Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

DEDICATED to PBKs.
For PBKs who are affiliated to AIVV, and supporting 'Advanced Knowledge'.
Post Reply
User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2422, आडियो 2908, दिनांक 15.12.2017
VCD 2422, Audio 2908, Dated 15.12.2017
प्रातः क्लास 1.4.1967,
Morning class dated 1.4.1967
VCD-2422-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.31
Time: 00.01-17.31


प्रातः क्लास चल रहा था – 1.4.1967. शनिवार को दूसरे पेज के अंतिम लाइन में बात चल रही थी – बाबा ने समझाया है, एकदम पिछाड़ी में जो अभी आते होंगे, वो क्या आते होंगे? बिचारे एक जन्म लेते होंगे, आधा जन्म लेते होंगे। तो एक या आधा जन्म में क्या अनुभव करेंगे इस दुनिया का? क्या सुख का अनुभव करेंगे, क्या दुःख का अनुभव करेंगे? उनको कोई अनुभवी आत्माएं कहेंगे क्या? तुम बच्चे तो इस ह्यूज ड्रामा के आदि से लेकरके अंत तक के सारे 84 जन्मों के अनुभवी बनते हो। सारे ड्रामा के सुख और दुःख का अनुभव सिर्फ तुम ब्राह्मण करते हो। कौनसे ब्राह्मण? जो डायरेक्ट बाप से पढ़ाई पढ़ते हैं। तुम कहा ही जाता है सामने वाले को। तो तुम पहले-पहले आते हो।

1.4.67 की वाणी का तीसरा पेज। जानते हो कि हम इतना जन्म लेते हैं सुख में। और इतना जन्म फिर दुःख में लेते हैं। और तुमको अभी नॉलेज मिली है, अपनी नॉलेज के साथ सबके सुख-दुःख की नॉलेज मिली है। हर एक नेशन के तुम जानकार हो क्योंकि जानते हो ये फलाना धर्म फलाने समय में स्थापन होता है। तो हर नेशन की, हर धर्मखण्ड की तुमको जानकारी है। तो ये जानकारी नई दुनिया में नहीं होगी क्योंकि नई दुनिया में तो सिर्फ एक ही धर्म होता है, एक ही राज्य होता है। वहाँ अनेक राज्य तो होते नहीं। भले नई दुनिया में नया खण्ड होता है। तो उनके लिए फिर वो है नई दुनिया क्योंकि ये भी तो समझते हैं ना। अब ये बौद्धी खण्ड है। ये नया खण्ड है। क्रिश्चियन खण्ड है, कहेंगे भई ये नया खण्ड है क्योंकि नए-नए आते रहते हैं तो नया हुआ ना। तो नए में सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो, उनको भी चार अवस्थाओं से पसार करना है। जैसे ये झाड़ होता है। तो ये भी मनुष्य सृष्टि का झाड़ है। सतयुग में सतोप्रधान, त्रेता में सतोसामान्य, द्वापर में रजो, और कलियुग में तमो हो जाता है।

तो देखो, पहले-पहले सतोप्रधान वाले झाड़ के जो पत्ते होते हैं, वो तो फिर बाद में नीचे होते जाते हैं। उसके ऊपर में दूसरा होता जाता है। क्योंकि दूसरा नया निकलता है। दूसरा होता जाता है। आगे-आगे कितना शोभनीक। तो नीचे वाला तो नीचे ही रहेगा ना। तो नए-नए ऊपर में चले जाते हैं। ऐसे होते-होते यहाँ तक कि झाड़ बड़ा हो जाता है। तो नया-नया तुम देखते हो। झाड़ में ऊपर नई-नई टालियाँ कैसे निकलती हैं। जब भी देखो कोई भी झाड़ होगा, आम का झाड़ भले पुराना भी हो जाए, तो जब बरसात के बाद देखेंगे तो ऊपर में पत्ते उनके बहुत हरे-हरे हो जाएंगे। और छोटे-छोटे भी निकलते रहेंगे। बरसात के बाद ऐसा होता है ना। तो ये भी संगमयुग है तुम्हारी ज्ञान की बरसात। उसके बाद सतयुग में नए-नए पत्ते निकलते रहते हैं। कहेंगे सबका दिमाग ठण्डा रहता है। जैसे शीतलता का मौसम हो गया। पीछे उनमें बूर निकलते हैं। तो अभी इसमें बूर तो यही है ना। वो फल यही निकलते हैं क्योंकि जो बूर निकलता है, वो तो कोई काम का नहीं होता है। फल निकलते हैं वो काम के होते हैं। तो अभी भी ऐसे ही है। ये झाड़ है। बहुत छोटा है। अभी नया झाड़ है। तुमने देखा आम का झाड़ लगाया वहाँ, तो कितने सड़ गए। और बाकि जो जाकरके चार बचे हैं, शायद होगा पाँच होंगे, बाकी सब सड़ गए। क्यों(कि), उनको तूफान लगता है। और उनकी परवरिश पूरी नहीं हुई। तो तुम भी अपनी परवरिश पूरी नहीं कर पाते हो तो सड़ जाता है। देखो, ऐसे बहुत से यहाँ सड़े हुए हैं ना फल। ऐसे फल फिर कोई काम के नहीं रहते।

ऐसी बहुत चिट्ठियाँ आती हैं। बोलते हैं – बाबा हम तो फेल हो गए। नहीं तो ऐसे कभी किसी को चिट्ठी लिखते हैं क्या कोई? कोई को डर लगता है। वो ख्याल करते हैं तो लिख देते हैं – बाबा, हम फेल हो गए। तो बाबा कहते फेल हो गए तो मूत पलीती कपड़े हो गए। अभी मूत पलीती कपड़े को कौन हाथ लगाएगा? नहीं। वो तो ठीक नहीं है। क्योंकि अभी तो तुम जानते हो कि मूत-पलीती कप्पड वो बाप उनको गोद में कैसे लेंगे? वो बाप? कौनसे बाप की तरफ इशारा कर दिया? हँ?
(किसी ने कहा - शिवबाबा।) शिवबाबा? शिवबाबा, शिवबाबा जब कहें, तो वो तो ग्राण्डफादर हुआ। और ग्राण्डफादर पहले होता है कि बाप पहले होता है? हँ? (किसी ने कहा – बाप।) बाप पहले होता है? ग्राण्डफादर बाद में होता है? हँ? ग्राण्डफादर पहले होता है, उसका बच्चा पैदा होता है, वो फिर बाप कहा जाता है जब बच्चा पैदा करता है तो। तो बताया कि जो मूत-पलीती हो जाते हैं उनको बाप फिर गोद में कैसे लेंगे? बाप माने मनुष्य सृष्टि का बाप। मनुष्य सृष्टि का बाप जब इस संसार में प्रत्यक्ष होता है, सारी दुनिया पहचानती है कि ये हमारा बाप है, सारी मनुष्य सृष्टि का बाप है, तो वो बाप, जो मूत-पलीती होते रहते हैं, उनको गोद में नहीं ले सकता। बाप आते हैं; जब मूत-पलीती से बच्चे साफ शुद्ध हो जाते हैं, तब बाप आते हैं। कौनसे बाप की बात? हँ? मनुष्य सृष्टि के बाप की बात है कि वो आते हैं माने संसार के सामने प्रत्यक्ष होते हैं, प्रत्यक्षता रूपी जन्म लेते हैं। सारी दुनिया जानती है कि ये हमारा सबका बाप है, हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई, सबका बाप है।

(किसी ने कहा – मूत-पलीती होना माने क्या?) मूत-पलीती होना माने डिसचार्ज होना। डिसचार्ज होते हैं तो मूत-पलीती हो जाते हैं। तो बाप, जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, ऐसे मूत-पलीती बच्चों को गोद में कैसे लेगा? जब साफ, शुद्ध हो जाते हैं, तब लेते हैं। तभी तो वो गोद में ले सकते हैं। वो कहके क्यों दूर कर दिया? क्योंकि ये भविष्य के पार्ट की बात है। इसलिए अभी कायदे बाबा ने बन्द कर दिये। क्या? पहले गोद में लेते थे। अब गोद में नहीं लेते हैं। बोलते हैं – नहीं। वहाँ जाकरके झोंपड़ी में सबसे एक-एक करके समाचार पूछो। तो उस हिसाब से ये गोद में लेते हैं। सबका पोतामेल लो। और गोद भी तो हर किसम की होती है ना। हँ? समझा ना। वो जैसे-जैसे अवस्था होगी उनकी उस समय में ऐसे-ऐसे बाप का प्यार मिलेगा। सगीर होगा, समझदार होगा, ज्ञान को समझेगा, अच्छा पुरुषार्थ करेगा, तो बाप का प्यार भी गहराई से मिलेगा। देखते हैं कि ये अन्दर में एक है और बाहर में दूसरा है। अन्दर में शैतानी भरी हुई है। ऐसे होते हैं ना। कोई अन्दर से एक होते हैं, बाहर से दूसरा दिखाते हैं कि हम बड़े अच्छे पुरुषार्थी हैं। तो प्यार भी ऐसे ही मिलता है फिर। बाबा तो प्यार करेंगे। अन्दर में बोलेंगे ये तो बहुत अच्छा, मीठा बच्चा है। बहुत सर्विसेबुल है। तो कोई को ऐसा देखेंगे तो कहेंगे इसमें कोई दम नहीं है एकदम। ये तो कुछ भी ज्ञान को नहीं समझते हैं। एकदम बुद्धू हैं। कोई की सर्विस करना जानते ही नहीं। सर्विस नहीं कर सकेंगे। बाकी और धंधे, ये करेंगे, वो करेंगे। तो अभी खयाल तो सब तरह का रहता है ना।

A morning class dated 1.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last line of the second page on Saturday was – Baba has explained; those who come now in the fag end would come for how much time? Poor fellows must be getting one birth or half a birth. So, what experience of this world will they have in one or half a birth? What kind of happiness will they experience? What kind of sorrows will they experience? Will they be called experienced souls? You children experience all the 84 births from the beginning to the end of this huge drama. You Brahmins alone experience the happiness and sorrows of the entire drama. Which Brahmins? Those who study direct from the Father. Only the one who is in front of you is called 'you'. So, you come first of all.

Third page of the Vani dated 1.4.67. You know that you get these many births in happiness. And then you get these many births in sorrows. And you have received knowledge now; you have received the knowledge of the self along with the knowledge of everyone's happiness and sorrows. You know every nation because you know that this particular religion is established at a particular time. So, you know every nation, every religious land. So, you will not have this information in the new world because there is only one religion, one kingdom in the new world. Numerous kingdoms do not exist there. Although it is a new land in the new world. So, then it is a new world for them because they also understand this, don't they? Well, this is the Buddhist land. This is a new land. There is the Christian land; it will be said that brother, this is a new land because new ones keep coming; so, it is new, is not it? So, they too have to pass through the four stages of satopradhan, sato, rajo, tamo. Just as there is this tree. So, this is also a tree of human world. It is satopradhan in the Golden Age, satosaamaanya in the Silver Age, rajo in Copper Age and it becomes tamo in the Iron Age.

So, look, the initial leaves of the satopradhan tree go on occupying a lower position. Newer ones keep on emerging above them because new one emerges. Another one keeps on emerging. Those in the front are so beautiful. So, the lower ones will remain lower only, will they not? So, the new ones come on the top. In this manner the tree grows big. So, you see the new ones as to how new branches emerge above in the tree. Whenever you see that there is a big tree, a mango tree, even if it grows old, so, when you see after rains, the leaves on the top will very green. And the smaller ones also keep emerging. It happens like this after the rains, doesn't it? So, this Confluence Age is also your rain of knowledge; After that new leaves keep on emerging in the Golden Age. It will be said that everyone's brain remains cool. It is as if it is a climate of cold. Later on they blossom. So, now this is the blossom here, is not it? Those fruits emerge here only because the blossom is of no use. The fruits that emerge are useful. So, it is like this even now. This is a tree. It is very small. Now the tree is new. You have seen that you sowed the mango tree there; many of them rotted. And the four that have survived, perhaps it may be five, all others rotted because they face storms. And they did not get complete sustenance. So, when you too are unable to sustain yourself completely, then you rot. Look, there are many rotten fruits like this here, aren't they? Such fruits then do not remain useful anymore.

This is a human tree. The Father comes and makes it deities from human beings. So, you see that they cannot become complete deities. They become third grade, fourth grade. They will be deities for namesake, but they are impaired deities because the celestial degrees have reduced, haven't they? Otherwise, the one who is perfect in 16 celestial degrees is called a deity. But if the celestial degrees are less, then it means that they have become impaired. Only those who are perfect in 16 celestial degrees belong to the deity religion. And this is a topic to be understood that definitely an emperorship is established. This will definitely be there in it. But by understanding this – this will happen. Achcha, to become third class is foolishness. One should create good thoughts, shouldn't one? So, it is understood that they do not get good thoughts. They cannot fight with Maya. They fail. And you know very well the topic of failing.

Many such letters are received. They say – Baba we have failed. Otherwise, does anyone write any such letter to anyone? Some fear. When they think, they write – Baba, we have failed. So, Baba says, when you have failed, your clothes have become dirty with urine. Now, who will handle the clothes which have become dirty with urine (moot-paleeti)? No. That is not alright because now you know that how will that Father take the clothes dirtied by urine in His lap? That Father? A gesture was made towards which Father? Hm?
(Someone said – ShivBaba.) ShivBaba? When we say ShivBaba, ShivBaba, then He is the grandfather. And is the grandfather first or is the Father first? Hm? (Someone said – Father.) Is the Father first? Is the grandfather later on? Hm? The grandfather is first; when his child is born then he is called the Father when he gives birth to a child. So, it was told that how will that Father take the clothes dirtied by urine in His lap? Father means the Father of the human world. When the Father of the human world is revealed in this world, when the entire world recognizes that this is our Father, the Father of the entire human world, then that Father cannot take into his lap those who keep on dirtying their clothes with urine. The Father comes; when the children become clean, pure from urine, then the Father comes. It is about which Father? Hm? It is about the Father of the human world that He comes, i.e. He is revealed in front of the world, He gets revelation like birth. The entire world knows that this one is the Father of all of us; He is the Father of everyone including Hindus, Muslims, Sikhs and Christians.

(Someone said – What is meant by becoming moot-paleeti?) Moot-paleeti means getting discharged. When one becomes discharged then one becomes moot-paleeti. So, how will the Father, the Father of the human world take such moot-paleeti children in his lap? He takes them [in his lap] when they become clean, pure. Only then can He take them in His lap. Why was He made distant by using the word 'He' (vo)? It is because this is about a part in the future. This is why now Baba has stopped the practices. What? Earlier He used to take you into His lap. Now He doesn't take you into His lap. He says – No. Go there in the hut and ask each one. Then, on that basis they are taken into the lap. Seek everyone's potamail. And lap is also of every kind, isn’t it? Hm? Did you understand? As will be their stage, so shall be the love that they will receive from the Father at that time. If someone is mature, intelligent, understands the knowledge, makes good purusharth, then the love that he receives from the Father will also be deep. When He sees that this one is something else inside and something else outside, there is mischief inside him. There are such persons, aren't there? Some are something else inside and show off outwardly that they are very good purusharthis, then the love that they receive is also like that. Baba will love. In His mind He will say that this one is a very good, sweet child. He is very serviceable. So, when someone is found to be like this (i.e. mischievous), then He will say that there is no substance in him at all. He does not understand the knowledge at all. He is completely foolish. He does not know how to render service to someone. He will not be able to do service. They will do other jobs; they will do this, they will do that. So, now we have all kinds of thoughts, don't we?
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2423, आडियो 2909, दिनांक 15.12.2017
VCD No.2423, Audio 2909, dated 15.12.2017
प्रातः क्लास 01.04.1967,
Morning class dated 01.04.1967
VCD-2423-extracts-Bilingual

समय- 0.01-21.17
Time- 00.01-21.17


प्रातः क्लास चल रहा था – 1.4.1967. शनिवार को पाँचवें पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी – तुम बच्चों को यही खास बतानी है कि शिवबाबा कौन है? हँ? कौन है शिवबाबा? गॉड का परिचय देना होता है ना। अंग्रेजी में कहते हैं गॉड। जी.ओ.डी.। जी माने? जेनरेटर। ओ माने? आपरेटर। और डी माने? डिस्ट्रक्टर। खलास। हिन्दी में कहते हैं त्रिमूर्ति शिव। क्या कहते हैं? (सबने कहा – त्रिमूर्ति शिव।) त्रिमूर्ति शिव। उसकी यादगार में त्रिमूर्ति हाउस बनाते हैं। हाउस माने? घर। किसका घर? हँ? त्रिमूर्ति हाउस। तीन मूर्तियों का घर। तो क्या तीन कमरे अलग-अलग बनाते होंगे? हँ? (किसी ने कहा – एक घर है।) एक घर है। घर एक का है। घर-परिवार एक का होता है या दो-चार का होता है? एक का होता है। तो नाम देते हैं त्रिमूर्ति हाउस। फिर यादगार नाम देते हैं त्रिमूर्ति रोड। रोड माने रास्ता। क्या? जिंदगी जीने का अच्छे ते अच्छा रास्ता। उसका नाम दिया है त्रिमूर्ति रोड। तो एक का रास्ता अच्छे ते अच्छा होगा बनाया हुआ या दो-चार-पाँच बताएंगे तो अच्छा रास्ता होगा? (सबने कहा – एक।) एक बताएगा तो वो अच्छा रास्ता और दो-चार-आठ बताएंगे तो रास्ता जरूर गलत हो जाएगा। तो सवाल ये है कि वो त्रिमूर्ति शिव जिसे कहा जाता है वो रास्ता बताने वाला, एक है या तीन-तीन हैं? हँ? (सबने कहा – एक।) एक है। एक इधर से आया, एक इधर से आया, तीन रास्ते जहाँ मिले, तो नाम देते हैं त्रिमूर्ति रास्ता।

ब्राह्मणों की ज़िंदगी में एक खास संस्कार होता रहा है। वो संस्कार जब तक नहीं होता, तब तक पक्का ब्राह्मण उसे नहीं मानते। कौनसा संस्कार? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जिसे कहते हैं द्विज। द्वि माने दूसरा; ज माने जन्म। अर्थात् दूसरा जन्म। जिसका दूसरा जन्म होता है उसे कहते हैं सच्चा द्विज। ब्राह्मण। अगर दूसरा जन्म नहीं हुआ, मल-मूत्र वाला ही जन्म हुआ, तो उसे ब्राह्मण नहीं कहेंगे। ब्राह्मण कब कहें? जब द्विज, दूसरा जन्म हो। तो जो दूसरा जन्म होता है उसमें क्या करते हैं? तीन धागे यज्ञोपवीत के यूँ डाल देते हैं। तीन धागे। और उन तीन धागों के ऊपर एक गांठ बांध देते हैं। ये भी किसकी यादगार है? हँ? ये भी उसी एक की यादगार जिसका नाम है त्रिमूर्ति शिव। क्या? तीन सूत्र माने तीन ज्ञान के धागे। ब्रह्मा के द्वारा दिया हुआ ज्ञान, शंकर के द्वारा दिया हुआ ज्ञान, फिर विष्णु के द्वारा दिया हुआ ज्ञान। और तीनों मिलकरके एक में इकट्ठे हो जाएं, गांठ बंध जाए तीनों की, तब कहते हैं त्रिमूर्ति धागा, तीन नहीं, एक जगह मिल गया। ऐसे नहीं कि टिवाटे पे कोई खड़ा हो, उससे रास्ता पूछा जाए तो ब्रह्मा का सूत्र वाला बताए इधर जाओ, विष्णु का सूत्र वाला बताएगा इधर जाओ, और शंकर के सूत्र वाला बताएगा – नहीं, इधर जाओ। तो ठिकाने पहुँचेगा? हँ? (किसी ने कहा – नहीं।)

तो ये तीन धागे जो यज्ञोपवीत के हैं, जिसका नाम रखा गया – यज्ञ उप वीत। यज्ञ माने जिस यज्ञ में स्वाहा करते हैं, बड़े ते बड़ा यज्ञ है – रुद्र ज्ञान यज्ञ। रुद्र जो है वो रौद्र रूप धारण करने वाले को कहा जाता है। ज्ञान यज्ञ का नाम क्या है? रुद्र ज्ञान यज्ञ। विनाशी या अविनाशी? (सबने कहा – अविनाशी।) अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ और शुरू किसके द्वारा हुआ? हँ? रुद्र के द्वारा शुरू हुआ। जिसने आरंभ से ही रौद्र रूप धारण किया है। वो रुद्र। जैसे बाबा कहते हैं ना – तुम्हारा जो यज्ञ आरम्भ हुआ, तो उसमें स्थापना के साथ-साथ विनाश ज्वाला भी प्रज्वलित हुई। तो जो विनाश करने का काम है, पुरानी परम्पराओं का विनाश, पुरानी धारणाओं का विनाश। पुराने-पुराने धर्मों का विनाश। पुरानी-पुरानी राज्य परंपरा का विनाश। माना जो कुछ भी पुरानापन है उस पुरानेपन का विनाश करने की ताकत दुनिया में किसी की नहीं हुई। जैसे धरमपिताएं आए, उन्होंने अपना धरम तो स्थापन कर दिया, लेकिन जो पुराना धर्म चला आ रहा था, उसका विनाश नहीं किया। तो एक जो आ रहा था उसके साथ दूसरा जोड़ दिया। तीसरा धर्मपिता आया – बुद्ध – उसने बौद्ध धर्म जोड़ दिया। तो अनेकता बढ़ती गई; कि एकता आएगी? हँ? अनेकता आ गई। अनेकता आएगी तो लड़ाई-झगड़ा होगा कि नहीं? होगा।

एक धर्म था, एक राज्य था दुनिया में, एक ही भाषा थी, एक ही कुल था, तो कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं था। देवताएं देवताओं की दुनिया में, स्वर्ग में, सब बड़े सुख से। फिर देखो क्या हो गया? जैसे-जैसे अनेक धरम बढ़ते गए, जैसे-जैसे उन धर्मों के आधार पर अनेक प्रकार के कर्मकांड बढ़ते गए; हँ? जैसे गीता में लिखा है ना – धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे। धर्म के क्षेत्र में अनेक प्रकार के धर्म हो गए। जैसे मुसलमान हैं। अपने धर्म के आधार पर उन्होंने कर्मकांड बनाए कि भई जब आदमी मरता है तो उसके शरीर को जलाय (दफनाय) देना चाहिए। ये कर्मकांड बनाय दिया। जबकि वो जानते थे कि पहले से एक कर्मकांड चल रहा है हिन्दुओं में, भारतवर्ष में। क्या? शरीर छोड़ते थे तो वो जलाते थे। भारत की पुरानी परंपरा तो यही है। उन्होंने कहा – नहीं, इस बात को हम नहीं मानेंगे। जलाना अच्छी चीज़ नहीं है। जला दिया, वो तो बहुत खराब कर दिया। अरे, जलाना नहीं है। खत्म नहीं करना है। उसको रखना है। क्या रखना है? क्यों रखना है? इसलिए रखना है कि हम देह थे। जब पैदा हुए तो हम क्या थे? देह थे। जब हम हैं ही देह तो उसको खतम क्यों करना? इसलिए आदमी मरता है तो उसकी देह को रख दो। देह, उसको रख दो। खत्म मत होने दो। उनका कहना है कि जब कयामत होगी तो अल्लाह ताला आकरके उस कब्र में से उसको जगाएंगे। और उनके शास्त्रों में लिखा हुआ है कि जब कयामत होगी, विनाश होगा इस दुनिया का, तो कब्रों के अन्दर से भूत-प्रेत बनकरके वो आत्माएं जाग उठेंगी। क्या? अल्ला ताला के आने तक पड़ी रहेंगी। लेकिन जैसे ही अल्ला ताला आएगा, वो भूत-प्रेत बनकर जाग खड़े होंगे, जिन्दा हो जाएंगे। ऐसी मान्यता बनाई।

अब वास्तव में ये मान्यता है कहाँ की? मुसलमानों में ये जो मान्यता बनी कि मुर्दे को, डैड बॉडी को गाड़ करके सुरक्षित कर दो। वास्तव में जब भगवान इस सृष्टि पर आता है, जिसे भगवान को वो अल्ला मियां कहते हैं, तो जो मुस्लिम धर्म की आत्माएं हैं, जो इस बात को समझती ही नहीं कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं, अविनाशी आत्मा हैं। उनका देहभान खतम ही नहीं होता। कुछ न कुछ रहेगा जरूर। इसलिए उनका कहना है कि आत्मा है या नहीं, है, हो भी सकती है, रूह को मान लेते हैं, लेकिन देह भी अविनाशी है। तो वो देह को भूल नहीं पाते इसलिए अविनाशी कहते हैं। अभी भगवान इस सृष्टि पर आया हुआ है। बता रहा है कि तुम देह नहीं हो, तुम क्या हो? आत्मा हो। आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है। तुम्हारी देह ये विनाशी है। लेकिन उनमें देहभान इतना ज्यादा होता है, दूसरे धर्म वालों में कि वो अपने देह के भान को भूल ही नहीं पाते। इसलिए उनका अनुभव ये कहता है कि नहीं, रूह अगर अविनाशी है तो देह भी अविनाशी है। इसलिए देह को सुरक्षित करके रखना चाहिए। उसको जलाना नहीं चाहिए।

ये फाउण्डेशन कहाँ पड़ा? संगमयुग में ये फाउण्डेशन पड़ता है दूसरे धरम वाली आत्माओं में। इसके अलावा कुछ भारतवासी आत्माएं भी होती हैं जो देवताएं थे, जो अपन को आत्मा समझते तो हैं, लेकिन आत्मा की उस ऊँचाई की स्टेज पर नहीं जा पाते स्मृति के आधार पर कि 16 कला संपूर्ण आत्मा बन जाएं। माना कुछ न कुछ देहभान रह जाता है। तो वो आत्माएं जो हैं कमजोर होने के कारण, कमजोर देवात्मा, 16 कला नहीं, कितने? हँ? पौने 16 कला, साढ़े 15, 14 कला, माने कम ताकत वाली आत्माएं। कम ज्ञान की रोशनी धारण करते हैं। पूरा ज्ञान धारण नहीं करते। आत्मा का पूरा ज्ञान अगर धारण कर लें तो वो भी अपन को अजर, अमर, अविनाशी मान लें, समझ लें। फिर कितने जन्म लेंगे? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) पूरे 84. पूरे चक्र में चक्र लगाने वाली आत्मा बनते। लेकिन वो पूरा ज्ञान लेते ही नहीं। पूरी प्रैक्टिस करते ही नहीं कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं। इस बात पर उनको पक्का निश्चय नहीं होता कि हम अविनाशी आत्मा हैं। देहभान नहीं खतम होता। इसलिए अविनाशी आत्मा नहीं बन पाते। आत्मा की निरंतर स्मृति में नहीं टिक पाते। तो वो ही कमजोर आत्माएं जो हैं, जब द्वैतवादी द्वापरयुग आता है, दूसरे धर्म के धरमपिताएं आते हैं, उनके साथ मिक्स हो जाते हैं। उनकी बातों से प्रभावित हो जाते हैं। और प्रभावित होकरके वो उनकी परंपराओं को मान लेते हैं। स्वीकार कर लेते हैं – हाँ, देह को जलाना नहीं चाहिए, बिल्कुल खतम नहीं करना है। क्या करना है? देह भी अविनाशी है, उस देह को, देहभान अविनाशी है, इसलिए देह को सुरक्षित करके रख दो।

तो इस तरह की ढ़ेर की ढ़ेर परंपराएं हैं। इस तरह की ढ़ेर की ढ़ेर परंपराएं हैं। क्या? अलग-अलग धर्मों के आधार पर ढ़ेर के ढ़ेर कर्मकांड हैं, जो धर्मपिताओं ने टाइम टू टाइम सिखाए। अब सारी मान्यताएं सच्ची होंगी या भगवान ने जो सिखाया था वो सच्चा होगा? सत्य एक होता है या सत्य दो, चार, आठ, ज्यादा होते हैं?
(सबने कहा – एक।) सत्य तो एक होता है। तो भगवान जब आते हैं तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जो भी आत्माएं दूसरे धर्मों में कन्वर्ट हो गईं थीं, देवात्माएं होते हुए भी, स्वर्ग में जन्म लेते हुए भी, उन सबको इकट्ठा करते हैं दूसरे धर्मों में से। क्या? हर धर्म की आत्माएं आखरी जनम में भारत में आकरके ब्राह्मण बनती हैं ब्रह्मा की औलाद।

A morning class dated 1.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the fifth page was – You children have to especially tell that who is ShivBaba? Hm? Who is it? Who is ShivBaba? You have to give the introduction of God, is not it? You say God in English. G.O.D. G means? Generator. O means? Operator. And D means? Destructor. That's all. In Hindi you say 'Trimurti Shiv'. What do you say?
(Everyone said – Trimurti Shiv.) Trimurti Shiv. A Trimurti House is built in His memorial. What is meant by house? Ghar (house). Whose house? Hm? Trimurti House. House of three personalities. So, do they build three separate rooms? Hm? (Someone said – There is one house.) There is one house. The house belongs to one. Does a house or family belong to one or to two-four [persons]? It belongs to one. So, the name is coined as 'Trimurti House'. Then a memorial name is given as Trimurti Road. Road means path. What? The best path to live life. It has been named as Trimurti Road. So, will the path of one be the best one or will it be the best path if two-four-five persons show the path? (Everyone said – One.) If one shows then that path would be good and if two-four-eight [persons] show, then that path will definitely be wrong. So, the question is that is the one who is called Trimurti Shiv, who shows the path, one or three? Hm? (Everyone said – One.) One. One comes from this side, one comes from this side, the place where the three roads meet, and then the name assigned is Trimurti Road.

There is a special ritual (sanskaar) in the life of Brahmins. Unless that ritual is performed, he is not considered to be a firm Brahmin. Which ritual? Hm?
(Someone said something.) Yes, the one who is called Dwij. Dwi means second; ja means birth, i.e. second birth. The one who is born for the second time is called the true Dwij. Brahmin. If he has not been born for the second time, if he has been born through ******* and urine only, then he will not be called a Brahmin. When will he be called a Brahmin? When he becomes Dwij, when he is born for the second time. So, what is done when he is born for the second time? Three threads of Yagyopavit (the sacred thread) is put like this. Three threads. And those three threads are tied into a knot like this. Whose memorial is this also? Hm? This is also a memorial of that one only whose name is Trimurti Shiv. What? Three threads means the three threads of knowledge. Knowledge given by Brahma, knowledge given by Shankar, and then knowledge given by Vishnu. And when all the three merge to become one, when the knot is tied, then it is called Trimurti thread. Not three. It merged into one. It is not as if someone is standing at a T-point (tivata) and if he is asked the path, then the one with the thread of Brahma says – Go here; the one with the thread of Vishnu will say – Go here and the one with the thread of Shankar will say – No, go here. So, will he reach the destination? Hm? (Someone said – No.)

So, these three threads of yagyopavit (sacred thread), which has been named Yagya up veet. Yagya means the Yagya in which one makes offerings. The biggest Yagya is the Rudra gyaan Yagya. The one who assumes a fierce form (raudra roop) is Rudra. What is the name of the Gyan Yagya? Rudra Gyan Yagya. Perishable or imperishable? (Everyone said – Imperishable.) Imperishable Gyan Yagya; and who started it? Hm? It was started by Rudra. The one who assumed a fierce form from the beginning itself. That Rudra. For example, Baba says – in your Yagya which has started, along with the flame of establishment, the flame of destruction was ignited. So, the task of destruction, the destruction of old rituals, destruction of old inculcations. Destruction of old religions. Destruciton of old traditions of the state. It means that nobody in the world has the power to destroy all the oldness. For example, when the founders of religions came; they established their own religion, but they did not destroy the old religion that had been continuing. So, they added one more to the existing one. The third founder of religion came – Buddha – He added Buddhism. So, plurality went on increasing. Or did unity take place? Hm? Diversity emerged. When diversity emerges, then will there be quarrels and disputes or not? There will be.

