Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 Oct 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2372-extracts-Hindi

समय- 0.01-11.52
Time: 00.01-11.52


रात्रि क्लास चल रहा था - 15.01.1966। इसी तारीख को रिवाइज़ हुआ 1967 में। बात चल रही थी शिवजयंती की। शिवजयंती मनानी तो है अच्छी तरह से। कोई को समझाने का भी चांस मिले तो अच्छा है। कैलण्डर भी बन रहे हैं। उम्मीद तो नहीं है बाम्बे वालों में कि ऐन शिवजयंती के टाइम पर ये टीन के कैलण्डर भी पहुँचाएंगे। टीन के कैलण्डर, स्थूल कपड़े के कैलण्डर, और चैतन्य चित्र वाला कैलण्डर – नहीं तो ये कैलण्डर भी अच्छी सौगात है। ‘भी’ क्यों लगा दिया? इसके पहले बात हो रही थी कास्केट की। जो प्लास्टिक का कास्केट है जो हूबहू यादगार है सोमनाथ मन्दिर की। जिसमें लिंग में चमकता हुआ हीरा जड़ा हुआ था। तो देखेंगे ये बनाकर भेज देते हैं या बनाने में कोई विघ्न पड़ते हैं। टीन का हो, कपड़े का हो या चैतन्य हो, विघ्न तो पड़ते ही हैं। यहाँ ये प्रेस है। ये फलाना यहाँ है। बम्बई में। ये विघन बहुत पड़ते रहते हैं।
A night class dated 15.01.1966 was being narrated. It was revised on the same date in 1967. The topic being discussed was of Shivjayanti (Shiv’s birthday). You have to celebrate Shivjayanti nicely. It is good if you also get a chance to explain to anyone. Calenders are also being prepared. It is not hoped that those from Bombay will enable these tin calenders to reach right on time for Shivjayanti. Tin calenders, the calenders made up of physical cloth and the calenders of living pictures – otherwise, these calenders are also a very good gift. Why was ‘also’ added? Before this, the topic of calender was being discussed. The plastic casket is an exact memorial of Somnath temple in which a shining diamond was engraved in the ling. So, we will see whether they prepare [the tin calenders] and send or are any obstacles created in their preparation? Be it of tin, be it of cloth or the living one, obstacles are definitely created. Here, there is a Press. This particular person is here, in Bombay. A lot of these obstacles keep on emerging.

इस शिवजयंती में प्रदर्शनी भी होवे तो अच्छा ही है। और ये भी हम तुमको लिखत में दे देते हैं। शिवबाबा का कैलण्डर। इसमें क्या है लिखत में? हँ? 32 किरणों वाला चित्र है ना। तो सवाल पैदा होता है। जो ज्योतिर्लिंगम शिव का चित्र दिखाया है, 32 गुणों के बीच में, वो सिर्फ निराकार है या साकार है या साकार, निराकार दोनों है? हँ?
(सबने कहा – दोनों है।) दोनों है? इसमें निराकार क्या है? हँ? (किसी ने कहा – शिवलिंग में हाथ पैर नहीं हैं।) जोर से बोलो। (किसी ने कहा – शिवलिंग में हाथ-पाँव नहीं दिखाते।) निराकार शिवलिंग में क्या है? (किसी ने कहा – बिन्दु।) सोमनाथ के मन्दिर में क्या था? (सबने कहा – हीरा।) निराकार ज्योतिबिन्दु की यादगार दिखाई। परन्तु हीरे के रूप में दिखाई।
It is good if an exhibition is also organised on this Shivjayanti. And we also give this to you in writing. ShivBaba’s calender. What is written in it? Hm? It is a picture of 32 rays, isn’t it? So, a question arises. The picture of point of light Shiv that has been shown in the middle of 32 virtues, is it just incorporeal or corporeal or both corporeal and incorporeal? Hm?
(Everyone said – Both.) Is it both? What is incorporeal in it? Hm? (Someone said – Shivling does not have hands and legs.) Speak loudly. (Someone said- Hand and legs are not depicted in Shivling.) What is incorporeal in Shivling? (Someone said – The point.) What was [incorporeal] in the temple of Somnath? (Everyone said – The diamond.) It was the memorial of the incorporeal point of light. But it was shown in the form of a diamond.

हीरा सिर्फ अव्वल नंबर रतन होता है, बहुत वैल्युबुल या पत्थर भी होता है?
(किसी ने कहा – पत्थर भी होता है।) तो ये निराकार शिव ज्योतिबिन्दु जिसकी आत्मा का ही नाम शिव है वो सिर्फ निराकार है या साकार है? ज्योतिबिन्दु? (सबने कहा – निराकार।) निराकार है? माना पत्थरबुद्धि है? जिस ज्योतिबिन्दु का नाम शिव है वो पत्थरबुद्धि है या पारस है? (किसी ने कहा – पारस है।) पारस और पत्थर में क्या फर्क है? पारस बिगड़ा हुआ शब्द है। असली शब्द है स्पर्श। माना जिसके स्पर्श मात्र से परिवर्तन हो जाए। लोहे जैसी निजात काली आत्मा भी परिवर्तन हो जाए। उसको कहते हैं पारस। बाकी ऐसा पारस कोई पत्थर नहीं होता है जो लोहे में टच कर दिया जाए, लोहे के संग में रख दिया जाए तो वो लोहा सोना बन जाएगा। होता है? नहीं होता है।
Is the diamond just a number one gem, very valuable or is it also a stone?
(Someone said – It is also a stone.) So, this incorporeal point of light Shiv, whose name of the soul alone is Shiv, is He just incorporeal or corporeal? Point of light? (Everyone said – Incorporeal.) Is it incorporeal? Does it mean that He has a stone-like intellect? Does the point of light, whose name is Shiv have a stone-like intellect or is He an elixir (paaras)? (Someone said – He is Paaras.) What is the difference between a paaras and a stone (patthar)? Paaras is a modified word (apbhransh). The original word is ‘sparsh’. It means the one whose touch itself causes transformation. A soul completely black like iron should also transform. That is called paaras. But there is no stone like paaras as such which, when touched to iron, when kept in the company of iron, transforms the iron into gold. Does it? It doesn’t.

अभी निराकार शिव ज्योतिबिन्दु को इस मनुष्य सृष्टि में आये हुए कितना टाइम हो गया?
(किसी ने कहा – 80 साल।) 80 साल होने जा रहे हैं। कोई पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बना? हँ? किसके स्पर्श से पारसबुद्धि बने? शिव ज्योतिबिन्दु जिसकी आत्मा का ही नाम शिव है, उसके स्पर्श से पारसबुद्धि बनते हैं या वो जब इस सृष्टि पर आता है, अपना विरुद बताता है कि मैं तुम बच्चों को आप समान बनाकर जाऊँगा। आप समान माना? निराकारी, निर्विकारी, निरअहंकारी बनाकर जाऊँगा। तो नंबरवार बनेंगे या एक साथ बनेंगे? (सबने कहा – नंबरवार।) कोई नंबर वन भी बना होगा। हँ? जो नंबर वन बनता है वो मुसलमानों में भी गाया जाता है अल्लाह अव्वलदीन। अल्लाह ने अव्वल नंबर दीन अर्थात् धर्म की स्थापना की थी। और धर्म उसके बाद ही आते हैं। जो अल्लाह सच्चा पातशाह है। शिव ज्योतिबन्दु बादशाह बनता है? हँ? (किसी ने कहा – नहीं।) तो भी बादशाह कौन बनता है राजयोग बल से? जो राजयोग बल से सच्चा बादशाह बनता है वो सत् गॉड फादर का बच्चा है।
How much time has passed since the incorporeal point of light Shiv came in this human world?
(Someone said – 80 years.) It is going to be 80 years. Did anyone become ‘paarasbuddhi’ (elixir-like intellect) from ‘pattharbuddhi’ (stone-like intellect)? Hm? Through whose touch will they become ‘paarasbuddhi’? The point of light Shiv, whose name of the soul itself is Shiv; do you become paarasbuddhi through His touch or when He comes in this world and reveals His promise that I will make you children equal to Myself and go. What is meant by ‘equal to Myself’ (aapsamaan)? I will make you incorporeal, viceless, egoless and go. So, will you become numberwise or will you become simultaneously? (Everyone said – Numberwise.) Someone must have become number one as well. Hm? The one who becomes number one is sung among the Muslims also as Allah Avvaldeen. Allah had established the number one Deen, i.e.religion. Other religions come only after that. The Allah who is the true Paatshaah (emperor). Does the point of light Shiv become Baadshah (emperor)? Hm? (Someone said – No.) Yet, who becomes an emperor through the power of rajyog? The one who becomes the true emperor through the power of rajyog is the child of the true God Father.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 31 Oct 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2373-extracts-Hindi

समय- 0.01-10.10
Time: 00.01-10.10


छोटा सा रात्रि क्लास है 16.01.1966। रिवाइज़ हुआ 1967 । हम अभी जो स्टडी करते हैं ये स्टडी श्रीकृष्णपुरी के लिए करते हैं। किसी ने कहा स्टडी कराने वाला कौन है? ब्रह्मा ने बोला अभी ये हम बच्चे जो स्टडी करते हैं, वो श्रीकृष्णपुरी के लिए करते हैं। श्रीकृष्णपुरी कहाँ होगी? हँ? सतयुग में होगी या संगमयुग में होगी? भक्तिमार्ग में सतयुग के कृष्ण का तो कोई गायन नहीं है। सतयुग त्रेता की कोई हिस्ट्री ही नहीं है। सारी बात संगमयुग की है। संगमयुग में जब शिवबाप आते हैं, निराकार आत्माओं का निराकार बाप आते हैं तो आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों का जो बाप है शिव, जिसकी आत्मा का ही नाम शिव है, बिन्दु का नाम शिव है, जिसको शरीर होता ही नहीं, इसलिए वो त्रिकालदर्शी है। त्रिकालदर्शी बाप इस मनुष्य सृष्टि में आते हैं।

तो वो बापों का बाप है। इस मनुष्य सृष्टि में जो भी जो भी ग्रेट धरमपिताएं हैं, उनका भी बाप, मनुष्य सृष्टि का बीज प्रजापिता, जिसे कहें ग्रेट-ग्रेट ग्राण्डफादर माना बाबा। ग्राण्डफादर को बाबा कहा जाता है। परन्तु उस ग्राण्डफादर का भी कोई बाप है जिसका कोई बाप नहीं। और वो है सारी मनुष्यात्माओं का बाप, ज्योतिबिन्दु शिव। वो ही राजयोग की स्टडी कराने वाला है, क्योंकि राजयोग से राजा सिर्फ वो ही बना सकता है, जो सदा स्वतंत्र हो। सदा स्वतंत्र रहने वाला सदा स्वतंत्र ही बनाएगा। राजा होता है, अपने राज्य में स्वतंत्र होता है। वो सबके ऊपर शासन करता है। उसके ऊपर कोई शासन नहीं करता। तो शासन करने की कला सिवाय आत्माओं के बाप शिव के कोई नहीं सिखाय सकता। क्योंकि जितनी भी मनुष्यात्माएं इस मनुष्य सृष्टि में, सब देहभान वाली होती हैं, देहभान वाली बनती हैं। भल पहले-पहले इस सृष्टि में आती हैं तो सात्विक होती हैं, आत्माभिमानी होती हैं, परन्तु सबको संग का रंग लगता है। और देहभानी बन पड़ते हैं।

संग का रंग लगता ही है शरीर के द्वारा। शरीर पांच तत्वों का पुतला। ये पाँच तत्व विनाशी हैं। आत्मा अविनाशी है। इसीलिए जो पाँच तत्वों के प्रभाव में आते हैं वो सब प्रभावित होने वाले हैं। यहाँ तक कि मनुष्य सृष्टि का जो बाप है, सारी मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष का बाप, वो भी पाँच तत्वों से प्रभावित होता है। और नीचे गिरता है। पन्तु कलियुगी, पापी, नीच सृष्टि में अंत में जब सुप्रीम सोल बाप, आत्माओं का बाप आते हैं तो अपने बड़े बच्चे को बाप का वर्सा जो मिलना चाहिए वो वर्सा, निराकारी वर्सा देते हैं। क्योंकि आत्माएं निराकारी, आत्माओं का बाप भी निराकारी, और निराकारी आत्माओं का बाप शिव सदा शिव कहा जाता है। जो सदा ही निराकारी है। भले इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आता है, पाँच तत्वों के पुतले में प्रवेश करता है, ज्ञान देने के लिए, परन्तु वो देह के पाँच तत्वों के प्रभाव में नहीं आता। बाकी जितनी भी मनुष्यात्माएं हैं या प्राणी मात्र की आत्माएं हैं इस सृष्टि पर पाँच तत्वों के संग के रंग में, प्रभाव में आती हैं और नीचे गिरती हैं। तो वो सुप्रीम सोल बाप जो कभी नीचे नहीं गिरता, पतित नहीं बनता, सदा शिव कहा जाता है, इसलिए त्रिकालदर्शी है क्योंकि जनम-मरण के चक्कर में नहीं आता, देह के बंधन में ही नहीं आता। त्रिकालदर्शी होने से वो तीनों काल के ज्ञान का वर्सा देता है।

There is a small night class dated 16.01.1966. It was revised in 1967. The study that we undertake now, we undertake this study for the abode of Shri Krishna. Someone said – who is the one who enables this study? Brahma said – The study that we children undertake now is for the abode of Shri Krishna. Where will the abode of Shri Krishna be? Hm? Will it be in the Golden Age or in the Confluence Age? There is no glory of Golden Age Krishna on the path of Bhakti. There is no history at all of the Golden Age and Silver Age. The entire topic is of the Confluence Age. When the Father Shiv comes in the Confluence Age, when the incorporeal Father of the incorporeal souls comes, then Shiv, the Father of the brother like souls, whose name of the soul itself is Shiv, the name of the point is Shiv, the one who does not have a body at all; that is why He is Trikaaldarshi (knower of all the three aspects of time). The Trikaaldarshi Father comes in this human world.

So, he is the Father of fathers. He is the Father of all the great founders of religions in this human world, the seed of the human world, i.e. Prajapita, who could be called the great-great-grandfather, i.e. Baba. Grandfather is called Baba. But even that grandfather has a Father who does not have any Father. And He, the point of light Shiv is the Father of all the human souls. He is the one who enables us to study rajyog because only the one who is forever independent can make you a king through rajyog. The one who remains free forever will make forever free. A king remains independent in his kingdom. He rules over everyone. Nobody rules over him. So, except Shiv, the Father of souls, nobody can teach the art of governance because all the human souls in this human world are body conscious, become body conscious. Although they are pure, soul conscious when they come first of all in this world, but everyone gets coloured by company and become body conscious.

