Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 18 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
VCD-2409-extracts-Bilingual
Part-9

समय- 02.27.21-02.40.24
Time: 02.27.21-02.40.24


माया का राज्य इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आधा समय चलता है और ईश्वर का राज्य भी आधा समय चलता है। ईश्वर जो राज्य स्थापन करता है वो सुख की दुनिया, स्वर्ग का राज्य स्थापन करता है जिसकी मान्यता मुसलमानों में भी है, जन्नत कहते हैं। और क्रिश्चियन्स में भी है, हैविन कहते हैं। नाम भी देते हैं हैविनली गॉड फादर। देहधारी मनुष्य गुरु चाहे वो इस्लामी हों, मुसलमान हों, क्रिश्चियन हों, रशियन्स हों नास्तिक, वो सब देहअभिमानी सांढ़े हैं। उनका विनाश होना है। स्थापना किसकी होनी है? हँ? स्थापनाकारियों का स्थापना होनी है। और विनाश करना भी त्रिमूर्ति शिव का काम है। शिव का ही काम है ना। तीन देवताओं के द्वारा कार्य कराता है ना। तो विनाश का कार्य नहीं होगा। पुरानी दुनिया, पुराना मकान गिरेगा नहीं तो नया मकान बन जाएगा क्या? बन ही नहीं सकता। तो बताया – इन महाराष्ट्र वालों को, बॉम्बे वालों को, आंध्रा वालों को, जो अंधरे हैं, उनको। इनको कहा जाता है महाराष्ट्र वाले, बॉम्बे वाले, आंध्रा वाले, तेलंगाना वाले।

बापदादा भी बच्चों को देखरके खुश है। हँ? किसको देखकरके खुश है? हँ? बच्चों को देखकरके खुश है। कौनसे बच्चों को देखकर खुश है? हँ? बापदादा कौनसे वंश के बच्चों को सामने देख रहा है? किसको देखकरके खुश है? सूर्यवंशी बच्चों को देखकर खुश है। क्योंकि जो सूर्यवंशी बच्चे हैं उनमें ही आधे हैं विनाशकारी, जो ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में सन् 76 के बाद से लेकरके अब तक आ रहे हैं। और उनमें ही स्थापनाकारी हैं। आधे स्थापनाकारी और आधे विनाशकारी। उन बच्चों को देखरके खुश है कि जो बाप ने सेवा दी है वो सेवा तो करने वाले हैं। और हरेक बच्चा पुरुषार्थ करके अपना या बाप का नाम प्रसिद्ध कर रहे हैं। क्या? नाम किस आधार पर प्रसिद्ध होता है? नाम होता ही है काम के आधार पर। क्या? जैसे नाम है राम। रम्यते योगिनो यस्मिन इति राम। जो योगियों के दिल में रमण करता रहता है। योगी लोग जिसको याद करके बड़े प्रसन्न, खुश होते रहते हैं। उसको कहते हैं राम। माने हीरो पार्टधारी विश्वपिता। आदम। वो सूर्यवंशी बच्चे मनुष्य सृष्टि का बाप, चाहे वो आत्मा बनते हैं या देहभान में रहते हैं, वो तो सारी दुनिया के लिए प्रसिद्ध है ही क्योंकि सारी दुनिया निराकार को मानती है। चाहे स्वदेशी हो, चाहे विदेशी हो। स्वधर्मी हो, विधर्मी हो। लेकिन ये बच्चे महाराष्ट्र, आंध्रा वाले, ये ऐसे बच्चे हैं, जो बाप का नाम प्रसिद्ध कर रहे हैं। ऐसी सेवा कर रहे हैं।

तो निर्वैर भाई ने पूछा – एक बात और पूछनी है। क्या बात? सभी ब्राह्मणों को मिलकर कौनसा एक संकल्प करना चाहिए? सभी ब्राह्मणों को मिलकरके वर्तमान समय के अनुसार कौनसा एक संकल्प इकट्ठा करना चाहिए? बापदादा ने बोला – ये तो अधिकार है आपका। इसलिए इस अधिकार को प्रेज़ेन्ट करने के लिए बाप देख रहा था। कौन-कौन क्या, कहाँ तक पहुँचे हैं? एक संकल्प में टिकने के लिए, इकट्ठा एक संकल्प करने के लिए कौन-कौन हैं, कौनसे नंबर वाले धर्म के हैं? कौन-कौन धर्मों में कनवर्ट होने वाले हैं, द्वैतवादी द्वापरयुग से? जबसे दूसरे-दूसरे धर्मवाले आते हैं, दूसरे-दूसरे राज्य स्थापन करते हैं, दूसरी-दूसरी मतें फैलाते हैं, दूसरे-दूसरे क्रियाकर्म करना शुरू कर देते हैं, तो कौन-कौन बच्चे हैं? और वो क्या हैं? सूर्यवंशी हैं, चन्द्रवंशी हैं, इस्लामवंशी हैं, बौद्धीवंशी हैं, क्रिश्चियनवंशी हैं, उनके फॉलोअर्स हैं, माने उन धर्मपिताओं के बाद में इस सृष्टि पर, रंगमंच पर पार्ट बजाने वाले हैं या सतयुग, त्रेता सूर्यवंश, चन्द्रवंश से आए हुए भारतवासी दूसरे धर्मों में कनवर्ट होने वाले बच्चे हैं। क्या हैं? और वो सब कहाँ तक पहुँचे हैं बाप के नज़दीक? सबकी पुरुषार्थ की दौड़ एक जैसी होगी या नंबरवार होगी? नंबरवार ही होगी।

तो बताया कहाँ तक पहुँचे हैं? पहुँचे हैं। बाकी पुरुषार्थ अच्छा किया है। किसने अच्छा किया है? जो बाप के सामने बच्चे बैठे हुए हैं, उनके लिए कहा। तो निर्वैर भाई ने कहा – आगे? आगे फिर विजय ही है। अच्छा पुरुषार्थ किया है तो विजय जरूर है। इसलिए बाबा ने देखा तो अभी ऐसा पुरुषार्थ किया है। तो बाबा ने भी देखा कि लास्ट तक सभी लक्ष्य जो रखा है – कौनसे लास्ट तक? दुनिया का संपूर्ण विनाश होने तक। महाविनाश। सामान्य विनाश तो दुनिया में होता ही रहता है। लेकिन आखरी विनाश जिसके बाद फिर ढ़ाई हज़ार वर्ष तक कोई भी विनाश नहीं होगा। तो लास्ट तक सभी ने लक्ष्य जो रखा है वह प्रैक्टिकल में करके दिखाएंगे। चाहे वो विनाशकारी बम्बई, कलकत्ता वाले हों और चाहे वो स्थापनाकारी नॉर्थ इंडिया के दिल्ली वाले हों। करके ही दिखाएंगे। यही सभी को उमंग है। और इस उमंग से ये ग्रुप आगे बढ़ता जाता है। कौनसा ग्रुप? बताया। कौनसा ग्रुप? हँ? कौनसा ग्रुप आगे बढ़ता जाता है? आंध्रा और? अरे? महाराष्ट्र। और बम्बई। तेलंगाना को भी तो नाम लिया। हँ? जिन के आँगन में तेल बहुत है। तेल को ही रिफाइन करना पड़ता है। रिफाइन नहीं करेंगे तो बहुत नुकसान करेगा। तो घी को रिफाइन नहीं करना पड़ता है।

तो उन गउओं का घृत भारत में प्रसिद्ध है। ये ह्यूमन गउएं हैं। भक्तिमार्ग की जानवर गउएं नहीं हैं। तो उन ह्यूमन गउओं का जो भी खासकरके भारतीय गउएं हैं; हँ? उनकी बात बताई। आंध्रा वाली गउएं। क्योंकि उन गउओं के पीछे पुराणों में, शास्त्रों में बच्चाबुद्धि कृष्ण को दिखाया जाता है। हँ? तो बच्चों की बुद्धि को क्या कहेंगे? समझदार, राज़दार या राज़ को न जानने वाले? राजविद्या, राजगुह्यम गीता में गाया हुआ है ना। कि राज़ को नहीं समझने वाले हैं?

तो बताया ये अंधे जरूर हैं लेकिन लंगड़े से एग्रीमेन्ट किया हुआ है। दिल के अन्दर है कि ये एग्रीमेन्ट प्रैक्टिकल में आएगा। लंगड़े कौन हैं? जो रुद्र माला के मणके हैं वो हैं रुद्र के बच्चे। विकराल रूप धारण करने वाले बच्चे। उन बच्चों की शिफ्थ है कि वो लूले लंगड़े हैं। क्या? किस बात में लूले-लंगड़े हैं? दौड़ में। दौड़ लगाते हैं पुरुषार्थ की। तो लंगड़े होने के कारण बीच-बीच में माया उन लंगड़चंदों को नीचे गिराय देती है। और जो अंधरे हैं उनकी टांगें तो सही सलामत हैं, सभी इन्द्रियाँ सही सलामत हैं। क्योंकि जन्म-जन्मांतर के ऐसा कर्म किए हैं इन्द्रियों से कि पाप कर्म नहीं किये हैं ज्यादा। नंबरवार तो हैं। अपवित्रता नहीं धारण की है। व्यभिचारी नहीं बने हैं। क्या? तो व्यभिचारी न बनने के कारण जन्म-जन्मांतर उनके लिए सुप्रीम सोल जो एवर प्योर है, उसके संस्कार धारण किये हैं, इसलिए वो अंधरों का ग्रुप जिस आँध्र प्रदेश में यादगार में आज भी हर कन्या-माता का नाम लक्ष्मी कहा जाता है, वो ग्रुप आगे बढ़ता जाता है।

The kingdom of Maya continues on this world stage for half the time and God’s kingdom also continues for half the time. The kingdom that God establishes is a world of happiness, a kingdom of heaven which is believed by the Muslims also, and they call it Jannat. And it is believed among the Christians also; they call it heaven. They also coin a name heavenly God Father. The bodily human gurus, be it the Islamic people, be it the Muslims, be it the Christians, be it the Russians, the atheists, all of them are body conscious bulls. They are going to be destroyed. Who are going to be established? Hm? The establishers are going to be established. And the task of destruction is also of Trimurti Shiv. It is the task of Shiv only, isn’t it? He gets the tasks performed through three deities, doesn’t He? So, will not the task of destruction take place? If the old world, old house doesn’t fall, then will the new house get constructed? It cannot be built at all. So, it was told – to those from Maharashtra, those from Bombay, those from Andhra, who are blind (andhrey). They are called those from Maharashtra, those from Bombay, those from Andhra, those from Telangana.

BapDada is also happy on seeing the children. Hm? He is happy on seeing whom? Hm? He is happy on seeing the children. He is happy on seeing which children? Hm? BapDada is seeing children of which dynasty in front of Him? He is pleased to see whom? He is pleased on seeing Suryavanshi children because among the Suryavanshi children half are destructive, who have been coming in the Confluence Age world of Brahmins from 76 till now. And among them only are the ones who cause establishment also. Half cause establishment and half cause destruction. He is happy on seeing those children that they do the service that the Father has assigned to them. And every child is making purusharth and making himself or the Father famous. What? On what basis does anyone’s name become famous? Fame is based only on the task performed. What? For example, the name is Ram. Ramyate yogino yasmin iti Ram. The one who keeps on roaming in the hearts of Yogis. The one whom the yogis remember and feel very happy. He is called Ram. It means the hero actor, the Father of the world. Aadam. Those Suryavanshi children, the Father of the human world, whether they become souls or remain in body consciousness, He is famous for the entire world because the entire world believes in the incorporeal. Be it the swadeshis, be it the videshis. Be it the swadharmis, be it the vidharmis. But these children belonging to Maharashtra, Andhra are such children who are making the Father famous. They are doing such service.

So, Nirwair Bhai asked – I have to ask one more thing. Which topic? All the Brahmins should collectively make which one thought? All the Brahmins should collectively create which one thought as per the present time? BapDada said – This is your right. This is why the Father was observing to present this right. Who all have reached to which stage? In order to become constant in one thought, in order to create a collective thought who all are present; and they belong to which number religion? They are going to convert to which all religions from the dualistic Copper Age? Ever since the people belonging to the other religions come and establish other kingdoms, spread other opinions, start following other rituals; so, who all are the children present? And what are they? Are they Suryavanshis, are they Chandravanshis, are they Islamvanshis, are they Bauddhivanshis, are they Christianvanshis, are they their followers, i.e. whether they play their part on the stage in this world after those founders of religions or are they the Indians, the children who have come from the Golden Age, Silver Age, Sun dynasty, Moon dynasty and have converted to other religions. What are they? And to what extent have they reached close to the Father? Will the race of purusharth be alike for all of them or will it be numberwise? It will be numberwise only.

So, it was told - To what extent have you reached? You have reached. You have made good purusharth. Who has made good [purusharth]? It was said for the children who are sitting in front of the Father. So, Nirwair Bhai said - Further? Further there is victory alone. When you have made good purusharth, then victory is sure. This is why Baba observed - You have made such purusharth now. So, Baba has also observed that the aim that everyone has set till the last - till which 'last'? Till the complete destruction of the world. Mega destruction. Ordinary destruction keeps on taking place in the world. But the last destruction, after which there will not be any destruction for two thousand five hundred years. So, the aim that everyone has set till the last will be shown in practical. Be it the destructive Bombay, be it those from Calcutta and be it those from north India, from Delhi, who cause establishment. We will definitely do and show. Everyone has this enthusiasm. And this group keeps on progressing with this enthusiasm. Which group? It was told. Which group? Hm? Which group is progressing? Andhra and? Arey? Maharashtra. And Bombay. The name of Telangana was also mentioned. Hm? Those whose courtyard contains a lot of oil. Oil itself has to be refined. If it is not refined then it will cause a lot of harm. So, ghee need not be refined.

So, the ghrit (clarified butter) of those cows is very famous in India. These are human cows. They are not the animal cows of the path of Bhakti. So, in case of those human cows, especially the Indian cows; hm? It was mentioned about them. The cows from Andhra because Krishna with a child-like intellect is shown behind those cows in the Puranas, in the scriptures. Hm? So, what will be the intellect of children called? Intelligent, raazdaar (the one who keeps secrets) or the one who does not understand the secret? It is sung in the Gita - Rajvidya, raajguhyam, is not it? Or don't they understand the secret?

So, it was told that they are definitely blind, but they have entered into an agreement with the lame. The heart knows that this agreement will come in practical. Who are lame? Those who are the beads of the Rudramala are the children of Rudra. The children who assume a fierce form. There is a specialty of those children that they are one armed and lame. What? They are one-armed and lame in which aspect? In running. They run the race of purusharth. So, being lame, Maya makes those lame persons fall in between. And those who are blind, their legs are indeed alright, all the organs are allright because birth by birth they have performed such action through the organs that they have not committed more sins. They are indeed numberwise. They have not inculcated impurity. They have not become adulterous. What? So, because of not becoming adulterous since many births, the Supreme Soul who is ever pure, they have inculcated His sanskars; this is why that group of blinds, in whose memorial even to this date the name of every virgin and mother is named as Lakshmi in Andhra Pradesh; that group keeps on moving ahead.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 21 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
VCD-2409-extracts-Bilingual
Part-10

समय- 02.40.25-02.52.02
Time: 02.40.25-02.52.02


हरेक बच्चे के ऊपर देखे; हर बच्चे के ऊपर विजय का तिलक दिखाई देता है। चाहे वो आंध्रा का हो, चाहे वो महाराष्ट्र या बम्बई का हो, चाहे वो तेलंगाना का हो। तेलंगाना का काम ही ऐसा है। करो अलगाववाद। एक को खंड-खंड करके कम से कम दो तो कर दो। जैसे भारत के अलगाववादियों ने अलग-अलग स्टेट बना दिये। अलग-अलग अपना राज्य कर लिया। नॉर्थ इंडिया में उत्तर प्रदेश शेर की शक्ल में दिखाया जाता था। उसका भी सर काट दिया। गैंडा बनाय दिया। शेर शेर नहीं रह गया। गैंडा बन गया। उसके ऊपर चाहे जितना प्रहार करो ग्लानि का, उसके चमड़े के ऊपर कोई असर होने वाला नहीं है। उस गैंडे की चमड़ी की ढ़ाल जितनी अकाट्य होती है कि कोई भी शस्त्र का वार उस ढ़ाल के ऊपर असर ही नहीं करता। तो वो गैंडा उत्तर प्रदेश के लिए बोला है अव्यक्त वाणी में – उत्तर प्रदेश को धर्मयुद्ध का खेल दिखाना है। क्या? ऐसा धर्मयुद्ध का खेल दिखाएगा, जिन्हें तेल का बड़ा गर्व है, अपनी धन-संपत्ति का बड़ा गर्व है, वो धराशायी हो जाएंगे।

निर्वैर भाई ने कहा – हाँ, विजय तो निश्चित है। किसने कहा? हद के निर्वैर भाई ने या बेहद के निर्वैर भाई ने? किसकी विजय निश्चित है? हँ? आँख लड़ाने की बात को जो सपोर्ट करने वाले हैं उनकी विजय निश्चित है, आँखों को, इन्द्रियों को व्यभिचारी बनाने वालों की विजय निश्चित है, या जो इन्द्रियों को अव्यभिचारी बनाने की बात करते हैं, उनकी विजय निश्चित है? कौन पवित्र है, कौन अपवित्र हैं? दुनिया की सबसे बड़ी पावर है पवित्रता। और पवित्रता इन्द्रियों के द्वारा ही धारण की जाती है। उस पवित्रता को धारण करने में लक्ष्मी परमपवित्र है। जो लक्ष्मी बबर शेर की भी सवारी करती है, माना बबर शेर का जो पार्ट है, उसको भी कंट्रोल में कर लेती है। या कहो उसको भी मनाय लेती है कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

तो निर्वैर भाई ने कहा – विजय तो निश्चित है। हँ? ये कौन ने कहा? बेहद के निर्वैर भाई की विजय निश्चित है या हद के निर्वैर भाई की विजय निश्चित है, जो आँख लड़ाने की बात को सपोर्ट करते हैं? किसकी विजय निश्चित होगी? अरे पवित्रता को सपोर्ट करने वाले बात को ही निश्चय दिलाएगी। विजय तो है – बापदादा ने बोला। लेकिन यह विजय अपने आत्मविश्वास की; क्या? आत्मा में कितना विश्वास भरा हुआ है कि मैं ज्योतिबिन्दु आत्मा हूँ। मैं देहभान वाला सांढ़ा नहीं हूँ। देहभान वालों को सपोर्ट करने वाला नहीं हूँ। मैं स्वयं भी दुर्योधन-दुःशासन नहीं बनता, दुर्योधन-दुःशासनों का काम है देहभान के आधार पर द्रौपदियों के साथ बलात्कार करना। बलपूर्वक कार्य करना। उनको कहते हैं बलात्कारी। भगवान और भगवान के बच्चे बलात्कारी नहीं हो सकते। दुर्योधन-दुःशासन नहीं हो सकते। भले ब्रह्मवाक्य मुरलियों में है भगवान का ही बोला हुआ महावाक्य है – इस दुनिया के सब पुरुष दुर्योधन-दुःशासन हैं। सब मनुष्य। नारियों को नहीं बोला, सब नारियों को। क्यों बोला? प्रैक्टिकल बात है तो बोला। घर-घर में दुर्योधन-दुःशासन बैठे हुए हैं। घर-घर में द्रौपदियाँ बैठी हुई हैं। जो दुर्योधन-दुःशासनों के द्वारा उन द्रौपदियों की इच्छा हो, न हो, उनके ऊपर बलात्कारी बनते हैं। तो आत्मविश्वासी कैसे बने? देहभानी हुए ना। आत्मा के ऊपर विश्वास करने वाले कहाँ हैं?

जो गायन है अपन को आत्मा समझो। स्वधर्मे निधनम् श्रेयः – अपने आत्मिक धरम में मर जाना भी अच्छा है। धरत परिये पर धरम न छोड़िये। देहभानी मत बनो। देहभान का प्रदर्शन करने वाले मत बनो। दुर्योधन-दुःशासन मत बनो। तो आत्मविश्वास, देह का विश्वास नहीं। देह तो विनाशी है। आज है, कल नहीं रहेगा। आज बड़े राष्ट्रपति बने पड़े हैं अमेरिका के। बड़े महामंत्री बने पड़े हैं कोई भी देश के। क्या लंबे समय तक स्थायी रहेंगे? अरे ये तो अल्पकाल का है। आत्मा सदाकाल के लिए है। आत्मा की मृत्यु कभी नहीं होती है। तो पहली बात आत्मविश्वास की। और दूसरी बात जो आत्मा के निश्चय में रहने वाली आत्माएं हैं रुद्रमाला के मणके या विजयमाला के मणके, उन आत्मविश्वास में रहने वाली आत्माएं, उनमें भी निश्चय। चाहे वो रुद्रमाला के मणके हों, चाहे वो विजयमाला के मणके हों, दोनों में पक्का निश्चय क्योंकि सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी दोनों के परिवार को मिलकरके एक नई दुनिया का परिवार बनेगा। चन्द्रवंशी राधा और सूर्यवंशी कृष्ण दोनों का मेल होता है तब एग्रीमेन्ट पूरा होता है। और परिवार नई दुनिया का बनता है। जिस परिवार का दुनिया में आज भी गायन है। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, सब आपस में इसी दुनिया में भाई-भाई बनेंगे, वसुधैव कुटुम्बकम् बनेगा। सारी वसुधा, सारी पृथ्वी के सब धर्मों के मनुष्यमात्र एक बाप को पहचानेंगे। वो दोनों के मिले हुए राज्य में सामने आएं।

निर्वैर भाई ने कहा – संस्कार मिलन के लिए बहुत पुरुषार्थ करते हैं। फिर भी अभी तक उसमें सफल नहीं हैं। तो वह संस्कार मिलन की सफलता कैसे होगी बाबा? उसका सहज तरीका क्या है? अभी तक एरिया के लिए, कुछ और बातों के लिए आपस में संस्कार नहीं मिलते हैं। बेहद में बुद्धि कैसे ले जाएं? इन सब बातों से हम ऊपर चले जाएं। तो बोला – सभी के पास लक्ष्य है कि सबको संस्कार मिला करके नई दुनिया में जाना है। क्योंकि सतयुग त्रेता में कोई झगड़ा-फसाद नहीं होगा। सबके संस्कार मिलेंगे।

तो हमको जाना है। ये सारा प्लैन तो बुद्धि में है सभी के पास। अभी इस प्लैन के ऊपर अटैन्शन थोड़ा ज्यादा रहे। भावना आवे, शुभ भावना सबके प्रति आवे। हर धर्म की मनुष्यमात्र की आत्माओं के लिए शुभ भावना आए। शुभ भावना और शुभ कामना। भासना आने के लिए थोड़ा सा अटैन्शन इसमें देवें कि हमारे अन्दर जो परिवार का प्यार है, परिवार बनता ही है एक बाप से। क्या? परिवार का एक बाप मुखिया होता है या ढ़ेर सारे बाप मुखिया होते हैं? इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरु नानक, सब बाप बनके बैठेंगे वसुधैव कुटुम्बकम के? हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, सब आपस में भाई-भाई बनके रहेंगे? भाई-भाई का प्यार हो जाएगा? कदापि नहीं। परिवार का प्यार तभी पैदा होगा जब एक बाप को पहचानें और साकार में पहचानें। परिवार का प्यार संगम पर ही ज्यादा अनुभव कर सकते हैं। संगमयुग है ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग काल का समय। जैसी यहाँ शूटिंग करेंगे वैसा ही ब्रॉड ड्रामा में पार्ट बजाएंगे।

Observe every child; a tilak (vermillion mark on the forehead) of victory is visible on every child. Be it the one from Andhra, be it the one from Maharashtra or Bombay, and be it the one from Telangana. The task of Telangana itself is like this. Indulge in separatism. Break one into at least two. Just as the separatists of India created separate states. They separated their states. In north India, Uttar Pradesh used to be depicted in the shape of a lion (sher). Its head also was cut. It was turned into a hippopotamus (gainda). A lion did not remain a lion. It became a hippopotamus. You may beat it with defamation to any extent, it is not going to have any effect on its skin. A shield made up of the skin of that hippopotamus is so thick that the attack of no weapon can have any effect on that shield. So, it has been said for that hippopotamus Uttar Pradesh in an Avyakt Vani – Uttar Pradesh has to show the game of dharmayuddh (war fought for the sake of establishing dharma). What? He will show such a game of dhramayuddh that those who are very egotistic of their oil, those who are very proud of their wealth and property will be destroyed.

Nirwair Bhai said – Yes, victory is definite. Who said? Is it the limited Nirwair Bhai or unlimited Nirwair Bhai? Whose victory is certain? Hm? Is the victory of those who support the topic of exchanging glances certain, is the victory of those who make their eyes, organs adulterous (vyabhichaari) certain or is the victory of those who talk of making their organs unadulterous (avyabhichaari) certain? Who are pure, who are impure? Purity is the biggest power of the world. And purity is inculcated only through the organs. Lakshmi is the purest one in inculcating that purity. That Lakshmi rides on a Babar Lion also, i.e. she controls even the part of Babar lion. Or you may say that she convinces even that person that what should be done and what should not be done.

So, Nirwair Bhai said - Victory is certain. Hm? Who said this? Is the victory of the unlimited Nirwair Bhai certain or is the victory of the limited Nirwair Bhai, who supports the topic of exchanging glances certain? Whose victory will be certain? Arey, certainty is only for those who support the topic of purity. BapDada said - Victory is certain. But this victory is of our self-confidence. What? To what extent does the soul have confidence that I am a point of light soul? I am not a body conscious bull. I am not the one who supports the body conscious ones. I do not become Duryodhan-Dushasan myself; the task of the Duryodhans and Dushasans is to rape the Draupadis on the basis of body consciousness. To work forcibly (balpoorvak). They are called rapists (balaatkaari). God and God's children cannot be rapists. They cannot be Duryodhans and Dushasans. Although it has been said by God Himself in the Brahmavaakya Murlis - All men in this world are Duryodhans and Dushasans. All human beings. It was not said for the women, all women. Why was it said? It was said because it is a practical topic. Duryodhans and Dushasans are sitting in every home. Draupadis are sitting in every home. They, the Duryodhans and Dushasans force themselves upon those Draupadis, irrespective of their willingness. So, are they self-confident? They are body conscious, aren't they? Do they have confidence over the soul?

It is sung - Consider yourself to be a soul. Swadharme nidhanam shreyah - It is better to die in one's own religion. Dharat pariye par dharma na chhodiye. (you may fall dead on the battleground, but do not renounce your duty). Do not become body conscious. Do not become the ones who display their body consciousness. Do not become Duryodhans and Dushasans. So, self-confidence (aatmavishwaas, i.e. confidence on the soul) and not confidence on the body. Body is perishable. It exists today, it will not remain tomorrow. Today, they have become Presidents of America. They have become big Ministers of any country. Will they be occupying the post for a long time? Arey, this is temporary. The soul is forever. A soul never dies. So, the first thing is confidence on the soul. And the second thing is - There should be faith even on the souls which have confidence over the soul, the beads of the Rudramala or the Vijaymala. Be it the beads of the Rudramala or the beads of the Vijaymala, there should be firm faith in both because the family of one new world will be built collectively with the Suryavanshi as well as Chandravanshi families. The agreement is completed when the Chandravanshi Radha and the Suryavanshi Krishna, both meet. And then the family of the new world is formed. That family is praised even today in the world. Hindus, Muslims, Sikhs, Christians, all will become brothers in this very world only; vasudhaiv kutumbkam (one world family) will be formed. All the human beings belonging to all the religions of the entire Earth (vasudha, prithvi) will recognize one Father. They should come out in the combined kingdom of both of them.

Nirwair Bhai said - We make a lot of purusharth to match our sanskars. Yet, we are not successful in that. So, how will we achieve that success in matching our sanskars Baba? What is the easy way for that? Sanskars do not match with each other on the question of area and on some other topics. How should we take our intellect in the unlimited realm? We should go beyond all these topics. So, it was said - Everyone has the goal that we have to match our sanskars and go to the new world because there will not be any fights in the Golden Age and Silver Age. Everyone's sanskars will match.