There was one religion, one kingdom in the world, there was only one language, there was only one clan, so, there used not to be any fights and quarrels. Everyone was very happy in the world of deities, in heaven. Then, look what happened? As the number of religions increased, as the different kinds of rituals increased on the basis of those religions; hm? For example, it has been written in the Gita – Dharmakshetre kurukshetre. Many kinds of religions emerged in the field of religion. For example, there are Muslims. They formed rituals on the basis of their religion that brother, whenever a person dies, then his body should be cremated (buried). They made this ritual, whereas they knew that already a ritual was in vogue among the Hindus, in the Indian region. What? Whenever someone used to leave his/her body, they used to cremate it. This is the old tradition of India. They (the Islamic people) said – No, we will not accept this. It is not good to burn. If you burnt it, you did a very bad thing. Arey, you should not burn. You should not destroy it. You have to keep it. What should be kept? Why should it be kept? It should be kept because we were bodies. When we were born, what were we? We were bodies. When we are indeed bodies, then why should it be destroyed? This is why when a person dies, then keep his body. Keep the body. Don't let it be destroyed. They believe that when destruction (kayaamat) takes place, then Allah Tala (God) will come and wake him up from the grave. And it has been written in their scriptures that when destruction takes place, when the destruction of this world takes place, then those souls will rise from the graves in the form of ghosts and devils. What? They will lie there till the arrival of Alla Tala. But as soon as Alla Tala comes, they will wake up and stand in the form of ghosts and devils and come to life. They developed such a belief.

Well, actually, this belief is about which place? This belief among the Muslims that the corpse, the dead body should be buried for safety. Actually, when God, whom they call Alla Miyaan, comes in this world, then the souls belonging to the Muslim religion, which do not understand at all that we are points of light souls, imperishable souls. Their body consciousness doesn’t end at all. It will definitely remain to some extent. This is why they say that whether the soul exists or not, it exists, it may exist, they accept the soul (ruh), but the body is also imperishable. So, they are unable to forget the body; this is why they call it imperishable. Now God has come in this world. He is telling that you are not a body; what are you? You are a soul. A soul is ajar (one that does not become old), amar (eternal), avinashi (imperishable). Your body is perishable. But they, the people of other religions are so body conscious that they are unable to forget the consciousness of their body at all. This is why their experience says that no, if the soul is imperishable, then the body is also imperishable. This is why you should safeguard the body. It should not be burnt.

Where was this foundation laid? This foundation is laid in the Confluence Age among the souls belonging to the other religions. Apart from this, there are some Indian souls also which were deities, who do consider themselves to be souls, but they are unable to achieve the high stage of the soul on the basis of remembrance so that they could become perfect in 16 celestial degrees. It means that body consciousness remains in them to some extent or the other. So, those souls being weak, being weak deity souls; not perfect in 16 celestial degrees; how many? 15.75 celestial degrees, 15.5, 14 celestial degrees; i.e. souls with lesser power. They inculcate lesser light of knowledge. They do not inculcate complete knowledge. If they inculcate complete knowledge of the soul, then they could consider themselves to be ajar, amar, avinaashi. Then how many births would they get? Hm?
(Someone said something.) Complete 84. They would have become souls which pass through the entire cycle. But they do not obtain complete knowledge at all. They do not make complete practice that we are points of light souls. They do not develop complete faith that we are imperishable souls. Their body consciousness does not end. This is why they are unable to become imperishable souls. They are unable to become constant in the awareness of the soul continuously. So, they are the weak souls who, after the commencement of the dualistic Copper Age, when the founders of other religions come, they mix up with them. They are influenced by their versions. And after being influenced, they accept their traditions. They accept them – Yes, the body should not be burnt, it should not be completely destroyed. What should be done? The body is also imperishable; that body; the body consciousness is imperishable, this is why the body should be kept safely.

So, there are numerous such traditions. There are numerous such traditions. What? On the basis of different religions, there are numerous rituals, which the founders of religions have taught from time to time. Well, will all the beliefs be true or will that which has been taught by God be true? Is truth one or is truth two, four, eight, or more?
(Everyone said – One.) Truth is one. So, when God comes then all the souls on this world stage which had converted to other religions, despite being deity souls, despite being born in heaven, all of them are gathered from other religions. What? Souls of every religion become Brahmins, the children of Brahma in the last birth in India.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 09 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2424, आडियो 2910, दिनांक 17.12.17
VCD 2424, Audio 2910, dated 17.12.17
प्रातः क्लास 01.04.1967,
Morning class dated 01.04.1967
VCD-2424-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.30
Time: 00.01-22.30


प्रातः क्लास चल रहा था – 1.4.1967. शनिवार को पाँचवें पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी – गॉड का परिचय देना होता है। हँ? गॉड तो भगवान। हिन्दी में कहते हैं भगवान। अंग्रेजी में कहते हैं गॉड। तो गॉड का परिचय क्यों कहा? क्योंकि गॉड अक्षर में, गॉड शब्द में तीन अक्षर हैं जिनके तीन अर्थ हैं। जी माना जेनरेटर, ओ माने आपरेटर, और डी माने डिस्ट्रक्टर। हिन्दी में इनको कहते हैं – त्रिमूर्ति। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। तो तीन मूर्तियों का परिचय देना है या एक का परिचय देना है? हँ? (सबने कहा – तीन मूर्तियों का।) तीन का परिचय देना है? (किसी ने कुछ कहा।) तीन में? (किसी ने कुछ कहा।) एक ही है? एक कौन है? (किसी ने कहा – शिवबाबा।) हँ? तीनों में एक शिवबाबा है? वाह भई! तीनों में एक शिवबाबा है। ब्रह्मा में शिवबाबा है? अरे, बताओ जल्दी-जल्दी। अभी तो कहा तीनों में एक ही है। ब्रह्मा में शिवबाबा है? (किसी ने कहा – अव्वल नंबर ब्रह्मा में।) अव्वल नंबर ब्रह्मा में शिवबाबा है? अगर कहें कि ब्रह्मा उसे कहा जाता है जिसमें सौ परसेन्ट सहनशीलता है। अम्मा। ब्रह्मा माने बड़ी अम्मा। बडे ते बड़ी अम्मा। तो कहें कि ब्रह्मा ही शिवबाबा है? अरे! कहें? (किसी ने कहा – नहीं।) क्यों? (किसी ने कहा – माँ का पार्ट।) हाँ। कहेंगे सहनशीलता वाली माँ का पार्ट है।

लेकिन ब्रह्मा तो बहुतों के नाम हैं। कौनसे ब्रह्मा के लिए कहें कि सहनशीलता वाली माता है संसार की बड़े ते बड़ी? किसको कहें?
(किसी ने कहा – दादा लेखराज ब्रह्मा।) दादा लेखराज ब्रह्मा को कहें? अच्छा? दादा लेखराज ब्रह्मा वाली आत्मा यज्ञ के आदि में जब धोबीघाट की बात फैली संसार में, बवंडर खड़ा हो गया; हो गया ना? तो दादा लेखराज ब्रह्मा डटे रहे या चौकड़ी मार के कराची भाग गए चुपचाप? हँ? (किसी ने कहा – कराची भाग गए।) तो सहन किया? (किसी ने कहा – नहीं।) नहीं? तो कहें उनमें सौ परसेन्ट सहनशीलता थी? अच्छा चलो आदि की बात छोड़ दो। जब उनके शरीर का अंत हुआ तो किस बात से हुआ? उनका जो शरीर से पार्ट था वो पार्ट का अंत कौनसी बात से हुआ जो शरीर ही छूट गया? बताओ-बताओ। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) नहीं। (किसी ने कहा – हार्टफेल।) हार्टफेल हआ; क्यों? हार्टफेल किस बात से हुआ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। उनको ये दुःख पैदा हो गया, अति का दुःख हो गया कि जिन बच्चों की मैंने इतनी पालना की, उन बच्चों ने मुझे धोखा दे दिया। मैं ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय नाम रखा, और इन्होंने तो उसको रजिस्ट्रेशन अपने नाम से करा लिया। मेरा नाम ही उड़ा दिया। तो ये बात वो सहन नहीं कर सके। शरीर ही छूट गया क्योंकि समझते थे कि ऊँचे ते ऊँचा जो शिव बाप है उसकी प्रापर्टी का मैं ही अव्वल नंबर हकदार हूँ। और संसार में मेरा ही नाम गाया जाएगा गीता का भगवान? हँ? कृष्ण। तो ये तो सारी बात फेल हो गई।

चलो, दादा लेखराज ब्रह्मा न सही ब्रह्मा अव्वल नंबर। तो फिर किसे कहें? हँ? परमब्रह्म को कहें? जो ब्रह्मा सो अव्वल नंबर विष्णु बनता है उसको भी न कहें?
(किसी ने कुछ कहा।) हँ? अच्छा, जो पहले नंबर में ब्रह्मा नामधारी हुआ, उसको कहें क्योंकि शिव बाप ने ब्रह्मवाक्य में बोला कि मैं अकेला नहीं आता हूँ। हँ? किसके साथ आता हूँ? तीन मूर्तियों के साथ आता हूँ। तो तीन मूर्तियों में वो पहली मूर्ति कौनसी जिसमें प्रवेश किया तो ब्रह्मा नाम पड़ा और उस ब्रह्मा का पहला पुत्र ब्राह्मण बना, ब्राह्मण चोटी कहा गया? क्या कहा गया? ब्राह्मण चोटी। चोटी का ब्राह्मण। सबसे ऊँचा। तो वो चोटी का ब्राह्मण किससे पैदा हुआ? ब्रह्मा से पैदा हुआ ना। ब्रह्मा का बच्चा कहें ब्राह्मण। जो भी नंबरवार ब्राह्मण होते हैं उनमें अव्वल नंबर ब्रह्मा। ठीक। तो वो तो हुआ जिसमें प्रवेश किया, और प्रवेश करके उसका नाम दिया ब्रह्मा। मैं जिसमें भी प्रवेश करता हूँ, उसका नाम ब्रह्मा देता हूँ।

तो किस आधार पर ब्रह्मा हुआ? क्या काम करने के लिए?
(किसी ने कुछ कहा।) सामना किया? दादा लेखराज ब्रह्मा को साक्षात्कार हुए थे ना। उन साक्षात्कारों को भागीदार के सामने सुनाने की हिम्मत दादा लेखराज ब्रह्मा को भी नहीं हुई। और उन्होंने कलकत्ते में अपनी बड़ी बहन को बताया। उसमें भी हिम्मत नहीं थी कि दादा लेखराज जो बुद्धिवादी था, कहें कि उस दुनिया में दादा लेखराज में और उनकी बड़ी बहन; क्योंकि बड़ी बहन को भारत में समझते हैं कि जैसे बड़ा भाई बाप समान, वैसे बड़ी बहन? माँ समान। तो उसको भी हिम्मत नहीं हुई उनके साक्षात्कारों की बात जाकरके भागीदार को सुनाएं क्योंकि वो तो थी ही भागीदार की पत्नी। और पत्नी तो अपने पति से ही प्रभावित होती है। तो क्या बड़ी बात हो गई? प्रभावित माना प्रजा। तो न दादा लेखराज को हिम्मत पड़ी, न उनकी बड़ी बहन को हिम्मत पड़ी। तो बड़ी बहन ने अपनी सहेली को बता दिया। जो सहेली बड़बोली थी। बोलने में बड़ी होशियार। तो उसके कान में बात पड़ी तो उसने तो हिम्मत कर ली। क्या? हिम्मत की ना। और जिसने हिम्मत की उसके लिए ब्रह्मवाक्य मुरली में क्या है? (किसी ने कुछ कहा।) हिम्मते बच्चे मददे बाप। तो शिव बाप ने उस बच्ची को हिम्मत दे दी। और बच्ची ने सुना दिया उन साक्षात्कारों की बात को भागीदार के सामने।

तो इसमें हिम्मत की क्या बात है? सुनी हुई बात को किसी के सामने सुना देना, इसमें क्या बड़ी बात है? कोई हिम्मत की बात है? हँ? है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) क्या? (किसी ने कहा – ज्यों की त्यों सुनाना।) ज्यों की त्यों सुनाना? हाँ, ज्यों की त्यों ही सुनाना, कुछ मिक्स करके थोड़ेही सुनाया? (किसी ने कुछ कहा।) नहीं। ये साक्षात्कार होना, ये स्वप्न होना, ये अंधश्रद्धा की, भक्ति की बात है, या बुद्धिवादी के प्रूफ और प्रमाण की बात है? भक्ति की बात है। ब्रह्मवाक्य मुरली में सुनी-सुनाई बातों पर भारतवासियों ने दुर्गति पाई। सुनी-सुनाई बातों के आधार पर थोड़ेही चलना चाहिए। बुद्धि से फैसला करना चाहिए या नहीं करना चाहिए? करना चाहिए। तो उस माता ने हिम्मत ये कर ली, कि जिस बुद्धिवादी भागीदार से जो ब्रह्मा बाबा की दुकान में दस साल से भागीदार था, अच्छा विद्वान था, बुद्धिवादी था, तो कोई की बात को, अंधश्रद्धा वाली बात को तो वो मानने वाला नहीं। तो न ब्रह्मा बाबा की हिम्मत पड़ती कि मैं उनको सुनाऊँ मुझे साक्षात्कार हुआ। वो कहेंगे – क्या प्रूफ तुमको साक्षात्कार हुआ? ऐसे ही तुम सुना रहे अपना प्रभाव जमाने के लिए। तो उस माता ने हिम्मत की और सुना दिया, ब्रह्मा बाबा को जैसे-जैसे साक्षात्कार हुए थे, वो बातें सुना दी।

और ये तो है कि सुनने वाला सुनने के साथ-साथ समझ भी सकता है कि नहीं समझ सकता है? हँ? तो भागीदार ने साक्षात्कारों की बात को सुना और उसी क्षण शिव बाप ने प्रवेश करके समझा दिया। शिव बाप जिसमें प्रवेश करते हैं वो तो किसी को पता ही नहीं चलता, कब आया, कब चला गया। ब्रह्म वाक्य है, इन ब्रह्मा को पता चलता है? दादा लेखराज ब्रह्मा को भी नहीं पता चलता था, कब आया, कब चला गया। ये भी पहचान है। क्या? निराकार शिव ज्योतिबिन्दु की ये पहचान है। क्या? क्या पहचान? कि कब आता है कब चला जाता है किसी को पता ही नहीं चलता। जिसमें आता है, उसको भी, उसको भी पता नहीं चलता। बाद में पता चलता है। और ये प्वाइंट मेरी बुद्धि में था ही नहीं। ये मैंने कैसे सुना दिया? तो फिर विचार चलता है कि जरूर कोई हस्ती है जिसने प्रवेश किया और ये बात बताई। लेकिन इस तरह की बातें, नई बात है, ये नई-नई बातें, दुनिया में आज तक किसी ने नहीं सुनाई थी। तो निश्चय पक्का हो जाता है कि सिवाय भगवान के और कोई नहीं हो सकता।

तो ठीक है। भागीदार ने सुना और सुनने के साथ-साथ समझा और जो सुना और समझा उसके हिसाब से क्लेरिफिकेशन दे दिया साक्षात्कारों का कि ब्रह्मा वाली आत्मा को सफेदपोश का साक्षात्कार हुआ इसलिए इनको ब्रह्मा के रूप में पार्ट बजाना है। संसार के सामने। क्या? संसार के सामने ब्रह्मा का पार्ट बजाना है। सवाल है कि संसार के सामने ब्रह्मा माँ का पार्ट बजाना है। संसार झूठा या संसार सच्चा? हँ?
(किसी ने कहा – झूठा।) जिस संसार को मालूम पड़ेगा कि ब्रह्मा कौन और ब्रह्मा के कुमार-कुमारी ब्राह्मण कौन? क्योंकि सारा संसार किसकी संतान? ब्रह्मा की संतान। तो सारे संसार की बुद्धि में यही बैठेगा वो जो सफेदपोश रूप है, वो ब्रह्मा है, जिसका सारा संसार ब्राह्मण बनता है। ब्राह्मण बनता है तो कम से कम एक जनम के लिए जीवनमुक्ति पाने वाला देवता बनता है। क्या? बनता है ना। एक जनम के लिए दिव्य जन्म जरूर लेता है। ठीक है। 500 करोड़ ने जाना कि ये ही ब्रह्मा है। लेकिन जिस 500 करोड़ ने जाना कि ये ब्रह्मा है, तो उसने सही जाना या झूठ जाना? (किसी ने कुछ कहा।) क्यों? (किसी ने कुछ कहा।) वास्तव में तो दादा लेखराज ब्रह्मा नाम तो तबसे पड़ा जबसे, जबसे ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय नाम पड़ा।

A morning class dated 1.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the fifth page on Saturday was – You have to give the introduction of God. Hm? God is Bhagwaan. They say Bhagwaan in Hindi. In English they say God. So, why was it said ‘introduction of God’? It is because there are three alphabets in the word God, in the word God, which has three meanings. G means generator, O means operator and D means destructor. In Hindi, they are called- Trimurti. Brahma, Vishnu and Shankar. So, do you have to give the introduction of all the three personalities or do you have to give the introduction of one? Hm?
(Everyone said – Of three personalities.) Do you have to give the introduction of three? (Someone said something.) In three? (Someone said something.) Is it one only? Who is the one? (Someone said – ShivBaba.) Hm? Is there one ShivBaba in all the three? Wow brother! There is one ShivBaba in all three. Is there ShivBaba in Brahma? Arey, tell quickly. Just now you said – There is only one in all the three. Is there ShivBaba in Brahma? (Someone said – In number one Brahma.) Is there ShivBaba in number one Brahma? If you say that the one who has hundred percent tolerance is called Brahma. Amma (mother). Brahma means senior mother. The seniormost mother. So, should we say that Brahma himself is ShivBaba? Arey! Should we say? (Someone said – No.) Why? (Someone said – Mother’s part.) Yes. It will be said that it is the part of a tolerant mother.

But Brahma is the name of many. For which Brahma should we say that she is the biggest tolerant Mother of the World? Who should be called?
(Someone said – Dada Lekhraj Brahma.) Should we call Dada Lekhraj Brahma? Achcha? The soul of Dada Lekhraj Brahma, when the topic of dhobighat (laundry) spread in the world in the beginning of the Yagya and a big storm arose, did it not? So, did Dada Lekhraj remain steadfast or did he run away silently to Karachi? Hm? (Someone said – He ran away to Karachi.) So, did he tolerate? (Someone said – No.) No? So, should we say that he had 100 percent tolerance? Achcha, let’s leave the topic of the beginning. When his body perished, how did it perish? The part that he played through his body, how did that part end that he left his body? Speak up, speak up. Hm? (Someone said something.) No. (Someone said – Heart fail.) His heart failed. Why? Why did his heart fail? Hm? (Someone said something.) Yes. He became sorrowful, he became extremely sorrowful that the children whom I sustained so much, those children duped me. I coined the name Brahmakumari Ishwariya Vishwavidyalaya. And these people got the registration done in their own names. They removed my name itself. So, he could not bear that. He left his body because he used to think that I am the number one person entitled to the property of the highest on high Father Shiv. And my name alone will be sung in the world as the God of Gita. Hm? Krishna. So, all the topic failed.

Okay, Dada Lekhraj Brahma may not be the number one Brahma. So, then who should be called? Hm? Should Parambrahm be called? Should we not call even the Brahma who becomes number one Vishnu?
(Someone said something.) Hm? Achcha, should we call the one who holds the title of Brahma at the number one position because Father Shiv has said in the Brahmavaakya that I do not come alone. Hm? With whom do I come? I come with three personalities. So, which is that first personality among the three personalities in which He entered so that he got the name Brahma and the first son of that Brahma became Brahmin and was called the choti Brahmin? What was he called? Brahmin choti. The highest Brahmin. The highest one. So, from whom was that highest Brahmin born? He was born from Brahma, wasn’t he? Brahma’s child will be called a Brahmin. Number one Brahma among all the numberwise Brahmins. Correct. So, he is the one in whom He entered. And after entering He named him Brahma. In whomsoever I enter I name him Brahma.

So, on what basis is he the Brahma? To perform which task?
(Someone said something.) Did he confront? Dada Lekhraj Brahma had visions, didn’t he? Even Dada Lekhraj Brahma could not muster the courage to narrate about those visions to his [business] partner. And he narrated to his elder sister in Calcutta. She too did not have the courage that Dada Lekhaj, who was intellectual, you could say that in that world Dada Lekrhaj and his elder sister; because in India people think about the elder sister that just as the eldest brother is like Father, similarly the elder sister? Is like the mother. So, she too could not gather courage to narrate the topic of visions to the partner because she was the partner’s wife. And a wife is influenced by her husband only. So, what is the big deal in it? Being influenced (prabhaavit) means to become a subject (praja). So, neither could Dada Lekhraj gather courage, nor could his elder sister muster courage. So, the elder sister told her friend. That friend was talkative. She was very clever in speaking. So, when the words reached her ears, then she could muster courage. What? She showed courage, didn’t she? And what has been said in the Brahmavaakya Murli for the one who shows courage? (Someone said something.) If the children show courage, the Father helps. So, Father Shiv gave courage to that daughter. And the daughter narrated the topic of those visions to the partner.

So, what is the topic of courage in it? What is the big deal in narrating the topic heard [from someone] in front of someone else? Is it a topic of display of courage? Hm? Is it? Hm?
(Someone said something.) What? (Someone said – To narrate as it is.) To narrate as it is? Yes, to narrate as it is; did she mix up anything and narrated? (Someone said something.) No. To have visions, dreams is a topic of blindfaith, Bhakti or is it a topic of proof of being intellectual? It is a topic of Bhakti. It has been said in the Brahmavaakya Murli that the Indians underwent degradation on the basis of hearsay. One should not act according to hearsay. Should one decide on the basis of intellect or not? One should. So, that mother showed this courage that the intellectual partner, the partner who was working in Brahma Baba’s shop since ten years, a nice scholar, intellectual person, then he dos not accept any topic, any topic of blindfaith. So, neither Brahma Baba could muster courage to narrate to him that I had visions. He will say – What is the proof that you had visions? You are narrating just to increase your influence. So, that mother showed courage and narrated; she narrated the topic of the visions that Brahma Baba had experienced.

And it is true that can the listener understand or not along with listening? Hm? So, the partner heard the topics of visions and the same moment the Father Shiv entered and explained. When the Father Shiv enters in someone then nobody knows at all as to when He came and when He departed. There is a Brahmavaakya; does this Brahma get to know? Even Dada Lekhraj Brahma used not to know as to when He came, when He departed. This is also an indication. What? This is an indication of the incorporeal point of light Shiv. What? Which indication? Nobody knows when He comes and when He departs. Even the one in whom He enters does not know. He gets to know later on. And this point was not in my intellect at all. How did I narrate this? So, then one thinks that definitely there is a personality who entered and narrated this topic. But such topics, there is a new topic, these new topics were not narrated by anyone in the world so far. So, the faith becomes firm that it cannot be anyone except God.

So, its alright. The partner heard and along with hearing, he understood it and whatever he heard and understood, he gave the clarification of the visions accordingly that the soul of Brahma had visions of a white clad person; so, he has to play a part in the form of Brahma in front of the world. What? He has to play the part of Brahma in front of the world. The question is that he has to play the part of mother Brahma in front of the world. Is the world false or is the world true? Hm?
(Someone said – False.) The world will know as to who is Brahma and who are the sons and daughters of Brahma, i.e. Brahmins? It is because whose progeny is the entire world? Brahma’s progeny. So, it will sit in the intellect of the entire world that that the white clad person is Brahma whose progeny the entire world becomes Brahmins. When someone becomes a Brahmin, then he becomes a deity who achieve jeevanmukti (liberation in life) for at least one birth. What? He becomes, doesn’t he? He does get divine birth for one birth. It is correct. 500 crores came to know that this is Brahma. But the 500 crores who came to know that this is Brahma, so, did they know correctly or did they know falsely? (Someone said something.) Why? (Someone said something.) Actually, the name Dada Lekhraj Brahma was coined ever since the name Brahmakumari Ishwariya Vishwa Vidyalaya was coined.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 10 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2425, आडियो 2911, दिनांक 18.12.17
VCD 2425, Audio 2911, dated 18.12.17
प्रातः क्लास 01.04.1967,
Morning Class dated 01.04.1967
VCD-2425-extracts-Bilingual

समय- 0.01-18.46
Time: 00.01-18.46


प्रातः क्लास चल रहा था – 1.4.1967. शनिवार को पाँचवें पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी – शिवबाबा का जब परिचय देना होता है माना गॉड का परिचय देना होता है तो ये बताना है। और बार-बार यही परिचय मिलता है कि तुम योग में रहते हो। किसके साथ? (किसी ने कहा – शिवबाबा।) शिवबाबा जिसे कहा जाता है वो है साकार और निराकार का मेल। शिव माना ज्योतिबिन्दु निराकार। और बाबा माने साकार ग्रैण्डफादर, दोनों का मेल। और वो शिव है त्रिमूर्ति शिव। वो तीन मूर्तियों के साथ आता है। त्रिमूर्ति शिव कहा जाता है। तो उसकी यादगार में त्रिमूर्ति हाउस बनाते हैं। या त्रिमूर्ति रोड नाम रखते हैं। तो क्या तीन मूर्तियों का बताया हुआ रास्ता है या एक मूर्ति का बताया हुआ रास्ता है? रास्ता तो एक होना चाहिए। तो सवाल पैदा होता है कि तीन मूर्तियों में ऊँच ते ऊँच मूर्ति कौन? कहते तो हैं भक्तिमार्ग में ब्रह्मा देवताय नमः, विष्णु देवताय नमः, फिर कहते हैं शंकर देवताय नमः। ऐसे कहते हैं? शंकर महादेव कहते हैं। विष्णु और ब्रह्मा को देव कहते हैं। तो साबित हो जाता है कि तीनों मूर्तियों में मुख्य मूर्ति कौनसी है? महादेव।

तो महादेव जिसमें तीन मूर्तियाँ समाई हुई हैं, भक्तिमार्ग में चित्र दिखाते हैं, तो शिव नेत्र दिखाते हैं शंकर की मूर्ति में। किसकी यादगार? शिव निराकार की यादगार शिव नेत्र। फिर चन्द्रमा दिखाते हैं ज्ञान चन्द्रमा कृष्णचन्द्र की यादगार। जो कृष्ण चन्द्र, चन्द्रमा की रोशनी घटती-बढ़ती है ना। कभी 16 कला संपूर्ण, कभी कलाहीन। कभी दूज का चाँद। तो शंकर के मस्तक पर कौनसा चाँद दिखाते हैं? कम कला वाला या संपूर्ण कला वाला?
(सबने कहा –कम कला वाला।) इसका मतलब है कि शिव है ज्ञान सूर्य और शंकर है ज्ञान सागर। वो सागर भी तब बनता है जब शिव के साथ योग लगाते-लगाते संपन्न स्टेज प्राप्त करता है, शिव समान। क्योंकि शिव जो ज्ञान सूर्य है वो सागर से, धरणी से, चन्द्रमा से, सितारों से सदैव डिटैच रहता है। कभी अटैचमेन्ट नहीं होता। उसे कहते हैं सूर्य। परन्तु सागर का तो धरणी के साथ अटैचमेन्ट रहता है। तो बताओ, क्या अन्तर हुआ शिव ज्ञान सूर्य में और सागर में क्या अंतर हुआ? वो भी ज्ञान सूर्य, वो भी ज्ञान सागर कहा जाता है। सूर्य से सारी दुनिया को रोशनी मिलती है। सागर, पृथ्वी, सितारे, चन्द्रमा एक सूर्य से रोशनी लेते हैं। परन्तु सूर्य जो सदैव डिटैच है, डिटैच होने के कारण किसी के लगाव-झुकाव में आता ही नहीं। तो उसकी रोशनी क्षीण होती है क्या? (किसी ने कहा –नहीं।) जो लगाव-झुकाव में आएगा तो क्षीणता आएगी।

दुनिया के जितने भी धरमपिताएं हैं, ऊँच ते ऊँच धरमपिता हो, अल्लाह अव्वलदीन, और चाहे छोटे-मोटे धरमपिताएं हों, सबको संग का रंग लगता है। इसलिए सबके अन्दर क्षीणता आती है, क्षरित होते हैं। एक ज्ञान सूर्य है जो कभी क्षरित नहीं होता क्योंकि लगाव में नहीं आता। लगाव-झुकाव में नहीं आता इसलिए उसको संग का रंग भी नहीं लगता। वो जन्म-मरण के चक्र से न्यारा है। जन्म-मरण का चक्र उनको लगता है जो कर्मेन्द्रियों से अटैचमेन्ट में आते हैं या मन-बुद्धि से अटैचमेन्ट में आते हैं। परन्तु इन सितारों में, चन्द्रमा में, धरणी में, और सागर में, पहाड़ों में, नदियों में, सरोवरों में, ऐसा कौन है जो सारी पृथ्वी को अटैचमेन्ट में ले लेता है? सारी धरणी उसमें समा जाती है।

शास्त्रों में लिखा है – जब महाविनाश होता है तो सागर इतना विकराल रूप धारण करता है कि सारी पृथ्वी पर जलमयी हो जाती है। और सभी प्राणी मात्र, क्या मनुष्य, क्या जानवर, क्या पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, सब खलास हो जाते हैं। आत्मा तो सबकी अविनाशी है। तो क्या खलास हो जाते हैं? शरीर खलास हो जाते हैं। लेकिन क्या सागर भी खलास हो जाता? सागर खलास नहीं होता। और जब खलास नहीं होता तो सूर्य की सारी रोशनी किसके ऊपर पड़ती है? ऐसे ही, वो तो जड़ सागर है, जड़ सितारे हैं, जड़ धरणी है, जड़ सूर्य है। और आत्माएं तो चैतन्य हैं। उन चैतन्य आत्माओं के बीच चैतन्य ज्ञान सूर्य है जो सदा डिटैच रहता है। इस संसार में भी आता है, जब ये दुनिया में जो आत्माएं पार्ट बजाती हैं सब कलाहीन हो जातीं। जैसे चन्द्रमा में सारी कलाएं कलाहीन हो जाती हैं तो चन्द्रमा में घोर अंधियारा फैल जाता है। इसी तरह इस सारी सृष्टि में घोर अज्ञान का अंधकार जब फैल जाता है, किसी को कुछ भी सच्चाई का पता नहीं रहता, तब वो ज्ञान सूर्य इस सृष्टि पर आता है और आकरके उसी ज्ञान सागर को पकड़ता है जिस ज्ञान सागर में वो शक्ति है कि सब उसी में समा जाते हैं। धरती के सितारे भी सागर में समा जाते हैं।

हम बच्चे धरती के सितारे हैं ना। सारी दुनिया के मनुष्यमात्र सितारे रूपी आत्माएं हैं। परन्तु ज्ञान की रोशनी से चमकने वाले सितारे नौ लाख ही गाए हुए हैं। जो दिन के सितारे भी हैं और रात के सितारे। रात के ज्ञान सितारे आधे और दिन के सितारे भी आधे। अंतर क्या है? रात के जो चैतन्य ज्ञान सितारे हैं वो अपनी रोशनी को चन्द्रमा में तिरोहित नहीं करते हैं पूरा। अपना प्रकाश भी दिखाते रहते हैं। और दिन के सितारे? अपनी ज्ञान की रोशनी नहीं समझते। उनको ये ज्ञान रहता है कि जो भी हमारे अन्दर ज्ञान की रोशनी है, वो ज्ञान सूर्य की दी हुई रोशनी है। चैतन्य ज्ञान सूर्य शिव। इसलिए वो सूर्यवंशी सितारे कहे जाते हैं क्योंकि सूर्य को महत्व देते हैं। सूर्य को महत्व देने वाले सारे संसार को उजागर करते हैं। जैसे जड़ सूर्य सारे संसार को उजागर करता है ना, रोशनी देता है ना। ऐसे ही ये ज्ञान सितारे हैं, दिन के सितारे, सूर्यवंशी सितारे जो साढ़े चार लाख हैं। और वो साढ़े चार लाख शुद्ध सूर्यवंशी सितारे, उनमें चन्द्रमा से निकलने वाले साढ़े चार लाख सितारे और हैं जो अपनी रोशनी को सूर्य के सितारों में मर्ज कर देते हैं। माने कनवर्ट हो जाते हैं। बाकी? बाकी जो हैं वो 16 कला संपूर्ण तो नहीं बनते लेकिन कम कलाओं वाले बनते हैं। जन्म बाई जन्म रोशनी कम होती जाती है। ज्यादा से ज्यादा इस मनुष्य सृष्टि में मनुष्यों की 84 पीढ़ियाँ हैं जो 84 का चक्र गाया हुआ है। इस 84 के चक्र में जो पूरे 84 जन्म लेने वाली आत्माएं हैं वो वो ही हैं जो ज्ञान सूर्य की रोशनी में अपने रोशनी को मर्ज करती हैं। अपना अलग आधिपत्य नहीं जमातीं।

A morning class dated 1.4.1967 was being narrated. The topic being narrated in the first line of the fifth page on Saturday was – When you have to give the introduction of ShivBaba, i.e. the introduction of God, you should tell this. And you get the same introduction again and again that you remain in Yoga. With whom?
(Someone said – ShivBaba.) The one who is called ShivBaba is the combination of corporeal and incorporeal. Shiv means point of light incorporeal. And Baba means corporeal grandfather, combination of both. And that Shiv is Trimurti Shiv. He comes with three personalities. He is called Trimurti Shiv. So, Trimurti House is built in His memory. Or the name Trimurti Road is coined. So, is it a path shown by three personalities or a path shown by one personality? The path should be one. So, a question arises that who is the highest personality among the three personalities? It is said on the path of Bhakti ‘I bow to Brahma the deity, I bow to Vishnu the deity’ and then they say ‘I bow to Shankar the deity’. Do they say like this? They say ‘Shankar the highest deity’. Vishnu and Brahma are called deities. So, it proves that among all the three personalities which one is the main personality? Mahadev.

