Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

DEDICATED to PBKs.
For PBKs who are affiliated to AIVV, and supporting 'Advanced Knowledge'.
Post Reply
User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 27 Apr 2015

वी.सी.डी.नं.309, कैसेट नं.793, पटना (बिहार),
मु.31.12.66, ता.27.09.05
भाग-5


हाँ, अमरनाथ बाप के जो बच्चे बन जाते हैं वो फिर अमर ही रहते हैं। क्योंकि भगवान शिव आते हैं तो तीन मूर्तियों के द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शंकर। ब्रह्मा की मूर्ति उसके द्वारा ज्ञान सुनाते हैं। विष्णु की मूर्ति उसके द्वारा प्रैक्टिकल कर्म सिखाते हैं, और शंकर की मूर्ति उसके द्वारा ज्ञान का ताण्डव नृत्य करते हैं। कैसा नृत्य? ताण्डव। ताड माना पिटार्इ। किसकी पिटार्इ? ब्रह्मा के द्वारा जितना मीठा ज्ञान सुनाया जाता है... ब्रह्मा वही आत्मा है जो सतयुग के आदि में हे कृष्ण नारायण वासुदेव जिसको कहा जाता है इसलिए कृष्ण के हाथ में मुरली दी जाती है। मीठी तान सुनाने की यादगार। और राम को बाण दिये जाते हैं या शंकर के मंदिर में नगाड़ा दिया जाता है। जैसे बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज होती हो, या डमरु दिया जाता है गड़गड़ाहट की आवाज वाला कर्कश आवाज। मुरली की तरह मीठी आवाज नहीं। किनके लिए? है तो वही एक ही वाणी। कोर्इ को मीठी लगती है, और कोर्इ को गड़गड़ाहट की आवाज लगती है, कडुवी लगती है। नगाड़े की तीखी आवाज लगती है। तीखी आवाज उनको लगती है जिन्हों के जन्म जन्मांतर के खराब कर्म हुये हैं और यहाँ ब्राह्मण बनने के बाद भी उन्होंने र्इश्वरीय ज्ञान को महत्व नहीं दिया। ज्ञान कुछ और कहता है वो कर्म कुछ और उल्टे करते हैं। ज्ञान कुछ और बोलता है वो वाचा भी उल्टा बोलते हैं। तो ऐसी आत्मायें जो भगवान बाप की वाणी को पूरा ग्रहण नहीं कर पाती, उनको भगवान की वाणी कर्कश लगती है।

जैसे दुनियां में भी होता है एक ही आदमी एक को बहुत अच्छा लगता है, और वही एक आदमी दूसरे को बहुत खराब लगता है। यहाँ भी ऐसे ही है। वो भगवान का पार्ट कोर्इ को तो एकदम काला भूत दिखार्इ पड़ता है। क्या दिखार्इ पड़ता है? कालों का काल, महाकाल दिखार्इ पड़ता है एकदम काला। और कोर्इ आत्मा ऐसी होती है जिनको बहुत सुंदर दिखार्इ पड़ता है, बहुम अच्छा मालुम पड़ता है। दोनों को आँखें एक जैसी है देखने की। एक उसको काले के रुप में देखता है और दूसरा उसको गोरे के रुप में देखता है। तो भगवान का नाम पड़ गया है श्याम-सुंदर। क्या? एक ही व्यक्तित्व पार्ट बजाने वाला। पार्ट सबकी नज़र में है कि वो एक ही पार्ट है। वो पार्ट एक ग्रूप को लगता है कि बहुत खराब पार्ट बज रहा है और दूसरे ग्रूप को लगता है कि ये बहुत अच्छा पार्ट बज रहा है। ऐसा अंतर हो जाता है। इसलिए उस पार्टधारी का नाम भक्तिमार्ग में रख दिया है श्याम सुंदर।

इतना श्याम ते श्याम माने काले ते काला भयंकर पार्टधारी दूसरे धर्म का कोर्इ धर्मपिता नहीं हो सकता। दूसरे धर्म वाले पिता न ज्यादा अच्छा पार्ट बजाते हैं, और न ज्यादा बुरा पार्ट बजाते हैं। न ज्यादा काले बनते हैं, और न ज्यादा गोरे बनते हैं। ये देवी देवता सनातन धर्म का जो धर्मपिता है वो अति का काला है, और अति का गोरा है। एक ही टाइम पर कुछ आत्माओं को गोरा दिखार्इ पड़ता है, और कुछ आत्माओं को काला दिखार्इ पड़ता है। किस बात में ये अंतर पैदा हो जाता? आसुरी आत्माओं को काला क्यों दिखार्इ पड़ता, और देवात्माओं को अच्छे ते अच्छा सुंदर कृष्ण क्यों दिखार्इ पड़ता? एक ही साथ एक ही व्यक्तित्व के ऊपर दो नाम क्यों रख दिये गये, श्याम सुंदर? जैसा-2 चेश्मा, वैसा-2 दिखार्इ देता है। 63 जन्मों में जिसने-2 जैसे-2 कर्म किये हैं... अच्छे कर्म करने वालों को भगवान का रुप अच्छा दिखार्इ देता है। और जिन्होंने 63 जन्म बुरे ते बुरे कर्म किये है उनको बुरा दिखार्इ देता है। तो ये अंतर पड़ जाता है भगवान के पार्ट का। पार्ट ऐसा है जिसके लिए बोला है कि तुम बच्चे भी शंकर के पार्ट को समझ नहीं सकते; वन्डरफुल पार्ट है। क्यों वन्डरफुल है?

क्योंकि वो सारी सृष्टि का बाप है। सारी सृष्टि में देवतायें भी हैं अच्छे ते अच्छे पार्टधारी, और राक्षस भी हैं बुरे ते बुरे पार्टधारी। 500-700 करोड़ मनुष्य सृष्टि है। 700 करोड़ मनुष्य सृष्टि में अच्छे ते अच्छे भी है और बुरे ते बुरे भी है। हर धर्म में अच्छे ते अच्छे हैं और बुरे ते बुरे हैं। जो भी दुनियां के धर्म हैं और धर्मपितायें हैं उनमें अच्छे ते अच्छे धर्मपितायें और धर्म भी हैं, और बुरे ते बुरे धर्मपितायें और धर्म भी हैं। तो परमात्मा बाप उन सभी धर्मों में से श्रेष्ठ आत्माओं को चुनता है, और चुन करके ब्रह्मा की औलाद ब्राह्मण बनाता है। दुनियां के हर धर्म के बीज चुन करके इकठ्ठे होते हैं माउण्ट आबू में, और वहाँ से ब्राह्मणों की सृष्टि की शुरुआत होती है।

इसलिए भक्तिमार्ग में कहते हैं कि ब्राह्मणों की नौ कुरियाँ होती हैं। नौ ऋषि थे, जिन नौ ऋषियों से नौ गोत्र शुरु हुये। ये कोर्इ नौ गोत्रधारी अलग से नहीं है आज की दुनियां में फैले हुये जो खास-2 धर्म हैं उन्हीं की यादगार है। देवता धर्म के दो रुप थे। सूर्यवंश और चन्द्रवंश जो बाद में हिंदू कहे गये। और जो दूसरे धर्मों में कन्वर्ट होने वाले जैसे कोर्इ इस्लाम धर्म में चले गये, कोर्इ भारतवासी बौद्धी धर्म में चले गये, कोर्इ भारतवासी क्रिश्चियन धर्म में चले गये तो जो दूसरे-2 धर्मों का जाकर के फाउन्डेशन लगाते हैं और भारतवासियों को धोखा दे जाते हैं उन आत्माओं में भी कोर्इ न कोर्इ बहुत श्रेष्ठ है। ऐसे नहीं कि सब एक जैसे होते हैं। कारणे अकारणे कुसंग में आकर के खराब हो जाते हैं। तो ऐसे बच्चों को बाप कलेक्ट करता है। माउण्ट आबू में जाकर के वो ब्राह्मण बनते हैं।

उनमें से जो सूर्यवंशी हैं वो ज्ञान सूर्य के औलाद किसके कंट्रोल में रहेंगे? जो दूसरे धर्म के बीज होंगे, या दूसरे धर्म की जो जड़े होंगे, फाउण्डेशन होंगे उनके कंट्रोल में रह सकेंगे? सूर्यवंशी जो होंगे वो कभी किसीके कंट्रोल में नहीं रह सकते। इसलिए वो यज्ञ के आदि में ही छोड़ करके चले जाते हैं। जिसके लिए वाणी में बोला हुआ है कि राम फेल हो गया, यज्ञ के आदि में ही। तो भगवान बाप ने उनको बाण दे दिये। जाओ ले जाओ ये धनुष और जाओ ले जाओ ये बाण। ये धनुष बाण की कमार्इ करके तुम अपनी कमार्इ करो। तो वो आत्मायें ज्ञान के बाण ले लेती हैं भगवान से और पुरुषार्थ करने के लिए ऐसा शरीर मिलता है उनको अगले जन्म में कि कोर्इ भी स्थिति-परिस्थिति में वो अपने शरीर से अच्छा पुरुषार्थ करने के लिए निमित्त बन जाती हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वो मुकबला करती हैं। क्योंकि उनमें पिछले 63 जन्मों के संस्कार भरे हुये हैं विधर्मियों से टकराने के।

जैसे शिवाजी हुये, शिवाजी की सेना हुर्इ, महाराणा प्रताप हुये महाराणा प्रताप की सेना हुर्इ, लक्ष्मी बार्इ हुर्इ लक्ष्मी बार्इ की सेना हुर्इ, वो सारा का सारा ग्रूप सूर्यवंशियों का ग्रूप है।
(किसीने कहा - पृथ्वीराज?) पृथ्वीराज चौहान हुआ। (किसीने कुछ कहा।) बहुत हैं ज्ञान के लिए थोड़े उदाहरण देना काफी है। 84 जन्म हैं तो 84 जन्म लेने वाले हैं ना। उनमें से 21 जन्म निकाल दो। बाकी कितने बचे? जो 63 जन्म बचे उन 63 जन्मों में वो हीरो पाटधारी है। तो हीरो के रुप में पार्ट बजाने वाली जो आत्मायें होंगी वो तो बहुत पॉवरफुल होनी चाहिए। हीरो कैसा पार्ट बजाता है ड्रामा में? हीरो जब पार्ट बजाता है तो हीरो के पार्ट को देख करके सबको खुशी होती है ना या दु:ख होता है? जो विलियन होता है उसका पार्ट देख करके दु:ख होता है। और जो हीरो होता है उसके पार्ट को देख करके तो सब खुश होते हैं। तो ऐसी श्रेष्ठ आत्मायें हैं परमात्मा बाप के जो बच्चे बनते हैं। उनको कहा जाता है रुद्रमाला, रुद्राक्ष की माला। लेकिन अंतर क्या पड़ता है?

VCD No.309, C.No.793, Patna (Bihar),
Mu.31.12.66, Dt.27.09.05
Part-5


Yes, the ones who become the children of the Amarnath Father remain immortal. It is because when God Shiva comes, He is revealed through the three personalities (murti): Brahma, Vishnu and Shankar. Through the personality of Brahma He narrates the knowledge, through the personality of Vishnu He teaches actions in practice and through the personality of Shankar he performs the tandav dance . What kind of dance? Tan dav. Tad means ‘beating’. Beating whom? The sweeter the knowledge is narrated through Brahma ... Brahma is the very soul who is called ‘He Krishna Narayan Vasudev’ in the beginning of the Golden Age. That is why Krishna is given a flute (Murli) in his hands. It is a memorial of playing the sweet tune. And Ram is given arrows or a drum, [which makes] a sound like the rumbling of clouds, is placed in the temple of Shankar or he is given a damru , which makes a rumbling sound, a harsh sound. It is not a sweet sound like that of a flute. For whom? It is the same Vani. Some find it sweet and some find it to be a rumbling sound; they find it bitter, they find it to be the sharp sound of a drum. Those who find it to be a sharp sound, have committed bad deeds birth after birth and here, even after becoming Brahmins, they did give importance to the knowledge of God. Knowledge says something and they do something opposite to it. Knowledge says something and they say something opposite to it. So, the souls who are unable to grasp the Vani of God the Father completely find His Vani to be harsh.

Just like it also happens in the world. One person seems very nice to someone and the same person seems very bad to someone else. It is the same here as well. Some find the God’s part to be completely dark and evil. What does He appear to them? He appears to be the Death of deaths, the great Death (Mahaakaal) , completely dark. And there are some souls who find Him to be very beautiful and very good. Both have the same eyes to look through, but one sees Him dark while the other sees Him fair. So, God is given the name ‘Shyam Sundar’ (Dark-Beautiful). What? There is only one personality who plays part. Everyone can see that it is only one part. That part seems to be very bad to one group and very good to the other group. There is such difference. That is why that actor is given the name Shyam Sundar in the path of Bhakti.

There can’t be a religious Father of any other religion who would play the darkest fearsome role. The fathers of the other religions neither play too good roles, nor do they play too bad roles. They neither become too black, nor do they become too fair. The religious Father of the Ancient Deity Religion is extremely dark and extremely fair. At the same time He appears fair to some souls and to some souls, He appears dark. Why does this difference arise? Why does He seem to be dark to the demonic souls and why does He seem to be the best and beautiful Krishna to the deity souls? Why was the same person given two names, Shyam Sundar at the same time? Someone sees something according to the glasses he wears. Whoever has performed whatever actions in the 63 births... The ones who perform good deeds find the form of God to be nice. And the ones who have committed the worst deeds in the 63 births find Him to be bad. So, this difference in the role of God arises. The role is such that it is said about it: ‘Even you children can’t understand the role of Shankar. It is a wonderful part.’ Why is it wonderful?

It is because he is the Father of the entire world. In the entire world there are deities, the ones who play the best roles as well as demons, who play the worst roles. This is the world of five-seven billion [souls]. In the human world of seven billion [souls] there are the best ones as well as the worst ones. There are the best ones and the worst ones in every religion. Among all the religions and religious fathers of the world are the best religions and religious fathers as well as the worst religions and religious fathers. So, the Supreme Soul Father selects the elevated souls from all those religions. After selecting them, He makes them into Brahmins, the progeny of Brahma. The seeds of every religion are selected and gathered at Mt. Abu. And the world of the Brahmins originates from there.

That is why they say in the path of devotion that there are nine categories of Brahmins. There were nine sages (rishis). Nine gotras originated from those nine rishis. The ones belonging to the nine gotras are not someone else. It is a memorial of the main religions spread in today’s world. There were two forms of the Deity Religion, the Sun Dynasty and the Moon Dynasty; they were called ‘Hindu’ later on. And those who convert to other religions; for example some went to the Islam, some Bharatwaasis went to the Buddhist religion, some Bharatwaasis went to the Christian Religion… So, some souls among those who go and lay the foundation of other religions and betray the Bharatwaasis are also very elevated. It is not that all are of the same kind. They become corrupted due to some reason, due to the influence of bad company. So, the Father collects such children; they become Brahmins in Mt. Abu.

Among them, the Suryavanshis , the progeny of the Sun of Knowledge, will remain under whose control? Can they remain under the control of the seeds, the roots, the foundation of the other religions? The Suryavanshis can never stay under anyone’s control. That is why they go away leaving the Yagya in the beginning itself. It is said about it in Murli: ‘Ram failed at the beginning of the Yagya itself’. So, God the Father gave him arrows. [He said:] ‘Take this bow and take these arrows. Earn your income with the help of these arrows and bow.’ That soul takes the arrows of knowledge from God. And he receives such a body to make purushaarth in the next birth that he becomes instrument to make good purushaarth through that body in any circumstance. He faces the most difficult circumstances, because he is full of the sanskars of clashing with the vidharmis in the past 63 births.

For example there was Shivaji, Shivaji’s army; there was Maharana Pratap, Maharana Pratap’s army, Lakshmi Bai, Lakshmi Bai’s army. That entire group is the group of the Suryavanshis.
(A student: Prithviraj?) There was Prithviraj Chauhan. (A student said something.) There are many of them. To impart knowledge, a few examples are enough. There are 84 births… They are the ones who have 84 births, aren’t they? Take away 21 births from it. How many remain? He is the hero actor in all the remaining 63 births. So, the souls who play roles in the form of heroes should be very powerful. What kind of part does the hero play in a drama? Everyone feels happy watching the hero playing his role, don’t they? Or do they feel unhappy? They feel unhappy watching the part of the villain, but everyone feels happy watching the part of the hero. So, those who become the children of the Supreme Soul Father as such elevated souls. They are called ‘the Rudramala ’, the rosary of rudraaksh. But what difference arises? ... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Apr 2015

वी.सी.डी.नं.309, कैसेट नं.793, पटना (बिहार),
मु.31.12.66, ता.27.09.05
भाग-6


कोर्इ में श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ ही आत्मायें प्रवेश करती हैं, और कोर्इ में दूसरे-2 धर्म की भी आत्मायें प्रवेश कर जाती हैं माने कोर्इ में 14 मुख, कोर्इ में 4 मुख, कोर्इ में 8 मुख, जो कम और जास्ती मुख बनते हैं वो यहाँ की यादगार है। अभी ये जो एडवान्स पार्टी है ये बीजरुप आत्माओं का संगठन है। इस बीजरुप आत्माओं के संगठन में हर धर्म की आत्मायें घुसी हुर्इ हैं। हर धर्म के बीज हैं। हर प्रकार के बीजों में हर प्रकार के धर्म की आत्मा प्रवेश करती हैं। कोर्इ-2 बीज ऐसे है जिनमें बाप दादा की ही सोल प्रवेश करती है। या तो कृष्ण की सोल प्रवेश करेगी, या तो शिव की सोल प्रवेश करेगी। जिसमें जितनी कम आत्माओं का प्रवेश होता है वो उतनी ही पॉवरफुल आत्मायें हैं, श्रेष्ठ आत्मायें हैं। और जिनमें जितनी ही जास्ती आत्माओं का प्रवेश होता है वो उतनी ही कम पॉवर वाली आत्मायें हैं। ये कोर्इ कम पॉवर वाली या ज्यादा पॉवर वाली कैसे बनती हैं? क्या कारण हुआ? एक बाप दूसरा न कोर्इ। जो एक बाप की याद में रहती हैं उनमें फिर एक बाप ही प्रवेश करता है। उसका नाम पड़ गया शास्त्रों में एकलव्य। एक को लव करने वाला। फिर नंबरवार।

तो ऐसी-2 जो आत्मायें रुद्रमाला के मणके बनते हैं वो रुद्रमाला के मणके सारे संसार में गाये जाते हैं। वो पूजन नहीं होता उनका, उनका सिर्फ सुमिरण होता है, स्मरण होता है। वो पूजनीय क्यों नहीं बनते? पूजा का कनेक्शन किस बात से है? पूजा का कनेक्शन है प्यूरिटी से। अगर ये रुद्रमाला के मणके भी पवित्र बन जाये पूरे तो दुनियां को अपने संग के रंग से सुधार नहीं सकते। न रुद्रमाला के मणके सुधार सकते हैं और न रुद्रमाला के मणकों का जो बाप है वो सुधार सकता है। ये तो दुनियां के चुनी हुर्इ वो आत्मायें हैं जो संसार के सितारे हैं। एक-2 सितारे में दुनियां बसी हुर्इ है। अपनी-2 दुनियां के प्रजापिता है। उस सारी दुनियां का उद्धार करने के लिए वो निमित्त है। जो निमित्त होते हैं उनके ऊपर जिम्मेवारी आ जाती है। जिम्मेवारी वही महसूस करेगा जिसने अपने पार्ट को पहचाना होगा। पार्ट को नहीं पहचानेंगे, बाप को नहीं पहचानेंगे तो अपने कैटगेरे को भी नहीं पहचानेंगे। दुनियां की ये 108 श्रेष्ठ आत्मायें हैं नंबरवार। दुनियां के नौ मुख्य धर्मों से कनेक्टेड हैं। नौ मुख्य धर्म कौन कौनसे हैं?

सूर्यवंश, चन्द्रवंश, इस्लामी, बौद्धी, क्रिश्चियन, सन्यासी, मुस्लिम, सिक्ख, और आर्यसमाज। नास्तिक को नहीं लिया गया। रशिया का जो नास्तिक धर्म है वो लोग न स्वर्ग को मानते हैं, न नर्क को मानते हैं, न भगवान को मानते हैं न आत्मा को मानते हैं, न परमात्मा को मानते हैं। वो तो पूरे ही अहंकारी है। इसलिए अहंकारियों को भगवान बाप अंदर से पसंद नहीं करता। बाहर से उनको पुचकारते रहता है, शाबाशी देता रहता है। क्योंकि उनसे काम लेना है। क्या काम लेना है? उनसे सारी दुनियां का विनाश कराना है। सारी दुनियां का संहार होता है एटमबम्बों से। एटमबम्ब कौन बनाता है? रुस बनाता है कि अमेरिका? रुस बनाता है। एटमबम्ब की इजाद जो है वो रुस वालों ने की, जो आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नर्क कुछ भी नहीं मानते। बाकी रह गये जो नौ धर्म। उन नौ धर्मों में जो फाउन्डेशन जमाने वाली नौ ग्रूप की बारह-2 आत्मायें हैं - बारह गुणे नौ कितने हुये? 108 - वो 108 आत्मायें सारी दुनियां के बीज हैं। जब वो बीज सुधरते हैं तो सारी दुनियां सुधर जाती हैं। और जब वो बीज बिगड़ते हैं तो सारी दुनियां बिगड़ जाती है। उन बीजों के ऊपर सारी दुनियां के बिगड़ने और सुधरने की जिम्मेवारी है।

उनमें भी सबसे मुख्य ग्रूप कौनसा है? सूर्यवंशी ग्रूप। जो सूर्यवंशी ग्रूप है उसके ऊपर तो बहुत ही जिम्मेवारी है। क्योंकि ये उन आत्माओं का ग्रूप है जो सारी दुनियां को बनाने वाले भी है उसमें, और सारी दुनियां को बिगाड़ने वाले भी उसमें मौजूद हैं। जो बनाने वाले हैं उनकी संख्या ज्यादा है। आठ , उनको कहा जाता है अष्टदेव। दक्षिण भारत में उनकी बहुत मान्यता है। पूजा होती है। ऐसे रुद्रमाला के मणके हैं। रुद्रमाला के मणकों की पूजा नहीं होती हैं। लेकिन वो आठ ऐसे हैं जो सबसे पहले सुधरते हैं। वो है ही सुधरे हुये। जन्म जन्मांतर की सुधरी हुर्इ आत्मायें हैं। सिर्फ निमित्त मात्र अंतिम जन्म में जाके नीचे गिरती हैं। क्योंकि जो नीचे नहीं गिरेगा वो ऊँचा भी नहीं उठ सकता। आखिरी जन्म में इसलिए नीचे गिरती हैं कि वो भगवान बाप को पहचान सके। जो पतित नहीं बनेगा वो पावन नहीं बन सकता। जितना जास्ती से जास्ती पतित बनता है, उतना जास्ती से जास्ती पावन भी बनता है। तो कलियुग के अंत में अंतिम जन्म में आकर के वो आत्मायें बहुत नीचे गिर जाती हैं। और पहले जन्म में जाकर के सबसे ऊँच उठ जाती हैं। ऊँची इसलिए उठती हैं कि भगवान बाप का उनको बहुत सहयोग मिलता है।

उसके अलावा थोड़ी आत्मायें और भी हैं उस ग्रूप में जो अष्ट देव के बिल्कुल विपरीत हैं - नष्ट देव। क्या? दुनियां का उद्धार करने के बजाय क्या उनका काम है? दुनियां को एकदम गड्ढे में ले जाना। जैसे शिवबाबा के पास दो बच्चे विशेष हैं एक ब्रह्मा और दूसरा शंकर। ब्रह्मा का पार्ट क्या है? स्थापना का और शंकर का पार्ट क्या है? विनाश का। किसका विनाश कराता है? किसको गड्ढे में ले जाता है? असुरों को या देवताओं को? असुरों को गड्ढे में ले जाता है। क्योंकि दुनियां का जो पतन है वो मनुष्यात्मायें नहीं कर सकती। पूरा पतन नहीं कर सकती, अति नहीं कर सकती। अति करना वो सबके बस की बात नहीं है। इब्राहीम, बुद्ध, क्राइस्ट आकर के सब धर्मों का विनाश नहीं कराते कि सब धर्मों का विनाश करा दे फिर अपने धर्म की स्थापना करे। वो डरते हैं कि सबका अगर हम मुकाबला करेंगे तो हम ही चूर-2 हो जायेंगे। तो सब धर्मों का संहार और एक सत् धर्म की स्थापना ये सिर्फ एक का ही काम है। उसके भी सहयोगी हैं, वो सहयोगी आत्मायें उस कार्य में सहयोगी बनती हैं। ओमशान्ति।


VCD No.309, C.No.793, Patna (Bihar),
Mu.31.12.66, Dt.27.09.05
Part-6


In some of them only the most elevated souls enter, while in some, the souls of the other religions also enter. It means some have 14 mouths, some have 8 mouths, some have 4 mouths. Having fewer or more mouths is a memorial of this time. Now, this advanced party is a gathering of the seed form souls. The souls of every religion are included in this gathering of the seed form souls. The seeds of every religion are there. The souls of all kinds of religions enter the all kinds of seeds. There is a seed in which only the soul of BapDada enters. Either the soul of Krishna or the soul of Shiva will enter him. The fewer the souls enter someone, the more powerful, elevated soul he is. And the more number of souls enter someone, the lesser powerful soul he is. How do they become more or less powerful? What is the reason? ‘One Father and no one else.’ The one who remains in the remembrance of the one Father, the Father alone enters him. In the scriptures he was given the name ‘Eklavya’, the one who loved the One. The rest are number wise .

