Q&A: PBK Murli discussions

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 24 Apr 2010

वार्तालाप नं.474, ताडेपल्लिगुडम, दिनांक 28.12.07

समयः 00.00-1.45
जिज्ञासु-बाबा, अभी हमको संगमयुग में स्‍वंय भगवान बाप के रूप में, टीचर के रूप में, सदगुरू के रूप में पढ़ाता है करके हमको कैसे पता चलेगा?

बाबा- कि बाप हमको पढ़ाता है?
जिज्ञासु- हाँ।
बाबा- जो बाप है सारी सृष्टि का बाप है ना। कि दो, चार, आठ, सौ, दो सौ, करोड़, दो करोड़, दो-पांच सौ का बाप है। सबका बाप है। तो जो सबका बाप है और वो हमको पढ़ाता है बेहद का बाप। और हम ये कहें कि ये हमारा बाप है। तो कैसे पता चले ये हमारा बाप है। तो उसको पढ़ाई पढ़ाना शुरू कर दो। क्‍या? अगर उसको तुम पढ़ाई पढ़ाय लेते हो। या तुम्‍हारे मित्र, संबंधी उसको पढ़ाई पढ़ाय देवें। तो बाप नहीं है। अगर वो तुम्‍हारे मित्र संबंधियों को पढ़ाई पढ़ाय देवे परंतु उसको पढ़ाई न पढ़ा पावे। तो बाप है। जो सुप्रीम टीचर होगा उसका कोई टीचर होगा क्‍या? उसका कोई टीचर नहीं हो सकता।

समय- 01.52- 09.15
जिज्ञासु- बाबा दत्‍तात्रेय......

बाबा- दत्‍ता माना दिया हुआ और त्रे माना तीन का। दो शब्‍द हैं। दत्‍ता और त्रेय। माना तीन का दिया हुआ। दुनियाँ में कौन तीन मुख्‍य हैं? ब्रह्मा, विष्‍णु और शंकर। यज्ञ के आदि में वो तीन आत्‍मायें होती हैं। जिनके द्वारा त्रिमूर्ति बाप प्रत्‍यक्ष होते हैं। बाप अकेला नहीं आता है। तीन मूर्तियों के साथ आता है। उन तीन मूर्तियों के द्वारा जो दिया गया।

यज्ञ के आदि में बुद्धि ले जायें वो तीन मूर्तियाँ आदि में भी थीं और अंत में भी तीन मूर्तियाँ होंगी। जिनका गायन होगा- विश्‍व विजय करके दिखलावें। कौन? तीन मूर्तियों का यादगार जो तीन प्रकार का कपड़ा है। ब्रह्मा के रंग का हरा कपड़ा। विष्‍णु के रंग का सात्विक सफेद कपड़ा और शंकर के रंग का क्रांतिकारी लाल कपड़ा। कपड़ा माना? शरीर रूपी वस्‍त्र। नहीं तो कपड़े का झंडा विश्‍व विजय नहीं करता है। कोई तीन शरीर रूपी वस्‍त्र हुए हैं जिन्‍होंने सारे विश्‍व के ऊपर विजय पाई है। और उन तीन के पुरूषार्थ से जो नई दुनियाँ बनी उस नई दुनिया में राजा बनता है कौन? कृष्‍ण। तीन के पुरूषार्थ से जो भी नई दुनिया तैयार होती है सतयुग की। उसमें मुखिया कौन होता है? कृष्‍ण।

और यज्ञ के आदि में भी उन तीन मूर्तियों के द्वारा बाप प्रत्‍यक्ष होता है। भले बच्‍चे पहचाने या न पहचाने। तीन मूर्तियों के साथ आता है। और वो तीन मूर्तियाँ... उनकी देन क्‍या है? क्‍या देकरके चली जाती हैं। वो तीन मूर्तियाँ थीं जो सन् 47 तक कुछ देके चली गईं। किसको देके चली गईं? अरे! तीनों मूर्तियाँ सन् 47 से पहले चली गईं या नहीं चली गईं? उन तीन मूर्तियों के द्वारा त्रे दत्‍ता दिया हुआ। तो तीन मूर्तियाँ क्‍या देकर चली गईं यज्ञ में? अरे! कृष्‍ण को देकर चली गईं ना। ब्रह्मा को देकर चली गईं ना। तीन मूर्तियों के द्वारा सारा यज्ञ किसने सम्‍भाला? ब्रह्मा ने सम्‍भाला। माना कृष्‍ण की आत्‍मा ने सम्‍भाला।

सन् 47 में जो भी नई दुनियाँ का सैम्‍पल बना ब्राह्मणों की दुनियाँ में। उस नई दुनियाँ के सैम्‍पल को सम्‍भालने वाला मुखिया कौन था? ब्रह्मा। वो गुण धारण करता था या अवगुण धारण करता था? गुण धारण करता था। तो जो गुण ही धारण करे किसीके अवगुण धारण न करे उसका नाम क्‍या रख दिया है शास्‍त्रों में? दत्‍तात्रेय। तीन मूर्तियों के द्वारा दिया हुआ। वो कृष्‍ण का पार्ट दत्‍तात्रेय का पार्ट है संगमयुग में। जिसने सदैव गुणों को धारण किया। और कु‍त्‍तों को पालता था। क्‍या? दत्‍तात्रे के आस-पास कौनसे जानवर दिखाए जाते हैं? कुत्‍ते। कृष्‍ण और क्राईस्‍ट की राशि मिलाई जाती है। मिलाई जाती है कि नहीं? क्रिश्चियनस कौनसे जानवर को ज्‍यादा प्‍यार करते हुए देखे जाते हैं? कारों में लिए-2 फिरते हैं कुत्‍तों को। तो कुत्‍तों के अवगुण को नहीं देखा। जो द्वैतवादी दुनियाँ का बीज है।

कुत्‍ते में कौनसा विकार प्रधान होता है? काम विकार। और जब द्वैतवादी द्वापर की दुनियाँ, नर्क की दुनियाँ शुरू होती है। तो कौनसी आत्‍मा आती है जिससे काम विकार की दुनियाँ में शुरूवात हो जाती है? कामी इस्‍लामी। उन तीन श्रेष्‍ठ मूर्तियों के द्वारा दिया हुआ दत्‍तात्रेय उसको कामी कुत्‍तों ने घेर लिया। परंतु वो सबके गुण देखता रहा कोई के भी अवगुण नहीं देखे। इसीलिए वो गायन हुआ है। दत्‍तात्रेय। कोई भी हो, कैसा भी हो हमें उसके गुण देखने हैं अवगुणों की आँख बंद हो जाए।


Disc.CD No.474, dated 28.12.07 at Tadepalligudem
Extracts-Part-1


Time: 00.00-1.45
Student: Baba, how will we know that God Himself teaches us in the form of a Father, a teacher, and Sadguru in the Confluence Age?

Baba: That the Father teaches us?
Student: Yes.
Baba: The Father is the Father of the entire world, is not He? Or is He the Father of two, four, eight, hundred, two hundred, crore, two crores, two-five hundreds? He is the Father of everyone. So, the one who is everybody's Father, that unlimited Father teaches us. And if we say that He is our Father, then how will we know that He is our Father? So, start teaching Him. What? If you are able to teach Him or if your friends, relatives are able to teach Him, then He is not a Father. If He is able to teach your friends and relatives, but if nobody is able to teach Him, then He is the Father. Will the Supreme Teacher have a teacher? He cannot have any teacher.

Time: 01.52-09.15
Student: Baba Dattatrey....

Baba: Datta means 'given' and 'Treya' means 'by three'. There are two words. Datta and Treya. It means given by three. Who are the three main ones in the world? Brahma, Vishnu and Shankar. In the beginning of the Yagya those three souls are present through whom the Trimurti Father is revealed. The Father does not come alone. He comes with three personalities. [He is] the one, who was given by those three personalities.

If we take our intellect to the beginning of the Yagya, those three personalities were present in the beginning of the Yagya and the three personalities will be present in the end as well, [they are the ones] who will be praised as - the one who gain victory over the world. Who? The memorial of the three personalities in the form of the three kinds of clothes: green cloth representing Brahma's colour; pure white cloth representing Vishnu's colour and the revolutionary red cloth representing Shankar's colour. What does cloth mean? Cloth like body. Otherwise, a flag made of cloth does not gain victory over the world. There have been three cloth-like bodies which have gained victory over the entire world. And the new world that was established through the purusharth (special effort for the soul) of those three; who becomes a king in that new world? Krishna. Who is the chief in the Golden Age new world that is established through the efforts of the three? Krishna.

And in the beginning of the Yagya too, the Father is revealed through those three personalities, the children may or may not recognize Him. He comes with the three personalities. And those three personalities....what is their gift? What do they give and depart? There were those three personalities, who gave something until (19)47 and departed. What did they give and depart? Arey, did the three personalities depart before (19)47 or not? Trey, i.e. three, datta, i.e. given; given by those three personalities. So, what did the three personalities give to the Yagya and depart? Arey! They gave Krishna and departed, did not they? They gave Brahma and departed, did not they? Who took care of the Yagya through the three personalities? Brahma took care, i.e. the soul of Krishna took care.

The sample of new world that was prepared in the world of Brahmins in (19)47; who was the chief care taker of the sample of that new world? Brahma. Did he used to inculcate virtues or vices? He used to inculcate virtues. So, what was the one who inculcates only virtues, who does not inculcate anybody's vices, named in the scriptures? Dattatreya. The one, who was ‘given’ by the three personalities. That part of Krishna, that part of Dattatreya is played in the Confluence Age. The one who always inculcated virtues. And he used to sustain dogs. What? Which animals are shown around Dattatreya? Dogs. The horoscopes of Krishna and Christ are matched. Are they matched or not? Which animals are Christians seen to love more? They take dogs along with them in cars. So, he (Krishna) did not see the vices of dogs; the one who is a seed of the dualistic world.

Which vice is dominant in a dog? The vice lust. And when the world of dualistic Copper Age, the world of hell begins, which soul comes and introduces lust in the world? The lustful Islamic soul. Dattatreya, who was ‘given’ by those three righteous personalities, was surrounded by the lustful dogs. But he continued to see everybody's virtues, he did not see anybody's vices. This is why he is famous as Dattatreya. We should see the virtues of every person, however that person may be; the eyes that see vices should be closed.

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Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 25 Apr 2010

वार्तालाप नं.474, ताडेपल्लिगुडम, दिनांक 28.12.07
उद्धरण-भाग-२


समय- 09.20-22.40
जिज्ञासु- बाबा, संगमयुगी कृष्‍ण, सतयुगी कृष्‍ण कैसे पता पड़ेगा?

बाबा- जो कलियुगी कृष्‍ण होगा। जो गीता का भगवान बनकरके बैठ जाता है; लेकिन वास्‍तव में गीता का भगवान होता नहीं है। झूठी गीता, और झूठी गीता बनती है कृष्‍ण का नाम डालने से। एक कृष्‍ण की बात है या नम्‍बरवार सभी कृष्‍ण जैसे बच्‍चों की बच्‍चा बुद्धियों की बात है? नम्‍बरवार बच्‍चा बुद्धि रूपी कृष्‍ण हैं जो माताओं को अपनी मुठ्ठी में कर लेते हैं और उनको अंगुली के इशारे पर चलाते हैं।

आज घर-2 में यही हालत है। खुदा न ख्‍वास्‍ता पति शरीर छोड़ देता है। तो मातायें किसके अंडर में आ जाती हैं? बच्‍चों के अंडर में आ जाती हैं। बच्‍चे जैसे माता के पति बनकरके बैठ जाते हैं, मालिक बनकर बैठ जाते हैं। और ये परम्‍परा भारतवर्ष में 2500 साल तक चली है। परिवारों में माताओं को वर्सा नहीं मिला। वर्सा बच्‍चों को मिलता रहा क्‍योंकि बच्‍चे माताओं के पति बनकरके बैठ गए। और अभी भी घर-2 में बच्‍चे माँ को उंगली के इशारे पर नचाते हैं। और सारी प्रॉपर्टी के हकदार खुद बनकर बैठ जाते हैं। ये तो बाप है जबसे इस दुनियाँ में प्रत्‍यक्ष होता है तो बाप के आने से आज की गवर्मेन्‍ट ने भी ये नियम बनाया है कि माताओं को भी वर्सा मिलना चाहिए। तो माताओं को भी कानून बन गया है कि चाहे तो वो अपना वर्सा पारिवारिक वर्सा अपने हाथ में ले सकती है।

ये लौकिक दुनियाँ की बात नहीं है वास्‍तव में ये अलौकिक दुनियाँ की बात है। अलौकिक दुनियाँ में बाप प्रत्‍यक्ष हो चुका है मातायें जिनकी अपनी कोई परिवार में इच्‍छा नहीं रह जाती। वो चाहें तो स्‍वतंत्र होकरके अपना जीवन व्‍यापन कर सकती हैं। ईश्‍वरीय ज्ञान में चल सकती हैं। उनको उन कृष्‍ण बच्‍चों के अंडर में रहने की दरकार नहीं है। बाप का आसरा ले सकती हैं; परंतु बाप को पहचानेंगे तब। तो वो कृष्‍ण बच्‍चा है बच्‍चा बुद्धि। इसीलिए माता की कदर नहीं करता।

यज्ञ में भी यज्ञ के आदि में जो मातायें थीं उनकी कदर नहीं हुई और वो मातायें आज भी यज्ञ में पुरूषों के द्वारा चलाई जा रही हैं। इसीलिए अव्‍यक्‍त वाणी में इशारा भी दे दिया- पांडवों को शक्तियों का गार्ड बनकर रहना है। गार्ड दास को कहा जाता है, सेवक को कहा जाता है। पांडवों को शक्तियों का सेवक बनकरके रहना है, गार्ड बनकर रहना है। अगर पांडव शक्तियों को गाइडेन्‍स देने वाले गाईड बनेंगे, मालिक बनेंगे तो यज्ञ में गड़बड़ पड़ जावेगी। वो गड़बड़ी अभी यज्ञ में पड़ी हुई है। बेसिक में ही नहीं पड़ी हुई है। एडवांस में भी वो गड़बड़ी चल रही है।

यज्ञ के आदि में भी जिन कृष्‍ण बच्‍चों ने, बच्‍चा बुद्धियों ने, और कृष्‍ण बच्‍चे के फॉलोवर्स ने बाप को नहीं पहचाना तो बाप का तिरस्‍कार हो गया और बाप चला गया और मातायें बंधन में आ गईं। उन दुर्योधनों दु:शासनों ने भगवान बाप का तिरस्‍कार किया और कृष्‍ण बच्‍चे को गीता माता का भगवान बनाके बैठाए दिया। अब बच्‍चा क्‍या पढ़ाई पढ़ावेगा।

कृष्‍ण उर्फ ब्रह्मा बच्‍चा बुद्धि के रथ के द्वारा शिव बाप ने मुरली तो चलाई। उनकी आत्‍मा ने, उनके कानों ने सबसे पहले मुरली सुनी। किसने? ब्रह्मा उर्फ कृष्‍ण ने। मुरली सुनी और मुरली सुनाई; लेकिन न समझी और न समझाई। बच्‍चा बुद्धि सुन सकता है। सुने हुए को सुना सकता है; लेकिन भगवान बाप की वाणी की गहराई को समझ भी नहीं सकता और समझा भी नहीं सकता। परंतु ये शूटिंग हो जाती है जो भक्तिमार्ग में शूटिंग होती रही। सुनने सुनाने की शूटिंग होती रही भक्तिमार्ग वाली या शास्‍त्रों में जो लिखा है उसको समझने और समझाने की शूटिंग हुई? सुनने सुनाने की शूटिंग हुई। गुरूजी ने सुनाया रावण को दस सिर थे। सत वचन महाराज। गुरूजी ने सुनाया कुम्‍भकरण 6 महीने सोता था। सत वचन महाराज। हनुमान पुँछड़ी वाला था। भगवान ने बंदरों की सेना ली। सत वचन महाराज। सुना और सत सत किया समझा तो नहीं।

समझने और समझाने को ज्ञान कहा जाता है। और ज्ञान देने वाला एक ज्ञान सागर बाप ही है कृष्‍ण नहीं है। लेकिन ब्राह्मणों की जो बेसिक दुनियाँ है उसमें गीता का साकार भगवान किसको समझा जाता है, किसको समझते हैं? कृष्‍ण उर्फ दादा लेखराज को गीता का साकार भगवान अभी भी समझते हैं। बेसिक में ही नहीं एडवांस की दुनियाँ में जो चंद्रवंशियों के बीजरूप आत्‍मायें हैं वो अभी भी कृष्‍ण की आत्‍मा को भगवान के रूप में मानती है। और राम बाप की अवज्ञा करती है। जबकी राम वाली आत्‍मा के तन के द्वारा कृष्‍ण बच्‍चे की आत्‍मा भी अभी पढ़ाई पढ़ रही है। और राम बाप के द्वारा शिव बाप टीचर बनकरके पढ़ाई पढ़ाता है। इसीलिए मुरली में बोला है। नेक्स्ट टू गॉड इस कृष्‍ण। कौनसा कृष्‍ण? संगमयुग में जो 16 कला सम्‍पूर्ण बन जाता है। दादा लेखराज ब्रह्मा उर्फ कृष्‍ण का तो शरीर ही छूट गया। 16 कला सम्‍पूर्ण बनने की बात खतम हो गई।

नेक्‍सट् टू गॉड इस नारायण। जो गायन है नर से नारायण बनने का। ब्रह्मा नर था;लेकिन नर चोला ही खतम हो गया तो नारायण कौन बनेगा। तो नेक्‍सट् टू गॉड इस नारायण ये ब्रह्मा के लिए बात लागू नहीं होती। नेक्‍सट् टू गॉड इस प्रजापिता। यज्ञ के आदि में पिता कोई और था। वो पिता का टाईटल ब्रह्मा बाबा को दे दिया गया। टाईटलधारी था प्रजापिता। ओरिजनल प्रजापिता नहीं था। इसीलिए बोला है नेक्‍सट् टू गॉड इस प्रजापिता। जो यज्ञ के आदि में मम्‍मा बाबा को भी डायरेक्‍शन देने वाला था। टीचर बनकरके बैठता था। वही आत्‍मा शरीर छोड़कर फिर दुबारा यज्ञ में आती है। और प्रजापिता के रूप में संसार में प्रत्‍यक्ष हो जाती है। तो नेक्‍सट् टू गॉड इस प्रजापिता और उसी प्रजापिता के द्वारा शिव बाप पढ़ाई पढ़ाकरके नर को नारायण बनाता है। इसीलिए नेक्‍सट् टू गॉड इस नारायण कहा। बाकी दादा लेखराज के लिए ये नेक्‍स्‍ट गॉड साबित नहीं होता। इसीलिए संगमयुगी कृष्‍ण अलग और सतयुग में जन्‍म लेने वाला कृष्‍ण वो आत्‍मा अलग। उसका कोई गायन नहीं है। संगमयुगी कृष्‍ण का शास्‍त्रों में गायन है। जिसके पीछे कंसी, जरासिंधी मारने के लिए पीछे2 फिरते रहते थे।


Disc.CD No.474, dated 28.12.07 at Tadepalligudem
Extracts-Part-2


Time: 09.20-22.40
Student: Baba, how will we know about the Confluence Age Krishna, Golden Age Krishna?

Baba: The one who is Iron Age Krishna, who sits as God of the Gita; he is not actually God of the Gita. There is false Gita and Gita becomes false by inserting the name of Krishna in it. Is it about one Krishna or is it about all the number wise Krishna-like children having child-like intellect? There are numberwise Krishnas having child-like intellect who take the mothers in their control and make them follow their directions.

This is the situation in every home today. By chance, if the husband leaves the body, then under whose control do the mothers live? They come under the control of the children. It is as if the children become the mother’s husband. They become her lord. And this tradition has been followed in India for 2500 years. Mothers did not get inheritance in the family. Sons have been getting inheritance because sons became the husbands (i.e. controllers) of mothers. And even now, in every house the sons make the mothers dance on their fingertips (i.e. directions). And they become the inheritors of the entire property themselves. Thanks to the Father that ever since He is revealed in the world, ever since the Father came, today’s Government has also made it a rule that even the mothers should get the inheritance. So, there is a law in favour of the mothers too that if they wish they can take their inheritance, their family inheritance in their hands.

It is not about the lokik world; actually, it is about the alokik world. The Father has been revealed in the alokik world; mothers, who do not have any more desires in their family, can lead their life independently if they wish. They can follow Godly knowledge. They need not remain under those Krishna[-like] sons. They can take the support of the Father, but only when they recognize the Father. So, that child Krishna has a child-like intellect. This is why he does not give regard to the mother.

Also in the Yagya, the mothers who were present in the beginning of the Yagya were not respected and even today those mothers are being controlled by the men in the Yagya. This is why it has been hinted in the Avyakt Vani – Pandavas should be the guards of shaktis. Guard means a slave, a servant. Pandavas should be the servants of shaktis; they should be their guards. If Pandavas become guides who give guidance to the shaktis, if they become their lords, then there will be anarchy in the Yagya. That anarchy is still going on in the Yagya. It is not just the case with the basic (party); that anarchy is going on in the advance (party) too.

Even in the beginning of the Yagya those Krishna-like children, those with a child-like intellect, and the followers of child Krishna did not recognize the Father; so, there was disregard (tiraskaar) of the Father and the Father departed and the mothers came under bondage. Those Duryodhans and Dushasans ignored God, the Father and they made child Krishna the God of the mother Gita. Well, how can a child teach?

Father Shiv narrated Murli through the Chariot of Krishna alias Brahma who has a child-like intellect. First of all his soul listened to the Murlis through his ears. Who? Brahma alias Krishna. He heard the Murlis and narrated the Murlis, but he neither understood them nor explained them. A person with a child-like intellect can hear. He can narrate something which he has heard. But he can neither understand nor explain the depth of the words of God the Father. But this shooting takes place, which continued to take place in the path of Bhakti. Did the shooting of listening and narrating of the path of Bhakti take place or did the shooting of understanding and explaining whatever has been written in the scriptures take place? The shooting of listening and narrating took place. Guruji narrated that Ravan had ten heads. (The disciple said) Sat vachan maharaj (whatever you say is truth Maharaj). Guruji said that Kumbhakarna used to sleep for 6 months. Sat vachcn maharaj. Hanuman had a tail. God took the help of an army of monkeys. Sat vachan maharaj. He heard and believed everything to be true. He did not understand.

Understanding and explaining is called knowledge. And the giver of knowledge is one ocean of knowledge, the Father, not Krishna. But in the basic world of Brahmins, who is considered to be the corporeal God of the Gita? Even now they consider Krishna alias Dada Lekhraj the corporeal God of the Gita. It is not just in basic (knowledge) but [also] in the world of advance, the seed-form souls of Chandravanshis (those who belong to the Moon Dynasty) accept the soul of Krishna God and they disobey the Father Ram, whereas the soul of child Krishna is still studying through the body of the soul of Ram. And the Father Shiv teaches knowledge through Father Ram as a teacher. This is why it has been said in the Murlis – next to God is Krishna. Which Krishna? The one who becomes perfect in 16 celestial degrees in the Confluence Age. Dada Lekhraj Brahma alias Krishna left his body. The issue of (Dada Lekhraj) becoming perfect in 16 celestial degrees ended there.