So, Mahadev in whom all the three personalities are included; when a picture is displayed on the path of Bhakti, then Shiv netra (Shiv’s eye) is shown in the personality of Shankar. Whose memorial is it? The memorial of incorporeal Shiv is the Shiv’s eye. Then a Moon is shown, the Moon of knowledge which is the memorial of the Krishnachandra. That Krishna Chandra; the light of the Moon decreases and increases, doesn’t it? Sometimes it is perfect in 16 celestial degrees, sometimes it is devoid of celestial degrees. Sometimes it is the second day Moon. So, which Moon is depicted on the forehead of Shankar? Is it the one with fewer celestial degrees or is it the one with complete celestial degrees?
(Everyone said – The one with fewer celestial degrees.) It means that Shiv is the Sun of Knowledge and Shankar is the ocean of knowledge. He becomes an ocean only when he achieves a perfect stage while having Yoga with Shiv; becomes equal to Shiv because Shiv, who is the Sun of Knowledge remains detached from the ocean, from the Earth, from the Moon and from the Stars always. He never develops attachment. He is called the Sun. But the ocean has attachment for the Earth. So, tell, what is the difference between the Sun of Knowledge Shiv and the ocean? He is also the Sun of Knowledge; and he is also called the ocean of knowledge. The entire world derives light from the Sun. The ocean, the Earth, the stars and the Moon derive light from one Sun. But the Sun, who is always detached, being detached He does not develop attachment or inclination towards any one at all. So, does His light decrease? (Someone said – No.) The one who develops attachment or inclination will become weak.

All the founders of the religions, be it the highest on high founder of religion, the Allah Avvaldeen, and be it the small founders of religions, everyone is coloured by the company. This is why everyone becomes weak, get discharged. It is the Sun of Knowledge alone who never gets discharged because He does not develop attachment. He does not develop attachment or inclination; this is why He does not get coloured by the company as well. He is beyond the cycle of birth and death. Those who develop attachment through the organs of the body or develop attachment through the mind and intellect pass through the cycle of birth and death. But among these stars, the Moon, the Earth, and the ocean, the mountains, the lakes, who is the one who takes the entire Earth into his attachment? The entire Earth merges into him.

It has been written in the scriptures – When mega destruction (mahaavinaash) takes place, then the ocean assumes such ferocious form that the entire Earth gets inundated. And all the living beings, human beings, animals, birds, worms and insects perish. Everyone's soul is imperishable. So, what perishes? The bodies perish. But does the ocean also perish? Ocean does not perish. And when it does not perish, then on what does the entire light of the Sun fall? Similarly, that is an inert ocean, they are the inert stars, it is the inert Earth, inert Sun. And the souls are living. Among those living souls, the living Sun of Knowledge remains detached always. Even if He comes in this world, when the souls playing their part in this world become devoid of celestial degrees, just as when the Moon becomes devoid of celestial degrees, then darkness spreads all over the Moon. Similarly, when complete darkness of ignorance spreads in this entire world, when nobody knows any truth, then that Sun of Knowledge comes in this world and catches the same ocean of knowledge, which contains that power that everyone merges into the same. The stars of the Earth also merge into the ocean.

We children are the stars of the Earth, aren’t we? All the human beings of the entire world are star like souls. But only nine lakh stars are praised to shine with the light of knowledge. There are day time (diurnal) stars as well as night time (nocturnal) stars. Half are the nocturnal stars and half are diurnal stars. What is the difference? The living stars of knowledge of the night do not merge their light completely in the Moon. They also keep on showing their light. And the diurnal stars? They do not consider their light of knowledge to be their own. They have the knowledge that whatever light of knowledge is within us, is the light given to us by the Sun of Knowledge. The living Sun of Knowledge Shiv. This is why they are called the Suryavanshi stars because they give importance to the Sun. Those who give importance to the Sun spread light in the entire world. Just as the inert Sun spreads light in the entire world, doesn’t it? It gives light, doesn’t it? Similarly, these stars of knowledge, the day time stars, the Suryavanshi stars are four and a half lakhs. And those four and a half lakh pure Suryavanshi stars include four and a half lakh stars which emerge from the Moon who merge their light in the stars of the Sun. It means that they convert. The rest? The rest do not become perfect in 16 celestial degrees, but have fewer celestial degrees. Birth by birth, their light keeps on decreasing. At the most, there are 84 generations of human beings in this human world which is sung as the cycle of 84 [births]. In this cycle of 84, the souls which get complete 84 births are the ones who merge their light in the light of the Sun of Knowledge. They do not exert their separate authority.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2426, आडियो 2912, दिनांक 20.12.2017
VCD 2426, Audio 2912, dated 20.12.2017
प्रातः क्लास 01.04.1967,
Morning class dated 01.04.1967
VCD-2426-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.09
Time: 00.01-20.09


प्रातः क्लास चल रहा था – 1.4.1967. शनिवार को पाँचवें पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी - ये बताना है कि गॉड का, शिवबाबा का परिचय देना होता है। और बार-बार यही परिचय मिलता है कि तुम शिवबाबा के साथ योग में रहते हो तो माया के तूफान भी बहुत आते हैं। अभी वो दुनियावी तूफान की तो बात ही नहीं है। ये तो माया के तूफान हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार रूपी माया। ये बरसात है, तूफान हैं, अर्थक्वेक हैं, ये तो कैलेमेटीज़ हैं। प्राकृतिक कैलेमिटीज़। बाकी बाप जो कहते हैं कि मामेकम् याद करो, ये तो अच्छी बात करते हैं ना। सभी मनुष्य भगत हैं। किसी न किसी को याद करते हैं। तो उनको बोल देना चाहिए कि देखो – क्राइस्ट का भी तो भगत होता है ना। वो क्रिश्चियन्स भी तो किसी को याद करते हैं ना। क्रियेटर तो सुप्रीम सोल कहा जाता है। क्राइस्ट को तो क्रियेटर नहीं कहते हैं। बाकी तो जो भी सोल्स हैं, धरमपिताएं हैं, वो सब चिल्ड्रेन्स हैं गॉड फादर के। यानी क्रियेशन हैं। तो धरमपिताएं हों, उनके फालोअर्स हों, इन सब क्रियेशन्स से इन्हेरिटेन्स नहीं मिलता है कोई को भी। और कोई प्रकार का इन्हेरिटेन्स नहीं मिलता है। वर्सा मिलता है क्रियेटर से।

तो आत्माएं क्रियेशन कैसे हैं? और सुप्रीम गॉड फादर क्रियेटर कैसे है? क्योंकि आत्माएं जन्म-मरण के चक्र में आने से जन्म-जन्मांतर जन्म-मरण के चक्र में आती रहीं। तो पूर्व जन्म की बातों को भूल जाती रहीं। और ऐसे करते-करते आत्माएं देह के बंधन में आते-आते, विकारों के बंधन में आते-आते अपने स्वरूप को ही भूल गई। देह का संग करते-करते, देह की इन्द्रियों से सुख लेते-लेते आखरीन अपन को देह समझ बैठीं। अपनी आत्मा के स्वरूप को भूल गई। देह तो विनाशी है। आज है, कल नहीं है। और देह में जो इन्द्रियां हैं वो भी विनाशी हैं। देह के साथ इन्द्रियाँ भी खलास। आत्मा रह जाती है, लेकिन वो अपने स्वरूप को भूल गई तो जैसे जडवत् हो गई। जैसे देह जडवत्, तो ऐसी पत्थरबुद्धि आत्माओं को, जिन देहधारी धरमपिताओं को बताते हुए ये देखा गया बार-बार कि रूह कब्रदाखिल हो जाती है। अरे! कब्र तो मिट्टी है। मिट्टी में रूह कैसे मिल जाएगी? अपन को मिट्टी रूपी देह समझ लेते हैं।

तो बाप आकर बताते हैं कि हे आत्माओं! तुम जडवत् मिट्टी नहीं हो। तुम तो चैतन्य आत्मा हो। और सदाकाल चैत्न्य आत्मा हो। आत्माओं को परिचय मिलता है सुप्रीम सोल बाप से कि जैसे मैं निराकार हूँ तुम आत्माएं भी निराकार हो। इन आँखों से नहीं देखी जा सकती। यहाँ तक कि वैज्ञानिकों के सूक्ष्म यंत्रों से भी नहीं देखी जा सकती। अति सूक्ष्म है। इस आत्मा को आत्मा के द्वारा ही जाना जा सकता है कान्सन्ट्रेट करके। परन्तु किसके ऊपर कान्सन्ट्रेट करें? तो बाप ही बताते हैं कि तुम आत्माएं ज्योतिबिन्दु मुआफिक हो। तुम आत्माओं का बाप मैं भी ज्योतिबिन्दु हूँ। तो अपने असली स्वरूप पर कान्सन्ट्रेट करेंगे तो अभ्यास करते-करते अपने अनेक जन्मों को जान सकेंगे।

ये आत्मा को अनेक जन्मों की पहचान क्रियेटर बाप से ही मिलती है। परन्तु क्रियेटर और क्रियेशन का संबंध तो साकार से होता है ना। तो निराकार गॉड फादर निराकार आत्माओं का बाप जब साकार मनुष्य सृष्टि के बीज में आते हैं तो उस मनुष्य सृष्टि के बीज से मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ क्रियेट करते हैं। जहाँ से सब आत्मा रूपी बच्चों को अपना परिचय मिलता है। इससे साबित होता है कि निराकार आत्माओं का बाप निराकार जब तक साकार मनुष्य में ना आवे तब तक क्रियेशन नहीं कर सकता क्योंकि उसको अपना मुख ही नहीं है। तो क्रियेटर से ही क्रियेशन को परिचय मिलता है और वर्सा मिलता है। अपनी जानकारी का भी वर्सा मिलता है। अपने बाप की जानकारी का भी। ये प्वाइंट को कोई-कोई अच्छी तरह से बांध लेना चाहिए। पहले तो वो प्वाइंट है कि वो क्रियेटर है। सबका क्रियेटर है, फादर है। फादर है तो जरूर वर्सा देता होगा ना। क्या वर्सा देता है? निराकारी स्टेज में है तो निराकारी ज्ञान का वर्सा देता है। परन्तु देता शरीर के द्वारा है। उसे, देने वाले को सब बाप ही कहते हैं।

तो बच्चे जन्म-मरण के चक्र में आते-आते उस बाप को जो निराकार आत्माओं का बाप है, उसे भूल जाते हैं। फिर कहते हैं आयकरके हमको लिबरेट करो। हम देह में फंस गए। देह की इन्द्रियों ने हमें बांध लिया अपने रस में। तो लिबरेट करके कहां ले जावेंगे? निराकार आत्मा को साकार देह से लिब्रेट करेंगे तो जरूर निराकारी धाम में ले जावेंगे। आत्मा रूपी बच्चे कहेंगे, शरीर के साथ ही कहेंगे क्योंकि कहना तो मुख से होता है। परन्तु मन की आवाज़ भी तो होती है। साकार द्वारा जो आवाज़ निकलती है वो साकारी के पास पहुँचती है। और निराकारी मन-बुद्धि की जो आवाज़ होती है वो मन-बुद्धि रूपी आत्मा, जिसे मनुष्य सृष्टि का बाप कहा जाता है, उस मनुष्य सृष्टि के बाप के द्वारा, जब वो प्रैक्टिस करते-करते आत्मिक स्टेज में पहुँचता है, तो आत्मा के धाम में वो आवाज़ पहुँचने की तो बात ही नहीं है क्योंकि आवाज़ तो इन्द्रियों का विषय है। हाँ, मन की आवाज़ पहुँच सकती है।

तो मन-बुद्धि को एकाग्र करना पड़े। लेकिन देह अभिमानी मनुष्य देह को कंट्रोल करते हैं, योग के नाम पर राजयोग के नाम पर देह की क्रियाएं सिखाते हैं। आसन लगाते हैं, प्राणायाम कराते हैं। ये कराते हैं, वो कराते हैं। अब देह की क्रियाओं से तो देह कंट्रोल हो सकती है ना। आत्मा कैसे कंट्रोल होगी? तो पहले-पहले जानना चाहिए निराकार आत्मा को, निराकार आत्माओं के घर को जानना चाहिए। पीछे देह को जानना चाहिए, देहधारियों को जानना चाहिए। तो ये झाड़ बनाया है, सृष्टि रूपी वृक्ष। इसे देखेंगे, ये बु्द्धि से समझा ही है कि जैसे कोई भी वृक्ष का बीज सूक्ष्म होता है, झाड़ बहुत बड़ा होता है। तो जब वृद्धि होती है, परिपक्वता झाड़ में आती है, फिर बीज तैयार होता है। जब बीज परिपक्व हो जाता है तो झाड़ से डिटैच हो जाता है। ऐसे ही है। ये आत्मा बीज है इस शरीर का। शरीर जैसे झाड़ है। जन्म बाई जन्म करते-करते बीज परिपक्व होता है। तो बीज तो अविनाशी है। इसका विनाश तो होता नहीं। झाड़ का विनाश हो जाता है।

A morning class was being narrated – 1.4.1967. The topic being discussed in the first line of the fifth page on Saturday was – You have to tell that you have to give the introduction of God, ShivBaba. And you again and again get the introduction that when you have Yoga with ShivBaba, then you also face a lot of storms of Maya. Now it is not about those worldly storms at all. It is the storms of Maya. Lust, anger, greed, attachment, ego like Maya. There is this rainfall, storm, earthquake; these are calamities. Natural calamities. As regards what the Father says – Remember Me alone, it is a good topic that He narrates, doesn’t He? All the human beings are devotees. They remember someone or the other. So, you should tell them – Look, there are devotees of Christ as well, aren’t they? Those Christians also remember someone, don’t they? The Supreme Soul is called a creator. Christ is not called the creator. As regards all the souls, the founders of religions, they are all children of God Father. It means that they are the creation. So, be it the founders of religions, be it their followers, inheritance is not received by anyone from all these creations. And they do not get any kind of inheritance. Inheritance is received from the creator.

So, how are the souls creation? And how is the Supreme God Father a creator? It is because souls continued to pass through the cycle of birth and death in many births because of passing through the cycle of birth and death. So, they continued to forget the topics of the past birth. And in this manner, the souls while coming in the bondage of the body, while coming in the bondage of the vices, forgot their own form. While keeping the company of the body, while deriving pleasure from the organs of the body, they considered themselves to be a body. They forgot the form of their soul. Body is perishable. It exists today, it will not exist tomorrow. And the organs in the body are also perishable. Along with the body, the organs also perish. The soul remains. But when it forgot its form, then it is as if it became inert. Just as the body is inert, similarly, the souls with stone-like intellect, the bodily founders of religions were seen telling again and again that the soul enters the grave. Arey! Grave is soil. How will the soul mix up with the soil? They consider themselves to be soil-like body.

So, the Father comes and tells – O souls! You are not inert soil. You are living souls. And you are forever living souls. The souls get introduction from the Supreme Soul Father that just as I am incorporeal, you souls are also incorporeal. It cannot be seen through these eyes. It cannot even be seen through the minute instruments of the scientists. It is very minute. This soul can be known through the soul only by concentrating. But on whom should we concentrate? So, the Father Himself says that you souls are like points of light. I, the Father of you souls am also a point of light. So, when you concentrate on your real form, then you will be able to know your many births by practicing.

This soul gets the realization of many births from the creator Father only. But the relationship of the creator and the creation is with the corporeal, isn’t it? So, when the incorporeal God Father, the Father of incorporeal souls comes in the seed of the corporeal human world, then He creates the human world tree from that seed of the human world from whom all the souls like children get their introduction. It proves that until the incorporeal Father of the incorporeal souls does not come in the corporeal world, He cannot undertake creation because He does not have a mouth of His own at all. So, the creation gets the introduction and inheritance from the creator only. It gets the inheritance of its own information and that of the information of the Father as well. Some such points should be nicely firmed up. First is that point that He is the creator. He is the creator, Father of everyone. When He is the Father then He must be definitely giving some inheritance, doesn’t He? Which inheritance does He give? As He is in an incorporeal stage, He gives the inheritance of the incorporeal knowledge. But He gives through the body. He, the giver is called by everyone as the Father only.

So, children, while passing through the cycle of birth and death forget that Father who is the Father of incorporeal souls. Then they say – Come and liberate us. We have got entangled in the body. The organs of the body have tied us in their pleasure. So, He will liberate us and take us to which place? When He liberates the incorporeal soul from the corporeal body, then He will definitely take it to the incorporeal abode. He will call them soul like children; He will call them along with the body only because one has to speak through the mouth only. But there is a voice of the mind also. The sound that emerges from the corporeal reaches the corporeal. The sound of the incorporeal mind and intellect reaches the mind and intellect like soul, who is called the Father of the human world. Through that Father of the human world, when he reaches the soul conscious stage while practicing, then there is no question of the sound reaching the Soul World because sound is the subject of the organs. Yes, the voice of the mind can reach.

So, one has to concentrate the mind and intellect. But the body conscious human beings control the body; in the name of Yoga, in the name of rajyog, they teach the procedures of the body. They do asanas, pranayam. They make you do this, they make you do that. Well, procedures of the body can control the body, can’t they? How will the soul come under control? So, first of all you should know the incorporeal soul, you should know the home of the incorporeal souls. Later on you should know the body, know the bodily beings. So, this tree has been made, the world tree. You will see this; you have understood through the intellect that just as the seed of any tree is minute, the tree is very big. So, when it grows, then the tree becomes mature, then the seed gets ready. When the seed becomes mature, then it detaches from the tree. It is the same case. This soul is the seed of this body. The body is like a tree. Birth by birth the seed becomes matured. So, the seed is imperishable. It is not destroyed. The tree is destroyed.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 12 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2427, आडियो 2913, दिनांक 21.12.17
VCD 2427, Audio 2913, dated 21.12.17
हैदराबाद (तेलंगाना), प्रातः क्लास 02.04.1967,
Hyderabad (Telangana), Morning class dated 02.04.1967
VCD-2427-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.15
Time: 00.01-19.15


आज का प्रातः क्लास है – 2.4.1967. रविवार को रिकार्ड चला – मुखड़ा देख ले प्राणी जरा दर्पण में। देख ले कितना पुण्य है कितना, पाप तेरे जीवन में। देख ले दर्पण में। कौनसे दर्पण की बात है? ज्ञान दर्पण। दर्पण माने आरसी। मिनीमधुबन को भी, मधुबन को भी दर्पण बोला। शीशे का महल जिसमें अपने चेहरे और दूसरों के भी चेहरे दिखाई देते हैं। चेहरे माने सीरत। सूरत। और बड़े से बड़ा दर्पण क्या है? हँ? (किसी ने कहा –बाबा।) बाबा। हाँ। शिवबाबा।

ओमशान्ति। ये किसने कहा? बाप ने कहा। क्या कहा? अउमशान्ति। हद के बाप ने कहा या बेहद के बाप ने कहा?
(किसी ने कहा – बेहद के बाप।) कौनसे बेहद के बाप ने कहा? अओमशान्ति। अ उ म। माना? जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शंकर, तीनों का पार्ट समाया हुआ है, उस बाप ने कहा ओमशान्ति। कौन-कौन हैं बेहद के बाप? हँ? आत्माओं का बाप और मनुष्य सृष्टि का बाप। तो यहाँ किसने कहा ओमशान्ति? (किसी ने कहा – मनुष्य सृष्टि के बाप ने।) मनुष्य सृष्टि के बाप ने कहा ओमशान्ति? शिव बाप ने नहीं? शिव बाप को त्रिमूर्ति शिव नहीं कहेंगे? हँ? कहेंगे। फिर? त्रिमूर्ति शिव बाप ने कहा ओमशान्ति या मनुष्य सृष्टि के बाप ने कहा ओमशान्ति? हँ? इधर की पाला कहती मनुष्य सृष्टि (के बाप) ने, उधर की पाला कहती त्रिमूर्ति शिव ने। शिव किसका नाम है? आत्माओं के बाप का नाम। उसको मूर्ति है? है? ये कौन कहता है मैं तीन मूर्तियों के साथ आता हूँ? (किसी ने कहा – शिव बाप।) शिव बाप कहते हैं मैं तीन मूर्तियों के साथ आता हूँ। ब्रह्मा की मूर्ति, विष्णु की मूर्ति और शंकर की मूर्ति।

त्रिमूर्ति की यादगार में त्रिमूर्ति हाउस बनाते हैं। एक का हाउस है या तीन का हाउस है? तीन का? एक का? त्रिमूर्ति रोड बनाते हैं, नाम रखते हैं। रोड माने रास्ता। जिंदगी जीने का रास्ता बताया जाता है ना। तो त्रिमूर्ति रोड, त्रिमूर्ति हाउस। हाउस में रहने वाले के नाम के आधार पर कहते हैं त्रिूमूर्ति हाउस। फिर बाप कहते हैं त्रिमूर्ति शिव का परिचय दो। किसका परिचय?
(सबने कहा – त्रिमूर्ति शिव।) त्रिमूर्ति शिव का परिचय दो। तो ब्रह्माकुमार-कुमारी किसका परिचय देते हैं? हँ? (किसी ने कहा – बिन्दी का।) बिन्दी का परिचय देते हैं। कहते हैं ब्रह्मा, विष्णु शंकर और इन तीन मूर्तियों के साथ आता है, वो ऊपर रखा हुआ बिन्दु। वो है त्रिमूर्ति शिव। वो त्रिमूर्ति शिव रास्ता बताता है तो कहा जाता है - त्रिमूर्ति रोड। तो रास्ता बताने वाला एक है, दो हैं, या तीन हैं? (किसी ने कहा – एक।) सच्चा रास्ता तो एक होगा या तीन होंगे? (सबने कहा – एक।) तो बताने वाली मूर्ति भी एक होगी (कि) तीन होंगी? (सबने कहा – एक।) फिर कौन? (किसी ने कुछ कहा।) कौन? (किसी ने कहा – मनुष्य सृष्टि का बाप।) मनुष्य सृष्टि का बाप? शिवबाबा कहा जाता है, साकार निराकार के मेल को बाबा कहा जाता है। और उसमें जुड़ा हआ है शिव।

तो शिव तो सिर्फ ज्योतिबिन्दु आत्मा का नाम शिव है जिसको शरीर नहीं होता। तो शरीरधारी में प्रवेश करता है तो कहा जाता है शिवबाबा। बोलता है – जिस तन में मैं प्रवेश करता हूँ, उसका नाम देता हूँ ब्रह्मा। दादा लेखराज में भी प्रवेश किया तो नाम दिया ब्रह्मा। परन्तु वो तो 1947 की बात है। और इस रुद्र ज्ञान यज्ञ का फाउण्डेशन तो पहले ही पड़ गया था। कब पड़ा था? 36 में ही पड़ गया था। नाम था अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ। शिव ज्ञान यज्ञ नाम नहीं था। ब्रह्मा ज्ञान यज्ञ नहीं था। विष्णु? विष्णु ज्ञान यज्ञ नहीं था। क्या नाम था? रुद्र ज्ञान यज्ञ। तो ये रुद्र ज्ञान यज्ञ नाम क्यों पड़ा?
(किसी ने कहा – रौद्र रूप धारण किया।) रौद्र माने भयंकर। कब धारण किया? आदि में, मध्य में, अंत में? कब धारण किया? अंत में धारण किया? जो आदि सो अंत नहीं होता है? स्थापना के साथ-साथ यज्ञ से विनाश ज्वाला प्रज्वलित नहीं हुई? हँ? हुई। तो इसका मतलब आदि में भी था, और अंत में भी है। फिर नाम के साथ लगा हुआ है विशेषण अविनाशी। कैसा रुद्र ज्ञान यज्ञ? अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ। जिसका विनाश कभी होता ही नहीं। हँ? सतयुग त्रेता में ज्ञान यज्ञ चलता है क्या? हँ? (किसी ने कहा – ज्ञान का सार।) ज्ञान का सार होता है। सार होता है माना सब कुछ है। और द्वैतवादी द्वापरयुग में भी भले द्वैत है, फिर भी प्रायःलोप होता है। क्या? (किसी ने कहा – प्रायःलोप।) लेकिन पूरा लोप तो नहीं होता। कलियुग में भी जैसे और धर्म होते हैं तो सत्य सनातन धर्म भी होता है और उसका नाम ही है सत्य सनातन धर्म। तो सत्य का कभी लोप होता नहीं।

तो जो सत्य है इसके लिए कहावत है कि सच्चाई सर के ऊपर चढ़कर बोलती है। माना विकराल रूप धारण कर लेती है। तो वो विकराल रूप धारण करने वाले के नाम के ऊपर ज्ञान यज्ञ का नाम रखा गया – रूद्र ज्ञान यज्ञ। तो वो रौद्र रूप कौन धारण करता है तीन मूर्तियों में? ब्रह्मा तो धारण नहीं करता। वो तो प्यार ही प्यार बरसाता है। विष्णु भी नहीं। कहते भी हैं देव-देव महादेव। ब्रह्मा को महादेव नहीं कहते, विष्णु को महादेव नहीं कहते, शंकर को कहते हैं महादेव। तो शिव का बड़ा बच्चा कौन हुआ? महादेव। और सब हैं तैंतीस करोड़ देव। और वो है? महादेव। तो भारतीय परंपरा में ये परंपरा चली आई है कि जो बड़ा बच्चा है उसको बाप का वर्सा मिलता है। और बाप का वर्सा क्या है? वो शिव है ज्ञान का अखूट भण्डार क्योंकि ज्ञान भी निराकार और आत्माओं का बाप भी? निराकार। निराकार के पास निराकार ही वर्सा होगा। साकार के पास साकारी वर्सा होगा। तो वो निराकार जब इस सृष्टि पर आता है, तो जिस साकार में प्रवेश करता है, उसका नाम रखता है काम के आधार पर। क्योंकि शास्त्रों में जितने भी नाम हैं वो काम के आधार पर हैं। तो नाम पड़ा रूद्र। ये किसका नाम पड़ा?
(किसी ने कहा – महादेव।) देव तो बाद में बनेगा। पहले तो; पहले क्या है? जो आदि है सो अंत में भी है। तो जिसका नाम पड़ा रुद्र और उसके द्वारा ज्ञान का भी नामकरण हो गया रुद्र ज्ञान यज्ञ।

तो सवाल है – कैसा यज्ञ? अविनाशी भी है। और रौद्र रूप भी धारण करने वाला है क्योंकि इस ज्ञान यज्ञ में सारी दुनिया की आहुति होनी है। सारी दुनिया माने? जो भी इस दुनिया के पुराने धर्म हैं, पुरानी मान्यताएं हैं, पुराने राज्य हैं, जो कुछ भी तामसीपन है, वो सारा स्वाहा हो जाना है। क्या बचेगा? हँ? अरे कुछ बचेगा कि सब लोप हो जाएगा?
(किसी ने कुछ कहा।) सत्य बचेगा। बाकी सब? सब लोप हो जाएगा। इसलिए गीता में कहा है – नासतो विद्यते भावो। (गीता 2/16) सत्य का कभी अभाव होता नहीं इस सृष्टि पर। सत्य सदैव कायम रहता है। जैसे सत्य सनातन धर्म इस सृष्टि पर सदा कायम रहता है। और धर्म? लोप हो जाते हैं। और धर्मखण्ड भी? लोप हो जाते हैं। ना आदि में थे और न अंत में रहेंगे। तो एक रहेगा। सत्य एक होता है या अनेक होते हैं? अंग्रेज लोग कहते भी हैं गॉड इज़ ट्रुथ, ट्रुथ इज़ गॉड। अनेकों बातें सत्य नहीं हो सकती। एक बात ही सत्य होगी।

Today's morning class is dated 2.4.1967. The record played on Sunday was – Mukhraa dekh le praani jaraa darpan me. Dekh le kitna punya hai kitnaa, paap terey jeevan me. Dekh le darpan me (O being! Just see your face in the mirror. Just see how many noble deeds and how much sins are there in your life. Look in the mirror.) It is about which mirror (darpan)? The mirror of knowledge. Mirror means aarsi. mini-Madhubans also, Madhuban also was termed as a mirror. A glass palace in which you can see your own face and the faces of others as well. Faces means characters (seerat). Face (soorat). And which is the biggest mirror? Hm?
(Someone said – Baba.) Baba. Yes. ShivBaba.

Om Shanti. Who said this? The Father said. What did He say? Aumshanti. Did the limited Father say or did the unlimited Father say?
(Someone said – The unlimited Father.) Which unlimited Father said? Aumshanti. A u m. What does it mean? The Father in whom the parts of Brahma, Vishnu and Shankar are merged said Om Shanti. Who all are unlimited fathers? Hm? The Father of souls and the Father of the human world. So, who said Om Shanti here? (Someone said – The Father of the human world.) Did the Father of the human world say Om Shanti? did not Father Shiv say? Will Father Shiv not be called Trimurti Shiv? Hm? He will be called. Then? Did Trimurti Father Shiv say Om Shanti or did the Father of the human world say Om Shanti? Hm? Those on this side say the [Father of] human world, and those on that side say Trimurti Shiv. Whose name is Shiv? The name of the Father of souls. Does He have a personality (murty)? Hm? Who says that I come with the three personalities? (Someone said – Father Shiv.) Father Shiv says – I come with the three personalities. Brahma's personality, Vishnu's personality and Shankar's personality.

Trimurti House is built in memory of Trimurti. Is it the house of one or a house of three? Of three? Of one? Trimurti Road is built, named. Road means path. The path of living the life is narrated, is not it? So, Trimurti Road, Trimurti House. On the basis of the residents of the House it is said Trimurti House. Then the Father says – Give the introduction of Trimurti Shiv. Whose introduction?
(Everyone said – Trimurti Shiv.) Give the introduction of Trimurti Shiv. So, whose introduction do the Brahmakumar-kumaris give? Hm? (Someone said – Of a point.) They give the introduction of a point. They say Brahma, Vishnu, Shankar and the one who comes along with these three personalities has been placed above as a point. That is Trimurti Shiv. That Trimurti Shiv shows the path; so, it is said – Trimurti Road. So, is it one, two or three who show the path? (Someone said – One.) Will the true path be one or three? (Everyone said – One.) So, will the personality that shows the path be one or three? (Everyone said – One.) Then who? (Someone said something.) Who? (Someone said – The Father of the human world.) Father of the human world? It is said ShivBaba; the combination of corporeal and incorporeal is called Baba. And Shiv is connected with it.

