Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 23 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2434, आडियो 2920, दिनांक 20.2.18
VCD 2434, Audio 2920, dated 20.2.18
प्रातः क्लास 2.4.1967
Morning class dated 2.4.1967
VCD-2434-Bilingual

समय- 0.01-23.05
Time- 0.01-23.05


प्रातः क्लास चल रहा था – 2 अप्रैल, 1967. रविवार को सातवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – सृष्टि के आदि, मध्य, अंत को कौन जानते हैं? इस सृष्टि की पालना कैसे हुई? मरे कैसे? तो ये सब बातें बाप तो जानते हैं ना। इस सृष्टि में भी उत्पत्ति कैसे होती है, पालना, फिर सारी सृष्टि का विनाश कैसे होता है, तो ये तो उनको मालूम ही है ना। तो बरोबर गाते भी हैं कि शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते। सो मालूम किसको पड़ा? अरे, तुम कह सकते हो। बाकी दूसरे को कोई को थोड़ेही ये ज्ञान है। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं। ‘करते हैं’ यानी करनकरावनहार है। दोनों बातें हैं। करने वाला भी है कर्ता। और कराने वाला भी है। कर्ता या अकर्ता? कहेंगे कर्ता। फिर जो करता है वो कराता भी है। तो तुमको भी कहते हैं – तुम भी ये सीखो। और दूसरों को सिखाओ। क्या? कि करना भी है और कराना भी है। तुम भी करनकरावनहार बनो। समझा ना। सर्विस करो भी, खुद सीखो भी, पढ़ो भी और पढ़ाओ भी। उसको कहा जाता है करन-करावनहार। तो बाप भी आकरके पढ़ाते हैं। और फिर कहते हैं पढ़ाओ। कौनसा बाप? आत्माओं का बाप आकर कहते हैं। पढ़ो और पढ़ाओ।

फिर ये स्वदर्शन चक्रधारी भी सुना। कौन? हँ? शिवबाबा? तुमको किसने बनाया? हँ? हँ? तुमको अर्थात् सन्मुख बैठने वाले बच्चों को किसने बनाया? अब ये सभी बातें तुम बच्चे सुनते हो। शिवबाबा द्वारा सुनते हो कि मैं ही देखो हूँ ना बरोबर। तुमको समझाया ना। कि मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ। स्वदर्शन? स्व माने आत्मा, दर्शन माने देखना। चक्र में आत्मा को देखना। 84 का चक्र है ना। और वो ये ही सृष्टि के चक्र का मालूम है। तभी तो मैं तुम बच्चों को इतना कहता हूँ कि तुम 84 जन्म कैसे लेते हो? अभी बताओ। ये 84 जन्म की कहानी तुम जानते हो? ये कहानी तो जरूर याद रखनी चाहिए कि हम चक्रधारी हैं। अच्छा, यही बात याद करते रहें तो चक्रवर्ती राजा तो बन सकते हैं ना। और फिर ये याद करें, चक्रवर्ती राजा बनें। ये हो गया जैसे ज्ञान।

ज्ञान और फिर योग। जिससे ये पाप कट हो जावें। जिसे ये बाबा कहते हैं – अपने दिल की देखो। अभी अपने दिल में देखते रहो। 2.4.67 की वाणी का आठवां पेज। शाम को बैठकरके, सारे दिन में तुम क्या करते हो, अपना पोतामेल निकालो। समझा ना। कई ये पोतामेल तो निकाल भी सकेगा नहीं। निकालेगा क्या? धूल भी नहीं निकालेगा। छाईं भी नहीं। तो पोतामेल क्या लेंगे? कब याद ही नहीं करते हो, तो क्या लिख देंगे? निल। जब भी सभा में बाबा बैठाते हैं, सभी कहते हैं शिवबाबा की याद में बैठते हो? तो बस शिवबाबा की याद में। जैसे दूसरे मनुष्य बैठते हैं भगत, शिव बड़ा और जैसे है बस ऐसे वो शिव-3 में अंदर में शिवबाबा की याद करते हैं। किसकी बात बताई? भक्तों की बात बताई क्योंकि भक्त लोग तो बड़ा लिंग देखते हैं। तो याद में रहना है। मूल बात। पहले नंबर की बात है। और याद भी कैसी? अव्यभिचारी याद चाहिए। बीच-बीच में दूसरे कोई की भी याद न आए। बड़ी डिफिकल्ट अव्यभिचारी याद चाहिए।

वो तो हुई पूजा की बातें भक्तिमार्ग की। सो भी द्वापर के आदिकाल में देखो अव्यभिचारी पूजा सिर्फ शिव की। उसको ही कहा जाता था अव्यभिचारी पूजा। पीछे व्यभिचारी। क्यों? कारण क्या हुआ? क्योंकि देहभान में रहकर अनेकों के संग के रंग में आए। तो वो याद आते हैं। अभी अपने दिल से पूछे – कि सारे दिन में कितनों को याद करता हूँ? मतलब अव्यभिचारी याद है हमारी? अभी तो हो गई याद की बात कि हम कितना समय अव्यभिचारी याद में रहता हूँ? उसके लिए उसका ओना चाहिए। कितना समय हमको मित्र-संबंधी याद पड़ते। फलाना याद पड़ते। ये टीरा याद पड़ते हैं। तो याद पड़ते हैं, तो ये नॉलेज कैसे याद रह सकती है। फिर तो जो याद पड़ते हैं उन्हीं की बातें याद आएंगी। और ये नॉलेज, ये तो एक से ही मिलती है। तो एक की अव्यभिचारी याद कैसे आएगी?

तो नॉलेज भी याद रखनी है बच्ची और पाप भी कटने हैं। देखो, कितना समझाता हूँ बैठे-बैठे। बुद्धि में नहीं बैठता है बच्ची। पाप का ऐसा कोई, पाप का घड़ा भरा पड़ा है बिल्कुल ही। भगवानुवाच है – बच्चे ये मत करो। बोलते हैं – हम क्या करें? परवश हैं। यानी माया के वश हैं। बस साफ कह देते हैं – हम क्या करें? परवश यानी माया के वश। अच्छा, चलो तो माया के वश तो है ही सारी दुनिया। तो चलो माया के वश ही रहो। या तो श्रीमत पर चलना है या तो अपनी मत पर। अपनी मत पर, माया की मत पर तो उनकी कोई मिट्टी पलीत हो जाती है।

चलो बच्ची टोली ले आओ। ये याद रखो, पहले-पहले हम स्कूल चिल्ड्रेन हैं। हमारा सारा मदार है पास, नापास 21 जन्म के लिए। ये कोई एक जन्म की बात नहीं है। ऐसे इसलिए नहीं है – ये भविष्य 21 जन्म की बात है। दिल से पूछो हम कहाँ तक पास होंगे? और उस अनुसार क्या पद हमको मिलेगा? बिल्कुल बड़ी कमाई है। सारा मदार है 21 जन्म। फायदा या घाटा 21 जन्म? मनुष्य तो एक-एक दिन का फायदा घाटा निकालते हैं। और यहाँ है 21 जन्म की बात। तुम तो बड़ी अच्छी थक जाती हो।

मध्य और अंत, राइट टू लेफ्ट। ये गीत है ना बच्ची। मैं सारा उस गीत के ऊपर समझाय रहा हूँ। ये अपने अन्दर में जांच पहनो – लायक हो? क्योंकि भक्तों को पढ़ाते हैं ना बाबा। पढ़ाकर ज्ञानवान बनाते हैं। पहले तो भगत थे ना। अभी यहाँ आये हो ज्ञान सीखने के लिए। भक्ति सीखते थे तो क्या अंतर था? और यहाँ आए ज्ञान सीखने के लिए तो क्या अंतर हुआ? हँ? भक्ति है अनेकों की बात। ज्ञान है एक से। तो ज्ञान भरपूर होता जाएगा। भक्ति निकल जाती है। ऐसे है ना। देह अभिमान को ही फिर भक्ति कर देंगे। इसलिए आत्मा अभिमान चाहिए। इतनी सी बात है। क्योंकि वो तो पिछाड़ी तक भी भक्ति। हँ? जब तक जीना है; कब तक पीना है? जब तक देहभान में जीते हैं, तब तक पीना है। देहभान खतम, आत्माभिमानी बने, तो देवता बन गए। तो पिछाड़ी तक भक्ति क्योंकि जब कर्मातीत अवस्था में आएंगे, कर्मों का कोई लेप-छेप न लगे, कर्मों के फल प्राप्त करने से अतीत हो जाएँ, परे हो जाएं; भक्ति नाइट। भक्ति की दुनिया ही खत्म हो जाएगी। पीछे देह अभिमान का नाम भी नहीं रहेगा। बिल्कुल ही नहीं रहेगा। हँ?

भक्ति कब तक चलेगी? जब तक भक्ति की दुकान चलेगी, भक्ति की दुकान के बीच में हम रहेंगे, तो भक्ति के संस्कार का संग का रंग लेते रहेंगे। फिर देह अभिमान का नाम निशान नहीं। सब-3 प्योर हो जाएंगे। जाने का है ना ऊपर में। कौन सब प्योर हो जावेंगे? हँ? जो देवताओं को जन्म देने वाले हैं, वो भी प्योर हो जाएंगे। देवात्माएं भी प्योर हो जावेंगी और इस आसुरी दुनिया के भी सब प्योर हो जावेंगे। जाने का सबको ऊपर में है। तो प्योर ऊपर जाना है ना। सबको जाना है। ये देह अभिमान का बोझ लेकर जाना है? तो समझानी के लिए अभी समझाते जाते हैं कि भई देही अभिमानी बनो। तुम्हारा जो विकर्म है ना; जो कर्म करना चाहिए उसके विपरीत कर्म, पाप कर्म विनाश हो जाए। मनमनाभव का तो अर्थ है ना बच्ची – मेरे मन में समा जा। आत्मिक स्थिति में समा जा। तो देहभान ही खतम, तो पाप कर्म कहाँ से होगा?

