Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 12 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2445, आडियो 2931, दिनांक 03.03.2018
VCD 2445, Audio 2931, Date 03.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning class dated 6.4.1967
VCD-2445-Bilingual

समय- 00.01-15.00
Time- 00.01-15.00


प्रातः क्लास चल रहा था – 6.4.1967. गुरुवार को पहले पेज पे मध्यादि में बात चल रही थी – परम अक्षर कहा जाता है सुप्रीम को, जिससे परे कोई नहीं। तो ये तो बच्चे जान गए हैं अच्छी तरह से अभी कि हम आत्माओं का सबका बाप है। माने जो भी बिन्दु-बिन्दु आत्माएं हैं प्राणीमात्र की, सबका बाप है। आत्माओं का बाप है, बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का, ज्योतिबिन्दु बाप। उसका कोई बाप नहीं। वो तो सुप्रीम बाप है। और हम सभी ब्रदर्स ही हैं। आत्मिक रूप में हम बाप के बच्चे ब्रदर्स हैं। तो बाप आकर कहते हैं – हम सभी आत्माएं हैं। ये कौनसे बाप कहते हैं? हँ? बाप भी आकर कहते हैं। ‘भी’ माना दो बाप हुए। कोई और भी बेहद का बाप है। तो कौन कहेगा कि हम सभी आत्माएं हैं? आत्मा-आत्मा ब्रदर्स। ऊपरवाला कहेगा हम सभी आत्माएं भाई-भाई हैं? हँ? कभी नीचेवाला, कभी ऊपरवाला। कौन कहेगा? हाँ। ब्रदर्स हैं माना नीचेवाला बेहद का बाप जो मनुष्य सृष्टि का है वो कहेगा हम सभी ब्रदर्स हैं। और मैं परमात्मा। माने जो ब्रदर्स हैं उनके बीच में पार्ट बजाने वाला मैं परम पार्टधारी, हीरो पार्टधारी आत्मा। और ब्रह्मा द्वारा बहन और भाई बनते हैं। ये भी बात है। नहीं तो सभी ब्रदर्स ही। ब्रह्मा के बच्चे-बच्चियां बनते हैं तो बहन और भाई। नहीं तो सुप्रीम सोल बाप शिव के हम सभी ब्रदर्स हैं।

और बहन और भाई अब बने हैं। किसके द्वारा? जब साकार में बाप और साकार माँ भी चाहिए। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा। तो ये बाप प्रजापिता। फिर? ब्रह्मा द्वारा। तो उसके कहेंगे ना बच्चे। क्या कहेंगे? बहन और भाई। मूल उसको, वो आत्माएं इनका कोई ऊँच और नीच नहीं कहेंगे। क्या? सुप्रीम सोल बाप के बच्चे, उनमें कोई नीच और ऊँच कुल होने की बात नहीं। मनुष्य बहन और भाई का ऊँच और नीच कुल कहेंगे। जब मनन-चिंतन-मंथन करने वाले मनुष्य की संतान बनें माना प्रजापिता की संतान बनें तो बहन और भाई ऊँच और नीच कुल कहेंगे। उनका कुल ये एक है। किनका? दूर क्यों कर दिया ‘उनका’ कहके कि भविष्य में जो पार्ट चलेगा, वो प्रैक्टिकल में सुप्रीम सोल बाप का पार्ट चलेगा? तो वो आत्माओं का कुल होगा। जब सभी मनुष्यात्माएं कल्पांतकाल में आत्मिक स्थिति में टिकी होंगी। तो बताया, उनका कुल ये एक है। आत्माओं का कुल है। सभी आत्माएं ज्योतिबिन्दु, ज्योतिबिन्दु, हाँ, फिर ये समझ जाते हैं कि जो भी सभी आत्माएं सो भी तुम समझते हो। तुमको समझाया जाता है।

ये सभी बातें मनुष्य तो कुछ भी नहीं जानते। दुनिया के मनुष्य बन्दर, एप्स, जंगली जानवर, दुनियावाले मनुष्य अकासुर, बकासुर। क्या? कैसे-कैसे असुर बता दिये? जैसे अक का फूल होता है। एकदम गंध छोड़ता है। कोई बड़ा फूल नहीं है। छोटा फूल है। तो अक के समान असुर। और बक-बक करने वाले बकासुर। फालतू बक-बक करते रहते हैं। हिरण्याकश्यप। हिरण्य सोने को कहा जाता है। जो सोने जैसी सच्ची-सच्ची आत्माएं हैं। उनके नूर को पीने वाले। काश्य माने तेज को पीने वाले। हिरण्याक्ष कहते हैं। शास्त्रों में लिखा है हिरण्याकश्यप का भाई हिरण्याक्ष। उसकी आँख सोने की थी। तो देखो, ये दुनिया के बन्दरों का, जंगली जानवरों का नाम शास्त्रों में ऐसे-ऐसे ले लिया है। जानवरों के मुआफिक हिंसक बनते रहते हैं दुःखदायी। फालतू लम्बे-चौड़े भाषण करते रहते हैं बक-4. उनके भाषण का प्रैक्टिकल में कोई फायदा नहीं। दुनिया जल्दी-जल्दी नीचे उतरती है। और जो सोने जैसी सच्ची-सच्ची आत्माएं थीं सतयुग में, 16 कला संपूर्ण देवताएं जैसे थे। ऐसी आत्माओं के काश्य को अर्थात् नूर को पीने वाले व्यभिचारी, हिरण्याक्ष। ये संगमयुग के नाम हैं ना जब भगवान बाप कलियुग के अंत और सतयुग के आदि में ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग करने आते हैं, डायरेक्टर के रूप में। तो ये शास्त्रों में संगमयुग के नाम हैं बच्ची।

ये महाभारी महाभारत लड़ाई है ही संगमयुग की। ऐसे नहीं कि उन्होंने दिखा दी है द्वापर के अंत में कृष्ण भगवान आया और महाभारत युद्ध कराया। और पापी कलियुग की स्थापना करके चला गया। अरे! भगवान आएगा तो भगवान को तो हैविनली गॉड फादर कहा जाता है, हैविन की रचना रचने वाला। वो पाप की दुनिया कैसे रचेगा? है तो पुण्यात्माओं, देवताओं की दुनिया है ना। तो ये बात ही नहीं लगती कि द्वापर के अंत में कोई कृष्ण भगवान आया। क्यों? क्योंकि शास्त्रों में तो ये लिखा है कि द्वापर के आदि में 8 कलाएं होती हैं, अंत में वो भी कलाएं क्षीण हो जाती हैं। तो कृष्ण तो 16 कला संपूर्ण गाया हुआ है। और सतयुग में 16 कलाएं होती हैं। कीर्तन में गाते भी हैं - हे कृष्ण नारायण वासुदेव। जो 16 कला संपूर्ण नारायण है वो ही कृष्ण की आत्मा है। तो उस संगमयुग के शूटिंग काल के समय ये भागवत में, ये भगवान के चरित्रों में ये नाम भगवान ने दिया। क्या? क्या नाम दिया? जंगली जानवरों जैसे नाम हैं। अकासुर, बकासुर, हिरण्याक्ष। हिरण्याक्ष क्या करता था? सारी धरती को; धरती को माता कहा जाता है ना। तो कोई माता के रूप में पार्ट बजाने वाली होगी ना चैतन्य आत्मा। हँ? उस सारी धरती को पाताल में ले जाता है। अर्थात् गड्ढे में गिरा देता है। विकारों के गर्त में गिराय देता है, व्यभिचार के गर्त में।

भगवानुवाच है ना। फिर भी भगवानुवाच है भागवत। क्या? भागवत् नाम क्यों रखा? इसमें विशेष कहानी है – लोग बहुत ध्यान से सुनते हैं। वो है गोपियों को भगाने की कहानी। गीता को उतने प्यार से नहीं सुनते। उतना मजमा भी नहीं लगता। थोड़े लोग सुनते हैं। और भागवत को सुनने के लिए तो कितना मजमा लगता है। भक्तिमार्ग में भी ऐसे ही है ना। है कहाँ की यादगार? ये संगमयुग के शूटिंग काल की यादगार है कि भगवान जब आते हैं तो गीता ज्ञान सुनाते हैं तो बहुत थोड़े लोग सुनते हैं। और फिर जब भागवत शुरू होती है तो बड़ी चक-चक समाज में मच जाती है। मीडिया में भी। अखबारों में, टीवी चैनल्स में चकाचक-चकाचक – ये भागी, वो भागी। इनका इंटरव्यू लो, उनका इंटरव्यू लो। सीबीआई में भी बमचक मच जाती है। भागवत। क्या? भागने वालों की कहानी। उसमें है भगवान के वर्शन्स। क्या? भागने वाली गोपियाँ भागतीं और एक तरफ भगवान की वाणी भी चलती। भगवान के वर्शन्स भी निकलते। ये है महिमा। क्योंकि जो भगवान के वर्शन्स निकलते हैं वो है ज्ञान। क्योंकि ज्ञान माने जानकारी। काहे की जानकारी? झूठ की? नहीं। सत्य की जानकारी। सत्य में भगवान कौन है? एक है या अनेक है? सत्य तो एक ही होता है।

A morning class dated 6.4.1967 was being narrated. The topic being narrated in the beginning of the middle portion of the first page was – The word 'param' is used for 'supreme'; nobody is higher than him. So, the children have now come to know nicely that He is the Father of all of us souls. It means that He is the Father of all the point-like souls of the living beings. He is the Father of all the point-like souls, the point of light soul Father. He doesn't have any Father. He is the Supreme Father. And we all are brothers only. In the soul form we children of the Father are brothers. So, the Father comes and tells – We all are souls. Which Father says this? Hm? The Father also comes and says. 'Also' means that there are two fathers. There is another unlimited Father. So, who will say that we all are souls? Soul like brothers. Will the above one say that we all souls are brothers? Hm? Sometimes you say 'the below one', sometimes you say 'the above one'. Who will say? Yes. We are brothers means that the below one, the unlimited Father of the human world will say that we all are brothers. And I am the Supreme Soul. It means that among the brothers, I play the supreme part, the hero actor soul. And we become sisters and brothers through Brahma. This is also a topic. Otherwise, all are brothers only. When we become the sons and daughters of Brahma, then we are sisters and brothers. Otherwise, we all are brothers in comparison to the Supreme Soul Father Shiv.

And now we have become sisters and brothers. Through whom? When the Father and the Mother is also required in corporeal form. Through Prajapita Brahma. So, this Father is Prajapita. Then? Through Brahma. So, you will be called his children, will you not? What will you be called? Sisters and brothers. Originally him; those souls will not be called high or low. What? There is no question of the children of the Supreme Soul Father being from any low or high clan. High and low clans will be said for the human beings who are sisters and brothers. When you become the children of the human being who thinks and churns, i.e. when you become the children of Prajapita, then the sisters and brothers will be said to belong to a high and low clan. Their clan is this one clan. Whose? Why were they made distant by saying 'their' that the part that will be played in the future will be a part of the Supreme Soul Father in practical? So, that will be the clan of the souls when all the human souls will be constant in soul conscious stage in the end of the Kalpa. So, it was told that their clan is this one clan. It is the clan of souls. All the souls are points of light, point of light; yes, then they understand that all the souls; that too you understand. You are explained.

Human beings do not know all these topics. People of the world, the monkeys, apes, wild animals, the people of the world, Akasur, Bakaasur. What? What kinds of demons were described? Just as there is a flower of Ak. It emanates a bad smell. It is not a big flower. It is a small flower. So, they are demons like Ak. And Bakaasur who speak wastefully (bak-bak). They speak wasteful matters. Hiranyakashyap. Gold is called hiranya. Those who drink the light of the gold-like true souls. Those who drink kaashya, i.e. lusture. They are called Hiranyaaksh. It is written in the scriptures that the brother of Hiranyakashyap was Hiranyaaksh. His eyes were golden. So, look, the monkeys, the wild animals of this world have been given such names in the scriptures. They keep on becoming violent like animals that cause sorrows. They deliver wasteful long speeches (bak-bak-bak-bak). There is no practical benefit of their lecture. The world quickly undergoes downfall. And the gold-like true souls which existed in the Golden Age were like deities perfect in 16 celestial degrees; the adulterous persons, Hiranyaaksh, who drink the kaashya, i.e. light of such souls. These are the names of the Confluence Age, when God, the Father comes to perform the shooting of the broad drama in the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age in the form of a Director. So, daughter, these are names of the Confluence Age in the scriptures.

This fiercest Mahabharata war is of the Confluence Age only. It is not as if they have shown that God Krishna came in the end of the Copper Age and caused the Mahabharata war and established the sinful Iron Age and departed. Arey! When God comes, then God is called heavenly God Father, the one who creates heaven. How will He create a sinful world? It is a world of noble souls, deities, is not it? So, it does not appear rational that God Krishna came in the end of the Copper Age. Why? It is because it has been written in the scriptures that there are eight celestial degrees in the beginning of the Copper Age, and in the end those celestial degrees also decrease. So, Krishna is praised as the one who is perfect in 16 celestial degrees. And there are 16 celestial degrees in the Golden Age. It is also sung in the prayers – O Krishna Narayana Vasudeva. The Narayan who is perfect in 16 celestial degrees is the soul of Krishna. So, during the shooting period of that Confluence Age in this Bhaagwat, in the acts of God these names were given by God. What? Which names were given? The names are like the wild animals. Akasur, Bakaasur, Hiranyaaksh. What did Hiranyaaksh used to do? The entire Earth; the Earth is called a mother, is not it? So, there will be a living soul that plays part in the form of a mother. Hm? He takes the entire Earth to the nether world (paataal), i.e. he makes it fall in a pit. He makes it fall in the pit of vices, in the pit of adultery.

God speaks, doesn't He? However Bhagwat contains the words of God. What? Why was the name Bhaagwat coined? There is a special story in it – People listen very carefully. That is a story of making the gopis to elope. People do not listen to the Gita so lovingly. The gathering is also not so big. A few people listen. And such a big crowd gathers to listen to the Bhaagwat. It is like this on the path of Bhakti as well, is not it? It is a memorial of which time? It is a memorial of the shooting period of the Confluence Age that when God comes, then the knowledge of the Gita that He narrates is heard by very few people. And then, when the Bhaagwat starts, then a lot of uproar is created in the society. In the media as well. Newspapers become active, TV Channels also become active – this lady ran away, that lady ran away. Take her interview, take the interview of that lady. There is uproar in the CBI as well. Bhaagwat. What? A story of those who elope. It contains the versions of God. What? Gopis elope and on the one side God's Vani is also narrated. God's versions also emerge. This is the glory because the versions of God that emerge are knowledge because knowledge means information. Information of what? Of lies? No. Information of truth. Who is God in reality? Is He one or many? Truth is only one.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2446, आडियो 2932, दिनांक 04.03.2018
VCD 2446, Audio 2932, Date 04.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning class dated 6.4.1967
VCD-2446-Bilingual

समय- 00.01-13.31
Time- 00.01-13.31


प्रातः क्लास चल रहा था – 6 अप्रैल, 1967. गुरुवार को पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी –एक ही ऊँचे ते ऊँचा है। क्या? ऊँचे ते ऊँच भगवन्त। कौन? हँ? कौन? अरे! एक शब्द में तो बताओ। एक को पहचानेंगे कैसे? उसका नाम जिसको तुम कहते हो ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त वो तो बिन्दी का नाम है। कैसे पहचानोगे कि वो ही ऊँचे ते ऊँची बिन्दी है? ऊँचे ते ऊँचा और नीचे ते नीचे इस दुनिया की बात है या आत्मलोक की बात है? आत्मलोक तो सब बिन्दु-4 एक जैसे। तो एक ही और एक ऊँचे ते ऊँचा। क्या? और भी लगा दिया। एक ही। माना आत्माओं के बीच में एक। लेकिन वो पकड़ में नहीं आ सकता किसी के। इसलिए जब सृष्टि में जहाँ ऊँच और नीच का सवाल होता है, आता है, तो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है उसके द्वारा वो एक ऊँचे ते ऊँचा कहा जा सकता है। उसको ही कहेंगे बाबा। क्या कहा? निराकार और साकार का मेल हो गया ना। क्योंकि सबका बाबा है। हँ? सबका बाबा है। और सबको सुख देने वाला है। हँ? निराकार ज्योतिबिन्दु शिव है, जिसकी आत्मा का नाम शिव है, वो बिना शरीर के सुख दे सकता है? हँ? सबको सुख दे सकता है? नहीं। वो जब प्रैक्टिकल में आकर पार्ट बजाता है, मुकर्रर साकार शरीर के द्वारा तो इस दुनिया में सबको सुख देने वाला साबित होता है।

तो सुख और दुख का खेल बना हुआ है। तो ये भी तुम बच्चे जानते हो कि सुख और दुख, ये इस दुनिया में द्वंद्व होता है। रात और दिन। तो सुख-दुख की दुनिया है। तो ये मनुष्य तो कहते हैं – देखो, अभी-अभी सुख भी है, अभी-अभी देखो दुख है। अरे! अभी माने ये कलियुग की बात हुई ना। सतयुग की तो बात नहीं है। ये दुनिया में तो सिर्फ कलियुग है क्या? चारों युग हैं। चार सीन का ये बेहद का ड्रामा है। तो सत्य का युग भी है और झूठ का युग, झूठखण्ड, कलह-कलेश का युग भी है। तो ये अभी-अभी है। यहाँ दुख भी है और सुख भी है। लेकिन सतयुग में क्या होता है? वहाँ सत होने की वजह से और सत के द्वारा ही वो स्थापना हुई है, तो सुख बहुत ही बहुत सुख ही सुख है। दुख का नाम-निशान नहीं है। और यहाँ इस दुनिया में? अभी-अभी दुख, अभी-अभी? सुख। सुख बहुत थोड़ा और दुख जास्ती होता जाता है। तो देखो – है ना ये सुख-दुख का खेल। बेहद का ड्रामा 5000 वर्ष का। क्या? 2500 वर्ष की हिस्ट्री है मनुष्यों के पास क्योंकि मनुष्यों की बनाई हुई हिस्ट्री, मनुष्यों की बनाई हुई दुनिया है। लेकिन जिस सुख की दुनिया की हिस्ट्री मनुष्यों के पास नहीं है, वो उनकी बनाई हुई दुनिया भी नहीं है। वो बनाई हुई दुनिया है हैविनली गॉड फादर की। जो हैविन का रचयिता है। तो उनको ये मालूम नहीं है कि नहीं इस दुनिया में आधा कल्प सुख की दुनिया और आधा कल्प दुख की दुनिया। माना ज्ञान से होता है सुख, अज्ञान से होता है दुख। ज्ञान माना दिन। और रात माने अज्ञान।

तो ये अभी-अभी जो दुनिया है ये अज्ञान अंधकार की दुनिया है। इस दुनिया में सुख के लिए सब भटक रहे हैं। सुख लेने के लिए एक को पकड़ा, दूसरे को पकड़ा, तीसरे के पीछे पड़े, चौथे के पीछे पड़े। सारी दुनिया का ये हाल है। और जो सुख चाहते हैं अनन्त, वो सुख इस दुनिया में कोई को नहीं मिलता। तो उन मनुष्यों को नहीं मालूम है। किन मनुष्यों को? तीन दुनिया बताई। जैसे बाहर की दुनिया में तीन दुनिया है। एक न्यूट्रल देशों की दुनिया आ गई। ऐसे ये बीजरूप आत्माओं की, न्यूट्रल देशों की दुनिया है। तो ये तीसरी दुनिया हो गई। हँ? और बीच वाली दुनिया है बीज और जो तनों और टहनियों वाला वृक्ष होता है उसके बीच में कौन है? जड़ें। आधारमूर्तों की दुनिया। तो उनकी बात बताई। उनको नहीं मालूम है। किनको? जो अभी न बीज रूप ऊपरवाली दुनिया में हैं और न उस दुनिया के हैं जो आधारमूर्त हैं। आधारमूर्त माने क्या? ऊपर से जैसे क्राइस्ट की आत्मा आती है। जीसस में प्रवेश करती है। तो जीसस हुआ आधारमूर्त जड़। वो देव आत्मा है। जरूर उसने सतयुग में जन्म लिया है। तभी तो क्रिश्चियन्स हैविनली गॉड फादर को जानते हैं। लार्ड कृष्ण को जानते हैं। अगर जीसस ने अनुभव न किया होता तो जानते कैसे?

तो उनको मालूम नहीं है। उनको माने किनको? जो आत्मलोक से मानवीय हिस्ट्री में उतरती हैं। द्वैतवादी दैत्यों की हिस्ट्री में उतरती हैं। देहअभिमानियों की सृष्टि में उतरती हैं द्वापरयुग से। उनको ये मालूम नहीं है। न इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, को, न उनके फालोअर्स कि नहीं, आधा कल्प सुख, आधा कल्प दुख। ये बात उनको नहीं पता। क्यों? वो आते ही हैं इसी दुनिया में। जहाँ दुख भी है और जहाँ सुख भी है। आरंभ में द्वैतवादी दुनिया भी सात्विक स्टेज में होती है इसलिए सुख अनुभव करते हैं अच्छा खासा। या जब भी वो धरमपिताएं वो फालोअर्स आते हैं तो पहले जनम में सुख अनुभव करते हैं क्योंकि सात्विक सतधाम से आई हैं। सतधाम से आने के कारण पहले जनम ही सुखी ही सुखी होती हैं। फिर बाद में, जैसे क्राइस्ट है, जीसस में प्रवेश करता, तो क्राइस्ट की आत्मा को सूली का दुख नहीं हो सकता। सत्वप्रधान होने के कारण जब चाहे बाहर आ जाएगी शरीर से। दुख किसको होता है? जिसके पूर्व जन्म होते चले आये हैं सतयुग से। तो वो आत्मा दुख लेती है काहे का? हँ? सूली। तो पता चल गया? आधारमूर्त दुख भोगती है या उस आधार का जिसने आधार लिया ऊपर से आने वाली आत्मा, वो दुख भोगती है? जो ऊपर से आने वाली आत्मा है वो हो गई पुरुष। और जिसमें प्रवेश किया वो हो गई माता। हँ? दुनिया में, ये दैत्यों की दुनिया में माताएं ज्यादा दुख भोग रही हैं कि पुरुष ज्यादा दुख भोग रहे हैं? हँ? माताएं-कन्याएं ही ज्यादा दुख भोगती हैं। वो ही बंधन में आ जाती हैं।

तो बताया – उनको ये बात नहीं मालूम है कि सुख और दुख की दुनिया आधा-आधा है। आधा कल्प सुख, सतयुग त्रेता, भगवान की बनाई हुई दुनिया और आधा कल्प दुख। नर अर्थात् मनुष्यों की बनाई हुई दुनिया नरक। क्यों पता नहीं है? हँ? क्यों पता नहीं है? उन्हें इसलिए पता नहीं है कि दुनिया भी चार अवस्थाओं से गुज़रती है। दुनिया की हर चीज़ चार अवस्थाओं से गुज़रती है। ऐसी कोई चीज़ नहीं जो पहले सुखदायी न हो और अंत में दुखदायी न हो। पहले सत्वप्रधान, फिर चौथी अवस्था में तामसी। तो ये हिसाब है इस दुनिया का कि पहले सतोप्रधान सतयुग, फिर सत्व सामान्य त्रेता, फिर जबसे ये देहअभिमानी धरमपिताएं, मनुष्यों की आत्माएं कहें इस सृष्टि पर उतरती हैं तो वो रजोप्रधानता जो है उनके अन्दर वो करम में आसक्त कराती है। कर्मेन्द्रियों में आसक्त कराय देती हैं।

A morning class dated 6th April, 1967 was being narrated. The topic being narrated in the end of the middle portion of the first page on Thursday was – There is only one highest on high. What? Highest on high God. Who? Hm? Who? Arey! Tell in one word. How will you recognize the one? His name, the one whom you call the highest on high God is the name of the point. How will you recognize that it is that point which is highest on high? Is 'highest on high' and 'lowest on low' a topic of this world or of the Soul World? In the Soul World all the points are alike. So, one and only one is highest on high. What? 'And' was also added. Only one. It means that one among the souls. But He cannot be caught by anyone. This is why when there is a question of high and low in the world, when He comes, then the permanent Chariot in which He enters He can be called the highest on high through him. He alone will be called Baba. What has been said? He is the combination of the incorporeal and corporeal, is not He? It is because He is everyone's Baba. Hm? He is everyone's Baba. And He gives happiness to everyone. Hm? Can the incorporeal point of light Shiv, whose name of the soul is Shiv, give happiness without a body? Hm? Can He give happiness to everyone? No. When He comes in practical and plays His part through the permanent corporeal body, then He proves to be the giver of happiness to everyone in this world.

So, the drama of happiness and sorrows is predestined. So, you children also know that the conflict between happiness and sorrows takes place in this world only. Night and day. So, it is a world of happiness and sorrows. So, these human beings say – Look, just now there is happiness also and look, just now there is sorrow also. Arey! Now means it is a topic of the Iron Age, is not it? It is not a topic of the Golden Age. Is there only Iron Age in this world? There are all the four Ages. This is an unlimited drama of four scenes. So, there is an Age of truth also and there is an Age of falsehood, land of truth, Age of distress and despair also. So, this is just now. There is sorrow as well as happiness. But what happens in the Golden Age? Because of the existence of truth there and as it has been established through truth only; so, there is a lot of happiness. There is no name or trace of sorrows. And here in this world? Just now there is sorrow and just now? Happiness. There is very little happiness and the sorrow keeps on increasing. So, look – it is a drama of happiness and sorrows, isn’t it? It is an unlimited drama of 5000 years. What? There is a history of 2500 years with human beings because it is a history written by the human beings, a world created by the human beings. But the world of happiness, whose history is not available with the human beings is not a world established by them. It is a world established by the heavenly God Father who is the creator of heaven. So, they do not know that no, there is a world of happiness for half a Kalpa and a world of sorrows for half a Kalpa in this world. It means that knowledge causes happiness and ignorance causes sorrows. Knowledge means day. And night means ignorance.

So, now this world is a world of ignorance, darkness. Everyone is wandering in this world for happiness. They catch one to obtain happiness, they catch the second one; they go behind the third one; they go behind the fourth one. This is the condition of the entire world. And the unending happiness that people want, nobody in this world gets that happiness. So, those human beings do not know. Which human beings? Three Worlds were described. Just as there are Three Worlds in the outside world. One is a world of neutral countries. Similarly, this is a world of seed-form souls, neutral countries. So, this is the third world. Hm? And the middle world is - who is in the middle of the seed and the tree of stems and branches? The roots. The world of base like souls (aadhaarmoort). So, their topic was mentioned. They do not know. Who? Those who are neither in the above seed-form world nor in that base-like world now. What is meant by aadhaarmoort? Just as the soul of Christ comes from above. It enters in Jesus. So, Jesus is the aadhaarmoort root. He is a deity soul. Definitely he has taken birth in the Golden Age. Only then do the Christians know the heavenly God Father. They know Lord Krishna. Had Jesus not experienced it, how would he know?

They do not know. ‘They’ refers to whom? Those who descend from the Soul World in the human history. Those who descend in the history of the dualistic demons. They descend in the world of body conscious ones from the Copper Age. They do not know this. Neither Ibrahim, Buddha, Christ, nor their followers know that no, there is happiness for half a Kalpa, sorrows for half a Kalpa. They do not know this. Why? They come only in this world where there is sorrow as well as happiness. In the beginning the dualistic world is also in a pure stage; this is why they experience a fair level of happiness. Or whenever those founders of religions, those followers come, then they experience happiness in the first birth because they have come from the pure, abode of truth. Because of coming from the abode of truth they experience only happiness in the first birth. Then later on, just as there is Christ; he enters in Jesus; so, the soul of Christ cannot experience the pain of crucifix. Because of being satwapradhan (pure), it can come out of the body whenever it wishes. Who experiences the pain? The one who has been getting rebirth from the Golden Age. So, that soul experiences the sorrow of what? Hm? Crucifix. So, did you get to know? Does the aadhaarmoort soul experience sorrows or the soul coming from above who took the support of that base experience sorrow? The soul coming from above is the male (purush). And the one in whom he entered is the mother. Hm? In the world, in the world of these demons, are the mothers experiencing more sorrows or are the men experiencing more sorrows? Hm? It is the mothers and virgins who experience more sorrows. They are the ones who experience bondage.

So, it was told that they do not know that the world of happiness and sorrows is fifty-fifty. For half Kalpa there is happiness in Golden Age and Silver Age, in the world established by God and for half Kalpa there are sorrows. Narak is the world established by nar, i.e. human beings. Why don’t they know? Hm? Why don’t they know? They do not know because the world also passes through four stages. Everything in the world passes through four stages. There is nothing which is not a cause of happiness initially and is not a cause of sorrows in the end. First it is satwapradhan and in the fourth stage it is taamsi (degraded). So, this is the account of this world that initially there is satopradhan Golden Age, then satwasaamaanya Silver Age, then, ever since these body conscious founders of religions, call them the human souls, descend to this world, then the semi-impurity (rajopradhaanataa) in them makes them attached to the actions. It makes them attached to the organs of action.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 14 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2447, आडियो 2933, दिनांक 05.03.2018
VCD 2447, Audio 2933, Date 05.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning Class dated 6.4.1967
VCD-2447-Bilingual

समय- 00.01-16.52
Time- 00.01-16.52


प्रातः क्लास चल रहा था – 6.4.1967. गुरुवार को दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी – तुम बच्चे। कौन बच्चे? तुम बच्चे, जो सन्मुख बैठ के सुनते हो सुप्रीम सोल बाप से, तो सबको समझाय सकते हो। माना सारी दुनिया को। चाहे देव आत्माएं हों, चाहे मनुष्यात्माएं हों, चाहे दैत्य। ऐसे तो मुख्य रूप से स्वर्ग की दुनिया में देवताएं, देवात्माएं होती हैं और नरक की दुनिया में सब दैत्य बन जाते। दिति की संतान दैत्य। तो देव हों या दैत्य हों, तुम सबको समझाय सकते हो। तुम। ये नहीं समझाय सकते। क्या? तुम हो दैवी दुनिया के लोग। बीज रूप आत्माओं की दुनिया के लोग। न्युट्रल दुनिया के लोग। क्या? और ये है जड़। आधार। और इनसे पैदा हुए सारे ही आधारमूर्त दुनिया के लोग। और तीसरी दुनिया वह है जो इन जड़ों पर आधारित है। वृक्ष है, उसके तीन हिस्से होते हैं। एक मूल तना जो नीचे से लेके ऊपर तक जाता है। उसकी जड़ें भी नीचे हैं, बिल्कुल इसके नीचे। सीधी नीचे जाती। दूसरी जड़ें हैं दाईं ओर की और बाईं ओर की। उन जड़ों से ताकत मिलती है वृक्ष की दाईं ओर की टहनियों को, धर्मों को और बाईं ओर की टहनियों को, धर्मों को। तो चाहे दाईं ओर की टहनियां हों, चाहे बाईं ओर की टहनियां हों, चाहे आधारमूर्तों के फालोअर्स हों, चाहे बीजरूप के फालोअर्स हों।

तुम सबको समझाय सकते हो कि तुम या तो नई दुनिया के मालिक बन सकते हो; क्या? तुम सब चाहो तो नई दुनिया के मालिक, स्वर्ग के मालिक बन सकते हो क्योंकि मैं शिव हैविनली गॉड फादर हूँ, हैविन की रचना करता हूँ। तो तुम सब चाहो तो हैविन के मालिक बन सकते हो। या तो शांतिधाम के मालिक बन सकते हो। क्या? दो मुख्य नाम हैं। उनको सब पसन्द करते हैं। देवात्माएं भी शान्ति पसन्द करती हैं। फिर वो सुख भी पसन्द करती हैं। और जो दैत्य हैं, जिन्हें मनुष्य कहा जाता है, जिनमें चंचल मन होता है, वो शान्ति ठीक। मन बड़ा चंचलता पैदा करता है, अशान्ति पैदा कर देता है। तो वो शान्ति पसन्द करती हैं। क्योंकि आती ही हैं दुख की दुनिया में। तो हमेशा उन्हें दुख ही दुख देखने को मिलता है तो कहते – न आए, ये दुनिया न होती तो अच्छा। उन्होंने वो दुनिया देखी ही नहीं, सुख की दुनिया। तो कहते – ये दुनिया हमें नहीं चाहिए। हमें सुख नहीं चाहिए। हमें तो शान्ति चाहिए। तो उन्हें शान्ति ही अच्छा लगता। खैर, जो भी हो, सुखधाम को पसन्द करने वाले हों, तो सुखधाम के मालिक बन सकते हैं। सुखधाम के भी मालिक बन सकते हैं। नंबरवार भी बन सकते हैं और अव्वल नंबर बनना चाहें तो अव्वल नंबर भी मालिक बन सकते। ऐसे ही शान्तिधाम के भी मालिक बन सकते हैं। अव्वल नंबर में शान्तिधाम के मालिक बनना चाहो तो अव्वल नंबर में बन सकते हैं। और फिर क्योंकि तुम ही तो बच्चे हो ना। क्या? मेरे बच्चे तुम हो। शिव के बच्चे तुम असली हो आत्मिक स्थिति में रहने वाले। शिव सदा आत्मिक स्थिति में रहता है ना स्वस्थिति में। तो तुम मेरे बच्चे हो। तुम माने वो बीज रूप आत्माएं, बीजरूप स्टेज में।

ये शरीर है ना, ये वृक्ष है। और बिन्दु आत्मा बीज। बीज पेड़ से, वृक्ष से निकलता है। वृक्ष कहाँ से निकलता है? बीज में से निकलता है। तो कैसे? माँ के पेट में पहले जड़ शरीर होता है या बीज आत्मा होती है? पहले तो जड़ शरीर तैयार होता है ना। जड़ शरीर का बीज कहाँ से आया? जो देह के बाप हैं देहअभिमानी वो उससे वो देह का बीज आया। लेकिन देह कहें या देह से भी पहले वो आत्मा है जिसमें जन्म-जन्मान्तर के संस्कार भरते हैं। जो आत्मा का देह उसके संस्कारों के अनुसार, माँ के पेट में 4-5 महीने पहले से ही तैयार होने लगता है। तो आत्मा पहले या शरीर पहले? हँ? आत्मा पहले। वो आत्मा जब माँ के पेट में 4-5 साल (महीने) का वो बच्चा निर्जीव तैयार हो जाएगा, क्योंकि उसने जैसे-जैसे कर्म किये होंगे, वैसा ही बच्चा तैयार होगा। क्या? आँख से दुष्कर्म किया होगा बहुत, बहुतों को फंसाया होगा, तो आँख से काना पैदा होगा। बहुत लात चलाई होगी तो टांग से लंगड़ा पैदा होगा। ऐसा होता है ना। तो ये पूर्व जन्म के संस्कार जो देह में आ गए, कहाँ से आए? हँ? आत्मा से आए। वो आत्मा जिसने अभी शरीर ही नहीं छोड़ा है। उसके वायब्रेशन काम करते हैं। वायब्रेशन की शक्ति इतनी पावरफुल होती है कि वो जीवन कहाँ बिता रहा है? और मन-बुद्धि के वायब्रेशन से वो शरीर माँ के पेट में तैयार हो रहा है। ये हिसाब-किताब है। क्या?