So, Shiv is just the name of the point of light soul, who does not have a body. So, when He enters in a bodily being, He is called ShivBaba. He says – The body in which I enter, I name it Brahma. Even when He entered in Dada Lekhraj, He named him Brahma. But that is about 1947. And the foundation of this Rudra Gyan Yagya was already laid earlier. When was it laid? It was laid in 36 itself. The name was imperishable Rudra Gyan Yagya. The name wasn't Shiv Gyan Yagya. It was not Brahma Gyan Yagya. Vishnu? It was not Vishnu Gyan Yagya. What was the name? Rudra Gyan Yagya. So, why was this name Rudra Gyan Yagya coined?
(Someone said – He assumed a raudra, i.e. fierce form.) Raudra means dangerous. When did he assume? In the beginning, in the middle, in the end? When did he assume? Did he assume in the end? Doesn't whatever happen in the beginning happen in the end? Wasn't the flame of destruction ignited along with the flame of establishment? Hm? It was. So, it means that he was in the beginning also and is present in the end as well. Then an adjective 'imperishable' is attached to the name. What kind of Rudra Gyan Yagya? Imperishable Rudra Gyan Yagya which is never destroyed. Hm? Does the Gyan Yagya continue in the Golden Age and Silver Age? Hm? (Someone said – The essence of knowledge.) There is the essence of knowledge. There is essence means there is everything. And even in the dualistic Copper Age, although there is dualism, yet it almost disappears. What? (Someone said – Almost disappears.) But it does not disappear completely. Just as there are other religions in the Iron Age and there is the true Sanatan Dharma also and its name itself is Satya Sanatan Dharma. So, the truth (satya) never disappears.

So, there is a saying for truth that truth speaks from the top of the head [i.e. without fear]. It means that it assumes a fierce form. So, on the basis of the name of the one who assumes a fierce form, the Gyan Yagya was named – Rudra Gyan Yagya. So, who among the three personalities assumes that fierce form? Brahma does not assume. He showers just love. Not even Vishnu. It is also said – Dev-Dev-Mahadev. Brahma is not called Mahadev. Vishnu is not called Mahadev. Shankar is called Mahadev. So, who is the eldest son of Shiva? Mahadev. All other 33 crores are deities. And he? The greatest deity (Mahadev). So, in the Indian tradition a tradition has continued that the eldest child gets the inheritance of the Father. And what is the inheritance of the Father? That Shiv is the inexhaustible stockhouse of knowledge because the knowledge is also incorporeal and the Father of the souls is also incorporeal. The incorporeal one will have incorporeal inheritance only. The corporeal will have corporeal inheritance. So, when that incorporeal comes to this world, then the corporeal in whom He enters, He names him on the basis of the task performed because all the names in the scriptures are based on the task performed. So, the name was coined as Rudra. Who was given this name?
(Someone said – Mahadev.) He will become a deity later on. First; what is he at first? Whatever he is in the beginning, he is in the end as well. So, the one who was named as Rudra and through him the knowledge was also named as Rudra Gyan Yagya.

So, the question is – What kind of Yagya? It is imperishable as well. And it also assumes a fierce form because in this Gyan Yagya the entire world is going to be sacrificed. What is meant by the entire world? All the old religions of this world, all the old beliefs, old kingdoms, whatever impurity exists, is to be sacrificed. What will survive? Hm? Arey, will anything survive or will everything disappear?
(Someone said something.) Truth will survive. Everything else? Everything else will disappear. This is why it has been said in the Gita – Naasato vidyate bhaavo (Gita 2/16) There is never a dearth of truth in this world. Truth prevails forever just as the true Sanatan Dharma remains forever in this world. Other religions? Disappear. Other religious lands also? Disappear. Neither did they exist in the beginning nor will they exist in the end. So, one will survive. Is truth one or many? The Englishmen also say – God is truth, truth is God. Many topics cannot be true. One topic alone will be true.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2428, आडियो 2914, दिनांक 23.12.17
VCD 2428, Audio 2914, date 23.12.17
प्रातः क्लास 02.04.1967,
Morning class dated 02.04.1967
VCD-2428-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-10.55
Time: 00.01-10.55


प्रातः क्लास चल रहा था – 2.4.1967. रविवार को पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी कि तुम मेरे को याद करते रहेंगे तो मैं गारंटी करता हूँ कि तुम्हारा विपरीत कर्म, विकर्म अर्थात् पाप कर्म जरूर नाश होगा। किसको याद करते रहेंगे? हँ? (किसी ने कहा – बाप को।) बाप को याद करते रहेंगे। बाबा को नहीं? (किसी ने कहा – शिवबाबा।) मुरली में तो बाप लिखा हुआ है। बिल्कुल प्रसिद्ध बात है। क्या? प्रकष्ट रूपेण सिद्धि भई किस बात की? चारों ओर ये प्रूफ और प्रमाण देकरके जो बात सिद्ध की गई, ऐसी प्रसिद्धि हुई संसार में, उस बात के लिए कहा कि बाप ने कहा; बाबा शब्द नहीं आया। बाबा कहा जाता है साकार और निराकार के मेल को। बाबा कहा जाता है ग्राण्डफादर को। बाप के बाप को। लेकिन यहाँ कहा किसने? बाप ने कहा। क्या? अगर तुम मेरे को याद करते रहेंगे तो मैं गारंटी करता हूँ कि तुम्हारे पाप कर्म विनाश होंगे। कहा किसने?

अरे! हिन्दी नहीं जानते इसलिए जल्दी नहीं बोलते। अरे! मुरली में क्या कहा? किसने कहा?
(किसी ने कहा – बाप ने।) बाप हद के तो ढ़ेर के ढ़ेर। उनकी तो बात छोड़ो। 84 जन्म में 84 बाप। हरेक के अलग-अलग। जो ग्रेट फादर्स हैं वो भी धरमपिता उन्होंने कभी नहीं कहा कि मेरे को याद करेंगे तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप भस्म हो जाएंगे। यहाँ कौनसे बाप ने कहा? बेहद के कितने बाप हैं? (किसी ने कहा – दो हैं।) हँ? दो बाप हैं। तो दो बाप जो बेहद के हैं उनमें से कौनसे बाप ने कहा? बाप माने कौनसी आत्मा? (किसी ने कहा – साकार।) साकार बाप की आत्मा ने कहा कि मेरे को याद करते रहेंगे तो गारंटी करता हूँ कि तुम्हारे पाप कर्म जरूर भस्म होंगे। निराकारी बाप ने नहीं कहा? क्या निराकारी बाप को याद करेंगे तो पाप भस्म नहीं होंगे? (किसी ने कहा – साकार-निराकार।) नहीं, नहीं, यहाँ सवाल ये है, ये नहीं। सवाल ये है कौनसे बाप की आत्मा ने कहा? अरे! हर आत्मा के बोलने में, हर आत्मा के संकल्पों में, हर आत्मा की दृष्टि-वृत्ति में, कर्मों में फर्क होता है कि नहीं होता है? हँ? तो यहाँ कौनसी आत्मा कह रही है मेरे को याद करेंगे तो भस्म हो जाएंगे तुम्हारे पाप कर्म? (किसी ने कहा – साकार।) साकार ने कहा? निराकार नहीं कह सकता? (किसी ने कहा – साकार बाप निराकार बाप के समान बन जाता।) साकार बाप? (किसी ने कहा – निराकारी स्टेज बनती है।) साकार बाप निराकार बाप समान बनने के बाद कहेगा? अभी नहीं कह रहा है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) पास्ट की बात बोल रहा है?

अगर साकार बाप, जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, वो अगर कहता है तो उसका कहना गलत है या सही है? हँ? सही है? क्यों? अभी संपन्न बना है?
(किसी ने कहा – संपन्न स्टेज बनने वाला है।) संपन्न स्टेज होने वाला है। तो जब हो जाएगा तब याद करेंगे तो पाप कर्म सब भस्म होंगे। ऐसे ही है ना? हँ? खुद ही अधूरा है, तो पाप कर्म हमारे भस्म करेगा? (किसी ने कहा – अभी संपन्न स्टेज है।) अभी संपन्न स्टेज है? (किसी ने कहा – अभी नहीं है।) अभी नहीं है? लेकिन बोल तो रहा है अभी सडसठ में, और पढ़ी जा रही है चलो, क्योंकि वेदवाणी है, हर काल में सच्ची ही साबित होती है, तो साकार बाप ने जो कहा, जिस साकार बाप में निराकार प्रवेश है और वो निराकार बाप प्रवेश करके ही दादा लेखराज ब्रह्मा के तन से बोलता है क्योंकि दादा लेखराज ब्रह्मा को भी प्रजापिता का टाइटल मिला है या नहीं मिला है? (किसी ने कहा – मिला है।) तो जब प्रिंसिपल स्कूल से, कॉलेज से बाहर होता है, नदारद होता है, छुट्टी पर होता है तो वाइस प्रिंसिपल कार्यवाहक होता है ना। तो कार्यवाहक प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा शिव बाप ने ही बोला ना। हँ? लेकिन किसकी तरफ से बोला कि मेरे को याद करेंगे तो पाप भस्म होंगे? (किसी ने कहा – भविष्य में आने वाला पार्ट।) प्रजापिता ब्रह्मा की तरफ से बोला कि मेरे को याद करेंगे तो तुम्हारे पाप कर्म जरूर भस्म होंगे। तो भविष्य के लिए जब वो पाप कर्म भस्म करेगा, बाप समान बनेगा, निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनेगा, तब ही पाप भस्म होंगे ना। या अभी भस्म होंगे?

(किसी ने कुछ कहा।) याद करते-करते भस्म होंगे लेकिन जो बाप कह रहा है वो साकारी बाप कह रहा है ना। यही आपने कहा ना। तो साकारी बाप ये कह रहा है; साकारी बाप की आत्मा कह रही है कि मेरे को याद करेंगे तो पाप भस्म होंगे। मेरे को याद नहीं करेंगे तो पाप भस्म नहीं होंगे। यही बात हुई ना। हँ? निराकार को याद करेंगे, सिर्फ निराकार बाप की आत्मा को याद करेंगे तो तुम्हारे पाप भस्म नहीं होंगे? (किसी ने कहा – साकार निराकार दोनों को।) हाँ, क्योंकि हम साकारी हैं ना और निराकार आत्मा भी हमारे अन्दर है। तो जब दोनों का मेल होता है तब ही तो पाप कर्म भस्म हो सकते हैं। पाप कर्म कब भस्म होंगे? (किसी ने कहा – याद करने से।) सिर्फ निराकार आत्मा के पाप भस्म होंगे या सिर्फ साकार आत्मा के भस्म होंगे या सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा के पाप भस्म होंगे? साकार और निराकार दोनों कम्बाइन्ड होंगी; निराकार आत्मा और साकार शरीरधारी, दोनों कम्बाइन्ड होंगे तो ही तो पुरुषार्थ कर सकेंगे। सिर्फ बिन्दु आत्मा तो पुरुषार्थ नहीं कर सकती। सूक्ष्म शरीरधारी भी जब तक शरीर में प्रवेश न करे, कोई एक्ट नहीं कर सकते। तो ये तो ठीक है पुरुषार्थ करने वाला बाप को याद करेगा तो उसके पाप कर्म भस्म होंगे। लेकिन कौनसे बाप को याद करे? सिर्फ निराकारी को या साकारी को? (किसी ने कहा – साकार और निराकार को।) लेकिन कह कौन रहा है यहाँ?

यहाँ मुरली में शब्द तो ‘बाप’ आया हुआ है। और बाप बेहद के दो हैं। हद के बापों को याद करने से तो पाप भस्म हो ही नहीं सकते क्योंकि हद के बाप तो 84 जन्मों में जितने भी हए सब उतरती कला में गए। सारी दुनिया ही नीचे गई। तो उनकी तो बात ही नहीं। रही धरमपिताओं की, वो भी नीचे गए। खुदको भी नीचे ले गए, अपने फालोअर्स को भी नीचे ले गए। तो उनकी भी बात नहीं हो सकती। भले वो कितने भी ग्रेट फादर्स रहे हों दुनिया में। लेकिन जो बाप अभी बोल रहा है मुरली में, चलो बोल नहीं रहा है सन् 67 में बोला, दादा लेखराज ब्रह्मा के तन में, जिस ब्रह्मा को प्रजापिता ब्रह्मा का टाइटल मिला। मान लो वो टाइटलधारी ही बोल रहा है कि मेरे को याद करेंगे तो तुम्हारे पाप भस्म होंगे। टाइटलधारी ही बोल रहा है मान लो। तो इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच पर 84 जन्मों में उस टाइटलधारी बाप से ज्यादा पुरुषार्थी कोई है? था 67 में? अरे, बोलो। धड़ाधड़ बोला करो, नहीं तो मज़़ा नहीं आता। हँ? कोई था?
(किसी ने कहा – नहीं।) नहीं था।...

A morning class dated 2.4.1967 was being narrated. On Sunday, the topic being discussed in the beginning of the middle portion of the first page was – If you continue to remember Me, I guarantee that your opposite actions, vikarma, i.e. sins will definitely be destroyed. If you continue to remember whom? Hm? (Someone said – The Father.) If you continue to remember the Father. Not Baba? (Someone said – ShivBaba.) It has been written 'Father' in the Murli. It is a completely famous thing. What? What was especially proven? It was said for something that was proved everywhere with proofs in the world that the Father said; the word Baba was not mentioned. The combination of corporeal and incorporeal is called Baba. Grandfather is called Baba. The Father's Father. But who said here? The Father said. What? If you continue to remember Me, then I guarantee that your sins will be destroyed. Who said?

Arey! You don't know Hindi; this is why you don't speak up fast. Arey! What has been said in the Murli? Who said?
(Someone said – The Father.) There are numerous limited fathers. Leave their topic. There are 84 fathers in 84 births. Each one has a separate one. Even the great fathers, the founders of religions never said that if you remember me, your sins of many births will be destroyed. Which Father said here? How many unlimited fathers are there? (Someone said – There are two.) Hm? There are two fathers. So, among the two unlimited fathers, which Father said? Father means which soul? (Someone said – Corporeal.) The soul of the corporeal Father said that if you continue to remember me then I guarantee that your sins will definitely be burnt. did not the incorporeal Father say? Will your sins not be burnt if you remember the incorporeal Father? (Someone said – Corporeal and incorporeal.) No, no. The question here is this; not this. The question is that the soul of which Father said? Arey! Is there a difference between the speech of every soul, the thoughts of every soul, the vision and vibrations of every soul, actions of every soul or not? Hm? So, which soul is telling here that if you remember Me then your sins will be burnt? (Someone said – Corporeal.) Did the corporeal say? cannot the incorporeal say? (Someone said – The corporeal Father becomes equal to the incorporeal Father.) Corporeal Father? (Someone said – He develops an incorporeal stage.) Will the corporeal Father say after becoming equal to the incorporeal Father? Doesn't he say now? Hm? (Someone said something.) Is he telling a topic of the past?

If the corporeal Father, who is the Father of the human world says then is his saying wrong or correct? Hm? Is it correct? Why? Has he become perfect now?
(Someone said – He is going to become perfect.) He is going to achieve the perfect stage. So, the sins will be burnt when you remember him when he becomes [perfect]. It is like this only, is not it? If he himself is incomplete, then will he burn our sins? (Someone said – He is now in a perfect stage.) Is he now in a perfect stage? (Someone said – He is not now.) Is he not now? But he is telling now in sixty eight, and okay it is being read out because it is a Vedvani, it is proved true in every Age; so, whatever the corporeal Father said, the corporeal Father in whom the incorporeal has entered, and that incorporeal Father speaks through the body of Dada Lekhraj Brahma by entering because has Dada Lekhraj Brahma also received the title of Prajapita or not? (Someone said – He has received.) So, when the Principal is out of school, college, when he is absent, when he is on leave, then the Vice Principal officiates, doesn't he? So, it was Shiv who spoke through the officiating Prajapita Brahma, did not He? Hm? But on behalf of whom did He say that your sins will be burnt when you remember Me? (Someone said – The part that is going to come in future.) He said on behalf of Prajapita Brahma that your sins will certainly be burnt if you remember Me. So, in future, when he burns your sins, when he becomes equal to the Father, when he becomes incorporeal, viceless, egoless, only then will your sins be burnt, will they not be? Or will they be burnt now?

(Someone said something.) They will be burnt while remembering, but the Father who is saying is the corporeal Father, is not he? This is what you said, did not you? So, the corporeal Father is telling this; the soul of the corporeal Father is telling that if you remember Me, then the sins will be burnt. If you do not remember me, then the sins will not be burnt. This is the thing, is not it? Hm? If you remember the incorporeal, if you remember the soul of just the incorporeal Father, then will your sins be burnt or not? (Someone said – Both corporeal and incorporeal.) Yes, it is because we are corporeal, aren't we? And the incorporeal soul is also within us. So, when there is a combination of both, only then the sins can be burnt. When will the sins be burnt? (Someone said – By remembering.) Will the sins of just the incorporeal soul be burnt or will the sins of just the corporeal soul be burnt or will the sins of the subtle bodied soul be burnt? One will be able to make purusharth when the corporeal as well as incorporeal will be combined, when the incorporeal soul and the corporeal bodily being, both will be combined. Just the point like soul cannot make purusharth. The subtle bodily being also cannot perform any act until it enters the body. So, it is correct that when the one who makes purusharth remembers the Father then his sins will be burnt. But which Father should he remember? Just the incorporeal or the corporeal? (Someone said – corporeal and incorporeal.) But who is speaking here?

The word used here in the Murli is 'Baap' (Father). And there are two unlimited fathers. The sins cannot be burnt at all by remembering the limited fathers because all the limited fathers who existed in 84 births underwent degradation. The entire world underwent degradation. So, it is not about them at all. As regards the founders of religions, they also underwent degradation. They caused their own downfall and they caused their followers also to fall. So, it cannot be about them as well. They might have been howevermuch great fathers of the world. But the Father who is speaking now in the Murli, okay, He may not be speaking, He spoke in 67 in the body of Dada Lekhraj Brahma, the Brahma who got the title of Prajapita Brahma. Suppose that titleholder himself is speaking that if you remember me then your sins will be burnt. Suppose that titleholder himself is speaking. So, on this human world stage, is there anyone who makes more purusharth than that titleholder Father? Was there anyone in 67? Arey, speak up. Speak fast, otherwise, there is no enjoyment. Hm? Was there anyone?
(Someone said – No.) There wasn't.....(continued)
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 14 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2428, आडियो 2914, दिनांक 23.12.17
VCD 2428, Audio 2914, date 23.12.17
प्रातः क्लास 02.04.1967,
Morning class dated 02.04.1967
VCD-2428-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 10.56-21.17
Time- 10.56-21.17


अरे भई, संसार रूपी जंगल में ये तीन शेर हैं – ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। टाइम टू टाइम दहाड़ मारते हैं। तो उनकी यादगार तीन शेर दिखाई जाती है। आजकल नोटों में भी, स्टाम्प पेपर में भी, वैसे भी शेर की लाट बनी हुई है – अशोक की लाट। वो यादगार तो है ना। हँ? ये भारत की सर्वोच्च चीज़ है। तीन मूर्तियों के रूप में दिखाई गई। उसमें भी नाम देते हैं त्रिमूर्ति। तो जो त्रिमूर्ति बाप कहा जाता है; एक बाप नहीं है, तीन मूर्तियाँ हैं तो तीन बाप है कि एक बाप है? हँ? कितने बाप हैं? (किसी ने कहा – एक।) एक ही बाप है। है त्रिमूर्ति लेकिन उसके तीन मूर्तियाँ हैं। मूर्ति माने मूरत जिसकी हो। उसकी तीन मूर्तियाँ हैं। तो तीन मूर्ति वाला वो त्रिमूर्ति कहा जाता है। तो त्रिमूर्ति बाप कहता है। चलो, कार्यवाहक प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा कहता है। जैसे प्रिंसिपल चला जाता है तो कार्यवाहक वाइस प्रिंसिपल होता है। तो उसकी मान्यता नहीं है क्या? है ना। तो ऐसे ही कार्यवाहक प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा 2.4.67 को बोला कि बाप ने कहा है अगर तुम मेरे को याद करते हो तो मैं ये गारंटी करता हूँ कि तुम्हारे पाप कर्म विनाश होंगे। तो वो बाप अगर कहता है, शिव बाप की बात तो यहाँ नहीं आई, तो क्या हमारे पाप कर्म विनाश होंगे या नहीं होंगे? अरे?

(किसी ने कहा – बाबा, बोलने वाला तो निराकारी शिव बाप बोल रहा है।) निराकर शिव बाप बोल रहे हैं लेकिन उस बाप के ऊपर, निराकार के ऊपर लागू होती है? वो निराकार बाप की आत्मा जो बोल रही है, मेरे को याद करते रहेंगे तो। और तेरी तो आत्मा का ही नाम शिव है बिन्दी का। वो तो कभी बदलता नहीं। तो बिन्दी शिव आत्मा को याद करते रहेंगे तो पाप भस्म होंगे? (किसी ने कहा - नहीं होंगे। बिन्दु को नहीं होंगे, लेकिन वो जो...) लेकिन-लेकिन नहीं। जो बाप बोल रहा है उसकी बात करो। (किसी ने कहा – बेहद के बाप माना भविष्य में आने वाला साकार।) यहाँ भविष्य की तो बात ही नहीं। मेरे को याद करते रहेंगे, अबसे लेकर भविष्य अंत तक, जब तक तुम रहें। मेरे को याद करते रहेंगे तो पाप भस्म होंगे, गारंटी है। (किसी ने कुछ कहा।) संपन्न होने के बाद याद करें? (किसी ने कहा – संपन्न होने के बाद पाप कट जाएंगे।) संपन्न होने के बाद किस स्वरूप को याद करें? मेरे जो कह रहा है उसको याद न करें? (किसी ने कुछ कहा।) ये तो पक्का हो गया – प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा कह रहे हैं। मान लो प्रजापिता ब्रह्मा ही कार्यवाहक है और वो आत्मा कह रही है मेरे को याद करेंगे तो तुम्हारे पाप जरूर भस्म होंगे। गारंटी कहता हूँ। तो प्रजापिता ब्रह्मा को याद करेंगे तो पाप भस्म होंगे। सुनने वालों को ये तो पक्का है – हाँ, यही 16 कला संपूर्ण बनने वाला है? (किसी ने कहा –पक्का है।) पक्का है ना। तो उसको याद करेंगे तो पाप भस्म हमारे नहीं होंगे? जैसे को याद करेंगे वैसे हम नहीं बनेंगे? (किसी ने कहा – बनेंगे।) तो झूठ बोला या सही बोला? (किसी ने कहा – सही बोला।) हँ?

(किसी ने कहा - मुरली में ये बताया साकार, आकार, निराकार को याद नहीं करना, उससे पाप भस्म नहीं होंगे। लेकिन अभी यहाँ बोलने वाला तो निराकार है। वो बोल रहे कि सृष्टि में।) तो सही बोलता है निराकार। निराकार सही बोलता है क्या? मेरे को? आत्मा ‘मेरे’ कहेगी तो एक के लिए कहेगी कि अनेक के लिए कहेगी? (किसी ने कहा –एक।) फिर? ‘हमने’ तो नहीं बोला, ‘हमको याद करते रहें’। हम माने दो, कम से कम। यहाँ तो एक आत्मा ने बोला। तो अगर हम निराकार की तरफ ये लगाएंगे बात कि निराकार शिव ने बोली, जिसकी बिन्दी का ही नाम शिव है, तो उसको याद करते रहेंगे तो हमारे पाप भस्म होंगे या जिस, जिन धरमपिताओं और उनके फालोअर्स ने निराकार को याद किया उनके पाप भस्म हुए क्या? (किसी ने कहा – नहीं।) (किसी ने कहा – लेकिन सृष्टि में जैसे संपन्न रूप शिवलिंग का प्रतीक है, उस रूप में मुझे याद करना है।) बैठने वाले सामने कौन बैठे थे उसके? साकार के सामने? जो बैठने वाले सुन रहे थे, जिस स्थिति में सुन रहे थे, उन्होंने अपना सुप्रीम बाप उसे मान लिया या नहीं मान लिया साकार में? (सबने कहा – मान लिया।) मान लिया ना। तो जिसको मान लिया, उसकी सुप्रिमेसी को जब स्वीकार किया, तो उसे याद करेंगे; तो जिसको याद करेंगे वैसे बनेंगे या नहीं बनेंगे? तो गलत क्या कह दिया इसमें?

(किसी ने कहा – लेकिन विकर्म तो विनाश नहीं होगा।) माना श्री कृष्ण के, दादा लेखराज के, प्रजापिता ब्रह्मा के टाइटलधारी के विकर्म विनाश नहीं होते? (किसी ने कुछ कहा।) होंगे। भविष्य तक की ये बात बताई, याद करते रहेंगे तो। अरे? जो भी सन्मुख बैठे थे उनसे बोला कि गारंटी करता हूँ तुम्हारे, सन्मुख बैठने वालों के विकर्म विनाश होंगे। भविष्य तक की बात बताई ना। तो भविष्य तक जो आत्माएं उनके सन्मुख बैठी हुई थी, वो अंत तक याद करती रहेंगी उसी रूप को तो उनके पाप कर्म भस्म नहीं होंगे? होंगे ना। (सबने कहा – हाँ।) हाँ। तो गलत तो नहीं कहा? (किसी ने कहा – याद निराकार को करना है।) निराकार को क्यों करनी है? वो साकार भी था प्रजापिता। प्रजापिता ब्रह्मा साकार भी था; प्रजापिता ब्रह्मा के अन्दर निराकार आत्मा भी है सृष्टि की। अकेला साकार भी नहीं, अकेला निराकार भी नहीं। अरे! (किसी ने कहा – सारी दुनिया एक को याद करना।) सारी दुनिया एक को कहाँ याद करती है? सारी दुनिया तो निराकार को पहचान भी नहीं पाती है। (किसी ने कहा – साकार को याद करते।) साकार को भी याद नहीं। साकार को याद करने से पाप कर्म भस्म होते ही नहीं। (किसी ने कहा – साकार को याद करते।) साकार को भी याद नहीं। साकार को याद करने से पाप कर्म भस्म होते ही नहीं। (किसी ने कहा – संपन्न स्टेज।)

यहाँ सवाल ये है – जो बाप बोल रहा है कि मेरे को याद करेंगे, तो वो कौनसा बाप है जो बोल रहा है? वो आत्मा कौन है जो बोल रही है कि मेरे को याद करेंगे तो गारंटी करता हूँ कि पाप कर्म जरूर (भस्म) होंगे तुम, तुम्हारे। (किसी ने कहा – ब्रह्मा तो बाप है नहीं।) है नहीं लेकिन कार्यवाहक है कि नहीं? वो जिस कुर्सी पर बैठा हुआ है उस कुर्सी को आप नक्कार देंगे? (किसी ने कहा – बाप तो बाप है ना। वो तो टेम्पररी है ब्रह्मा।) बाप मर जाता है तो अम्मा बाप का काम करती है कि नहीं छोटे-छोटे बच्चों के लिए? (किसी ने कहा – करती है, लेकिन बाप नहीं बनती ना।) अब वो बच्चे जिसको याद करेंगे उसके समान बनेंगे या नहीं बनेंगे? (किसी ने कहा – समान बनेंगे।) तो वो उसके पाप भस्म नहीं हुए समान बनने से? (किसी ने कहा – पर अम्मा तक बनी ना।) तो अम्मा कृष्ण वाली आत्मा जो अम्मा है उसके पाप भस्म नहीं होते क्या? नहीं होते? (किसी ने कहा – होते।) और उसके साथ जो जन्म लेती है, जिसे हम मम्मा कहते हैं ओम राधे, साथ ही साथ दोनों जन्म लेते हैं ना। दोनों के संस्कार समान बनते हैं या नहीं? (किसी ने कहा – बाबा लेकिन।) लेकिन-लेकिन नहीं। हमने जो पूछा उसका ही जवाब दो पहले।

(किसी ने कहा – पूरा 84 जन्म नहीं हुआ ना उनका।) पूरा 84 जन्म नहीं होते उनके? दोनों के? हँ? पूरे 84 जन्म नहीं होते? ये किसने कहा कि कृष्ण वाली आत्मा के 84 जन्म नहीं होते? (सबने कहा – पूरा।) पूरा? जन्म की बात है। पूरे 84 जन्म नहीं होते हैं तो 16 कला संपूर्ण नहीं बनते? (किसी ने कहा – बनते।) तो 16 कला संपूर्ण जो बनेगा उसके पाप भस्म नहीं हुए? हँ? (किसी ने कहा – हुआ।) फिर? (किसी ने कहा – सूक्ष्म तन लेगा ना।) सूक्ष्म शरीर भी किसी दूसरे शरीर में प्रवेश करके कार्य करता है या नहीं करता है? (किसी ने कहा – करता है।) तो फिर? उसका जो हिस्सा उसे मिलता है, नहीं मिलता है? (किसी ने कहा – मिलता है।) फिर? अरे? सवाल ये है हम डकैत को याद करेंगे तो डकैत बनेंगे या नहीं बनेंगे? (किसी ने कहा – बनेंगे।) चोर को याद करेंगे तो चोर बनेंगे या नहीं बनेंगे? (किसी ने कहा – बनेंगे।) चोर का संग करेंगे तो चोर बनेंगे या नहीं बनेंगे? तो उसी आधार पर 16 कला संपूर्ण आत्मा हमने पहचान ली कि ये बनेंगे तो 16 कला संपूर्ण आत्मा को हम याद करेंगे तो हम, यहाँ तो ये भी नहीं बात है। यहाँ तो ये बात है हमारे पाप कर्म भस्म होंगे या नहीं होंगे? पाप कर्म भस्म होंगे तो हम 16 कला संपूर्ण देवता नहीं बनेंगे? (किसी ने कहा – बनेंगे।) आप रह जाएंगे? नहीं रह जाएंगे। तो यही तो बात है।

जो आत्मा के द्वारा मुख से ये बात बोली जा रही है – ‘मेरे को याद करेंगे’ तो ये किसने कहा ‘मेरे को याद करेंगे’? कौनसी आत्मा ने कहा?
(किसी ने कहा – शिव आत्मा।) शिव आत्मा निराकार। उसको याद करेंगे तो पाप भस्म होंगे? वो कह सकती है? वो कह सकती है कि मेरे को अकेले को याद करेंगे तो पाप भस्म हो जाएंगे? या उसको जिन धरमपिताओं ने याद किया उनके पाप भस्म हो गए? हो गए? ये तो बात गलत है कि निराकार को याद जिन्होंने किया उनके पाप भस्म हो गए। इतनी सी बात नहीं समझ में आ रही है! जो कृष्ण वाली आत्मा को हमने पक्का समझ लिया कि ये 16 कला संपूर्ण बननी ही बननी है और अंत तक हम उसे याद करते रहेंगे तो हमारे पाप कर्म भस्म नहीं होंगे? होंगे। ये तो बात रही वहाँ तक की। अब तो ब्रह्मा ने शरीर छोड़ दिया। अब ये वाक्य जो मेरे शब्द बोला है वो किसके लिए लागू होगा? अब शिव (किसी ने कहा – प्रजापिता ब्रह्मा।) प्रजापिता ब्रह्मा जो ओरिजिनल था वो तो इसी सृष्टि में अंत तक रहता है ना। सूक्ष्म शरीरधारी तो नहीं बनता? तो वो आत्मा के द्वारा ये वाक्य लागू होता है या नहीं? जैसे भक्तिमार्ग में कहते हैं वेदवाणी जो है, उसकी ऋचाएं, कोई भी युग आ जाए तो सच्ची ही साबित होंगी। तो ये हम जान गए ये ब्रह्मवाक्य है, ब्रह्मा की वाणी है। ब्रह्मा के मुख से वेद निकले। तो ये वाक्य ‘मेरे’ शब्द अब किसके लिए लागू होता है? (किसी ने कहा – प्रजापिता के लिए।) प्रजापिता जो ओरिजिनल था यज्ञ की आदि में, उसके लिए लागू होता है या नहीं होता है? (किसी ने कहा – होता है।) होता है। तो वो ही आत्मा कहती है मेरे को याद करेंगे तो तुम्हारे पाप कर्म भस्म होंगे। ‘हो जा रहे हैं’ - ऐसे नहीं बोला। एक-एक शब्द, एक-एक अक्षर जो वेदवाणी का है वो पत्थर की लकीर है।

Arey, brother, these are the three lions in the jungle like world – Brahma, Vishnu, Shankar. They roar from time to time. So, three lions are depicted in their memory. Now-a-days on the notes also, on the Stamp Papers also, even otherwise a lions amblem has been made – Ashoka's amblem. That memorial exists, doesn't it? Hm? This is the highest thing of India. It has been shown in the form of three personalities. Even in it a name is mentioned – Trimurti. So, the one who is called Trimurti Father, it is not one Father, there are three personalities; so, are there three fathers or one Father? Hm? How many fathers are there?
(Someone said – One.) There is only one Father. It is Trimurti, but it has three personalities. Murty means the one who has a personality. So, the one with three personalities is called Trimurti. So, the Trimurti Father says. Okay, He says through the officiating Prajapita Brahma. For example, when the Principal leaves then the officiating Vice-Principal is there. So, is he not recognized? He is, is not he? So, similarly, it was said on 2.4.67 through the officiating Prajapita Brahma that the Father has said that if you remember Me, then I guarantee that your sins will be burnt. So, if that Father says; the topic of Father Shiv was not mentioned here; so, will our sins be burnt or not? Arey?