The colour of company is applied only through the body. The body is an effigy of five elements. These five elements are perishable. The soul is imperishable. This is why all those who are affected by the five elements are the one who get influenced. It is to the extent that the Father of the human world, the Father of the entire human world tree also gets influenced by the five elements and undergoes downfall. But in the end of the Iron Age, sinful, lowly world, when the Supreme Soul Father, the Father of souls comes, then the Father’s inheritance that the eldest child should get, He give him that inheritance, the incorporeal inheritance because the souls are incorporeal, the Father of the souls is also incorporeal and Shiv, the Father of incorporeal souls is called SadaaShiv (forever benevolent). He is forever incorporeal. Although He comes on this world stage, although He enters in the effigy of five elements in order to give knowledge, yet He does not come under the influence of the five elements. All other human souls or the souls of the living beings in this world are coloured by the company and come under the influence of the five elements and undergo downfall. So, that Supreme Soul Father who never undergoes downfall, never becomes sinful, is called SadaaShiv; this is why He is Trikaaldarshi because He does not enter the cycle of birth and death, does not get bound by the body. Because of being Trikaaldarshi He give the inheritance of knowledge of all the three aspects of time.


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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2374-extracts-Hindi

समय- 0.01-08.48
Time: 00.01-08.48


रात्रि क्लास चल रहा था 16.01.1966। इसी तारीख को रिवाइज़ हुई 1967 में। बात चल रही थी – अभी हम जो स्टडी कर रहे हैं सो श्रीकृष्णपुरी के लिए करते हैं। कहाँ के लिए करते हैं? ये कहाँ होती है? श्रीकृष्णपुरी कहाँ होती है? (किसी ने कुछ कहा।) सतयुग में होती है। हँ? (किसी ने कहा – वैकुण्ठ में होती है।) वैकुण्ठ में होती है। हँ? श्रीकृष्णपुरी कहाँ होती है? (किसी ने कुछ कहा।) सतयुग में होती है। सतयुग का कोई गायन है शास्त्रों में? शास्त्रों में सतयुग-त्रेता का कोई गायन है? (किसी ने कहा – नहीं।) तो फिर आप कौनसी कृष्णपुरी में जाना चाहते हैं? (किसी ने कहा – संगमयुगी।) संगमयुगी? जब श्रीकृष्णपुरी सतयुग में होती है तो आप संगमयुग में क्यों जाना चाहते हो? हँ? (किसी ने कहा – मौजों का युग है।) मौजों का युग है? श्रीकृष्णपुरी नहीं है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) संगमयुग में श्रीकृष्णपुरी है या नहीं है? (सबने कहा – है।) हँ?

आजकल भक्तिमार्ग में एक चित्र निकला है – पहले वो चित्र नहीं देखा जाता था। याद है कौनसा चित्र? हँ? एक बूढ़ा बाबा दाढ़ी-मूँछ वाला जिसके सर पर चन्द्रमा विराजमान है, उसकी गोद मंी कृष्ण बच्चा बैठा हुआ है। ये कृष्ण बच्चा कौनसी आत्मा है?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? क्योंकि चित्रकारों ने जो चित्रकारी की है जिसकी भाव-भंगिमा शास्त्रों में आई है, तो कोई चरित्र के आधार पर चित्रकारी की होगी। तो जो श्री कृष्ण बूढ़े बाबा की गोद में बैठा दिखाया गया, वो कौनसी आत्मा है? (किसी ने कहा – ब्रह्मा बाबा की आत्मा।) ब्रह्मा बाबा की आत्मा। अभी पीछे एक अव्यक्त वाणी आई होगी, नहीं, मुरली आई होगी जिसका क्लेरिफिकेशन आया था कि आत्माओं के बीच में सुप्रीम बाप कौन है? उसका नाम क्या है? शिव बाप। बापों का बाप जिसका कोई बाप? होता ही नहीं। और वो आत्मा रूपी बच्चों का बाप है, निराकारी बच्चों का। जो भी आत्मा रूप में निराकारी बच्चे हैं उनमें कोई बड़ा बच्चा होगा जो कहा जाता है आत्मा-आत्मा भाई-भाई। तो भाई-भाईयों के बीच में कोई बड़ा भाई के रूप में आत्मा होगी या नहीं होगी? (सबने कहा – होगी।) वो कौन है? (किसी ने कहा – राम वाली आत्मा।) वो राम वाली आत्मा? राम फेल हो गया वो? हँ? (किसी ने कहा – प्रजापिता।) राम वाली आत्मा और 500-700 करोड़ मनुष्य सृष्टि की जो प्रजा है उसका पिता – प्रजापिता। ब्रह्म वाक्य भी है, ब्रह्मा के मुख से बोला हुआ वेदवाक्य – राम बाप को कहा जाता है और कृष्ण बच्चे को कहा जाता है।

तो जो आत्माओं के बीच में, आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों के बीच में बाप का बड़ा बच्चा है, वो शिव बाप का बड़ा बच्चा है ना। भाईयों में बड़ा भाई है। तो दादा हुआ ना। हँ? आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों के बीच में क्या कहेंगे उसे? दादा। और बाप कौन? शिव बाप। शिवबाबा? शिव बाप। बाबा तो तब कहें जब कोई साकार तन में प्रवेश करे। बाबा कहते हैं ग्रान्डफादर को। तो उसका तो एक ही संबंध है आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों के साथ बाप का। दूसरा कोई संबंध है ही नहीं। और बड़े बच्चे के साथ, जिसे आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों के बीच में दादा कहें, वो हम क्या कहते हैं? बाप और बाप के बड़े बच्चे को क्या कहते हैं मिला के? बाप? दादा।

ये कबसे कहने लगे? हँ? सुप्रीम सोल बाप शिव और उनके जो भी बच्चे हैं आत्मा-आत्मा भाई-भाई, उनमें बड़ा भाई दादा, ये बाप-दादा, इन दो आत्माओं को आपने कबसे कहना शुरू कर दिया?
(किसी ने कहा – 5-6 बरस से।) 5-6 बरस से? (किसी ने कहा – पांच दिसम्बर।) पाँच? पाँच दिसम्बर से। पाँच दिसम्बर से कहना तो तब शुरू करेंगे जब पता हो जिन बच्चों को कि बाप ज्योतिबिन्दु और दादा भी ज्योतिबिन्दु बना जीवन में पहली बार। तो संबंध जुटा

A night class dated 16.01.1966 was being narrated. It was revised on the same day in 1967. The topic being discussed was – Whatever we study now is for Shri Krishna’s abode. For which place do we study? Where is this? Where is Shri Krishna’s abode? (Someone said something.) It exists in the Golden Age. Hm? (Someone said – It exists in Vaikunth.) It exists in Vaikunth. Hm? Where does the abode of Shri Krishna exist? (Someone said something.) It exists in the Golden Age. Is there any glory of the Golden Age in the scriptures? Is there any praise of the Golden Age and Silver Age in the scriptures? (Someone said – No.) Then which abode of Shri Krishna do you wish to go to? (Someone said – The Confluence-Aged.) The Confluence-Aged? When the abode of Shri Krishna exists in the Golden Age, then why do you wish to go to the one that exists in the Confluence Age? Hm? (Someone said – It is an Age of joy.) Is it an Age of joy? Isn’t the abode of Shri Krishna so? Hm? (Someone said something.) Does the abode of Shri Krishna exist in the Confluence Age or not? (Everyone said – It does.) Hm?

Now-a-days a picture has emerged on the path of Bhakti – earlier that picture did not used to be seen. Do you remember which picture is that? An aged man with beard and moustache, on whose forehead the Moon is seated; child Krishna is sitting in his lap. Which soul is this child Krishna? (Someone said something.) Hm? It is because the painting that artist has made, whose emotions have been described in the scriptures, then that painting must have been prepared on the basis of some character (charitra). So, whose soul is that Shri Krishna who has been shown sitting on the lap of the old Baba? (Someone said – The soul of Brahma Baba.) The soul of Brahma Baba. Now recently an Avyakt Vani must have emerged, no, a Murli must have emerged, whose clarification was given that who is the Supreme Father among the souls? What is His name? Father Shiv. The Father of fathers who does not have any Father at all. And He is the Father of the souls like children, of the incorporeal children. All the incorporeal children in the form of souls, among them there must be an eldest child who is called soul like brother. So, among the brothers, will there be a soul which is in the form of an eldest brother or not? (Everyone said – There will be.) Who is it? (Someone said – The soul of Ram.) That soul of Ram? That Ram who failed? Hm? (Someone said – Prajapita.) The soul of Ram and the Father of the 500-700 crore subjects of the human world – The Prajapita. There is a Brahm vaakya (a sentence uttered by Brahma) also, a Vedvaakya (a sentence of the Veda) spoken through the mouth of Brahma – The Father is called Ram and the child is called Krishna.

So, the one who is the eldest child of the Father among the souls, among the brother like souls, he is the eldest child of Father Shiv, isn’t he? He is the eldest brother among the brothers. So, he is Dada (elder brother), isn’t he? Hm? What will he be called among the brother like souls? Dada. And who is Baap (Father)? Father Shiv. ShivBaba? Father Shiv. He will be called Baba when He enters in a corporeal body. A grandfather is called Baba. So, He, the Father has only one relationship with the brother like souls. There is no other relationship at all. And along with the eldest child, whom we call Dada among the brother like souls, what do we say? What do we call the Father (Baap) and the eldest child of the Father together? Baap? Dada.

Since when did you start telling so? Hm? The Supreme Soul Father Shiv and the eldest brother, Dada among all His children, among the brother like souls, this Baap-Dada; since when did you start calling these two souls?
(Someone said – Since 5-6 years.) Since 5-6 years? (Someone said – Fifth December.) Fifth? Since fifth December. Those children will start calling from fifth December when they know that the Father is a point of light and the Dada also became a point of light for the first time in life. So, a relationship was established.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 09 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2375-extracts-Hindi

समय- 0.01-12.08
Time: 00.01-12.08


रात्रि क्लास चल रहा था 16 जनवरी, 1967 का रात्रि क्लास। बात चल रही थी – जितना हम पुरुषार्थ करेंगे उतना अच्छा पद पाएंगे। पुरुषार्थ की बात आई। देह अर्थ की बात नहीं। देह का कनेक्शन इस दुनिया से है। और पुरुष आत्मा को कहते हैं। शरीर रूपी पुरी में श अर्थात् शयन करने वाला। अर्थात् आत्मा। तो आत्मा के अर्थ जो करते हैं, जितना भी करते हैं, वो आत्मा अविनाशी है अनेक जन्मों के लिए। तो जन्म-जन्मान्तर के लिए ऊँचा और अच्छा पद पाएंगे। क्योंकि पढ़ाने वाला कोई देहधारी गुरू या टीचर नहीं है। हमको पढ़ाने वाला बेहद का बाबा है जिसका कनेक्शन सभी मनुष्यात्माओं से है। 500-700 करोड़ मनुष्यात्माओं से। जो शिवबाबा सभी को मुक्ति और जीवनमुक्ति का वर्सा देते हैं। और वो बाबा स्वस्थिति में स्थित रहने वाला है, इसलिए जरूर स्वर्ग का वर्सा देते हैं। ऐसे नहीं कि 33 करोड़ देवताओं को ही स्वर्ग का वर्सा मिलता है। सुख का वर्सा मिलता है। नहीं। 500-700 करोड़ जो भी मनुष्यात्माएं हैं, इस समय संगमयुग में पुरुषार्थ कर रही हैं या करेंगी, सबको सुख का अर्थात् स्वर्ग का वर्सा कम से कम एक जन्म के लिए जरूर मिलना है। वो बाप है ना। बाप माने वर्सा।

दो बेहद के बाप हैं – एक आत्माओं का बाप और दूसरा मनुष्यात्माओं का बाप। दोनों कम्बाइन्ड हैं। और दोनों ही इस संगमयुग में स्वस्थिति में स्थित होकर स्वर्ग का वर्सा देते हैं। वो बाबा है। बाबा माने ग्रैन्डफादर। फादर का वर्सा कोई को मिले या न मिले, फादर दे या न दे, लेकिन ग्रैन्डफादर अर्थात् बाबा का वर्सा जरूर हर बच्चे को मिलता है। तो बेहद का बाबा जो सदा स्वस्थिति में रहने वाला है वो स्वर्ग का वर्सा नहीं देंगे तो और क्या देंगे? परन्तु वो बेहद का वर्सा तो इन देवी-देवताओं को ही मिला हुआ है। लक्ष्मी-नारायण के चित्र की तरफ इशारा किया। बेहद का बाप है, बेहद का बाबा है तो जरूर बेहद का सुख का वर्सा देता होगा।

इन लक्ष्मी-नारायण की ओर इशारा करके बताया – इससे साबित होता है इन लक्ष्मी-नारायण को आलराउण्ड, चारों युगों का वर्सा मिलता है। सुख का वर्सा मिलता है क्योंकि ये आलराउण्ड पार्ट बजाने वाले हैं। इसलिए बोला कि इनको बेहद का वर्सा मिला हुआ है। इसीलिए ये सामने त्रिमूर्ति एम-आब्जेक्ट रखी जाती है। क्योंकि जिनके लिए बोला – इन लक्ष्मी-नारायण, अर्थात् जो संगमयुग में ही नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनते हैं। इनकी एम-आब्जेक्ट है त्रिमूर्ति जिसमें ब्रह्मा की मूर्ति, विष्णु की मूर्ति, और विनाशकारी शंकर की मूर्ति। स्थापना, पालना और विनाश की तीनों ही मूर्तियाँ एक ही त्रिमूर्ति शिव में हैं जिनकी यादगार में त्रिमूर्ति हाउस बनते हैं। जैसे दिल्ली में बना है त्रिमूर्ति हाउस। वो शरीर रूपी हाउस तो एक ही है परन्तु उस हाउस में तीनों पार्ट समाए हुए हैं।

भारत में गांव-गांव और शहर-शहर में शिव के मन्दिरों में उस आत्मा की यादगार दिखाई गई है। और विदेशों में भी हैं। देश-विदेश में जो खुदाईयां हुई हैं उनमें सबसे जास्ती लिंग मूर्तियाँ मिली हैं। लिंग मूर्ति अव्यक्त भी है। अव्यक्त उसे कहा जाता है जो आँखों से दिखाई न पड़े। अर्थात् इस लिंग मूर्ति में इन्द्रियाँ नहीं दिखाई देती। हाथ, पांव, नाक, आँख, कान, न ज्ञानइन्द्रियां, न कर्मेन्द्रियां दिखाई देती हैं। क्योंकि वो आत्मा जो नारायण कही जाती है जिसका अर्थ ही है नार माने जल और अयण माने घर अर्थात् उस आत्मा का ज्ञान जल ही घर है, जिस ज्ञान के लिए गीता में बोला है – न हि ज्ञान सदृशम् पवित्रम यहि विद्यते। अर्थात् इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कोई चीज़ नहीं है।


A night class dated 16th January, 1967 was being narrated. The topic being discussed was – The more we make purusharth, the better the post that we will get. The topic of purusharth was mentioned. It is not about the body. The connection of the body is with this world. And the soul is called purush. The one who sha, i.e. rests (shayan) in the body like abode (puri), i.e. the soul. So, those who do for the sake of soul, to whatever extent they do, that soul is imperishable for many births. So, they will get a high and good post for many births because the teacher is not a bodily guru or teacher. The one who teaches us is the unlimited Baba whose connection is with all the human souls. With the 500-700 crore human souls. The ShivBaba who gives the inheritance of mukti and jeevanmukti to everyone. And that Baba remains in swasthiti (stage of soul), this is why He definitely gives the inheritance of heaven. It is not as if only the 33 crore deities get the inheritance of heaven, get the inheritance of happiness. No. All the 500-700 crore human souls who are making or will make purusharth at this time in the Confluence Age are to get the inheritance of happiness, i.e. heaven at least for one birth without fail. He is the Father, isn’t He? Father means inheritance.