Next to God is Narayan. The praise that Nar (man) became Narayan…. Brahma was a man, but when the male body itself perished, who will become Narayan? So, the saying that ‘next to God is Narayan’ is not applicable to Brahma. Next to God is Prajapita. In the beginning of the Yagya, the Father was someone else. That title of the Father was given to Brahma Baba. He was the titleholder Prajapita. He was not the original Prajapita. This is why it has been said ‘next to God is Prajapita’. The one who used to give directions to Mama as well as Baba in the beginning of the Yagya, the one who used to sit as their teacher, that very soul, after leaving its body, enters the Yagya once again and is revealed in the world in the form of Prajapita. So, next to God is Prajapita and the Father Shiv teaches knowledge through that Prajapita and transforms man to Narayan. This is why it was said ‘next to God is Narayan’. As regards Dada Lekhraj, he does not prove to be next to God. This is why the Confluence Age Krishna and the soul of Krishna who takes birth in the Golden Age are different. There is no praise for him. The Confluence Age Krishna, whom the Kansis and Jarasindhis chased (and tried) to kill, is praised in the scriptures
.....(to be continued)
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Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 26 Apr 2010

वार्तालाप नं.474, ताडेपल्लिगुडम, दिनांक 28.12.07
उद्धरण-भाग-3


समय-25.40-28.40
जिज्ञासु- बाबा, मुरली तो कोई मिस नहीं करते। जब तबीयत ठीक नहीं रहती तो आप से घर में पढ़के सेंटर में जा सकता है कभी । ऐसे जानबूझकर हमलोग मुरली मिस नहीं करेंगे सेंटर जाने के लिए, पढ़ने में, गीता पाठशाला। तबीयत ठीक रहेगा तो जायेंगे नहीं तो कभी-2....

बाबा- ये तो आत्मा. की पावर की बात है। श्रद्धा विश्वागस की बात है, निश्चतय बुद्धि की बात है। नहीं तो मुरली में तो बोला हुआ है 106 डिग्री बुखार हो तो भी रोज क्ला स करना चाहिए जाकरके।
जिज्ञासु- जानबूझके नहीं बैठेंगे।
बाबा- अरे! 106 डिग्री तो छोड़ो 100 डिग्री, 99 डिग्री होता है तो भी धरे रह जाते हैं। नहीं तो हिम्मकते बच्चेन मददे बाप। हिम्मछत हार जाते हैं।
जिज्ञासु- बुखार को छोड़िए ना। कभी घाव लगेगा शरीर को, एक्सीडेन्टी होगा तब चल नहीं सकेगा तो भी मंजूर कर सकता है ना। घर में बैठके पढ़ेंगे।बाबा- बहानेबाजियाँ तो होती हैं।
जिज्ञासु- जानबूझके नहीं करेंगे ना बाबा।
बाबा- अरे! एक्सींडेन्टब रोज होता रहता है क्या्?
जिज्ञासु- रोज का मतलब नहीं कभी-2। रोज का बात कैसे होगा। मुरली तो ब्राह्मणों का आहार है। छोड़ेंगे नहीं...
बाबा- जो करेगा सो पाएगा। जितना कायदा उतना फायदा। कायदा है कि स्टुडेन्टी को रेग्युैलर रहना चाहिए, पंच्यु अल रहना चाहिए। रोज क्लानस में आता है माना रेग्युहलर है। और टाईम से आता है माना पंच्युाअल है। अगर रोज नहीं आता है और टाईम से नहीं आता है। और क्लाहस शुरू हो जाता है। बाद में आता है इसका मतलब पंच्यु अल नहीं है डिसरिगार्ड करता है। एक बार डिसरिगार्ड करेगा कहेगा एक्सिडेन्ट हो गया। दूसरी बार डिसरिगार्ड करेगा कहेगा एक्सीाडेन्टग हो गया। तीसरी बार डिसरिगार्ड करेगा। तो टीचर कहाँ तक माफ करता रहेगा। टीचर खुश होगा? कभी खुश नहीं होगा।

समय- 28.50-43.40
जिज्ञासु- यमुना नदी कौन है?

बाबा- यमुना नदी कौन है? कहते हैं- तीन नदियों का संगम होता है उसमें कुम्भक का मेला होता है। गंगा, यमुना और सरस्वतती। उनमें गंगा नदी पतित-पावनी के कार्य में अव्व ल मानी जाती है। यमुना नदी भी पतित-पावनी मानी जाती है; लेकिन अव्व ल नंबर नहीं मानी जाती। गंगा जिस क्षेत्र से बहती है वो ऐसी धरणी है, ऐसी जमीन है जो बालू में बहती है। रेत में, सेंड में। वो ऐसी देहअभिमान की मिट्टी में बहती है। जो मिट्टी चिपकती नहीं है। क्या ? गंगा नदी की देहअभिमान की मिट्टी तो है; लेकिन ऐसी मिट्टी है जो देह में चिपकती नहीं है। थोड़ा पानी डालो सारा बह जाता है। थोड़ा सा ज्ञान जल डालो। और यमुना नदी की मिट्टी ऐसी देहअभिमान वाली है इतनी चिकनी है कि जहाँ चिपक जाएगी पकड़के रख लेगी।

अब वो नदी चैतन्ये होती है या जड़ नदी की बात है? ये चैतन्य नदियों की बात है। कोई चैतन्यच नदियाँ ऐसी हैं जो देहअभिमान की मिट्टी में जकड़ लेती है ज्ञान सुनने वालों को, ज्ञान स्नासन करने वालों को। और कोई ज्ञान गंगायें ऐसी हैं कि देहभान तो है आखिर कलियुगी दुनियाँ के हैं; लेकिन ऐसा देहअभिमान नहीं जो कोई को अपनी जकड़ में जकड़ के रख ले, पुरूषार्थ से नीचे गिरा दे। पहले जन्मन होता है यमुना का। बाद में गंगा का। इसीलिए मुरली में बोला है ज्ञान गंगायें निकली हैं अंत में। अभी भी ज्ञान गंगा प्रत्य क्ष नहीं हुई है। इसीलिए उत्तर भारत के कुम्भाकरण अभी भी सोए हुए हैं। गंगा नदी के किनारे जो कुम्भमकरण रूपी सन्याससी हैं वो चौकड़ी मारके बैठते हैं वो गंगा की औलाद अपन को कहते हैं। वो यमुना के किनारे चौकड़ी मारकर नहीं बैठते हैं।

यमुना नदी सूर्यपुत्री कही जाती है। पहले-2 जन्मै होता है यमुना नदी का। मुरली में भी मिसाल दिया हुआ है- यज्ञ के आदि में पहले-2 निकली एक भंगिन, मेहतरानी। संतसंग में आतीि थी और आते ही बाबा के गले लिपट जाती थी सबके सामने। बादमें उसके परिवार वाले आए और ज़बरदस्ती पकड़के ले गए। ये तो बेसिक की बात हुई। एडवांस में भी एडवांस के आदि में कोई कन्याे के रूप में कोई माता थी जो फट से एडवांस में चटक पड़ी। परंतु जो जन्मं-जन्मांरतर के उसके भाँती थे। उन्होंमने उसको ज्ञान में टिकने नहीं दिया। और खुद भी नीचे गिरे और उसको भी नीचे गिरा दिया। ये गंगा, यमुना की बात है। जिसे शास्त्रों में तुलसी का भी नाम दिया है।

गंगा, यमुना और सरस्वमती। सरस्वाती बीच में आती है और बीच में ही लोप हो जाती है। बेसिक में भी ओमराधे मम्माव आदि में नहीं थी। बाद में आई और ब्रह्मा बाबा से पहले ही शरीर छोड़के बीच में ही चली गई। एडवांस में भी जो सरस्वेती जगदम्बाा के रूप में प्रत्योक्ष होती है वो भी बीच में ही आती है और बीच में ही लोप हो जाती है। जिस जगदम्बात के लिए बोला है कि जगदम्बाे अंत में महाकाली का रूप धारण करेगी। जगदम्बाम कहो, सारे जगत की अम्बा कहो।

ब्रह्म माना बड़ी और मा माना माँ, बड़ी माँ कहो। इसीलिए मुरली में बोला है- वास्तहव में ये ब्रह्मा तुम्हाबरी जगदम्बा है। वास्त व में ये दाढ़ी मूँछ वाला जो ब्रह्मा है ना ये तुम्हाेरी जगदम्बा् है। क्यों कि जो सारे जगत की अम्बा् होगी सब माताओं की माता होगी वो सबसे जास्ती सहन करने वाली होगी या कम सहन करने वाली होगी। सबसे जास्तीा सहन करने वाली होगी। उसके मुकाबले न बेसिक में कोई सहन कर सकता। और न एडवांस में कोई ऐसी हस्ती है जो ब्रह्मा के मुकाबले सहन करने वाली हो या प्रत्यहक्ष हो। इसीलिए बोला ये ब्रह्मा वास्त‍व में तुम्हाेरी जगदम्बा है परंतु तन पुरूष का है। इसीलिए कन्याएओं माताओं के चार्ज में इस पुरूष तन को नहीं रखा जाता। इसीलिए ओमराधे मम्माए को टाईटलधारी जगदम्बां बनाए दिया। कन्यााओं-माताओं की सम्भारल करने के लिए।

अच्छाए जब दाढ़ी मूँछ वाला ब्रह्मा जगदम्बाि नहीं है। उसने पार्ट जगदम्बास का नहीं बजाया। और वास्तजव में दाढ़ी मूँछ वाले की पूजा नहीं होती है। और जगदम्बाज की तो पूजा होती है। तो वो जगदम्बाम कौन है जिसकी मंदिरों में पूजा होती है मूर्तियाँ बनती हैं। वो वही जगदम्बा है जो यज्ञ के आदि में एक माता थी। जो मम्माह बाबा को भी पढ़ाई पढ़ाती थी। वही शरीर छोड़ने के बाद दुबारा एडवांस में आकर जन्म् लेती है। और उसमें ब्रह्मा की सोल शरीर छोड़ने के बाद प्रवेश करती है। आदि में सतोप्रधान स्टेउज में जो जगदम्बा् है वो ही अंत में महाकाली का पार्ट बजाती है इसीलिए महाकाली के मस्तगक पर ज्ञान चंद्रमाँ दिखाया जाता है। जैसे शंकर के मस्तिक पर चंद्रमाँ है वैसे महाकाली...। महाकाल और महाकाली दोनों के मस्त क पर ज्ञान चंद्रमाँ प्रत्यहक्ष है। कौन है ज्ञान चंद्रमाँ? ब्रह्मा बाबा। तो वो मंदिरों में पूजा जाता है। क्योंँकि स्त्री चोला है।

पुरूष सब दुर्योधन दु:शासन है। पुरूष चोला और स्त्री चोला पवित्रता की धारणा के हिसाब से ज्यायदा तीखा कौन होता है? स्त्रीं चोला। और उसमें भी खास करके भारत की मातायें बहुत पवित्र गाई हुई हैं। इसीलिए यादगार में भारत की नदियों में स्ना न करते हैं। विदेशों की नदियों में स्ना।न नहीं करते। क्यों ? क्योंाकि विदेशी जो चैतन्यी नदियाँ हैं। वो अनेक पति करने वाली हैं, व्यतभिचार फैलाने वाली हैं। और भारत की जो नदियाँ हैं वो जीवन में एक ही पति करती हैं। पवित्रता को धारण करती है। इसीलिए यमुना नदी अंत में काला पार्ट बजाती है महाकाली के रूप में। इसीलिए वो जमुना है, काला पानी बहता है और गंगा जल पवित्र माना जाता है। बीच में सरस्वएती नदी है वो सरस्वीती नदी का पार्ट ही ऐसा है बीच में आती है बीच में लोप हो जाती है।

तो तीन नदियाँ हैं जो पतित-पावनी मानी जाती हैं। उनमें मुख्यै गंगा है। वो ज्ञान गंगायें अभी प्रत्ययक्ष नहीं हुई हैं। जब प्रत्यंक्ष होंगी तो पहले-2 निकलेंगे सन्यांसी जिन्हों ने जन्मप-जन्मांहतर पवित्रता को धारण किया है। भल झूठी पवित्रता को धारण किया; लेकिन पवित्रता को फॉलो तो किया। इसीलिए बोला है जब सन्यारसी निकलेंगे तो तुम बच्चोंण विजय हो जावेगी। क्याक? एडवांस ज्ञान में भी जो सन्याोस धर्म की जब बीजरूप आत्माययें निकलेंगी उत्तीर भारत से। जो ज्ञान गंगा के किनारे चौकड़ी मारकरके बैठने वाली हैं तो तुम बच्चोंत की विजय हो जावेगी। तो गंगा में और यमुना में ये फर्क है।


Disc.CD No.474, dated 28.12.07 at Tadepalligudem
Extracts-Part-3


Time: 25.40-28.40
Student: Baba, nobody misses Murli. When someone does not feel well, he can read at home and then go to the center (when he is well). We don’t miss the Murli class that we attend at the center or gitapathshala deliberately. If we feel well, we will go, otherwise sometimes…...

Baba: It is about the power of the soul. It is about devotion and faith; it is about having a faithful intellect. Otherwise, it has been said in the Murli that even if you have 106 degree fever, you should attend the daily class.
Student: We will not sit (at home) deliberately.
Baba: Arey, leave about 106 degree (fever), even if they have 100 degree, 99 degree (fever) they sit at home. Otherwise, if children show the courage, the Father is ready to help. [But] they lose courage.
Student: Leave about fever. Sometimes, we suffer injuries to the body; if we meet with an accident, we will not be able to walk; then is it OK to sit and study at home?
Baba: All these are excuses.
Student: We will not do it deliberately Baba.
Baba: Arey! Do you meet with an accident daily?
Student: It is not about everyday; sometimes. How can it be everyday? Murli is the food for the Brahmins. We will not leave it….
Baba: The one who puts in effort will achieve [the reward]. The more you follow the rule, the more benefits you reap . The rule is that the student should be regular, punctual. If he comes to the class daily; it means that he is regular. And if he comes on time, it means that he is punctual. If he does not come daily and if he does not come on time, and if the class starts and if he comes late, then it means that he is not punctual; he shows disregard (for the teacher). If he shows disregard once, he will say that he met with an accident (as an excuse). If he shows disregard for the second time, he will say he met with an accident. If he shows disregard for the third time, how far will the teacher continue to excuse? Will the teacher be happy? He will never be happy.

Time: 28.50-43.40
Student: Who is river Yamuna (in an unlimited sense)?

Baba: Who is river Yamuna? It is said that the fair of Kumbh (mela) is organized at the confluence of the three rivers – Ganga, Yamuna and Saraswati. Among them river Ganga is considered to be number one in the task of purifying the sinful ones. River Yamuna is also considered to be purifier of the sinful ones, but it is not considered to be number one. The region through which river Ganga flows is such a land that it flows on sand. It flows on the soil of body consciousness, which does not stick. What? The mud of river Ganges is no doubt body conscious, but it is such a mud which does not stick to the body. If you pour some water, it is washed away entirely. If you put a little water of knowledge [it is washed away]. And the mud of river Yamuna is so body conscious, it is so sticky that wherever it sticks, it will remain stuck [there].

Well, is it about a living river or a non-living river? It is about the living river. There are some living rivers which bind the listeners of knowledge, the ones who take the bath of knowledge in the mud of body consciousness. And some Ganges of knowledge are such ones that they do have body consciousness; after all they belong to the Iron Age world, but their body consciousness is not such that they bind someone in their clutches and make them go down in their purusharth (special effort for the soul) . First Yamuna takes birth and later on Ganga. This is why it has been said in the Murli that the Ganges of knowledge have emerged in the end. Even now the Ganges of knowledge is not revealed. This is why the Kumbhakarnas of north India are sleeping. The Kumbhakarna-like sanyasis who sit on the banks of river Ganga call themselves the children of Ganga. They do not sit on the banks of Yamuna.

River Yamuna is called Suryaputri (daughter of the Sun). First of all river Yamuna takes birth. An example has also been given in the Murli – In the beginning of the Yagya first of all a Bhangin (a woman belonging to one of the lowermost castes among Hindus), mehtarani (scavenger) came. As soon as she used to come to the Satsang (spiritual gathering) she used to embrace Baba in front of everyone. Later on her family members came and took her away forcibly. This is about the basic (knowledge). Even in the advance (party), in the beginning of the advance (party) there was a mother in the form of a virgin who entered the advance (party) suddenly. But her companions of many births did not allow her to remain constant in knowledge. They themselves experienced downfall and made her to experience downfall too. This is about Ganga, this is about Yamuna, who has also been named ‘Tulsi’ in the scriptures.

Ganga, Yamuna and Saraswati. Saraswati comes in between and vanishes in between. Even in basic (knowledge) Om Radhey Mama was not present in the beginning. She came later on and departed in between, leaving her body before Brahma Baba. Even in advance, the one who is revealed in the form of Saraswati Jagdamba comes in between and vanishes in between. It has been said for that Jagdamba that Jagdamba will assume the form of Mahakali in the end. Call her Jagdamba, or call her the mother of the entire world.

Brahm means big and ma means mother; call her senior mother. This is why it has been said in the Murli – In reality this Brahma is your Jagdamba. Actually this Brahma with beard and moustaches is your Jagdamba because will the mother of entire world, the mother of all mothers tolerate the most or will she tolerate less? She will be the one who tolerates the most. When compared to her, there is nobody who can tolerate (to that extent) in basic. And neither is there any personality in the advance (party), who can tolerate as much as Brahma nor is [anyone like that] revealed. This is why it has been said that this Brahma is in fact your Jagdamba, but the body is male. This is why this male body is not kept in charge (to take care) of the virgins and mothers. This is why Om Radhey Mama has been made titleholder Jagdamba to take care of virgins and mothers.

OK, if the Brahma with beard and moustaches is not Jagdamba; he has not played the part of Jagdamba and actually the one with beard and moustache is not worshipped and Jagdamba is worshipped. So, who is that Jagdamba who is worshipped in the temples, and whose idols are made? She is the same Jagdamba who was a mother in the beginning of the Yagya, who used to teach knowledge to even Mama and Baba. After leaving her body, she comes again to the advance (party) and takes (the unlimited) birth. And the soul of Brahma enters her after leaving its body. The one who is Jagdamba in the beginning, in the satopradhan (the stage dominated by goodness and purity) stage, plays the part of Mahakali in the end. This is why the moon of knowledge is shown on the forehead of Mahakali. Just as there is the moon on the forehead of Shankar, similarly, Mahakali…... The moon of knowledge is visible on the forehead of Mahakaal as well as Mahakali. Who is the moon of knowledge? Brahma Baba. So, he is worshipped in the temples because the body is female.

All men are Duryodhans and Dushasans. Among the male body and female body, who is faster from the point of view of practicing purity? The female body. And even in that, especially the mothers of India are known to be very pure. This is why as a memorial people bathe in the rivers of India. They do not bathe in the rivers of foreign countries. Why? It is because the living rivers of foreign countries adopt many husbands, they are the ones which spread adultery. And the rivers of India adopt only one husband in their life. They practice purity. This is why river Yamuna plays a dark part in the form of Mahakali in the end. This is why it is ‘Jamuna’, dark water flows through it and the water of Ganges is considered to be pure. The river Saraswati is in between. The part of river Saraswati is such that it comes in between and vanishes in between.

So, there are three rivers which are considered to be purifier of the sinful ones. Among them main is Ganga. Those Ganges of knowledge are not revealed now. When they are revealed, then first of all the sanyasis will emerge who have imbibed purity for many births. Although they imbibed false purity, they did follow (practice) purity. This is why it has been said – when sanyasis emerge, you children will gain victory. What? Even in the advance knowledge, when the seed-form souls of sanyas religion emerge from northern India, the ones who sit on the banks of the Ganges of knowledge, then you children will become victorious. So, this is the difference between Ganga and Yamuna.

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Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 27 Apr 2010

वार्तालाप नं.472, हैदराबाद, दिनांक 27.12.07
उद्धरण-भाग-१


समयः 00.00-00.44
बाबा: भगवान आयेगा तो कहेगा मैं भगवान हूँ? कहेगा?
जिज्ञासु: नहीं कहेगा।
बाबा: फिर?
जिज्ञासु: बाप पहले बच्चों को प्रत्यक्ष करेगा फिर बच्चे बाप को प्रत्यक्ष करेंगे। कौनसा पहले...
बाबा: जो ज्यादा ताकतवर होगा सो पहले करेगा।
जिज्ञासु: ताकत[वर] तो बाप है।
बाबा: हाँ तो बाप अगर सर्वशक्तिवान है, ज्यादा पावरफुल है तो पहले बच्चों को प्रत्यक्ष करेगा या बच्चे बाप को प्रत्यक्ष कर लेंगे?
जिज्ञासु: जो पावरफुल है वो पहले करेगा।
बाबा: हाँ तो अभी 70 साल हो गए, बच्चे अगर पावरफुल होते तो अभी तक 70 सालों में कुछ किया होता ना? कुछ कर पाए क्या? नहीं कर पाए।

समयः 00.50-02.20
जिज्ञासुः आगे चलके बाबा क्रोधियों से नहीं मिलेंगे। तो बाबा कहते हैं- जो जितना ज्यादा पापी हो, जितना बड़ा विकारी हो अंत में बनने वाला देवता स्वरूप में देखने वाला तो क्रोधी के रूप में क्यों देखता है?

