दुनिया की ढाई हज़ार वर्ष की ही मिलती है। तो फिर उस गेट में ब्रैकट में 2500 इयर भी लिख सकते हैं। गेटवे टू हेविन। जिस हेविन में दुःख-अशान्ति का नाम-निशान नहीं होगा। बाबा कहते कि भई मैं तो समझाता हूँ ये सोच-सोच करके। तुम बच्चे उनको बताय सकते हो। बाबा बोलते हैं – उनको बिचारे को भेज देते हैं। बिचारे बहुत मुंझ गए। और ये बाबा भी बहुत ही दफा क्या-क्या लिखते रहते हैं। आज रात को विचार करते-3, विचार सागर मंथन तो सुबह को होता है ना। सवेरे अमृतवेले विचार सागर मंथन करना चाहिए। मक्खन भी कब निकालते हैं? घर-घर में चले जाओ जहाँ भैंस हैं, गइयाँ होती हैं, देखो मक्खन कब निकालते हैं? सवेल में निकालते हैं ना। तो बाबा भी कहते हैं – ये है बेहद का अमृतवेला। वो हद का अमृतवेला होता है जिस अमृतवेले में वो जड़ सूर्य निकलता है जड़ रोशनी देने वाला। और ये है बेहद का अमृतवेला, बेहद का ज्ञान सूर्य – बेहद ज्ञान की रोशनी देने वाला। तो विचार सागर मंथन करने से ये मक्खन निकलता है।

30.3.67 की वाणी का पांचवाँ पेज। अमृतवेले को मंथन करने से बहुत अच्छी राय निकलती है। सुबह को खयालात बहुत अच्छी होती है। तो तभी बाबा कहते हैं बच्चे – सवेल में उठ करके बाबा को याद करो। और कैसे किसको रास्ता बतावें। जब भी ऐसी कोई बात आती है गेट खुलने के लिए सब बिचारे राय पूछते हैं। सो ही बाबा इसमें बोलते तो रहते हैं ना। तो सबको मालूम पड़ता है। भई विचार सागर मंथन करके जयपुर वालों को लिख दो या बाप को लिख दो कि हमने ये विचार सागर मंथन किया। तो कोई बहुत अच्छा विचार निकल आता है। जो एक अक्षर में भी कोई समझ जावे। परन्तु मुश्किलात है एक अक्षर में समझने के लिए क्योंकि ये बन्दरबुद्धि इशारे से समझने वाले नहीं हैं। तो ये तो फैसला कर ही देते हैं कि नहीं, नई दुनिया का गेट इन पतितों से नहीं खुलवाना है। ऐसी शुभ चीज़ को बन्दरों से उद्घाटन नहीं कराना चाहिए। कोई पावन से, वो अभी अच्छा शंकराचार्य क्योंकि पावन तो है ना। फिर भी तो पावन है। समझा ना। भले है बड़ा शंकराचार्य। बाबा कहते बड़ा एप है, बड़ा बन्दर। वो सबसे बड़ा एप क्योंकि सर्वव्यापी का तो उनके मुख से निकलता ही नहीं कि भगवान सर्वव्यापी नहीं है। कितना उनको समझाते हैं। तो ये जो बोर्ड भी बनवाए हैं, बाप ने बैठकरके बनवाए हैं ना कि ये बोर्ड लगाओ कि गीता का भगवान आखरीन में कौन है क्योंकि गीता के भगवान ने स्वर्ग की स्थापना की।


A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the fourth page was – The Father tells the children that you should also tell that there are two gates. One is the gate of purity, peace and prosperity in heaven, in whose remembrance the India Gate was built in the broad drama when the Queen Victoria of that world came from abroad. How do you go there in that gate of peace, prosperity and purity and how do you open that gate because you children know that the gateway to heaven is Mahabharata. The fiercest Mahabharata civil war opens the gate of heaven because all the religions prosper in India and in India’s capital. And the Father says – Sarva dharmaan parityajya. Leave all these religions. Leave the religions, leave the founders of the religions. It has been said in the Gita as well – Maamekam sharanam brij. Come to the asylum of Me, the one Father who is praised as the highest on high Allah Avvaldeen. The highest on high is called Allah. And that Allah came and established the Avval, i.e. number one religion. Religion is called Deen. So, Baba thought of it because all this churning of the ocean of thoughts takes place, doesn’t it children? So, the gate towards mukti, jeevanmukti, peace and prosperity. You can also write ‘for 21 generations’. Did you understand?

So, brother, now definitely these gates are opened. They open for half a Kalpa. You can also write half a Kalpa because you cannot write many words on the gate. So, you should just write – Gate towards purity, peace and prosperity for half Kalpa. And the monkeys will not understand this topic of half Kalpa because they find the history of this world for only two and a half thousand years. So, then you can also write 2500 years within brackets on that gate. Gateway to heaven. A heaven where there will not be any name or trace of sorrows and peacelessness. Baba says – Brother, I explain after thinking a lot. You children can tell them. Baba says – I send to them, the poor ones. Poor ones have become very confused. And this Baba also writes what all things many a times. Today night while thinking, thinking and thinking; the churning of the ocean of thoughts takes place in the morning only, doesn’t it? One should churn the ocean of thoughts at Amrit Vela. When is the cream also extracted? Go to every home [in villages], where there are buffaloes, cows, look, when do they extract the cream? They extract in the mornings. So, Baba also says – This is an unlimited Amrit Vela. That is a limited Amrit Vela; in that Amrit Vela that non-living Sun, which gives non-living light, rises. And this is an unlimited Amrit Vela, the unlimited Sun of Knowledge who gives the unlimited light of knowledge. So, this cream emerges by churning the ocean of thoughts.

Fifth page of the Vani dated 30.3.67. Very good opinion emerges by churning at Amrit Vela. One can think very well in the mornings. So, that is why Baba says – Children wake up in the morning and remember Baba. And how else should I show the path to someone! Whenever any such topic emerges about opening of the gate, then everyone asks for an opinion. Baba keeps on telling about the same in it, doesn’t He? So, everyone gets to know. Brother, churn the ocean of thoughts and write to those from Jaipur or write to the Father that we churned the ocean of thoughts like this. So, a very good thought emeges so that some one could understand in a word as well. But it is difficult to understand in a word because these people with a monkey-like intellect are not going to understand through gestures. So, they decide that no, the gate of the new world is not to be opened through these sinful ones. Such an auspicious thing should not be inaugurated by the monkeys. By a pure one, that now okay Shankaracharya because he is pure, isn’t he? He is otherwise pure. Did you understand? Although he is a big Shankaracharya. Baba says – he is a big ape, big monkey. So, the biggest ape because the topic of ‘sarvavyaapi’ (God being omnipresent) does not emerge from their mouth at all that God is not omnipresent. They are explained so much. So, these boards also which have been prepared, the Father sat and prepared them that this board should be displayed that ultimately who is the God of Gita because the God of Gita established heaven.


---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-university.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-university.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 18 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2397-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.05
Time: 00.01-18.05


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. सातवें पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – ये जो शास्त्रों में गाया हुआ है – अतीन्द्रिय सुख की अवस्था पूछो तो गोप-गोपियों से पूछो। ये रिजल्ट पुरुषार्थियों के लिए पिछाड़ी की है। अभी की नहीं है। कबकी? हँ? (किसी ने कहा – पिछाड़ी की।) नहीं-नहीं। पिछाड़ी की तो है। अभी माने कब की नहीं है? 67 की वाणी है ना। उस समय बताया – एक साल के बाद ब्रह्मा बाबा ने शरीर छोड़ दिया। तो क्या पिछाड़ी नहीं हुआ गोप-गोपियों के लिए? उस समय की भी बात नहीं है क्योंकि गोप-गोपी कहा जाता है इन्द्रियों से गुप्त संबंध जोड़ने वाले के लिए। अलग-अलग प्रकार की रचना होती है इन्द्रियों की। भाई-बहन का संबंध, बेटी-बाप का संबंध, माँ-बेटी का संबंध, बाप-बेटे का संबंध। और बाबा कहते हैं तुम सब सीताएं हो। तुम सब पार्वतियाँ हो। तुम सब द्रौपदियाँ हो। तुम सब सजनियाँ हो एक साजन की। तो ये ढेर के ढ़ेर संबंध जो हैं वो निराकार आत्माओं के बाप, निराकार बाप के साथ हैं या निराकार बाप जिस साकार में प्रवेश करते हैं उसके लिए हैं? क्योंकि निराकार बाप का संबंध निराकार आत्माओं से सिर्फ एक संबंध है। क्या? बाप और बच्चे का संबंध। बाप और बच्ची का भी संबंध नहीं।