So, such souls who become the beads of the Rudramala are praised in the entire world. They aren’t worshipped. They are just remembered. Why don’t they become worthy of worship? What is worship connected to? Worship is connected to purity. If these beads of the Rudramala also become completely pure, they can’t reform the world through the color of their company. Neither the beads of the Rudramala nor the Father of the beads of the Rudramala can reform it. They are those selected souls of the world who are the stars. Every star has a world enclosed in itself. They are Prajapitas (Father of subjects) of their own world. They are the instruments to uplift the entire world. The ones, who are instruments, become responsible. Only the one, who has recognized his role, will realize his responsibility. If someone doesn’t recognize his role and the Father, he won’t recognize his category either. These are the number wise 108 elevated souls of the world. They are connected to the nine main religions of the world.

Which are the nine main religions? The Sun Dynasty, the Moon Dynasty, the Islam, Buddhism, Christianity, Sanyasi, Muslim, Sikh and Arya Samaj; Atheism wasn’t included. In the Atheism of Russia, they neither believe in paradise, nor in hell; they neither believe in God, nor do they believe in the soul, nor the Supreme Soul. They are completely arrogant. This is why God the Father doesn’t like the arrogant ones from within. He pampers them externally. He keeps patting their back, because He has to get His work done through them. What work? He has to have the entire world destroyed through them. The destruction of the entire world takes place through atomic bombs. Who makes the atom bombs? Is it Russia or America?
(A student: Russia.) Russia makes them. The Russians, who don’t believe in the soul or the Supreme Soul, paradise, hell or anything, invented atom bombs. The remaining ones are the nine religions. 12 souls each of the nine groups who lay the foundation in the nine religions - 12 times nine is equal to how many? 108 - Those 108 souls are the seeds of the entire world. When those seeds improve, the entire world improves and when those seeds become corrupted, the entire world becomes corrupted. Those seeds are responsible for the entire world to become corrupt and to reform.

Even among them which group is the main one? The group of the Suryavanshis. The group of the Suryavanshis has a lot of responsibility, because this is the group of the souls who... [The souls] who create as well as destroy the entire world are present in it. The ones who create are more in number. They are eight [souls]. They are called the eight deities (ashta dev). People in Southern Bharat believe in them a lot; they worship them. As such they are the beads of the Rudramala. The beads of the Rudramala aren’t worshiped, but those eight [souls] are such that they reform themselves first of all. They are good anyway. They are good souls, birth after birth. They fall down for namesake only in their last birth. It is because the one, who doesn’t fall down, can’t climb up either. They fall down in their last birth, so that they are able to recognize God the Father. The one, who doesn’t become impure (patit), can’t become pure (paavan). The more impure someone becomes, the purer he becomes. So, in the end of the Iron Age, in their last birth, those souls fall down very much, and in their first birth they become the highest. They become high, because they receive a lot of help from God the Father.

Apart from them, there are also some other souls in that group. They are completely opposite to the eight deities. [They are] the deities of destruction (nashta dev). What? Instead of uplifting the world, what is their task? Taking the world completely to a ditch. For example ShivBaba has two special children. One is Brahma and the other is Shankar. What is the role of Brahma? To establish. And what is the role of Shankar? To destroy. He brings about the destruction of whom? Whom does he take to the ditch? Is it the demons or the deities? He takes the demons into ditch. It is because human souls can’t bring about the complete degradation of the world. They can’t bring it to the extreme point. To bring things to the extreme point is not within everyone’s capacity. Abraham, Buddha, Christ don’t destroy all the other religions when they come. They don’t destroy all the other religions to establish their own religion. They are scared that if they face all the religions, they themselves will be shattered (cuur cuur). So, the work to destroy all the religions and establish the one true religion belongs only to the One. He too has His helpers. Those helper souls co-operate in this work. Om Shanti.
(Concluded.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 29 Apr 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-1


रात्रि क्लास चल रहा था 10 फरवरी 1967 का। पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी कि नॉलेज तो बहुत सहज है। बाकी याद करते-करते विकर्म विनाश करने में समय लग जाता है। मनुष्य कहते हैं, ये तो कोई शक्ति है, या तो इनको परमात्मा से प्रेरणा मिलती है। अब बाप कहते हैं, मैं तो ज्ञान का सागर हूँ, प्रेरणा कैसे करूँगा? ज्ञान का सागर हूँ तो ज्ञान की उछालें मारूँगा ना। प्रेरणा तो अंदर की चीज़ हो गई। ज्ञान सुनाने के लिए मुख से बोलना होता है, और कानों से सुनना पड़ता है। वास्तव में ये प्रेरणा अक्षर भक्ति मार्ग का है, कि भगवान ने हमको ऐसे प्रेरणा की। तो पहले मूल बात है, बाप को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो जायें।

बाप को याद करें विकर्म विनाश हो जायें, और कोई को याद करें तो विकर्म विनाश क्यों नहीं होते? बाप की याद से ही विकर्म विनाश क्यों होते हैं? बाप, जहाँ बाप है वहाँ पाप नहीं , और जहाँ पाप होता है वहाँ बाप नहीं होता। तो बाप की याद करेंगे, मन-बुद्धि से संग करेंगे, तो ‘जैसा संग वैसा रंग‘ लगेगा। रावण को याद करेंगे, माना ‘रुलाने वाला‘, रावण, तो बुद्धि का संग रावण से लगेगा, तो रुलाने वाले के तो पाप बनते है, तो हमारे भी पाप बन जावेंगे। तो पहली मूल बात है बाप को ही याद करो।

मुख्य याद की यात्रा है। और इसी में मेहनत है। इसको कहा जाता है गुप्त मेहनत। क्योंवकि अंदर-अंदर से याद करना होता है। मुख से कुछ बोलने की भी दरकार नहीं है। ऐसे नहीं, शिव बाबा, शिव बाबा, शिव बाबा बोलते रहो। अंदर की याद चाहिए। आवाज़ बिल्कुल बंद हो जाये। कोई की आवाज़ बंद होती है, कहते हैं मुख से तो नहीं बोलेंगे, लेकिन फिर अंदर से आवाज़ निकलती है, जीभ चलती रहती है। तो ये भी नहीं। कोई कर्मेंद्रिय की कोई भी हरकत न हो। ये अंदरूनी मेहनत है। तो मुख से कब शिव बाबा, शिव बाबा या शिवाय नमः, यह भी कहना नहीं है। क्यों नहीं कहना है? क्योंकि बाहर की आवाज़ मन की आवाज़ नहीं है। मन की आवाज़, दिल की आवाज़ है। दिल की आवाज़ दिलवाड़ा बाप तक पहुँचेगी। ये तो शरीर की आवाज़ है। जिह्वा कहो, मुख कहो, ये शरीर के ही तो अंग हैं। गले से आवाज़ निकलती है। वो भी शरीर का अंग है। शिवबाबा को तो अपना कोई अंग अथवा शरीर है ही नहीं। तो जिसको अपना अंग ही नहीं है, शरीर ही नहीं है, देह ही नहीं है, उसको देह से कैसे आकर्षित किया जा सकता है? देह से उसको आकर्षित नहीं कर सकते, याद भी नहीं कर सकते। वो भी बुद्धि रूपी आत्मा है। और हम भी मन-बुद्धि रूपी आत्मा हैं। तो मन-बुद्धि रूपी आत्मा का मेल मन-बुद्धि रूपी आत्मा से होता है। कोई देह में बहुत मोटा ताज़ा हो, और दूसरा जिससे उसका मेल बिठाना हो, वो बहुत पतला-दुबला हो, तो मेल नहीं बैठता है ना । जैसे को तैसा चाहिए। इसलिए बाप कहते हैं पहले देहभान भूलो। मुख से बोला माना देहभान आया, है।

तो देह को, देह के भान को भूलो और अपन को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। इसको गूँगे की मिठाई कहा जाता है। जैसे गूँगा है, वो मिठाई खाता है, उससे पूछा जाये मिठाई का स्वाद कैसा है? उसके मुख से आवाज़ निकलती नहीं है। अंदर-अंदर अनुभव भरा हुआ है। तो ये परमात्मा की याद भी अंदरूनी अनुभव है। हम शांति में बाप को याद करते हैं। हमको राजयोग सीखने को मिलता है। कहते हैं ना – ‘तीन मिनट साइलैंस‘। आवाज़ में आने की बात नहीं। वो तो कहते हैं - ‘तीन मिनट साइलैंस‘, अर्थ को तो समझते नहीं हैं। यहाँ तो तुम अर्थ को समझते हो। तुम्हारी इस शांति में बहुत कमाई है। क्योंकि तुम आत्मिक स्थिति में अपन को आत्मा समझकर के बैठते हो। ये आत्मा तुम (तुम्हारी) भृकुटि के मध्य में ज्योति बिंदु के रूप में बैठी हुई है। आत्मा का परमात्मा से मेल होता है। वो सुप्रीम सोल परमात्मा शिव देह धारण नहीं करता। तुम देह धारण करते हो। तो क्या करना पड़े? पहले देह को भूलना पड़े। जितना-जितना देह को भूलते जावेंगे, आत्मिक स्थिति में स्थित होते जावेंगे, उतना बाप की याद पक्की होती जावेगी। ये गुप्त ज्ञान है। अंदर में ज्ञान रहता है। ये तुम जो नोट्स लेते हो, वो भी इसलिए लेते हो, कॉपी-पैंसिल से, कि तुमको याद रहे। जो बहुत होशियार होते हैं, उनको नोट्स लेने की भी दरकार नहीं है। उनका बुद्धि रूपी डायरी में ही सारा नोट होता रहता है। टॉपिक्स का भी नोट्स होना चाहिए, कि आज हमको इस फलाने टॉपिक पर किसीको समझाना है। पतित से पावन होने के लिए और किसी को नहीं बुलाते है।

कृष्ण को बुलावें, विष्णु को बुलावें, पतित से पावन होने के लिए हनुमान को बुलावें; बाबा कहते हैं वो तो बंदर । वो कैसे पतित से पावन बनावेगा? कोई गणेश को याद करते हैं। वो तो देह अभिमान में झूमता ही रहता है। तो बाप कहते है कि पतित से पावन बनना है तो बाप को ही बुलाया जाता है। भक्ति मार्ग में 63 जन्म बुलाते रहे। क्या कहकर बुलाते रहे? पतित पावन सीता-राम। क्या? हे सीताओं के राम, तुम पतितों को पावन बनाने वाले हो, अब आ जाओ। हम सब सीतायें पतित हुई पड़ी हैं। हमको पतितपने से उठाओ। इसका मतलब ये हुआ कि कोई भी देवता, राम के सिवाय, ऐसा नहीं है जिसमें वो सुप्रीम सोल निराकार शिव प्रवेश करके पतितों को पावन बनाता हो।


VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-1


A night class of 10th February 1966 was in progress. In the beginning of the middle part of the first page the topic being discussed was: this knowledge is very easy. But, it takes time to destroy the wrong actions through remembrance. People say, ‘either this is some power or they get inspiration from the Supreme Soul.’ Now the Father says, ‘I am indeed the Ocean of Knowledge. How will I inspire? As I am the Ocean of Knowledge I will splash up [the waves] of knowledge, won’t I? Inspiration is something internal. To give knowledge, He has to speak through the mouth and hear through ears. Actually, this word ‘inspiration’ is derived from the path of Bhakti (devotion) [and they think] that God gave them that inspiration. So, the foremost basic thing is to remember the Father, then your wrong actions will be destroyed.

By remembering the Father, our wrong actions are destroyed. Why aren’t our wrong actions destroyed if we remember someone else? Why are wrong actions destroyed only through the remembrance of the Father? Where there is the Father, there is no sin; and where there is sin, the Father is not present there. So, if we remember the Father and take His company through the mind and intellect, then ‘as is the company we take, so is the colour applied to us’. If we remember Ravan, i.e., the one who makes [others] cry, if the intellect comes in the company of Ravan, then - the one who makes [others] cry accumulates sins - we will also accumulate sins. So, the first basic thing is to remember only the Father.

The journey of remembrance is important and hard work is needed only in this. This is called ‘hidden hard work’ because you have to remember within. There is no need to speak anything through the mouth either. It is not that you have to keep saying ‘ShivBaba, ShivBaba, ShivBaba’. There should be the inner remembrance. You should become completely voiceless. When someone becomes voiceless, he says, ‘I won’t speak through the mouth’, but then the voice comes from inside, the tongue keeps moving; even this should not happen. There should not be any activity of any karmendirya . This is internal hard work. So you don’t have to even say, ‘ShivBaba, ShivBaba or Shivay Namah’ through the mouth. Why should we not say it? Because, the external voice is not the voice of the mind. The voice of the mind is the voice of the heart and the voice of the heart will reach the ‘Dilwada Father ’. This (the external voice) is the voice of the body; the tongue or the mouth are organ of the body. The voice comes from the throat, which is also a part of body. ShivBaba does not have His own organs or body at all. So, the one who doesn’t have His own organs and body, how can He be attracted through the body? He can neither be attracted nor remembered through the body. He is also a soul in the form of the intellect and we are also souls in the form of the mind and intellect. So, the soul in the form of the mind and intellect can have connection only with the soul in the form of the mind and intellect. [For example], if a person is very fat and healthy and the person with whom he has to be paired is very thin and weak, then they don’t make a match, do they? Similar ones are required. That is why, the Father says, ‘first of all forget body consciousness. If you speak through the mouth, then it proves the presence of body consciousness.

So, forget the body and bodyconsciousness, and remember Me, the Father considering yourself a soul.’ This is called ‘sweet of the dumb’. For example, when a person who cannot speak eats sweets and is then asked about the taste of the sweet, then, no voice comes out of his mouth [but] he has its experience within. So, this remembrance of the Supreme Soul is also an internal experience. We remember the Father in silence. We get to learn Raja Yoga. It is said, ‘three minutes of silence’, isn’t it? There is no question of coming in sound. They just say, ‘three minutes of silence’, but do not understand its meaning. Here, you understand the meaning. You earn a lot through this silence because by considering yourself a soul, you sit in the soul consciousness state. You, the soul, are sitting in the bhrikuti (place between the eyebrows) in the form of a point of light. The soul meets the Supreme Soul. That Supreme Soul Shiva does not take on a body; you take on a body. So, what should you do? First, you have to forget this body. The extent to which you keep forgetting the body and keep becoming firm in the soul consciousness state, the remembrance of the Father will become firm to that extent. This is a secret knowledge; you have [this] knowledge within you. You even take down these notes with a book and a pencil so that you may remember it. The ones who are very intelligent need not take even notes. They note down everything in their diary like intellect itself. Even the topics should be noted down, [so that you have a thought:] today, I have to explain this particular topic to someone. To become pure from impure, no one else is called.

[If someone] calls Krishna or Vishnu, to purify the impure ones if someone calls Hanuman ... Baba says that he (Hanuman) is a monkey; how can he purify the impure ones? Some remember Ganesh. He sways in body consciousness. So the Father says, only the Father is called to purify the impure ones. In the path of Bhakti, you kept calling for 63 births. By what name did you keep calling? – ‘Patit-pavan Sita-Ram (Sita-Ram, the purifier of the sinful)!’ What? ‘O, the Ram of the Sitas, You are the one who purifies the impure ones, now please come. We all Sitas have become impure, liberate us from impurity.’ It means that there is no other deity except Ram, in whom Supreme Soul incorporeal Shiva enters and purifies the impure ones.
... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 Apr 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-2


तो दो बाप हुए। एक निराकार, बिंदु-बिंदु निराकार आत्माओं का बाप। जो बिंदु आत्मा, हमारी भृकुटि के मध्य में बैठी हुई है, स्टार के मिसल, जिसकी यादगार में बिंदी लगाते है, टीका लगाते है, वास्तव में वो आत्मिक स्मृति में टिकने की बात है, कोई टीका लगाने की बात नहीं है। उस ज्योति बिंदु आत्मा को उस सुप्रीम सोल बाप की याद में टिकना है, जो बाप कभी देह के बंधन में बंधता ही नहीं। इस सृष्टि पर आता भी है, हम-तुम बच्चों में से कोई एक शरीरधारी में मुकर्रर रूप से प्रवेश करता भी है, सब कर्म करता है, इसलिए साधारण चोले में आता है। साधारण चोले में आवेगा, तो कर्म भी साधारण ही करेगा। कर्म सब करता है, लेकिन कर्म के बंधन में नहीं बंधता, ऐसा वो पावन है। और हम पतित बन जाते हैं। हम इस सृष्टि पर जब आते हैं, आत्माओं के लोक से, तो इस साकार सृष्टि में आने के बाद नीचे गिरते जाते हैं। माना पतित होते जाते हैं। हमारी आत्मा की शक्ति क्षीण होती जाती है।

क्यों? वो भी तो आत्माह है और हम भी आत्मा है। हमारी शक्ति क्यों क्षीण होती है? उसकी क्यों नहीं होती? क्यों कि वो अभोक्ताम है। क्या? वो शरीर में आते हुए भी इंद्रियों का सुख भोगता नहीं है। और हम जो भी आत्मायें हैं, वो शरीर धारण करने के बाद इंद्रियों का सुख भोगे बगैर रह नहीं सकते। तो हम सब हैं भोगी, और वो है अभोगी। इसलिए वो पतितों को पावन बनाने वाला है। वो ऐवर प्योर है। क्यां? हम नीचे गिरते-गिरते इम्प्योर बन जाते हैं। और वो नीचे गिरता ही नहीं। हम जिसका संग का रंग लगाते हैं, जिसका संग करते हैं, अटैचमेंट हो जाता है, लगाव लग जाता है। और जिसका संग करते हैं, जिससे लगाव लग जाता है, उसकी बुद्धि में याद ऑटोमेटिक आने लग पड़ती है। हम न चाहें याद करना, तो भी याद आता है। और उसको? वो संग में तो आता है। जिस शरीर में प्रवेश करता है उसकी इंद्रियों द्वारा संग तो करता है आत्मा रूपी बच्चों का, लेकिन उसको संग का रंग लगता नहीं। वो लगाव में उसकी बुद्धि नहीं आती। और जब लगाव में नहीं आवेगी, तो उसको याद भी नहीं आती है। कोई बच्चे पूछते हैं - बाबा हम आपको इतना याद करते हैं, आप हमें याद करते हैं कि नहीं? हमारी याद आपकी बुद्धि में छपती है कि नहीं? तो बाप कहते हैं, मुझे एक-एक को य़ाद करने की क्या दरकार? जो जैसा करेगा, उसको वैसा फल नूँधा हुआ है। मैं एक-एक को बैठकर के याद नहीं करूँगा। तुम आशिक हो एक परमात्मा बाप के, और मैं तो माशूक हूँ। तो आशिक बैठकर के माशूक को याद करे। मैं एक-एक को, 500 करोड़ को, 700 करोड़ मनुष्य आत्माओं को, एक को - एक को बैठके याद करूँगा क्या?

मैं तो जो खास-खास मुख्य-मुख्य एक्टर्स है, इस सृष्टि रूपी रंगमंच के, उनके अनेकों जन्मों की जीवन कहानी आकर के बताता हूँ। उस जीवन कहानी के आधार पर तुम बच्चे अपने जन्मों को जान जाते हो। मुझे एक-एक की कर्म कहानी बताने की दरकार नहीं है। न मैं बोर्ड पर लिखूँगा, न कागज़ पर लिखूँगा कि तुमने क्या-क्या पार्ट बजाये हैं अनेक जन्मों में। तुम अपनी आत्मिक स्थिति के बल से, परमात्म याद के बल से अपनी आत्मा में इतनी पावर भरते हो, अपनी आत्मा को इतना पवित्र बनाते हो कि तुम्हें अनेक जन्मों का ज्ञान स्वतः ही हो जाता है। तुम आत्मा इस सृष्टि रूपी रंग मंच पर पार्टधारी हो। जैसे वो ड्रामा होता है ना । तो कोई स्त्री का पार्ट बजाता है, कोई पुरुष का पार्ट बजाता है, कोई गधे का पार्ट बजाता है, कोई राजा का पार्ट बजाता है। तो जिसको जो पार्ट बजाना है वो पार्ट उसे याद रहता है या नहीं याद रहता है? याद रहता है। तो हम बिंदु-बिंदु आत्मायें भी पार्टधारी हैं। इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आकर के जन्म-जन्मांतर हमने पता नहीं कितने बार चोले बदले हैं। कभी स्त्री के रूप में पार्ट बजाया और कभी पुरुष के रूप में पार्ट बजाया।

कोई कहे ये क्या चक्कर? स्त्री-पुरुष, पुरुष-स्त्री, ये क्यों बनना? अरे, जैसे बीज होते हैं, गेहूँ का बीज होगा, सरसों का बीज होगा, वो ज़मीन में बोया जायेगा, तो कौन सा पौधा पेदा होगा? सरसों से सरसों का पौधा पैदा होगा, आम से आम का पौधा पैदा होगा। ऐसे ही तुम्हारी जाति जो है, वो मनुष्य की जाति है। तुम जो बिंदु-बिंदु आत्मायें हो, तुम्हारी जाति कौन सी है?
(सभी ने कहा – मनुष्य।) बिंदु-बिंदु-बिंदु-बिंदु मनुष्य आत्मायें हो। हाँ, जैसे वो पौधे होते हैं, जैसे आम होता है, पपीता होता है, तो उनमें कोई बीज नर होता है, कोई मादा होता है। बीज तो देखने में एक ही जैसा, लेकिन जब वृक्ष बनता है, तो कोई नर बनता है, कोई मादा बनता है। ऐसे ही तुम बच्चे किसी जन्म में नर बनते हो, पुरुष बनते हो, और किसी जन्म में स्त्री चोलाधारी। जब नर बनते हो तो काम विकार की प्रधानता होने क कारण स्त्री चोले को याद करते रहते हो सारे जीवन। तो अंत मते सो गते हो जाती है। अंत में वही स्त्री चोला याद आ जाता है तो तुमको अगला जन्म स्त्री का मिलता है। और अगर स्त्री चोला है, तो पाँच विकारों में काम विकार प्रधान होने की वजह से सारा जीवन कोई न कोई पुरुष का चोला याद आता रहता है। तो सारा जीवन जो चोला याद किया जायेगा अंत समय में भी वही याद आ जाता है। तो कौन सा जन्म मिलेगा? पुरुष का जन्म मिल जाता है। हाँ। कोई- कोई टाईम ऐसा होता है कि कोई दो जन्म लगातार पुरुष के, अथवा दो जन्म लगातार स्त्री के मिल सकते हैं। इससे जास्ती नहीं। फिर तो चोला बदलना ही पड़े। तो ये संस्कारों का हिसाब-किताब है। ये बुद्धि का हिसाब है।

VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-2


So there are two fathers. One is incorporeal, the Father of the point souls, the point soul that is seated like a star in our bhrikuti, as a memorial of which you apply a bindi (a dot), a tiikaa (mark of vermilion applied on forehead). Actually, it is about becoming stable in the soul conscious state and not about applying a tiikaa. That point of light soul has to become stable in the remembrance of that Supreme Soul Father who is never bound in the bondage of the body. He comes in this world and enters a bodily being from among us children in a permanent form, He performs all kinds of actions, this is why He comes in an ordinary body. If He comes in an ordinary body, He will perform just ordinary actions. He performs all actions but He is not get bound in the bondage of actions. He is pure in such a way. And we become impure. When we come in this world from the Soul World, then we keep falling in this corporeal world, i.e. we keep becoming impure. The power of our soul keeps diminishing.