तो ये कोई नई बात नहीं बताते हैं बाबा। मनुष्य अर्थ नहीं समझते हैं। बाबा अर्थ पूरा एकदम पाई पैसे का अर्थ है। मनमनाभव माना भी लिखा हुआ है। मामेकम याद करो। और कोई याद आया तो मनमनाभव तो नहीं हुआ। तो अभी किसको मामेकम याद करो? कौन कहता है मुझ एक को याद करो? आत्माओं का बाप कहता है मुझ एक को याद करो या साकार निराकार का मेल कहता है मुझ एक को याद करो। निराकार भी व्यक्तित्व तो तब बनता है जब साकार में प्रवेश करे। ऐसा कोई भी नहीं है जो सिर्फ कृष्ण को याद करता हो। हँ? राधा भी नहीं है? उसकी आत्मा भी रजोप्रधान बनेगी तो कर्मेन्द्रियों की दुनिया में आवेगी ना। जो गीता वाले खुद भगवान को याद करते हैं। गीता का मिसाल क्यों दिया? हँ? जो सच्ची गीता है वो ही राधा है। तो कृष्ण तो भगवान हुआ ही नहीं। इसलिए जहाँ-जहाँ गीता का बहुत प्रचार हो ना, वहाँ। तो शान्ति निकेतन में भी गीता। ये बनारस में भी तो वो है। वहाँ भी गीता। जहाँ भी गीता का होवे वहाँ जाकरके थोड़ा समझाना चाहिए। क्यों? क्योंकि गीता पाठी जल्दी समझेंगे। वो भक्तिमार्ग की गीता। और ये? ज्ञान मार्ग की गीता। भक्तिमार्ग की गीता मनुष्यों ने लिखी। भक्तिमार्ग की टीकाएं भी भिन्न-भिन्न मनुष्यों ने लिखी और यहाँ तो एक ही सच्ची गीता है। वो भगवान बताते हैं, गीता का भगवान। गीतापति भगवान। पति रचयिता हुआ, गीता रचना हुई। अच्छा मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चों प्रति यादप्यार और गुडमार्निंग। ओमशान्ति। (समाप्त)

A morning class dated 2nd April, 1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the seventh page on Sunday was – Who knows the beginning, middle and end of the world? How was this world sustained? How did they die? So, the Father knows all these topics, doesn't He? How does generation take place in this world, how it is sustained and then how the entire world is destroyed; so, He alone knows this, doesn't He? So, definitely it is also sung that ShivBaba causes establishment through Brahma. So, who came to know? Arey, you can say. Others do not have this knowledge. ShivBaba establishes through Brahma. 'Establishes' means that He is the doer and enabler (karankaraavanhaar). There are both the topics. He is the doer (karta) also who does. And He is also the enabler. Doer or non-doer (akarta)? It will be said – doer. Then, the one who does enables as well. So, He tells you also – You too learn this. And teach others. What? That you should do as well as enable others to do. You should also become karankaraavanhaar (doer-enabler). Did you understand? Do service also, do learn yourself, do study and teach as well. Such a person is called karan-karaavanhaar. So, the Father also comes and teaches. And then says – Teach. Which Father? The Father of souls comes and says. Study and teach.

Then you heard about this swadarshan chakradhari as well. Who? Hm? ShivBaba? Who made you? Hm? Hm? Who made you, i.e. the children who are sitting face to face? Well, you children listen to all these topics. You listen through ShivBaba that look, it is Me alone, definitely. You were explained, weren't you? That I am a swadarshan chakradhari. Swadarshan? Swa means soul; darshan means ‘to see’. To see the soul in the cycle (chakra). It is a cycle of 84 [births], is not it? And He knows about this world cycle only. Only then do I tell you children so much that how do you get 84 births? Now tell. Do you know this story of 84 births? You should definitely remember this story that we are chakradharis. Achcha, if you continue to remember this, then you can become Chakravartin Kings, cannot you? And then you should remember this; become Chakravartin Kings (the one who conquers the four directions). This is like knowledge.

Knowledge and then Yoga through which these sins can be cut. Baba says – Look into your heart. Now keep on looking into your heart. Eighth page of the Vani dated 2.4.67. Sit in the evening and draw the potamail (account) of whatever you did throughout the day. Did you understand? Many will not be able to write potamail as well. Will they write? They will not be able to write even partially. Not even a trace. So, what potamail will they write? When you never remember at all, then what will you write? Nil. Whenever Baba makes you sit in the gathering, everyone says – Do you sit in ShivBaba's remembrance? So, just in ShivBaba's remembrance. Just as other human beings, the devotees sit; Shiv is big and they keep on remembering ShivBaba uttering 'Shiv, Shiv, Shiv' inside. Whose topic was mentioned? A topic of the devotees was mentioned because the devotees see the big ling. So, you have to remain in remembrance. It is about the first number. And how should the remembrance also be? Remembrance should be unadulterated (avyabhichaari). You should not even remember anyone else in between. Very difficult unadulterated remembrance is required.

So, those are the topics of worship on the path of Bhakti. That too, look at the early period of the Copper Age, the unadulterated worship of Shiv alone. That alone used to be called avyabhichaari worship. Later on it became vyabhichaari (adulterated). Why? What was the reason? It is because they got coloured by the company of many while being in body consciousness. So, they come to the mind. Now ask your heart – How many people do I remember throughout the day? I mean, is our remembrance avyabhichaari? Now it is about remembrance that how long do I remain in avyabhichaari remembrance? For that one should worry about that. How long do I remember the friends and relatives or someone else or someone else? So, when they come to the mind, then how can this knowledge remain in our memory? Then the utterances of whoever comes to the mind will come to your mind. And this knowledge is received only from one. So, how will the unadulterated thoughts of one come to the mind?

So, you should remember the knowledge also daughter and you should cut the sins as well. Look, I sit and explain so much. It does not sit in the intellect daughter. It is as if a pot of sins is completely full. God says – Children, don't do this. They say – What should we do? We are under others' control (parvash). It means that they are under the control of Maya. They say clearly – What should we do? Parvash means under the control of Maya. Achcha, okay the entire world is under the control of Maya. So, okay, you may remain under the control of Maya only. Either follow the Shrimat or follow your own opinion. If someone follows his/her own opinion or Maya's directions, then they will be ruined.

Okay daughter, bring toli (sweets). Remember, first of all we are school children. Our entire focus is to pass or fail for 21 births. This is not about one birth. It is not so because – this is about future 21 births. Ask your heart – how far will we pass? And accordingly which post will we receive? It is a very big income. The entire focus is on 21 births. Gain or loss for 21 births? People calculate profit or loss for every day. And here it is about 21 births. You get tired a lot.

Middle and last; right to left. This is the song daughter, is not it? I am explaining everything on that song. Check within yourself first – Are you worthy? It is because Baba teaches the devotees, doesn't He? He teaches and makes them knowledgeable. Earlier you were devotees, weren't you? Now you have come here to learn knowledge. What was the difference when you were learning Bhakti? And what is the difference when you have come here to learn knowledge? Hm? Bhakti is about many. Knowledge is from one. So, knowledge will go on fulfilling. Bhakti is removed. It is so, is not it? Body consciousness will be converted to Bhakti. This is why soul consciousness is required. It is as simple as that because that Bhakti continues till the end. Hm? As long as you live; how long do you have to drink? As long as you are alive in body consciousness, you have to drink. When the body consciousness ends, when you become soul conscious, then you become deities. So, Bhakti continues till the end because when you achieve karmaateet stage, when you will not be affected by the actions, when you cross the stage of receiving the fruits of actions; Bhakti is night. The world of Bhakti itself will end. In the end there will not even be the name of body consciousness. It will not remain at all. Hm?

How long will Bhakti continue? As long as the shop of Bhakti runs, as long as we live amidst the shop of Bhakti, we will keep on getting coloured by the company of the sanskars of Bhakti. Then there will not be any name or trace of body consciousness. All will become pure. You have to go above. Who all will become pure? Hm? Those who are going to give birth to deities will also become pure. The deity souls will also become pure and everyone in this demoniac world will also become pure. Everyone has to go above. So, you have to go above in a pure form, will you not? Everyone has to go. Do you have to carry the weight of this body consciousness? So, for the sake of explanation, it is now explained that brother, become body conscious. Your sins (vikarma), aren’t they? Actions that are opposite to what you should perform; such sinful actions should be destroyed. Daughter, the meaning of manmanaabhav itself is – Merge into My mind. Merge into soul conscious stage. So, the body consciousness itself will end; then where will the sins emerge from?

So, Baba does not narrate a new topic. People don't understand the meaning. Baba, the meaning is very simple. The meaning of Manmanaabhav has also been written. Remember Me alone. If anyone else comes to your mind, then it is not Manmanaabhav. So, who alone should you remember? Who says – Remember Me alone? Does the Father of souls say remember Me alone or does the combination of corporeal and incorporeal say remember Me alone? The incorporeal also becomes a personality when He enters in a corporeal. There is no one who remembers just Krishna. Hm? Not even Radha? When her soul also becomes rajopradhan, then it will enter the world of organs of action, will she not? The readers of Gita remember God themselves. Why was the example of Gita given? Hm? The true Gita herself is Radha. So, Krishna is not God at all. This is why wherever there is a good publicity of the Gita; so, the Gita in Shanti Niketan also. That is there in Banaras (Varanasi) also. There is Gita there as well. Wherever there is a programme on Gita, you should go and explain a little. Why? It is because the readers of Gita will understand quickly. That Gita of the path of Bhakti. And this one? This is the Gita of the path of knowledge. The Gita of the path of Bhakti has been written by the human beings. The commentaries of the path of Bhakti were also written by different human beings and here, there is only one true Gita. That God says, the God of Gita. God, the Lord of the Gita (Gitapati Bhagwaan). The husband is the creator; the Gita is the creation. Achcha, remembrance, love and good morning to the sweet-sweet, long lost and now found (seekiladhey) children. Om Shanti. (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 25 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2435, आडियो – 2925, रात्रि क्लास 5.4.1967
VCD 2435, Audio 2925, Night class 5.4.1967
VCD-2435-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-18.21
Time- 00.01-18.21


आज का रात्रि क्लास है – 5 अप्रैल, 1967. तो तुम बच्चे जानते हो कि अभी राम वो नहीं। कौनसा? त्रेता वाला। राम उनको भी कह देते हैं। वास्तव में वो राम की बात नहीं है। वो तो 14 कला संपूर्ण है। दो कलाएं कम हो गईं। तो अभी कौनसे राम की बात है? राम किसे कहा जाता है? राम का अर्थ क्या है? रम्यते योगिनो यस्मिन इति रामः। योगी लोग जिसमें रमण करते हैं, खुश होते हैं, ज्ञान रतनों से खेल खेलते हैं, उस राम की बात है। तो क्या त्रेता वाला राम ज्ञान रतनों से खेल खिलाता है? नहीं। ये तो संगमयुगी राम की बात है। जैसा काम वैसा नाम। क्या काम किया? जो बाप के योगी बच्चे हैं, उन बच्चों को रमण कराता है, ज्ञान रत्नों से खेल खिलाता है। तो वो हुआ इस ब्रॉड ड्रामा का जो शूटिंग पीरियड है, ब्रॉड ड्रामा होने से पहले रिहर्सल का टाइम है ड्रामा का, उस टाइम को कहा जाता है सतयुग और त्रेता का संगम। नहीं, सतयुग और कलियुग का संगम। कलियुग का अंत और सतयुग का आदि। उस टाइम पर जो योगी बच्चों को ज्ञान में रमण कराने वाली आत्मा है, वो आत्मा है सभी आत्माओं का बाप, सुप्रीम सोल शिव। वो ही रमण कराता है। ज्ञान रत्नों से खेल खिलाता है। जिसमें प्रवेश करते हैं वो खेल खिलाने वाला है क्या? हँ? वो तो पत्थरबुद्धि बन जाता है। वो क्या खेल खिलाएगा? तमोप्रधान बन गया।

तो सदा सात्विक रहने वाली आत्मा शिव, वास्तव में उनका नाम कभी बदलता भी नहीं है। वो शिव ही उनकी बिन्दी का नाम है, आत्मा का नाम है, और जितने भी नाम होते हैं वो शरीरधारियों के होते हैं। तो राम नाम भी कोई शरीरधारी है आत्मा जो त्रेता में 14 कला संपूर्ण राम थी, क्षत्रीय राजा राम, क्षात्र तेज वाला। वो सीढी के चित्र में देखो ध्यान से लक्ष्मी-नारायण के ऊपर छत्रछाया है? नहीं। और राम के ऊपर देखो। सीढी के चित्र में ध्यान से देखो। छत्रछाया है। इससे क्या साबित हुआ? जिसके ऊपर छत्रछाया है ऊँचे ते ऊँचे बाप की वो कौन हुआ? क्षत्रीय, क्षात्र तेज वाला। क्यों? क्षत्रीयों का काम क्या होता है? हँ? मोस्टली राजाएं कौनसे, कौनसी जाति के राजाएं बने? ब्राह्मण धर्म वाले राजाएं थोड़ेही बने। क्षत्रीय ही राजाएं बने। क्यों? राजा वो बनते हैं, जो युद्ध में जीत पाते हैं। हार जाएं तो राजा थोड़ेही बनेंगे। तो युद्ध करने वाले को क्षत्रीय कहा जाता है। कैसा युद्ध? युद्ध करते-करते भाग जाने वाला नहीं। क्या? युद्ध करते-करते भाग जाने वाला भी नहीं और शरीर छोड़ जाने वाला भी नहीं। युद्ध करते-करते जीत पाने वाला। क्यों? उसकी सदा विजय होती है जिसके ऊपर ऊँच ते ऊँच बाप की छत्रछाया है।