तो वो बापों का बाप कहते हैं – मैं जब इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आता हूँ, तो तुम बच्चों के साथ अनेक प्रकार के देह के इन्द्रियों के संबंध जोड़ता हूँ। तब ये पूरा परिवार बनता है वसुधैव कुटुंबकम्। सारी दुनिया एक परिवार बनती है। उनमें भी ये तुम बच्चों का है राज परिवार। राजा रानियों का परिवार। एक जन्म के लिए नहीं है। अनेक जन्मों के लिए है। किसके साथ? किसके साथ?
(किसी ने कहा – साकार के साथ।) हाँ। जिसके लिए बोला, ब्रह्म वाक्य में ही बोल दिया – इस सृष्टि पर सदा कायम कोई चीज़ है ही नहीं। सदा कायम एक शिव बाबा ही है। लेकिन ये संबंध नंबरवार हैं। एक जैसे नहीं हो सकते क्योंकि ये नंबरवार पढ़ाई है राजयोग की। जिस राजयोग की पढ़ाई पढ़करके तुम बच्चे जन्म-जन्मान्तर के राजाएं बनते हो।

ये राजाई की पढ़ाई दुनिया में कोई ने नहीं पढ़ाई। दुनिया के बड़े ते बड़े ग्रेट फादर्स – इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, आदि ने भी नहीं पढ़ाई क्योंकि सभी मनुष्यात्माएं देह और देह की प्रकृति के आधीन हैं क्योंकि अपन को देह समझते हैं। पाँच तत्वों के पुतले हैं। कोई भी स्वाधीन नहीं। खासकर जबसे ये द्वैतवादी दुनिया बनी। जिस दुनिया में दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो कुल, दो-दो मतें, दो-दो भाषाएं चल पड़ीं। तबसे इस दुनिया में कोई मनुष्य मात्र स्वाधीन नहीं। सब पराधीन हैं। और जो स्वयं पराधीन होंगे वो क्या बनाएंगे? हँ? पराधीन ही बनाएंगे। पर है प्रकृति। पर है माया। स्व माने आत्मा। तो जो सदैव स्वस्थिति में रहने वाला है, वो ही ऐसी पढ़ाई पढ़ाता है कि स्वाधीन रहो और स्वाधीन रहने दो। स्वतंत्र रहो और स्वतंत्र रहने दो। स्वतंत्र तो राजाएं होते हैं। राजा के ऊपर कोई का तंत्र, कोई की राजाई नहीं चलती। राजा स्वाधीन होता है। तो सदैव स्वस्थिति में रहने वाला बाप, जो बापों का बाप है, जिसका कोई बाप नहीं। वही स्वाधीन राजा बनाने की पढ़ाई पढ़ाता है। और तो दुनिया में सब आधीन बनाने वाले हैं। एक भी आत्मा नहीं जो पराधीन न बनाती हो सिवाय इस मुकर्रर रथ के। जिस मुकर्रर रथधारी आत्मा में मैं पार्ट बजाता हूँ।

बताया कि अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति तब ही हो सकती है जब इस देह की सभी इन्द्रियों से परे का सुख भोगा जाए। चाहे वो श्रेष्ठ इन्द्रयाँ ही क्यों न हों, ज्ञानेन्द्रियाँ। देह का अंग हैं, विनाशी हैं, इसलिए अतीन्द्रिय सुख नहीं कहा जा सकता। अतीन्द्रय सुख तभी हो सकता है जब देह की स्मृति से परे चले जाए आत्मा। ऐसे निरन्तर आत्मिक स्थिति बन जाए कि देह की इन्द्रियों से परे रह करके जो ऊँचे से ऊँचा सुख मिलेगा वो निरन्तर का सुख होगा। इस कलियुग के अंत में तो क्षणभंगुर सुख रह गया है। काग विष्टा समान सुख रह गया है। काग विष्टा क्यों कहा? क्योंकि काग अर्थात् कौवा वो सुख लेता है जो मनुष्य त्याग देता है। मनुष्य जो खानपान का भोग का सुख लेता है, उस सुख को मलमूत्र के द्वारा मनुष्य त्याग देता है। और उस मलमूत्र को कौवा खाता है। तो क्या सुख आएगा? क्षणभंगुर भी नहीं कहें।

तो बाप कहते हैं – इस जीवन में रहते निरंतर का सुख भोगना हो, वो कैसा सुख होता है, ये पूछना हो तो गोप-गोपियां ही बताय सकती हैं। जिन्होंने भगवान बाप के साथ चाहे ज्ञान इन्द्रियों से, चाहे कर्मेन्द्रियों से गुप्त संबंध जोड़ा है, जो गुप्त संबंध इतना तीव्र संबंध है कि जब मनुष्य मरता है, तो वो तीव्र संबंध जो सारा जीवन भोगा है, जिस संबंध से वो संबंध अंत समय में याद आ जाता है। और अंत मते सो गति हो जाती है। चाहे वो ज्ञानेन्द्रियों का संबंध ही क्यों न हो, या फिर कर्मेन्द्रियों का संबंध हो। जीवनभर जिन इन्द्रियों से सुख भोगा जाता है, चाहे वो मेल की इन्द्रियां हो, चाहे वो फीमेल की इन्द्रियाँ हों, मृत्यु के समय अंतकाल में वो लंबे समय का भोगा हुआ सुख जरूर याद आता है।

तो बताओ वो कौनसा गुप्त संबंध है? जो देवी-देवताओं को भी अनुभव होता है, जो देवी-देवताएं ज्ञानेन्द्रियों से सुख भोगते हैं। जैसे ब्रह्मवाक्यों में, वेदवाणी में बाबा ने हमको बताय दिया, साक्षात्कार से बनाए हुए लक्ष्मी-नारायण के चित्र में इशारा दे दिया कि लक्ष्मी-नारायण जो नर से उसी जीवन में डायरेक्ट नारायण बनते हैं और नारी लक्ष्मी डायरेक्ट उसी जीवन में नारायणी बनती है, राजयोग सीखकरके, उनका ऐसा संबंध होता है जो अतीन्द्रिय सुख प्राप्त कराता है। देह की इन्द्रियों से उसका कोई कनेक्शन नहीं क्योंकि देह और देह की इन्द्रियाँ अलग चीज़। और देह में रहने वाली आत्मा? हँ?
(किसी ने कहा – अलग चीज़।) अलग। आत्मा अविनाशी और देह? विनाशी। तो जो अविनाशी आत्मा है उसके स्वरूप को पहचानें और अविनाशी आत्मा के स्वरूप में टिककर स्मृति में रहकर, आत्मा के बाप के साथ स्मृति का कनेक्शन जोड़ें।

A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the seventh page was – it is famous in the scriptures – If you wish to ask about supersensuous joy (ateendriy sukhh), then ask the Gop-Gopis. This result is about the end for the purusharthis. It is not about the present time. It is of which time? Hm? (Someone said – Of the end.) No, no. It is indeed of the last period (pichaari). ‘Now’ means it does not concern which time? It is a Vani dated 1967. It was told at that time – Brahma Baba left his body after one year. So, was it not the last period for the Gop-Gopis? It is not about that time as well because Gop-Gopis are said to be those who establish incognito relationship through the organs. There are different kinds of creations of the organs. There is a relationship of brother and sister, relationship of daughter and Father, relationship of mother and daughter, relationship of Father and son. And Baba says – You all are Sitas. You all are Parvatis. You all are Draupadis. You all are wives (sajniyaan) of one husband (saajan). So, are these numerous relationships with the Father of the incorporeal souls, with the incorporeal Father or are they for the corporeal one in whom that incorporeal Father enters? It is because the incorporeal souls have only one relationship with the incorporeal Father? Which one? The relationship of the Father and son. Not even that of a Father and a daughter.