Why? He (Shiva) is also soul and we are souls too, [then] why does our power diminish and not His? It is because He is ‘Abhogta ’, what? He does not seek pleasures of indirya despite coming in a body. Whereas, all of us souls after taking on a body cannot live without enjoying the pleasures of indriya. We all are ‘bhogi’ (pleasure seekers and He is ‘abhogi’. That is why He is the one who purifies the impure ones. He is Ever pure. What? We become impure by falling and He never falls. We are attached towards the one whose company we take, and we automatically start remembering the one whose company we take, the one to whom we are attached. Even if we don’t want to remember him, we are reminded of him. And what about Him? He certainly comes in the company, through the indriya of the body which He enters He certainly comes in the company of the souls in the form of children but He is not affected by the colour of the company. His intellect does not come into attachment and when [the intellect] doesn’t come into attachment he is not reminded of anyone either. Some children ask, ‘Baba, we remember You so much, do You remember us or not?’  Does our remembrance make an impression on Your intellect or not? So, the Father says, what is the need for Me to remember each and every one? A person is bound to receive fruits according to his actions. I will not sit and remember each and every one. You are lovers of the one Supreme Soul Father, and I am the Beloved. So, lover should remember the Beloved. Will I sit and remember each one, the 500 - 700 crore (five-seven billion) human souls?

In fact, I come and tell [you] the life-story of many births of the special and important actors of this stage like world. On the basis of that life story, you children learn about your respective births. I do not need to tell the story of each and everyone’s actions. Neither will I write on board, nor paper that what various parts you have played for many births. Through the power of soul consciousness and remembrance of the Supreme Soul, you fill so much power in your soul, you make your soul so pure that you come to know about your many births automatically. You souls are actors on this stage like world. For example, there is that (physical) drama, in it someone plays the role of a man, someone plays the role of a woman, someone plays the role of a donkey and someone of a king. So, does an actor remember the role he has to play or not? He remembers it. So, we point souls are also actors. No one knows how many times we have changed our costumes (bodies) after coming on this stage like world for many births. Sometimes we have played part in the form of a woman and sometimes in the form of a man.

If someone asks ‘What is this confusion? Why to become woman from a man and man from a woman?’ Arey! For example, there are seeds; there is wheat, there are mustard seeds, if they are sown in soil, which plant will grow out of them? The mustard plant will grow from mustard seeds, the mango seed will grow into a mango plant. Similarly, your race is the human race. What is the race of you point souls? You are point human souls. Yes. For example, those plants, there is the mango plant, the papaya plant; among them some seeds are male and some are female. The seeds appears to be the same, but when they grow into tress, then some become male [trees] and some become female [trees]. Similarly, you children become male in some births, and in some births you take on a female body. When you become a male, then due to the dominance of the vice of lust, you keep remembering the female body throughout your life. So, your final thoughts lead you to your destination. At the end, you remember the same female body and you are born as a female in the next birth. And if you are in a female body, you keep remembering one or the other male body throughout your life because of the dominance of the vice of lust among the five vices. So, the body which you remember throughout your life, you remember the same in the end. So, what will you be born as? You are born as a male. Yes, sometimes it can happen that you get two consecutive births as a male or two consecutive births as a female. Not more than this; then you will certainly have to change your costume. So these are the karmic accounts of the sanskaars, this is the account of the intellect.
... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 01 May 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-3


अभी बाप कहते हैं, बुद्धि को मेरे में लगाओ। मेरे में बुद्धि को लगावेंगे, तो तुम्हारे सारे पाप भस्म हो जावेंगे और तुम पुण्यात्मा माना देवात्मा बन जावेंगे। क्या? देव योनि में चले जावेंगे। क्योंकि मैं आकर के नर को नारायण और नारी को लक्ष्मी बनाने की शिक्षा देता हूँ। दुनिया में ये शिक्षा और कोई किसी को दे नहीं सकता। ये गीता का ज्ञान है। क्या? हे नर अर्जुन, तू ऐसी करनी कर, तू नर से नारायण बने, और हे नारी द्रौपदी, तू ऐसी करनी कर जिससे तू नारी से लक्ष्मी बने। मैं ऐसा देवता बनाता हूँ, जिसकी दुनिया में कोई ग्लानि नहीं है। 33 करोड़ देवताओं में से एक-एक देवता की शास्त्रों में ग्लनि है, दोष मढ़ दिया है। लेकिन एक ही देवता ऐसा है जिसकी कोई शास्त्रों में ग्लानि नहीं है। नारायण। मैं ऐसा देवता तुमको बनाता हूँ।

जो नई दुनिया आने वाली है, ये कलियुग जाने वाला है, सतयुग आने वाला है; ये कलियुग कैसे जावेगा? इतना बड़ा कलियुग! 500-700 करोड़ मनुष्य फैले हुए हैं सारी सृष्टि पर, ये कैसे खलास होगा? वंडर है! अरे, भगवान बाप आते है तो एक तरफ नई दुनिया की निर्माण की विधि बताते है, और दूसरी तरफ पुरानी दुनिया का ध्वंस, विनाश करने का भी तरीका बताते है। तरीका ही नहीं बताते है, काम शुरु कराये देते है। आज से 70 साल पहले, न भगवान आया था, और न ये एटम बम बने थे। एक तरफ भगवान आता है और दूसरी तरफ एटम बम बनना शुरु हो जाते है। ये एटम बम्‍‍ब दुनिया के बड़े ते बड़ा ऐसा हथियार है जो सारी सृष्टि को खलास कर देता है। ये बड़े-बड़े एटम बम्‍‍ब भगवान की दाढ़ें बताई हैं गीता में। अर्जुन को मुँह खोलके दिखाय दिया, विराट रूप का साक्षात्कार कराय दिया। हे अर्जुन देख! मेरी ये जो दाढ़ें हैं ऊपर की और नीचे की, इन दाढ़ों के बीच में सारी दुनिया चबाई जाने वाली है। ये एटम बम्‍‍ब आसमान में भी तैर रहे हैं, और समंदर में भी, पाताल में तैर रहे हैं। सिर्फ बटन दबाने की देर है, और खेल खलास हो सकता है।

लेकिन बाप कहते है, जब तक मैं नई दुनिया की स्थापना न कर लूँ , क्या? जब तक मैं नई दुनिया का ढाँचा तैयार न कर लूँ तब तक पुरानी दुनिया का विनाश नहीं हो सकता। दुनिया में भी लौकिक बाप होते हैं, तो ऐसे थोड़े ही कि सारा मकान एक साथ गिराय देंगे। एकदम गिराय देते हैं क्या? नहीं। पहले एक कमरा बनायेंगे, एक कमरा पहले तैयार करेंगे, और उसमें सारा साज-सामान इकट्ठा करके रखेंगे। फिर सारे मकान को गिराय देंगे। तो मैं भी छोटी सी दुनिया तैयार करता हूँ। क्या? गुलगुल बगीचा बनाता हूँ। अभी तो ये दुनिया काँटों का जंगल है। क्या? काँटों का जंगल है। जहाँ जाओ, जहाँ देखो, काँटे ही चुभते रहते हैं। काँटे दु:खदायी होते हैं या सुखदायी होते हैं? दु:खदायी होते हैं। बाप कहते हैं ये काँटों की दुनिया अब खलास होने वाली है। काँटों की दुनिया खलास होगी, इसमें एटम बमों से आग लगेगी, धमाके होंगे, और सारी दुनिया में जलमयी हो जायेगी। कैसे? एटम बमों में से आग निकलती है कि जल निकलता है?
(किसी ने कहा- आग।) तो जलमयी कैसे हो जावेगी?

जो ऐटम बम फटते हैं, तो पृथ्वी का बैलेंस बिगड़ता है। बैलेंस बिगड़ने से जो पृथ्वी के ऊपर के हिस्से में, उत्तरी ध्रुव, जहाँ मीलों ऊँचे पहाड़ हैं बर्फ के और दक्षिण में दक्षिणी ध्रुव, जहाँ सैंकड़ों मील ऊँचे पहाड़ हैं बर्फ के, वो सब टूट-टूट के समुंदर में आ जाते हैं, और समुंदर का स्तर ऊँचा चला जावेगा। जो बंबई जैसे शहर समुंदर के किनारे आज जमीन के ऊपर रखे हुए हैं, जैसे दिखाई पड़ता है सागर के ऊपर बंबई तैर रही है। जब समुंदर ता पानी ऊपर उठेगा तो सारी बंबई क्या होगी? सारी बंबई जिसे माया की नगरी कहा जाता है वो सब डूब जावेगी। तो सागर जो है उफान मारेगा, और उसमें एटम बमों की गर्मी से उसका जल क्या बन जावेगा? भाप बनकर के ऊपर उड़ेगा। सारी दुनिया में बरसात ही बरसात का नज़ारा हो जावेगा, और कई दिन तक बरसात होगी मूसलाधार। लगातार मूसलाधार बरसात होने से क्या होगा? सब जलमई हो जावेगा। ये जलमई सारी दुनिया को शांत कर देगी। शांत होगी दुनिया, वातावरण शांत होगा, अशांति धीरे-धीरे खत्म हो जावेगी।

पाँच तत्व भी सतोप्रधान बनेंगे, लेकिन वो बनेंगे तब जब इस दुनिया के जो रहने वाले नये संगठन के मनुष्य होंगे, माना जो देवतायें होंगे, वो संपन्न स्टेज को पहुँचे हुए होंगे। अपनी शांत स्टेज को पकड़े हुए होंगे। ऐसी आत्मायें, जो इन आँखों से इस विनाश को देखेंगी, वो अशांत नहीं होंगी। अपने शांति के वाइब्रेशन को टूटने नहीं देंगी। उनके द्वारा नई दुनिया बनेगी। वो पावन बन जावेंगे। उन पावन मनुष्यों के द्वारा, माना देवताओं के द्वारा नई सृष्टि की शुरुआत होगी। तो आज के जो बड़े-बड़े महान संत हैं, कोई-कोई कहते हैं, नारा लगाते हैं, जैसे ‘जय गुरूदेव’। क्या नारा लगाते हैं? – ‘सतयुग आने वाला है, कलियुग जाने वाला है।’ वो बात तो सही है। ये काम मैं ज्ञान सुनाकर के कराता हूँ। इसमें प्रेरणा देने की बात नहीं है।


VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-3


Now the Father says, ‘Engage your intellect in Me. If you engage your intellect in Me, then all your sins will be burnt to ashes and you will become a virtuous soul, i.e. a deity soul.’ What? You will be born in the class of the deities because I come and teach the study to make a nar (man) into Narayan and a naari (woman) into Lakshmi. Nobody in the world can teach this to anyone. This is the knowledge of the Gita. What? ‘O, nar Arjun, do such deeds that you become Narayan from a man, and O, naari Draupadi, do such deeds that you become Lakshmi from a woman.’ I make you such a deity who is not at all defamed in the world. Among the 33 crore (330 million) deities, each and every deity is defamed in the scriptures, they have been blamed but there is just one deity who is not defamed in the scriptures; it is Narayan. I make you such a deity.

The new world is about to come, this Iron Age is about to go, the Golden Age is about to come. How will the Iron Age go? The Iron Age is so big! 500-700 crore people are spread in the whole world; how will it (the Iron Age) perish? It is a wonder! Arey! When God the Father comes then on one side He tells [us] the process to construct the new world, and on the other side He also tells [us] the method to demolish, destroy the old world. Not only tells [us] the method, but also has the work started. 70 years ago neither had God come, nor were these atom bombs made. On one side God comes and on the other side, [people] start making atom bombs. The atom bomb is such a powerful weapon of the world which destroys the whole world. In the Gita, these powerful atom bombs are referred to as the ‘jaws of God.’ God opened His mouth and showed it to Arjun, He gave him the vision of His universal form (viraat ruup) [and said:] ‘O Arjun, look, the whole world is going to be chewed between My upper and lower jaws.’ These atom bombs are hovering in the sky and they are present in the oceans, the underworld too. They just have to press a button and the whole drama can end.

But the Father says ‘Until I establish the new world ...’what? ‘Until I prepare the framework of the new world, the old world cannot be destroyed’. In world also, there are worldly fathers. It’s not that they will demolish the whole house altogether. Do they demolish it altogether? No. First, he will make one room, he will prepare one room and he will gather all goods and materials and keep it there. Then he will demolish the whole house. Similarly, I also prepare a small world. What? I make a garden of flowers. At present, this world is a forest of thorns. What? It is a forest of thorns. Wherever you go, whatever you see, the thorns just keep pricking [you]. Do thorns give sorrow or happiness? They give sorrow. The Father says, Now, this world of thorns is going to end. The world of thorns will end, it will be set to fire with the atom bombs, there will be explosions and the whole world will submerge in water. How? Does fire or water come out of atom bombs?
(Someone said: Fire.) Then how will it submerge in water?

When atom bombs explode, the Earth’s balance is disturbed. Due to this disturbance of balance, the miles of high mountains of ice in the upper portion of the Earth, on the North Pole and the many miles of high mountains of ice on the South Pole will break and fall into the sea and the level of sea will rise. Cities like Bombay, which are situated on the sea coast, today they are seen on ground. It appears as if Bombay is floating on the sea. What will happen to the whole Bombay when the level of the sea rises? The whole Bombay, which is called the city of Maya, will drown. The sea will boil over, and due to the heat of atom bombs the water of the sea will turn into what? It will evaporate. There will be the scene of rain and only rain in the world and heavy rains will pour for several days. What will happen due to continuous heavy rains? Everything will drown in water. This flood will calm the whole world. The world will become silent, the atmosphere will become silent. Restlessness will end gradually.

The five elements will also become satopradhaan, but they will become satopradhaan only when the residents of this world, the new gathering, i.e. the deities will have reached their complete stage, when they will have achieved their silent stage. Such souls, who will see the destruction through these eyes, will not be restless. They will not let their vibrations of silence break; the new world will be established through them. They will become pure. The new world will begin through those pure people i.e. the deities. So some of the great saints of today say, they raise slogans. For example, [there is] Jaigurudev; what slogan does he raise? ‘The Golden Age is about to come, the Iron Age is about to go.’ This is indeed correct. I have this work done by narrating knowledge, there is no question of giving inspiration in this.
... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 May 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-4


बाकी गंगाजल वा चरणामृत से थोड़े ही कोई पावन बन सकते हैं। क्या? जो गंगा जी का जल है, वो शरीर को साफ करेगा, कपड़ों को साफ करेगा, या मन-बुद्धि रूपी आत्मा को साफ करेगा? शरीर-रूपी वस्त्र को साफ कर सकता है। कहते हैं लोग - ‘गंगा पतित-पावनी है।’ लेकिन ये नहीं जानते हैं कि पतित-पावनी गंगा, उसको धारण किसने किया? वो पतित-पावनी गंगा कोई पानी की गंगा है, या कोई कन्या है जिसने ज्ञान जल को धारण किया? कोई कन्या है जिसने ऐसे ज्ञान जल को धारण किया है कि निर्लिप्त जीवन बिताया, अटैचमेंट कोई के साथ नहीं हुआ। एक शिव के साथ अटैचमेंट हुआ। किसके साथ? शिव की जटाओं में गंगा दिखाते हैं ना ! शंकर का जूड़ा बंधा हुआ होता है, और उसमें किसी कन्या का चेहरा दिखाया जाता है। तो इससे साबित होता है कि चित्रकार ने ये चित्र दिया है। बताया है कि परमात्मा शिव जब इस सृष्टि पर आते हैं तो राम के अंतिम चोले में प्रवेश करके उनका नाम देते हैं – ’शंकर’। और शंकर ऐसी गहरी याद में रहता है कि शंकर और शिव की आत्मा मिलकर के एक हो जाती हैं, ‘एकाकार’।

इसलिए 33 करोड़ देवताओं में से एक ही देवता ऐसा है जिसका नाम शिव के साथ जोड़ा जाता है। कौन है? ‘शिव-शंकर भोलेनाथ’। और 33 करोड़ देवताओं में से एक भी ऐसा नहीं है जिसका नाम शिव के साथ जोड़ा गया हो। बाप आकर बताते है कि ‘शिव-शंकर भोलेनाथ’ कहते तो है, लेकिन लोग समझ लेते है कि शिव-शंकर एक ही आत्मा है। ऐसा नहीं है। अगर एक ही आत्मा होती; तो शिव की पिंडी बनाते हैं, शिव के मंदिर में क्या बनाते हैं? – शिव की पिंडी बनाते है। और शंकर का विग्रह बनाते है, मूर्ति बनाते है। जो पुराने-पुराने मंदिर हैं, उनमें बीच में शिवलिंग होता है और आस-पास देवताओं की मूर्तियाँ रखी होती हैं। उन मूर्तियों में मुख्य स्थान पर शंकर की मूर्ति रखते है। उससे साबित क्या हुआ? कि वो आस-पास सब परमात्मा बाप शिव के बच्चे बैठे हुए हैं, जो मनुष्य से देवता बनते हैं और बीच में मनुष्यों को देवता बनाने वाला बाप बैठा हुआ है – शिव।

तो शिव की आत्मा अलग, जो जन्म-मरण के चक्र में न आने के कारण उसकी कोई मूर्ति नहीं बनती। किसकी? शिव की मूर्ति नहीं बनती, शिव का लिंग बनाया जाता है। उसको हाथ, पाँव, नाक, आँख, कान नहीं दिखाये जाते। क्योंकि वो हाथ, पाँव, नाक, आँख, कान के बंधन में बंधता ही नहीं। और शंकर के हाथ, पाँव, नाक, आँख, कान दिखाये जाते है। तो दोनों आत्मायें अलग-अलग हैं। शिव की आत्मा अलग, और शंकर की आत्मा अलग। लोग क्या समझते है? कि शिव-शंकर एक ही है। एक नहीं है, है तो दो आत्मायें, लेकिन शंकर की आत्मा इतनी गहरी याद में बैठती है, जो चित्रों में उसको गहरी याद में बैठे हुए दिखाया गया है, कि वो शिव के साथ एकाकार हो जाती है। क्या? शंकर के संस्कार स्वभाव इतने निराकारी स्टेज को पकड़ते है कि शिव के समान निराकारी बन जाता है। जैसे शिव का गुण है - ‘निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी’; ऐसे ही शंकर की आत्मा भी क्या बन जाती है? निराकारी, निर्विकारी और निरहंकारी।

निर्विकारी माना? जिसमें कोई विकार नहीं। इसलिए... विकारों में मुख्य विकार कौनसा ? पाँच विकार हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार। उनमें मुखिया है काम विकार। लेकिन शंकर के लिए कथा दिखाते है, कि उन्होंने काम देवता को भस्म, कर दिया। और कोई देवता को नहीं दिखाते है। क्या? कि किसी ने काम देवता को भस्म‍ किया हो। शंकर को दिखाते है कि कामदेव को भस्मक कर दिया। अब जब मुखिया को ही भस्मभ कर दिया, तो बाकी चोर-डकैत जो (हैं) वो तो अपने आप भाग जायेंगे। इसलिए शंकर भी निराकारी सो संपूर्ण निर्विकारी बन जाता है। और निर्विकारी सो निरहंकारी। जिसमें अहंकार होगा, देह का अहंकार होगा, वो फिर अहंकार तो दिखायेगा अपना। देह होते हुए भी देह का कोई अहंकार न रहे, उसको कहते है निरहंकारी।

तो बताया कि शंकर के मस्तक पर गंगा दिखाते है। कहते हैं गंगाजल वा चरणामृत, उसे पीने से पवित्र बन जावेंगे। विष्णु के चरणों में से गंगा निकलती हुई दिखाई गई है। गंगा विष्णु के चरणों में से निकली और शंकर के मस्तक में समा गई। अब कोई ये स्थूल चरण की बात थोड़े ही है। ये तो बुद्धि-रूपी पाँव की बात है। क्या? बुद्धि-रूपी पाँव, किसके? विष्णु के। विष्णु ज़रूर कभी पहले ब्रह्मा रहा होगा। ब्रह्मा सो विष्णु। कहते है ब्रह्मा के मुख से वेद निकले। ‘विद्’ माना जानकारी, ज्ञान। तो किसी को पता ही नहीं है, कि मुख में से क्या ‘हुआ’ किया और वेद निकल पड़े होंगे। ऐसे कहीं होता है क्या? नहीं। वो निराकार शिव ब्रह्मा के तन में प्रवेश करता है। और प्रवेश करके जो वाणी बोलता है वो वाणी ब्रह्मा की आत्मा धारण करती है। क्या? धारणा कहाँ होगी? बुद्धि में धारण होती है।


VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-4


As for the rest, no one can become pure through the water of the Ganges (the river Ganga) or carnaamrit . What? Will the water of the Ganges clean the body, the clothes or will it clean the soul in the form of the mind and intellect? It can clean the cloth like body. People [just] say that the Ganges is purifier of the impure, but they do not know who held the Ganges, the purifier of the impure. Is Ganges, the purifier of the impure, a river of water or is it some virgin who has imbibed the knowledge? It is a virgin who has imbibed the water of knowledge in such a way that she spent a detached life. She did not have attachment for anyone else, she had attachment for the one Shiva. She [had attachment for] whom? (Everyone said: With Shiva.) The Ganges is shown in his hair locks, isn’t she? The hair of Shankar is tied-up and the face of a virgin is shown in it. So, this proves that the artist has made this picture. He has depicted that when the Supreme Soul Shiva comes in this world, then He enters the last body of Ram and names him Shankar. And Shankar stays in such deep remembrance that the souls of Shankar and Shiva combine to become one, united.

That is why there is only one deity among the 33 crore deities whose name is combined with the name of Shiva. Who is it? Shiva-Shankar, Bholenath (lord of innocent ones). There is no one else amongst the 33 crore deities whose name can be combined with that of Shiva. The Father comes and tells [us] that though it is said Shiva-Shankar Bholenath, people think that Shiva-Shankar are just one soul. It is not like this. If they were only soul, then a small lump (pindi) of Shiva is made. What do they make in the temples of Shiva? They make a pindi of Shiva. While, an idol of Shankar is made. In ancient temples, a Shivling is placed in the centre and around it the idols of deities are placed. Among those idols, the idol of Shankar is placed at the prime location. What does this prove? That all the children of the Supreme Soul Shiva who become deities from human beings are sitting around. And the Father, Shiva, who makes human beings into deities, is sitting in the center.