बाबा: तो बोलने वाला ब्रह्मा की सोल है या शिवबाबा की सोल है?
जिज्ञासु: तो बाबा उसी समय क्यों नहीं बोला गया कि ये ब्रह्मा ने बोला है? जब पूछा जा रहा है तो क्यो बोला गया?
बाबा: तो जो बोला है वो ब्रह्मा की सोल ने बोला कि बाप जो है वो क्रोधियों से नहीं मिलेंगे। पहले बाप अपने 8 देव बच्चों से मिलेंगे या जिन्होंन पुरुषार्थ ही नहीं किया, 70 साल बीत गए और पुरुषार्थ में निल (Nil) पूरे के पूरे क्रोधी और पूरे के पूरे कामी, लोभी, मोही, अहंकारी अब तक अपना रिजल्ट दे रहे हैं तो बाप किससे मिलेंगे?
जिज्ञासु: बाप को तो सबका कल्याण करना ही है।
बाबा: फिर वो ही बात। माना पढ़ाई पढ़े उनका भी कल्याण करना है, उनको भी नारायण बनाना है और जो पढ़ाई न पढ़े उनको भी? उनको भी नारायण बनाना है?
जिज्ञासु:... एक साथ ले जाऊंगा।
बाबा: वो तो मार पीट के ले जाऊंगा।
जिज्ञासु: ले तो जायेगा ना? बाबा: हाँ तो मार पीट के ले जायेगा।

समयः 02.21-05.30
जिज्ञासुः बाबा, कोई आरोप लगाता है।

बाबा: किसके ऊपर?
जिज्ञासु: किसीके ऊपर।
बाबा: कौन?
जिज्ञासु: कोई भी। झूठा आरोप लगाता है भले कुछ भी लगाता है। आरोप लगा दिया किसीने, तो फिर उस बच्चे को बाप देवता स्वरूप में ही देखेगा या नहीं?
बाबा: आरोप लगाने वाले के ऊपर या जिसके ऊपर आरोप लगाया गया है वो?
जिज्ञासु: जिसके ऊपर आरोप लगाया है वो।
बाबा: आरोप तो दुनिया में बहुत से लगते रहते हैं। लोग तो सूरज के ऊपर भी आरोप और कीचड़ फेंक देते हैं। आरोप लगाने से क्या होता है? वो स्वीकार करे तब ना। जिसके ऊपर आरोप लगाया गया है क्या वो उस आरोप को दिल से स्वीकार कर लेता है? या वो आरोप उसके ऊपर साबित हो जाता है? जब साबित भी नहीं होता और जिसके ऊपर आरोप लगाया गया है वो दिल से स्वीकार भी नहीं करता, उसके ऊपर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। चोर होगा और चोर से चोर कहा जाए तो वो दौड़ पड़ेगा - ए! साबित करो, तुमने हमको चोर कैसे कहा? अब जिसने आरोप लगाया है उसके पास कोई प्रूफ ही नहीं तो वो डर जायेगा।

तो जो चोर होता है वो डरता है और वो कड़क रूप धारण करता है और वो प्रभावित भी होता है दूसरे के कहने से लेकिन जो चोर है ही नहीं उसके ऊपर कोई लाख आरोप लगाता रहे, सारी दुनिया आरोप लगाए; जो बोला है मुरली में- सारी दुनिया दुश्मन बनेगी। सारे दुनिया में कोई रह जायेगा या सारे ही आजायेंगे? 8 देव आवेंगे कि नहीं? 8 देव भी उस लिस्ट में आ जावेंगे थोड़े समय के लिए। अगर वो भी उस लिस्ट में न आवे तो चौरासीवें जन्म में जाके कन्वर्ट न हो। वो भी उस माया के विकराल रूप के प्रभाव में आ जावेंगे थोड़े समय के लिए। तो प्रभावित होते हैं प्रभावित होने वाले तो सारी दुनिया में सब चोर है, सब झूठे हैं नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार या कोई 2-4 ऐसे भी है जो झूठे नहीं है? हाँ? सारी दुनिया झूठी और एक? एक सच्चा। ये साबित होना है या नहीं होना है? (होना है) बस।

Disc.CD No.472, dated 27.12.07 at Hyderabad
Extracts-Part-1


Time: 00.01-00.44
Baba: When God comes, will He say that He is God? Will He?
Student: He will not say so.
Baba: Then?
Student: The Father will reveal the children first and then the children will reveal the Father. What will happen first?...
Baba: The one who is more powerful will reveal [the other one] first.
Student: The Father is more powerful.
Baba: Yes. So, if the Father is Almighty, if He is more powerful, will He reveal the children first or will the children reveal the Father first?
Student: The one, who is powerful, will reveal [the other one] first.
Baba: Yes, so, 70 years have passed; had the children been more powerful, they would have done something in 70 years, wouldn’t they? Were they able to do anything? They were not.

Time: 00.50-02.20
Student: (Baba has said that) Baba will not meet the angry ones in future. So, Baba says – however much someone may be sinful, however much someone may be vicious, He sees them in their deity form of the last period; so, why does He see them in the form of angry ones?

Baba: So, is Brahma’s soul speaking or ShivBaba’s soul speaking?
Student: So, Baba, why was it not said at that time that Brahma spoke this? Why was it told on being asked?
Baba: It is the Brahma’s soul who said that the Father will not meet the angry ones. Will the Father first meet His 8 deity children or (will He meet) those who have not made any purusharth (special effort for the soul) at all; 70 years have passed; yet they are nil in making purusharth; they are giving their result of being completely angry, completely lustful, greedy, the ones with attachment, egotist; so, whom will the Father meet?
Student: The Father is bound to bring benefit everyone.
Baba: You are saying the same thing again. Does it mean that those who study should also be benefited, they should also be made Narayan and those who do not study should also be made Narayan? Should they also be made Narayan?
Student:........I will take everyone together.
Baba: About that (it has been said that) I will take even by beating.
Student: So, He will take, will He not?
Baba: Yes, but He will beat and take (them along).

Time: 02.21-05.30
Student: Baba, if someone levels any charges…

Baba: On whom?
Student: On someone.
Baba: Who?
Student: Anyone. If he levels a false charge; he may level any charge. If someone levels an allegation; so, then will the Father see that child in a deity form or not?
Baba: Are you asking about the one who levels charges or the one on whom the charges are leveled?
Student: The one against whom the charges have been leveled.
Baba: People level many charges against others in the world. People level charges and throw murk even on the Sun . What happens if charges are leveled ? [The issue becomes important] only if he accepts it. Does the one against whom the charges have been leveled accept those charges from his heart? Or is the charge against him proved? When the charge is not proved and the one against whom the charge has been leveled does not accept it from his heart, he is not influenced at all… if someone is a thief and if the thief is called a thief, then he will attack him immediately – Hey, prove it; how did you call me a thief? Well, if the one who has leveled the charge does not have any proof, then he will be frightened.

So, a thief fears and he (i.e. the one on whom false charges have been leveled) assumes a strict form and he (i.e. the one who levels false charges) becomes influenced by others, but the one who is not a thief at all, even if someone keeps leveling a lakh charges against him, the entire world may level charges, for which it has been said in the Murli that the entire world will become an enemy. Will anyone be left out in the world or will everyone be included in it? Will the eight deities be included in it, or not? Even the eight deities will be added to that list for some time. If they are not included in that list then they will not be converted in the last birth. They too will come under the influence of the fierce form of that Maya for some time. So, those who are to be influenced will be influenced; so is everyone in the world a thief, is everyone false numberwise according to their efforts or are there any such ones who are not false? Hm? The entire world is false and what about one? One is true. Is this going to be proved [true] or not? (It is going to be proved [true]) That is all.
...(to be continued)
...............................................................................................................
Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Post by arjun » 28 Apr 2010

वार्तालाप नं.472, हैदराबाद, दिनांक 27.12.07
उद्धरण-भाग-2


समयः 05.53-10.44
जिज्ञासुः बाबा, राज करेगा खालसा ये बड़ी माँ के लिए बोला गया या छोटी माँ के लिए बोला गया?

बाबा: राज करेगा खालसा ये कौनसे धर्म वाले कहते हैं? (सभी ने कहा- सिक्ख धर्म्) सिक्ख धर्म मंु कहते हैं। तो इस बात का ज्यादा अभिमान कौनसे धर्म वालों को होगा? सिक्ख धर्म वालों को इस बात का ज्यादा अभिमान है। क्या? कि राज करेगा खालसा। माना उस खालिस आत्मा ने जितना इस सृष्टि पर ब्राह्मण बनकरके राज्य किया उतना और कोई ब्राह्मण ने राज्य नहीं किया। ये कौन कहते हैं? कौन कहते हैं? सिक्ख धर्म वाले। वो सिक्ख धर्म कलियुग का है, तमोप्रधान युग का है या रजोप्रधान युग का है? (सभी ने कहा- तमोप्रधान युग) तमोप्रधान युग का है और रजोप्रधान युग में भी सतोप्रधान की स्टेज का भी नहीं है। रजोप्रधान की स्टेज में जो तमो, तामसी, चौथी स्टेज वहाँ का भी नहीं है। जो कलियुगी तमोप्रधान युग है उसमें मध्य से पैदा होता है। तो उसकी समझ में और दूसरे धर्म वालों की समझ में अंतर होगा या नहीं होगा? अंतर होगा।

उनकी बुद्धि इतनी है ही नहीं कि संगमयुग में राज करना अच्छी बात है या खराब बात है? बोलो? संगमयुग में राज करेगा खालसा इस बात का अहंकार करना बहुत खराब बात है। उनकी ये बात बुद्धि में नहीं बैठती। वो इसी अहंकार में रहते हैं- अह हाँ ! मेरे खून से जन्म लेने वाली आत्मा पहले भगवान बाप का बनती है और सरेंडर होती है, हमारा धर्म सबसे ऊँचा है। इसलिए वो कहते हैं राज करेगा खालसा। ये नहीं जानते कि संगमयुग में राज करने वाली जो भी देवियाँ है, राज करने वालों में सबसे ऊँची स्टेज में जाती है तो निकृष्ट देवियाँ है या उच्च कोटि की देवियाँ है? काली का रूप बजाने वाली देवीयाँ है। चामुण्डी कहा जाता है उनको। जो मुरली में बोला है चण्डिका देवी की भी पूजा होती है। तो बाबा जो बोल रहे हैं चण्डिका देवी, वो हीन अर्थों में बोला है या ऊँच अर्थ में बोला है? हीन अर्थों में बोला है। देवी ही बनना है तो महागौरी का पार्ट बजाए या महाकाली का पार्ट बजाए? महागौरी का पार्ट बजाना वो अच्छी बात है।

ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया जब तक है, सन 36 तक भी हो तो भी अपने को राजा समझ करके कभी नहीं बैठना चाहिए, कंट्रोलर अपने को समझ करके बैठना नहीं है। क्या बनकरके बैठना है? हम सेवाधारी है। तो जन्म जन्मांतर का भाग्य ऊँचा बनेगा। जो यहाँ सेवा ले लेंगे, कंट्रोल कर लेंगे वहाँ उनकी राजाई कम हो जावेगी। इसलिए रुद्रमाला का पहला मणका और अंतिम मणके में क्या अंतर पड़ जाता है? एक जन्म जन्मांतर का कंट्रोलर बनता है बड़े ते बड़ा और एक जन्म जन्मांतर का राजा तो भले बने; कोई जन्म में बने कोई जन्म में न बने वो दूसरी बात, लेकिन भगोड़ा राजा बनेगा। क्या? (किसीने कहा- भगोड़ा राजा) भगोडा राजा। सन 98 में एड्वांस पार्टी में बहुत ऐसे निकले जो भाग खड़े हुए। जब झगड़ा शुरु हुआ तो बहुत से ऐसे निकले जो भाग खड़े हुए और बहुत से ऐसे निकले जो सामने आकरके स्थिर रहे। तो शूटिंग तो हो रही है ना? राजायें तो बनते हैं लेकिन जब देखते हैं – अरे! आक्रमण हो गया भाग जाते हैं।

जिज्ञासु: भागने वालों का घाटा होता है ना?
बाबा: हाँ जी ।

समयः 10.45-12.05
जिज्ञासुः बाबा, क्रोधाग्नि और कामाग्नि वालों से बाबा नहीं मिलेंगे बोला है ना?

बाबा: क्रोधाग्नि में बोला है कामाग्नि वालों के लिए नहीं बोला। क्रोधाग्नि अलग बात और कामाग्नि अलग बात। कामाग्नि वाला और काम वासना में जलने वाला पतित बनता है लेकिन क्रोधाग्नि में जलने वाला पतित नहीं कहा जाता। उसको पतित नहीं कहेंगे। बाप पतित को पावन बनाने के लिए आता है। तो पहले इस्लामी मरेंगे या पहले क्रिश्चियन मरेंगे? (सभी: इस्लामी) क्यों? ज्यादा पतित कौन बने? पहले इस्लामी पतित बने। ज्यादा पतित बने। तो बाप पतितपने को नहीं देखता। क्या? पतितपने को नहीं देखता। पतितों में अहंकार क्रोध ज्यादा होता है या क्रोधियों में अहंकार और क्रोध ज्यादा होता है? क्रोधियों में अहंकार भी बहुत होता है और अहंकारी को माफ नहीं किया जाता।

Disc.CD No.472, dated 27.12.07 at Hyderabad
Extracts-Part-2


Time: 05.53-10.44
Student: Baba, has the phrase 'raaj karega khalsa' been said about the senior mother or the junior mother?

Baba: People of which religion utter the words 'raaj karega khalsa'? (Everyone said - Sikhism) These words are used in Sikhism. So, people of which religion will be more proud of this statement? Sikhs will be more proud of this. What? 'Raaj karega khaalsaa'. It means that no Brahmin ruled in this world as much as that pure soul ruled after becoming a Brahmin. Who says this? Who utters these words? The Sikhs. Does Sikhism belong to the Iron Age, a tamopradhaan Age or a rajopradhan Age? (Everyone said - tamopradhaan Age) It is a religion of the tamopradhaan Age. And it is not even a religion of satopradhan stage in the Rajopradhan Age. It is not a religion of the degraded (tamo, taamsi) fourth stage in the Rajopradhan Age either. It emerges in the middle of the tamopradhan Iron age. So, will there be a difference between its intelligence and the intelligence of the people of other religions? There will be a difference.

They are not intelligent enough to think whether it is good or bad to rule in the Confluence Age. Speak up? It is very bad to feel egotistic about 'raaj karega khaalsaa' (the pure one will rule) in the Confluence Age. This does not sit in their intellect. They remain egotistic about this [and think] 'Yes, the soul which takes birth through my blood becomes the Father's child first of all and surrenders to Him; our religion is the greatest one. This is why they say 'raaj karega khaalsaa'. They do not know whether all the (female) deities who rule in the Confluence Age, all the deities who attain a high stage among those who rule, are degraded female deities or are they female deities of a high class? They are devis who play a part in the form of Kali. They are called Chamundi. It has been said in the Murli that even Chandika devi is worshipped. So, the mention about Chandika devi by Baba - is it in a demeaning sense or in a glorifying sense? It has been said in a demeaning sense. If someone wants to become a devi (female deity) - should she play the part of Mahagauri (the fairest one) or of Mahakali (the darkest one)? It is better if she plays the part of Mahagauri.

As long as the Confluence Age world of Brahmins exists, even if it is up to (20)36, we should never consider ourselves a king and sit; we should not consider ourselves a controller and sit. We should sit considering ourselves as what? We are servants/servers (sevadharis). Then we will accumulate fortune for many births. Those who take service here, those who control [others] here, their kingship will be reduced over there. So, what difference arises between the first bead and the last bead of the rosary of Rudra? One (of those two beads) becomes the biggest controller for many births and the other one may become a king for many births; he may become in one birth and may not become in some other birth, that is a different issue; but he may become a ‘runaway (bhagora) king’. What?
(Someone said - a ‘runaway king’) A ‘runaway king’. In 1998, many people emerged in the Advance Party who ran away. When the dispute began, there were many who ran away and there were many who confronted and remained stable. So, the shooting is taking place, is not it? They do become kings, but when they see - Arey! ‘We have been attacked’; they run away.
Student: Those who run away suffer a loss, don't they?
Baba: Yes.

Time: 10.45-12.05
Student: Baba, it has been said that Baba will not meet those who burn in the fire of anger (krodhaagni) and the fire of lust (kaamaagni), hasn’t it?

Baba: It has been said about those burning in the fire of anger and not the fire of lust. The fire of anger is different and the fire of lust is different. The one who has the fire of lust in him and the one who burns in the fire of lust becomes sinful, but the one who burns in the fire of anger is not called sinful. He will not be called a sinful one. The Father comes to transform the sinful ones into pure ones. So, will the Islamic people die first or will the Christians die first? (Everyone said - The Islamic people) Why? Who became more sinful? The Islamic people became sinful first. They became more sinful. So, the Father does not see the sinfulness. What? He does not see the sinfulness. Do the sinful ones have more ego, more anger or do the angry ones have more ego and more anger? The angry ones also have a lot of ego and the egotist is not pardoned. ....(to be continued)
.....................................................................................................................
Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 29 Apr 2010

वार्तालाप नं.472, हैदराबाद, दिनांक 27.12.07
उद्धरण-भाग-3


समयः 12.55-17.09
जिज्ञासुः बाबा, जब त्रिमूर्ति का चित्र एक्युरेट बनेगा उसमें बड़ी मम्मी, छोटी मम्मी और बाबा, साकार चित्र यही होगा ना?

बाबा: जो प्रैक्टिकल में मौजूद हो साकार शरीर से उनका झंडा बुलन्द होगा या जो मरमुरा गए हो उनके शरीर का झंडा बुलन्द होगा? जो प्रैक्टिकल में साकार में मौजूद होंगे उनका झंडा यादगार में बनता है उनकी यादगार होती है विश्व विजय करके दिखलावे। जिन्होने शरीर ही छोड़ दिया, उनके लिए गायन कैसे होगा कि ये कपड़े विश्व विजय करके दिखलावे? शरीर रूपी कपड़ा है न यहाँ तो? शरीर रूपी कपड़ा जो चैतन्य में जीवित हो उसका गायन होगा या मृत का गायन होगा? जो जीवित हो, और जीवित रहते-2 विश्व विजय करके दिखलावे। अब उन कपड़ों में स्टेज चाहे जैसी हो। चाहे हरे कपड़े की नीची वाली स्टेज हो, चाहे सफेद कपड़े की मिडियम स्टेज हो और चाहे लाल कपड़े की ऊँचे से ऊँची स्टेज हो लेकिन तीनों ही मिलेंगे स्वभाव संस्कार से, तो विश्व विजय करके दिखलावे। नहीं तो अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ेगा।
जिज्ञासु: बाबा बड़ी मम्मी की जगह और कोई लेगा क्या?
बाबा: आप ले सकते हैं।
जिज्ञासु: मेल चोला है।
बाबा: नहीं तो क्या हुआ? अगर रुद्रमाला के मणके नहीं है क्योंकि माथे पे तो लिखा हुआ नहीं है। लिखा है क्या? रुद्रमाला के मणके हैं, माथे पे तो लिखा हुआ नहीं है। कोई कन्वर्ट हो करके और ब्रह्माकुमारीयों में जाकर मिल जाए और वहाँ सरेंडर हो जाए और उनकी मत पर चलने लग पड़े और बादमें जब विजयमाला प्रत्यक्ष हो तो वो भी उनको फॉलो करें तो वो रानी की लिस्ट वाले हुए या राजा की लिस्ट वाले हुए? वो तो लिस्ट ही बदल गई। भल स्त्री चोला हो तो भी कन्वर्ट हो करके पुरुष चोला बन सकता है और भल पुरुष चोला हो तो भी कन्वर्ट हो करके स्त्री चोला बन सकता है।
जिज्ञासु: मैं कैसा बन सकूंगा? विधि तो बोलो।
बाबा: ये तो कन्वर्ट होने की बात है। (किसी ने कहा- वो देखा जायेगा अंत में) हाँ, अभी कोई रिजल्ट थोडे ही निकला है। जैसे पुरुष जन्म होता है और पुरुष जन्म जो है इतना पुरुष के रूप में विकार भोगता है, इतना विकार भोगता है, इतना लगाव रखता है स्त्री चोले से, कि बिना स्त्री चोले के जिन्दगी चलती नहीं। ऐसा होता है ना? तो अंत मते सो क्या होगा? स्त्री चोला मिलेगा। तो यहाँ भी भल रुद्रमाला का मणका है, देखने में मणका है लेकिन अन्दर से ये कमजोरी भरी हुई है। क्या? काम विकार की घोर कमजोरी भरी हुई है। इतनी कमजोरी भरी हुई है कि अगर अपनी स्त्री नहीं मिलेगी तो जो भी मिलेगा, जो भी दांव में आ गया उसको छोड़ेगा नहीं। बेटी हो तो बेटी को नहीं छोड़ेगा, बहन हो तो बहन को नहीं छोड़ेगा, भतीजी हो तो भतीजी को नहीं छोड़ेगा। तो इतना लगाव भारी लगा हुआ होगा तो अंत मते सो क्या हो जायेगी? अधोगति स्त्री चोला मिलेगा।

समयः 17.10-19.50
जिज्ञासुः बाबा, बीज में 100% विकार होते हैं या पत्ते में होते हैं?

बाबा: बीज एक प्रकार का नहीं है। बीज कितने प्रकार के हैं? 9 प्रकार के बीज है। 9 प्रकार के जो बीज है उनमें कोई बीज ऐसा भी है कि भगवान बाप भगवान के रूप में जब आता है तो उसी सेकेण्ड से अपने को कन्वर्ट कर लेता हैं।
जिज्ञासु: उसी सेकेण्ड से?
बाबा: उसी सेकेण्ड से अपने को कन्वर्ट करना शुरु कर देता है और कोई बीज ऐसे हैं; अभी इतने साल हो गए लेकिन बड़ी मुश्किल है समझने में। मुरली का एक एक महावाक्य उनकी बुद्धि में बैठ जाए, समझ में आ जाए, पक्का हो जाए- बड़ा मुश्किल है। ब्रह्मा की बोली हुई मुरली में भी संशय पैदा होता रहता है। अव्यक्त बापदादा की बोली हुई वाणी में भी संशय पैदा होता रहता है और जो क्लैरिफिकेशन की टीचर के द्वारा बोली हुई वाणी है उसमें भी, उसमें भी संशय पैदा होता रहता है।
जिज्ञासु: ये सारे आपके ही बच्चे हैं ना बाबा?
बाबा: वो तो बोला है- आपेही तरस परोही। भक्त लोग क्या कहते हैं भक्तिमार्ग में? क्या बोलते हैं मन्दिर में जाके? मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही आपेही तरस परोही। पतित राजायें पावन के मन्दिर रूपी घर में जाकरके उनके सामने माथा टिकाते हैं। कहते हैं- आपेही तरस परोही। ये शूटिंग कहाँ होती है? संगमयुग में शूटिंग होती है। रिजल्ट कहाँ खुलेंगे? संगमयुग में ही रिजल्ट खुलेंगे। प्रूफ सहित रिजल्ट खुलेंगे कि बिना प्रूफ के खुलेंगे? प्रूफ तैयार हो रहे हैं कि नहीं?
जिज्ञासु: बाबा, पावन बनने के लिए आपका वायब्रेशन मिलेगा या नहीं मिलेगा?
बाबा: जब बाप का वायब्रेशन आपको मिल रहा है तो हम तो बाप के बच्चे हैं हमारा वायब्रेशन क्यों नहीं मिलेगा आपको?

Disc.CD No.472, dated 27.12.07 at Hyderabad
Extracts-Part-3


Time: 12.55-17.09
Student: Baba, when the accurate picture of Trimurti is prepared, then it will have the corporeal pictures of the senior mother, the junior mother, and Baba, will it not?