So, that Father of fathers says – When I come on this world like stage, then I establish various kinds of relationships with you children through the organs of the body. Then this entire family is established as Vasudhaiv Kutumbkam. The entire world becomes a family. Even among them this is a royal family of you children. A family of kings and queens. It is not for one birth. It is for many births. With whom? With whom?
(Someone said – With the corporeal.) Yes. It was said for him, it was said in the Brahmvaakya itself – There is nothing permanent in this world. One ShivBaba alone is permanent. But these relationships are numberwise. They cannot be alike because this is a numberwise study of rajyog. By studying this knowledge of rajyog you children become kings for many births.

Nobody taught this knowledge of rajyog in the world. The biggest great fathers of the world – Ibrahim, Buddha, Christ, etc did not teach this knowledge as well because all human souls are subservient (aadheen) to the body and body’s nature because they consider themselves to be a body. [They think] they are effigies of the five elements. Nobody is independent (swaadheen), especially from the time this dualistic world started. In this world two religions, two kingdoms, two clans, two opinions, two languages started. No human being has been independent in this world since then. All are subservient. And what will those who are subservient make others? Hm? They will make them subservient (paraadheen) only. Prakriti (nature) is ‘par’ (unrelated). Maya is ‘par’. ‘Swa’ means soul. So, only the one who always remains in swasthiti teaches such knowledge that you remain independent (swaadheen) and let others remains independent (swaadheen). Be free and let others be free. Kings are free (swatantra). Nobody’s rule (tantra) works over the king, nobody’s kingship works on him. A king is independent. So, the Father who always remains in swasthiti, the one who is Father of fathers, the one who does not have any Father. He alone teaches the knowledge to become a king. All others make you subservient in the world. There is not even a single soul which does not make others subservient except this permanent Chariot (mukarrar rath), the soul of the permanent Chariot in which I play My part.

It was told that you can achieve supersensuous joy only when you enjoy the pleasure that is beyond all the organs of the body. Be it the righteous organs, the sense organs. They are organs of the body, they are perishable; this is why it cannot be called supersensuous joy. Supersensuous joy is possible only when the soul goes beyond the remembrance of the body. One should develop such continuous soul conscious stage that the highest joy that you will receive while being away from the organs of the body will be a continuous happiness. In the end of the Iron Age what remains is just momentary pleasure. What remains is just pleasure like the excreta of crow (kaag vishta samaan sukkh). Why was it called ‘kaag vishtaa’? It is because kaag, i.e. a crow takes that pleasure which human beings excrete. The pleasure of eating food that a human being enjoys, he excretes it through urine or stools. And the crow eats that excreta. So, what pleasure will it derive? It will not be called even momentary.

So, the Father says – If you want to enjoy continuous happiness in this life, if you want to ask about that joy, then only those Gop-Gopis can tell who have established incognito relationship with God, the Father, be it through the sense organs, be it through the organs of action; the incognito relationship is such an intense relationship that it comes to the mind in the end. And as are the thoughts in the end so is the fate that one achieves. Be it the relationship of the sense organs or the relationship of the organs of action. The organs through which one enjoys pleasure throughout the life, be it the male’s organs or the female’s organs, that pleasure derived for a long period definitely comes to the mind at the time of death, in the last period.

So, tell, which is that incognito relationship? The deities, who enjoy pleasure through the sense organs, those deities also experience that. For example, Baba told us in the Brahmavaakyas (Godly sentences), in Vedvani – a hint was given in the picture of Lakshmi-Narayan that was prepared through divine visions that Lakshmi-Narayan, who become direct Narayan from nar (man) in the same life and naari (woman) Lakshmi becomes direct Narayani in the same life by learning rajyog; their relationship is such that it fetches supersensuous joy. They do not have any connection with the organs of the body because body and the organs of the body are different things. And the soul that resides in the body? Hm?
(Someone said – Is a different thing.) Different. The soul is imperishable and the body? Is perishable. So, you should realize the form of the imperishable soul and by becoming constant in the form of the imperishable soul, you should establish connection of remembrance with the Father of the soul.

---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
VCD-2398-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.36
Time: 00.01-14.36


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. सातवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – देह को भूल करके और देह के संबंधों को भूल करके एक बाप को याद करता रहे। उठते, बैठते, चलते-फिरते एक बाप ही याद रहे। क्योंकि भक्ति तो प्रत्यक्ष है और ये बाप गुप्त है। कौनसा बाप? बेहद के दो बाप हैं। एक है आत्माओं का बाप। और दूसरा है सारी मनुष्य सृष्टि का बाप। और भक्ति मार्ग में कौनसे बाप की भक्ति प्रत्यक्ष है? और कौनसा बाप गुप्त है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) आत्माओं का बाप गुप्त है? सारी दुनिया निराकार बाप को ही तो याद करती है क्योंकि अभी ये सारी दुनिया में वो बाप सर्वव्यापी मान बैठे हैं। तो प्रत्यक्ष है या गुप्त है? दिखावा है तो प्रत्यक्ष है। नहीं तो गुप्त है। परन्तु कौनसा बाप गुप्त है?

निराकार आत्माओं का निराकार बाप इस सृष्टि पर आते हैं तो साकार मनुष्य सृष्टि के बाप में प्रवेश करते हैं। प्रवेश तो करते हैं परन्तु जिसमें प्रवेश करते हैं उसको यज्ञ के आदि से कोई पहचान नहीं पाता। जो मनुष्य सृष्टि का पहला पत्ता है – 16 कला सम्पूर्ण कृष्ण वाली आत्मा – वो संगमयुग में पहचान पाती है? पहला पत्ता ही नहीं पहचान पाता, तो दूसरे कहाँ से पहचान पाएंगे? तो उस मनुष्य सृष्टि के बाप की पहचान कौन देता है? हँ?
(किसी ने कहा – ब्रह्मा।) ब्रह्मा? जो खुद नहीं जानता। ब्रह्मा उर्फ सतयुगी कृष्ण वाली आत्मा खुद ही नहीं जानती कि बाप कौन है और न जानने के कारण अपन को ही गीता का साकार भगवान समझे बैठी है। मैं ही गीतापति भगवान हूँ साकार में। अब गीतापति भगवान 16 कला संपूर्ण देवता बनने वाली आत्मा होगी या कलातीत आत्मा होगी? कहते भी हैं कलातीत कल्याण कल्पांतकारी।

तो जो कलाओं से भी परे है, कलाओं में बांधा हुआ नहीं है, वो तो सूर्य है। सूर्य को कलाओं में बांधा जाता है क्या? सूर्य कलाओं से बाधित है? कलाओं में बंधायमान देवताएं होते हैं। और देवताओं को देवता बनाने वाला भगवान होता है। जो गीता में भी गायन है – नर अर्जुन को गीतापति भगवान ने ऐसा ज्ञान दिया, जो नर अर्जुन नारायण बना, नारी द्रौपदी नारायणी बनी। तो बनाने वाला ऊँचा हुआ या बनने वाली रचना ऊँची हुई? वो बनाने वाला कौन? बनाने वाला हेविनली गॉड फादर कहा जाता है। अंग्रेज भी मानते हैं – हेविन का रचयिता, स्वर्ग का रचयिता गॉड फादर। मुसलमान भी मानते हैं – अल्लाह मियाँ ने हेविन की रचना की, जन्नत की रचना की। और आदम को जन्नत में भेजा। ऐसे कहते हैं। परन्तु वो ये नहीं जानते, न क्रिश्चियन्स जानते हैं, न मुसलमान जानते हैं कि हेविन अर्थात् स्वर्ग साकार है या निराकार? हँ? साकार है। तो साकार का रचयिता साकार होना चाहिए या निराकार होना चाहिए?
(सबने कहा – साकार।)