So, the soul of Shiva is separate, his idol is not made because He doesn’t come in the cycle of birth and death. Who? Shiva’s idol is not made, a ling is made. He is not shown having hands, legs, nose, eyes or ears because He is not bound in the bondage of hands, legs, nose, eyes, ears at all. [On the contrary,] Shankar is shown to have hands, legs, nose, eyes and ears. So, both the souls are separate. The soul of Shiva is separate and the soul of Shankar is separate. What do people think? Shiva -Shankar are one and the same. They are not one, they are two souls but, Shankar’s soul sits in such a deep remembrance - he is shown to be sitting in deep remembrance in pictures - that he becomes united with Shiva. What? The sanskaars and nature of Shankar reach such an incorporeal stage that he becomes incorporeal like Shiva. As are the virtues of Shiva, incorporeal, vice-less and egoless, so the soul of Shankar also becomes what? Incorporeal, vice-less and egoless.

What does vice-less mean? The one who has no vice. So, which vice is the prime one among all vices? There are five vices: Lust, anger, greed, attachment and ego. Among them, the prime vice is lust. But for Shankar, a story is shown that he burnt the deity of desires (Kaam devata) to ashes. No other deity is shown. What? That some deity burnt the deity of desires to ashes. Shankar is shown to have burnt the deity of desires to ashes. Now, when the chief himself is burnt to ashes, then rest of the thieves and bandits will run on their own. This is why, Shankar also becomes completely vice-less from incorporeal; and the one who is vice-less is egoless. The one who has ego, bodily ego, he will definitely show his ego. Despite having a body there shouldn’t be the ego of the body; this is called [being] egoless.

So it is said that the Ganges is shown on the head of Shankar. [People] say: We will become pure by drinking water of the Ganges or carnaamrit . The Ganges is shown to flow from the feet of Vishnu. The Ganges emerged from the feet of Vishnu and merged in the hair locks of Shankar. Now in fact, it is not about the physical feet. This is about the feet like intellect. What? Whose feet like intellect? Vishnu’s. Vishnu must certainly have been Brahma earlier. Brahma so Vishnu. It is said that Vedas emerged from the mouth of Brahma. ‘Vid’ means information, knowledge. So, no one knows [the reality]. [They say:] ‘Brahma must have opened his mouth and the Vedas emerged from it’. Does it ever happen like this? No. That incorporeal Shiva enters the body of Brahma and the Vani ( Murlis) that He narrates, Brahma’s soul assimilates that Vani. What? Where will the assimilation take place? The assimilation will take place in the intellect.
... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 May 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-5


उस बुद्धि में, जो बुद्धि रूपी चरण में, ज्ञान की धारणा होती है, वो ज्ञान की धारणा सुनने वाले सुनते है। उन सुनने वालों में पुरुष भी होते हैं और स्त्रियाँ भी होती हैं। ज्यादा धारणा किसको होगी? (किसी ने कहा - स्त्रियों को)क्यों? पुरुषों को क्यों नहीं होगी? रावण तो बहुत प्रकांड विद्वान था। उसके हाथों में वेद-शास्त्र दिखाये जाते हैं, जैसे ब्रह्मा के हाथों मों वेद-शास्त्र दिखाये जाते हैं। तो उसने वेद-शास्त्र रुपी ज्ञान धारण नहीं किया क्या? धारण तो किया, लेकिन प्रैक्टिकल जीवन में धारण नहीं किया। इसलिए मुरली में बाबा बोलते है – जितने पुरुष हैं, सब दुर्योधन दुशासन। क्या? ये दुष्ट युद्ध करते हैं। दुर्योधन हैं, दुशासन - दुष्ट शासन करते हैं। जबरदस्ती, मार-पीट कर के चलाते हैं। बाप कहते है जो दुर्योधन-दुशासन हैं, उनकी बुद्धि में ये ज्ञान धारण नहीं हो सकता है। कोई को क्रोध आ जाये तो उस समय ज्ञान रहता है? उड़ जाता है। ऐसे ही बाबा कहते है, कोई काम विकार में नीचे गिर जाये, तो पाँचवी मार से नीचे गिरता है, हाड़-गोड़ सब टूट जाता है। ज्ञान सारा उड़ जाता है। ज्ञान की बातें फिर सुना न सकें। तो पुरुषों को वो धारणा नहीं होती है।

अब रही कन्यायें-मातायें, कन्याहओं-माताओं में से... दो वर्ग हैं। एक हैं कुमारियाँ और दूसरी हैं अधर कुमारियाँ। ‘अधर’ – आधी कुमारी। कैसे? आधी कुमारी कैसे? शादी हो गई तो आधी कुमारी या पूरी माता बन गई? ज्ञान में आने के बाद, बाबा बताते है कि तुमको पवित्र रहना है। क्या? अपने जीवन में पवित्रता धारण करनी है। मन-बुद्धि के अंदर गंद नहीं आने देना। क्या? गू-मूत की दुनिया में तुम्हारी बुद्धि चलायमान न हो। ऐसी बुद्धि बनाना। तो भले शादी हो गई, बच्चे भी पैदा हो गए, लेकिन ज्ञान में चल पड़ी और बुद्धि में कचड़ा नहीं आने देती है, तो कुमारी हुई ना उस समय से? तो उनको कहा गया अधर कुमारी।

और दुसरी वो होती हैं जिन्होंने शादी की ही नहीं। बच्चों की पैदाईश हुई ही नहीं है। तो वो हुई कुमारी। इसलिए यादगार में मंदिर भी बने हुए हैं। कुमारी कन्या और अधर कुमारी। तो जो कुमारियाँ हैं, उनमें प्योरिटी ज्यादा होगी, पवित्रता के वाइब्रेशन ज्याहा होंगे, या माताओं में ज्यादा होंगे? कुमारियों में प्योरिटी के वाइब्रेशन ज्यादा होते हैं। इसलिए वो कुमारियाँ नंबरवार ज्ञान को धारण करने वाली बन जाती हैं। कोई कहे नंबरवार क्यों? सारी ही कुमारियाँ हैं फिर नंबरवार क्यों लगा दिया? इसलिए लगा दिया कि आज की इस कलियुगी दुनिया में सारी दुनिया का वातावरण कैसा हो गया है? गंदा हो गया है। खराब हो गया है। ऐसा वातावरण बन गया है जिस बाबा कहते है कि राम ने बंदरों की सेना ली। वास्तव में बंदरों की सेना नहीं ली, बंदर मिसल मनुष्य बन जाते हैं, उनकी सेना ली। उनको ज्ञान सुनाया। उनको माया से युद्ध करना सिखाया। ऐसे जो बंदर होते हैं, वो बंदरों की दुनिया में; बाबा बताते है, अखबार भी बताते है, आज टी.वी. भी बताता है, क्या? कि बाप बेटी को नहीं छोड़ता, भाई बहन को नहीं छोड़ता, मामा भांजी को नहीं छोड़ता, चाचा भतीजी को नहीं छोड़ता, गुरु अपनी चेली को नहीं छोड़ता। कुमारियों के सारे ही दुश्मन बन जाते हैं। तो? तो सारी ही कुमारियाँ भ्रष्ट हो जाती होंगी क्या? कि नंबरवार भ्रष्टत होती होंगी? नंबरवार बनती हैं। तो उनमें कोई ऐसी भी निकलती है जो ज्ञान को अच्छी तरह से धारण करती है और संसार में वो ज्ञान दूसरों को सुनाती भी है, बाँटती भी है। उत्तर भारत में गंगा बहती हुई दिखाई जाती है। क्या? उत्तर भारत में गंगा का बहुत मान है। कहते हैं गंगा शंकर के मस्तक में समा गई।

अब ये बातें कहाँ की हैं? संगमयुग की हैं। परमात्मा शिव ने ब्रह्मा के मुख में आकर जो वेद-वाणी बोली, जो ज्ञान सुनाया, जिसे मुरली कहा जाता है, उस मुरली के ज्ञान को कोई ने पूरा धारण किया। क्या? जो पूरी याद में रहेगा वही पूरी धारण करेगा। तो शंकर की याद बहुत तीखी होती है। वो याद की शक्ति से, जो भी ब्रह्मा के मुख से ज्ञान सुनाया जाता है, वो सारा ज्ञान अपनी जटाओं में समा लेता है। कोई जटाओं में ज्ञान नहीं समाया जाता। कहीं बालों में ज्ञान होता है क्या? बालों माना? जटाओं माने बुद्धि में वो सारा ज्ञान समा जाता है।

बुद्धि में जो ज्ञान समाता है, उन जटाओं में आकर के, विष्णु के चरणों में से जो निकली हुई गंगा है, जो ब्रह्मा सो विष्णु बनने वाली आत्मा है उसकी रहबरी में पलने वाली जो आत्मा गंगा के रूप में, कन्या के रूप में होती है वो उसपर अर्पण हो जाती है। किनपर? शंकर पर। शिव-शंकर भोलेनाथ के ऊपर अर्पण, माने समर्पण, हो जाती है। वो समर्पण होने की यादगार उनके मस्तक पर गंगा दिखाई गई है। तो गंगा शंकर की जटाओं में आकर समा जाती है। तो पहले परमात्मा शिव ब्रह्मा के द्वारा ज्ञान सुनाते है। जो ज्ञान आता है. उस ज्ञान को कोई तपस्वी शंकर के रूप में उसको धारण करता है और धारण करने में जो नंबर वन जाता है उसकी बुद्धि में वो गंगा ज्ञान की, घुमड़ती रहती है। पहले घुमड़ती रहती है, वहीं अटक जाती है। बाहर नहीं आती। तो कथा बना दी है। क्या? कि भागीरथ ने क्या किया? लंबे समय तक फिर तपस्या की। तपस्या करके गंगा को, क्या किया? गंगा को जटाओं से नीचे लाया गया। माना, जो उनके मस्तक में ज्ञान गंगा समा गई थी, वो ज्ञान गंगा फिर पृथ्वी पर फैलती है। और सारी दुनिया का कल्याण करती है।


VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-5


The assimilation of knowledge that takes place in the intellect, the feet like intellect, the listeners listen to that assimilation of knowledge. Among those hear it, there are men as well as women. Who will imbibe more? Women. Why? Why not men? Ravan was a great scholar. Scriptures are shown in his hands, just like they are shown in the hands of Brahma. So, didn’t he imbibe the knowledge of the Vedas and scriptures? He did imbibe it, but not in the life in practice. That is why, Baba says in Murli that all men are Duryodhan- Dushaasan . What? They fight this wicked war, they are Duryodhan. Dushasan, they rule in a wicked way. They make people work using force and violence. The Father says, ‘The intellect of Duryodhan and Dushaasan cannot assimilate this knowledge’. Does the knowledge remain [in their intellect] when they become angry? It vanishes. Similarly, Baba says that if someone falls in the vice of lust, then [it is like] he falls from the fifth storey of a building; he breaks his bones and everything. All the knowledge vanishes. Then, they cannot narrate the topics of knowledge. So, men don’t assimilate that [knowledge].

Now, the virgins and mothers remain. Among the virgins and mothers there are two categories. One [category] is the kumaris (virgins), and the other [category] is of the adharkumaris (females who are married and lead a pure life). Adhar means half (aadhi) kumari. How? How is she a half kumari? After marriage, did she remain a half kumari or did she completely become a mother? Baba says that after coming in knowledge, you have to remain pure. What? You have to imbibe purity in your life. You should not let dirt enter your mind and intellect. What? Your intellect should not be engaged in the world of excrements; you should make your intellect such. So, although she got married and also gave birth to children, if she follows knowledge and does not let dirt enter her intellect, then from that time she becomes a kumari, doesn’t she? So, they (such females) were called Adharkumari.

And the other [category] is of those who have not got married, who have not at all given birth to children. So, they are kumaris. That is why, temples are also made as memorials: kunvaari kanyaa (virgin) and adharkumari. So, will kumaris have more purity, the vibrations of purity or will the mothers have it more? The virgins have more vibrations of purity. That is why, kumaris imbibe the knowledge number wise (at different levels). Someone may ask, ‘Why number wise?’ When all are virgins, then why was [the word] number wise used? He used it because in today’s world of the Iron Age, how has the atmosphere of the whole world become? It has become dirty and bad. The atmosphere has become such that regarding it Baba says, ‘Ram took an army of monkeys.’ Actually, he did not take an army of monkeys, but human beings become like monkeys, it is their army that he took. He narrated the knowledge to them and taught them to fight with Maya. Such monkeys, in the world of monkeys… Baba says, it comes in the newspapers as well as on T.V. ; what? A Father doesn’t spare his daughter, a brother doesn’t spare his sister, an uncle doesn’t spare his niece and a guru doesn’t spare his female disciple. Everyone becomes an enemy of the kumaris. So? So, will all the kumaris become impure? Or will they become impure number wise? They become impure number wise. Some among them, someone emerges who imbibes the knowledge well and also narrates, distributes it to the others in the world. The Ganges is shown to flow in North India. What? The Ganges is highly regarded in North India. It is said that the Ganges merged in the head of Shankar.

Now, these topics are of when? They are of the Confluence Age. The Ved Vani that the Supreme Soul Shiva narrated through the mouth of Brahma, the knowledge which is called Murli that He narrated; that knowledge of Murli was completely imbibed by someone. What? Only the one who remain in complete remembrance will imbibe [the knowledge] completely. So, the remembrance of Shankar is very sharp. Through the power of remembrance, he absorbs the entire knowledge that is given through the mouth of Brahma in his hair locks. Actually, the knowledge does not merge in the hair locks. Is there any knowledge in the hair? Hair means that the complete knowledge merges in the intellect.

The knowledge that merges in the intellect, in those hair locks… the Ganges, who emerged from the feet of Vishnu, the soul in the form of the Ganges, a virgin who receives sustenance under the guidance of the one who becomes Brahma so Vishnu offers herself to him. To whom? To Shankar. She offers herself, surrenders herself to Shiva Shankar Bholenath. The Ganges has been shown on his head as a memorial of offering herself. So, the Ganges merges in the hair locks of Shankar. So, first, the Supreme Soul Shiva narrates the knowledge through Brahma, then some ascetic in the form of Shankar imbibes it, and the Ganges of knowledge keeps whirling in the intellect of the one who goes No.1 in imbibing the knowledge. Initially, she keeps whirling; she stops there itself and doesn’t flow out. So they have made up a story. What did Bhagirath do? He did tapasyaa (intense meditation) for a long time once again. What did he do the Ganges after doing tapasyaa? He brought down the Ganges from the hair locks, i.e. the Ganges of knowledge which merged in his (Shankar’s) intellect, then spreads on the earth and benefits the whole world.
... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 May 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-6


तो शंकर जी का भी चोला पुरुष का है, या स्त्री का चोला है? पुरुष चोला है। पुरुष चोलों के द्वारा कल्याण नहीं होता सृष्टि का। कितना भी भारी ज्ञान सुना दें। कल्याण कब होता है? जब वो ज्ञान कोई कन्या धारण करती है, और धारण करके संसार में फैलाने के निमित्त बनती है। तो गंगा आती है। बताया, ऐसे नहीं है कि गंगा जल या चरणामृत से कोई पावन बन जाते है। उन्होंने तो ये समझ लिया, कोई स्थूल गंगा है पानी की, जिससे कोई पावन बनता है। नहीं। कोई कन्या निकलती है और कन्या उस ज्ञान को धारण करती है जीवन में और जीवन में धारण करके दूसरों को सुनाती है।

अब वास्तव में अमृत तो ज्ञान को कहा जाता है। क्या? अमृत माना?
(किसी ने कहा – ज्ञान।) शास्त्रों में आया है ना , कि सागर मंथन हुआ और उसमें से अमृत कलश निकला। अमृत कलश निकला। ये नहीं कहते, ज्ञान कलश निकला। क्या निकला? अमृत कलश निकला। तो ज्ञान में और अमृत कलश में क्या अंतर है? मुरली में भी बोला है; मुरली में, जब ब्रह्मा बाबा मुरली चलाते थे तो उनके मुख से बोला है, अभी गीता ज्ञानामृत नहीं कहेंगे। क्यों नहीं कहेंगे? क्योंकि अमृत जो है वो मंथन करने के बाद निकलता है। जब सागर मंथन हुआ तो अमृत निकला। ऐसे ही ब्रह्मा के मुख से जो ज्ञान सुनाया गया, उस सुने हुए ज्ञान को शंकर की बुद्धि में, शंकर की जटाओं में, मंथन किया गया। शंकर ने अपनी बुद्धि में मंथन किया, तो मंथन करने के बाद फिर वो अमृत बनकर के निकलता है।

तो बताया, अमृत ज्ञान को कहा जाता है। कहते भी है, अमृत छोड़ विख काहे को खाये? क्या गंगा जी के लिए कहते है?
(किसी ने कहा – नहीं।) किसके लिए कहते है? ‘अमृत छोड़ विख काहे को खाये?’ ये गंगा जी के लिए कहते है या देवताओं के लिए कहते है? किसके लिए कहते है? चित्र किसका बनाया हुआ है? शंकर जी का चित्र बनाया हुआ है। क्या चित्र बनाया हुआ है? शंकर जी क्या करते थे? विष पात्र लिए हुए, पीते हुए दिखाया जाता है उनको। बाप कहते है, तुमको अमृत मिल रहा है, तुमको ज्ञानामृत देता हूँ, तुम विष काहे के लिए पीते हो? ये गंगा के लिए नहीं है। माना कन्यायें–मातायें जो होती हैं, उनमें लाज रहती है। वो सूर्पनखायें-पूतनायें नहीं बनती हैं मोस्ली (ज़्यादातर)। तो लज्जा होने के कारण वो ज्ञानामृत को पीने वाली बनती हैं। और पुरुष? पुरुष जो है, वो विषपायी होता है। वो विषय-विकार भोगने वाला होता है।

तो जो पुरुष हैं, उन पुरुषों में जो मुख्य पुरुष है, वो कौन है? ज़्यादा से ज़्यादा कोई आत्मा पुरुष के जन्म लेने वाली होती होगी या नहीं होती होगी? ज़्यादा पुरुष जन्म कौन लेगा और ज़्यादा स्त्री जन्म कौन लेगा? कुछ हिसाब होगा कि नहीं नहीं होगा? क्या हिसाब होगा? यह भी तो बताया, कोई आत्मा दो-दो जन्म स्त्री के ले लेती है, कोई आत्मा दो-दो जन्म पुरुष के लेती है। तो कोई ऐसी आत्मा भी तो होगी जो 84 जन्मों में से ज़्यादा से ज़्यादा पुरुष चोले धारण करती हो। और कोई ऐसी होगी जो 84 जन्मों में ज़्यादा से ज़्यादा स्त्री चोला धारण करती हो। तो ज़्यादा पतित कौन बनेगा, ज़्यादा पावन कौन बनेगा? जो पुरुष चोला ज़्यादा धारण करेगा वो ज़्यादा पतित बनेगा। और जो स्त्री चोला सबसे जास्ती धारण करेगा वो क्या बनेगा? वो अंतिम जन्म में भी पावन बनेगा। तो बुद्धि भी कैसी होगी? पावन बुद्धि होगी।

तो गंगा कहो या वैष्णवी देवी लक्ष्मी कहो, क्या? ये दो रूप हैं। अमृत कलश निकला तो दिखाया गया है लक्ष्मी को दिया गया। लक्ष्मी ने फिर वो ज्ञानामृत बाँटा। किसको बाँटा? किसको बाँटा? देवताओं को बाँटा। लेकिन गलती क्या हो गई? लक्ष्मी ने बाँटा तो; ब्रह्मा सो वैष्णवी बनने वाली जो लक्ष्मी है उसने बाँटा तो, लेकिन फैसला नहीं कर पाया। क्या? कि कौन देवता है और कौन असुर है। और बाँटते ही चले गये। तो असुरों का नंबर लग गया। उन्होंने अपना घुस गये। उन्होंने नंबर लगा लिया। तो वो जो नंबर लग गया, वो तो अमर हो गया ना । क्या? इस सृष्टि में से असुर कभी खत्म हो जाते हैं क्या? असुर खत्म नहीं होते। वो द्वापरयुग से फिर, फिर शुरु हो जाते हैं।

तो इसका मतलब ये हुआ कि लक्ष्मी को इतनी निर्णय शक्ति नहीं होती है। कितनी? इतनी परख शक्ति लक्ष्मी को नहीं होती है जितनी...
( किसी ने कहा – नारायण को।) नारायण को तो होती ही होती है; जितनी गंगा को होती है। क्या? गंगा में, गंगा के लिए नहीं दिखाते है कि गंगा जो है पतित-पावनी है तो वो गंगा असुरों को भूल में आकर के बाँट देती है। नहीं। भूल में आके नहीं बाँटती है। वो असुरों का भी उद्धार करती है। गंगा की बुद्धि में वो ज्ञान रहता है जो रुद्रमाला के रुद्र वत्सों में ज्ञान रहता है।

रुद्रमाला और विजयमाला। रुद्रमाला किसकी है और विजयमाला किसकी है? रुद्र कहा जाता है शिव को। तो शिवबाबा की माला है रुद्रमाला। और विजयमाला, वैजन्ती माला वैष्णवी देवी की है। वो विजयमाला जो है, वो विष्णु की माला है। तो विष्णु ऊँचा या शिव ऊँचा?
( किसी ने कहा - शिव ऊँचा।) शिव ऊँचा हुआ, तो उसकी माला में भी ताकत ज़्यादा होगी कि नहीं होगी? (किसी ने कहा – बिल्कुल होगी ताकत ज़्यादा।) और विष्णु की माला में उतनी ताकत नहीं होती है। ये बात दूसरी है कि जो विजयमाला है, उस विजयमाला में रुद्रमाला के मणके, जब विकारों पर विजय पा लेते हैं, तो विकारों पर विजय पाने वाले वो मणके विजयमाला में एड कर दिए जाते हैं। फिर प्रवृत्ति मार्ग की स्थापना हो जाती है। जो नई दुनिया बनती है, उसमें प्रवृत्ति मार्ग की स्थापना होती है। निवृत्ति मार्ग की स्थापना जो हुई है 2500 साल से, वो खलास हो जाती है।

VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-6


So, does Shankarji have a male body or a female body? He has a male body. The world is not benefited through a male body no matter how powerful knowledge he narrates. When does the benefit take place? It is when some virgin assimilates that knowledge and then becomes instrument to spread it in world. So, that Ganges comes. [So,] it was said, ‘It is not that no someone becomes pure through the water of the Ganges or carnaamrit. They have perceived it to be some physical Ganges of water which purifies someone. No. it is some virgin who emerges and imbibes the knowledge in her life and after imbibing it in her life she narrates it to the others.

Now in fact, knowledge is known as nectar. What? What does nectar mean?
(Students: Knowledge.) In the scriptures it is mentioned that an urn of nectar emerged when the churning of ocean took place. The urn of nectar came out. It’s not said that an urn of knowledge came out. What came out? Urn of nectar came out. So, what is the difference between knowledge and the urn of nectar? It is also said in a Murli. In the Murli spoken through the mouth of Brahma Baba, it is said: Now, it will not be called the nectar of the knowledge of the Gita.’ Why will it not be called so? It is because nectar comes out after churning. When the churning of the ocean took place, then the nectar came out. Similarly, the knowledge spoken through the mouth of Brahma was churned in the intellect, hair locks of Shankar. Shankar did the churning in his intellect, then after churning it came out in the form of nectar.

So, it was said: Knowledge is known as nectar. It is also said, ‘why do you leave nectar and eat poison’. Is it said for the Ganges?
(Someone said: No.) For whom is it said? ‘Why do you leave nectar and eat poison?’ Is it said for the Ganges or the deities? For whom is it said? Whose picture is made? The picture is of Shankarji is made. What picture is made? What did Shankarji do? He is shown to drink poison from a bowl. The Father says, ‘You are getting nectar, I give you the nectar of knowledge, then why do you drink poison?’ It is not said for the Ganges, i.e. virgins and mothers have modesty in them. Mostly, they do not become ‘Shrupanakha and Pootna ’. So, because of having modesty, they are the ones to drink the nectar of knowledge. And, what about men? Men are the ones who drink poison; they take the pleasure of vices.