So, we have to go. This entire plan is in everyone's intellect. Now you should pay a little more attention to this plan. There should be a feeling, good feeling towards everyone. There should be good feelings for the souls of people of every religion. Good feelings and good wishes. In order to get that feeling you should give a little attention to the fact that the family love within us; the family is formed only with one Father. What? Is there one Father as the head of family or are there numerous fathers as heads? Will Ibrahim, Buddha, Christ, Guru Nanak, everyone sit as the fathers of one world family (vasudhaiv kutumbkam)? Will Hindus, Muslims, Sikhs, Christians remain as brothers with each other? Will they develop fraternal love? Certainly not. The family love will emerge only when you recognize one Father and recognize in corporeal form. The family love can be experienced only in the Confluence Age. Confluence Age is the time of shooting period of the broad drama. As is the shooting your perform here, so shall be the part that you play in the broad drama.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 22 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
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समय- 02.52.03-03.10.36
Time: 02.52.03-03.10.36


फिर निर्वैर भाई ने कहा – ये भूल जाते हैं कि ईश्वरीय परिवार 5000 साल के बाद इस रूप में आकर मिलता है। इतने बाद, वर्षों के बाद, इसी स्वरूप में मिलते हैं। ये भूलने के कारण फिर आपस में थोड़ा बहुत संस्कारों के मिलन में और सहज हो जाए। अगर ये दिल में आ जाए कि हम पूरा कल्प अलग रहे। भले साथ में पार्ट बजाते होंगे पर नाम-रूप तो यह नहीं था। अभी इस नाम-रूप से आपस में मिलते हैं। तो कितना आपस में प्यार होना चाहिए। ये भूल जाते। कम्पिटिशन में आ जाते हैं, जो कॉम्प्लिमेन्टरी रोल कैसे सबका आपस में मिलकरके कैसे आगे बढ़ाएं उसके लिए एक लक्ष्य आपकी तरफ से सबको एक लक्ष्य मिल जाए। उस मिलने की तरफ हम जाएंगे। दादा लेखराज की आत्मा बोली – लक्ष्य यही रखें कि होना ही है। क्या? ऐसे तो नहीं कि नहीं होना है। नई दुनिया आएगी, स्वर्ग आएगी, जन्नत आएगी, तो सबके संस्कार मिलेंगे। सभी यही सोच रहे हैं कि यह इस बात पर क्यों सोच रहे हैं कि सबके संस्कार मिलें? सारी पढ़ाई ठीक है और पढ़ाने वाले भी ठीक हैं। तो फिर ये क्वेश्चन तो है ही नहीं कि संस्कार कैसे मिलें? अभी यही लक्ष्य रखो कि हम बनने हैं। उसमें आपका पार्ट सहयोगी बनने का नहीं है, लेकिन खुद अपने को लायक बनाना है। दूसरों का सहयोग तब बनेंगे जब खुद लायक बनेंगे। खुद का सुधार फिर पर का सुधार। अटैन्शन अपने ऊपर देना है। ये जरूरी बात है।

और बाबा ने देखा है कि सबको इसका बहुत ख्याल है कि बनना ही है, बन रहे हैं। पुरुषार्थ अनुसार तो नंबर लेंगे लेकिन पहले ये ध्यान रखो। अभी तो हम जैसे पूछते हैं बाबा, वैसे आप भी आपस में रूह-रूहान करके जो राजधानी का सीट है वो अवश्य लेंगे। तो अभी ये संकल्प रखो कि अब राजधानी में क्या सीट लेनी है? हँ? संकल्प वो ही रखेंगे जो इस बात को मानेंगे बापदादा अव्यक्त की कि दिल्ली में राजधानी स्थापन हो रही है। इसका जो आपोजिशन करने वाले हैं और बापदादा का मुँह ही, मुँह हाथ से बंद कर देते हैं, अरे बाबा आप माउंट आबू में बैठे हैं। आप दिल्ली में नहीं बैठे हैं। कहीं आपकी बुद्धि खराब तो नहीं हो गई है? हँ? अब ऐसों की बुद्धि में कैसे डाला जाएगा कि दिल्ली में राजधानी बापदादा स्थापन कर रहे हैं।

देखो, राजधानी में बैठे तो हैं। बृजमोहन भाई के लिए ये बात बोली होगी। बृजमोहन का भी बेहद का अर्थ वही। क्या? बृज। और निर्वैर। बृज को मोहने वाले। अभी दिल्ली की राजधानी में तो हैं। बैठे तो हैं, लेकिन अभी दिल्ली की राजधानी में आपके जैसे, दिल्ली राजधानी में आपके साथ हो। और भी राजधानी बुद्धि में रखनी। किसी भाई ने कहा – बाबा आपने तो सारी सीट शक्तियों को दे दी। बाबा ने बोला – क्यों? वो हमेशा ही देखो – ये देखा गया है – जब रेस होती है ना तब माताएं-कन्याएं ही नंबर ले लेती हैं। क्या? दुनिया की पढ़ाई में भी देख लो। कौन नंबर ले रही हैं? कन्याएं-माताएं नंबर ले रही हैं। जब फाइनल होता है तो यही रिजल्ट निकलता है। लेकिन आपके पास भी लक्ष्य है कि हमको भी नंबर लेना है। और पास होना है। तो बापदादा या ड्रामा दोनों तरफ ध्यान रखो।

निर्वैर भाई ने कहा – कौनसी बात में फॉलो फादर करना है? ब्रह्मा बाबा ने कहा – फॉलो फादर का अगर अटैन्शन है तो फिर प्रैक्टिकल लाइफ में सब प्रैक्टिकल दिखाई देना चाहिए। क्या? फादर भी, परिवार में फादर प्रैक्टिकल में दिखाई देना चाहिए, प्रैक्टिकल शरीर के द्वारा होता है कि सिर्फ निराकार, आकार के द्वारा होता है, प्रैक्टिकल तो शरीर के साथ ही हो सकता है। प्रैक्टिकल लाइफ में बाप भी होना चाहिए और प्रैक्टिकल लाइफ में सब बच्चे भी होना चाहिए, दिखाई देना चाहिए। बाप निराकारी स्टेज में है तो बच्चे भी निराकारी स्टेज में दिखाई दें। जिससे प्यार होता है उसके समान बनना पड़ता है। बापदादा निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी – तो बच्चे भी कैसे होने चाहिए? निराकारी, निर्विकारी और निरहंकारी। लेकिन प्रैक्टिकल में बाप को देखते ही नहीं। साकार में बाप को देखते ही नहीं। जानते ही नहीं तो देखेंगे कैसे? मानते ही नहीं। क्यों? क्यों? क्योंकि माया बेटी के प्रभाव में आए हुए हैं। और माया ने प्रकृति जगदंबा से हाथ मिलाया हुआ है। जो प्रकृति जगदंबा सबसे जास्ती दुनिया में पावरफुल है। तो माया के प्रभाव में आ जाते हैं।

तो सभी की अभी जैसे बाप चाहता है वैसे ही हो रही है। लेकिन टाइम पर तो हो ही जाता है। लेकिन सदा हो ये बात है। क्या? माया के प्रभाव में कभी न आएं। नहीं तो माया विघ्नों की दीवाल खड़ी कर देती है। दौड़ करने वालों के सामने दीवाल खड़ी हो जाए तो दीवाल से टकराएंगे। तो वो भी हो रही है और होगी। इसलिए यह भी फिक्र नहीं है। सभी पुरुषार्थ कर रहे हैं और सभी, अभी सभी की बुद्धि में यही है कि हम नंबर जरूर लेंगे। हो जाएंगे। तैयारी हो गई है। कुछ है? निर्वैर भाई ने कहा – सदा उम्मीदवार रहेंगे। उम्मीद और उम्मीद होनी ही है। ये तो हुआ ही पड़ा है। बाकी सिर्फ बीच-बीच में थोड़ा सा रूप बदलता है। तो वो बदलते हुए रूप को किसी न किसी रीति से कोई बात होती है तो हो ही जाती है। इसलिए बापदादा भी इतना नहीं कह सकता। क्योंकि पुरुषार्थ का स्वरूप दिखाई दे रहा है। ऐसा नहीं है कि नहीं दिखाई देता है। दिखाई देता है। लेकिन सदा नहीं दिखाई देता है। कभी कैसे, कभी कैसे। कभी नीचे, कभी ऊपर। अभी इसको स्थिर करो। और सब जोश दिखाओ। तो हम सब तैयार हैं। हम सब माने? सब धरमवाले तैयार हैं। सब कुरियों वाले ब्राह्मण तैयार हैं। कोई किसी भी धरम में कन्वर्ट होकरके रहे हों। द्वापरयुग से, द्वैतवादी युग से द्वैतवादी धरमपिताओं, दूसरे-दूसरे देश के देशवासियों से प्रभावित होकरके रहे ना। भारतवासी ही प्रभावित हुए। तो वो सब जैसे वहाँ कन्वर्ट हुए थे, वैसे अब ब्राह्मण धर्म में कन्वर्ट हो रहे हैं, हो गए हैं। सब तैयार हैं। पेपर देने के लिए।

पेपर देने के लिए तैयार हैं सभी? पूछो सभी से। पेपर देने के लिए तैयार हैं? कितनी बार पूछा? हँ? तैयारी की बात एक बार पूछी, फिर दूसरी बार पूछी, फिर तीसरी बार पूछी। और उम्मीद है तो प्राप्ति भी उतनी है। जितनी उम्मीद अन्दर में भरी हुई होगी, उतनी ही प्राप्ति करेंगे। और उम्मीद उतनी ही अन्दर में भरेगी जितनी पढ़ाई पढ़ी होगी। ईश्वरीय पढ़ाई का नशा रहता है? उम्मीद का नशा रहता है? उम्मीद के बल पर दुनिया चलती है। रहता तो है। बीच-बीच में थोड़ा टाइम आता है। फिर पुरुषार्थ करते हैं। लेकिन ये सदा नशा सदा रहे। इसका अभी अभ्यास चाहिए। थोड़ा अटेन्शन देना पड़ेगा। किस बात में अटैन्शन देना पड़ेगा? अरे पढ़ाई पर अटैन्शन नहीं दिया है इसलिए उम्मीद भी कम रहती है। ईश्वरीय पढ़ाई है। दुनिया की सबसे ऊँची पढ़ाई, सुप्रीम गॉड फादर पढ़ा रहा है। इस बात पर निश्चय रहना चाहिए। पढ़ाई है ना ईश्वरीय। पढ़ाई में तो अटैन्शन दिया जाता है ना। और फिर ये तो है ईश्वरीय पढ़ाई। कोई देहधारी धरमपिता धरमगुरू की पढ़ाई तो नहीं है। ये तो निराकार गॉड फादर, सुप्रीम गॉड फादर की पढ़ाई है। जो आपको अनुभव नहीं है ना। इसलिए उम्मीद हिल जाती है। इसलिए सबको नए साल की मुबारक दी है। मुबारक दी है और इस नए साल में उम्मीद का कदम आगे बढ़ाने का वरदान है।

अपने को भरपूर और बाप समान समझकरके ऐसे अपने को सदा तैयार रखना। किसके समान समझकरके? बाप समान समझकर। ब्रह्मा को बाप समझना नहीं है। उसका तो नाम ही है ब्रह्म माने बड़ी माँ माने माँ। माँ के समान बनने की बात नहीं बताई। बाप समान बनना। बाप का मतलब ये नहीं है कि निराकार आत्माओं का बाप शिव ज्योति बिन्दु बनना है। वो निराकार आत्मा समान बनेंगे तो परमधाम में पड़े रहेंगे। सोल वर्ल्ड में पड़े रहेंगे लम्बे समय तक। इस दुनिया में आकर सुख नहीं भोगेंगे। तो है साकार मनुष्य सृष्टि के साकार बाप की बात। आदम, एडम, आदि देव शंकर की बात है। ऐसे अपने को सदैव तैयार रखना। अभी की जो भी समय है उस समय में अपन को ऐसे तैयार करें। कैसे? बाप समान। जैसे बाप का पुरुषार्थ है। जैसे बाप, मनुष्य सृष्टि का बाप निराकारी बाप के समान निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनते हैं, जैसे बाप बच्चों से भी चाहते हैं कि जैसे बाप सर्व गुण संपन्न है, कौनसा बाप सर्व गुण संपन्न? देवताओं के लिए कहा जाता है, सर्व गुण संपन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण अहिंसक, मर्यादा पुरुषोत्तम। निराकार आत्माओं का निराकार बाप कोई सर्व गुण संपन्न बनता है? अरे वो निर्गुण है या सगुण है? वो तो निर्गुण निराकार है। सगुण तो नारायण बनता है।

नारायण को बनाने वाला निराकारी सो साकारी भगवान है। जो स्वयं निराकारी बनता है। साकारी से निराकारी बनता है और साकार शरीर में भी रहता है। साकार कर्मेन्द्रियों से करम भी करता है। परन्तु उन कर्मेन्द्रियों का रस नहीं लेता। कर्मयोगी है 100 परसेन्ट पक्का। ताज-तख्तधारी है। दुनिया, सारी दुनिया की, सारे विश्व की जिम्मेवारी का ताजधारी है, उसकी यादगार है जगन्नाथ। सारे जगत का नाथ। गरीबों का भी नाथ, साहूकारों का भी नाथ। ऐसे नहीं श्रीनाथ। श्रेष्ठ देवात्माओं का ही नाथ हो। नहीं। सारे जगत की जो भी मनुष्यात्माएं हैं, चाहे वो देवात्मा बनने वाली हों, चाहे वो असुर की असुर ही रह जाने वाली हों, सबकी जिम्मेवारी लेने वाली आत्मा है। सबका उद्धार करने वाली आत्मा। उद्धार का अर्थ ही है उत माने ऊपर, हर माने हरण करने वाली। अगर न भी जा सकें पुरुषार्थ में स्वेच्छा से तीखी तो भी जबरियन उनको नीचे से ऊपर ले जाएगा। उसको कहते हैं उद्धारकर्ता। ऐसे ये विशेषताएं हरेक बच्चा अपने में अनुभव करे। अभी भी समय है। जो कुछ रहा हुआ है, वो सब अपने में धारण करके धारणा रूप का साक्षात्कार करो। अभी क्या करें? ऐसे होगा, कैसे होगा? नहीं। ये क्यों, क्या, कैसे का क्वेश्चन पूछने की बात ही नहीं। क्यों? क्योंकि बाप ने अपने पास कुछ भी रखा नहीं है ज्ञान सुनाने के लिए। सारा ज्ञान, सृष्टि का, आदि, मध्य, अंत का ज्ञान बच्चों को दे दिया है। सब बातों का क्वेश्चन, सब प्रश्नों का समाधान दे दिया है। अभी बाप ने सबको हिम्मत दी है। उमंग दिया है। तो उसी हिम्मत और उमंग इन दोनों को साथ लेकर आप भी जल्दी-जल्दी आगे बढ़ो। ओमशान्ति।

Then Nirwair Bhai said - We forget that we get the Godly family after 5000 years in this form. We meet in this form after so much time, after so many years. Because of forgetting this it will become easier to match the sanskars. If your heart realizes that we had been separate for an entire Kalpa (cycle); although we might have been playing parts together, but the name and form was not this. We meet each other in this name and form now. So, there should be so much love for each other. We forget this. We indulge in competition; everyone should get a goal from your end as to how the complementary role of everyone matches with each other and how we could progress. We will move towards that meeting. The soul of Dada Lekhraj said - You should have the target that it is bound to happen. What? It is not as if it is not going to happen. The new world will come, heaven will come, jannat will come; then everyone's sanskars will match. Everyone is thinking that why is he thinking that everyone's sanskars should match. The entire study is okay and the teachers are also okay. So, then there is no question at all as to how the sanskars should match? Now have a goal that we are to become. In that your part (role) is not to become a helper, but you have to make yourself worthy. You will become others' helpers when you become worthy yourself. Improve yourself, and then improve the world. You have to pay attention towards yourself. This is an important thing.

And Baba has seen that everyone is worried about the topic that you have to become and you are becoming. You will obtain number as per purusharth. But first pay attention to this. Now, just as we ask Baba, similarly you also have a spiritual chit-chat with each other and will definitely obtain the seat in the capital. So, now make this resolution that which seat should I achieve in the kingdom? Hm? Only those people who accept these words of Avyakt BapDada that a kingdom is being established in Delhi will set a resolution. Those who indulge in its opposition and close BapDada's mouth itself, those who close BapDada's mouth with their hands - Arey, Baba you are sitting in Mount Abu. You are not sitting in Delhi. Have you gone mad? Hm? Well, how will it be put in the intellect of such persons that BapDada is establishing a kingdom in Delhi.

Look, you are sitting in the Capital. These words might have been spoken for Brijmohan Bhai. The unlimited meaning of Brijmohan is also the same. What? Brij. And Nirwair. The one who attracts Brij. Now you are indeed in the capital Delhi. You are sitting, but now in the capital Delhi like you; you are together in the capital Delhi. And you have to keep the capital in your intellect. A brother said - Baba, you have given all the seats to the Shaktis. Baba said - Why? Look always, it has been observed that whenever a race is organized then it is the mothers and virgins only who grab the numbers (ranks). What? Look in the worldly studies also. Who are grabbing the numbers (ranks)? The virgins and mothers are only achieving the numbers. When the final [exam] takes place, then this is the result that emerges. But you also have the goal that we too have to achieve the number. And we have to pass. So, pay attention to both BapDada or drama.

Nirwair Bhai said - In which topic should we follow Father? Brahma Baba said - If you pay attention to 'follow Father' then everything should appear practical in the practical life. What? The Father also; the Father should be visible in the family in practical. Does practical happen through the body or does it happen only through incorporeal, subtle? Practical can happen with the body only. The Father should also be there in practical life and all the children should also be there, should be visible in practical life. When the Father is in an incorporeal stage, then the children should also be visible in an incorporeal stage. One has to become equal to the one whom you love. When BapDada is incorporeal, viceless, egoless - then how should the children also be? Incorporeal, viceless, and egoless. But you do not see the Father in practical at all. You do not see the Father in corporeal form at all. When you don't know at all, how will you see? You do not accept at all. Why? It is because you have come under the influence of daughter Maya. And Maya has joined hands with nature. Nature Jagdamba is most powerful in the world. So, you come under the influence of Maya.

So, everyone is now making efforts as the Father wishes. But it happens on time. But the question is that it should happen always. What? You should never come under the influence of Maya. Otherwise, Maya creates a wall of obstacles. If a wall emerges on the path of sprinters, then they will dash against the wall. So, that is also happening and it will happen. This is why this worry also doesn't exist. Everyone is making purusharth and everyone; now it is in the intellect of everyone that we will definitely achieve the number. We will. The preparations have been made. Is there anything? Nirwair Bhai said - We will always remain hopeful (ummeedvaar). There is bound to be hope. This is as good as done. Just the form changes a little in between. So, that changing form, whenever something happens, then it happens anyways. This is why BapDada also cannot say much because the form of purusharth is visible. It is not as if it is not visible. It is visible. But it is not visible forever. Sometimes it is in one manner and sometimes it is in another manner. Sometimes down, sometimes up. Now make it constant. And everyone should show enthusiasm. So, we all are ready. What is meant by 'we all'? People of all the religions are ready. Brahmins of all the categories are ready. Someone might have converted to any religion. From the Copper Age onwards, from the dualistic Age, you have been influenced by dualistic founders of religion, by the residents of other countries, haven't you been? It is the Indians who have been influenced. So, just as all of them converted there, similarly, they are converting now in the Brahmin religion. All are ready to appear for the paper (exam).

Is everyone ready to appear for the paper (exam)? Ask everyone. Are you ready to appear for the paper? How many times was the question put? Hm? The topic of preparations was asked once, then it was asked the second time, then it was asked for the third time. And when there is hope, then the attainments will also be like that. The more there is hope, the more attainments you will achieve. And there will be hope inside to the same extent you have studied the knowledge. Do you feel intoxicated of the Godly studies? Is there intoxication of hope? The world works on the basis of hope. It remains. It comes for a little time in between. Then you make purusharth. But this intoxication should be there always. Now its practice is required. You will have to pay a little attention. You will have to pay attention to which topic? Arey, you have not paid attention to studies. This is why there is less hope. It is Godly teaching. It is the highest teaching of the world; the Supreme God Father is teaching. You should have faith on this topic. It is Godly study, is not it? You have to pay attention to studies, shouldn't you? And then this is Godly teaching. It is not a teaching by any bodily founder of religion, or any religious guru. This is the teaching of the incorporeal God Father, Supreme God Father. You are not experienced, are you? This is why the hope shakes. This is why everyone has been given congratulations for the New Year. Congratulations have been given and the step of hope in this New Year is a boon to take you ahead.

Consider yourself to be fulfilled and equal to the Father and keep yourself ready like this always. By considering yourself to be equal to whom? By considering yourself to be equal to the Father. You should not consider Brahma to be your Father. His name itself is - Brahm meaning senior; ma means mother. It was not mentioned that you should become equal to the mother. Become equal to the Father. Father does not mean that you have to become [equal to] the Father of incorporeal souls, the point of light Shiv. If you become equal to that incorporeal soul, then you will keep on lying in the Supreme Abode. You will lie in the Soul World for a long period. You will not come to this world and enjoy happiness. So, it is about the corporeal Father of the corporeal human world. It is about Aadam, Adam, Aadi Dev Shankar. Keep yourself ready like this always. Whatever time is going on now, in that time you should prepare yourself like this. How? Equal to the Father. Just as there is the purusharth of the Father, just as the Father, the Father of the human world becomes incorporeal, viceless and egoless like the incorporeal Father, just as the Father expects from the children also that just as the Father is perfect in all the virtues; which Father is perfect in all the virtues? It is said for the deities that they are perfect in all the virtues, perfect in 16 celestial degrees, completely non-violent, highest among all the human beings in following the code of conduct (Maryadas purushottam); does the incorporeal Father of the incorporeal souls become perfect in all the virtues? Arey, is He beyond virtues (nirgun) or virtuous (sagun)? He is beyond virtues and incorporeal (nirgun, niraakaar). It is Narayan who becomes sagun (virtuous).

The maker of Narayan is the incorporeal cum corporeal God who becomes incorporeal himself. He becomes incorporeal from corporeal and then lives in the corporeal body as well. He also acts through the corporeal organs of action. But He does not draw pleasure from those organs of action. He is a 100 percent firm karmayogi. He wears the crown and holds the throne. He wears the crown of responsibility of the world, the entire world; his memorial is the Jagannath. The Lord of the entire world. He is the Lord of the poor as well as the rich. It is not as if he just Shrinath, the Lord of only the righteous deities. No. He is the soul which takes up the responsibility of the human souls of the entire world, be it the souls becoming deities, be it the souls which remain demons only. He is the soul which uplifts everyone. Uddhaar itself means - 'ut' meaning 'above', 'har' meaning 'the one who abducts'. Even if someone is unable to move fast in purusharth with his own will, he will take them up from below forcibly. He is called 'uddhaarkarta' (uplifter). Every child should experience these specialties in himself. There is still time. Whatever remains, inculcate all that in yourself and have the vision of being an embodiment of inculcation (dhaarnaamoort). What should I do now? Will it happen like this? How will it happen? No. There is no question of why, what, how at all. Why? It is because the Father has not kept any knowledge with Himself, which is yet to be narrated. He has given the entire knowledge, the entire knowledge of the beginning, middle and end of the world to the children. He has given solution to all the topics, all the questions. Now the Father has given courage to everyone. He has given enthusiasm. So, you also move ahead quickly with that courage and enthusiasm. Om Shanti.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 23 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2410, आडियो 2896, दिनांक.11.11.2017
VCD No.2410, Audio 2896, Dated 11.11.2017
प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning class dated 31.3.1967
VCD-2410-extracts-Bilingual

समय- 0.01-20.13
Time: 00.01-20.13


आज का प्रातः क्लास है – 31.3.1967। शुक्रवार को रिकार्ड चला है – न वो हमसे जुदा होंगे, न हम उनसे जुदा होंगे। न उल्फत दिल से निकलेगी। ये गाइड्स क्या कर दिखलाते हैं? स्वर्ग जाने का गेट दिखलाते हैं। भई, ये बात ठीक है ना? देखो, अभी नाम इनको दिया है, इस बच्चे को। गेटवे (gateway) यानि रास्ते की तरफ जाना। ये गेट का रास्ता है। वे (way) कहा जाता है रास्ते को। और गेट (gate) कहा जाता है फाटक को। ये स्वर्ग का फाटक कब खुलता है? बच्ची, ये नरक है ना। हैल है ना। हैविन का फाटक कब खोलते हैं? और कौन खोलते हैं? पूछा, क्या बताएंगे? हँ? स्वर्ग का फाटक कौन खोलते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) कन्याएं-माताएं खोलती हैं। उनमें भी अव्वल नंबर कौन? हँ? (किसी ने कहा – भारत माता।) ये दुनिया तो इन बातों को नहीं जानती है। तुम बच्चों को, जिनको सदैव खुशी रहती है, और ये सभी चित्र वगैरह बनाते हो समझाने के लिए, उनको खुशी रहती है। लिखते हैं गेटवे टू हेविन। हैविन में जाने का रास्ता। ये उसकी प्रदर्शनी है कि कैसे हैविन में जा सकते हैं। स्वर्ग के द्वार में कैसे जा सकते हैं? ये है नरक का द्वार। किसका द्वार? (सबने कहा – नरक का द्वार।) नरक का क्यों कहा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) नर किसको कहा जाता है? नारी किसको कहा जाता है? हँ? स्वर्ग का द्वार, नरक का द्वार। स्वर्ग का द्वार कौन खोलते हैं? हँ? और नरक का द्वार कौन खोलते हैं? हँ? (किसी ने कहा – नर।) नारी नहीं बोला।

अभी चित्र तो बहुत तुमने बनाए हैं। देखो, बाबा ने रात को कहा ना – अच्छा, ये कुछ काम का नहीं। एक भी कुछ काम का नहीं। अच्छा बाबा, बस बाबा पूछते हैं बच्चों से, तो इन सब चित्रों में कौनसा चित्र अच्छा है? जिससे हमको गेट का द्वार खोलने में आता है? अच्छा चलो बताओ। ये जो इतने सभी चित्र हैं, इनमें कौनसा एक चित्र है, जिस चित्र से हम किसको भी समझाय सकें। ये है स्वर्ग में जाने का गेट। दिखलाओ कौनसा चित्र है। नाम बताओ चित्र का। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, सब बताओ, मैं प्रश्न पूछता हूँ ना। रात को तुम अजब खाते। मैं कहता हूँ ये कुछ नहीं। समझा ना। अभी बाबा पूछते हैं कि तुम बताओ ये कौनसा चित्र सबसे फर्स्टक्लास है जिससे गेट खुलते हैं। किसी भाई ने कहा – सबसे पहला – स्वर्ग की रचयिता और उनकी रचना। अच्छा। सबसे पहला। अच्छा चलो, भई दूसरा। किसी ने कहा – त्रिमूर्ति। अच्छा। त्रिमूर्ति! फिर कोई ने कहा – गोला। गोला? अरे! परे कौन, बताओ, ये तो दो हैं। किसी ने कहा – बाबा, ये एक ही चित्र एक ही है। अच्छा, बात सुनो। ये तो ठीक है। ये चित्र है। परन्तु मुझे गेट बताओ। किसी ने कहा – गेट सामने बैठी। जिसने ये बताया, इसने अच्छा ये बताया। अरे भई, तुम बताओ बच्ची। ये सभी चित्रों में हमको गेट बताओ। समझे? स्वर्ग में जाने का गेट। इसमें है कोई चित्र गेट बताने का? तुम बताओ।

किसी भाई ने कहा – बाबा, गीता का भगवान कौन है, ये समझेंगे तो गेट हो जाएगा। अच्छा! ये समझेंगे? चलो भई, तुम बताओ। हाँ, तुम बताओ। कोई भी बताने वाला है? जो बताय सकते हैं सो हाथ उठाय करके बताओ। इसमें क्या है? किसी ने कहा – बाबा, झाड़ में आ जाते हैं सारे। अच्छा, ये झाड़ है। अच्छा बस। भल चित्र, हम चित्रों के लिए रात को इतना तुमको बोला ना। और तुम हंसने लगे। शिवबाबा क्या कहते हैं, ये सभी फालतू बात। अच्छा ये बोलता है – झाड़। किसी ने कहा – बाबा सीढ़ी। सीढ़ी? अच्छा, चलो और भी कोई है? फिर किसी ने कहा – चक्कर। ये कहते हैं चक्कर। अच्छा भई चक्कर। अच्छा। और इसने कहा त्रिमूर्ति। उसने कहा - पहले-पहले शिवबाबा। शिवबाबा। चलो-चलो। भई, नाम लेकर नोट करते जाओ। मैं आज देखो सबसे पूछता हूँ। अच्छा और बताओ। तो देखो, चित्रों की बात निकालता हूँ ना। किसी ने कहा – जी। रात को मैं बोला ये, ये खेल है ना। अच्छा और भी किसी को बताना है? किसी ने कहा – बाबा, विराट स्वरूप। विराट स्वरूप किसे, कहां है? ये जो बाबा ने बनाया है, मंगाया है अभी। अच्छा, भई चलो, विराट स्वरूप। और कुछ बताओ। किसी ने कहा – बाबा नरक और स्वर्ग का गोला। वो कहाँ है? किसी ने कहा – उस तरफ। तुम भी यही तो कहते हो। किसी ने कहा - नहीं। ये बड़ा चक्कर कहते हैं। अच्छा, वो दो छोटे चक्कर हैं। चलो भई, कोई और भी हैं? किसी ने कहा – बाप का परिचय।

मैं पूछता हूँ – चित्र मुझे कहीं बताओ जिसमें गेटवे हो। तो मालूम होता है कि ये गेटवे है इस चित्र में। ये बड़ा समझने की बात है। चलो, और भी कोई है। तो ये किसी ने कहा रामराज्य, रावणराज्य। 31.3.67 की वाणी का दूसरा पेज। रामराज्य और रावणराज्य। अच्छा, वो इसमें गेट बताया? बिचारा मौन में रहते हैं एकदम। रिटायर्ड लाइफ। किसी ने कहा – ना बाबा। किसी ने कहा – त्रिमूर्ति। त्रिमूर्ति कहाँ कहा इसने? या और किसी ने कहा। किसी ने कहा – दीदी ने बोला। जो त्रिमूर्ति कहते हैं सो हाथ उठाओ। हाँ, त्रिमूर्ति में बहुत हाथ हैं। अच्छा, तो जिसने त्रिमूर्ति कहा। तुम भी त्रिमूर्ति के। अच्छा, इसमें हाथ है। ये चक्कर किसने कहा? कोई ने कहा – खन्नाजी ने कहा। खाली एक खन्नाजी? बस। एक ही भगवान है। कोई ने कहा – इसमें मैंने कहा। इसने इस एक ही भगवान है, बाकी सब बन्दे। केवल इसने राइट कहा। क्यों राइट कहा?