जो निराकार आत्माएं हैं उन निराकार आत्माओं को निराकारी ज्ञान का वर्सा देकरके अपना परिचय देने वाला निराकार बाप है। उसका वर्सा भी निराकार है। बाप भी? निराकार है। तो वो निराकारी बाप इस सृष्टि पर आता है तो किसके पीछे भाग के आता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) जो गीता में भी कहा है – मैं जब आता हूँ तो अपना टाइटल अपने बच्चे को देता हूँ। कोई भी बाप है, अपना टाइटल बच्चे को देता है या नहीं देता है? तो वो निराकार बाप निराकार आत्माओं का निराकारी ज्ञान देने वाला ज्ञान सूर्य है। और हम बच्चे सितारे हैं। जैसे स्थूल दुनिया में स्थूल सूर्य होता है, स्थूल सितारे होते हैं। वो जड़ सितारे हैं। और हम? चैतन्य सितारे हैं। वो आसमान के सितारे हैं। और हम? धरती के सितारे हैं। अरे? वो आसमान की ऊँचाई पर चमकने वाले सितारे और हम धरती के सितारे क्यों नीचे? नीचे की स्टेज में क्यों हैं? क्योंकि हमें अपनी आत्मा का पूरा ज्ञान नहीं है। इसलिए हम धरती के सितारे हैं। जब हमें अपनी आत्मा का पूरा ज्ञान हो जाता है, तो हम कहाँ के रहवासी हैं? हँ? सूरज, चाँद, सितारों से भी पार? ब्रह्मलोक के रहवासी हैं। जो ब्रह्मलोक परमब्रह्म भी कहा जाता है। वो हमारे रहने का मूल स्थान है।

A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the seventh page was - Keep on remembering one Father by forgetting the body, forgetting the relationships of the body. You should remember one Father alone while getting up, sitting, walking because Bhakti is revealed and this Father is incognito. Which Father? There are two unlimited Fathers. One is the Father of souls. And the other is the Father of the entire human world. And the Bhakti of which Father is revealed on the path of Bhakti? And which Father is incognito? Hm? (Someone said something.) Is the Father of souls incognito? The entire world remembers the incorporeal Father only because now in this entire world they consider that Father to be omnipresent. So, is He revealed or incognito? If there is ostentation then He is revealed. Otherwise He is incognito. But which Father is incognito?

When the incorporeal Father of the incorporeal souls comes in this world then He enters in the Father of the corporeal human world. He does enter but nobody is able to recognize the one in whom He enters from the beginning of the Yagya. The first leaf of the human world - the soul of Krishna who is perfect in 16 celestial degrees - is it able to recognize [Him] in the Confluence Age? When the first leaf himself is unable to recognize, then how will the others be able to recognize? So, who gives him the introduction of the Father of the human world? Hm?
(Someone said - Brahma.) Brahma? The one who himself does not know. Brahma alias the soul of Golden Age Krishna itself does not know that who is the Father and because of not knowing it has considered itself to be the corporeal God of Gita. I myself am God, the husband of Gita (Gitapati Bhagwaan) in corporeal form. Well, will a soul which becomes a deity perfect in 16 celestial degrees be Gitapati Bhagwaan or will a soul which is beyond celestial degrees (kalaateet) be that? It is also said - Kalaateet kalyaan kalpaantkaari.

So, the one who is beyond the celestial degrees, the one who is not bound in celestial degrees is the Sun. Is the Sun bound in celestial degrees? Is the Sun bound by celestial degrees? The deities are bound by celestial degrees. And it is God who makes deities as deities. It is praised in the Gita as well - Gitapati God gave such knowledge to the man Arju that the man Arjun became Narayan and woman Draupadi became Narayani. So, will the maker be higher or will the creation who becomes so, be higher? Who is that maker? The maker is called the heavenly God Father. The Englishmen also believe - the creator of heaven, the creator of swarg (heaven) is the God Father. Muslims also believe - Allah Miyaan created heaven, created Jannat. And He sent Aadam to Jannat. They say so. But they do not know; neither the Christians know nor the Muslims know whether heaven, i.e. swarg is corporeal or incorporeal? Hm? It is corporeal. So, should the creator of corporeal be corporeal or should He be incorporeal?
(Everyone said - Corporeal.)

The one who gives the inheritance of incorporeal knowledge to the incorporeal souls and gives His introduction to the incorporeal souls is the incorporeal Father. His inheritance is also incorporeal. The Father is also? Incorporeal. So, when that incorporeal Father comes in this world, then behind whom does He run? Hm? (Someone said something.) It has been said in the Gita also - When I come, then I give my title to my child. Does any Father give his title to his child or not? So, the incorporeal Father of the incorporeal souls is the Sun of Knowledge who gives the incorporeal knowledge. And we children are stars. Just as there is a physical Sun, physical stars in the physical world. They are the non-living stars. And we? We are living stars. They are the stars of the sky. And we? We are stars of the Earth. Arey? They are the stars shining in the heights of the sky and why are we stars of the Earth below? Why are we in a lower stage? It is because we souls do not have the entire knowledge of our soul. This is why we are stars of the Earth. When we get the complete knowledge of our soul, then we are residents of which place? Hm? We are residents of the Brahmalok situated beyond the Sun, the Moon and the stars. That Brahmalok is also called Parambrahm. That is our original place of residence.

---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2399-extracts-Bilingual

समय- 00.01-12.25
Time: 00.01-12.25


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. गीत चला है – ओम नमो शिवाय। पितु मातु सहायक स्वामी सखा, तुम ही सबके रखवारे हो। ऊँचे ते ऊँची स्टेज है ना। इसलिए गाया जाता है, ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। कौन है? हँ? कौन है ऊँचे ते ऊँचा? अरे? (सबने कहा – शिव बाबा।) कोई आत्मा है ऊँचे ते ऊँची स्टेज वाली। कौन है? बड़े चक्कर में फंस गए? भई, अच्छी महिमा उसकी क्या है? ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। भई, वो बाप भी है। टीचर भी है और सदगुरू भी है। सुप्रीम बाप है, साकार मनुष्य सृष्टि का। सुप्रीम टीचर भी है साकार मनुष्य सृष्टि में। और सदगुरू तो होता ही है साकार। सच्चा गुरू। जो सिक्ख लोग गाते हैं एक सदगुरू निराकार। अकालमूर्त।

तो चलो, जरूर ये तीनों ही, इसको अब से सर्विस करनी पड़ेगी। किसको? हँ? ये सर्विस किसको करनी पड़ेगी समझाने की? इसको। किधर इशारा किया?
(किसी ने कहा – नारायण।) नारायण की तरफ इशारा किया? वो नारायण बनेगा तो सर्विस करेगा? हँ? जरूर ये तीनों ही सर्विस इसको करनी पड़ेगी। किसको? (किसी ने कहा – प्रजापिता।) इसको? बाजू में बैठे हुए को ‘इसको’ कहा जाता है या सन्मुख बैठे हुए को कहा जाता है ‘इसको’? (सबने कहा – बाजू में।) तुम बच्चों को कहते हैं ‘तुमको’। जो बाजू में उठाकरके रख दिया, सन्मुख बैठ करके उससे बात नहीं करते हैं। बोलते भी हैं – मैं तुमको सुनाता हूँ, और ये? ये बीच में सुन लेता है।

तो बताया – इसको अभी ये सर्विस करनी पड़ेगी। पड़ेगी? क्या मजबूरी आ गई क्या? हँ? क्या मजबूरी आ गई इसको? ‘इसको’ माने किसको? ब्रह्मा बाबा को। क्या मजबूरी आ गई जो सडसठ में बोला – इसको ये सर्विस करनी पड़ेगी समझाने की? क्या समझाने की? हँ?
(किसी ने कहा – गीता का भगवान मैं नहीं।) ओहो, भगवान की तो बात ही नहीं कर रहे अभी। गीता के भगवान की कहाँ बात हो रही है? बात हो रही है सुप्रीम बाप, सुप्रीम टीचर और सदगुरू एक ही गाया जाता है। गाया जाता है। गायन, पूजन, यादगार कहाँ के हैं? हँ? संगमयुग में कोई ने बाप, टीचर, सदगुरू का ऊँचे ते ऊँचा पार्ट बजाया है। उसके लिए गाया जाता है ऊँचे ते ऊँचा भगवंत।