जैसे माँ है, गर्भ धारण करती है, और गर्भकाल में वो आत्मिक स्थिति में रहती है, तो बच्चे के ऊपर असर पड़ेगा ना। आत्मिक स्थिति में रहती है और वो आत्मा का उस समय शरीर स्त्री चोला है या पुरुष चोला है? आत्मा का जो चोला जिसने गर्भ धारण किया है, वो स्त्री चोला है ना। हँ? अरे? जिसने गर्भ धारण किया है वो माँ का स्त्री चोला नहीं है? तो स्त्री चोला जो है वो स्त्री चोला आत्मिक स्मृति में, पति की स्मृति में, देह की स्मृति में नहीं है, तो जो बच्चा पैदा होगा उसमें कौनसे संस्कार आवेंगे? हँ? आत्मिक स्मृति में रहने के ही संस्कार आएंगे ना। देहभान कि में देह हूँ, पुरुषपने के संस्कार आएंगे? दुर्योधन-दुःशासन के संस्कार आएंगे? नहीं आएंगे। तो ये बड़ा हिसाब-किताब है।

तो बताया, कि तुम बच्चे मालिक हो पार्ट बजाने के लिए। चाहे तो लंबे समय तक शान्तिधाम में रहो, चाहे तो सुखधाम में रहो क्योंकि तुम बच्चे जो हो ना; कौनसे बच्चे? बाबा का कान्सन्ट्रेशन कौनसे बच्चों के ऊपर रहता है? आस कौनसे बच्चों के ऊपर है? कितने बच्चों के ऊपर आस है? आठ बच्चों के ऊपर आस है। माना जो अव्वल नंबर आठ हैं, वो ही राजाई प्राप्त करेंगे जो ईश्वर की ईशत्व की, शासन की शक्ति है, वो आठ ही प्राप्त करेंगे, आठ के जो बाल-बच्चे हैं, वो भी तो प्राप्त करेंगे ना। तो वो तो महाराजाओं की लिस्ट के हो गए आठ। उनके जो बच्चे हैं वो 108 हैं। और जो 108 राजाएं हैं उन राजाओं की प्रजा नहीं होगी? हँ? जो 108 राजाएं जब राजा बनेंगे तो उनके विशेष सहयोगी, महामंत्री, सेनापति, ये विशेष अधिकारी होते हैं ना। होंगे या नहीं होंगे हँ? नहीं। विशेष अधिकारी जो हैं विशेष प्रजा है या नंबर दो की, नंबर तीन, थर्ड क्लास, फोर्थ क्लास प्रजा है? हँ? हाँ। 108 के जो बच्चे हैं उनमें जो फर्स्टक्लास अधिकारी बनते रहेंगे सहयोगी, वो हैं 16108 और उनकी संख्या कितनी है? 16108 की संख्या है ना। वो कब तक पूरी होती है? वो कब तक तैयार हो जाते हैं 16108 देखने में आएं कि हाँ उन्होंने स्टेज प्राप्त कर ली मालिकपने की। राजाई प्राप्त कर ली। शासन कर रहे हैं इतने के ऊपर।

ये सारा शूटिंग की बात है, रिहर्सल की बात है। रिहर्सल और शूटिंग चार युगों की होती है ना। चार युगों में से जो है गॉड फादर की दुनिया है, वो हैविन सतयुग त्रेता की है ना। तो त्रेता के अंत में जाकरके 16108 प्रत्यक्ष होंगे। क्या? और हिसाब है। ये सतयुग त्रेता में जो 21 जन्म होते हैं, जैसी-जैसी प्राप्ति वैसी-वैसी शूटिंग 16108 को होती है सतयुग, त्रेता आधा कल्प में। वो ही हिसाब फिर दूसरे तरीके से द्वापर से लेकर कलियुग अंत तक चलता है। यहाँ भी 16108 प्रत्यक्ष हुए प्रिंस प्रिंसेज़ के रूप में और वो प्रिंस-प्रिंसेज़ का भी अपना दायरा होता है। उनके ऊपर कंट्रोल करते हैं। तो द्वापर से लेकरके कलियुग के अंत तक भी वो ही कंट्रोल करेंगे। चाहे वो महाराजाओं की लिस्ट के आठ हों, वो आठ दिकपाल गाए जाते हैं, चाहे वो राजाओं की लिस्ट के 108 हों, जो राजाएं गाए जाते हैं, और उन राजाओं की नज़दीकी, फर्स्टक्लास प्रजा है, अधिकारी वर्ग की नज़दीक-नज़दीक, जैसे प्रिंस हैं, प्रिंसिज हैं, और महामंत्री है, सेनानायक है, ये अधिकारी होते हैं ना। प्रिंस अधिकारी होता है कि नहीं? प्रिंसिस भी? वो भी अधिकारी। तो उनका जो दायरा है प्रजा के ऊपर कंट्रोल करने का वो दायरा जैसे त्रेता के अंत तक प्रत्यक्ष होता है ऐसे ही कलियुग के अंत तक प्रत्यक्ष होता रहता है। ऐसे ही कलियुग के अंत तक प्रत्यक्ष होता रहता है। क्या?

मान लो त्रेता की अंत की सीढी है 21वें जनम की। हँ? सतयुग के आठ जनम, त्रेता के तेरह जन्म, तो 21 जन्म का, जो इक्कीसवें जन्म की जो सीढ़ी है उसमें जो 16108 प्रिंस-प्रिंसेज प्रत्यक्ष होंगे। क्या? कंट्रोलर के रूप में, वो ही कंट्रोलर के रूप में कलियुग के अंत में जाकरके प्रत्यक्ष होंगे। भले ढ़ेर के ढ़ेर देश-विदेश में फैले हुए होंगे, लेकिन कंट्रोल तो करेंगे ना। हँ? कितने देश हैं दुनिया में और कितने मिनिस्टर होंगे। सब देशों को इकट्ठा करो और उनके मिनिस्टर्स को इकट्ठा करो। तो संख्या कितनी बनेगी? ढ़ेर। और इतना ही नहीं। मिनिस्टर्स तो विधानपालिका हो गई। एक कार्यपालिका होती है जो प्रैक्टिकल में करते हैं बड़े-बड़े अधिकारी एडमिनिस्ट्रेटर। उनकी संख्या कितनी होगी? ऐसे ही न्यायपालिका में। न्यायपालिका में जो बड़े-बड़े जज बैठते हैं, हँ, न्यायाधीश बन करके वो भी तो बड़े आफीसर हैं कि छोटे-मोटे हैं? तो टोटल मिला के। क्या? ये 16108 की संख्या या तो कलियुग के अंत में प्रैक्टिकल में देखने में आते हैं कि इनके हाथ में बड़ी सत्ता है। या तो त्रेता के अंत में देखने में आते हैं। तो बताया कि तुम बच्चे मालिक हो।

A morning class dated 6.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the second page on Thursday was – You children. Which children? You children, who sit face to face and listen from the Supreme Soul Father, so, you can explain to everyone, i.e. the entire world. Be it the deity souls, be it the human souls, be it the demons. In a way, mainly there are deities, deity souls in the world of heaven, and everyone becomes a demon in the world of hell. Diti's children daitya (demons). So, be it deities (dev) or demons (daitya), you can explain to everyone. You. These people cannot explain. What? You are people from the divine world. People of the world of seed-form souls. The people of neutral world. What? And this is root (jad). Base (aadhaar). And all those who are born from them are the people of the aadhaarmoort (base-like) world. And the third world is that which is based on these roots. There are three parts of a tree. One is the main stem, which extends from the base to the top. Its roots are also below it, exactly below it. They go straight down. The other roots are those on the right side and on the left side. The branches, the religions on the right side of the tree and the branches, religions on the left side draw power from those roots. So, be it the branches on the right side, be it the branches on the left side, be it the followers of the aadhaarmoort, be it the followers of the seed-form.

You can explain to everyone that you can either become the masters of the new world; what? If you all wish, you can become the masters of the new world, masters of heaven because I Shiv am heavenly God Father, I create heaven. So, if you all wish you can become the masters of heaven. You can either become the masters of the abode of peace. What? There are two main names. Everyone likes them. Deity souls also like peace. Then they like happiness as well. And the demons, who are called human beings, who have an inconstant mind, for them peace is okay. Mind creates a lot of inconstancy, creates peacelessness. So, it likes peace because it comes in the world of sorrows only. So, they get to see only sorrows, so they say – Had we not come, had this world not existed it would be better. They have not seen that world itself, the world of happiness. So, they say – We don't want this world. We do not want happiness. We want peace. So, they like only peace. By the way, whatever may be the case, those who like the abode of happiness, can become the masters of the abode of happiness. They can become the masters of the abode of happiness. They can become numberwise also and if they wish to become number one, they can become number one masters as well. Similarly, you can become the masters of the abode of peace as well. If you wish you can become the number one master of the abode of peace. And then because you alone are the children, aren't you? What? You are My children. You are the true children of Shiv, who remain in soul conscious stage. Shiv always remains in soul conscious stage, in swasthiti. So, you are My children. 'You' means the seed-form souls, in seed form stage.

This is a body, is not it? It is a tree. And the point like soul is the seed. The seed emerges from the tree. Where does the tree emerge from? It emerges from the seed. So, how? Is there a non-living body or the seed soul in the mother's womb first? First the non-living body gets ready, doesn't it? Where did the seed of the non-living body emerge from? The seed of the body emerged from the body conscious fathers of the body. But call it the body or even before that body is the soul which records the sanskars of many births. The body of the soul starts getting ready 4-5 months beforehand in the mother's womb as per its sanskars. So, is the soul first or is the body first? Hm? The soul is first. That soul; when that 4-5 years (months) old non-living child gets ready in the mother's womb because the child will get ready in accordance with the actions that he would have performed. What? If he had performed evil actions through the eyes, if he would have entangled many persons, then he will be born with one eye. If he would have kicked many, then he would be born lame. It happens like this, doesn't it? So, the sanskars of the past birth which have emerged in the body have come from where? Hm? They came from the soul. That soul, which has not yet left its body. Its vibrations work. The power of vibrations is so powerful that he is leading his life at one place and through the vibrations of the mind and intellect that body is getting ready in the mother's womb. This is the karmic account. What?

For example, there is mother, she conceives, and during the pregnancy she remains in soul conscious stage, so it will have an effect on the child, will it not? It remains in soul conscious stage and at that time does that soul have a female body or a male body? The body of the soul, which has conceived, is a female body, isn’t it? Hm? Arey? is not the one who has conceived a mother's body? So, the female body is in soul's awareness, if it is not in the remembrance of the husband, if it is not in the remembrance of the body, then which sanskars will the child who will be born, have? Hm? It will get the sanskars of being in soul consciousness only, will it not? Will it get the sanskars of body consciousness that I am a body, a male body? Will it get the sanskars of Duryodhan-Dushasan? It will not get. So, this is a big karmic account.

So, it has been told that you children are masters to play a part. If you wish you may remain in the abode of peace for a long time and if you wish you may remain in the abode of happiness because you children; which children? Baba's concentration remains on which children? From which children does He have hope? From how many children does He have hope? He has hope from eight children. It means that the first eight numbers will achieve kingship; the eight alone will achieve the power of God, the power of governance. The children of eight will also achieve, will they not? So, those eight are in the list of Maharajas. Their children are the 108. And will those 108 kings not have subjects? Hm? When the 108 become kings, then their special helpers, the Mahamantris (ministers), Commanders are the special officers, aren't they? Will they or will they not be? No. Are the special officers special subjects or are they number two, number three, third class, fourth class subjects? Hm? Yes. The children of the 108; among them those helpers who will keep on becoming first class officers are the 16108 and what is their number? Their number is 16108, isn’t it? By when is that number completed? By when do those 16108 get ready? They should be visible that yes, they have achieved the stage of masters. They have achieved kingship. They are ruling over so many.

All this is a topic of shooting, a topic of rehearsal. The rehearsal and shooting of four Ages takes place, doesn't it? Among the four Ages, the world of God Father, the heaven is in the Golden Age and Silver Age, is not it? So, in the end of the Silver Age, 16108 will be revealed. What? And there is an account. The 21 births in the Golden Age and Silver Age; as are the achievements, so does the shooting takes place for 16108 in the Golden Age and Silver Age during half a Kalpa. The same account continues in another manner from the Copper Age to the end of the Iron Age. Even here 16108 were revealed in the form of Princes and Princesses and those Princes and Princesses also have their own realm. They control in their jurisdiction. So, from the Copper Age to the end of the Iron Age also they will only control. Be it the eight of the list of Maharajas, who are praised as the eight Dikpaal (protectors of directions), be it the 108 of the list of kings, who are praised as kings, and be it the close, first class subjects of those kings, those who are close to the officers, for example, there are Princes, Princesses, Ministers, Army commanders; these are officers, aren't they? Is a Prince an officer or not? Princess also? She is also an officer. So, their realm, their realm of controlling the subjects, just as it is revealed in the end of the Silver Age, similarly, it continues to be revealed till the end of the Iron Age. Similarly, it continues to be revealed till the end of the Iron Age. What?

Suppose there is the last step of the Silver Age, of the 21st birth. Hm? Eight births of the Golden Age, thirteen births of the Silver Age, so, in the step of the 21st birth, 16108 Princes and Princesses will be revealed. What? They will only be revealed in the form of controller in the end of the Iron Age. Although numerous of them will be spread all over the country and abroad, yet they will control, will they not? Hm? How many countries are there in the world and how many ministers would be there! If you count all the countries and their ministers, then what would be their number? Numerous. And not just that. Ministers are part of the legislature. There is one executive, the big officers, administrators, who do in practical. What will be their number? Similar is the case with judiciary. The judges who sit in the judiciary are also big officers; or are they small officers? So, in totality; what? This number of 16108 is visible in practical either in the end of the Iron Age that they have a big power in their hands. Or they are seen in the end of the Silver Age. So, it was told that you children are masters.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 15 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2448, आडियो 2934, दिनांक 06.03.2018
VCD 2448, Audio 2934, Date 06.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning class dated 6.4.1967
VCD-2448-Bilingual

समय- 00.01-16.37
Time- 00.01-16.37


प्रातः क्लास चल रहा था – 6 अप्रैल, 1967. गुरुवार को दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी –कि तुम बच्चे चाहो तो शान्तिधाम के मालिक बन सकते हो, चाहे तो सुखधाम के मालिक बन सकते हो। चाहे तो दोनों के मालिक बन सकते हो। तुम बच्चे तो मालिक हो पार्ट बजाने के लिए। अभी घर छोड़करके यहाँ आते हो पार्ट बजाने के लिए। अभी इस दुनिया में ये भी तो कोई मनुष्य नहीं जानते हैं कि दुनिया एक रंगमंच है। हम रंगमंच पर पार्ट बजाने वाले पार्टधारी हैं। हम आत्मा हैं। आत्मा पार्ट बजाती है इस रंगमंच पर भांति-भांति के चोले बदलकर जन्म-जन्मांतर। ऐसी बात को कोई भी नहीं जानते हैं क्योंकि पहले तो आत्मा का आक्यूपेशन भी तो चाहिए। बच्ची आत्मा कैसी है? आत्मा का भी आक्यूपेशन चाहिए तो आत्मा के बाप का भी आक्यूपेशन चाहिए। तो मुख्य पहली बात है ये रियलाइज करना आत्मा को कि आत्मा है क्या? तो तुमको और किसको मालूम था कि हमारी आत्मा क्या है, कैसे पार्ट बजाती है। अभी आत्मा तो जानते हो कि आत्मा परमधाम से आती है।

परमधाम का मतलब ही है परे ते परे धाम। ऊँचे ते ऊँचा धाम, जहाँ ऊँच ते ऊँच बाप रहता है। बाप का घर है ना। तो वहाँ शान्तिधाम। क्या आत्माओं की? वो आत्माओं की दुनिया है, निराकारी आत्माओं की। इनकारपोरियल वर्ल्ड से आती है आत्मा। निराकारी दुनिया से आती है। परन्तु है तो। भले कहते भी हो कि बिन्दी है। तो बिन्दी भी तो है ना। तभी बुद्धि में फिर भी बड़ी आती है जैसे कि। क्यों? शालिग्राम बड़े होते हैं ना। तो बड़ी होती है। तो एकदम से बड़ी। कहते भी हो, समझते भी हो कि आत्मा स्टार है। बिन्दी समान बहुत छोटी है। बहुत सूक्ष्म है। फिर भी जब मन्दिरों में जाकरके शालिग्रामों को देखते हो तो तुम्हारी बुद्धि में आत्मा अंगुष्ठा मिसल हो। क्योंकि शालिग्राम भी अंगुष्ठा मिसल होते हैं। तो वो चीज़ देखी जाती है ना। तो जो चीज़ देखी जाती है वो बुद्धि में बैठ जाती है। क्या बुद्धि में बैठ जाती है? कि आत्मा शालिग्राम है। शालिग्राम बड़ी, आत्मा बिन्दी तो छोटी है। शालिग्राम क्यों कहते हैं? ग्राम समूह को कहा जाता है। शालि चावल को कहा जाता है। चावल जैसी आत्मा जिसका देहभान का छिलका उतर गया और वो समूह में आती है तो एक दूसरे का संग का रंग लगता है, बड़ा देहभान का रूप धारण कर लेती है। तो देखो बैठ जाती है ना बुद्धि में कि शालिग्राम बड़ी है। चित्र देखा है।

तो जब बैठ करके यज्ञ करते हैं तो भी वो शालिग्राम जितने बड़े बनाते हैं आत्माओं को। शालिग्राम काहे के बनाते? मिट्टी के बनाते हैं। माने देह अभिमान की मिट्टी में संग के रंग में आते-आते बिन्दी से बढ़ करके बड़े हो गए। क्योंकि उनको ये मालूम होते हुए देखो बुद्धि कैसी होती है? मालूम होते हुए भी कि भई चमकता है अजब सितारा भृकुटि के बीच में। मालूम तो होता है ना। अगर नहीं मालूम होता तो भृकुटि के बीच में बिन्दी क्यों लगाते? नाक के ऊपर लगा लेते। भृकुटि में बिन्दी लगाते हैं ना। तो आत्मा इतनी छोटी है कि इन आँखों से देखी भी नहीं जा सकती। इतनी छोटी चीज़ है। बहुत छोटी। इसलिए गीता में कहा है कि अणु से भी अणु। जैसे अणु को यंत्र से देखते हैं तो देखने में आता है। नहीं तो? अणु इतनी छोटी चीज़ जिससे अणु बम्ब बनता है। वो उसमें ताकत ज्यादा आ जाती है ना। तो देखो, जब यज्ञ करते हैं तो बनाएंगे वो अंगूठे के मिसल। क्या? यज्ञ माने? यज्ञ माने स्वाहा। ‘स्व’ माने ‘अपना’, ‘हा’ माने ‘हाय, गया’। अपना जो कुछ है तन, मन, धन, बीबी, बाल-बच्चे, वो सब स्वाहा। गया।

तो देखो, जब यज्ञ रचते हैं; यज्ञ माने स्वाहा करते हैं ना। यज्ञ माना अर्पण करना, त्याग करना। कब बनाएंगे अंगुष्ठे मिसल? माना बड़ा रूप धारण करेंगे तभी तो याद करेंगे। छोटी बिन्दी मिसल आत्मा है। तो कुछ है ही नहीं। क्या-क्या करेंगे? तो जब यज्ञ रचते हैं तो बनाते हैं अंगुष्ठे मिसल। बड़ा रूप बना देते हैं। तो वो बात शास्त्रों में लिखी हुई है कि अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ रचा तो उसमें, उस यज्ञ में सारी दुनिया स्वाहा। अभी देखो शास्त्र में लिखा हुआ भी कैसे है। मुख से भी फिर कहते हैं स्टार है, सितारा है। बहुत छोटा है, एकदम बहुत छोटा। इस आत्मा को, स्टार को, दिव्य दृष्टि बिगर देखा ही नहीं जा सकता। और वो तो आँखों से देखते हैं जो आसमान के सितारे हैं। वो तो स्थूल सितारे हैं तो इन आँखों से दिखाई पड़ते हैं। और वो जो यज्ञ में बनाते हैं शालिग्राम वो भी आँखों से देखते हैं। बनाते हैं ना। हँ? देहअभिमान की मिट्टी से बनाए गए। उनकी पूजा करते हैं। माना छोटे रूप की पूजा नहीं कर सकते। लेकिन जब वो बड़ा रूप धारण करते हैं तो उनकी पूजा करते हैं। तो जो पूजा करते हैं तो उनकी बुद्धि में वो ही शालिग्राम रहते हैं बड़े। क्योंकि पूजा तो बड़े की ही की जा सकती है। बिन्दी की कैसे पूजा करेंगे? बिन्दी छोटी सी हो गई। जल चढ़ाएंगे, लुढ़क जाएगी। पता ही नहीं चलेगी कहाँ चली गई? तो बड़े रूप की पूजा करते हैं।

तो ऐसे ये बाप भी ऐसे ही बड़े हैं। क्या? ये बाप माने कौन बाप? जो कहते हैं मेरी आत्मा का ही नाम शिव है। औरों की आत्मा का नाम शिव नहीं होता है क्योंकि मैं सदैव निराकारी रहता हूँ। निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी। कोई देह का कभी भी अहंकार नहीं होता। भले देह में प्रवेश करता हूँ। फिर भी जिस देह में प्रवेश करता हूँ, मेरी आत्मा को कोई अहंकार नहीं होता कि मैं इस देह का स्वामी हूँ और मैं विश्व का मालिक हूँ। ऐसा कोई अहंकार नहीं रहता। कौन? ये बाप। ये बाप माने कौन बाप? ज्योतिबिन्दु शिव। ये भी कहते हैं कि मैं हूँ तो बहुत सूक्ष्म ज्योतिबिन्दु। फिर शरीर में प्रवेश करता हूँ तो बड़ा हूँ। जैसे शालिग्राम बड़े ऐसे मैं भी बड़ा। फिर उनसे भी बड़े; उनसे भी बड़े कौन? हँ? उनसे भी बड़े कौन? मैं प्रवेश करता हूँ तो बड़ा लिंग रूप बनाते हैं। उसकी पूजा करते हैं। फिर उनसे भी बड़े। माना कौन? जिसमें प्रवेश करता हूँ शरीरधारी, शरीर में, उस शरीरधारी की जो आत्मा है वो उससे भी बड़ा। बड़ा माने? बड़ी महिमा वाली। तो इसको फिर कहा जाता है अज्ञान। क्या? है तो ओरिजिनली हम ज्योतिबिन्दु आत्मा अति सूक्ष्म जिसमें भय का, देह का नाम-निशान नहीं। फिर समझ लेते हैं हम बड़े हैं। तो ये हुआ अज्ञान। सारा अज्ञान। बाप कहते हैं देखो, ये अज्ञान है ना बच्ची। क्या? कि हम ओरिजिनल हैं क्या? अति सूक्ष्म ज्योतिबिन्दु आत्मा। फिर समझते हैं क्या देह अहंकार में आकरके? मैं राजा हूँ, मैं मिनिस्टर हूँ, मैं राष्ट्रपति हूँ। मैं बड़ा अधिकारी हूँ। तो ये सब अज्ञान है।

A morning class dated 6th April, 1967 was being narrated. The topic being narrated in the middle of the second page on Thursday was – If you children wish you can become the masters of the abode of peace; if you wish you can become the masters of the abode of happiness. If you wish you can become the masters of both. You children are masters to play your parts. Now you leave the home and come here to play your parts. Now, in this world no human being knows that the world is a stage. We are actors playing parts on the stage. We are souls. A soul plays parts on this stage by changing dresses (bodies) birth by birth. Nobody knows such a topic because first the occupation of the soul is also required. Daughter, how is the soul? The occupation of the soul is also required and the occupation of the soul's Father is also required. So, the main first topic is to realize the soul that what a soul is. So, did you or anyone else know as to what our soul is, and how it plays the part? Now you know the soul that the soul comes from the Supreme Abode.

The meaning of the Supreme Abode itself is the farthest abode. The highest on high abode where the highest on high Father lives. It is the Father's home, is not it? So, there, the abode of peace. Is it of the souls? It is the world of souls, of incorporeal souls. The soul comes from the incorporeal world. It comes from the incorporeal world. But it is. Although you also say that it is a point. So, it is a point also, is not it? Only then however does the big one come in the intellect. Why? Shaligrams are big, aren't they? So, it is big. So, it is completely big. You also say, you also understand that the soul is a star. It is very small like a point. It is very subtle. Yet, when you go and see the Shaligrams in the temples, then it occurs in your intellect that you are souls like a thumb because shaligrams are also like thumbs. So, that thing is observed, is not it? So, the thing that is observed also sits in the intellect. What sits in the intellect? That the soul is a shaligram. A shaligram is big, the soul, a point is small. Why is it called Shaligram? A group is called Gram. Rice is called Shaali. Rice like soul, whose peel of body consciousness has been removed and when it comes in a group, then it gets coloured by each other; it assumes the big form of body consciousness. So, look, it sits in the intellect that Shaligram is big. A picture has been seen.

So, even when you sit and perform Yagya, the souls are depicted as big as shaligrams. What are Shaligrams made up of? They are prepared with clay. It means that while being coloured by the company of the mud of body consciousness, they grew from a point to a big form because despite knowing, how their intellect is? Despite knowing that brother, the unique star shines in the middle of the forehead (bhrikuti). It is known, is not it? Had they been unaware, why would they apply bindi in the middle of the bhrikuti? They would have applied it on the nose. They apply bindi in bhrikuti, don't they? So, the soul is so small that it cannot even be seen through these eyes. It is such a small thing. Very small. This is why it has been said in the Gita that it is minuter than an atom. For example, when an atom is seen through the microscope, then it is visible. Otherwise? The atom is such a small thing with which an atom bomb is prepared. It develops more power, doesn't it? So, look, when they perform Yagya, then they make it like a thumb. What? What is meant by Yagya? Yagya means swaha (sacrifice). 'Swa' means 'ours'; 'ha' means 'haay, gaya' (Oh no, it went). Whatever is ours, the body, mind, wealth, wife, children, all that was sacrificed. Went.

So, look, when a Yagya is organized; Yagya means they sacrifice, don't they? Yagya means to surrender, to renounce. When do they make like a thumb? It means that they will remember only when they assume a big form. The soul is like a small point. So, it is nothing at all. What all will you do? So, when Yagya is organized, then it is made like a thumb. They make a big form. So, that topic has been written in the scriptures that when an imperishable Rudra Gyan Yagya was organized then in that Yagya, the entire world is sacrificed. Now look, how it has been written in the scriptures. They also say through the mouth that it is a star, sitara. It is very small, completely very small. This soul, this star cannot be seen without divine vision (divya drishti) at all. And those stars of the sky are seen through the eyes. They are physical stars; so, they are visible through these eyes. And those Shaligrams which are made in the Yagya are also visible through the eyes. They are made, aren't they? Hm? They were made with the mud of body consciousness. They are worshipped. It means that the small form cannot be worshipped. But when they assume a big form, then they are worshipped. So, only those big Shaligrams remain in the intellect of those who worship because only the big forms can be worshipped. How will the point be worshipped? Point is small. When you offer water, it will roll down. You will not know at all as to where it went? So, they worship the big form.