कौन है ऊँच ते ऊँच बाप? आत्माओं का बाप, सुप्रीम सोल, हैविनली गॉड फादर जिसे कहते हैं, परन्तु वो क्रिश्चियन्स तो जानते ही नहीं हैं कि निराकार ज्योतिबिन्दु हैविन की रचना करने वाला नहीं है। हेविन तो साकार है। साकार का रचने वाला साकार ही होगा ना। तो वो निराकार आत्माओं का बाप, आत्माएं भी निराकार, तो बाप भी निराकार। वो जब कोई साकार मनुष्य तन में प्रवेश करता है, ऐसी साकार आत्मा, मनुष्यात्मा, जो सारी मनुष्य सृष्टि का बाप है, बीज है। उसमें प्रवेश करके ज्ञान देता है। ज्ञान को ज्ञान रतन कहा जाता है। तो ज्ञान रत्नों से तुम बच्चे खेलते हो। तो प्रैक्टिकल में खिलाने वाले उस संगमयुगी राम को राम कहा जाता है। त्रेतायुग का राम कोई ज्ञान रत्नों से खिलाता थोड़ेही है।

तो राम यानी बाप आकरके तुम बच्चों को वशीकरण मंत्र देते हैं। कौन बाप? आकरके। आते हैं। आने वाला बाप। कहाँ से आते हैं? आत्माओं का बाप आत्मलोक, जिसे सुप्रीम एबोड कहा जाता है। मुसलमान लोग अर्श कहते हैं। खुदा अर्श में रहता है, फर्श में नहीं रहता। और हिन्दू लोग परमधाम कहते हैं। परमपिता का घर। तो वहाँ से आने वाला बाप, वो है आत्माओं का बाप। वो आत्मलोक से आता है। वो आत्माओं का बाप शिव ज्योतिबिन्दु, वो आकरके तुम बच्चों को वशीकरण मंत्र देते हैं। क्या कहा? तुम बच्चों को। तुम किसे कहा जाता है? सन्मुख बैठने वालों को तुम कहा जाता है, जिन्होंने सन्मुख बैठकरके समझा, सुना और प्रैक्टिकल में चलते भी हैं। तो उनसे कहा तुम बच्चे। बोला भी है मैं तुमको सुनाता हूँ। ये तो बीच में सुन लेता है। तो किसको सुनाया जाता है? जो काम पूरा करके दिखाए उसको सुनाया जाता है। काम ही पूरा करके न दिखाए, क्योंकि समझा ही नहीं, तो ‘ये’ कहके जो इशारा करते हैं, ये ब्रह्मा और उसके फालोअर्स, कुख वंशावली, जो ब्रह्मा की गोद का सुख लेते रहे। जो ब्रह्मा की गोद की ही व्याख्या करते हैं वो बच्चे और ब्रह्मा भी, इनके लिए बोला ‘यह’, जो बाजू में बैठते हैं।

तो उनको वशीकरण मंत्र नहीं देते हैं। क्या? कैसा मंत्र? वशीकरण। वश में करने वाला। क्या? योगबल से कोई भी आत्माओं को कंट्रोल कर सकते हो। योगबल है वायब्रेशन की ताकत। क्या? जो आत्मा सारे विश्व के ऊपर कंट्रोल करने वाली है, उसको भी वश में कर सकते हैं। बताओ, दुनिया में कोई आत्मा है जो सारे विश्व को कंट्रोल करती हो? कोई आत्मा ऐसी है इस संसार में जो सारी दुनिया की आत्माओं को वश में कर लेती है? कोई है या नहीं है? कौन है? आदमी है कि औरत है? आदमी बड़ा होता है। औरत थोड़ी छोटी होती है। कौन है? बड़ा आदमी है या छोटा है? हँ? हाँ। पुरुष जितने होते हैं वो सब दुर्योधन-दुःशासन होते हैं। तो दुर्योधन-दुःशासन है या कन्याओं-माताओं में से कोई है? हँ?

तो बोला – जगदम्बा। क्या? जिसको सिक्खों ने कहा है राज करेगा खालसा। कौन राज्य करेगा सारी दुनिया के ऊपर जब विनाश होगा? खालसा राज (करेगा)। खालिस क्यों कहा? खालिस इसलिए कहा कि वो ही आत्मा है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, मनुष्य सृष्टि के बाप का बच्चा एकमात्र जो सारी दुनिया की मनुष्यात्माओं को कंट्रोल कर लेती है। तो फिर वो जगदम्बा के लिए बोला गया है। वैसे भी देखा जाए अगर वसुधैव कुटुंबकम् है तो बाप तो बीजरूप है। उसकी तो बात ही छोड़ो। बाकी पूरे परिवार को, सारे कुटुम्ब को कौन कंट्रोल करती है? माँ ही तो कंट्रोल करती है। तो वो जगदम्बा स्त्री है या पुरुष है? हँ? क्या है? स्त्री है। चोले से तो स्त्री है। फिर सिक्खों ने ऐसे क्यों कह दिया – राज करेगा खालसा? खालसी कहना चाहिए। स्त्री कहना चाहिए। लेकिन सिक्ख लोगों को भी ये ज्ञान हो जाता है कि इस मनुष्य सृष्टि में, जब नई सृष्टि रची जाती है तो पहले-पहले जो आत्मिक स्थिति में स्थित बच्चे होते हैं, वो बाप के बच्चे हैं बड़े। उनको कहा जाता है रुद्राक्ष की माला। क्या? जो रुद्र की अक्ष माने आँखें हैं। सारे संसार का सारा समाचार महाविनाश के टाइम पर रुद्र को देते हैं कि इस क्षेत्र में ऐसे हुआ, उस क्षेत्र में वैसे हुआ, उस क्षेत्र में वैसे। दसों दिशाओं का सारा हाल देते हैं।

तो उन बच्चों को कंट्रोल करने वाली आत्मा संगमयुग की अंतिम टाइम पर भी 500-700 करोड़ मनुष्यात्माओं को जो बच्चे के रूप में हैं, मनुष्य सृष्टि के बाप के बच्चे, उन सबको वश में कर लेती है, ऐसा पक्का उसे वशीकरण मंत्र याद है। क्या मंत्र है? मंत्र है – मुझे याद करो। मामेकम्। मुझ एक को याद करो। अब एक को याद करो का मतलब क्या है? आत्माओं के बाप को याद करो बिन्दु को? अरे, बिन्दु-4 चींटी की आत्मा, हाथी की आत्मा, मनुष्य की आत्मा, राक्षस की आत्मा, देवता की आत्मा, कौनसी आत्मा? कैसे पता चलेगा बिन्दी आत्मा? कौनसी बिन्दी को याद करें? इसलिए बताया कि वो सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु जिस मुकर्रर साकार शरीर में प्रवेश करती है; क्या? और कोई में मुकर्रर रूप से प्रवेश नहीं करती। टेम्पररी प्रवेश करेगी नंबरवार। लेकिन जिस रथ में मुकर्रर रूप से प्रवेश करती है, आदि से लेकरके अंत तक उस रथ की बात है। वो रथ को ही भागीरथ कहा है शास्त्रों में। भाग्यशाली रथ। कैसा रथ? भाग्यशाली रथ। मरने वालों को भाग्यशाली रथ कहेंगे? हँ? जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर महाविनाश में मर जाए वो भाग्यशाली रथ हुआ? नहीं।

ये तो सिक्ख लोग भी जानते हैं। अकालमूर्त। कैसी मूर्ति? अकाल। जिसको काल खा नहीं सकता। तो सारी दुनिया को खा जाएगा वो मूर्त, वो रथ, लेकिन उसको कोई खा नहीं सकेगा। वो है मनुष्य सृष्टि का बाप। हद की मृत्यु भी नहीं होती और बेहद की मृत्यु भी नहीं होती यानी संशयबुद्धि। वो कभी अनिश्चयबुद्धि नहीं बनता। हाँ, जगदम्बा अनिश्चयबुद्धि बनती है। लेकिन उसमें शिफ्थ क्या है? उसमें शिफ्थ ये है कि वो उस मुकर्रर रथ को याद ही करती रहती है। वो याद उससे छूटती नहीं। कारण? कारण ये है कि कन्या के ऊपर जिस पुरुष की पहली-पहली छाप पड़ती है, ठप्पा लगता है, कन्या उसे जीवनभर भूल नहीं पाती। एक तो ये। और दूसरी बात, लम्बे समय तक वो मनुष्य सृष्टि के बीज रूप बाप के संग में रहती है, साथ रहती है। तो संग का रंग लगेगा कि नहीं लगेगा? और थोडे बहुत समय, लम्बे समय तक रहे, वो भी नहीं। उससे ज्यादा लंबे समय का इन्द्रियों का साथ, दृष्टि का साथ, ज्ञानेन्द्रियों या कर्मेन्द्रियों का साथ कोई भी नहीं निभाय पाता। उसके मुकाबले सब अल्पकाल में रहते हैं। बुद्धि से भी नहीं कि मन-बुद्धि से रहें। क्योंकि शिव बाप कहते हैं ब्रह्मा के मुख से वेदवाणी में कि मुझे बिन्दु रूप में, सूक्ष्म रूप में, सूक्ष्म रूप में नहीं याद कर सकते हो तो कोई बात नहीं। क्या करो? मेरा जो बड़ा आकार, रूप है जिसमें मैं प्रवेश करता हूँ उस लिंग को याद करो। माने उसकी कर्मेन्द्रियाँ याद न आएं। लेकिन देह जरूर याद आए।

Today's night class is dated 5th April, 1967. So, you children know that it is not that Ram now. Which one? The one from the Silver Age. He too is called Ram. Actually, it is not about that Ram. He is perfect in 14 celestial degrees. Two celestial degrees were reduced. So, it is about which Ram now? Who is called Ram? What is the meaning of Ram? Ramyate yogino yasmin iti Ramah. The one in whom the Yogis wander, become happy, play with the gems of knowledge, it is about that Ram. So, does the Ram of Silver Age make you play with the gems of knowledge? No. It is about the Confluence Age Ram. As is the task, so is the name. Which task did he perform? He entertains the yogi children of the Father, makes them play with the gems of knowledge. So, he is; the shooting period of the broad drama, the time for rehearsal before the broad drama, that time is called the confluence of the Golden Age and Silver Age. No, the confluence of the Golden Age and the Iron Age. The end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age. At that time, the soul which entertains the yogi children through knowledge is the Father of all souls, the Supreme Soul Shiv. He Himself entertains. He makes you play with the gems of knowledge. Does the one in whom He enters makes you play? Hm? He develops a stone-like intellect. Which game will he make you play? He became degraded (tamopradhan).