देखो, मैं फिर समझाता हूँ। तुमको समझाना ही है गेटवे। अब ये चक्कर में ऊपर में देखो। इस तरफ में है नरक का गेट। और उस तरफ में है स्वर्ग का गेट। वो बरोबर स्वर्ग में लक्ष्मी-नारायण दिखाते हैं। और उसमें तो सभी आसुरी संप्रदाय। और ये भी दिखलाते हैं - यहाँ से ये आत्माएं भागती हैं। समझे ना। एक जाती हैं स्वर्ग में। और एक जाती हैं शांतिधाम में। कौन शांतिधाम में जाती हैं? कौन सुखधाम में जाती हैं? अब ये गेट तो बरोबर ठीक है। गोला है। किसी ने कहा – दोनों गोले। एकदम क्लीयर। तुम लोगों को सबको समझाना है। और इस गोले के ऊपर ही बड़ी समझानी है। यहाँ नरक में देखो कितने आदमी हैं। और स्वर्ग में देखो कितने आदमी हैं। ये स्वर्ग में देखो कितना राज़ है। भई ये गेट इस चक्कर का ये जो जगह है, मैं इनसे ये गोला बोला। अच्छा, इस चक्कर में गेट कौन है? दिखलाओ। क्या ये सारा चक्कर गेट है? नहीं। सारा चक्कर भी गेट नहीं है। बस वो गेट पूरा एकदम। देखो आत्माएं जाती हैं ऊपर में। निकल जाती हैं। है ना। और जाएगा गेट, स्वर्ग का गेट। वो नरक का गेट। इसमें सुई लगी हुई है ना। और वो सुई शो करनी है। सुई देखो सबसे तीखी है। तो वो सुई दिखलाती है कि ये नर्क अभी ये स्वर्ग होने का है। तो सबसे अच्छा समझाने का ये है। गेटवे टू स्वर्ग।


Today's morning class is dated 31.3.1967. The record played on Friday is - Na vo hamse judaa hongey, na ham unsay judaa hongey. Na ulfat dil se niklegi. (Neither will he be separated from me, nor I will separate from him. Nor will his love depart from the heart.) What do these guides do? They show the gate towards heaven. Brother, this topic is correct, is not it? Look, a name has been given to this one, to this child. Gateway means going towards the way. This is the path to the gate. Way means path. And gate means door. When is the door to heaven opened? Daughter, this is a hell (narak), is not it? When is the door of heaven opened? And who opens? It was asked; what would you tell? Hm? Who opens the gate of heaven? (Someone said something.) The virgins and mothers open. Who is number one even among them? Hm? (Someone said - Mother India.) This world does not know these topics. You children, who always remain joyful and prepare all these pictures etc to explain, feel happy. You write, gateway to heaven. The path to go to heaven. This is its exhibition as to how you can go to heaven. How can you enter the gate of heaven? This is the gate of hell. Whose gate? (Everyone said - Gate of hell.) Why was it called hell (nar)? Hm? (Someone said something.) Who is called 'nar'? Who is called 'naari'? Hm? Gate of heaven, gate of hell. Who opens the gate of heaven? Hm? And who opens the gate of hell? Hm? (Someone said - Nar, i.e. man.) It was not said naari, i.e. woman.

Now you have prepared many pictures. Look, Baba told in the night, did not He - Achcha, all this is of no use. Nothing is of any use. Achcha Baba, Baba just asks the children - So, which picture is good among all these pictures through which we can open the gate? Achcha, come on, tell. Among all these pictures, which is the one picture through which we could explain to anyone? This is the gate to go to heaven. Show, which picture is it. Tell the name of the picture. Hm?
(Someone said something.) Yes, everyone tell; I ask a question. You were surprised in the night. I say, not this. Did you understand? Now Baba asks - You tell, which picture is most first class through which the gate is opened. A brother said - First of all - the Creator of heaven and their creation. Achcha. First of all. Achcha, let's move further; brother, next. Someone said - Trimurti. Achcha. Trimurti! Then someone said - Circle (Gola). Circle? Arey! Which one is first? Tell; these are two. Someone said - Baba, this is one picture only. Achcha, listen. This is okay. This is the picture. But show the gate to me. Someone said - The gate is in the front. The one who said this; this one pointed out correctly. Arey, brother, you tell daughter. Show me the gate in all these pictures. Did you understand? The gate to go to heaven. Is there any picture showing the gate in it? You tell.

A brother said - Baba, if we understand who the God of Gita is, then the gate will become clear. Achcha! If you understand this? Okay brother, you tell. Yes, you tell. Is there anyone who can tell? Those who can tell may raise their hands. What is in it? Someone said - Baba, everything is included in the tree. Achcha, this is the Tree. Achcha, that is all. I told you so much about the pictures in the night, did not I? And you started laughing. ShivBaba is telling all these wasteful topics. Achcha, this one says - Tree. Someone said - Baba, the Ladder. Ladder? Achcha, okay, is there anyone else also? Then someone said - The circle. This one says Circle. Okay brother, Circle. Achcha. And this one said Trimurti. He said - first of all ShivBaba. ShivBaba. Let's move further. Brother, go on noting with names. Look, I ask everyone today. Achcha, tell further. So, look, I raise the topic of the pictures, don't I? Someone said - Yes. I told this in the night; this is a game, is not it? Achcha, does anyone else want to tell? Someone said - Baba, the gigantic form (viraat roop). Who is the 'Viraat Swaroop'? Where is it? This one, which Baba has prepared, fetched recently. Achcha, brother, Viraat Swaroop. Tell something else. Someone said - Baba the sphere of hell and heaven. Where is it? Someone said - That side. You also say the same thing. Someone said - No. This one says - Big Circle. Achcha, they are two small circles. Okay brother, is there anyone else also? Someone said - The Father's introduction.

I am asking - Show me a picture which contains the gateway so that you could know that this is the gateway in this picture. This is a topic to be understood a lot. Okay, is there anyone else? So, someone said - Kingdom of Ram, kingdom of Ravan. Second page of the Vani dated 31.3.67. Kingdom of Ram and kingdom of Ravan. Achcha, did you point out the gate in it? Poor fellow remains completely silent. Retired life. Someone said - No Baba. Someone said – Trimurti. Did he say Trimurti? Or someone else must have said. Someone said – Didi said. Those who say Trimurti, raise your hands. Yes, there are many hands in support of Trimurti. Achcha, the one who said Trimurti. You are also in favour of Trimurti. Achcha, there is a hand raised for it. Who said this Circle? Someone said - Khannaji said. Just Khannaji? That is all. There is only one God. Someone said - I said in this one. This one, this one is the only God, all others are his men. This one alone said the right thing. Why did he say the right thing?

Look, I explain once again. You have to explain only on the gateway. Now look at the Cycle above. On this side is the gate of hell. And on that side is the gate of heaven. They correctly show Lakshmi-Narayan in heaven. And in that one (hell) everyone is from the demoniac community. And it is also shown that - these souls run from here. Did you understand? Didn’t you? One goes to heaven. And one goes to the abode of peace. Which one goes to the abode of peace? Which one goes to the abode of happiness? Now this gate is definitely correct. There is the Circle. Someone said - Both Circles. Completely clear. You people should explain to everyone. And the big explanation is on this Circle only. Look, there are so many people in the hell here. And look, how many people are there in heaven. Look, there is so much secret in heaven. Brother, this gate of this Cycle, this place, I said Cycle to him. Achcha, which is the gate in this Cycle? Show. Is this entire Cycle a gate? No. The entire Cycle is also not a gate. That is all, that gate is complete. Look, the souls are going upwards. They depart. And that gate will go, the gate of heaven. That is a gate of hell. There is a needle in it, is not it? And that needle is to be showed. Look, the needle is the sharpest. So, that needle shows that this hell is now going to become heaven. So, this is the best one to be explained. Gateway to heaven.


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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 24 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2411, आडियो 2897, दिनांक.12.11.17
VCD No.2411, Audio 2897, Dated 12.11.17
प्रातः क्लास 31.3.1967, नालासोपारा (महाराष्ट्र)
Morning Class dated 31.3.1967, Nalasopara (Maharashtra)
VCD-2411-extracts-Bilingual


समय- 0.01-19.06
Time: 00.01-19.06


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. चौथे पेज की तीसरी लाइन में बात चल रही थी – आज की इस कलियुगी दुनिया में जो कुछ भी बोलते हैं, जो कुछ भी चलन चलते हैं, सब अनराइटियस क्योंकि इस दुनिया में ए टू ज़ेड सब अनराइटियस बन जाते हैं। हँ? ए टू ज़ेड माना क्या? हँ? ए माना अलफ। ज़ेड माने लास्ट। कौन है अलफ? बिन्दी है अलफ या खड़ा डंडा या पड़ा डंडा है अलफ? (किसी ने कुछ कहा।) तो कौन है अलफ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) मनुष्य सृष्टि का बाप है अलफ। खड़ा है तो अनराइटियस कैसे? हँ? खड़ा है, पड़ा नहीं है तो खड़ा हुआ अच्छा या पड़ गया वो अच्छा? (किसी ने कहा – खड़ा हुआ।) तो अच्छा है तो अनराइटियस कैसे? अरे? (किसी ने कहा – कलियुग के अंत में।) कलियुग अंत में! क्या कलियुग के अंत में? सब अनराइटियस बन जाते हैं। तो जो अव्वल नंबर है वो भी अनराइटियस? हँ? अनराइटियस माना पत्थरबुद्धि या पारसबुद्धि? तो पत्थरबुद्धि को अनराइटियस कहेंगे या राइटियस कहेंगे? अनराइटियस।

लेकिन गीता में तो लिखा है कि सत का इस दुनिया में कभी अभाव नहीं होता। सत माने राइटियस। असत माने अनराइटियस। तो क्या इस दुनिया में पार्ट बजाने वाली आत्मा रूपी पार्टधारियों के बीच में सब अनराइटियस बन जाते हैं? हँ? नहीं बनते? अरे? माना इस मनुष्य सृष्टि में कोई बीज रूप बाप है ना। वो सबका बाप है ना। पत्थरबुद्धियों का बाप है या नहीं है? तो अनराइटियस हुआ या राइटियस हुआ? हँ? क्या हुआ? अनराइटियस हुआ ना। पत्थरबुद्धि है तब तो ब्रह्मवाक्य में बोला – अमृत छोड़ विख काहे को खाए? तो किसने बोला? कौनसी आत्मा ने बोला? शिव बाप ने बोला। किसको खास बोला? हँ? राम वाली आत्मा के लिए बोला। तो निराकार आत्माओं के बाप सुप्रीम सोल बाप की नज़र में अनराइटियस है या राइटियस? हँ? राइटियस है?
(सबने कहा – अनराइटियस।) अनराइटियस है।

तो बताया – इस झूठखण्ड की दुनिया में सब अनराइटियस। तो गीता का वाक्य तो झूठा हो गया। नासते विद्यते भावो ना भावो विद्यते सतः। (गीता – 2/16) इस दुनिया में सत का कभी अभाव नहीं होता क्योंकि ये दुनिया त्रिगुणमयी है। क्या? तीन गुणों से भरी पूरी है। सत, रज, तम। ये तीनों गुण इस दुनिया में कभी भी खत्म नहीं होते। ये ठीक है कि सतयुग में सतगुण की प्रधानता होती है। द्वापर में रजोगुण की प्रधानता होती है। और कलियुग में तमोगुण की प्रधानता होती है। लेकिन सत्वगुण और रजोगुण बिल्कुल वो समाप्त नहीं हो जाता। हो जाता है? नहीं। तो बताओ – ये जो बोला इस दुनिया में जो भी हैं, सब अनराइटियस। सबमें कौन-कौन आ जाते? ए टू ज़ेड सब आ जाते। जो कुछ बोलते, चलते सब अनराइटियस।

तो आखिर सत्य क्या है? गीता शास्त्र, जो दुनिया का पहला नंबर शास्त्र है, वेदवाणी के अनुसार, ब्रह्मा मुख से निकली जो वेदवाणी है, उससे भी पहला शास्त्र। अभी प्रैक्टिकल में देख लें। ब्राह्मणों की दुनिया में ब्रह्मा के मुख से वेदवाणी निकल रही है; निकली या नहीं निकली? और अभी भी ब्रह्मा है। ब्रह्मा की सोल जो कुछ भी बोलती है, वेदवाणी के अनुकूल ही बोलती है। अव्यक्त वाणी का एक भी महावाक्य वेदवाणी मुरली के बरखिलाफ होता ही नहीं। तो वेदवाणी प्रैक्टिकल ब्राह्मणों की दुनिया में देखा जाए, अव्वल नंबर है या उससे भी पहले कोई शास्त्र है? है? नहीं? हँ? अच्छा, ब्रह्मा एक का नाम है या अनेकों के नंबरवार नाम हैं? तो जिस ब्रह्मा के द्वारा वेदवाणी बोली जा रही है, वो अव्वल नंबर ब्रह्मा है क्या? है? अरे! जब अव्वल नंबर ब्रह्मा ही नहीं है तो अव्वल नंबर वाणी कही जाएगी? तो फिर क्या?
(किसी ने कहा – गीता शास्त्र।) हाँ। यज्ञ के आदि में गीता के श्लोकों का ही क्लेरिफिकेशन दिया जाता था।

तो पहले वेदवाणी या पहले गीता? हँ? गीता माता। गीता माता है तो गीता पति भगवान भी है। शिव जयन्ती सो गीता जयन्ती। शिव आता ही है गीता माता की जयजयकार करने। किसकी जयजयकार करने? गीता माता की जयजयकार करने। तो जरूर है कि गीता माता कौनसी माला की हैड बन जाएगी? विजयमाला की हैड बन जाती है। तो गीता माता कौन? अव्वल नंबर गीता। सर्व शास्त्र शिरोमणि, जिससे अव्वल नंबर कोई भी शासन करने का विधान नहीं। सब शास्त्रों का माई बाप। क्या बोला?
(सबने कहा – सबका माई बाप।) सिर्फ माई या माई-बाप दोनों? (सबने कहा – दोनों।) ये कैसे? हँ? (किसी ने कहा – परमब्रह्म।) हाँ। क्योंकि वेदवाणी है। मुरली में बोला - निराकार आत्मा का निराकार बाप जब आते हैं, तो जिस तन में भी प्रवेश करते हैं उसका नाम ब्रह्मा देते हैं। तो वो हो गया परमब्रह्म। अव्वल नंबर ब्रह्मा। और जो अव्वल नंबर ब्रह्मा है वो ही अव्वल नंबर गीता हो गई। वो गीता माता और वो गीतापति भगवान। तो एक है या दो हैं? (किसी ने कहा – एक है।) एक है? हँ? माता तो फीमेल होती है। और पिता तो मेल होता है। तो कौनसी आत्मा मेल? और कौनसी आत्मा फीमेल? हँ? शास्त्रों में जो भी नाम-रूप दिये गए हैं किस आधार पर दिये? काम के आधार पर। तो गीता माता के द्वारा क्या काम किया गया? हँ? (किसी ने कहा – गीता माता।) गीता माता के द्वारा गीता पति भगवान ने माता के रूप में ज्ञान का बीज डाला। और जो ज्ञान का बीज पड़ा तो बीज से किसकी पैदाइश होती है? जिसमें ज्ञान का बीज डाला और जिसने उस ज्ञान बीज को धारण किया, सिर्फ सुनने-सुनाने के लिए नहीं, समझने-समझाने के लिए नहीं। ज्ञान सुन लिया जाए, समझ लिया जाए, समझा लिया जाए, तो बात पूरी हो जाती है? क्या रह जाता है? (किसी ने कहा – प्रैक्टिकल।) प्रैक्टिकल जीवन में धारण करने की बात रह जाती।

तो पहली माता, जो अव्वल नंबर माता है, जिसके लिए शास्त्रों में गायन है गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुर्साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः। उस परमब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूँ। क्या? परमब्रह्म माता गुरु, जो सब शास्त्रों का माई बाप है। वेदों का भी माई-बाप, कुरान का भी माई बाप, बाइबल का भी माई-बाप। जो भी शासन करने के विधान बनाए गए, मनुष्य सृष्टि में उन सबका माई बाप। चलो, माई मान लिया, क्योंकि प्रैक्टिकल में बीज को धारण करने वाली पहली-पहली कौन? हँ? माता। फिर उस बीज की प्रैक्टिकल में पालना करने वाली कौन? जब बीज प्रत्यक्ष होता है, बीज बच्चे के रूप में प्रत्यक्ष हुआ तो बाप का प्रतिरूप है या नहीं है? है। तो माता ब्रह्मा परमब्रह्म और उससे उत्पन्न हुआ बच्चा। क्या? क्या हुआ? ब्रह्मा का बच्चा क्या हुआ? ब्राह्मण। वो पहला-पहला ब्राह्मण भी है। ब्रह्मा और ब्राह्मण।


A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third line of the fourth page was – Whatever people speak, whatever activity they do in today's Iron Age world is all unrighteous because A to Z everyone becomes unrighteous in this world. Hm? What is meant by A to Z? A means Alaf. Z means last. Who is Alaf? Is a point Alaf or is the vertical line Alaf or is the horizontal line Alaf? (Someone said something.) So, who is Alaf? Hm? (Someone said something.) The Father of the human world is Alaf. If he is standing, then how is he unrighteous? Hm? He is standing; he is not lying down, so, is it better if he is standing, or is it better if he lies down? (Someone said – Standing.) So, if he is good, then how is he unrighteous? Arey? (Someone said – In the end of the Iron Age.) In the end of the Iron Age! Is it in the end of the Iron Age? All become unrighteous. So, is the one who is number one also unrighteous? Hm? Unrighteous means stone-like intellect (pattharbuddhi) or elixir-like intellect (paarasbuddhi)? So, will the stone-like intellect be called unrighteous or righteous? Unrighteous.

But it has been written in the Gita that there is never a dearth of truth in this world. Truth means righteous. Untruth means unrighteous. So, among the soul-like actors playing their parts in this world, does everyone become unrighteous? Hm? Don't they become? Arey? It means that there is a seed form Father in this human world, is not he? He is everyone's Father, is not he? Is he the Father of those with stone-like intellect or not? So, is he unrighteous or righteous? Hm? What is he? He is unrighteous, is not he? He has a stone-like intellect; that is why it has been said in the Brahmavaakya – Why do you consume poison instead of nectar? So, who said? Which soul said? Father Shiv said. Whom did He tell especially? Hm? He said for the soul of Ram. So, in the eyes of the Supreme Soul Father, the Father of incorporeal souls, is he unrighteous or righteous? Hm? Is he righteous?
(Everyone said – Unrighteous.) He is unrighteous.

So, it was told – Everyone is unrighteous in this world of abode of untruth. So, the sentence of the Gita became false. Naasate vidyate bhaavo na bhaavo vidyate satah. (Gita 2/16) There is never a dearth of truth in this world because this world is trigunmayi (full of three attributes). What? It is full of three attributes (gun). Sat, raj, tam. These three attributes never end in this world. It is correct that there is dominance of the Satgun in the Golden Age. There is dominance of rajogun in the Copper Age. And there is dominance of tamogun in the Iron Age. But the satwagun and rajogun do not end completely. Do they? No. So, tell – It was said that whoever exists in this world is unrighteous. Who all are included in everyone? A to Z everyone is included. Whatever they speak, whatever they act is unrighteous.

So, ultimately what is truth? Scripture Gita, which is the number one scripture of the world as per Vedvani, it is a scripture older than the Vedvani that emerged from the mouth of Brahma. Now, let's see in practical. Vedvani is emerging from the mouth of Brahma in the world of Brahmins; did it emerge or not? And even now Brahma exists. Whatever the soul of Brahma speaks, it speaks in accordance with the Vedvani only. No sentence of the Avyakt Vani is against the Vedvani Murli at all. So, if you see in the world of Brahmins in practical, is Vedvani number one or is there any scripture before that as well? Is it there? Is it not? Hm? Achcha, is Brahma the name of one or is it the numberwise names of many? So, is the Brahma through whom the Vedvani is being spoken the number one Brahma? Is he? Arey! When he is not the number one Brahma at all, then will it be called number one Vani? So, then what?
(Someone said – Scripture Gita.) Yes. In the beginning of the Yagya the clarification of the shlokas of the Gita only used to be given.

So, is the Vedvani first or is the Gita first? Hm? Mother Gita. When there is Mother Gita, then there is husband of Gita, i.e. God as well. Shiv's birthday is Gita's birthday. Shiv comes only to hail the victory of Mother Gita. To hail whose victory? To hail the victory of Mother Gita. So, definitely the head of which rosary will Mother Gita become? She becomes the head of the rosary of victory (vijaymala). So, who is Mother Gita? Number one Gita. The highest gem among all the scriptures; there is no code of governance ahead in number (rankings) than it. Mother and Father of all the scriptures. What has been said?
(Everyone said – Everyone's Mother and Father.) Just Mother or both Mother and Father? (Everyone said – Both.) How is this? Hm? (Someone said – Parambrahm.) Yes. It is because it is Vedvani. It has been said in the Murli – When the incorporeal Father of the incorporeal soul comes, then whichever body it enters, He names it Brahma. So, he happens to be the Parambrahm. The number one Brahma. And the number one Brahma himself is the number one Gita. He is the Mother Gita and He is the husband of Gita, i.e. God. So, is it one or two? (Someone said – It is one.) Is it one? Hm? Mother is female. And Father is male. So, which soul is male? And which soul is female? Hm? Whatever names and forms have been coined in the scriptures were coined on the basis of what? On the basis of the task performed. So, which task was performed through Mother Gita? Hm? (Someone said – Mother Gita.) Gita's husband God sowed the seed of knowledge through Mother Gita in the form of a mother. And the seed of knowledge that was sowed, who is born through that seed? The one in whom the seed of knowledge was sowed and the one who held that seed of knowledge, not just to listen and narrate, not just to understand and explain. If the knowledge is heard, understood, explained, will everything be over? What remains? (Someone said – Practical.) The topic of inculcating in practical life remains.

So, the first mother, who is the number one mother, for whom it is sung in the scriptures – Gururbrahma Gururvishnu Gururdevo Maheshwarah. Gurursaakshaat Parambrahm Tasmai Shri Guruve Namah. (Brahma, the guru, Vishnu, the guru, deity Maheshwar the guru. I bow before the practical guru who is Parambrahm.) I bow before that Parambrahm. What? Parambrahm Mother Guru, who is the Mother and Father of all the scriptures. Mother and Father of the Vedas as well, Mother and Father of the Koran as well, Mother and Father of Bible as well. Mother and Father of all those Codes for governance which were formed in the human world. Okay, you accepted him as the Mother because who is the first and foremost person to hold the seed in practical? Hm? The Mother. Then who sustains that seed in practical? When the seed is revealed, when the seed is revealed in the form of a child, then is he a reflection of the Father or not? He is. So, Mother Brahma is the Parambrahm and the child born from her. What? What happened? What is the child of Brahma? Brahmin. He is the first Brahmin as well. Brahma and Brahmin.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 25 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2412, आडियो 2898, दिनांक 14.11.17
VCD No.2412, Audio 2898, Dated 14.11.17
प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning Class dated 31.3.1967
VCD-2412-extracts-Bilingual

समय- 0.01-20.57
Time: 00.01-20.57


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. शुक्रवार को चौथे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – स्वर्ग का गेट और नरक का गेट। समझाने के लिए ले जाना चाहिए। उस चित्र पर ले जाना चाहिए जहाँ नरक का गेट और स्वर्ग का भी गेट लगा हुआ है। इंग्लिश में कहते हैं गेट। और हिन्दी में कहते हैं द्वार। स्वर्ग का द्वार और नरक का द्वार। तो फट से कहाँ ले जाना चाहिए? स्वर्ग के द्वार पर ले जाना चाहिए। पहले हिन्दी लैंग्वेज में समझाओ। फिर इंग्लिश में समझाओ। क्योंकि ट्रांस्लेशन में गड़बड़ी तो होती है ना कि एक्यूरेट ट्रांस्लेशन होता है?

तो ले जाना चाहिए पहले स्वर्ग का गेट। गेटवे टू हैविन इज़ महाभारत। सिर्फ भारत नहीं। क्या?
(सबने कहा – महाभारत।) गेटवे टू हैविन इज़ महाभारत। क्या खासियत है महाभारत की? हँ? युद्ध के लिए प्रसिद्ध है। दुनिया का बड़े ते बड़ा युद्ध। नाम दे दिया - महाभारत। जैसे कहते हैं ना महानारायण, महालक्ष्मी। ऐसे ही महाभारत। माना सिंगल भारत नहीं। हँ? (किसी ने कहा – महाभारी महाभारत।) महाभारत। सिंगल भारत क्यों नहीं? हँ? और जब भारत बोलते हैं और जय बोलते हैं तो क्या बोलते हैं? भारत माता की जय। अरे! बार-बार बोलेंगे। क्या? भारत माता की जय! अरे! कोई सुनेगा तो कहेगा ये भारत माता विधवा थी क्या? जो नाम ही नहीं लेते पिता का? अरे! पिता का भी तो नाम लेना चाहिए। नहीं लेना चाहिए? (सबने कहा – लेना चाहिए।) तो माता को आगे क्यों रख दिया? हँ? (किसी ने कहा – माताएं स्वर्ग का गेट खोलती हैं।) माताएं स्वर्ग का गेट खोलती हैं। अरे! पिताओं ने क्या बदसलूकी कर दी जो पिताएं स्वर्ग का गेट नहीं खोल सकते? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) अरे! माताओं से कोई दुश्मनी है क्या पिताओं की? हँ? (किसी ने कहा – नहीं।) नहीं? वो ऐसे क्यों कहती हैं कि माताएं ही स्वर्ग का गेट खोलती हैं पिताएं नहीं खोलते? (किसी ने कहा – सत्य की शक्ति धारण करने में माताएं सक्षम होती हैं।)

अच्छा! सत्य की शक्ति धारण करने में और उस हिसाब से सचखण्ड स्थापन करने में माताएं सक्षम हैं क्योंकि सत कहो, सत्य कहो, सत्व कहो, सत्व किसे कहा जाता है? सत्व। आधा त, व। हँ? सत्व कहा जाता है सार को। किसे कहा जाता है? (सबने कहा – सार को।) सत्व माने सार। तो इस दुनिया के जो मनुष्य मात्र होते हैं उनमें सत्व कहाँ होता है? वो सत्व की शक्ति माताओं-कन्याओं में होती है या पुरुषों में होती है? (किसी ने कहा – माताओं में।) माताओं-कन्याओं में? वाह भई! कहाँ होती है? माताएं तो अपना ही पक्ष ले रही हैं। सत्व की शक्ति कहाँ होती है? अरे! पहले-पहले कहाँ होती है? जिस सत्व की शक्ति को धारण करने वाली धरणी माता सती कही जाती है। क्या कही जाती है? (सबने कहा – सती।) सती कही जाती है। और उस सती की शक्ति के सामने भगवान को भी झुकना पड़ता है।

जालंधर की कथा सुनी? क्या? हँ? जालंधर की मुट्ठी में जब तक वृंदा रही; हँ? तब तक जालंधर को भगवान भी हराय नहीं सका। भगवान का पूरा परिवार ताकत लगा दी लेकिन हराय नहीं सका। और जब उस सत्य की शक्ति जालंधर के हाथ से खिसक गई तो क्या रिजल्ट हुआ? हँ? जालंधर हार गया। तो ये तो सच है कि सत की शक्ति कहो, सत्व की शक्ति कहो, दुनिया की बड़े ते बड़ी शक्ति है। स्वर्ग की दुनिया में भी बड़े ते बड़ी शक्ति है और? नरक की दुनिया में भी बड़े ते बड़ी शक्ति है। देवताओं की दुनिया में भी बड़ी शक्ति है, और? राक्षसों की दुनिया में भी बड़े ते बड़ी शक्ति है।

ये स्वर्ग की दुनिया में और नरक की दुनिया में जो सत्व कहो, सत कहो, शक्ति आती है, ये कहाँ से आती है?
(किसी ने कहा – परमपिता परमेश्वर।) हँ? (किसी ने कहा – याद।) याद से आती है? अच्छा? याद करने वालों में कहाँ से आती है? हँ? दिखाते हैं कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा याद की स्थिति में शंकर को दिखाते हैं चित्रों में। चित्र चरित्र की यादगार होते हैं। तो शंकर में ये याद की शक्ति कहाँ से आई? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जो इस सृष्टि का बड़े ते बड़ा पार्टधारी है, हीरो पार्टधारी, उसमें ये शक्ति भी सुप्रीम सोल से आती है। सुप्रीम सोल का मतलब ही है परमपुरुष। पुरुष का अर्थ क्या है? (किसी ने कहा – आत्मा।) कैसे? (किसी ने कहा – परम आत्मा।) हँ? (किसी ने कुछ कहा।) खिसक गए। परमात्मा अलग बात। और परमपुरुष अलग बात। परमपिता अलग बात। और परमात्मा अलग बात। अगर ऐसा न होता तो हमेशा ऐसे ही क्यों कहते हैं परमपिता परमात्मा? क्यों नहीं कहते परमात्मा परमपिता? कहते हैं? हँ? जैसे शिव-शंकर। क्यों नहीं कहते शंकर-शिव? क्यों नाम लेते हैं शिव का पहले? क्यों नाम लेते हैं परमपिता का? (किसी ने कहा – बाप पहले, बेटा बाद में।) हाँ। क्योंकि वो ऐसा पिता है जिसका पिता कोई नहीं।

इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर देखें तो चार युगों के चक्कर में पार्टधारी आत्मा जो हीरो पार्टधारी कहा जाता है, उसके सिवाय कोई इतना शक्तिशाली नहीं। भले कोई उसे पहचानता नहीं है, जान नहीं पाता। लेकिन वो सृष्टि रूपी रंगमंच पर चारों ही सीन में, सतयुग-त्रेता-द्वापर-कलियुग, पार्ट जरूर बजाता है। परन्तु इन चार युगों में पार्ट बजाने वाले को भी कोई नहीं जानते। और उन चार युगों की, चार ड्रामा के, ह्यूज ड्रामा के सीन्स की शूटिंग कराने वाले डायरेक्टर को भी कोई नहीं जानते, जो सदा पर्दे के पीछे रहता है। क्योंकि हीरो पार्टधारी तो सिर्फ चार युगों रूपी चार सीन्स में ही सबके आँखों के सामने पर्दा डालके रहता है। कोई पहचान पाता? कोई नहीं पहचान पाता। अगडम-बगडम अपनी तुक्के लगाते रहते हैं। कोई क्या कहता है! कोई क्या कहता है! पक्का पता किसी को नहीं। ऐसे ही एक और आत्मा भी है। है तो आत्मा। परन्तु चारों सीन में पार्ट नहीं बजाता। ह्यूज ड्रामा में पार्ट नहीं बजाता। लेकिन शूटिंग पीरियड में ऐसा पार्ट बजाता है और इतना सच्चा पार्ट बजाता है कि उसका मुकाबला कोई आत्मा नहीं कर सकती। हीरो पार्टधारी भी उसका मुकाबला नहीं कर सकता।

तो वो आत्मा कही जाती है परमपुरुष। परम माने बड़े ते बड़ा। परे ते परे पार्ट बजाने वाला। पुरुष माने – पुरु माने नगर। जैसे कानपुर। तो नगर का नाम है ना पुरु। पुरी। जगन्नाथ पुरी। तो जो पुर है वो रहने का स्थान है। शरीर रूपी स्थान। उस शरीर रूपी स्थान में रहने वाली जो आत्मा है, वो ऐसी आत्मा है जो परमपुरुष कही जाती है। आत्मा माने पुरुष। जो शरीर रूपी पुरी में कभी न कभी आराम से शयन करने का पार्ट बजाती हो। भले सब जन्मों में नहीं। लेकिन कोई एक जन्म हर आत्मा के लिए होता है कि वो कैसा पार्ट बजाती? आराम से शयन करती है। जैसे विष्णु को दिखाते हैं। हँ? कैसे पड़ा हुआ है? आराम से शयन कर रहा है। कहाँ शयन कर रहा है? सर्पों को, सर्पिणियों की शैया के ऊपर आराम से शयन कर रहा है। अरे! दुनिया में ऐसे होता है कि कोई सर्पों की शैया बनाए और उस पर आराम से शयन करे? होता है? सर्प काटने के लिए छोड़ देंगे क्या? छोड़ेंगे? हँ? और काटेंगे तो बेहोश कर देंगे कि नहीं? हँ? बेहोश कर देंगे। लेकिन वो विष्णु आराम से पड़ा रहता है।

ये कवियों की भाषा है। क्या? कवियों की भाषा अलंकारात्मक, प्रतीकात्मक होती है। सामान्य मनुष्य इन बातों को नहीं पकड़ पाता क्योंकि मनुष्य तो ज्यादातर सभी विकारी होते हैं कि कोई निर्विकारी मनुष्य भी होता है? निर्विकारी बन जाए तो देवता कहा जाता है। मनुष्य कहा ही नहीं जाता है। और देवताएं तो कुछ मनन-चिंतन-मंथन करते ही नहीं। क्या? मनुष्य किसे कहा जाता है? जो मन का उपयोग करे सो मनुष्य। असली रूप में तो मनु की औलाद को मनुष्य कहा गया। मनु माने जिसने मन बहुत चलायमान किया हो। तो चंचल मन जिनके पास होता है उन्हें तो मनुष्य कहा जाता है। और जो अपनी मन की चंचलता को स्तब्ध कर देते हैं, रोक देते हैं, स्थिर कर देते हैं, उनको देवता कहा जाता है। देवता माने? देवता माने देने की इच्छा करने वाले, किसी से कुछ भी लेने की इच्छा नहीं करने वाले। तो वो देवताएं भी मन को कंट्रोल करने वाले हैं। और मनुष्य? मन को कंट्रोल नहीं कर पाते। और राक्षस? हँ? जिन्हें बाबा कहते जानवरों से भी बदतर बन गए, राक्षस तो जानवर जैसे। जैसे जानवर को आवेग आता है तो ये थोड़ेही देखता कि ये क्या है? इससे मेरा क्या संबंध है? ये मेरी बच्ची है, ये मेरी माँ है, बहन है। जानवर को पता चलता है? हँ? वो तो आवेग आया और फटाक से काम किया। तो उनको कहा जाता है जानवर। और जो मन का उपयोग करते हैं उनको मनुष्य कहा जाता है। मनुष्यों में भी जो श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं सत्व को धारण करने के लिए या जो मनुष्य अपने जीवन में सबसे बड़ी सत्व की शक्ति वीर्य कही जाती है, उसको धारण करने वाले होते हैं या प्रयास करते हैं धारण करने का, वो ऋषि मुनि कहे जाते हैं। क्या कहे जाते? ऋषि। ऋषि का मतलब ही है पवित्र रहने वाला।


A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle of the fourth page on Friday was – The gate of heaven and the gate of hell. You should take there to explain. You should take to that picture where the gate of heaven and the gate of hell is also displayed. It is called a gate in English. And it is called 'dwaar' in Hindi. The gate of heaven and the gate of hell. So, where should you take them immediately? You should take them to the gate of heaven. First explain in the Hindi language. Then explain in English because mistakes take place in translation, don't they or does accurate translation take place?