So, who is the chief amongst all the men? Will there be some soul who has the maximum births of a male or not? Who will have more male births and who will have more female births? Will there be some account or not? What will be the account? It was said just now that some soul has two consecutive male births, and some soul has two consecutive female births. Then, there will also be some soul who has a male body for maximum number of birth in the 84 births; and there will [also] be a soul who has a female body for maximum number of births in the 84 births. So, who will become more impure and who will become more pure? The one who takes more male bodies will become more impure. And what will [the soul] who takes maximum number of female bodies become? It is pure even in the last birth. So, what will the intellect be like? The intellect will be pure.

So, call her Ganga or Vaishnvi-Devi Lakshmi. What? These are the two forms. It is shown that when the urn of nectar came out, it was given to Lakshmi. Lakshmi distributed that nectar of knowledge. To whom did she distribute it? She distributed it to whom? She distributed it to the deities. But what mistake did she make? Although Lakshmi distributed it; the one who becomes Brahma so Vishnavi, Lakshmi certainly distributed it but she could not decide. What? Who is a deity and who is a demon and she went on distributing it. So, the demons got a chance and they intruded [in the line of deities] and got their number. So, when they got their number, they became immortal, didn’t they? What? Do demons ever perish from the world? Demons don’t perish, they start coming again from the Copper Age.

So, it means that Lakshmi does not have so much power of making decisions. How much? Lakshmi doesn’t have as much power of making decision as ...?
(Someone said: Narayan.) Narayan definitely has it. [Lakshmi doesn’t have as much power of making decisions] as the Ganges has. It is not shown for the Ganges that Ganges, he purifier of the sinful makes a mistake and distributes [nectar] to the demons. No. She doesn’t make a mistake and distribute [the nectar], [in fact] she uplifts the demons as well. The knowledge which stays in the intellect of the Ganges is the same knowledge which stays in [the intellect of] the Rudravatsa (children of Rudra) of the Rudramala.

Rudramala and Vijaymala. To whom does Rudramala belong and to whom does Vijaymala belong? Shiva is called Rudra. So, the rosary of ShivBaba is Rudramala. And, Vijaymala or Vaijanti mala belongs to Vaishnavi devi; that Vijaymala is the rosary of Vishnu. So, is Vishnu high or is Shiva high? Shiva is higher, so will his rosary also be more powerful or not? And Vishnu’s rosary does not have so much power. This is another thing that the beads of the Rudramala, when they win over the vices, are added to the Vijaymala. Then the path of household is established. The path of household is established in the new world which is made. The path of renunciation which was established in the 2500 years ends.
... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 May 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-7


तो बताया, कहते भी हैं, अमृत छोड़ विख काहे को खाये? तो कौन कहते है? और किससे कहते हैं? अरे किसी से तो कहते होंगे? कोई तो कहता होगा? किसने कहा और किससे कहा? (किसी ने कहा - शिव ने कहा।) शिव ने कहा, किससे कहा? (किसी ने कहा - शंकर से।) शंकर जी से कहा, तू अमृत छोड़ विख काहे को खाये? अच्छा! क्या शंकर ही विख खाता है? और कोई नहीं खाता? जो भी पुरुष हैं, उन पुरुषों में कोई ऐसा भी पुरुष है जो विख न खाता हो? कोई है? कोई ऐसा नहीं। खाते तो सब हैं, लेकिन अव्वल नंबर खाने वाला भी तो कोई होगा। जो पहला ब्राह्मण, सो पहला देवता। जो पहला देवता, सो पहला क्षत्रिय। जो पहला क्षत्रिय, सो पहला विषियस, विषय विकारी। जो पहला विषियस, वैश्यल, सो पहला शूद्र। तो पहला नंबर किसका लगा? (किसी ने कहा - शंकर का।) तो गायन किसका होगा? (किसी ने कहा - शंकर का।) गायन भी उसी का होता है।

गायन ही नहीं, वो प्रैक्टिकल बात है। कि सारी बातों पर जीत हो जाती है। किसकी? शंकर की, याद के बल से। लेकिन एक बात पर जीत नहीं होती। कौनसी बात? कौनसी बात? विष पीते जो दिखाया गया है, वो विष पीना छोड़ नहीं पाता। क्यों? अरे, काम विकार के ऊपर विजय पाने के लिए संगी-साथी चाहिए या अकेला हो जायेगा? संगी-साथी भी तो चाहिए। और जो संगी-साथी चाहिए, वो समान ताकत वाला चाहिए या लुंजुम-पुंजुम चाहिए?
(सभी ने कहा – समान ताकत वाला।) लुंजुम-पुंजुम से काम नहीं चलेगा। हाँ, ये हो सकता है कि एक ब्राह्मण कुल का हो तो दूसरा क्षत्रिय कुल का हो। या ब्राह्मणों में से कुछ गिरी हुई कुरी का हो। लेकिन ये नहीं हो सकता कि एक शूद्राणी हो और एक ब्राह्मण हो, और दोनों का साथ कर दिया जाये तो वो काम विकार के ऊपर जीत पाय लेंगे। नहीं। समान पुरुषार्थी होने चाहिए। तो समान पुरुषार्थियों में फिर बाबा... (विडिओ कट)

तो ये कहाँ की बात बोली? ये बात कहाँ की बोली?
( किसी ने कहा - संगमयुग में। ) संगमयुग में ऐसा हुआ होगा। क्या? (किसी ने कहा – एक छोड़ना, दूसरा पकड़ना।) हाँ। एक करते है, संगी-साथी बनाते है, सृष्टि बनाते है, सृष्टि की पैदाईश होती है ब्रह्मा के द्वारा। फिर क्या करते है? वो सृष्टि अच्छी नहीं लगती, तो खत्मी कर देते है। (किसी ने कहा – कमी महसूस होती होगी।) हाँ। फिर; फिर नई सृष्टि रचने के लिए संगी-साथी दूसरा चाहिए कि नहीं चाहिए? फिर दूसरा साथी बनाते है। वो भी सृष्टि उन्हें पसंद नहीं आती। फिर खलास कर देते है। फिर तीसरी; तीसरा संगी-साथी। फिर सृष्टि रची गई तीसरी बार। वो भी पसंद नहीं आई। पिर चौथी बार जब बनाते है, तो वो स्थापन हो जाती है। तो आखरी कौनसा होता है? आखरी, आखरीन जो संगी-साथी बनता है वो कौन बनता है? लक्ष्मी, वैष्णवी।

(किसी ने पूछा - वो आखरी पहले ही क्यों न बना लिया बाबा चार बार की बजाए?) आदि में तो शूद्रों को ब्राह्मण बनाया गया था और वो भी कलकत्ते की बात थी। और कलकत्ते में परंपरा ऐसी चलती है आखरी जन्मऔ में कि जो भी मनुष्य होते हैं वो सब इतने विकारी होते हैं कि दो-दो स्त्रियाँ रखते हैं, चार-चार स्त्रियाँ रखते हैं। एक अपनी स्त्री घर में रखेंगे, उसके होते हुए भी दूसरा मकान बना देंगे, वहाँ दूसरी औरत रखेंगे। ये बंगालियों में बहुत चलता था। तो आदि में ये स्थापना हो जाये, जमदे-जामदे नहीं होता है। क्या? हथेली हर आम नहीं उगाया जा सकता। यज्ञ के आदि में भी, बाबा कहते हैं धोबीघाट खोला था। क्या? धोबीघाट खोला था, लेकिन उस समय ज्ञान नहीं था। जब ज्ञान ही नहीं है तो स्थापना होने का सवाल ही नहीं। उस समय तो ओम्-ओम् ध्वनि का उच्चारण करते थे जैसे भगत लोग करते हैं। संस्कृत की गीता बैठकर के पढ़ाते थे। तो वो कोई ज्ञान थोड़े ही हुआ।

ज्ञान तो अब आया है, ब्रह्मा के मुख से, वेद-वाणी आई। लेकिन उसका मंथन नहीं हुआ। फिर कोई बच्चा निकलता है, ब्राह्मण बच्चा, जनेऊधारी शंकर को दिखाते है ना। कोई ब्राह्मण बच्चा ऐसा निकलता है जो इस ज्ञान को पूरा मस्तक में धारण करता है, मंथन करता है, और उसके मस्तक में से गंगा बाहर आती है। संसार में सृष्टि का उद्धार करने के लिए वो कन्या मैदान में आ जाती है। फिर ये सारी यहाँ की बातें हैं। बोला, ऐसी बात नहीं है कि गंगाजल वा चरणामृत से कोई पावन बन जाते है। अमृत तो ज्ञान को कहा जाता है। ‘अमृत छोड़ विख काहे को खाये’?

तो भक्ति मार्ग में बहुत ही अगड़म-बगड़म कर दिया है। क्या अगड़म-बगड़म कर दिया है? भक्ति मार्ग में कोई भी बात का ताल-मेल बैठता नहीं है। वो सारा सूत मुँझा हुआ होता है। ज्ञान का सारा सूत; जैसे कोई धागा हो ना, और यूँ-यूँ-यूँ इकट्ठा करके गुल्ला बना दो तो क्या होगा? सारा सूत मुँझ जायेगा। तो ऐसे ही ज्ञान का सारा सूत मुँझा हुआ है। अब बाप आकर के उस सूत को सुलझाते है। आज के सन्यासी होते हैं ना , झूठे सन्यासी, वो मालूम है जटायें कैसी बना लेते हैं?
(किसी ने कहा – उलझी-उलझी।) हाँ, वो उनको जटा बना के और लिबड़ा करके और सारे बालों को गुत्थिम-गुत्थाझ कर देते हैं। बड़ी-बड़ी लंबी-लंबी जटायें बना देते हैं।

VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-7


So, it was said, ‘It is also said “Why do you leave nectar and eat poison?”’ So who says it and to whom is it said? Arey, it will be said to someone, [and] there will be someone who says it. Who said it and to whom? (Someone said: Shiva said it.) Shiva said it; to whom did He say it? (Someone said: To Shankar.) He said it to Shankarji: Why do you leave nectar and eat poison? Acchaa? Does only Shankar eat poison? Does no one else eat it? Among all men, is there any man who does not eat poison? Is there any? There is no such man. Everyone does eat poison, but there will be someone among them who eats it in the first place. First Brahmin so the first deity; the first deity so the first Kshatriya ; the first Kshatriya so first vicious; and first vicious Vaishya so the first Shudra . So whose number is first? (Someone said: Shankar.) Then who will become famous? He himself becomes famous.

It is not just famous, but it is a practical thing that, through the power of remembrance, Shankar wins everything except one thing. What? He is shown to drink poison; he is unable to give-up drinking poison. Why? Arey, in order to win over the vice of lust does he require a company or will he do it alone? A companion is also required. And should the companion he needs have equal power or should he be weak?
(Someone said: Equally powerful.) Someone weak will not do. Yes, this is possible that one is from the lineage of Brahmins and the other is from the lineage of Kshatriya or from some lower section of Brahmins. But it is not possible that one is from the lineage of Brahmins, the other is from the lineage of Shudra, both of them are paired and they win over the vice of lust. No. They should be equal purushaarthis. Among equal purushaarthis, Baba… (VIDEO CUT)

So, this is about when? This is about when? This must have happened in the Confluence Age. What?
(Someone said: Leaving one and taking another.) Yes. He takes one [personality], He makes him his companion, He creates the world; the world is born through Brahma. Then what does He do? He does not like that world so he destroys it. (Someone said: He experiences some shortcoming in it.) Yes. Then, to create a new world, is another companion required or not? (Someone said: It is required.) Then He takes a new companion. He does not like even that world, again He destroys it. Then again a third [companion], He takes a third companion, the world was again created for the third time. He does not like even that. Then the world He creates for the fourth time, that [world] is and established. So who is the last one? Who becomes the last companion? Lakshmi, Vaishnavi.

(Someone said: Why wasn’t the last one made the first companion?) In the beginning, the Shudras were made Brahmins, that too in Kolkata; and in Kolkata, in last birth, there’s a practice that all the people become so vicious that they keep two-four women [as wives]. They will keep their own wife at home and despite her being there they will make another house and keep a second wife there. This was very prevalent among the Bengalis (People from Bengal). So, this establishment cannot happen in the beginning. A person cannot rule as soon as he is born. A mango plant cannot be grown on the palm . Baba says that in the beginning of the Yagya also, a dhobi ghaat (laundry) was opened. What? A laundry was opened but there was no knowledge at that time. When there is no knowledge, there is no question of the establishment at all. At that time, they just chanted the sound ‘Om’, just like the devotees do. The Sanskrit Gita was read out. So, it is not knowledge.

In fact, knowledge has come now. Through the mouth of Brahma, the Ved-Vani was spoken but it was not churned. Then, some Brahman child emerges; Shankar is shown wearing a janeu (sacred thread generally worn by the Hindu Brahmins), isn’t he? Some Brahmin child emerges who imbibes and churns the knowledge in his head and the Ganges flows out of it. To uplift the world, that virgin comes to the field. So, all these topics are of here. It is said that no one becomes pure through the water of the Ganges or the carnaamrit. Knowledge is known as nectar. ‘Why do you leave nectar, and eat poison?’

So, in path of Bhakti they have created a lot of confusion. What confusion have they created? In the path of Bhakti, there is nothing that is logical. The whole yarn is entangled. The whole yarn of knowledge… Suppose there is a string, wind it into a ball like this (Baba is demonstrating), then what will happen? The whole yarn will be entangled. So, similarly the whole yarn of knowledge is entangled. Now the Father comes and disentangles it. Do you know how the false sanyasis of today tie their hair-locks?
(Someone said: Tangled.) Yes, they roll them and make all their hair knotted. They form very long hair-locks. ... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 06 May 2015

वी.सी.डी.नं.414, राजीवनगर,
मु.10.02.67, ता.03.04.06
भाग-8


वो है, उन्होंने यादगार कहाँ की बनाई हुई है, धारण की हुई है? (किसी ने कहा – संगमयुग की।) शंकर जी की यादगार धारण की हुई है। शंकर जी की बुद्धि में ज्ञान जो है वो आखरी जन्मै में सारा गुत्थाम-गुत्था होकर के जटाओं के रूप में लटक जाता है। अगर शिव प्रवेश न करे तो ज्ञान का सूत मुँझा का मुँझा ही हुआ रहेगा । अभी शिवबाबा कहते है, मैं आया हुआ हूँ, जो ज्ञान का सूत मुँझा हुआ है उसको सुलझाने के लिए। ये ज्ञान का सूत किसने मुँझाया? द्वापरयुग से शास्त्र बने। (किसी ने कहा - धर्मगुरुओं ने।) धर्मगुरुओं ने? धर्मगुरुओं में भी मुख्य गुरु कौन हुआ होगा, जिसने ये ज्ञान का सूत बहुत, बहुत मुँझाय दिया ? आखिर शास्त्र बनाना शुरु किसने किया? (किसी ने कहा - ब्राह्मण बच्चों ने।) ब्राह्मण बच्चों में भी कोई ब्राह्मण बच्चा तो होगा जिसने शुरुआत की होगी शास्त्रों के बनाने की। और शास्त्रों में क्या लिखा है? ये शास्त्र, वेद-शास्त्र किसने बनाये? (किसी ने कहा – ब्रह्मा ने।)

नहीं। ब्रह्मा के तो मुख से निकला। जैसे धर्मपिताओं के मुख से अपना-अपना धर्म का ज्ञान निकलता है। वो कोई शास्त्र नहीं हैं। उन धर्मपिताओं के सैंकड़ों वर्षों के बाद फिर उनके शास्त्र बनते हैं। क्या? मोहम्मद के 200-300 वर्षों के बाद फिर कुराण बनी। क्राइस्ट के 300-400 वर्षों के बाद बाइबल बनी। गुरु नानक के 100-200 वर्षों के बाद गुरु ग्रंथ साहब बना। उसी समय थोड़े ही बनता है। तो ऐसे ही शिव बाप भी जब आते है तो ब्रह्मा के मुख से जो ज्ञान सुनाते है उसका शास्त्र बन ही नहीं सकता। 2500 साल के बाद फिर कोई शास्त्र बनाना शुरु करता है।

तो कोई ने तो महाभारत, गीता, और ये शास्त्र बनाये होंगे? वो कौन है? व्यास। ‘वि’ माना विशेष, और ‘आस’ माना बैठ गया पालथी मारके, ज्ञान बखारने के लिए। तो जो बैठ गया, जिसने शास्त्र बनाये वो शास्त्र दुर्गति के बने या सद्गति के बने? दुर्गति के बने। वो दुर्गति करने वाला कौन? अरे! कोई तो हुआ होगा? अरे, शास्त्र बनाने वाला कोई तो हुआ होगा। व्यास हुआ। वो कौन है व्यास? व्यास की भी गद्दियाँ चली। जैसे गुरु लोग होते हैं ना । तो गुरु लोग शरीर छोड़ देते हैं, तो उनकी गद्दी लेकर के कोई दूसरा बैठ जाता है। जैसे नारायणों की सतयुग में गद्दियाँ चलती हैं, फर्स्ट नारायण, दूसरा नारायण, तीसरा नारायण, चौथा नारायण, जैसे अंग्रेज़ों में डिनायस्टी चली, किंग एडवर्ड फर्स्ट, किंग एडवर्ड सैकेंड, थर्ड। ऐसे ही व्यास नाम की भी गद्दियाँ चली। जो सतयुग में नारायण बनते हैं, वही द्वापर में आकर क्या बनते हैं? व्यास बन जाते हैं नंबरवार।

तो उनमें नंबर वन व्यास कौन हुआ? अरे! कौन हुआ?
(किसी ने कहा – इब्राहिम।) इब्राहिम हुआ? इब्राहिम शास्त्र लिखता है? (किसी ने कहा - ब्रह्मा बाबा।) ब्रह्मा बाबा हुआ ? अरे, ब्रह्मा से भी पहले कौन हुआ? (किसी ने कहा - राम वाली आत्मा।) हाँ। सतयुग में ब्रह्मा बाबा तो दूसरे नंबर का नारायण बनेगा। उससे भी पहले नारायण कौन हुआ? नर-नारायण वाली आत्मा ना । तो पहला जो नारायण बनता है वो ही पहला आकर के वहाँ व्यास बनता है।

अब वहाँ मनुष्य बुद्धि है, शिवबाबा तो प्रवेश होता नहीं। तो जैसी अगड़म-बगड़म बुद्धि बनती है, विकीरी बुद्धि द्वापरयुग से, विकारियों के संग से, विकारी धर्मपिताओं के संग से, वैसे उन्होंने सृष्टि का कल्याण करने के लिए, समझके बैठ गये कि हम कल्याण करेंगे। शिवोहम् कहके बैठ जाते हैं। आदत तो है ना ? क्या? ये आदत कहाँ से पड़ती है? ये संगमयुग में आदत पड़ जाती है। शिवबाबा प्रवेश करते है। तो जिसमें प्रवेश करते है उसको ये अहंकार हो जाता है कि शिवबाबा और किसी में मुकर्रर नहीं प्रवेश करते है, मेरे में ही प्रवेश करते है। भले बाहर के मुख से न करे, तो भी अंदर-अंदर बात बैठ जाती है। तो वो बात जो अंदर बैठ गई संगमयुग में वो कहाँ निकलती होगी? कहीं निकलेगी कि नहीं निकलेगी?
(किसी ने कहा – निकलेगी।) वो द्वापरयुग से निकल पड़ती है। (किसी ने कहा - इमर्ज हो जाती है।) हाँ, इमर्ज हो जाती है। तो वो ढेर सारे शास्त्र बनाये देते हैं। उन शास्त्रों से मनुष्यों की दुर्गति होती रही।

पहले शास्त्र भी सतोप्रधान थे। दुनिया की हर चीज़ पहले सतोप्रधान, फिर रजोप्रधान, फिर लास्ट में तमोप्रधान बनती है। तो पहले-पहले जो शास्त्र बनाये, द्वापरयुग के आदि में उनमें फिर भी सात्विकता थी, सतोप्रधानता थी। बनाने वाले ने जिस अर्थ से बनाये, वही अर्थ वो सुनाते थे। लोकिन बाद में क्या हुआ? उनके जो परवर्ती आये, दूसरे-दूसरे नारायण, दूसरे-दूसरे धर्म वाले, उन्होंने उसके अर्थ जो है वो पलट दिए। अर्थों का अनर्थ कर दिया। मनमत घुसेड़ दी। वो मनमत घुसेड़ने से क्या हुआ, कि वो शास्त्रों का अर्थ जो है पलट गया। ओम् शांति।


VCD No.414, Rajivnagar,
Mu. 10.02.67, Dt. 03.04.06
Part-8


They have put into practice a memorial of when? (Someone said: The Confluence Age.) They have put into practice a memorial of Shankarji. In the last birth, in the intellect of Shankarji the entire knowledge becomes complicated and hangs down in the form of tangled hair locks. If Shiva does not enter [Shankar], the yarn of knowledge would just remain entangled. Now ShivBaba says, ‘I have come to disentangle the yarn of knowledge which was entangled’. Who entangled this yarn of knowledge? Scriptures were made from the Copper Age. (Someone said: The religious gurus.) The religious gurus? Who will be the main guru among those religious gurus as well, who has entangled the yarn of knowledge a lot? After all, who started making the scriptures? (Someone said: The Brahmin children.) Even among the Brahmin children there must be some particular Brahmin child who will have started making these scriptures. What is written in the scriptures as well? Who made these Vedas and scriptures? (Someone said: Brahma).

No. [The knowledge] came out from Brahma’s mouth. Like from the mouth of the religious fathers, the knowledge of their religion emerges, they are not scriptures. Scriptures are made centuries after the religious fathers [give knowledge]. What? Quran was made 200-300 years after Mohammad, Bible was made 300-400 years after Christ, Guru-Granth-Sahib was made 100-200 years after Guru Nanak; [scriptures] are not made at the same time. Similarly, even when the Father Shiva comes and gives knowledge through Brahma’s mouth, its scripture certainly cannot be made [at that time]. After 2500 years, someone starts making the scriptures.

So someone will have made the scriptures like the Mahabharata, the Gita and such scriptures. Who is that one? Vyas. ‘Vi’-means vishesh (especially) and ‘aas’ means to sit cross legged to narrate knowledge. So, the one who sat, the one who made scriptures… were they made for degradation or for uplift? They were made for degradation. So, who is the one who brings degradation? Arey, there must have been someone. Arey, there must have been someone who made scriptures. It was Vyas. Who is that Vyas? There were dynasties of Vyas too. For example, there are the gurus, when the gurus leave their body, then someone else sits on their throne. Just like, Narayans have dynasties in the Golden Age: the 1st Narayan, the 2nd Narayan, the 3rd Narayan , the 4th Narayan. Just like the dynasty among the Christians continued: King Edward I, King Edward II, [King Edward] III. Similarly, there were dynasties of the ones with the name Vyas too. Those who become Narayans in Golden Age, what do they themselves become from the Copper Age onwards? They become Vyas one after the other.

So who is the No.1 Vyas among them? Arey? Who is it?
(Someone said: Abraham.) Is it Abraham? Does he write scriptures? (Someone said: Brahma Baba.) Is it Brahma Baba? Arey! Who was before even Brahma? (Someone said: The soul of Ram.) Yes. Brahma Baba will become the 2nd Narayan in the Golden Age, who is the Narayan even before him? It is the soul of Nar-Narayan (the one who becomes Narayan from nar), isn’t it? So, the one who becomes the 1st Narayan himself becomes the 1st Vyas there (in the Copper Age).