There are two unlimited Father – One is the Father of souls and the other is the Father of the human souls. Both are combined. And both give the inheritance of heaven by becoming constant in stage of the self, i.e. soul (swasthiti) in this Confluence Age. He is Baba. Baba means grandfather. One may or may not get the inheritance of the Father, a Father may give or not give, but every child definitely gets the inheritance of the grandfather, i.e. Baba. So, if the unlimited Baba who always remains constant in the swasthiti does not give the inheritance of heaven, then what else will He give? But only these deities have received that unlimited inheritance. A gesture was made towards the picture of Lakshmi-Narayan. When He is the unlimited Father, unlimited Baba, then He must be definitely giving the inheritance of unlimited happiness.

A gesture was made towards these Lakshmi and Narayan and told – It proves that these Lakshmi and Narayan get the allround inheritance of all the four Ages. They get the inheritance of happiness because they are the ones who play an allround part. This is why it was said that they have received the unlimited inheritance. This is why the Trimurti aim and object is placed in front of you because the ones for who it was said ‘these Lakshmi and Narayan’, i.e. the ones who become Narayan from nar (man) and Lakshmi from naari (woman) in this Confluence Age itself. Their aim-object is Trimurti in which there is a personality of Brahma, personality of Vishnu and the personality of destructive Shankar. All the three personalities of establishment, sustenance and destruction are available in the same Trimurti Shiv, in whose memory Trimurti House is built. For example, a Trimurti House is built in Delhi. That house like body is only one, but all the three parts are contained in that house.

The memorial of that soul is shown in the temples of Shiv in every village and every city in India. And they are available in the foreign countries as well. In the excavations that have been conducted within the country and abroad the maximum idols that have been found are of the ling. The idol of Ling is Avyakt as well. The one who is not visible to the eyes is called Avyakt, i.e. the organs are not visible in this ling like personality. The hands, legs, nose, eyes, ears, neither the sense organs nor the organs of action are visible because that soul which is called Narayan, whose meaning itself is - ‘naar’ means ‘water’ and ‘ayan’ means that the water of knowledge itself is the home of that soul. For that knowledge it has been said in the Gita – “Na hi gyaan sadrisham pavitram ya hi vidyate.” It means that there is nothing as pure as knowledge in this world.


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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 14 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2376-extracts-Bilingual

समय- 00.01-6.00
Time: 00.01-06.00


आज का रात्रि क्लास है 18.01.1966. इसी तारीख को रिवाइज़ हुआ 1967 में। खेल अभी पूरा हो, फिर से रिपीट होने का है। ये फिर से जो रिपीट होने का खेल है, वो पहले कब हुआ था जो अभी पूरा हो रहा है? हँ? आज से 40 साल पहले भी ये खेल शुरु हुआ था एडवान्स ब्राह्मणों की दुनिया में। अभी वो खेल पूरा हो फिर से रिपीट होने का है। ब्रह्मा ने जो तीसरी बार ब्राह्मणों की सृष्टि रची 1976 से, एडवान्स ब्राह्मणों की सृष्टि, बीजरूप आत्माओं की सृष्टि, उसका खेल अभी पूरा हो फिर से रिपीट होने का है। दुनिया की तो गत और मत, दुनिया की गति तो है ही नहीं। इसलिए फिर कहेंगे दुनिया की दुर्गति। गतिशील नहीं है। वो ब्राह्मणों की दुनिया की गति अभी दुर्गति कहेंगे। असत मत पर चलने वाली कहेंगे। सत्य की मत पर चलने वाली नहीं है। इस दुनिया में सत् कौन है? असत् कौन है? सत वो ही है जो एक गॉड फादर सत कहा जाता है। बाकी सब गुरु कैसे हो गए? असत हो गए। एक सदगुरु निराकार। अर्थात् गुरू है तो साकार होगा या निराकार होगा? हँ? निराकार या साकार? सत है तो निराकार। नो संकल्प एट आल। निराकारी स्टेज। संकल्प-विकल्प है, मनन-चिंतन-मंथन करने वाला है तो मनुष्य होता है। मनन-चिंतन से परे की स्टेज है तो कहेंगे भगवान। इसलिए कहा जाता है मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। क्योंकि मननात् मनुष्य। चंचल मन के फिरावे में जो है वो मनुष्य है।

Today’s night class is dated 18.01.1966. It was revised on the same date in 1967. The drama is about to end now is going to repeat again. When was this drama which is to be repeated again, enacted in the past that it is going to be completed now? Hm? This drama had started 40 years ago as well in the world of Brahmins. Now that drama is about to end and is going to repeat again. The world of Brahmins that Brahma created for the third time from 1976, the world of advanced Brahmins, the world of seed form souls, that drama is now about to be over and is to repeat. The dynamics (gat) and opinion (mat) of the world; there is no dynamics of the world at all; this is why it will be said – the degradation (durgati) of the world. It is not dynamic (gatisheel). That dynamics of the world of Brahmins will now be called degradation. It will be said to be following the false opinion (asat mat). It does not follow the opinion of truth. Who is truth in this world? Who is false? True is only the one who is called one God Father, the truth. How are all other Gurus? They are untruth. One Sadguru is incorporeal, i.e. if there is a guru, will he be corporeal or incorporeal? Hm? Incorporeal or corporeal? If He is truth, He is incorporeal. No thought at all. Incorporeal stage. If he creates good and bad thoughts, if he thinks and churns, then he is a human being (manushya). If the stage is beyond that of thinking and churning, then He will be called God. This is why it is said that a human being cannot be called God because the one who thinks is a human being. The one who comes under the sway of the inconstant mind is a human being.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2377-extracts-Bilingual

समय- 0.01-6.55
Time: 00.01-06.55


रात्रि क्लास चल रहा था 18.01.1966. रिवाइज़्ड हुआ इसी तारीख को 1967 में। बात चल रही थी कि रास्ता तो यही बताया है, खाली लब्ज़ नहीं बताते हैं बच्चों को कि ये रूहानी अर्थ, रूहानी यात्रा है मनमनाभव की। यात्रा में कहाँ पहुँचना है? हँ? भक्तिमार्ग में भी यात्रा करते हैं तो कहीं पहुँचा जाता है ना। तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। तीर माना किनारा। थ माना स्थान। अर्थात् एक ठिकाने पहुँचाने वाले स्थान पर। किस स्थान पर पहुँचना है? हँ? रूहों को पहुँचना है रूहानी घर। और जो रूहें हैं, आत्माएं, सब आत्माएं परमपिता के बच्चे हैं। आत्माओं के बाप का घर है – रूहानी धाम, जहाँ की हमारी रूहानी यात्रा है। जिसके लिए कहते हैं मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। कौन कहता है? मेरे मन में समा जा – ये कौन सी आत्मा कहती है? हँ? आत्माओं का बाप कहते हैं या मनुष्यात्माओं का बाप कहते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? (किसी ने कहा - मनुष्यात्माओं का बाप।) क्यों? (किसी ने कुछ कहा।) मनुष्यात्माओं का बाप, जो मननात मनुष्य कहे जाते हैं – मनन-चिंतन, संकल्प-विकल्प करने वालों का बाप है, वो ही मनुष्यों का बाप है जिसको मन है। आत्माओं के बाप को तो मन? है ही नहीं। तो मनुष्यों का बाप कहते हैं मनमनाभव।

फिर आता है – मध्याजी भव। याजी माने यज्ञ करने वाला। यजन करने वाला। स्वाहा करने वाला। अर्थात् इस संसार में आत्मा कहती है तो सारा जीवन यजन कार्य में जाना चाहिए। यजन अर्थात् सेवा कार्य। तो मध्याजी भव। मत माने मेरे। याजी माना यजन करने वाला। मेरे अर्थ यजन करने वाला भव। इसके कहेंगे रूहानी वर्सा। मेरे अर्थ सेवा अर्थात् मेरे अर्थ यज्ञ कार्य, यज्ञ सेवा। जो इस यज्ञ का नाम है – अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ। अविनाशी का मतलब ही है जिस यज्ञ का विनाश नहीं होता।


A night class dated 18.01.1966 was being narrated. It was revised on the same date in 1967. The topic being discussed was that this path has been shown; mere words are not narrated to the children that this is a spiritual meaning, spiritual journey of Manmanaabhav. Where do you have to reach in the journey? Hm? Even on the path of Bhakti when you perform pilgrimages, you reach somewhere, don’t you? You go on pilgrimage (teerth yaatra). Teer means shore (kinara). Tha means place (sthaan), i.e. at a place where you reach the destination. Where do you have to reach? Hm? The souls have to reach the spiritual home. And as regards the souls, the spirits, all the souls are the children of the Supreme Father. The home of the Father of souls is the spiritual abode whose spiritual pilgrimage we undertake. For that it is said – Manmanaabhav. Merge into My mind. Who says? Which soul says – Merge into My mind? Hm? Does the Father of souls say or does the Father of the human souls say? (Someone said something.) Hm? (Someone said – The Father of human souls.) Why? (Someone said something.) The Father of human souls; those who are called – Mananaat manushya (those who think are called human beings); He is the Father of those who think, create good and bad thoughts. He is the Father of human beings who has a mind. As regards the mind of the Father of souls? He does not have it at all. So, the Father of human beings says – Manmanaabhav.

Then comes – Madhyaaji bhav. Yaaji means the one who performs Yagya. The one who performs yajan (Yagya). The one who sacrifices, i.e. the soul says in this world; so the entire life should be spent in Yagya work. Yajan means the task of service. So, Madhyaaji bhav. Mat means mine. Yaaji means the one who performs the tasks of service. Be the one who performs the tasks of service for Me. This will be called spiritual inheritance. Perform service for Me, i.e. perform Yagya work, Yagya service for Me. The name of this Yagya is – Avinaashi Rudra Gyan Yagya. The meaning of Avinaashi itself is – The Yagya which is never destroyed.


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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2378-extracts-Bilingual

समय- 0.01-11.08
Time: 00.01-11.08

रात्रि क्लास चल रहा था 18.01.1966 जो रिवाइज़ हुआ इसी तारीख को 1967 में। पहले पेज की पाँचवीं लाइन में बात चल रही थी - मनमनाभव का अर्थ है रूहानी यात्रा। और वर्सा है मध्याजी भव। मनमनाभव माना - मेरे मन में समा जा। अर्थात् जो कहने वाला है कि मेरे मन में समा जा वो है मनुष्य सृष्टि का बाप। 500-700 करोड़ की मनुष्य सृष्टि। हरेक मनुष्य आत्मा के अन्दर, रूह के अन्दर, जन्म-जन्मान्तर अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प चलते रहते हैं 5000 वर्ष के ड्रामा में। और उस ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग होती है इस संगम में। यहाँ हरेक मनुष्य आत्मा अपने 5000 वर्ष के ड्रामा की संकल्प-विकल्पों की शूटिंग करती है न जाने कितनी-कितनी आत्माओं के साथ। संकल्पों और विकल्पों के झंझावात आते रहते हैं। उन सबकी शूटिंग इस संगमयुग में होती है। अच्छे संकल्प आते हैं तो अच्छा पुरुषार्थ होता है रूह का। और जब बुरे संकल्प आते हैं तो बुरा पुरुषार्थ हो जाता है। आत्मा दुःखी-दुःखी हो जाती है। ऐसे करते-करते हर मनुष्य आत्मा कलियुग से लेकर द्वापर, त्रेता से होते हुए सतयुग के अंत तक श्रेष्ठ और भ्रष्ट संकल्पों की शूटिंग करती है।

ये हमारी है रूहानी यात्रा। रूह माने आत्मा। और रूहानी यात्रा में जो संकल्पों का बीज पड़ता है वो वाचा और कर्मणा में भी आता है। जिसका प्रतिफल होता है – रूह को सुख और दुःख का वर्सा मिलता है। क्योंकि मनुष्य कोई रूहानी वर्सा तो मांगते नहीं है। क्योंकि अपन को रूह समझते ही नहीं हैं। देह समझते हैं। तो वो जिस्मानी वर्सा मांगते हैं। जिस्म अर्थात् देह की इन्द्रियों का वर्सा मांगते हैं। इन्द्रियों से सुख और दुख मिलता है। तो कहेंगे बाबा ने हमको ये सुख-दुःख दिया, भगवान ने दिया। ऐसे ही कहेंगे ना। भले है सभी आत्मा की एक्टिविटी शरीर के द्वारा। ये आत्मा है जो अब कहती है कि हम अपना वर्सा बच्चे को देता हूँ। लौकिक बाप है, लौकिक बच्चों को वर्सा देता है। जिस्मानी बाप कहा जाता है। जिस्मानी बच्चों को वर्सा देता है। और यहाँ संगमयुग में है रूहानी बाप। वो किसको वर्सा देता है? रूहों को वर्सा देता है। बिन्दु-बिन्दु रूह, ज्योतिबिन्दु स्वरूप आत्माएं। निराकार कही जाने वाली आत्माएं। निराकारी बाप से, रूहानी बाप से कौनसा वर्सा पाते हैं? निराकारी बाप से निराकारी वर्सा मिलेगा।

निराकारी वर्सा होता है ज्ञान का। तो निराकारी बाप कहता है मेरे में जो ज्ञान है, जानकारी है वो भूत, भविष्य (वर्तमान), तीनों काल की जानकारी है। क्योंकि वो रूहानी बाप जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है। इसलिए त्रिकालदर्शी है। तो तीनों काल की सच्चाई का वर्सा देता है। सत्य का ज्ञान देता है। परन्तु वो सत्य का ज्ञान देने वाला जो ट्रुथ इज़ गॉड कहा जाता है, गॉड इज़ वन कहा जाता है, वो सच्चा बाप हर बच्चे को एक जैसा वर्सा देता है या पक्षपात करता है?
(सबने कहा – एक जैसा।) परन्तु क्या बच्चे एक जैसा वर्सा लेते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? क्यों नहीं लेते? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? देने वाला देता है तो लेने वाले क्यों नहीं लेते? (किसी ने कुछ कहा।) इसलिए नहीं लेते कि हर आत्मा रूपी पात्र में ग्रहण करने की शक्ति अपनी-अपनी है। कोई छोटा पात्र है, कोई बड़ा पात्र है। ये कोई स्थूल पात्र की तो बात है नहीं। ये तो बुद्धि रूपी पात्र की बात है। हरेक मनुष्य की मन बुद्धि रूपी आत्मा में अपने कम अथवा ज्यादा जन्मों का पार्ट भरा हुआ है।

A night class dated 18.01.1966 was being narrated; it was revised on the same date in 1967. The topic being discussed in the fifth line of the first page was – The meaning of Manmanaabhav is spiritual journey. And the inheritance is Madhyaaji Bhav. Manmanaabhav means – Merge into My mind. It means that the one who says that merge into My mind is the Father of the human world. The human world of 500-700 crores. Many kinds of good and bad thoughts keep on emerging for many births in the 5000 years drama within every human soul, within the soul. And the shooting of that drama takes place in this Confluence Age. Here every human soul performs the shooting of good and bad thoughts in its 5000 years drama with so many souls. The storms of good and bad thoughts keep on emerging. The shooting of all these takes place in this Confluence Age. When good thoughts emerge, then the soul makes good purusharth. And when bad thoughts emerge, then bad purusharth takes place. A soul becomes sorrowful. While doing so every human soul performs the shooting of righteous and unrighteous thoughts from the Iron Age to Copper Age, from Silver Age to the end of the Golden Age.