So, you should take first to the gate of heaven. Gateway to heaven is Mahabharata. Not just Bhaarat. What?
(Everyone said – Mahabharata.) Gateway to heaven is Mahabharata. What is the specialty of Mahabharata? Hm? It is famous for war. The biggest war of the world. A name was given – Mahabharata. For example, it is said Mahanarayan, Mahalakshmi. Similarly, Mahabharata. It means that it is not single Bhaarat. Hm? (Someone said – Mahabhaari Mahabhaarat.) Mahabhaarat. Why is it not single Bhaarat? Hm? And when you say Bhaarat and when you say 'jai' (victory), then what do you say? Bhaarat mata ki jai (victory to Mother India). Arey! You say again and again. What? Bhaarat Mata ki jai. Arey! If anyone listens, he will ask – Was Mother India a widow that you do not utter the name of the Father at all? Arey! You should utter the name of the Father as well. Should you not utter? (Everyone said – We should.) So, why was the mother placed ahead? Hm? (Someone said – Mothers open the gate of heaven.) Mothers open the gate of heaven. Arey! Which misbehavior did the fathers indulge in that the fathers cannot open the gate of heaven? Hm? (Someone said something.) Arey! Do the fathers have any enmity with the mothers? Hm? (Someone said – No.) No? Why do they say that mothers alone open the gate of heaven, fathers don't open? (Someone said – The mothers are capable of inculcating the power of truth.)

Achcha! Mothers are capable of holding that power of truth and establishing the abode of truth because call it truth (sat), satya, satwa; What is meant by satwa? Satwa. Half ta and va. Hm? Essence is called Satwa. What is called [satwa]? (Everyone said – Essence.) Satwa means essence. So, where is the satwa located in all the human beings of this world? Is that power of satwa contained in the mothers and virgins or in men? (Someone said – In mothers.) In mothers and virgins? Wow brother! Where is it located? Mothers are taking their own side. Where is the power of satwa located? Arey! Where is it located first of all? The Mother Earth, which holds that power of truth, is called Sati. What is she called? (Everyone said – Sati.) She is called Sati. And even God has to bow before that power of Sati.

Have you heard the story of Jalandhar? Hm? As long as Vrinda remained in the clutches of Jalandhar; Hm? Even God could not defeat Jalandhar till then. God's entire family used its power, but couldn't defeat him. And when that power of truth slipped from the hands of Jalandhar, then what was the result? Hm? Jalandhar was defeated. So, it is true that call it the power of truth, power of satwa, it is the biggest power of the world. It is the biggest power even in the world of heaven and? It is also the biggest power of the world of hell. It is the biggest power in the world of deities; and? It is also the biggest power in the world of demons.

From where does this satwa, truth, power come in the world of heaven and the world of hell?
(Someone said – The Supreme Father Supreme God.) Hm? (Someone said – Remembrance.) Does it come through remembrance? Achcha? Where does it come from in those who remember? Hm? It is showed in the pictures that Shankar is shown to be in the stage of remembrance more than anyone else in this world. The pictures (chitra) are a memorial of the character (charitra). So, where did the power of remembrance come in Shankar? Hm? (Someone said something.) Yes, the biggest actor in this world, the hero actor also derives this power from the Supreme Soul. The meaning of the Supreme Soul itself is Parampurush. What is meant by purush? (Someone said – Soul.) How? (Someone said – The Supreme Soul.) Hm? (Someone said something.) You changed the topic. The Supreme Soul is a different topic. And the Parampurush is a different topic. The Supreme Father is a different topic. And the Supreme Soul is a different topic. Had it not been so, then why is it always said 'Supreme Father Supreme Soul'? Why is it not said 'Supreme Soul Supreme Father'? Do you say? Hm? For example, Shiv-Shankar. Why is it not said 'Shankar-Shiv'? Why is the name of Shiv uttered first? Why is the name of the Supreme Father uttered (first)? (Someone said – Father first; later the son.) Yes. It is because He is such a Father who doesn't have any Father.

If you look at the world stage, then nobody is as powerful as the actor soul playing its part in the cycle of all the four Ages, which is called the hero actor. Although nobody recognizes him, knows him. But he definitely plays his part in all the four scenes of the world stage, i.e. Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age. But nobody knows the one who plays a part in all these four Ages. And nobody knows the Director, who enables the shooting of those four Ages, the four scenes of the drama, the huge drama, who always remains behind the curtains because the hero actor puts curtains over the eyes of everyone in the four scenes like four Ages only. Does anyone recognize? Nobody is able to recognize. They keep on making wild guesses. Someone says something! Someone says something! Nobody knows firmly. Similarly there is another soul. It is indeed a soul. But it does not play a part in all the four scenes. It does not play a part in the huge drama. But it plays such a part in the shooting period and plays such true part that no soul can be compared with it. Even the hero actor cannot be compared with it.

So, that soul is called Parampurush. Param means biggest. The one who plays a unique part. Purush means – Puru means town/city. Like Kanpur. So, puru is the name of a town/city. Puri. Jagannathpuri. So, the 'pur' is the place of residence. The body like place. The soul which lives in that body like place is such a soul who is called Parampurush. Soul means purush. The one who plays a part of resting comfortably at some point or the other in the body like abode. It may not be in all the births, but in there is one birth for every soul in which it plays what kind of a part? It rests comfortably. Just as Vishnu is shown. Hm? How is he lying? He is resting comfortably. Where is he resting? He is resting over a bed of he-snakes, she-snakes. Arey! Does it happen in the world that someone makes a bed of snakes and rest comfortably over it? Is there anyone? Will you allow the snakes to bite? Will you? Hm? And if they bite, will they make you unconscious or not? Hm? They will make you unconscious. But that Vishnu remains lying comfortably.

This is a language of poets. What? The language of poets is decorative, symbolic. Ordinary human being is unable to grasp these topics because are most of the human beings vicious or is there any viceless human being also? If anyone becomes viceless, then he is called a deity. He is not called a human being at all. And the deities do not think and churn at all. What? Who is called a human being? The one who uses his mind is a human being. In a true form the child of Manu is called a human being (manushya). Manu means the one who has made his mind very inconstant. So, the one having an inconstant mind is called a human being. And those who stop, halt the inconstancy of their mind, make it stable are called deities. What is meant by a deity? Deity means those who desire to give, do not desire to get anything from anyone. So, those deities also control the mind. And the human beings? They are unable to control their mind. And the demons? Hm? For them Baba says they have become worst than animals. Demons are like animals. For example, when an animal becomes excited, then does it see what this one is? What is my relationship with this one? This is my daughter, this is my mother, and this is my sister. And those who use their mind are called human beings. Even among the human beings, those who are righteous human beings, in order to hold the satwa or those human beings who hold the biggest power of satwa, i.e. veerya (semen) or make efforts to hold it are called sages and saints (rishi-muni). What are they called? Rishi (sage). Rishi itself means the one who remains pure.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2413, आडियो 2899, दिनांक 16.11.17
VCD No.2413, Audio 2899, dated 16.11.17
प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning Class dated 31.3.1967
VCD-2413-extracts-Bilingual

समय- 0.01-21.17
Time: 00.01-21.17


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. शुक्रवार को चौथे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – दो गेट हैं – स्वरग का गेट और नरक का गेट। ये समझाने का बहुत अच्छा है। ठक् से स्वर्ग के गेट पर ले जाना चाहिए। पहले हिन्दी में बताओ। क्या? स्वर्ग का दरवाज़ा। और नरक का दरवाज़ा। स्व आत्मा को कहा जाता है। ग माने आत्मिक स्थिति में गया। आत्मिक स्थिति में रहने वाला आत्मिक स्थिति में स्थिर होगा तो स्वरग का दरवाज़ा खोलेगा। और नर मनुष्य को कहा जाता है। नर माने मेल या फीमेल? हँ? मेल। तो नर प्लस क। क माने करने वाला। नर माने नर। नर क्या करने वाला? नरक बनाने वाला। और स्वस्थिति में रहने वाला? स्वर्ग बनाने वाला। अंग्रेजी में नाम लगाय दिया है इंडिया गेट। क्या? इंड आ। क्या आ गया? इंड आ गया। कब आता है एंड दुनिया में? हँ? कहते हैं महारानी विक्टोरिया जब आई थी तो उसके स्वागत में इंडिया गेट बनाया गया। विक्टोरिया का अर्थ क्या है? विक्टरी यह। विक्टरी माने जीत। यह – ये रही जीत। तो उन्होंने तो फालो किया है। विक्टोरिया कौनसे धरम की महारानी? क्रिश्चियन धरम की। और क्रिश्चियन्स ने फालो किया कृष्ण को। बाबा भी ब्रह्म वाक्य मुरली में बोलते हैं कृष्ण और क्राइस्ट की राशि मिलाई जाती है।

तो वास्तव में कृष्ण तो भगवान का बच्चा है। मनुष्य सृष्टि का पहला पत्ता है ना। किसने पैदा किया? हँ? मनुष्य सृष्टि के पहले पत्ते को पैदा किसने किया? जो नर से नारायण बनता है। उसने पैदा किया। जिस बच्चे को पैदा किया मनुष्य सृष्टि के पहले पत्ते को भक्तिमार्ग में उसे समझ लिया है गीता का भगवान, 16 कला संपूर्ण कृष्ण गीता का भगवान। अरे! भगवान तो 16 कला संपन्न देवता बनाने वाला है, बनने वाला तो नहीं है। हँ? वो कलाओं में बंधा हुआ है या कलातीत है? वो तो गाया हुआ है शास्त्रों में – कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। और भक्तिमार्ग में लोगों ने कृष्ण बच्चे को भगवान मान लिया। और कृष्ण बच्चे को बोलते हैं कि 16 कला संपूर्ण था। कीर्तन भी करते हैं, हे कृष्ण नारायण वासुदेव। माने, जो कृष्ण है वो ही नारायण है। वो ही वासुदेव है। लेकिन वास्तव में कलाओं में बंधायमान तो भगवान हो ही नहीं सकता। जो भगवान है कलातीत है। तो किसकी बात है? कृष्ण भगवान नहीं है तो क्या कृष्ण का बाप भगवान है कृष्ण को जन्म देने वाला? हाँ, बीज को बाप कहा जाता है। पत्ते को तो पत्ता ही कहेंगे।

तो जो बीज है मनुष्य सृष्टि का, वो नर होता है कलियुग के अंत में। और भगवान उसको नर से नारायण बनाते हैं। तो नारायण बड़े का नाम है या छोटे का नाम है, बच्चे का नाम है? बड़े का नाम है। क्योंकि नारायण का अर्थ ही है – नार माने ज्ञान जल, अयन माने घर। जो ज्ञान जल रूपी घर में रहता हो। जल से कभी बाहर आता ही न हो। तो क्या बच्चा ज्ञान के जल में रहेगा? हँ? बच्चा की बुद्धि सदैव ज्ञान जल में स्नान करती रहेगी क्या? ज्ञान के मनन-चिंतन-मंथन में रहेगा क्या? नहीं। ये तो कलियुग के अंत में कोई बड़े आयु वाले मनुष्य की बात है जो नर कहा जाता है। उस नर को जिसने नारायण बनाया वो असल में भगवान है। क्यों? क्योंकि भगवान तो ऊँच ते ऊँच को कहा जाएगा कि नीच को कहा जाएगा? भगवान तो परे ते परे स्टेज में रहने वाला होगा। ऐसे परे से परे स्टेज जिससे ऊँची परे की स्टेज में कोई भी न रहता हो। और ऐसा भगवान तो वो ही हो सकता है जो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा हो। उसको कहा जाता है निराकार क्योंकि जो जन्म-मरण के चक्र में प्राणी आते हैं, वो तो साकार होते हैं, साकार शरीरधारी। और जो नर है, नर से नारायण बनता है, वो भी साकार होता है। साकार होगा तो साकारी देह होगी। देह होगी तो देह के बंधन में होगा। अगर देह के बंधन महसूस न हो, तो उसे नारायण बनने की दरकार ही क्या है? तो जो नर को नारायण बनाने वाला है वो सदा निराकारी है। निराकारी, निर्विकारी और निरहंकारी है।

तो वो निराकारी जो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है, उसमें तीनों काल का ज्ञान कैसे आ जाता? हँ? और ज्ञान आता है तीनों काल का, तो किसके आधार पर तीनों काल का ज्ञान आता है? तीन काल के ज्ञान का आधार क्या? हँ? अरे! बिना आधार के कोई कुछ होता है क्या? तो तीनों काल के ज्ञान का आधार तब ही बनता है जब कोई हो तीनों काल में आवर्तन करने वाला, जिसके तीनों काल जब व्यतीत हो जाएं, फिर भी मौजूद रहे। लोप न हो जाए। उसको गीता में कहा है – इस दुनिया में जो सत होता है, सदा सत होता है, तीनों काल में सत होता है, या एक दो काल में सत्य होगा, फिर असत्य हो जाएगा? हँ? तीनों काल में सत होता है। तो तीनों काल में सत रहने वाली एक ही आत्मा है इस मनुष्य सृष्टि पर। और वो हमारे शास्त्रों में शंकर के नाम-रूप से गाई जाती है। जो मान्यता है कि शंकर के मात-पिता का नाम कोई को मालूम ही नहीं। उसने जन्म लिया। कब जन्म लिया? कोई को पता ही नहीं। उसको कभी मृत्यु होते किसी ने देखा ही नहीं। तो वो है जो शास्त्रों में विश्वपिता माना गया है। हर-हर महादेव शंभो काशी विश्वनाथ गंगे। सारे विश्व को नाथने वाला है। क्या? सारे विश्व की जो भी प्राणी मात्र आत्माएं हैं, ऐसे नहीं सिर्फ मनुष्यात्माएं, सबको नाथ डालने वाला। कोई पति होता है ना। तो वो पत्नी को क्या डालता है नाक में? नथनिया डाल देता है कि हमारे कंट्रोल में रहे। तो विश्वपिता है या विश्वपति है, तो सारा विश्व, सभी धर्म की आत्माएं, उसके कंट्रोल में रहेंगी तभी वो विश्वपिता या विश्वपति कहा जाएगा। कंट्रोल में ही न हो तो विश्वपिता या विश्वपति कहा जाएगा? नहीं कहा जाएगा।

लेकिन, वो नर से जब नारायण बनता है तो नारायण बनने से पूर्व वह नर से नारायण बनने वाला, भगवान से भगवान-भगवती की उपाधि ले लेता है। क्या? जैसे कोई बच्चा होता है, तो अपने बाप से उसको अटक मिल जाती है ना। नहीं मिलती? टाइटल नहीं मिलता? हँ? टाइटल मिलता है। बाप का टाइटल बच्चे के ऊपर जाता है। तो ये मनुष्य सृष्टि में जब अनेक धर्म व्याप्त हो जाते हैं तो वो त्रिकालदर्शी भगवान इस सृष्टि पर तब आता है, जब देखता है कि कोई मनुष्यात्मा है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जो तीनों काल को क्रास करके, इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर ठहर जाती है। नहीं तो कोई भी मनुष्यात्मा या प्राणी मात्र नहीं है जो तीनों कालों को क्रास कर सके।


A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. On Friday, the topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fourth page was – There are two gates – the gate of heaven and the gate of hell. This is very good to explain. You should immediately take them to the gate of heaven. First tell in Hindi. What? The gate of heaven (swarg). And the gate of hell. The soul is called swa. Golden Age means 'went to the stage of soul consciousness'. If the one who remains in soul conscious stage becomes constant in the soul conscious stage, then he will open the gate of heaven. And a human being is called nar. Nar refers to male or female? Hm? Male. So, nar+ka. Ka means the doer. Nar means man. What does a nar do? He creates narak (hell). And the one who remains in soul conscious stage? Makes heaven. In English a name has been coined India Gate. What? Ind aa. What came? End arrived. When does the end arrive in the world? Hm? It is said that when Queen Victoria came, the India Gate was built to welcome her. What is meant by Victoria? Victory yah. Victory means win. Yah – This is the victory. So, they have followed it. Victoria is a Queen of which religion? Of Christianity. And the Christians followed Krishna. Baba also speaks in the Brahma vaakya Murli that the zodiac signs (raashi) of Krishna and Christ are matched.

So, actually Krishna is a child of God. He is the first leaf of the human world, is not he? Who gave birth to him? Hm? Who gave birth to the first leaf of the human world? The one who becomes Narayan from nar (man). He gave birth to him. The child, the first leaf of the human world who was given birth, was considered the God of Gita, Krishna, the God of Gita who is perfect in 16 celestial degrees. Arey! God is the one who makes others perfect in 16 celestial degrees; He is not the one who becomes. Hm? Is He bound in celestial degrees or is He beyond celestial degrees? He is praised in the scriptures as Kalaateet Kalyaan Kalpaantkaari (one who is beyond celestial degrees, benevolent and brings the Kalpa to an end). And on the path of Bhakti people accepted child Krishna as the God. And they say for child Krishna that he was perfect in 16 celestial degrees. They also sing, He Krishna Narayan Vasudev. It means that Krishna himself is Narayan. He himself is Vasudev. But actually God cannot be the one who is bound in celestial degrees. God is beyond celestial degrees. So, it is about whom? If Krishna is not God, then is the Father of Krishna God who gives birth to Krishna? Yes, the seed is called Father. Leaf will be called leaf only.

So, the seed of the human world is a man (nar) in the end of the Iron Age. And God makes him Narayan from nar. So, is Narayan the name of a grown-up man or of a young man or of a child? It is the name of a grown-up man because the meaning of Narayan itself is – Naar means the water of knowledge, ayan means house. The one who lives in the water of knowledge like house only. He never comes out of the water at all. So, will a child remain in the water of knowledge? Hm? Will the intellect of the child keep on bathing in the water of knowledge all the time? Will he always remain in the thinking and churning of knowledge? No. This is about a grown-up human being in the end of the Iron Age, who is called nar (man). The one who made that nar to Narayan is God in reality. Why? It is because will the highest on high be called God or will a lowly one be called God? God remains in the highest stage. Such highest stage that nobody else remains in a stage higher than that. And only He can be that God who is beyond the cycle of birth and death. He is called incorporeal because those living beings that pass through the cycle of birth and death are corporeal, corporeal bodily beings. And the one who is nar (man), becomes Narayan from nar is also corporeal. If he is corporeal he will have a corporeal body. If he has a body, he will be in the bondage of the body. If he does not experience the bondage of the body, then where is the need for him to become Narayan at all? So, the one who makes him Narayan from nar is forever incorporeal. He is incorporeal, viceless and egoless.

So, how does that incorporeal who is beyond the cycle of birth and death, get the knowledge of the all the three aspects of time? And when He gets the knowledge of the three aspects of time, then on what basis does He get the knowledge of all the three aspects of time? What is the basis of the knowledge of the three aspects of time? Hm? Arey! Does anything happen without any basis? So, the basis of the knowledge of the three aspects of time is formed only when there is someone who traverses all the three aspects of time and remains existing even when all the three aspects of time pass away. He should not disappear. For him, it has been said in the Gita – The one who is true, forever true in this world, true in all the three aspects of time or does he remain true in one or two aspects of time and becomes false thereafter? Hm? He remains true in all the three aspects of time. So, there is only one soul which remains true in all the three aspects of time in this human world. And it is praised by the name and form of Shankar in our scriptures. It is believed that nobody knows the name of the mother and Father of Shankar at all. He was born. When was he born? Nnobody knows at all. Nobody has ever seen him die. So, he is the one who is believed to be the Father of the world in the scriptures. Har-har Mahadev Shambho Kashi Vishwanath Gange. He is the one who controls the entire world. What? He controls all the living beings of the entire world, not just the human souls. There are husbands, aren't there? So, what does he put in the wife's nose? He puts a nose ring (nathaniya) so that she remains under his control. So, when he is the Father of the world (vishwapita), lord of the world (vishwapati), then he will be called so only when the entire world, the souls of all the religions remain in his control. If they are not under his control at all, then will he be called the Father of the world or the lord of the world? He will not be called.

But when he becomes Narayan from nar, then before becoming Narayan, the one who becomes Narayan from nar, obtains the title of Bhagwaan-Bhagwati from God (Bhagwaan). What? For example, a child gets a title (atak) from his Father, doesn't he? Doesn't he get? Doesn't he get the title? Hm? He gets the title. The Father's title goes to the child. So, in this human world, when numerous religions spread, then that Trikaaldarshi God comes to this world when He sees that there is a human soul on this world stage, which crosses all the three aspects of time and stops on this world stage. Otherwise, there is no human soul or human being who could cross all the three aspects of time.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2414, आडियो 2900, दिनांक 18.11.17
VCD No.2414, Audio 2900, Dated 18.11.17
प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning class dated 31.3.1967
VCD-2414-extracts-Bilingual


समय- 0.01-19.15
Time- 00.01-19.15


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. शुक्रवार को चौथे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – गेट आफ हेविन। इसकी महिमा अपरमअपार है क्योंकि बाप आकरके हेविन का गेट खोलते हैं माताओं के द्वारा। इसकी गत और मत यानि वो तो है उनके अक्षर। गत मत न्यारी। परन्तु गति तो बाद में होती है। पहले तो होती है मति अर्थात् बुद्धि। जिसे कहते हैं श्रीमत। पीछे होती है गति। गति और सदगति। और ये गति और मति ये भी अपसाइड डाउन कर दिया क्योंकि पहले है सदगति के लिए मत देना। तो देखो, कैसे तुम बच्चों को सहज मति देते हैं। श्रीमत अर्थात् श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ भगवान की मत। तो भगवान की मत पर चलना होता है ना। बैरिस्टर की मत पर चलने से बैरिस्टर बनेंगे। डाक्टर की मत पर चलने से डॉक्टर बनेंगे, डॉक्टरानी बन सकते हैं। और भगवान की मत पर चलने से? भगवान और भगवती बनते हैं। और है भी भगवानुवाच क्योंकि मत देने वाला भगवान है। वो ही मुख से उवाच करते हैं। अभी सिर्फ ये फर्क होता है कि कौनसा भगवान मत देने वाला? श्रीमत देने वाला कौनसा भगवान? इसलिए बाबा ने ये नया दिखलाया है कि भई ये तो पहले सिद्ध करो कि भगवान किसको कहा जाता है जो गीता में कहा भगवानुवाच। ये बात तो पहले सिद्ध करो कि मत देने वाला भगवान कौन है?