So, the soul Shiv, who remains pure forever, actually His name never changes. Shiv is the name of His point, His soul; all other names are those of the bodily beings. So, there is an embodied soul named Ram, who was Ram perfect in 14 celestial degrees, Kshatriya King Ram, with the glow of Kshatriyas (kshaatra tej). Look at the picture of the Ladder carefully; is there a canopy (chatrachaya) over Lakshmi-Narayan? No. And look above Ram. Look carefully at the picture of the Ladder. There is a canopy. What does it prove? Who is the one who has the canopy of the highest on high Father? Kshatriya, the one with the glow of Kshatriyas. Why? What is the task of the Kshatriyas? Hm? Persons from which caste became kings mostly? Those from Brahmin religion did not become kings. It was the Kshatriyas only who became kings. Why? Those who gain victory in wars become kings. Will they become kings if they lose? So, those who wage wars are called the Kshatriyas. What kind of a war? Not the one who runs away while waging wars. What? Not the one who runs away while fighting a war and not the one who leaves his body. The one who gains victory while waging a war. Why? He, who has a canopy of the highest on high Father on him always becomes victorious.

Who is the highest on high Father? The Father of souls, the Supreme Soul, the one who is called the heavenly God Father, but those Christians do not know at all that the incorporeal point of light is not the one who creates heaven. Heaven is corporeal. The one who creates corporeal will be corporeal only, will he not be? So, that Father of incorporeal souls, the souls are also incorporeal; so the Father is also incorporeal. So, when He enters in a corporeal human body; such corporeal soul, a human soul, who is the Father, the seed of the entire human world. He enters in him and gives knowledge. Knowledge is called the gem of knowledge. So, you children play with the gems of knowledge. So, the Confluence Age Ram who makes you play in practical will be said to be Ram. The Ram of Silver Age does not make you play with the gems of knowledge.

So, Ram, i.e. the Father comes and gives you children the vashikaran mantra (the mantra to control). Which Father? Comes. He comes. The Father who comes. From where does He come? The Father of souls, the Soul World, which is called the Supreme Abode. Muslims call it Arsh. Khuda (God) lives in Arsh; He does not live in Farsh (land). And Hindus call it Paramdham. The home of the Supreme Father. So, the Father who comes from there, He is the Father of souls. He comes from the Soul World. That Father of souls, Shiv, the point of light comes and gives you children the vashikaran mantra. What has been said? You children. Who is called 'you'? Those sitting face to face are called 'you', those who sat face to face and understood, heard and also follow in practical. So, they were called 'you children'. It has also been said – I narrate to you. This one listens in between. So, who is told? The one who finishes the task is told. If someone does not complete the task at all because he has not understood at all, then the hint that is given by telling 'this one' (ye), this Brahma and his followers, the womb born progeny, who continued to derive the pleasure of Brahma's lap. It was said 'this one' (yah) for the children who always explain the lap of Brahma only and for Brahma as well.

So, they are not given the vashikaran mantra. What? What kind of a mantra? Vashikaran. The one that controls. What? You can control any soul through the power of Yoga. The power of Yoga is the power of vibrations. What? The soul, which controls the entire world, can also be controlled. Tell, is there any soul in the world which controls the entire world? Is there a soul in this world which controls the souls of the entire world? Is there anyone or not? Who is it? Is it a man or a woman? A man (husband) is elder. The woman (wife) is slightly younger. Who is it? Is it a big personality or a small personality? Hm? Yes. All men are Duryodhans and Dushasans. So, are they Duryodhans-Dushasans or is it someone among the virgins and mothers? Hm?

So, it was said – Jagdamba. What? The one who has been termed by the Sikhs as – Raaj karega khaalsaa (the pure one shall rule). Who will rule over the entire world when destruction takes place? The pure one shall rule. Why was it said 'khaalis'? It was said 'khaalis' because it is that soul alone on this world stage, she is the only child of the Father of the human world, who controls the human souls of the entire world. So, then it has been said for Jagdamba. Even otherwise, if it is observed that if there is Vasudhaiv Kutumbkam, then the Father is seed-form. Leave aside his topic. Who controls the remaining entire family? It is the mother only who controls. So, is that Jagdamba female or male? Hm? What is she? She is a female. She is female from the point of view of the body. Then why did the Sikhs say – Raaj karega khaalsaa? They should have said 'khaalsi'. They should have said – woman. But the Sikhs also get to know that in this human world, when the new world is created, then the children who become constant in the soul conscious stage first of all, they are the elder children of the Father. They are called the rosary of Rudraksh. What? Those who are the aksh, i.e. eyes of Rudra. They give the entire news of the entire world to Rudra at the time of mega-destruction (mahaavinaash) that it happened like this in this area, it happened like that in that area, it happened like that in that area. They give the entire news of the ten directions.

So, the soul that controls those children in the last time of the Confluence Age controls the 500-700 crore human souls, who are in the form of children, the children of the Father of the human world; she remembers the vashikaran mantra so firmly. What is the mantra? The mantra is – Remember Me. Remember Me alone. Remember Me alone. Well, what is the meaning of 'remember Me alone'? Should you remember the Father of souls, the point? Arey, point, point, point, point, the soul of ant, the soul of elephant, the soul of human being, the soul of a demon, the soul of a deity; which soul? How will you recognize the point like soul? Which point should we remember? This is why it was told that the permanent corporeal body in which that Supreme Soul point of light enters; what? It does not enter in any one else in a permanent manner. It will enter temporarily, numberwise. But the Chariot in which it enters in a permanent manner, from the beginning to the end, it is about that Chariot. That Chariot itself has been called the fortunate Chariot (bhaagirath) in the scriptures. Fortunate Chariot. What kind of a Chariot? Fortunate Chariot. Will those who die be called fortunate chariots? Hm? Is the one who dies in the mega-destruction (mahaavinaash) on this world stage a fortunate Chariot? No.

The Sikhs also know this. Akaalmoort. What kind of moorty (personality)? Akaal. The one who cannot be devoured by death. So, that personality, that Chariot will devour the entire world, but nobody can devour him. He is the Father of the human world. He does not suffer a limited death as well as an unlimited death, i.e. losing faith. He never loses faith. Yes, Jagdamba loses faith. But what is her quality? Her quality is that she keeps on remembering that permanent Chariot. She is unable to forget him. Reason? The reason is that a virgin is unable to forget throughout her life the stamp that is affixed by any man for the first time. One thing is this. And the second thing is that she remains in the company of the seed-form Father of the human world for a long time. So, will she be coloured by the company or not? And it’s not even a case of being together for a little time or a longer time. Nobody is able to maintain the relationship for such a long period through the organs, through vision, through sense organs or through the organs of action more than she maintained. All others maintain for a short period when compared to her. Not even through the intellect that they may maintain relationship through mind and intellect because Father Shiv says through the mouth of Brahma in the Vedvani that if you cannot remember Me in a point form, in a subtle form, then it doesn’t matter. What should you do? Remember the ling, My big form in which I enter. It means that his organs of action should not come to the mind, but the body should definitely come to the mind.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2435, आडियो – 2925, रात्रि क्लास 5.4.1967
VCD 2435, Audio 2925, Night class 5.4.1967
VCD-2435-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 18.22-38.53
Time- 18.22-38.53


तो बड़े रूप को याद करेंगे तो भी तुम बाप समान बन जावेंगे। क्योंकि इस दुनिया में मनुष्य सृष्टि के बाप से ऊँच पद पाना कोई हो ही नहीं सकता। मनुष्य सृष्टि का बाप ऊँच ते ऊँच है। उसके साकार स्वरूप को, जो अविनाशी स्वरूप है, जिसको काल ही नहीं खा सकता महाविनाश में उस साकार स्वरूप को भी याद करेंगे तो भी तुम्हारे अन्दर संग का रंग लगेगा या नहीं लगेगा? और सबसे जास्ती लगेगा कि कम लगेगा? हँ? सबसे जास्ती लगेगा। और ये भी बात है – साकार की छाप साधारण नहीं होती है। साकार में रसगुल्ला खाया होगा तो याद आएगा या नहीं आएगा? हँ? जरूर याद आएगा। देखो, जन्म-जन्मान्तर स्त्री साकार पति को याद करती है जीवनभर। तो अंत समय में कौन याद आता है? साकार याद आता। और साकार याद आ जाता है तो अंत मते सो गति हो जाती है। स्त्री को उस पुरुष का ही जन्म मिलता है। ऐसे ही पुरुष का है। पुरुष अपने जीवन में जिस स्त्री को बहुत याद करता है, चलो दो-चार स्त्रीयाँ भी हों, कोई ने तो ज्यादा सुख दिया होगा। तो जिसको ज्यादा याद करता है वो अंत समय में याद आ जाता है। तो अंत मते? सो गते। स्त्री का चोला मिलता है।

तो देखो, साकार को भी याद करने का कितना बड़ा महत्व है। दूसरी बात, निराकार को याद करना कठिन है निरंतर या सहज है? क्या है? कठिन है। और साकार को याद करना सहज है। क्योंकि प्रैक्टिस पड़ी हुई है अनेक जन्मों की। तो देखो उस निराकार को याद करके सिद्धि प्राप्त, सफलता प्राप्त करने वाली आत्माएं इस संसार में बहुत थोड़ी हैं। क्या? बाकी कितनी भी मनुष्यात्माएं हैं ढ़ेर की ढ़ेर वो सब साकार को याद करके और मुक्ति को प्राप्त कर लेती हैं। लेकिन ये अंतर है। निराकार को जो याद करते हैं वो क्षिप्रम भवति मुक्तात्मा। वो तीव्र गति वाले होते हैं। बड़ी तीव्र गति से पहुँच जाते हैं। अपने लक्ष्य के ऊपर। और जो साकार को याद करने वाले होते हैं तो भले धीमी गति है, लेकिन सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं वो, लेकिन सहज-सहज।

तो भगवान आकरके जो सिखाते हैं वो क्या सिखाते हैं? सहज राजयोग सिखाते हैं या कठिन राजयोग सिखाते हैं? सहज सिखाते हैं। सहज बनने का तरीका क्या बताया? साकार को पहचानो। क्या? यही परीक्षा है सबसे बड़ी कि इस मनुष्य सृष्टि में वो साकार तनधारी कौन है मनुष्य सृष्टि का बीज जिसमें मैं मुकर्रर रूप से पार्ट बजाता हूँ, डायरेक्टर बनके पार्ट बजाता हूँ? डायरेक्टर हमेशा पर्दे के पीछे रहता है, दिखाई तो किसी को पड़ता नहीं। हीरो, हीरोइन, एक्टर्स, सब दिखाई पड़ते हैं। वो नहीं दिखाई पड़ता। तो मैं किसमें पार्ट बजाय रहा हूँ, किस आकार, शरीरधारी में, ये बात को पक्का-पक्का पहचान लेना और फिर कभी मृत्युपर्यंत जब तक इस सृष्टि का विनाश हो, कभी न भूलना, इतना पक्का निश्चयबुद्धि हो जाए। तो ऐसी आत्माओं को साकार में निराकार याद करने से साकार शरीरधारी में निराकार ज्योतिबिन्दु शिव को याद करने से बहुत सहज हो जाता है। इसलिए तुलसीदास ने लिखा है – सगुणहि अगुणहि नही कछु भेदा। साकार और निराकार में कोई भेद नहीं है। उभय हरैं भव संभव खेदा। दोनों ही इस संसार के दुःख को हरण करने वाले हैं। निराकार भी हरण करने वाला है। और साकार भी हरण करने वाला है। और निराकार साकार दोनों का कॉम्बिनेशन हो, जो हम ब्राह्मण लोग कहते भी हैं बापदादा कम्बाइन्ड हैं। लेकिन ब्राह्मण समझ नहीं पाते हैं कौन से बापदादा? देहभान में रहने वाले ब्राह्मण कुखवंशावली समझते हैं राम-कृष्ण शरीरधारियों में। लेकिन वो बात नहीं है। जो निराकार राम है, और जो साकार राम वाली आत्मा त्रेतायुग वाली भी है, संगमयुग में मुकर्रर रथ का पार्ट बजाती है, दोनों ही आत्माएं एक टाइम ऐसा आता है कि निराकारी स्टेज वाली बन जाती है।