ऊँच और नीच इस दुनिया की बात है या पारलोक की बात है? हँ? इस दुनिया की बात है। तो ये समझाने की सर्विस किसको बताई खास करनी पड़ेगी? पड़ेगी। अभी भले चाहता है, नहीं चाहता है, बुद्धि में बैठा है, नहीं बैठा है, समझता है, नहीं समझता है। लेकिन इसको ये समझाने की सर्विस करनी पड़ेगी, लेकिन समझाएगा किसको?
(किसी ने कहा – प्रजापिता।) प्रजापिता को समझाएगा? (किसी ने कहा – यही बाप, टीचर, सद्गुरू है, यही प्रजापिता।) प्रजापिता को समझाएगा? प्रजापिता के द्वारा तो खुद ही बोलता है। मुकर्रर रथ के रूप में बोलता है। मुकर्रर रथ के रूप में समझाता है। किसको? इसको। कि वो सुप्रीम बाप भी है इस सृष्टि में। सुप्रीम टीचर भी है। माना इस साकार सृष्टि में उसको जन्म देने वाला कोई बाप नहीं है। जो गाते भी हैं – सिच्छक हौं, सिगरे जग को, तिय ताको कहाँ अब देति है सिच्छा। कौनसी आत्मा बोलती है? हँ? प्रजापिता वाली आत्मा बोलती है। ये तो इस दुनिया की बात है। जो शास्त्रों में गाई हुई है, कवियों ने गाई हुई है, लेकिन है वास्तव में संगमयुग की बात। जिसका नाम कवि ने सुदामा रख दिया। सु माने सुन्दर, दाम माने? हँ? धन-संपत्ति। बेहद की धन-संपत्ति। ज्ञान की धन-संपत्ति।

वो ज्ञान की धन-संपत्ति वाला, उस जनम में जो सबसे गरीब बन गया वो गरीब की बात बोली। और उसको समझाना पड़ेगा कि वो कौन है जिसके लिए गरीब निवाज़ गाया हुआ है? साहूकार निवाज़ नहीं। कौन गाया हुआ है? हँ? चक्कर में पड़ जाते। क्या बात है? अरे गरीबनिवाज़ कौन गाया हुआ है?
(किसी ने कहा – शिवबाबा।) हँ? शिवबाबा? हँ? (किसी ने कहा – ब्रह्मा।) ब्रह्मा? सुदामा। वो खुद ही गरीब है वो क्या गरीबनिवाज़ बनेगा? हँ? (किसी ने कहा – शिव बाप।) हँ? शिव बाप। जो अखूट ज्ञान का भण्डार है। वो शिव बाप गरीब ते गरीब को देता है। क्यों गरीब बन गया? हँ? क्योंकि इस झूठ खण्ड की दुनिया में, द्वैतवादी दुनिया में आकर उसे झूठखण्ड से जन्म-जन्मान्तर टकराना पड़ता है, युद्ध करने पड़ते हैं।

A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The song played is – Om Namo Shivay. Pitu maatu sahaayak swami sakhaa, tum hii sabke rakhvaare ho. (You are my Father, mother, lord, friend; you are the protector of everyone.) It is the highest on high stage, isn’t it? This is why He is praised as the highest on high God. Who is it? Hm? Who is the highest on high? Arey? (Everyone said – ShivBaba.) There is a soul in the highest on high stage. Who is it? You have got entangled in a big confusion? Brother, what is His good praise? Highest on high God. Brother, He is the Father as well. The is a Teacher as well as Sadguru. He is the Supreme Father of the corporeal human world. He is also the Supreme Teacher in the corporeal human world. And Sadguru is anyways corporeal. The true Guru. The Sikhs sing – One Sadguru incorporeal. Akaalmurt.

So, definitely these three, this one will have to do service now onwards. Who? Hm? Who will have to do this service of explaining? This one. In which direction was a gesture made?
(Someone said – Narayan.) Was a gesture made towards Narayan? Will he do service when he becomes Narayan? Hm? Definitely this one will have to do all these three kinds of service. Who? (Someone said – Prajapita.) This one? Is the one who is sitting beside called ‘isko’ (this one) or is the one sitting in the front called ‘this one’? (Everyone said – The one sitting beside.) You children are called ‘tumko’ (you). The one who was lifted and placed in the side; He does not talk to him face to face. He also says – I narrate to you and this one? This one listens in between.

So, it was told – This one will have to do this service now. ‘Will have to’? What is the compulsion? Hm? What is his compulsion? ‘Isko’ (this one) refers to whom? Brahma Baba. What is the compulsion that He said in Sixty seven – this one will have to do this service to explain? Explain what?
(Someone said – I am not the God of Gita.) Oho, the topic of God is not being mentioned now at all. Is the topic of God of Gita being discussed? The topic being discussed is – Only one is praised as the Supreme Father, Supreme Teacher and Sadguru. He is praised. Praises, worships, memorials are of which time? Someone has played the highest on high part of Father, Teacher and Sadguru in the Confluence Age. It is praised for him – Highest on high God.

Is high and low a topic of this world or about the other world (paarlok)? Hm? It is about this world. So, it was mentioned that who will have to especially do this service of explaining? Will have to. Although he may or may not wish now, although it may have sit or may not have sit in his intellect, although he may have understood or may not have understood, yet this one will have to do the service of explaining. But whom will he explain?
(Someone said – Prajapita.) Will he explain to Prajapita? (Someone said – This Father, Teacher, Sadguru; this Prajapita.) Will he explain to Prajapita? He Himself speaks through Prajapita. He speaks in the form of a permanent Chariot. He explains in the form of a permanent Chariot. Whom? This one. That he is the Supreme Father also in this world. He is a Supreme Teacher as well. It means that there is no Father who gives birth to him in this corporeal world. It is also sung – Sichchak haun, sigrey jag ko, tiy taako kahaan ab deti hai sichcha (He is the teacher of the entire world; who can teach Him?) Which soul speaks? Hm? The soul of Prajapita speaks. This is about this world. It has been praised in the scriptures, the poets have sung, but it is actually a topic of the Confluence Age. Poet named him as Sudama. Su means sundar (beautiful); daam means? Hm? Wealth and property. Unlimited wealth and property. Wealth and property of knowledge.

A mention was made about the poor one who possesses the wealth and property of knowledge but became the poorest one in that birth. And he will have to explain that who is the one for whom it is said ‘Garibniwaaz’ (friend of the poor)? Not saahookaarniwaaz (friend of the rich). Who is praised? Hm? You feel confused. What is the matter? Arey, who is praised as Garibniwaaz?
(Someone said – ShivBaba.) Hm? ShivBaba? Hm? (Someone said – Brahma.) Brahma? Sudama. He himself is poor; how will he become a Garibniwaaz? Hm? (Someone said – Father Shiv.) Hm? Father Shiv. The one who is an inexhaustible store-house of knowledge. That Father Shiv gives to the poorest one. Why did he become poor? Hm? It is because he has to clash, fight with this world of falsehood, after coming in this dualistic world, with the abode of falsehood.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 21 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2400-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.17
Time: 00.01-13.17


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. आठवें पेज के आदि में बात चल रही थी - ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। उसकी अच्छी महिमा क्या है? वो बाप भी है। सुप्रीम टीचर भी है तो सदगुरू भी है। एक ही है। तो चलो जरूर ये बाप, टीचर, सद्गुरू – ये तीनों ही ये सर्विस इसको करनी पड़ेगी। किसको? ‘इसको’ कहते थे तो किस तरफ इशारा करते थे? इसको, यह। हँ? ब्रह्मा बाबा की ओर इशारा करते थे क्योंकि उनकी बाजू में ही बैठा हुआ है शिव सुप्रीम सोल। तो इसको, ब्रह्मा को अभी ये सर्विस करनी पड़ेगी। भविष्य में। माना सडसठ में नहीं कर रहा है। हँ? ये सर्विस, बाप, टीचर, सदगुरू को समझाने की सर्विस सिक्स्टी सेवन (67) में नहीं कर रहा था? हँ? कर रहा था? नहीं कर रहा था। तब तो बताया कि भविष्य में ये सर्विस करनी पड़ेगी। कब? जब खुद इस गहरे प्वाइंट को समझे। क्या? कि वो बाप भी है, सद्गुरू भी है और सुप्रीम टीचर भी है।

बाप बना है तो बाप ही कहेंगे। बाप कैसे बनता है? हँ? आदि में बीज बोता है तो बाप बनता है। अंत में वर्सा देता है तो बाप बनता है। बाप माना ही वर्सा। तो बाप बना है। बना है! माना पहले नहीं था? पहले था या नहीं था? भले होगा। कोई जानता तो नहीं था। तो बाप बना है। वर्तमान की बात बताई। संगमयुग में। बाप बना है तो बाप ही कहेंगे ना। कैसे बना? पास्ट में बना या भविष्य की बात बताई? बना। हँ? पास्ट की बात बताई। सन् 36-37 की बात बताई। जो गीता में भी लिखा है – अहम् बीज प्रदःपिता। मैं मनुष्य सृष्टि का बीज बोने वाला पिता हूँ। तो बीज बोने वाला पिता बना है तो बाप ही रहेंगे। ऐसे थोड़ेही कि अंतिम पार्ट में बदल जाएंगे, शिक्षा देंगे बच्चों को। शिक्षा भी देते हैं, टीचर बनकरके।