So, similarly, this Father is also big. What? 'This Father' refers to which Father? The one who says that the name of My soul itself is Shiv. The name of the souls of others is not Shiv because I always remain in an incorporeal stage. Incorporeal, viceless, egoless. There is never any ego of the body. Although I enter in a body, yet the body in which I enter, My soul does not have any ego that I am the master of this body and I am the master of the world. There is no such ego. Who? This Father. This Father refers to which Father? The point of light Shiv. This one also says that I am indeed a very subtle point of light. Then, when I enter in a body, I am big. Just as Shaligrams are big, similarly I am also big. Then bigger than him; who is bigger than him? Hm? Who is bigger than him? When I enter, then a big ling form is prepared. It is worshipped. Then bigger than him. It refers to whom? The one in whom I enter, the bodily being, the body in which I enter, the soul of that bodily being is bigger than him. What is meant by big? The one with big glory. So, then this is called ignorance. What? We are originally a point of light soul, very minute, in whom there is no fear, no name or trace of body. Then we think that we are big. So, this is ignorance. Entire ignorance. The Father says – Look, this is ignorance, is not it daughter. What? That originally what are we? Very minute point of light soul. Then, what do they think out of body consciousness? I am a king, I am a Minister, I am a President. I am a big officer. So, then all this is ignorance.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2449, आडियो 2935, दिनांक 07.03.2018
VCD 2449, Audio 2935, Date 07.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning class dated 06.04.1967
VCD-2449- Bilingual

समय- 00.01-17.01
Time- 00.01-17.01


प्रातः क्लास चल रहा था – 6.4.1967. गुरुवार को तीसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी भक्तिमार्ग की। कोई भी बात भक्तिमार्ग की अब हमको अच्छी नहीं लगती है क्योंकि इन सब भक्तिमार्ग की बातों से हम नीचे गिर गए। अभी हमको मालूम हो गया कि भक्ति एक अलग चीज़ है, गिराने की सीढ़ी, वो भक्ति है। भक्ति आती है अनेक धर्मगुरुओं से। जैसे रावण के दस सिर इकट्ठे हो गए। तो ये कलियुग के अंत में जो खास-खास रावण के दस सिर इकट्ठे हो जाते हैं। तो अनेक सिर हमको गिराते हैं। और एक राम का सिर, बाप का सिर हमको चढ़ाता है। और सेकण्ड में चढ़ाते हैं। गाया हुआ है – एक सेकण्ड में जीवनमुक्ति राजा जनक की। जनक कोई और तो नहीं है। जन माना जन्म देने वाला। क माना करने वाला। तो ये सारे संसार को जन्म देने वाला तो एक बीज हो गया। बीज रूप बाप। लेकिन उसके साथ-साथ जो भी सारे संसार की और बीज रूप आत्माएं हैं वो सब नंबरवार जनक हैं साढ़े चार लाख। तो सभी को ये मालूम पड़ जाता है कि अभी बाप सुप्रीम सोल साकार मनुष्य सृष्टि के बाप में आकरके हमको एक सेकण्ड में चढ़ाते हैं। एक सेकण्ड उस चढ़ाने से पहले जो टाइम होता है, उसमें ये भूत-प्रेत आत्माएं चिपक के हमको नीचे गिराती हैं। गाया उसे जाता है सेकण्ड में जीवनमुक्ति।

अच्छा, अभी सेकण्ड में जीवनमुक्ति हमको मिलती है तो उस सेकण्ड का राज़ तो होना चाहिए। अगर बंधन होता है तो कबसे शुरु होता है? और कैसे शुरू होता है? एक से होती है मुक्ति। किस एक से? किस एक से मुक्ति होती है? और अनेकों से होती है बंधन की बात। अनेक डालते हैं बंधन में। एक डालता है छुटकारे में। तो ये बंधन कैसे शुरू होता है? जब एक का राज्य स्थापन किया हुआ ढ़ाई हज़ार साल स्वर्ग में चलता है, हैविनली गॉड फादर का स्थापन किया हुआ स्वर्ग का राज्य। तो उसके अंत में, ढ़ाई हज़ार साल के बाद ये द्वैतवादी धरमपिताएं दूसरे-दूसरे धरम के, संसार में घुस पड़ते हैं। और देवात्माओं की दुनिया में जो कम कलाओं वाले देवताएं होते हैं, वो ही कच्ची आत्माएं, कच्चे देवताएं, द्वैतवादी द्वापरयुग से उन धरमपिताओं के बहकावे में आ जाते हैं। इसलिए मुरली में ब्रह्मवाक्य है कि भारतवासियों ने सुनी-सुनाई बातों से दुर्गति पाई। जिसने जो आकरके सुनाना शुरू कर दिया, झूठी-झूठी बातें सुना दी, बस, प्रभावित हो गए, उनकी प्रजा बन गए। ऐसे शुरू होता है तुम बच्चो के लिए ये बंधन का मार्ग। इसका कोई को पता नहीं है कि जीवन में बंधन कैसे आता है? नहीं तो बाप का तो नारा है, जो सारी मनुष्य सृष्टि का बाप है, सभी आत्माओं का बाप है, क्या नारा है? स्वतंत्र रहो, और स्वतंत्र रहने दो।

हम बच्चों को ये मालूम है कि बरोबर हम जीवनमुक्ति पाते हैं। फिर इतनी सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते, कितनी सीढ़ी? 84 जन्मों की सीढ़ी। उतरते-उतरते अभी जैसे जीवनबंध पूरा हो जाता है। और फिर? एक बाप प्रैक्टिकल में सम्मुख आते हैं तो जीवनमुक्त भी हो जाते हैं। आते हैं एक ही बाप सबको बनाने के लिए। हँ? कौन एक ही बाप? कौन एक ही बाप? दुनिया में बाप तो बहुत हुए 84 जन्मों के हरेक, एक-एक बाप। हँ? तो धरमपिताएं भी बाप। फिर सब धरमपिताओं, बापों का भी बाप। सारी मनुष्य सृष्टि का एक बाप। फिर उसका भी बाप। तो कौनसा एक बाप है जो सबको बनाने के लिए आते हैं? उनका नाम क्या? इसलिए गाते हैं – सर्व का सद्गति दाता। क्या? सब माने? सबका सद्गति दाता। माना सबमें ए टू ज़ेड सब आ जाते हैं। सारी मनुष्य सृष्टि आ जाती है, प्राणीमात्र आ जाते हैं। और मनुष्य सृष्टि का बीज रूप बाप भी आ जाता है। उस बीज रूप मनुष्य सृष्टि के बाप में शिव बाप ही आकरके सद्गति दाता बनता है। वा तो कहें, उसमें प्रवेश करके उसे आप समान बनाता है। तो सबकी सद्गति होती है।

तो सद्गतिदाता वो होने के कारण उसको ही कहते हैं हे पतित पावन। हँ? वो होने के कारण उसको। न इसको। हँ? उनको भी नहीं। इसको माने वो बाजू में बैठा ब्रह्मा की आत्मा। और इसके बाजू में बैठने वाले जो भी इसके फालोअर्स हैं, कोई भी सद्गतिदाता नहीं। वो जो दूर ही दूर बैठे रहते हैं, कभी मेरे नज़दीक नहीं आ पाते, उनको भी यही कहते हैं। किसको कहते हैं? उस एक को ही कहते हैं। किस एक को? हँ? आत्माओं के बाप को? कैसे पता चलेगा एक? बिन्दु-बिन्दु आत्माएं सब एक जैसी। जब साकार मनुष्य तन में, आदम में प्रवेश करता है, तो जो पहचानते जाते हैं, उस एक को। तो उनकी बात है। वो है पतित-पावन। पतितों को पावन बनाने वाला। और उसमें है भी, उस व्यक्तित्व में, उस पर्सनालिटी में एक आत्मा पतित और एक आत्मा पावन। तो कहा जाता है – हे पतित-पावन आओ। तो अभी ये तो बच्चों के ऊपर तो अच्छा, पक्का निश्चय है ना कि पतित-पावन कौन है? किसको बुलाते हैं? जो बुलाते हैं तो पतित से पावन भी बनते हैं। और जो बुलाते ही नहीं, विदेशी लोग, इसीलिए विदेशों में कीर्तन करते हैं – हे पतित-पावन आओ? तो वो पतित से पूरे पावन बनते भी नहीं हैं।

तो जो हमको पावन बनाते हैं तो उनको तो याद करना चाहिए। हँ? क्योंकि याद करने से ही पावन बनते हैं। हँ? क्या? याद करना, देखना, कानों से सुनना, नाक से सूंघना, या होठों से चाटना, चाहे कोई ज्ञानेन्द्रियां हों, चाहे कोई कर्मेन्द्रियां हों। इनका इतना प्रभाव नहीं है। क्या? बलिहारी मन-बुद्धि से याद करने की है। तो याद करने से ही पावन बनते हैं। क्या? अगर ऐसा न होता तो 500-700 करोड़ आत्माएं ज्ञानेन्द्रियों से और कर्मेन्द्रियों से संग का रंग लेती हैं प्रैक्टिकल साकार में? लेती है? नहीं लेतीं। वो भी, वो भी पावन आत्माएं बनती हैं या नहीं बनती हैं? कैसे बनती हैं? मन-बुद्धि से याद करने से ही पावन बनती हैं। और कोई भी चीज़ को याद करने से हम पावन नहीं बन सकते। क्या? दुनिया की कोई भी चीज़ हो, वो सिर्फ एक ही है व्यक्तित्व, पर्सनालिटी, जिसको याद करने से हम पावन बन सकते हैं क्योंकि वो ही है ऊँचे ते ऊँचा पतित-पावन एक। क्या? ऊँचे ते ऊँचा और नीचे ते नीचा कहाँ की बात है? निराकारी आत्माओं की दुनिया की बात है या साकारी दुनिया में ऊँच-नीच होता है? साकारी दुनिया की बात है। तो वो साकारी दुनिया में जो ऊँचे ते ऊँचा पार्टधारी, हीरो पार्टधारी है; हँ? भोगी आत्माओं के बीच परमपार्टधारी है, वो ही ऊँचे ते ऊँचा, पतित-पावन एक है।

जबकि हम पावन बनते हैं तो फिर यहाँ रह नहीं सकते। क्या? जैसे वो पतितों को पावन बनाने वाला पावन है तो उसको याद करके उसकी याद में हम ऐसे लीन हो जाते हैं कि इस पतित दुनिया में फिर रह नहीं सकते हैं। उसमें ही जाके मिल जाते हैं। किसमें? हँ? किसमें? पतित-पावन बाप में जाकरके मिल जाते हैं। लीन हो जाते हैं। यहाँ इस दुनिया में नहीं रह सकते। क्या? यहाँ और जिस बाप में जाकरके लीन होते हैं वहाँ, अंतर क्या है? यहाँ है पाँच तत्वों की दुनिया। विनाशी तत्वों की दुनिया। और बाप परमधाम भी है। क्या? ब्रह्म लोक, जिसका कभी विनाश नहीं होता। जिसके लिए बोला कि तुम बच्चे नंबरवार परमधाम को इस सृष्टि पर उतार लेंगे। जो पहले-पहले इस सृष्टि पर परमधाम में रहने की अनुभूति करता है उसके, आत्मा के घर में, सभी आत्माओं को जाकरके शरण लेनी पड़ेगी। यहाँ नहीं रह सकते पांच तत्वों की दुनिया में।

A morning class dated 6.4.1967 was being narrated. On Thursday, the topic being discussed in the beginning of the middle portion of the third page was of the path of Bhakti. We do not like any topic of the path of Bhakti now because we have fallen down through all these topics of the path of Bhakti. Now we have come to know that Bhakti is a different thing, a ladder to downfall is Bhakti. Bhakti comes from many religious gurus. It is as if the ten heads of Ravan gathered. So, in the end of this Iron Age, the ten special heads of Ravan gather. So, many heads make us fall. And one head of Ram, the head of Father makes us rise. And He makes us rise in a second. It is sung – Jeevanmukti (liberation in life) of King Janak in a second. Janak is none else. Jan means the one who gives birth. Ka means the one who does. So, the one who gives birth to the entire world is one seed. The seed-form Father. But along with him, all the seed form souls of the world are numberwise four and a half lakh Janaks. So, everyone gets to know that now the Father, the Supreme Soul comes in the Father of the corporeal human world and makes us rise in a second. The time just before that second which causes rise, in that time these ghost and devil souls stick to us and make us fall. It is sung – Jeevanmukti in a second.

Achcha, now we get jeevanmukti in a second; so, there should be a secret of that second. If there is bondage, when does it start? And how does it start? One causes mukti (liberation). Which ‘one’? Who is that ‘one’ who causes mukti? And many cause the topic of bondage. Many put you in bondage. One puts you in freedom. So, how does this bondage start? When the kingdom established by one continues in heaven for 2500 years, the kingdom of heaven established by the heavenly God Father, then at the end of it, after 2500 years, these dualistic founders of religions of other religions intrude into the world. And in the world of deity souls, the deities with fewer celestial degrees, the same weak souls, the weak deities, get misled by those founders of religions from the dualistic Copper Age. This is why there is a Brahmavaakya in the Murli that the Indians underwent degradation on the basis of hearsay. Whatever anyone came and started narrating, narrated false topics, that is all, they got influenced, they became their subjects. In this manner starts the path of bondage for you children. Nobody knows as to how bondage in life starts? Otherwise, the slogan of the Father, the Father of the entire human world, the Father of all the souls is; what is the slogan? Be free and let others be free.

We children know that definitely we achieve jeevanmukti. Then we come down so many steps; how many steps? the Ladder of 84 births. While coming down now it is as if the process of bondage in life (jeevanbandh) is completed. And then? When we come face to face with one Father in practical, then we also become liberated in life (jeevanmukt). Only one Father comes to make everyone. Hm? Which one Father? Who’s that only one Father? There have been many fathers in 84 births, one in each birth. Hm? So, the founders of religions are also fathers. Then the Father of all the founders of religions, Father of fathers. One Father of the entire human world. Then his Father as well. So, who is the one Father who comes to make everyone? What is his name? This is why it is sung – The bestower of true salvation upon everyone. What? Everyone refers to whom? Bestower of true salvation upon everyone. It means that A to Z everyone is included among everyone. The entire human world is included; all the living beings are included. And the seed form Father of the human world is also included. The Father Shiv Himself comes in that seed form Father of the human world and becomes the bestower of true salvation upon everyone. Or we may say, He enters in him and makes him equal to Himself. Then the true salvation of everyone is caused.

So, as He is the bestower of true salvation upon everyone, He is called O purifier of the sinful ones (patit-paavan). Hm? As He is, He. No, this one. Hm? Not that one also. ‘This one’ means ‘that soul of Brahma who is sitting beside’. And those who sit beside this one, all his followers, nobody is the bestower of true salvation upon everyone. Those who keep on sitting far away, are never able to come near Me, they are also told this only. Who are told? He alone is called. Which one? Hm? The Father of souls? How will you know of the one? All the point-like souls are alike. When He enters in the corporeal human body, in Aadam, then all those who start recognizing that one, so, it is about that one. He is the purifier of the sinful ones. He purifies the sinful ones. And in that personality one soul is sinful and one soul is pure. So, it is said – O purifier of the sinful ones, come. So, now the children have good, firm faith that who is the purifier of the sinful ones? Who is called? Those who call become pure from sinful ones. And those who do not call at all, the foreigners; this is why do they pray in the foreign countries – O purifier of the sinful ones, come? So, they do not even become completely pure from sinful ones.

So, you should remember the one who makes us pure. Hm? It is because we become pure only by remembering. Hm? What? To remember, to see, to hear through the ears, to smell through the nose, or to lick through the lips, be it any sense organ, be it any organ of action. They do not cast much influence. What? The glory is about remembering through the mind and intellect. So, we become pure only by remembering. What? Had it not been so, then do 500-700 crore souls get coloured by the company through sense organs and the organs of action in practical, in corporeal form? Do they get coloured? They do not get coloured. Do they also become pure souls or not? How do they become? They become pure only by remembering through the mind and intellect. We cannot become pure by remembering anything else. What? Be it anything in the world, it is by remembering only one personality that we can become pure because he is the only one highest on high, purifier of the sinful ones. What? Highest on high and lowest on low is about which place? Is it about the world of incorporeal souls or does high and low exist in the corporeal world? It is about the corporeal world. So, the one, who is the highest on high actor, hero actor in that corporeal world; hm? The one who is the supreme actor among the bhogi (pleasure seeking) souls is the highest on high, purifier of the sinful ones.

When we become pure, we cannot remain here. What? Just as he is the pure one, who purifies the sinful ones, so, by remembering him, we merge into his remembrance in such a way that they cannot live in this sinful world. We go and merge into Him only. In whom? Hm? In whom? They go and merge into the Father, the purifier of the sinful ones. We merge into him. We cannot remain in this world. What? What is the difference between ‘here’ and ‘there’, the Father in whom you go and merge? Here it is a world of five elements. A world of destructible elements. And the Father is also the Supreme abode. What? Brahm lok, which is never destroyed for which it was said that you children will bring the Supreme Abode numberwise to this world. The one who first of all experiences living in the Supreme Abode first of all, all the souls will have to go and seek asylum in his home, the home of the soul. You cannot live here in the world of five elements.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2450, आडियो 2936, दिनांक 08.03.2018
VCD 2450, Audio 2936, Date 08.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning Class dated 6.4.1967
VCD-2450-Bilingual

समय- 00.01-17.05
Time- 00.01-17.05


प्रातः क्लास चल रहा था – 6.4.1967. चौथे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – झूठा और सच्चा कह देते हैं। एक दाम नहीं होता है। सोना सच्चा, सोना झूठा। नाइन कैरट तक कहा जाए। तो नाइन कैरट, 14 कैरट, 18, 12 तो होते ही हैं। ये गिनिट्स लगाते आए हैं। 16 कैरट। नहीं, ये कायदा नहीं। बनाय तो कैसे भी सकते हैं कोई भी। जितना खाद डालो उतना वो बन जाते हैं। यहाँ है चैतन्य आत्माओं की खाद पड़ती है। सतयुग में सोने जैसे, त्रेता में परमधाम से उतरने वाली चांदी जैसी आत्माओं की खाद। द्वापर में तांबे जैसी आत्माओं की खाद, जो आत्मलोक से उतरती हैं। उनका संग का रंग लगता है। ढ़ेर के ढ़ेर आते हैं। ऐसे आने वालों की संख्या बढ़ती जाती है।

तो बाप की जो महिमा की जाती है कि मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, सत्य है, चैतन्य है, ऐसे गाते हैं ना। आगे गाते थे। और वो सिर्फ सुना हुआ था या शास्त्रवादियों से या उनसे। अच्छा। उस समय तो कोई भी पता नहीं पड़ते हैं कि कौन है मनुष्य सृष्टि का बीज रूप। भले गायन भी करते हैं, ज्ञान का सागर है, सुख का सागर है, शान्ति का सागर, फलाना-फलाना। पन्तु सिर्फ गायन मात्र रह जाता है। अभी संगमयुग में तो प्रैक्टिकल में तुम जानते हो कि बरोबर ये जो बीज रूप बाप में शिफ्तें हैं, उनमें शिफ्तें हैं, माना जो भी आत्माएं हैं, उनका बीज रूप बाप और जो भी मनुष्य मात्र हैं उनका बीज रूप बाप, दोनों इकट्ठे होते हैं तो शिफ्तें कही जाती हैं। एट्रिब्यूट्स। सुखों का भण्डार। तो वो हमारे में भरते रहते हैं। अभी संगमयुग में हमको बताते रहते हैं। प्यार के सागर भी बनो। ये तो बाद में बनेंगे। पहले तो ज्ञान के सागर बनो। तो ज्ञान का सागर बनना ये है मुख्य बात। ज्ञान के भण्डार बनेंगे तो योग के सागर बनो। योग शक्ति। समझे। योग रखो। किसके साथ? सिर्फ निराकार ज्योतिबिन्दु के साथ? नहीं, हमारी याद भी प्रवृत्ति की है। साकार और निराकार की प्रवृत्ति है। तो उनके मेल को बाबा कहा जाता है। तो बाबा को याद करो।

तो बाबा हमको कहते हैं कि मुझे याद करो तो तुम्हारा पाप कट जावे। हँ? जैसे को याद करेंगे, वैसे ही बन जावेंगे। निराकार ज्योतिबिन्दु को याद करेंगे तो पाप कटेंगे? हँ? उसमें पाप होते हैं क्या? हँ? तो जिसमें प्रवेश करते हैं उसमें पाप भी होते हैं। तो दोनों का मेल कहते हैं मुझे याद करो। तो तुम्हारा भी पाप कट जावे। तो ये हो गया योग। रचना को अपनी पहचान मिली, रचयिता बाप की पहचान मिली। तो रचयिता बाप, जिनसे हमको पावन बनना है। रचयिता और रचना का तो हिसाब है ना। रचना साकार तो रचयिता भी साकार। तो उस साकार में जो निराकार है, दोनों के योग से हमको पावन बनना है याद से क्योंकि उनका नाम ही है पतित-पावन। उनका कहा। उसका तो नहीं कहा। उसका माने एक। उनका माने कम से कम दो। दो का कम्बिनेशन है। तो उनका नाम है। तो उनका गुण भी बताया। पतित और पावन। दोनों का कम्बिनेशन है। पहले कौन? पहले किसको याद करेंगे? हँ? पहले किसको याद करेंगे? हँ? पतित को याद करेंगे या पावन को याद करेंगे? हँ? किसको याद करेंगे? क्यों? पतित को इसलिए याद करना पड़े कि जो सदैव पावन है वो तो बिन्दु है। और बिन्दु को याद करने से पता ही नहीं चलेगा कौनसा बिन्दु? इसीलिए जिस पतित में आते हैं, मुकर्रर रथ में, पहले उसे याद करना पड़े। फिर? पावन भी याद आए। ऐसे भी नहीं है कि पावन को याद करें, पतित को भूल जावें। तो वो तो पहले ही याद करना है। नहीं तो याद पहुँचती ही नहीं। और कोई पतित को ही याद करे और पावन को भूल जाए, तो शिव के बिना तो क्या हो जाता है? हँ? शिव नहीं है, ज्योतिबिन्दु ही नहीं है, तो फिर वो मुर्दा हो जाएगा। तो मुर्दे को थोड़े ही याद करना है।

तो नाम पड़ता है पतित-पावन। वो एक ही व्यक्तित्व है, पर्सनालिटी है, जिसका नाम पतित-पावन। दूसरा तो दुनिया में कोई भी पतित-पावन नहीं है। फिर क्या हैं? दूसरे दुनिया में जो भी हैं वो क्या हैं? हँ? पतित ही हैं। क्योंकि उनमें पता ही नहीं चलेगा कि किसमें पावन प्रवेश करता है? मुकर्रर रथ का तो पता चलता है। तो एक को ही कहते हैं – हे पतित-पावन! बस, पतित-पावन आकरके क्या करेगा? हँ? वो तो जानते ही नहीं हैं भक्त लोग। कहते भी बड़ा राइट है पतित-पावन सीता-राम। हँ? पतित-पावन कहते हैं तो सीता-राम क्यों लगाय देते? हँ? कौन है सीता, कौन है राम? कौन है सीता, कौन है राम? हँ? पतित-पावन सीता-राम। ये चार नाम इकट्ठे कर दिये। हँ? या पतित-पावन?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। वो तो ठीक है। जिसमें योगी लोग रमण करते हैं वो राम। तो ये सीता कौन है? हँ? कौन है सीता? राम का तो क्लेरिफिकेशन हुआ – योगी लोग जिसमें रमण करते हैं वो राम। (किसी ने कुछ कहा।) सब सीताएं? तो जिसको राम कहा वो सिर्फ राम ही है या सीता भी है? हँ? तुम सब सीताएं हो – ये किसने कहा? शिव ने कहा। तो जिनसे कहा उनमें वो राम वाली आत्मा भी आती है या नहीं? वो भी सीता है या नहीं? हँ? सीता माने जो रावण की जेल में आ जाएं, देह के बंधन में आ जाएं, पांच तत्वों के बंधन में आ जाएं, 5 विकारों के बंधन में आ जाएं। तो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं, वो रथधारी आत्मा भी पांच विकारों और पांच तत्वों के बंधन में आती है या नहीं आती है? आती है।

तो पतित-पावन सीता-राम कह दिया। हँ? माने सीता-राम शब्द में भी सीता पहले, राम बाद में। और पतित-पावन में भी पतित पहले, पावन बाद में। अब एक सीता तो नहीं हुई ना। हँ? कितनी हुईं? तुम सब सीताएं हो। है ना बच्ची। 6.4.67 की वाणी का पांचवां पेज। देखो, एक सीता नहीं। ये सभी सीताएं हुईं भक्ति। चाहे वो मेल हों, चाहे वो फीमेल हों। मेल चाहे फीमेल। और उन्होंने एक सीता का नाम ले लिया। भक्तों ने। या रामायण लिखने वाले तुलसीदास, वाल्मीकी ने। वो हद में चले गए क्योंकि ये, ये सभी भक्त हद में हैं। तुम बच्चों को अभी बेहद का ज्ञान सुनाते हैं। और हर बात में बेहद में ले जाते। क्या? जो भी सुनाते हैं वो हद की दुनिया का तो मिसाल दिया जाता है। लेकिन तुम्हारी बुद्धि कहाँ पहुँचती है? बेहद में। तो तुम जानते हो कि सीता इस हिसाब से कहा ही जाता है भक्ति। और सब भक्तियां हैं। मेल-फीमेल सब भक्तियां हैं।

A morning class dated 6.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the fourth page was – They say false and true. There isn’t one fixed price. True gold, false gold. It could be said upto nine carats. So, nine carat, 14 carat, 18, 12 are anyways there. They have been adding these ginnites. 16 carat. No, this is not the rule. Anyone can make in any form. They become [numberwise false] in accordance with the quantity of alloy you add. Here, the alloy of living souls is added. Alloy of gold like in the Golden Age, and the alloy of silver like souls descending from the Soul World. Alloy of copper like souls, which descend from the Soul World in the Copper Age. Their colour of company is applied. Numerous souls come. The number of such souls which arrive keeps on increasing.

So, the glory of the Father that He is the seed-form of the human world, true, living; they sing like this, don’t they? Earlier they used to sing. And was that just heard or from the supporters of scriptures (shaastravaadi). Achcha. At that time nobody can know that who the seed form of the human world is. Although they also sing that He is the ocean of knowledge, ocean of happiness, ocean of peace, etc. etc. But it remains just praise. Now, in the Confluence Age, you know in practical that definitely these qualities of the seed-form Father; He has the qualities, i.e. when the seed-form Father of all the souls and the seed-form Father of all the human beings combine, then they are said to have these qualities. Attributes. Storehouse of happiness. So, He keeps on filling in us. He keeps on narrating to us now, in the Confluence Age. Become an ocean of love also. You will become this later. First become an ocean of knowledge. So, becoming the ocean of knowledge is the main topic. When you become the storehouse of knowledge, then become the ocean of Yoga. Power of Yoga. Did you understand? Have Yoga. With whom? With just the incorporeal point of light? No, our remembrance is also of household. It is a household of corporeal and incorporeal. So, their combination is called Baba. So, remember Baba.

So, Baba tells us – If you Remember Me your sins will be cut. Hm? As is the one you remember, so shall you become. Will the sins be cut if you remember the incorporeal point of light? Hm? Does He have sins? Hm? So, the one in whom He enters has sins as well. So, the combination of both says – Remember Me so that your sins also are cut. So, this is Yoga. The creation got its introduction, got the introduction of the Creator Father. So, the creator Father, from whom we have to become pure. There is an account of the Creator and creation, isn’t it? When the creation is corporeal, the Creator should also be corporeal. So, we have to become pure through the remembrance, Yoga of the incorporeal within that corporeal, both, because their name itself is the purifier of the sinful ones (patit-paavan). It was said ‘their’ (unka). It was not said – his (uska). Uska means one. Unka means at least two. It is a combination of two. So, it is their name. So, their attribute was also mentioned. Sinful and pure. It is a combination of both. Who is first? Whom will you remember first? Hm? Whom will you remember first? Hm? Will you remember the sinful one or will you remember the pure one? Hm? Whom will you remember? Why? You will have to remember the sinful one because the one who is forever pure is a point. And if you remember the point, then you will not know at all as to which point? This is why the sinful one in whom He comes, in the permanent Chariot, first you will have to remember Him. Then? The pure one should also come to the mind. It is not as if you remember the pure one and forget the sinful one. So, you have to remember him first. Otherwise, the remembrance does not reach at all. And if someone remembers just the sinful one, and forgets the pure one, then what does he (the sinful one) become without Shiv? Hm? If Shiv is not there, if the point of light is not there at all, then he will become a corpse. So, you should not remember the corpse.

So, the name is coined as ‘patit-paavan’ (Purifier of the sinful ones). That is only one personality whose name is ‘patit-paavan’. Nobody else in the world is ‘patit-paavan’. Then, what are they? What are all others in the world? Hm? They are sinful only because among them it cannot be recognized at all that in which of them does the pure one enter? In case of the permanent Chariot it can be known. So, only one is called – O Purifier of the sinful ones (Patit-paavan). That is all; what will the purifier of the sinful ones come and do? Hm? The devotees do not know this at all. What they say is also very right – Patit-paavan Sita-Ram. Hm? When they say ‘patit-paavan’, why do they add ‘Sita-Ram’? Hm? Who is Sita, who is Ram? Who is Sita, who is Ram? Hm? Patit-paavan Sita-Ram. These four names were brought together. Hm? Or Patit-paavan?
(Someone said something.) Yes. That is all right. The one in whom yogis roam is Ram. So, who is this Sita? Hm? Who is Sita? The clarification of Ram was given – The one in whom the yogis roam is Ram. (Someone said something) All Sitas? So, the one who was called Ram, is he just Ram or is he Sita as well? Hm? You all are Sitas – Who said this? Shiv said. So, is the soul of Ram also included among those whom He said this? Is he also a Sita or not? Hm? Sita means the one who comes in the jail of Ravan, comes in the bondage of the body, comes in the bondage of the five elements, comes in the bondage of the five vices. So, the permanent Chariot in which He enters, that Chariot’s soul also comes under the bondage of the five vices and five elements or not? It does come.