शिव बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों को आप समान बनाकर जाऊँगा नंबरवार। तो कोई 100 परसेन्ट भी तो बनता होगा। तो जो 100 परसेन्ट निराकारी स्टेज में टिक जाता है, शिव बाप समान ही निराकार बन जाता है, उसकी संसार में शिवलिंग के रूप में पूजा होती है। क्या? किसकी पूजा होती है? क्या कहते हैं उसको? शिवलिंग। अरे! जो ओरिजिनल शिव है, सदा कल्याणकारी है, कभी अकल्याणकारी बनता ही नहीं, वो सदा निराकार रहने वाला सदा शिव है, या कोई और आत्मा है? कोई आत्मा, कोई आत्मा है और इस संसार में जो सदा कल्याणकारी है? कोई नहीं है। मनुष्य सृष्टि का बीज बाप भी नहीं। वो भी सारी सृष्टि का विनाश करा देता है। कल्याणकारी कहाँ हुआ? हाय-हाय करके मरते हैं ढ़ेर के ढ़ेर। तो कल्याणकारी हुआ? लेकिन बताया है कि सदा कल्याणकारी बन करके रहने वाला, पार्ट बजाने वाला, किरदार आत्मा एक ही है शिव। उसके नाम पर, उसके काम पर उसका नाम शिव पड़ा। शिव माने कल्याणकारी। लेकिन शिव के समान एक आत्मा और भी है जो बन जाती है पुरुषार्थ करके। क्या? जो बन जाती है और इस सृष्टि के विनाशकाल तक भी बनकरके रहती है और ढ़ाई हज़ार वर्ष और भी निराकारी स्टेज में रहती है, उससे ज्यादा लंबे समय तक निराकारी स्टेज में कोई रह ही नहीं सकता।

तो वो उस वशीकरण मंत्र को, जो याद कहा जाता है, योग का मंत्र कहा जाता है, महामंत्र कहा जाता है, मनमनाभव, मेरे मन में समा जा। वो कहने वाला शिव नहीं है। शिव को मन है? वो तो असोचता है। उसको मन है ही नहीं। तो कहेगा कैसे – मेरे मन में समा जा? तो जिसमें प्रवेश करता है, वो साकार मनुष्य सृष्टि का बाप कहता है – मेरे मन में समा जा। वो मनन-चिंतन-मंथन करने वाला मन भी है, मनुष्य सृष्टि के बीच में क्षिप्र बुद्धि तो है ही। बहुत तीक्ष्ण गति वाला है। क्षिप्र माना तीक्ष्ण गति वाला। जैसे और धर्मपिताएं हैं। चाहे वो ब्रह्मा हो, इब्राहिम हो, बुद्ध हो, क्राइस्ट हो, कोई भी धर्मपिता हो, वो निराकार को याद करते हैं या साकार को याद करते हैं? वो निराकार को याद करते हैं। वो साकार को पहचान ही नहीं पाते। जो विधर्मी धर्मपिताओं में सबसे मुख्य, सृष्टि के आदि वाला ब्रह्मा है, वो ही बाप को नहीं जान पाता बहुत लंबे समय तक। तो और दूसरे, बाद में आने वाले कैसे जानेंगे? वो तो आते ही हैं आधा कल्प के बाद – इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, आदि। तो जब बाप को जानते ही नहीं हैं, तो याद कैसे करेंगे? न निराकार को सही तरीके से पहचान पाते, न साकार को पहचान पाते।

और यहाँ तो साकार निराकार का कॉम्बिनेशन है। हैं दोनों ही आत्माएं। एक है आत्माओं का बाप। और दूसरा है साकार मनुष्यात्माओं का बाप। दोनों आत्माएं हैं। लेकिन एक बाप के रूप में और दूसरा? किस संबंध में? आत्माओं के बीच? उसको क्या कहा जाए? 500 करोड़ आत्माओं के बीच में, वो आत्माओं के बीच में शिव बाप का बड़ा बच्चा है ना। है या नहीं? है। तो जो बड़ा बच्चा है, आत्माओं के बीच में। वो तो बाप समान हो गया। मुसलमान लोग भी उसे मानते हैं। आदम को। सृष्टि का आदि पुरुष। कहते भी हैं आदम को खुदा मत कहो। आदम खुदा नहीं। लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं। जो खुदा का नूर है, ज्योतिर्लिंगम, वो ही नूर आदम का भी नूर है। इसलिए आदम को ही लिंग के रूप में पूजा जाता है। आज जो यादगार मन्दिरों में लिंग है उसमें बिन्दु हीरा नहीं दिखाते। लेकिन जबसे यादगार मन्दिर बनना शुरू हुए सात्विक स्टेज में, द्वैतवादी द्वापरयुग से उस सात्विक स्टेज में, उस साकार का निराकारी रूप भी साथ में दिखाया गया, हीरे के रूप में सोमनाथ मन्दिर में। वो हीरा होरो पार्टधारी की यादगार है।

हीरा पत्थर होता है या नहीं होता है? क्या होता है? पत्थर होता है। तो पत्थरबुद्धि भी आत्मा बनती है कलियुग के अंत में। और सतयुग के आदि में? पारसबुद्धि भी बनती है। शिव, जो आत्माओं का बाप है, वो पत्थरबुद्धि बनता है? बनता ही नहीं। वो पारसबुद्धि भी नहीं बनता। तो ये जो शिवलिंग यादगार दिखाया जाता है वो किसकी यादगार है? शिव निराकार ज्योतिबिन्दु, जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करता है, उस हीरो पार्टधारी की यादगार है, इसलिए हीरे के रूप में सोमनाथ मन्दिर में वो लिंग में हीरा जड़ा हुआ था। लिंग लाल-लाल है, पत्थर लाल। वो शरीर की यादगार है। जिस शरीर के रोम-रोम में ज्ञान भरा रहता है। ज्ञान की रोशनी भरी रहती है। वो शरीर रूपी जो घर है, वो ज्ञान का, वो रोशनी का ऐसा भंडार है, रोम-रोम में ऐसा ज्ञान भरा हुआ है कि वो परमब्रह्म का घर हो गया और होता भी है वास्तव में। इसलिए लाल-लाल पत्थर का लिंग दिखाया जाता है।

शिव बाप भी ब्रह्मा मुख से वेदवाणी मुरली में कहते हैं – तुम बच्चे परमधाम को इस सृष्टि पर उतार लेंगे। माना? इस सृष्टि पर उतारेंगे, स्मृति के आधार पर, तो पहले तो शरीर में उतरेगा, कोई शरीरधारी तो परमधाम के तरह लगातार प्रकाशित बनेगा ना। ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित। ज्ञान की रोशनी के भंडार से प्रकाशित। तो जो आत्मिक ज्ञान के रोशनी के भंडार से भरपूर बन जाती है, उसे ब्रह्म के समान घर कहा है, आत्माओं का घर, जो कहता है मनमनाभव, मेरे मन में समा जा। माना? मेरे मन में क्या है? क्यों समा जाए भाई? तेरे मन में शिव ही याद है, बैठा हुआ है। तेरी स्मृति में क्या बैठा है? सिर्फ ज्योतिबिन्दु शिव। क्या? साकार बैठा है? हँ? निराकार ही बैठा है? साकार नहीं बैठा है? उसे याद करना कठिन होता है कि सहज होता है? वो सहजयोगी है या कठिन योगी है? सहजयोगी है। सहजयोगी है तो निरंतर हो सकता है। ब्रह्मा से लेकरके जितने भी धर्मपिताएं हैं, वो सब कठिनयोगी हैं। फिर बहुत लंबा टाइम लगता है नंबरवार। कठिन हो जाता है। हठपूर्वक याद करते हैं। खींच के याद करते हैं। तो जिसको सहज होता है उसकी याद भी निरंतर हो जाती है। निरंतर माना? सिर्फ 8 घंटे की रहेगी, बाकी 16 घंटे का अंतर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा? वो निरंतर याद करेगा तो सहज हो जाएगा ना। क्योंकि अपने स्वरूप को कोई याद कर सकता है कि नहीं? अपने चेहरे को, शरीर को याद कर सकता है या नहीं? याद नहीं कर सकता। लेकिन शीशे में देखके? शीशे में देख ले, तो फिर याद आएगा या नहीं? याद आएगा ना। तो वो साकार स्वरूप में निराकार को याद भी कर सकता है।

दूसरी बात, अपनी भृकुटि के मध्य में निराकार को, या निराकार आत्मा, अपनी आत्मा को याद करना, जो अपनी आत्मा ज्योतिबिन्दु और आत्माओं के बाप की आत्मा ज्योतिबिन्दु, दोनों एक जैसे हैं, सहज पड़ेगा, कठिन पड़ेगा? सहज पड़ेगा। तो ये तो और सहज हो गया अपनी आत्मा को याद करना। इसलिए बाप कहते हैं पहले अपनी आत्मा को याद करो, फिर बाप को याद करो। माना अपनी आत्मा नज़दीक है ना। और प्रैक्टिकल में अन्दर है या नहीं है? प्रैक्टिकल में है। जो जो प्रैक्टिकल में अन्दर आत्मा है और माताएं तो जन्म-जन्मान्तर बिन्दी लगाती ही रही हैं। एक दूसरे को देखती रही हैं तो भी बिन्दी के रूप में देखती रही। पुरुष भी आत्मिक स्मृति का टीका लगाते रहे हैं। तो सहज हुआ ना। भारतवासियों को तो सहज होना चाहिए।

तो जो मनुष्य सृष्टि का बाप है उसके लिए अपने ही साकार स्वरूप में निराकार को याद करना बहुत सहज हो जाता है। सहज ते सहज। बाकी धरमपिताओं को? नंबरवार कठिन होता जाता है। इसलिए वो इतना निराकारी स्टेज में नहीं रह सकते कि विनाशकाल में निराकार को याद रख पाएं। उस समय तो बहुत परीक्षाएं आएंगी प्रकृति के द्वारा, माया के द्वारा। हँ? सबको हिला के रख देगी कि नहीं परीक्षाएं, परिस्थितियाँ? तो उस समय कोई निराकार को याद करे, वो तो धरमपिताओं का ही काम है। वो धरमपिताएं जो मुख्य-मुख्य हैं, जैसे ब्रह्मा - चन्द्रवंशियों का बाप; इब्राहिम – इस्लाम धर्म का बाप; बुद्ध – बौद्धियों का बाप; क्राइस्ट – क्रिश्चियन्स का बाप; और उनके सहयोगी धरमपिताएं भी आते हैं बाद में। वो भी नंबरवार हैं। तो वो सब धरमपिताएं बड़े-बड़े हठयोगी हैं। मारे ईर्ष्या के वो साकार को मानते ही नहीं। और कहते हैं – वो याद कर सकता है तो हम निराकार को याद क्यों नहीं कर सकते? नहीं मानेंगे, नहीं मानेंगे, नहीं मानेंगे। और वो हठ कर लेते हैं। तो क्या होता है? उनकी हठ पूरी होती है निराकार को याद करने से। वो तीव्रगति से चढ़ते हैं ऊँची स्टेज में। लेकिन? बहुत ऊँचे नहीं जा सकते। नंबरवार ऊँचाई तक पहुँचते हैं और नंबरवार धरमपिताएं बन जाते हैं। माना पूरी 500 करोड़ की सृष्टि, 700-800, 750 करोड़ की मनुष्य सृष्टि उनको अपना बाप नहीं मान पाती। वो तो सिर्फ एक ही मनुष्यात्मा है जो सारी मनुष्य सृष्टि का बीज है – आदम, एडम, आदि देव शंकर, महादेव। वो एक ही आत्मा है जिसको सारी मनुष्य सृष्टि अंत में भगवान बाप का साकार स्वरूप समझ लेती है और उसे याद करती है। ... तो सारी सृष्टि के लिए सहज और धरमपिताओं के लिए कठिन हो जाता है।