और वो भगवान के बारे में किसी को मालूम ही नहीं है। भले विदेशी, विधर्मी मानते हैं भगवान निराकार है। मुसलमान बोलते भी हैं अल्ला मियां ने ये फरमाया, वो फरमाया। अब निराकार भगवान अल्ला मियाँ कैसे फरमाएगा? फरमान देने के लिए तो मुख चाहिए ना। तो जो निराकार को मानते हैं उनको भी पता नहीं। कहते हैं खुदा अर्श में रहता है। तो अर्श से फरमान कैसे आएगा? आवाज़ कैसे आएगा? वो तो वाणी से परे धाम है। वहाँ तो वाणी जाती ही नहीं। ये उनको अगर मालूम होता तो इतनी जोर से चिल्लाते भी नहीं – अल्लाह-हो-अकबर। और भारत में कहते हैं भगवान निराकार भी है, भगवान साकार भी है। वो निराकार साकार बनकरके आता है। लेकिन कैसे साकार बनकर आता है, गीता में लिख दिया है कृष्ण का नाम। अब कृष्ण तो 16 कला संपूर्ण देवता। तो भगवान देवता बनाने वाला है या स्वयं देवता है? बनाने वाला है। वो तो देवता से भी ऊँच है। और भगवान क्या बनाएगा? देवता देवता को जन्म देगा। मनुष्य मनुष्य को जन्म देगा। और भगवान? भगवान-भगवती बनाएगा। लेकिन कैसे बनाएगा? अभी कई योरोपियन लोग हैं जो कृष्ण को भगवान थोड़ेही मानेंगे। वो तो कहते भी हैं लॉर्ड कृष्णा। बस वो कहते हैं क्योंकि ये फिर भी स्वर्ग के मालिक हैं ना लक्ष्मी-नारायण। और भारत में कीर्तन करते हैं – हे कृष्ण नारायण वासुदेव। माना जो कृष्ण है वो ही नारायण है। वो स्वरग के फिर भी मालिक हैं। स्वर्ग के मालिक तो भगवान-भगवती ठहरे। नहीं तो और कभी कौन ठहरे? ब्रह्मलोक में, ब्रह्माण्ड में तो कोई महाराजा-महारानी नहीं रखे हैं। ये महाराजा-महारानी तो इस दुनिया में होते हैं ना।

स्वर्ग भी इसी धरती पर और नरक भी इसी धरती पर। स्वर्ग में होता है सुख। सुख आता है सत्वप्रधानता से। नरक में होता है दुःख। नरक आता है तमोप्रधानता से। तो इस धरणी पर सत्वप्रधानता भी होती है। फिर तमोप्रधानता भी होती है। सत्वप्रधान अर्थात् नया। नई चीज़ सुखदायी होती है। पुरानी चीज़ दुखदायी होती है। तो ये स्वर्ग नरक भी धरती पर हैं। ये धरती, जल, वायु, अग्नि, आकाश – ये पाँचों ही तत्व सत्वप्रधान से तमोप्रधान बनते हैं। दुनिया की हर चीज़ पहले सतोप्रधान, फिर बाद में तमोप्रधान होती है। तो ये स्वर्ग और वो नरक। ये दोनों बातें बिल्कुल न्यारी हैं। कैसे? स्व माने आत्मा। ग माने गया। स्वर्ग का मतलब ही है आत्मिक स्थिति में गया। नरक का मतलब ही है – नर माने मनुष्य। क माने करने वाला। मनुष्य विकारी होता है तो वो नरक ही बनाएगा। अंग्रेजी में कहते हैं हैल और हेविन। तो ये बिल्कुल बुद्धि सहज कहती है और बुद्धि अभी इस दुनिया में सबकी मारी गई है। हैल को लाखों वर्ष हो गया। हेविन को लाखों वर्ष हो गया। कहते हैं हैविन पूरा होने में अभी हज़ार, चालीस हज़ार वर्ष। तो बिचारे घोर अंधियारे में हैं क्योंकि मनुष्यों के पास जो हिस्ट्री है ढ़ाई हज़ार साल की और हिस्ट्री में समय की गणना बताते हैं इतने बरस हुआ। संवत भी जितने बनाए, जिसने मनुष्यों ने बनाए हुए हैं, ईस्वी संवत हो, मुसलमानों का क्रिस्त संवत हो, हिन्दुओं का विक्रम संवत हो, शक संवत हो, ये सारे ही संवत ढाई हज़ार वर्ष के अंदर हैं। मनुष्यों ने जो गणना समय की की है, ये ढाई हज़ार वर्ष से ऊपर की कोई गणना नहीं है।

और मनुष्य, मनु की औलाद को मनुष्य कहा जाता है। मनु का मतलब ही है, जिसका मनुआ, मन बड़ा चंचल हो। तो चंचल मन स्वर्ग बनाएगा या नरक बनाएगा? नरक बनाएगा। तो बिचारे सब घोर अंधियारे में हैं। अज्ञानता की नींद में हैं क्योंकि इस दुनिया में जिनकी हिस्ट्री है वो सभी विदेशी धरमपिताएं, इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, आदि ढ़ाई हज़ार वर्ष के अंदर हैं। और सब मनुष्य हैं। कोई को देवता नहीं कहेंगे। ये मनुष्यों की हिस्ट्री मनुष्यों के पास है। देवताओं की हिस्ट्री कोई मनुष्यों के पास नहीं है। क्यों? क्योंकि देवता बनाने वाला तो भगवान है। नर अर्जुन को भगवान ने नारायण बनाया गीता ज्ञान देकर। तो नारायण 16 कला संपूर्ण। देवता भी उनको कहा जाता है जो 16 कला संपूर्ण बनते हैं। और आज के मनुष्यों में तो कोई कला है ही नहीं। बिचारे कलाहीन हुए पड़े हैं। जैसे चन्द्रमा की कला खत्म हो जाती है तो चन्द्रमा कैसा दिखाई देता? चन्द्रमा में उजाला दिखाई देता या अंधेरा दिखाई देता? अंधेरा दिखाई देता। तो कहते हैं चन्द्रमा की कला क्षीण हो गई। ऐसे ही मनुष्यों में आज कलाहीनता आ गई। कला काया चट्ट हो गई। इससे साबित होता है कि इस सृष्टि में जब स्वर्ग था तब 16 कला संपूर्ण थे। और जो पहले-पहले देवता 16 कला संपूर्ण था वो कृष्ण गाया हुआ है, नारायण गाया हुआ है। इससे साबित होता है और कहते भी हैं कृष्णचन्द्र। चन्द्रमा का टाइटल देते हैं। इसका मतलब कृष्ण इस मनुष्य सृष्टि की ऐसी पहली-पहली देवात्मा है जो चन्द्रमा की तरह 16 कला संपूर्ण भी इस सृष्टि पर बनती है और ये सृष्टि जब तामसी बनती है तो कलाहीन भी बन जाती है।


A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. On Friday, the topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fourth page was – Gate of heaven. Its glory is unlimited because the Father comes and opens the gate of heaven through the mothers. Its gat (fate) and mat (directions/opinion), i.e. these are their words. The gat-mat is unique. But the gati takes place later on. First is the mati, i.e. intellect, which is called Shrimat. Later on it is gati. Gati and Sadgati. And this gati and mati has also been made upside down because first it is giving directions for sadgati (true salvation). So, look, how I give easy direction to you children. Shrimat means the direction of the highest God. So, you have to follow God's directions, shouldn't you? You will become Barristers by following the opinion of the Barrister. You will become male or female Doctor by following the opinion of a Doctor. And by following the opinion of God? You become Gods and Goddesses. And it is also God's words (Bhagwaanuvaach) because the one who gives directions is God. He Himself speaks through the mouth. Now the difference is only that which God gives opinion? Which God gives Shrimat? This is why Baba has shown this new that brother, first prove that who is called God for whom it has been said 'Bhagwaanuvaach' in the Gita. First prove this topic that who is the God who gives directions.

And nobody knows about that God at all. Although foreigners, vidharmis believe that God is incorporeal. Muslims also say that Allah Miyaan said this, said that. Well, how will incorporeal God Allah Miyaan speak? In order to issue directions He requires a mouth, doesn't He? So, even those who believe in the incorporeal do not know. They say that Khuda (God) lives in Arsh (beyond the sky). So, how will the orders be received from Arsh? How will the sound travel? That is an abode beyond sounds. Sounds do not reach there at all. Had they known, then they would not even shout so loudly – Allah-O-Akbar. And in India it is said that God is incorporeal as well as corporeal. That incorporeal comes as a corporeal. But how He comes as a corporeal; the name of Krishna has been written in the Gita. Well, Krishna is a deity perfect in 16 celestial degrees. So, does God make you a deity or is He Himself a deity? He is the maker. He is greater than a deity. And what will God make? A deity will give birth to a deity. A human being will give birth to a human being. And God? He will make God-Goddess. But how will He make? Now there are many European people who will not accept Krishna as God. They even say Lord Krishna. They just say because these Lakshmi and Narayan are the masters of heaven, aren't they? And it is sung in India – O Krishna Narayan Vasudev. It means that Krishna himself is Narayan. However, they are the masters of heaven. God-Goddess are the masters of heaven. Otherwise, who else is at any time? There are no Maharajas-Maharanis in Brahmlok, Brahmaand. These Maharajas-Maharanis are in this world, aren't they?

Heaven is also on this very Earth and hell is also on this very Earth. There is happiness in heaven. Happiness comes from purity. There is sorrow in hell. Hell comes from impurity. So, there is purity as well as impurity on this Earth. Satwapradhaan means new. New things give happiness. Old things cause sorrows. So, this heaven and hell are also on the Earth. This Earth, water, air, fire, sky – all the five elements become tamopradhan from satopradhan. Everything of the world is initially satopradhan, and then becomes tamopradhan. So, this heaven and that hell. Both these topics are completely unique. How? Swa means soul. Golden Age means went. Swarg itself means – Went to soul conscious stage. Narak itself means – Nar, i.e. human being. Ka means 'doer'. A human being is vicious; so, he will make hell only. Englishmen say – Hell and heaven. So, this intellect says this easily and in this world everyone's intellect has become dead. [They say] It has been lakhs of years since the hell started. It has been lakhs of years since heaven existed. They say that there are still thousand, forty thousand years for the heaven to end. So, the poor fellows are in complete darkness because the history available with the human beings is of two thousand five hundred years and the calculation of time is told in the history that it has been so many years. All the Eras that were started, the human beings who created them, be it the Christian Era, be it the Christ Era of Muslims, be it the Vikram Era of the Hindus, be it the Saka Era, all these Eras began within two thousand five hundred years. The calculation of time that the human beings have made; none of these calculations are older than two thousand five hundred years.

And the progeny of Manu is called manushya (human being). Manu means the one whose mind (manua, man) is very inconstant. So, will an inconstant mind make heaven or hell? It will make hell. So, poor fellows are all in complete darkness. They are in the slumber of ignorance because all the foreigner founders of religions – Ibrahim, Buddha, Christ, etc., whose history is available in this world have existed within 2500 years only. And all are human beings. Nobody will be called deities. Human beings have this history of human beings. No human being has the history of deities. Why? It is because it is God who makes deities. God made man Arjun as Narayan by giving the knowledge of the Gita. So, Narayan is perfect in 16 celestial degrees. Only those who become perfect in 16 celestial degrees are called deities. And today's human beings do not have any celestial degree at all. Poor fellows have become devoid of celestial degrees. For example, how does the Moon look when its celestial degrees finish? Is there light visible in the Moon or is darkness visible? Darkness is visible. So, it is said that the celestial degrees of the Moon have become weak. Similarly, human beings have today become devoid of celestial degrees. The celestial degrees and the body have become weak. This proves that when there was heaven in this world, then they were perfect in 16 celestial degrees. And Krishna is praised, Narayan is praised as the first deity who was perfect in 16 celestial degrees. This proves that and people also say Krishnachandra. A title of Moon (chandrama) is given. It means that Krishna is the first and foremost deity soul of this human world who becomes perfect in 16 celestial degrees like the Moon in this world itself and when this world becomes degraded, then it becomes devoid of celestial degrees as well.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 Oct 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
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VCD No.2414, Audio 2900, Dated 18.11.17
प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning class dated 31.3.1967
VCD-2415-extracts-Bilingual

समय- 0.01-20.00
Time: 00.01-20.00


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. शुक्रवार को चौथे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी –तुम बच्चों को एक ही फुरना रहती है - सर्विस कैसे करें? कोई न कोई फुरना होती है ना। बस ईश्वरीय सेवा करें, बाबा को याद करें और सतोप्रधान बनें। और बाबा तो बताया ही है कि मामेकम् याद करो। सतोप्रधान बनने के लिए मामेकम् याद करो। कोई दूजम, तीजम, चौथम, और किसी को याद न करो। क्यों? दूसरों को याद करने में क्या ईर्ष्या द्वेष आ रहा है? हँ? क्योंकि एक ही है जो शिव समान बनता है, संपूर्ण बनता है। और संगमयुगी शूटिंग पीरियड में जबसे संपूर्ण बनता है तबसे अंत तक, उल्टी सीढ़ी चढ़ रहे हैं ना। तो उल्टी सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते तीनों काल जब क्रॉस हो जाता है तब तक सतोप्रधान स्टेज में ही रहता है। फिर तो शूटिंग काल ही खतम हो जाता है। तो ऐसे को याद करेंगे जो पुरुषार्थी जीवन में पुरुषार्थ करते-करते आखरीन शिव समान स्टेज को पा लेता है। जो ब्रह्म वाक्य है मुरली में – मैं तुम बच्चों को आप समान बनाकर जाऊँगा।

थोड़ा-थोड़ा हिन्दी कौन-कौन जानता है हाथ उठाओ। हाँ, तो जो शिव है ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त क्योंकि वो ही एक आत्मा है जो कभी जन्म-मरण के चक्र में नहीं आती है। और हम सब आत्माएं मनुष्य सृष्टि पर जो भी हैं, पार्ट बजाने वाली वो सब जन्म-मरण के चक्र में आने के कारण पिछले जन्मों की सारी बातें भूल जाते हैं। खास करके जो सृष्टि चक्र में महामृत्यु का टाइम आता है, वो एक ऐसा बड़ा एक्सिडेंट है, दुनिया का बड़े ते बड़ा एक्सिडेंट कि जिस एक्सिडेंट के बाद हम आत्माएं सब कुछ भूल जाती हैं। यहाँ तक कि मनुष्य सृष्टि की जो अव्वल नंबर आत्मा है, जिस अव्वल नंबर आत्मा के द्वारा ऊँचे से ऊँचा भगवन्त शिव नई सृष्टि की स्थापना कराता है राजयोग की बातें बताकर। और उस अव्वल नंबर आत्मा के द्वारा जैसे मुसलमानों में आज तक भी ये मान्यता है अल्लाह अव्वलदीन। अल्लाह ने आकर अव्वल नंबर दीन अर्थात् धर्म की स्थापना की। तो अव्वल नंबर धर्म की स्थापना तो अव्वल नंबर धर्मपिता ही करेगा। और धरमपिता जिस धर्म की स्थापना करता है, स्थापना के निमित्त बनता है, उस धर्म को फालो करने वाली आत्माएं जब तक इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर रहती हैं, तब तक धरमपिता रहता है परन्तु और-और जो धरमपिताएं हैं नंबरवार, वो तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अल्पकाल का पार्ट बजाते हैं। और वो अव्वल नंबर का धरमपिता तो अव्वल नंबर पार्टधारी है जिसे हीरो पार्टधारी कहा जाता है।

तो वो हीरो पार्टधारी, उसको हीरो बनाता कौन है? हँ? वो स्वयं अपने पुरुषार्थ से हीरो बनता है या कोई बनाता है? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ अगर कहें बनाता है तो बात आती है औरों को क्यों नहीं बनाता? बनाने वाला पार्शलटी करता है क्या? पार्शलटी तो नहीं कर सकता। हाँ, वो मत देता है। क्या? मत माने अकल। बुद्धि देता है क्योंकि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर एक वो ही आत्मा है जो बुद्धिमानों की बुद्धि है। सर्वोत्तम बुद्धिवान आत्मा। जैसा गीता में लिखा है कि इन्द्रियां बड़ी प्रबल हैं। इन्द्रियों से मन प्रबल है, और मन से मनुष्यों की बुद्धि प्रबल है। और मनुष्यों में भी कोई एक मनुष्य है सारी मनुष्य सृष्टि का बीज, जो बहुत प्रबल है। त्रिनेत्री कहा जाता है। कोई चित्र देखा है त्रिनेत्री का? हँ? कौनसा चित्र देखा? शंकर का चित्र देखा। भारतीय परंपरा के शास्त्रों में त्रिनेत्री के नाम से शंकर प्रसिद्ध है। और उसका जो तीसरा नेत्र है, वो बुद्धि का नेत्र कहा जाता है। जिसके लिए कहा गीता में कि मन से भी प्रबल वो त्रिनेत्री बुद्धि है। और फिर बताया – यो बुद्धया परसस्तु सः। (गीता 3/42) जो उस बुद्धिमान से भी परे ते परे है वो वो है।

तो साबित हो जाता है कि बुद्धिमानों की बुद्धि कौन है?
(किसी ने कहा - शिव।) कोई नीचे वाला है या कोई ऊपर है? कोई है। इसलिए है कि वो त्रिकालदर्शी है। तीनों काल के सत्य का ज्ञाता है। इसलिए उसको सत्यम् शिवम् सुन्दरम् कहते हैं। अंग्रेज लोग कहते हैं गॉड इज़ ट्रुथ, और ट्रुथ इज़ वन वो एक ही है। परन्तु जैसे हम आत्माएं बिन्दु-बिन्दु हैं वो भी बिन्दु है। फिर पहचान में कैसे आएगा? ये भी बिन्दी, वो भी बिन्दी, वो भी बिन्दी, 500-700 करोड़ सब मनुष्यात्माएं बिन्दी। कैसे पहचानें? (किसी ने कहा – ज्ञान से।) जब वो प्रवेश करे हम बच्चों में से किसी एक मुकर्रर रथ में। एक शरीर रूपी रथ में परमानेन्ट प्रवेश करे तब पहचाना जाए। तो गीता में भी एक शब्द आया है प्रवेष्टुम्। मैं प्रवेश करने योग्य हूँ। तो वो प्रवेश करता है। और गीता के मुखपृष्ठ पर जो चित्र दिखाया है; कौनसा चित्र दिखाते हैं? मुखपृष्ठ पर कौनसा चित्र दिखाते हैं? रथ। अर्जुन का रथ दिखाते हैं ना। अर्जुन के रथ में भगवान सारथि के रूप में बैठे। अर्जुन रथी है। और गीता में कहा है बुद्धिमान नर अर्जुन। क्या? मनुष्यों के बीच अगर कोई बुद्धिमान मनुष्य है जो गीता ज्ञान को अच्छी तरह से ग्रास्प करने वाला है, वो बुद्धिमान कौन? अर्जुन। तो वो अर्जुन वास्तव में कोई दूसरी आत्मा नहीं है। अर्जुन माने अर्जन करने वाला, कमाई करने वाला, धन का उपार्जन करने वाला। और धन कौनसा श्रेष्ठ है? बड़े ते बड़ा धन, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ है ज्ञान धन। और ज्ञान कहा जाता है जानकारी को। काहे की जानकारी? सत्य की जानकारी।

तो वो सत्य की जानकारी देने वाला भगवान अर्जुन के रथ में प्रवेश करता है। रथ माना शरीर। शास्त्रों में भी कहा है – शरीरं रथं विद्धि, इन्द्रियाणि हयान्याहु। शरीर को रथ समझ और इन्द्रियों को घोड़ा समझ। तो दिखाया गया गीता के मुखपृष्ठ पर कि अर्जुन के शरीर रूपी रथ में भगवान प्रवेश होकरके उस रथ को कंट्रोल करते हैं। किसको कंट्रोल करते हैं? रथ को। आत्मा को नहीं? रथ को कंट्रोल करते या आत्मा को कंट्रोल करते? आत्मा को नहीं कंट्रोल करते। आत्मा को स्वतंत्र छोड़ते। मेरी बात मानो या न मानो। जब तुम्हारी समझ में आ जाए तब मानो। फोर्स नहीं करते। ऊँच ते ऊँच है ना। तो वो ऊँच ते ऊँच कभी जोर जबरदस्ती नहीं करता। क्या? स्वतंत्र रहो और स्वतंत्र रहने दो। आत्मा को कंट्रोल नहीं किया। अर्जुन की आत्मा को भी कंट्रोल नहीं करता। कोई भी मनुष्य मात्र की आत्मा को कंट्रोल नहीं करता। जिनमें प्रवेश करता है; मनुष्य तन में ही प्रवेश करता है। तो उसका नाम देता है ब्रह्मा। और ब्रह्मा नामधारी तो शास्त्रों में 4-5 गाए हुए हैं। चतुर्मुखी ब्रह्मा, पंचमुखी ब्रह्मा। तो अव्वल नंबर का कोई तो ब्रह्मा होगा ना।

तो जिस अव्वल नंबर ब्रह्मा में प्रवेश करता है वो है परमब्रह्म। परम माने परे ते परे स्टेज में पार्ट बजाने वाली माँ। प्रबल ते प्रबलतम माँ। जिस माँ से जास्ती प्रबल पार्ट कोई आत्मा बजा ही नहीं सकती। इसलिए हमारे भारत में आदि काल से ही माता को विशेष प्रिफरेंस दिया है। इसलिए कहा जाता है माता-पिता। ये नहीं कहते पिता-माता। माता-पिता। और शिव के मन्दिर में भी जाते हैं तो भी कहते हैं – त्वमेव माता च पिता त्वमेव। तू ही मेरी माता है। माता को आगे रखते हैं। क्यों? क्योंकि वो जब आता है तो पहले-पहले इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जिस आत्मा के तन में भी प्रवेश करे, करता तो पुरुष तन में ही है, परन्तु जिस पुरुष तन में प्रवेश करता है, उसका नाम देता है ब्रह्मा। उसमें आकरके बीज डालता है, सीड। काहे का बीज? ज्ञान का बीज। इसलिए गीता में लिखा है अहम् बीज प्रदःपिता। (गीता 14/4) हँ? मैं कौन? वो ज्ञान का बीज डालने वाला पिता हूँ। साधारण पिता नहीं है। परमपिता। तो परमपिता। वो परमपिता को क्या चाहिए? परममाता। परमब्रह्म। वो परमब्रह्म वो परमपिता वो परमपुरुष। क्या? वो क्या है? परमपुरुष। और जिसमें प्रवेश करके अपना कार्य कराता है, वो है पराप्रकृति। प्र माने प्रकष्ठ, कृति माने रचना। क्या? उसकी प्रकष्ठ रचना। प्रकृति। तो जो ऋषि-मुनि-विद्वान हुए, उन्होंने ये बात बताई, इस मनुष्य सृष्टि की प्रत्येक आत्मा को ये बात बताई कि ये जो मनुष्य सृष्टि है उसमें दो ही मुख्य हैं। एक पुरुष और एक प्रकृति। प्रकृति है माता और पुरुष है पिता। तो वो पिता माता में प्रवेश करके नई सृष्टि रूपी परिवार की रचना करता है। या कहो कराता है। कैसे? ज्ञान का बीज डाल देता है।

A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the fourth page on Friday was – You children have only one worry (furnaa) – How should we do service? You have one or the other worry, don't you? We should just do Godly service, remember Baba and become satopradhan. And Baba has already told – Remember Me alone. Remember Me alone to become satopradhan. Do not remember any second, third, fourth person and anyone. Why? Why is jealousy and malice emerging in remembering others? Hm? It is because there is only one who becomes equal to Shiv, becomes perfect. And in the Confluence Age shooting period, ever since he becomes perfect, from that time till the end; we are climbing the staircase in the opposite direction, aren't we? So, while climbing the staircase in the opposite direction, when he crosses all the three aspects of time, he remains in a satopradhan stage only. Then the shooting period itself ends. So, if you remember such a person who ultimately achieves the Shiv-like stage while making purusharth. There is a Brahmavaakya in the Murli – I will make you children equal to Myself and go.

All those who know a little Hindi, raise your hands. Yes; so, Shiv is the highest on high God because His is the only soul which never passes through the cycle of birth and death. And we all souls existing, playing our parts in the human world forget all the topics of the past births because of passing through the cycle of birth and death. Especially when the time of large scale deaths (mahamrityu) comes in the world cycle, then it is such a big accident, the biggest accident of the world that after that accident we souls forget everything to the extent that the number one soul of the human world, the number one soul through whom the highest on high God Shiv establishes a new world by narrating the topics of rajyog and through that number one soul, for example, it is believed by the Muslims even to this day – Allah Avvaldeen. Allah came and established the number one Deen, i.e. religion. So, the number one religion will be established by the number one founder of religion only. And the religion that a founder of religion establishes, becomes instrumental in establishing; as long as the souls which follow that religion remain on this world stage, the founder of the religion remains till then, but the other founders of religions are numberwise; they play their parts on this world stage temporarily. And that number one founder of religion is the number one actor who is also called hero actor.

So, that hero actor; who makes him a hero? Hm? Does he himself become a hero with his own purusharth or does anyone make him?
(Someone said something.) Yes, if we say that someone makes him, then a question arises as to why doesn't He make others? Does the maker show partiality? He cannot do partiality. Yes, He gives directions (mat). What? Mat means intelligence. He gives intellect because His is the only soul on this world stage which is the intellect of all intelligent ones. He is the most intelligent soul. For example, it has been written in the Gita that the organs are very strong. Mind is stronger than the organs and the human intellect is stronger than the mind. And among the human beings, there is a human being who is the seed of the entire human world, who is very strong. He is called Trinetri (three-eyed). Have you seen any picture of the Trinetri? Hm? Which picture have you seen? You have seen the picture of Shankar. In the scriptures of the Indian tradition Shankar is famous by the name of Trinetri. And his third eye is called the eye of intellect for which it has been said in the Gita that that Trinetri intellect is stronger than the mind. And then it has been told – Yo buddhya parasastu sah. (Gita 3/42) He is the one who is higher than that intelligent one.

So, it is proved that who is the intellect of the intelligent ones?
(Someone said – Shiv.) Is it someone who is below or is it someone above? There is someone. He exists because He is Trikaaldarshi. He knows the truth of all the three aspects of time. This is why He is called Satyam Shivam Sundaram. Englishmen say – God is truth; and He alone is 'truth is one'. But just as we souls are point-like, He is also a point. Then, how can He be recognized? This is also a point, that is also a point; that is also a point; all the 500-700 crore human souls are points. How can we recognize? (Someone said – Through knowledge.) It is when He enters in a permanent Chariot from among us children. He can be recognized when He enters in a permanent way in a body like Chariot. So, a word 'Praveshtum' has been mentioned in the Gita as well. I am capable of entering. So, He enters. And the picture that is shown on the cover page of the Gita; which picture is depicted? Which picture is shown on the cover page? Chariot. Arjun's Chariot is shown, is not it? God sat as a charioteer (saarathi) in the Chariot of Arjun. Arjun is the rider (rathi). And it has been said in the Gita – Intelligent man Arjun. What? If there is any intelligent human being among human beings, who grasps the knowledge of Gita nicely, that intelligent one; who? Arjun. So, that Arjun is actually not any other soul. Arjun means the one who earns, the one who earns wealth. And which wealth is righteous? The biggest wealth, the most righteous one is the wealth of knowledge. And information is said to be knowledge. Information of what? The information of truth.

So, that God, who gives the information of truth, enters in a Chariot. Chariot means body. It has been said in the scriptures also – Shariram ratham viddhi, indriyani hayaanyaahu. Consider the body to be a Chariot and consider the organs to be a horse. So, it has been shown on the cover page of the Gita that God enters in the body like Chariot of Arjun and controls that Chariot. Whom does He control? The Chariot. Not the soul? Does He control the Chariot or the soul? He does not control the soul. He leaves the soul free. You may accept My words or not. Accept it whenever you understand them. He does not force. He is the highest on high, is not He? So, that highest on high never forces. What? Be free and let others be free. He did not control the soul. He does not control even the soul of Arjun. He does not control the soul of any human being. The one in whom He enters; He enters in a human body only. So, He names him Brahma. And 4-5 persons are praised in the scriptures as the titleholders of Brahma. Four headed Brahma, five headed Brahma. So, there must be a number one Brahma, will there not be?

So, the number one Brahma in which He enters is the Parambrahm. Param means the mother who plays a part in the highest stage. The strongest mother. No soul can play a stronger part than that mother at all. This is why in our India Mother has been given special preference from the beginning itself. This is why it is said Mother-Father (maaat-pita). It is not said Father-Mother. Mother-Father. And even when you go to the temple of Shiva you say – Twamev mata cha pita twamev. You alone are my Mother. Mother is kept ahead. Why? It is because when He comes, then in whichever soul's body He enters on this world stage; He enters in a male body only, but in whichever male body He enters, He names Him Brahma. He comes and sows the seed in him. Seed of what? Seed of knowledge. This is why it has been written in the Gita – Aham beej Pradahpita. (Gita 14/4) Hm? Who am I? I am that Father who sows the seed. He is not an ordinary Father. Supreme Father. So, Supreme Father. What does that Supreme Father want? Supreme Mother. Parambrahm. He is Parambrahm; He is the Supreme Father, He is the Parampurush. What? What is He? The Parampurush. And the one in whom He enters and enables His task is the Paraaprakriti. Pra means prakashth, kriti means creation. What? His special creation. Prakriti. So, the sages, saints, scholars who existed, told a topic; they told a topic to every soul of this human world that there are only two things important in this human world. One is Purush and one is Prakriti. Prakriti is the Mother and Purush is the Father. So, that Father enters in the Mother and creates the new world like family. Or you may say – He enables. How? He sows the seed of knowledge.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 01 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2416, आडियो 2902, दिनांक 22.11.2017
VCD 2416, Audio 2902, 22.11.2017
प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning Class dated 31.3.1967
VCD-2416-extracts-Bilingual

समय- 0.01-23.16
Time: 00.01-23.16


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. शुक्रवार को चौथे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी –तुमको जो कुछ भी फुरना है वो एक ही है – कैसे सेवा करें। और कैसे सतोप्रधान बनें? बाबा ने तो तरीका बताया है – मामेकम् याद करो। कोई और को याद न करो। किस आत्मा ने कहा – मामेकम् याद करो? हँ? किसने कहा? किस आत्मा ने कहा मामेकम् याद करो? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) शिव बाप ने कहा? शिवबाबा ने कहा। दोनों में क्या अंतर है? शिव बाप है सभी आत्माओं का बाप। उसकी आत्मा का कोई बाप नहीं। और उस सुप्रीम बाप, जिसका कोई बाप नहीं, वो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है। इसलिए त्रिकालदर्शी है। तीनों काल का ज्ञाता है। इसलिए उसको कोई मनन-चिंतन-मंथन करने की दरकार नहीं है। वो असोचता है। उसको सोच-विचार करने की दरकार नहीं। उसको मन है ही नहीं सोच-विचार करने के लिए। वो तो शुद्ध बुद्धि है। बुद्धिमानों की बुद्धि है।

उसमें चंचल मन कहाँ से आया? वो जिसमें प्रवेश करता है, इस सृष्टि में आकर, जबकि ये सारी सृष्टि तमोप्रधान बन जाती है कलियुग के अंत में, तब सतयुग आदि की सृष्टि की रचना करने के लिए आता है। पुरानी दुनिया को खलास करके नई दुनिया रचाने के लिए आता है। और जिस तन में आता है, उसके द्वारा कहता है मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। अर्थात् जो तनधारी आत्मा है, वो याद करते-करते संपन्न स्टेज में पहुँचती है तो वो ही आत्मा कह सकती है मनमनाभव, मेरे मन में समा जा। क्योंकि शिवबाप को मन नहीं है। वो जिसमें प्रवेश करता है, उसको चंचल मन होता है। उस चंचल मन को योगबल के द्वारा कंट्रोल करना, एकाग्र करना उसी आत्मा का काम है जो आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों के बीच में बड़ा भाई है। और उस बड़ा भाई आत्मा को शिव बाप अपनी त्रिकालदर्शिता का सारा वर्सा देते हैं। वो है ही निराकार आत्माओं का निराकार बाप। निराकार बाप के पास निराकारी वर्सा ही होगा। और वो निराकारी वर्सा है अखूट ज्ञान का भण्डार। वो जब आता है तो आत्मा-आत्मा भाई-भाईयों के बीच जो बड़ा भाई है, जिसको गीता शास्त्र में नाम दिया है परम आत्मा इति उदाहृतः। (गीता 15/17) उसे परम आत्मा कहा जाता है। कैसी आत्मा? जो परम पार्टधारी है। हीरो पार्टधारी है। उस हीरो पार्टाधारी में प्रवेश करके उसे जीरो से हीरो तक पहुँचाता है। या यों कहें वो जीरो आत्मा शिव बाप की याद से हीरो बन जाती है। वो आत्मा के लिए है ये मनमनाभव मंत्र कहना कि मेरे मन में समा जा। तेरे मन में क्या है? एक शिव बाप दूसरा न कोई।