This is our spiritual journey (roohani yaatra). Rooh means soul. And the seed of thoughts that is sown in the spiritual journey changes into words and actions also. Its result is that the soul gets the inheritance of happiness and sorrows because human beings do not seek spiritual inheritance because they do not consider themselves to be souls at all. They consider themselves to be a body. So, they seek physical inheritance. They seek inheritance of the organs of the body. You get happiness and sorrows through the organs. So, you say Baba gave us this happiness and sorrow, God gave us. You will say so, will you not? Although all the activity of the souls is through the body; it is the soul which now says that I give my inheritance to the child. The lokik (worldly) Father gives inheritance to the lokik children. He is called the physical Father. He gives inheritance to the physical children. And here in the Confluence Age it is the spiritual Father. To whom does He give inheritance? He gives inheritance to the souls. Point like souls, the point of light like souls. The souls which are called incorporeal. Which inheritance do you get from the incorporeal Father, from the spiritual Father? You will get incorporeal inheritance from the incorporeal Father.

The incorporeal inheritance is of knowledge. So, the incorporeal Father says – The knowledge, the information that is contained in Me is the information of the past, future (and present) because that spiritual Father does not pass through the cycle of birth and death. This is why He is Trikaaldarshi. So, He gives the inheritance of the truth of all the three aspects of time. He gives the knowledge of truth. But that giver of knowledge of truth who is called ‘Truth is God’, ‘God is one’, does that true Father give similar inheritance to every child or does He show partiality?
(Everyone said – Similar.) But do the children obtain similar inheritance? (Someone said something.) Hm? Why don’t they obtain? (Someone said something.) Hm? When the Giver gives, then why don’t the takers take? (Someone said something.) They do not obtain because every utensil like soul contains different power of reception. Some utensils are small and some utensils are big. This is not about the physical utensils. It is about the intellect like utensil. The part of less or more births is contained in the mind and intellect like soul of every human being.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 25 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2379-extracts-Bilingual

समय- 0.01-11.27
Time: 00.01-11.27


ओमशान्ति। रात्रि क्लास चल रहा था 18.01.1966. इसी तारीख को रिवाइज़ हुई 1967 में। पहले पेज के अंत में बात चल रही थी – तुमको ये सारा ज्ञान है जिसे कहा जाता है नाटक की आदि, मध्य, अंत को जो छोटा एक्टर होगा वो भी जानता होगा। तो दुनियावी नाटक तो होता है छोटा नाटक। और ये तो है ह्यूज ड्रामा। 5000 वर्ष का चतुर्युगी का ब्रॉड ड्रामा। परन्तु इस ड्रामे को जो भी सभी एक्टर्स होंगे, संपन्न स्थिति वाले होंगे, तो जानते तो होंगे ना। ब्रॉड ड्रामा के पार्ट को भी सभी जानते होंगे। कब जानते होंगे? हँ? सतयुग में, त्रेता में, द्वापर में या कलियुग में? हँ? (किसी ने कहा – संगम में।) पुरुषोत्तम संगमयुग में जानते होंगे जबकि पुरुष रूप में वो आत्माएं अपने सुप्रीम सोल बाप से आत्मा का परिचय लेती हैं। और परिचय लेकरके आत्मिक स्वरूप में टिकने का अभ्यास करती हैं। अभ्यास जब पक्का हो जाता है तो अपनी आत्मा रूपी रिकार्ड में अनेक जन्मों का कैसा-कैसा क्या-क्या पार्ट भरा हुआ है, वो सभी एक्टर्स जान जाते हैं। परन्तु ये ह्यूज ड्रामा है। बहुत बड़ा ड्रामा है। इसलिए इनको थोड़े में जानना होता है।

तो निराकार आत्माओं का जो निराकार बाप है जिसके पास निराकारी ज्ञान का अखूट भण्डार है, बच्चों को देता है तो पहले तो थोड़े में समझाते हैं क्योंकि पहले तो बच्चे छोटे-छोटे होंगे ना। बच्चाबुद्धि होंगे। सालिमबुद्धि बनते हैं माना आत्मा के ऊपर एकाग्र बनते हैं, एकाग्रता की स्थिति आती है, संपन्न आत्मा बनते हैं, तो बच्चे स्वयं ही अपनी आत्मा के अनेक जन्मों के पार्ट को समझ जाते हैं कि कौन-कौन से जन्मों में मैंने कौन-कौनसा चोला लेकरके पार्ट बजाया है? कितनी-कितनी आत्माओं के सम्पर्क में आया हूँ? और कितनी-कितनी आत्माओं के संबंध में आया हूँ? क्योंकि सम्पर्क हल्का होता है और संबंध गहरा होता है। तो हरेक आत्मा रूपी सितारे में अपनी दुनिया बसी हुई है। वो आसमान के सितारे नहीं हैं, जड़ सितारे, जिनमें कोई दुनिया बसी हुई हो। ये तो तुम बच्चे आत्मा रूपी सितारे हो जिनमें एक-एक में अपनी-अपनी दुनिया बसी हुई है।

तो बाप इस ह्यूज ड्रामा के चार सीन में, जो चार युग हैं खास, उन युगों का भी राज़ बताते हैं, कैसे दुनिया की हर चीज़ सतोप्रधान, सत्वसामान्य, रजो और तमो, चार अवस्थाओं से पसार होती है। तो युगों की बात भी समझाते हैं। युग भी पहले सत्वप्रधान, फिर त्रेता सत्वसामान्य, फिर द्वापर रजोप्रधान, कलियुग है तमोप्रधान।

प्रकृति का राज़ भी समझाते हैं। प्र माना प्रकष्ठ रूपेण। कृति माने रचना। जो परमपुरुष की प्रकष्ठ रचना है उसका राज़ भी बताते हैं। और ये माया का भी राज़ समझाते हैं। संपत्ति का भी राज़ समझाते हैं और सहज ही समझाते हैं ताकि कोई भी कहो कि अभी संगमयुग में, जिसे पुरुषोत्तम संगमयुग कहा जाता है, हर एक, एक से उत्तम पार्ट बजाने वाली मनुष्यात्माओं को अभी संगम में आत्माओं के बाप से वर्सा मिलता है। आत्मा निराकार तो निराकार आत्माओं का बाप निराकार। उस निराकारी बाप का वर्सा भी निराकार। और वो निराकारी वर्सा है ज्ञान का वर्सा। तो अभी शिव बाप से नंबरवार आत्माओं को वो वर्सा मिलता है। शिव बाप बताते हैं कि मैं जिस तन में मुकर्रर रूप से आता हूँ वो साकार तन और मैं सदा निराकार आत्मा, जिसकी बिन्दु का ही नाम शिव है। उसको शरीर होता ही नहीं।

तो मैं बिन्दु आत्मा जब इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आता हूँ तो तुम बच्चों को वरदान देता हूँ कि तुम को आप समान निराकारी, निर्विकारी, निरअहंकारी बनाकर जाऊँगा। तो जो बच्चा मनुष्यात्मा रूपी आत्माओं के बीच में बड़ा बच्चा होता है, जिसे शास्त्रों में भी प्रजापति कहा गया है, वो अंतिम स्वरूप है पुरुषार्थ का। 500-700 करोड़ मनुष्य सृष्टि का पति क्योंकि शिव बाप तो सिर्फ आत्माओं का बाप है, पति नहीं है। आत्मा-आत्मा भाई-भाई और शिव बाप सिर्फ बाप। आत्माएं भी भाई-भाई हैं, भाई-बहन भी नहीं। जब मैं मुकर्रर रथ में प्रवेश करता हूँ तो बताता हूँ कि इस मुकर्रर रथ में प्रवेश करके ये मुकर्रर रथधारी आत्मा जब संपन्न स्टेज प्राप्त करती है तो बाप समान निराकारी, निर्विकारी, निरअहंकारी पहले-पहले बनती है, जिसको कहते हैं कि बाप का बड़ा बच्चा बाप समान कहा जाता है।


Om Shanti. A night class dated 18.01.1966 was being narrated. It wa revised on the same date in 1967. The topic being discussed in the end of the first page was – You have this entire knowledge which is called – even the small actor will be aware of the beginning, middle and end of the drama. So, the worldy drama is a small drama. And this is a huge drama. The broad drama of 5000 years consisting of four Ages. But all the actors who are in a perfect stage will be aware of this drama, will they not? Everyone must be aware of the part of the broad drama, musn’t they? When would they be aware? Hm? In the Golden Age, in the Silver Age, in the Copper Age or in the Iron Age? Hm? (Someone said – In the Confluence Age.) They must be aware in the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age) when those souls in the form of purush get the introduction of the soul from their Supreme Soul Father. And after getting their introduction they practice to become constant in the spiritual form. When the practice becomes firm, then all the actors get to know as to what kind of part of many births is recorded in their record like soul. But this is a huge drama. It is a very big drama. This is why it has to be known in short.

So, the incorporeal Father of the incorporeal souls, who has an inexhaustible storehouse of incorporeal knowledge, when He gives it to the children, first He explains in short because initially the children will be young, will they not be? They will have a child-like intellect. When they develop a matured intellect, i.e. when they focus themselves on the soul, when they achieve the stage of concentration (ekaagrata), when they become perfect souls, then the children themselves understand the part of many births of their soul that I have played parts by assuming which all bodies in which all births, with how many souls have I come in contact, and with how many souls have I come in relationship because contact is shallow and a relationship is deep. So, every star like soul has its own world. They are not the stars of the sky, the non-living stars in which a world is contained. It is you children, the star like souls in whom your individual world is contained.

So, the Father narrates the secret of especially the four Ages in the four scenes of the huge drama as to how everything in the world passes through the four stages of satopradhan, satwasaamaanya, rajo and tamo. So, the topic of Ages is also explained. The Ages (Eras) are also initially satwapradhan, then the Silver Age is satwasaamaanya, then the Copper Age is rajopradhan and the Iron Age is tamopradhan.

He explains the secret of the nature (prakriti) also. Pra means ‘prakashth roopen’ (in a special manner). Kriti means creation. He also narrates the secret of the special creation of the Parampurush (God). And He also explains the secret of this Maya. He also explains the secret of the property (sampatti) and He explains in a simple way only so that now in the Confluence Age, which is called the Purushottam Sangamyug, the human souls which play parts, one better than the other, get inheritance from the Father of souls now in the Confluence Age. When the soul is incorporeal, the Father of the souls is also incorporeal. The inheritance of that incorporeal Father is also incorporeal. And that incorporeal inheritance is the inheritance of knowledge. So, now the numberwise souls get that inheritance from the Father Shiv. The Father Shiv says that the body in which I come in a permanent manner, that corporeal body and I, the forever incorporeal soul, whose name of the point itself is Shiv, He does not have a body at all.

So, when I the point-like soul come on this world stage, then I give a boon to you children that I will make you incorporeal, viceless and egoless like Me and go. So, the child, who is the eldest child among the human souls, who has been called Prajapati in the scriptures, is the last form of purusharth, the Lord (pati) of 500-700 crore human world because Father Shiv is the Father of just the souls, not a husband (pati). Souls are like brothers and Father Shiv is just a Father. The souls are also brothers, not even brothers and sisters. When I enter in a permanent Chariot, then I tell by entering in this permanent Chariot that when this permanent charioteer soul achieves the perfect stage, then it becomes incorporeal, viceless and egoless like the Father first of all, which is termed as the eldest child being equal to the Father.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 27 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2380-extracts-Bilingual

समय- 0.01-10.22
Time: 00.01-10.22


रात्रि क्लास चल रहा था 18.01.1966. इसी तारीख में 1967 में रिवाइज़ हुआ । पहले पेज के अंत में बात चल रही थी – अभी संगमयुग में शिवबाबा से वर्सा मिलता है। और दूसरे युगों में लौकिक बाप से वर्सा मिलता है। शिवबाबा से वर्सा इसलिए मिलता है कि शिवबाबा है स्वर्ग का रचयिता। कौन? शिवबाबा। शिव बाप नहीं। हँ? (किसी ने कहा – शिव बाबा।) शिव बाबा? (किसी ने कहा – हाँ।) शिव बाप रचयिता नहीं है? हँ? (किसी ने कहा – नहीं।) नहीं। शिव बाप रचयिता क्यों नहीं? (किसी ने कहा – बाप तो निराकार है।) हाँ। रचयिता साकार होना चाहिए और रचना भी? साकार होना चाहिए। शिव बाप जब आते हैं, आत्माओं का लोक छोड़करके इस दुनिया में, तो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं उस मुकर्रर रथ को त्रिकालदर्शी होने के कारण पहले से जानते हैं कि ये मुकर्रर रथ है मनुष्य सृष्टि का बाप। मनुष्य सृष्टि साकार है और आत्माओं का लोक? हँ? निराकार है। आत्माओं का बाप भी? निराकार है।

निराकार आत्माओं के बाप से कौनसा वर्सा मिलेगा? निराकारी वर्सा मिलेगा। निराकारी वर्सा होता है ज्ञान का। तो निराकारी बाप इस साकारी सृष्टि में आकरके साकारी मनुष्य सृष्टि के बाप का परिचय देते हैं। जिसको बताया साकार और निराकार का मेल शिवबाबा। बाबा माने ग्रान्डफादर। शिव बाप का संबंध सिर्फ एक ही है। आत्मा-आत्मा भाई-भाई और शिव बाप हमारा? बाप। दूसरा कोई संबंध नहीं। जब इस सृष्टि पर आते हैं तो मुकर्रर रथ में प्रवेश करने के बाद अनेक प्रकार के संबंध बनते हैं। संबंधों से सुख मिलता है। संबंध होते ही सुख के लिए हैं।