अब ये भी गारंटी है कि अभी साथ में भी जाना पड़ेगा। अभी माने कभी? संगम में, संगमयुग में अभी साथ भी जाना पड़ेगा। पड़ेगा? माने कम्पलशन है कि सभी को साथ जाना है? हँ? कहाँ जाना पड़ेगा? हँ? अरे? जहाँ से आते हैं वहीं जाना पड़ेगा। उसे कहते ही हैं परमब्रह्म। ब्रह्मलोक। जिसे ये बाप ही कह सकता है, सुप्रीम सोल बाप। जो सबका बाप है। उसका कोई बाप नहीं, कि मद्योनि महत्ब्रह्म तस्मिन गर्भम् दधाम्यहम्। मेरी योनि रूपा माता महत्ब्रह्म है। महत् तत्व जिसे कहा जाता है। पंच तत्व जैसा नहीं है। महान तत्व है। तुरीया तत्व है। कौन है तुरीया तत्व? महत् तत्व, परमब्रह्म, जिसमें मैं ज्ञान का बीजारोपण करता हूँ। कोई भी बाप, बीजरूप बाप किसमें ज्ञान, किसमें बीजारोपण करता है? माता में करता है। वो सामान्य बाप है। और ये तो परमपिता है। सुप्रीम गॉड फादर कहा जाता है। तो माता भी? साधारण माता होगी क्या? महत् ब्रह्म। गीता में भी आया। इसे परमब्रह्म भी कहें। वो हमारा घर है। कोई भी बच्चे इस दुनिया में आते हैं, हद की दुनिया में भी हद के बच्चे आते हैं, तो कहाँ से आते हैं? हँ? माँ से आते हैं ना। कहाँ से आते हैं? माता से आते हैं।

तो ये परंपरा किसने डाली? कबसे ये परंपरा चली? हँ? बेहद मनुष्य सृष्टि के बच्चे कहाँ से आते हैं? परम ब्रह्म से आते हैं। ब्रह्मा कोई एक का नाम तो नहीं है। वो तो बोला है ब्रह्मवाक्य मुरली में – मैं जिसमें भी प्रवेश करूंगा उसका नाम? ब्रह्मा रखूंगा। परन्तु वो तो टेम्पररी नाम है। टेम्पररी रथ है। मेरा मुकर्रर रथ, उसी को कहा जाता है महत् ब्रह्म। परमब्रह्म। मैं किसमें आता हूँ? रथ में आता हूँ या आत्मा में आता हूँ? रथ में आता हूँ। तो जो रथ है, जिसे सन्यासी लोग तो कहते हैं भगवान है। हँ? हद की दुनिया के सन्यासी ही कहते हैं कि शूटिंग पीरियड में बेहद की दुनिया के भी सन्यासी कहते हैं? किसे? ब्रह्मा को। क्या कहते हैं? भगवान है। लेकिन ब्रह्म रहने का स्थान है या भगवान है? रहने का स्थान है। तो वहाँ अभी साथ में जाना पड़ेगा। वो गुरू सच्चा गुरू भी है। नहीं तो दुनिया में तो अनेक गुरू होते हैं। लेकिन गायन है सच्चा सद्गुरू शिव भगवान। जिसे कहते हैं ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त। ऊँचे ते ऊँचा और नीचे ते नीचा कहाँ की बात है? इस साकार सृष्टि की बात है। तो महिमा भी कहाँ होती है? साकार सृष्टि में कितनी महिमा है! अगर बच्चे महिमा भी गाते रहें तो भी अहो सौभाग्य। बुद्धि में गाते हैं। कोई मुख से गाने की बात नहीं है।


A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the eighth page was – The highest on high God. What is his good glory? He is a Father also. He is the Supreme Teacher as well as Sadguru. He is only one. So, definitely this one will have to do all these three services of Father, Teacher, Sadguru. Who? When He used to say ‘isko’ (this one), towards whom did He used to point? Isko, yah (this one). Hm? He used to point towards Brahma Baba because the Supreme Soul Shiv is sitting beside him only. So, this one, Brahma will have to do this service now. In future. It means that he is not doing in sixty seven. Hm? Was he not doing this service of explaining about the Father, Teacher, Sadguru in sixty seven? Hm? Was he doing? He wasn’t doing. That is why it was told that he will have to do this service in future. When? When he himself understands this deep point. What? That he is a Father also, Sadguru also and the Supreme Teacher as well.

When he has become a Father, he will be called a Father only. How does he become a Father? Hm? When he sows the seed in the beginning, then he becomes a Father. In the end when he gives the inheritance, then he becomes a Father. Father itself means inheritance. So, he has become a Father. He has become! Does it mean that he wasn’t earlier? Was he or wasn’t he in the past? He may have been. Nobody knew. So, he has become a Father. A topic of the present was mentioned. In the Confluence Age. When he has become a Father, then he will be called a Father only, will he not? How did he become? Did he become in the past or was a topic of the future was mentioned? He became. Hm? A topic of the past was mentioned. A topic of 36-37 was mentioned. It has been written in the Gita also – Aham beej pradahpita. I am the Father who sows the seed of the human world. So, when he has become the Father who sows the seed then he will remain a Father only. It is not as if he will change in the last part, he will teach the children. He also gives teachings as a Teacher.

Well, it is also guaranteed that now you will have to go along as well. ‘Now’ refers to which time? In the Confluence Age, now everyone will have to go along. ‘Will have to’ (padega)? Does it mean that there is a compulsion that everyone has to go along? Hm? Where will you have to go? Hm? Arey? You will have to go from the place where you come. That is called Parambrahm only. Brahmlok. Only this Father, the Supreme Soul Father, who is everyone’s Father can say this. He does not have any Father – Madyoni mahatbrahm tasmin garbham dadhamyaham. My Yoni like mother is Mahatbrahm. The one which is called Mahat tatwa. He is not like the five elements (pancha tatwa). He is a great tatwa. He is a unique element (turiya tatwa). Who is turiya tatwa? Mahat tatwa, Parambrahm in whom I sow the seed of knowledge. In whom does any Father, the seed like Father sow the seed? He sows in the mother. That is about the ordinary Father. And this one is the Supreme Father. He is called the Supreme God Father. So, the Mother also? Will she be an ordinary Mother? Mahat Brahm. It has been mentioned in the Gita as well. Call this the Parambrahm as well. That is our home. Any children come to this world, the limited children come in the limited world; so, where do they come from? Hm? They come from the mother, don’t they? Where do they come from? They come from the Mother.

So, who started this tradition? Since when did this tradition start? Where do the children of the unlimited human world come from? They come from the Param Brahm. Brahma is not the name of one person. It has been said in the Brahmavaakya Murli – In whomsoever I enter, will name him/her? Brahma. But that is an temporary name. It is a temporary Chariot. My permanent Chariot, that itself is called Mahat Brahm. Parambrahm. In whom do I come? Do I come in a Chariot or in a soul? I come in a Chariot. So, the Chariot whom the Sanyasis call God; hm? Do the Sanyasis of the limited world alone say or do the Sanyasis of the unlimited world also say in the shooting period? Whom? Brahma. What do they say? He is God. But is Brahm the place of residence or God? It is the place of residence. So, you will have to go there along now. That Guru is a true Guru as well. Otherwise there are many Gurus in the world. But it is praised that the true Sadguru is God Shiv who is called the highest on high God. Highest on high and lowest on low is a topic of which place? It is about this corporeal world. So, where are praises also made? There is so much glory in the corporeal world! Even if the children keep on singing praises, it is their great fortune. They sing in the intellect. It is not about singing through the mouth.