(Someone said – Baba, it is the incorporeal Father Shiv who is speaking.) Incorporeal Father Shiv is speaking, but does it apply to that Father, the incorporeal? The soul of that incorporeal Father who is telling that if you continue to remember Me. And the name of your soul, your point itself is Shiv. That never changes. So, will the sins be burnt if you continue to remember the point like soul Shiv? (Someone said – They will not be. It will not be for the point, but....) No but-but. Speak about the Father who is telling. (Someone said – Unlimited Father means the corporeal who is going to come in future.) Here, it is not about the future at all. If you continue to remember Me from now till the end in future, as long as you are alive. If you continue to remember Me, then the sins will be burnt, there is a guarantee. (Someone said something.) Should we remember after he becomes perfect? (Someone said – The sins will be burnt after he becomes perfect.) Which form should we remember after he becomes perfect? Should we not remember the one who is telling ‘Me’? (Someone said something.) It is sure that He is telling through Prajapita Brahma. Suppose Prajapita Brahma himself is officiating and that soul is telling that if you remember Me, then your sins will definitely be burnt. I say with guarantee. So, the sins will be burnt by remember Prajapita Brahma. Are the listeners sure that yes, this is the one who is going to become perfect in 16 celestial degrees? (Someone said – It is sure.) It is sure, is not it? So, will your sins not be burnt by remembering him? Will we not become like the one whom we remember? (Someone said – We will become.) So, did he speak a lie or truth? (Someone said – He spoke the truth.) Hm?

(Someone said – It has been told in the Murli that we should not remember the corporeal, subtle, incorporeal; it will not help in burning the sins. But now here the speaker is incorporeal. He is telling that in the world.) So, the incorporeal is telling the correct thing. Does the incorporeal speak correctly? Me (merey ko)? When a soul says 'Me', will it say for one or for many? (Someone said – One.) Then? He did not say 'we' (hum), 'if you continue to remember us'. 'Hum' means at least two. Here one soul said. So, if we apply this to the incorporeal that this was spoken by the incorporeal Shiv, the name of whose point itself is Shiv, then if we continue to remember Him, will our sins be burnt or were the sins of the founder(s) of religion and their followers who remembered the incorporeal, burnt? (Someone said – No.) (Someone said – But just as Shivling is the symbol of the perfect form, you have to remember Me in that form.) Who were sitting in front of him? In front of the corporeal? The ones who were sitting and listening, the stage in which they were listening, did they accept him as their Supreme Father or not in corporeal form? (Everyone said – They accepted.) They accepted, did not they? So, the one whom they accepted, when they accepted his supremacy, then if you remember him; so, as is the one whom you remember, will you become like him or not? So, what is the wrong thing that He said in this?

(Someone said – But the sins will not be burnt.) Does it mean that the sins of Shri Krishna, Dada Lekhraj, the titleholder of Prajapita Brahma are not burnt? (Someone said something.) They will be. This topic was mentioned for the future as well; if you continue to remember. Arey? It was said to those who were sitting face to face that I guarantee that your sins, the sins of those sitting face to face will be burnt. The topic was mentioned for the future as well, wasn't it? So, the souls which were sitting in front of him continue to remember him in future, will their sins not be burnt? They will be burnt, will they not be? (Everyone said – Yes.) Yes. So, he did not say anything wrong, did he? (Someone said – You have to remember the incorporeal.) Why should you remember the incorporeal? That Prajapita was corporeal as well. Prajapita Brahma was corporeal as well; There is the incorporeal soul of the world also within Prajapita Brahma. There is not just corporeal and not just the incorporeal. Arey! (Someone said – The entire world has to remember one.) Does the entire world remember one? The entire world is not even able to recognize the incorporeal. (Someone said – They remember the corporeal.) They do not remember the corporeal as well. The sins are not at all burnt by remembering the corporeal. (Someone said – They remember the corporeal.) They do not remember the corporeal as well. The sins are not burnt by remembering the corporeal at all. (Someone said – The perfect stage.)

The question here is – Who is the Father who is telling that if you remember Me? Which soul is telling that if you remember Me, then I guarantee that your sins will certainly be burnt. (Someone said – Brahma is not the Father.) He is not, but is he officiating or not? Will you deny the seat that he occupies? (Someone said – The Father is Father, is not He? Brahma is temporary.) When the Father dies, the mother acts as a Father for the young children, doesn't she? (Someone said – She does, but she doesn't become the Father, does she?) Well, will the children become like the one whom they remember or not? (Someone said – They will become equal.) So, weren't his sins burnt by becoming equal? (Someone said – But she became just the mother.) So, the mother, the soul of Krishna, who is the mother; are his sins burnt or not? Aren't they? (Someone said – They are.) And the one who gets birth with him, the one whom we call as Mama, Om Radhey, both of them get birth together, don't they? Do the sanskars of both of them become equal or not? (Someone said – But Baba.) No buts. First give reply only to whatever I have asked.

(Someone said – He did not get complete 84 births.) Doesn't he get complete 84 births? Both? Hm? Don't they get complete 84 births? Who said that the soul of Krishna does not get 84 births? (Everyone said – Complete.) Complete? It is about the birth. If he doesn't get complete 84 births, then doesn't he become perfect in 16 celestial degrees? (Someone said – He becomes.) So, weren't the sins burnt in case of the one who becomes perfect in 16 celestial degrees? Hm? (Someone said – They were.) Then? (Someone said – He will get a subtle body, will he not?) Does the subtle body also enter in another body and work or not? (Someone said – It works.) So, then? Doesn't he gets its share? (Someone said – He gets.) Then? Arey? The question is that if we remember a dacoit, then will we become a dacoit or not? (Someone said – We will become.) If you remember a thief, will you become a thief or not? (Someone said – We will become.) If you keep the company of a thief, will you become a thief or not? So, the same basis, if we recognize the soul which is perfect in 16 celestial degrees that this one is going to become, then if we remember the soul which is perfect in 16 celestial degrees, then we; here, it is not even about this. Here, the topic is that will our sins be burnt or not? If our sins are burnt, then will we not become perfect in 16 celestial degrees? (Someone said – We will become.) Will you be left out? You will not be left out. So, this is the thing.

The soul through whose mouth this topic was being narrated – ‘If you remember Me’, so, who said this ‘if you remember Me’? Which soul said?
(Someone said – The soul of Shiv.) Soul of incorporeal Shiv. Will your sins be burnt if you remember Him? Can it say? Can it say that if you remember Me alone, then the sins will be burnt? Or were the sins of those founders of religions who remembered Him burnt? It is wrong that the sins of those who remembered the incorporeal were burnt. Don’t you understand such a small thing? The soul of Krishna for whom we have understood for sure that it is definitely going to become perfect in 16 celestial degrees and if we continue to remember him till the end, then will our sins not be burnt? They will be. This was about till that time. Now Brahma has left his body. Now this sentence, the word ‘Me’ which was spoken is applicable to whom? Now Shiv (Someone said – Prajapita Brahma.) The one who was original Prajapita Brahma remains in this world till the end, doesn’t he? He doesn’t become subtlebodied, does he? So, does this topic apply through that soul or not? For example, it is said on the path of Bhakti that the Vedvani, its richas (hymns) will prove to be true in any Age. So, we have got to know that this is Brahmavaakya, Brahma’s Vani (speech). Vedas emerged from the mouth of Brahma. So, this sentence, the word ‘Me’ is applicable to whom now? (Someone said – To Prajapita.) Does it apply to the original Prajapita who was in the beginning of the Yagya or not? (Someone said – It is applicable.) It is applicable. So, the same soul says – Your sins will be burnt if you remember Me. It wasn’t said ‘are getting burnt’. Each word, each alphabet of the Vedvani is like a line drawn on the stone (indelible).
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 15 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2429, आडियो 2915, दिनांक 26.12.17
VCD 2429, Audio 2915, dated 26.12.17
प्रातः क्लास 02.04.1967,
Morning class 02.04.1967
VCD-2429-extracts-Bilingual

समय- 0.01-21.11
Time- 00.01-21.11


प्रातः क्लास चल रहा था – 2.4.1967. शनिवार को दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी – जो हमारा यज्ञपिता है; कौन है यज्ञपिता? हँ? (किसी ने कहा – शिवबाबा।) शिवबाबा यज्ञपिता है? अच्छा! यज्ञ का नाम क्या है? (सबने कहा – रुद्र ज्ञान यज्ञ।) अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ। तो कौन हुआ यज्ञपिता? रुद्र हुआ ना। शिव तो नहीं हुआ क्योंकि शिव को तो मुख ही नहीं है। तो रुद्र ज्ञान यज्ञ कैसे रचेगा? हँ? ज्ञान रचने के लिए मुख तो चाहिए। नहीं? (किसी ने कहा – चाहिए।) हाँ। तो वो निराकार शिव ज्योतिबिन्दु जब साकार सृष्टि पर आते हैं तो जिस साकार मनुष्य सृष्टि के साकार बीजरूप आत्मा में प्रवेश करते हैं जो सारी मनुष्य सृष्टि 500-700 करोड़ का पिता है उसका नाम पड़ जाता है रुद्र। क्योंकि वहीं से ज्ञान यज्ञ शुरू होता है। और ज्ञान कैसा है? विनाशी या अविनाशी? (किसी ने कहा – अविनाशी।) तो ज्ञान यज्ञ का पिता भी कैसा होगा? (सबने कहा – अविनाशी।) अविनाशी रुद्र। उसका विनाश नहीं हो सकता। भले वो रौद्र रूप धारण करता है, भयंकर रूप धारण करता है, जिस भयंकर रूप में इस रुद्र ज्ञान यज्ञ में सारी दुनिया स्वाहा हो जाएगी। कैसा यज्ञ है? सारी दुनिया इस रुद्र ज्ञान यज्ञ में स्वाहा हो जाएगी। परन्तु वो यज्ञपिता स्वाहा नहीं होगा। उसको कहा जाता है अमरनाथ। वो अमरनाथ कालों का काल है, महाकाल है, जिसको कोई काल खा नहीं सकता।

तो बाप आकर कहते हैं बच्चों से कि मुझे पहचानो। और पहचानकर मुझे याद करो। तो पहचाना या नहीं पहचाना? हँ? पहचाना? नहीं पहचाना? ब्रह्माकुमारियां तो कहती हैं – हमने पहचाना। उन्होंने क्या पहचाना?
(किसी ने कहा – बिन्दु।) बिन्दु पहचाना। और आपने क्या पहचाना? (किसी ने कहा – साकार में निराकार।) वो निराकार आत्माओं का निराकार बाप शिव साकार में है। और जिस साकार में है उसे आप समान बनाता है ज्योतिबिन्दु निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी। और जिस तन के द्वारा कहता है मददगार बनो बाप के, तो क्या ज्योतिबिन्दु शिव के मददगार बनना है? (किसी ने कहा – साकार के।) शिव के क्या मददगार बनेंगे? शिव तो निराकार है। उसे किसी मदद की दरकार है ही नहीं। उसका काम तो है – जो उसके अन्दर अखूट ज्ञान का भण्डार है, वो अखूट ज्ञान का भण्डार का दाता है। तो इसमें हम क्या मदद करेंगे? हँ? मदद करेंगे? हम तो मदद नहीं करते। तो किसके लिए बोला मददगार बनो बाप के? बेहद के दो बाप हैं। आत्माओं का बाप और मनुष्य सृष्टि का बाप। तो जिस मनुष्य सृष्टि के बाप में प्रवेश करते हैं उसके लिए बोला कि मददगार बनो। हँ?

दूसरी बात। तुम्हारा जो पाप का मीटर भर गया है, उसको साफ करना है याद करके। याद से घटता जाएगा। और कितना घटता है ये बड़े सोच-समझ की बात है कि हमारा पाप कर्म का मीटर कितना घट गया है। ये फिकरात है हमको, बड़ी भारी जबरदस्त फिकरात है कि हम बाबा को निरंतर याद क्यों नहीं कर सकते? हँ? क्या कारण है? क्या फिकरात है?
(किसी ने कुछ कहा।) नहीं। पापों का बोझा बहुत है। इसलिए हम निरंतर याद नहीं कर सकते हैं। तो नहीं याद कर सकते हैं तो हमारी क्या गति होगी? हँ? क्या गति होगी? निरंतर याद करेंगे एक सेकण्ड का भी याद में अंतर न पड़े। लगातार निराकार ज्योतिबिन्दु स्मृति स्वरूप। तो जिसकी लगातार निराकारी ज्योतिबिन्दु स्मृति स्वरूप बनेगा, तो मनुष्य सृष्टि का बीज है, क्या बन जाएगा? मनुष्य सृष्टि का बीज बन जाएगा। अगर अंतर पड़ता जाएगा याद में, तो बीज से आत्मा दूर होती जाएगी या नज़दीक होती जाएगी? दूर होती जाएगी।

तो बताओ, अगर याद नहीं करेंगे तो क्या गति होगी? अपने आपसे पूछना चाहिए कि मैं आत्मा सतयुग के आदि में आनेवाली हूँ या अभी निरंतर याद नहीं करूंगी, अंतर पड़ता जावेगा, कोई दिन 24 घंटे भी याद नहीं आती। हँ? होता है ऐसा? तो क्या गति होगी? हँ? एकदम लास्ट में जाकरके हमारी सद्गति होगी। माना सृष्टि रूपी रंगमंच पर हम इस मनुष्य सृष्टि के आदिपिता से बहुत दूर जाकरके जन्म लेंगे। न सतयुग में, न त्रेता में, न द्वापर में, न कलियुग में, कलियुग के अंत में जाकर हमारा जन्म होगा। तब हमें जीवनमुक्ति मिलेगी।

तो बोला, क्या करना चाहिए? अपने आपसे पूछना है। बाप हरेक को कहते हैं भले हरेक इस समय गफलत में रहते हैं क्योंकि माया पिछाड़ी पड़ी हुई है। अगर यहाँ गफलत की, अभी, तो बहुत पछताना पड़ेगा। क्या? अगर यहाँ याद करने में लापरवाही की तो क्या रिजल्ट होगा? हँ? बहुत पछताना पड़ेगा। बाबा ये जानते हैं कि बहुत गफलत में झूठ और पाप करते रहते हैं। बस दिखलाते एक हैं बाप को पोतामेल में और करते दूसरा हैं। माना अन्दर में एक हैं और बाहर में दूसरे। और बाबा ने क्या कहा है ऐसों से? ऐसी आत्माओं के बारे में बोला है जो अन्दर से एक और बाहर से दूसरे हैं, ऐसे आत्माएं मेरे नज़दीक नहीं आ सकती। क्या? समझा? जो अन्दर से एक हैं और बाहर से दूसरे हैं, ऐसा मेरा नज़दीक नहीं आ सकता। न यहाँ संगमयुग में नज़दीक आ सकता, दूर ही दूर रहेंगे, और जो ब्रॉड ड्रामा होगा, उसमें भी दूर ही रहेंगे।

कोई कारण ही नहीं है कि इस यज्ञ में आकरके कोई भी यानी कोई पैसा चाहिए। क्या कहा? कोई ये कहे कि बाबा हम तो सेन्टर से बहुत दूर रहते हैं, गीतापाठशाला से बहुत दूर रहते हैं, तो बाबा कहते हैं ऐसा यज्ञ में आकरके कोई भी न कहे कि हम तो बहुत दूर रहते हैं, हमारे पास इतना पैसा नहीं है जो हम रोज़ आकरके क्लास करें। बाबा को गहराई से पहचानने के लिए, ज्ञान की गहराई को अच्छी तरह से पकड़ें और बाबा को पहचानें, पहचान कर बाबा के नज़दीक हो जाएं। अरे तुम बच्चों को तो पैसे की दरकार ही नहीं। क्यों भई? हँ? पैसे की दरकार क्यों नहीं? हँ? अरे पुरुषार्थ के लिए क्या चाहिए? हँ? पुरुषार्थ के लिए पाव भर आटा चाहिए। नमक डाल दो। क्या? नहीं डाल दो? अच्छा आटा भी नहीं चाहिए, गेहूँ को पानी में भिगो दो, दूसरे दिन अंकुर आ जाएंगे। अंकुरित अन्न खाएंगे तो नहीं चलेगा जीवन? हँ? जीवन रहेगा या नहीं रहेगा? नमक की भी दरकार नहीं। गेहूँ को आटा बनाने की भी दरकार नहीं। जिसको पैसा चाहिए उनको फिर बहुत पाप करना पड़ता है। क्या? पैसा किसलिए चाहिए? हँ? पुरुषार्थ करने के लिए तो पैसा जास्ती की दरकार ही नहीं है। पाव भर आटा रोज़़ मिलता रहे, पाव भर अनाज मिलता रहे, पुरुषार्थ होगा या नहीं होगा? होगा।

पैसा किनको चाहिए? जिनको पेटपूर्ति के अलावा और भी पूर्तियाँ करनी है। हँ? अरे? और भी इन्द्रियाँ हैं कि नहीं? आँख इन्द्रिय है। रोज़ सिनेमा देखने के लिए पैसा चाहिए या नहीं चाहिए? नहीं चाहिए? हँ? अच्छा चलो, सिनेमा नहीं देखेंगे बाइस्कोप में जाकरके, हम मोबाइल में बैठे-बैठे, तो मोबाइल के लिए भी पैसा चाहिए कि नहीं चाहिए? टीवी के लिए चाहिए या नहीं चाहिए? चाहिए। तो आँखों का रस है, वो लेने के लिए पैसा चाहिए। कान का रस है – रेडियो चाहिए, अच्छे-अच्छे गाना सुनने के लिए। हँ? नहीं चाहिए? समाचार सुनने के लिए आज दुनियादारी में क्या हो रहा है? चाहिए ना। तो बताया और भी इन्द्रियाँ हैं। वो भी अपना भोग मांगती हैं। उन इन्द्रियों की भोगपूर्ति के लिए पैसा चाहिए। लेकिन पुरुषार्थ के लिए; पुरुष माने आत्मा, अर्थ माने लिए। आत्मा का उद्धार करने के लिए पाव भर अनाज के अलावा कोई पैसा नहीं चाहिए। जिनको पैसा चाहिए उनको वो दुनिया पैसे वाली चाहिए। हँ? और जिनको पैसा नहीं चाहिए, सिर्फ पुरुषार्थ करना है, वो उनके लिए उस दुनिया की दरकार है ही नहीं। उस दुनिया में जो रहते हैं उनको पाप जरूर करना पड़ेगा क्योंकि वो है धंधाधोरी की दुनिया। घूमने-फिरने वालों की दुनिया। क्या? और ये तो बाबा ने बताय दिया घूमना-फिरना है भूतों का काम। घूमना-फिरना करेंगे तो पैसा चाहिए कि नहीं चाहिए? चाहिए।

तुम जो बच्चे आकरके बने हो बाप के, तुम बच्चों को जो यज्ञ में रहने वाले हो; कहाँ रहने वाले हो? हँ? ज्ञान यज्ञ में रहने वाले हो ना। हँ? कि अज्ञान की दुनिया में रहने वाले हो? ज्ञान यज्ञ में रहने वाले हो। उनको तो कुछ भी करने की दरकार नहीं। वाह भाई! ये क्या बोल दिया? जो ज्ञान यज्ञ में रहने वाले बच्चे हैं, ज्ञान यज्ञ के लिए ही जीवन लगाय रहे हैं, तन की ताकत लगाय रहे हैं, जो कुछ भी टटपुंजिया धन है, वो लगाय रहे हैं, ऐसे बच्चों को तो कुछ भी दुनिया का धंधा करने की दरकार नहीं है। न झूठ, न पाप, न क्या, कुछ भी नहीं। यहाँ बाबा के घर में जगन्नाथ भण्डारा है ना। कौनसा भण्डारा है? जगन्नाथ भण्डारा। सारे जगत का नाथ। तो उसको पेट के लिए दो रोटी नहीं मिलेगी जो ईश्वरीय धंधे में ही लगा रहे? हँ? कोई धंधा न करे, बुड्ढे-सुड्ढे हो गए, ज्ञान में चल रहे हैं। हँ? उन्हें बहू चाहिए, पुत्र चाहिए, पोत्रा चाहिए, बिना बहू के, बिना लल्ले के, बिना पोत्रे के रह नहीं सकते। तो फिर? हँ? वो फिर उन पोत्रे-पोत्रियों का दास-दासी कर्म करने के लिए दादी अम्मा चाहिए। और यहाँ तो? यहाँ तो कुछ भी नहीं चाहिए। कोई भी पोत्रे-धोत्रे बाबा को ऐसे पालने के लिए छोटे बच्चे हैं ही नहीं।

यहाँ तो भोजन मिलेगा ही। क्या? ऐसे बहुत से सरेन्डर हैं, जो सरेन्डर हुए और सेवा कुछ भी करते नहीं। अपने पेट की परवरिश के लिए भोजन भी बनाने के लिए तैयार नहीं। झाडू-चौका-बर्तन भी नहीं करते। सारा दिन बातें करते रहते हैं। बस, दुनिया को दिखाने के लिए सरेन्डर हुए। चलो इतना ही करें तो भी ठीक। और ही डिससर्विस करने के करम करते हैं। क्या? तो ऐसे बच्चों को भी बाबा यहाँ भोजन देते हैं या नहीं देते?
(सबने कहा – देते हैं।) या कोई को कान पकड़ के निकाल देते हैं? हँ? अपने आप निकल जाते हैं वो दूसरी बात। तो देखो भोजन तो यहाँ मिलता ही है।

A morning class dated 2.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the second page on Saturday was – Our yagyapita; who is the yagyapita? Hm?
(Someone said – ShivBaba.) Is ShivBaba the yagyapita? Achcha! What is the name of the Yagya? (Everyone said – Rudra Gyan Yagya.) Imperishable Rudra Gyan Yagya. So, who is the yagyapita? It is Rudra, is not it? It is not Shiv because Shiv doesn't have a mouth at all. So, how will He create the Rudra Gyan Yagya? Hm? In order to create knowledge mouth is required. is not it? (Someone said – It is required.) Yes. So, when that incorporeal point of light Shiv comes in the corporeal world, then the corporeal seed-form soul of the corporeal world in whom He enters, who is the Father of the entire human world of 500-700 crores, then he is named as Rudra because the Gyan Yagya starts from there only. And how is the knowledge? Is it perishable or imperishable? (Someone said – Imperishable.) So, how will the Father of the Gyan Yagya also be? (Everyone said – Imperishable.) Imperishable Rudra. He cannot be destroyed. Although he assumes a fierce (raudra) form, although he assumes a dangerous form, such dangerous form that the entire world will be sacrificed in this Rudra Gyan Yagya. What kind of a Yagya it is? The entire world will be sacrificed in this Rudra Gyan Yagya. But that yagyapita will not be sacrificed. He is called Amarnath. That Amarnath is kaalon ka kaal, Mahaakaal (Lord of death) who cannot be devoured by death.

So, the Father comes and tells the children that recognize Me. And after recognizing Me, remember Me. So, did you recognize or not? Hm? Did you recognize? Did you not recognize? Brahmakumaris do say – We have recognized. What did they recognize?
(Someone said – Point.) They recognized the point. And what did you recognize? (Someone said – Incorporeal within the corporeal.) That incorporeal Father of incorporeal souls, i.e. Shiv is in corporeal form. And He makes the corporeal one, in whom He is present equal to Himself, i.e. point of light, incorporeal, viceless and egoless. And the body through whom He asks you to become the helper of the Father; so, should we become the helper of the point of light Shiv? (Someone said – Of the corporeal.) How will you become the helpers of Shiv? Shiv is incorporeal. He does not need anyone's help at all. His task itself is – He is a giver of the inexhaustible stockhouse of knowledge, the inexhaustible stockhouse of knowledge that is contained in Him. So, what help will we render to Him? Hm? Will we help? We do not help. So, for whom was it said that you have to become the helper of the Father? There are two unlimited Fathers. The Father of souls and the Father of human world. So, it was said for the Father of the human world, in whom He enters that you have to become helper. Hm?

Second thing, your meter of sins which has become full, has to be cleaned through remembrance. It will go on decreasing through remembrance. And it is a topic to ponder as to how much it decreases, how much our meter of sins has decreased. We have this worry; it is a very big worry that why cannot we remember Baba continuously? Hm? What is the reason? What is the worry?
(Someone said something.) No. There is a lot of burden of sins. This is why we cannot remember continuously. So, if we cannot remember, then what will be our fate? Hm? What will be the fate? If you remember continuously, there should not be a gap of even a second. Continuous embodiment of incorporeal point of light. So, the one who becomes continuous embodiment of incorporeal point of light, then what will the seed of the human world become? He will become the seed of the human world. If there is a gap in remembrance, then will the soul go on becoming distant from the seed or will it come closer? It will go on becoming distant.

So, tell, if you don't remember then what will be the fate? You should ask yourself that whether I, the soul am going to come in the beginning of the Golden Age or if I do not remember continuously now, if there develops a gap, on some days you don't remember throughtout the 24 hour period; hm? Does it happen so? So, what will be your fate? Hm? We will achieve true salvation in the last. It means that we will get birth very far away from the first Father of this human world on this world stage. Neither in the Golden Age, nor in the Silver Age; neither in the Copper Age, nor in the Iron Age; we will be born in the end of the Iron Age. Then we will get jeevanmukti (liberation in life).

So, it was said – What should you do? You have to ask yourself. The Father tells everyone – although everyone keeps on making mistakes at this time because Maya is chasing you. If you make mistake here, now, then you will have to repent a lot. What? If you become careless in remembering here, then what will be the result? Hm? You will have to repent a lot. Baba knows that many people keep on telling lies and committing sins while committing mistakes. They just show one thing in the potamail to the Father and do something else. It means that they are something else inside and something else outside. And what has Baba said to such persons? It has been said about such souls that those who are different inside out that such souls cannot come close to Me. What? Did you understand? The one who is different inside out cannot come close to Me. Neither can he come close here in the Confluence Age, they will remain distant only and they will remain far away in the broad drama as well.

There is no reason at all that there is requirement for any money after coming to this Yagya. What has been said? Someone may say – Baba, we live very far away from the center, from the Gitapathshala; so, Baba says – Nobody should come to the Yagya and say that we live very far away; we do not have that much money to come and attend the class daily. In order to recognize Baba deeply, grasp the knowledge very well deeply and recognize Baba and after recognizing you should come close to Baba. Arey, you children don't require money at all. Why brother? Hm? Why is not money required? Hm? Arey, what is required to make purusharth? Hm? Just 250 grams of wheat flour is required to make purusharth. Add salt. What? Should you not add? Achcha, even wheat flour is not required; soak wheat in water; next day, it will start sprouting. Will you not remain alive if you eat sprouted grains? Hm? Will the life continue or not? There is no need for salt as well. There is no need for you to turn wheat into flour. Those who require money have to then commit a lot of sins. What? Why is money required? Hm? There is no need for more money to make purusharth. If you keep on getting 250 grams of wheat flour daily, if you keep on getting 250 grams of grains, will you be able to make purusharth or not? It will.

Who requires money? Those who have to fulfill other desires also other than filling their stomach. Hm? Arey? Are there other organs also or not? There is the organ eye. Is money required to watch cinema daily or not? Is it not required? Okay, you may not go to the bioscope to watch cinema, we may sit and see on mobile; so, is money required for mobile also or not? Is it required for TV or not? It is required. So, in order to derive the pleasure of eyes money is required. There is the pleasure of ears – you require radio to listen to nice songs. Hm? Is it not required? In order to listen to news that what is going on in the world today? It is required, is not it? So, it was told that there are other organs as well. They also seek their pleasure. In order to fulfill the demands of those organs money is required. But in order to make purusharth; purush means soul, arth means for. In order to uplift the soul no money is required except 250 grams of grains. Those who want money want that world of money. Hm? And those who do not require money, want to make just purusharth, do not require that world at all. Those who live in that world will have to definitely commit sins because that is a world of businesses. A world of those who roam around. What? And this Baba has told that to travel around is the job of ghosts. If you roam around, do you require money or not? It is required.

You have come and become the Father's children; you children who live in the Yagya; you are a resident of which place? Hm? You live in the Gyan Yagya, don’t you? Hm? Or do you live in the world of ignorance? You live in the Gyan Yagya. They need not do anything. Wow brother! What has been said? The children who are living in the Gyan Yagya, those who are devoting their life only for the Gyan Yagya, investing their physical power, investing whatever little wealth they have, such children need not do any worldly business. Neither lies, nor sins, nor what? Nothing. Here, in Baba’s home, there is Jagannath’s bhandara (storehouse), isn’t it? Which bhandara? Jagannath Bhandara. The Lord of the entire world. So, will the one who remains in Godly business get two roties for his stomach? Hm? One may not do any business; one grows old and is following the path of knowledge. Hm? They want a daughter-in-law, son, and grandson. They cannot live without a daughter-in-law, without a son, without a grandson. So, then? Hm? Then a grandmother is required to act as a servant or maid of those grandchildren. And here? Nothing is required here. Baba does not have any grandchildren or small children to sustain.