तो सभी को इस महामंत्र को धारण करना है। तब ही हर आत्मा संपन्न बनेगी। और संपन्न बनेगी तो जो संपन्न धाम है, जिसे परे ते परे धाम कहा जाता है, परमधाम, वहाँ की वासी बनेगी। हर आत्मा को संपन्न बनने के बाद इस दुःखी संसार से मुक्त होना है। सभी आत्माएं दुख से, अशांति से मुक्त होना चाहती हैं। तो जो ऊँचे ते ऊँचा भगवंत है, वो हर आत्मा की आस पूरी करता है। सबको मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा दिलवाता है। लेकिन स्वयं रास्ता बताता है, युक्ति बताता है, बुद्धिमानों की बुद्धि है ना। इसलिए, सबको बुद्धि का दाता है। वैसे भी इस दुनिया में मनुष्य कहते हैं कि जब हम इस दुनिया में आए तो अल्लाह ताला ने हमें बड़ी नियामत बख्शीश दी थी। वो बड़े ते बड़ी नियामत है - बुद्धि का वरदान। हर आत्मा को जन्म लेते ही अपने-अपने प्रकार की नंबरवार बुद्धि प्राप्त होती है। उस बुद्धि के आधार पर ही हर आत्मा जीवन में प्रयत्नशील रहती है।

तो वो बुद्धिमानों की बुद्धि बाप क्या देता है? हँ? स्वर्ग देता है? नर्क देता है? शांति देता है? सुख देता है? वो सुखदाता है? सुख भोगता है? जिसके पास स्वयं ही सुख नहीं है, वो दूसरों को सुख कैसे देगा? फिर वो ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त कैसे है? वो ऊँचे ते ऊँचा इसलिए है कि वो ऊँचे ते ऊँची बुद्धि देता है नंबरवार। बुद्धिमानों की बुद्धि है ना। इसीलिए तो गीता में कहा है – ये इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल हैं। इन्द्रियों से मन बड़ा प्रबल है। ग्यारहवीं इन्द्रिय। और मन से मनुष्यों की नंबरवार बुद्धि बड़ी प्रबल है। और जो मनुष्यों की बुद्धि से भी प्रबल है, परे ते परे है वो ‘बुद्धय परसत्व सः’ (गीता 3/42) वो वो है जो इस नीचे की दुनिया का रहने वाला नहीं है। परे ते परे, ऊँच ते ऊँच धाम का वासी है। गाते भी हैं ऊँचा तेरा धाम, ऊँचा तेरा नाम, तो वो ऊँच ते ऊँच भगवंत बुद्धि का दाता है। बुद्धि ही हज़ार नियामत है। बुद्धि से बड़ी नियामत, बड़ी देन और कोई चीज़ नहीं। बुद्धि से ही सत्य असत्य का निर्णय किया जाता है। बुद्धि से ही अच्छे और बुरे की परख की जाती है। श्रेष्ठ और निकृष्ट की परख की जाती है। उस दुनिया में जो भी 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएं हैं बुद्धिमान, जिनकी बुद्धि इस दुनिया के सुख भोगते-भोगते आखरीन तामसी बन जाती है, पत्थरबुद्धि बन जाती है, उन पत्थरबुद्धियों को पारसबुद्धि बनने का रास्ता बताता हूँ। इसलिए रास्ता बताने वाले का नाम हमारे भारतीय संस्कृति में, शास्त्रों में पंडा रखा गया। जैसे पाण्डवों के बाप का नाम पाण्डु था। पंडा के पुत्र पाण्डव कहे गए। जैसे ब्रह्मा के पुत्र ब्राह्मण कहे गए।

तो वो बड़े ते बड़ा पण्डा है। अच्छे ते अच्छे धाम अर्थात् घर में ले जाने वाला रास्ता बताता है। ऊँचे ते ऊँचा त्रिकालदर्शिता का ज्ञान देता है। तीनों काल का ज्ञान। वो अखूट ज्ञान का भण्डार देता किसको है? हँ? अरे! दुनिया में भी जितने बाप हुए हैं, जो भी हिस्ट्री में राजाएं हुए हैं, उन्होंने अपना वर्सा कौनसे बच्चे को दिया? बड़े बच्चे को दिया। तो ये भी आत्मा रूपी बिन्दु-बिन्दु बच्चे हैं मनुष्यात्माएं। इन 500-700 करोड़ मनुष्यात्माओं के बीच वो जो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा परमपिता शिव है, जिसकी ज्योतिबिन्दु आत्मा का ही नाम शिव है। क्योंकि उसको अपना शरीर है ही नही, वो शरीर के बंधन में बंधता ही नहीं। क्योंकि जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है। जन्म-मरण के चक्र में वो आते हैं जो इन्द्रियों से कर्म करते हैं। वो तो अकर्ता है। मुसलमान लोग जैसे कह देते हैं – अल्लाह मियाँ ने जन्नत बनाई, अल्ला मियाँ ने ज़मीन बनाई, अल्ला मियाँ ने आफताब बनाया, सूर्य; अल्ला मियाँ ने आसमान बनाया। नहीं। वो कुछ भी बनाता, करता नहीं है। वो है ही अकर्ता।

वो तो सिर्फ रास्ता बताता है’; जीवन जीने के लिए बुद्धि का दाता है। मत देता है। जो कहा जाता है तुम्हारी गत-मत न्यारी। अर्थात् गति करने वाला और मति देने वाला कोई है जरूर जो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मति देता है। और उस मति के आधार पर जो आत्मा पुरुषार्थ करती है, प्रबलतम पुरुषार्थ। पुरुष अर्थ, पुरु माने शरीर। अर्थ माने लिए। ऐसे नहीं है पुरु माने रहने का स्थान। पुरी। शहर या गाँव। और उस पुरी में रहने वाला। तो ये शरीर है पुरी, पुरु। और उसमें रहने वाली आत्मा है, उसको कहा जता है आत्मा। शरीर रूपी पुरु में रहने वाला पुरुष। अर्थात् शरीर रूपी पुरु में रहकरके जो आराम से रह सकता है, कोई प्रकार की बेआरामी महसूस न करे, उसको कहते हैं पुरुष। अर्थात् आत्मा। और उन आत्माओं के बीच में एक आत्मा है परमपुरुष। परमपुरुष अर्थात् ऐसे शरीर रूपी पुर में रहती है जो पतिततम कामी काँटा होता है। ऐसे दुनिया के बीच में वो कामी कांटा रहता है जिससे बड़ी दुखदायी दुनिया कभी बनी ही नहीं। ऐसे कलियुग के अंत की घोर पापियों की दुनिया, जिस दुनिया के लिए कहा जाता है झूठै लेना, झूठै देना, झूठै भोजन, झूठ चबैना। ब्रह्म वाक्य मुरली में भी है – झूठै झूठ मिरई झूठ, सच की रत्ती भी नहीं। रत्ती होती है ना। गुमची की माला में जो एक गुमची का मणका होता है लाल-लाल काले मुँह वाला, उसका वजन एक रत्ती। तो इतनी बड़ी दुनिया में सच्चाई की एक रत्ती भी नहीं रहती। इतनी झूठ दुनिया हो जाती है। ऐसी दुनिया के बीच रहने वाले पतिततम कामी कांटे में आता है। सुप्रीम सोल बाप। और बड़े आराम से रहता है। कोई भी प्रकार की बेआरामी कभी महसूस नहीं करता। कभी बेचैन नहीं होता। चैन से पार्ट बजाता है श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत देने का। वो सदा अमन चैन में रहने वाला है।

A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. On Friday, the topic being discussed in the end of the middle of the fourth page was – You have only one worry – how to do service. And how to become Satopradhan (pure)? Baba has narrated the method – Remember Me alone. Do not remember anyone else. Which soul said – Remember Me alone? Hm? Who said? Which soul said – Remember Me alone? Hm?
(Someone said something.) Did Father Shiv say? ShivBaba said. What is the difference between both of them? Father Shiv is the Father of all the souls. His soul does not have any Father. And that Supreme Father, who does not have any Father is beyond the cycle of birth and death. This is why He is Trikaaldarshi. He knows about all the three aspects of time. This is why He need not think and churn. He is asochtaa (the one who does not think). He need not think. He does not have a mind at all to think. He is purely an intellect. He is an intellect of intellectuals.

Where did inconstant mind come in Him? The one in whom He enters after coming to this world, when this world become tamopradhan (degraded) in the end of the Iron Age, then in the beginning of the Golden Age He comes to create the world. He comes to create the new world by destroying the old world. And the body in which He comes, He says through that body – Manmanaabhav. Merge into My mind, i.e. when the soul owning that body reaches the perfect stage then the same soul can say Manmanaabhav, merge into My mind because Father Shiv doesn't have a mind. The one in whom He enters has an inconstant mind. To control that inconstant mind through the power of Yoga, to focus it is the task of the same soul which is the elder brother among all the brother like souls. And the Father Shiv entrusts the entire inheritance of Trikaaldarshita (knowledge of the three aspects of time) to the soul of that elder brother. He is the incorporeal Father of the incorporeal souls. The incorporeal Father will have only the incorporeal inheritance. And that incorporeal inheritance is the inexhaustible store-house of knowledge. When He comes, then the elder brother among the brother like souls, who has been named in the scripture Gita as 'Param aatma iti udaahritah' (Gita 15/17) He is called the Supreme Soul (Param Aatma). What kind of a soul? The one who is the supreme actor. He is the hero actor. He enters in that hero actor and enables him to reach from zero to hero. Or we may say that zero soul becomes hero through the remembrance of Father Shiv. This Manmanaabhav Mantra is for that soul to say that merge into my mind. What is in your mind? One Father Shiv and none else.

So, everyone has to inculcate this Mahamantra (greatest mantra). Only then will every soul become perfect. And when it becomes perfect will it become a resident of the perfect abode, which is called the farthest abode, the Supreme Abode. Every soul has to become liberated from this sorrowful world after becoming perfect. All the souls want to become free from sorrows, peacelessness. So, the highest on high God fulfills the desire of each soul. He enable everyone to get the inheritance of mukti-jeevanmukti. But He Himself shows the path, narrates the tact; He is the intellect of the intellectual ones, is not He? This is why He bestows intellect upon everyone. Even otherwise, people in this world say that when we came to this world, Allah Tala had given us a big gift. That biggest gift is the boon of intellect. Every soul gets numberwise intellect of its own kind as soon as it gets birth. On the basis of that intellect every soul keeps on making efforts in its life.

So, what does the Father, who is the intellect of intellectual ones (buddhimaanon ki buddhi) give? Hm? Does He give heaven? Does He give hell? Does He give peace? Does He give happiness? Is He a giver of joy? Does He experience joy? How will the one who does not have joy Himself give joy to others? Then how is He the highest on high God? He is the highest on high because He gives the highest on high intellect numberwise. He is the intellect of the intellectuals, is not He? This is why it has been said in the Gita – These organs are very strong. Mind is very strong among all the organs. The eleventh organ. And the numberwise intellect of the human beings is stronger than the mind. And the one who is stronger than the intellect of the human beings, beyond the intellect is that 'Buddhay parsatwa sah' (Gita 3/42) that one who is not the resident of this world below. He is the resident of the farthest, highest abode. It is also sung that highest is your abode, highest is your name; so, that highest on high God is the giver of intellect. The intellect itself is the thousand fold gift (hazaar niyaamat). There is no gift, nothing greater than the intellect. Truth and untruth is decided only through intellect. Decision of good and bad is taken only through the intellect. High and low are decided. All the 500-700 crore intelligent human beings in that world, whose intellect ultimately becomes degraded while enjoying pleasures of this world, develop a stone-like intellect (pattharbuddhi), I show those with a stone like intellect the path to develop an elixir like intellect (paarasbuddhi). This is why the one who shows the path has been named as 'Panda' (guide) in our Indian culture, scriptures. For example, the name of the Father of Pandavas was Pandu. The sons of Panda were called Pandavas. For example, sons of Brahma were called Brahmins.

So, He is the biggest guide (Panda). He shows the path to take us to the best abode, i.e. home. He gives the highest on high knowledge of the three aspects of time (trikaaldarshita). The knowledge of all the three aspects of time. Whom does He give the inexhaustible stock of knowledge? Hm? Arey! All the fathers who have existed in the world, all the kings who have existed in the history gave their inheritance to which child? They gave it to the eldest child. So, these are souls like point form children, the human souls. Amidst these 500-700 crore human souls, that Supreme Father Shiv is beyond the cycle of birth and death, the name of whose point of light soul itself is Shiv because He does not have a body of His own at all; He does not get bound by the bondage of the body at all because He is beyond the cycle of birth and death. Those who perform actions through the organs pass through the cycle of birth and death. He is akartaa (non-doer). For example, the Muslims say – Allah Miyaan made the heaven, Allah Miyaan made the land, Allah Miyaan made the Sun (aaftaab), Allah Miyaan made the sky. No. He does not make anything. He is a non-doer (akarta).

He shows only the path; He is the giver of intellect to lead life. He gives directions. It is said – Your gat-mat is unique. It means that there is definitely someone who causes salvation (gati) and gives directions (mati), who gives the most righteous directions. And the soul which makes purusharth, strongest purusharth on the basis of that direction. Purush arth; puru means body. Arth means 'for'. It is not as if 'puru' means the place of residence. Puri. City or village. And the one who lives in it. So, this body is puri, puru. And the soul resides in it; it is called the soul. The purush who lives in the body like abode. It means that the one who can live comfortably while living in the body like abode; does not experience any restlessness; such a person is called Purush, i.e. soul. And among those souls is a soul called Parampurush. Parampurush means the one who lives in such a body like abode which is the most sinful lustful thorn. That lustful thorn lives amidst such world, which never caused more sorrows before it. Such world of most sinful ones in the end of the Iron Age, for which it is said – Jhoothai lena, jhoothai dena, jhoothai bhojan, jhooth chabena (Taking lies, giving lies, food of lies and chewing of lies) It has been mentioned in the Brahmavaakya Murli also – There is complete falsehood, there is no ratti (iota, a unit of weight) of truth. There is ratti, isn’t it? In the rosary of gumchi, there is a bead of gumchi with red and black face; its weight is one ratti. So, in such a big world, there is not even a ratti of truth. The world becomes so false. He comes in the most sinful, lustful thorn living amidst such a world. The Supreme Soul Father. And He lives very comfortably. He does not ever experience any kind of restlessness. He never becomes restless. He plays His part of giving the most righteous directions comfortably. He always remains peaceful and comfortable.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2417, आडियो 2903, दिनांक 27.11.2017
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प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning Class dated 31.3.1967
VCD-2417-extracts-Bilingual

समय- 0.01-17.19
Time: 00.01-17.19


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. इतवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – ब्रह्मा बाबा कहते हैं – मैंने बहुत गुरु किये। कोई भी साधु, संत, महात्मा ने नहीं बताया कि आत्मा क्या है? क्या चीज़ से बनती है? नहीं सुनाया कि परमात्मा क्या है? किसकी-किसकी बात पूछी? परमपिता परमात्मा क्या है? दो शब्द बोले - परमपिता और परमात्मा। दोनों की बात नहीं बताई। न परमपिता बताया न परमात्मा बताया। न ये बताया कि परमपिता क्यों पहले कहते हैं और परमात्मा बाद में क्यों कहते? ऐसे क्यों नहीं कहते परमात्मा परमपिता? जैसे कहते हैं शिव शंकर। क्यों नहीं कहते शंकर शिव? दो नाम हैं शिव-शंकर। दोनों नाम साथ-साथ ले देते हैं। परन्तु शिव माने कल्याणकारी, शंकर माने विनाशकारी। सं करोति। संघार करता है। तो काम तो दोनों के अलग-अलग हैं। नाम भी तो अलग-अलग होने चाहिए। दोनों को मिलाके एक क्यों कर दिया? तो कोई बात नहीं बताते। ऐसे नहीं कि कोई सिर्फ परमात्मा को नहीं जानते। नहीं। आत्मा को भी नहीं जानते। आत्माओं में परम पार्टधारी आत्मा कौन है, हीरो पार्टधारी इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कौन है, वो भी नहीं जानते और जो सामान्य पार्टधारी आत्माएं हैं, वो क्या हैं, ये भी नहीं जानते।

अगर आत्मा को जान जावे तो परमात्मा को भी फट से जान जावें। क्योंकि आत्मा शब्द से पहले क्या लगा है? हँ? परम। परम माने बडे। बड़े ते बड़े। जिसके स्टेज पर कोई पहुँच ही नहीं सकें। ऐसा परे ते परे परम पार्टधारी। अगर आत्मा को जान जावें तो परमात्मा को भी फट से जान जावें। परन्तु न आत्मा को जानते न परमात्मा को जानते क्योंकि दुनिया में भी कोई बच्चा अपन को जान जाए कि मैं कौनसे वंश का हूँ, किसकी औलाद हूँ, तो बाप को भी जान जाए। बच्चा जानेगा ना कि वो आया कहाँ से, कहाँ से निकला। हँ? अरे! कोई भी बच्चा होता है संसार में तो अपन को जान जाए कि मैं कहाँ से आया, जान जाए तो क्या बताएगा? कहाँ से आया? हँ? अरे! दुनियावी बच्चा।
(किसी ने कहा – माँ-बाप से।) माँ-बाप से आया। दोनों में से किससे पहले आया? (किसी ने कहा – माँ।) पहले माँ से आया? (किसी ने कहा – दोनों।) दोनों से इकट्ठा आया? अगर माँ से आया कहें, तो माँ में भी पहले किसी से आया कि नहीं आया? हँ? (किसी ने कहा – बाप से।) बाप से आया। जान जाएगा ना।

तो मूल तो बाप हुआ ना। हँ? बाप ने बीज डाला, माँ ने संभाला उस बीज को। माँ धरती माता कही जाती है। धरणी माता, धारण करने वाली माता, बीज को धारण किया ना। बाप तो अपने अंदर जिंदगी भर धारण करके नहीं रख सकता। कोई ऐसा बाप है? हँ? जो अपने बीज को, अपने अंदर के बीज को जिंदगी भर धारण करके रखे? हँ? नहीं रख सकता। अगर जबरदस्ती भी अपने ऊपर करे कि मैं जीवन भर धारण करूंगा, जीवनभर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूंगा, तो हो सकता है? हँ?
(किसी ने कहा – नहीं हो सकता।) हाँ। वो बीज इतना पावरफुल होता है, कि वो अपने अंदर जीवनभर धारण करके रख ही नहीं सकता। दुर्योधन-दुःशासन जरूर बन पड़ेगा। पाप कर बैठेगा, महापापी बन जाएगा। तो कौन धारण करती है? माता, उसको चाहिए ना धारण कराने के लिए। माता या कन्या चाहिए। तो वो माता कन्या रूपी धरणी में बीज बो देता है। अगर बच्चा ये जान जाए कि ये मेरी माता है और वो मेरा पिता है, पिता ने बीज बोया और माता ने धारण किया। तो दोनों को जान जाएगा ना। ऐसे ही बेहद में। क्या? बेहद में भी अगर आत्मा जान जाए; क्या? कि मुझे किसने जन्म दिया? कहेगा माता ने जन्म दिया। कहाँ से निकला? माता से निकला। हँ?

तो मनुष्य सृष्टि में विचार करना चाहिए आत्माएं जितने भी बच्चे हैं इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर, जिसे कहा जाता है वसुधैव कुटुम्बकम्। सारी वसुधा एक कुटुम्ब है, परिवार है, तो परिवार को पालने वाली? माता। तो आत्मा अगर जान जाए कि इस मनुष्यों के परिवार को पालने वाली कोई माता थी मूल रूप तो वो बाप को भी जान जाएगा। कोई मनुष्य मात्र की आत्मा इस सृष्टि पर ये जान पाई कि हम आत्मा रूपी बच्चे, मनुष्यात्माएं इस सृष्टि पर कहाँ से आए? सृष्टि के आदि में आखिर किसी ने तो शुरुआत की होगी? पहला मनुष्य सृष्टि में कोई बच्चा पैदा हुआ होगा कि नहीं हुआ होगा?
(सबने कहा – हुआ होगा।) तो जो पहला मनुष्य सृष्टि में बच्चा हुआ, आदि का बच्चा उसे इतना तो वो जानते हैं धरमपिताएं, मुसलमान कहते हैं आदम, अंग्रेज लोग कहते हैं एडम, हिन्दू कहते हैं आदि देव। जैनी लोग कहते हैं आदिनाथ। इतना नाम जानते हैं। फिर काम नहीं जानते कि वो जो आदि था मनुष्य सृष्टि का बीज, वो बीज था, बाप था, बीज को ही बाप कहा जाता है, ये कोई आत्मा ने नहीं जाना। बड़े-बड़े धरमपिताएं हुए, ग्रेट फादर्स कहे जाने वाले, जैसे क्राइस्ट, दुनिया के मनुष्यों की आबादी 500-700 करोड़, उसमें से आधी आबादी लगभग क्रिश्चियन्स की है। वो अपना धरमपिता क्राइस्ट को तो मानते हैं; और क्राइस्ट भी ये मानता था एडम को। लेकिन वो एडम सारी मनुष्य सृष्टि का बीज रूप बाप था, ये कोई ने जाना? कोई ने नहीं जाना।

अच्छा वो अगर बीज रूप बाप था तो उसने बीज को कहाँ बोया? बीज के लिए तो धरणी रूपी धारण करने वाली माता चाहिए ना। बीज को धारण करने वाली माता ही नहीं होगी तो बीज पैदा होगा? हँ? पैदा ही नहीं होगा। तो कोई ने नहीं जाना कि जो मनुष्य सृष्टि रूपी नंबरवार बच्चे हैं वो सृष्टि रूपी रंगमंच पर आए कहाँ से? और उन बच्चों में जो भी पहला बच्चा होगा वो निकला कहाँ से? जहाँ से निकला वो हो गई माँ। उस माँ में जिसने बीज डाला, वो हो गया बाप। तो इसलिए बाप को आना पड़ता है बताने के लिए। कौनसे बाप को? आत्माओं के बाप को। हँ? आत्माओं के बाप, बेहद का है या हद का?
(सबने कहा – बेहद का।) बेहद का बाप है। बेहद आत्माएं हैं। उन सब बेहद आत्माओं का जो बाप है वो इस सृष्टि पर आकरके बताता है। क्या बताता है? ऐसे तो गीता में लिखा हुआ है – श्लोक है – अहम् बीज प्रदःपिता। क्या? मैं बीज बोने वाला, बीज डालने वाला पिता हूँ। लेकिन अर्थ करने वालों ने जाना ही नहीं। टीकाएं ढ़ेर की ढ़ेर कर दीं। ये किसी ने नहीं जाना कि वो कौनसा बीज बोता है? कौनसा बीज डालता है? इतना भी जानते थे कि मनुष्य सृष्टि में जो पहली-पहली खेप आई ब्रह्मा के द्वारा, ब्रह्मा ने इस मनुष्य सृष्टि में जिन चार बच्चों को उत्पन्न किया वो मानसी सृष्टि थी। इतना भी शास्त्रों में लिखा हुआ है मनुष्यों ने। लेकिन फिर ये नहीं जान पाए कि ब्रह्मा जिसका अर्थ ही होता है, ब्रह्म माने बड़ी, मा माने माँ, वो बड़ी माँ में बीज किसने डाला?

तो ये बताने के लिए बाप को आना पड़ता है। पहले-पहले रियलाइज कराते हैं आत्मा को। क्या? क्योंकि दुनिया में कोई से भी पूछो मनुष्य से तुम क्या हो तो कोई जवाब देता है हम पुरुष हैं, कोई कहता है हम स्त्री हैं। कोई कहता है हम डॉक्टर हैं, कोई कहता है हम पुरुष हैं, कोई कहता है हम भिखारी हैं। उनसे पूछो – जब तुम पैदा हुए थे तब तुम क्या थे? क्या मास्टर, डॉक्टर, भिखारी थे? नहीं। तो फिर तुम क्या हो? वास्तव में तुम क्या हो? तो सब चक्कर में पड़ जाते। तो बाप बताते हैं – तुम तो अपने देह की बात बताते हो कि हम डॉक्टर हैं, हम राजा हैं, हम भिखारी हैं, देह से जो कर्म करते हो, वो कर्म का नाम बता देते हो, करने वाले का नाम, ये नहीं बताते तुम आखिर कौन हो? वास्तव में तुम आत्मा हो। जब पैदा हुए थे, तब भी तुम आत्मा थे। और अभी भी तुम आत्मा हो। ऐसे नहीं जब तुम पैदा हुए थे तब तुम शिशु थे, फिर बड़े हुए, किशोर हो गए, फिर और बड़े हुए, नौजवान हो गए, फिर और बड़े हो गए तो वयोवृद्ध हो गए। अरे! ये कोई बदलते रहते हो तुम? नहीं, ये तो तुम्हारा शरीर बदलता है। देह बदलती है। तुम बदलते नहीं हो। तुम तो सदा काल आत्मा थे और अभी भी आत्मा हो। तो पहले-पहले ये बात रियलाइज़ कराते हैं। वास्तविक में तुम क्या हो, रियल। आत्मा का पहचान देते हैं।


A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page on Sunday was – Brahma Baba says – I became a disciple of many gurus. No sage, saint, mahatma told what a soul is. What is it made up of? They did not narrate as to what is the Supreme Soul? Which topics were asked? What is the Supreme Father Supreme Soul? Two words were uttered – Supreme Father and Supreme Soul. The topic of both was not mentioned. Neither Supreme Father was mentioned nor Supreme Soul was mentioned. Nor was it mentioned that why is the Supreme Father mentioned first and Supreme Soul mentioned afterwards? Why do you not say Supreme Soul Supreme Father? For example it is said Shiv Shankar. Why don’t you say Shankar Shiv? There are two names Shiv-Shankar. Both names are mentioned together. But Shiv means benevolent. Shankar means destructive. San karoti. He destroys. So, the tasks of both are different. The names should also be different. Why did you mix up the two into one? So, they do not tell anything. It is not as if someone does not know only the Supreme Soul. No. They do not know the soul as well. They also don't know that who is the Supreme actor soul among the souls, who is the hero actor on this world stage and they also don't know as to what the ordinary actor souls are.

If you know the soul, then you will know the Supreme Soul also immediately because what is prefixed to the word 'soul'? Hm? Supreme (Param). Param means big, biggest. Nobody can reach His stage at all. Such highest supreme actor. If you know the soul, then you will know the Supreme Soul also immediately. But you neither know the soul nor the Supreme Soul because if any child in the world knows himself as to which dynasty I belong, whose progeny I am, then he will know the Father as well. The child will know where he has emerged from. Hm? Arey! If any child of the world knows himself that where have I emerged from, then what will he say? Where did he emerge from? Arey! A worldly child.
(Someone said – From the parents.) He came from the parents. Among both of them, from whom did he emerge first? (Someone said – Mother.) Did he come from the mother first? (Someone said – Both.) Did he emerge from both of them together? If we say he came from the mother, then even in the mother, did he come from someone or not? Hm? (Someone said – From the Father.) He came from the Father. He will know, will he not?

So, the Father is the origin, is not he? Hm? The Father sowed the sedd, the mother took care of that seed. Mother is called Mother Earth. Mother Earth, the mother who holds; she held the seed, did not she? Father cannot hold it in him throughout his life. Is there any such Father? Hm? The one who can hold his seed, the seed inside him throughout his life? Hm? He cannot hold. Even if he forces himself that I will hold it throughout the life, I will remain firm on the vow of celibacy throughout the life, then can it be possible? Hm?
(Someone said – It cannot be possible.) Yes. That seed is so powerful that he cannot hold it within him throughout his life at all. He will definitely become Duryodhan-Dushasan. He will commit a sin, he will become the most sinful one. So, who holds it? The mother; He needs her to make her hold it. He wants a mother or virgin. So, he sows the seed in that mother or virgin like land. If the child knows that she is my mother and he is my Father; the Father sowed the seed and mother held it. So, he will know both of them, will he not? Similar is the case in an unlimited sense. What? Even in an unlimited sense if the soul knows; what? That who gave birth to me? He will say that the mother gave birth. Where did it emerge from? It emerged from the mother. Hm?

So, you should think that in the human world, all the soul like children on this human world like stage, which is called 'vasudhaiv kutumbkam' (one world family). The entire world is a family; so, who takes care of the family? The mother. So, if the soul knows that there was a mother to take care of this family of human beings originally, then he will know the Father as well. Did the soul of any human being in this world get to know that where did we souls like children, the human souls come to this world from? Someone must have started the world in the beginning. Would any child have been born first of all in the human world or not?
(Everyone said – It would have been born.) So, the child, the first child which was born in the human world is known to the founders of the religions, the Muslims call him Aadam, Englishmen call him Adam, Hindus call him Aadi Dev. Jains call him Aadinath. They just know the name. Then they do not know the task that the first one who was the seed of the human world, that seed was the Father; the seed itself is called the Father; no soul came to know this. There have been great founders of religions, who were called great fathers; for example, Christ; the population of the human beings in the world is 500-700 crores; out of it about half the population is of Christians. They do accept Christ as the founder of their religion. And Christ also believed in Adam. But did anyone know that that Adam was the seed form Father of the entire human world? Nobody knew.

Achcha, if he was the seedform Father, then where did he sow the seed? Land like mother is required to hold the seed, is not she required? If the mother who holds the seed herself does not exist then will the seed be born? Hm? It will not be born at all. So, nobody knew that where did the numberwise children of the human world emerge from on the world stage? And even among those children, where did the first child emerge from? The place from which he emerged is the mother. The one who sowed the seed in that mother is the Father. So, this is why the Father has to come to tell. Which Father? The Father of souls. Hm? Is the Father of souls unlimited or limited?
(Everyone said – Unlimited.) He is an unlimited Father. There are unlimited souls. The Father of all those unlimited souls comes in this world and tells. What does He tell? It has been written in the Gita – there is a shloka – Aham beej pradah pita. What? I am the Father who sows the seed. But the interpreters did not know at all. They made numerous commentaries. Nobody knew that which seed does He sow? Which seed does He sow? They also knew that the first and foremost batch that arrived in the human world through Brahma; the four children whom Brahma produced in this human world constituted a thought born world (maanasi srishti). It has been written in the scriptures by the human beings to this extent. But they did not know that Brahma whose meaning itself is Brahm, i.e. senior, Maa means mother; who sowed the seed in that senior mother?