Now, there he (Vyas) has a human intellect , there isn’t the entrance of ShivBaba in him, so as the intellect becomes confused and vicious from the Copper Age due to the company of vicious [souls] , the vicious religious fathers so he sat in order to benefit the world [thinking] that he will bring benefit of the world. He sits saying, ‘Shivoham ’. He has this habit, hasn’t he? From where does he develop this habit? He develops this habit in the Confluence Age. ShivBaba enters him. So, the one in whom ShivBaba enters gets this ego: ShivBaba doesn’t enter anyone else in permanent a form. It is in me that He enters. Although he doesn’t say this externally, through the mouth, he has this impression within. So, the impression he has in him in the Confluence Age, where does it come out? Will it come out at some point of time or not?
(Someone said: It will come out.) It comes out from the Copper Age onwards. (Someone said: It emerges.) Yes, it emerges; so he makes various scriptures. Through those scriptures, the human beings degrade.

Earlier, the scriptures were also satopradhaan. Everything in the world is firstly satopradhaan, then rajopradhaan and tamopradhaan at last. So the scriptures made in the beginning, in the beginning of the Copper Age, still had saatvikta (truth) and satopradhaantaa (the quality of being satopradhaan). The meaning with which its creator created it, the same meaning was told but what happened later on? The other Narayans of other religions who came after him, changed the meanings [of the scriptures]. They made meaningless interpretations of it. They inserted their mind’s opinion in it. Because of inserting their mind’s opinion the meanings of those scriptures changed. Om Shanti.
(Concluded.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 May 2015

वी. सी. डी. 591 हैद्राबाद (आंध्रप्रदेश)
मु. 29.06.67, ता. 10.01.07
भाग-1


ओम् शान्ति। 29 जून 1967 का प्रात: क्लास चल रहा था। बात चल रही थी, भल देवी देवता धर्म की स्थापना तो शिवबाबा करते हैं फिर भी नाम तो है ब्रह्मा, विष्णुग, शंकर; त्रिदेव। भक्तिमार्ग में त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह देते हैं। इसका भी फाऊन्डेशन कहाँ पड़ता है? ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनियां में ही ब्रह्मा को तीन रूपों में मान लेते हैं। जैसा कि साक्षात्कार के द्वारा बनाये गये त्रिमूर्ति के चित्र में ब्रह्मा के ही तीन फिचर्स की कल्पना कर ली गयी। अगर एक ही फिचर तीनों मूर्तियों में होता तो तीन मूर्ति क्यों कही जाए? फिर तो एक मूर्ति ही कहना चाहिए। तीनों मूर्तियों का पार्ट अलग-2 है, टार्इम अलग-2 है। ब्रह्मा के द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना पहला काम। फिर जो ब्राह्मण पैदा होते हैं, उनमें थोडे़ अच्छे और बाकी रावण, कुम्भकरण, मेघनाद जैसे ब्राह्मण तैयार होते हैं। उन आसुरी ब्राह्मणों का विनाश करने के लिए उनकी आसुरीयत का विनाश करने के लिए फिर शिव को ब्रह्मा का रूप त्यागना पड़ता है। वो रूप त्यागना पड़ता है जिसने माँ के रूप में अखुट प्यार दिया, अखुट सहनशक्ति का परिचय दिया। वो ब्रह्मा की मूर्ति के रूप में पार्ट बजाने वाली और कोर्इ शख्सियत दुनियां में नहीं हैं, ना होगी, ना हुर्इ थी। जो माँ का काम विशेष होता है सहनशीलता पूर्वक बच्चों की पालना करना। बच्चे चाहे जैसे हो। तो वो ब्रह्मा की मूर्ति के द्वारा पार्ट बजाने का टार्इम अलग, वो मूर्ति अलग।

फिर आसुरी ब्राह्मणों का पत्ता साफ करने के लिए उनके असुरपना को खत्म करने के लिए शिव की दूसरी मूर्ति कार्य करती है। उसे कहते हैं शंकर द्वारा आसुरी ब्राह्मणों की सृष्टि का विनाश। जिसकी घोषणा सन् 76 में की गयी थी। घोषणा तो सन् 66 में हुर्इ थी। लेकिन प्रैक्टिकल शुरूआत की घोषणा सन् 76 से की गयी। 76 से ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनियां में विघटन का काम शुरू हो गया। विनाश कोर्इ चुटकी बजाते होने की चीज नहीं है। टार्इम लगता है। काम का आरंभ होने में, मध्य होने में, अन्त होने में टार्इम लगता है। तो 30-33 साल ब्रह्मा के द्वारा, पहली मूर्ति के द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना, दूसरी मूर्ति के द्वारा आसुरी ब्राह्मणेां की आसुरीयत का काट, खण्डन। उसमें सब धर्मों का खण्डन आ जाता है। वो टार्इम अलग हो जाता है। मूर्ति अलग हो जाती है।

बाद में 30-33 साल आते हैं तीसरी मूर्ति का पार्ट बजाने के लिए। वो तीसरी मूर्ति इन दोनों मूर्तियों और इनकी सहयोगीनी शक्तियों का कॉम्बिनेशन है, स्वभाव संस्कार का । उनमें कोर्इ विशेष ऐसी आत्मा भी है जो बैलन्स का खास पार्ट बजाती है। विष्णू देवता कहो, वैष्णव देवी कहो उसका पार्ट बजाने का टार्इम अलग। तो यह नहीं कह सकते कि ब्रह्मा की तीन मूर्तियाँ हैं। ये तो भक्तों ने समझ लिया है। ब्रह्मा तो नीचे तब्बके का है। ब्रह्मा सो विष्णुर बन सकता है। लेकिन शंकर नहीं बन सकता। तीन मूर्तियाँ एक साथ पार्ट बजाती ही नहीं। और जब एक साथ मिलकरके पार्ट बजाती हैं तो काम ही पूरा हो जाता है। प्रत्यक्षता हो जाती है। संसार जगने लगता है।

तैतीस करोड़ देवताओं के बीच में यह तीन मूर्तियाँ ही विशेष हैं। और तीन प्रकार के तबक्के हैं। ऊँचे से ऊँचा तबक्का है महादेव शंकर, मध्यम तबक्का है विष्णुर और नीचा तबक्का है ब्रह्मा। शिवशंकर भोलेनाथ ही गॉड फादर का प्रत्यक्ष रूप है। विष्णुस देवता देवताओं का मुख्य अधिपति रूप है। और ब्रह्मा को तो ब्राह्मण कह सकते हैं। ब्राह्मण मनुष्य ही होते हैं। ब्राह्मण जब तक अधुरे हैं तब तक ब्रह्मा के बच्चे हैं। जब ब्राह्मण और ब्रह्मा सम्पूर्ण बनते हैं तो ब्रह्मा का दिन सो विष्णु। का दिन शुरू हो जाता है। ब्रह्मा देव कोटि की स्टे ज नहीं है। उनको दाढी मूँछ इसलिए दिखाए गए हैं।

तो ऊँचे से ऊँचे फॉलोअर वो हैं जो गॉड फादर के रूप को पहचानते हैं। भगवान के रूप को पहचानते हैं और फालों करते हैं। दूसरे वो हैं जो देवताओं को पहचानते हैं और देवता को फालों करते हैं। देवताओं से प्राप्ति करते हैं। और तीसरे वो हैं जो नम्बरवार मनुष्य गुरूओंको पहचान पाते हैं। उन मनुष्य गुरूओं में मुख्य गुरू के रूप में पार्ट बजाने वाला है ब्रह्मा। जो ब्राह्मण सृष्टि का मुखिया है। सम्पन्न जो ब्राह्मण बनते हैं सो देवता कहे जाते हैं। तो तीन तबक्कों में यह संसार बटा हुआ है। ऊँचे से ऊँचे तबक्के की वो आत्माएँ हैं जो आदि से ले करके अन्त तक अपने धर्म की पक्की रहती हैं। सिर्फ लास्ट जन्म की बात छोड़ दी जाए। दूसरे वो हैं जो देव कुल के हैं। देवता ही द्वापर से हिंदू बनते, हिंदू से फिर दूसरे-2 धर्मों में कन्वर्ट होते गये। और तीसरा तबक्का वो है जो भक्तों का है। भक्तों की संख्या अपार है बाप के वारीसदार बच्चे भी हैं। जो रूद्र माला कही जाती है।

शिव बिंदू का नाम है। जब रौद्ररूप धारी में प्रवेश करता है तो रूद्र कहा जाता है। रूद्र ज्ञान यज्ञ कहा जाता है। रूद्र के द्वारा ही रूद्रयज्ञ की शुरूआत होती है। रूद्र माला के मणके ही जन्म-जन्मान्तर के राजा बनने के अधिकारी बनते हैं। फिर जो ब्रह्मा से विष्णु् बनने वाले हैं या विष्णु् को फॉलो करने वाले हैं वो है राजाओं को विशेष सहयोग देने वालों की माला। सहयोगीनी शक्तियाँ, भारत की रानियाँ, भारत माताएँ। उनमें विशेष प्युरिटी की पावर रहती है। ऐसी पावर रहती है कि अपनी पावर से रूद्रमाला के जो लंगडे हैं उनको भी विजय दिलाने के निमित्त बनती है। नहीं तो पाँच विकारों के ऊपर विजय पाना उनके भी बस की बात नहीं है। भल उनका गुरू ऊँचे ते ऊँचा करतार है। लेकिन माता गुरू जब तक न बने तब तक उनका भी उद्धार नहीं हो सकता।


VCD 591, Hyderabad (A.P.),
Mu. 29.06.67, Dt. 10.01.07
Part - 1


Om Shanti. The morning class of the 29th June 1967 was in progress. The topic being discussed was: Although ShivBaba establishes the Deity Religion (Devi Devta Dharm), there is the name Brahma, Vishnu and Shankar. [They are called] Tridev (three deities). In the path of Bhakti (devotion) they say: Trimurti Brahma. When is the foundation of this also laid? In the Confluence Age Brahmin world itself they consider Brahma to be in three forms; just as in the picture of Trimurti prepared through the visions, they imagined the three features to be only of Brahma. Had the feature of all the three personalities been the same, why would they be called three personalities (teen murti)? Then, it should be called just one personality (ek murti). The part of all the three personalities is different, their time is different. The first task is the establishment of the Brahmin religion through Brahma. Then the Brahmins that are born, among them few are good and all the rest Brahmins which become ready are like Ravan, Kumbhakaran and Meghanad. Then, to destroy those devilish Brahmins, to destroy their devilishness, Shiva has to renounce the form of Brahma. He has to renounce that form who gave unending love in the form of mother, who gave the introduction of unending power of tolerance. There is no other personality in the world who plays the role in the form of Brahma; there won’t be any and there wasn’t any. The most important task of a mother is to sustain the children with tolerance. It doesn’t matter how the children are. So the time of playing the role through the personality of Brahma is different. That personality is different.

Then to clear off (destroy) the devilish Brahmins, to end their devilishness the second personality of Shiva performs the task. That is called the destruction of the devilish world of Brahmins through Shankar. The declaration of this was made in the year 76. In fact, the declaration was made in the year 66 but the declaration of its beginning in practice was made in the year 76. From [the year] 76 in the Confluence Age world of Brahmins, the task of disintegration began. The destruction is not something that can take place within a snap (in a second). It takes time. It takes time for the task to begin, [to come at] middle [time] and to end. So the establishment of Brahmin religion through Brahma, the first personality took place in 30-33 years. The destruction of devilishness of the devilish Brahmins [takes place] through the second personality; it includes the destruction of all the religions. That time changes. The personality changes.

After that it takes 30-33 years for the third personality to play the part. That third personality is the combination of nature and sanskaars of these two personalities and their cooperative powers. Among them there is also a special soul who especially plays the part of [maintaining] balance. Call it Vishnu devtaa (male deity), ‘Vaishnav devi (female deity)’, its time of playing the part is different. So this cannot be said that Brahma has three personalities. In fact, the devotees have believed it to be so. Brahma is from the lowest level. Brahma can become Vishnu but he cannot become Shankar. All the three personalities don’t play their part simultaneously at all. And when they combine together and play their part, the very task is accomplished. The revelation takes place. The world begins to awaken.

Among the 33 crore (330 million) deities only these three personalities are special. And there are three types of levels. The highest on high level is [of] Mahadev Shankar. The middle level is [of] Vishnu. And the lowest level is [of] Brahma. Shiva Shankar Bholenath himself is the actual form of God the Father. The deity Vishnu is the chief among the deities, he is in the form of [their] master. And Brahma can certainly be called Brahmin. Brahmins are just human beings. As long as the Brahmins are incomplete, they are the children of Brahma. When Brahmins and Brahma become complete, then the day of Brahma so the day of Vishnu begins. Brahma is not [the one with] the stage of deities. That’s why he is depicted with a beard and a moustache.

So the highest followers are those who recognize the form of God the Father, who recognize the form of God and follow him. Second are those who recognize the deities, follow the deities and make attainment from the deities. And third are those who recognize the number wise human gurus. Among those human gurus, Brahma plays the part in the form of the chief guru, he is the head of the Brahmin world. The Brahmins who become complete are called deities. So this world is divided into three levels. The souls of the highest level are those who remain steadfast with their religion from the beginning till the end, leave about the last birth. Second are those who belong to the category of deities. The deities themselves become Hindus from the Copper Age. And after becoming Hindu they kept converting to other religions. And the third level is of the devotees, the number of devotees is huge. There are also the inheritor children of the Father who are called Rudramaalaa (the rosary of Rudra).

Shiva is the name of the Point. When He enters the one who takes on the fearsome form He is called Rudra. It is said Rudra gyaan Yagya (Rudra’s Yagya of knowledge). The Rudra Yagya begins through Rudra himself. Only the beads of Rudramaalaa become entitled to become kings for many births. Then, those who become Vishnu from Brahma or those who follow Vishnu [belong to] the rosary of the special helpers of the kings. They are the co-operative powers (shaktis), the queens of Bharat (India), [i.e.] the mothers of Bharat. They have special power of purity. They have such powers that they become instruments to make even the Rudramaalaa, who are lames, to gain victory. Otherwise, it is not even in their power to gain victory over the five vices. Even though their guru is highest on high performer (kartaar), until a mother becomes [their] guru, they can’t be uplifted either.
...(to be continued)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 May 2015

वी. सी. डी. 591 हैद्राबाद (आंध्रप्रदेश)
मु. 29.06.67, ता. 10.01.07
भाग-2


तो तीन मूर्तियाँ ब्रह्मा की नहीं हैं। शिवबाबा की ही तीन मूर्तियाँ हैं। शिव जिसमें पहले-2 प्रवेश करता है ज्ञान सुनाने के लिए... शिव हुआ बाप और जिसमें प्रवेश करता है पहले-2 वो हुआ ब्रह्मा। वो भी प्रकृति के पाँच तत्वों का पुतला है। प्रकृति का माता का रूप हो जाता है। बाद में प्रजापिता ब्रह्मा कहा जाता है। प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद ब्रह्मा कुमार कुमारी कहे जाते हैं। उनमें मुख्य कार्यकर्ता है ब्रह्मा, दादा लेखराज जिसका नाम पड़ता है। कृष्ण की सोल जो सृष्टि रूपी रंगमंच का पहला पत्ता है। जो माँ का पार्ट प्रजापिता के द्वारा नहीं बजाया जा सकता। प्रजापिता की सहयोगीनी शक्ति प्रजामाता जगदम्बा कहो, प्रकृति का विशेष रूप कहो वो भी माता का वो उत्कृ्ष्टत पार्ट नहीं बजा पाती। जो सहनशक्ति को धारण करे और हर धर्म से चुनी हुर्इ विशेष आत्माओं को जो नौ वर्ग के ब्राह्मण तैयार होते हैं उनको सहनशीलता पूर्वक पालना दे सके। माँ जो कार्य नहीं कर पाती वो बाप और माँ का बच्चा करता है। इसलिए बच्चे में बाप समान बनने की ताकत कही जाती है। माँ के लिए नहीं कहा जाता है बाप समान। कौन बनता है? बच्चा बनता है बाप समान।

तो कृष्णवाली महात्मा दादा लेखराज उसको मिलता है ब्रह्मा का टाइटिल। माँ का टाइटिल, माँ का कार्य वो अपने कंधों पर धारण करता है। और सारे जगत से चुने हुए हर धर्म की विशेष आत्माओं को, श्रेष्ठ आत्माओं को अपनी गोद में पालना देता है। जो आत्माएँ उसकी गोद में पलती हैं वो आखरी जन्म की तामसी आत्मायें होती हैं। चंद्रवंश से ले करके और आखरी गिरे ते गिरे धर्मों की आत्माएँ होती हैं। उन हर वंश की आत्माओं को, तामसी आत्माओं को पालना देना कोर्इ मासी का घर नहीं है। तिल-तिल करके माँ को मरना पड़ता है। और उन आसुरी बच्चों के स्वभाव संस्कार को सहन करना पड़ता है। खुद कर्म करके दिखाना बच्चे क्या कर्म करते हैं यह नहीं देखना। बच्चों को अच्छे ही अच्छे रूप में देखना। बच्चों का भविष्य देखना। कल्प पूर्व के स्वरूप की याद दिलाना। उनके वर्तमान आसुरी पने को नहीं देखना। देखते हुए नहीं देखना। कितना कठिन कार्य अपनाता है! जबकि चोला, तन पुरूष का होता है। स्त्री चोला स्त्री के रूप में माँ का पार्ट बजाए ये जो संभावना होती है। लेकिन पुरूष होते हुए भी पुरूष का स्वभाव संस्कार होते हुए भी इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर माँ के रूप में पार्ट बजाना कितनी बड़ी जिम्मेवारी निभार्इ।

इसलिए जो ब्रह्मा जैसी कैटेगरी की आत्माएँ होती हैं या ब्रह्मा की गोद में जिन्होंने पालना ली है, विशेष महत्त्व दिया है वो ब्रह्मा को सर्वोपरी मानते रहे, अभी भी मानती हैं। इसलिए भक्तिमार्ग में ब्रह्मसमाजी कहा जाता है। शिव के फॉलोअर्स को, शंकर के फॉलोअर्स को शैव समाजी कहा जाता है, शैव सम्प्रदायी। और विष्णू के फॉलोअर्स को वैष्णव सम्प्रदायी कहा जाता है। शिव शंकर भोलेनाथ के जो फॉलोअर्स हैं कड़क स्वभाव वाले। जैसे कानून होता है। कानून बहुत कड़क होता है। तो कानून को बनाने वाले, कानून को चलाने वाले और कानून को तोड़ने वाले भी होते हैं। ज्यादा शक्तिशाली कौन होता है? जो विधाता है वो विधान बनाने वाला कहा जाता है। परमात्मा शिव जिस देव देव महादेव के स्वरूप में प्रवेश करके पार्ट बजाते हैं वो है असली विधाता। विधी विधान बनाने वाला। जो असली विधाता है या होता है वो अपने बनाए हुए विधान को तोड़ता नहीं है। तोड़ने वाले कोर्इ दूसरे हो सकते हैं। विधी, विधाता और विधान। विधान कहा जाता है कॉन्स्टीट्यूशन को। वो विधान बीज रूप में यज्ञ के आदि में ही आ चुका था। जिसे पिउ की वाणी कहा गया। जो बाद में लोप हो गयी। बाद में दादा लेखराज ब्रह्मा के मुख से जो वाणी चली वो वेद वाणी बनकर हमारे सामने आयी। वेदों की ऋचा को सामान्य मनुष्यों ने नहीं पहचान पाया। ऊपर-2 पढ़ना ऊपर-2 सुनना ये तो हुआ लेकिन उसका अन्दरूनी रहस्य क्या है वो कोर्इ के पल्ले नहीं पड़ता। इसलिए कहते हैं या समझें कवि या समझे रवि।

यज्ञ के आदि में जिस व्यक्तित्व के द्वारा जो ज्ञान का बिजारोपण किया था वो तो चला गया। उसके नजदीकी जो फॉलोअर्स थे वो भी चले गये। बाद में आने वाले चंद्रवंशी, इस्लामवंशी, बौद्धि और क्रिश्चियनवंशी उन्होंने तो उसपर मनन-चिंतन ही नहीं किया। ध्यान ही नहीं दिया। उन्हें ब्रह्मा की वाणी मिली। वो वाणी भी मातृप्रधान वाणी है। उसमें संसार के सारे रहस्य भरे हुए हैं। परंतु उन रहस्यों को खोलने के लिए भी परमात्मा शिव को रूप धारण करना पड़ता है। और वो रूप है बाप, टिचर और सद्गुरू का। यज्ञ के आदि में भी बाप, बाप के रूप में था। लेकिन फाऊन्डेतशन भक्तों के द्वारा पड़ा। पूरा ज्ञान न होने के कारण कारणे अकारणे वो बच्चे टूट पडे़। सारा ही ग्रुप चला गया। गीता में तो लिखा हुआ है जो ब्राह्मणत्व ले करके एक बार धारणा कर लेता है। ब्राह्मण जन्म ले लेता है भल शरीर छोड़ दे तो भी अगले जन्म में उसका ब्राह्मणत्व एड हो जाता है। पुरूषार्थ एड हो जाता है। वो यज्ञ के आदि के बच्चे ब्रह्मा और सरस्वती के शरीर छोड़ने के बाद इसी ज्ञान यज्ञ में प्रवेश कर जाते हैं। अपने पूर्व जन्म की प्रारब्ध के आधार पर वो लास्ट में आने पर भी फास्ट जाने का पार्ट बजाते हैं।

यज्ञ के आदि में भी रूद्र ज्ञान यज्ञ से रूद्र का रौद्र रूप होने के कारण विनाश ज्वाला प्रज्वलित हुर्इ थी। दुनियां में भी इसका प्रभाव पड़ा था बडे़ रूप में। हिरोशमा नागासाकी दो बडे़ शहर खलास हो गये। वो छोटे रूप कि विनाश ज्वाला थी। आदि में जिसका फाऊन्डेशशन पड़ा अभी अन्त में बडे़ रूप में वो विनाश ज्वाला प्रज्वलित हो करके सम्पन्न होने का रूप धारण करेगी। ब्राह्मणों की दुनियां से ही नहीं, बीज रूप आत्माओं की एडवान्स पार्टी की दुनियां से ही नहीं, सारी दुनियां से आसुरों का और आसुरीयत का विनाश होने वाला है। और ये विनाश बहुत दूर नहीं है। पहली मूर्ति प्रत्यक्ष हो गयी। उसका कार्य प्रत्यक्ष हो गया। दूसरी मूर्ति भी अपने बच्चों के बीच में प्रत्यक्ष हो गयी। जो नम्बरवार 4.5 लाख बीज रूप आत्माएँ हैं जिनमें सवा दो लाख पुरूष स्वभाव संस्कार वाली हैं। और बडे़ स्ट्रिक्ट स्वभाव की हैं। कोर्इ उन्हें मोड़ना चाहे तो जल्दी मुड़ने वाली नहीं हैं। मोड़ने वाली हैं। कोर्इ और उनको मोड़ नहीं सकता। इसलिए रूद्र की माला में रूद्राक्ष के मणके दिखाये जाते हैं। कड़क मणके होते हैं। उनमें मुख बने होते हैं। कोर्इ में एक मुख, कोर्इ में दो , कोर्इ में चार, कोर्इ में चौदह। ये मुख प्रवेशता की यादगार है।


VCD 591, Hyderabad (A.P.),
Mu. 29.06.67, Dt. 10.01.07
Part - 2


So, all the three personalities are not of Brahma. The three personalities are of ShivBaba Himself. The one whom Shiva enters first to narrate the knowledge... Shiva is the Father and the one whom He enters first is Brahma. He too is an effigy of the five elements of nature. The nature is the form of a mother. Later on, he is called Prajapita Brahma. The progeny of Prajapita Brahma are called Brahma Kumar Kumaris. Among them the main person is Brahma, the one who is named Dada Lekhraj; the soul of Krishna, who is the first leaf of this stage like world. The part of mother can’t be played through Prajapita. The co-operative power of Prajapita [is] Prajamata (mother of the subjects); call her Jagdamba or the special form of nature, she also is unable to play that superior part of mother, who assimilates the power of tolerance and can sustain the special selected souls from every religion, the nine categories of Brahmins that become ready. The task that the mother is unable to do, the child of the mother and the Father does it. That is why it is said that the child has the power to become equal to his Father. It is not said for the mother [that she becomes] equal to the Father. Who becomes [equal]? The child becomes equal to the Father.