Here you will definitely get food. What? There are many such surrendered ones who have surrendered and do not do any service. They are not even ready to cook food to sustain their stomach. They do not even broom, cook or clean the utensils. They keep on talking throughout the day. That is all; they surrendered to show to the world. Okay, it is alright if they do this much. But they do even more disservice. What? So, does Baba give food to such children also or not?
(Everyone said – He gives.) Or is anyone held by his ear and driven out? Hm? If they go on their own, then that is a separate thing. So, look, you do get food here.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 16 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2430, आडियो 2916, दिनांक 16.2.18
VCD 2430, Audio 2916, date 16.2.18
प्रातः क्लास 1.4.1967
Morning class dated 1.4.1967
VCD-2430-extracts-Bilingual

समय- 0.01-16.16
Time- 0.01-16.16


आज प्रातः क्लास थी – 1 अप्रैल, 1967 की मुरली। मुरली का पेज नंबर है 3 मध्य। इस मुरली का गीत था – ये लड़ाई है दीये और तूफान की। ये आत्मा है दीवा और उस दीवे को या कहें बल्ब को करेंट मिलती है बड़े जाम से। तो बहुत करेंट कहाँ होती है? तो देख सकते हैं नहीं ना। परन्तु अभी जो बच्चों को समझाना चाहिए बाहरवालों को, दुनियावालों को, जैसे ये बच्ची बैठी है, फिर ये समझती है हम सबको समझावें। अच्छा, हाँ, सबको भी समझाना चाहिए। उनको क्या समझाना चाहिए? किसने कहा? आत्माओं के बाप ने कहा। किस बच्ची की ओर इशारा किया? जो बच्ची ब्रह्मा के तन के सामने बैठी है। समझती है कि सबको समझावें। सबको माना कितनों को? बाबा तो दुनियावालों को ही बात कर रहे हैं। दुनिया वालों को समझाना चाहिए। बाहरवालों को। तो जरूर वो बच्ची विश्व आत्माओं का, या विश्व धर्मों की सभी आत्माओं की माँ होगी। जगदम्बा होगी। लेकिन जगदम्बा का चित्र देखने भक्त लोग समझते हैं कोई देह है। वो तो बाहर से देखने में आती है। देह एक चीज़ और उसमें देह को चलाने वाली आत्मा दूसरी चीज़। वो तो नहीं दिखाई पड़ती। तो जगत की अम्बा है तो सारे जगत को समझाने वाली होगी ना। सभी बच्चों को समझाएगी। लेकिन समझाएगी तो आत्मा ना। जड़ शरीर थोड़ेही समझाएगी।

तो बच्ची सामने बैठी है। और समझती है कि हम सबको समझावें। 500-700 करोड़ को समझाऊँ। अच्छा, हाँ, सबको भी समझाना चाहिए। क्या समझाना चाहिए कि तुम जो आत्माएं हो 500-700, 750 करोड़ सोल्स हो, आत्माओं को सोल्स ही तो कहते हैं ना बाहर में, दुनिया में। दुनिया में तो अंग्रेजी ही चल रही है। तो वो आते हैं तो जब यहाँ आ करके ऊँची स्टेज में ऊपर बैठें बाप की याद में, तभी तो प्योर हों। पर करेंट है तुम्हारे में। किसने बोला? शिव बाप जो अखूट ज्ञान का सागर है उसने बोला। किससे बोला? जो विश्व में, विश्व की मनुष्यात्माओं का बाप है, सारी मनुष्य सृष्टि का बाप, एडम, आदम, आदि देव शंकर कहा जाता है, उससे बोला। वो बड़ी मशीनरी है ना करेंट देने वाली। तो बोला कि ये सबसे ऊपर है। और वो करेन्ट है तुम्हारे में। माने जिस एडम, आदम से बात कर रहे हैं उससे कहा तुम्हारे में ये करेंट है। और सतोप्रधान हो, गोल्डन एज में हो और प्योर सोल्स हो। और फिर जो प्योर सोल है उसको इम्प्योर भी बनना है जरूर क्योंकि ये तो शूटिंग चल रही है ना। रिहर्सल काल है ना। चार युगों का ड्रामा है चार सीन्स वाला। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग। तो जरूर तमोप्रधान कलियुग के अंत में आवेंगे। और सतयुग के आदि में आवेंगे। कलियुग के अंत में आवेंगे आत्माओं का बाप। और आत्माओं का बाप जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं वो संपन्न बनकरके आवेगा सतयुग आदि में। जिसे कहें संगमयुगी स्वर्णिम सतयुग। तो दोनों युगों का मेल हो गया संगम। कलियुग का अंत और सतयुग का आदि।

इस संगम में शूटिंग होती है। और डायरेक्टर कौन है? डायरेक्टर है परमपिता शिव जो सदैव पर्दे के अन्दर रहता है। कभी किसी को दिखाई नहीं देता। उसको पहले-पहले देखने वाला बैटरी है या जेनरेटर कहो, मशीन बड़ा-बड़ा मशीनर। वो है डौंट कहा जाता है। तो वो डौंट से करेन्ट लेनी है 500-700 करोड़, 750 करोड़ मनुष्यात्माओं को। वो सोल्स नंबरवार चार युगों में आती हैं। कोई सतयुग में, कोई त्रेता में, कोई द्वापर में, कोई कलियुग अंत में भी आती हैं। तो जबसे भी आती हैं, पार्ट बजाती हैं, चार अवस्थाओं से पसार जरूर होती हैं – सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग का मतलब ही है हर आत्मा के जीवन में, चाहे अंत में आने वाली क्यों न हो, सतोप्रधान, सतोसामान्य, रजो और तमो – चार अवस्थाओं से पसार होना पड़ता है। तो जैसे आत्मा रूपी दीवा तमोप्रधान होने पर उझियानी ज्योति वाला हो जाता है। इम्प्योर आत्मा हो जाती है। तो जो भी प्योर सोल हैं, उनको इम्प्योर भी बनना जरूर है। चाहे वो अव्वल नंबर का डौंट ही क्यों न हो, बड़ा बैटरा, बड़ी मशीनरी। वो भी जब इम्प्योर बनती है, तभी तो गॉड फादर को बुलाते हो ना कि आकरके हमको लिबरेट करो, छुड़ाओ, इस देहअभिमान के बंधन से छुड़ाओ।

अब लिबरेट का अर्थ अलग होता है। हमको पावन बनाओ। जैसे एक पवित्र सोना होता है प्योर सोना 24 कैरेट, उसमें चांदी की, तांबे की, लोहे की खाद पड़ जाती है, तो इम्प्योर हो गया ना, अपवित्र हो गया ना। तो सतयुग से लेकर जो सोना का युग कहा जाता है, त्रेता में आत्माएं जन्म लेते-लेते आती हैं, सुख भोगते-भोगते इन्द्रियों के संग के रंग में आते-आते, ऊपर से जो आत्माएं आती हैं, वो चांदी जैसी आत्माएं आती हैं। उनके संग के रंग में आकरके चांदी जैसी हो जाती हैं। फिर द्वापर में उतरते हैं, ऊपर से भी उतरते हैं और पीछे वाले भी जन्म लेते रहते हैं, जनसंख्या बढ़ती रहती है। संग के रंग में आते रहते हैं। तो तांबे की खाद पड़ जाती है आत्माओँ में। फिर कलियुग में आते हैं तो ऊपर से आने वाली आत्माएं भी ढ़ेर की ढ़ेर आती हैं। और पीछे से जन्म लेने वाले भी जन्म लेते रहते हैं। ये 84 का चक्कर है ना। तो इस चक्र में पार्ट बजाने आना तो सभी को है सृष्टि रूपी रंगमंच पर। लेकिन खाद मिक्स होती जाती है। कलियुग में लोहे की खाद, लोहे जैसी काली, तमोप्रधान आत्माएं राक्षसी पार्ट बजाने वाली, उनके संग के रंग में आना पड़ता है। तो देहभान बढ़ता रहता है। जो आत्मा सोना थी वो अपवित्र होती जाती है। खाद वाली बनती जाती है। दुःख बढ़ता है। तो आत्मा कहती है मुझको पावन बनाओ। जो कहते हैं हमको पावन बनाओ वो आत्माएं अलग होती हैं, सब नहीं कहती हैं – हे पतित पावन आओ। जो कहते हैं पतित-पावन आओ, बुलाते हैं वो ही पतित से पावन बनते हैं। जो बुलाते नहीं हैं पतित पावन आओ, वो पावन भी नहीं बनते हैं।

तो लिबरेट माना कोई दुःख से लिबरेट करो। दुःख से छुड़ाओ। दुःख होता ही है देहअभिमान से। देहभान आता ही है द्वापरयुग से। द्वैतवादी युग है ना दैत्यों का। द्वापर, कलियुग – ये दैत्यों का युग है, राक्षसों का, राक्षसी दुनिया है दुःखदायी। तो आत्मा कहती है दुःख से लिबरेट करो। पावन बनने का अर्थ अलग है। हमको पावन बनाओ पतित से। अर्थात् आत्मा जो सतयुग में सोने जैसी थी वो लोहे जैसी काली बन गई। तो जरूर जो पतित बने हैं, कोई भी चीज़ से, क्योंकि सतयुग आदि में तो बहुत थोड़े होते हैं, फिर आत्मलोक से, सुप्रीम अबोड से, मुसलमान उसे कहते हैं अर्श, हिन्दू लोग कहते हैं ब्रह्मलोक अर्थात् परमधाम से आत्माएं आती रहती हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर। दुनिया की जनसंख्या बढ़ती रहती है। सतयुग से त्रेता की आबादी ज्यादा। त्रेता से द्वापर की आबादी ज्यादा। द्वापर से फिर कलियुग की आबादी ज्यादा। तो ज्यों-ज्यों आबादी बढ़ती जाती है, आत्माओं का जखीरा बढ़ता जाता है तो अनेकों के संग के रंग में आकरके जो आदि में सतयुग में पावन आत्माएं थीं वो अच्छी खासी पतित बन जाती हैं, दुःखी हो जाती हैं, तो कहते हैं दुःख से लिबरेट करो। और ये दुःख आता ही है देहअभिमान से। ज्यादा आता है। देह अभिमान होता है द्वापर से क्योंकि सतयुग त्रेता में तो आत्मा अभिमानी होते हैं। अपन को आत्मा समझते हैं। वहाँ आत्मा का दीपक जगा हुआ रहता है।


Today's morning class is Murli dated 1st April, 1967. The page number of Murli is 3, middle. The song in this Murli was – Ye laraai hai deeye aur toofaan ki (this is a fight between a lamp and storm). This soul is a lamp and that lamp or you may call it a bulb, it gets current from a big jam (generator). So, where is a lot of current (electricity) stored? So, you cannot see, can you? But now the children should explain to the outsiders, to the people of the world, just as this daughter is sitting, then she thinks that she should explain to everyone. Achcha, yes, you should explain to everyone. What should be explained to them? Who said? The Father of souls said. Towards which daughter did He point out? The daughter who is sitting in front of the body of Brahma. She feels that she should explain to everyone. To everyone refers to how many? Baba is talking of the outsiders only. One should explain to the outsiders. To the outsiders. So, definitely that daughter will be the mother of all the souls of the world, or of all the souls of the religions of the world. She will be the Mother of the World (Jagdamba). But by seeing the picture of Jagdamba, the devotees think that she is a body. She appears so outwardly. Body is one thing and the soul which controls that body is another thing. That is not visible. So, when she is the Mother of the World, then she will explain to the world, will she not? She will explain to all the children. But it is the soul which will explain, will it not? The inert body will not explain.

So, the daughter is sitting in front. And she thinks that she should explain to everyone. I should explain to 500-700 crores. Achcha, yes, everyone should also be explained. What should be explained? That you are 500-700, 750 crore souls, the atmas are called souls only outside, in the world. It is English only which is in vogue in the world. So, they come; so, when they come here and sit in a high stage in the Father's remembrance, then they can become pure. But there is current in you. Who said? Father Shiv, who is an inexhaustible ocean of knowledge said. To whom did He say? He said to the Father of the human souls of the world, the Father of the entire human world, Adam, Aadam, Aadi Dev Shankar in the world. He is the big machinery which gives current. So, it was said that this one is above everyone. And that current is in you. It means that He said to the Adam, Aadam to whom He is speaking that you have this current. And you are satopradhan, in Golden Age and pure souls. And then the one who is a pure soul has to definitely become impure because this is a shooting going on, is not it? It is a rehearsal period, is not it? It is a drama of four Age with four scenes. Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age. So, definitely He will come in the end of the Iron Age. And He will come in the beginning of the Golden Age. The Father of souls will come in the end of the Iron Age. And the permanent Chariot in whom the Father of souls enters will come in the beginning of the Golden Age after becoming perfect. It can be called the Confluence-Aged golden Satyug. So, the Confluence Age is the meeting point of both the Ages. The end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age.

Shooting takes place in this Confluence Age. And who is the Director? The Director is the Supreme Father Shiv who always remains behind the curtains. He is never visible to anyone. The one who sees Him first of all is the battery or you may call him the generator, a machine, a big machine. He is called daunt. So, the 500-700 crore, 750 crore human souls have to receive current from that daunt. Those souls come numberwise in the four Ages. Some come in the Golden Age, some in the Silver Age, some in the Copper Age, some in the end of the Iron Age also. So, ever since they come, play their parts, they definitely pass through the four stages – Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age itself means that in the life of every soul, be it the soul which comes in the end, it has to pass through the four stages – Satopradhan, satosaamaanya, rajo and tamo. So, for example, the light of the lamp like soul dampens on becoming tamopradhan, the soul becomes impure. So, all the pure souls have to definitely become impure. Be it the number one daunt, big battery, big machinery. When that also becomes impure, only then do you call the God Father that come and liberate us, free us, liberate us from this bondage of body consciousness.

Now the meaning of liberate is different. Make us pure. For example, there is a pure gold, 24 carat pure gold; when the alloy of silver, copper, iron is added to it, then it became impure, didn’t it? It became impure, didn’t it? So, from the Golden Age, which is called the Age of gold, souls reach the Silver Age while getting birth, while enjoying pleasures through the company of organs, the souls which come from above are silver like souls. They become like silver by getting coloured by their company. Then they descend to the Copper Age; they descend from above as well; and those who already existed also keep on getting rebirth; the population keeps on increasing. They keep on getting coloured by the company. So, the alloy of copper gets added in the souls. Then, when you come to the Iron Age, then numerous souls come from above as well. And the ones who had been getting birth in the past also keep on getting birth. This is a cycle of 84 (births), isn’t it? So, everyone has to come to this world stage to play their part in this cycle. But the alloy goes on getting mixed. The alloy of iron in the Iron Age, souls which are black like iron, tamopradhan and play a demoniac part; they have to get coloured by their company. So, the body consciousness keeps on increasing. The soul that was gold goes on becoming impure. It goes on becoming adulterated. The sorrows increase. So, the soul says – Make me pure. The souls which say ‘make us pure’ are different; everyone doesn’t say – O purifier of the sinful ones! Come. Those who say ‘O purifier of the sinful ones! Come’, call Him are the ones who become pure from sinful ones. Those who do not call at all saying ‘O purifier of the sinful ones! Come’ do not become pure as well.

So, to liberate means to liberate from some sorrow. Liberate from sorrows. Sorrow is caused only through body consciousness. Body consciousness comes only from the Copper Age. It is a dualistic Age of demons, isn’t it? Copper Age, Iron Age – this is an Age of demons; it is a demoniac world that causes sorrows. So, the soul says – Liberate me from sorrows. The meaning of becoming pure is different. Make us pure from sinful ones, i.e. the soul which was like gold in the Golden Age has become black like iron. So, definitely those who have become sinful, due to any reason, because there are very few in the beginning of the Golden Age; then souls keep on coming on this world stage from the Soul World, from the supreme abode; the Muslims call it Arsh, the Hindus call it Brahmlok, i.e. Paramdham. The population of the world keeps on increasing. The population of the Silver Age is more than that of the Golden Age. The population of the Copper Age is more than that of the Silver Age. The population of the Iron Age is more than that of the Copper Age. So, as the population keeps on increasing, as the number of souls keeps on increasing, then by getting coloured by the company of many, the souls which were pure in the beginning of the Golden Age become substantially sinful, become sorrowful; then they say – Liberate us from sorrows. And this sorrow comes only from body consciousness. It comes more. Body consciousness exists from the Copper Age because you are soul conscious in the Golden Age and Silver Age. You consider yourself to be souls. The lamp of the soul remains lighted there.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 17 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2431, आडियो 2917, दिनांक 17.2.18
VCD 2431, Audio 2917, dated 17.2.18
प्रातः क्लास 2.4.1967
Morning Class dated 2.4.1967
VCD-2431-extracts-Bilingual

समय- 0.01-14.34
Time- 00.01-14.34


आज है प्रातः क्लास – 2 अप्रैल, 1967. रविवार को चौथे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – शंकर क्या करते हैं? कहते हैं भई वो प्रेरणा करते हैं, प्रेरक हैं। अभी प्रेरणा तो कोई नहीं है। अभी माना कभी? माने जिस समय यह मुरली चल रही है ब्रह्मा के मुख से 2 अप्रैल, 1967 को उस समय की बात बताई कि अभी कोई प्रेरणा तो नहीं है। क्योंकि शंकर का पार्ट ही नहीं खुला हुआ था। पहले ब्रह्मा का पार्ट। ब्रह्मा भी कोई एक नहीं है। चतुर्मुखी ब्रह्मा दिखाते हैं, पंचमुखी ब्रह्मा दिखाते हैं, तो अव्वल नंबर का ब्रह्मा भी होगा जिसको परमब्रह्म कहा जाता है। ब्रह्मा के बाद आता है, स्थापना के बाद आती है विनाश की बात। क्योंकि स्थापना का तब तक कोई महत्व नहीं होगा जब तक पुरानेपन का विनाश न हो, पुरानी दुनिया का विनाश न हो। तो शंकर द्वारा विनाश की बात आती है। वो तो तब आएगी, जब पांचों ही ब्रह्मा के द्वारा पार्ट पूरा हो जाए।

यज्ञ की आदि में ब्रह्मा के रूप में, त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह देते हैं भक्तिमार्ग में, तो वास्तव में जो शिव की तीन मूर्तियाँ हैं वही तीन ब्रह्मा हैं। परमब्रह्म पहला, उसके बाद है, वो परमब्रह्म भी एक में ही नाम पड़ता है। जैसे दादा लेखराज पुरुष तन थे तो नाम पड़ा ब्रह्मा। जिसमें भी प्रवेश करता हूँ, उसका नाम ब्रह्मा देता हूँ। तो ब्रह्मा नाम तो दिया, परन्तु ब्रह्मा के द्वारा जो ब्राह्मण पैदा होते हैं, ब्राह्मणियाँ पैदा होती हैं, उन ब्राह्मणियों को पुरुष तन कैसे संभालेगा, इसलिए सरस्वती को निमित्त बनाया। वो भी तो सहयोगी ब्रह्मा हो गई स्थापना के कार्य में। ऐसे ही यज्ञ के आदि में जो परमब्रह्म था, वो तो प्रैक्टिकल रूप तब कहें, जब उनकी बेटी हो। तो जो जगदम्बा है, आदि देवी जिसे कहा जाता है, वो निमित्त बनी दादा लेखराज के साक्षात्कारों को सुनाने के लिए। और उसने मुख से सुनाया, तो जो ब्राह्मण पैदा हुआ, वो पहला ब्राह्मण बना। कौन? प्रजापिता। सारी मनुष्य सृष्टि का पिता। 500-700 करोड़ मनुष्यात्माओं का पिता, बीज। जो पहला ब्राह्मण बनता है, सो पहला-पहला देवता बने। उसी को कहते हैं देव-देव महादेव।

तो यज्ञ के आदि में स्थापना के साथ-साथ विनाश ज्वाला भी उसी ब्राह्मणों से चलती है। जो पहला ब्रह्मा बनता है, उसके बाद जगदम्बा भी ब्रह्मा है, ब्रह्मा का मुख, फिर जो स्त्री चोला है जगदम्बा और तनधारी आत्मा तो है, परन्तु आत्मा जडत्वमयी है, ज्ञान की गहराई को नहीं पकड़ सकती। ज्ञान दाता को नहीं पकड़ सकती। क्योंकि जगदम्बा में भी दो रूप चाहिए। जैसे महालक्ष्मी में दो रूप हैं – लक्ष्मी और जगदम्बा, दोनों का कॉम्बिनेशन होता है तो महालक्ष्मी कहा जाता है। ऐसे ही जगदम्बा है प्रकृति का रूप, प्रकृति अर्थात् 5 तत्वों का संघात। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। इन तीन, तीनों का, पाँचों का संघात रूप जो प्रकृति है, प्रकष्ठ कृति, वो तो हुई जगदम्बा। परन्तु प्रकृति को भी परे चलाने वाला आत्मा तो होनी चाहिए जगदम्बा। तो जगदम्बा का जो आत्मिक रूप है, वो ही है लक्ष्मी।

तो परमब्रह्म और साथ में लगा हुआ है प्रजापिता। तो प्रजापिता ब्रह्मा और जगदम्बा, उन दोनों से जो जुड़ी हुई तीसरी शक्ति है, जिसे कहा जाता है महागौरी क्योंकि आत्मिक रूप है। तो इन तीनों शक्तियों का जो कॉम्बिनेशन है वही संपन्न बनने पर कहा जाता है शंकर। जिसमें शिव वाली आत्मा संपन्न रूप से स्मृति में समा जाती है तब कहा जाता है शंकर का पार्ट। और उस शंकर को ही रुद्र कहा जाता है जिस रुद्र से सबसे पहले रुद्रमाला तैयार होती है, रुद्र वत्सों की। तो बच्ची भी चाहिए। तो वो बच्ची हो गई जिसे हम कहते हैं लक्ष्मी। ज्यादा पवित्र कौन होती है? माँ, बाप या बच्ची? बच्ची को ही ज्यादा पवित्र कहेंगे। तो ये तीन शक्तियाँ यज्ञ के आदि में थीं। एक परमब्रह्म, दूसरा जगदम्बा के रूप में ब्रह्मा। और तीसरा बच्ची के रूप में। इसलिए कहा जाता है कि दो शक्तियाँ हैं – राधा और सीता। बोला भी है – राधा भी निकली तो सीता भी निकली। राधा का अर्थ ही पड़ता है राम को धारण जिसने किया अपने जीवन में शुद्धतापूर्वक। तो जिस आत्मा ने जन्म-जन्मान्तर राम वाली आत्मा को धारण किया पवित्र संबंध के रूप में, तो वो राधा कही गई। राधा तो एक ही होती है। बाकी तो सब गोपियों में नाम आते हैं। ये पवित्रता की बात है।

तो ये जो 3 मूर्तियाँ हैं इनमें सर्वोपरि मूर्ति कौनसी? वो तीन कुरियाँ दिखाई जाती हैं – ब्रह्मा पुरी, विष्णु पुरी, शंकर पुरी। तो यज्ञ की आदि में जब विनाश ज्वाला आरंभ हुई, स्थापना के साथ-साथ, तो निमित्त बताया है ब्रह्मा और बाप। और तीसरे ब्राह्मण बच्चे। तो तीसरी वो बच्ची हो गई जिसका संपन्न रूप लक्ष्मी पड़ता है। जो बच्ची है वो हो गई न्यूट्रल मात-पिता के बीच में। उसको कहते हैं बैलेन्स रखने वाली विष्णु। ब्रह्मा का पार्ट अलग – बड़ी माँ का है। और बाप का पार्ट स्ट्रिक्ट होता है वो अलग। और मध्यस्थ भी चाहिए। तो विष्णु को दिखाते हैं। इन तीनों रूपों में सबसे ऊँची स्टेज दिखाई जाती है तीन सूक्ष्म पुरियों में शंकर की जो ब्रह्मलोक से बिल्कुल नज़दीक है। फिर उससे ज्यादा दूरी है विष्णु लोक की। फिर उससे भी ज्यादा दूरी है ब्रह्मा की। ब्रह्मा पुरी। तो अब साबित हो जाता है कि तीनों पुरियों में रहने वाले जो तीन देवताएं हैं उनमें पहले-पहले संपन्न स्टेज किसकी बनी होगी? जरूर कहेंगे जो ऊँच है, ऊँची स्टेज में बैठा है, उसकी ही बनी होगी। तो जिसकी संपन्न स्टेज बनती है वो ही शिव कहा जाता है, शिव समान स्टेज। क्योंकि शिव का कहना है, जो शिव सदैव ज्योति बिन्दु आत्मा के रूप में स्थिर रहता है, स्वस्थिति में स्थित रहता है, कभी देहभान में आता ही नहीं है, वो शिव ही ऊँच ते ऊँच ईश्वर कहा जा सकता है, भगवान कहा जा सकता है।

Today's morning class dated 2nd April, 1967. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the fourth page on Sunday was – What does Shankar do? They say, brother, he gives inspiration; he is an inspirer/motivator (prerak). Now there is no inspiration. Now refers to which time? It means the time when this Murli was being narrated through the mouth of Brahma on 2nd April, 1967. It was said about that time that there is no inspiration now because the part (role) of Shankar had not yet started. First was the part of Brahma. Brahma is also not one. Four headed Brahma is shown, five-headed Brahma is shown; so, there will be a number one Brahma also who is called Parambrahm. After Brahma, after the topic of establishment comes the topic of destruction because there will not be any importance of establishment until the oldness is destroyed, old world is destroyed. So, the topic of destruction through Shankar emerges. That will come when the part through all the five Brahmas is completed.

In the beginning of the Yagya, in the form of Brahma, people say Trimurti Brahma on the path of Bhakti; so, those who are the three personalities of Shiv in reality are the three Brahmas. Parambrahm is the first one; after that; that Parambrahm is also the name of one only. For example, Dada Lekhraj Brahma was a male body, so the name coined was Brahma. In whomsoever I enter, I name him Brahma. So, he was indeed given the name Brahma, but the Brahmins who are born through Brahma, the Brahmanis who are born, how will those Brahmanis (female Brahmins) be taken care of by a male body; this is why Saraswati was made instrumental. She too became a helper Brahma in the task of establishment. Similarly, the one who was Parambrahm in the beginning of the Yagya will be called a practical form when he has a daughter. So, Jagadamba, who is called the first female deity (aadi devi), became instrumental in narrating the visions of Dada Lekhraj. And when she narrated through the mouth, then the Brahmin who was born became the first Brahmin. Who? Prajapita. The Father of the entire human world. The Father, the seed of the 500-700 crore human souls. The one who becomes the first Brahmin should become the first deity. He himself is called Dev-Dev-Mahadev.

So, in the beginning of the Yagya, the flame of destruction is ignited by the same Brahmin along with the flame of establishment. After the one who becomes the first Brahma, Jagadamba is also a Brahma, the mouth of Brahma, then the female body Jagdamba and the soul holding that body does exist, but the soul is inert; it cannot grasp the depth of the knowledge. It cannot grasp the giver of knowledge because there are two forms required in Jagdamba as well. Just as there are two forms of Mahalakshmi – Lakshmi and Jagdamba, there is a combination of both; then it is said Mahalakshmi. Similarly, Jagdamba is the form of nature (prakriti); nature means the combination of five elements. Earth, water, air, fire, sky. The combination of these three, three, five [elements] is the nature (prakriti), the special creation; she is Jagdamba. But there should be a soul Jagdamba who controls even the nature. So, the soul form of Jagdamba is Lakshmi.

So, Parambrahm and along with it Prajapita is affixed. So, Prajapita Brahma and Jagdamba; the third power connected with both of them, who is called Mahagauri because she is soul form. So, the combination of these three powers on becoming perfect is called Shankar. When the soul of Shiv merges into the remembrance in the perfect form in it, then it is called Shankar's part. And that Shankar himself is called Rudra; through that Rudra the Rudramala (rosary of Rudra) of Rudra children gets ready first of all. So, a daughter is also required. So, that daughter is the one whom we call Lakshmi. Who is purer? Mother, Father or daughter? The daughter only will be called purer. So, these three powers (shaktis) were present in the beginning of the Yagya. One Parambrahm, second is Brahma in the form of Jagdamba. And the third one in the form of a daughter. This is why it is said that there are two shaktis – Radha and Sita. It has also been said – Radha also emerged and Sita also emerged. Radha itself means the one who inculcated Ram in her life with purity. So, the soul who inculcated the soul of Ram birth by birth in the form of a pure relationship was called Radha. Radha is only one. All other names are included among the Gopis. This is a topic of purity.

So, which personality is the highest one among these three personalities? Those three abodes are depicted – Brahma's abode, Vishnu's abode, Shankar's abode. So, when the flame of destruction was ignited in the beginning of the Yagya along with establishment, then those instrumental for it were described as Brahma and Baap (Father). And the third are the Brahmin children. So, the third one is that daughter, whose perfect form is Lakshmi. The daughter happens to be the neutral one between the Mother and the Father. She is called Vishnu, who maintains a balance. Brahma's part is different – It is of the senior mother. And the Father's part is strict; that is separate. And a middleman is also required. So, Vishnu is depicted. Among the three forms, among the three subtle abodes, Shankar's stage is shown to be the highest stage, which is very close to the Brahmlok (Soul World). Then farther from it is the abode of Vishnu. And then farther from it is Brahma's abode. Brahmapuri. So, now it is proved that among the three deities living in the three abodes, who must have achieved the perfect stage first of all? It will definitely be said that the one who is high, sitting in a high stage must have achieved. So, the one who achieves the perfect stage is called Shiv, a stage equal to Shiv because Shiv says, Shiv, who always remains constant in the point of light soul form, remains in soul stage (swasthiti), never becomes body conscious, that Shiv alone can be called the highest on high God, Bhagwaan.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 19 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2432, आडियो 2918, दिनांक 18.2.18
VCD 2432, Audio 2918, dated 18.2.18
प्रातः क्लास 2.4.1967
Morning class dated 2.4.1967
VCD-2432-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 0.01-14.01
Time- 00.01-14.01


प्रातः क्लास चल रहा था – 2 अप्रैल, 1967. और रविवार को पाँचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी कि भक्ति कितनी अच्छी लगती है उनको और ज्ञान से कितना कोस दूर बैठते हैं। कोई सुनता थोड़ेही। किसकी भी नहीं सुनते हैं। माँ बैठकरके बच्ची को समझाएगी तो भी कहेंगे ये माँ तो बेवकूफ है। ये हमको ये सब शिक्षा देती रहती है। ऐसे तो फिर कैसे पावन बनेंगे? अरे! परन्तु माँ तुमको समझाती है, पावन बनना अच्छा ही है। पवित्र बनो, मनसा, वाचा, कर्मेन्द्रियों से पवित्र बनो। चलो, मनसा के संकल्पों में कुछ भूल होती है तो पुरुषार्थी जीवन में कुछ समय पाप नहीं भी बनेगा। वाचा से तो भूल न करो। परन्तु अगर कर्मणा में भूल हो जाती है तो क्या होता है? हँ? पतितपना बहुत ज्यादा आवेगा, पाप ज्यादा चढ़ेगा या कम चढ़ेगा? सबसे जास्ती पाप चढ़ जाता है। जैसे कि पाँचवीं मार से नीचे गिरते हैं। तो पावन बनना अच्छा है, खासकरके इस संगमयुग में। पुरुषोत्तम बनना है ना।

हर मनुष्यात्मा को पुरुषोत्तम बनना है। हर आत्मा रूपी सितारे की अपनी-अपनी दुनिया है ना। तो अपनी दुनिया में जो भी पुरुष रूप आत्माएं हैं उनमें उत्तम बनना है या नहीं बनना है? लक्ष्य क्या होना चाहिए? उत्तम बनने का लक्ष्य होना चाहिए या नीच बनने का लक्ष्य होना चाहिए? माँ समझाती है – मैं खुद पतित बन करके दुःखी हुई हूँ। तुम पावन बनो। कौन? बच्चों से बताती है तुम पावन बनो और सो भी हम कहती तब हूँ जबकि अभी पावन दुनिया स्थापन हो रही है। अभी माने कब? पुरुषोत्तम संगमयुग में खास पतित दुनिया का विनाश होने वाला है। और साक्षात भगवान ही पावन बनाय रहे। कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा नहीं। संग के रंग से पावन बनाता है।

बिल्कुल नहीं सुनती। जिनकी तकदीर में नहीं है वो बिल्कुल जैसे कि एकदम वो जो कहा जाता है ना हियर नो ईविल, तो फिर ये तो अच्छी बात है ना। तो बस वो माया रूप में बनी बेटी कहती है हियर नो बाबा की बातें। है ना ऐसे। माया झट कह देती है कि शिवबाबा का ज्ञान मत सुनो। वो बुद्धि में मत रखो। मेरी बात सुनो। आटोमेटिकली माया ऐसी चमाट मारती है जो बुद्धि में रह ही नहीं सकते हैं। और बाप को तो बहुत बात भी नहीं है। क्या है मुख्य बात? छोटी सी बात है। अपन को आत्मा समझ बाप को याद करो। आत्माओं का बाप है ना। आत्माएं सब निराकार है ना। तो निराकार आत्माओं के बाप को याद करो। याद तो आत्माओं के बाप को करना है ना। हाँ, आत्मा सूक्ष्म है, बाप भी अति सूक्ष्म है। नहीं याद आता है तो जिस बड़े स्वरूप में प्रवेश करता है उसको याद करो। अरे, बाप को याद करो। निराकार साकार दोनों का व्यक्तित्व तो पर्सनलिटी एक ही है या अलग-अलग है? एक ही है। याद ही नहीं कर सकते। सारे देह के मित्र-संबंधी याद आ जाते हैं। वो सब याद आते हैं। सामने आ जाते हैं। उनको झट बहुत याद करते हैं। तो उनको अगर याद करते हैं, बाबा की आज्ञा नहीं मानते हैं ना।

बाबा कहते हैं, क्या कहते हैं? मामेकम् याद करो। तो उल्टा ही अर्थ लगा लेते हैं। मामेकम् का मतलब समझ लेते हैं मुझ एक बिन्दु को याद करो। वो एक बिन्दु ही सर्वश्रेष्ठ है, ऊँचे ते ऊँच। ऊँचे ते ऊँचा भगवन्त है। अरे! बिन्दु ऊँचे ते ऊँचा कहा जा सकता है? ऊँचे ते ऊँचा और नीचे ते नीचा इस दुनिया में होता है कि निराकारी दुनिया में होता है? कहाँ होता है? इस दुनिया में होता है। तो इस दुनिया में वो क्या निराकारी बनकरके रहता है? या साकार में प्रवेश होकर रहता है निरंतर रूप से? साकार में रहता है ना। तो मामेकम् याद करो का मतलब ये है कोई एक व्यक्तित्व है, पर्सनालिटी है, शख्सियत है, उसमें याद करो। तो फिर नाफरमानबरदार बनकरके कहते हैं, हम क्या करें? हमको याद आती है ना। किसकी? देहधारियों की। तो बाबा, बाबा क्या कहते हैं? अरे याद आती है तो उनको भूलो। किनको भूलो? जो देहधारी संबंधी हैं उनको भूलो। याद आती है और आती रहेगी तो क्या रिजल्ट होगा? हँ? ऊपर चढ़ेंगे या नीचे गिरेंगे? नीचे गिर पड़ेंगे। नीचे गिर पड़ने का मतलब कोई पाताल लोक में नहीं चले जावेंगे। क्या मतलब होगा? हँ? माला में आत्मा रूपी मणका नीची स्टेज में चला जावेगा। बाप से दूर हो जावेंगे कि नज़दीक रहेंगे जन्म-जन्मान्तर? कौनसे बाप से? जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, जो निराकारी आत्माओं के बीच सर्वोपरि आत्मा जो है सुप्रीम सोल, उसके सबसे नज़दीक रहता है।

तो देहधारियों को भूलो। नहीं तो जन्म-जन्मान्तर के लिए हीरो पार्टधारी से क्या होगा? दूर हो जाएंगे। गिर पड़ेंगे। तो जिस देहधारी की बहुत याद आती है, कोई न कोई की बहुत याद आती होगी ना। तो उसको भूल करके मुझे याद करते रहो। अभ्यास करो। जिनकी याद ज्यादा आती है उनसे नफरत लाते रहो। हँ, ये छी-छी है। ये गंद है। इसको कहा जाता है वैराग। क्या? वैराग माने? वि माने विपरीत, राग माने प्यार। प्यार के विपरीत चले जाओ। ये छी-छी दुनिया है। क्या? ये दुनिया कैसी है? हँ? अच्छी दुनिया है? शिव कहाँ आता है? अच्छी दुनिया में आता है, श्रेष्ठ दुनिया में आता है, स्वर्ग में आता है या नर्क में आता है? रौरव नर्क में आता है। तो कैसी दुनिया है? सारी दुनिया छी-छी दुनिया है। हमारे लिए तो बहुत अच्छा, नया स्वर्ग स्थापन हो रहा है। ऐसी भावना रखनी चाहिए।

तुमको शांतिधाम का परिचय मिला। बाप का घर है ना। स्वर्ग का परिचय मिला। बाप का परिचय मिला। किसका-किसका परिचय मिला? एक का या तीन का? तीनों का परिचय मिला। बाप का भी परिचय मिला, जिससे सब कुछ प्राप्ति होती है। जो कुछ पाना था सो पा लिया, अब कछु पाना नाहि। स्वर्ग की प्राप्ति होती है और बाप का घर भी मिलता है। तो तीन को याद करें या एक को याद करें? दो को याद करें? एक में ही तीन समाए हुए हैं। जो कोई को भी इस सारी सृष्टि में कोई को भी तीनों बातें एक साथ नहीं हैं। कौन-कौनसी तीनों बातें? कोई व्यक्तित्व में नहीं है। कौन-कौन सी तीनों बातें? घर भी हो, ऊँचे ते ऊँचे बाप का घर, और परमानेंट हो मुकर्रर रथ के रूप में। घर भी है, स्वर्ग भी है और बाप भी है। ऊँचे ते ऊँचा वर्सा देने वाला।


A morning class dated 2nd April, 1967 was being narrated. And the topic being discussed in the middle of the fifth page on Sunday was that Bhakti appears so nice to them and they sit at such a distance from knowledge. Nobody listens. They do not listen to anyone. Even when the Mother sits and explains to the children, they say that this Mother is foolish. She keeps on giving all these teachings to us. In this manner how will you become pure? Arey! But the Mother explains to you; it is good to become pure. Become pure; become pure through mind, words and organs of action. Okay, if you commit some mistakes through the thoughts of the mind, then you will not accrue sins for some time in the purusharthi life. Do not commit sins through words. But if you commit mistakes through actions, then what happens? Hm? Will you become very sinful, will you accrue more sins or less sins? You accrue maximum sins. It is as if you fall from the fifth floor. So, it is good to become pure, especially in this Confluence Age. You have to become purushottam (highest among all the human beings), should you not?