---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11574
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 23 Sep 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2401-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.35
Time: 00.01-17.35


प्रातः क्लास चल रहा था – 30.3.1967. आठवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – हम सब ब्रदर्स हैं। ज्योतिबिन्दु-बिन्दु आत्मा-आत्मा भाई-भाई हैं। और वो हमारा बाप है। तो वो हमारा भाई है या बाप है? बाप है। क्यों? हम भी बिन्दु, वो भी बिन्दु, तो हमारा बाप कैसे? हँ? (किसी ने कहा – जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता।) हाँ। हम मनुष्यात्माएं जन्म-मरण के चक्र में आने वाली भोगी आत्माएं हैं। और वो जन्म-मरण के चक्र में न आने वाला कभी भी, अभोक्ता है। तो वो है तो बिन्दु लेकिन हमको वर्सा काहे का देता है? तो वर्सा देने वाला बाप ही कहा जाता है। बाप माने वर्सा। परन्तु वो हमें क्या वर्सा देता है? ज्ञान का वर्सा। कैसे ज्ञान का वर्सा? (सबने कहा – निराकारी ज्ञान।) निराकारी ज्ञान का वर्सा तो ठीक। निराकारी आत्माओं को निराकारी वर्सा ही मिलेगा। परन्तु वो निराकार जिसको हाथ, पांव, नाक, आँख, कान, मुख है ही नहीं, वो वर्सा कैसे देगा? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? साकार के द्वारा वर्सा देगा? तो साकार के द्वारा जो वर्सा देगा वो निराकार वर्सा देगा या साकार वर्सा देगा? (किसी ने कहा – साकार वर्सा देगा।) निराकार के द्वारा साकार वर्सा देगा?

निराकारी बाप है तो निराकारी वर्सा देने वाला। क्योंकि जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है तो त्रिकालदर्शी है। इसलिए तीनों काल का वर्सा देता है सत्य का। तीनों काल का सत्य इस मनुष्य सृष्टि में कोई मनुष्यात्मा के पास नहीं है। है? परन्तु उसको मुख नहीं है। तो वो निराकार बाप हमको वर्सा कैसे देगा?
(किसी ने कहा – साकार द्वारा।) हम मनुष्यात्माएं साकार हैं, हमारी आत्मा निराकार है, तो कहें कि हम निराकार भी हैं और हम साकार भी हैं। हम मनुष्यात्माओं के अन्दर निराकार और साकार का मेल है ना। तो हमको वर्सा कौन देगा? (किसी ने कहा – शिव बाप।) शिव बाप? शिव बाप तो निराकार है। (किसी ने कहा – साकार के द्वारा।) अरे चींटी चींटी को वर्सा देगी, हाथी हाथी को वर्सा देगा, जैसा बाप वैसे बेटे को वर्सा देगा। नहीं? हँ? ऐसे तो नहीं कि हाथी चींटी को वर्सा दे देगा? तो निराकार बाप निराकार आत्माओं को तीनों काल का वर्सा देता है। परन्तु हम जो मनुष्यात्माएं हैं, वो निराकार आत्मा भी हैं और साकार? शरीर भी हैं। हम निराकारी सो साकारी हैं ना। तो हमारा बाप कैसा होगा? हँ? (किसी ने कहा – निराकार।) निराकार होगा? (किसी ने कहा – साकारी।) हमारा बाप भी वैसा ही होना चाहिए। निराकारी सो साकारी। परन्तु मनुष्य सृष्टि में जो मनुष्य सृष्टि का बाप होगा वो सदा निराकारी हो सकता है क्या? हँ? नहीं। तो हमको सदा का अर्थात् तीनों कालों का वर्सा कैसे देगा? सत्य का वर्सा, ज्ञान का वर्सा कैसे देगा? साकार देगा? हँ? साकार तो नहीं देगा। ये तो बड़ी भारी मूंझ हो गई। हँ? वर्सा देने वाला बाप और वर्सा लेने वाला बच्चा एक जैसा चाहिए या अलग प्रकार का चाहिए? (किसी ने कहा – बाप समान।)

तो अब ये तो बात पक्की है निराकार निराकार को वर्सा देता है। और साकार साकार को वर्सा देता है। हम आत्माएं, जो मनुष्यात्माएं हैं, हम अपन को निराकार कहें? अभी कहें या नहीं कहें? जब हम हैं ही निराकार नहीं, तो निराकार का वर्सा कैसे लेंगे? हँ? (किसी ने कहा – निराकारी स्टेज को धारण करने वाला।) निराकारी स्टेज को धारण करके लेंगे। तो निराकारी स्टेज को धारण करने के लिए क्या करना पड़े? हँ? (किसी ने कहा – मनमनाभव होना पड़े।) मनमनाभव होना पड़े? ये किसने कहा? ये कौन कहता है मनमनाभव? मेरे मन में समा जा। हँ? मनुष्य सृष्टि का बाप कहता है? तेरे मन में क्यों समा जाऊँ? तेरे मन में....पता नहीं क्या चलता है? हँ? मनुष्य सृष्टि के बाप के अन्दर मनन-चिंतन-मंथन करने वाला मन है या नहीं है? मन अच्छा भी सोचता है और मन बुरा भी सोचता है। संकल्प भी करता है और विपरीत संकल्प भी करता है। तो हम उसमें क्यों समा जाएं? (किसी ने कुछ कहा।) जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, मनुष्य सृष्टि का बाप, मनुष्य है ना। और मननात् मनुष्य कहा जाता है। मनन-चिंतन-मंथन करे तो मनुष्य, नहीं करे तो जानवर। संकल्प-विकल्प सोच-विचार करता है या नहीं करता है मन से? (सबने कहा – करता है।) तो जो खुद सोचता है वो हमको भी अगर उसकी याद में समा जाएं, मनमनाभव हो जाएं, जो मन वाला कहता है मेरे मन में समा जा, तो हम भी सोचता बनेंगे या असोचता बनेंगे? हँ? (किसी ने कहा – सोचता।) सोचता? असोचता नहीं बनेंगे? हँ? बनेंगे? कैसे बनेंगे? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? कौन बन जाएगा? मनुष्य सृष्टि का बाप बन जाएगा तो हम भी बन जाएंगे। नंबरवार बन जाएंगे।

तो मनुष्य सृष्टि का बाप कैसे बनता है? हँ?
(किसी ने कहा - एक की याद में।) एक की याद में रहकर बनता है? अच्छा? माना एक निराकार ज्योतिबिन्दु की याद में रहकर वो असोचता बन सकता है तो हम क्यों नहीं बन सकते? हँ? (किसी ने कहा – साकार द्वारा।) हम क्यों साकार द्वारा? उसके लिए द्वारा नहीं और हमारे लिए द्वारा? हँ? (किसी ने कहा – बड़ा बेटा है ना।) बड़ा बेटा है? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ये कह सकते हैं कि शिव बाप के ज्योतिबिन्दु-बिन्दु आत्मा-आत्मा जितने भी बच्चे हैं उन बच्चों में, कोई सबसे पहले इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर हुआ, कोई बाद में होगा, कोई सतयुग के आदि में ही होगा। कोई त्रेता के आदि में होगा। कोई द्वापर के आदि में इब्राहिम होगा। नंबरवार ही होंगे ना। छोटे बड़े होंगे या नहीं होंगे? तो ऐसा कौन है जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर तीनों कालों में सबसे बड़ा बच्चा हो आत्मा रूपी? कोई होगा या नहीं होगा? हँ? (किसी ने कहा – होगा।) होगा। जो भी सृष्टि का, तीनों कालों का चक्कर है, भूत, भविष्य, वर्तमान का, उस पूरे चक्कर में, कोई आलराउण्ड चक्कर लगाने वाला होगा तो इसी के आधार पर ये सृष्टि जो है तीनों कालों की कही जा सकती है और तीनों काल का ज्ञाता भी तभी हो सकता है। कब? जब कोई न कोई पार्टधारी तीनों काल का पूरे सृष्टि चक्र का, पूरे कालचक्र में पार्ट बजाने वाला हो। होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए? होना चाहिए।