Baba: Will the flag of the one who is present in practical through the corporeal body be hoisted or will the one who has died, his flag-like body be hoisted? Those who are present in practical in corporeal form, their memorial is formed in the form of a flag; their memorial is praised in the form of 'vishwa vijay karke dikhlaave' (it will conquer the world and show). How can it be praised about those who left their bodies that these clothes will conquer the world and show? Here, it is a cloth in the form of body, is not it? Will the cloth in the form of body which is alive be praised or will the dead one be praised? The one who is alive and conquers the world during his lifetime (will be praised). Well, those clothes may be in whatever stage. Whether the green cloth is in the lowest stage, whether the white cloth is in a medium stage and whether the red cloth is in the highest stage, but only when the nature and sanskars of all the three meet they will conquer the world. Otherwise, a single person cannot achieve a great goal alone.
Student: Baba, will anyone else take the place of the senior mother?
Baba: You can take it.
Student: I am in a male body.
Baba: So, what? If you are not a bead of the Rudramala, because it is not written on the forehead; is it written? It is not written on the forehead that you are beads of the Rudramala. If anyone converts and joins hands with the Brahmakumaris and surrenders there and starts following their opinion and later on when the vijaymala is revealed, if he too starts following them, then will he be included in the list of queens or in the list of kings? That list itself has changed. Even if someone is in a female body, she can convert and assume a male body. And even if someone is in a male body, he can convert and assume a female body.
Student: How can I become? Tell me the method.
Baba: It is about converting. (Someone said: that will be known in the end). Yes, the result is not yet out. For example, the male birth; in a male birth, the soul enjoys so much lust, so much lust, he becomes attached to the female body so much that he cannot live without the female body. It happens like this, doesn't it? So, as the thoughts in the end, what will be the fate? He will get a female body. So, similarly, even if someone is a bead of the Rudramala, he appears to be a bead (of Rudramala), but inside he has this shortcoming. What? There is a great weakness of lust. There is so much weakness that if he does not get his wife, he will not leave anyone whom he finds or [anyone who] comes in his clutches. if she is his daughter, he will not spare her; if she is his sister, he will not spare her ; if she is his niece, he will not spare her. So, if there is so much attachment (for the female body), then what will be the fate according to his thoughts in the end? He will get a female body in its lowest state.

Time: 17.10-19.50
Student: Baba, does a seed have 100% vices or do the leaves have?

Baba: Seed is not of one kind. How many kinds of seed are there? There are 9 kinds of seeds. Among the 9 kinds of seeds, there is even a seed which converts (transforms) itself from the very second God the Father comes in the form of God.
Student: From that very second?
Baba: It starts transforming itself from that very second and some seeds are such type that so many years have passed [that they have been in knowledge], it is very difficult for them to understand. It is very difficult for every version of Murli to sit in their intellect, for them to understand it, [for them] to become firm. They keep having doubts on the Murlis spoken by Brahma. They also keep raising doubts regarding the versions spoken by Avyakt BapDada and even in the versions of clarification spoken in the form of a teacher. They doubt even that (clarification).
Student: A ll these are your children Baba, aren’t they?
Baba: It has been said, ‘show mercy upon us (aapey hee taras parohi)’. What do devotees say in the path of Bhakti? What do they say when they go to a temple? I, the nirgunhara am devoid of virtues; please have mercy upon me. The sinful kings go to the temple-like home of the pure ones and bow their heads before them. They say: Have mercy upon us. Where does this shooting take place? The shooting takes place in the Confluence Age. Where will the result be out? The result will be out only in the Confluence Age. Will the result be out with proofs or without proofs? Are the proofs getting ready or not?
Student: Baba, will we get your vibrations to become pure or not?
Baba: When you are getting the Father’s vibrations, we are the Father’s children; why will you not get our vibrations?.....................................................................................................................
Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 01 May 2010

वार्तालाप नं.472, हैदराबाद, दिनांक 27.12.07
उद्धरण-भाग-४


समयः 27.58-30.45
जिज्ञासुः कोई बेगर बने बिगर प्रिंस नहीं बनता। पिछली बार पूछा गया था। उसका जवाब बाबा ने दिया है जो सरेंडर होते हैं वो रॉयल बाप के और रॉयल कुल के बन जाते हैं। तो मैने पूछा था वो कब बेगर बने और कब प्रिंस बने जो भी मणके डिकलैर हुए? तो बाबा ने कहा जो लौकिक में थे वो सब बेगर फिर बाप के पास सरेंडर हुए तो प्रिंस।

बाबा: नहीं। ज्ञान में आने के बाद बेगर बनेंगे। तन, मन, धन स्वाहा करेंगे तब का गायन है या ज्ञान में आने से पहले का गायन है? ज्ञान में आने के बाद, बाप का बनने का अंजाम करने के बाद जो अपना तन, मन, धन, सब स्वाहा कर दे पांडवों की तरह, जुए में हार जाए। क्या? बाप, बाप नहीं, माँ, माँ नहीं। माँ की बात नहीं मानेंगे, बाप की बात नहीं मानेंगे, पति की बात नहीं मानेंगे। क्यों? क्योंकि मुरली में बोला है लौकिक सम्बन्धियों से न कुछ पूछना है और न उनकी मत पर चलना है। तो बाप, बाप नहीं, बच्चा, बच्चा नहीं, माँ, माँ नहीं, पति, पति नहीं और पत्नी, पत्नी नहीं। कितना भी प्यारा हो पूरी बाजी लगायेंगे या नहीं लगायेंगे? लगायेंगे। तो इस तरह जो पूरी बाजी लगा देते हैं धन की भी, तन की भी ऐसी पूरी बाजी लगाने वाले मान मर्तबे की भी पूरी बाजी लगाते हैं वो फुल बेगर हो गए कि नहीं?

सन 76 में बाप अगर प्रत्यक्ष होता है तो फुल बेगर में प्रत्यक्ष होगा या मकान, दुकान, जमीन, जायदाद वाले में प्रत्यक्ष होगा? तो जैसा बाप के लिए वैसा बच्चों के लिए, कि कुछ दूसरा हिसाब हो जायेगा? हिसाब तो एक ही रहेगा ना? यहाँ भी ऐसा ही होगा। यहाँ तो पहली परीक्षा ही ये हैं, प्रश्न ही ये हैं नष्टोमोहा स्मृतिलब्धा। इसके प्रूफ प्रैक्टिकल में चाहिए। जिसके प्रैक्टिकल जीवन में ये प्रूफ नहीं मिलेगा – नष्टोमोहा स्मृतिलब्धा वो नहीं कहे जावेंगे ये फुल बेगर बने। फुल बेगर नहीं बने तो फुल प्रिंस भी नहीं बन सकते।


समयः 41.27-49.05
जिज्ञासुः बाबा, शाहजहाँ के सिंहासन के नीचे कोहिनूर हीरा था। अंग्रेज़ लोग औरंगजेब को मारने के बाद हीरा लेकर चले गये। जो शाहजहाँ है वो आधारमूर्त की दुनिया से निकला है या बीज रूपी दुनिया से निकला है?

बाबा: ब्राह्मणों की बेहद की दुनिया में वो नूर हीरा को (कौन) है? कोई है या नहीं है? जिसकी कीमत आज तक कोई भी आँक नहीं सका। ऐसा वो बेशकीमती हीरा चैतन्य हीरा होगा या जड़ हीरा होगा? चैतन्य हीरा है। वो चैतन्य हीरा लास्ट में, अंग्रेजों के पास लंडन में जाने से पहले, विदेश में जाने से पहले कौनसे राजा के अंडर में था? कौन राजा के अंडर में था?

जिज्ञासु: शाहजहाँ के सिंहासन के नीचे था।
बाबा: वो तो पुरानी बात हो गई। अंग्रेजों का राज्य जो है वो औरंगजेब के शासन काल में नहीं था। बाद में उनका राज्य शुरु हुआ। इतनी पावर उस समय नहीं थी अंग्रेजों की भारतवर्ष में। तो कोहिनूर हीरा तो बाद तक भी रहा न भारतवर्ष में? वो नूर हीरा जो है जो अभी विदेशों में हैं; अभी भारत में तो नहीं आया? बाप भी अभी कहाँ का वासी है? विदेशी बनके आया है या स्वदेशी है? विदेशी बनकर आया है। तुम्हारा प्रश्न- शाहजहाँ के शासन में जो उनकी गद्दी थी, सिंहासन था, माना आसन था, उस आसन के नीचे था हीरा, जिसपर वो बैठता था। आसन होता है ना? आसन किस लिए होता है? आधार लेने के लिए। जो जानवर अवतार है वो किसका आधार लेते हैं? और राम, कृष्ण के अवतार हैं वो किसका आधार लेते हैं? हाँ जो जानवर के कच्छ, मच्छ अवतार है, जो भी अवतार हैं जानवर रूप में वो ज्ञान का आधार लेते हैं। क्या? कन्याओं, माताओं को आधार मानकरके नहीं चलते और राम, कृष्ण ऐसे अवतार हैं जो कन्याओं, माताओं को आगे रख करके, अपने जीवन में उनका आधार ले करके फिर जीवनयापन करते हैं।

तो शाहजहाँ नाम से ही क्या साबित होता है? कहाँ का शाह? जहान का शाह। जो सारे जहान का शाह है संगमयुग में भी हुआ होगा या नहीं हुआ होगा? जरूर संगमयुग में भी हुआ होगा और संगमयुग में उसका कोई बच्चा हुआ होगा कंसी, जरासिन्धी जैसा जिसने बाप को भी जेल में डाल दिया हो। हाँ? जिसकी बुद्धि रूपी पॉकेट में भगवान का रंग नहीं जमा हुआ था, और और रंग भरे हुए थे। नाम क्या पड़ गया? औरंगजेब। वो हीरा गंवाने के निमित्त बन गया। या शाहजहाँ गंवाने के निमित्त बना? औरंगजेब गवाने के निमित्त बन गया। तो जो शाहजहाँ है जिसने अपना सिंहासन बनाया उसमें उस हीरे को रख दिया कि ये हीरा मेरा आधार है। हीरे जैसा जीवन अच्छा होता है या कौडी जीवन अच्छा होता है? हीरे जैसा जीवन अच्छा होता है। हीरा चमक मारता है, रोशनी देता है। कौनसी रोशनी? जहाँ रख दो वहीं रोशनी देगा। अगर उसके ऊपर धूल जम जाए।

जिज्ञासु: तो भी चमक मारेगा।
बाबा: नहीं। धूल जम जाएगी तो रोशनी नहीं देगा। अगर घिस दिया जाए, उसकी धूल हटा दी जाए... आँखों में भी, आँखों के द्वारा देहभिमान की धूल चढ़ती है या नहीं चढ़ती है? चढ़ती है। आँखों के द्वारा जो देहभिमान की धूल चढ़ी है हीरे पर वो धूल अगर घिस दी जाए, हटा दी जाए तो अन्धेरे में भी वो हीरा चमक मारेगा या नहीं मारेगा? अन्धेरे में भी चमक मारेगा। वो हीरा चमक मारने वाला है और उस हीरे का आधार ले करके शाहजहाँ, जहान के ऊपर शासन करने वाला है। वो ईश्वरीय शासन है। कहाँ शाहजहाँ और कहाँ औरंगजेब - दोनों में वास्ट अंतर हो जाता है। वो भाईयों को मारकरके और बाप को जेल में डाल करके राजाई लेता है। भारतवर्ष में कंस का और उग्रसेन का कथा कहानियों के रूप में जीवन चरित्र दिखाया गया है । बातें सब कहाँ की है? यहाँ की बातें हैं।

Disc.CD No.472, dated 27.12.07 at Hyderabad
Extracts-Part-4


Time: 27.58-30.45
Student: Nobody becomes a prince without becoming a beggar. This issue was raised the last time. Baba replied that those who surrender become children of the royal Father and members of the royal clan. So, I had asked as to when did all those beads, whose numbers have been declared, become beggars and when did they become prince? So, Baba said that when they were in lokik they were beggars and when they surrendered to the Father, they became prince.

Baba: No. They will become beggars after entering the path of knowledge. Is there praise about the time when they sacrifice their body, mind, wealth or is the praise related to the period before they enter the path of knowledge? After entering the path of knowledge, after promising to become the Father’s child, the one who sacrifices everything including the body, mind, wealth like the Pandavas; if they lose (everything) in the (unlimited) game of dice. What? The Father should not remain a Father, the mother should not remain a mother; they will not listen to the mother, they will not listen to the Father; they will not listen to the husband. Why? It is because it has been said in the Murlis that you should neither ask about anything to lokik relatives, nor follow their directions. So, the Father should not remain a Father, the child should not remain a child, the mother should not remain a mother, the husband should not remain a husband and a wife should not remain a wife. However lovely someone (i.e. the relative) may be, will they sacrifice them completely or not? They will. So, those who put their wealth as well as the body at stake completely, those who put their honour and position at stake completely, did they become full beggar or not?

When the Father is revealed in (19)76, is He revealed through a full beggar or will He be revealed through someone who has a house, shop, land, property? So, as is the case with the Father, it be the same with the children or will it be something else in their case? It will be the same case, will it not ? Even here it will be like this; here, the first test itself is this; the first question itself is this – nashtomoha smritilabdha. Its proof is required in practical. The one in whose life this proof – nashtomoha smritilabdha - is not found in practical, they will not be said to have become full beggars. If they do not become full beggars, they cannot become full prince too.


Time: 41.27-49.05
Student: Baba, the Kohinoor diamond was embedded below the throne of Shahjahan (a Mughal emperor of India who was the grandson of Emperor Akbar). Englishmen took away the diamond after killing Aurangzeb (the son of Shahjahan). Does Shahjahan emerge from the world of base-like souls or from the world of seed-form souls?

Baba: In the unlimited world of Brahmins, who is that noor (light) diamond (noor hira ko hai)? Is there anyone or not; the one whose price could not be estimated by anyone so far? Will such priceless diamond be a living diamond or a non-living diamond? It is a living-diamond. In which King’s custody was that living-diamond before reaching the Britishers in London, before reaching the foreign countries? Under which King’s custody was it?
Student: It was embedded below Shahjahan’s throne.
Baba: That is an old fact. The British rule (in India) was not during the rule of Aurangzeb; their rule started later on. At that time Britishers were not so powerful in India. So, Kohinoor diamond was present in India much later also. That noor diamond, which is now in the foreign countries; it has not yet come to India, has it? The Father too, is still a resident of which place? Has he come as a videshi (foreigner) or a swadeshi (the one belonging to his own country)? He has come as a videshi. Your question – Shahjahan’s throne (guddi/sinhaasan) during his rule; the diamond was embedded below that seat (aasan), on which he used to sit. There are seats, aren’t there? What is the purpose of a seat? To take support (to sit). Whose support do the avatars (incarnations of God shown in Hindu scriptures) in the form of animals take? And whose support do incarnations of Ram and Krishna take? Yes, the incarnations in the form of animals, the incarnations in the form of a tortoise, in the form of a fish take the support of knowledge. What? They do not take the support of virgins and mothers. And Ram and Krishna are such incarnations, who keep the virgins and mothers in front of them; in their life they take their support to live.

So, what does the name of Shahjahan prove? Shah (emperor) of which place? Shah of jahaan(world). The emperor of the entire world would have existed in the Confluence Age, or not? Certainly he would have existed in the Confluence Age too, and there must have been his child, the one like Kansi, Jarasindhi who must have put even the Father in jail. Hm? The one whose pocket-like intellect (buddhi roopi pocket) was not coloured by the colour of God; there were other colours (aur rang) in it. What was the name? Aurangzeb. He became instrumental in losing that diamond. Or did Shahjahan become instrumental in losing the diamond? Aurangzeb became instrumental in losing it. So, Shahjahan, who built his throne, embedded that diamond in it thinking that this diamond is my support. Is a diamond-like life better or a shell-like life better? A diamond-like life is better. A diamond shines; it radiates light. Which light? Wherever you place it, it will radiate light. If it is covered by dust…

Student: Even so it will radiate light.
Baba: No. It will not radiate light if it is covered by dust. If it is polished, if its dust is removed.... in the eyes too; does the dust of body consciousness get into the eyes or not? It does. The dust of body consciousness that has covered the diamond through the eyes, if it is polished, if it is removed, then, will that diamond radiate light even in darkness or not? It will radiate light even in darkness. That diamond is going to radiate light and by taking support of that diamond, Shahjahan is going to rule over the world. That is a Godly rule. There cannot be a comparison between Shahjahan and Aurangzeb. There is a vast difference between both of them. He (i.e.Aurangzeb) usurps kingship by killing his brothers and by putting his Father in jail. The life story of Kansa and Ugrasen has been shown in (mythological) stories in India. All these topics pertain to which place? These are topics of this place.

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Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 02 May 2010

वार्तालाप नं.472, हैदराबाद, दिनांक 27.12.07
उद्धरण-भाग-५


समयः 49.10-01.00.37
जिज्ञासुः बाबा, बुद्ध धर्म में बाबा का साकार जन्म है बिम्बिसार?

बाबा: महात्मा बुद्ध जो है उसको बौद्धी लोग भगवान मानते हैं कि हिन्दु लोग भी भगवान मानते हैं?
जिज्ञासु: बौद्धी लोग।
बाबा: नहीं। हिन्दु लोग तो सब धर्मों में कन्वर्ट होते हैं। तो और-2 धर्मों में कन्वर्ट होने वालों में जो बौद्धी धर्म के हैं वो बुद्ध को भी भगवान मानते हैं। वास्तव में भगवान बुद्ध नहीं है। (जिज्ञासु ने कुछ कहा) हाँ, जो बुद्ध है वो तो बहुत अर्वाचीन है और भगवान तो बहुत प्राचीन है। महात्मा बुद्ध की तो हिस्ट्री मिल रही है, प्रूफ मिल रहे हैं और भगवान ने जो पार्ट बजाया है उसकी तो कोई हिस्ट्री ही नहीं है, कोई प्रूफ नहीं है।

जैनी लोग आज से 2500 वर्ष पहले महावीर को भगवान मानते हैं, चौबीसवां तीर्थंकर मानते हैं। उनके 50 वर्ष के बाद महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। 50 वर्ष के बाद महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ तो महात्मा बुद्ध का जो साहित्य है, उस समय का लिखा हुआ वो साहित्य में कहीं भी महावीर का नाम निशान नहीं है। अब ऐसा सम्भव हो सकता है क्या कि महावीर भगवान के आने के 50 साल के बाद उसी भारत में महात्मा बुद्ध हुए हो और उनके साहित्य में महावीर का नाम निशान गायब? कोई शिलालेखों में, कोई भोजपत्रों में कहीं न कहीं तो नाम निशान होना चाहिए। इससे क्या साबित हुआ? इससे साबित हो गया कि न जैनियों के भगवान 2500 साल पहले हुए, न बौद्धियों के भगवान 2500 साल पहले हुए। महात्मा बुद्ध भगवान थे ही नहीं।

भगवान तो आता है तो राजयोग सिखाता है और ऐसा राजयोग सिखाता है जिस राजयोग से हम बच्चे जन्म जन्मांतर के राजायें बनते हैं। जितने भी धर्म है दुनिया में फैले हुए, जिनकी राजाईयाँ चली है उनमें बौद्ध धर्म की राजाई बहुत थोड़े समय चली है। क्या? अगर भगवान बुद्ध हुए होते तो उनके फॉलोवर्स को सबसे जास्ती राजाई मिलनी चाहिए। सबसे ज्यादा, लम्बे वर्ष तक राजाई करने वाले कौन होने चाहिए? बौद्ध धर्म के फॉलोवर। लेकिन वो राजायें बनने के बजाए आज भिखमंगे दिखाई पड़ रहे हैं या राजायें दिखाई पड़ रहे हैं? उनका नाम ही है बौद्ध भिक्षु, बौद्ध भिक्षुणी। भिक्षु–भिक्षुणी माना क्या होता है? भिक्षु माने भीख मांगने वाला और भिक्षुणी माना भीख मांगने वाली। तो भगवान भिखमंगा बनाने के लिए आता है या राजा बनाने के लिए आता है? बुद्ध कोई भगवान नहीं थे।

जिज्ञासु: बाबा बिम्बिसार का संगमयुग में क्या पार्ट है?
बाबा: जो भी धर्म हैं और उन धर्मों में जो भी राजायें हुए हैं उन राजाओं को राजाई देने वाला पार्ट कौनसा है? क्योंकि जो भी धर्मपितायें आए उन्होंने तो सिर्फ अपने धर्म की स्थापना की। कोई धर्मपिता ने आकरके राजाई अथवा राजधानी की स्थापना नहीं की। धर्मपिताओं के आने के 300-400 वर्षों के बाद जब उनका धर्म बहुत फैल जाता है, लाखों की तादाद में धर्म के फॉलोवर्स की संख्या बन जाती है तब उनकी राजाई शुरु होती है। तो बिम्बसार जो हुआ वो महात्मा बुद्ध के जमाने में हुआ या थोड़े समय के बाद हुआ? जो भी हिस्ट्री है उस हिस्ट्री को देखना पड़े।

महात्मा बुद्ध ने जिस शरीर में, जिस चोले में प्रवेश किया वो चोला जिस राजा का पुत्र होता है वो पुत्र होने के नाते कन्वर्ट होने वाली आत्मा साबित होती है। होती है या नहीं? कन्वर्ट होने वाली आत्मा साबित होती है और सतयुग के जितने भी नारायण है परवर्ती, बाद में आने वाले, सतयुग के पहले नारायण को छोडकर, वो सब कन्वर्ट होने वाले नारायण है। उनकी पूजा नहीं होती इसलिए।

तो द्वापर युग में महात्मा बुद्ध का जो आधारमूर्त है वो कन्वर्ट होने वाली नारायण की आत्मा है, कम जन्म लेने वाली आत्मा है। उससे भी ज्यादा पावरफुल उसका बाप है, उसका दादा है या वो स्वयं है? उसका बाप-दादा उससे भी ज्यादा पावरफुल राजा बनता है। तो उनके बाप जो हुए हैं; जिस समय महात्मा बुद्ध कन्वर्ट होते हैं बौद्धी धर्म में या महात्मा बुद्ध की आत्मा सिद्धार्थ को कन्वर्ट करती है, सिद्धार्थ के बाप और सिद्धार्थ के दादे उस समय में मौजूद होते हैं या नहीं होते हैं, मर जाते हैं? पहले लम्बी आयु होती थी। वो मौजूद होते थे, धरत परिये पर धर्म न छोडिये ऐसी स्टेज वाले थे। संगमयुग में उन बीजरूप आत्माओं ने ये फाउंडेशन डाला। कन्वर्ट होने वाले नारायणों के बाप के रूप में। जो फाउंडेशन ऐसा डालने वाली आत्मायें हैं वो उस जन्म में, उस शरीर से जिस शरीर से वो सिद्धार्थ के बाप और डाडे बनते हैं, कन्वर्ट होते हैं या नहीं कन्वर्ट होते हैं?
(सभी ने कहा: नहीं होते)
बाबा: अरे जिसका प्रश्न है उसको तो बोलने दो।
जिज्ञासु: प्रश्न मेरा नहीं।
बाबा: चलो तुम्हारा नहीं तुम्हारे भाई बन्धु का सही। (जिज्ञासु ने कुछ कहा) हाँ वो कन्वर्ट होने वाली आत्मायें नहीं है जो बीजरूप बाप से डायरेक्ट पढ़ाई पढ़ने वाली आत्मायें हैं, नम्बरवार। इसलिए उस जन्म में कन्वर्ट नहीं होते। भले बच्चा चला गया तो चला जाए दूसरे धर्म में। अंत तक विरोध करते हैं। सिद्धार्थ उर्फ महात्मा बुद्ध को यहाँ तक प्रताड़ित करते हैं कि देश-निकाला भी मिल जाता है। लेकिन अन्दर की आत्मा जो है ये जानती है कि मेरा बच्चा, मेरा पोता कितना महान व्यक्ति है जो देश, विदेश में जा करके सैकडों नहीं, हजारों नहीं लाखों लोगों को कन्वर्ट कर रहा है, लाखों लोग उसके पीछे-2 फिर रहे हैं। वो शौहरत तो फैलती है कि नहीं? तो बाप के पास, उसके डाडे के पास वो शौहरत नहीं आती है क्या? जब शौहरत आती है तो दिल उस बच्चे की तरफ उनका खिंचता है कि नहीं खिंचता है? (सभी: खिंचता है) उसकी महानता के प्रति दिल आकर्षित होता है ना? तो याद आता है। वो याद अंत मते सो गति कर देते हैं।

200-300 वर्षों के बाद वो बाप और डाडे की आत्मायें जन्म लेते-2 बौद्ध धर्म में कन्वर्ट हो जाती है जन्म लेकर। 300-400 वर्षों के बाद बौद्ध धर्म में जाके जन्म लेती है और जन्म लेने के बाद; क्योंकि वो पावरफुल बीजरूप आत्मायें हैं और बच्चे के प्रति उनका मोह है तो वो मोह को साकार में, प्रैक्टिकल में परिवर्तन कर देती है पावरफुल आत्मायें होने के कारण और बौद्ध धर्म का फाउंडेशन डालने के निमित्त बनती हैं।

जिज्ञासु: बाबा क्रिश्चियन धर्म में जैसे दो है- कैथलिक और प्रोटेस्टेंट। वैसे ही बौद्ध धर्म में भी है क्या?
बाबा: हीनयान, महायान।
जिज्ञासु: उस धर्म को तो श्रेष्ठ कहते हैं ना। श्रेष्ठ कहते हैं ना उनको। जो विचार है, बौद्धियों की जो विचार धारा है।
बाबा: श्रेष्ठ तो इसलिए कहते हैं कि वो अहिंसा को परमधर्म मानते हैं। जो किश्चियन धर्म का दूसरा छेडा बनता है वो तो राजाओं की हिंसा कर देता है इसलिए श्रेष्ठ नहीं है।


Disc.CD No.472, dated 27.12.07 at Hyderabad
Extracts-Part-5


Time: 49.10-01.00.37
Student: Baba, does Baba take corporeal birth as Bimbisar in Buddhism?