Every human soul has to become purushottam. Each soul like star has its own world, doesn't it? So, among all the purush-like souls in your world, should you become best (uttam) or not? What should be the goal? Should you have the goal of becoming best or should you have the goal to become lowly? The Mother explains – I have myself become sorrowful by becoming sinful. You become pure. Who? She tells the children – You become pure and that too I say when the pure world is being established now. Now means when? In the Purushottam Sangamyug, especially the sinful world is going to be destroyed. And God Himself is making you pure. It is not any Tom, Dick and Harry (aira gaira natthu khaira). He makes you pure through the colour of company.

She doesn't listen at all. Those who are not fated, they are completely as if it is said hear no evil, is not it? So, then it is a good thing, is not it? So, that is all; that daughter in the form of Maya says – Hear no versions of Baba. It is like this, is not it? Maya tells immediately – Do not listen to the knowledge of ShivBaba. Do not keep it in the intellect. Listen to me. Maya slaps automatically in such a way that it cannot remain in the intellect at all. And the Father does not have many matters. What is the main topic? It is a small topic. Consider yourself to be a soul and remember the Father. He is the Father of souls, is not He? All the souls are incorporeal, aren't they? So, remember the Father of incorporeal souls. You have to remember the Father of souls, don't you have to? Yes, the soul is subtle; the Father is also very subtle. If He does not come to your mind, then remember the big form in whom He enters. Arey, remember the Father. Is the personality of the incorporeal and corporeal one and the same or different? It is one only. You cannot remember at all. All the friends and relatives of the body come to the mind. All of them come to the mind. They come in front of you. You remember them a lot immediately. So, if you remember them, you don't obey Baba, do you?

Baba says; what does He say? Remember Me alone (Maamekam Yaad karo). So, they interpret it in an opposite manner. They interpret 'Me alone' as 'Remember Me, the one point'. That one point alone is the highest one, supreme. He is the highest on high God. Arey! Can a point be called the highest on high? Is highest on high and lowest on low in this world or in the incorporeal world? Where does it exist? It exists in this world. So, does He remain incorporeal in this world? Or does He continuously remain present by entering in a corporeal? He remains in a corporeal, doesn't He? So, to 'remember Me alone' means that there is a personality; remember Me in it. So, then they become disobedient and say – What should we do? They come to our mind, don't they? Who? The bodily beings. So, what does Baba say? Arey, when they come to your mind, forget them. Whom should you forget? Forget the bodily relatives. If they come to your mind and keep on coming to your mind, then what will be the result? Hm? Will you rise or will you fall? You will fall. Falling down does not mean you will go to the nether world (paataal lok). What will be the meaning? Hm? The bead like soul will go down in lower stage in the rosary. Will you become distant from the Father or will you remain close birth by birth? From which Father? The Father of the human world remains closest to the highest soul among the incorporeal souls, i.e. the Supreme Soul.

So, forget the bodily beings. Otherwise, what will happen in relation to the hero actor birth by birth? You will become distant from him. You will fall. So, the bodily being who comes to your mind more; there is someone or the other who comes to your mind more. So, forget him/her and keep on remembering Me. Practice. Keep on developing hatred for the ones who come to your mind more. Hm? This one is dirty. This is dirty. This is called detachment (vairaag). What? What is meant by vairaag? Vi means vipreet (opposite). Raag means love. Go against love. This is a dirty world. What? How is this world? Hm? Is it a nice world? Where does Shiv come? Does He come in a nice world, does He come in a righteous world, does He come in heaven or does He come in hell? He comes in a extreme hell (raurav nark). So, how is the world? The entire world is a dirty world. A very nice, new heaven is being established for us. You should have such feelings.

You got the introduction of the abode of peace (shaantidhaam). It is the Father's home, is not it? You got the introduction of heaven. You got the introduction of the Father. You got the introduction of what all? Of one or of three? You got the introduction of all the three. You got the introduction of the Father also through whom you get all the attainments. You have achieved whatever you had to attain; nothing more is to be achieved. You get the attainment of heaven and you get the Father's home as well. So, should we remember three or one? Should we remember two? Three are merged in one. In the entire world all the three topics are not together. Which three topics? They are not there in any one personality? Which three topics? It should also be home, the home of the highest on high Father and it should be permanent in the form of permanent Chariot (mukarrar rath). It is home as well as heaven and he is the Father as well. The one who gives the highest on high inheritance.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2432, आडियो 2918, दिनांक 18.2.18
VCD 2432, Audio 2918, date 18.2.18
प्रातः क्लास 2.4.1967
Morning Class dated 2.4.1967
VCD-2432-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 14.02-30.16
Time- 14.02-30.16


तुम बच्चों को बाप का परिचय मिला है। क्या? किस बाप का परिचय मिला है? ऊपरवाले निराकार बाप का सिर्फ परिचय मिला है या उसने इस मनुष्य सृष्टि के बाप का भी परिचय दिया है? दोनों एक में ही कम्बाइन्ड हैं। एक ही पर्सनालिटी में। सृष्टि चक्र का परिचय मिला। क्योंकि जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, सारे चक्कर को क्रॉस करने वाला है तो तुमको बाप के वर्से का परिचय मिला। तो उस वर्से की तरफ जाना चाहिए ना। किस वर्से की तरफ? हँ? जो परिचय मिल गया है। क्या परिचय मिल गया? हँ? आत्मा का परिचय मिल गया। उस वर्से की तरफ जाना चाहिए। जो तुम्हारी आत्मा का ऊँचे ते ऊँच वर्सा है। परिचय मिला ना? हँ? मिला या नहीं मिला? मिला।

तो वो ही पढ़ाई में लग जाना चाहिए। और अच्छी तरह से लग जाना चाहिए। क्योंकि आत्मा को ऊँचे ते ऊँचा स्टेज का परिवार तो मिला ना। और फिर पढ़ाना भी लग जाना चाहिए। क्या-क्या करें? खुद पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाएं। उनको तो भूलना तो नहीं है ना। किनको? जो ऊँच ते ऊँच आत्मा को वर्सा मिलना है, जिसका परिवार मिल गया, उसको भूलना तो नहीं है ना। यहाँ कोई भी जो जिनसे कोई भी संबंध है, वो बाहर का संबंध है। कि अन्दर का है? हँ? अन्दर का है या बाहर का है? देह का संबंध माने बाहर का संबंध। वो विकारी संबंध है। ये उनको तो चिट्ठी भी लिखने की दरकार नहीं है। किनको? जिनसे बाहरी देह का संबंध है, उनको तो क्या करना है? हँ? प्यार-व्यार होता है ना? तो जिनसे दूर हो जाते हैं, फिर कारणे-अकारणे उनको चिट्ठी लिखने की दिल होती है। चिट्ठी भी लिखने की दरकार नहीं रहती। क्योंकि ज्ञान के सिवाय कोई लिखने से थोड़ेही कोई समझ सकते हैं। हँ? और ज्ञान तो एक बाप का है ना। उस ज्ञान में, जो ईश्वरीय ज्ञान है, उसमें और कोई मनुष्यमात्र का अंशमात्र भी अगर मिल गया तो क्या हो जाएगा? ज्ञान या अज्ञान? दूध के भरे घड़े में आधा चौथाई विष का मिल जाए सर्प का तो क्या हो जाएगा? विष ही हो जाएगा।

2.4.67 की वाणी का छठा पेज। तो हम किसको भी लिखते हैं शिवबाबा को याद करो। लिखेंगे ना। तो कोई शिवबाबा को भी याद करेंगे क्या? हँ? जिनको हम चिट्ठी लिखते हैं, शिवबाबा को याद करो, तो तुम्हारी चिट्ठी देखकरके वो शिवबाबा को याद करेंगे क्या? करेंगे? बिल्कुल नहीं करेंगे। तुमको याद करेंगे। कभी नहीं लिखना ऐसी भावना में आकर। बच्चे होंगे, उनको कोई बाप बैठकरके पढ़ाएंगे तो वो याद करेंगे कुछ न कुछ। परन्तु वो युक्तियुक्त तो होगा नहीं ना। तो कोई याद थोड़ेही कर सकते हैं। क्योंकि याद करने के लिए पहली-पहली बात क्या चाहिए? याद करने के लिए पहली-पहली बात चाहिए परिचय। बाप का एक्यूरेट परिचय बुद्धि में बैठे। नाम, रूप, देश, काल, कर्तव्य बुद्धि में बैठना चाहिए। शिवबाबा है क्या? और हम आत्मा क्या हैं? कहाँ शिवबाबा और कहाँ हम? कितना जमीन आसमान का अंतर है? क्या अंतर है? वो ऊपरवाला शिवबाबा नहीं। वो तो शिव बाप है सिर्फ। उसके साथ बाबा माने ग्रांडफादर का संबंध ही नहीं बनता। शिवबाबा ऊपर की ओर इशारा करें या इस सृष्टि पर? इस सृष्टि पर? इस सृष्टि पर शिवबाबा है ना।

कितना भी समझाओ। अगर बैठे तो याद करे। नहीं बैठता एकदम। क्योंकि ऐसा कुछ पाप आत्मा है जो बैठता ही नहीं है। बिल्कुल ही नहीं बैठता। तो फिर कहेंगे उनको पद ही नहीं पाना है। या तो थोड़ी भक्ति की है, इसलिए उनकी बुद्धि में नहीं बैठता है। ज्यादा बुद्धि में किसके बैठेगा? जिसने 2500 साल द्वैतवादी द्वापरयुग से जो कुछ भक्ति की है तो बुद्धि में बैठेगा। जिसने सबसे जास्ती भक्ति की है, उसको जास्ती बैठेगा। जिसने कम भक्ति की है उसको कम बैठेगा। नहीं भक्ति की है तो बुद्धि में नहीं बैठेगा। क्योंकि उनको माल मिलने का ही नहीं है। बाप तो हरेक को कहते हैं कि अपने ऊपर नज़र धरो। और अपने अंतर को देखो। अंतर को देखो माने? अंतर क्या है? जो अंतर है उसे ही कहते हैं आध्यात्मिक ज्ञान। अधि माने अन्दर। आत्मा के अन्दर देखो।

जो अभी कहते हैं ना बच्ची – अगर भारत में भी है, लक्ष्मी के साथ वो नारद कहते हैं भगत। देखो, भगत है ना। क्या? भक्तों में भी शिरोमणि भगत नारद को कहा जाता है। हँ? शिरोमणि भगत है तो सबसे जास्ती भक्ति की होगी, भक्तों के बीच में कि कम की होगी? हँ? शिरोमणि है तो जरूर बड़ा भक्त हुआ। सबसे जास्ती भक्ति करने वाला हुआ। तो नाम क्या हुआ? हँ? नारद। भक्त शिरोमणि। कहते हैं ना। और यहाँ आते हैं ना। भक्त शिरोमणि तो बहुत हैं नंबरवार। जो वो कहते हैं – हम लक्ष्मी को वर सकेंगे? नारद की कथा में यही तो आता है। क्या? कि हम, नारद कहता है कि हम लक्ष्मी को वरेंगे। तो वो तो बोलते हैं कि अपने अन्दर में तो देखो ये शीशा है ज्ञान का दर्पण। दर्पण दिखाय दिया। तो बन्दर का चेहरा दिखाई पड़ा। बन्दर तो बहुत विकारी होता है। पाँचों विकार भरपूर भरे पड़े होते हैं। तो तुम्हें भी बाप कहते हैं, रोज़-रोज़ कहते हैं, अपने अन्दर में तो देखो। तो तुमको क्या बाप याद आता है? कि कोई और याद आ जाता है? ये सृष्टि का चक्र याद आता है? चलते-फिरते, उठते-बैठते याद आता है? याद आता है तो खुशी आती है मनन-चिंतन-मंथन करने से? देखते रहो, याद करते रहो। फिर दूसरा आ जाते हैं ना। तो ये समझो कि ये अभी पाप बहुत जलाते हैं। ये पाप बुहत हैरान करते हैं। क्या?

कोई भी प्रकार से हमको ये याद छोड़करके, कोई भी हालत में याद हमको शिव की करनी चाहिए। क्या कहा? हँ? और कोई भी हमारे पास, कोई से भी लव नहीं रखना होता है, बिल्कुल ही नहीं। और लव का तो तुम बच्चों को दिखला रहे हैं कि लव किसको कहा जाता है। लव कैसा होता है? अरे, ये लव कितना हैरान करते हैं। ये नाम नहीं लेता हूँ, देह को लव करने वालों का। बाकी तुम देखते हो। ये बाहर का देह का लव कैसे जाते हैं, कितना तड़पाता है, कितना हैरान करता है। तड़पना चाहिए शिवबाबा के साथ लव में रहने का। और बाहर में कितने हैं। हम लिस्ट बनावें, तुमको बहुत लम्बी-चौड़ी लिस्ट बनाकर देवें। नाम लेकरके, बहुत अच्छे-अच्छे फर्स्टक्लास बच्चे भी कितना हैरान होते हैं इस देहधारी की लव में। छोटे का तो माया के आगे कुछ भी नहीं है। उनको तो यूं चुटकी में मसल देती है। समझा ना। वो तो जैसे कुछ भी नहीं। मैं बड़े का, बहुत अच्छे-अच्छे का नाम निकाल करके दूँ कि देखो, उनको माया कैसे नाक से पकड़ती है। क्या? नाक से ही क्यों पकड़ती है? नाक बड़ी जल्दी माया को पकड़ने में आ जाती है क्या? हँ? लम्बी-चौड़ी नाक है क्या? लम्बी-चौड़ी नाक किसकी होती है? हँ? चींटी की या देहअभिमानी हाथी की? हाथी की तो बहुत लम्बी-चौड़ी नाक होती है। तो नाक से फट से पकड़ लेती है। तो ऐसे नहीं समझना चाहिए भई उस हाथी को पकड़ती है। पुरुषार्थ करने वालों में हाथी रूपी महारथी होते हैं ना। तो उनकी नाक को पकड़ती है। अरे, वो हमको भी तो पकड़ती है। फिर उसमें और हमारे में क्या फर्क? ऐसे नहीं समझना चाहिए। तो क्या फर्क है? ये फर्क न देखो। तो ऐसे नहीं - छूट आना चाहिए। छूटना चाहिए ना।

You children have received the introduction of the Father. What? You have received introduction of which Father? Have you received the introduction of just the above-one incorporeal Father or has He also given the introduction of the Father of this human world? Both are combined in the same personality. You received the introduction of the world cycle because the Father of the human world crosses the entire cycle; so, you got the introduction of the Father's inheritance. So, you should go towards that inheritance, shouldn't you? Towards which inheritance? Hm? The introduction that you have received. Which introduction have you received? Hm? You got the introduction of the soul. You should go towards that inheritance which is the highest on high inheritance of your soul. You got the introduction, did not you? Hm? Did you get or not? You got.

So, one should become busy in the same studies. And then you should get engaged in it nicely because the soul has found the family of highest on high stage, hasn’t it? And then one should also start teaching. What all should we do? We should ourselves study and teach others as well. We should not forget Him, should we? Whom? The highest on high inheritance that the soul has to receive, whose family you have found should not be forgotten, should you? Whatever relationships we have here are outwardly relationships. Or is it an inner relationship? Hm? Is it internal or external? Bodily relationship means external relationship. That is a vicious relationship. You need not even write letters to them. Whom? What should you do with the ones with whom you have external bodily relationship? Hm? You have love [for someone], don't you? So, when you become distant from him/her, then you feel like writing letters to them due to one reason or the other. There is no need to write letter as well because except knowledge nobody can understand just by writing [letters]. Hm? And the knowledge belongs to one Father, doesn't it? Even if a trace of the knowledge of human beings mixes up in that knowledge, in the Godly knowledge, then, what will it become? Knowledge or ignorance? If half or one fourth of snake poison mixes up in a pot full of milk, then what will it become? It will become poison only.

Sixth page of the Vani dated 2.4.67. So, we write to anyone – Remember ShivBaba. You will write, will you not? So, will anyone remember ShivBaba as well? Hm? The persons whom you write letters asking them to remember ShivBaba; so, will they remember ShivBaba by reading your letter? Will they? They will not at all. They will remember you. Never write like this under emotions. If there are children, and if a Father sits and teaches them, then they will remember to some extent or the other. But that will not be rational, will it be? So, nobody can remember because what is the first and foremost requirement for remembering? In order to remember [someone], the first and foremost requirement is introduction. The accurate introduction of the Father should sit in the intellect. The name, form, place, time, duty should sit in the intellect. What is ShivBaba? And what are we, the souls? Is there any comparison between ShivBaba and us? There is a difference of land and sky! What is the difference? Not that above one ShivBaba. He is just Father Shiv. The relationship of Baba, i.e. grandfather cannot be established with Him. Should we make a gesture upwards while talking of ShivBaba or towards this world? Towards this world? ShivBaba is in this world, isn’t He?

Howevermuch you explain. If it sits [in your intellect], remember. It does not sit at all because he/she is such a sinful soul that it does not sit at all. It does not sit at all. So, then it will be said that they aren't supposed to achieve any post at all. Either they have done little Bhakti; this is why it does not sit in their intellect. In whose intellect will it sit more? It will sit in the intellect of the one who has done some Bhakti from the dualistic Copper Age since 2500 years. It will sit more in case of the one who has done more Bhakti than anyone else. It will sit less in the one who has done less Bhakti. If he/she hasn't done Bhakti at all, then it will not sit in the intellect because they are not supposed to get the benefit. The Father tells everyone – Keep an eye on yourself. And check your inside (antar). What is meant by checking the inside? What is inside? The inner self is called the spiritual knowledge (adhyatmik gyaan). Adhi means andar (inside). Look inside the soul.

It is said now daughter, is not it – Even if you are in India, they say that there is devotee Narada along with Lakshmi. Look, he is a devotee, is not he? What? Devotee Narada is said to be the highest one among the devotees. Hm? When he is the highest devotee, then he must have done the most Bhakti among all devotees or would he have done less Bhakti? Hm? When he is the highest one, then he is definitely a big devotee. He is the one who did more Bhakti than anyone else. So, what is the name? Hm? Naarad. The highest one among the devotees. It is said, is not it? And they come here, don't they? There are numberwise many high devotees. He says – How can I marry Lakshmi? This is mentioned in the story of Narada. What? That I, Narada says – I will marry Lakshmi. So, he says that – check yourself; this is the mirror, the mirror of knowledge. He was shown a mirror. So, he saw a monkey's face. Monkey is very vicious. All the five vices are in full. So, the Father tells you as well, He tells everyday, look into your inner self. So, do you remember the Father? Or does anyone else come to your mind? Do you remember this world cycle? Does it come to your mind while walking and moving, while standing and sitting? If it comes to your mind, then do you feel happy by thinking and churning? Keep on looking, keep on remembering. Then others come to your mind, don't they? So, think that these sins burn us a lot now. These sins trouble us a lot. What?

We should remember Shiv in any manner, under any circumstance. What has been said? Hm? And you should not have love for anyone, not at all. And as regards love, it is being shown to you children as to what is meant by love. How is love? Arey, this love troubles so much. I do not announce the names of those who love the body. But you see. This external love for the body troubles you, haunts you so much. You should be worried to be in love for ShivBaba. And there are so many outside. I could make a list, I could make a very long list. I could take names. Very nice firstclass children also get troubled in the love for this bodily being. Small ones cannot do anything in front of Maya. She rubs them like this in a chutki (clip). Did you understand? They are nothing. I could name the big ones, very nice ones that look, how Maya catches them by their nose. What? Why does she catch them by the nose only? Does the nose come under Maya’s hold easily? Hm? Is the nose long and wide? Who has a long and wide nose? Hm? Is it of an ant or of a body conscious elephant? Elephant's nose is very long and wide. So, it catches immediately by the nose. So, you should not think that brother, she catches that elephant. Among those making purusharth, there are elephant like maharathis, aren't there? So, she catches them by the nose. Arey, she catches us also. Then what is the difference between him and us? You should not think like this. So, what is the difference? Do not see this difference. So, it should not be like this – you should free yourself and come. You should get freed, shouldn't you?

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 21 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2432, आडियो 2918, दिनांक 18.2.18
VCD 2432, Audio 2918, date 18.2.18
प्रातः क्लास 2.4.1967
Morning Class dated 2.4.1967
VCD-2432-extracts-Bilingual-Part-3

समय- 30.17-47.32
Time- 30.17-47.32


बाबा ये जो वाणी रोज़ चलाते हैं। क्या? क्या वाणी चलाते हैं? देह अभिमान को छोड़ो। आत्माभिमानी बनो। आत्मा की स्मृति में निरंतर रहना है। ढ़ाई हज़ार साल देवताएं कौनसी स्मृति में रहेंगे? आत्मिक स्मृति में रहेंगे ना। अरे भई, बाप के साथ अंत में प्राण निकलें तो क्या होगा? हँ? अंत मते? सो गते। बाप के साथ का मतलब क्या? बुद्धि जो है बाप के साथ में रही पड़ी हो अंत समय में। तब जब शिवबाबा की याद हो और ये ज्ञान बुद्धि में बैठा हुआ हो। कौनसा ज्ञान? ये सुदर्शन चक्र का ज्ञान। स्व माने आत्मा। दर्शन माने ये 84 का चक्र। हमारी आत्मा ने इस सृष्टि चक्र में कैसे-कैसे 84 के चक्र में, सुख या दुख में चक्कर लगाया है वो ज्ञान बुद्धि में टपकता रहे। तब प्राण तन से निकलें। क्योंकि बाप ने भी यही कहा ना। क्या? अंत मते सो गते। अंत समय में सिर्फ एक बाप की याद हो। बाप तो कर्मातीत अवस्था में है सदैव। हँ? कौन है? हँ? वो ऊपरवाला कर्मातीत? वो कर्म करता है जो कर्मातीत अवस्था में होगा? हँ? कर्म कौन करता है? जो कर्म करेगा सो कर्मातीत बनेगा। कर्म ही नहीं है। वो अकर्ता है या कर्ता है? क्या है? वो तो अकर्ता है। उसकी बात नहीं है। वो जब साकार में आता है तब कर्म के बंधन में नहीं बंधता। तो उस स्वरूप की बात है।

तो उनकी भेंट में अभी ये ज्ञान का चक्कर फिरता रहता है। किनकी भेंट में? हँ? उनकी माने किनकी भेंट में? उनकी माने दो आत्माएं हैं कम से कम कम्बाइंड रूप में। बाप और दादा। आत्मिक रूप में। और साकारी रूप में? राम और कृष्ण की आत्माएं। कैसे चक्कर लगाती हैं? वो बुद्धि में भी ज्ञान का चक्कर चलता रहता है। स्वदर्शन चक्रधारी है। समझा ना। बाप अभी कौन है? हँ? स्वदर्शन चक्रधारी। कौनसा बाप? बेहद के दो बाप हैं। कौनसा बाप? ऊपर का? नीचे का? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। उसको तो चक्कर में आना ही नहीं है ऊपर वाले को। ये तो नीचे की बात है। जो नीचे का बाप है, साकार सृष्टि का, मनुष्य सृष्टि का, वो ज्यादा से ज्यादा बड़े चक्कर में आता है। वो जितना चक्कर में आता है उतना कोई आता ही नहीं है। तो समझो अभी बाप कौन है जिसके मुकाबले हम परसेन्टेज में चक्कर में आते हैं? किसको मालूम थोड़ेही है कि सौ परसेन्ट स्वदर्शन चक्रधारी कौन है? हँ? कौन है? सौ परसेन्ट स्वदर्शन चक्रधारी कौन है? ऊपर वाला? वो तो चक्कर काटता ही नहीं सृष्टि का। ऊपरवाला या नीचेवाला? (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा ! नंबरवार ब्राह्मण हैं स्वदर्शन चक्रधारी। ठीक है? हँ? तो अव्वल नंबर भी कोई ब्राह्मण होगा ना। लास्ट नंबर भी कोई होगा ना? नंबरवार, मीडियम नंबर वाले भी होंगे ना। तो नंबर किस आधार पर बनते हैं? सुदर्शन चक्र चलाने के आधार पर बनते, मनन-चिंतन-मंथन के आधार पर बनते, पढ़ाई के आधार पर बनते या ऐसे ही बन जाते? तो कौनसा चिंतन चलना चाहिए? ज्ञान का चिंतन चलना चाहिए या देह का चिंतन चलना चाहिए?