तो शिवबाबा से सुख का वर्सा मिलता है। और क्योंकि वो हमारा बाबा है, ग्रान्डफादर है, तो ग्रान्डफादर का वर्सा तो जरूर मिलेगा। बाप का वर्सा मिले या न मिले। वो शिवबाबा का वर्सा है मुक्ति और जीवनमुक्ति। मुक्ति माना दुख-दर्दों से मुक्ति। देह के बंधन से मुक्ति। इस दुखदायी दुनिया से मुक्ति। और मुक्ति मिल गई फिर क्या चाहिए? जैसे बुखार आ गया। सारे शरीर में दर्द हो रहा है। आत्मा दुखी हो रही है। उस दुख से मुक्ति मिल जाए, बुखार चला जाए, तो कहेंगे बुखार से मुक्ति मिल गई। शरीर का दर्द दूर हो गया। शांति मिल गई। फिर क्या चाहिए? बुखार खत्म हो गया। शरीर का दर्द खत्म हो गया, शांति मिल गई, फिर कुछ चाहिए कि नहीं चाहिए? हँ? क्या चाहिए?
(किसी ने कहा – सुख चाहिए।) हाँ। जिनको रसगुल्ला बहुत अच्छा लगता होगा, बहुत याद आएगा। या जिस किसी में लगाव होगा वो याद आएगा। तो सुख भी चाहिए। और सुख शरीर में रहकरके मिल सकता है, इन्द्रियों के द्वारा सुख मिल सकता है या बिना शरीर के सुख मिलेगा? (किसी ने कहा – शरीर के साथ मिलेगा।) शरीर के साथ ही सुख मिलता है। परन्तु सुख मिले, दुख न मिले। उसको कहते हैं जीवनमुक्ति। जीवन रहे और जीवन रहते-रहते सुख ही सुख मिले। दुख का नामनिशान न हो। तो कहेंगे जीवनमुक्ति।

और ये जीवनमुक्ति का भी वर्सा, जैसे मुक्ति का वर्सा ग्राण्डफादर से मिलता है। फादर से मिले या न मिले। तो ग्राण्डफादर जीवन में रहते-रहते सुख भोगा होगा? हँ? ग्राण्डफादर ने सुख भोगा होगा तो बच्चों को भी देगा। ग्राण्डफादर सुख नहीं भोगेगा तो बच्चों को भी नहीं मिलेगा। और शिव बाप? सुख से भी न्यारा है और दुख से भी न्यारा है। क्यों? क्योंकि उसको अपना शरीर? है ही नहीं। जिस शरीर के द्वारा सुख-दुख अनुभव होता है। तो जीवन में रहते-रहते जीव आत्मा बनकरके सुख ही सुख भोगा जाए, दुख न भोगा जाए, उसको कहेंगे जीवनमुक्ति। और ये मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा मनुष्य सृष्टि के प्रत्येक मनुष्यमात्र को मिलना है।


A night class dated 18.01.1966 was being narrated. It was revised on the same date in 1967. The topic being discussed in the end of the first page was – We get the inheritance from ShivBaba now in the Confluence Age. In other Ages we get inheritance from the worldly Father. We get inheritance from ShivBaba because ShivBaba is the creator of heaven. Who? ShivBaba. Not Father Shiv. Hm? (Someone said – ShivBaba.) ShivBaba? (Someone said – Yes.) Isn’t Father Shiv the creator? Hm? (Someone said – No.) No. Why isn’t Father Shiv the creator? (Someone said – The Father is incorporeal.) Yes. The creator should be corporeal and the creation should also be? Corporeal. When Father Shiv comes to this world by leaving the abode of souls, then the permanent Chariot in which He enters, being Trikaaldarshi (knower of all the three aspects of time), He knows that permanent Chariot beforehand that this permanent Chariot is the Father of the human world. The human world is corporeal and the abode of souls? Hm? It is incorporeal. The Father of souls is also? Incorporeal.

Which inheritance will you receive from the Father of incorporeal souls? You will get incorporeal inheritance. The incorporeal inheritance is of knowledge. So, the incorporeal Father comes in this corporeal world and gives the introduction of the Father of the corporeal human world who was described as the combination of corporeal and incorporeal, i.e. ShivBaba. Baba means grandfather. Father Shiv has only one relationship. Souls are brothers and the Father Shiv is our? Father. There is no other relationship. When He comes in this world, then after entering the permanent Chariot many kinds of relationships are established. Happiness is received from relationships. Relationships are only for happiness.

So, we get inheritance of happiness from ShivBaba. And because He is our Baba, grandfather, so, we will definitely get the inheritance of the grandfather. We may or may not get the inheritance of the Father. That inheritance of ShivBaba is mukti and jeevanmukti. Mukti means liberation from sorrows and pains. Liberation from the bondage of the body. Liberation from this world which causes sorrows. And when we have got liberated, then what else do we want? For example, we catch fever. The entire body is experiencing pain. The soul is feeling painful. If you get liberation from that sorrow, if the fever subsides, then it will be said that you got liberated from fever. The body’s pain is gone. You got peace. Then what [else] is required? Fever ended. Body’s pain ended, peace was found; then, is anything required or not? Hm? What is required?
(Someone said – Happiness is required.) Yes. Those who like rasgulla a lot, will remember it a lot. Or you will remember whomsoever you have are attached to. So, happiness is also required. And can happiness be found by being in the body, can happiness be found through the organs or will happiness be received without the body? (Someone said – It will be received with the body.) Happiness is received only with the body. But one should get happiness, one shouldn’t get sorrows. That is called jeevanmukti. One should be alive and one should get happiness while being alive. There should not be any name or trace of sorrows. Then it will be called jeevanmukti.

And this inheritance of jeevanmukti also, just like the inheritance of mukti is received from the grandfather. One may or may not get from the Father. So, would the grandfather have experienced happiness while being alive? Hm? If the grandfather would have experienced happiness, then he would give to the children as well. If the grandfather does not enjoy happiness, then the children wouldn’t receive as well. And Father Shiv? He is beyond happiness as well as beyond sorrows. Why? Because He does not have His body at all. The body through which one experiences happiness and sorrows. So, when one experiences only happiness, does not experience sorrows while being alive as a jeevatma (a living soul in a body), then that will be called jeevanmukti. And every human being of the human world is to receive this inheritance of mukti and jeevanmukti.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 29 Nov 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2381-extracts-Bilingual

समय- 00.01-10.31
Time: 00.01-10.31


रात्रि क्लास चल रहा था 18.01.1966. इसी तारीख को 1967 में रिवाइज़ हुई । दो पेज के मध्य में बात चल रही थी – हम सभी पावन बन रहे हैं। बन करके मनुष्य से देवता बनाएगा तो मनुष्य को ही आकरके देवता बनाएगा ना। तो ये मनुष्य है। मनुष्य कहा जाता है मनु की औलाद को। जो मनुष्य मन से मनन-चिंतन-मंथन करता है उसे मनुष्य कहा जाता है। सिर्फ वे ब्राह्मण कहलाते हैं मनुष्य। ब्रह्मा की औलाद ब्राह्मण। क्योंकि ये प्रजापिता ब्रह्मा के एडॉप्टेड चिल्ड्रेन्स हैं। और शास्त्रों में प्रजापिता ब्रह्मा का गायन भी तो है ना। आरम्भ में होता है पिता, प्रजापिता। जो अंत में बनता है पुरुषार्थ करके विश्व का पिता। विश्व पति कहो। तो शास्त्रों में प्रजापति कह दिया है।

बच्चों को ये भी बुद्धि में रहता है कि अभी नाटक पूरा होता है। और अभी हमको वापस जाना है। जाना भी है, फिर आना भी है। फिर ये भी जानते हैं कि हमको पहले-पहले सुख के संबंध में आना है क्योंकि संबंध जोड़ा ही जाता है सुख के लिए। तो अभी दुःखों का बंधन पूरा होता है। दुःख की हर चीज़ पहले सत्वप्रधान होती है, फिर रजोप्रधान होते हुए तमोप्रधान बनती है। तो जो सुख का संबंध जोड़ा था सतयुग में वो द्वापर में रजोप्रधान होते हुए कलियुग में तामसी, दुखदायी बन जाता है। तो दुख का बंधन कहा जाता है। और ये भी समझना चाहिए कि अगर थोड़ा भी समझा है कि सतयुग में सुख के संबंध में थे। संबंध माना ही संपूर्ण और बंध माना बंधन। संपूर्ण सुखों का बंधन। दुःख का नाम-निशान नहीं। तो दुख का वो वहाँ बंधन था ही नहीं। सुख ही सुख था।

और था भी वहाँ एक ही धर्म। ये पहचान तो बहुत अच्छी दी जाती है ना। जब भारत स्वर्ग में था क्योंकि भारत तो अविनाशी खंड है। और जो भी विदेशी धर्मखण्ड हैं, विधर्मी धर्मखण्ड हैं, विपरीत धर्मवाले हैं, विपरीत देशवाले हैं, वो सब विनाशी खण्ड हैं। न सृष्टि के आदि में थे, न अंत में रहेंगे। भारत देश अविनाशी खण्ड है क्योंकि अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ कुण्ड की शुरुआत यहाँ होती है।

तो भारत जैसा महान पवित्र खण्ड कोई होता ही नहीं। और यही भारत खंड जब तामसी बनता है, तो इन जैसा महान और पवित्र धर्मखण्ड कोई होता ही नहीं। क्योंकि ये बनना ही है। जो जितना सतोप्रधान बनता है, उतना ही तामसी भी बनता है। तो जो भारत महान पावन था, सो भारत और भारतवासी महान पतित बने। भारत में ही ये याद करते रहते हैं, जब पतित बनते हैं। क्या याद करते? हे पतित पावन आओ। और देशों में नहीं याद करते। क्यों? क्योंकि और-और धर्मखण्ड वाले, और-और देश, इतने पतित, दुखी होते ही नहीं। तो भारत में ही बुलाते हैं। ये पतित-पावन, ये अक्षर और कोई भी जगह में होता ही नहीं। भले अंग्रेजी में लोग कहते हैं लिबरेटर आओ, लिब्रेट करो। परन्तु वो तो कहते हैं दुःख से आकर लिब्रेट करो। हेविन को स्थापन करने वाले आओ। आकरके हमको दुखों से लिब्रेट करो। मुक्त करो। वो अंग्रेज लोग जानते हैं कि स्वर्ग की स्थापना करने वाले हैं और उनका नाम भी रखा हुआ है लिब्रेटर। जैसा काम वैसा ही नाम रखा जाता है। स्वर्ग की स्थापना करने वाले और उनका नाम।


A night class dated 18.01.1966 was going on. It was revised on the same date in 1967. The topic being discussed in the middle of the second page was – We all are becoming pure. If he becomes and then makes human beings to deities, then he will come and make the human beings only as deities, will he not? So, these are human beings. The children of Manu are callled Manushya. The human being who thinks and churns through his mind is called manushya. Only such Brahmins are called manushya (human beings.) Children of Brahma, i.e. Brahmins because these are the adopted children of Prajapita Brahma. And Prajapita Brahma is praised in the scriptures as well, isn’t he? In the beginning he is pita (Father), Prajapita (Father of the subjects). He becomes the Father of the world (vishwa ka pita) in the end. Call him Lord of the world (vishwa pati). So, he has been called Prajapati in the scriptures.

Children also remember in their intellect that the drama is about to be over now. And now we have to go back. We have to go and then come as well. Then we also know that we have to first of all come in the relationship of happiness because relationship is established only for happiness. So, now the bondage of sorrows is going to finish. Everything that gives sorrows is initially satwapradhan, then while becoming rajopradhan it becomes tamopradhan. So, the relationship of happiness which was established in the Golden Age becomes rajopradhan in the Copper Age and then becomes taamsi, cause of sorrows in the Iron Age. Then it is called a bondage of sorrows. And one should also understand that even if you have understood a little that you were in the relationship (sambandh) of happiness in the Golden Age; Sambandh itself means ‘sampoorna’ (complete) and ‘bandh’ means ‘bandhan’ (bondage or chain). A bondage of complete happiness. There is no name or trace of sorrows. So, the bondage of sorrows did not exist there at all. There was just happiness.

And there was just one religion there. This is a very good introduction that is given, isn’t it? When India was in heaven, because India is an imperishable land. All other foreign religious lands, the vidharmi (heretic) religious lands, those with opposite religions, opposite countries, they all are perishable lands. They were neither existent in the beginning of the world nor will they remain in the end. India is an imperishable land because the imperishable Rudra Gyan Yagya Kund begins here.