So, they said – Patit-paavan Sita-Ram. Hm? It means - even in the words Sita-Ram, Sita is first and Ram is later on. And even in ‘patit-paavanpatit (sinful) is first, paavan (pure) is later. Well, there is not one Sita, isn’t it? Hm? How many are there? You all are Sitas. Isn’t it daughter? Fifth page of the Vani dated 6.4.67. Look, not one Sita. All these Sitas are Bhakti. Be it males or females. Be it male or female. And they uttered the name of one Sita. The devotees. Or Tulsidas, Valmiki who wrote Ramayana. They thought in a limited sense; all these devotees are in a limited sense. You children are now narrated unlimited knowledge. And you are made to think of every topic in an unlimited sense. What? Whatever is narrated, example of the limited world is given. But where does your intellect reach? To unlimited. So, you know that due to this reason Sita is called Bhakti. And all are bhaktins. All males and females are bhaktins.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 18 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2451, आडियो 2937, दिनांक 09.03.2018
VCD 2451, Audio 2937, Date 09.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning class dated 6.4.1967
VCD-2451-Bilingual

समय- 00.01-14.50
Time- 00.01-14.50

प्रातः क्लास चल रहा था – 6.4.1967. गुरुवार को पांचवें पेज के अंत में बात चल रही थी – जो भक्त लोग होते हैं एकदम बिल्कुल बुद्धू होते हैं। उनको कहो – देखो, स्वर्ग ऊपर में होता है। सभी ऊपर में चले जाते हैं। यहाँ तो नरक है ना। तो जो भक्तिमार्ग में भक्त और भक्तिनियां होंगी, वो बोलेंगी – हाँ, सत्य वचन महाराज। ये सत्य है। वास्तव में स्वर्ग और नरक कोई ऊपर होने की, नीचे होने की बात नहीं है। भगवान बाप जब इस सृष्टि पर आते हैं तो सारी दुनिया के मनुष्य मात्र को ऊँची स्टेज में ले जाते हैं। क्योंकि सबसे ऊँचा है शान्तिधाम। सो शान्तिधाम से फिर इस दुनिया में आत्माएं आते हैं सुख भोगने के लिए। तो स्वर्ग में पहले आते। और स्वर्ग के जन्म-जन्मान्तर आधा कल्प सुख भोगकर फिर नीचे दुख की सृष्टि में आती हैं। नीची स्टेज में आ जाती हैं।

ऊँची स्टेज है आत्मिक स्थिति। और नीची स्टेज है देहभान की स्थिति। भारी कौन है और हल्की कौन है? हँ? आत्मिक स्थिति। आत्मा है हल्की-फुल्की। और देह है भारी। वो तो पांच तत्वों से बनती है – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। तो ऊपर कौन उड़ेगी? आत्मिक स्थिति ऊपर उड़ेगी। तो भक्त लोगों ने समझ लिया कि आत्मिक स्थिति वाली जो देवताओं की दुनिया है, वो कोई ऊपर में होती होगी। और देहअभिमानी भक्तों ने समझ लिया हमारी दुनिया नीचे है। अब इसमें नीचे-ऊँचे होने की तो कोई बात नहीं। इसी भारत में पहले लक्ष्मी-नारायण का, राम-सीता का राज्य था, तो ऊँची स्टेज थी आत्मा की। वही आत्मा जब देहभान में उतरती है, द्वैतवादी द्वापरयुग में, देहअभिमानी धरमपिताओं के आने से तो नीची स्टेज में आ जाते हैं। दुःखी हो जाते। अशान्त हो जाते। कोई भी साधु या वो फलाना उनको ऐसे कहेंगे ना भक्तों को तो बोलेंगी ये भी सत्य है।

अभी तुमको, तुमको तो बाप बैठ क्लीयर बात समझाते हैं। तुम जान गई हो कि बरोबर हम यहाँ ही इस भारत की मालिक थी। तब हम स्वर्गवासी थे। अभी हम इस भारत में परतंत्र हैं। समझते हैं बापूजी ने स्वतंत्रता दिलाई। लेकिन स्वतंत्र कोई है ही नहीं। कोई भी मालिक नहीं है। अपनी मन-बुद्धि रूपी आत्मा के तो मालिक बनना दूर रहा, देह के भी मालिक नहीं, देह के संबंधियों के भी मालिक नहीं। अभी एकदम आधीन। अभी इस दुनिया में कलियुग अंत में ऐसे नरकवासी बने हैं। कहाँ के वासी? नरकवासी। स्वर्गवासी नहीं क्योंकि स्वस्थिति में आने से स्वर्ग बनता है। और नर, जिसे मनुष्य कहा जाता है, उस नर की बनाई हुई दुनिया को नरक कहा जाता है।

अभी बाबा आए हैं। हमको स्वर्गवासी बनना है। क्योंकि बाबा को कहा ही जाता है – ग्राण्डफादर को। दुनिया में जो भी बड़े-बड़े धरमपिताएं हुए हैं, उनको भी सुख-शांति का वर्सा देने वाला, उन धरमपिताओं का भी बाप शिवबाबा, वो तो ग्राण्डफादर हो गया। तो उस ग्राण्डफादर से सबको वर्सा मिलता है। वो आकरके हर मनुष्यात्मा को पहले-पहले जनम में स्वर्ग की अनुभूति कराते हैं, आत्मिक स्थिति की अनुभूति कराते हैं। 500-700-750 करोड़ मनुष्यात्माएं इस दुनिया में क्यों न हो गए हैं कलियुग के अंत में। फिर भी महाविनाशकाल में शरीर छोड़ने के बाद जब सब आत्माएं आत्मलोक में जाएंगी और वहाँ से वापस इस दुनिया में आएंगी तो पहले-पहले जनम में सभी मनुष्यात्माएं आत्मिक स्थिति में रहकर सुख का ही अनुभव करेंगी। 6.4.1967 की वाणी का छठा पेज। तो ऐसे स्वर्ग में जो नई आने वाली आत्माएं हैं परमधाम से, ब्रह्मलोक से, आत्मलोक जिसे कहा जाता है, वो तो यहाँ बादशाह अपने को अनुभव करती हैं। क्या? उनको कोई दुःख नहीं दे सकता। जैसे, बादशाह सबको दण्ड देता है लेकिन उसको कोई भी दण्ड नहीं दे सकता।

अब उन बादशाहों के बीच में हम बच्चे भी, ज्ञान सूर्य बाप के डायरेक्ट सूर्यवंशी बच्चे। क्या? और-और मनुष्यात्माएं कोई तो ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा के बच्चे हैं; ब्रह्मा ज्ञान चन्द्रमा है तो बच्चे कौनसे वंशी? चन्द्रवंशी। कोई इस्लाम वंशी, कोई बौद्धीवंशी, कोई क्रिश्चियनवंशी। और हमको फिर सूर्यवंशी बनना है। हम तो उन चन्द्रवंशियों के, इस्लामियों, बौद्धियों, क्रिश्चियन्स के जन्म-जन्मान्तर न कभी प्रभाव में आए हैं, और न यहाँ शूटिंग पीरियड में उनके प्रभाव में आने वाले हैं। अन्दर से हम उनके प्रभाव में नहीं आते। बाहर से भल वो हमारी बांधाबूंधी कुछ समय के लिए कर ही लें। तो ये जो सूर्यवंशियों की नॉलेज है, ये नॉलेज ही नर से नारायण बनने की है। क्या? नर, मनुष्य, जो मनु से बना हुआ है; मनु की औलाद को मन कहा जाता है। वो मनु मनन-चिंतन-मंथन करने वाला था, संकल्प-विकल्प करने वाला था; उसकी औलाद कहे जाते हैं मनुष्य। तो वो ही मनुआ अभी आदि नारायण बनता है। बनाने वाला कौन? नर को नारायण जैसा कौन बनाता? नर, जो कलियुग के अंत में कलाहीन हो जाते हैं, चन्द्रमा की तरह कोई भी रोशनी नहीं रहती, उनको सुप्रीम सोल बाप आकर, जैसे चन्द्रमा 16 कला संपूर्ण रोशनी वाला बन जाता है, ऐसे 16 कला संपूर्ण नारायण बनाते हैं। कौन? आदि नारायण। तो खुद कैसे होंगे? 16 कला संपूर्ण होंगे या उससे भी ऊपर होंगे? हँ? कलातीत। वो है ही सूर्य। सूर्य को थोड़े ही कलाओं में बांधा जाता है। वो कलाओं से ऊपर होता है।

तो ये नर से नारायण बनने की नॉलेज है। नारायण का अर्थ ही है, अयन माने घर, नार माना जल। जिसका घर ज्ञान जल में ही है। क्या? ज्ञान जल से बाहर कभी आता ही नहीं। इसलिए साक्षात्कार से जो आदि नारायण का चित्र बनवाया है बाबा ने उसमें देखो ध्यान से – ये लक्ष्मी-नारायण ऊपर खड़े हैं; उनकी दुनिया प्रकाश वलय वाली दुनिया है। क्या? ज्ञान जल की दुनिया में खड़े हैं। जो दुनियावी संसार के संकल्प हैं, देह के संकल्प, देह के धंधों के संकल्प, वो उनके संकल्प नहीं हैं। इसलिए उनका नाम पड़ा नार अयन। अयन। नार अयन माने जिनका घर ज्ञान जल में है। ज्ञान प्रकाश के वलय में ही रहते हैं। वो जो कथा सुनाते हैं सो भी नर से नारायण बनाने की सत्य नारायण की कथा है। और वो कथा भी भारत में होती है। हँ? दूसरे देशों में नहीं होती है। सत्य नारायण की कथा। हँ? वो यादगार है। उन्होंने क्या किया होगा? हँ? जरूर सत्य का अनुगमन किया। सत्य कहा ही जाता है ईश्वरीय ज्ञान को। एक ईश्वर से ही ज्ञान आता है, जो ईश्वर सदैव निराकारी स्टेज में रहने वाला है। इसीलिए जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता। चक्र में न आने से फिर उसमें तीनों काल का ज्ञान समाया हुआ रहता।

A morning class dated 6.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the fifth page on Thursday was – The devotees are complete fools. If you tell them – Look, the heaven is above. Everyone goes above. Here, it is hell, isn’t it? So, the male and female devotees on the path of Bhakti will say – Yes, whatever you say is true (satya vachan maharaj). This is true. Actually, heaven and hell is not about being up or down. When God, the Father comes in this world, then He takes the entire humankind to a high stage because the highest abode is the abode of peace. So, then you come from the abode of peace to this world to enjoy pleasure. So, you come to heaven first. And after enjoying happiness for half a Kalpa birth by birth in heaven, they come down to the world of sorrows. They come to the low stage.

High stage is soul conscious stage. And low stage is the stage of body consciousness. What is heavy and what is light? Hm? Soul conscious stage. Soul is light. And body is heavy. It is made up of the five elements – Earth, water, air, fire, sky. So, who will fly high? The soul conscious stage will fly high. So, the devotees thought that the world of deities in soul conscious stage must be somewhere above. And the body conscious devotees thought that our world is below. Well, there is no topic of being below or above. In this very India, there was a kingdom of Lakshmi-Narayan, Ram-Sita; so, the stage of the soul was high. When the same soul descends in body consciousness, in the dualistic Copper Age on the arrival of the body conscious founders of religions, then they come to a low stage. They become sorrowful. They become disturbed. If you tell any sage or anyone or any devotee, then they will say that this is also true.

Now the Father sits and tells you clearly. You have come to know that definitely we were masters of this India here only. At that time we were residents of heaven. Now we are slaves in this India. You think that Bapuji gave us liberation. But nobody is free. Nobody is a master. Being the masters of your mind and intellect like soul is a far off proposition; they are not even the masters of the body, not even the masters of the relatives of the body. Now you are complete slaves. Now you have become such residents of hell in the end of the Iron Age in this world. Residents of which place? Residents of hell. Not the residents of heaven because heaven is established by achieving swasthiti (soul conscious stage). And man (nar), who is called a human being, the world established by that nar is called narak (hell).

Now Baba has come. We have to become the residents of heaven because grandfather is called Baba. The one who gives the inheritance of happiness and peace to even the big founders of religions who have existed in this world, the Father of even those founders of religions is the grandfather. So, everyone gets inheritance from that grandfather. He comes and makes every human soul experience heaven, experience soul conscious stage in the first and foremost birth. There might be 500-700-750 crore human souls in this world in the end of the Iron Age. Yet, during the time of mega destruction (mahaavinaashkaal), after leaving their bodies, when all the souls go to the Soul World and come back to this world from there, then in the first and foremost birth, all the human souls will remain in soul conscious stage and experience happiness only. Sixth page of the Vani dated 6.4.1967. So, the souls which have newly arrived from the Supreme Abode, from the Brahmlok, from the Soul World to heaven, they experience themselves to be emperors here. What? Nobody can cause sorrows to them. For example, an emperor gives punishment to everyone, but nobody can punish him.

Now, among those emperors, we children also; the direct Suryavanshi children of the Father who is the Sun of Knowledge. What? Among other human souls some are the children of the Moon of knowledge Brahma; when Brahma is the Moon of knowledge, then the children belong to which dynasty? The Moon dynasty. Some belong to the Islam dynasty, some to the Buddhist dynasty, some to the Christian dynasty. And we have to then become Suryavanshis. We have neither come under the influence of those Chandravanshis, Islamic people, Buddhists, Christians birth by birth nor are we going to be influenced by them here during the shooting period. We do not get influenced by them internally. Outwardly, they may bind us for some time. So, this knowledge of the Suryavanshis, this knowledge itself is to become Narayan from nar (man). What? Nar, human being (manushya), which is made from Manu; the offspring of Manu is called man (mind). That Manu used to think and churn, used to create good and bad thoughts. His children are called manushya. So, the same Manua now becomes Aadi Narayan. Who is the maker? Who makes nar (man) like Narayan? Nar (men), who become devoid of celestial degrees, when they don’t have any light like the Moon, the Supreme Soul Father comes and just as the Moon becomes completely luminous with 16 celestial degrees, similarly He makes him a Narayan perfect in 16 celestial degrees. Who? Aadi Narayan. So, how will he himself be? Will he be perfect in 16 celestial degrees or higher than that? Hm? Kalaateet (beyond celestial degrees). He is the Sun. Can the Sun be bound in celestial degrees? He is beyond celestial degrees.

So, this is knowledge to become Narayan from nar. The meaning of Narayan itself is – Ayan means home, naar means water. The one whose house is in the water of knowledge only. What? He never comes out of the water of knowledge. This is why look carefully at the picture of Aadi Narayan, which was got prepared by Baba through visions – these Lakshmi and Narayan are standing above; their world is a world of carb of light. What? They are standing in the world of water of knowledge. Their thoughts are not the thoughts of the world, thoughts of the body, thoughts of the businesses of the body. This is why he was named Naar Ayan. Ayan. Naar Ayan, i.e. the one whose home is in the water of knowledge. He lives in the carb of light only. The story that He narrates is also a story of the Satya (true) Narayana which transforms nar (man) to Narayan. And that story is narrated in India only. Hm? It is not narrated in other countries. The story of Satya Narayana. Hm? That is a memorial. What must he have done? Hm? He definitely must have followed truth. Godly knowledge itself is called truth. Knowledge comes only from one God, who always remains in an incorporeal stage. This is why He does not enter the cycle of birth and death. Because of not entering the cycle, the knowledge of all the three aspects of time remains ingrained in Him.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2452, आडियो 2938, दिनांक 10.03.2018
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क्या बात चल रही थी? हँ? आखरी प्वाइंट क्या चल रहा था? जय सिया राम। आखरी प्वाइंट चल रहा था, प्वाइंट चल रहा था मुरली में कि हिन्दू क्यों कह देते हैं? हँ? हिन्दू का तो अर्थ है – हिं माने हिंसा, दू माना दुइते। जो हिंसा को दूर करते हैं उनको हिन्दू कहा जाता है। हँ? अब हम ब्राह्मण सो देवता बनते हैं, वो देवताएं जो सतयुग आदि से आते हैं, पहला-पहला देवता 16 कला संपूर्ण कृष्ण आया तो वो क्या हिंसा दूर करता है? हँ? दूर करता है? हँ? दूर तो नहीं करता। न वो दूर करता है, न उसके फालोअर्स दूर करते हैं। हँ? कृष्ण उर्फ ब्रह्मा, वो हिंसा को दूर करते हैं? नहीं करते। और हिंसा बढ़ाते। कैसे? हँ? आँख से तो सतयुग में बढ़ाते हैं, ब्रॉड ड्रामा जब शुरू होता है। लेकिन संगमयुग में क्या करते हैं? हँ? संगमयुग में ब्रह्मा गोद में लेके यूं-यूं हिलाते रहते बच्चों को। तो देहभान बढ़ेगा या घटेगा? बढ़ता है। देहभान बढ़ता है तो काम विकार भी जरूर पैदा हो जाता है इन्द्रियों में। तो घाटा हुआ, फायदा हुआ? तो हिंसा को दूर करने वाले हुए? हँ? वो कह देते हैं – हम हिंसा को दूर करने वाले हैं। ब्रह्मा भी समझते हैं, ब्रह्माकुमा-कुमारियां भी समझते हैं कि हम हिंसा को दूर करने वाले हैं।

वास्तव में हिंसा को दूर करने वाला कौन है? बताओ भई, मालूम है तो बताओ। हँ? कोई है कि नहीं? कौन है? शिवबाबा है? अच्छा! शिवबाबा – माना एक है या दो हैं? हँ? कौन है हिंसा को दूर करने वाला? शिव तो बिन्दी का नाम है। ये नाम कभी बदलता ही नहीं। उनकी आत्मा का नाम है। शिव बाप आकरके हिंसा को दूर करते हैं प्रवेश करके? उनके प्रवेश करने मात्र से हिंसा दूर हो जाती है? रुद्र ज्ञान यज्ञ के आदि में प्रवेश किया। हिंसा दूर हो गई? हो गई? हँ? अरे? सही बात नहीं बोलते। हँ? प्रवेश करने से हिंसा तो दूर नहीं हुई। प्रवेश किया। तो जिसमें प्रवेश किया उसको तो मालूम ही नहीं पड़ा। है ना? उसको मालूम नहीं पड़ा कि मेरा पार्ट क्या है? चलो उसने पार्ट बजाया। यज्ञ के आदि में? क्या पार्ट बजाया? जो भी ओम मंडली नाम का संगठन बना, नई दुनिया बनी, जो कुछ भी, तो उसने विनाश का काम किया या नई दुनिया बनाई? क्या काम किया? हँ? बनाई? हँ? बनाई? माना रुद्र वत्सों की दुनिया बनाई। हँ? प्रजापिता पुरुष में प्रवेश किया, तो प्रजापिता हुआ पिता, फिर उस शरीरधारी को शरीर ले लिया। है ना? लिया कि नहीं? तो देह को लिया।

वो देह उसको बड़ी सुन्दर लगी होगी। दुनिया, दुनिया में जो फिदा होते हैं वो काय के ऊपर फिदा होते हैं? आशिक बनते हैं तो काय के ऊपर आशिक बनते हैं? माशूक के ऊपर। माशूक में क्या देखते हैं? आत्मा को देख लेते हैं क्या? हँ? आत्मा तो नहीं देखने में आती। तो क्या देखते हैं? अरे बताओ, बताओ भई। रूप को देखते हैं। किसका? नाक का रूप कि कान का रूप? देह का रूप देखते हैं। देह में भी सबसे ऊँचा स्टेज है मुख की। तो मुख की सुन्दरता देख लेते हैं। है तो ठीक बात।
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। हाँ। विशेषता क्या देख लेते हैं? क्या विशेषता देखी? और किसमें विशेषता देखी? सत्य की विशेषता देखी? सत्य की विशेषता देखी। क्या सच्चाई? क्या सच्चाई देखी? और किसमें सच्चाई देखी? तीनों कालों को क्रॉस करता है। वो आत्मा करती है। हाँ, वो शरीर भी करता है। और कोई आत्मा, और कोई शरीरधारी तो क्रॉस करता नहीं। तो अविनाशी है तो क्रॉस करता है ना। जिसका विनाश नहीं होता वो ही सत्य है। जिसका विनाश हो जाता वो तो असत्य है।

तो ये बात देखा। क्या देखा? सत्य को देखा। इस दुनिया में जो भी पार्ट बजाने वाली आत्माएं हैं, प्राणीमात्र हैं या उनमें श्रेष्ठ मनुष्य मात्र हैं, उनमें श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ पार्टधारी कौन है? ये देखा। तो पता चला कि ये शरीरधारी जो है, जिसको ये अंतिम जनम में शरीर मिला है; पूर्वजन्मों के हिसाब से शरीर मिलता है ना। तो इसने पूर्व जन्म में इतने श्रेष्ठ कर्म किये हैं, जिसके आधार पर इसको ऐसा शरीर मिला है कि काल बाधित, काल बाधित नहीं होता। क्या? काल भी उसको बाधा नहीं पहुंचा सकता। भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल उसको बाधा खड़ी करके रोक नहीं सकते। और सारी दुनिया की जितनी मनुष्यात्माएं हैं, प्राणीमात्र हैं, सब काल कलवित हो जाते हैं। किसी का शरीर रहता नहीं महाविनाश में। लेकिन ये आत्मा है। वो शरीर को देख के पहचान लेता है। शरीर को देखकर? आत्मा को नहीं देखता? हँ? ऊपरवाला आत्मा को भी तो देखता है। हँ? कि ये पार्टधारी सबसे श्रेष्ठ पार्टधारी है, इस सृष्टि रूपी रंगमंच का हीरो पार्टधारी है। और इस हीरो पार्टधारी का प्रूफ ये है कि इसका शरीर विनाश काल में भी नष्ट होने वाला नहीं है। आत्मा भी अविनाशी है और उसका रथ भी अविनाशी है। इसलिए गीता में कहा है – इदम् शरीरम् कौन्तेय क्षेत्रम् इति अभिधीयते। (गीता 13/3) क्षेत्र माने? हवन करने का कुंड जो होता है उसको क्षेत्र कहते हैं। रुद्र ज्ञान यज्ञ कुण्ड। कैसा है रुद्र ज्ञान यज्ञ? अविनाशी। इसका विनाश कभी होने वाला नहीं है। अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ कुण्ड है।

जो अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ कुण्ड है, माने ऐसा शरीर है जिसमें सारी दुनिया स्वाहा हो जाएगी। क्या? लेकिन ये यज्ञ कुण्ड स्वाहा नहीं होगा। ये अपनी स्थिति में बना रहेगा। शरीर भी रहेगा, काल वाला शरीर; विनाश हो गया? शंकर का शरीर? शंकर का शरीर विनाश हो गया? वो संपन्न था? उसने अपने स्वरूप को पहचान लिया था? तो उसकी तो बात ही नहीं। वो शरीर है, जिसका नाम पड़ता है संसार में ऐसा पुरुषार्थी जो अपने पुरुषार्थ को संपन्न स्टेज में 100 परसेन्ट बाप समान की स्टेज में ले जाएगा। जैसा बाप ऐसी पार्टधारी हीरो आत्मा कि वो बाप समान बन जाए। बाप कैसा है? निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी। वो आत्मा भी भल शरीर धारण करने वाली है लेकिन शरीर से ही कैसी बन जाए? शरीर भी निराकारी। निराकारी का मतलब? ज्ञान के प्रकाश से भरपूर, रोम-रोम में ज्ञान का प्रकाश निकालेगा। देहभान का? नामोनिशान नहीं।

तो, उसको लिंग रूप में दिखाते हैं संसार में। खास भारत में। उसका जो सात्विक स्वरूप वो सोमनाथ मन्दिर में बनाया गया था, जब भक्तिमार्ग सात्विक स्टेज में था, तो लाल पत्थर का लिंग था ना। लाल पत्थर क्यों दिखाया गया? कि जैसे सूर्य होता है ना, वो पहले-पहले कैसा रंग का दिखाई देता है? लाल रंग का। तो ऐसे ही लाल रवि हुआ। क्या? वो संपन्न स्टेज में वो शरीर भी कैसा हो जाता है? लाल रूप है। लेकिन वो शरीर भी ज्ञान प्रकाश से भरा-पूरा। रोम-रोम में ज्ञान भरा हुआ है। इसलिए सृष्टि के उस आदिनारायण का नाम रखा जाता है आदि नारायण। क्या? कैसा नारायण? ज्ञान जल में तो रहने वाला है, लेकिन आदि वाला ज्ञान जल में रहने वाला। उसके मुकाबले सतयुग में जो कृष्ण वाली आत्मा हे कृष्ण नारायण जन्म लेता है, वो आदि तो नहीं है, वो तो उसका बच्चा बनके पैदा हुआ ना। दूसरी पीढ़ी हुई ना। तो उसको आदि नारायण नहीं कहेंगे। नारायण तो है। क्या? ज्ञान जल में रहता है कि नहीं? सतयुग का पहला नारायण कृष्ण? नहीं रहता? रहता। कैसे? शिव प्रवेश कर जाता है? कौन प्रवेश कर जाता? अरे, आत्मिक स्टेज में रहता है ना। तो ज्ञान का सार आ गया। क्या? आत्मिक स्टेज में रहता है, जब आत्मा रूपी राजा ही शरीर का आत्मिक स्टेज में है, तो यथा राजा तथा प्रजा सारा शरीर आत्मिक स्टेज में रहता। देहभान का नाम-निशान नहीं। लेकिन है दूसरी पीढ़ी। फिर उसके बाद तीसरी पीढ़ी आएगी। चौथी पीढ़ी आएगी। सतयुग में आठ नारायण होंगे। तो आठों ही नारायण जो हैं उत्तरोत्तर उतरती कला वाले हैं। वो आत्मिक स्टेज नहीं रहेगी 16 कला संपूर्ण। घटती जाएगी।

तो बताया कि वो सब जितने भी हैं वो सब उतरती कला के हो गए। हँ? सभी आत्माएं और उनकी प्रजा। फिर जब उतरती कला के हो गए, विघटन होने वाली कला के हो गए तो विघटन होते-होते-2 एक टाइम ऐसा आएगा आखरी जनम में’; कैसा? कि आत्मा की सारी कला काया चट्ट हो जाती है। जब आत्मा की कला काया ही सारी चट्ट हो जाएगी तो फिर रिजल्ट क्या आएगा? देह कैसी मिलेगी? तामसी मिलेगी? सौ परसेन्ट तामसी देह मिलेगी, दुखदायी मिलेगी या सात्विक मिलेगी? कैसी मिलेगी? हँ? अरे, इसे पहले दे देना। हाँ, एकदम सौ परसेन्ट तामसी शरीर मिलता है। लेकिन जो आत्मिक स्थिति में स्थित रहती है, जो आत्मा सृष्टि के आदि में भी विष्णु स्वरूप थी, आत्मिक स्टेज में और अंत में भी विष्णु रूप रहती है। नो विष एट आल। क्या? एक नारी सदा ब्रह्मचारी की स्टेज में है। तो आत्मिक स्टेज होने के कारण उसका शरीर भी कैसा होगा? शरीर रूपी जो राज्य है, वो भी आत्मा के आत्मभाव से भरा हुआ होगा। देहभान से भरा हुआ नहीं। जो देह की भान वाले होते हैं दैत्य, वो तो दुःखदायी होते हैं या सुखदायी? हँ? दुःखदायी होते हैं। तो वो एक आत्मा है जो हिं माने हिंसा, दू माने दूर करने वाला। उसकी औलाद को कहा जाता है हिन्दू।

What was the topic being discussed? Hm? What was the last point being discussed? Jai Siya Ram. The last point being discussed was, the point being discussed in the Murli was – Why do they say Hindu? Hm? The meaning of Hindu is – Hin, i.e. hinsaa (violence), doo means duite (to do away). Those who do away with violence are called Hindus. Hm? Now we become deities from Brahmins; such deities who come from the beginning of the Golden Age; when the first and foremost deity Krishna, who is perfect in 16 celestial degrees came, does he do away with violence? Hm? Does he do away? Hm? He does not do away. Neither does he do way, nor do his followers do away. Hm? Does Krishna alias Brahma does away with violence? He doesn’t. They increase violence further. How? Hm? They increase it through eyes in the Golden Age, when the broad drama begins. But what do they do in the Confluence Age? Hm? In the Confluence Age Brahma used to take the children in his lap and used to dangle them like this. So, will the body consciousness increase or decrease? It increases. When the body consciousness increases, then definitely the vice of lust also increases in the organs. So, did he suffer loss or got benefit? So, did he happen to be the one who removes violence? Hm? They say – We do away with violence. Brahma also thinks, Brahmakumar-kumaris also think that we do away with violence.

Actually, who does away with violence? Tell brother; tell, if you know. Hm? Is there anyone or not? Who is it? Is it ShivBaba? Achcha? Does ShivBaba mean one or two? Hm? Who does away with violence? Shiv is the name of a point. This name never changes at all. It is the name of His soul. Does Father Shiv come and do away with violence by entering? Is violence done away with just by His entry? He entered in the beginning of the Rudra Gyan Yagya. Was violence done away with? Was it? Hm? Arey? You do not speak the correct thing. Hm? Violence was not done away with just by entering. He entered. So, the one in whom He entered did not get to know at all. Isn’t it? He did not get to know as to what his part was. Okay, he played the part. In the beginning of the Yagya? Which part did he play? The gathering named Om Mandali that was formed, the new world that was formed, whatever it was, did he perform the task of destruction or did he create a new world? Which task did he perform? Hm? Did he create? Hm? Did he create? It means that a world of Rudra children was created. Hm? He entered in Prajapita Purush; so, Prajapita is the Father, then the body of that bodily being was taken. Isn’t it? Did he take or not? So, he took the body.

He must have found that body very beautiful. In the world, when people lose their heart to someone, then they lose their heart for what? When they become lovers, then what do they love? The beloved. What do they see in the beloved? Do they see the soul? Hm? The soul is not visible. So, what do they see? Arey, tell; brother, tell. They see the form. Whose? Form of the nose or the form of ear? They see the form of the body. Even in the body the highest stage is of the face. So, they see the beauty of the face. It is correct thing.
(Someone said something.) Yes, yes. What is the specialty they see? Which specialty do they see? And in whom did they see the specialty? Did He see the specialty of truth? He saw the specialty of truth. Which truth? Which truth did He see? And in whom did He see the truth? He crosses all the three aspects of time. That soul crosses. Yes, that body also crosses. No other soul, no other bodily being crosses. So, when he is imperishable, he crosses, doesn’t he? The one who is not destroyed is truth. The one who is destroyed is untruth.

So, He saw this. What did He see? He saw the truth. Among all the souls or living beings who play their parts in this world, or among the righteous human beings, who is the most righteous actor among them? He saw this. So, He came to know that this bodily being, who has received this body in the last birth; body is received as per the karmic accounts of the past births, isn’t it? So, this one has performed such righteous actions in the past birth that on the basis of which he has got such body that it is not bound by time. What? Time (kaal) cannot create an obstruction for him. Past, future, present, all the three aspects of time cannot create an obstacle for him and stop him. All other human souls, living beings of the entire world are gobbled by death (kaal). Nobody’s body survives in the period of mega-destruction. But this is the soul. He sees the body and recognizes. By seeing the body? Doesn’t He see the soul? Hm? The above one observes the soul as well. Hm? That this actor is the most righteous soul, a hero actor of this world stage. And the proof of this hero actor is that his body is never going to be destroyed even in the period of destruction. The soul is also imperishable and his Chariot is also imperishable. This is why it has been said Gita – Idam shareeram kaunteya kshetram iti abhidheeyate. (Gita 13/3) What is meant by kshetra? The place where the sacrificial fire is lit is called kshetra. Rudra Gyan Yagya Kund. How is the Rudra Gyan Yagya? Imperishable. It is never going to be destroyed. It is an imperishable Rudra Gyan Yagya Kund.

The imperishable Rudra Gyan Yagya Kund is such a body, in which the entire world will be sacrificed. What? But this Yagya Kund will not be sacrificed. This one will remain constant in his stage. The body will also remain; the body with kaal; was it destroyed? Shankar’s body? Was Shankar’s body destroyed? Was it perfect? Had he realized his form? So, it is not about him at all. It is a body, who is named as such a purusharthi who will take his purusharth to a perfect stage, to a stage 100 percent equal to the Father. As is the Father, so should the hero actor soul should become equal to the Father. How is the Father? Incorporeal, viceless, egoless. Although that soul assumes a body, yet how should it become through the body? The body should also be incorporeal. What is meant by incorporeal? Full with the light of knowledge; light of knowledge would emerge from every hair follicle. There will be no name or trace of body consciousness.

So, he is shown in ling form in the world, especially in India. His pure form that was made in the temple of Somnath, when the path of Bhakti was in a pure stage, then it was a ling of red stone, wasn’t it? Why was a red stone depicted? There is Sun, isn’t it? In which colour does it appears first of all? In red colour. So, similar is the red Sun. What? In that perfect stage, how does that body also become? It is in a red form. But that body is also full of the light of knowledge. There is light filled in every hair follicle. This is why that first Narayan of the world is named as Aadi Narayan. What? What kind of Narayan? He does live in the water of knowledge, but the one who lives in the water of knowledge of the beginning. When compared to him, the soul of Krishna, ‘Hey Krishna Narayan’ who gets birth in the Golden Age is not the first one; he was born as his child, wasn’t he? He belongs to the second generation, doesn’t he? So, he will not be called Aadi Narayan. He is indeed Narayan. What? Does he live in the water of knowledge or not? The first Narayan, Krishna of the Golden Age? Doesn’t he live? He lives. How? Does Shiv enter in him? Who enters? Arey, he remains in a soul conscious stage, doesn’t he? So, he assimilated the essence of knowledge. What? He lives in a soul conscious stage; when the soul-like king of the body himself is in soul conscious stage, then as is the king, so are the subjects, the entire body remains in a soul conscious form. There is no name or trace of body consciousness. But it is a second generation. Then after that the third generation will come. The fourth generation will come. There will be eight Narayans in the Golden Age. So, all the eight Narayans have successively descending celestial degrees. There will not be that soul conscious stage, which is perfect in 16 celestial degrees. It will go on decreasing.