अरे! तो जो सर्वोपरि स्वदर्शन चक्रधारी, हीरो पार्टधारी है उनको सिखलाया किसने? हँ? उनको क्यों कहा? हँ? उनको क्यों कहा? एक है या कम से कम दो हैं? कितने हैं? उनको स्वदर्शन चक्रधारी बनना सिखलाया किसने? हँ? किसने सिखलाया? एक ने सिखलाया या दो ने? एक ने सिखलाया। और दो को सिखलाया जो ऊँच ते ऊँच, स्वदर्शन चक्रधारी हैं। वो दो कौन? या ज्यादा को सिखलाया जो ऊँच ते ऊँच हैं? कौन हैं दो ऊँच ते ऊँच स्वदर्शन चक्रधारी? हँ? याद भी करते रहते बापदादा-3 करते रहते। फिर भी भूल जाते? कौन हैं ऊँचे ते ऊँचे स्वदर्शन चक्रधारी? चलो एक हो गया राम वाली आत्मा। राम बाप को कहा जाता है, मनुष्य सृष्टि का बाप। दूसरा? अरे, इतना भी बता दिया बापदादा-बापदादा करते रहते ना। निराकारी आत्माओं के बीच में बापदादा वो तो जान गए। साकारी में भी कोई बापदादा हैं? साकारी सृष्टि में। कौन? है ना राम कृष्ण। तो जो कृष्ण वाली आत्मा है भोगी आत्माओं के बीच में हीरो पार्टधारी को छोड़ करके वो सर्वोपरि ऊँची स्टेज में जाती है स्वदर्शन चक्र चलाने में कि नहीं जाती है? जाती है। अभी नहीं जाती है। जब दो बच्चों का इकट्ठा जन्म होगा; क्या? किसका?? जो बाबा है ना ग्राण्डफादर; कब कहा जाता है? जब बच्चे का भी बच्चा पैदा हो। तो क्या कहा जाता? बाबा। तो उसका बच्चा कौन? मनुष्य सृष्टि का बाप। फिर उसका बच्चा कौन ऊँचे ते ऊँचा? हँ? कोई है या नहीं? इस मनुष्य सृष्टि में कृष्ण बच्चा सतयुग का। जो भी इस मनुष्य सृष्टि की आत्माएं हैं, उन मनुष्यात्माओं के बीच में वो ऊँचा पार्ट बजाने वाला है। उनको सिखलाया किसने? हँ? सिर्फ निराकार ज्योतिबिन्दु ने सिखलाया या निराकार शिव ज्योतिबिन्दु साकार में आया तब सिखलाया? साकार में आया तब सिखलाया। लेकिन कृष्ण को किसने सिखलाया? निराकार से सीखा या साकार से सीखा? किससे सीखा? दो बच्चों का जन्म इकट्ठा है। बाप और बच्चे का जन्म इकट्ठा है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर। क्या? जो चित्रों में दिखाते हैं एक बुड्ढा बाबा देह के रूप में बैठा हुआ है और उसकी गोद में? कृष्ण बच्चा प्यार ले रहा है गोद का।

तो बताया – कोई स्वदर्शन चक्रधारी होगा जिसने सिखलाया। तो कौन होगा स्वदर्शन चक्रधारी? देखो, कितनी समझने की बातें हैं। क्या? कौन है स्वदर्शन चक्रधारी? चरित्र के चित्र बनाए जाते हैं। जो भक्तिमार्ग में चित्र हैं वो किसकी यादगार हैं? चरित्र की यादगार है। तो स्वदर्शन चक्र कौन-कौनसे चित्रों में दिखाया जाता है? कृष्ण को दिखाते हैं और? वो तो दो हाथ वाला है। और किसको दिखाते?
(किसी ने कहा – विष्णु।) हाँ। चार हाथ हैं विष्णु को। उनको भी स्वदर्शन चक्र दिखाते। तो देखो, क्या विष्णु चक्रधारी होगा? हँ? होगा? विष्णु स्वदर्शन चक्रधारी होगा? होगा? स्वर्ग में होगा कि इस नरक की दुनिया में होगा? नरक की दुनिया में स्वदर्शन चक्रधारी होगा? अरे? विष्णु तो स्वर्ग का देवता है। सर्वोपरि देवता स्वर्ग का है लेकिन वो बुद्धू होते हैं या ज्ञान होता है उनमें? हँ? ज्ञान होता है? जो प्रैक्टिकल में विष्णु होगा उनको ज्ञान होगा? हँ? स्वर्ग में ज्ञान होगा? ज्ञान तो यहाँ इस सृष्टि की बात है। तो हम ब्राह्मणों को स्वदर्शन चक्रधारी बनाते कौन हैं? हँ? ये रचना के आदि, मध्य, अंत को तो वो हैं ना। दूर किया। जो सृष्टि रूपी रचना है इसका आदि, मध्य, अंत तो वो है ना। कौन? कहने वाला कौन? शिव। और वो करके किसकी तरफ इशारा किया? हँ? वो एक या दो या चार? ज्यादा? रचना का आदि, मध्य, अंत। अरे? पहली-पहली रचना कौन? त्रिमूर्ति। त्रिमूर्ति रचना उसमें जो ब्रह्मा, विष्णु, शंकर हैं तो सर्वोपरि ऊँची स्टेज वाला जो शंकर है वो है सबसे ऊँची स्टेज में। वो आदि भी है, मध्य भी है, अंत भी है।

तो पहले-पहले स्वदर्शन चक्रधारी। वो भी तो आत्मा है ना। भले परमात्म पार्टधारी भी हो जाता है। लेकिन पहले तो आत्मा है या परमात्म पार्टधारी प्रसिद्ध होता है? आत्मा। तुम्हारी आत्मा भी बनती है ना स्वदर्शन चक्रधारी। हँ? नंबरवार या नंबर वन? अव्वल नंबर में? नंबरवार बनती हैं। तो वो भी स्वदर्शन चक्रधारी और तुम भी स्वदर्शन चक्रधारी। अभी? अभी माने कभी? जिस समय ये ब्रह्मा के मुख से वाणी बोली जा रही है उस समय। अभी ये है नहीं। कौन? वो ऊँच ते ऊँच स्वदर्शन चक्रधारी, हीरो पार्टधारी अभी हीरो नहीं है। अभी दुनिया की नज़रों में क्या है? जीरो है या हीरो है? अभी नहीं। कितना रात-दिन का फर्क है ना भक्तिमार्ग में। तो अभी दुनिया में, सारी दुनिया में भक्तिमार्ग चल रहा है या ज्ञान मार्ग चल रहा है? हँ? ज्ञान एक से आता है। और भक्ति? अनेकों से आती है। तो दुनिया में जितने भी अभी मौजूद हैं, वो भक्त हैं या नहीं हैं? हँ? भक्त हैं। ज्ञानी क्यों नहीं? हँ? एक से ज्ञान लेते हैं, एक से जानकारी लेते हैं या सुनी-सुनाई बातों पर भी विश्वास कर लेते हैं? दूसरो-दूसरों की सुनाई बातों पर? भक्त क्या करते हैं? सुनी-सुनाई बातों पर भी विश्वास कर लेते हैं। वो ही भक्त हुए। भारतवासी हुए या भारत हुए? क्या हुए? हँ? अव्वल नंबर भारत कौन? भा माने ज्ञान की रोशनी; रत माने रहने वाला। सदैव ज्ञान की रोशनी में रहे, सदैव ज्ञान टपकता रहे बुद्धि में, तो कहेंगे भारत। और उसकी याद में जो दिल और दिमाग से रहते हैं वो कहाँ के वासी हुए? हँ? भारतवासी हुए। ओमशान्ति।

The Vani that Baba narrates every day. What? Which Vani does He narrate? Leave the body consciousness. Become soul conscious. You have to remain in the remembrance of the soul continuously. Which awareness will the deities have for 2500 years? They will be in the awareness of the soul, will they not be? Arey, brother, what will happen when the life force (praan) departs [from the body] in the company of the Father? Hm? As are the thoughts in the end? So shall be the fate. What is meant by the Father's company? The intellect should remain with the Father in the end period. At that time when there is the remembrance of ShivBaba and this knowledge has sat in the intellect. Which knowledge? This knowledge of Sudarshan Chakra. Swa means soul. Darshan means this cycle of 84. The knowledge of how our soul has passed through the cycle of 84 in this world cycle, how it has passed through happiness and sorrows should keep on dripping in the intellect. At such a time the life force should depart this body because the Father has also said this, hasn't He? What? Who is it? Hm? Is that above one [God] karmaateet? Does He perform actions that He would be in a karmaateet stage? Hm? Who performs actions (karma)? The one who performs actions would become karmaateet. When there are no actions at all; is He akarta (non-doer) or karta (doer)? What is He? He is akarta. It is not about Him. When He comes in a corporeal form, He does not get bound by the bondage of karma. So, it is about that form.

So, when compared to them, now this cycle of knowledge keeps on revolving. In comparison to whom? Hm? 'Them' refers to whose comparison? 'Them' means there are at least two souls in a combined form. Baap and Dada. In soul form. And in corporeal form? The souls of Ram and Krishna. How do they revolve? The cycle of knowledge keeps on revolving in the intellect. He is Swadarshan Chakradhari. Did you understand? What is the Father now? Hm? Swadarshan Chakradhari. Which Father? There are two unlimited Fathers. Which Father? The above one? The below one? Hm?
(Someone said something.) Yes. He, the above one is not supposed to enter in the cycle at all. It is about the below one. The Father below, the Father of the corporeal world, of the human world passes through the biggest cycle. Nobody passes through the cycle as much as he passes. So, understand who that Father is now, in whose comparison we pass through the cycle in percentage? Nobody knows as to who is the hundred percent Swadarshan Chakradhari? Hm? Who is it? Who is hundred percent Swadarshan Chakradhari? The above one? He does not pass through the cycle at all. The above one or the below one? (Someone said something.) Achcha! Numberwise Brahmins are Swadarshan Chakradharis. Is it correct? Hm? So, there must be a number one Brahmin as well; will there not be? There must be a last number also, will there not be? There will be numberwise ones, medium number ones also, will there not be? So, on what basis are the numbers decided? Are they decided on the basis of revolving the Swadarshan Chakra, are they decided on the basis of thinking and churning, are they decided on the basis of studies or are they simply decided? So, what should we think? Should we think of the knowledge or should we think of the body?

Arey! So, who taught the highest Swadarshan Chakradhari, the hero actor? Hm? Why was it said 'unko' (them)? Hm? Why was it said unko? Is there one or are there at least two? How many are there? Who taught them to become Swadarshan Chakradhari? Hm? Who taught? Did one teach or did two teach? One taught. And He taught to two, who are highest on high, swdarshan chakradhari. Who are those two? Or did He teach to more who are highest on high? Who are highest on high Swadarshan Chakdradharis? Hm? You also keep on remembering, you keep on uttering 'BapDada-3'. Yet you forget? Who are the highest on high Swadarshan Chakradharis? Okay, one is the soul of Ram. The Father is called Ram, the Father of the human world. Second? Arey, it was also told that you keep on uttering 'BapDada-3', don't you? You have come to know who that BapDada is among the incorporeal souls. Is there any corporeal BapDada as well? In the corporeal world. Who? There are Ram and Krishna. So, the soul of Krishna among the bhogi (pleaure seeking) souls, apart from the hero actor attains the highest stage in rotating the swadarshan chakra or not? It achieves. It does not achieve now. When two children are born together; What? Who? Baba, who is grandfather, is not he? When is He called so? When the child of his child is also born. Then, what is He called? Baba. So, who is His child? The Father of human world. Then who is his highest on high child? Hm? Is there anyone or not? Child Krishna of the Golden Age in this human world. Among all the human souls that exist in this human world he plays the highest on high part. Who taught them? Hm? Did just the incorporeal point of light teach or did the incorporeal point of light Shiv teach when He came in corporeal form? He taught when He came in corporeal form. But who taught Krishna? Did he learn from the incorporeal or did he learn from the corporeal? From whom did he learn? Two children are born together. The birth of the Father and the child is simultaneous on this world stage. What? It is shown in the pictures that an old grandfather is sitting in the form of a body and who is in his lap? Child Krishna is receiving the love of his lap.

So, it was told – There must be a Swadarshan Chakradhari who must have taught. So, who must be the Swadarshan Chakradhari? Look, there are topics to be understood so much. Wha? Who is Swadarshan Chakradhari? Pictures (chitra) are made on the basis of the acts (charitra). Whose memorials are the pictures on the path of Bhakti? They are the memorials of the acts [performed]. So, in which one of all the pictures is the Swadarshan Chakra shown? It is shown on Krishna; and? He has two hands. Who else is shown to have [Swadarshan chakra]? (Someone said – Vishnu.) Yes. Vishnu has four hands. He is also shown to have Swadarshan Chakra. So, look, will Vishnu be Chakradhari? Hm? Will he be? Will Vishnu be Swadarshan Chakdradhari? Will he be? Will he be in heaven or will he be in this world of hell? Will he be Swadarshan Chakra in the world of hell? Arey? Vishnu is the deity of heaven. He is the highest deity of heaven, but are they fools or do they have knowledge? Hm? Do they have knowledge? Will the one who is Vishnu in practical have knowledge? Hm? Will there be knowledge in heaven? Knowledge is about this place, here. So, who makes us Brahmins Swadarshan Chakradharis? Hm? They (vo), the beginning, middle and end of this creation, aren't they? They were made distant. He, the beginning, middle and end of the world like creation, doesn't he? Who? Who is the speaker? Shiv. And towards whom did He point out by saying 'vo' (they)? Hm? Are they one or two or four? More? The beginning, middle and end of the creation. Arey? Who is the first and foremost creation? Trimurti. Trimurti creation includes Brahma, Vishnu and Shankar; so, the highest Shankar is in the highest stage. He is in the beginning also, middle also and the end also.

So, first of all Swadarshan Chakradhari. He too is a soul, is not he? Although he becomes a supreme actor also. But is he first a soul or does he become famous as a supreme actor first? Soul. Your soul too becomes Swadarshan Chakradhari, doesn't it? Hm? Numberwise or number one? In number one? It becomes numberwise. So, he is also Swadarshan Chakdradhari and you are also swadarshan chakradhari. Now? ‘Now’ refers to when? At the time when this Vani is being spoken through the mouth of Brahma. Now he is not so. Who? That highest on high Swadarshan Chakdradhari, hero actor is not hero now. What is he in the eyes of the world now? Is he a zero or a hero? Not now. There is a difference of day and night on the path of Bhakti. So, now, is the path of Bhakti going on or is the path of knowledge going on in the world, in the entire world? Hm? Knowledge comes from one. And Bhakti? It comes from many. So, all those who are present in the world now, are they devotees or not? Hm? They are devotees. Why aren't they knowledgeable? Hm? Do they obtain knowledge from one, do they obtain information from one or do they believe in the hear say also? The topics narrated by others? What do the devotees do? They believe in the hearsay also. They are devotees only. Are they residents of India (Bhaaratwaasis) or Bhaarat? What are they? Hm? Who is number one Bhaarat? ‘Bha’ means the light of knowledge; ‘rat’ means 'the one who remains engaged'. If someone remains in the light of knowledge always, if the knowledge keeps on dripping in the intellect always, then it will be said Bhaarat. And those who live in his remembrance through their heart and intellect are the residents of which place? Hm? They are the residents of India (Bhaaratwaasis). Om Shanti.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

User avatar
arjun
PBK
Posts: 11585
Joined: 01 May 2006
Affinity to the BKWSU: PBK
Please give a short description of your interest in joining this forum.: To exchange views with past and present members of BKWSU and its splinter groups.
Location: India

Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 22 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2433, आडियो 2919, दिनांक 19.2.18
VCD 2433, Audio 2919, date 19.2.18
प्रातः क्लास 2.4.1967
Morning class dated 2.4.1967
VCD-2433-extracts-Bilingual

समय- 0.01-19.00
Time- 0.01-19.00


प्रातः क्लास चल रहा था – 2 अप्रैल, 1967. रविवार को छठे पेज की अंतिम लाइनों में बात चल रही थी – तुम बच्चों की आत्मा भी स्वदर्शन चक्रधारी बनती है ना। तो वो भी स्वदर्शन चक्रधारी। ‘भी’ क्यों लगाया क्योंकि अव्वल नंबर जो स्वदर्शन चक्रधारी है उसे विष्णु कहा जाता है, जो आदि के जन्म से लेकर अंतिम जन्म तक स्वभाव-संस्कार से मिलकरके पति-पत्नी एक होकर रहते हैं। आदि में भी विष्णु फिर अंत में भी विष्णु। बाकि हैं नंबरवार स्वदर्शन चक्रधारी। अभी ये नहीं है। जिनके लिए ‘भी’ लगा दिया। माना जब पुरुषोत्तम संगमयुग का पुरुषार्थ का अंतिम समय आता है तो फिर जब बाप प्रवेश करता है उस समय वो स्वभाव-संस्कार से अलग-अलग हो जाते हैं। कौन? नर से नारायण बनने वाली आत्मा और नारी से लक्ष्मी बनने वाली आत्मा। कितना रात-दिन का फर्क है ना भक्तिमार्ग में। रात अज्ञान की और दिन ज्ञान का। फिर लगाय दिया विष्णु को स्वदर्शन चक्रधारी। हम कहते हैं – नहीं-नहीं, सुदर्शन चक्रधारी परमात्मा है। परमपिता नहीं? सुदर्शन चक्रधारी परम आत्मा है, परम पार्टधारी, हीरो का पार्टधारी। परमपिता तो उससे भी ऊपर है। उसको स्वदर्शन चक्कर घुमाने की दरकार है? वो तो सदा जागती ज्योति, त्रिकालदर्शी है। कभी भी अंधियारे में आता ही नहीं।

2.4.67 की वाणी का सातवां पेज। त्रिकालदर्शी, त्रिमूर्ति, त्रिनेत्री – अलाना, टीडा, ये सब भक्तिमार्ग की बातें हैं। अच्छा, क्या देखना? दर्शी माने देखना। क्या देखना? त्रिकालदर्शी। भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल का दर्शन करने वाला। कौन? आत्माओं का बाप या आत्माओं के बीच में जो भोक्ता आत्मा है, सभी आत्माएं, मनुष्यात्माएं भोक्ता हैं। उनके बीच में जो हीरो पार्टधारी परम आत्मा है, परम पार्टधारी, वो त्रिकालदर्शी है। अरे, वो त्रिकालदर्शी होता तो बहुत जन्मों के अंत के भी अंत में मैं प्रवेश करता हूँ। तो उस समय अज्ञानी होता है, अंधेरे में होता है कि सोझरे में होता है? वो परमात्मा शब्द इसीलिए लगाया ही जाता है परमपिता के बाद। परमपिता परमात्मा। कभी ऐसे नहीं कहेंगे – परमात्मा परमपिता। जैसे सदैव कहते हैं शिव-शंकर। कभी ऐसे नहीं कहते शंकर शिव। क्यों? क्योंकि जो बड़ा है वो पहले।

तो हम उनको कहते हैं ये नॉलेज कौन देता है? स्वदर्शन चक्रधारी हमको कौन बनाते हैं? और कल्प-कल्प बनाते रहते हैं। कौन बनाते हैं? बनाने वाला खुद बना हुआ होगा तब बनाएगा या बना हुआ नहीं होगा तो बनाएगा? कोई भी कहेगा पहले खुद बने तब दूसरों को बताए। इसलिए ही बोला है – हम उनको कहते हैं। हँ? कहने वाला ‘हम’ क्यों कह रहा है अपन को? क्योंकि तनधारी भी आत्मा है और उसमें जो प्रवेश आत्मा है, वो भी है। तो दो हुए या एक हुआ? दो हुए, तो हम ही कहा जाएगा। हम उनको। अपने को नहीं कहा। उनको कहते हैं। माना भविष्य में आने वाला कोई पार्ट है। ये नॉलेज उनको कौन देता है? जिनका भविष्य में पुरुषार्थ संपन्न होने वाला है। उनको कहते हैं ये नॉलेज कौन देता है? सुदर्शन चक्रधारी हमको कौन बनाते रहते हैं? कौन बनाते रहते हैं? कल्प-कल्प बनाते रहते हैं। कौन? जो सदा त्रिकालदर्शी है। कभी भी अंधेरे में नहीं आता। कहा ही जाता है सदाशिव।

तो सुदर्शन चक्रधारी पहले तो बाबा है ना। चक्रधारी। चक्र को धारण करने वाला। स्वदर्शन चक्रधारी बनाने वाला नहीं। स्वदर्शन चक्र को धारण करने वाला। धारण कराने वाला या करने वाला? कहेंगे, कहेंगे धारण करने वाला। स्वदर्शन चक्रधारी पहले तो बाबा है ना। आत्माओं का बाप है या ग्राण्डफादर है बाबा? कौन स्वदर्शन चक्रधारी है? जरूर कहेंगे जो नर से नारायण बनता है, और उस साकार में सदा निराकारी स्टेज में रहने वाला शिव प्रवेश करता है तो साकार निराकार का मेल बाबा कहा जाता है। है तो आत्मा ना। हँ? जिसे बाबा कहा जाता है वो पहले तो स्वदर्शन चक्रधारी नहीं था। पुरुषार्थ संपन्न होता है तो स्वदर्शन चक्रधारी बनता है। तो सुदर्शन चक्रधारी बना तब परमात्मा कहेंगे। परमपार्टधारी। बाकी है तो आत्मा ना पुरुषार्थ करने वाली। पीछे तुमको बनाते हैं। पीछे माने? पहले खुद सुदर्शन चक्रधारी बनते हैं पुरुषार्थ करके। फिर तुमको बनाते हैं। अभी वो ही आत्मा बनती है। क्या? आत्मा बनती है? बिगड़ती है? आत्मा बनती बिगड़ती है? बनती बिगड़ती नहीं है। लेकिन अपने स्वरूप को भूली हुई है।

वो याद दिलाने के लिए ही बोला कि प्रैक्टिस करनी पड़ती है आत्मिक स्मृति की। जो देहभान में रहती है, देह की स्मृति में रहती है सदा, उसको आत्मा की स्मृति दिलाता है, जो सदैव आत्मिक रूप में स्थित रहता है, स्वस्थिति में स्थित रहता है। तो वो आत्मा स्वदर्शन चक्रधारी बनती है। आत्मा ही है स्वदर्शन चक्रधारी। हँ? ऐसे नहीं परमपिता स्वदर्शन चक्रधारी है। तुम्हारी भी आत्मा स्वदर्शन चक्रधारी बनती है। ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? इनकी आत्मा भी स्वदर्शन चक्रधारी बनती है। किनकी? जो बाजू में बैठकरके सुन रहा है। किसके बाजू में सुन रहा है? शिव बाप प्रवेश करते हैं ना दादा लेखराज ब्रह्मा में। प्रवेश करके ये ब्रह्मवाक्य, वेदवाणी बोलते हैं। तो बोला तुम्हारी भी, जो सामने बैठे हैं इमर्ज करके उनसे बोला – तुम्हारी भी आत्मा स्वदर्शन चक्रधारी बनती है। इनकी भी बनती है। तो ये जरूर बनेंगे। तो मनुष्य में आकरके ज्ञान देंगे ना। जरूर इनको, जिन आत्माओं को ईश्वरीय संदेश देकरके अपनी प्रजा बनाना है, उन प्रजावर्ग की आत्माओं में प्रवेश करके उसको ज्ञान देंगे ना।

तो अभी तुम्हारी आत्मा में ज्ञान है। इनकी आत्मा में ज्ञान नहीं है। तुम्हारी आत्मा में ज्ञान है जबकि तुम मनुष्य के शरीर में हो। मनुष्य कहा ही जाता है जो मनन-चिंतन-मंथन करे। इनकी आत्मा में ज्ञान क्यों नहीं है? इनकी माने ब्रह्मा की आत्मा में ज्ञान क्यों नहीं है? क्योंकि; ये मनुष्य नहीं हैं? हँ? मनन-चिंतन-मंथन करता है? जब मनन-चिंतन-मंथन ही नहीं करता तो मनुष्य काहे का? मननात् मनुष्य। तो कहेंगे कि जानवर है, जानवर जैसा है या मनुष्य है? हँ? पहले इसको क्या बनना पड़े? हँ? पहले तो मनन-चिंतन-मंथन करनेवाला बालिग बच्चा बनना पड़े। अभी तो नाबालिग बच्चा है ना। वो कोई मनन-चिंतन-मंथन थोड़े ही कर सकता है गहराई से। तो तुम्हारी आत्मा में ज्ञान है। क्योंकि तुम ज्ञान का मनन-चिंतन-मंथन कर सकते हो। ये बच्चा बुद्धि है तो जैसे जानवर बुद्धि है, इसकी बुद्धि में मनन-चिंतन-मंथन नहीं चल सकता। बाबा में ज्ञान है, जबकि मनुष्य के तन में न आए तो ज्ञान कैसे (दे)? क्योंकि परमधाम में आत्मा जड़वत् रहती है या चैतन्य रहती है? जडवत् रहती है। तो मनुष्य तन में आए तब ज्ञान देवे।

तो बाबा में ज्ञान है। किसको कहा बाबा? साकार निराकार का मेल हुआ, तो क्या कहेंगे? बाबा। रचना के आदि मध्य और अंत का नॉलेज कौन देते हैं? हँ? रचना। पहली-पहली रचना कौन है? त्रिमूर्ति। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। इन तीनों का ज्ञान कौन देते हैं? इनके आदि का भी ज्ञान, मध्य का भी ज्ञान, अंत का भी ज्ञान। कौन देते हैं? हँ? रचना। रचना के आदि, मध्य, अंत का ज्ञान देने वाला जरूर सदाकाल का त्रिकालदर्शी होना चाहिए। लेकिन क्या वो देता है? हाँ। वो ज्ञान ही तो देता है। निराकार आत्मा है, निराकार आत्माओं का बाप है, तो निराकारी वर्सा देगा या साकारी वर्सा देगा? निराकारी वर्सा ही देगा। तो जो ये मनुष्य सृष्टि है और ये मनुष्य सृष्टि की रचना है, मनुष्य हैं, जो भी प्राणी मात्र हैं, इस रचना के आदि, मध्य, अंत का नॉलेज देने वाला वो सुप्रीम सोल है त्रिकालदर्शी। लेकिन रचता देंगे और कौन देंगे? रचता प्रैक्टिकल में होगा, साकार होगा या निराकार होगा? साकार होगा। तो साकार में आकरके देंगे। नहीं तो और कौन देंगे? निराकार देंगे क्या? निराकार को मुख ही नहीं है तो देंगे कैसे ज्ञान? ज्ञान देने के लिए तो मुख चाहिए।

ये जो गाया जाता है कि ये इसको ज्ञान नहीं है रचयिता और रचना का। किसको? ब्रह्मा को। ज्ञान नहीं है। काहे-काहे का ज्ञान नहीं है? न रचयिता बाप का ज्ञान है कि इसका बाप कौन है और न उसकी रचना का ज्ञान है। ये नहीं जानता मेरा बाप कौन है, इस मनुष्य सृष्टि का बाप कौन है? और ये मनुष्य सृष्टि कैसे इसकी रचना है? रचना साकार तो रचयिता भी? साकार। और ये क्या समझता है? कि रचयिता निराकार और रचना? रचना साकार। अभी रचयिता का ही पता नहीं है। किनको? इनको। कि रचयिता भी साकार होता है, रचना भी साकार होती है। कुम्हार साकार होगा तो साकार घड़ा की रचना करता है। साकार घड़ा है तो उसका बनाने वाला भी? साकार है। तो रचना का ज्ञान मिले कहाँ से? हँ? अरे भई, घड़ा किसने बनाया, कैसे बनाया, कब बनाया, ये किससे ज्ञान मिले? बनाने वाले से ही मिले। सृष्टि साकार है, साकार सृष्टि का रचयिता भी साकार है, तो ज्ञान कैसे देगा? उसने रची होगी तो ज्ञान देगा।

A morning class dated 2nd April, 1967 was being narrated. The topic being discussed in the last lines of the sixth page on Sunday was – The soul of you children also becomes swadarshan chakradhari, doesn't it? So, it is also swadarshan chakradhari. Why was 'also' added? It is because the number one swadarshan chakradhari is called Vishnu, who, as husband and wife remain one in nature and sanskars from the first birth to the last birth. They are Vishnu in the beginning and then Vishnu in the end as well. Others are numberwise swadarshan chakradharis. Now they are not so. For whoever 'also' was added. It means that when the last period of the purusharth of the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age) comes, then, when the Father enters, then at that time, they become separate in nature and sanskars. Who? The soul that becomes Narayan from nar (man) and the the soul that becomes Lakshmi from naari (woman). There is a world of difference on the path of Bhakti. The night of ignorance and day of knowledge. Then swadarshan chakradhari has been prefixed to Vishnu. We say – No, no, it is the Supreme Soul who is swadarshan chakradhari. Not the Supreme Father? The Supreme Soul, the supreme actor, the hero actor is Sudarshan Chakradhari. The Supreme Father is superior to him. Is there any need for him to rotate the swadarshan chakkar? He is always an awakened light (jaagti jyoti), trikaaldarshi. He never comes under darkness at all.

Seventh page of the Vani dated 2.4.67. Trikaaldarshi, Trimurti, Trinetri – etc. etc.; all these are topics of the path of Bhakti. Achcha, seeing what? Darshi means 'to see'. To see what? Trikaaldarshi. The one who sees past, future, present, all the three aspects of time. Who? Is it the Father of souls or the pleasure-seeking (bhokta) soul among all the souls? All the souls, human souls are pleasure-seeking souls. Among them the hero actor, the Supreme Soul, the supreme actor is Trikaaldarshi. Arey, had he been Trikaaldarshi, then I enter in the end of the end of the many births. So, at that time is he ignorant, is he in darkness or is he in light? That is why that word 'Supreme Soul' is added only after the 'Supreme Father'. Supreme Father Supreme Soul. It is never said – Supreme Soul Supreme Father. For example, it is always said – Shiv-Shankar. It is never said – Shankar-Shiv. Why? It is because the one who is senior is first.

So, we ask them, who gives you this knowledge? Who makes us swadarshan chakradhari? And He keeps on making in every Kalpa. Who makes? Will the maker make if he has become himself or will he make even if he hasn't become? Anyone would say that he should become himself first and then tell others. This is why it has been said – We tell them. Hm? Why is the teller calling himself 'we' (hum)? It is because the bodily being is also a soul and the soul which has entered in him is also present. So, are they two or one? They are two; so, it will be called 'we' only. We,...them. He did not say for Himself. We tell them. It means that there is a part which is going to be played in future. Who gives this knowledge to them? The ones, whose purusharth is going to be completed in future. We tell them, who gives this knowledge? Who keeps on making us sudarshan chakradhari? Who keeps on making? He keeps on making in every Kalpa. Who? The one who is forever Trikaaldarshi. He never comes in darkness. He is called Sadaashiv.

So, first Baba is sudarshan chakradhari, is not he? Chakradhari. The one who holds the chakra. Not the one who makes swadarshan chakradhari. The one who makes you hold the swadarshan chakra. Is it the one who makes you hold or is it the one who holds? It will be said, the one who holds. First Baba is swadarshan chakradhari, is not he? Is Baba the Father or grandfather of souls? Who is swadarshan chakradhari? It will be definitely said, the one who makes Narayan from nar (man), and Shiv, who remains in an incorporeal stage forever enters in that corporeal; so, the combination of corporeal and incorporeal is called Baba. He is a soul, is not it? Hm? The one who is called Baba was not a swadarshan chakradhari earlier. When the purusharth becomes complete, then he becomes swadarshan chakradhari. So, when he became sudarshan chakradhari, then he will be called the Supreme Soul. The supreme actor. But it is a soul which makes purusharth. Later on he makes you. What is meant by 'later on'? First he himself becomes sudarshan chakradhari by making purusharth. Later on he makes you. Now the same soul becomes. What? Does the soul become? Does the soul get destroyed? Does the soul get created and destroyed? It is not created or destroyed. But it has forgotten its form.

In order to remind that only it was told that you have to practice spiritual awareness. Those who remain in body consciousness, those who remain in the awareness of the body always are reminded of soul by the one who always remains in a soul form, remains in swasthiti. So, that soul becomes swadarshan chakradhari. The soul itself is swadarshan chakradhari. Hm? It is not as if the Supreme Father is swadarshan chakradhari. Your soul also becomes swadarshan chakradhari. Why was 'also' added? Hm? The soul of this one also becomes swadarshan chakradhari. Whose? The one who is sitting beside and listening. He is listnening beside whom? Father Shiv enters in Dada Lekhraj Brahma, doesn't He? He enters and speaks this Brahmavaakya, Vedvani. So, it was said that yours also; He caused those sitting in the front to emerge and said to them – Your soul also becomes swadarshan chakradhari. That of this one also becomes. So, this one will definitely become. So, He will come in a human being and give knowledge, will He not? Definitely this one, the souls which have to be given Goldly message and make his subjects, he will enter in those subjects category souls and give knowledge to him, will he not?

So, now your soul has knowledge. The soul of this one does not have knowledge. Your soul has knowledge when you are in a human (manushya) body. The one who thinks and churns is called a human being. Why does the soul of this one doesn't have knowledge? Why is not there knowledge in this one, i.e. the soul of Brahma? It is because; is he not a human being? Hm? Does he think and churn? When he does not think and churn at all, then is he a human being? Mananaat manushya (the one who thinks is a human being). So, will it be said that he is an animal? Is he like an animal or is he a human being? Hm? What will he have to become first? Hm? First he will have to become a grown-up child who thinks and churns. He is now a minor child, is not he? He cannot think and churn deeply. So, your soul has knowledge because you can think and churn over knowledge. This one has a child like intellect; so, it is as if he has an animal like intellect. Thinking and churning cannot take place in his intellect. There is knowledge in Baba; but if He doesn't come in a human body, how can He give knowledge? It is because, does the soul remain inert in the Supreme Abode or does it remain alive? It remains inert. So, He can give knowledge when He comes in a human body.

So, there is knowledge in Baba. Who was called Baba? He is a combination of corporeal and incorporeal; so, what will he be called? Baba. Who gives the knowledge of the beginning, middle and end of the creation? Hm? Creation. Who is the first and foremost creation? Trimurti. Brahma, Vishnu and Shankar. Who gives the knowledge of all these three? The knowledge of their beginning, the knowledge of their middle and the knowledge of their end as well. Who gives? Hm? Creation. The one who gives the knowledge of the beginning, middle and end of the creation should be Trikaaldarshi forever. But what does He give? Yes. He gives only knowledge. He is the incorporeal soul; He is the Father of the incorporeal souls; so, will He give incorporeal inheritance or corporeal inheritance? He will give incorporeal inheritance only. So, it is the Supreme Soul who gives the knowledge of this human world and the creation of this human world, human beings, all the living beings, and the beginning, middle and end of this creation is Trikaaldarshi. But the Creator will give; who else will give? Will the creator be in practical, corporeal or incorporeal? He will be corporeal. So, He will come in corporeal form and give. Otherwise, who else will give? Will the incorporeal give? The incorporeal one doesn't have a mouth at all; so, how will He give knowledge? Mouth is required to give knowledge.

It is sung that this one does not have the knowledge of the creator and the creation. Who? Brahma. He does not have knowledge. He doesn’t have knowledge of what all things? Neither does he have the knowledge of the creator Father that who is his Father and nor does he have the knowledge of His creatoin. He does not know as to who is my Father, who is the Father of this human world? And how this human world is his creation? When the creation is corporeal, then the creator should also be corporeal. And what does this one think? That the creator is incorporeal and the creation is also corporeal. Now he does not know about the creator at all. Who? This one. That the creator is also corporeal and the creation is also corporeal. When the potter is corporeal, then he creates a corporeal pot only. When the pot is corporeal, then its maker is also corporeal. So, from where can we get the knowledge of the creation? Hm? Arey, brother, who made the pot, how did he make it, when did he make it? From whom can we get this knowledge? It will be received from the maker only. When the world is corporeal, then the creator of the corporeal world is also corporeal; so, what kind of a knowledge will he give? He will give the knowledge if he has created it.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

Post Reply

Who is online

Users browsing this forum: No registered users and 6 guests