So, there is no great, pure land like India. And when this very land of India becomes taamsi (degraded), then there will not be any religious land as great and pure as this land because this is bound to become. The more satopradhan someone becomes, the more taamsi (degraded) he becomes as well. So, the India which was greatly pure, that India and the Indians become greatly sinful. They keep on remembering only in India when they become sinful. What do they remember? O purifier of the sinful ones! Come. They do not remember in other countries. Why? It is because people of other religious lands, other countries do not become sinful, sorrowful to that extent. So, people call only in India. This word ‘patit-paavan’ (purifier of the sinful ones) does not exist anywhere else. Although people say in English – Liberator come and liberate. But they say – Come and liberate from sorrows. O establisher of the heaven! Come. Come and liberate us from sorrows. Free us. Those Englishmen know there is someone who establishes heaven and his name is also coined as liberator. The name is coined according to the acts performed. The establisher of heaven and His name.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 06 Dec 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2382-extracts-Bilingual

समय- 00.01-11.55
Time: 00.01-11.55


रात्रि क्लास चल रहा था 18.01.1966. इसी तारीख को रिवाइज़ हुआ 1967 में। तीसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी – अभी इस दुनिया में मनुष्यों के सिखाए हुए योग तो बहुत तरीके के हैं। अथाह तरीके हैं। अब इन मनुष्य गुरुओं को ये यात्रा का योग कौन सिखाए? ये रूहानी यात्रा है। रूहानी यात्रा का योग कौन सिखलाते होंगे? वो लोग तो फिलासफी, स्प्रिचुअलिस्म, ये अक्षर ही दो हैं, दूसरे। और वो स्प्रिचुअल भी इसको ही कहते हैं जिसको फिलासफी कहा जाता है। इस्प्रिट शक्ति को कहा जाता है। स्प्रिचुअल शक्ति वाले को कहा जाता है। और यहाँ है ये आध्यात्मिक ज्ञान। अधि माने अन्दर, आत्मिक माने आत्मा के अन्दर। ये आत्मा के अन्दर का ज्ञान सिवाय परमपिता परमात्मा के कौन सिखाएगा? आत्म के अन्दर तो 84 जन्मों की कहानी भरी पड़ी है।

उन दुनिया वाले फिलासाफर्स को तो मालूम ही नहीं है कि स्प्रिचुअल नॉलेज ज्ञान का सागर है। सागर नीचे होता है। धरणी माता के चारों ओर सागर ही सागर है। और सूर्य तो उससे भी ऊपर है। वो सूर्य और सितारे, चांद, वो तो आसमान के जड़ सितारे हैं। लेकिन ये जो आत्मा रूपी चैतन्य सितारे हैं, उनको नॉलेज कौन देता है? उनको कौन ज्ञान की रोशनी देता है? वो ज्ञान की रोशनी देने वाला निराकार आत्माओं का निराकार बाप है। बाप माना ही वर्सा। तो निराकार आत्माओं का निराकारी बाप कौनसा वर्सा देगा? निराकारी ज्ञान का वर्सा देगा या साकारी स्वर्ग का वर्सा देगा? निराकार होगा तो निराकार ही वर्सा देगा। निराकारी आत्माओं का बाप है, निराकारी ज्ञान का वर्सा है। जो निराकारी ज्ञान उस निराकार में सदैव ही भरा हुआ है। और वो अखूट ज्ञान का भण्डार है। जो और आत्माएं हैं, चाहे मनुष्यात्माएं ही क्यों न हों, उनको अखूट ज्ञान का भण्डार नहीं कहेंगे क्योंकि और जो आत्माएं हैं, वो जन्म-मरण के चक्र में आने वाली हैं। इसलिए पूर्व जन्म की सारी बातों को भूल जाती हैं। और ये आत्माओं का बाप निराकार कभी भी जन्म-मरण के चक्र में आने वाला नहीं है। इसलिए त्रिकालदर्शी है। भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों को जानने वाला है।

तीनों काल की जानकारी, इसी को ज्ञान की रोशनी कहा जाता है। तो ये ज्ञान की रोशनी का ज्ञान सूर्य है। वो ज्ञान सूर्य ज्ञान की रोशनी किसको देता है? जरूर कहेंगे मनुष्यात्माओं को देता होगा क्योंकि मनुष्यात्माएं मनन-चिंतन-मंथन करने वाले मनु की संतान अर्थात् ब्रह्मा की संतान। मनु की संतान को ही मनुष्य कहा जाता है। मननात् मनुष्य कहा जाता है। मनुष्य ही मनन-चिंतन-मंथन कर सकता है क्योंकि मनुष्य में मन प्रधान है। और प्राणियों में आत्मा तो है, परन्तु मन-बुद्धि की प्रधानता नहीं होती। इसलिए जिनमें मन की प्रधानता है वो मनन-चिंतन कर सकती हैं। संकल्प विकल्प कर सकती हैं। और मंथन के द्वारा सार को निकाल सकती हैं। इसलिए भारत के शास्त्रों में सागर मंथन गाया हुआ है। सागर मंथन क्यों गाया हुआ है? सूर्य का मंथन क्यों नहीं गाया हुआ है? ज्ञान की रोशनी सूर्य में होगी ना। परन्तु वो ज्ञान सूर्य तो अखूट ज्ञान का भण्डार है। उसका ज्ञान कभी खूटता ही नहीं। और मनुष्यों का ज्ञान खूट जाता है।

परन्तु मनुष्यात्माएं भी तो नंबरवार हैं रंगमंच पर। जैसे लौकिक बाप के अनेक बच्चे होते हैं। कोई पहले पैदा होता है, तो बड़ा बच्चा कहा जाता है। बाद में जन्म लेता है तो छोटा बच्चा कहा जाता है। तो ज्यादा प्यूरिटी की पावर किसमें होगी? ऐसे ही जो परमपिता शिव है जो ऐसा पिता है जो परे से परे स्टेज का रहने वाला है, जिसका कोई पिता नहीं। मनुष्य सृष्टि का कोई पिता है, जिसे शास्त्रों में प्रजापिता या प्रजापति कहा गया। परन्तु उसका भी पिता है। जिसे परमपिता कहा जाता है। उसका कोई पिता नहीं। उसको कोई वर्सा देने वाला बाप नहीं। और वो जो वर्सा देने वाला बाप है परे ते परे परमपिता, वो अपने बच्चों में से किसको ज्ञान देगा? किसको ज्ञान की रोशनी देगा? हँ? बड़े बच्चे को देता है। दुनिया की सारी परंपराएं उसी बाप से चलती हैं। इसलिए हिस्ट्री में देखा जाए तो भारत के राजाओं ने कौनसे बच्चे को वर्सा दिया राजाई का? बड़े बच्चे को दिया।

A night class dated 18.01.1966 was being narrated. It was revised on the same date in 1967. The topic being discussed in the middle of the third page was – Now there are many kinds of methods of the Yoga taught by human beings in this world. There are innumerable methods. Well, who will teach the Yoga of this journey to these human gurus? This is a spiritual journey. Who teaches the Yoga of spiritual journey? Those people use the words philosophy, spiritualism; these are just two words. And they call this only, which is called philosophy as spiritual. Power is called spirit. The one with power is called spiritual. And here this is spiritual knowledge (aadhyatmik gyaan). Adhi means inside; aatmik means within the soul. Who other than the Supreme Father Supreme Soul will teach this knowledge of within the soul? There is a story of 84 births within the soul.

Those worldly philosophers do not know at all that the ocean of knowledge has spiritual knowledge. The ocean is below. There is ocean all around the Mother Earth. And the Sun is above even that. Those Sun and stars, the Moon; they are the non-living stars of the sky. But who gives knowledge to these souls like living stars? Who gives them the light of knowledge? It is the incorporeal Father of the incorporeal souls who gives the light of knowledge. Father itself means inheritance. So, which inheritance will the incorporeal Father of the incorporeal souls give? Will He give the inheritance of incorporeal knowledge or will He give the inheritance of corporeal heaven? If He is incorporeal, then He will give incorporeal inheritance only. He is the Father of incorporeal souls; the inheritance is of incorporeal knowledge. That incorporeal knowledge is always contained in that incorporeal. And He is an inexhaustible store-house of knowledge. The other souls, be it the human souls, they will not be called an inexhaustible store-house of knowledge because other souls pass through the cycle of birth and death. This is why they forget all the topics of the past births. And this incorporeal Father of souls never passes through the cycle of birth and death. This is why He is Trikaaldarshi (knower of all the three aspects of time). He knows past, future and present, all the three aspects of time.

Information of all the three aspects of time; this itself is called the light of knowledge. So, this is the Sun of Knowledge of light of knowledge. To whom does that Sun of Knowledge give the light of knowledge? It will definitely be said that He must be giving to the human souls because the human souls are the children of Manu who thinks and churns, i.e. they are the children of Brahma. The children of Manu themselves are called manushya (human being). It is said ‘mananaat manushya’ (the one who thinks is called a human being). Only a human being can think and churn because there is dominance of mind in a human being. Other living being do have a soul, but there is no dominance of mind and intellect in them. This is why those in whom there is a dominance of mind can think and churn. They can create good or bad thoughts and can bring out the essence by churning. This is why the churning of ocean is famous in the scriptures. Why is the churning of ocean famous? Why isn’t the churning of the Sun famous? The Sun will have the light of knowledge, will He not? But that Sun of Knowledge is an inexhaustible store-house of knowledge. His knowledge never exhausts at all. The knowledge of all other human beings exhausts.

But the human souls on the stage are also numberwise. For example, there are many children of a worldly Father. The one who is born first is called the eldest child. If someone gets birth later on, he is called younger child. So, who will have more power of purity? Similarly, the Supreme Father Shiv is such a Father who lives in the farthest stage, the one who does not have any Father. There is a Father of the human world who has been called Prajapita or Prajapati in the scriptures. But he too has a Father, who is called the Supreme Father. He does not have any Father. There is no Father who gives inheritance to Him. And to whom among His children will that Father who gives inheritance, the farthest Supreme Father, give knowledge? Whom will He give the light of knowledge? Hm? He gives to the eldest child. All the traditions of the world start with that Father only. This is why if you observe the history, then to which child did the kings of India give inheritance of kingship? They gave to the eldest son.


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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 10 Dec 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2383-extracts-Bilingual

समय- 00.01-11.20
Time: 00.01-11.20


आज का प्रातः क्लास है 2.11.1966. बुधवार को रिकार्ड चला है – दूरदेश का रहने वाला आया देश पराए। मन से मन की पूछ रहा है अपना भेद छिपाए। कितने दूरदेश का रहने वाला? सूरज, चाँद, सितारों से भी पार। जिसे ब्रह्म लोक कहा जाता है। ऊँचे ते ऊँचा धाम। जहाँ इस दुनिया की सभी आत्माएं जाकरके निवास करती हैं। उन जड़-जंगम आत्माओं में से सभी के पार रहने वाला। कहाँ आया है? रावण के पराए देश में आया है। रावण का पराया देश क्या है? और आने वाले का अपना देश क्या है? अपना देश है या जिसमें आता है उसका देश है? भारत देश में आता है। परन्तु जिस भारत देश में आता है वो भारत देश भी उस बेहद आत्माओं के बाप का अपना देश नहीं रहा। उस भारत पर विदेशियों का कब्जा हो गया। ऐसे पराये रावण के देश में उस देश को ढ़ाई हज़ार वर्ष की स्वतंत्रता सच्ची देने वाला वो आत्माओं का बाप परतंत्र भारत देश में आया हुआ है। और भारतवासी हर बच्चों के मन से, दिल से मन के द्वारा पूछ रहा है कि क्या तुम्हें सच्ची स्वतंत्रता मिली? कि और ही बंधन में आ गए? विदेशियों की दासता में जकड़ गए?

वो पूछने वाला बेहद का बाप सारी सच्चाई, ज्ञान का राज़ बताते हुए भी अब तक भी अपना अता-पता पक्का-पक्का नहीं बताय रहा। इस वर्ल्ड ड्रामा का डायरेक्टर होते हुए, अब तक भी पर्दे के पीछे छिपा हुआ है। इसीलिए जो अपन को ब्राह्मण कहलाने वाले ब्रह्मा की संतान, चाहे वो बेसिक नॉलेज लेने वाले हों, चाहे एडवांस नॉलेज लेने वाले हों, सब अंसमंजस में हैं। एक भी निश्चय-अनिश्चय रूपी जन्म-मृत्यु से परे नहीं हुआ है। सबको भगवान के प्रैक्टिकल पार्ट के बारे में कुछ न कुछ अनिश्चय आता रहता है। और बहुतों का वो अनिश्चय प्रैक्टिकल रूप में देखा जाता है। ब्राह्मण बनते-बनते शूद्र बन जाते हैं। पवित्रता का विरुद तोड़ देते हैं। समझते हैं सब झूठी बातें हैं। कोई सच्चाई नहीं। ऐसी कोई दुनिया हो ही नहीं सकती जहाँ पवित्रता के आधार पर, ब्रह्मचर्य के आधार पर मानवीय जेनरेशन चलती हो। ओमशान्ति।

जब प्रदर्शनी बच्चे समझाते हैं, अभी तो जड़ प्रदर्शनी के ऊपर ही समझाना पड़ता है। कबकी बात है? ये मुरली कबकी है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) 1966 नवम्बर की मुरली है। इसलिए बोला अभी तो जड़ प्रदर्शनी के ऊपर ही समझाना पड़ता है। पड़ता है माने? मजबूरी है। कोई चैतन्य चित्र ज्ञान के आधार पर प्रत्यक्ष नहीं हुआ सन् 66 में। इसलिए जड़ प्रदर्शनी के ऊपर ही जड़ चित्रों के ऊपर ही समझाना पड़ता है। क्योंकि 66 में ही बाबा ने घोषणा कराई थी। क्या घोषणा कराई थी? कोई चैतन्य चित्रों की प्रदर्शनी के बारे में, प्रत्यक्षता के बारे में कोई घोषणा कराई थी? अरे बताओ? (किसी ने कहा – आने वाले दस वर्षों में पुरानी दुनिया का विनाश और नई दुनिया की स्थापना होने वाली है।) वो नई दुनिया की स्थापना होगी। (किसी ने कहा – लक्ष्मी-नारायण की प्रत्यक्षता के बारे में।) हाँ, तो लक्ष्मी-नारायण की प्रत्यक्षता के बारे में क्या बताया? इन लक्ष्मी-नारायण का जन्म आज से दस वर्ष कम 5000 वर्ष हुआ। तो दस वर्ष को 1966 में जोड़ दिया जाए क्योंकि तब ही 5000 वर्ष में से दस वर्ष कम गिने जाएंगे। तो 1976 आता है जब इन लक्ष्मी-नारायण का प्रत्यक्षता रूपी जन्म होता है। कि लक्ष्मी-नारायण बनने वाली आत्माएँ कौन हैं, जिनके लिए दस वर्ष की घोषणा की थी? और ये भी बताया था कि दस वर्ष में ब्राह्मणों की इस दुनिया का विघटन शुरू हो जाएगा। माना बेसिक ब्राह्मणों की दुनिया का विघटन शुरू हो जाएगा। और नई दुनिया का संगठन शुरू हो जाएगा।

Today’s Morning Class is dated 2.11.1966. The record played on Wednesday is – Door desh ka rahney vala aaya desh paraaye. Man se man kii pooch rahaa hai apna bhed chhipaaye. (The resident of the far-off country has come to an alien country. He is asking matters of the heart while hiding his identity.) The resident of a coutry how far away? Farther than the Sun, the Moon, the Stars, which is called the Brahmlok. The highest on high abode where all the souls of this world go and reside. The one who lives even beyond all those non-living things and living souls. Where has He come? He has come in the alien country of Ravan. Which is the alien country of Ravan? And which is the own country of the one who has come? Is it His own country or is it the country of the one in whom He comes? He comes in India. But the country India in which He comes, that country India is also no longer the own country of that Father of unlimited souls. The foreigners have occupied that India. In such alien country of Ravan, that Father of souls has come in the unfree country India in order to bestow true freedom of 2500 years to that country. And He is asking the mind, the heart of every Indian child through His mind that did you achieve true freedom? Or did you get bound further? Did you get bound in the slavery of foreigners?

That unlimited Father who is asking the question is not yet telling firmly about His address despite revealing the entire truth, the secret of knowledge. Despite being the director of this world drama, He is still hidden behind the curtains. This is why those who call themselves Brahmins, the children of Brahma, be it those who obtain the basic knowledge or be it those who obtain the advance knowledge, all are in confusion. Not even a single person has gone beyond the cycle of faith and doubts in the form of birth and death. Everyone keeps on getting doubts to some extent or the other about the practical part of God. And that doubt of many persons is seen in practical form. They become Shudras while becoming Brahmins. They break the vow of purity. They think that all these topics are false. There is no truth. There cannot be any such world where human generation takes place on the basis of purity, on the basis of celibacy. Om Shanti.