Baba: Do Buddhists consider Mahatma Buddha as God or do Hindus also consider him as God?
Student: The Buddhists.
Baba: No. Hindus convert to all the religions. So, among those who convert to other religions, those who belong to the Buddhist religion consider Buddha also as God. Actually, Buddha is not God. (Student said something) Yes, Buddha is not so ancient, but God is very ancient. The history of Mahatma Buddha is available, we have the proofs [of Mahatma Buddha], and there is no history, no proof at all of the part played by God.

Jains believe Lord Mahavir, the twenty fourth Teerthankar to have existed 2500 years ago. Mahatma Buddha was born 50 years after him. Mahatma Buddha was born 50 years later, but there is no name or trace of Mahavir in the literature related to Mahatma Buddha, in the literature written at that time. Well, can it be possible that Mahatma Buddha existed just 50 years after the arrival of Bhagwaan Mahavir and there is no name or trace of Mahavir in his literature? There should be some name or trace somewhere or the other in shilalekh (rock edicts), bhojpatra (the bark of the birch tree which was used to write on in olden times). What does it prove? It proves that neither the God of Jains existed 2500 years ago nor the God of Buddhists existed 2500 years ago. Mahatma Buddha was not God at all.

When God comes He teaches Rajyog and He teaches such Rajyog, with the help of which we children become kings for many births. In all the religions that are spread all over the world, whose kingships have existed, the kingship of Buddhism has existed for a very short period. What? Had Buddha been God, his followers should have achieved kingship for the longest period. Who should have ruled for the maximum length of time, for the maximum number of years? The followers of Buddhism. But instead of becoming kings, do they appear to be beggars or kings today? Their name itself is Buddhist Bhikshu , Buddhist Bhikshuni . What is meant by Bhikshu-Bhikshuni? Bhikshu means men who seek alms and Bhikshuni means women who seek alms. So, does God come to make us beggars or to make us kings? Buddha was not God at all.

Student: Baba, what is the role of Bimbisar in the Confluence Age?
Baba: Which is the part that gives the kingship to the kings who have existed in all the religions? It is because all the religious fathers who came established just their religion. No religious Father established kingship or kingdom when he came. 300-400 years after the arrival of the religious fathers, when their religion spreads far and wide, when the strength of the followers of their religion grows to lakhs, their kingship begins. So, did Bimbisar exist during the times of Mahatma Buddha or a short while after that? We will have to see the history.

The body in which Mahatma Buddha entered; the king whose son thatbody is…, being the son it proves to be a soul that converts. Does it or doesn’t it? It proves to be a soul that converts and all the subsequent Narayans of the Golden Age, who come later on, except the first Narayan of the Golden Age, are the Narayans who convert. This is why they are not worshipped.

So, the root soul of Mahatma Buddha in the Copper Age is a soul of the Narayan who converts and he is the one who takes lesser number of births. Who is more powerful than him - his Father, his grandfather or he himself? His Father and grandfather become more powerful kings than him. So, the time when his Father exists, when Mahatma Buddha converts to Buddhism or when the soul of Mahatma Buddha converts Prince Siddharth, did Siddharth's Father and his grandfather exist at that time or not? Or do they die? In the past, people used to live long. They used to be present; they were in a stage of 'dharat pariye par dharma na choriye' (you may fall dead but you should not leave your religion). Those seed-form souls laid that foundation in the Confluence Age in the form of the Father of the Narayans who convert. Do the souls which lay such a foundation, convert or not in that birth, through that body, through the body through which they become Siddharth's Father and grandfather?
(Everyone said - They do not)
Baba: Arey, let the person, who has asked the question speak.
Student: It is not my question.
Baba: OK, it may not be your question; let it be a question of your relatives. (Student said something) Yes, the souls which study the knowledge directly from the seed-form Father are not the souls which convert numberwise. This is why they do not convert in that birth. Even if the child adopts another religion, they oppose (the child’s adopted religion) till the end. Siddharth alias Mahatma Buddha is tormented to the extent that he is banished from the kingdom. But the soul knows within : my child, my grandson is such a great personality who is converting not just thousands, but lakhs of people in the country and abroad; lakhs of people are following him. Does that fame spread or not? So, does (the news of) that fame not reach that Father or grandfather? When the (news of the) fame reaches them, then doesn’t their heart reach out to that child or not? (Everyone said – It does). The heart is pulled towards his greatness, isn’t it? So, his thoughts emerge in his mind. That remembrance leads to a fate according to the thoughts in the end.

After 200-300 years, the souls of that Father and grandfather convert to Buddhism after taking many births. They take birth in Buddhism after 300-400 years and after taking birth…, because they are powerful seed-form souls and they have attachment for that child; so, that attachment causes transformation in corporeal form, in practical because they are powerful souls. And they become instruments in laying the foundation for Buddhism.

Student: Baba, for example there are two sects in Christianity – Catholics and Protestants; similarly, are there any sects in Buddhism?
Baba: Heenyaan, Mahaayaan.
Student: That religion is called a righteous religion, isn’t it? Their opinion, the thinking of the Buddhists…
Baba: It is called righteous because they consider non-violence to be the highest religion. The second offshoot of Christian religion kills the kings; this is why it is not righteous....(concluded)
.....................................................................................................................
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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 13 May 2010

वार्तालाप नं.475, बंगलौर, दिनांक 30.12.07
उद्धरण-भाग-१


समयः 00.00 - 3.57
जिज्ञासु- बाबा, काली को तेल चढ़ाते हैं बोला ना। तो तेल माना ज्ञान की भाषा में?

बाबा- घृत में और तेल में क्‍या अंतर है? घृत की कीमत में और तेल की कीमत में इतना क्‍यों अंतर रहा और है?
जिज्ञासु- घृत माना समझा नहीं। घृत माना क्‍या?
बाबा- घृत माना घी प्‍योरिटी और तेल माना प्‍योरिटी या इम्प्योरिटी? तेल को प्‍योर बनाने के लिए रिफाईन करते हैं। रिफाईन करने के बावजूद भी उसकी कीमत घी की इतनी नहीं होती। क्‍यों? तेल तेल ही है। और घी घी है। घी सार से निकाला जाता है या दूध रूपी या द‍ही रूपी विस्‍तार से निकलता है?
जिज्ञासु- सार से।
बाबा- पहले दूध और दही का सार निकाला जाता है। फिर सार को भी गरम करके घी निकालते हैं। और तेल? तेल सार से निकलता है क्‍या? सीधा ही विस्‍तार से तेल निकल आता है। तेल की प्‍योरिटी में और घी की प्‍योरिटी में जमीन-आसमान का अंतर है।
जिज्ञासु- घृत भी चिपक जाता है ना बाबा?
बाबा- घृत में पानी का अंश होगा तो ज़रूर चिपकेगा। और अच्‍छी तरह से तपाया हुआ होगा तो घी चिपकता नहीं है। मिक्‍सचरिटी होगी तो चिपकेगा और मिक्‍सच‍रिटी नहीं होगी तो नहीं चिपकेगा।
जिज्ञासु- घी में शक्ति मिलता है और तेल मे शक्ति नहीं मिलता।
बाबा- मिलती है शक्ति; लेकिन एक होती है विकारी शक्ति और एक होती है बुद्धि को शुद्ध बनाने वाली शक्ति। घी में भी वेराईटी होती है। भैंस का घी। भैंस बुद्धि में और गाय की बुद्धि में क्‍या अंतर होता है? अंतर तो ज़रूर होता है। जैसा भोजन खायेंगे वैसी बुद्धि बनेगी। भेड़ का भी घी होता है। भेड़-बकरी का दूध बुद्धि कैसी बनाएगा? भेड़-बकरी जैसी बुद्धि बनाएगा। जानवरों का माँस खाते हैं उनकी बुद्धि देखो और शाकाहारी भोजन खाते हैं उनकी बुद्धि देखो।

समयः 4.00 - 14.08
जिज्ञासु- बाबा, देवतायें वाम मार्ग में चले गए ये किस समय का गायन है? संगमयुग में कब?

बाबा- दुनियाँ की हर चीज चार अवस्‍थाओं से पसार होती है। कोर्इ ऐसी चीज हो जो चार अवस्‍थाओं से पसार न होती हो तो बताएं। देवता हो, चाहे क्षत्रीय हो, चा‍हे वैश्‍य हो, या शूद्र वर्ण हो। चार अवस्थाओं से पसार होते हैं या नहीं? होते हैं। तो देवता वर्ण की आत्‍मायें भी जो 16 कला सम्‍पूर्ण देवता कहे जाते हैं वो भी चार अवस्‍थाओं से पसार होते होंगे। वो देवतायें कौनसे युग के हैं? असल में कौन से युग के हैं? सतयुग के। वो सतयुग के देवतायें भी चार अवस्‍थाओं से पसार होते हैं। और ऐसे नहीं कि चार युगों में ही चार अवस्‍थाओं से पसार होते हैं। संगम में भी और शूटिंग पीरियड में भी चार अवस्‍थाओं से पसार होते हैं। नहीं तो टैली करके देख लो। बेसिक नालेज से टैली करके देख लो। और जो एडवांस में आए हैं, जब से आए हैं लेकरके तबसे अब तक देख लो। अवस्‍था में अंतर आता रहा कि नहीं आता रहा? आता रहा।

भक्ति भी चार अवस्‍थाओं से पसार होती है। पहले भक्ति सतोप्रधान थी फिर भक्ति व्‍यभिचारी तमोप्रधान बनती है। ज्ञान भी पहले सतोप्रधान। जब भट्ठी करने गए तो एक में कितनी श्रद्धा होती है। और बाद में उस श्रद्धा, विश्‍वास, भावना का बंटवारा होता रहता है। तो अवस्‍थायें नीचे आ जाती हैं। ज्ञान भी एक से सुनेंगे तो अव्‍यभिचारी ज्ञान है, सतोप्रधान ज्ञान है। और अनेकों की बातें सुनकरके धारण किया, जीवन में अपनाया। तो ज्ञान भी तमोप्रधान बन जाता है। हाँ हर आत्‍मा की धारणा अपनी-2 अलग-2 है। सभी आत्‍मायें एक जैसी तमोप्रधान नहीं बनती। और सभी आत्‍मायें टाईम टू टाईम एक जैसी तमोप्रधान नहीं बनती। नहीं तो असल देवता वर्ण की जो पहला नंबर बीजरूप आत्‍मा है। देवता वर्ण का पहला बीज और इस्‍लाम धर्म का पहला बीज। अरे! सृष्टि का कोई तो पहला बीज होगा। होगा या नहीं होगा? होगा। ऐसे ही देव‍ता धर्म का पहला आधारमूर्त माना जड़ रूप और इस्‍लाम धर्म का पहला आधारामूर्त अर्थात् जड़ के रूप में पार्ट बजाने वाला, जड़ों के रूप में। इन दोनों के बीच में अगर हम टैली करें तो पहले कौन तमोप्रधान बनता है और लम्‍बे समय के बाद तमोप्रधान कौन बनता है?

जिज्ञासु- इस्‍लाम धर्म का।
बाबा- हाँ। इस्‍लाम का जो आधारमूर्त जड़ है वो द्वापर के आदि से ही तमोप्रधान बन गई। और जो देवता धर्म की जड़ है, आधारमूर्त है वो अंतिम जन्‍म में जाकरके सिर्फ दृष्टि मात्र से तामसी बनती है तो कितना वास्‍ट डिफरेन्‍स है। बाकी ऐसे नहीं कहेंगे कि सतोप्रधान सतोप्रधान ही रहेगा और तमोप्रधान तमोप्रधान ही रहेगा। देवता धर्म की बीजरूप आत्‍मा और देवता धर्म का अव्‍वल नम्‍बर जड़रूप आधारमूर्त आत्‍मा। ज्‍यादा काली और ज्‍यादा गोरी कौन पार्ट बजाएगी? बीजरूप आत्‍मा भल लम्‍बे समय तक सात्विक स्‍टेज में पार्ट बजाए तो भी अंतिम जन्‍म में सबसे जास्‍ती तामसी पार्ट बजाने वाली बन जाती है। तो साबित क्‍या हुआ? कि हर धर्म को चार अवस्‍थाओं से पसार होना पड़ता है। और हर आत्‍मा को चार अवस्‍थाओं से पसार होना पड़ता है। हर युग में ये क्रम चलता है। चाहे कोई भी युग में आने वाली आत्‍मा हो परमधाम से, वो चार अवस्‍थाओं से पसार ज़रूर होती है।

जो आत्‍मायें अभी-2 भी उतर रहीं हैं ऊपर से वो पहले सतोप्रधान पार्ट बजाती है, दुःख नहीं भोगती, सुखी आत्‍मा का पार्ट बजाती है। जो सुखी होता है वो दूसरों को भी क्‍या देता है? सुख ही देता है। और जो दुःखी होता है, खुद ही दुःखी है, तो दूसरों को क्‍या बाँटेगा? दुख ही बाँटेगा। चाहे संगमयुग हो, चाहे कोई भी युग हो। संगमयुग में शूटिंग होती है चार अवस्‍थाओं की। और युगों में असली ड्रामा होता है। उसे शूटिंग नहीं कहेंगे। शूटिंग कहो, रिहर्सल कहो, रिकार्डिंग कहो। ड्रामा में जो ड्रामाबाजी होती है, नाटकबाजी होती है वो रियल होती है या नकली होती है? जैसे मुरली में बोला- बाप विदेशी बनकरके आए हुए हैं। तो रियलिटी में विदेशी हैं या वास्‍तव में विदेशी हैं या नाटकबाजी है?

जिज्ञासु- नाटकबाजी।
बाबा- बनकर आए हैं। इसका मतलब थे नहीं विदेशी। पार्ट बजाए रहे हैं विदेशी बनने का। क्‍यों? अगर विदेशी पार्ट न बजाए तो सब बच्‍चों से मिल भी नहीं सकते। और पहले से ही पक्‍का स्‍वदेशी का, मर्यादा पुरूषोत्‍तम का पार्ट बजायें। तो क्‍या होगा? सारी दुनियाँ में पहले ही प्रत्‍यक्षता हो जाएगी। बाप भी गुप्‍त, बच्‍चे भी गुप्‍त। उनका दान, मान, पद, पुरूषार्थ, सब गुप्त हो जाता है।

Disc.CD No.475, dated 30.12.07 at Bangalore
Extracts-Part-1


Time: 00.00-03.57
Student: Baba, it is said that oil is poured over (the idol of) Kali. So, what does oil mean in knowledge?

Baba: What is the difference between ghrit (purified butter/ghee) and oil? Why has there been such a vast difference in the price of ghrit and oil?
Student: I did not understand what is meant by ghrit. What is meant by ghrit?
Baba: Ghrit means ghee, purity. And does oil mean purity or impurity? Oil is refined to make it pure. Despite refining it, it is not as costly as ghee. Why? After all, oil is oil. And ghee is ghee. Is ghee produced from the essence or from milk or curd that is the expanse?
Student: From the essence.
Baba: First the essence of milk and curd is extracted. Then that essence is heated to extract ghee. And oil? Does oil emerge from essence? Oil emerges directly from the expanse. There is a vast difference between the purity of oil and ghee.
Student: Ghee also sticks, doesn’t it Baba?
Baba: If there is a trace of water in ghee it will certainly be sticky. And if the ghee has been heated properly, it does not stick. If there is contamination it will stick and if there is no contamination, it will not stick.
Student: We get energy through ghee and not through oil.
Baba: You do get energy (through oil), but one is a vicious energy, and one is an energy that makes the intellect pure. There is a variety in ghee too. Ghee prepared from the milk of buffalo. What is the difference between the intellect of a buffalo and the intellect of a cow? There is definitely a difference. As the food we eat, so shall our intellect become. There is a ghee prepared from the milk of sheep too. How will the milk of sheep and goats make the intellect? It will make the intellect like sheep and goats. Look at the intellect of those who eat the meat of animals and the intellect of those who eat vegetarian food!

Time: 04.00-14.08
Student: Baba, to which time does the saying ‘deities started following the leftist path’ pertain ? At which time in the Confluence Age?

Baba: Everything in the world passes through four stages. Tell me if there is anything that does not pass through four stages? Whether it is deity, kshatriya, vaishya or Shudra class. Do they pass through the four stages or not? They do. So, the souls belonging to the deity class, who are said to be deities perfect in 16 celestial degrees also must have passed through the four stages. Those deities belong to which Age? To which Age do they belong in reality? To the Golden Age. Those deities of the Golden Age also pass through four stages. And it is not as if they pass through the four stages only in the four Ages. Even in the Confluence Age, and even in the shooting period they pass through the four stages. Otherwise, just tally and see. Tally with the basic knowledge and see and those who have entered the path of advance knowledge, ever since they have entered, they can see (themselves) since that time till now. Has the stage been changing or not? It has been.

Bhakti passes through four stages too. First Bhakti was satopradhan ; then Bhakti becomes adulterous, tamopradhan . The knowledge was also initially satopradhaan; when someone goes for bhatti, there is so much faith in the One. And later on, that faith, that devotion, that feeling is divided. So, the stage comes down. Even in case of knowledge, if you listen from One, the knowledge remains unadulterated, satopradhan knowledge. And if you listen to the words of many and inculcate it, if you adopt it in life, then knowledge also becomes tamopradhan. Yes, the way every soul assimilates is different. All the souls do not become tamopradhan equally. And all the souls do not become equally tamopradhan from time to time. Otherwise, the number one seed-form soul of the true deity class, the first seed of the deity class and the first seed of Islam religion….. Arey! There must be a first seed of the world. Will there be or not? There will be. Similarly, the first supporting soul (aadhaarmoort) of the deity religion, i.e. the root form and the first supporting soul of Islam religion, i.e. the one who plays a part in the form of root; if we tally the difference between both of them, then who becomes tamopradhan first and who becomes tamopradhan after a long time?

Student: The one who belongs to Islam religion [becomes tamopradhan first].
Baba: Yes. The supporting root of Islam became tamopradhan since the beginning of the Copper Age itself. And the root, the supporting soul of the deity religion becomes tamopradhan only through vision in the last birth. So, there is such a vast difference [between them]. But it will not be said that the satopradhan one will always remain satopradhan and the tamopradhan one will always remain tamopradhan. The seed-form soul of deity religion and the number one supporting root-like soul of the deity religion, who will play a darker part and who will play a fairer part? Although the seed-form soul plays a part in the satvik (pure) stage for a longer time, it becomes an actor who plays the most degraded part in the last birth. So, what does it prove? It proves that every religion has to pass through the four stages. And every soul has to pass through the four stages. This sequence goes on in every Age. It does not matter in which Age the soul comes down from the Supreme Abode, it certainly passes through the four stages.

The souls that are descending from above in the present time play a satopradhan part initially. They do not suffer pain. They play the part of a happy soul. What does a happy soul give the others? He gives only happiness. And the one who is sorrowful; when he himself is sorrowful, what will he distribute to the others? He will distribute only sorrow. Whether it is the Confluence Age, or any Age. The shooting of four stages takes place in the Confluence Age. In other Ages, the actual drama takes place. It will not be called shooting. Call it shooting, call it rehearsal, call it recording. The dramatization that takes place in a drama is real or is it unreal? For example, it has been said in the Murli : The Father has come in the form of a foreigner. So, is he a foreigner in reality or is He a foreigner actually or is it dramatization?