So the great soul Krishna, Dada Lekhraj, receives the title of Brahma. He takes on the title of the mother, the responsibility of the task of the mother. And he sustains the selected souls from the entire world, the souls of every religion, and the elevated souls on his lap. The souls who are sustained on his lap are the degraded (taamsi) souls, of the last birth. They are the souls starting from the Candravansh to the last, lowest of the low religions. It is not an easy task (maasi kaa ghar) to give sustenance to the souls of every religion, degraded souls. The Mother has to sacrifice herself little by little and has to tolerate the devilish nature and sanskaars of those devilish children. To perform the task himself and set an example but not to see what deeds do the children perform, to see the children only in the good form, to see the future [form] of the children, to remind them of their form a Kalpa before, not to see their present devilish nature, not to see even while seeing it; he adopts such a difficult task, even though the body is of a male. It is possible that the female body, the form of a female plays the part of a mother. But even after being a male, even after having the nature and sanskaars of a male, he carried on such a great responsibility of playing the part of the mother on this stage like world!

That’s why the souls who are from the category of Brahma or those who have received the sustenance on the lap of Brahma, who have given him special importance, they considered Brahma to be the superior, they consider this even now. That’s why in the path of Bhakti they are said to be Brahmsamaaji. The followers of Shiva, the followers of Shankar are called Shaivsamaaji, those belonging to the community of Shaiv. And the followers of Vishnu are called those belonging to the community of Vaishnav. Those who are the followers of Shiva Shankar Bholenath have a strict nature. Just as the law, law is very strict. So there are those who make laws, those who govern the law and there are also those who break the laws. Who is more powerful? The law maker (vidhaataa) is said to be the one who makes the constitution (vidhaan). The form of Dev-Dev-Mahadev (the greatest deity) whom the Supreme Soul Shiva enters and plays the part, he is the real law maker, the one who makes the rules and regulations (vidhi-vidhaan). The real law maker or the one who becomes this doesn’t break the rules made by him. There can be others who break it. Vidhi (law), vidhaata (law maker) and vidhaan. Constitution is called vidhaan, that constitution had come in its seed form [stage] in the beginning of the Yagya itself; it was called as the versions of Piu , which disappeared later on. Later on, the Vani that was narrated through the mouth of Dada Lekhraj Brahma, it came in front of us in the form of Ved Vani (the versions of Veda). The ordinary people didn’t understand the verses of Veda. Reading and listening to it superficially certainly took place but no one was able to understand what secret it contains. That’s why it is said, ‘yaa samjhe kavi yaa samjhe Ravi’ (only the poet or the sun (God) knows the meaning of poem).

The personality through whom the seed of knowledge was sown in the beginning of the Yagya, he went away. His followers who were close to him, they too went away. Those who came later, Candravanshi, Islamvanshi (those belonging to the Islam), Buddhists and Christians didn’t think and churn on it at all. They didn’t pay attention at all. They got the Vani of Brahma. That Vani also is the matriarchal (matrapradhaan) Vani. It contains the entire secrets of the world. But to disclose those secrets also the Supreme Soul Shiva has to take on the form. And that form is of the Father, the Teacher and the Sadguru. In the beginning of the Yagya also the Father was there in the form of the Father but the foundation was laid by the devotees. Because of not having complete knowledge, those children (of the beginning of the Yagya) broke away [from the knowledge] by some or other reason. The entire group went away. It is certainly written in the Gita: the one who assimilates Brahmanatva (Brahminism) once, is born as a Brahmin, even though he leaves the body, his Brahmanatva is adds up to the next birth. The purushaarth (special effort) is added. Those children of the beginning of the Yagya, enter this Yagya of knowledge after the demise of Brahma and Saraswati. On the basis of the fruits of their previous birth, they play the part of going fast even after coming in last.

In the beginning of the Yagya also because of the fearsome form of Rudra, the flames of destruction were ignited from the Rudra gyaan Yagya . It had affected the world also in a big form. The two big cities i.e. Hiroshima and Nagasaki were destroyed. That was the small form of the flame of destruction. Its foundation was laid in the beginning [of Yagya] [and] now, in the end that flame of destruction will ignite in a huge form and take on the form of accomplishment. Not just from the world of Brahmins, not just from the world of seed form souls of the Advance Party but from the entire world the demons and the devilish nature are going to be destroyed. And this destruction is not very far. The first personality is revealed, his task is revealed. The second personality is also revealed in front of his children, who are the 4.5 lakh (450 thousand) seed form souls number wise . Among them 2.25 lakh are the ones with the nature and sanskaars of a male and have very strict nature. If anyone wants to mold them, they don’t mold easily. They are those who mold others. No one else can mold them. That’s why in the Rudramaalaa (rosary of Rudra), the beads of rudraaksha are shown. They are hard beads. There are mouths made on them. Some have one, some have two, some have four, and some have fourteen mouths on them. These mouths are the memorial of entrance.
..... (to be continued)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 09 May 2015

वी. सी. डी. 591 हैद्राबाद (आंध्रप्रदेश)
मु. 29.06.67, ता. 10.01.07
भाग-3


ब्रह्मा सरस्वती जैसी आत्माएँ जो शरीर छोड़ने के बाद दूसरा गर्भ धारण नहीं करती हैं। जिन्हें बेसिक नॉलेज पर अटल निश्चय हो जाता है। वो शरीर छोड़ने के बाद इन्स्पीरीटींग पार्टी के रूप धारण करके उन रूद्रमाला के मणकों को उमंग उत्साह भरने वाली बन जाती हैं। जब सात्विक स्टेज धारण करती हैं तब और जब तामसी स्टेज धारण करती हैं तो सारे संसार का, आसुरीयत का विनाश कराने के कारण बन जाती हैं। उन्हीं रूद्र माला के मणकों के द्वारा। उनकी बुद्धि रूपी पेट में प्रवेश करती हैं। अपना कार्य सम्पन्न कराती हैं। निमित्त तन बनते हैं रूद्रमाला के मणके। कार्य कराने के निमित्त बनती हैं वो। क्योंकि स्थूल शरीर धारी में उतनी पावर नहीं होती है जितनी सूक्ष्म शरीर धारियों में पावर होती है। स्थूल शरीर के बंधन में जो आत्मा बंधी हुर्इ है वो उतना पावरफूल पार्ट नहीं बजाए सकती। बडे़-2 अजूबे कार्य नहीं कर सकती। संसार को चौंकाने वाले कार्य नहीं कर सकती। उनके द्वारा कौनसी आत्मा वो कार्य करती हैं। जो प्रवेश करने वाली आत्माएँ हैं वो जबरदस्त काम करके दिखाती हैं। इतनी हिम्मत देह के बंधन में बंधनेवालों में होती ही नहीं। इसलिए उनका नाम है इन्स्पीरीटींग पार्टी। फिर इतनी पावरफुल आत्माएँ हैं तो उनके ज्यादा जन्म होने चाहिए। पहले उनको सृष्टि रूपी रंगमंच पर आना चाहिए। नर्इ दुनियां में प्रत्यक्ष होना चाहिए। वो बाद में आने के निमित्त क्यों बनती है? जबकी उनमें जास्तीन शक्ति है। इसलिए बनती हैं बाद में आने के निमित्त कि बौद्धिक पावर उनमें उतनी नहीं होती जो ज्ञान की गहराइयों को पूरा-2 समझ सकें। स्थूल शरीर का बंधन ना होने के कारण, सूक्ष्म शरीर के द्वारा पार्ट बजाने के कारण उनमें पावर तो ज्यादा है लेकिन बौद्धिक पावर नहीं होती है। बौद्धिक पावर जिसमें जास्तीी होगी वही मन को कंट्रोल कर सकेगा। वो भी तब जब परमपिता परमात्मा का सान्निध्य मिले, गाइडेंस मिले। परमात्मा शिव के सान्निध्य को प्रक्टिकल में प्राप्त करने वाले शरीरधारी बच्चे होते हैं जो साकार इंद्रियों के द्वारा साकार परमपिता परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करते हैं। इसलिए उनकी बुद्धि सात्विक बन जाती है। संग के रंग के आधार पर ही परिवर्तन होता है। उसमें भी जितनी ऊँच ते ऊँच एक की लगन होती है उतनी बुद्धि पावरफुल बनती है। लगन कम है तो बुद्धि इधर-उधर बिखरती है, व्यभिचारी बनती है। औरों-2 का संग लेने के कारण नम्बरवार बन जाती है। जो बुद्धि में सात्विकता आनी चाहिए वो सात्विकता नहीं होती।

ब्रह्मा जैसी आत्माओं का मन प्रबल होता है। बुद्धि प्रबल नहीं होती। उनको मन रूपी घोडे़ का मिसाल दिया गया है। इसलिए बोला है कि त्रिमूर्ति में एक है घोड़ा, एक है शेर और एक है बकरी। मन रूपी घोड़ा कहा जाता है। घोडे़ की लगाम अगर ढीली कर दी जाए, बुद्धि ही लगाम है। तो घोड़ा जोर से दौड़ता है। ऊपर नीचे नहीं देखता। इसलिए बुद्धि की लगाम जो एक के हाथ में देता है... जिस हाथ का नाम क्या है? उस एक ऊँच ते ऊँच हाथ का नाम क्या है? श्रीमत। वो मन रूपी घोड़ा उसके कंट्रोल में आ जाता है। कोर्इ पहले कंट्रोल में लेता है और कोर्इ बाद में कंट्रोल में लेता है। जिसकी एक में लगन और संग तोड़ एक संग जोड़ सतत इसी प्रयास में लगा रहता है, पुरूषार्थ में लगा रहता है। उसकी बुद्धि सात्विक बन जाती है।
जो सात्विक बुद्धि है उन सूक्ष्म शरीरधारीयों के ऊपर कंट्रोल कर लेती है। जिन सूक्ष्म शरीरधारीयों को तांत्रिक कंट्रोल करते हैं। यह मैली विद्या कही जाती है; तांत्रिक प्रक्रिया। गीता में लिखा हुआ है जो भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, वो भूत-प्रेतों से अल्पकाल की प्राप्ति करते हैं। ब्राह्मणों की दुनियां में भी ऐसे भूत-प्रेतों को मानने वाले हैं जिनका भगवान के उपर निश्चय नहीं बैठता, भगवान को पहचान ही नहीं पाते। और ब्रह्मा की गोद में पलने वाले जो और विधर्मी आत्माएँ हैं क्रिश्चियन, इस्लामी, बौद्धि आदि वो सब फरिश्ताओं को मानने वाले हैं। देवताओं को मानने वाले नहीं हैं। सात्विक रूप है फरिश्ता और उनका तामसी रूप बनता है भूत-प्रेत, इविल सेाल्स। आज भारत में भी गाँव-2 में शहर-2 में इविल सेाल्स का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। सिर्फ भारत की ही बात नहीं है अभी तो सारी दुनियां में अकाले मौत का तांडव नृत्य होगा। ढेर के ढेर अकाले मौत में शरीर छोड़ेंगे और सूक्ष्म शरीर धारण करते जावेंगे। कितना तांडव होगा। उन भूत-प्रेतों को कंट्रोल करना इन तांत्रिकों की बस की बात ही नहीं रह जावेगी। उनका भी बाप कौन है? भूत-प्रतों का भी बाप कौन है? भूतनाथ। इसलिए देवात्माओं को भी कहता है, मनुष्य आत्माओं को भी कहता है, मनुष्य गुरूओं को भी कहता है और भूत-प्रेत का पार्ट बजाने वाले जो भूत-प्रेत योनी की आत्माएँ हैं उनको भी कहता है। क्योंकि सारी दुनियां उसके बच्चे हैं। उन बच्चों को वार्निंग देता है। क्या वार्निंग देता है? बच्चे, तुम्हारा बाप आया हुआ है। ऐसे नहीं कि वो स्थापनाकारियों का ही बाप है या पालना करीयों का ही बाप है, विष्णु। जैसा सौम्यि पार्ट बजाने वालों का ही बाप है। वो भूत-प्रेतों का भी बाप है। भूतनाथ उसका टाइटिल है।

इसलिए भक्तों ने तो ब्रह्मा की तीन मूर्तियाँ बना दी हैं। त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह देते हैं। लेकिन वास्तव में त्रिमूर्ति का पार्ट बजाने वाला मैं हूँ। स्थापनाकारी भी मैं, पालना करनेवाला भी मैं, क्योंकि विष्णुर की जो चार भुजाएँ हैं वो चार भुजाएँ चार आत्मा रूपी मदद गार भुजाओं की सूचक है। ब्रह्मा के साथ सरस्वती और राधे के साथ जगदम्बा। भारतमाता के साथ वर्ल्डं मदर। ये चार भुजाएँ हैं और इन चारों को चलाने वाला कौन है? जिसको कहा जाता है शिवबाबा। भुजाएँ अपने आप अपना कार्य नहीं कर सकतीं। चलाने वाला चाहिए। तो विष्णुन का जो रूप है उसमें चलाने वाला स्वयं शिवशंकर भोलेनाथ का स्वरूप है। इसलिए विष्णुथ के रूप का एक दूसरा चित्र भी बनाया हुआ है अर्धनारीश्वर। आधा स्त्री का चोला और आधा पुरूष का चोला। जैसे गीता में बोला है नदियाँ में मैं यह महान नदी हूँ। वृक्षों में मैं यह महान वृक्ष हूँ। देवताओं में मैं यह महान देवता हूँ। ऐसे ही स्थापना करनेवालों में भी मैं महान हूँ। विनाश करनेवालों में भी मेरी प्रधानता है। और पालना करनेवालों में भी मेरी प्रधानता है। तो भक्तों ने तो ऐसे ही कह दिया है। चित्र बनाए दिया है त्रिमूर्ति का साक्षात्कार के आधार पर। साक्षात्कार करनेवाले दूसरे होते हैं। बनानेवाले चित्रकार दूसरे होते हैं। उनको गाइडेन्स देनेवाले दूसरे होते हैं। तो वो चित्र एक्यूरेट नहीं तैयार हो सकते। इसलिए जो साक्षात्कार से त्रिमूर्ति का चित्र बनाया गया उनमें तीनों ही फिचर्स ब्रह्मा के लगा दिये गये। ब्रह्मा का जैसा ओरीजीनल फिचर था वैसा ही रखा गया। विष्णुे के फिचर में भी ब्रह्मा का चित्र लगा दिया गया। मूँछे हटा दी गईं। और शंकर के चित्र में भी ब्रह्मा का फिचर लगा दिया गया। मूँछे हटा दी गईं। तो तीनों ही मूर्तियों में ब्रह्मा का फिचर डाल दिया। डालने वाले ब्रह्मा के पुजारी थे।

लेकिन बाबा ने बोला मुरली में कि भक्तिमार्ग वाले भक्त कहते हैं त्रिमूर्ति ब्रह्मा। वास्तव में त्रिमूर्ति ब्रह्मा की नहीं हैं तीन मूर्तियाँ। तीन मूर्तियाँ मेरी हैं। मैं ही प्रजापिता ब्रह्मा में प्रवेश करके ब्राह्मणों की रचना रचता हूँ। ब्रह्मा की भी रचना रचता हूँ। मैं ही विष्णुा का रचियता हूँ। और मैं ही शंकर का स्वरूप धारण करता हूँ। तीनों ही रूप मेरे हैं। तो त्रिमूर्ति शिव कहना चाहिए। त्रिमूर्ति शिव शंकर भेालेनाथ कहना चाहिए। शिव की तीनों मूर्तियाँ हैं। जो अलग-2 रूपधारी हैं। अन्त में प्रत्यक्ष होगी। ये तीन मूर्तियाँ एक साथ पार्ट नहीं बजातीं। उनका टार्इम अलग-2 निश्चित है। तीनों मूर्तियाँ एक साथ नहीं बोलतीं। उनके बोलने का टार्इम भी अलग-2 है। एक्ट करने का टार्इम भी अलग-2 है। और जब इकठ्ठी होके पार्ट बजाती हैं तो ड्रामा ही खलास होने लगता है। प्रत्यक्षता हो जाती है। ओम् शान्ति।


VCD 591, Hyderabad (A.P.),
Mu. 29.06.67, Dt. 10.01.07
Part - 3


The souls like Brahma and Saraswati who don’t enter another womb after leaving their body, those who have firm faith in the basic knowledge, after leaving their body, they take on the form of the inspiriting party and become those who fill the beads of the Rudramaalaa with zeal and enthusiasm; only then when they are in the saatvik (pure) stage. And when they attain the degraded (taamasi) stage, they become the reason of destruction of the entire world and the devilish nature through those very beads of Rudramaalaa. They enter their stomach like intellect and make their task to accomplish. The bodies of the beads of Rudramaalaa become the instrument. They (the inspiriting party) become the instrument to enable the task to be performed. It is because the physical bodily beings don’t have power to the extent the subtle bodily beings have. The soul that is bound in the bondage of the physical body cannot play a powerful part to that extent. They cannot perform great miraculous tasks. They cannot perform the tasks which astonish the world. Which souls perform that task through them? The souls who enter perform great task. Those who are bound in the bondage of the body don’t have so much courage at all. That’s why their name is inspiriting party. Then if they are such powerful souls, they should have more births, they should come first on this stage like world; they should be revealed [first] in the new world. Why do they become the instruments for coming later, even if they have more power? They become the instruments for coming later because they don’t have much intellectual power to understand the depth of the knowledge completely. Because of not having the bondage of the physical body and playing the part through the subtle body, they do have more power but they don’t have intellectual power. Only the one who has more intellectual power will be able to control the mind. That too [is possible] when he is in closeness, when he gets the guidance of the Supreme Father Supreme Soul. Those who receive the closeness of the Supreme Soul Shiva in practice are the bodily children. They receive the closeness of the corporeal Supreme Father Supreme Soul through the corporeal indriyaan . That’s why their intellect becomes saatvik. The transformation takes place based on the color of company itself. In that too, the higher is the dedication for the One, the intellect becomes powerful to that extent. If the dedication is less, then the intellect wanders here and there. It becomes adulterous because of taking the color of company of other [people]. It becomes number wise . There isn’t satviktaa to the extent it should be in the intellect.

The mind of the souls like Brahma is powerful. Their intellect is not powerful. They are compared to a horse: ‘the horse like mind’. That’s why it has been said, in the Trimurti, one is horse, second is lion and the third is goat. It is said horse like mind. If rein of the horse is let loose, - the intellect itself is the rein - the horse runs fast. He doesn’t see up and down. That’s why the one who gives the rein of intellect in the hand of the One; what is the name of that hand? What is the name of that one highest on high hand? Shrimat. That horse like mind comes under his control. Someone controls it first, and someone else controls it later. The one who has dedication in the One, the one who is always engaged in this very effort, this very purushaarth [to] break the connection with others and establish the connection with the One, his intellect becomes pure.

Those with a pure intellect gain control over those subtle bodily beings, the subtle bodily beings that are controlled by the tantrics (a person versed in tantric knowledge). This tantric technique is called a dirty science. It is written in the Gita: those who worship the ghosts and spirits, make the attainment from ghosts and spirits for short time. In the world of Brahmins also there are such ones who believe in ghosts and spirits, who don’t have faith on God. They are not at all able to recognize God. And the other vidharmi souls take sustenance on the lap of Brahma [like] Christians, the people of Islam, Buddhists etc., all of them believe in angels (farishtaa). They don’t believe in deities. Their pure form is of an angel and their degraded form is ghosts, spirits and evil souls. Today, in Bharat also, in every village and every city, the effect of the evil souls is increasing. It is not just about Bharat. Now, in the entire world, the dance of destruction (taandav nritya) of untimely death will take place. Numerous [people] will leave their body because of untimely death and take on subtle bodies. Such a dance of destruction will take place! Then it will not at all be in the capacity of the tantrics to control those ghosts and spirits. Who is the Father of them too? Who is the Father of even the ghosts and spirits? Bhootnath (Controller of the ghosts and spirits). This is why, he tells the deity souls as well as human souls, he tells the human gurus as well as the souls of the species of the ghosts and spirits, who play the part of ghosts and spirits ... It is because [the people of] the entire world are his children. He gives warning to those children. What warning does he give? Children, your Father has come. It’s not that he is the Father of only those who establish or he is the Father of only those who give sustenance; he is the Father of only those who play gentle part like Vishnu. He is the Father of ghosts and spirits as well. His title is Bhootnath.

This why, the devotees have certainly made three idols of Brahma, they say Trimurti Brahma. But in reality, it is I who play the part of Trimurti. I Myself am the one who establishes and I Myself am the one who gives sustenance too, because the four arms of Vishnu are the symbols of four co-operative souls in the form of four arms. Saraswati along with Brahma and Jagadamba along with Radhe [i.e.] the World Mother along with Bharat mata (Mother India) [are shown]. These are the four arms and who is the one who makes them work? He is called ShivBaba. The arms cannot perform their task on their own. The one who makes them work is required. So in the form of Vishnu, the form of Shiva Shankar Bholenath himself is the one who makes them work. That’s why another picture of Vishnu is also prepared [that is of] ardhnaarishwar (half-man and half-woman). Half part [of the body] is of a female and half is that of a male. Just as it is said in the Gita: Among the rivers I am this great river, among the trees I am this great tree. Among the deities I am this great deity. In the same way, I am great among those who establish as well as I am superior among those who do the destruction and I am superior among those who give sustenance too. So the devotees have simply said this; they have made the picture of Trimurti based on the visions. Those who have visions are different. The artists who make [the pictures] are different; those who give them guidance are different. So those pictures cannot be made accurate. That’s why the picture of Trimurti that was prepared based on visions, the features of Brahma were shown in all the three [personalties] in it. The original features of Brahma were kept as it is; the features of Brahma were shown in the picture of Vishnu as well, the moustaches were removed. And in the picture of Shankar also the features of Brahma were depicted; the moustaches were removed. So, they have shown the features of Brahma in all the three personalities. Those who had shown it were the devotees of Brahma.