भारतीय शास्त्रों में तो गाया हुआ है। कौन? जिसके लिए कहते हैं उसके माँ-बाप का काई को पता ही नहीं। तुम आदिदेवः। तुम आदिदेव हो। माने तुम्हारे से आदि में इस सृष्टि चक्र में कोई हुआ ही नहीं। तो भक्तिमार्ग में वो लोग शंकर को समझ लेते हैं। क्या? शंकर को समझते हैं कि वो इस सृष्टि में अनादि है। उसका न कोई ने आदि देखा और न कोई अंत देख सकता है। परन्तु वो भक्त बिचारे ये नहीं जानते कि गांव-गांव में, शहर-शहर में, देश-देश में, देश-देशांतर में और दुनिया में जितनी भी खुदाइयाँ हुई हैं, उनमें सबसे जास्ती जो यादगार मूर्तियाँ लिंग की मिली हैं, जो शिवालयों में देखी जाती हैं, वो लिंग मूर्तियाँ किसकी यादगार हैं, क्योंकि लिंग मूर्ति मन्दिर में मुख्य स्थान पर बीच में रखी होती है। और बाजू में दीवाल में सभी देवी-देवताओं के चित्र दिखाते हैं। तो मुखिया कौन हुआ? हँ? शिवलिंग मुखिया है या चारों ओर की दीवालों में जो देवी-देवताएं बैठे हैं उन देवी-देवताओं में जो मुख्य शंकर की मूर्ति रखी होती है, वो मुखिया है? वो बाजू में दीवाल में क्यों टिकी हुई है सबके साथ?
(किसी ने कहा – पुरुषार्थी।) इससे साबित होता है कि शंकर मुखिया नहीं है उस शिवालय का। आलय माना घर। शिवालय माने शिव का घर।

A morning class dated 30.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the eighth page was – We all are brothers. Point of light like souls are brothers. And He is our Father. So, is He our brother or our Father? He is the Father. Why? We are also points and He is also a point; then how is He our Father? Hm?
(Someone said – He does not pass through the cycle of birth and death.) Yes. We human souls are pleasure-seeking (bhogi) souls which pass through the cycle of birth and death. And He never passes through the cycle of birth and death; He is abhokta (the one who does not seek pleasures). So, He is indeed a point, but what inheritance does He give us? So, the one who gives the inheritance is called a Father only. Father means inheritance. But which inheritance does He give us? The inheritance of knowledge. Inheritance of what kind of knowledge? (Everyone said – Incorporeal knowledge.) The inheritance of incorporeal knowledge is okay. The incorporeal souls will get incorporeal inheritance only. But how can that incorporeal who does not have hands, legs, nose, eyes, ears, mouth at all, give inheritance? (Someone said something.) Hm? Will He give through a corporeal? So, the inheritance that He will give through the corporeal be an incorporeal inheritance or will He give a corporeal inheritance? (Someone said – He will give corporeal inheritance.) Will He give corporeal inheritance through the incorporeal?

The incorporeal Father is the one who gives incorporeal inheritance. Because He does not pass through the cycle of birth and death He is Trikaaldarshi (knower of the three aspects of time). This is why He gives the inheritance of truth of all the three aspects of time. No human soul in this human world possesses the truth of all the three aspects of time. Does anyone have? But He does not have a mouth. So, how will that incorporeal Father give us inheritance?
(Someone said – Through corporeal.) We human souls are corporeal; our soul is incorporeal; so, we should say that we are incorporeal as well as corporeal. There is a combination of the corporeal and the incorporeal within us human souls, isn’t it? So, who will give us inheritance? (Someone said – Father Shiv.) Father Shiv? Father Shiv is incorporeal. (Someone said – Through the corporeal.) Arey, an ant will give inheritance to an ant, an elephant will give inheritance to an elephant. As is the Father, so is the kind of son that he will give inheritance to. Is it not? Hm? Will an elephant give inheritance to an ant? So, the incorporeal Father gives the inheritance of all the three aspects of time to the incorporeal souls. But we human souls are incorporeal souls as well as a corporeal? Body. We are incorporeal as well as corporeal, aren’t we? So, how will our Father also be? Hm? (Someone said – Incorporeal.) Will He be incorporeal? (Someone said – Corporeal.) Our Father should also be like that only. Incorporeal as well as corporeal. But can the Father of the human world in the human world be incorporeal forever? Hm? No. So, how will He give us the permanent inheritance, i.e. of all the three aspects of time? How will He give the inheritance of truth, inheritance of knowledge? Will the corporeal give? Hm? The corporeal will not give. This is a very big confusion. Hm? Should the Father who gives the inheritance and the child who takes the inheritance be alike or of different kinds? (Someone said – Like the Father.)

So, now it is sure that the incorporeal gives inheritance to the incorporeal. And the corporeal gives inheritance to the corporeal. Can we souls, who are the human souls call ourselves incorporeal? Can we call now or not? When we aren’t incorporeal at all, then how will we obtain the inheritance of the incorporeal? Hm? (Someone said – The one who achieves the incorporeal stage.) We will obtain by achieving the incorporeal stage. So, what will we have to do to achieve the incorporeal stage? Hm? (Someone said – We will have to become Manmanaabhav.) Will we have to become Manmanaabhav? Who said this? Who says this Manmanaabhav? Merge into My mind? Hm? Does the Father of the human world say? Why should I merge into your mind? Who knows what goes on inside Your mind? Hm? Does the Father of the human world have a mind that thinks and churns or not? The mind thinks good as well as bad. It creates [good] thoughts as well as opposite thoughts. So, why should I merge into that? (Someone said something.) The Father of the human world, the Father of the human world is a human being, isn’t he? And it is said ‘Manaanaat Manushya’. If someone thinks and churns (manan-chintan-manthan) he is a human being (manushya); otherwise he is an animal. Does he create good and bad thoughts, does he think through the mind or not? (Everyone said – He does.) So, the one who thinks himself, if we also merge into His remembrance, if we become Manmanaabhav, the one with a Mind who says – Merge into My mind, then will we also become sochtaa (the one who thinks) or will we become asochtaa (the one who doesn’t think)? Hm? (Someone said – Sochtaa.) Sochtaa? Will you not become asochtaa? Hm? Will we become? How will we become? (Someone said something.) Hm? Who will become? If the Father of the human world becomes then we will also become. We will become numberwise.

So, how does he become the Father of the human world? Hm?
(Someone said – In the remembrance of one.) Does he become by remaining in the remembrance of one? Achcha? Does it mean that when he can become asochtaa (the one who doesn’t think) by being in the remembrance of one incorporeal point of light then why can’t we become? Hm? (Someone said – Through the corporeal.) Why through corporeal in our case? Why no media for him and why media for us? Hm? (Someone said – He is the eldest son, isn’t he?) Is he the eldest son? (Someone said something.) Yes, it can be said that among all the point of light like souls, the children of Father Shiv, someone existed on this world stage first of all, someone will exist later on, someone must have existed in the beginning of the Golden Age itself. Someone must have existed in the beginning of the Silver Age itself. Someone must have been Ibrahim in the beginning of the Copper Age. They will be numberwise only, will they not be? Will they be young and old or not? Who on this world stage is the soul like eldest child in all the three aspects of time? Will there be anyone or not? Hm? (Someone said – There will be.) There will be. If he passes allround through the cycle of the world, through all the three aspects of time, the past, future and present, then on its basis only this world can be said to be of all the three aspects of time and there can be a knower of all the three aspects of time also only then. When? When one or the other actor plays his part in the entire world cycle, in the entire time cycle in all the three aspects of time. Should he or shouldn’t he? He should.

He has been praised in the Indian scriptures. Who? It is said for him that nobody knows about his parents. Tum Aadidevah. You are the first deity. It means that nobody existed before you in the beginning of this world cycle. So, on the path of Bhakti, those people think of Shankar. What? They think of Shankar that he is eternal in this world. Nobody saw either his beginning nor can anyone see his end. But those poor devotees do not know that in all the excavations that have taken place in every village, every country, in various countries and in the world, the memorial idols that have been found the most are that of the ling (phallus), which are seen in the temples of Shiva (Shivalayas). Whose memorial are those ling idols because the idol of ling is placed in the center in a prominent place in the temple. And in the sides on the walls the pictures of all the deities are shown. So, who is the chief? Hm? Is the Shivling the chief or is Shankar, whose idol is placed prominently among the deities who are sitting on the walls, the chief? Why is it placed on the wall in the sides along with everyone?
(Someone said – He is purusharthi.) It proves that Shankar is not the chief of that Shivaalay. Aalay means home. Shivaalay means Shiv’s home.
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

Post Reply

Who is online

Users browsing this forum: No registered users and 9 guests