Student: Dramatics.
Baba: He has come in the form of (a foreigner). It means that He was not a foreigner. He is playing a part of becoming a foreigner. Why? If he does not play the part of a foreigner, then He can’t even meet all the children. And if He plays the part of a firm swadeshi, Maryadas purushottam (highest among all human beings in following the code of conduct) from the beginning, then what will happen? He will be revealed in the entire world in the beginning itself. The Father as well as the children are hidden. Their donation, respect, post, spiritual effort, everything is hidden....(to be continued)
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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 14 May 2010

वार्तालाप नं.475, बंगलौर, दिनांक 30.12.07
उद्धरण-भाग-2


समय- 14.16-14.‍50
जिज्ञासु- बाबा, संगमयुग का ड्रामा का रिकॉर्ड होता है ना। वो पहले 5000 वर्ष का एक्टe करता है। वो पहले है।

बाबा- उसमें आगे पीछे नहीं कर सकते। ये कह सकते हैं कि जो आत्मा जब श्रीमत पर चलती है तो उसका 21 जन्मों का काउन्टक होता है। रिकार्डिंग कहो या शूटिंग कहो। और मनमत या मनुष्यउमत पर चलती है तो 63 जन्मोंह का काउन्टक होता है।

समय-15.00-26.22
जिज्ञासु- बाबा, अष्टमदेवो में चार आत्माकयें स्थाहपनाकारी, चार पालनाकारी, चार विनाशकारी हैं ना।

बाबा- माना ऐसे नहीं कि कोई आत्मां में स्थापना के ही सदैव संस्काहर हैं, पालना के नहीं हैं, या विनाश के नहीं हैं। हर आत्माक में स्थाकपना, पालना और विनाश के संस्कार होते ज़रूर हैं। लेकिन कोई आत्मां में प्रधानता होती है। (जिज्ञासु ने कुछ कहा)
बाबा- हाँ। कोई स्थारपना करने में प्रधान गुणों वाली है, कोई पालना करने में प्रधान गुणों वाली है और कोई विनाश करने में प्रधान गुणों वाली है। तो?
जिज्ञासु- तो ये ही पूछना था विनाशकारी और पालनाकारी में फर्क क्या है? जो चार आत्मागयें स्थाञपनाकारी होती हैं और चार आत्मा यें विनाशकारी होती हैं ना।
बाबा- ब्रह्मा को कहेंगे कैसा पार्ट? स्थाापना का पार्ट। माँ बच्चोंक के अवगुणों को देखने वाली होती है या नहीं होती है? गुणों को ही देखती है अवगुणों को नहीं देखती। और बाप गुणों को भी देखता है तो अवगुणों को भी देखता है। भारत की परंपरा में विष्णुक देवता जो सदैव बाप की सुरक्षा का पार्ट बजाने में स्त्री चोले का पार्ट बजाता रहा। लक्ष्मीव रूप धारण करके क्या् पार्ट बजाया? बाप की सुरक्षा की भस्माीसुर से। मोहनी रूप धारण किया। वो विष्णु का पार्ट है ना। तो ऐसे नहीं है की उसमें पालना के ही संस्कार हैं। नहीं। संस्काकर तो स्थाधपना के भी हैं, पालना के भी हैं और विनाश के भी कुछ न कुछ संस्कार हैं लेकिन बाप के सहयोगी के रूप में है।
जिज्ञासु- तो जो विनाशकारी होते हैं वो अगेन्ट् में होते है क्याण बाप के?
बाबा- सदैव अगेन्ट्नाश नहीं हो सकता। ये हो सकता है कि आदि में कुछ न कुछ सहयोगी और बाद में विरोधी बन जाए। आदि में जो सहयोगी होगा तो आदि सो अंत में सहयोगी ज़रूर बनेगा। बाकी बीच में? बीच में कहेंगे लम्बे समय तक भी विनाशकारी हो सकता है। तो ज्यादा कमाई कौनसी की - डिस्ट्रक्शन की या कनस्ट्रक्शकन की? डिस्ट्रनक्श न की कमाई ज्यांदा की तो पद कहाँ मिलेगा? 21 जन्मों का पद तो मिलेगा लेकिन कहाँ मिलेगा? आदि में मिलेगा या अंत में मिलेगा? अंत में मिलेगा।
जिज्ञासु- बाबा, अष्टदेवों में पहले चार स्थापना करने वाली है। और चार को बोला वो पालना करने वाली है। और चार है उसका काम क्या?
बाबा- उनका काम आदि में थोड़ा सहयोगी बनना और अंत में थोड़ा सहयोगी बनना। आदि में भी लेने वाले फर्स्टा और अंत में भी लेने वाले फर्स्टं और बीच में लम्बे समय तक विनाशकारी।
जिज्ञासु- अंत में लेने वाले माना क्या लेना?
बाबा- वर्सा ही लिया जाता है। बाप से क्या लिया जाता है? जो भी एडवांस के आदि में थे सहयोगी विशेष - वो कौनसे धर्म की विशेष आत्मा्यें थीं जिन्होंने बाप को प्रत्यक्ष किया? इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन। लेकिन उसी समय, जिस समय उन्होंने सहयोग दिया, उसी समय उन्हों ने ग्लानि भी कर डाली। साँप क्या करता है? साँप के जन्म देने की पद्धति क्या होती है बच्चों को?
जिज्ञासु- अंडे होते हैं।
बाबा- नहीं। अंडे की बात वो अलग। जन्मा देने की पद्धति। साँप अपने अंडे देता है और अपने अंडों को खा भी जाता है। जो कुंडली के बाहर निकल गए तो निकल गए तो निकल गए। और जो भी अंदर अंडी बच्चे हैं उन सबको खा जाता है। अपना पक्का फॉलोवर बना लेगा। साँप किस बात की यादगार है? पाँच विकारों की यादगार है। तो ये भी यज्ञ के आदि में थे। सहयोग करने में भी आगे थे। ड्रामा ऐसा बना हुआ है कि बाप को कौनसे बच्चे प्रत्यक्ष करते हैं?
जिज्ञासु- विदेशी।
बाबा- स्वदेशी तो पहचान ही नहीं पाते। क्योंचकि कुम्भ्करण की निद्रा में सोए हुए होते हैं। कौन पहचानते हैं? विदेशी बच्चे ही बाप को पहले पहचानते हैं क्योंकि बुद्धिवादिता में आगे होते हैं। बुद्धि में तीखे होते हैं। श्रद्धा, विश्वाबस और भावना भारतवासियों में ज्यादा होती है या विदेशियों में ज्यादा होती है? भारतवासियों में श्रद्धा, विश्वास और भावना ज्यादा होती है इसीलिए भारतमाता कहा जाता है। माताओं में श्रद्धा, विश्वास, भावना ज्यादा होती है या बुद्धिवाद ज्यादा होता है? माताओं में ज्यादा होती है। तो वो भगवान के रूप को नहीं पहचान पाते। और विदेशी बुद्धि के तीखे होने के कारण जल्दी पहचान लेते हैं। एक है दिलवाले और एक हैं दिमागवाले। बाप को ज्यादा कौन प्रिय है?
जिज्ञासु- दिलवाले।
बाबा- दिलवाले बच्चे ज्यादा प्रिय हैं। क्यों? अरे! बाप तो खुद ही बुद्धिमानों की बुद्धि है उसको कोई क्या- बुद्धि देगा। जो बुद्धिमानों की बुद्धि बाप है और उसको कोई अपनी बुद्धि की प्रखरता दिखाए तो बाप उसको पसंद नहीं करता। बाप के पास जो चीज नहीं है। क्या ? दिल नीचे या दिमाग ऊपर? दिमाग ऊपर होता है दिल नीचे होता है। सुप्रीम सोल बाप है बुद्धिमानों की बुद्धि आत्मा । वो बाप है आत्माोओं का बाप। और जो भी आत्मा यें हैं वो सब उस बाप के मुकाबले सब सीतायें हैं। क्या? तुम सब सीतायें हो। चाहे पुरूष का चोला है, चाहे स्त्री का चोला है। तुम सब क्याय हो? तुम सब सीतायें हो, तुम सब भक्तियाँ हो। राम बाप है एक। और वो राम बाप भी एक कब है? 84 जन्मे में राम बाप है या सिर्फ संगमयुग में राम वाली आत्मा अपने स्वएरूप को पहचानती है? संगमयुग में भी तब पहचानती है जब उसमें सुप्रीम सोल बाप प्रवेश करता है। तो बाप बुद्धिमानों की बुद्धि है। जो भी धर्मपितायें हैं उनको बु‍द्धु कहेंगे या बुद्धिमान कहेंगे? क्यान कहेंगे? बु‍द्धु कहेंगे? अगर बु‍द्धु थे तो भारतवासी जीत जाने चाहिए या हार जाने चाहिए? भारतवासी जीत गए विदेशियों के मुकाबले या हार गए? सबकुछ गंवाए दिया या विदेशियों से जीत लिया? हार गए। तो बुद्धु हैं...।
जिज्ञासु- बाप के मुकाबले बु‍द्धु हैं।
बाबा- अच्छा! 63 जन्मों में भारतवासियों के मुकाबले विदेशी क्या हुए?
जिज्ञासु- वो तो बुद्धिमान हुए।
बाबा- वो तो बु‍द्धु हैं। हाँ जी। बाप को भोलेनाथ कहा जाता है। कि बुद्धिमानों की आकरके सुरक्षा करता है? जो भोली बुद्धि वाले हैं, देवतार्इ बुद्धि वाले हैं, साफ दिल हैं, उनको पसंद करता है। और जो दुनियाँ स्थापन करता है वो दुनियाँ साफ दिल वालों की दुनियाँ बनती है या जिनके दिल में कचड़ा भरा रहता है उनकी दुनियाँ बनती है? जो साफ दिल होकरके बाप को सच्चा पोतामेल देते हैं उनकी दुनियाँ बनती है।

Disc.CD No.475, dated 30.12.07 at Bangalore
Extracts-Part-2


Time: 14.16-14.50
Student: Baba, the drama is recorded in the Confluence Age, isn’t it? The 5000 years act takes place first. That takes place first.
Baba: We cannot say which one takes place first and which one takes place later on. We can say that when a soul follows Shrimat, it accounts for the 21 births. Call it recording or shooting. And when it follows the opinion of its mind or the opinion of human beings, then it accounts for the 63 births.

Time: 15.00-26.22
Student: Baba, among the eight deities, four souls cause establishment, four (souls) give sustenance and four (souls) are destructive, aren’t they?

Baba: It does not mean that a soul has the sanskars of establishment forever and not the sanskars of sustenance or destruction. Every soul certainly has sanskars of establishment, sustenance and destruction. But there is a domination (of a particular sanskar) in some souls. (The student said something)
Baba: Yes. There is domination of virtues of establishment in some, there is domination of the virtues of sustenance in some and there is domination of the qualities of destruction in some. So?
Student: So, I wanted to ask what is the difference between the souls that give sustenance and those who cause destruction? There are four souls that cause establishment and four souls that cause destruction, aren’t there?
Baba: What kind of part will Brahma be said to have played? The part of establishment. Does a mother see the vices of children or not? She sees only the virtues; she does not see the vices. And the Father sees the virtues as well as the vices. In the Indian tradition, deity Vishnu always played the part of a woman to safeguard the Father. What part did he play by assuming the form of Lakshmi? He safeguarded the Father from Bhasmasur. He assumed an attractive form (Mohini). That is a part of Vishnu, isn’t it? So, it is not that he has only the sanskars of sustenance. No. He has the sanskars of establishment as well as sustenance and there are also the sanskars of destruction to some extent or the other. But he is in the form of a helper of the Father.
Student: So, are the destructive ones against the Father?
Baba: He cannot be against always. It is possible that he is cooperative to some extent or the other in the beginning and becomes an opponent later on. The one, who is cooperative in the beginning, will certainly become cooperative in the end. And as regards the time in between.... It can be said about the time in between that he can be destructive for a long period. So, which income did he earn more? Income of destruction or of construction? He earned more income of destruction; so where will he achieve a post? He will definitely achieve a post in the 21 births, but where will he get it? In the beginning or in the end? He will get it in the end.
Student: Baba, among the eight deities, the first four bring about establishment. And as regards [the next] four, it has been said that they do sustenance. What is the task of the remaining four?
Baba: Their task is to become helpful to some extent in the beginning and to some extent in the end. They are the first ones to obtain (the inheritance) in the beginning as well in the end and in between they are destructive for a long time.
Student: ‘Those who obtain in the end’ meaning what do they obtain?
Baba: It is the inheritance that is obtained. What else is obtained from the Father? All those who were especially helpful in the beginning of the advance (party), the special souls who revealed the Father, to which religion did they belong? ? Islam, Buddhism and Christianity. But at the same time when they extended help, they also defamed (the Father). What does a snake do? By which method does a snake give birth?
Student: It lays eggs.
Baba: No. The topic of eggs is different. (What is) the method of giving birth? A snake lays its eggs and also eats them up. The eggs which are able to come out of its grip become free. But it eats all those offspring which remain under its grip. He will make them his firm followers. What does a snake represent? It is a memorial of the five vices. So, even these souls were present in the beginning of the Yagya. They were ahead in giving help too. The drama has been made in such a way that, which children reveal the Father?
Student: The foreigners (videshi).
Baba: The swadeshis are unable to recognize at all because they remain fast asleep like Kumbhakarna (the demon king who used to sleep for 6 months). Who recognize (the Father)? Only the videshi (foreigner) children recognize the Father first because they are superior in intelligence. They have a sharp intellect. Do the Indians have more devotion, faith and feelings or do the foreigners have more devotion, faith and feelings? Indians have more devotion, faith and feelings; this is why it is said ‘Mother India’ (Bhaarat Mata). Do the mothers have more devotion, faith and feelings or do they have more intelligence? Mothers have more (faith). So, they are unable to recognize the form of God. And because of having a sharp intellect the foreigners recognize easily. One kind is those with a heart (dilwaaley) and one is those having brains (dimaagvaaley). Who are dearer to the Father?
Baba: The children with a heart are dearer. Why? Arey! The Father is Himself the most intelligent one among the intelligent ones (buddhimaanon kee buddhi). Who can give Him intelligence? If someone shows his intelligence to the Father, who is the most intelligent one, then the Father does not like him. Something that the Father lacks. What? Is the heart below or is the brain above? Brain is above and the heart is below. The Supreme Soul Father is a soul who is the most intelligent one. That Father is the Father of souls. When compared to that Father, all the other souls are Sitas. What? You all are Sitas; whether it is a male body or a female body. What are all of you? You all are Sitas. You all are devotees (bhaktiyaan). The Father Ram is one. And when is that Father Ram present? Is he Father Ram in 84 births or does the soul of Ram recognize his form only in the Confluence Age? Even in the Confluence Age he recognizes (his form) only when the Supreme Soul Father enters him. So, the Father is the most intelligent one. Will all the religious fathers be called fools or intelligent ones? What will they be called? Will they be called fools? If they were fools, should the Indians have won or should they have lost? Did the Indians win or lose against the foreigners? Did they lose everything or did they gain victory over the foreigners? They lost. So, they are fools….
Student: When compared to the Father they are fools.
Baba: OK! In the 63 births, when compared to the Indians how were the foreigners?
Student: They were intelligent.
Baba: They (i.e. the Indians) are fools. Yes. The Father is called the Lord of the innocent ones. Or does He come and protect the intelligent ones? He likes the ones with innocent intellect, the ones with divine intellect, clean intellect. And the world that He establishes consists of those with a pure heart or of those whose hearts are full of garbage? The (new) world consists of those who give true potamail to the Father with a pure heart.....(to be continued)
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Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 15 May 2010

वार्तालाप नं.475, बंगलौर, दिनांक 30.12.07
उद्धरण-भाग-३


समय-26.54-29.32
जिज्ञासु- बाबा, द्वापर में जो अर्ध विनाश होता है। और कलियुग के अंत में पूरा विनाश होता है ये दोनों में फर्क क्‍या है?

बाबा- द्वापर के आदि में जो अर्ध विनाश होता है वो 8 कलाओं का ही विनाश होता है या 16 कला सम्‍पूर्ण विनाश होता है? 8 कलाओं का ही विनाश होता है। विनाश तो होता है लेकिन कितनी कला वाला? 8 कला वाला अधूरा विनाश होता है। 8 फिर भी बच गए। और कलियुग के अंत में? विनाश भी 16 कला टोटल विनाश पूरी ताकत में कुछ भी बचता नहीं। चाहे जड़ अणु-अणु हो, चाहे पेड़-पौधों की आत्‍मा हो, चाहे जड़ जंगम आत्‍मायें हो, पशु-पक्षी की आत्‍मायें हो, कीड़े-मकोड़ों की आत्‍मायें हो। सब आत्‍मायें जहाँ से उतरी हैं अपना सारा साईकल पूरा करके कहाँ पहुँचेंगे? वही पहुँचेंगे। उसको कहेंगे सम्‍पूर्ण विनाश।

चक्र होता है ना। ये चक्र है तो चक्र यहाँ से शुरू हुआ तो यहाँ तक क्‍या कहेंगे? गिरती कला ही कहेंगे। यहाँ से शुरू हुआ और यहाँ तक क्‍या कहेंगे? गिरती कला ही। दाईं ओर का चक्र है फिर यहाँ से यहाँ तक क्‍या कहेंगे? बाईं ओर का चक्र। अधूरा चक्र कहाँ पूरा हुआ? आधा चक्र हुआ एक तरफ और आधा चक्र हुआ दूसरी तरफ। और दोनों मिलाके सम्‍पूर्ण चक्र हो गया। तो पूरा चक्र चाहिए। चारों अवस्‍थाओं से पसार होना चाहिए। और हर आत्‍मा को चार अवस्‍थाओं से पसार होना चाहिए। हर वस्‍तु को चार अवस्थाओं से पसार होना चाहिए। पांच तत्‍वों के अणु-अणु को चार अवस्‍थाओं से पसार होना चाहिए। तब कहेंगे सम्‍पूर्ण विनाश।


समय-29.37-33.53
जिज्ञासु- बाबा, दिल में कुछ चिंतन-मं‍थन चलता नहीं है। तो कैसे दिलवाला, दिमागवाला का फर्क होता है बाबा?

बाबा- मंथन चिंतन दिल में चलता है या दिमाग में चलता है? जिसके दिमाग में मनन-चिंतन-मंथन ईश्‍वरीय सरणी के अनुसार चलता है वो दिलवाला बाप का बच्‍चा है या दिमाग वालों का बच्‍चा है? दिलवाला बाप का बच्‍चा है। और जिसकी बुद्धि में श्रीमत के अनुकूल मनन-चिंतन-मंथन नहीं चलता। मनमत के आधार पर चलता है या मनुष्‍यों की मत के आधार पर चलता है वो बुद्धिमानों का बच्‍चा है। अनेक बुद्धिमानों का बच्‍चा है या एक जो बुद्धिमानों की बुद्धि है उसका बच्‍चा है?
जिज्ञासु- अनेक बुद्धिमानों का।
बाबा- तो ये अंतर पड़ जाता है। अभी इतना ज्ञान मिल रहा है और इतना ज्ञान मिलने के बावजूद भी जिसका मनन-चिंतन-मंथन ज्ञान के अनुसार चलता ही नहीं। अगर चलती भी है बुद्धि। तो दुनियाँ जिस तरह धंधे-धोरी में बुद्धि चला रही है वैसी ही चलती है। जो ब्राह्मणों का धंधा है उस धंधे में बुद्धि नहीं चल रही है। तो क्‍या कहेंगे कि पुरूषार्थी जीवन में वो बुद्धिमानों की बुद्धि एक बाप से प्रभावित होकर रहा या अनेकों से प्रभावित होकर रहा? अनेकों से प्रभावित हो गया इसीलिए दुनियाँवी तरीके से बुद्धि चल रही है।

अगर बाप से प्रभावित हुई होती है बुद्धि। और जन्‍म-जन्‍मांतर एक बाप की प्रजा बनकरके रहने वाली जो आत्‍मा होगी उसकी बुद्धि दुनियाँवी तरीके से चलेगी या एक बाप जैसे चलाना चाहता है वैसे चलेगी? कहाँ तीखी होगी? एक बाप जिस सरणी में बुद्धि को चलाना चाहता है, मन-बुद्धि को घुमाना चाहता है वहाँ बुद्धि घूमेगी। उसका कारण क्‍या होता है? कारण यही होता है कि औरों से प्रभावित होने वाली आत्‍मा बाप के जो मुख्‍य डायरेक्‍शन्स हैं उनको शुरूआत से ही फॉलो नहीं करती। ज्ञान में आने के बाद मुख्‍य डायरेक्‍शन बाप का क्‍या मिलता है? पवित्र बनो, योगी बनो। लेकिन बाप की पहचान नहीं है तो पवित्र रहेगा ही नहीं। ज्ञान काल में फाउंडेशन से ही अपवित्रता का फाउंडेशन लगाएगी तो बु‍द्धि कैसी बन जाएगी? दुनियाँवी बुद्धि बनेगी या ईश्‍वरीय बुद्धि बनेगी? दुनियाँवी बुद्धि बन जाती है। मनन-चिंतन-मंथन ज्ञानयुक्‍त होकर चल ही नहीं सकता।


Disc.CD No.475, dated 30.12.07 at Bangalore
Extracts-Part-3


Time: 26.54-29.32
Student: Baba, what is the difference between the semi-destruction that takes place in the Copper Age and the complete destruction that takes place at the end of the Iron Age?

Baba: Is the semi-destruction that takes place in the beginning of the Copper Age destruction of just 8 celestial degrees or of complete 16 celestial degrees? Destruction of only 8 celestial degrees takes place. Destruction does take place, but of how many degrees? It is an incomplete destruction of the 8 celestial degrees. 8 still remain. And at the end of the Iron Age? Destruction of complete 16 celestial degrees, the total destruction, nothing remains in the total power (of the soul). Whether it is non-living atoms, whether it is the soul of trees and plants, whether it is the non-living or the living souls, whether it is the souls of animals and birds, whether it is the souls of worms and insects, where will all the souls reach after completing their cycle? They will reach the same place from where they descended. That will be called complete destruction.

There is a cycle, isn’t there? This is a cycle, so the cycle started here (Baba showed through gestures); so what will be said up till here (the lower point of the circle)? It will be called decreasing celestial degrees only. It started from here and what will it be called till here? It will be called decreasing celestial degrees. The cycle is on the right side; and then what will be said from this place to this place? The left side of the cycle. Where did the incomplete cycle become complete? On the one side is half of the cycle and on the other side is another half cycle. And both together constitute the complete cycle. So, a complete cycle is required. We should pass through all the four stages. And every soul should pass through four stages. Everything has to pass through the four stages. Every atom of the five elements should pass through four stages. Then it will be called complete destruction.


Time: 29.37-33.53
Student: Baba, thinking and churning does not take place in my heart. So, Baba, what difference is there between a person with dominance of heart (dilvala) and someone with dominance of intellect (dimaagvala)?

Baba: Does churning and thinking take place in the heart (dil) or in the intellect (dimaag)? The one in whose intellect thinking and churning takes place in the way which God wants; is he a child of the Dilvala Father or is he a child of those who have brains? He is the child of the Dilvala Father . And the one in whose intellect thinking and churning does not take place according to Shrimat, and if it takes place on the basis of the opinion of the mind (manmat) or on the basis of the opinion of the human beings (manushyamat), he is the child of the intelligent ones. Is he a child of numerous intelligent ones or of the most intelligent one?
Student: (He is a child) of numerous intelligent ones.

Baba: So, this is the difference. Now so much knowledge is being received and despite receiving so much knowledge, the one whose thinking and churning does not take place according to knowledge at all; even if the intellect works, it thinks about the business and occupation like the people of the world, the intellect is not working towards the occupation of the Brahmins. So, will it be said that he remained influenced in his purusharthi life by one Father the most intelligent one or by many? He was influenced by many. This is why the intellect is working in a worldly way.