So, it was told that all of them are the ones who possess descending celestial degrees. Hm? All the souls and their subjects. Then, when they belong to the descending celestial degrees, when they are the ones with disintegrating celestial degrees, then while disintegrating continuously, one such time will come in the last birth; how? The entire celestial degrees of the soul vanish. When all the celestial degrees of the soul vanish, then what will be the result? What kind of a body will you receive? Will you get a degraded body? Will you get hundred percent degraded body, will you get a pain-giving body or will you get a pure body? What kind of a body will you get? Hm? Arey, give it to him first. Yes, you get completely 100 percent degraded body. But the one who remains in soul conscious stage, the soul which was in the form of Vishnu in the beginning as well, in a soul conscious stage and remains in the form of Vishnu in the end as well. No vish (poison) at all. What? He is in the stage of ‘ek naari sadaa brahmachaari’ (the one who is loyal to his wife is like a celibate person forever). So, because of being in a soul conscious stage, how will his body also be? The body like kingdom will also be full of soul consciousness. It will not be full of body consciousness. Those who are body conscious are daityas (demons); do they cause sorrows or happiness? Hm? They cause sorrows. So, he is the one soul who ‘hin’, i.e. hinsa (violence), ‘doo’ means ‘the one who removes’. His children are called Hindus.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2453, आडियो 2939, दिनांक 11.03.2018
VCD 2453, Audio 2939, Date 11.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning Class dated 6.4.1967
VCD-2453-Bilingual

समय- 00.01-20.20
Time- 00.01-20.20


प्रातः क्लास चल रहा था – 6.4.1967. गुरुवार को छठे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी –देवी-देवता सनातन धर्म का क्यों नहीं कहते हैं? जबकि देवी-देवताओं के चित्र भी मिलते हैं। चित्र हैं चरित्र की यादगार। तो जरूर कभी चरित्र किया होगा ना। दिव्य चरित्र किये होंगे। तो नाम पड़ता है देवी-देवता। हाँ, फिर क्यों अपन को आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाला नहीं कहते हैं? वो हिन्दू धरमवाले क्यों कहते हैं? हँ? क्योंकि अपन को कहना चाहिए आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाला, परन्तु हिन्दू बताय देते कि हम हिंसा को दूर करने वाले हैं। देखो – वंडर कितना है? तुम कोई से भी पूछो – ये हिन्दू धरम किसने स्थापन किया? क्योंकि और-और धरमपिताओं ने जो धरम की स्थापना की तो जिन्होंने काम किया उनके नाम पर उस धरम का नाम पड़ा। क्राइस्ट ने क्रिश्चियन धरम की स्थापना की। बौद्ध धर्म की स्थापना बुद्ध द्वारा हुई। मुस्लिम धर्म की स्थापना मुहम्मद के द्वारा हुई। तो हिन्दू नाम क्यों रख दिया? देश के नाम पर कोई धरम का नाम थोड़ेही होता है कि हिन्दुस्तान के नाम पर हिन्दुओं का नाम हो गया। तो ये पूछते हैं कोई से तो बिचारे मुँझ जाते हैं। बिल्कुल ही मुँझ जाते।

अरे! हिन्दू तो कोई धरम ही नहीं है। ये है आदि सनातन देवी-देवता धर्म क्योंकि सृष्टि के आदि में अव्वल नंबर में सबसे पुराना धर्म है जो स्थापन किया गया। हँ? किसने स्थापन किया? सनातन नाम है तो जरूर इससे मिलता-जुलता धरमपिता का नाम होना चाहिए। जो सबसे पुराने ते पुराना है ब्रह्मा की सृष्टि में वो है उनका बड़ा पुत्र जिसको कहा जाता है योगीश्वर सनत कुमार। योगियों को शासन करने वाला। योगीश्वर कैसे बनता है? पहले ज्ञान आता है फिर प्रैक्टिकल होता है। ज्ञान है थ्योरी। तो पहले वो ज्ञानेश्वर है। ज्ञान धारण करता है। फिर योगीश्वर बनकरके अव्वल नंबर धर्म की स्थापना करता है। पुराने ते पुराना धर्म हो गया। इसलिए मुसलमान भी कहते हैं अल्लाह अव्वलदीन। अल्लाह ने अव्वल नंबर दीन अर्थात् धर्म की स्थापना की क्योंकि अल्लाह है ही जन्नत में देवी-देवताओं को बनाने वाला। तो कोई को मालूम है। हँ? कोई को ये मालूम है। मालूम है तभी तो कहते हैं – अल्लाह अव्वलदीन। अल्लाह ने आकर अव्वल दीन अर्थात् अव्वल धर्म की स्थापना की। तो, योगियों का ईश्वर ही हुआ ना।

आगे मालूम था तुम बच्चों को। क्या? आगे तुम बच्चों को ये मालूम था क्या कि हम अपन को हिन्दू क्यों कहलाते हैं? हँ? नहीं मालूम था। हम पूजा करते हैं देवताओं की। तो जो देवताओं की पूजा करते हैं वो अपन को देवी-देवता धर्म का कहते हैं। क्राइस्ट को अपने धरम में बड़े ते बड़ा मानते हैं। क्राइस्ट के चित्र गिरिजाघरों में टांगते हैं, पूजा करते हैं, तो क्राइस्ट के बच्चे क्रिश्चियन्स हुए। बुद्ध की पूजा करते हैं तो बौद्धी हुए ना। इब्राहिम की पूजा करते, मालूम है कि हमारा ये धर्मस्थापक है, धर्म का नाम रखाय देते हैं। जो-जो भी आर्य समाजी या ये फलाना-फलाना टीरा। ये जो भी हैं ये क्या हुआ है? ये जड़ों को क्या हो गया जो अपने धरमपिता का नाम भूल गए, धर्म का नाम भूल गए? अपनी धरमपुस्तक को भी भूल गए। क्या हुआ? अरे, ये इतना पुराना धर्म है, इसकी हिस्ट्री कोई को पता ही नहीं रहती।

तो देखो, ये ड्रामा बना हुआ है। ये बात भी तुम बच्चों को अच्छी तरह से मालूम हो गई। ये दुनिया का एक ड्रामा बना हुआ है। और दुनिया वालों की तो कोई की बुद्धि में है ही नहीं। कोई धरमवालों की बुद्धि में नहीं है। क्या? ये दुनिया एक ड्रामाबाज़ी है। ब्रॉड ड्रामा है। जरा भी बुद्धि में नहीं है बच्चे। बिल्कुल एकदम तुच्छ बुद्धि बन गए। तुम बच्चों में ड्रामा तो आते हैं ना। राज़ तो सारा बुद्धि में आ गया ना कि ये हमारा पहला धरम है। दूसरे फिर सूर्यवंशी हों क्योंकि जैसे सूर्य है, सबसे डिटैच होकर रहता है। उसका किसी में अटैचमेन्ट नहीं। ऐसे ही हम सूर्यवंशियों का जो मुखिया है, वो आत्मा भी कभी किसी के अटैचमेन्ट में नहीं आती। हँ? किसके अटैचमेन्ट में आती है? वो ऊपरवाला ऊपरवाले के अटैचमेन्ट में आता है? हँ? इस सृष्टि पर भी आती है, इस सृष्टि के मुकर्रर हीरो पार्टधारी में प्रवेश करती है, तो भी उसके अटैचमेन्ट में नहीं आती है। तो फिर हम सूर्यवंशी हैं, पीछे ये-ये धर्म आते हैं। सूर्य तो सबसे पहला है ना। हँ?

कहते हैं शास्त्रों में कि दो रानियां थीं परमपुरुष की। एक दिति, एक अदिति। तो दिति माने थोड़ा नीचा कर्म करने वाली। उससे दैत्य पैदा हुए। और ऊँचा कर्म करने वाली अदिति। तो ये परमपुरुष के दो प्रकार के बच्चे हैं। अदिति से जो बड़े ते बड़ा बच्चा पैदा हुआ उसका नाम पड़ा आदित्य। क्या? जैसे ब्रह्मा के बच्चे ब्राह्मण। ऐसे अदिति का बड़ा बच्चा आदित्य। देवताओं में बड़ा। तो देखो, पहले-पहले हैं सूर्यवंशी। फिर बाद में ये चन्द्रवंशी, इस्लामवंशी, बौद्धीवंशी, क्रिश्चियनवंशी, आदि, आदि। हम भी फिर इनके साथ पुनर्जन्म लेते जाते हैं। जो भी आते हैं, कोई भी धरम वाले आते हैं आत्मलोक से, सो पुनर्जन्म लेते जाते हैं। ड्रामा है ना। ड्रामाबाज़ी करने के लिए रंगमंच पर सब अपने-अपने घर से आते हैं ना। तो ये बाप का घर सो हम बच्चों का घर। आत्मलोक। अंग्रेज लोग इसे कहते हैं सुप्रीम एबोड। मुसलमान कहते हैं अल्लाह अर्श में रहता है। फर्श में नहीं रहता। पहले कहते थे। अभी वो सर्वव्यापी कहने लगे। तामसी हो गए ना।

तो कोई भी धरम वाली आत्माएं हों, आत्मलोक से नीचे उतरती हैं, तो फिर जन्म लेते-लेते, इन्द्रियों के सुख भोगते-भोगते, देह के सुख भोगते-भोगते नीचे गिरते जाते हैं। सब नीचे गिरते हैं। सूर्यवंशी भी? नीचे गिरते हैं। तो यथार्थ रीति से अभी ये बात हुई। क्या? यथार्थ बात क्या हुई? हँ? कि आत्मिक स्थिति से जो भी नीचे उतरते हैं इस सृष्टि में, देह की दुनिया में, पाँच तत्वों से बनी देह की दुनिया में, भौतिकवादी दुनिया में उतरते हैं, तो पहले-पहले आत्मिक स्थिति में रहते हैं देवात्माएं, तो पंचभूतों का उतना असर होता ही नहीं। सुख में ही रहते हैं। फिर जब दूसरे-दूसरे धरम के धरमपिताएं आते हैं तो, तो देहभान होता है। तो देहभान के कारण तेज़ी से आत्माएं नीचे उतरती हैं। रजोप्रधान, फिर तमोप्रधान बनती जाती हैं। तो ये जो पीछे-पीछे धर्म आते हैं उनके साथ हम भी पुनर्जन्म लेते जाते हैं। तो यथार्थ बात ये हुई। क्या? कि; क्या यथार्थ बात हुई? हँ? कि आत्मलोक में नीचे गिरना नहीं होता है बाप के घर में। और जब इस देह की दुनिया में आते हैं तो नीचे गिरना होता है।

अभी तुम बच्चे पढ़ते भी हो उनके स्कूल में। जैसे दुनिया में पढ़ते हैं, कोई की बुद्धि में अच्छा बैठता है, कोई की बुद्धि में कम बैठता है। स्कूल में बच्चे तो होते हैं ना पढ़ाई पढ़ने वाले। कोई फर्स्ट क्लास, सेकण्ड क्लास, थर्ड क्लास, फोर्थ क्लास भी होते हैं। कोई की बुद्धि में तो कुछ भी नहीं बैठता है। ऐसे होता है ना। नहीं बुद्धि में बैठता है। फिर भी तो पढ़ते हैं ना। तो पढ़ते हैं; पढ़ते रहेंगे तो जरूर पास हो ही जाएंगे। तो देखो, इसमें अगर पार नापास होते हैं, इस अलौकिक पढ़ाई में, ईश्वरीय पढ़ाई में अगर नापास होते हैं, तो, तो इस दुनिया में सूर्य के बाद दूसरा नाम किसका आता है जो रोशनी देता है सबसे जास्ती? हँ? सबसे जास्ती सूर्य के बाद रोशनी देता है चन्द्रमा। तो चन्द्रवंशियों के प्रभाव, चन्द्रमा के प्रभाव में आने वाले चन्द्रवंशी कहे जाते हैं। क्या? नापास हुए तो? चन्द्रवंशियों की पीढ़ी में चले जावेंगे।

6.4.1967 की वाणी का सातवां पेज। तो जो चन्द्रवंशियों की रहबरी में चले जाते हैं, चन्द्रमा की रहबरी में चले जाते हैं, इसलिए उनको क्षत्रीय कह देते हैं 14 कला संपूर्ण। पढ़ते-पढ़ते अभी लड़ाई की तो बात नहीं ना। पढ़ाई में लड़ाई की बात होती है क्या? पढ़ाई है ना। पढ़ाई में नापास होने के कारण उनको क्षत्रीय कह देते हैं। चन्द्रवंशी कह देते हैं। सूर्यवंशी नहीं कहते। क्या? हँ? ये फेल होना कहाँ से शुरू हुआ? इसकी शुरुआत करने वाला कौन? सूर्य, सूर्यवंशी या चन्द्रमा और चन्द्रवंशी? हँ? चन्द्रमा। इसीलिए ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग पीरियड में देखें जो ज्ञान चन्द्रमा है वो यज्ञ के आदि में पढ़ाई पढ़ते-पढ़ते भाग गया। तो पहला-पहला नापास होने वाला कौन हुआ? हँ? चन्द्रमा हुआ। उन्हें फिर सूर्यवंशी नहीं कहते हैं। क्या? तो ये तो मनुष्य नहीं जानते। क्या बात? कि सूर्य की औलाद सूर्यवंशी। जैसे सूर्य सारी दुनिया को रोशनी देता है, ऐसे ही जो सूर्य, ज्ञान सूर्य के बच्चे हैं वो विश्व कल्याणकारी होंगे या सिर्फ एक देश के कल्याणकारी होंगे? विश्व कल्याणकारी। ये बात दुनिया के दूसरे धर्म के मनुष्य नहीं जानते।

A morning class dated 6.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the sixth page on Thursday was – Why don’t people say that they belong to the Devi-Devata Sanatan Dharma? Pictures of the deities are also found. Pictures (chitra) are the memorials of the acts (charitra). So, definitely, they must have displayed their acts at some point in time, hadn’t they? They must have performed divine acts. So, the name is coined as devi-devata (deities). Yes, then why don’t you call yourself as a person belonging to the Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma? Why do they call themselves as belonging to the Hindu religion? Hm? It is because they should call themselves as a person belonging to the Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma, but they call themselves Hindus that we are the ones who do away with violence (hinsa door karney vaaley). Look – It is such a wonder! Ask anyone – Who established this Hindu religion? Because the religions that founders of other religions established; so, the ones who performed the acts, the religion was named on the basis of their name. Christ established Christianity. Buddhism was established by Buddha. Muslim religion was established by Mohammad. So, why was the name Hindu coined? Name of the religion is not based on the name of the country that Hindus were named on the basis of Hindustan. So, when you ask this to someone, then they get confused. They get completely confused.

Arey! Hindu is not a religion at all. This is Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma because it is the oldest number one religion established in the beginning of the world. Hm? Who established? When the name is Sanatan, then definitely the name of the founder of the religion should match with its name. The oldest one in the world of Brahma is his eldest son, who is called Yogiishwar Sanat Kumar. The one who governs the yogis. How does he become Yogiishwar? First the knowledge comes, and then it happens in practical. Knowledge is theory. So, first is that Gyaaneshwar. He inculcates knowledge. Then he becomes Yogiishwar and establishes the number one religion. It is the oldest religion. This is why the Muslims also say – Allah Avvaldeen. Allah established the number one Deen, i.e. religion because Allah is the one who makes deities in heaven. So, some know. Hm? Some know this. They do know; only then do they say – Allah Avvaldeen. Allah came and established the number one Deen, i.e. number one religion. So, he is the Eeshwar (Lord) of the yogis, isn’t he?

Did you children know earlier? What? Did you children know earlier that why we call ourselves Hindus? Hm? We did not know. We worship deities. So, those who worship the deities call themselves as belonging to the deity religion. Christ is considered to be the highest one in his religion. Pictures of Christ are hung in the Churches and worshipped, so, the children of Christ are Christians. When someone worships Buddha, they are Buddhists, aren’t they? Ibrahim is worshipped; they know that this is our founder of religion; they name the religion. All these Arya Samajis or these such and such persons. What are all these? What has happened to these roots that they have forgotten the name of the founder of religion, the name of the religion as well? They forgot their religion’s book as well. What happened? Arey, this is such ancient religion; nobody knows its history at all.

So, look, this drama has been made. You children have come to know this topic also nicely. This is a drama of this world. And it is not in the intellect of the people of the world at all. It is not in the intellect of people of any religion. What? This world is a big dramatics. It is a broad drama. Children, it is not there in the intellect even slightly. Their intellects have become completely degraded. You children think of the drama, don’t you? The entire secret has come to your intellect that this is our first religion. Then there are the Suryavanshis because for example, the Sun remains detached from everyone. It does not have attachment in anyone. Similarly, the head of us Suryavanshis, that soul also never develops attachment for anyone. Hm? For whom does it develop attachment? Does that above one develop attachment for the above one? Hm? Even when He comes to this world and enters in the permanent hero actor of this world, it does not develop attachment for him. So, then we are Suryavanshis; later on these religions emerge. The Sun is first of all, isn’t he? Hm?

It is said in the scriptures that there were two queens of the Parampurush (Supreme Being). One Diti and one Aditi. So, Diti means the one who used to perform slightly lower actions. Daityas (demons) were born from her. And the one who used to perform higher actions was Aditi. So, these are two kinds of children of the Parampurush. The eldest son born to Aditi was named Aditya. What? For example, Brahma’s children are Brahmins. Similarly, the eldest son of Aditi is Aditya. The seniormost among the deities. So, look, first of all are the Suryavanshis. Then later on these Chandravanshis, Islamvanshis, Bauddhivanshis, Christianvanshis, etc., etc. We too go on getting rebirth along with them. Whoever comes, souls of whichever religion come from the Soul World go on getting rebirth. It is a drama, isn’t it? In order to enact the drama everyone comes to the stage from their homes, don’t they? So, this Father’s home is the home of us children. The Soul World. Englishmen call it the Supreme Abode. Muslims say that Allah lives in Arsh (supreme abode). He does not live on farsh (land). They used to say earlier. Now they have started calling Him omnipresent. They have become degraded, haven’t they?

So, be it souls of any religion, when they descend from the Soul World, then while getting rebirth, while experiencing the pleasures of the organs, while experiencing the pleasures of the body, they keep on falling. Everyone falls. The Suryavanshis also? Fall. So, this is now in a correct manner. What? What is in correct manner? Hm? All those who descend from the soul conscious stage to this world, to the world of body, to the world of body made up of the five elements, to the materialistic world, then the deity souls remain in soul conscious stage first of all, then the five elements do not cast that much influence. They live in happiness only. Then, when founders of other religions come, then there is body consciousness. So, souls fall quickly due to body consciousness. They go on becoming rajopradhan and then tamopradhan. So, these religions which come later on, we too keep on getting rebirth along with them. So, it is a correct topic. What? That; what is the correct topic? Hm? That we do not fall in the Soul World, in the Father’s home. And when we come to the world of this body, then we suffer downfall.

Now you children also study in their school. For example, people study in the world; it sits nicely in the intellect of some; it sits less in the intellect of some. There are children who study in the schools, don’t they? Some first class, second class, third class, fourth class as well. In case of some, nothing sits in their intellect. It happens like this, doesn’t it? It does not sit in the intellect. Yet, they study, don’t they? So, they study; when they keep on studying, they will definitely pass. So, look, if you fail in this, in this alokik study, in the Godly study, then whose name is uttered in this world after the Sun, who gives the most light? Hm? The one who gives most light after the Sun is the Moon. So, those who come under the influence of the Chandravanshis, the Moon are called the Chandravanshis. What? If you fail? You will go in the generation of the Chandravanshis.

Seventh page of the Vani dated 6.4.1967. So, those who go into the company of the Chandravanshis, company of the Moon (Chandrama) are called Kshatriya, who are perfect in 14 celestial degrees. While you are studying, there is no question of fight, isn’t it? Is there any topic of fighting in studies? It is a study, isn’t it? Because of failing in studies they are called Kshatriyas. They are called Chandravanshis. They are not called Suryavanshis. What? Hm? Where did this failing start? Who started it? The Sun, the Suryavanshis or the Moon, the Chandravanshis? Hm? The Moon. This is why if you observe in the shooting period of the broad drama, the Moon of knowledge ran away while studying knowledge in the beginning of the Yagya. So, who was the one who failed first of all? Hm? It was the Moon. They are then not called Suryavanshis. What? So, the human beings don’t know this. Which topic? That the children of the Sun are Suryavanshis. For example, the Sun gives light to the entire world; similarly, the children of the Sun, the Sun of Knowledge, will they be world benevolent or will they be benevolent for just one country? They will be benevolent for the entire world. The people of the other religions of the world do not know this topic.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 21 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2454, आडियो 2940, दिनांक 12.03.2018
VCD 2454, Audio 2940, Date 12.03.2018
प्रातः क्लास 6.4.1967
Morning Class dated 6.4.1967
VCD-2454-Bilingual

समय- 00.01-17.27
Time- 00.01-17.27


प्रातः क्लास चल रहा था – 6.4.1967. गुरुवार को सातवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी –मनुष्यों को पहले-पहले ये बात बतानी होती है कि बाप को भूल क्यों गए? किससे भूला? और क्यों भूला? हँ? किससे भूला? हँ? किससे माना कोई कारण हुआ ना। हँ? भूल हुई तो गीता। कौनसी गीता से? हँ? झूठी गीता से भूल हुई। झूठी गीता में किसकी छाप है? जो भूल हो गई? और सच्ची गीता में किसकी छाप है? हँ? ठप्पा लगता है ना। हँ? जैसे कन्या है; जीवन में ठप्पा लगता है जिसका पहले तो वो जिंदगी भर नहीं भूलता। और वो सच्ची गीता कौन जो बाप को प्रत्यक्ष कर देती है? और झूठी गीता कौन? हँ? ब्रह्मा का ठप्पा लगता है। किसको? ब्रह्मा का ठप्पा किसको लगता है? हँ? झूठी गीता को। हँ? कब लगता है? कब लगता है? हँ? आदि में यज्ञ के। हँ? दोनों लोग सही बताया। यज्ञ के आदि में बाप का ठप्पा नहीं लगा तो किसी और का ठप्पा लग गया। बाप के बच्चे का ठप्पा लग गया। बाबा पूछते हैं ना मुरली में – ब्रह्मा का बाप कौन? तो ब्रह्मा का बाप कोई होगा ना। ब्रह्मा का बाप शिवबाबा। तो शिवबाबा का ठप्पा लगा रहने की बजाय किसका ठप्पा लग गया? हँ? बच्चा, कृष्ण बच्चा उर्फ ब्रह्मा जो सतयुग में कृष्ण बच्चा बनता है, उस आत्मा का ठप्पा लग गया। तो वो झूठी गीता से भूल हो गई। तो बस ये झूठी गीता है भुलाने वाली।

और फिर क्या होगा? भूले ही बने रहेंगे या सुधार होगा? हँ? सुधार होगा या नहीं होगा? अब बाप आया है तो सुधार तो होगा। बाप तो कहते हैं – सबकी नज़र दिल्ली पर है। तो बाप की भी नज़र दिल्ली पर है। बाप कौन कम है? तो जब बाप की नज़र है तो सुधार तो हो ही जाएगा। तो गीता से भूल हो गई। गीता भुलाने वाली है। ये है भूल। बस। अभी तुम कहते हो – गीता पढ़ने से, वेद पढ़ने से भक्तिमार्ग में नीचे उतरते जाते हो। क्या? क्या पढ़ने से? गीता पढ़ने से या गीता सुनने से भक्तिमार्ग में नीचे उतरते जाते हो। कौनसी गीता सुनने या पढ़ने से? वो, हँ, जो मनुष्यों ने लिखी है। टीकाएं की हैं बाद में ना। इसलिए जो विदेशी विद्वान हैं कीथ, कीरो, वगैरा, उन्होंने रिसर्च करके ये बात बताय दी कि गीता पहले निराकारी, निराकारवादी रचना थी। जैसे धरमपिताएं निराकारी स्टेज वाले होते हैं, ऐसे ही गीता का भगवान भी निराकारी था। बाद में कृष्ण के उपासकों ने; क्या? उन्होंने नाम डाल दिया। किसका नाम डाल दिया? कृष्ण का नाम डाल दिया। तो भक्तिमार्ग में झूठी गीता होने से नीचे उतरते गए। सुनने से नीचे उतरते गए। और भगवान से जब तुम सुनते हो, पढ़ते हो, तो तुम चढ़ती कला में आ जाते हो।

तो देखो, अभी ये बात तुम्हारी बुद्धि में है ना बच्ची। दुनिया में और तो कोई भी नहीं है। और तो गीता को बड़ी अच्छी तरह से, बड़ा मान सम्मान देकरके, गीता की आरती वगैरा करके पूजते हैं। क्या? किसको पूजते? पुस्तक को। जड़ गीता को। जड़त्वमयी बुद्धि वाली को पूजते हैं, टीरा करके। तो अब ये वंडरफुल बात सुनी ना। कोई सुनते हैं, वंडर खाते हैं। अरे, ये क्या कहते हैं? ये जो गीता कृष्ण की है, उनसे मनुष्य नीचे गिरते जाते हैं? यानी पतित बनते हैं? और गीता तो है ही पतित पावन की। किसकी है? वास्तव में किसकी है? पतित-पावन बाप की है ना। वो सुनने से अभी ये पावन बन जाते हैं। तो देखो, ये समझने की कैसी सहज बात हो गई कि पतित-पावन से वो गीता सुनते हैं तो पावन बन जाते हैं। और देहधारी धर्मगुरु लोग जब उसकी टीकाएं करते हैं तो गीता झूठी हो जाती है।

हम एक गीता के ऊपर ही रखते हैं ना। ये भारत तो गीता के ऊपर ही है। ये भारत धरमखण्ड है ना। उसका धरमखण्ड गीता ही है। और देशों के धर्मखण्ड अलग-अलग हैं। जैसे क्राइस्ट का क्रिश्चियन धर्मखण्ड है, उनका गीता थोड़ेही है। उनका क्या है? बाइबल है। मुसलमानों का कुरान है। बौद्धियों का धम्मपद है। और भारत धर्मखण्ड तो गीता के ऊपर ही है। उसका उद्धार गीता से। अब वो गीता सच्ची है तो उद्धार होगा। और झूठी बनाय दी? तो भारत का मुख्य शास्त्र गीता है। अभी वो गीता सुनने से, अब ये किसको मालूम है बच्चे कि ये बात बाप ने आकरके बताई है? क्या? झूठी गीता से क्या होता है और सच्ची गीता से क्या होता है? झूठी गीता कैसे होती है? जो बाप की गीता थी उसमें कोई और ने ठप्पा लगाय दिया तो झूठी हो गई। दुनिया तो जानती नहीं है और तुम तो निश्चय कर लेते हो। क्या? बहुत निश्चय करते हैं और विवेक भी कहते हैं कि हाँ गीता का भगवान एक है। क्या? ये तो ढ़ेर की ढ़ेर टीकाएं करने वाले निकल पड़े। व्याख्याएं इतनी लम्बी चौड़ी करते हैं मोटे-मोटे गीता के ऊपर धर्मग्रंथ बनाय देते। जैसे गीता के रोम-रोम को ये ही जानते हैं। अरे! गीता माता के रोम-रोम को गीतापति भगवान जानता होगा या टीका-टिप्पणी करने वाले जानते हैं? वो जानने वाला तो एक है। गॉड इज़ वन कहा जाता है।

6.4.67 की वाणी का आठवां पेज। तो देखो, कृष्ण को तो भगवान हम कह ही नहीं सकते हैं क्योंकि कृष्ण तो देवता है 16 कला सम्पूर्ण। हँ? कि भगवान है? जो मनुष्यों ने भी गीता लिखी है उसमें कहीं भी कृष्ण भगवानुवाच नहीं लिखा है। क्या लिखा है? भगवानुवाच। अब कौनसा भगवानुवाच? वो भूल गए। तो कृष्ण को भगवान क्यों नहीं कह सकते? क्योंकि कृष्ण की पूजा तो बच्चे के रूप में करते हैं। गीता, जिससे राजयोग सिखाया, जिस गीता में राज़ भरा हुआ है राजाई प्राप्त करने का। क्या? क्या राज़ भरा हुआ है? कि जो प्रबल इन्द्रिय है कामेन्द्रिय, उस पर जीत कैसे पाई जाए? इन्द्रियों पर जितना जीत पाएंगे तो उतने बड़े राजा बनेंगे। अब ये काम बच्चा करेगा? बच्चे को इस राज़ का पता होता है क्या? उन्होंने कृष्ण बच्चा दिखाय दिया। तो बिल्कुल ही हम कृष्ण को भगवान नहीं कह सकते क्योंकि भगवान ही गीतापति भगवान है। जो राज़ की बातें जानता है और सिखाता है। और वो बाप एक ही है। क्या? अनेक बाप नहीं हैं। इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरुनानक, ब्रह्मा, वगैरा, जो राजयोग सिखाय करके राजाई प्राप्त कराय दें। क्या? हँ? मनुष्य गुरु जो हैं, वो क्या करते हैं? पढ़ाई पढ़ाते हैं। इंजीनियर बनाय देंगे। डॉक्टर बनाय देंगे। वकील, जज बनाय देंगे। राजा तो कोई नहीं बनाय देते। हिस्ट्री में कोई मनुष्यमात्र ने, कोई धरमपिता ने कोई को राजा नहीं बनाया। उन धरमपिताओं के धरम में भी, धर्मावलंबियों के बीच में भी जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, वो ही आकरके राजधानी स्थापन करके देता है। क्या? तो वो बाप एक ही है।

A morning class dated 6.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle of the seventh page was – The human beings have to be first of all told that why have you forgotten the Father? How did you forget? And why did you forget? Hm? How did you forget? Hm? How means that there must be a reason, isn’t it? Hm? The mistake is Gita. Which Gita? Hm? The false Gita committed mistake. Whose impression (chaap) is affixed on the false Gita due to which the mistake was committed? And whose impression is affixed on the true Gita? Hm? Stamp is affixed, isn’t it? Hm? For example, there is a virgin. Whoever casts his impression for the first time in her life, she cannot forget it throughout her life. And who is that true Gtia who reveals the Father? And who is the false Gita? Hm? Brahma’s impression is affixed. On whom? On whom is Brahma’s impression affixed? Hm? The false Gita. Hm? When is it affixed? When is it affixed? Hm? In the beginning of the Yagya. Hm? Both the persons gave correct reply. The Father’s impression was not affixed in the beginning of the Yagya. So, the impression of someone else was affixed. The impression of the Father’s child was affixed. Baba asks in the Murli – Who is Brahma’s Father? So, there must be Brahma’s Father, musn’t there be? Brahma’s Father is ShivBaba. So, instead of ShivBaba’s impression remaining affixed, whose impression was affixed? Hm? The impression of the child, child Krishna alias Brahma, who becomes child Krishna in the Golden Age, the impression of that soul was affixed. So, that false Gita committed a mistake. So, that is all; this false Gita makes you forget.

And then what will happen? Will you continue to commit mistakes or will any improvement take place? Will any improvement take place or not? Now the Father has come; so, improvement will indeed take place. The Father says – Everyone’s eyes are focused on Delhi. So, the Father’s eyes are also focused on Delhi. Is Father any less? So, when the Father’s eyes are focused, then improvement will definitely take place. So, the Gita committed mistake. Gita makes you forget. This is the mistake. That is all. Now you say – You go on experiencing downfall on the path of Bhakti by reading the Gita, by reading the Vedas. What? By reading what? By reading Gita or by listening to the Gita you go on experiencing downfall on the path of Bhakti. By listening to or reading which Gita? That, hm, which the human beings have written. They have made commentaries later on, haven’t they? This is why the foreign scholars Keith, Keiro, etc. did research and told that earlier Gita was a write-up which believed God to be incorporeal. Just as the founders of religions are in an incorporeal stage, similarly, God of the Gita was also incorporeal. Later on the worshippers of Krishna; what? They inserted his name. Whose name did they insert? They inserted the name of Krishna. So, because of the Gita becoming false on the path of Bhakti you went on experiencing downfall. You went on descending by listening [to the false Gita]. And when you listen from God, when you study from God, then you achieve rising celestial degrees.

So, look, now this topic is in your intellect, isn’t it daughter? There is none else in the world. And Gita is worshipped very nicely, by giving a lot of respect, by performing ‘aarti’ (a ritual of worship) of Gita. What? Who is worshipped? The book. The non-living Gita. They worship the one with an inert intellect. So, now you have heard a wonderful topic, haven’t you? Some listen and wonder. Arey, what do they say? Do people go on experiencing downfall through this Gita of Krishna, i.e. do they become sinful? And Gita is of the purifier of the sinful ones (Patit-paavan). Whose Gita is it? Actually, whose Gita is it? It is of the Father, the purifier of the sinful ones, isn’t it? These become pure by listening to it. So, look, it is such an easy thing to understand that when you listen to that Gita from the purifier of the sinful ones, you become pure. And when bodily religious gurus make commentaries on it, then the Gita becomes false.