So, the Father has to come to tell this. First of all He makes the soul to realize. What? Because if you ask any human being in the world as to what are you, then someone replies that I am a man, someone says I am a woman. Someone says I am a doctor, someone says I am a man, someone says I am a beggar. If you ask them – What were you when you were born? Were you a Master, Doctor, beggar? No. So, then what are you? What are you in reality? Then everyone gets into a fix. So, the Father tells – You tell about your body that I am a doctor, I am a king, I am a beggar; whatever actions you perform through the body, you tell the name of that action, the name of the performer of the action. You do not tell as to what you are ultimately. Actually, you are a soul. You were a soul even when you were born. And even now you are a soul. It is not as if when you were born, you were a baby, then, when you grew up, you became a juvenile, then when you grew further, you became a youth and then when you grew further, you became a senior citizen. Arey! Do you keep on changing? No. It is your body that changes. The body changes. You do not change. You were forever a soul and even now you are a soul. So, first of all He makes you realize this. What are you in reality, real? He gives the realization of the soul.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2418, आडियो 2904, दिनांक 1.12.2017
VCD No.2418, Audio No.2904, dated 1.12.2017
प्रातः क्लास 31.3.1967
Morning Class dated 31.3.1967
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समय- 0.01-21.35
Time: 00.01-21.35


प्रातः क्लास चल रहा था – 31.3.1967. शुक्रवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – बच्चा अपना आपको जान जाए इसलिए बेहद के बाप को आना पड़ता है। तो बच्चे को अपन की जानकारी देने के लिए बाप को आना पड़ता है। और आकरके पहले-पहले रियलाइज़ कराते हैं – आत्मा को रियलाइज़ कराते हैं कि तुम ज्योतिबिन्दु आत्मा तो हो बेसिकली, लेकिन इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर तुम कौनसी विशेष आत्मा हो। किस कुल विशेष में विशेष पार्ट बजाने वाली आत्मा हो अर्थात् कौनसे धर्म वंश में विशेष पार्ट बजाया है और क्या-क्या पार्ट बजाया है रियलाइज़ कराते हैं आत्मा को। तो जो आत्मा का रियलाइज़ेशन करते हो कि वास्तव में मैं कौनसी आत्मा हूँ, क्या हूँ, ये रियलाइज़ेशन परमात्मा के बिगर कौन रियलाइज़ कराएगा? हँ? कौन कराएगा? परमात्मा रियलाइज़ कराएगा या परमपिता रियलाइज़ कराएगा? कहते हैं ना परमपिता परमात्मा। ऐसे तो कभी नहीं कहते परमात्मा परमपिता। जैसे कहते हैं शिव शंकर। ऐसे तो कभी नहीं कहते हैं शंकर-शिव। तो रियलाइज़ कराने के लिए, तुम आत्माओं के अपने पार्ट का रियलाइज़ेशन कराने के लिए कि वास्तव में तुम कौन आत्मा हो, कौन चाहिए? परमात्मा चाहिए। अर्थात् परम शब्द लगाके किसकी तरफ इशारा किया? परम पार्टधारी आत्मा के प्रति इशारा किया। जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर परम पार्टधारी, हीरो पार्टधारी आत्मा है, जो हीरो पार्टधारी आत्मा इस रंगमंच पर आदि से लेकर अंत तक पार्ट बजाती है।

हीरो पार्टधारी को प्रॉम्प्टिंग देने वाला डायरेक्टर कौन है? हँ? जो डायरेक्टर सदा पर्दे के पीछे रहकर प्रॉम्पटिंग देता है। पर्दे के बाहर कभी नहीं दिखाई देता। तो वो ही डायरेक्टर बाप, बेहद का बाप कहते हैं – अभी तुम बच्चे ये बात समझते हो ना। बच्ची तुम क्या जानती हो कि आत्मा क्या है? कहाँ रहती है? ये आत्मा क्या होती है? अच्छा चलो, डाक्टर लोग भी जानते थे भई आत्मा है तो बहुत सूक्ष्म; इतनी सूक्ष्म है कि इन आँखों से भी नहीं देखी जाती। जैसे कोई मलेरिया के रोगी के कीटाणु बहुत सूक्ष्म होते हैं तो उनको यंत्रों से देखते हैं। इन आँखों से नहीं दिखाई देते। तो जब इन आँखों से नहीं देखा जाता है और यंत्रों से भी नहीं देखा जाता है, इसका मतलब उन कीटाणुओं से भी अति सूक्ष्म है। तो ट्रायल करने की बात है। क्या ट्रायल किया? डॉक्टर लोगों ने ट्रायल किया; मरते हुए व्यक्ति तो शीशे में बन्द कर दिया। शीशे में बन्द करके देखें। शीशे में बन्द करके देखना, इन आँखों से देख नहीं सकेंगे। तो फिर देखेंगे कैसे? शीशा फट गया, दिखाई फिर भी नहीं दी। तो क्या देखेंगे?

तो देखो, दुनिया में तुम्हारे जैसा एजुकेटड कोई भी नहीं है। ऐसी नॉलेज वाला। बाकी इतना जरूर है कि तुम बच्चे भी नंबरवार हो। आत्मा जो पार्टधारी है, उसके पार्ट को जानने के लिए नंबरवार जानने वाले हो। समझा ना। अभी तो इतना तो सबको मालूम पड़ा है। बेसिकली ये सबको पता चल गया तुम बच्चों में से सभी को पता चल गया कि आत्मा बिन्दी है। और ये तो तुम समझते भी हैं कि आत्मा बिन्दी है। तो आत्माओं के बीच जो परम पार्टधारी आत्मा है, जिसे परमात्मा कहते हैं वो भी? बिन्दी है। तो परमात्मा को बिन्दी क्यों बताते? परम माने परे ते परे रहने वाला या बड़ा क्योंकि उस परमात्मा आत्मा का इतना बड़ा पार्ट है जो तुम सबसे टैली किया जाए तो बहुत लंबा पार्ट है। इतना लंबा पार्ट है कि वर्तमान, भूत और भविष्य तीनों कालों को क्रॉस करने वाला पार्ट। इसलिए कहा जाता है परमात्मा परम पार्टधारी। जो परमपार्टधारी आत्मा है, उसको तुम बच्चों के बीच टैली किया गया। हँ? परमपिता को टैली नहीं कर सकते? परमपिता शिव को तुम बच्चों के साथ टैली कर सकते हैं या नहीं कर सकते? हँ?
(किसी ने कहा – नहीं।) क्यों? क्योंकि वो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है। गर्भ से जन्म नहीं लेता। और हम आत्माएं? जन्म-मरण के चक्र में आने वाली हैं। और परमात्मा भी जन्म-मरण के चक्र में आने वाला है। तो जो एक जैसी आत्माएं हैं उनके बीच में परमात्मा को टैली किया जा सकता है। परमपिता को टैली नहीं कर सकते।

मनुष्यात्माओं का बाप परम पार्टधारी परमात्मा तो है। लेकिन वो भी जन्म-मरण के चक्र से न्यारा नहीं है। जन्म-मरण के चक्र में आने वाला है। और जन्म-मरण के चक्र में जो जितना जास्ती आएगा, तो ज्यादा पतित बनेगा या कम पतित बनेगा? ज्यादा पतित बनता है क्योंकि दुनिया की हर चीज़ को, हर आत्मा को चार अवस्थाओं से पसार होना पड़ता है। ऐसी दुनिया की कोई चीज़ नहीं है जो चार अवस्थाओं से पसार होने के बाद तामसी न बने, पुरानी ते पुरानी न बने। तो ये तो समझा कि अनेक जन्मों में सुख भोगते-भोगते, इन्द्रियों से ही सुख भोगा जाता है, तो संग के रंग में आने से आत्मा पतित बनती है क्योंकि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अनेकों का संग का रंग लगता है ना। कि एक का लगता है? अनेकों का लगता है। तो हम सब आत्माएं पावन से पतित बन जाती हैं। अब पतित बन गई हैं जरूर क्योंकि हम आत्माएं जो इतनी हल्की-फुल्की और सूक्ष्म हैं, तो ऊपर रहेंगी या नीचे रहेंगी? हँ? ऊपर की रहने वाली हैं। अपने घर में रहते हैं। उसे कहते हैं ऊँच ते ऊँच धाम। शांतिधाम। जैसे कहते हैं परमात्मा। ऐसे ही कहते हैं परमधाम। कैसा धाम? परे ते परे धाम।

और उस धाम में कोई भी पतित आत्मा नहीं रह सकती। क्या? पतित माने नीचे गिरा हुआ। पतित माने? नीचे गिरा हुआ। और पावन माने? ऊँचा, ऊँची स्टेज में जाने वाला। तो वहाँ से तो पावन ही रहेंगे। और जो इस दुनिया में आते हैं वो पावन ही आते हैं। ऐसी कोई आत्मा नहीं है जो परमधाम से आवे और पावन न हो। फिर इस दुनिया में आकर पतित बनते हैं। हँ? ऐसा होता है? हँ? अरे? पावनधाम परमधाम से इस दुनिया में आते हैं तो पतित बनते हैं? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) माना सतयुग में आवेंगे, सतयुग में तो पतित बनेंगे? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, भले सतयुग है, क्योंकि इन्द्रियाँ नंबरवार श्रेष्ठ हैं। एक जैसी हैं? कोई कर्मेन्द्रियाँ हैं, कोई ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। जैसे कर्म करने वाले हैं। तो कर्म करना कर्मेन्द्रियों से ही होता है। ये जो कर्म करते हैं कर्मेन्द्रियों से वो कर्मेन्द्रयाँ ज्ञानेन्द्रियों के मुकाबले श्रेष्ठ हैं या भ्रष्ट हैं? (किसी ने कहा –भ्रष्ट।) तो भ्रष्ट हैं तो कर्म भी कैसे करेंगे? भ्रष्ट कर्म करेंगे। ज्ञानेन्द्रियाँ श्रेष्ठ हैं तो नंबरवार श्रेष्ठ कर्म ही करती हैं। ज्ञानेन्द्रियों में भी नंबरवार हैं। और कर्मेन्द्रियों में भी नंबरवार हैं। तो जो कर्मेन्द्रियाँ हैं उनका कर्म कौनसे युग से शुरू होता है? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। श्रेष्ठ इन्द्रियों का कर्म, ज्ञानार्जन करना, वो श्रेष्ठ युग है। उसे कहते हैं स्वर्ग। और जो कर्मेन्द्रियों का कर्म जहाँ से शुरू होता है जिस युग से, वहाँ से कहते हैं नरक। क्या कहते हैं? नरक।

A morning class dated 31.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page was – The unlimited Father has to come so that the child could recognize himself. So, the Father has to come to give the child the information about Himself. And after coming He first of all makes him realize; He makes the soul realize that you are a point of light soul basically, but which special soul you are on this world stage. You are a soul to play a special part in which particular clan, i.e. you have played a special part in which religious dynasty and what all parts have you played; He makes the soul realize this. So, the realization of the soul which you have that which soul I am in reality, what I am; who else other than the Supreme Soul can cause this realization, make you realize? Hm? Who will cause? Will the Supreme Soul make you realize or will the Supreme Father make you realize? It is said – Supreme Father Supreme Soul. It is never said – Supreme Soul Supreme Father. For example, it is said – Shiv-Shankar. It is never said – Shankar-Shiv. So, in order to make you realize, in order to enable you souls to have a realization of your part that what are you in reality, who is required? The Supreme Soul is required. It means that who was pointed out by adding the word 'supreme'? The soul playing the supreme part was pointed out. He is the supreme actor, the hero actor soul on this world stage. That hero actor plays a part from the beginning to the end on this stage.

Who is the Director who gives prompting to the hero actor? Hm? The Director who always gives prompting while remaining behind the curtains. He is never visible outside the curtain. So, the same Director Father, the unlimited Father says – Now you children understand this topic, don't you? Daughter, what do you know as to what is a soul? Where does it reside? What is this soul? Okay, doctors also used to know that the soul is very subtle; it is so subtle that it is not visible to these eyes. For example, some microbes of the patients of Malaria are very subtle; so, they are observed through instruments. They are not visible through these eyes. So, when it is not visible through these eyes and is not visible even through instruments; it means that it is subtler than those microbes. So, it is a subject of trial. Which trial was conducted? Doctors conducted a trial; they put a dying person in a glass enclosure. Let us put him in a glass enclosure and see. Put him in a glass enclosure and watch; you will not be able to see through these eyes. So, then how will you see? The glass broke; it was still not visible. So, what will you see?

So, look, there is nobody as educated as you in the world with such knowledge. But it is sure that you children are numberwise. You numberwise know the part of the soul which is an actor. Did you understand? Now everyone has come to know this much. Basically, everyone has come to know, everyone among you children have come to know that the soul is a point. And you also understand that the soul is a point. So, among the souls, the hero actor soul, who is called the Supreme Soul is also a point. So, why is the Supreme Soul mentioned to be a soul? Supreme means that He is the resident of the farthest place or big because that Supreme Soul, the soul plays such a big part that if it is tallied with you all, then it is a very long part. It is such a long part that it is a part which crosses all the three aspects of time, i.e. present, past and future. This is why He is called the Supreme Soul, the supreme actor. The one who is the supreme actor soul has been tallied with you children. Hm? cannot the Supreme Soul be tallied? Can the Supreme Father Shiv be tallied with you children or not? Hm?
(Someone said – No.) Why? It is because He is beyond the cycle of birth and death. He is not born through the womb. And we souls? We are the ones who pass through the cycle of birth and death. And the Supreme Soul also passes through the cycle of birth and death. So, among the similar souls, the Supreme Soul can be tallied. The Supreme Father cannot be tallied.

The Father of the human souls is the supreme actor, Supreme Soul indeed. But he too is not beyond the cycle of birth and death. He passes through the cycle of birth and death. And the more someone passes through the cycle of birth and death, will he become more sinful or less sinful? He becomes more sinful because everything, every soul in the world has to pass through four stages. There is nothing in the world which does not become degraded, oldest after passing through the four stages. So, you did understand that while enjoying pleasure in many births; pleasure is enjoyed through the organs only; so, the soul becomes sinful by being coloured by company because you get coloured by the company of many on this world stage, don't you? Or do you get coloured by only one? You get coloured by many. So, we all souls become sinful from pure. Now we have definitely become sinful because do we souls, who are so light and subtle, live above or below? Hm? We live above. We live in our home. That is called the highest on high abode. The abode of peace. For example, it is said – Supreme Soul. Similarly, it is said – Supreme Abode. What kind of an abode? The farthest abode.

And no sinful soul can remain in that Abode. What? Sinful means 'the fallen one'. Sinful means? Fallen one. And pure means? High, the one who goes into a high stage. So, there you will remain pure only. And those who come to this world, come in a pure form only. There is no soul which comes from the Supreme Abode and is not pure. Then they become sinful after coming to this world. Hm? Does it happen so? Hm? Arey? Do you become sinful when you come from the pure world, the Supreme Abode to this world? Hm?
(Someone said something.) It means that when you come to the Golden Age, will you become sinful? Hm? (Someone said something.) Yes, although it is the Golden Age, because the organs are numberwise righteous. Are they alike? Some are organs of action, some are sense organs. For example, you perform actions. So, actions are performed through the organs of action only. These actions that you perform through the organs of action, are those organs of action righteous or unrighteous when compared to the sense organs? (Someone said – Unrighteous.) So, when they are unrighteous, then how will be the actions that they perform? They will perform unrighteous actions. When the sense organs are righteous, then they perform numberwise righteous actions only. The sense organs are also numberwise. And when does the action of the organs of action begin? (Someone said something.) Yes. The action of righteous organs, to obtain knowledge is a righteous Age. That is called heaven (swarg). And the time, the Age from when the actions of the organs of action begin is called hell (narak). What is it called? Hell.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2419, आडियो 2905, दिनांक 10.12.2017
VCD No.2419, Audio 2905, dated 10.12.2017
प्रातः क्लास 31.3.1967, नालासोपारा (महाराष्ट्र)
Morning class dated 31.3.1967, Nalasopara (Maharashtra)
VCD-2419-extracts-Bilingual

समय- 0.01-17.08
Time: 00.01-17.08


आज का प्रातः क्लास है – 31.3.1967. शुक्रवार को पांचवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – ये दुनिया में एक भी देखो तुम्हारे जैसा एक्यूरेट नॉलेज वाले दुनिया में कोई नहीं है। बाकी इतना जरूर है कि नंबरवार हैं। जैसे तुम नंबरवार हो। अभी तो इतना तो सबको मालूम पड़ा है कि बरोबर आत्मा बिन्दी है। और ये तो समझाते भी हैं कि परमात्मा बिन्दी है। बाकी हम आत्माओं को जो पावन से पतित बन गई हैं जरूर क्योंकि हम ऊपर में जो रहते हैं अपने घर में वहाँ तो कोई पतित रह ही नहीं सकते हैं। वहाँ तो पावन ही रहेंगे। और वहाँ से पावन ही आते हैं। फिर पतित बनते हैं। फिर पतित से पावन जरूर बनते हैं। अगर पावन नहीं बने तो फिर दुबारा पार्ट कैसे बजावें? अब ये बहुत सहज ते सहज बात है कि अपन को समझना कि ये 84 का चक्र पूरा हुआ है। और ये तो बिल्कुल कॉमन बात है कि हमारी आत्मा तमोप्रधान बन गई है।

तुमको मालूम पड़ा कि बरोबर हम ही 84 जन्म लेते हैं जो बाप समझाते हैं। और तुम एक तो नहीं हो ना बच्ची। बाबा एक के लिए तो नहीं कहेंगे। बच्चे, तुम अपने जन्मों को नहीं जानते। तो तुमको बताता हूँ। कोई एक को थोड़ेही समझाएगा। वास्तव में बाबा कहते हैं मैं समझाता इनको हूँ। तुम सुन लेते हो। किनको समझाता हूँ? लक्ष्मी-नारायण की तरफ इशारा किया। ये हमारे सामने बैठे हुए हैं। मैं इनको समझाता हूँ, सुनाता हूँ, बाकी तुमको कैसे सुनाऊँगा? तुमको देखूंगा कैसे? तुम्हारे में तो प्रवेश किया है। और इनको हम सुनाता हूँ। और तुम सुन जाते हो। ये बिचारे सुनते तो हैं। परन्तु ये तो ‘यें,यें,यें’ करते रहते हैं। ये सुनते हैं। और बाबा से तो वो ऐसे थोड़ेही कहेंगे। तो ये है इनका रथ। तो ये तो समझते जाते हैं। ये समझने की बात जो समझते हैं वो ऐसे-ऐसे करते हैं। बरोबर ऐसे करते हैं कि इनको इस सृष्टि का परिचय बाबा का मिले।

31.3.67 की वाणी का आठवाँ पेज। नहीं। ये समझने की बात है, जो समझते हैं वो ऐसे-ऐसे करते हैं बरोबर कि भई ये राइट बात है। तो अभी गेट पर नाम तो लिखना है। 31.3.67 की वाणी का छठा पेज। पर उनका ज्ञान भी तो चाहिए ना फिर कि गेट पर नाम क्या लिखना है? तो उनको पहले-पहले गेटवे दिखलाना ही चाहिए। ठक। यहाँ से लेकरके दिखलाना चाहिए। कौनसे गेट की बात की? कई दिन से दो गेट की बात चल रही है। इंडिया गेट और दिल्ली गेट। दिल्ली गेट है दरियावगंद में। दिल्ली में ही है। और इंडिया गेट। तो इस इंडिया गेट से यहाँ से समझाना चाहिए, समझाना पड़े कि देखो ये धर्म अब प्रायःलोप हो गया है। कौनसा धर्म? यहाँ से गीता में बोला – सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकम् शरणम् व्रज। (गीता 18/66) इसकी यादगार है सभी धर्म खलास। इंड आ जाता है। नाम पड़ता है इंडिया गेट।

कोई को भी पता नहीं है कि हम कोई देवी-देवता धर्म के हैं। पर हैं तो देवी-देवता धर्म के ना। भले जैसे क्रिश्चियन लोग हैं, पहले तो जरूर सतोप्रधान होंगे। पीछे उनकी मल्टीप्लिकेशन होती जावेगी। आते जाएंगे, आते जाएंगे, आते जाएंगे। कहाँ तक आते जावेंगे कि इस दुनिया में जन्म पुनर्जन्म लेते-लेते तमोप्रधान जरूर बनेंगे। और सारी दुनिया तमोप्रधान तो जरूर बनेगी। झाड़ भी तो पुराना जरूर बनेगा। क्यों? क्योंकि ये है ह्यूमन झाड़। और अनेक वैरायटी धर्मों का झाड़ है। इसको कहा जाता है विराट झाड़। विराट नाटक भी कह सकते हैं। तो ये बच्चे जानते हैं – बरोबर हिसाब से जानते हैं कि झाड़ के हिसाब से फिर किनके हिसाब से भी कि भई ये क्रिश्चियन्स और वो दूसरे धर्म वो सब पीछे आते हैं क्योंकि वो तो जरूर कोई तो आएंगे ना। ड्रामा बना-बनाया है। कोई कहेंगे - क्यों? हमको पहले क्यों नहीं? अरे कोई वक्त तो हमको टर्न मिलेगा सतयुग में जाने का। नहीं। क्योंकि ये तो बना-बनाया ड्रामा है। फिक्स हुआ पड़ा है। और तो किसी को भी नहीं मिल सकता है।

ये तो अनेक धर्मों का खेल बना हुआ है। सो भी बरोबर मनुष्य जानते हैं कि सतयुग में आदि सनातन देवी-देवता धर्म प्राचीन है। उसी को फिर हैविन पैराडाइज़ कहते हैं। और ये जानते हैं कि हमारा सबका इतना-इतना वर्ष हुआ। अच्छी तरह से जानते हैं। कौन जानते हैं? ये लक्ष्मी-नारायण जानते हैं। सिर्फ ये नहीं जानते कि ये धर्म प्रायःलोप है। सर्वथा लोप नहीं होता। था तो जरूर। परन्तु कब था। अभी देखो ये जो शंकराचार्य है ना। ये शंकराचार्य दस हज़ार वर्ष कह लें तो वो तो आ गया। तो देखो इतना नीचे तो है ही नहीं। सो भी उनको पता नहीं है पक्का। ये दस हज़ार वर्ष बिचारे ने बोल दिया। कोई उनको पकड़ेगा, बोलेगा आपने दस हज़ार वर्ष कैसे कहा। ये कल्प की आयु 10000 वर्ष कैसे? कल्प तो लाखों वर्ष का है। और 10000 वर्ष में 84 जन्म मनुष्य कैसे ले सकेंगे? कोई होवे उस समय तो पकड़ लेवे अच्छी तरह से। परन्तु उस समय उनसे बात कौन करे? डरते रहते हैं बिचारे कहीं नाराज़ न हो जावे। तो चुप। कोई बात मत करो। ये ऐसा न करो। बात मत पूछो। समझाते हैं अच्छी तरह से - मीठे बच्चों याद ही तुमको ये रहना है। अभी हम जा रहे हैं स्वर्ग में। हाँ, अभी तुरन्त जा नहीं सकते हैं क्योंकि देखो ना हम तो अभी तमोप्रधान हैं। तो हम कैसे जाएंगे? ये आत्मा कहती है ना हम कैसे जाएंगे? अच्छा घर भी जाएंगे तो कैसे जाएंगे? अभी तो हम तमोप्रधान हैं ना। तो सतोप्रधान बनने के लिए बाप ने युक्ति बताई है। क्या युक्ति बताई? हँ? मनमनाभव। और फिर बाद में? मध्याजी भव। मामेकम याद करो।

Today's Morning class is dated 31.3.1967. On Friday, the topic being discussed in the end of the middle portion of the fifth page was – Look, there is nobody in this world who could give accurate knowledge in the world. However, they are numberwise, just as you are numberwise. Now, everyone has come to know that definitely the soul is a point. And they also explain that the Supreme Soul is a point. As regards us souls, which have definitely become sinful from pure because we, who live above in our home, no sinful one can live there at all. Only the pure ones can live there. And the pure ones only come from there. Then they become sinful. Then they definitely become pure from sinful. If they do not become pure, then how will they play their part again? Now it is the easiest thing to think about yourself that this cycle of 84 births has been completed. And this is very common thing that our soul has become tamopradhan (degraded).

You have come to know that definitely we alone get 84 births, about which the Father explains. And you are not alone daughter, are you? Baba will not say for one person. Children, you do not know about your births. So, I tell you. Will He explain to just one person? Actually Baba says – I explain to this one. You also hear. Whom do I explain? He pointed towards Lakshmi-Narayan. They are sitting in front of Me. I explain to them, narrate to them; but how will I narrate to you? How will I observe you? I have entered in you. And I narrate to them. And you listen. This poor fellow does listen. But this one keeps on uttering 'yein, yein, yein'. This one listens. And he will not say like this to Baba. So, this is the Chariot of this one. So, this one goes on understanding. Those who understand this topic to be understand keeps on doing like this. They definitely do like this so that they get the introduction of this world, of Baba.

Eighth page of the Vani dated 31.3.67. No. This is a topic to be understood. Those who understand keep on doing like this that definitely this is a right topic. So, now you have to write a name on the gate. Sixth page of the Vani dated 31.3.67. But then one should also know that which name should be written on the gate? So, first of all they should be showed the gateway. Thak. You should start showing from here. Which gate was mentioned? Since many days the topic of two gates is being discussed. India Gate and Delhi Gate. Delhi Gate is in Dariyavgand (presently called Dariyaganj). It is in Delhi only. And India Gate. So, you should explain from this India Gate, from here; you have to explain that look, this religion has now almost disappeared. Which religion? From here, it was said in the Gita – Sarvadharmaan parityajya maamekam sharanam vrij. (Gita 18/66) Its memorial is that all the religions end. The ind (end) comes. So, the name is coined as 'India Gate'.

Nobody knows that they belong to the deity religion. But they do belong to the deity religion, don't they? Although, for example, there are the Christians; they must be initially satopradhan (pure). Later on multiplication must have taken place among them. They will keep on coming, keep on coming, and keep on coming. How far will they keep on coming? They will definitely become tamopradhan while getting rebirths in this world. And the entire world will definitely become tamopradhan. The tree will also definitely become old. Why? It is because this is a human tree. And it is a tree of variety of religions. This is a called a gigantic tree. You can also call it a huge drama. So, children know, they know it properly that from the point of view of the tree or from any other point of view these Christians and the other religions come later on because they, someone will definitely come, will they not? The drama is already fixed. Someone may say – Why? Why not us first? Arey, at some time or the other we will get the turn to go to the Golden Age. No. It is because this is an already fixed drama. It has been fixed. Nobody else can get.

This is an already fixed drama of many religions. That too people know that in the beginning of the Golden Age the ancient deity religion is the oldest one. That is then called heaven, paradise. And you know that it has been many years since we all came. You know very well. Who knows? These Lakshmi and Narayan know. They don't know only the fact that this religion has almost disappeared. It does not disappear completely. It did exist. But when did it exist? Now look, there is this Shankaracharya, is not he? You may say this Shankaracharya came ten thousand years ago, but he has already come. So, look, he is not so old at all. That too they don't know for sure. The poor fellow said this - ten thousand years. Someone will catch him and say – How did you say ten thousand years? How is the duration of the Kalpa 10000 years? Kalpa is of lakhs of years. And how will human beings be able to get 84 births in 10000 years? If someone is courageous at that time, he will catch him nicely. But who will talk to him at that time? The poor fellows keep on fearing lest he becomes angry. So, they keep quiet. Do not talk anything. Do not do like this. Do not ask. He explains nicely – Sweet children, you have to remember this alone. Now we are going to heaven. Yes, now you cannot go immediately because look, we are now tamopradhan, aren't we? So, how will we go? This soul says, doesn't it – how will we go? Achcha, even if we go home, how will we go? Now we are tamopradhan, aren't we? So, the Father has narrated the tact to become satopradhan. Which tact was narrated? Hm? Manmanaabhav. And thereafter? Madhyaji Bhav. Remember Me alone.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2420, आडियो 2906, दिनांक 12.12.2017
VCD No.2420, Audio 2906, Dated 12.12.2017
रात्रि क्लास 31.3.1967,
Night Class dated 31.3.1967
VCD-2420-extracts-Bilingual

समय- 0.01-16.35
Time- 00.01-16.35


आज का रात्रि क्लास है – 31.3.1967. ये जो बाबा ने कहा है चित्र बनाओ; कृष्ण की महिमा का चित्र बनाओ। ये गीता के ऊपर। गीता के ऊपर कृष्ण की महिमा का चित्र बनाओ या उनकी महिमा है? किनकी? गीता जो छपी है, मनुष्यों की बनाई हुई, उस मानवीय गीता में कृष्ण की जो महिमा है वो उनकी महिमा है? बाबा ने तो थोड़ी ही शिवबाबा की लिखी है। ‘थोड़ी ही’ माने? माने बाबा ने थोड़े ही लिखी है। लिखी किसने है? मनुष्य गुरुओं ने लिखी है। सिर्फ गीता ज्ञान दाता और त्रिमूर्ति पिता है। कौन है तीन मूर्तियों का पिता? (किसी ने कहा - शिव।) जिसकी यादगार में त्रिमूर्ति हाउस, त्रिमूर्ति रोड बनाते हैं। त्रिमूर्ति रोड अर्थात् त्रिमूर्ति का रास्ता। त्रिमूर्ति का हाउस। एक का हाउस या त्रिमूर्ति हाउस? हँ? (किसी ने कहा – तीन।) तीन का हाउस? टिवाटा यादगार बनाते हैं। तीन रास्ते निकलते हैं। तो जिस रास्ते पर लिखते हैं त्रिमूर्ति रोड, वो एक का बताया हुआ रास्ता है या तीन के बताए हुए रास्ते हैं? एक का बताया हुआ रास्ता और दूसरे का, तीसरे का बताया हुआ रास्ता, बताने में कुछ अंतर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा?