If the intellect is influenced by the Father, and if the soul has been the subject of one Father for many births, will its intellect work in a worldly way or in the way one Father wants it to work? Where will it be sharp? The intellect will move in the way in which one Father wants it to move, or wherever He wishes the mind and intellect to move. What is the reason for it? The reason for this is that the soul which becomes influenced by others, does not follow the main directions of the Father from the beginning itself. After entering the path of knowledge, what is the main direction of the Father? Become pure, become yogi. But if there is no realization of the Father, then he will not lead a pure life at all. If he lays the foundation of impurity from the foundation period of knowledge itself, then what will the intellect become like? Will it become a worldly intellect or a divine intellect? It becomes a worldly intellect. The thinking and churning cannot take place in accordance with the knowledge at all
.......(to be continued)
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Post by arjun » 16 May 2010

वार्तालाप नं.475, बंगलौर, दिनांक 30.12.07
उद्धरण-भाग-४


समय- 34.40-45.45
जिज्ञासु- संगमयुग में आत्‍मा सतोप्रधान से तमोप्रधान हो जाता है शूटिंग पीरियड में....।

बाबा- सतोप्रधान से तामसी बन जाती है जो बाप के डायरेक्‍शन्स हैं उनकी अवज्ञा करते-2। क्‍योंकि लौकिक दुनियाँ में जो पाप करते थे उसका एक गुणा पाप बनता था और यहाँ ब्राह्मण बनने के बाद जो पाप करते हैं उसका सौ गुणा पाप तुरंत चढ़ जाता है। तो जिसके ऊपर सौ गुणा पाप का बोझा चढ़ जाएगा और कहीं खुदा न ख्‍वास्‍ता जो पाप किया है उसको छुपा लेता है। तो पाप के ऊपर भी पाप बढ़ता जाता है। दिन दुगुना रात चौगुना होता जाता है। तो आत्‍मा तामसी बनेगी या सात्विक बनेगी? और ही तामसी बनती जाती है। पता भी नहीं चलता कि माया रावण सवार हो गया।
जिज्ञासु- नहीं बाबा, वो भाई का प्रश्‍न है वो तमोप्रधान बन जाता है फिर अचानक लास्‍ट में सतोप्रधान कैसा बनता है?
बाबा- अरे! यहाँ प्रैक्टिस तो बताई हुई है बाप को याद करने की। प्रैक्टिस में कमी पड़ती है या प्रैक्टिस बढ़ती जाती है? याद की जो प्रैक्टिस है अपन को आत्‍मा समझ बाप को याद करने की प्रैक्टिस है, वो बढ़ रही है लगातार या घट रही है? बढ़ रही है। भले पाप कर्म भी बढ़ते चले जा रहे हैं; लेकिन प्रैक्टिस भी बढ़ती चली जा रही है। तो अंत में उसका वारा न्‍यारा हो जाता है। अंत में जिसकी प्रैक्टिस ज्‍यादा होगी वो फट से अपने पाप कर्मों को भस्‍म कर लेगा। वो प्रैक्टिस है साकार में निराकार को याद करने की। क्‍या? याद करने की। जो साकार में निराकार को याद करने के आदी हो जाते हैं, प्रैक्‍टाइस्‍ड़ हो जाते हैं, उनके मुकाबले जो सिर्फ निराकार बिंदु को याद करने के प्रैक्‍टाइस्‍ड़ हो जाते हैं। उन दोनों के बीच में निरंतर याद की प्रैक्टिस किसकी होती है और सहज याद करने की प्रैक्टिस किसकी होगी? जो साकार में निराकार को याद करता है उसकी याद निरंतर हो जाती है और सहज भी हो जाती है।

सिर्फ बिंदु को जो याद करते हैं कोई साकार को नहीं मानते। ‘‘हम नहीं मानते’’। तो देह अंहकार के कारण ऐसा होता है या निरअहंकारी के कारण ऐसा होता है? ज़रूर उनमें भयंकर देहभान भरा हुआ है। ज्ञान की सारी बातों को भी मानते हैं। फिर उस साकार को ठुकराते हैं। ग्‍लानि करते हैं। जैसे दुर्योधन बु‍द्धु था क्‍या? बु‍द्धु तो नहीं था। और युधिष्ठिर? वो भी बु‍द्धु नहीं था। लेकिन अंहकार की दृष्टि से देखा जाए। तो अहंकारी ज्‍यादा कौन था और निरअंहकारी कौन था? युधिष्ठिर निरअहंकारी था और दुर्योधन अहंकारी था। अंदर से समझता था कि जो भी गुरू द्रोणाचार्य हैं और जो भी भीष्‍म पितामाह वगैरा हैं, वो उनको विशेष मान देते हैं। मेरे अंदर भी पढ़ाई की कोई कमी नहीं है दुर्योधन समझता था। लेकिन अहंकार की वजह से नीचा गया।

ये देहअभिमान नीचे ले जाता है। देहअभिमान निराकार बाप को पहचानने नहीं देता इसीलिए जो एडवांस में आ जाते हैं वो एडवांस में भी भल नौ प्रकार के बीज हैं परंतु फिर भी नंबरवार साकार में निराकार को पहचानने वाले हैं। और जड़ों पर जो बैठे हुए हैं वो जड़ों तक ही सीमित रहते हैं बीज की स्‍टेज प्राप्‍त ही नहीं कर पाते। इसीलिए नर से नारायण की स्‍टेज भी नहीं प्राप्‍त कर सकते। उनके 63 जन्‍मों के पाप अंत में जाकरके सब खलास हो जाते हैं। भल बीच-बीच में उन्‍होंने पाप बहुत तेजी से किए। जैसे बताया है भक्ति मार्ग में, काशी करवट खाते थे। तो क्‍या अंतर पड़ जाता था? उनके पिछले जन्‍म के सारे पाप भस्‍म हो जाते थे। और फिर अगला जन्‍म लेकर जितने पाप भस्‍म किए हैं उस अगले जन्‍म में उतने से भी ज्‍यादा पाप बढ़ जाते हैं। तो भी अंतिम जन्‍म में जाके रिज़ल्‍ट क्‍या निकलता है उनका? उनमें कौनसी ऐसी शि‍फ्त आ जाती है जो आ‍खरी जन्‍म में हाई जम्‍प लगा जाते हैं? जैसे 8-9 विशेष आत्‍माओं के लिए अव्‍यक्‍त वाणी में बोला है कि 100 मणके जो हैं वो तो फिर भी एकरस चलते हैं। और जो 8-9 हैं वो बहुत ऊपर नीचे होते हैं। अभी अभी ऊपर, अभी अभी नीचे। अभी अभी अप और अभी अभी डाउन। तो हाईजम्‍प लगाने की प्रै‍क्टिस ज्‍यादा किसकी हुई ? 8 की होगी या 100 की होगी? 8 की हाई जम्‍प लगाने की प्रैक्टिस ज्‍यादा हो जाती है।

तो समझ में आया कि शूटिंग पीरियड में चार अवस्‍थाओं से पसार होने के बावजूद भी, अति तामसी बन जाने के बावजूद भी, कला‍हीन आत्‍मा बन जाने के बावजूद भी, ऊँचे कैसे उठ जाते हैं? एक सेकेण्‍ड में ब्रह्मा पतित सो क्‍या बन जाते हैं? विष्‍णु पावन बन जाते हैं। जब ब्रह्मा बन सकता है। ब्रह्मा पतित, विकारी से पावन विष्‍णु एक सेकण्‍ड में। तो ब्राह्मण नहीं बनेंगे? ब्राह्मण भी बन सकते हैं। बाकी सब नहीं बन सकते। क्‍या? जिन्‍होंने राजयोग की प्रक्टिस की होगी...। योग का नाम बहुत बाला है ना। ऐसी पढ़ाई और किसी मनुष्‍य मात्र ने पढ़ाई? नहीं। ये राजयोग की पढ़ाई बाप ही आकरके पढ़ाते हैं।

तो जिन्‍होंने ये पढ़ाई पढ़ी दत्‍त-चित्‍त होकर। रेग्‍युलर स्‍टुडेन्‍ट बनते हुए और पंच्‍युअल स्‍टुडेन्‍ट होते हुए। उनके लिए बोला कि जो सुप्रीम सोल बाप टीचर बनकरके आता है। ऐसे बाप सुप्रीम सोल टीचर की जो इज्‍जत करते हैं। उसकी पढ़ाई की इज्‍जत करते हैं। बाप उनके ऊपर मेहरबान होता है। और जो क्‍लास में पंच्‍युअल ही नहीं हैं। क्‍लास शुरू हो गया आधा घंटे के बाद आए, एक घंटे के बाद आए। तो पंच्‍युअल कहेंगे, रिगार्ड करने वाला कहेंगे टीचर की पढ़ाई को, या डिसरिगार्ड करने वाला कहेंगे? डिसरिगार्ड करने वाले हो गए। ऐसे ही कभी बाप के क्‍लास में आए और कभी नहीं आए।

वहाँ जो स्‍कूल होते हैं दुनियाँ में वहाँ तो फाईन पड़ जाता है। रोज न आने वाले कभी एबसेन्‍ट करते हैं तो क्‍या हो जाता है? फाईन पड़ जाता है। यहाँ बाहर से देखने में तो कोई फाईन नहीं है। पता ही नहीं लगता कि हमारे ऊपर कोई फाईन चढ़ गया। डिसरिगार्ड का। सुप्रीम टीचर की डिसरिगार्ड करने का भी कोई फाईन पड़ता है; लेकिन वास्‍तव मे इसका भी सौ गुणा पाप चढ़ता है। तो आ‍खरीन जो रिज़ल्‍ट आता है उस रिज़ल्‍ट में जो रेग्‍युलर बच्‍चे हैं और पंच्‍युअल बच्‍चे हैं वो आगे निकल जाते हैं। दूसरे पीछे रह जाते हैं।


Disc.CD No.475, dated 30.12.07 at Bangalore
Extracts-Part-4


Time: 34.40-45.45
Student: In the Confluence Age, the soul changes from satopradhan to tamopradhan in the shooting period…...

Baba: It changes from satopradhan to tamopradhan while disobeying the directions of the Father because whatever sins we used to commit in the lokik world, we used to accumulate one time sin and here, after becoming a Brahmin, we accumulate hundred times sins for the sin that we commit. So, the one who accumulates hundred times sins and if by chance he hides the sins he has committed, the sins keep increasing. It keeps increasing day in and day out. So, will the soul become degraded or pure? It goes on becoming degraded. He does not even know that Maya Ravan has entered him.
Student: No Baba, that brother is asking that when a soul becomes tamopradhan, then how does it become satopradhan suddenly in the last?
Baba: Arey! Here you have been taught the practice to remember the Father. Does the practice decrease or increase? Is the practice of remembrance, the practice of considering itself to be a soul and remembering the Father increasing or decreasing continuously? It is increasing. Although the sinful actions are also increasing, the practice is also increasing. So, in the end he succeeds. In the end, the one who has practiced more will burn his sinful actions immediately. That practice is of remembering the incorporeal one within the corporeal one. What? To remember. When we compare between those who become habituated, those who become practiced to remember the incorporeal one within the corporeal one and those who become practiced to remember only the incorporeal point; who practices remembering continuously and who practices easy remembrance? The one who remembers the incorporeal one within the corporeal one remembers continuously and easily.

Those who remember just the point and do not accept the corporeal one, (those who say) ‘we don’t accept’. So, does it take place due to body consciousness or due to being egoless? Certainly they are full of body consciousness. They accept all the issues of knowledge as well. Then they despise that corporeal one. They defame him. For example, was Duryodhan3 a fool? He was not a fool. And what about Yudhishthir3? He was not a fool either. But if you see from the point of view of ego, who was more egotistic and who was egoless? Yudhishthir was egoless and Duryodhan was egotistic. He realized from within that Guru Dronacharya, Bheeshma Pitamah etc. give him (i.e. Yudhishthir) special respect. Duryodhan used to realize that he too does not lack knowledge, but he met downfall due to ego.

This body consciousness brings him down. Body consciousness does not allow him to recognize the incorporeal Father; this is why those who come to advance (party); although there are nine kinds of seeds in advance (party) also, they recognize the incorporeal one within the corporeal one numberwise. And those who are sitting on the roots remain limited to the roots (in their stage); they are unable to achieve the stage of the seeds. This is why they can’t achieve the stage of ‘a man to Narayan’ either. The sins of their 63 births are finished in the end although they committed sins very quickly in between. For example, it has been said in the path of Bhakti that people used to undertake Kashi Karvat (a tradition in ancient India where devotees of Shiva used to sacrifice their lives by falling into a deep well containing a big sword at its base to get rid of their sins). So, what difference did it used to make? All the sins of their past birth used to be burnt. And after taking the next birth, they used to commit even more sins than the sins they burnt (in the previous birth). Even so, what is the result they get in the last birth? Which quality do they acquire so that they make a high jump in the last birth? For example, about the 8-9 special souls, it has been said in the Avyakt Vani that the 100 beads tread uniformly (on the path of knowledge). And the 8-9 oscillate up and down a lot. Just now (they are) up and just now (they are) down. Just now up and just now down. So, who might have practiced making a high jump more, is it the 8 or the 100? 8 practice making a high jump more.

So, did you understand , despite passing through four stages in the shooting period, despite becoming most degraded, despite becoming devoid of celestial degrees, how they rise? Within a second what does Brahma transform from a sinful one into? He becomes a pure Vishnu. When Brahma can become (pure), when Brahma is transformed from a sinful, vicious one to Vishnu in a second, will the Brahmins not become [deity]? Brahmins can become (deities) too. The rest cannot become (deities). What? Those who have practiced rajyog…..Yoga is very famous, isn’t it? Did any other human being teach such knowledge? No. Only the Father comes and teaches the knowledge of this rajyog.

So, for those who studied this knowledge with concentration, like a regular student, and like a punctual student, it has been said that those who respect the Supreme Soul Father who comes as a teacher, those who respect his teachings, the Father is pleased with them. And those who are not punctual in the class at all. If they come to the class half an hour, one hour after the class started, then will they be called punctual, will they be said to be the ones who give regard to the teacher’s teaching or will they be said to be the ones who disregard? They are the ones who disregard. Similarly, sometimes they come to the Father’s class and sometimes they do not.

In those schools in the world, fine is imposed (on latecomers). What happens to those who do not come daily, those who remain absent sometimes? Fine is imposed on them. Here, no fine is imposed as such. We do not know at all that we have been imposed a fine for disregard (shown to the teacher), (we don’t know at all) that a fine is imposed for showing disregard to the Supreme Teacher, but actually, it also accumulates hundred times sins. So, ultimately, in the result that comes out, the regular children, the punctual children go ahead. Others lag behind
.....(to be continued)
.....................................................................................................................
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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 17 May 2010

वार्तालाप नं.475, बंगलौर, दिनांक 30.12.07
उद्धरण-भाग-५


समय- 45.46 -52.40
जिज्ञासु- बाबा, शिव का फॉलोवर्स बनता है शैव, विष्‍णु का फॉलोवर्स बनते हैं वैष्‍णव। फिर भी वैष्‍णव का बहुत महिमा है ना बाबा, शैव के ...?

बाबा- जो विष्‍णु के फॉलोवर बनते हैं वो किसके फॉलोवर हैं वास्‍तव में? ऐसे के फॉलोवर हैं जो 84 जन्‍मों में विषय वासना का जीवन बिताता ही नहीं। दुनियाँ में एक आत्‍मा ऐसी है जो अव्यभिचारी जीवन जन्‍म-जन्‍मांतर का बिताती है। अरे! वेरायटी झाड़ है तो वेरायटी झाड़ में कोई ऐसी भी आत्‍मा होनी चाहिए या नहीं? होनी चाहिए। और उसको जो फॉलो करने वाले हैं उनमें भी वो ही विशेषता होती है। क्‍या? जन्‍म-जन्‍मांतर विषय वासना में, व्‍यभिचार में जाने वाले ही नहीं। इससे साबित होता है कि वो पावरफुल आत्‍मा है या कमजोर आत्‍मा है?
जिज्ञासुः पावरफुल।
बाबा- हं? जन्‍म—जन्‍मांतर की जो रानियाँ हैं वो आधीन रहने की स्‍वभाव वाले हैं या स्‍वतंत्र रहने के स्‍वभाव वाली हैं? आधीन रहने की स्‍वभाव वाली हैं। बाप आकरके क्‍या बनाता है? बाप आकरके स्‍वाधीन बनाता है हम आत्‍माओं को। उनको कहा जाता है रूद्रमाला के मणके। वो है बाप की माला। वो स्‍वाधीन स्‍वभाव के हैं। और जो वैष्‍णव के फॉलोवर हैं, विष्‍णु के पंथी हैं वो आधीन रहने के स्‍वभाव वाले हैं। ज्‍यादा अपने जीवन में सुख राजायें भोगते हैं, चाहे स्‍वर्ग में और चाहे नर्क में, या रानियाँ ज्‍यादा सुख भोगती हैं? रानियाँ ज्‍यादा सुख भोगती हैं और राजायें बहुत खून-खराबा करते हैं। उतना सुख भोगने की उनको परवाह नहीं है; लेकिन उनको स्‍वाभिमान की परवाह है। इसीलिए मुरली में बोला है। तीन मूर्तियों में एक है शेर, एक है बकरी और एक है घोड़ा। कौनसा पसंद है?
जिज्ञासु- शेर।
बाबा- बकरी को तो चाहे जो कान से पकड़ ले, बस आधीन बनाके ले जाएगा। कसाई पकड़ लेगा तो आधीन बनाएगा। और कोई श्रेष्ठ पकड़ लेगा तो भी आधीन बनाके रखेगा। वो है ही देवताई स्‍वभाव। और वो जो रूद्रमाला के मणके हैं वो देवताई स्‍वभाव के नहीं हैं। क्‍या? वो सदैव देवता बनकरके रहने वाले नहीं हैं। पतितों की लिस्‍ट है या विष्‍णु के फॉलोवर्स, पावन बनकरके रहने वालों की लिस्‍ट है? कौनसी लिस्‍ट है? पतितों की लिस्‍ट है।

पतित पावन बाप किसको पसंद करता है? जो सन्‍यासी बनकरके पवित्र रहते हैं उनको पसंद करता है या जन्‍म-जन्‍मांतर गृहस्‍थी में रहकरके पतित बन गए है उनको पसंद करता है? गृहस्थियों को...। जिनमें पतितपना जास्‍ती आ गया है। उनको पसंद करता है। तो पवित्र रहना बड़ी बात नहीं है। क्‍या बड़ी बात है? बाप को पहचानना ही सबसे बड़ा गुण है। क्‍या? बाप सबसे बड़ा गुण कौनसा देखते हैं? पवित्र आत्‍माओं को पहले उठाते हैं या बाप को पहचानने वालों को पहले उठाते हैं? तुम बच्‍चों में कोई गुण हो या ना हो बाप को परवाह नहीं है। बाप कौनसा गुण देखते हैं? कि दुनियाँ में चाहे जितने अवगुणधारी हैं; लेकिन इन बच्‍चों में एक गुण विशेष है दुनियाँ के मुकाबले। क्‍या? बाप की पहचान। तो खुश होना चाहिए या दुखी होना चाहिए?...

जिज्ञासु- खुश होना चाहिए।
बाबा- …कि अरे! वैष्‍णव पंथी बनते तो सुख ज्‍यादा उठाते। अरे! दुनियाँ में सुख भोगना ही सबसे बड़ी बात है या स्‍वाभिमान सुरक्षित बना रहे वो सबसे बड़ी बात है?
जिज्ञासु- स्‍वाभिमान।
बाबा- स्‍वाभिमानी बनकर रहें। वो सबसे बड़ी बात है।
जिज्ञासु- वो भी अहंकार होता है ना।
बाबा- स्‍वाभिमान को अहंकार नहीं कहा जाता। अहं पैदा होता है पांच तत्‍वों से और स्‍वाभिमान पैदा होता है... स्‍व कहते हैं को आत्‍मा को। वो आत्‍मा का अभिमान है। आत्‍मा परमपिता परमात्‍मा का बच्‍चा है।

समय-52.46-53.33
जिज्ञासु- बाबा, आत्‍मा में भक्तिमार्ग का संस्‍कार रहेगा, ये कैसे समझा जाएगा?

बाबा- कहेगा कुछ और और करेगा कुछ और। ये सबसे बड़ी पहचान है। उसकी एक्‍ट से पता लग जाएगा। ये ज्ञानयुक्‍त एक्‍ट नहीं करेगा। कथनी और करनी में भक्‍तों में बहुत अंतर हो जाता है। और ज्ञानी जो होगा जो सोचेगा सो बोलेगा और जो बोलेगा सो करके भी दिखाएगा।

समय-53.38-55.15
जिज्ञासु- बाबा, त्रेता के अंत में अर्ध विनाश होता है ना। सतयुग, त्रेतायुग में तो सब देवातयें पावन होते हैं। फिर अर्ध विनाश होके कैसे दुख भोगना पड़ता है?

बाबा- हाँ जी।
जिज्ञासु- क्‍यों दुख भोगना पड़ता है? विनाश होने के बाद थोड़ा लोग तो मरेंगे ना।
बाबा- तराजू होता है। तराजू में कभी बैलेन्‍स बिगड़ता है? बैलेन्‍स कब बिगड़ जाता है? जब एक तरफ भारी हो जाता है और दूसरी तरफ हल्‍का हो जाता है। तो आत्‍मा की जो 16 कलायें हैं। त्रेता के अंत में जो भी आत्‍मायें हैं। उनका बैलेन्‍स बिगड़ जाता है या बैलेन्‍स में ही बनी रहती हैं? सबका बैलेन्‍स बिगड़ जाता है।
जिज्ञासु- तो 16 से सभी 8 हो जाते हैं ना फिर थोड़े लोग तो होते हैं।
बाबा- तो बैलेन्‍स बिगड़ गया ना। बैलेन्‍स बिगड़ा तो नीचे की दुनियाँ में आ गए ज्‍यादा लोग।
जिज्ञासु- नीचे की दुनियाँ में आ गए।
बाबा- तो ऊपर से जो उतरेंगे वो और ही ज्‍यादा नीच उतरेंगे कि श्रेष्‍ठ उतरेंगे? और ही ज्‍यादा नीच उतरते हैं और उनकी संख्‍या बहुत, कई गुनी, कई गुनी होती है।

Disc.CD No.475, dated 30.12.07 at Bangalore
Extracts-Part-5


Time: 45.46-52.40
Student: Baba, the followers of Shiv become Shaiv, the followers of Vishnu become Vaishnav. However, Baba, the Vaishnavites are praised more than the Shaivites…..?

Baba: Those who become the followers of Vishnu are whose followers in real sense? They are followers of such a person who does not lead a life of vices and lust at all in 84 births. There is one such soul in the world who leads an unadulterated life in every birth. Arey, it is a variety tree; so in the variety tree there should also be one such soul or not? There should be. And those who follow it also have that specialty. What? They do not indulge in lust and adultery for many births, too. It proves that… are they powerful souls or weak souls?
Student: Powerful.
Baba: Do the queens of many births have the nature of remaining subordinates or of remaining free? They have the nature of remaining subordinates. What does the Father make us when He comes? The Father comes and makes us souls, free. They (such souls) are called the beads of the rosary of Rudra. They constitute the rosary of the Father; they have an independent nature. And those who are the followers of Vishnu, those who belong to the community of Vishnu have the sanskar of remaining subordinates. Whether it is in heaven or in hell, do the kings enjoy more happiness in their life or do the queens enjoy more happiness? The queens enjoy more happiness and the kings indulge in a lot of bloodshed. They do not care much about enjoying happiness. But they care about their self-respect. This is why it has been said in the Murli: among the three personalities, one is a lion, one is a goat and one is a horse. Which one do you like?
Student: Lion.
Baba: Whoever wants may catch the goat by its ear and take it under him. If a butcher catches it, he will make it his slave. And even if a righteous person catches it, he will make it his subordinate. They have a divine nature indeed. And the beads of Rudramala do not have a divine nature. What? They do not remain deities always. Is it a list of sinful ones or a list of the followers of Vishnu who remain pure? Which list is it? It is a list of sinful ones.

Who does the purifier of the sinful ones, the Father like? Does He love those who lead a pure life like sanyasis or does He like those who have become sinful while leading a household life for many births? The householders…..He likes those who have become more sinful. So, leading a pure life is not a big issue. What is the bigger issue? Recognizing the Father is the biggest virtue. What? Which greatest virtue does the Father observe? Does He uplift the pure souls first or does He first uplift those who recognize the Father? The Father does not care whether you children have any virtue or not. Which virtue does the Father see? Someone may be vicious to any extent in the world, but there is one special virtue in these children when compared to the (people of the) world. What? Realization of the Father. So, should you feel happy or should you feel sorrowful?