When children explain in the exhibition; now they have to explain only in the non-living exhibition. It is about which time? What is the date of this Murli? Hm?
(Someone said something.) It is a Murli dated November, 1966. This is why it was said – Now you have to explain in the non-living exhibition. What is meant by ‘have to’? There is a compulsion. No living picture was revealed on the basis of knowledge in 66. This is why you have to explain on the non-living pictures only in the non-living exhibition because Baba had caused a declaration in 66 itself. Which declaration did He cause? Did He cause any declaration about the exhibition of living pictures, about revelation? Arey, speak up? (Someone said – The old world is going to be destroyed and the new world is going to be established in the forthcoming ten years.) That new world will be established. (Someone said – About the revelation of Lakshmi-Narayan.) Yes, so, what was told about the revelation of Lakshmi-Narayan? These Lakshmi and Narayan were born ten years less 5000 years from this day. So, if you add ten years to 1966, because only then will ten years be counted less from among 5000 years. So, it comes to 1976 when these Lakshmi and Narayan get revelation like birth that who are the souls which are to become Lakshmi and Narayan, for whom the declaration of ten years was made? And it was also told that the disintegration of this world of Brahmins will begin in ten years. It means that the disintegration of the world of basic brahmins will start. And the gathering of the new world will begin.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 12 Dec 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
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समय- 00.01-12.50
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रात्रि क्लास चल रहा था 18.01.1966. और इसी तारीख को रिवाइज़ हुई 1967 में। तीसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी – वो दुनिया वाले फिलासफी और स्प्रिचुअलिस्म, ये अक्षर दो हैं। वो स्प्रिचुअल भी इसको कहते हैं और इसको फिलासफी भी कहा जाता है। उनको ये मालूम नहीं है कि स्प्रिचुअल नॉलेज, ज्ञान का सागर है। वो जो रूहानी नॉलेज देते हैं। तो रूहानी नॉलेज का अर्थ ही माना रूह। रूह की नॉलेज दें। क्योंकि जिस्म की नॉलेज एक जन्म से कनेक्टेड है। और जिस्म पाँच तत्वों का पुतला है। पाँच तत्वों को पंचभूत कहा जाता है। पंचभूतों की नॉलेज भौतिक नॉलेज है। और ये है रूहानी नॉलेज। जिसे कहते हैं आध्यात्मिक ज्ञान। वो इसे स्प्रिचुअल नॉलेज कह देते हैं। जबकि आध्यात्मिक अर्थ अधि माने अन्दर, आत्मिक माने आत्मा के अन्दर। अर्थात् आत्मा रूपी जो रिकार्ड है – उसके अन्दर 84 के चक्र का ज्ञान भरा हुआ है। अनेक जन्मों का ज्ञान है। आत्मा के अन्दर का ज्ञान परमपिता परमात्मा के सिवा कोई दे ही नहीं सकता। दुनियावी फिलासफर्स होते हैं। स्प्रिचुअलिस्ट होते हैं। वो इस बात को नहीं जानते। उसको कह देते हैं फिलासफी है। उसमें तो कभी कोई कहते ही नहीं हैं कि सुप्रीम रूह या कोई महात्मा बैठकरके रूहों को समझाते हैं। वो बात तो है ही नहीं।

तो उसको रूहानी नॉलेज नहीं कहा जाए। वो उनकी तो जिस्मानी नॉलेज है। भौतिकवादी नॉलेज है। मनुष्यों ने बैठकरके बनाई है। ये सारी फिलासफी की किताबें मनुष्यों ने बैठ बनाई है। और ये तो है स्प्रिचुअल नॉलेज। जो स्प्रिचुअल गॉड फादर बैठकरके अपने चिल्ड्रेन्स को समझाते हैं। ये बात किसी को मालूम नहीं है। जब तक कोई यहाँ से जाकरके उनको समझावे कि बरोबर स्प्रिचुअल नॉलेज ही गीता की नॉलेज है। और ये गीता का ज्ञान कोई फिलासफी नहीं है। यहाँ तो भगवान ने बैठकरके रूहों को समझाया है। और उस गीता में लिखा है अर्जुन को बैठकरके कृष्ण ने समझाया। अब ये दोनों नाम देखो – वो आता है और हम कहते हैं – नहीं। हमारा सुप्रीम रूह है। सो हम आत्माओं को बैठकरके पढ़ाते हैं। इसको कहा जाता है स्प्रिचुअल नॉलेज। माना रूहानी नॉलेज, जो रूहों के प्रति है। क्योंकि रूह ही पतित बनती है।

अभी ये बात तो बिचारा कोई समझते ही नहीं हैं। जब तक कोई यहाँ वाला उनको जाकरके न समझाए। और किसको अच्छे से पकड़े। ये संस्था असुल विलायत में थी। अभी फिर कोई महर्षि है कि क्या है, किसमें है, ऋषिकेश में तो धारणा है ना इन सभी सन्यासियों को, भक्तों को और महात्माओं को, फलानों को, ये समझते हैं कि हरिद्वार कोई बड़ा तीर्थ है। बाकी वास्तव में तो हरिद्वार है ही नहीं। ये हरिद्वार तो गांव का नाम है। तो वहाँ उस गांव को शेप दे दिया है। ऐसा शेप दे दिया है कि यहाँ कोई जाते हैं, स्वर्ग आश्रम जाते हैं, फिर वहाँ लक्ष्मण झूला दिखाते हैं। परन्तु है तो कुछ भी नहीं। बैठकरके नाम रखते हैं ऋषिकेश। कहते हैं यहाँ ऋषि लोग रहते थे। बाकी है तो सभी तीर्थों में टुबके मारने वाले। डुब्बक मारते हैं ना। अन्दर जाकरके सिर्फ निकाल आते हैं। बाहर निकाल लेते हैं। ये भी टुब्बी मार करके फिर से निकाल लेते हैं।

18.1.66 की वाणी का रात्रि क्लास, चौथा पेज। अब ये तो ज्ञान की बात हुई। ज्ञान जल में टुबकी मारना। आगे भक्तिमार्ग में तो सब स्नान करने जाते थे। गंगा स्नान में जाते थे। टुब्बक मारते थे। और ये काम जन्म-जन्मांतर किया होगा। अभी तो इसकी नॉलेज, वो फिलासफी कोई है ही नहीं। फिर कोई लिखा-पढ़ी करे। अपने पास जो अच्छा सर्विस में सेन्सिबुल हो, ऐसे तो कुछ कोई ने चिट्ठियां भी लिखी हैं। ये किसको चिट्ठी लिखी थी? अरे मुट्ठी वो इनको दिखलाया नहीं। दिखलावे तो सुनावें। चिट्ठी लिखा है राधाकृष्ण को। और पता नहीं दूसरा किसको, किसके ऊपर लिखा था। देखें तो सही। अगर यहाँ से दिल्ली वालों को लिखेंगे ना, तो कहाँ तक होगी। ये बिजनेस जब तलक बन्द हो तब तलक ये भी होगी। तो कल उनको चिट्ठी लिख देते हैं कि वहाँ चिट्ठी देवे। वहाँ के जो बड़े हैं, महर्षि हैं या उनके भी जो बड़े हैं। विलायत से भी बहुत आए हुए हैं।


A night class dated 18.01.1966 was being narrated and it was revised on the same date in 1967. The topic being discussed in the middle of the third page was – Those people of the world use the two words – philosophy and spiritualism. They call this also spiritual and this is called philosophy as well. They do not know that He is the ocean of knowledge, spiritual knowledge. The one who gives spiritual knowledge. So, the meaning of spiritual knowledge itself is soul. You should give the knowledge of soul because the knowledge of body is connected with one birth. And the body is an effigy of five elements. The five elements are called the ‘panchbhoot’. The knowledge of the five elements is physical knowledge. And this is spiritual knowledge which is called aadhyatmik gyaan. They call it spiritual knowledge whereas aadhyatmik means ‘adhi’ means ‘inside’, ‘aatmik’ means ‘within the soul’, i.e. the knowledge of the cycle of 84 is recorded within the record-like soul. There is knowledge of many births. Nobody except the Supreme Father Supreme Soul can give the knowledge of within the soul. There are worldly philosophers. There are spiritualists. They do not know this topic. They call it philosophy. In that nobody ever says that the Supreme Soul or any Mahatma (great soul) is sitting and explaining to the souls. That topic does not exist at all.

So, that will not be called spiritual knowledge. Theirs is physical knowledge. It is materialistic knowledge. Human beings sat and prepared it. Human beings sat and prepared all these books of philosophy. And this is spiritual knowledge which the spiritual God Father sits and explains to His childrens. Nobody knows about this topic until someone goes from here and explains to them that definitely spiritual knowledge itself is the knowledge of Gita. And this knowledge of the Gita is not philosophy. Here God sat and explained to the souls. And it has been written in that Gita that Krishna sat and explained to Arjun. Well, look at both these names – He comes and we say – No. He is our Supreme Soul. So, He sits and explains to us souls. This is called spiritual knowledge, i.e. roohani knowledge, which is for the souls (rooh) because it is the souls only which become sinful.

Now nobody understands this topic until someone from here goes and explains to them and catches hold of someone nicely. This organization was actually in the foreign country. Now it is some Maharshi or someone; there is a belief in Rishikesh that all these Sanyasis, the devotees and Mahatmas, such and such persons think that Haridwar is a big pilgrimage center. Actually there is no Haridwar as such. This Haridwar is the name of a village. So, there that village has been given a shape. It has been given such a shape that someone goes there, goes to the Swarg Ashram; and then they depict a Lakshman jhoola (swing) there. But it is nothing. They sit and name it Rishikesh. They say that sages (rishis) used to live here. In all the pilgrimage centers (teerth) there are people who take a dip [in rivers or lakes]. They take a dip, don’t they? They go inside [under the water] and come out. They take themselves out. They also take a dip and then take themselves out.

Night class of Vani dated 18.1.1966; fourth page. Well, this is a topic of knowledge. To take a dip in the water of knowledge. Earlier everyone used to go to bathe on the path of Bhakti. You used to go to bathe in the Ganges. You used to take a dip. And you must have performed this task birth by birth. Well, they do not have any knowledge, or philosophy about it. Then someone should write about it. The one who is very sensible in service among us; someone has also written some letters. They have written a letter to (the then President of India) Radhakrishna. And we don’t know another letter was written to someone else on some other topic. Let us see. How far will it be viable if we write to those [VIPs] residing in Delhi from here. This will continue until this business continues. So, tomorrow we write a letter to them that they should give the letter there. The big ones there, the Maharshis or whoever is big among them. Many have come from the foreign countries as well.


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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Dec 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
VCD-2385-extracts-Bilingual

समय- 00.01-12.05
Time: 00.01-12.05


प्रातः क्लास चल रहा था 10.11.1966. दसवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – ये है बेहद का दिन और बेहद की रात। वो बारह घंटे का हद का दिन और बाहर घंटे का हद का रात नहीं है। बेहद ब्रह्मा का दिन आधा कल्प और बेहद ब्रह्मा की रात आधा कल्प। इसके लिए बाप कहते हैं मैं कल्प के संगमयुगे आता हूँ। कौनसा बाप कहते हैं? बेहद के दो बाप हैं। एक आत्माओं का बाप और एक मनुष्यों का बाप। सारी मनुष्य सृष्टि का बीज। तो कौन कहते हैं कि मैं कल्प के संगमयुगे आता हूँ? हँ? शिव बाप कहते हैं कि मैं कल्प-कल्प के संगमयुगे आता हूँ। युगे-युगे नहीं आता हूँ। हर बारह-साढे बारह सौ वर्षों का जो युग होता है, चाहे सतयुग, त्रेता, चाहे द्वापर, चाहे कलियुग, कोई भी दो युगों के बीच मैं नहीं आता हूँ। जब चारों युग सम्पूर्ण बनते हैं, चारों युगों की आयु बीत जाती है, तब कल्प के संगमयुगे आता हूँ। जब अंधियारा पूरा होता है, अज्ञान की रात पूरी होती है, बेहद अज्ञान की रात और बेहद का दिन होता है सतयुग। दोनों के संगम में आता हूँ।

ऐसे नहीं कि सतयुग पूरा हुआ और त्रेतायुग आया, तो दोनों युगों के बीच में मैं कोई 14 कला सम्पूर्ण राम बनके आता हूँ। नहीं। न त्रेतायुग पूरा होता है, और द्वापर शुरू होता है, इन दो युगों के बीच में भी नहीं आता हूँ क्योंकि द्वापर है द्वैतवादी युग। दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो भाषाएं, दो-दो मतें, दो-दो कुल। तो जहाँ द्वैतवाद शुरू होता है, तो शुरुआत में तो सात्विक होगा ना। तब भी नहीं आता हूँ। और जब द्वापर का अंत होता है चौथी अवस्था से द्वापर पास होता है, तब भी कोई कृष्ण भगवान बनकर नहीं आता हूँ कि द्वापर के अंत में आकरके कलियुग पापी युग की स्थापना करूंगा।

भगवान के लिए तो दूसरे धर्म वाले भी कहते हैं – हेविनली गॉड फादर। हेविन अर्थात् स्वर्ग की स्थापना करने वाला फादर। जो और-और धरमपिताएं हैं – इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट – ये कोई स्वर्ग स्थापन नहीं करते हैं, न स्वस्थिति में रहते हैं। ये तो देहभान में रहते हैं। तो देहभान से तो पाँच विकार पैदा होते हैं। तो विकारी युग की वृद्धि करेंगे वो देहधारी धरमपिताएं या निर्विकारी देवताओं की दुनिया बनाएंगे? तो मैं चौथा युग तमोप्रधान कलाहीनता का युग जब पूरा होता है, घोर अज्ञान अंधकार की रात्रि फैल जाती है, कोई को पता नहीं रहता कि मैं कौन, मेरा बेहद का बाप कौन, जो बाप बेहद सुख-शान्ति का वर्सा देने वाला है, ऐसा अज्ञान अंधकार जब सारी दुनिया में, कलियुग के अंत में फैल जाता है, तब मैं आता हूँ।

और मेरी कोई वो जनमपत्री भी नहीं है तिथि-तारीख की जो कोई जनमपत्री निकाल सके। तिथि-तारीख, फलानी तारीख में आया, वो भी नहीं। क्योंकि मैं कब आता हूँ, कब जाता हूँ, कोई को पता ही नहीं पड़ता। इस ब्रह्मा को भी पता नहीं पड़ता है। जिसके द्वारा वेदवाणी, ज्ञान की वाणी सुनाता हूँ। इनमें कब प्रवेश किया? इनको भी नहीं मालूम पड़ता। या ब्रह्मा नामधारी जो भी हैं क्योंकि जिसमें भी प्रवेश करता हूँ, उसका नाम ब्रह्मा रखता हूँ। तो इन ब्रह्मा नामधारियों को, कोई को पता नहीं पड़ता कि मैं कब आता हूँ। चाहे ज्ञान सुनने-सुनाने के लिए आता हूँ, चाहे बुद्धि से समझने-समझाने के लिए आता हूँ। और चाहे प्रैक्टिकल करम में ज्ञान की अनुभूति कराने आता हूँ। संस्कारों का परिवर्तन कराने आता हूँ। तो इनमें से कोई को पता नहीं पड़ता।


A morning class dated 10.11.1966 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the tenth page was - This is an unlimited day and an unlimited night. It is not that limited day of twelve hours and limited night of twelve hours. Unlimited day of Brahma for half a Kalpa and unlimited night of Brahma for half a Kalpa. For this the Father says - I come in the Confluence Age of every Kalpa. Which Father says? There are two unlimited Fathers. One is the Father of souls and one is the Father of human beings. The seed of the entire human world. So, who says that I come in the Confluence Age of every Kalpa? Hm? The Father Shiv says - I come in the Confluence Age of every Kalpa. I do not come in every Age. I do not come in between every Age of 1250 years, be it the Golden Age, Silver Age, be it the Copper Age or the Iron Age, I do not come in between any two Ages. When all the four Ages are completed, when the duration of all the four Ages is over, then I come in the Confluence Age of the Kalpa. When the darkness is over, when the night of ignorance, the unlimited night of ignorance is over, and when the unlimited day, i.e. the Golden Age starts, then I come in the Confluence of both [the Ages].