So, even if you remember the big form, you will become equal to the Father because nobody can achieve a post higher than the Father of the human world in this world. The Father of the human world is the highest on high. Even if you remember his corporeal form, which is the imperishable form, which cannot be devoured by death even in mega-destruction (mahaavinaash), then will you be coloured by the company or not? And will you be coloured the most or less? Hm? You will be coloured the most. And it is also true that the impression of the corporeal is not ordinary. If you have eaten a rasgulla in a corporeal form, then will it come to your mind or not? Hm? It will definitely come to the mind. Look, a wife remembers her husband birth by birth, throughout her life. So, who comes to her mind in the end? The corporeal comes to the mind. And when the corporeal comes to the mind, then as are the thoughts in the end, so does the fate become. The wife gets the birth of the same male. Same is the case with the man. The woman that a man remembers a lot in his life; okay, there could be two-four women, one of them must have given more pleasure. So, the one whom he remembers more, comes to his mind in the end. So, as are his thoughts in the end, so will be his fate. He gets a female body [in the next birth].

So, look, there is such a big importance attached to remembering the corporeal as well. Second thing, is it difficult or easy to remember the incorporeal continuously? How is it? It is difficult. And it is easy to remember the corporeal because one has practiced since many births. So, look, there are very few souls in the world who have achieved success by remembering that incorporeal. What? All other numerous human souls remember the corporeal and achieve mukti (liberation). But this is the difference. Those who remember the incorporeal are 'kshipram bhavati muktaatma'. They are very fast. They reach their goal very quickly. And those who remember the corporeal may be slow, but they achieve success easily.

So, what does God come and teach? Does He teach easy RajYoga or difficult RajYoga? He teaches easy one. What is the method to make it easy? Recognize the corporeal. What? This is the biggest test that who is that corporeal body in this human world, the seed of the human world, in which I play a part in a permanent manner; in which I play a part as a director. The director always remains behind the curtains; he is not visible to anyone. Everyone including the hero, heroine and actors are visible. He is not visible. So, one should firmly recognize as to in which person, in which subtle body, in which bodily being am I playing My part and then not forget till the death, till the destruction of the world; one should develop such firm faith. So, for such souls, it becomes very easy to remember the incorporeal point of light Shiv in a corporeal bodily being. This is why Tulsidas wrote – Sagunahi agunahi nahi kachu bheda. There is no difference between the corporeal and the incorporeal. Ubhay harain bhav sambhav kheda. Both of them remove the sorrows of this world. The incorporeal also removes and the corporeal also removes. And if it is a combination of the incorporeal and corporeal, which we Brahmins also say that BapDada are combined. But the Brahmins are unable to understand that which BapDada it is? The lap-born Brahmins who live in body consciousness think about the bodily beings Ram and Krishna. But it is not about that. The incorporeal Ram and the corporeal soul of Ram of the Silver Age also and plays the part of the permanent Chariot in the Confluence Age; a time comes when both the souls achieve the incorporeal stage.

Father Shiv says – I will make you children numberwise equal to Myself and go. So, someone must be becoming 100 percent. So, the one who becomes constant in 100 percent incorporeal stage and becomes incorporeal like the Father Shiv is worshipped in the form of Shivling in the world. What? Who is worshipped? What is it called? Shivling. Arey! Is the original Shiv, who is forever benevolent, never becomes non-benevolent at all, is it the Sadaa Shiv who always remains incorporeal or is it any other soul? Is there any other soul in this world who is forever benevolent? There is none. Not even the seed-form Father of the human world. He too causes the destruction of the entire world. Is he benevolent? Many people die while crying in despair. So, is he benevolent? But it has been told that there is only one actor soul Shiv who remains benevolent forever, plays a benevolent part. He was named Shiv based on His tasks. Shiv means benevolent (kalyaankaari). But there is another soul equal to Shiv who becomes [benevolent] by making purusharth. What? The one who becomes and remains so till the destruction of this world and remains in an incorporeal stage for another 2500 years. Nobody can remain in an incorporeal stage for a longer period than him.

So, that vashikaran mantra, which is called remembrance, which is called the mantra of Yoga, called mahamantra, manmanaabhav, merge into My mind. The one who says that is not Shiv. Does Shiv have mind? He is the one who does not think at all (asochtaa). He does not have a mind at all. So, how will He say – Merge into My mind? So, the one in whom He enters, that Father of the corporeal human world says – Merge into My mind. He is also the mind which thinks and churns; he already has a fast intellect (kshipra buddhi) in the human world. He has a very fast pace. Kshipra means very fast pace. For example, there are other founders of religions. Be it Brahma, Ibrahim, Buddha, Christ, or any founder of religion, do they remember the incorporeal or the corporeal? They remember the incorporeal. They are unable to recognize the corporeal at all. When the most important one among all the vidharmi founders of religions, i.e. Brahma from the beginning of the world himself is unable to recognize the Father for a long time, then how will others, latter ones recognize? They come only after half a Kalpa – Ibrahim, Buddha, Christ, etc. So, when they do not know the Father at all, then how will they remember? Neither are they able to recognize the incorporeal properly nor are they able to recognize the corporeal.

And here it is a combination of the corporeal and incorporeal. Both are souls. One is the Father of souls. And the other is the Father of the corporeal human souls. Both are souls. But one is in the form of Father and the other? In which relationship? Among the souls? What will he be called? Among the 500 crore souls, among the souls he is the eldest son of the Father Shiv, is not he? Is he or is not he? He is. So, the eldest child among the souls became equal to the Father. Muslims also believe in him, in Aadam. The first man of the world. It is also said – Do not call Aadam as Khuda, Aadam is not Khuda, but Aadam is not separate from the light of Khuda. The light of Khuda, the Jyotirlingam is the light of Aadam as well. This is why Aadam himself is worshipped in the form of ling. The ling that is a memorial in the temples today, a point-like diamond is not shown in it. But ever since the memorial temple began to be constructed in a pure stage, from the dualistic Copper Age, then in that pure stage, the incorporeal form of that corporeal has also been shown in the form of a diamond in the Somnath temple. That diamond is a memorial of the hero actor.

Is diamond a stone or not? What is it? It is a stone. So, it is the soul which becomes stone-like intellect (pattharbuddhi) in the end of the Iron Age. And in the beginning of the Golden Age? It becomes elixir-like intellect (paarasbuddhi) also. Does Shiv, who is the Father of souls, become stone-like intellect? He does not become at all. He does not become paarasbuddhi as well. So, whose memorial is this Shivling that is depicted? It is a memorial of the hero actor in whom shiv, the incorporeal point of light enters in a permanent manner. This is why that diamond was studded in the ling in the Somnath Temple in the form of a diamond. The ling is red, red stone. That is a memorial of the body. The body in which every horripilate (rom-rom) is filled with knowledge. It is full of the light of knowledge. That body like house of knowledge is such a stock house of light, there is such light filled in every hair that it became the home of Parambrahm and it is actually so. This is why it is shown a ling of red stone.

Father Shiv also says in Vedvani Murli through the mouth of Brahma – You children will bring the Supreme Abode down to this world. What does it mean? You will bring it down to this world on the basis of remembrance; so, first it will come down in a body; there must be a bodily being who will become continuously luminous like the Supreme Abode, will it not? Glowing with the light of knowledge. Illuminated with the stock house of light of knowledge. So, the one who becomes full of the stock house of knowledge is called a home like Brahm, the home of souls, who says Manmanaabhav – Merge into My mind. What does it mean? What is in my mind? Why should I merge in your mind brother? There is only the remembrance of Shiv in your mind. What is sitting in your memory? Just point of light Shiv. What? Is the corporeal sitting? Hm? Is only the incorporeal sitting? Is the corporeal not sitting? Is it difficult or easy to remember him? Is he an easy yogi or difficult yogi? He is an easy yogi. If he is an easy yogi, then it can be continuous. All the founders of religions from Brahma onwards are difficult yogis. Then it takes a long time numberwise. It becomes difficult. They remember forcibly. They remember by pulling [their intellect]. So, for those who find it easy, their remembrance also becomes continuous. What is meant by continuous? It will remain only for 8 hours; will there be a difference of 16 hours or not? If he remembers continuously then it will become easy, will it not? It is because can one remember one's own form or not? Can one remember one's face, body or not? He cannot remember. But by seeing in the mirror? If he sees his face in the mirror then will it come to the mind or not? It will come to his mind, will it not? So, he can remember the incorporeal also in the corporeal form.

Secondly, to remember the incorporeal or the incorporeal soul, one's own soul in the middle of the forehead, one's own soul, the point of light and the point of light soul of the Father of souls are both alike; so, will it be easy or difficult? It will be easy. To remember one's own soul is much easier. This is why the Father says – First remember your soul; then remember the Father. It means our soul is close, is not it? And is it inside in practical or not? It is in practical. The soul which is in practical inside and mothers have been applying bindi (vermillion mark on the forehead) birth by birth. Even when they have been seeing each other, they saw in point form only. Men have also been applying the teeka (vermillion mark on the forehead) of spiritual awareness. So, it is easy only, is not it? It should be easy for the Indians.