We place [our faith] on only one Gita, don’t we? This Bhaarat is based on the Gita only. This India is a religious land, isn’t it? Its religious land is the Gita only. The religious lands of other countries are different. For example, the religious land of Christ is Christian, it is not Gita. What is theirs? It is Bible. It is Koran for the Muslims. It is Dhammapad for the Buddhists. And the Indian religious land is based on the Gita only. Its upliftment is through Gita. Now if that Gita is true, then upliftment will take place. And when it was made false? So, the main scripture of India is the Gita. Now, by listening to that Gita; well, who knows child that the Father came and narrated this topic? What? What happens through false Gita and what happens through true Gita? How does the Gita become false? When someone else affixed his impression on the Father’s Gita, then it became false. The world doesn’t know and you develop faith. What? Many people develop faith and the wisdom also says that yes, the God of Gita is one. What? Numerous people have emerged who write commentaries [on the Gita]. They make such long interpretations; they write fat religious scriptures on the Gita as if they alone know every hair follicle of the Gita. Arey! Would Gita’s husband God know every hair follicle of Mother Gita or will those who make commentaries know? It is only one who knows. It is said – God is one.

Eighth page of the Vani dated 6.4.67. So, look, we cannot call Krishna as God at all because Krishna is a deity perfect in 16 celestial degrees. Hm? Or is he God? In the Gita written by the human beings it has nowhere been written ‘Krishna Bhagwaanuwaach’ (God Krishna speaks). What has been written? Bhagwaanuvaach (God speaks). Well, which God speaks? That they forgot. So, why cannot Krishna be called God? It is because Krishna is worshipped in the form of a child. Gita, through whom Rajyog was taught, the Gita that is full of secrets to achieve kingship. What? Which secret is contained in it? That how can one gain victory over the strong organ, the organ of lust? The more victorious you become over the organs, the bigger the king you will become. Well, will a child perform this task? Does a child know this secret? They have shown a child Krishna. So, we can’t call Krishna as God at all because God Himself is the husband of Gita; God, who knows and teaches the topics of secret. And that Father is only one. What? There are not many Fathers, Ibrahim, Buddha, Christ, Guru Nanak, Brahma, etc., who could teach Rajyog and enable you to achieve kingship. What? Hm? What do human gurus do? They teach knowledge. They will make you an engineer. They will make you a doctor. They will make you an advocate, judge. Nobody makes you a king. No human being, no founder of religion in the history has made anyone a king. Even in the religion of those founders of religions, among the followers of those religions, it is the Father of the human world alone, who comes and establishes a kingdom. What? He is the only Father.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 23 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2455, आडियो 2941, दिनांक 13.03.2018
VCD 2455, Audio 2941, Date 13.03.2018,
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night class dated 16.5.1967
VCD-2455-Bilingual

समय- 00.01-15.01
Time- 00.01-15.01


रात्रि क्लास आज का है – 16.5.67. किसी ने अपना अनुभव बताया। फिर बोले। कौन बोले? हँ? अरे? किसी ने अपना अनुभव बताया। ब्रैकेट में लिखा है। तो बोले। कौन बोले? हँ? हाँ। आत्माओं का बाप शिव साकार तन में बोले। माना बाबा बोले। बहुत तो गिरते हैं। माने गिरने वालों की संख्या बहुत होती है। और ठहरने वालों की संख्या बहुत कम होती है। तो जो ब्रह्मा के बच्चे बहुत गिरते हैं, बहुत हार खाते हैं, और बहुत प्वाइंट्स से हराते हैं। क्या? बाबा तो ज्ञान के ढ़ेर के ढ़ेर प्वाइंट्स बताते रहते हैं। कोई किस प्वाइंट से हार खा जाते, कोई किस प्वाइंट से हार खा जाते। बहुत हराते हैं। तो बाबा बच्चों को कहते हैं – मीठे बच्चे, जो भी ईश्वरीय ज्ञान के प्वाइंट हैं उनसे हराओ मत। यानी काम से भी हराओ मत। क्या? काम विकार के बारे में ढ़ेर के ढ़ेर गीता ज्ञान में प्वाइंट बताए ना। क्रोध से भी न हराओ। क्या? काम से भी न हराओ। क्रोध से भी न हराओ। क्यों? जैसे गीता में कहा है - काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। (गीता 3/37)

ये काम विकार और क्रोध विकार, ये दोनों ही विकार जबसे दुनिया में रजोगुण की प्रधानता होती है; कबसे होती है? हँ? हाँ। द्वापरयुग से। द्वैतवादी जब द्वापरयुग आता है तो काम क्रोध की प्रधानता हो जाती है। उससे पहले काम-क्रोध की प्रधानता नहीं है। काम विकार की भी नहीं, क्रोध विकार की भी नहीं। जैसे ही इब्राहिम, दुनिया का दूसरा धरमपिता; हँ? और उसके अंडर में कनवर्ट होने वाला बुद्ध बौद्धी धरम का, इस दुनिया में आते हैं तो कामेन्द्रिय की प्रधानता के कारण जो कर्म करते हैं, उस कर्मफल की बाइ चान्स अगर पूर्ति नहीं होती है, तो फिर क्या हुआ? भयंकर क्रोध में भी आते हैं। और द्वापर के आदि में इतना नहीं बढ़ता क्योंकि दुनिया की हर चीज़ चार अवस्थाओं से पसार होती है। सतो, रजो, तमो, आदि।

तो द्वापर का आदि काल जब पूरा होने को होता है तब तक क्राइस्ट की आत्मा इस सृष्टि पर आ जाती है। वो क्रोध का मूल है। हँ? उस समय तक आते-आते इस्लामी भी हैं, वो भी, जो पहले-पहले सात्विक थे द्वापर की आदि में; हँ? 500 साल के बाद वो कामेन्द्रियों की इच्छा पूर्ण नहीं होती है तो भयंकर क्रोध में आते हैं। किसके संग के रंग से? कबसे आने लगे? हँ? हाँ। किसके संग के रंग से आने लगे? पहले नहीं आते थे। क्राइस्ट आया; हँ? तो उसके संग के रंग से आने लगे। और क्राइस्ट से क्रिश्चियन पैदा होते हैं। उन क्रिश्चियंस को जन्म देने वाली कोई तो होगी अम्मा। क्राइस्ट को जन्म देने वाली कोई तो अम्मा होगी। क्योंकि क्राइस्ट को जन्म देने वाली माँ जीसस हुई। क्राइस्ट आत्मा बीजरूप ऊपर से आती है ना आत्मलोक से, सुप्रीम अबोड से। तो जिसमें प्रवेश करती है वो अम्मा हो गई। क्या? जैसे बाप बीज है। और वो माँ में बीज डालता है। तभी तो बच्चा पैदा होता है। तो जिसमें बीज पड़ा वो बीजरूप आत्मा वो क्रोध का बीज है। वो आत्मा जैसे ही सृष्टि रूपी रंगमंच पर आती है 2000 साल पहले, बस, इस्लामियों में भी क्रोध का भूत सवार हो जाता, जो पहले सिर्फ कामी तो थे; क्या? काम की आस पूरी नहीं होती थी, तो भी सात्विक स्टेज में रहते थे। क्या? जोबरजस्ती जोर दबाव देकरके काम विकार क्रोध से नहीं भोगते थे।

तो यही बात बाबा ने बोली। क्या? किससे मत हराओ? एक तो काम विकार से, काम विकार की इन्द्रियों से मत हारो। इन इन्द्रियों को जीतना है। और क्रोध विकार से भी मत हराओ। हँ? क्रोध आँखों मंन आता है तो लाल-लाल आँखें दिखाते हैं। बिचारी अबला जाके लाल-लाल आँखें देख के डर जाएगी। अच्छा भैया जो करना हो सो कर लो। हाथ-पांव चलाते हैं। हाथ-पांव भी तो कर्मेन्द्रियां है ना। धुलाई-पिटाई कर देते हैं। तो द्वैतवादी द्वापरयुग से माताएं अबला बन जाती हैं। क्या? बलहीन बन जाती हैं। क्यों? क्यों बन जाती हैं? हँ? आत्मा तो मनुष्यों की ही है। जो आत्मा एक जनम पुरुष बनती है, एक जनम स्त्री बनती है। कन्याएं-माताएं अबला क्यों बन जातीं? क्योंकि कन्याओं-माताओं में वो पुरुष की इन्द्रिय प्रबल नहीं है। क्या? पुरुष का वो अंग प्रबल नहीं है जो बहुत शक्तिशाली होता है। तो बिचारी आधीन हो जाती हैं। तो बाबा ने तरीका बताया। क्या? हँ? अगर हार नहीं खानी है इस दुनिया में किसी से, विश्व का बादशाह बनना है तो क्या करना है? हँ? क्या करना है? इन शत्रुओं से, काम विकार से, क्रोध विकार से खास हार न खाओ। ये विकार पैदा करने वाली जो इन्द्रियां हैं ना वो हार खिलाती हैं। इसलिए गायन है इन्द्रियजीते जगतजीत। क्या? इन्द्रियों को जीतेंगे तो जगतजीत। कौनसी खास इन्द्रियों को? काम – ये है बड़ा डकैत। हँ? और बड़े डकैत का कोई सहयोगी भी होगा। वो है क्रोध। तो ये काम एश क्रोध एश रजोगुण समुद्भव। ये रजोगुण से पैदा होते हैं और रजोगुण जो है वो कर्मों में प्रवृत्त कराय देता है। माने जो कर्मेन्द्रियां हैं जिन्हें भ्रष्ट इन्द्रियां कहते हैं वो भ्रष्ट कर्मों में प्रवृत्त कराय देता है।

तो बोला – इन भूतों को। किन भूतों को? क्या नाम दिया? अरे! किन भूतों की बात बताई? काम-क्रोध। इन भूतों को अच्छी तरह से जीतना है। क्या? रगड़-रगड़ के जीतना है। मारो अच्छे से। क्या? रगड़ते जाओ, रगड़ते जाओ। और रगड़-रगड़ के जीतो। क्या? जैसे मल्लयुद्ध होता है ना। तो जो पावरफुल पहलवान होता है, दूसरे पहलवानों को नीचे गिराता है। तो उसे रगड़ता है ना। हँ? अगर रगड़ा नहीं और छोड़ दिया तो वो फिर हावी हो जाएगा। इसलिए उसके उठने से पहले ही रगड़ते जाओ, रगड़ते जाओ। अच्छी तरह से रगड़-रगड़ के जीतना है। हिम्मत उसकी पस्त हो जाए। समझ में आया? तो, जब ऐसे जीत पहनोगे इन विकारों के ऊपर तो ये विकार ही तुमको बहुत सुख देंगे। क्या? ये काम विकार शुद्ध आत्मिक स्नेह में कनवर्ट हो जाएगा। ये क्रोध विकार; क्या? शुद्ध प्यार में परिवर्तित हो जाएगा। आत्मा का प्यार होता है ना। वो शुद्ध होता है या भ्रष्ट कर्मेन्द्रियों का प्यार शुद्ध होता है? हँ? तो बताया – ये कन्वर्ट हो जाएंगे। ये बहुत सुख देंगे। अभी ये बहुत दुःख देते हैं। कौन? हँ? कौन हैं? विकार। हँ? वि माने विशेष। कार माने कर्म। क्या? विशेष कर्म करने वाली परिवार में कौन होती है? जो परिवार की पालना भी करती है, परिवार को जनम भी देती है? कौन होती है? हँ? माँ होती है। तो ये जीसस जैसी आत्माएं हैं ना जिनमें वो धरमपिताएं ऊपर से आके प्रवेश करते हैं ना। इब्राहिम जैसे कामी; काम विकार का बीज। और क्राइस्ट जैसा क्रोधी। ये क्रोध विकार का बीज। है ना? तो जिनमें प्रवेश करते हैं उनको संग के रंग से कन्वर्ट कर देते हैं।

Today’s night class is dated 16.5.1967. Someone narrated his experience. Then He spoke. Who spoke? Hm? Arey? Someone narrated his experience. It has been written within brackets. So, He spoke. Who spoke? Hm? Yes. Shiv, the Father of souls, spoke in a corporeal body. It means Baba spoke. Many suffer downfall. It means that the number of those who suffer downfall is big. And the number of those who remain constant is very less. So, Brahma’s children fall a lot, suffer defeat a lot and they are defeated on many points. What? Baba keeps on narrating a lot of points of knowledge. Some suffer defeat due to some point and some suffer defeat due to some other point. Many suffer defeat. So, Baba tells the children – Sweet children, do not suffer defeat on account of the points of Godly knowledge. It means do not suffer defeat at the hands of lust as well. What? Numerous points were mentioned in the knowledge of the Gita regarding the vice of lust, were they not? Do not suffer defeat at the hands of anger as well. What? Do not suffer defeat at the hands of lust as well. Do not suffer defeat at the hands of anger as well. Why? For example, it has been said in the Gita – Kaam esh krodh esh rajogunsamudbhavah. (Gita 3/37)

This vice of lust and the vice of anger, both these vices, ever since there is dominance of rajogun in the world; since when does it begin? Hm? Yes. From the Copper Age. When the dualistic Copper Age begins, then there is a dominance of lust and anger. Before that there is no dominance of lust and anger. Not of the vice of lust as well, not of the vice of anger as well. As soon as Ibrahim, the second founder of religion of the world; hm? And Buddha, the one from Buddhism who gets converted under him, come to this world, then because of the dominance of the organ of lust, whatever actions you perform, if by chance, the fruits of those actions are not fulfilled, then what happens? They become dangerously wrathful as well. And in the beginning of the Copper Age, it does not increase so much because everything in the world passes through four stages. Sato, rajo, tamo, etc.

So, when the initial period of the Copper Age is about to be over, by then the soul of Christ comes to this world. He is the origin of anger. Hm? By that time even the Islamic people, who were initially satwic (pure) in the beginning of the Copper Age; hm? After 500 years, when the desires of the organs of lust are not fulfilled, then they become dangerously angry. By being coloured by whose company? Since when did they start getting coloured? Hm? Yes. In whose company did they start getting coloured? They did not used to be coloured earlier. Christ came; hm? So, they started getting coloured by his company. And the Christians are born from Christ. There must be a mother who gives birth to those Christians. There must be a mother who gives birth to Christ because the mother who gives birth to Christ is Jesus. The seed form soul Christ comes from above, the Soul World, the Supreme Abode. So, the one in whom it enters happens to be the mother. What? For example, the Father is the seed. And He sows the seed in the mother. Only then is the child born. So, the one in whom the seed was sowed, that seed form soul is the seed of anger. As soon as that soul comes to the world stage 2000 years earlier, that is all, the ghost of anger rides on the Islamic people as well. They were earlier just lustful; what? Even when the desire for lust used not to be fulfilled, they used to remain in a satwic stage. What? They did not used to enjoy the vice of lust by force by becoming wrathful.

So, this is what Baba said. What? Do not suffer defeat at the hands of whom? Firstly, do not suffer defeat at the hands of the vice of lust, at the hands of the organs of lust. You have to conquer these organs. And do not suffer defeat at the hands of the vice of anger as well. Hm? When eyes become angry, then they show red eyes. Poor ladies will be afraid on seeing the red eyes. Okay brother, do whatever you want to do. They use their hands and legs. Hands and legs are also organs of action, aren’t they? They beat them. So, mothers become weak from the dualistic Copper Age. What? They become weak. Why? Why do they become weak? Hm? The soul is of human beings only. The soul becomes male for one birth and becomes female for one birth. Why do virgins and mothers become weak? It is because that strong male organ is not present in the virgins and mothers. What? That strong male organ is not present which is very powerful. So, poor ladies become subservient (aadheen). So, Baba narrated a method. What? Hm? If you do not want to suffer defeat at anyone’s hands in this world, if you want to become the emperor of the world, then, what should you do? Hm? What should you do? Do not suffer defeat at the hands of these enemies, the vice of lust, the vice of anger. These organs which cause these vices to emerge are the ones which make you suffer defeat. This is why there is a proverb – Indriyajeetey jagatjeet (the one who conquers the organs becomes victorious over the world). What? If you conquer the organs you will conquer the world. Especially which organs? Lust – This is a big dacoit. Hm? And there must also be a helper of the big dacoit. That is anger. So, this – Kaam esh krodh esh rajogun samudbhav. These [vices of lust and anger] are born of rajogun and this rajogun makes you inclined towards actions. It means the organs of action, which are called the unrighteous organs make you inclined towards unrighteous actions.

So, it was said – These ghosts. Which ghosts? What was the name given? Arey! Which ghosts were mentioned? Lust and anger. You have to conquer these ghosts nicely. What? You have to conquer by rubbing them nicely. Beat them nicely. What? Go on rubbing, go on rubbing. And conquer by rubbing continuously. What? For example, wrestling takes place, doesn’t it? So, the powerful wrestler pulls the other wrestlers down. So, he gives them a rubbing, doesn’t he? Hm? If he does not give them a rubbing and leaves them, then he will become dominant once again. This is why, before he gets up, go on drubbing him. You have to conquer by giving a nice rubbing. His courage should vanish. Did you understand? So, when you conquer the vices like this, then these vices will only give you a lot of happiness. What? This vice of lust will convert into pure spiritual love. This vice of anger; what? It will convert to pure love. There is spiritual love, isn’t it? Is that pure or is the love of the unrighteous organs pure? Hm? So, it was told – These will convert. They will give you a lot of happiness. Now they give a lot of sorrows. Who? Hm? Who? The vices (vikaar). Hm? Vi means vishesh (special). Kaar means karma (actions). What? Who in the family performs special actions? It is the one who sustains the family as well as gives birth to the family. Who is it? Hm? It is the mother. So, these Jesus like souls, in whom those founders of religions enter from above, don’t they? Lustful like Ibrahim; the seed of the vice of lust. And wrathful like Christ. This seed of the vice of lust. It is, isn’t it? So, the ones in whom they enter, they convert them through the colour of their company.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 24 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2456, आडियो 2942, दिनांक 14.03.2018
VCD 2456, Audio 2942, date 14.03.2018
प्रातः क्लास 16.5.1967
Morning class dated 16.5.1967
VCD-2456-Bilingual

समय- 00.01-19.07
Time- 00.01-19.07

रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. बात चल रही थी कि बच्चे इन पांच विकारों से बहुत गिरते हैं, हार खाते हैं। और बाबा कहते हैं - बच्चे हराओ मत। कोई, कोई भी ज्ञान की प्वाइंट से हारना नहीं है। कितने प्वाइंट्स देते हैं। फिर भी हार खा जाते हैं। काम से भी मत हराओ, क्रोध से भी मत हराओ। ये मुख्य भूत है – काम और क्रोध। क्यों? दूसरे क्यों नहीं? इसलिए – ये काम और क्रोध, जब रजोगुणी दुनिया हो जाती है, तब पैदा होते हैं। और बहुत पुराने भूत हैं रजोगुणी द्वापरयुगी दुनिया के। तो इन भूतों को अच्छी तरह से जीतना है। किन भूतों को? हँ? हाँ। काम और क्रोध के भूतों को अच्छी तरह से जीतना है। ‘अच्छी तरह से’ का क्या मतलब हुआ? हँ? ऐसे अच्छी तरह से पछाड़ना है कि फिर इनकी हिम्मत ही न हो वार करने की। फिर जब अच्छी तरह से जीत लेंगे, अच्छी तरह से इनको पछाड़ खिला देंगे। जैसे दो पहलवान लड़ते हैं ना तो एक पहलवान अच्छी तरह से पछाड़ देता है। फिर बस पस्त होके चारों खाने चित्त। तो जब ऐसे ये चारों खाना चित्त हो जाएंगे तो ये काम और क्रोध रूपी विकार कनवर्ट हो जाएंगे। क्या? ये बहुत सुख देंगे नई दुनिया में।

तो देखो बड़ी भारी कमाई है। जबरदस्त कमाई है। और ये तुम्हारी कमाई कल्प-कल्प की है। कोई एक दो जन्म की बात नहीं है। और तुम जानते हो कि हम किसके पास आए हुए हैं? हँ? किसके पास आए हुए हैं? हँ? हँ? भगवान के पास आए हुए हैं। ये क्या होता है? हँ? ये भगवान क्या होता है? हँ? भगवान के पास आए हुए हैं; धनवान के पास नहीं आए हुए हैं। अरे, बड़े ते बड़ा तो ज्ञान धन होता है ना। हँ? भगवान के पास आए हैं या बड़े ते बड़े अखूट ज्ञान धनवान के पास आए हैं? किसके पास आए हुए हैं? हँ? नारायण को तो एक भगवती होती है। क्या? नारायण को कितनी भगवती? एक भगवती होती है। तुम कहते हो हम भगवान के पास आए हुए हैं। तो दोनों में क्या फर्क है? हँ? धनवान में क्या फर्क है? भगवान में क्या फर्क है? और जो नारायण भगवान कहा जाता है, उसके पास भगवती होती है, 16 कला संपूर्ण कहा जाता है, उसमें क्या फर्क है? इन तीनों में फर्क बताओ। नारायण में तो ज्ञान जल रहता है। चलो, एक बात हो गई। जो ऊँच ते ऊँच नारायण है सृष्टि के आदि में, पहली पीढ़ी में, उसमें तो ज्ञान जल रहता है। ठीक बात है। अब दूसरे और रह गए दो। एक धनवान रह गया। और एक भगवान रह गया। तो उनकी भी शिफ्थ बताओ। हाँ।

तो धनवान होता है, वो धन वाला होता है। ज्ञान धनवान होता है तो ज्ञान धन वाला होता है। अच्छा; और भगवान? भगवान क्या वाला होता है? हँ? अरे भाई जल्दी-जल्दी बताओ। कहाँ लूले-लंगड़ों से, अंधों से और गूंगों से पाला पड़ गया। भाग्यवान जिसमें बाप प्रवेश करते हैं। तो प्रवेश करने वाला ज्यादा पावरफुल हुआ या जिसमें प्रवेश करते हैं वो ज्यादा पावरफुल हुआ? हँ? तो दोनों में भगवान कौन? नीचे वाला भगवान? और ऊपर वाला? ऊपरवाला जो प्रवेश करता है वो क्या है? हँ? वो कुछ नहीं? जीरो? कहते वो जीरो बिन्दी है। हँ? नीचे वाला हीरो है, ऊपरवाला जीरो है? हँ? जिस अर्जुन के रथ में प्रवेश करते हैं शरीर रूपी रथ में, वो अर्जुन हीरो हो गया और जो प्रवेश करने वाला है उसके रथ में, उसके रथ को संभालता है, वो जीरो हो गया? अरे, दोनों में फिर भगवान कौन है? भगवान को तो लोग कहते हैं – उससे ज्यादा ताकतवर कोई होता ही नहीं। वो तो सर्वशक्तिवान होता है। तो होता है या नहीं होता है? हँ? भगवान सर्वशक्तिवान होता है। तो ऊपरवाले में, जो प्रवेश करता है, और नीचे वाले में, जिसमें प्रवेश करता है, ज्यादा पावरफुल कौन है? ऊपरवाला ज्यादा पावरफुल है। फिर वो ही भगवान हुआ ना। अभी तो कह रहे थे नीचे वाला भगवान है। फिर ऊपरवाला अगर भगवान है तो उसको भग है? हँ? नारायण को तो एक भगवती है तो एक भग तो है कम से कम। हँ? ऊपरवाले को भग है? एक है कि हज़ार हैं कि 16000 भगें हैं? हँ? ऊपरवाले को 16000 भगें हैं? हँ? उसे क्या चाहिए? उसे क्यों चाहिए ऊपरवाले को 16000 भगें? हँ? जो नीचे वाला है उसको तो लिंग है। लिंग रूप कामेन्द्रिय है। काम महाशत्रु है। तो जिसको है उसको भग चाहिए। ऊपरवाला पावन बनाता है? किसको? नीचे वाले को? सारी सृष्टि को? छोड़ो। कहाँ गूंगों से पाला पड़ गया।

तो तुम जानते हो किसके पास आए हुए हो। जिसके पास आए हुए हो ये कोई साधु नहीं है। क्या? जो इन्द्रियों की साधना करते हैं जंगल में जाकरके, घरबार को छोड़करके। क्या? वो कोई साधु नहीं है। गृहस्थी है या साधु है? हँ? बेहद का गृहस्थी है कि हद का गृहस्थी है? हँ? हद के गृहस्थी को तो एक घरवाली, दो घरवाली होती है। ये तो बेहद का गृहस्थी है। क्या? इतनी घरवालियाँ और किसी को होती ही नहीं हैं। भागवत में गाया हुआ है 16000 गोपियाँ जिनके साथ गुप्त संबंध जोड़ता है पति-पत्नी का संबंध गुप्त कहा जाता है। तो तुम किसके पास आए हुए हो? ऊपरवाले के पास आए हुए हो या नीचे वाले के पास आए हुए हो? हँ? वो ऊपरवाला तो, ऊपरवाला तो न साधु है, न उसे गृहस्थी कह सकते हैं। वो जब इस सृष्टि पर आता है तो जिसमें प्रवेश करता है उसके साथ उसकी गृहस्थी है। क्या? उसकी पक्की गृहस्थी एक के साथ है या अनेकों के साथ है? एक के साथ पक्की गृहस्थी है। उसको कहते हैं मुकर्रर रथ, मुकर्रर शरीर। जैसे किसी पति को पत्नी होती है ना, तो एक पत्नी तो मुकर्रर होती है। पहलीवाली। और बाकी फिर नंबरवार हैं। उनकी ज्यादा उतनी वैल्यू नहीं होती है दूसरी, तीसरी, चौथी पत्नी की।

तो जो मुकर्रर रथ लेता है अर्जुन का; मुकर्रर माने परमानेन्ट। हँ? दादा लेखराज का रथ कैसा था? परमानेन्ट था या टेम्पररी था? हँ? टेम्पररी रथ था। जितने भी ब्रह्मा के मुख गाए जाते हैं, वो पूरा शरीर न दिखा करके मुख दिखा देते हैं। तो पंचमुखी ब्रह्मा में से एक मुख ऐसा है जो मुकर्रर है। और बाकी चार? बाकी चार टेम्पररी हैं। तो तुम किसके पास आए हुए हो? कभी कहते ऊपरवाले के पास आए हुए हो। कभी कहते नीचे वाले के पास आए हुए हो। मुकर्रर रथधारी के पास आए हो माना अर्जुन के पास आए हो। जो अर्जन करता है। हँ? ऊपरवाले से, जो ऊपरवाला त्रिकालदर्शी है, अजन्मा है, अकर्ता है, अभोक्ता है, जिसका नाम आत्मा का बिन्दी का ही नाम है शिव। वो अकर्ता, अभोक्ता, अजन्मा, गर्भ से जन्म नहीं लेता। इसलिए वो त्रिकालदर्शी है। और अखूट त्रिकालदर्शी है। इस सृष्टि पर तब आता है जब ये सृष्टि तमोप्रधान दुखी हो जाती है कलियुग के अंत में। तब आकरके अर्जुन के रथ में प्रवेश करता है।

अर्जुन कौन? जिसमें प्रवेश करता है वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच का हीरो पार्टधारी है। क्या? नंबरवार पार्टधारियों में से नहीं। अव्वल नंबर का हीरो पार्टधारी, मुख्य एक्टर है। ऐसे तो और भी मुख्य एक्टर्स। जैसे ब्रह्मा ने सृष्टि रची तो जिस ब्रह्मा ने सृष्टि रची वो भी मुख्य एक्टर हो गए। इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरुनानक – ये सब मुख्य-मुख्य एक्टर्स हो गए। लेकिन इनमें हीरो पार्टधारी एक भी नहीं सिवाय अर्जुन के। जिस अर्जुन के रथ में वो शिव प्रवेश करके शिव नेत्र कहा जाता है। किसको होता है शिव नेत्र? नाम बताओ। शंकर को होता है। इसलिए एक ही देवता है, बड़े ते बड़ा देवता कहा जाने वाला देव-देव-महादेव, जिसमें वो तीसरा नेत्र, शिव नेत्र प्रवेश करके काम करता है परमानेन्ट। अब उसे शंकर कह दो, अर्जुन कह दो, आदि देव कह दो, देव-देव-महादेव कह दो, मुसलमानों की भाषा में आदम कह दो, पहला दुनिया का आदमी। अंग्रेजों की भाषा में एडम कह दो। जैनियों की भाषा में आदिनाथ कह दो। क्या? आदि माने आदि का। नाथ माने नथनिया डाल दी। इस सृष्टि की पार्ट बजाने वाली वो पहली आत्मा जिसकी नाक में नकेल डाल दी। किसने डाल दी? ऊपरवाले ने। तो तुम किसके पास आए हो? ऊपरवाले के पास नहीं आए हो? जिसको नकेल डाली जाती है उसके पास आए हो? हँ? अभी कहते थे कि हम उसके पास आए हैं, मुकर्रर रथधारी के पास। (अभी तो आराम से सो गए। थोड़ी धूप और लगा लो।) तो कहेंगे कि हम दोनों के पास आए हैं। क्या? ऊपरवाला आत्मा है सिर्फ। उसको अपनी देह नहीं है। उसकी ज्योतिबिन्दु आत्मा का ही नाम शिव है। और इस सृष्टि में जब आता है कलियुग के अंत में, तो जिसमें प्रवेश करता है वो हीरो पार्टधारी अर्जुन या शंकर, वो शंकर ही है हीरो पार्टधारी।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed was – Children fall a lot and are defeated by these five vices. And Baba says – Children, do not get defeated. Do not get defeated in case of any point of knowledge. You are given so many points. Yet, you suffer defeat. Do not get defeated by lust also; do not get defeated by anger as well. These are the main ghosts – Lust and anger. Why? Why not others? This is why – these lust and anger are born when the world becomes rajoguni. And they are very old ghosts of the rajoguni Copper Age world. So, you have to conquer these ghosts very nicely. Which ghosts? Hm? Yes. You have to conquer the ghosts of lust and anger nicely. What is meant by ‘nicely’? Hm? You have to defeat them so nicely that they should not dare to attack again. Then, when you conquer them nicely, when you defeat them nicely; for example, two wrestlers fight, don’t they? So, one wrestler defeats the other nicely. Then, he (the defeated wrestler) falls flat on the ground. So, when they fall flat on the ground, then these lust and anger like vices will convert. What? They will give a lot of happiness in the new world.

So, look, it is such a big income. It is a very huge income. And your income is for every Kalpa. It is not about one or two births. And you know that who have we come to meet? Hm? Who have we come to meet? Hm? Hm? We have come to meet God. What is this? Hm? What is this God (Bhagwaan)? You have come to meet Bhagwaan; You have not come to meet the wealthy one (dhanwaan). Arey, the biggest wealth is the wealth of knowledge, isn’t it? Hm? Have you come to meet Bhagwaan or have you come to meet the most prosperous one, who has the inexhaustible wealth of knowledge? Who have you come to meet? Hm? Narayan has one Bhagwati. What? How many Bhagwatis (goddesses) does Narayan have? He has one Bhagwati. You say that we have come to meet Bhagwaan. So, what is the difference between both? Hm? What is the difference when you say Dhanwaan? What is the difference when you say Bhagwaan? And Narayan, who is called Bhagwaan, has Bhagwati; He is said to be perfect in 16 celestial degrees; what is the difference? Tell the difference between these three. There is water of knowledge in Narayan. Okay, one topic has been covered. The highest on high Narayan, in the beginning of the world, in the first generation contains the water of knowledge. That is correct. Now two others remain. One ‘Dhanwaan’ remains. And one ‘Bhagwaan’ remains. So, tell their specialty also. Yes.