Student: We should feel happy.
Baba: (Should you feel unhappy thinking) that arey! We would have enjoyed more happiness had we been the followers of Vishnu. Arey! Is enjoying happiness the biggest achievement in the world or is maintaining our dignity (swabhimaan) the biggest achievement?
Student: Self respect.
Baba: We should maintain our dignity. That is the biggest issue.
Student: That is also a kind of ego, isn’t it?
Baba: Self-respect is not called ego. Ego(swabhiman) arises from the five elements and the self respect arises from….Swa means soul. That is a respect (abhimaan) of the soul. A soul is the child of the Supreme Father Supreme Soul.

Time: 52.46-53.33
Student: Baba, how can we understand that a soul has the sanskars of the path of Bhakti?

Baba: He will say something and do something else. This is the biggest indication. We can know from his act. He will not act in accordance with the knowledge. There is a lot of difference between the words and the actions of the devotees. And the one who is knowledgeable will speak only what he thinks and whatever he speaks, he will also do it and show.

Time: 53.38-55.15
Student: Baba, semi-destruction takes place in the end of the Silver Age, doesn’t it? In the Golden Age and Silver Age all are pure deities. Then why do they have to experience sorrows due to semi-destruction?

Baba: Yes.
Student: Why do they have to experience pain? At least some people will die after destruction, will they not?
Baba: Suppose there is a weighing scale (taraaju). Is the balance of a weighing scale ever disturbed? When is it disturbed? When one side becomes heavy and the other side becomes light. So, the 16 celestial degrees of a soul… Do all the souls in the end of the Silver Age experience imbalance or do they maintain balance? Everybody experiences imbalance.
Student: So, everyone changes from 16 (celestial degrees) to 8 (celestial degrees), don’t they? But some people do survive.
Baba: So, imbalance has occurred, hasn’t it? When imbalance occurred, more people came to the world below (i.e. the corporeal world).
Student: They came to the world below.
Baba: So, will the souls that descend from above (i.e. the Supreme Abode) be much more degraded souls or righteous souls? Those who descend are much more degraded and their number is huge, many, many times more.
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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 23 May 2010

वार्तालाप नं.475, बंगलौर, दिनांक 30.12.07
उद्धरण-भाग-६


समय-55.24-1.07.50
जिज्ञासु- बाबा, सब बी.के वाले कुमारिका दादी, विश्‍व किशोर भाऊ, जग‍दीश भाई, वो सब शरीर छोड़ने के बाद बीजरूप आत्‍माओं में प्रवेश करके, वो एडवांस नालेज का वो बोल रहे हैं। वो कैसे? शरीर छोड़ने के बाद तो सब भूलना है न।

बाबा- जैसे भक्तिमार्ग में। भक्तिमार्ग में जो गुरू बनकरके बैठे हुए हैं। गद्दीनशीन हैं वो मान-मर्तबा ले रहे हैं या नहीं? ले रहे हैं। और मान-मर्तबा लेते हुए भी ब्रह्माकुमार-कुमारियों के संग में जब आते हैं और उनकी बातें सुनते हैं। तो उनके अंदर से ये आता है कि हाँ ये सच्‍चे हैं? दुनियाँवी गुरूओं को, सन्‍यासियों को ये बुद्धि में आता है कि वास्‍तव में परमात्‍मा सर्वव्‍यापी नहीं है। मनुष्‍य आत्‍मा 84 लाख योनियों में नहीं जाती, अच्‍छी तरह बुद्धि में बैठता है। लेकिन अपने मान-मर्तबे को छोड़ नहीं सकते। क्‍यों नहीं छोड़ सकते? क्‍योंकि लोकलाज में बंध जाते हैं। उनका देहअभिमान जो मान-मर्तबे की दुनियाँ है वो छोड़ने नहीं देता। ये तो दुनियाँ वाले गुरूओं की बात हुई।

अब दुनियाँ में जो गुरू हैं उनका जो स्‍वभाव संस्‍कार है, वो ब्राह्मणों की दुनियाँ में जो बेसिक नालेज के गुरू हैं मान-मर्तबा लेने वाले हैं, लोक लाज में बंधे हुए हैं। वो बुद्धिमान हैं या बुद्धु हैं? सच्‍चाई को पहचानने वाले हैं या जानबूझकरके सच्‍चाई को छुपाने वाले हैं? जानबूझकरके छुपाने वाले हैं। उनको बोला है रावण कौन? ज़रूर कहेंगे ये गुरू लोग। जो गद्दियों पर बैठे हुए हैं। मान-मर्तबा भोग रहे हैं। ये गुरू लोग, जैसे रावण के लिए गायन है शास्‍त्रों में, अंदर से जानता था- भगवान कौन है। जानता था या नहीं? जानता था। फिर भी देहअहंकार के कारण स्‍वीकार नहीं करता था कि ये भगवान है। क्‍या अहंकार था? कंस को क्‍या अहंकार था? उसको अहंकार था अगर भगवान है तो हमसे टक्‍कर ले। हमारे मान-मर्तबा को नीचे झुकाकर दिखाए। हमारे पास जो धन सम्‍पत्ति है। उस धन सम्‍पत्ति, मान-मर्तबा और वैभव के मुकाबले ये क्‍या है? कुछ भी नहीं है तो उसका अहंकार चढ़ गया। जब शरीर छूट जाता है तो न धन रह जाता है, न मान-मर्तबा रह जाता है, न मर्तबा रह जाता है।

जिज्ञासु- फिर भी संस्‍कार तो रहता है ना बाबा।
बाबा- अंदर से वो आत्‍मा समझती तो है। वो लोक लाज के बंधन में बंधकर रहती है या उससे मुक्‍त हो जाती है? लोक लाज के बंधन से मुक्‍त हो जाती है। और जो लोकलाज के बंधन से जो आत्‍मा मुक्‍त हो गई। तो ज्‍यादा सेवा करेगी, ईश्‍वरीय सेवा ज्‍यादा करेगी या कम करेगी? ज्‍यादा सेवा करेगी। और जब उसकी बुद्धि में प्रवेश करने के बाद एडवांस नालेज पक्‍की बैठ जावेगी। तो और ज्‍यादा सेवा करेगी। जब तक पूरी नालेज नहीं बैठती है तो थोड़ा बहुत आपोज़ीशन भी कर सकता है। जैसे अभी आत्‍मायें प्रवेश करती हैं एडवांस वालों में। तो कब तक आपोज़ीशन करेगी? जब तक पूरी बात उनकी बुद्धि में नहीं बैठी है। और जब पूरी बात बैठ जाती है तो आपोज़ीशन के बजाए सपोर्ट करेंगी। अंत में ऐसा ही होने वाला है। दुनियाँ में सूक्ष्म शरीरधारी आत्‍माओं की संख्‍या बढ़ेगी या घटेगी? दिन दुगुनी रात चौगुनी बढ़ती जाएगी। क्‍योंकि अकाले मौत लगातार बढ़ रही है या घट रही है? अकाले मौत बढ़ती चली जावेगी। लगातार भूकंम होंगे तो बड़े-बड़े मकान, बड़े-बड़े बिल्‍डिंग, मल्‍टी स्‍टोरीस् सारी गिरेंगी। तो अकाले मौत बढ़ेगी। वो आत्‍मायें कहाँ जायेंगी? उनका उद्धार कहाँ से होगा?
जिज्ञासु- बीजरूप आत्‍माओं से।
बाबा- यही बीजरूप आत्‍मायें हैं। जिनके द्वारा उनका उद्धार होना है। इसीलिए एक-एक में अनेक-अनेक प्रवेश करेंगी। परंतु जो आत्मिक स्थिति के पक्‍के होंगे वो उनके प्रभाव में आने वाले नहीं हैं। क्‍योंकि उनके ऊपर ईश्‍वरीय ज्ञान का पूरा प्रभाव चढ़ा हुआ है। तो उनकी प्रजा भी बनने वाले नहीं हैं। जो आत्मिक स्थिति में कच्‍चे होंगे। उनके ऊपर उन आत्‍माओं का प्रभाव हो जावेगा, सवारी कर लेंगे। और सवारी करके तब तक जब तक वो सच्‍चाई को पूरा नहीं समझती हैं, एडवांस के ज्ञान की गहराई को पूरा नहीं समझती हैं तब तक विरोध करती रहेंगी। बाद में सहयोगी बन जावेंगी।
जिज्ञासु- जो आत्मिक स्थिति का पक्‍का हो जाएगा। उनमें प्रवेश नहीं करेंगी वो आत्‍मायें?
बाबा- जो आत्मिक स्थिति का पक्‍का होगा, बीजरूप स्‍टेज में होगा उसमें सूक्ष्‍म शरीर को प्रवेश करने का रास्‍ता मिलेगा? बिंदु रूपी स्‍टेज, कारण स्‍टेज। एक है झाड़ उसको कहते हैं बड़ा विस्‍तार। एक होता है जड़ें उतना विस्‍तार नहीं है। लेकिन सारे वृक्ष का आधार है। और एक उन जड़ों का भी बीज। ज्‍यादा पावरफुल कौन है? बीज ज्‍यादा पावरफुल है। तो जो आत्मिक स्थिति जिनकी पक्‍की हो चुकी है। इतनी पक्‍की हो चकी है कि एक सेकण्‍ड में निराकारी स्‍टेज जब चाहें तब, एक सेकण्‍ड में मनन-चिंतन-मंथन की स्‍टेज जब चाहें तब और एक सेकण्‍ड में साकारी स्‍टेज जब चाहें तब और जितनी देर चाहें तब तक साकार इन्द्रियों से सुख भोगने वाले। फिर जैसे ही आक्रमण हो साकार से क्‍या बन जायें? एकदम निराकारी स्‍टेज धारण कर लें।

तो ऐसी आत्‍मायें जो पर्फेक्‍ट प्रैक्टिस वाली होंगी। अभी-2 साकारी अभी-2 निराकारी अभी-2 आकारी। बापदादा ने कौनसी प्रैक्टिस करने के लिए बोला? यही तो प्रैक्टिस करने के लिए बोला अव्‍यक्‍त बनो। शुरूवात में तो बहुत ही बोलते थे अव्‍यक्‍त बनो। आकारी बनेंगे तो भी अव्‍यक्‍त हैं और निराकारी बनेंगे तो भी अव्‍यक्‍त हैं। व्‍यक्‍त भाव से परे, जो स्‍टेज इन आँखों से नहीं देखी जाती है...

तो ऐसी स्‍टेज वाली आत्‍माओं को वो भूत-प्रेतानी आत्‍मायें डिस्‍टर्ब ही नहीं कर सकेंगी। नहीं तो ऐसे भी होगा कि प्राण भी हरण करके ले जावेंगे। फिर भले बाद में उनको पता चलेगा कि अरे जिनके साथ हमने ऐसा दुष्‍कर्म कर लिया कि इनको आप समान सूक्ष्‍म शरीरधारी बना तो लिया; लेकिन ये तो बीज हैं ये सदाकाल सूक्ष्‍म शरीरधारी बनकर नहीं रह सकता। ये तो हमारा भी बाप है। वो बीजरूप आत्‍मा सूक्ष्‍म शरीर धारण करने के बाद उसके ऊपर काबिज हो जावेगी। क्‍योंकि बीजरूप आत्‍मा है।

उसने जो ज्ञान लिया है वो कौनसा ज्ञान लिया है? ऐसा एडवांस ज्ञान लिया है जो इसी जन्‍म में पढ़ाई की पूरी प्रारब्‍ध देना सिखाता है। इसी जन्‍म में नर से नारायण बनने का ज्ञान लिया है। और उन आत्‍माओं ने अगले जन्‍म में, कई जन्‍म में, अगले जन्‍म में। तो पढ़ाई की गति...। एक तो वो आत्‍मायें जो सूक्ष्‍म शरीरधारी हैं आलरेडी। और दूसरी वो आत्‍मायें जो बीजरूप स्‍टेज वाली हैं। भले थोड़े समय के लिए बीजरूप स्‍टेज उनकी चली जाएगी क्‍योंकि अकाले मौत हुई है। लेकिन ज्‍यादा पावरफुल बन जाती हैं। तो उनके ऊपर जल्‍दी विजय पाय लेंगी और फिर दुबारा जन्‍म लेकरके तीव्र पुरूषार्थ करेंगी। क्‍योंकि मुरली में महावाक्‍य आया है मेरे मुख से दो अक्षर भी सुना तो स्‍वर्ग में क्‍यों नहीं आवेगा। मेरे मुख से दो अक्षर भी सुना? कौनसे स्‍वर्ग में आ जावेगा? नम्‍बरवार स्‍वर्ग में आवेगा या अव्‍वल नम्‍बर स्‍वर्ग में आवेगा?

जिज्ञासु- अव्‍वल नम्‍बर स्‍वर्ग में।
बाबा- बाप ने कौनसे कौन स्‍वर्ग में आने का वरदान दिया? अव्‍वल नम्‍बर स्‍वर्ग में आ जावेगा। मेरे मुख से डायरेक्‍ट सुना तो। शरीर रहते-2। तो सूक्ष्‍म शरीरधारी जो ओरिजनल आत्‍मायें हैं वो तो शरीर रहते-2 मेरे मुख से डायरेक्‍ट सुन ही नहीं पाती। वो तो फिर भी भले सूक्ष्म शरीर बहुत पावरफुल होता है। फिर भी बीजरूप आत्‍मा के सूक्ष्‍म शरीर के मुकाबले बहुत कमजोर हो जाता है।

Disc.CD No.475, dated 30.12.07 at Bangalore
Extracts-Part-6


Time: 55.24-1.07.50
Student: Baba, BKs like Kumarka Dadi, Vishwa Kishore Bhau, Jagdishbhai, after leaving their bodies, they are entering seed-form souls and speaking about advance knowledge. How does it happen? After leaving their bodies they should forget everything.

Baba: For example, the path of Bhakti. In the path of Bhakti, those who are sitting as gurus…, those who are sitting on the thrones; are they getting respect and position or not? They are. And despite getting respect and position, when they come in the company of Brahmakumar-Kumaris and listen to them, do they feel in their mind or not , ‘yes, these people are true’? It occurs in the intellect of the worldly gurus, the sanyasis that actually the Supreme Soul is not omnipresent [and] a human soul does not pass through 84 lakh species. It sits in their intellect properly. But they cannot leave their respect and position. Why can’t they leave it? It is because they are bound by public honor. Their body consciousness does not allow them to leave their world of respect and position. This was about the worldly gurus.

[Like] the nature and sanskars of the worldly gurus, the gurus of the basic knowledge in the world of Brahmins, who get respect and position, who are bound in public honour; are they intelligent or fools? Do they recognize truth or do they willfully hide the truth? They willfully hide the truth. As regards them it has been said : who is Ravan? It will definitely be said , these gurus, who are sitting on thrones and are enjoying respect and position. These gurus; just as it is famous about Ravan in the scriptures that he knew in his mind who is God. Did he know or not? He knew. Still, out of body consciousness, he used to not accept that this person is God. What ego did he have? What ego did Kansa have? He had an ego that if this one is God, he should confront me; he should be able to decrease my respect and position. The wealth and property that I have; when compared to that wealth and property, that respect and position and grandeur, what is this (person)? Nothing. So, he became egotistic. When someone leaves the body, neither his wealth remains with him, nor respect and position.

Student: Still the sanskars remain, don’t they, Baba?
Baba: That soul feels from within. Does it remain bound by the bondage of public honour or does it become free from it? It becomes free from the bondage of public honour. And if a soul becomes free from the bondage of public honour, will it do more service, more service of God or less? It will do more service. And when the advance knowledge enters in its intellect and sits firmly, it will do even more service. As long as the complete knowledge does not sit (in the intellect) it can indulge in opposition to some extent or the other. For example, souls enter those who follow the advance knowledge now. So, how long will they oppose? [They will oppose] as long as the complete issue has not sat in their intellect. And when the issue fits completely, then instead of opposition, it will support. It will happen like this in the end. Will the subtle bodied souls increase in the world or will they decrease? They will increase day and night because… is untimely death increasing or decreasing continuously? Untimely death will increase. When earthquakes will occur continuously all the big houses, big buildings, multistoried buildings will crash. So, untimely death will increase. Where will those souls go? How will they be uplifted?
Student: By the seed form souls.
Baba: These are the very seed-form souls through whom they are going to be uplifted. This is why many (souls) will enter each one. But those who are firm in soul conscious stage will not be influenced by them because they are completely influenced by the knowledge of God. So, they are not going to become their subjects either. Those who are weak in soul conscious stage will be influenced by those souls, they will enter them. And after entering them, they will continue to oppose until they understand the truth, until they completely understand the depth of the advance knowledge. Later on they will become helpful.
Student: Will those souls not enter those who become firm in soul conscious stage?
Baba: Will the subtle body get a path to enter the one who is firm in soul conscious stage, the one who is in a seed-form stage, the seed-form stage, the causal stage? One is a tree; it is called vast expanse. One is the roots; they are not very extensive. But they are the base of the entire tree. And one is the seed of even the roots. Who is more powerful? The seed is more powerful. So, those who have become firm in soul conscious stage, those who have become so firm that they can become constant in an incorporeal stage whenever they wish, in a second, they can attain the stage of thinking and churning whenever they wish, in a second, and they can attain the corporeal stage in a second. Whenever they wish and however long they wish they can enjoy the pleasure of the corporeal organs. And as soon as the attack takes place what should they change from a corporeal stage? They should attain the incorporeal stage immediately.

So, such souls which have perfect practice, corporeal in a moment and incorporeal in the next moment and subtle in the next one. Which practice has BapDada asked us to do? We have been asked practice just this; to become Avyakt. In the beginning He used to frequently ask us to become Avyakt. Even if we become subtle we are Avyakt and even if we become incorporeal we are Avyakt, a stage beyond the corporeal feeling, a stage which is not visible through these eyes.

So, those ghostly and devilish souls cannot even disturb the souls in such a stage. Otherwise, they can even make us leave the body. Then, later on they may realize , ‘arey, the person against whom we committed such a sin and made him a subtle bodied soul like me, but this one is a seed; he cannot remain subtle-bodied forever. He is (like) my Father (superior to me)’. After attaining a subtle body, that seed-form soul will become dominant over it because it is a seed-form soul.

Which knowledge has he taken? He has taken the advance knowledge that teaches us to achieve complete fruits of the knowledge in this birth itself. He has obtained knowledge of changing from a man to Narayan in this birth itself. And those souls have (obtained the knowledge to obtain fruits) in the next birth, in many births, in the next birth. So, the result of the knowledge….One kind is the souls who have already taken the subtle body. And the second kind is the souls which have the seed-form stage. Although they lose their seed-form stage for some time since they have met an untimely death, they become more powerful. So, they will gain victory over them soon and then take rebirth and make fast spiritual efforts because the mahavakya (great sentence) has been mentioned in the Murli , ‘Even if someone has heard two words from my mouth, why will he not come to heaven?’ Even if he has heard two words from my mouth? To which heaven will he come? Will he come to the numberwise heaven or in the number one heaven?

Student: To the number one heaven.
Baba: The Father has given us the boon to come in which heaven? ‘He will come to the number one heaven if he has heard directly from my mouth while living in the body’. So, the original subtle bodied souls are not at all able to listen directly from my mouth while being alive. Although the subtle body is very powerful, they are very weak when compared to [the subtle bodied] seed-form soul. (concluded)
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Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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arjun
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Re: Q&A: PBK Murli discussions

Post by arjun » 01 Jun 2010

वार्तालाप नं.473, हैदराबाद-3, दिनांक 27.12.07
उद्धरण-भाग-1


समयः 23.25-25.35
जिज्ञासुः बाबा, ईश्वर चन्द्र विद्या सागर, नाम तो अच्छा लग रहा है वो कौन थे (है?)

बाबा: आदमी थे और कौन थे? अच्छे श्रेष्ठ आदमी थे।
जिज्ञासु: नाम अच्छा है ना?
बाबा: नाम भी अच्छा है उन्होने काम भी अच्छा ही किया। जो अच्छा काम करते हैं उनकी महिमा होती है। काम तो अच्छा ही किया। पहले ईश्वर फिर बादमें चन्द्र। क्या? और दोनो मिल करके हो गए विद्या के सागर। क्या? शिव शंकर भोलेनाथ ईश्वर हो गए, चन्द्रमाँ हो गया चन्द्र और दोनो मिल गए तो विद्या सागर हो गए। आत्मा अभिमानी थे या देह अभिमानी थे? (किसीने कहा- आत्मा अभिमानी) कैसे? कैसे कहेंगे कि वो आत्मा अभिमानी थे? (किसीने कुछ कहा) यहाँ की बात छोड़ो, यहाँ – वहाँ की बात छोड़ो। जो यहाँ है सो वहाँ है, जो वहाँ है सो यहाँ है, जो हद में हैं सो बेहद में हैं, जो बेहद में हैं सो हद में हैं। (किसीने कहा- देह अभिमानी थे) देह अभिमानी थे? नहीं। उनकी जो कहानी है उसमें एक बात प्रसिद्ध है। उन्होने कौनसा काम करने में अपनी हेटी नहीं समझी? हाँ? उन्होने कुली का काम किया या नहीं किया? हाँ? ये देहभान की निशानी है या आत्मा अभिमान की निशानी है? (सभी- आत्मा अभिमान) फिर? चाहे छोटा काम हो और चाहे बड़ा काम हो जन सेवा के हिसाब से कोई भी प्रकार की सेवा छोटी बड़ी नहीं होती है। ये आत्मा अभिमानी की निशानी है।

Disc.CD No.473, dated 27.12.07 at Hyderabad
Extracts-Part-1


Time: 23.25-25.35
Student: Baba, the name Ishwar Chandra Vidya Sagar appears to be nice; who was he?

Baba: He was a man; what else was he? He was a righteous man.
Student: The name is nice, isn’t it?
Baba: The name is nice as well as the work that he did was nice. Those who do good work are praised. He certainly did good work. First Ishwar (God), then Chandra (Moon). And together they became ocean of knowledge (vidya ke saagar). What? They became Shiv-Shankar Bholenath Ishwar; the Moon is Chandra and together they happen to be the ocean of knowledge. Was he soul conscious or body conscious? (Someone said – soul conscious) How? How can we say that he was soul conscious? (Someone said something) Leave the topic of this place; leave the topic of that place and this place. Whatever is here is there; whatever is there is here; whatever is in a limited sense is in an unlimited sense; whatever is in an unlimited sense is in a limited sense. (Someone said- he was body conscious) Was he body conscious? No. There is one thing famous about his story. Which task did he not think to be lowly? Hm? Did he work as a Kuli (porter) or not? Hm? Is it an indication of body consciousness or soul consciousness? (Everyone said – Soul consciousness) Then? Whether it is a small task or a big task; from the point of public service any kind of service is not small or big. It is an indication of soul consciousness......(to be continued)
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Note: The words in italics are Hindi words. Some words have been added in the brackets by the translator for better understanding of the translation.

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