It is not as if when the Golden Age is over and when the Silver Age starts, then I come in between both the Ages as the Ram who is perfect in 14 celestial degrees. No. Neither do I come when the Silver Age ends and the Copper Age begins, i.e. in the middle of these two Ages because the Copper Age (Dwapar) is a dualistic (dwaitwaadi) Age. Two religions, two kingdoms, two languages, two opinions, two clans. So, the time when dualism begins, then it will be pure in the beginning, will it not be? I do not come at that time as well. And when the Copper Age ends, when the Copper Age passes through the fourth stage, at that time also I do not come as God Krishna that I will come and establish the Iron Age, the sinful Age at the end of the Copper Age.

People of the other religions also say for God – Heavenly God Father. The Father who establishes heaven, i.e. swarg. The other founders of religions – Ibrahim, Buddha, Christ – they neither establish heaven (swarg) nor do they remain in the stage of the soul (swasthiti). They remain in body consciousness. So, five vices are born from body consciousness. So, will they, the bodily founders of religions increase the vicious Age or will they establish a world of viceless deities? So, when the fourth Age, the degraded Age devoid of celestial degrees ends, when the night of complete darkness spreads, when nobody knows that who am I, who is my unlimited Father who gives unlimited inheritance of happiness and peace, when such darkness of ignorance spreads in the entire world in the end of the Iron Age, then I come.

And I do not have that horoscope (janampatri) with day and date so that someone could get the horoscope that He came on a particular day and date, on a particular date, not even that because nobody can get to know when I come and when I depart. This Brahma through whom I narrate Vedvani, the speech of knowledge also does not get to know. When did I enter in this one? This one also does not get to know. Or all those who assume the name of Brahma because in whomsoever I enter I name him/her as Brahma. So, none of all these who assume the name of Brahma gets to know when I come, whether I come to listen and narrate knowledge and whether I come to understand and explain through the intellect. And whether I come to cause the experience of knowledge in practical actions. I come to transform the sanskars. So, none of them gets to know.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 Dec 2017

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2386-extracts-Bilingual

समय- 00.01-12.05
Time: 00.01-12.05


प्रातः क्लास चल रहा था 10.11.1966. गुरुवार को ग्यारहवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – तुम बच्चे भारतवासी हो ना। भारतवासी अर्थात् भा माने ज्ञान की रोशनी, रत माने रहने वाला। जो सदा ज्ञान की रोशनी में रहने वाला है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, आदि से लेकर अंत तक। अज्ञान की रोशनी में रहने वाला नहीं है। बताओ वो कौन है? जोर से बोलो। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) एक शिवबाबा। जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदा कायम है। कौन बताया? शिवबाबा। शिव बाप या शिवबाबा? शिव बाप इसलिए नहीं कहेंगे कि वो हम ज्योतिबिन्दु, बिन्दु-बिन्दु अणुरूप आत्माओं का बाप है। उसका कोई दूसरा संबंध नहीं है। हम आत्मा रूपी बच्चे आपस में भाई-भाई और वो ज्योतिबिन्दु शिव हमारा बाप। बाबा नहीं। बाबा आदि दूसरे संबंध तब बनते हैं, जब गीता के अनुसार प्रवेष्टुम्, मैं प्रवेश करता हूँ। जिसे दिव्य जन्म कहा जाता है। भूत-प्रेतों के अनुसार प्रवेश नहीं करता हूँ।

मेरा दिव्य जन्म गाया हुआ है क्योंकि मैं कब आता हूँ और कब जाता हूँ, पता ही नहीं चलता। भूत-प्रेतों का तो पता चल जाता है। कब आए, कब चले गए। मेरा पता नहीं चलता। हाँ, बाद में पता चलता है, जिसमें प्रवेश करता हूँ, उसको अनुभव होता है कि ये बात तो मेरे दिमाग में कभी आई नहीं थी जो बाबा ने अभी सुनाई, नई बात बताई है। क्योंकि बाबा, जिसे बाबा कहा। किसने कहा होगा बाबा? हँ? एक ही आत्मा है मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर जिसकी बुद्धि में बाबा अक्षर आता है, शब्द आता है तो बिन्दी ही उसकी बुद्धि में आती है। बाकी अन्य आत्माओं की बुद्धि में अंतकाल तक बिन्दी नहीं रहती। महामृत्यु भी भले आ जाए, तो भी अंत काल में सभी मनुष्यात्माओं की बुद्धि में क्या आता है? हँ? शिवबाबा आता है या शिव बाप आता है?
(सबने कहा – शिवबाबा।) शिवबाबा आता है। परन्तु शिवबाबा कहने से उनकी बुद्धि में साकार और निराकार का मेल आता है। इसलिए तुलसीदास ने भी लिख दिया – सगुणहि अगुणहि नहीं कछु भेदा। उभय हरै भव संभव खेदा। सगुण में और निर्गुण में, साकार में और निराकार में कोई भेद नहीं है। दोनों ही इस संसार के दुःख दर्द को हरने वाले हैं। तो वो निराकार आत्माओं का बाप शिव ज्योतिबिन्दु उस गीता में कहा है – अणोणीयांशंमनुस्मरेत। वो अणु से अणु स्मरण किया जाता है, वो ईश्वर, सूक्ष्म से सूक्ष्म है। इतना सूक्ष्म बुद्धि से कि उस बुद्धि रूपी आत्मा को कोई क्रास ही नहीं कर सकता।

जैसे गीता में कहा है – इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल हैं। इन्द्रयों से मन प्रबल है। जिसे मन रूपी घोड़ा कहो, मन रूपी बैल कहो बड़ा प्रबल है। मनसस्तु पराबुद्धिः। मन से भी परे बुद्धि है मनुष्यों की नम्बरवार। और जो बुद्धिमान मनुष्य है बुद्धिमानों की भी बुद्धि वो ही शिव है। क्योंकि सबसे जास्ती सूक्ष्म है। वो सूक्ष्मातिसूक्ष्म इस सृष्टि पर जब आता है परमधाम छोड़करके, जिस धाम से परे कोई धाम है ही नहीं, दुःखधाम से परे सुखधाम, और सुखधाम से भी परे शान्तिधाम जिसे अंग्रेज लोग कहते हैं सोल वर्ल्ड। सुप्रीम अबोड। मुसलमानों में कहा जाता है अर्श। पहले मुसलमान भी कहते थे – खुदा अर्श में रहने वाला है, फर्श का रहने वाला नहीं है। अभी तो सबकी बुद्धि में आ गया है – वो खुदा ज़र्रे-ज़र्रे में है। जैसे हिन्दू लोग समझते हैं कि भगवान सर्वव्यापी है। अरे गीता क्या कहती है? मेरा धाम कौनसा है? मैं कहाँ का रहने वाला हूँ? गीता कहती है – न तदभासयते सूर्यो। न वहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँचता है। न शशांको। न चन्द्रमा का प्रकाश पहुँचता है। अग्नि का भी प्रकाश नहीं पहुँचता। और सूरज, चाँद, सितारों और अग्नि के प्रकाश से भी परे जो धाम है जहाँ जाकरके मनुष्यात्माएँ या कोई भी प्राणी मात्र महामृत्यु के समय अपने-अपने शरीर छोड़करके जब जाते हैं जिसे लोगों ने कह दिया है प्रलयकाल। वहाँ जाकरके कोई वापस इस दुःख की दुनिया में नहीं आते। मैं वहाँ का रहने वाला हूँ।

यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद् धाम परमम् मम। अच्छा! इस दुःखी कलियुगी दुनिया में लौट कर नहीं आते हैं तो कहाँ जाते हैं? अरे भगवान इस सृष्टि पर किसी मुकर्रर रथधारी में, बुद्धिमान नर अर्जुन में, जो गीता में गाया हुआ है – बुद्धिमानों में बुद्धिमान मनुष्य अर्जुन है। जिसके तन का आधार स्वयं परमपिता परमात्मा शिव लेते हैं। परन्तु वो भी मनुष्य है, मनन-चिंतन-मंथन करने वाला मनुष्य जिसे मनु की औलाद कहा जाता है, वो नर अर्जुन जन्म-मरण के चक्र में आने वाली आत्मा है। जैसे इस दुनिया की सभी आत्माएं, सभी प्राणी मात्र, सभी 500-700 करोड़ मनुष्य मात्र जनम-मरण के चक्र में आने वाले हैं। इसलिए पूर्वजन्म की बातें सब भूल जाते हैं। कोई भी त्रिकालदर्शी नहीं। एक ही शिव परमपिता परमात्मा है जो कभी जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता। गर्भ से जन्म नहीं लेता। इसलिए वो तीनों काल का ज्ञाता है। भूत-भविष्य-वर्तमान, सारे सृष्टि चक्र का ज्ञान उसमें भरा हुआ है। इसलिए कहा जाता है गॉड इज़ ट्रुथ, ट्रुथ इज़ गॉड। उसमें सत्य का ज्ञान है। हम भी कहते आए सत्यम् शिवम् सुन्दरम्।


A morning class dated 10.11.1966 was being narrated. On Thursday, the topic being discussed in the end of the middle portion of the eleventh page was – You children are the residents of India (Bhaaratwaasis), aren’t you? Bhaaratwasi means ‘bha’, i.e. light of knowledge, ‘rat’ means ‘the one who remains engaged’. The one who remains engaged in the light of knowledge on this world stage from the beginning to the end. He does not remain in the light of ignorance. Tell, who is he? Speak up loudly. Hm? (Someone said something.) One ShivBaba. The one who remains permanently on this world stage. Who is it said to be? ShivBaba. Father Shiv or ShivBaba? It will not be said Father Shiv because He is the Father of us point of light, point like, atom-like souls. There is no other relationship. We soul like children are brothers and that point of light Shiv is our Father. He is not Baba. Other relations like Baba, etc. are formed when as per the Gita I enter which is called divine birth. He does not enter like the ghosts and devils.

My divine birth is famous because you cannot know at all as to when I come and when I go. You can know about the [arrival or exit] of ghosts and devils. When they came and when they left. You cannot know about Me. Yes, later on you get to know; the one in whom I enter feels that this topic which Baba narrated just now, never occurred in my intellect. It was a new topic because Baba, who was called Baba. Who must have called Baba? Hm? There is only one soul on this human world stage that when the word ‘Baba’ comes in his intellect, then only a point (bindi) comes in his intellect. The point does not remain in the intellect of other souls till the end. Even if mahamrityu (large scale death) occurs, yet what comes in the intellect of all the human souls in the end? Hm? Does ShivBaba come in their intellect or does Father Shiv comes?
(Everyone said – ShivBaba.) ShivBaba comes. But on uttering ‘ShivBaba’ the combination of corporeal and incorporeal comes in their intellect. This is why Tulsidas also wrote – “Sagunahi agunahi nahi kachu bheda. Ubhay harai bhav sambhav kheda.” There is no difference between sagun and nirgun, i.e. corporeal and incorporeal. Both relieve this world of sorrows and pains. So, that Father of incorporeal souls, the point of light Shiv has said in that Gita – Anoneeyaamshamanusmaret. He is remembered as the one minuter than an atom; That God is the subtlest one. He is so subtle through His intellect that nobody can cross that intellect like soul at all.

For example, it has been said in the Gita that the organs are very strong. The mind is stronger than the organs. Call it the horse-like mind, call it the bull-like mind, it is very strong. Manasastu paraabuddhih. Intellect (buddhi) of the human beings is numberwise beyond the mind (man) as well. And the one who is an intelligent human being; the intellect of those intelligent ones is also the same Shiv because He is the subtlest one. When that subtlest one comes in this world by leaving the Supreme Abode; there is no abode farther than that abode; the abode of happiness is beyond the abode of sorrows; the abode of peace is beyond the abode of happiness as well which the Englishmen call the Soul World. The supreme abode. It is called among the Muslims as Arsh. Earlier the Muslims also used to say – Khuda (Allah or God) lives in Arsh (a place beyond the skies); He does not reside on farsh (floor or land). Now it has entered into everyone’s intellect that Khuda is in every particle (Khuda zarre-zarre me hai.). For example, Hindus think that God is omnipresent. Arey, what does the Gita say? Which is My Abode? I am a resident of which place? The Gita says – Na tadbhaasayate Suryo. Neither does the light of the Sun reach there. Na shashaanko. Nor does the light of the Moon reach there. The light of the fire also does not reach there. And the abode which is beyond the light of the Sun, the Moon and the stars, where all the human souls or any living beings reach after leaving their bodies at the time of Mahamrityu (large-scale deaths), which has been termed by the people as the period of inundation (pralaykaal). After reaching that place nobody comes back to this world of sorrows. I am a resident of that place.

Yad gatwa na nivartante tad dhaam paramam mam. Achcha! If they do not come back to this sorrowful, Iron Age world, then where do they go? Arey, God in this world in a permanent charioteer, in the intelligent man Arjun, who is praised in the Gita – the most intelligent human being among the intelligent ones is Arjun. The Supreme Father Supreme Soul Himself takes the support of his body. But he is also a human being, the human being who thinks and churns, the one who is called the child of Manu, that man Arjun is a soul which passes through the cycle of birth and death. Just as all the souls, all the living beings of this world, all the 500-700 crore human beings pass through the cycle of birth and death. This is why they forget all the topics of the past birth. Nobody is Trikaaldarshi (knower of all the three aspects of time). It is the Supreme Father Supreme Soul Shiv alone who never passes through the cycle of birth and death. He does not get birth through a womb. This is why He is the knower of all the three aspects of time. The knowledge of past, present and future and the entire world cycle is recorded in Him. This is why it is said that God is truth, truth is God. He contains the knowledge of truth. We too have been saying – Satyam Shivam Sundaram (true, benevolent and beautiful).

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