So, a dhanwaan (wealthy person) possesses dhan (wealth). If someone is wealthy in knowledge, he possesses the wealth of knowledge. Achcha; and God? What does God (Bhagwaan) possess? Hm? Arey brother, tell quickly. One has to deal with one-armed, lame, blind and dumb people. Fortunate (bhaagyavaan) is the one in whom the Father enters. So, is the one who enters more powerful or is the one in whom He enters more powerful? Hm? So, who is God among both? Is the below one God? And the above one? What is the above one who enters? Hm? Is He not anything? Zero? You say that He is zero, a point. Hm? Is the below one a hero and the above one zero? Hm? The Chariot of Arjun, the body like Chariot in which He enters, that Arjun is hero and the one who enters in his Chariot, takes care of his Chariot is zero? Arey, who is God among both of them? For God, people say that there is nobody more powerful than Him at all. He is almighty. So, is He or is He not? Hm? God is almighty. So, who is more powerful among the above one, who enters and the below one, in whom He enters? The above one is more powerful. Then, He is God, isn’t He? Just now you were telling that the below one is God. Then if the above one is God, then does He have ‘bhag’ (female reproductive organ)? Hm? Narayan has one Bhagwati; so, he has at least one bhag. Hm? Does the above one have bhag? Does He have one or 1000 or 16000 bhags? Hm? Does the above one have 16000 bhags? Hm? What does He require? Why does the above one require 16000 bhags? Hm? The below one has ling (phallus). He has the ling like organ of lust. Lust is the biggest enemy. So, the one who has ling requires bhag. Does the above one make you pure? Whom? The below one? The entire world? Leave it. I have to deal with dumb people.

So, you know that whom have you come to meet. The one whom you have come to meet is not a sage (saadhu). What? Those who try to control their organs by going to the forests, by leaving their households. What? They are not sages. Are they householders or sages? Hm? Are they unlimited householders or limited householders? Hm? Limited householders have one wife or two wives. This one is an unlimited householder. What? Nobody else has so many wives at all. It has been sung in the Bhaagwat that the 16000 Gopis, with whom He establishes incognito relationship; the relationship of a husband and a wife is called incognito. So, who have you come to meet? Have you come to meet the above one or the below one? Hm? That above one, the above one is neither a sage, nor can he be called a householder. When He comes in this world, then His household is with the one in whom He enters. What? Is His firm household with one or with many? He has a firm household with one. That is called the permanent Chariot, permanent body. For example, a husband has a wife, doesn’t he? So, one wife is permanent. The first one. All others are numberwise. They, the second, the third, the fourth wife does not hold that much value.

So, the permanent Chariot (mukarrar rath) of Arjun that He assumes; mukarrar means permanent. Hm? How was the Chariot of Dada Lekhraj? Was it permanent or temporary? Hm? It was a temporary Chariot. All the heads of Brahma which are praised are shown just as heads without showing the entire body. So, among the five heads of Brahma, one head is permanent. And the remaining four? Remaining four (heads) are temporary. So, who have you come to meet? Sometimes you say – We have come to meet the above one. Sometimes you say that you have come to meet the below one. You have come to meet the permanent charioteer, i.e. Arjun, the one who earns (arjan karta hai). Hm? From the above one, the above one who is Trikaaldarshii (the knower of past, present and future) ajanma (the one who doesn’t get birth), akarta (non-doer), abhokta (the one who does not seek pleasures), whose soul’s, point’s name is just Shiv. That akarta, abhokta, ajanma does not get birth through womb. This is why He is Trikaaldarshii. And He is inexhaustible Trikaaldarshii. He comes to this world when this world becomes tamopradhan, sorrowful in the end of the Iron Age. Then He comes in the Chariot of Arjun.

Who is Arjun? The one in whom He enters is the hero actor of this world stage. What? He is not among the numberwise actors. He is the number one hero actor, main actor. In a way there are other main actors as well. For example, when Brahma created the world, then the Brahma who created the world, is also a main actor. Ibrahim, Buddha, Christ, Guru Nanak – all these are also main actors. But among them none is a hero actor except Arjun. It is that Arjun in whose Chariot that Shiv enters and is called Shiv Netra (Shiva’s eye). Who possesses Shiv’s eye? Tell the name. Shankar possesses. This is why there is only one deity, Dev-Dev-Mahadev, who is called the highest deity, in whom that third eye, the Shiv netra enters and works permanently. Well, call him Shankar, call him Arjun, call him Aadi Dev, call him Dev-Dev-Mahadev, call him Aadam in the language of the Muslims, the first man (aadmii) of the world. Call him Adam in the language of the Britishers. Call him Aadinath in the language of the Jains. What? Aadi means ‘of the beginning’. Naath means that a nathaniya (nose-pin) was put. The first soul playing its part in this world, in whose nose the nose-pin was put. Who put it? The above one. So, who have you come to meet? Have you not come to meet the above one? Have you come to meet the one in whose nose the nose-pin was put? Hm? Just now you were telling that we have come to meet him, the permanent charioteer. (Now you have slept comfortably. You may take sunbath as well.) So, it will be said that we have come to meet both. What? The above one is just a soul. He does not have his body. The name of only His point of light soul is Shiv. And when He comes to this world in the end of the Iron Age, then the one in whom He enters, that hero actor, Arjun or Shankar, that Shankar is the hero actor.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 25 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2457, आडियो 2943, दिनांक 15.03.2018
VCD 2457, Audio 2943, Date 15.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2457-Bilingual

समय- 00.01-18.30
Time- 00.01-18.30


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी –बाप और दादा; और हैं भी सब ऐसे ही बापदादा जैसे। बाप ज्योतिबिन्दु आत्मा और ज्योतिबिन्दु आत्मा के बच्चे भी ज्योतिबिन्दु आत्मा। सब ज्योतिबिन्दु आत्मा शिव के बच्चे। और प्रजापिता ब्रह्मा के भी सब बच्चे। शिव ज्योतिबिन्दु सुप्रीम बाप, जिसका कोई बाप नहीं। और प्रजापिता ब्रह्मा, वो पिता भी है तो ब्रह्मा भी है क्योंकि शिव बाप जब इस सृष्टि पर आते हैं तो जिस पुरुष तन में प्रवेश करते हैं उसका नाम ब्रह्मा रखते हैं। तो वो हो गया ब्रह्मा नामधारियों में अव्वल नंबर ब्रह्मा जिसे कहते हैं परमब्रह्म। और ब्रह्म माने बड़ी, मा माने माँ। बड़ी माँ है तो प्रजापिता भी होगा। सारी प्रजा का बाप। इस मनुष्य सृष्टि में जिसे वसुधैव कुटुंबकम कहा जाए, जब बाप आते हैं तो ऐसा कुटुंब बनाते हैं। तो उसमें 500-700 करोड़ आत्माएं मनुष्यात्माएं हैं। सब प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे। उसे प्रजापिता ब्रह्मा कहो, परमब्रह्म कहो, सारी प्रजा का पिता आदम कहो, एडम कहो, क्योंकि इस सृष्टि पर पहले-पहले रचना ही तो ऐसे होती है ना। और रचना तो साकार ही होती है। तो रचयिता भी साकार होना चाहिए। प्रजापिता ब्रह्मा, प्रजापिता भी साकार और उसको सृष्टि रचने के लिए अम्मा चाहिए। तो बड़ी ते बड़ी ब्रह्मा, अम्मा, परमब्रह्म रचना हो गई। परिवार में माँ बाप की पहली रचना ही तो होती है ना। तो प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा जो पहले-पहले पैदा हुए वो भी ब्राह्मण। फिर ब्राह्मण सो देवता।

देवता उन्हें कहा जाता है जिनमें दिव्य गुण हों। जो सुख देने वाले हैं। लेने की इच्छा रखने वाले नहीं हैं। उनको देवता कहा जाता है। परन्तु देवता तो बाद में बनते हैं। बाद की पीढ़ी का नाम है देवता। जिन्हें 16 कला संपूर्ण कहा जाता है। हे कृष्ण नारायण वासुदेव। कृष्ण नारायण जैसे 16 कला संपूर्ण देवता सतयुग की आदि में। परन्तु ये देवताओं की पीढ़ी भी बाद की पीढ़ी है। उनसे भी पहले, सतयुग से पहले जो कलियुग का अंत समय था, महाविनाश का समय था, उसमें ब्रह्मा के द्वारा ब्राह्मण रचे गए प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा। और वो ब्राह्मण भी अव्वल नंबर कुरी के। नहीं तो ब्राह्मणों की भी भक्तिमार्ग में नौ कुरियाँ गाई हुई हैं। तो अव्वल नंबर के ब्राह्मण सो अव्वल नंबर के देवता क्योंकि सतयुग में जो देवताएं होंगे वो सतयुग की हर पीढ़ी में 16 कला संपूर्ण तो नहीं कहेंगे। सुख भोगते-भोगते कलाएं कम होती जाएँगी ना। तो सतयुग के आठ जन्मों में आठी पीढ़ियों के जो देवता बनते हैं देवात्माएं, वो नंबरवार कम कलाओं वाले होते जाते हैं।

टोटल सतयुग के आठ जन्मों में दो कलाएं कम हो जाती हैं। फिर सृष्टि सत्वसामान्य बन जाती है। सतोप्रधान सतयुग नहीं कही जाती है। तो उनको कहा जाता है क्षत्रीय। जो विकारों के युद्ध में, जैसे गीता में कहा है – काम, क्रोध, लोभ – ये महाशत्रु हैं, इनको जीत लो। इन शत्रुओं से जीतने में जो फेल हो गए, वो क्षत्रीय कहे गए। परन्तु क्षत्रीय धरम की भी स्थापना बाप ही करते हैं। आत्माओं का बाप शिव मनुष्यों के बाप प्रजापिता में प्रवेश करके क्षत्रीयों की पैदाइश होती है। क्षत्रीय उन्हें कहा जाता है जो क्षात्र तेज वाले होते हैं। उनके ऊपर शिव की प्रैक्टिकल में विशेष छत्रछाया रहती है क्योंकि वो बाप के वो बच्चे हैं जिन्होंने पहले-पहले हिम्मत की पुरुषार्थ करने की। आत्मिक स्थिति में टिकने की। आत्मिक स्थिति में टिकने की हिम्मत तो की, और कर्मेन्द्रियों से कर्म करते हुए भी आत्मिक स्थिति में टिकने की कोशिश की। लेकिन फेल हो गए। उनकी संख्या होती है साढ़े चार लाख। जिनमें सवा दो लाख बाद में एड होते हैं। असली हैं सवा दो लाख। इसलिए भक्तिमार्ग में यादगार रुद्र ज्ञान यज्ञ रचते थे तो लाख, दो लाख शालिग्राम बनाते थे। भक्तिमार्ग में कहते हैं आत्मा अंगुष्ठ मिसल है। तो उन्होंने अंगुष्ठाकार के शालिग्राम बनाने शुरु कर दिये। वो भी मिट्टी के क्योंकि शरीर तो मिट्टी का ही होता है पुरुषार्थ करने वालों का।

लेकिन जब भगवान आते हैं कलियुग के अंत में, सतयुग के आदि के पुरुषोत्तम संगमयुग में तो उस समय शूटिंग पीरियड का आरम्भ होता है। जैसे और धरमपिताएं सौ साल के अन्दर अपने धरम की स्थापना करके शरीर छोड़ जाते हैं, ऐसे ही परमपिता परमात्मा भी अपना कार्य सौ साल के अन्दर करते हैं पूरा, परन्तु जमदे-जामदे तो नहीं होता। हथेली पर आम तो नहीं जमाया जा सकता। इसलिए पुरुषोत्तम संगमयुग के सौ वर्ष के आदिकाल में ज्ञान थोड़ा होता है। पूरा ज्ञान नहीं होता है। आत्मा का, परमात्मा का, परमपिता का। इसलिए फेल हो जाते हैं। फिर भी जो फेल हो जाते हैं, क्षत्रीय कहे जाते हैं, उनको बाप का वर्सा मिलता है। क्योंकि ब्राह्मण हैं, शरीर छोड़ते हैं, तो अगले जनम में फिर ब्राह्मण बनेंगे। ईश्वरीय पढ़ाई की प्रालब्ध तो खलास होती नहीं। तो बाप से उनको एक तो छत्रछाया मिलती है। दूसरी, पुरुषार्थ रूपी जो धनुष है जिसे चाप कहते हैं, भक्तिमार्ग में कहते हैं ना शंकर चाप जहाज़, जेहि चढ़ उतरैं पार नर। बूढ़ि सकल संसार। तो वो शंकर प्रजापिता वाली ही आत्मा, आदम कहें, आदि देव कहें, जिसमें शिव मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं, वो अपने उन फेल होने वाले बड़े बच्चों को, सूर्यवंशी पीढ़ी को वर्सा दे देते हैं। ये ले जाओ ज्ञान धारण करने वाला धनुष। धनुष के ऊपर बाण धारण किया जाता है ना। तो ये शरीर रूपी धनुष ले जाओ। अगले जनम के लिए पुरुषार्थ करने के लिए। इसे जहाज़ भी कह दिया, चाप भी कह दिया। उस शरीर के द्वारा तीव्र पुरुषार्थ करना। और उनकी बुद्धि में ज्ञान बाण के तरकश भी दे दिये, तरकश में, बुद्धि रूपी जो तरकश है, उसमें ज्ञान बाण भी भर देते हैं, जिन्हें राम बाण कहा जाता है क्योंकि उन दुबारा जन्म लेने वाली आत्माओं में, सूर्यवंशियों में, जिन्हें रुद्र ज्ञान यज्ञ का पहला-पहला ब्राह्मण कहा जाता है, वो ब्राह्मण यज्ञोपवीत भी धारण करते हैं। जिन्हें रुद्रगणों का मुखिया शंकर दिखाते हैं। शंकर के चित्रों में भी यादगार यज्ञोपवीत दिखाते हैं ना जनेऊ।

तो अगला जन्म लेकरके जब वो ज्ञान में आते हैं तो क्षात्र तेज वाले भी होते हैं। उनको ऊँच ते ऊँच सुप्रीम सोल की छत्रछाया मिलती है। और पुरुषार्थ का शरीर रूपी धनुष भी धारण करके आते हैं। जिसको गीता में अर्जुन से कहा है – हे ज्ञान धन का अर्जन करने वाले अर्जुन! तेरा ये जो शरीर है, शरीर रूपी चाप कहो, धनुष कहो, जहाज़ कहो, क्षेत्र कहो; कहते हैं ना धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे। तो उसका भी कोई बीज होगा ना। तो जो बीज होता है, उसी आत्मा के नाम पर वो युद्ध होता है महाभारत। इसलिए नाम दिया है महाभारत। भा माने ज्ञान की रोशनी; रत माने लगा रहने वाला। जो ज्ञान की रोशनी में ही रथ लगा रहता है उस रथ के लिए गीता में ही बोल दिया – इदम् शरीरम् कौन्तेय क्षेत्रम् इति अभिधीयते। (गीता 13/1) ये तेरा शरीर रूपी धनुष है ना, चाप है ना, रथ है ना, शरीर रूपी ये यज्ञ कुण्ड का क्षेत्र है, युद्ध का क्षेत्र है। और इस धर्मयुद्ध के क्षेत्र से जो कर्मकांड निकलते रहे हैं जन्म-जन्मान्तर अनेक धर्मों के अलग-अलग, उनका भी ये क्षेत्र है। तो वो शरीर रूपी रथ के द्वारा खूब युद्ध करते हैं ज्ञान का। ज्ञान तो सच्चाई को ही कहा जाता है। सत्य का ज्ञान ही ज्ञान है। कोई असत्य का ज्ञान थोड़ेही ज्ञान कहा जाता है। तो सचखण्ड स्थापन करना है तो सच्चा ज्ञान सृष्टि का चाहिए। सृष्टि को निर्माण करने वाले बाप का भी सच्चा ज्ञान चाहिए। और जो निर्माण करने वाले हैं सचखण्ड का उस पहली-पहली सूर्यवंशी बच्चों का भी सच्चा ज्ञान चाहिए।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the first page was – Baap and Dada; and everyone is like this, like BapDada. The Father is a point of light soul and the children of the point of light soul are also points of light souls. All are children of the point of light soul Shiv. And everyone is the child of Prajapita Brahma as well. Point of light Shiv, the Supreme Father who doesn’t have any Father. And Prajapita Brahma is Father as well as Brahma because when Father Shiv comes to this world, then the male body in which He enters, He names him Brahma. So, he happens to be the number one Brahma among those who hold the name Brahma, who is called Parambrahm. And Brahm means senior, ma means mother. When there is the senior mother, then there will be Prajapita as well. The Father of all the subjects (praja). In this human world, which may be called Vasudhaiv Kutumbkam (world family), when the Father comes, he establishes such a kutumb (family). 500-700 crore souls are human souls in it. All are children of Prajapita Brahma. Call him Prajapita Brahma, call him Parambrahm, call him the Father of all the subjects (praja), call him Adam because the first and foremost creation in this world takes place like this only, doesn’t it? And the creation takes place in corporeal form only. So, the creator should also be corporeal. Prajapita Brahma; Prajapita is also corporeal and he requires a mother to create world. So, the seniormost Brahma, mother, Parambrahm is the creation. In a family, the mother is the first creation of the Father, isn’t she? So, those who were born first of all through Prajapita Brahma are also Brahmins. Then Brahmins become deities.

Those who possess divine virtues are called deities. Those who give happiness. They do not have the desire to take. They are called deities. But you become deities later on. The name of the latter generation is deities, who are called perfect in 16 celestial degrees. He Krishna Narayan Vasudev. Deities like Krishna and Narayana, perfect in 16 celestial degrees in the beginning of the Golden Age. But this generation of deities is also a latter generation. Before them, before the Golden Age, which was the last period of the Iron Age, the period of mega-destruction, Brahmins were created in it through Brahma, through Prajapita Brahma. And those Brahmins are also of the number one category. Otherwise, nine categories of Brahmins are famous on the path of Bhakti. So, the number one Brahmins become number one deities because the deities in the Golden Age will not be called perfect in 16 celestial degrees in every generation of the Golden Age. While enjoying pleasures, the celestial degrees will go on decreasing, will they not? So, in the eight births of the Golden Age, the deity souls, who become deities in the eight generations, they go on becoming deities of numberwise decreasing celestial degrees.

In total, two celestial degrees decrease in the eight births of the Golden Age. Then the world becomes satwasaamaanya (ordinarily pure). It is not called Satopradhan Golden Age. So, they are called Kshatriyas. In the war of vices, for example, it has been said in the Gita – Lust, anger, greed, these are the biggest enemies;, conquer them. Those who failed in conquering these enemies were called Kshatriyas. But it is the Father himself who establishes the Kshatriya religion as well. The Father of souls, Shiv enters in the Father of the human beings, Prajapita and gives birth to the Kshatriyas. Those with the lustre of Kshatriyas (kshaatra-tej) are called Kshatriyas. The special canopy (chatrachaya) of Shiv remains over them in practical because they are such children of the Father who have first of all shown courage to make purusharth of becoming constant in soul conscious stage. They showed courage to become constant in soul conscious stage and they tried to become constant in soul conscious stage even while performing actions through the organs of action. But they failed. Their number is four and a half lakhs, among whom 2.25 lakh are added later on. The true ones are 2.25 lakhs. This is why when Rudra Gyan Yagya used to be organized on the path of Bhakti, then a lakh, two lakh shaligrams used to be created. It is said on the path of Bhakti that the soul is like a thumb (angushth). So, they started making shaligrams in the shape of a thumb. That too of mud because the body of those who make purusharth is also made up of mud only.

But when God comes in the end of the Iron Age, in the beginning of the Golden Age in the Purushottam Sangamyug, then at that time the shooting period begins. Just as other founders of religions establish their religion and leave their bodies, similarly the Supreme Father Supreme Soul completes His task within hundred years, but it does not happen immediately. Mango tree cannot be grown on the palm. This is why there is little knowledge in the beginning period of the hundred years Purushottam Sangamyug. There isn’t complete knowledge of the soul, the Supreme Soul, the Supreme Father. This is why they fail. Yet, those who fail and are called Kshatriyas get the inheritance of the Father because when Brahmins leave their bodies, they will become Brahmins once again in the next birth. The fruits of the Godly studies do not go in vain. So, on the one hand they get the canopy of the Father. On the other hand, the purusharth like bow, which is called chaap; it is said on the path of Bhakti – Shankar chaap jahaaj, jehi chadh utrain paar nar. Boodhi sakal sansaar (Shankar is like a ship; human beings ride it to sail across. The entire world drowns). So, that soul of Shankar, Prajapita, who may be called Aadam, Aadi Dev, in whom Shiv enters in a permanent manner, He gives the inheritance of the Suryavanshi generation to those of His elder children who fail. Take this bow which holds the knowledge. Arrows are held on the bow, aren’t they? So, take this body like bow to make purusharth for the next birth. It was called a ship (jahaaj) as well as chaap. Make intense purusharth through that body. And the quiver (tarkash) of arrows of knowledge was also given in their intellect, the intellect like quiver was also filled with the arrows of knowledge, which are called Ram’s arrows because among those souls which get rebirth, among the Suryavanshis, who are called the first and foremost Brahmins of the Rudra Gyan Yagya, those Brahmins wear the sacred thread (yagyopavit) as well. Shankar is shown as the chief of Rudragans. Even in the pictures of Shankar, the memorial yagyopavit, janeu (sacred thread) is shown, isn’t it?

So, when they get next birth and enter the path of knowledge, then they also have kshaatra tej. They get the canopy of the highest on high Supreme Soul. And they also come with the body like bow of purusharth. For that it has been said to Arjun in the Gita – O Arjun! The one who earns the wealth of knowledge! Your body; call it body like boat, call it a bow, call it a ship, call it a kshetra (field); it is said,isn’t it? Dharmakshetre kurukshetre. So, there must be its seed as well, will it not be? So, that Mahabharata war is fought in the name of that seed soul. This is why the name has been coined as Mahabharata. Bha means the light of knowledge; rat means the one who remains engaged. The Chariot which remains engaged in the light of knowledge only, it has been said for that Chariot in the Gita itself – Idam shareeram kaunteya kshetram iti abhideeyate. (Gita 13/1) This body of yours is like a bow, isn’t it? It is a boat, isn’t it? It is a Chariot, isn’t it? This is a body like field of Yagya kund, a battle field. And it is also a field for the various rituals of various religions that have been emerging since many births from this field of dharmayuddh (war for dharma). So, they wage a lot of war of knowledge through that body like Chariot. Truth is called knowledge. Knowledge of truth itself is knowledge. Knowledge of untruth is not called knowledge. So, if you have to establish a land of truth, then the true knowledge of the world is required. The true knowledge of the Father who establishes the world is also required. And the true knowledge of the first and foremost Suryavanshi children is also required who establish the land of truth.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2458, आडियो 2944, दिनांक 16.03.2018
VCD 2458, Audio 2944, date 16.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2458-Bilingual

समय- 00.01-27.56
Time- 00.01-27.56


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. और पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – पहले-पहले जो रचना होती है वो ऐसे ही होती है ना। कौनसी रचना होती है पहले-पहले? इस संसार में, इस सृष्टि में पहले-पहले रचना कौनसी होती है? (किसी ने कहा – प्रकृति रचना होती है।) माँ रचना होती है। अरे! शिव बाप आते हैं तो पहले-पहले कौनसी रचना होती है? (किसी ने कुछ कहा।) परम; क्या? परमजम? परमब्रह्म? नहीं, वो तो नाम रखते हैं। नाम तो किसी देहधारी का ही रखा जाएगा। तो देहधारी पहले हुआ कि नाम पहले हुआ? हँ? बच्चा जन्म लेता है तो छठे दिन जब छठी होती है तो उसका नाम रखा जाता है। तो बच्चा पहले या नामधारी पहले? पहले कौन हुआ? बच्चा पहले हुआ। तो, माशूक की रचना करते हैं। अरे! आशिक माशूक तो दोनों एक जैसे होना चाहिए ना? हँ? तभी तो आशुक की और माशूक की चलेगी। एक चींटी जैसा हो, एक हाथी जैसा हो, ये आशिकी माशुकी कैसे चलेगी? नहीं चलेगी ना। तो वो स्वयं बिन्दु। हँ? और वो इस सृष्टि पर आता है तो उस बिन्दु रूप आत्मा को ढूंढता है जो अंतिम जनम में भी आत्मिक स्टेज में रहता है। क्या? प्रवेश करने से पहले। तो बिन्दु को तो रचना नहीं कहेंगे। रचना रचयिता तो साकार होते हैं।

तो वो जो सुप्रीम सोल, निराकार ज्योतिबिन्दु शिव, आत्माओं का बाप, सुप्रीम सोल आता है, तो नाम बताओ कौनसी रचना रचता है इस सृष्टि में? अरे? कुछ बुद्धि में नहीं आता। तीन मूर्तियों के साथ आता है। कितनी मूर्तियाँ? तीन मूर्तियाँ। वो रचना हो गई। क्या? किसकी रचना हो गई? नाम बताओ। नाम बताओ।
(किसी ने कुछ कहा।) शिव की रचना हो गई? शिव साकार है कि निराकार? शिव साकार है कि निराकार? शिव तो निराकार है। तो निराकार रचना रचयिता होते हैं? तो शिव की रचना कैसे हो गई? शिवबाबा। माना वो निराकार साकार में प्रवेश करता है, उसी समय क्या हो जाता है? हँ? साकार बन जाता है। क्या? जिससे प्यार किया जाता है, तो उसके मुआफिक बनना पड़े ना। हँ? नहीं बनना पड़े? तो वो जिससे प्यार करता है, आशिक बनकर, सुप्रीम सोल, इस सृष्टि पर कौनसे देश में आता है? भारत देश में आता है। तो भारत पर आशिक हुआ। भारत देश एक जड़ जमीन का भी नाम है। लेकिन वो तो चैतन्य आत्मा है सुप्रीम सोल। तो, इस जड़ जमीन में भी भारत देश में भी, जो चैतन्य आत्मा है विशेष पार्टधारी, हीरो पार्टधारी, जिसका नाम ही है भारत। क्या? भा माने? ज्ञान की रोशनी। रत माना लगा रहने वाला। वो आत्मा मन से, वचन से, कर्मेन्द्रियों के कर्म से इस सृष्टि पर जहाँ भी रहेगी जन्म लेते-लेते, क्या करेगी? ज्ञान की रोशनी में रत रहेगी, लगी रहेगी। तो ऐसी आत्मा का आधार लेता है। और आधार लेकर; वो आत्मा तीन मूर्तियों में विशेष आत्मा होगी या साधारण आत्मा होगी? हँ? जरूर विशेष आत्मा होगी तीन मूर्तियों के बीच। हाँ। जो गाया जाता है – ब्रह्मा की मूर्ति, विष्णु की मूर्ति, और शंकर का पार्ट बजाने वाली मूर्ति। ये तीन मूर्तिमान आत्माएं हैं सृष्टि के आदिकाल की।

तो बताया – पहले-पहले रचना भी ऐसी ही होती है, जैसा रचयिता होता है। तो इस सृष्टि में पहली-पहली रचना त्रिमूर्ति तो है। तीन मूर्तियों के साथ आता है। लेकिन उनमें भी तो कोई प्रामिनेन्ट मुख्य मूर्ति होगी ना। तभी तो, तभी तो कहा जाता है देव-देव-महादेव। ब्रह्मा देव, विष्णु देव, और फिर उनसे भी ऊँचे महादेव। तो जिस महादेव वाली आत्मा में पार्ट बजाने वाली देवआत्मा, महान आत्मा में वो मुकर्रर रूप से प्रवेश करता है, वो महान आत्मा कैसे कही जाए कि वो पहली रचना है तीन मूर्तियों में भी? तो ये तो पक्का है कि जब आता है तो जहाँ भी आता होगा, जिस देश में भी आता होगा, जिस शहर में भी आता होगा, शहर के जिस मकान में भी आता होगा, वो तीन मूर्तियाँ इकट्ठी तो जरूर होंगी। क्या? अकेला आता है कि आता है तो तीन मूर्तियां भी होती हैं? हँ? तीन मूर्तियाँ भी होती हैं। तीनों मूर्तियाँ होती हैं लेकिन वो आता कौनसी मूर्ति में है सबसे पहले? ऐसे तो नहीं तीनों मूर्तियों में इकट्ठा आता होगा। हँ? जब आता है तो अकेला नहीं होता। तीन मूर्तियाँ होती हैं। लेकिन कोई तो पहली-पहली प्रामिनेन्ट मूर्ति होगी ना जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करके पार्ट बजाए। हँ? तो जिसमें प्रवेश करता है वो है मनुष्य सृष्टि का बीज रूप बाप। क्या? मनुष्य सृष्टि का क्या? पहला ब्राह्मण। किसकी औलाद? हँ? ब्रह्मा। माने बड़ी अम्मा की औलाद। अब अम्मा ज्यादा बुद्धिमति होती है या बाप ज्यादा बुद्धिमान होता है? बाप ज्यादा बुद्धिमान होता है।

तो जिस पुरुष तन में प्रवेश किया, उसकी, उस पुरुष अर्थात् आत्मा की दो पत्नियाँ थीं। क्या? एक पहली-पहली पत्नी और दूसरी बाद में बनाई गई पत्नी। जैसे कहते हैं ना कलकत्ते में क्या खासियत बताई उस शहर की हिस्ट्री में? हँ? बताई कि बड़े विकारी होते हैं, वैश्यालय, वैश्य। विशियस कर्म करनेवाले। विषय-विकार का भोग किये बगैर रह नहीं सकते। तो उनका एक पत्नी से काम नहीं चलता। तो उस प्रसिद्ध वैश्यालय में, जो हिस्ट्री में कलकत्ता प्रसिद्ध रहा, वो दो प्रकार की होती थी पत्नियाँ। एक तो ओरिजिनल, पहले वाली। और दूसरी नंबर दो की। अव्वल नंबर और दूसरी नंबर। तो वो बाप की रचना हो गईं कि नहीं दोनों? क्या? रचना हुई कि नहीं? कृति हुई कि नहीं? कृति माने रचना। प्रकष्ट रचना। इस वसुधैव कुटुम्बकम् कहें, तो इस वसुधैव कुटुम्बकम् का जो बाप है, उसकी पहली-पहली रचनाएं उनका नाम पड़ा प्रकृति। और गीता में दो प्रकार की प्रकृति बताई गई। क्या-क्या? क्या-क्या? पराप्रकृति। परे ते परे स्टेज में रहने वाली, आत्मिक स्टेज वाली। और दूसरी अपराप्रकृति। नीचे की स्टेज। तो दो पत्नियाँ थीं, प्रजापिता को कहो, आदम को कहो, उस आदि देव कहो, उसको दो पत्नियाँ, उनमें एक अव्वल नंबर और एक बाद में बनाई गई दो नंबर की। वो भी सृष्टि के आदिकाल की बात है ना। तो, श्रीमत के अनुकूल ही होगा कि श्रीमत के प्रतिकूल होगा? हँ? अनुकूल ही होना चाहिए ना।

तो जो पहली पत्नी है वो स्वेच्छा से, क्योंकि उसमें पवित्रता के संस्कार ज्यादा हैं, आत्मा है ना। चैतन्य आत्मा है ना? चैतन्य प्रकृति और जड़त्वमयी प्रकृति। तो जो आत्मिक रूप में चैतन्य स्टेज वाली है, कौन-कौन हैं चैतन्य स्टेज वाली? हँ? इस शरीर में दो प्रकार की प्रकृतियाँ कौन सी हैं? बताओ-बताओ। अरे, एक और ले आओ ब्लैकबोर्ड। नहीं तो इधर-उधर छीनते रहते हैं। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, दो प्रकार की पत्नियाँ – एक प्रकृति, प्रकष्ठ कृति आत्मिक रूप में। और दूसरी कृति देह के रूप में। जैसे, शिव आया इस सृष्टि पर। तो प्रकष्ठ कृति कौन हुई? शिव ने जो इस सृष्टि पर आकर रचना की तो पहले-पहले किसकी रचना की? पहली-पहली रचना – प्र कृति। अव्वल नंबर पराप्रकृति। परे ते परे रहने वाली प्रकृति। माने इस सृष्टि में जो भी प्राणीमात्र आत्माएं हैं उनमें सबसे परे रहने वाली। कौन? मनुष्य सृष्टि में जो बीज रूप बाप है, उसकी परे ते परे रहने वाली रचना, कृति कौन हुई?
(किसी ने कुछ कहा।) नहीं। लक्ष्मी। वो परे ते परे स्टेज वाली इसलिए है कि वो महागौरी का पार्ट बजाने वाली है। साधारण गोरा पार्ट नहीं बजाती है। 84 जन्म एक ही पार्टधारी आत्मा के साथ उसका देह का संबंध पत्नी के रूप में बनता है। क्या? सामान्य बात है? ये कोई सामान्य बात नहीं है। तो एकदम शुद्ध आत्मा। तो पराप्रकृति हो गई कि नहीं? प्र माने प्रकष्ठ। कृति माने रचना। रचना कैसे? किसने रची?