So, for the Father of the human world, it is very easy for him to remember the incorporeal within his own corporeal form. Easiest of all. For the remaining founders of religions? It becomes numberwise difficult. This is why they cannot become constant in incorporeal stage to that extent that they could remember the incorporeal during the period of destruction. At that time a lot of tests would emerge through the nature, through Maya. Hm? Will the tests, the circumstances shake everyone or not? So, to remember the incorporeal at that time is the task of the founders of religions only. Those main, main founders of religions, for example, Brahma, the Father of the Chandravanshis; Ibrahim, the Father of Islam; Buddha, the Father of Buddhists; Christ, the Father of Christians; and their helper founders of religions also come later on. They are also numberwise. So, all those founders of religions are very obstinate yogis. Due to sheer jealousy, they do not accept the corporeal at all. And they say – When he can remember the incorporeal, then why can’t we remember? We will not accept, we will not accept, we will not accept. And they become obstinate. So, what happens? Their stubbornness is fulfilled by remembering the incorporeal. They climb to a high stage very fast. But? They cannot reach very high. They reach numberwise height and become numberwise founders of religions. It means that the entire human world of 500 crores, 700-800, 750 crores is unable to accept them as their Father. It is only one human soul, who is the seed of the entire human world – Aadam, Adam, Aadi Dev Shankar, Mahadev. His is the only soul whom the entire human world considers to be the corporeal form of God, the Father in the end and remembers him....So, for the entire world it becomes easy and it becomes difficult for the founders of religions.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 27 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2435, आडियो – 2925, रात्रि क्लास 5.4.1967
VCD 2435, Audio 2925, Night Class 5.4.1967
VCD-2435-extracts-Bilingual-Part-3

समय- 38.54-56.09
Time- 38.54-56.09

तो बताया कि निराकार बाप शिव आत्मलोक से आकरके तुम बच्चों को, जो सन्मुख बैठे हुए हैं, रुद्रमाला के रुद्र वत्स जो रुद्र ज्ञान यज्ञ की शुरुआत करता है सन 36-37 में, आदि में सो अंत में भी रौद्र रूप धारण करके सारी मनुष्य सृष्टि का अंत कर देता है। सारी दुनिया इस रुद्र ज्ञान यज्ञ में स्वाहा हो जाती। ऐसा रुद्र तुम बच्चों को वशीकरण मंत्र देता है। क्या? क्या वशीकरण मंत्र? मन मना भव। मेरे मन में समा जा। कौन आत्मा कहती है? ऊपरवाली कहती है? उसको मन है? वाह पट्ठे। सदैव ऊँची स्टेज में रहने वाला शिव है, उसको तो मन है ही नहीं। कौन कहता है? नीचे वाला, जिसमें वो प्रवेश करता है, जो सबसे नीचे चला जाता है, डूब-डूब के, एकदम पाताल लोक में चला जाता है। पातालियों का, कहते हैं असुरों का स्थान पाताल में है। वो पातालियों का भी बाप बन जाता है। एकदम नीच ते नीच बनता है मनुष्य सृष्टि में। ऊँचे ते ऊँचा भी बनता और नीच ते नीच भी बनता।

नीचों का भी बाप और ऊँचे देवताओं का भी बाप। उसमें, उस मनुष्यात्मा में शिव बाप आकरके तुम रुद्र वत्सों को, रुद्रगणों को, जो कोई लूले हैं, कोई लंगड़े हैं, कोई काने हैं, कोई बीचे हैं, कोई मुखहीन, विपुल मुख काहो, ऐसे बच्चों को वशीकरण मंत्र देते हैं कि दुनिया में तुम जिसे चाहो उसे वश में कर सकते हो। किसलिए देते हैं? ये वशीकरण मंत्र देने का कारण क्या है? इसलिए देते हैं कि तुम बच्चे मायाजीते जगतजीत बन जाओ। क्या? जितना वशीकरण मंत्र का उपयोग करेंगे योगबल के आधार पर जो तुम्हें वशीकरण मंत्र मिलता है कि तुम माया को जीत सकते हो। पूरा नहीं जीतेंगे, नंबरवार थोड़ा-बहुत तो जीतेंगे। नहीं जीतेंगे? जीतेंगे। तो जितना माया को जीतेंगे उतना जगतजीत बनेंगे। जैसे आठ दिगपाल माने गए हिन्दू शास्त्रों में कि वो आठ दिशाओं को जीत लेते हैं नंबरवार, कोई उत्तर दिशा का, कोई दक्षिण दिशा का, कोई पूरब दिशा का, कोई पश्चिम दिशा का। उन चारों दिशाओं के कोण में भी चार बैठे हुए हैं। तो ऊपरवाला भी, और फिर नीचे वाला भी अलग है। तो दसों दिशाओं को कंट्रोल करने वाले हैं। वो नंबरवार हैं।

तो बता दिया – किसलिए वशीकरण मंत्र देते हैं? कि तुम क्या करो? जगतजीत बन सकते हो। सारे जगत को जीतने वाले क्या बन सकते हो? जगन्नाथ बन सकते हो। बन सकते हो कि नहीं? हँ? और कुमारों को तो खास बोला है। क्या बोला है? कुमार जो चाहे सो कर सकते हैं। सारी दुनिया को जीतना, सारे जगत को जीतना चाहें तो जगत को भी जीत सकते हैं। हँ? जगदम्बा को जीत सकते हैं? हँ? जो चाहे सो कर सकते हो तो क्या नहीं कर सकते हो? सबको जीत सकते हो। काहे से? वशीकरण मंत्र से। मायाजीते जगतजीत। क्या? माया बड़ी बुद्धिशाली है। शक्तिशाली नहीं है। दुनिया में सबसे जास्ती शक्तिशाली है जगदम्बा। क्या? माया, माया बेटी जो है ना वो जगदम्बा की बड़ी बच्ची है या छोटी बच्ची है? बड़ी बच्ची है। क्या? बड़ी बच्ची है। छोटी ऐसे नहीं। कैसे बच्ची है? बड़ी बच्ची है।

तो जो बड़ी बच्ची है वो सभी बच्चियों को अपने कंट्रोल में करेगी या नहीं करेगी? जैसे कहते हैं बड़ा भाई बाप समान कहा जाता है। ऐसे ही बड़ी बहन भी माँ समान हो गई। तो माँ अगर खुदा न खास्ता मौजूद नहीं है तो छोटी-छोटी बच्चियाँ किसको अपनी अम्मा समझेंगी? बड़ी बहन। तो हाँ, बहनें तो समझेंगी छोटी-छोटी अपनी अम्मा। लेकिन उस बड़ी बेटी की जो अम्मा है, जिसे कहा जाता है जगदम्बा, उसको भी कंट्रोल कर लेगी कि नहीं कर लेगी? बोलो। हँ? क्यों? क्योंकि बुद्धि का कमाल है सारा। बुद्धि पवित्र बच्चों में होती है या माता में पवित्र बुद्धि होती है? हँ? बच्चों में पवित्र बुद्धि। बच्चों में भी जो बच्चियाँ हैं, उनकी और ज्यादा पवित्र बुद्धि होती है। और वो है माया बड़ी बेटी। तो जगदम्बा माता को भी कंट्रोल कर सकती है कि नहीं कर सकती है? कर सकती है। और कर लेती है।

माया बड़ी ठगनी है, चालाक है। देखती है कि मैं माया बेटी तो हूँ, मेरे अंदर पाँच विकारों की माया तो भरी हुई है। मैं अपने को रोक नहीं पाती। इसलिए बाप के ऊपर भी माया फैलाती है। क्या? क्या बनती है? क्या बन जाती है? कैसी माया फैलाती है? अन्दर-अन्दर से ये माया फैलाती है कि ये बाप भी मेरे कब्जे में आ जाए। और मैं इसके साथ जो चाहूँ सो करूँ। ऐसी माया बेटियाँ होती हैं कि नहीं दुनिया में? होती हैं। रवीश भाई ही बता पाता कि ग्रीन पार्क में एक ऐसा बुड्ढा है जिसकी दो लड़कियां, उनकी शादी उसने नहीं की। और वो लड़कियां बड़े प्यार से उस बुड्ढे के साथ रहती हैं। नौकरी करती हैं और बुड्ढे के साथ रहती हैं। और शादी करने के लिए मना करती हैं। करेंगी नहीं। तो माया बेटियां हुई कि नहीं? बोलो। और मुरली में भी ब्रह्मवाक्य है, वेदवाणी है; क्या? आज की दुनिया ऐसी है कि बाप बच्ची को नहीं छोड़ता। भाई बहन को नहीं छोड़ता। मामा भांजी को नहीं छोड़ता। चाचा भतीजी को नहीं छोड़ता। अरे कन्याओं के तो सारी दुनिया दुश्मन बन पड़ी है। टीचर स्टुडेन्ट को नहीं छोड़ता। गुरू चेली को नहीं छोड़ता। क्यों? कि कलियुग के अंत में सारी दुनिया अति भोगी बन जाती है। ऐसे तो सब आत्माएं भोगी तो हैं ही, एक शिव को छोड़करके, लेकिन कलियुग के अंत में तो अति हो जाती है विकारों की। उनमें भी सबसे जास्ती विकार की अति होती है काम विकार की।

तो माया बेटी की बात बताई कि वो तो है ही मायावी बेटी। अन्दर कुछ और, और बाहर से दुनिया को क्या दिखाती है? ये मेरा पापा है। और जो नज़दीक आने वाले होंगे वो तो जान ही जाएंगे तुम्हारा पापा है कि क्या है? तो माया बेटी जब देखती है कि ये पापा मेरे कंट्रोल में नहीं आता है, जैसे मैं चाहूँ ऐसे उसको यूज़ नहीं कर सकती हूँ तो युक्ति अपनाती है। कब युक्ति अपनाती है? जब बाप के जो रुद्र माला के जो रुद्र गण हैं उनके योगबल से बहुत तंग आ जाती है, थक जाती है, यहाँ तक कि स्थूल शरीर भी छोड़ देती है, तो फिर सूक्ष्म शरीर धारण करके बुद्धि भी तीक्ष्ण हो जाती है। सूक्ष्म शरीर भी ज्यादा ताकतवर बन जाता है। तो वो युक्ति अपनाती है। क्या युक्ति अपनाती है? जो जगदम्बा है ना। क्या? जो होने वाली नई दुनिया आने वाली है ना, उसमें वसुधैव कुटुम्बकम् बनेगा ना। उसकी अम्मा कौन है? जो सारी वसुधा कुटुम्ब बनेगी, उस वसुधा रूपी धरणी के रूप में अम्मा कौन है? हँ? जगदम्बा, जगजननी। जगदम्बा है ना। तो बस माता को मुट्ठी में लेती है। वो कैसे मुट्ठी में ले लेती है? माता तो बड़ी है। वो तो बाद में पैदा हुई, छोटी है, क्योंकि माँ की जो बड़ी बच्ची पैदा होती है, तो बुद्धि में पवित्र ज्यादा होगी या अपवित्र होगी? तीक्ष्ण बुद्धि होगी या साधारण होगी माँ के मुकाबले? हँ? माँ के मुकाबले बुद्धि में ज्यादा तीखी पवित्र बुद्धि होगी या नहीं होगी? होगी। तो वो माता को मुट्ठी में ले लेती है।

और वो माता है धरणी का रूप। प्रकृति का अगर अच्छे ते अच्छा रूप देखना हो तो धरणी में देख लो। और बुरे ते बुरा रूप देखना हो भयंकर से भयंकर रूप तो धरणी में देख लो। क्योंकि ये धरणी माता जो है पृथ्वी, जब विकराल रूप धारण करती है तामसी, बड़े-बड़े भूकम्प लाती है, तो दुनिया की ज्यादा परसेन्टेज में आबादी खलास कर देती है। भयंकर हुई ना? बहुत ताकतवर है। तो उस ताकतवर से, जगतजननी, जगतमाता से वो क्या करती है? हाथ मिलाय लेती है माया बेटी। उसको अपने कंट्रोल में कर लेती है। फिर तो डबल ताकत हो गई। अम्मा की भी ताकत और बड़ी बेटी की भी ताकत। अम्मा के भी कंट्रोल में बच्चे आ जाते हैं और बड़ी बेटी की भी ताकत। अम्मा के भी कंट्रोल में बच्चे आ जाते हैं और बड़ी बेटी भी साथ में मिल जाए तो और कंट्रोल बढिया हो जाता है। तो बस, सारी ब्राह्मणों की दुनिया में चाहे वो कोई कुरी के ब्राह्मण बनने वाले हों, बहु कुरियों के ब्राह्मण गाए जाते हैं। जो ब्राह्मण द्वापरयुग से कंट्रोल में आ जाते हैं द्वैतवादी धरमपिताओं के कंट्रोल में। संग के रंग में आ जाते। एक को छोड़कर। जो बाप है वसुधैव कुटुम्बकम्। उससे तो लड़ाई है उसकी। वो उसके कंट्रोल में नहीं आता। तो क्या करती है? खूब लड़ाई लड़ती है। खूब आक्रमण करती है।