परन्तु उनको और भी थोड़ा भेज देना चाहिए। किनको? जो कृष्ण के भक्त हैं। बताओ शान्ति का सागर। कृष्ण क्या है? शान्ति का सागर है? हँ? महाभारत युद्ध किसने कराया? कृष्ण ने महाभारत युद्ध कराया, तो शान्ति का सागर हुआ? हँ? शान्ति का सागर हुआ या अशान्ति फैल गई? ज्ञान का सागर। ज्ञान माने?
(सबने कहा – जानकारी।) ज्ञान माने जानकारी। काहे की जानकारी? हँ? (सबने कहा – सत्य।) सत्य की जानकारी। और सत्य के लिए गीता में लिखा है – नासतो विद्यते भावो, ना भावो विद्यते सतः। (गीता 2/16) जो सत होता है, सच्चा होता है, उसका कभी अभाव नहीं होता। होता है? हँ? सत तो सदाकाल है या कभी है, कभी नहीं है? सदाकाल है। तो वो सत कौन है? वो कृष्ण जो द्वापर के अंत में दिखाया गया? हँ? द्वापर के अंत में जो कृष्ण दिखाया गया कि महाभारत युद्ध कराया, वो कृष्ण सदा सत्य हुआ? फिर कृष्ण को 16 कला संपूर्ण दिखाय दिया। अब शास्त्रों में एक तरफ मनुष्यों ने लिखा है और सभी मनुष्य गुरु मानते हैं कि सतयुग 16 कला संपूर्ण, त्रेता 14 कला संपूर्ण और द्वापर? ज्यादा से ज्यादा 8 कला संपूर्ण। सो भी आदि में सात्विक स्टेज में। तो जो युग ही 16 कला संपूर्ण नहीं है, 14 कला संपूर्ण नहीं है और पूरा युग 8 कला संपूर्ण हो ही नहीं सकता। वहाँ कृष्ण को दिखाय दिया। तो ये बात झूठी साबित होती है या सच्ची? (किसी ने कहा – झूठी।)

और 16 कला संपूर्ण द्वापर के अंत में कृष्ण आया तो एकदम कलियुग कलाहीन बन गया? और कृष्ण भगवान; उसके आने के बाद पापी कलियुग की स्थापना हो गई? ऐसे हो सकता है क्या? और-और धरमपिताओं के लिए तो ठीक है। हिस्ट्री देख ली जाए; पक्का-पक्का प्रूफ मिल जाता है कि कोई भी मनुष्य धरमपिताएं आए हैं तो उनके बाद दुनिया का पतन हुआ है कि उत्थान हुआ है? पतन हुआ है। लेकिन भगवान के बारे में तो ये नहीं कहा जा सकता। क्यों? अंग्रेज लोग भी मानते हैं उसको हैविनली गॉड फादर। क्या मतलब हुआ? हँ? सुप्रीम गॉड फादर जिसे हैविनली गॉड फादर कहते हैं, तो जरूर उसने हैविन स्थापन किया होगा। नहीं तो हैविनली गॉड फादर क्यों कहते हैं?

तो हैविन माने स्वर्ग, सुख की दुनिया। सुख काहे से आता है? अज्ञान से सुख आता है या ज्ञान से सुख आता है?
(सबने कहा – ज्ञान से।) ज्ञान से सुख आता है। तो सुख की दुनिया स्वर्ग स्थापन करने वाला सुख का सागर होगा ना। हँ? क्या होगा? सुख का सागर होता है। और यही बात ब्रह्मवाक्य मुरली में भगवान ने हमें बताई कि जब मैं आता हूँ तो धक् से तुम्हारी नई दुनिया की राजधानी स्थापन कर देता हूँ। क्या कहा? आने की क्या पहचान बताई? हँ? सुख की दुनिया आते ही बनाता है या अशान्ति फैला देता है? सुख की दुनिया बनाता है। तो वो ज्ञान का सागर है। शान्ति का सागर है। ज्ञान से ही सुख शान्ति होती है। अज्ञान से दुःख और अशान्ति होती है। तो जो सुख का सागर है वो ही ज्ञान का सागर है, वो ही शान्ति का सागर है। और सुख? प्यार से आता है या अहंकार से आता है? प्यार से सुख आता है। तो प्रेम का भी सागर है। पवित्रता का सागर है। क्योंकि वो सब बातों में जो सुखदाई है, सागर ही है ना बच्ची। कृष्ण को तो सागर नहीं कहा जाए। हँ? कृष्ण जो सतयुग का पहला पत्ता है, 16 कला संपूर्ण है, सतयुग में जो भी देवताएं जन्म लेंगे, उन देवताओं के बीच 16 कला संपूर्ण है, एक अंशमात्र भी कम नहीं, पहला नंबर देवता होगा या बाद में जन्म लेने वाले होंगे? हँ? पहला नंबर देवता। और दिखाते भी हैं, शास्त्रों में कि दुनिया में जब जलमई हो गई तो सागर में सबसे पहले पीपल के पत्ते पर कौन आया? हँ? कृष्ण बच्चा आया। तो वो कृष्ण बच्चा मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष का पत्ता है ना। क्या है? पत्ता है। बीज तो नहीं है? है? बीज नहीं है। बीज जरूर कोई और है।

तो जो बीज है वो पिता है। जिसको कहा जाता है सारी मनुष्य सृष्टि का बीज। जैसे ब्रह्मा बाबा मुरली में पूछते हैं, ब्रह्मा का बाप कौन? पूछते हैं या नहीं? तो कौन है ब्रह्मा का बाप? ब्रह्मा, विष्णु, शंकर – ये तीनों ही देवताएं रचना हैं या रचयिता हैं? रचना हैं। तो कोई रचयिता होगा ना। हँ? कौन है?
(किसी ने कहा – शिव।) शिव बाप? शिव बाप माने वो सिर्फ बाप है। क्या? शिव का दूसरा कोई संबंध नहीं बनता। क्यों? क्योंकि शिव उनकी बिन्दु रूप आत्मा का ही नाम है। उनको शरीर होता ही नहीं। इसलिए बिन्दु-बिन्दु आत्माओं का बाप है। ग्रांडफादर भी नहीं। जब शरीर में प्रवेश करते हैं तो सारे संबंध बन जाते है। ग्राण्डफादर भी है। तो बताया त्रिमूर्ति पिता है। क्या कहें? त्रिमूर्ति शिव बाप कह सकते हैं। तीनों देवताओं का भी बाप। ब्रह्मा का भी बाप, विष्णु का भी बाप और? शंकर का भी बाप। शंकर का बाप? शंकर को तो कहते हैं देव-देव-महादेव। ब्रह्मा देव, विष्णु देव, और शंकर? महादेव। तो इन तीनों भाईयों में बड़ा भाई कौन हुआ? महादेव। और बड़े भाई को क्या कहते हैं? बाप समान कहा जाता है। भले बाप नहीं कहा जाता लेकिन बाप कहा जाता है या बाप नहीं कहा जाता, बाप समान तो कहा जाता है। ये बात मुसलमान भी मानते हैं - क्या? क्या कहते हैं? आदम को खुदा मत कहो, आदम खुदा नहीं, लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं। तो देखो जिसे हम कहते हैं त्रिमूर्ति शिव, जिसके नाम पर यादगार बनी है संसार में त्रिमूर्ति रोड, त्रिमूर्ति हाउस वो एक की यादगार है, एक का बसाया हुआ रास्ता है या तीन-तीन या कई एक का बताया हुआ रास्ता है? एक का बताया हुआ रास्ता। त्रिमूर्ति हाउस कहते हैं तो एक का घर है, उस घर में एक की बपौती है या दो, चार, आठ बाप हैं? बपौती तो एक की है। तो त्रिमूर्ति हाउस भी जो यादगार है, त्रिमूर्ति रोड यादगार है, कोई एक आत्मा की यादगार है।

Today's night class is dated 31.3.1967. Baba has asked you to prepare a picture; prepare a picture of Krishna's glory. On this Gita. Prepare the picture of Krishna's glory on the Gita; or is it his glory? Whose? The Gita that has been printed, prepared by the human beings, in that human Gita, the glory of Krishna that has been mentioned, is it his glory [in reality]? Baba, ShivBaba has not written. What is meant by 'thodi hi'? It means that Baba hasn't written. Who has written? The human gurus have written. Just the bestower of the knowledge of Gita and Trimurti Father. Who is the Father of the three personalities?
(Someone said – Shiv.) In His memory the Trimurti House, Trimurti Road is built. Trimurti Road means the path of Trimurti. Trimurti's House. Is it the house of one or a Trimurti House? Hm? (Someone said – Three.) House of three? A memorial of T-intersection of roads (tivata) is built. Three roads emerge [from the T-point]. So, the road on which they write Trimurti Road, is it a path shown by one or a path shown my three? Will there be a difference between the path shown by one and by the second, third person or not?

But they should be sent some more. Who? Those who are the devotees of Krishna. Tell, the ocean of peace. What is Krishna? Is he the ocean of peace? Hm? Who caused the Mahabharata war? Krishna caused the Mahabharata war. So, is he the ocean of peace? Hm? Is he the ocean of peace or did peacelessness spread? The ocean of knowledge. What is meant by knowledge?
(Everyone said – Information.) Knowledge means information. Information of what? Hm? (Everyone said – Truth.) The information of truth. And it has been written in the Gita for truth – Naasato vidyate bhaavo, na bhaavo vidyate satah. (Gita 2/16) There is never a dearth of truth or the true one. Is there any dearth? Hm? Does truth exist forever or does it exist sometimes and does not exist sometimes? It exist forever. So, who is that truth? Is it the Krishna who has been depicted in the end of the Copper Age? Hm? Is the Krishna, who has been shown in the end of the Copper Age that he caused the Mahabharata war, forever truth? Then Krishna has been shown to be perfect in 16 celestial degrees. Well, on the one side human beings have written in the scriptures and all the human gurus believe that Golden Age is perfect in 16 celestial degrees; the Silver Age is perfect in 14 celestial degrees and the Copper Age? At the most 8 celestial degrees. That too in the pure stage in the beginning. So, the Age which is not perfect in 16 celestial degrees, not perfect in 14 celestial degrees and the entire Age cannot be perfect in 8 celestial degrees at all, Krishna has been depicted in that Age. So, is this topic proved to be false or true? (Someone said – False.)

And if Krishna came at the end of the Copper Age which was perfect in 16 celestial degrees, then did it immediately become Iron Age which is completely devoid of celestial degrees? And God Krishna; did sinful Iron Age get established after his arrival? Can it be possible? It is okay for other founders of religions. If you look at the history, you get firm proof that whenever any human founders of religions came, then after their arrival, did the world witness downfall or rise? It has witnessed downfall. But it cannot be said for God. Why? The Englishmen also believe him to be heavenly God Father. What does it mean? Hm? The Supreme God Father, who is called heavenly God Father; so, definitely he must have established heaven. Otherwise, why is He called the heavenly God Father?

So, heaven means swarg, the world of happiness. How does happiness come? Does happiness come from ignorance or does happiness come from knowledge?
(Everyone said – From knowledge.) Happiness comes from knowledge. So, the one who establishes the world of happiness, i.e. heaven will be an ocean of happiness, will He not be? Hm? What will He be? He is an ocean of happiness. And the same topic has been narrated to us by God in the Brahmavaakya Murli that when I come then I immediately establish the capital of your new world. What has been said? What is the indication of His arrival? Hm? Does He establish the world of happiness as soon as He comes or does He spread disturbance? He establishes a world of happiness. So, He is an ocean of knowledge. He is an ocean of peace. Happiness and peace is caused through knowledge only. Ignorance causes sorrows and disturbance. So, the one who is an ocean of happiness is the ocean of knowledge; he is the ocean of peace. And happiness? Does it come from love or does it come from ego? Happiness comes from love. So, He is an ocean of love as well. He is an ocean of purity because He is a giver of happiness in all the topics; He is an ocean only, is not He daughter? Krishna cannot be called an ocean. Hm? Krishna, who is the first leaf of the Golden Age, perfect in 16 celestial degrees, all the deities who are born in the Golden Age, among those deities he is a deity perfect in 16 celestial degrees, not even a part less; will he be a number one deity or will he be among those who get birth later on? Hm? He will be number one deity. And it is also shown in the scriptures that when the world was inundated with water, then who came on the fig leaf in the ocean first of all? Hm? Child Krishna came. So, that child Krishna is a leaf of the human world tree, is not he? What is he? He is a leaf. He is not a seed, is he? Is he? He is not a seed. Definitely someone else is a seed.

So, the seed is the Father, who is called the seed of the entire human world. For example, Brahma Baba asks in the Murli – Who is Brahma's Father? Does He ask or not? So, who is Brahma's Father? Brahma, Vishnu, Shankar – Are all these three creations or creators? They are creations. So, there must be a Creator, will there not be? Hm? Who is it?
(Someone said – Shiv.) Father Shiv? Father Shiv means He is just a Father. What? Shiv does not have any other relationship. Why? It is because Shiv is the name of His point like soul. He does not have a body at all. This is why He is the Father of the point like souls. Not even grandfather. When He enters in a body, then all the relationships are established. He is a grandfather also. So, it was told that He is Trimurti Father. What should we say? We can say Trimurti Father Shiv. Father of all the three deities. Father of Brahma also, Father of Vishnu also and Father of Shankar also. Father of Shankar? Shankar is called Dev-Dev-Mahadev. Brahma Dev, Vishnu Dev and Shankar? Mahadev. So, who is the elder brother among these three brothers? Mahadev. And what is the elder brother called? He is said to be equal to the Father. He may or may not be called a Father, but he is indeed called equal to the Father. The Muslims also accept – What? What do they say? Do not call Aadam as Khuda; Aadam is not Khuda; But Aadam is not separate from the light of Khuda (God). So, look, the one whom we call Trimurti Shiv, in whose name the memorial of Trimurti Road, Trimurti House has been built in the world, is it the memorial of one, is it the road developed by one or is it a path shown by three or many? It is a path shown by one. When you say Trimurti House, then is it the house of one, is it a property of one in that house or are there two, four, eight fathers? It is the property of one only. So, the memorial of Trimurti House, the memorial of Trmurty Road is also the memorial of a soul only.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 06 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2421, आडियो 2907, दिनांक 13.12.2017
VCD No.2421, Audio 2907, dated 13.12.2017
रात्रि क्लास 31.3.1967 + प्रातः क्लास 1.4.1967,
Night Class 31.3.1967 + Morning Class 1.4.1967
VCD-2421-extracts-Bilingual

समय- 0.01-16.34
Time: 00.01-16.34


रात्रि क्लास चल रहा था – 31.3.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी कि अभी पतित देवात्माएं तो नहीं कहेंगे क्योंकि देवी-देवताओं के पहले पतित शब्द लगाने से देवी-देवताओं की इज्ज़त ही चली जावेगी। इसलिए ये नाम का फर्क पड़ गया है। अपन को हिन्दू कहलाने लगे। कई बार तुम बच्चों को समझाया गया है अच्छी तरह से। तो भगवान के लिए जो समझाना है तो समझाकरके फिर कहना है- अब याद किसको करना चाहिए? पतित-पावन कौन है? क्योंकि पतितों को पावन बनाने वाला कृष्ण को तो नहीं कहेंगे। कृष्ण तो स्वयं 16 कला संपूर्ण देवता बनता है। और देवता को भगवान थोड़ेही कहा जा सकता। भगवान तो मनुष्य को देवता बनाने वाला है। तो सबसे ऊँचे ते ऊँचा तो वो बाप है। जिस बाप से वर्सा मिलता है। सभी आत्माओं को वर्सा मिलता है क्योंकि वो आत्माओं का बाप है ना। बाप को ही लिबरेटर कहा जाता है। लिबरेटर माने छुड़ाने वाला। काहे से छुड़ाने वाला? हँ? देह के बंधन से छुड़ाने वाला कि तुम आत्मा हो। देह नहीं हो। इसलिए वो रास्ता भी बताता है। आत्माओं के रहने का स्थान कहाँ है? तुम आत्माओं को कहाँ जाना है? तो आत्मलोक में जाना है। आत्मिक स्थिति बनाएंगे तो आत्मलोक में जाएंगे।

तो, सोल वर्ल्ड कहते हैं। आत्माओं का लोक। और ले जाने वाला है गाइड। रास्ता बताता है। कहाँ ले जाता है? आत्माओं के धाम में ले जाता है। तो गाइड इंग्लिश में बोला। जरूर इसने ही बोला होगा। किसने? हँ? कृष्ण की आत्मा ने ही बोला होगा क्योंकि कृष्ण की राशि क्राइस्ट से मिलाई जाती है। बोला होगा कि जरूर वो गाइड है, लिबरेटर है। दुःखों से लिबरेट कराने वाला है, छुड़ाने वाला है क्योंकि दुखों से आकरके सारी दुनिया को लिबरेट करे। और दुःखों से छुड़ाकरके सुख की दुनिया में ले जाए, शान्ति में ले जाए। तो पहले शान्ति में ले जाते हैं। फिर सुखधाम में भेज देते हैं। तो बताओ फिर याद किसको करना चाहिए? हँ? शान्तिधाम में ले जाने वाले को याद करना चाहिए या सुखधाम में ले जाने वाले को याद करना चाहिए? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) किसको? सुखधाम ले जाने वाले को याद करना चाहिए? शान्तिधाम में ले जाने वाले को याद नहीं करना चाहिए? बुखार आता है। सारी शरीर की नसें-नसें टूटने लगती हैं। बहुत अशान्ति महसूस होती है। तो कहेंगे पहले शान्ति मिले। बुखार उतर जाता है तो शान्ति मिलती है। दुःख से छूट जाते हैं। फिर? हँ? फिर शान्त ही पड़े रहेंगे क्या? हँ? कुछ न कुछ खाने-पीने की इच्छा होगी। इन्द्रियों को सुख चाहिए। तो पहले शान्ति जरूर है। बाद में सुख। ऐसे तो होता नहीं कि बुखार आ रहा हो, नस-नस टूट रही हो, अशान्ति बढ़ रही है शरीर में और कोई कहे रसगुल्ला खा लो, मुख का स्वाद ले लो, तो कोई लेगा? हँ? क्यों? क्योंकि अशान्ति में है ना। अशान्ति में कुछ अच्छा नहीं लगता। तो पहले शान्ति देवा चाहिए। क्या? शान्ति देने वाला चाहिए। और फिर? सुखदेवा चाहिए। तो ये अक्षर इंग्लिश में बोला गया कि दुख से लिबरेट करने वाला और सुखधाम में ले जाने वाला वो गाइड है। सारी दुनिया को लिबरेट करते हैं और सुख में ले जाते हैं, शान्ति में ले जाते हैं।

पूछा – किसको याद करना चाहिए? नानक को करना चाहिए? हनूमान को करना चाहिए? देवताओं को करना चाहिए? या इन सबसे जो ऊँचे ते ऊँचा है उसको याद करना चाहिए? क्योंकि गुरु नानक का भी चित्र दिखाते हैं, उंगली से इशारा ऊपर कर रहे हैं। तो गुरु नानक से भी कोई ऊँचा है ना। हनूमान भी किसकी पूजा करता है? वो फिर राम की पूजा करता है। और राम किसकी पूजा करते हैं? शिव की पूजा करते हैं। तो देखो ऊँच ते ऊँच को पकड़ना चाहिए ना। बिचौलियों को क्यों पकड़ना चाहिए? अभी पतित पावन को याद करने से मनुष्य पतित से पावन बनेंगे ना। वो पतितों को पावन बनाने वाला कहता है – कौन कहता है? हँ? कौन कहता है पतितों को पावन बनाने वाला। कौन है? शिव। वो कहता है? उसको कहने के लिए मुख है? हँ? शिव बाप को मुख है? फिर कैसे कहेगा? कहने के लिए मुख ही नहीं है तो कहेगा कैसे? हँ? तो जिस तन में प्रवेश करते हैं उसको अपना मुख भी है, सभी इन्द्रियाँ हैं। तो मुख से कहते हैं – मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। माना शिव को तो मन है नहीं। तो जिसमें प्रवेश करते हैं उसके द्वारा कहते हैं – मेरे मन में समा जा। ये अक्षर जरुर इस बच्चे ने भी कहा होगा। किस बच्चे ने? हँ? ब्रह्मा बाबा ने भी कहा होगा।

वो कहते हैं मनमनाभव अर्थात् सिर्फ मामेकम् याद करो। अपन को आत्मा समझ कर याद करो। क्योंकि अभी मौत सामने खड़ा है। विनाश सामने खड़ा है। ये महाभारी महाभारत लड़ाई, वो ही लड़ाई सामने खड़ी है जिसका वर्णन महाभारत में है। और उस महाभारत का कनेक्शन गीता के साथ है। क्या? पहले गीता ज्ञान। गीता ज्ञान सुनते हैं तो फिर भागवत होने लगती है। ज्ञान की जो मुरली सुनाते हैं उनके पीछे भागने लग पड़ते हैं। फिर जब भागने लग पड़ते हैं तो कोई-कोई को छोड़ के भागते होंगे ना। उनको फिर क्रोध आता है। तो फिर, फिर महाभारत लड़ाई हो जाती है। तो ये कनेक्शन है। गीता का कनेक्शन भागवत से। और भागवत का कनेक्शन? महाभारत से है। तो ऐसे-ऐसे अच्छी तरह से समझाने से ये ऊँचे ते ऊँचा बाप बुद्धि में बैठेगा। और इस समय में ही बुद्धि में बैठेगा। क्या? सतयुग में तो है ही सत्वप्रधान, सुखी दुनिया। त्रेता में भी सतोसामान्य। दुःख तो नहीं शुरू हो गया। द्वैतवादी द्वापर में दुःख शुरू होता है। लेकिन अति तो नहीं हो गई। और कलियुग में अति हो जाती है। बहुत दुःखी हो जाते हैं। तो अंत में मैं आता हूँ। तो फिर याद कर-कर के पवित्र बन करके जरूर बाप से जाकर मिलेगा। और कोई उपाय नहीं है। इसलिए उनको लिबरेटर कहा जाता है। कौन बोला? शिव बोला। उनको लिबरेटर कहा जाता है। ये क्यों बोला शिव ने? मुझको बोलना चाहिए। मुझको लिबरेटर कहा जाता है। मुझको नहीं कहा। क्या कहा? उनको। क्यों? उनको कहके दूर क्यों कर दिया?
(किसी ने कहा – भविष्य में।) क्योंकि वो पार्ट भविष्य में चलने वाला है। उनको पतित-पावन कहा जाता है। मुझको पतित पावन नहीं कहेंगे। क्यों?

पतित शरीर के साथ पतित आत्मा बनती है कि बिना शरीर के पतित बनती है?
(सबने कहा –शरीर के साथ।) आत्मा शरीर धारण करे तो पतित बनती है। शरीर धारण ही न करे तो पतित कैसे बनेगी? संग का रंग शरीर के द्वारा लगता है कि बिना शरीर के संग का रंग लगेगा? शरीर के द्वारा संग का रंग लगता है। तो बताया – पतित-पावन तब कहा जाता है जब वो निराकार साकार शरीर में प्रवेश करे। और वो साकार शरीरधारी बाप समान संपन्न स्टेज धारण करे। पहले स्वयं पतित से पावन बने। फिर संग के रंग से दूसरों को पतित से पावन बनाय सकता है। अच्छा, ये बात तो अभी बाबा ने एड किया। अब ये बच्चियाँ रोज़ तो नहीं आती हैं। रोज़ ज्ञान सुनने आती नहीं हैं तो क्या होगा? ये जब-जब आएगी तो सत के संग का रंग लगेगा। सतसंग में आएगी तो रंग लगेगा। नहीं तो दुनिया में ही रहेंगी तो दुनिया का संग का रंग लगेगा। दुनिया तो नीचे जा रही है। तो दुनिया का संग का जो रंग लेगा वो भी कहां जाएगा? नीचे ही जाएगा।

A night class dated 31.3.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was that now it will not be said 'sinful deity souls' because if you prefix sinful to the deities, then there will not be any respect for the deities at all. This is why there is a difference in this name. They started calling themselves Hindus. Many a times it has been explained nicely to you children. So, after explaining whatever you have to explain about God, you should say – Now whom should we remember? Who is the purifier of the sinful ones? It is because Krishna will not be called the one who purifies the sinful ones. Krishna himself becomes a deity perfect in 16 celestial degrees. And a deity cannot be called God. God transforms a human being into a deity. So, that Father is the highest on high. He is the Father from whom you receive inheritance. All the souls get inheritance because He is the Father of souls, is not He? The Father Himself is called a liberator. Liberator means the one who makes you free. Makes you free from what? Hm? He frees you from the bondage of the body [by telling] that you are a soul. You are not a body. This is why He also shows the path. Where is the place of residence of the souls? Where do you souls have to go? So, you have to go to the abode of souls. If you develop a soul conscious stage, then you will go to the abode of souls.

So, it is called the Soul World. The abode of souls. And the one who takes us is the guide. He shows the path. Where does He take us? He takes us to the abode of souls. So, 'guide' was said in English. Definitely this one must have said. Who? Hm? The soul of Krishna Himself must have said because the zodiac signs of Krishna are matched with that of Christ. He must have said that He is definitely the guide, the liberator. He is the one who liberates, frees us from sorrows because He should liberate the entire world from sorrows and after liberating them from sorrows, He should take them to the world of happiness, peace. So, first He takes them to peace. Then He sends them to the abode of happiness. So, tell, then whom should you remember? Hm? Should you remember the one who takes you to the abode of peace or should you remember the one who takes you to the abode of happiness? Hm?
(Someone said something.) Whom? Should you remember the one who takes you to the abode of happiness? Should you not remember the one who takes you to the abode of peace? When you suffer from fever, every nerve of the body starts weakening. You feel very restless. So, you will say first I should get peace. When the fever subsides, then you get peace. You become free from sorrows. Then? Hm? Then will you keep on lying in peace only? Hm? You will have the desire to eat something. The organs want pleasure. So, first peace is required. Later on happiness. It does not happen that you are suffering from fever, when every nerve is weakening, when restlessness is increasing in the body and if someone says – eat this rasgulla (a sweet), enjoy the pleasure of the mouth, then will anyone take? Hm? Why? It is because he is restless, is not he? One doesn't like anything in restlessness. So, first the deity of peace is required. What? The giver of peace is required. And then? The deity of happiness is required. So, this word was spoken in English that He is the guide who liberates you from sorrows and takes you to the abode of happiness. He liberates the entire world and takes them to happiness, to peace.

It was asked – Whom should you remember? Should you remember Nanak? Should you remember Hanuman? Should you remember the deities? Or should you remember the highest on high? It is because even in the picture of Guru Nanak which is depicted, he is pointing a finger upwards. So, there is someone higher than Guru Nanak as well, is not it? Whom does Hanuman also worship? He then worships Ram. And whom does Ram worship? He worships Shiv. So, look, you should catch the highest on high one, shouldn't you? Why should you catch the middlemen? Now the human beings will become pure from sinful by remembering the purifier of the sinful ones, will they not? That purifier of the sinful ones says – Who says? Hm? Who says – The purifier of the sinful ones? Who is it? Shiv. Does He say? Does He have a mouth to say? Hm? Does Father Shiv have mouth? Then how will He say? How will He say when He does not have a mouth at all to speak? So, the body in which He enters has a mouth of his own and all the organs. So, he says through the mouth – Manmanaabhav. Merge into my mind. It means that Shiv does not have a mind. So, the one in whom He enters, He says through him – Merge into My mind. Definitely this child must also have uttered these words. Which child? Hm? Brahma Baba must have also said.

He says ‘Manmanaabhav’, i.e. remember Me alone. Consider yourself to be a soul and remember [Me] because death is staring at you now. Destruction is staring at you. This fiercest Mahabharata war is the same war staring at you which has been described in the Mahabharata. And the connection of that Mahabharata is with Gita. What? First the knowledge of Gita. When you listen to the knowledge of the Gita, then Bhagwat takes place. They start running after flute of knowledge that He plays. Then, when they start running, then they must be running by leaving behind some persons, do they not? Then they [who have been left behind] become wrathful. So, then, the Mahabharata war takes place. So, this is the connection. The connection of Gita is with Bhaagwat. And the connection of Bhaagwat is with Mahabharata. So, when you explain nicely like this, then this highest on high Father will sit in their intellect. And He will sit in the intellect at this time only. What? In the Golden Age, the world is anyways satwapradhan (pure), happy. In the Silver Age also it is satwasaamaanya (ordinarily pure). The sorrows did not begin. Sorrows start in the dualistic Copper Age. But it does not reach the extreme level. And it reaches the extreme levels in the Iron Age. You become very sorrowful. So, I come in the end. So, then you will definitely meet the Father after remembering Him and becoming pure. There is no other way. This is why He is called the liberator. Who said? Shiv said. He is called liberator. Why did Shiv say this? He should have said ‘I am’. I am called liberator. He did not say ‘I am’. What did He say? He. Why? Why did he make him distant by saying ‘he’?
(Someone said – In future.) Because that part is going to be played in future. He is called the purifier of the sinful ones. I will not be called the purifier of the sinful ones. Why?

Does a soul become sinful along with the sinful body or does it become sinful without a body?
(Everyone said – With a body.) A soul becomes sinful when it assumes a body. If it does not assume a body at all, then how will it become sinful? Is the colour of company applied through the body or will the colour of company be applied without a body? The colour of company is applied through the body. So, it was told – He is called the purifier of the sinful ones when that incorporeal enters into a corporeal body. And that corporeal bodily being should achieve a perfect stage equal to the Father. First He should himself become pure from sinful. Then he can make others pure from sinful through the colour of company. Achcha, this topic was added now by Baba. Well, these daughters do not come every day. When they do not come every day to listen to knowledge, then what will happen? Whenever they come they will be coloured by company of truth. If they come to the satsang (spiritual gathering), they will get coloured. Otherwise, if they remain in the world itself, then they will be coloured by the company of the world only. The world is going down. So, where will the one who take the colour of company of the world also go? He will go down only.
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