शिव आता है तो जिसको अपनी प्रकृति बनाता है पहली-पहली देव-देव-महादेव रूपी मूर्तिमान आत्मा को, तो उसमें दोनों ही हैं। शरीर भी है और आत्मा भी है। और वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर दोनों ही सदाकाल रहकरके पार्ट बजाने वाली आत्मा है। आत्मा है। शरीर भी है और आत्मा भी है। तो आत्मा हो गई पराप्रकृति शिव की। पराप्रकृति कैसे? कृति कैसे? हँ? कृति माने रचना। रचना रचने का तो टाइम होता है। तो क्या आत्मा की रचना रची जाती है? हँ? आत्मा की तो रचना नहीं। आत्मा अनादि है या कोई टाइम पर रची जाती है? हँ? अनादि है। तो फिर वो कृति कैसे हो गई? रचना कैसे हो गई? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। पहले तो उस मनुष्य सृष्टि में जब सुप्रीम सोल शिव आता है तो किसी को अपनी आत्मा के स्वरूप का परिचय ही नहीं है। होता है? तो जैसे कि है ही नहीं। है या नहीं है? मनुष्य क्या समझते हैं अपन को? देह समझते हैं। देह का पार्ट बजाने वाला व्यक्तित्व बताय देते हैं। राजा हूँ, रंक हूँ, हँ? बडा नेता हूँ, बड़ा धर्माचार्य हूँ। कुछ भी बताय देते हैं। देह का नाम बताते हैं। आत्म का रूप-स्वरूप का किसी को पता ही नहीं। तो वो जब आता है तो जिसे अपनी प्रकष्ट कृति, रचना रूपी पत्नी बनाता है, वो पहली-पहली रचना है आत्मा। परिचय देता है ना। तो जन्म हुआ कि नहीं? हँ? तो जो जन्म हुआ आत्मा का, वो प्रजापिता वाली आत्मा अपन को समझती है कि मैं आत्मा हूँ। ये प्रकष्ट रचना हो गई ऊपरवाले की। और वो आत्मा को आधार चाहिए कि नहीं? तो शरीर रूपी आधार। जो शरीर है पाँच तत्वों का बना हुआ पुतला वो हो गई जडत्वमयी रचना। क्या? कैसी रचना? जडत्वमयी रचना। माना जो शरीर है वो पाँच जड़ तत्वों से बना हुआ है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। ये है अपराप्रकृति। नीची प्रकृति।

तो, ये दोनों का मेल कब होता है? मेल तब होता है जब परमपुरुष इस सृष्टि पर आकरके फिदा होता है। जिस पर फिदा होता है वो है माशूक। सिर्फ आत्मा है कि देह भी है? हँ? दोनों है। तो आत्मा भी है, और आत्मा का वो जो बाद में तैयार होता है; हँ? सात्विक चोला सृष्टि के आदि में, वो सात्विक चोला भी है, पाँच जड़ तत्वों का बना हुआ। माने सृष्टि के आदि से ही वो जो शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है, उसमें आत्मा भी है जो इस सृष्टि पर परमपुरुष कहा जाता है। कैसा पुरुष? परम। माने परे ते परे इस सृष्टि में रहकरके पार्ट बजाने वाली आत्मा, परमपुरुष। हँ? और उसका चोला। शरीर रूपी चोला पांच तत्वों का। वो चोला भी आत्मा ही तो धारण करती है। हँ? तो जो आत्मा धारण करती है, वो दो प्रकार का चोला है। एक ज्ञानेन्द्रियों का; क्या? ये आँख है, कान है, मुख है, स्पर्श इन्द्रिय है, तो इन ज्ञान इन्द्रियों का चोला। जो ज्ञान को ग्रहण करने वाली हैं। देवात्माएं। ज्ञान को कौन ग्रहण करती हैं? देवात्माएं या राक्षसी आत्माएं? देवात्माएं। वो ही देवात्माएं मनन-चिंतन-मंथन करने वाली द्वापर से मनुष्यात्माएं बनती हैं।

तो शिव ने आकरके ऐसे व्यक्तित्व को अपनी प्रकृति बनाया जिसमें चैतन्यता भी है, चैतन्य प्रकृति भी है – पराप्रकृति; और जड़त्वमयी प्रकृति भी है कर्मेन्द्रियों वाली। क्या? कर्मेन्द्रियों को कहेंगे भ्रष्ट इन्द्रियों वाली। तो जो भ्रष्ट इन्द्रियां हैं, वो भ्रष्ट इन्द्रियां भी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पैदा करने वाली हैं। तो इसलिए शास्त्रों में कथा बनाय दी। कश्यप ऋषि और उनकी दो पत्नियाँ। काश्य कहते हैं तेज को। योग बल का तेज। प माने पीने वाला। क्या? कौन हुआ कश्यप? जो योगबल का इस संसार में सबसे जास्ती तेज पीने वाला है, उसका नाम रख दिया कश्यप ऋषि। और उसकी दो पत्नियाँ दिखा दी। प्रकृति। प्रकष्ठ कृति के रूप में दो पत्नियाँ। एक अव्वल नंबर, एक दो नंबर की। अव्वल नंबर की जो प्रकृति हुई वो ही परा प्रकृति जो गीता में बताई गई। और दो नंबर की जो प्रकृति हुई वो ही वो कर्मेन्द्रियों का खेल खेलती है। है ना? पांच विकारों को उत्पन्न करने वाली है। तो वो दो प्रकृति हो गई एक पुरुष की इस सृष्टि में। जो इस सृष्टि में प्रैक्टिकल पार्ट बजाने वाली ये तीन आत्माएं हो गईं। क्या? तीन मूर्तियाँ हो गई ना। कि एक ही मूर्ति? तीन मूर्तियाँ। एक मार्ग का नाम जो महान ते महान है उसका नाम रखा महादेव। और दो का नाम भी रखा। एक का नाम ब्रह्मा – स्थापना करने वाला। ब्राह्मण बनाता है। क्या बनाता? ब्राह्मण की स्थापना करता है, ब्राह्मणों की। देवता नहीं बनाता। लेकिन जो दूसरी प्रकृति है; क्या? चैतन्य ज्ञानइन्द्रियों वाली, वो क्या करती है? हँ? समझदार इन्द्रियाँ हैं ना। तो उनका संघात जो पराप्रकृति है, वो क्या करती है? ब्राह्मणों को देवता बनाय देती है। निर्विकारी देवता। ब्राह्मण नौ कुरियों के होते हैं। उनमें विकारी भी होते हैं और नंबरवार निर्विकारी भी होते हैं। तो तीन मूर्तियाँ जो हैं वो पहली-पहली रचना हो गई।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. And the topic being discussed in the beginning of the middle portion of the first page was – The first and foremost creation is like this only, isn’t it? Which creation is first and foremost? In this world, which is the first creation?
(Someone said – Nature is the creation.) The mother is the creation. Arey! When Father Shiv comes, then which creation is done first and foremost? (Someone said something.) Param; what? Paramjam? Parambrahm? No, that is a name coined. It is a bodily being only who will be named. So, is it a bodily being first or the name first? Hm? When a child is born, then on the sixth day called chhathi, he/she is named. So, is the child first or is the named person first? Who is first? The child is first. So, the beloved (maashook) is created. Arey, the lover and beloved should be alike, shouldn’t they? Hm? Only then will the lover and beloved get along. If one is like an ant, and one is like an elephant, then how will this love continue? It will not continue, will it? So, he is himself a point. Hm? When He comes in this world, then He searches for that point form soul, which remains in a soul conscious stage in the last birth as well. What? Before entering. So, point will not be called creation. Creation and creator are in corporeal form.

So, when that Supreme Soul, the incorporeal point of light Shiv, the Father of souls, the Supreme Soul comes, then tell the name of the creation that He creates in this world? Arey? Nothing comes to your intellect. He comes with three personalities. How many personalities? Three personalities. They are the creations. What? Whose creation are they? Tell the names. Tell the names.
(Someone said something.) Are they the creation of Shiv? Is Shiv corporeal or incorporeal? Is Shiv corporeal or incorporeal? Shiv is incorporeal. So, are the creation and creator incorporeal? So, how can there be a creation of Shiv? ShivBaba. It means that when that incorporeal enters in a corporeal, then what does He become at that very time? Hm? He becomes corporeal. What? One has to become like the one whom we love, will we not? Hm? Will we not have to become? So, the one whom He loves as the lover, in which country of this world does the Supreme Soul enter? He comes in India. So, He became the lover of Bhaarat (India). Bhaarat is the name of the non-living land also. But that Supreme Soul is a living soul. So, in this non-living land also, in India also the living soul, the special actor, the hero actor, whose name itself is Bhaarat. What? What is meant by ‘bha’? The light of knowledge. 'Rat' means the one who remains engaged. Wherever that soul remains in this world through mind, words, actions of the organs of action while getting rebirths, what will it do? It will remain busy in the light of knowledge. So, He takes the support of such soul. And after taking support; will that soul be a special soul among the three personalities or will it be an ordinary soul? Hm? Definitely it will be a special soul among the three personalities. Yes. It is sung – Personality of Brahma, personality of Vishnu, and the personality that plays the part of Shankar. These three personified souls are from the initial period of the world.

So, it was told that first of all the creation is also in the same way as the creator. In this world, the first and foremost creation is Trimurti. He comes with the three personalities. But even among them someone must be a prominent main personality. Only then, only then is he called Dev-Dev-Mahadev. Brahma Dev, Vishnu Dev and then Mahadev, who is higher than them. So, the soul of Mahadev, the deity soul, the great soul in whom He enters in a permanent manner, how can it be said that that great soul is the first creation among the three personalities? So, it is sure that when He comes, then wherever He must be coming, in whichever country He must be coming, whichever city He must be coming, in whichever house of that city He must be coming, those three personalities will definitely gather there. What? Does He come alone or are the three personalities also present when He comes? Hm? The three personalities are also present. The three personalities are present, but in which personality does He come first of all? It is not as if He comes in all the three personalities simultaneously. Hm? When He comes, He is not alone. The three personalities are there. But there must be a first and foremost prominent personality in which He enters in a permanent manner and plays His part. Hm? So, the one in whom He enters is the seed form Father of the human world. What? What is he in the human world? The first Brahmin. Whose child? Hm? Brahma. It means the child of the senior mother. Well, is the mother more intelligent or the Father more intelligent? The Father is more intelligent.

So, the male body in which He enters, that purush, i.e. soul had two wives. What? One is the first and foremost wife and then the wife adopted later on. For example, it is said that in Calcutta; what is the specialty of that city in the history? Hm? It was told that they are very vicious; vaishyalay (brothel), vaishya. Those who perform vicious actions. They cannot live without enjoying the vices. So, they cannot be satisfied with one wife. So, in that famous brothel, which was famous as Calcutta in the history, there used to be two kinds of wives. One is the original, the first one. And the second is number two. Number one and number two. So, were both of them the creation of the Father or not? What? Are they creation (rachnaa) or not? Are they creation (kriti) or not? Kriti means creation. Special creation. If it is called Vasudhaiv Kutumbkam, then the Father of this vasudhaiv kutumbkam (one world family), the name of his first and foremost creations was coined as Prakriti. And two kinds of Prakriti were mentioned in the Gita. Which ones? Which ones? Paraaprakriti. The one who remains in the highest stage, in a soul conscious stage. And the other is Aparaprakriti. Low stage. So, there were two wives of Prajapita, you may call him Aadam, call him Aadi Dev; he had two wives, one is number one and one was adopted later on, the number two. That is also the topic of the beginning of the world, isn’t it? So, will it be in accordance with Shrimat or will it be against Shrimat? Hm? It should be in accordance with Shrimat only.

So, the first wife voluntarily, because she has more sanskars of purity, she is a soul, isn’t she? She is a living soul, isn’t she? Living Prakriti and non-living Prakriti (nature). So, the one who is in a living stage in soul form; who all are in a living stage? Hm? Who are the two kinds of Prakritis in this body? Speak up, speak up. Arey, bring another black board. Otherwise, they keep on snatching.
(Someone said something.) Yes, two kinds of wives – One is Prakriti, special creation in a soul form. And the other creation is in the form of a body. For example, Shiv came to this world. So, who is the special creation? Shiv came in this world and created creation; so, whom did He create first and foremost? First and foremost creation – Pra Kriti. Number one Paraaprakriti. The Prakriti who remains in the highest stage. It means that she is in a higher stage than all the living souls in this world. Who? Who is the highest creation of the seed form Father in the human world? (Someone said something.) No. Lakshmi. She is in the highest stage because she plays the part of Mahagauri (the fairest one). She does not play an ordinarily fair part. For 84 births she develops physical relationship with only one actor soul in the form of a wife. What? Is it an ordinary matter? It is not an ordinary topic. So, completely pure soul. So, is she Paraaprakriti or not? Pra means prakashth (special). Kriti means creation. How is she a creation? Who created?

When Shiv comes, then the one whom He makes His first and foremost Prakriti Dev-Dev-Mahadev personified soul, so, both are in him. There is body as well as soul. And both of them play part on this world stage forever. There is soul. There is the body as well as the soul. So, the soul is the Paraaprakriti of Shiv. How is it the Paraaprakriti? How is it the kriti (creation)? Hm? Kriti means creation. There is time to create creation. So, is a soul created? Hm? A soul is not created. Is a soul eternal (anaadi) or is it created at any time? Hm? It is eternal. So, then how is it a creation? How is it a creation? Hm?
(Someone said something.) Yes. Firstly, when the Supreme Soul Shiv comes in that human world, then nobody knows about the form of his/her soul. Does anyone know? So, it is as if they do not know at all. Do they know or do they not? What do human beings consider themselves to be? They consider themselves to be a body. They describe themselves as a personality which plays the part of a body. I am a king; I am a pauper; hm? I am a big leader. I am a big religious leader. They say anything. They tell the name of the body. Nobody knows about the form of the soul at all. So, when He comes, then the one whom He makes His special creation, creation like wife, that first and foremost creation is soul. He gives the introduction, doesn’t He? So, did he get birth or not? Hm? So, the soul was born. That soul of Prajapita considers itself to be a soul that I am a soul. This is the special creation of the above one (God). And does that soul need a base (aadhaar) or not? So, the body like base. The body made up of the five elements is the inert creation. What? What kind of a creation? Inert creation. It means that the body is made up of the five elements. Earth, water, air, fire, sky. This is Aparaaprakriti. Lower prakriti.

So, when do both of them meet? They meet when the Parampurush comes in this world and loses his heart to him. The one to whom He loses His heart is the beloved (maashook). Is he just a soul or a body as well? Hm? He is both. So, there is soul also; and that of the soul which gets ready later on; hm? The pure body in the beginning of the world, he is the pure body as well made up of the five inert elements. It means that from the beginning of the world itself the one who is worshipped in the form of a Shivling, contains a soul also, who is called Parampurush in this world. What kind of Purush? Param (supreme). It means the soul which plays the highest part while living in this world, the Parampurush. Hm? And his body. The body like dress made up of five elements. It is the soul which assumes that body as well. Hm? So, the dress that a soul assumes is of two kinds. One is of the sense organs; what? These eyes, ears, mouth, organ of touch, so, the body made up of these sense organs which receive knowledge. The deity souls. Who receives the knowledge? The deity souls or the demoniac souls? The deity souls. The same deity souls, which think and churn, become human souls from the Copper Age.

So, Shiv came and made such personality as His Prakriti, which has life (chaitanyata), he is a living nature (chaitanya prakriti) also – Paraaprakriti; and he is inert nature (jaratwamayi prakriti) also having organs of action. What? The organs of action will be called the one which are unrighteous. So, the unrighteous organs also cause lust, anger, greed, attachment, ego to emerge. So, this is why a story has been made in the scriptures. Sage Kashyap and his two wives. Lustre is called kaashya. The lustre of the power of Yoga. Pa means the one who drinks (peeney vaala). What? Who is Kashyap? The one who drinks the lustre of the power of Yoga the most was named sage Kashyap. And he was shown to have two wives. Prakriti. Two wives in the form of special creation. One is number one, one is number two. The number one Prakriti is the Paraaprakriti which has been described in the Gita. And the number two Prakriti plays the game of the organs of action. Isn’t it? She gives rise to the five vices. So, these are the two Prakritis of one Purush in this world. They are the three souls which play a practical part in this world. What? These are the three personalities, aren’t they? Or is there only one personality? Three personalities. The name of one path which is the greatest of all was named Mahadev. And the other two were also named. Name of one is Brahma, the one who causes establishment. He creates Brahmins. What does he create? He establishes the Brahmins. He does not make deities. But the other Prakriti; what? The one with living sense organs; what does she do? Hm? These are the sensible organs, aren’t they? So, what does their collection, i.e. Paraaprakriti do? She transforms the Brahmins to deities. Viceless deities. Brahmins belong to nine categories. They include vicious ones as well as numberwise viceless ones. So, there are three personalities who are the first and foremost creation.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 27 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2459, आडियो 2945, दिनांक 17.03.2018
VCD 2459, Audio 2945, Date 17.03.
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2459-Bilingual

समय- 00.01-17.04
Time- 00.01-17.04


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – ये ब्रॉड ड्रामा के शूटिंग पीरियड में, जिसे संगमयुग कहा जाता है, वहाँ शिव बाप आकरके ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों की रचना रचते। जो है ब्राह्मण सो ही देवता बनते हैं। शूटिंग पीरियड में ही चारों वर्णों से पसार होते हैं नंबरवार। तो त्रेता की भी शूटिंग होती है, देवता से क्षत्रीय बनते। फिर द्वापरयुग की भी शूटिंग होती है तो क्षत्रीय सो वैश्य बनते हैं। विषियस बन जाते हैं। फिर कलियुग की भी शूटिंग होती है तामसी स्टेज की तो वैश्य सो फिर शूद्र बन जाते हैं। इसलिए बोला गीता में – चातुर्वण्यम् मयासृष्टम् गुणकर्मविभागशः। (गीता 4/13) गुणों के आधार पर जो ब्राह्मण जितने जो गुण धारण करते हैं, उनके कर्मों के आधार पर, जैसे कर्म करते हैं, सतोप्रधान, सतोसामान्य, रजो और तमो, तो वैसे-वैसे वर्ण में चले जाते। तो ये सृष्टि चार अवस्थाओं से पसार होती ही है। दुनिया की हर चीज़ चार अवस्थाओं से पसार होती है क्योंकि इस सृष्टि में प्रकृति की प्रधानता है। हँ? और प्रकृति जरूर चार अवस्थाओं से पसार होती है। सत्वप्रधान, सत्वसामान्य, रजोप्रधान, तमोप्रधान। बाबा, जिन्हें साकार निराकार का मेल कहा जाता है, निराकार आत्माओं का बाप और साकार मनुष्य सृष्टि का बाप आदम, एडम, उसमें प्रवेश करते हैं।

तो, जो देवता धर्म की आत्माएं हैं वो साकार को ही सब कुछ समझ के बैठ जाती। इसलिए मुसलमान कहते हैं - आदम को खुदा मत कहो, आदम खुदा नहीं, लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं। नूर क्या है? पवित्रता का नूर है। तो, कलियुग के अंत में संगमयुग में शूटिंग काल में जब सुप्रीम सोल बाप आते हैं तो शूद्र जो हैं, जो क्षुद्र कर्म करने वाले हैं, नीच कर्म करने वाले, दुःखदायी कर्म करने वाले, उनको शूद्र से फिर ब्राह्मण बनाते हैं। पहली मशीनरी है शूद्र से ब्राह्मण बनाने की ब्रह्मा द्वारा। फिर, जब ब्राह्मण नंबरवार तैयार हो जाते हैं नौ कुरियों के, शूटिंग हो जाती है, तो फिर जो ब्राह्मण बने हैं पक्के-पक्के, उन ब्राह्मणों को सतयुग के देवता बनने काबिल बनाते हैं। इसलिए बोला कि मैं चार वर्णों की रचना करता हूँ संगम में। जिनको लंबे समय तक सुखदायी देवता का पार्ट बजाना है वो देवता हो गए। जिनको क्षात्र तेज धारण करना है, भगवान की छत्रछाया जिनके ऊपर रहती है, क्योंकि वो, जो सत नहीं हैं, झूठ हैं, कुछ न कुछ नंबरवार उनसे युद्ध करते रहते हैं। तो युद्ध करने वालों को तो ताकत चाहिए ना। तो उनको क्षात्र तेज की ताकत मिलती है। मिलती ही रहती है। चारों युगों में ताकत मिलती है। टकराते रहते हैं।

तो बताया, पक्के-पक्के ब्राह्मण सो देवता बनते हैं, फिर थोड़ी ऊँची कैटागरी के क्षत्रीय बनते हैं, फिर शूद्र बनते हैं, क्षत्रीय से वैश्य बनते हैं, वैश्य से शूद्र। तो ये सारा सृष्टि का चक्र चार अवस्थाओं से घूमता रहता है। नाम दे दिया है स्वदर्शन चक्र। स्व माने आत्मा, दर्शन माना देखना कि आत्मा सतयुग से कलियुग के अंत तक नंबरवार कैसे चौरासी के चक्र में पार्ट बजाती है। देखो, ये चक्कर को याद करने से तुम मीठे-मीठे लाडले बच्चे चक्रवर्ती बन जाते हो। विश्व के महाराजा, विश्व के मालिक बनते हो। और बाप भी कहते हैं – बच्चे, तुम ये बात सुनते हो कि हम तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं? कैसे बनाते हैं? हँ? आकरके तुम्हारा असली परिचय तुमको देते हैं कि तुम क्या हो। जैसे दुनिया समझती है कि हम देह हैं, तुम भी समझते थे हम देह, पांच जड़ तत्वों से बनी हुई देह, पंच भूतों से बनी हुई। भौतिकवादी दुनिया के प्रभाव में तुम आ गए थे। तो पहले-पहले तुमको परिचय देता हूँ कि तुम आत्मा हो ज्योतिबिन्दु। क्या? जिस आत्मा की ज्योति तुम्हारी आँखों से निकल रही है। आत्मा निकल जाती है तो आँखें निर्जीव जैसी हो जाती हैं, बटन जैसी हो जाती। तुम्हारी आत्मा बिन्दु भी है, अति सूक्ष्म भी है और ज्योति स्वरूप भी है।

तो ये आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जब आत्मलोक से आती है, सोलवर्ल्ड से, तो चार अवस्थाओं में पसार होती है। चाहे वो कोई युग में आए, उसे चार अवस्थाओं से पसार जरूर होना पड़ेगा। तो ये सारे चक्कर को तुम बच्चे याद करते हो इसलिए बाप कहते हैं - तुम सुनते हो कि तुमको हम तुम्हारे असली स्वरूप का परिचय देकर विश्व का मालिक बनाते हैं? तुम अपनी आत्मा को याद करते हो और देह को भूलते हो, देह के पदार्थों को भूलते हो, देह के संबंधियों को भूलते हो। अपनी ज्योतिबिन्दु आत्मा के स्वरूप में स्थिर होते हो तो तुम्हें आत्मा रूपी रिकार्ड के अनेक जन्मों का पता लग जाता है। या जो आत्मा जितने जन्म लेने वाली है उसको अपने पार्ट का पता लगता है। तुम सारे विश्व के मालिक बनते हो। क्या? जो सतयुग में देवताएं होंगे वो सतयुग के मालिक बनेंगे। वो विश्व के मालिक नहीं कहे जाएंगे। क्यों? क्यों नहीं कहे जाएंगे? क्योंकि; हँ? क्योंकि विश्व में जो जनसंख्या है, विश्व धर्मों की जनसंख्या, वो 500-700-750 करोड़ है, मनुष्यों की। तो तुम विश्व के मालिक बनते हो, विश्व के बादशाह बनते हो क्योंकि तुम आत्मिक स्मृति में पक्के-पक्के हो जाते हो। इसीलिए विश्व की सभी आत्माओं को आत्मिक रूप में देखते हो। आत्मा-आत्मा भाई-भाई। तुम्हारी बुद्धि जो है अलगाववादी नहीं बनती है। क्या? अलगाव कर देते हैं ना। ये नहीं समझते हैं कि एक बाप के बच्चे हैं मूल रूप में। हँ? मूल रूप है आत्मिक रूप। तो आत्मिक रूप में सब एक शिव बाप के सुप्रीम सोल गॉड फादर के बच्चे हैं। यही असलियत है। यही बुद्धि में रहना चाहिए। लेकिन नंबरवार हैं।

जितनी-जितनी बुद्धि नीच बनती है, क्योंकि ज्ञान पूरा उठाते नहीं ईश्वर का। तो क्षुद्र बुद्धि बनते जाते हैं। शूद्रों की ओर जाते हैं। तो अलगाववादी बनते जाते हैं। बनना चाहिए विश्व का मालिक। और तुम बनते हो। मैं मालिक नहीं बनूंगा। हँ? क्यों? ऐसी क्या बात हो गई? क्यों नाराज़ हो गए? किसने बोला – मैं मालिक नहीं बनूंगा? सुप्रीम सोल शिव ने बोला, जो आत्म लोक का रहवासी है। इस सृष्टि पर कलियुग के अंत में ही आता है, नई सतयुगी दुनिया की सृष्टि रचने, पुरानी दुनिया का विनाश करने और जो नई सृष्टि में पक्के-पक्के आत्मिक स्थिति वाले तैयार होते हैं उनके हाथों विश्व की बादशाही देने। तो कहते हैं कि मैं अगर मालिक बनके बैठूं तो फिर मुझे भी इस दुनिया में हराना पड़ेगा। हँ? कलियुग अंत में जैसे तुम हार जाते हो संग के रंग में आते-आते, मुझे भी हारना पड़ेगा। और मैं हार जाऊँगा तो फिर तुमको आत्मिक स्थिति में कौन स्थिर कराएगा? इसलिए मेरा पार्ट है; क्या? कि मैं विश्व का मालिक नहीं बनता हूँ।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the first page was – In this shooting period of the broad drama, which is called the Confluence Age (Sangamyug), Father Shiv comes and creates Brahmins through Brahma. Those who are Brahmins become deities. In the shooting period itself they pass through all the four classes numberwise. So, the shooting of the Silver Age also takes place; they become Kshatriyas from deities. Then, when the shooting of the Copper Age also takes place, then they become Vaishyas from Kshatriyas. They become vicious. Then the shooting of the Iron Age, of the degraded stage also takes place; then you become Shudras from Vaishyas. This is why it has been said in the Gita – Chaaturvarnyam mayaasrishtam gunkarmavibhaagashah. (Gita 4/13) On the basis of the virtues, whatever virtues the Brahmins inculcate, on the basis of their actions, as are the actions they perform, satopradhan, satosaamaanya, rajo and tamo, so are the classes that they get birth in. So, this world definitely passes through four stages. Everything in the world passes through four stages because there is a dominance of Prakriti in this world. Hm? And Prakriti definitely passes through four stages. Satwapradhan, satwasaamaanya, rajopradhan, tamopradhan. Baba, who is called the combination of corporeal and incorporeal, the Father of incorporeal souls and the Father of the corporeal human world, Aadam, Adam; He enters in him.

So, the souls belonging to the deity religion consider the corporeal to be everything. This is why the Muslims say – Do not call Aadam as Khuda (Allah), Aadam is not Khuda, but Aadam is not separate from the light of Khuda. What is light? It is the light of purity. So, in the end of the Iron Age, in the Confluence Age, during the shooting period, when the Supreme Soul Father comes, then the Shudras, who perform lowly (kshudra) actions, perform lowly actions, perform actions that cause sorrows, they are then transformed from Shudras to Brahmins. The first machinery is to make Brahmins from Shudras through Brahma. Then, when numberwise Brahmins of nine categories get ready, when their shooting (rehearsal) is completed, then all those who have become firm Brahmins, those Brahmins are made worthy of becoming deities of the Golden Age. This is why it has been said – I create four classes in the Confluence Age. Those who have to play the part of deities who give happiness are the deities. Those who have to assume the lustre of Kshatriyas (kshaatra tej) and are protected by the canopy of God because they keep on fighting numberwise with those who are not true, who are false to some extent or the other. So, those who fight require strength, don’t they? So, they get the power of kshaatra tej. They keep on getting it. They get the strength in all the four Ages. They keep on clashing.

So, it was told, you become deities from firm Brahmins, then you become Kshatriyas of a slightly higher category, then you become Shudras, then you become Vaishyas from Kshatriyas, then Shudras from Vaishyas. So, this entire cycle of world keeps on revolving through four stages. The name coined is Swadarshan Chakra. Swa means soul; darshan means to see that how the soul plays its part from the Golden Age to the end of the Iron Age numberwise in the cycle of 84 births. Look, by remembering this cycle (chakkar), you sweet-sweet, lovely children become Chakravartins (conquerors of all the directions). You become emperors of the world, masters of the world. And the Father also says – Children, do you listen to this topic that I make you masters of the world? How do I make? Hm? I come and give you your true introduction that what you are. Just as the world thinks that we are bodies, you also used to think that we are bodies made up of the five inert elements, five elements. You had come under the effect of the materialistic world. So, I first of all give you the introduction that you are a point of light soul. What? The light of that soul is shining through your eyes. When the soul departs, then the eyes become lifeless, like buttons. Your soul is also a point; it is very subtle as well as light form.

So, when the soul comes from the aatmalok, i.e. the Soul World to this world stage, then it passes through four stages. It may come in any Age, it will have to definitely pass through four stages. So, you children remember this entire Cycle; that is why the Father says – Do you hear that I give you the introduction of your true form and make you the master of the world? You remember your soul and forget the body, forget the things related to the body, forget the relatives of the body. When you become constant in the point of light soul, then you get to know the many births of the soul like record. Or the soul gets to know about its part of whatever number of births it is going to get. You become the masters of the entire world. What? The deities in the Golden Age will become masters of the Golden Age. They will not be called the masters of the world. Why? Why will they not be called? Because; hm? It is because the population of the world, the population of the world religions, is 500-700-750 crore human beings. So, you become the masters of the world, emperors of the world because you become firm in the awareness of the soul. This is why you see all the souls of the world in a soul form. Souls are brothers. Your intellect does not become separatist (algaavvaadii). What? People indulge in separatism (algaav), don’t they? They do not understand that they are children of one Father originally. Hm? The original form is soul form. So, in soul form all are children of one Father Shiv, Supreme Soul God Father. This is the truth. This is what should remain in the intellect. But you are numberwise.

The lower the intellect becomes, because they do not grasp the knowledge of God completely. So, they go on developing a lowly intellect (kshudra buddhi). They go towards the Shudras. So, they go on becoming separatists. You should become master of the world. And you become. I will not become a master. Hm? What happened? Why did He become angry? Who said – I will not become Master? Supreme Soul Shiv, who is a resident of the Soul World, said. He comes only in the end of the Iron Age to this world to create a new Golden Age world, to destroy the old world and to give the emperorship of the world in the hands of those who get ready with firm soul conscious stage in the new world. So, He says that if I become a Master, then I will also have to suffer defeat in this world. Hm? In the end of the Iron Age, just as you suffer defeat while getting coloured by company, I will also have to suffer defeat. And if I suffer defeat then who will make you constant in soul conscious stage? This is why it is My part; what? That I do not become the master of the world.

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