But Baba has said in the Murli: The devotees of the path of devotion say, Trimurti Brahma. In reality, the three personalities are not of Brahma. The three personalities are Mine. I Myself enter Prajapita Brahma and create the Brahmins, I also create Brahma. I Myself am the creator of Vishnu and I Myself take on the form of Shankar. All the three forms are Mine. So, it should be said, Trimurti Shiva. It should be said Trimurti Shiva Shankar Bholenath. The three personalities with different forms are of Shiva. They will be revealed in the end. These three personalities don’t play their part together. They have different fixed times. All the three personalities don’t speak at the same time. Their time of speaking is also different. Their time of act is also different and when they combine together and play the part, the drama itself comes to an end. The revelation takes place. Om Shanti.
(Concluded.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 10 May 2015

वी.सी.डी. नं.594, कैसेट नं.1080, दावणगेरे (कर्नाटक)
मु.30.06.67 ता.13.01.07
भाग-1


रात्री क्लाास चल रहा था 30 जून 1967 का। पहले पेज की दूसरी लाईन चल रही थी। जब बाबा ब्रह्मा द्वारा समझाते है, एडॉप्ट् करते है, उसको कहा जाता है मुखवंशावली। यहाँ पर कुखवंशावली की बात नहीं है। यहाँ माना कहाँ? और वहाँ होती है कुखवंशावली की बात। यहाँ माने जहाँ बाप प्रैक्टिकल में ब्रह्मा के तन में आकर समझाते है और बच्चों को एडॉप्ट करते है। बिना समझाय एडॉप्ट नहीं करते। ये सभी यहाँ का अनुभव है। बाप पढ़ाते है। कृष्ण के लिए भी कहते है कि भगवान ने पढ़ाया था। अब हरेक मनुष्य की बायोग्राफी अलग-2 होती है। मनुष्य नहीं जानते है। तुम बच्चे जानते हो कि कृ‍ष्णर की और परमात्मा की जीवनकहानी में रात-दिन का फ़र्क है। कृष्ण की जीवनकहानी और परमात्मा राम बाप की जीवनकहानी।

प्रदर्शनी में आते है परंतु इतना समय नहीं देते है कि जो पूरा समझ करके जावे। थोड़ा-2 टाईम निकाल करके आते है। ये चित्र तो बहुत इज़ी है समझाने के लिए। समझाया जाता है, ये नयी दुनिया है, ये पुरानी दुनिया है। स्वर्ग में भारत ऐसा सुखी होता था। इस ड्रामा में तुम बच्चों के बिना और कोई जानते नहीं है। बच्चे ड्रामा को जानने पर समझते है कि हम 5000 वर्ष के बाद आए है। फिर अब तुम चले जावेंगे सतयुग में। ये पार्ट फिर 5000 वर्ष के बाद फिर रिपीट होगा। अभी तुम बच्चे जानते हो कि ये संगमयुग है। बच्चों को निश्चय है ही कि हम जाते है बापदादा के पास और हम विश्व का मालिक बनेंगे।

भारत में ही 5000 वर्ष पहले लक्ष्मीे–नारायण का राज्य था। फिर 84 जन्मा लेते-2 ज़रूर तमोप्रधान अवस्था को पावेंगे। बच्चेी जानते है कि हम और बाबा फिर 5000 वर्ष के बाद मिलेंगे। कौनसा बाबा? कौनसा बाबा 5000 वर्ष के बाद मिलेंगे? शिवबाबा। बच्चों का नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार चलता रहता है। लव भी सभी का एकरस नहीं होता है। जो बहुत दु:खी होते है तो उनको सहारा मिलता है तो उनको बहुत लव रहता है।

मंदिरों में तो शिव-शंकर इकट्ठा कर लेते है। मंदिर तो यादगार है ना। किस बात की यादगार है? जो पार्ट बजाया है उस पार्ट की यादगार है। तो मंदिरों में शिव-शंकर इकट्ठा क्योंो कर दिया गया? किसा बात की यादगार है कि शिव और शंकर इकट्ठे हो गए? ये तो यहाँ ब्राह्मण जानते है कि शिव की आत्मास अलग, शंकर की आत्मा अलग, दोनों का पार्ट अलग-2, शिव कल्याणकारी, शंकर संघारकारी, शिव का लिंग बनाते है, शंकर का विग्रह बनाते है। शिव ज्योातिबिन्दु स्वरूप दिखाते है। सोमनाथ मंदिर में भी शिवलिंग दिखाया था तो उसमें हीरा स्टार मिसल दिखाया गया। और शंकर को याद में बैठे हुए दिखाते है। किसकी याद में बैठते है? जो भी पुराने मंदिर है, उनमें बीच में शिवलिंग होता है। और दिवारों में चारों ओर देवताओं की मूर्तियाँ रखी हुई है। उससे क्या साबित होता है? सब किसको याद कर रहे है? एक शिव को याद करते है। उन याद करने वालों में मुख्य स्थान शंकर का रखा हुआ है।

शंकर को भी याद में बैठा हुआ दिखाते है। फिर और देवताओं को तो शिव के साथ नहीं मिलाय दिया। किसको मिलाय दिया? शंकर को शिव के साथ मिलाय दिया। तो ऐसा क्यों किया? कोई तो कारण होगा। क्या कारण हुआ? शिव जो बाप है बिन्दुो-2 आत्माओं का, जो सदैव शिव स्वरूप स्मृाति में रहता है, बिन्दुरूप स्थिति में स्थित रहने वाला है, वो जब इस सृष्टि पर आता है, तो कोई बच्चा तो पहले-2 बाप समान ज्योतिबिन्दु रूप धारण करता होगा। जो बच्चा बाप समान बीजरूप स्टेज धारण करता है, सदा शिव के साथ विश्व कल्याणकारी का पार्ट बजाता है, उसकी यादगार में शिव और शंकर को इकट्ठा कर दिया गया है। शिव-विष्णु को इकट्ठा नहीं करते, शिव-ब्रह्मा को इकट्ठा नहीं करते, शिव और शंकर को इकट्ठा कर दिया है।

तो भक्तिमार्ग में जो भी यादगारें है, कहाँ की यादगार है? संगमयुग की यादगार है। तो तुम बच्चों की ये बात बुध्दि में है कि शंकर के आगे बैल क्यों दिखाते है। शंकर को नहीं दिखाते है पहले। शंकर के आगे कौन दिखाते है? बैल दिखाते है। क्यों दिखाते है? बैल पर सवारी दिखाते है। कोई भी देवता होता है तो उसकी सवारी उसके साथ ही दिखायी जाती है। सरस्वती की सवारी, उनके साथ हंस दिखाया जाता है। देवी की सवारी, उनके साथ सिंह दिखाया जाता है अथवा बाघ दिखाया जाता है, बाघंबरी देवी कहते है। गणेश की सवारी चूहा दिखावेंगे। कार्तिकेय की सवारी मयूर दिखाते है। गंगा की सवारी मगरमच्छ दिखाते है। शंकर के साथ किसको दिखाया? बैल को दिखाते है। इसका क्या मतलब हुआ?

बैल तो जानवर की निशानी है। दिखाते है कि बैल पर छलांग लगाके चढ़ते है। नहीं तो बैल पर कैसे सवार होते है? छलांग का मतलब क्या हुआ? एक होता है पुरूषार्थ में चलना, एक होता है पुरूषार्थ में दौड़ना, एक होता है पुरूषार्थ में उड़ना और एक होता है हाई जम्प लगाना। तो दिखाते है हाई जम्प लगाकर बैल पर सवार हो जाते है। माना जो बैल की वृत्तियाँ है उन वृत्तियों पर उन्होंने सवारी कर ली। शिव के आगे बैल नहीं दिखाते है। शंकर के आगे दिखाते है। क्यां? क्यों शिव के आगे बैल नहीं दिखाते? इसका मतलब क्या हुआ? शिव के मंदिर जहाँ होते है, शिवलिंग बना होता है, शंकर की मूर्ति नहीं होती है वहाँ बैल नहीं दिखाते? दिखाते तो है। लेकिन यहाँ बोल दिया, शिव के आगे नहीं दिखाते है। इसका मतलब जहाँ शिव बोला है, वो भी लिंगाकार रूप है। वास्तव में असली रूप ज्योतिबिन्दु। है।


VCD No. 594, C.No. 1080, Davangere (Karnataka),
Mu. 30.06.67, Dt. 13.01.07
Part – 1


A night class dated 30th June 1967 was being discussed. Second line of the first page was being discussed: When Baba explains through Brahma, when He adopts [someone], they are called mukhvanshaavali. Here, it is not about [being] a kukhvanshaavali. ‘Here’ means where? And there it is about [being] kukhvanshaavali. ‘Here’ means the place where the Father comes in the body of Brahma in practice, explains and adopts the children. He doesn’t adopt them without explaining. All these are the experiences of here. The Father teaches. They also say for Krishna: God taught [the knowledge]. Well, the biography of every human being is different. The human beings don’t know [this]. You children know that there is a difference of night and day between the biographies of Krishna and the Supreme Soul. [There is] the life story of Krishna and the life story of the Supreme Soul, the Father Ram.

People do come to the exhibition but don’t give enough time to understand [the explanations] completely before going. They take out little time and come. These pictures are certainly very easy to explain. It is explained: This is the new world [and] this is the old world. Bharat (India) was happy like this in heaven. Except you children, no one knows this drama. After knowing the drama, the children understand that they have come after 5000 years. [The Father says:] now you will go to the Golden Age again. This part will repeat again after 5000 years. Now you children know, this is the Confluence Age. The children certainly have faith: we go to BapDada and we will become the masters of the world.

There was the kingdom of Lakshmi - Narayan 5000 years ago in Bharat itself. Then while passing through 84 births, they will definitely reach the tamopradhaan stage. The children know: we will meet Baba again after 5000 years. Which Baba? Which Baba will meet us after 5000 years? ShivBaba. [The purushaarth of] the children continues number wise (more or less) according to their purushaarth (spiritual effort). Everyone does not have uniform love either. When those who are very sad find a support, they have a lot of love [for Him].

In the temples, they combine Shiva and Shankar. Temples are certainly the memorials, aren’t they? Of what are they the memorials? They are the memorials of the parts played. So, why are Shiva and Shankar combined in the temples? Combining of Shiva and Shankar is a memorial of what? It is the Brahmins here who know that the soul of Shiva is separate, the soul of Shankar is separate, the parts of both of them is different, Shiva is beneficial, Shankar is destroyer, a ling (oblong shape) is made [as the memorial] of Shiva, idols of Shankar are made. Shiva is shown in the form of a point of light. A star like diamond was shown in the Shivling at the Somnath temple as well and Shankar is shown sitting in remembrance. In whose remembrance does he sit? In all the old temples, Shivling is placed in the centre and the idols of deities are placed (shown) in the walls all around it. What does this prove? Whom are they all remembering? They remember the one Shiva. Among those who remember [Him], Shankar is placed at the main position.

Shankar is also shown to be sitting in remembrance. But the other deities have not been combined with Shiva. Who has been combined [with Shiva]? Shankar has been combined with Shiva. So, why did they do so? There must be some reason. What is the reason? Shiva, the Father of the point souls, who always remains in the awareness of the form of Shiva, who always remains stable in the point form stage, when He comes to this world, there will certainly be some child who takes on the form of a point of light like the Father. The child who assimilates the seed form stage like the Father, the one who plays the part of being beneficial to the world (vishwa kalyaankaari) along with Sadaa Shiva; Shiva and Shankar have been combined in its memorial. They don’t combine Shiva [and] Vishnu, they don’t combine Shiva [and] Brahma, [but] they have combined Shiva and Shankar.

So, all the memorials in the path of Bhakti are the memorials of when? They are the memorials of the Confluence Age. So, the topic is in the intellect of you children: why is a bull shown in front [of the idol] of Shankar. Shankar is not shown first. Who is shown before Shankar? They show a bull. Why do they show it? He (Shankar) is shown riding a bull. The vehicle of any deity is shown along with that very deity. The vehicle of Saraswati… a swan is shown with her. The vehicle of a devi (a female deity)... a lion or a tiger is shown with her, she is called ‘baaghambari devi’. Rat is shown as the vehicle of [the deity] Ganesha. A peacock is shown as the vehicle of Kartikeya. A crocodile is shown as the vehicle of Ganga. Who is shown with Shankar? A bull is shown. What does it mean?

In fact, a bull represents an animal. It is shown that [he] jumps and climbs over the bull. Otherwise, what is the way of mounting on a bull? What is the meaning of a jump? One thing is to walk in purushaarth (spiritual efforts), another thing is to run in pururshaarth, one thing is to fly in purushaarth and another thing is to take a high jump [in purushaarth]. So, it is shown that he takes a high jump and climbs on the bull. It means, he climbed over (controlled) the instincts of a bull. A bull is not shown in front of Shiva. It is shown in front of Shankar. What? Why? Isn’t a bull shown in front of Shiva? What does it mean? At places where there are the temples of Shiva, a Shivling is made, there aren’t the idols of Shankar, isn’t a bull shown there? It is certainly shown. But here it was said [in the Murli], it is not shown in front of Shiva. It means, when it is said Shiva [here], He too is in the form of a ling. His real form is a point of light
... (to be continued.)

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11513
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: to exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 May 2015

वी.सी.डी. नं.594, कैसेट नं.1080, दावणगेरे (कर्नाटक)
मु.30.06.67 ता.13.01.07
भाग-2


बिन्दुo का बड़ा आकार लाईट का गोला है। जो लाईट का गोला है वो ज्ञान का प्रकाश है। वो ज्ञान का प्रकाश साकार के द्वारा प्रतिबिंबित होगा या बिन्दु के द्वारा प्रतिबिंबित होगा? ज्ञान कैसे आवेगा? ज्ञान का प्रकाश अनुभव में कैसे आवेगा? मुसलमान लोग तो कहते है, अल्ला ह मियाँ ने ये फरमाया, अल्लााह मियाँ ने वो फरमाया; परंतु अल्ला ह मियाँ जो फरमाते है वो क्याय उपर से आवाज़ आती है? कोई साकार के द्वारा फरमाते होंगे ना। तो जो साकार लाईट का रूप है वो साकार शरीर की यादगार है जिसमें वो ज्योंतिबिन्दुट प्रवेश करता है। प्रवेश करके उसके द्वारा ज्ञान की लाईट संसार में फिंकती है, पहुँचती है। तो लिंग आकार हो गया शंकर का रूप, विग्रह। और उसमें प्रवेश करनेवाला हो गया ज्यो,तिबिन्दु।। उसको कहते है शिव-शंकर भोलेनाथ। उनकी सवारी दिखाते है बैल।

बैल कौन है?
(किसी ने कहा: ब्रह्मा।) बैल कहो, घोड़ा कहो बात एक ही है। घोड़ा कहा जाता है मन रूपी घोड़ा। हर आत्माल की जैसे तीन शक्तियाँ है मन, बुध्दि, संस्काडर वैसे परमात्माह बाप शिव की भी तीन शक्तियाँ है, ब्रह्मा, विष्णु। और शंकर। तो ब्रह्मा रूपी मन को कन्ट्रो ल करने के लिए शिव शंकर में प्रवेश करते है। सिर्फ मन को ही नहीं कन्ट्रो ल कराते; सारी इन्द्रियों को कन्ट्रोशल कराते है। इन्द्रियाँ योगबल के आधार पर कन्ट्रोनल्डो हो जाती है। जो कन्ट्रो ल्डक हुई इन्द्रियाँ हैं वो मन के आधार पर कन्ट्रोयल्डर होती हैं। मन अगर कन्ट्रोहल में नहीं है तो इन्द्रियाँ कन्ट्रोयल में नहीं होंगी। मन कन्ट्रो ल में है तो इन्द्रियाँ भी कन्ट्रो ल हो जाती है। तो मूल है ब्रह्मा। लगाम बुध्दि की कसी हुई होगी तो मन कन्ट्रोडल में होगा। लगाम ढ़ीली छोड़ी जाएगी तो घोड़ा कुलाचें मारता हुआ कहीं का कहीं ले जाएगा।

तो शंकर के आगे बैल, ये निशानी है। ये हैं सभी भक्ति मार्ग की बातें जो भक्तोंी की समझ में नहीं आती है। वो तो ऐसे ही सिर्फ रख देते है। आज से हजारों वर्ष पहले ऋषि-मुनियों ने जो पहाड़ों की गुफाओं में चित्रकारी की थी, उस चित्रकारी के आधार पर जो शास्त्रन बने, उन शास्त्रों का इंटरप्रिटेशन उन्होंचने जैसा समझा वैसा किया। असली बात तो बाप आकर के समझाते है कि ये शंकर के आगे बैल क्यों दिखाया गया है। बैल ये निशानी क्यों है? बैल और गाय की जोड़ी होती है। कृष्ण के साथ किसे दिखाते है? गौओं को दिखाते हैं। कृष्णा के साथ तो बैल दिखाना चाहिए। बैल नहीं दिखाया है। क्यास दिखाया है? गौएँ दिखायी है। अब वो वास्त व में ह्युमन गौओं की बात है और ह्यूमन बैल की बात है।

कृष्णक की आत्माम ही बच्चाद बुध्दि का पार्ट बजाती है। बाबा बताते है, कृष्णय बच्चा् है, राम बाप को कहा जाता है। माना कृष्णै की आत्माा... जो कुछ भी बाबा बोलते है कृष्णु के अंतिम जन्मह के चोले के द्वारा, उसे कृष्णआ की आत्माक नहीं समझती है। इसलिए मुरली में बताते है, मैं तुम बच्चोंे से बात करता हूँ। ये तो बीच में सुन लेता है। कौन? ब्रह्मा माना कृष्णब की सोल। मैं इससे बात नहीं करता हूँ। क्योंू? इससे बात भी करूँ तो कोई फायदा नहीं, ये समझेगा ही नहीं। जब समझेगा नहीं तो काम भी पूरा नहीं करेगा। इसलिए मैं तुम बच्चोंी से बात करता हूँ। तुमसे इसलिए बात करता हूँ कि तुम बात की गहराई को समझ करके प्रैक्टिकल एक्टस में लावेंगे। और राजयोग के द्वारा इन्द्रियों को और इन्द्रियों के सरदार मन को कन्ट्रोलल कर लेंगे।

ये कृष्ण बच्चा् सतयुग आदि में सतोप्रधान स्टेरज में जब होता है तो बच्चेग के रूप में महात्मान का पार्ट बजाता है। कलियुग के अंत में यही कृष्णत क्याे बन जाता है? कृष्णक सो कंस बन जाता है। तुम कन्ट्रोहलर हो कृष्णं रूपी मन के और मैं तुम्हाजरे में प्रवेश करके तुमको कन्ट्रोसल करता हूँ। इसलिए कहते है शिव-शंकर भोलेनाथ। अब तुम जान गए हो कि ये भक्तिमार्ग की बातें है। भगवान तो एक ही रचयता है। दुनिया भी एक ही है। उन्होंमने तो समझ लिया है कि ये सूरज, चाँद, सितारें जितने ढ़ेर है उन सब में एक-2 दुनिया है। वास्तेव में उन जड़ सितारों में कोई दुनिया नहीं होती है। ये तो तुम चैतन्य धरती के सितारें हो; तुम एक-2 सितारे में एक-2 दुनिया समायी हुई है। माने तुम्हाैरे 84 जन्मोंय के साथ अनेक आत्मांओं का कनेक्शकन जुटा हुआ है। वो तुम्हाहरी अपनी दुनिया है।

यूँ सारी दुनिया एक ही है। भगवान भी एक ही है। शास्त्रों में तो बहुत गपोड़े हैं। लिखा है चंद्रमा पर देवतायें निवास करते है। अब चंद्रमा पर तो साइंसदान होकर के वापस लौटे आए। वहाँ तो कोई जीव-जन्तुे मिला ही नहीं। कोई देवातायें मिले क्याट? कुछ भी नहीं मिला। ये कुदरत है। वो साइंस घमंडी समझते है कि एक-2 सितारे में दुनिया है तो वहाँ पहुँचने की कोशिश करते है। समझते है हम वहाँ प्लाकट खरीदेंगे। बुध्दि में ये बात नहीं आती कि इस पृथ्वीक पर ही जीवन है। इस पृथ्वीह के अलावा दुनिया में कहीं भी कोई जीवन की बात हो ही नहीं सकती। क्योंो नहीं हो सकती? एक पृथ्वीव पर ही सूर्य की किरणें उत्ततरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर तिरछी पड़ती है। तो सूर्य की दूरी हो जाती है। और पृथ्वीह के मध्ये में सीधी किरणें पड़ती है। वहाँ सूर्य नज़दीक हो जाता है। तो ऐसी एक्ज़ेहक्टह जहाँ नज़दीकी है सूर्य के साथ वहाँ मनुष्य। जीवन है।


VCD No. 594, C.No. 1080, Davangere (Karnataka),
Mu. 30.06.67, Dt. 13.01.07
Part – 2


The bigger form of a point is a ball of light. The ball of light is the light of knowledge. Will that light of knowledge be reflected through the corporeal one or the Point? How will knowledge come? How will the light of knowledge be experienced? The Muslims say, ‘Allah Miyaan said this, Allah Miyaan said that’; but when ‘Allah Miyaan’ speaks, does a voice come from above? He will certainly speak through some corporeal one, won’t He? So, the physical form of light is the memorial of the real body in which the Point of light enters. After entering [that body], the light of knowledge is spread [in the world], it reaches the world through it. So, the shape of a ling, an idol is the form of Shankar and the One who enters him is the Point of light. He is [then] called Shiva-Shankar Bholenath (lord of the innocent ones). A bull is shown as his mount.

Who is a bull?
(Someone said: Brahma.) Call him a bull, a horse, it is the same thing. Horse means mind in the form of horse. Just like every soul has three powers: the mind, intellect and sanskaar, in the same way there are three powers of the Supreme Soul, the Father Shiva as well: Brahma, Vishnu and Shankar. So, in order to control Brahma in the form of the mind, Shiva enters Shankar. He not just enables him to control the mind [but] He enables him to control all the indriyaan . The indriyaan are controlled with the help of yogbal (the power of Yoga). The indriyaan in control are controlled with the support of the mind. If the mind is not under control, the indriyaan will not be in control. If the mind is under control, the indriyaan are also controlled. So, the main one is Brahma. If a tight rein of the intellect is kept, the mind will be under control. If the reins are let loose, the horse will leap and take us somewhere far away.

So, there is a memorial of a bull in front of Shankar. All these are the topics of the path of Bhakti which the devotees are unable to understand. Thousands of years ago, the sages and saints drew pictures in the caves in mountains; the scriptures that were prepared based on those paintings were interpreted by them (people) the way they understood it. It is the Father who explains the real thing after coming, [about] why a bull is shown in front of Shankar. Why there is a sign of a bull? There is a couple of a cow and a bull. What is shown along with Krishna? Cows are shown. A bull should be shown with Krishna. [But] a bull is not shown; what is shown? Cows are shown. Now, in reality, that is about human cows and human bulls.

The soul of Krishna himself plays the part of the one with a child like intellect. Baba says, Krishna is a child; Ram is called the Father. It means, the soul of Krishna… whatever [Shiv]baba narrates through the body of Krishna in his last birth, the soul of Krishna doesn’t understand it. This is why, it is said in Murli: I talk to you children. This one just listens in between. Who? Brahma i.e. the soul of Krishna. I don’t talk to this one. Why? There is no use even if I talk to him, he will not at all understand. If he doesn’t understand, he will not complete the task either. This is the reason, I talk to you children. I talk to you because you will understand the topic in depth and bring it in practice in your acts and will control the indriyaan and the leader of the indriyaan, the mind, through Raja Yoga.

When this child Krishna is in the satopradhaan stage in the beginning of the Golden Age, he plays the part of a mahaatmaa (a noble soul) in the form of a child. What does this very Krishna become at the end of the Iron Age? He becomes Kansa from Krishna. You are the controllers of Krishna in the form of mind and I enter you and control you. This is why, it is said, Shiva-Shankar Bholenath. Now you have understood that these are the topics of the path of Bhakti. God alone is the Creator. And there is only one world. They have considered that the Sun, the Moon, [and] numerous stars that there are, they all have a separate world in them. In fact, there is no world in those inert stars. It is you, the living stars of the earth; each of you stars have a world in you. It means, there is a connection of many souls with your 84 births. That is your own world.

As such, there is just one world. And there is one God. There are many gossips in the scriptures. It is written: deities reside on the Moon. Well, the scientists visited the Moon and came back. There, they did not find any living creature at all. Did they find any deities there? They did not find anything. This is nature. The egotistic scientists think that there is a world in each star [in the sky] so, they make an attempt to reach there. They think that they will buy a plot there. It doesn’t come in their intellect that life exists on the Earth alone. Except for this Earth, there cannot be life anywhere in the world at all. Why can’t it be? On the Earth itself, the rays of the Sun fall inclined at the North and the South Poles. Thus, the Sun becomes distant [from those places]. While at the centre of the Earth, the sun rays fall straight. The Sun is close [to the Earth] at that place. So, the human life exists at the place where there is exact closeness to the Sun
... (to be continued).

Post Reply

Who is online

Users browsing this forum: No registered users and 7 guests