तो माया की, बेटी की और बाप की लड़ाई होती है। ... क्या? लड़ाई होती है। और उस लड़ाई में क्या होता है? सारी दुनिया एक तरफ हो गई, सारा परिवार ब्राह्मणों का एक तरफ हो गया, नौ कुरियों के ब्राह्मण, एक बाप को छोड़करके सारे एक तरफ हो गए। शूटिंग पीरियड में यज्ञ के आदि में भी ऐसे ही होता है। सारी दुनिया एक तरफ और बाप दूसरी तरफ। माया बेटी और जगदम्बा, सब बच्चे, चाहे वो कोई कुरी के ब्राह्मण हों, सब एक तरफ चले जाते हैं। आदि सो? अंत में भी ऐसे ही होता है। जैसे परमब्रह्म आदि ब्रह्मा की सौ साल की आयु 76 में पूरी होती है तो फिर ऐसे ही होता है। कैसे? जैसे यज्ञ के आदि में हुआ था। सारी दुनिया ब्राह्मणों की एक तरफ, दूसरी आत्मा, राम वाली आत्मा एक तरफ और सारा ब्राह्मण, नौ कुरी के ब्राह्मण मिलकरके दूसरी तरफ। ठीक 40 वर्ष के बाद। इसके लिए बोला – 40-50 वर्ष में तुम बच्चे तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हो। तो 76 से लेकरके 2016-17 के अंत तक फिर ऐसे ही हो जाता है। माया ऐसी जोर से आक्रमण करती है, माँ के साथ मिलकर, सभी बच्चों के साथ मिलकर कि सारी दुनिया एक तरफ, चाहे बीजरूप आत्माओं की दुनिया हो, चाहे आधारमूर्त आत्माओं की दुनिया, जड़ों की दुनिया हो, और चाहे 500-700 करोड़ की दुनिया हो, सब आत्माएं एक तरफ और एक आत्मा दूसरी तरफ।

तो बताया, फिर क्या होता है? फिर दो का राज्य चलेगा या एक का राज्य चलेगा? एक तो माया बेटी लड़ाई लड़ने वाली। और उसने अपनी मुट्ठी में ले लिया अम्मा, जगदम्बा को। तो दो ही शक्तिशाली रह गए ना परिवार के बीच में, वसुधैव कुटुम्बकम् के बीच में। तो किसकी चलेगी? माया बेटी की चलेगी कि अम्मा की चलेगी? कौन पावरफुल है? हँ? जाकी लाठी ताकी भैंस। जिसके हाथ में हिंसा करने की शक्ति ज्यादा होगी वो ही बचेगा। हिंसक ही बचेंगे। तो कौन बचती है दोनों के बीच में कंट्रोलर? जगदम्बा या माया बेटी? हँ? माया बेटी तो विकारों का आक्रमण करती है। और जो प्रकृति रूपी धरणी है वो कौनसा आक्रमण करेगी? बड़े-बड़े भूकम्प लाती है। तो माया बेटी भी उसमें मुकाबला कर पाएगी? नहीं कर पाती। तो सारी ब्राह्मणों की दुनिया के अन्दर वो जगदम्बा जो है वो कंट्रोल करती है। तो मायाजीते जगतजीत। पहला जगतजीत तो बाप। और दूसरा जगतजीत? कौन? जगदम्बा।

तो बोला मन को वशीकरण से मायाजीत। मन के संकल्पों को अगर कंट्रोल कर लिया? एक बाप की याद में, तो क्या होता है? माया को जीत लेते हैं। रावणजीत बनेंगे। माया को जीत लिया तो माया का जो पति है रावण वो भी जीत लेगा। वो कोई बड़ी बात नहीं है। क्योंकि दस सिर मिलकरके रावण का रूप बनते हैं। पाँच विकार, जरूर दुनिया में कोई पाँच विकारी होंगे, देहभानी होंगे बड़े-बड़े। क्या? कामी, क्रोधी, लोभी; क्या? और देह अहंकारी। तो ये चार ही हैं। एक रावण के सिर पे गधा दिखाया जाता है। देहअभिमान की धूल में, मिट्टी में लोट जाती है घड़ी-घड़ी। दूसरा कामी। तीसरा क्रोधी। और फिर लोभी। तो रावण जीते जगतजीत। मायाजीते जगतजीत। तो इस बात की प्रैक्टिस तुम कर रही हो। तुम किससे कहा? कि एक की याद में रहकरके तुम सारी दुनिया को जीतने की प्रैक्टिस कर रही हो। कौन कहा? किससे कहा? बाप ने किससे कहा? हँ? तुम कर रही हो। कोई स्त्री से कहा कि कोई पुरुष से कहा? हँ? फीमेल है ना। फीमेल होते हुए भी रूद्र माला का मणका है या नहीं? हँ? जगदम्बा। ओमशान्ति।

So, it was told that the incorporeal Father Shiv comes from the Soul World and tells you children, who are sitting face to face, the Rudra children of the Rudramala. Rudra, who starts the Rudra Gyan Yagya in 36-37, assumes a fierce (raudra) form in the beginning as well as the end and ends the entire human world. The entire world is sacrificed in this Rudra Gyan Yagya. Such Rudra gives you children a Vashikaran Mantra. What? Which Vashikaran Mantra? Man manaa bhav. Merge into My mind. Which soul says? Does the above one say? Does He have a mind? Wow guy! The one who always remains in a high stage is Shiv; He does not have a mind at all. Who says? The below one, in whom He enters, the one who sinks to the lowest depth, goes to the nether world (Paataal lok). As regards the Paataalis, it is said that the demons live in Paataal (nether world). He becomes the Father of the Paataalis (residents of Paataal) as well. He becomes the lowest one in the human world. He becomes the highest one as well as the lowest one.

He is the Father of the lowest ones also and the Father of the high deities also. Father Shiv comes in him, in that human soul and gives the Vashikaran Mantra to you Rudra children, the Rudragans, some of whom are one armed (looley), some are lame (langrey), some are one-eyed (kaaney), some are without heads, some have many heads that you can control anyone you want in the world. Why does He give? What is the reason for giving this Vashikaran Mantra? He gives so that you children become victorious over the world by conquering the Maya. What? The more you use the Vashikaran Mantra, which you get on the basis of the power of Yoga, the more you can conquer Maya. If you do not conquer completely, you will win numberwise to some extent or the other. Will you not win? You will win. So, the more you conquer Maya, the more you will conquer the world. Just as eight Digpals are mentioned in the Hindu scriptures that they conquer eight directions numberwise; some conquer the north direction, some the south direction, some the east direction, some the west direction. Four are sitting in the angles of those four directions also. So, the above one and then the below one is also separate. So, they control all the ten directions. They are numberwise.

So, it was told – Why is the Vashikaran Mantra given? What should you do? You can become the conquerors of the world. What can you become by conquering the entire world? You can become Jagannath. Can you become or not? Hm? And it has especially been said to the Kumars. What has been said? Kumars can do whatever they want. They can conquer the entire world if they wish to conquer the entire world. Hm? Can they conquer Jagdamba? Hm? When you can do whatever you want, then what cannot you do? You can conquer everyone. By what? By Vashikaran Mantra. Those who conquer Maya can conquer the world. What? Maya is very intelligent. It is not powerful. The most powerful one in the world is Jagdamba. What? Is Maya, daughter Maya the elder daughter of Jagdamba or is she the younger daughter? She is the elder daughter. What? She is the elder daughter. She is not younger. What kind of a daughter is she? She is the elder daughter.

So, will the elder daughter take all the daughters under her control or not? For example, it is said – Elder brother is said to be equal to the Father. Similarly, elder sister is also equal to the mother. So, by chance, if the mother is not alive, then whom will the younger daughters consider as their mother? The elder sister. So, yes, the younger sisters will consider her to be their mother. But will she control even the mother of that elder daughter, who is called Jagdamba or not? Speak up. Hm? Why? It is because everything is a wonder of the intellect. Do children have a pure intellect or does the mother have a pure intellect? Hm? Children have a pure intellect. Even among the children, the daughters' intellect is purer. And she is Maya, the eldest daughter. So, can she control even Mother Jagdamba or not? She can. And she controls.

Maya is a big cheat, clever. She observes that I am indeed daughter Maya, I am full of the Maya of five vices. I cannot stop myself. This is why she spreads her Maya (influence) on the Father also. What? What does she become? What does she become? What kind of Maya does she spread? She spreads this Maya within that this Father should also come under my control. And I should be able to do whatever I want to do with him. Are there such Maya-like daughters in the world or not? There are. Ravish Bhai alone could tell that there is such an old man in Green Park who did not solemnize the marriage of his two daughters. And those daughters live with that old man very lovingly. They work and live with the old man. And they don't want to get married. They will not get married at all. So, are they Maya-like daughters or not? Speak up. And there is a Brahmavaakya (sentence) in Murli also, there is a Vedvani; what? Today's world is such that the Father does not spare his daughter. A brother does not spare his sister. A maternal uncle doesn't spare his niece. A paternal uncle does not spare his niece. Arey, the entire world has become an enemy of the virgins. A teacher doesn't spare his student. A guru does not spare his disciple. Why? It is because in the end of the Iron Age the entire world becomes most pleaure-seeker (bhogi). In a way all the souls are seekers of pleasure except one Shiv; but in the end of the Iron Age vices reach a climax. Even among them the vice that reaches the most extreme levels is the vice of lust.

So, the topic of daughter Maya was mentioned that she is anyways a Mayavi (illusive) daughter. There is something else inside and what does she show outwardly to the world? This is my Papa (Father). And those who come closely in contact with them will know whether he is your Papa or something else. So, when daughter Maya sees that this Papa doesn't come under my control, I cannot use him as I wish, then she adopts tact (yukti). When does she adopt tact? When she is fed up of the power of Yoga of the Rudragan of the Father's Rudramala, when she becomes tired to the extent that she leaves her physical body as well, then she assumes a subtle body and her intellect also becomes sharp. The subtle body also becomes more powerful. So, she adopts tact. Which tact does she adopt? There is Jagdamba, is not she? What? Vasudhaiv kutumbkam (one world family) will be established in the forthcoming world, will it not be? Who is her mother? The entire world which will become a family, who is the mother in the form of land like Earth,? Hm? Jagadamba, Jagjanani (world mother). She is Jagdamba, is not she? So, that is all; she takes the mother in her fist. How does she take her in her fist? Mother is senior. She has been born later on; she is younger because will the eldest daughter of the mother who is born, have a purer intellect or impure intellect? Will she have a sharper intellect or will she be ordinary when compared to the mother? Hm? Will her intellect be sharper, purer when compared to the mother or not? She will. So, she takes the mother in her fist.

And that mother is the form of Earth. If you wish to see the best form of nature, then observe in the Earth. And if you want to see the worst form, if you want to see the most dangerous form, then observe in the Earth because when this Mother Earth, Prithvi assumes a ferocious, degraded form, causes big earthquakes, then it destroys the population of the world in larger percentage. She is dangerous, is not she? She is very powerful. So, what does she do with that powerful one, the world mother, Jagatmata? Daughter Maya joins hands with her. She takes her under her control. Then her power becomes double. Mother's power as well as daughter's power. Children come under the control of the mother also and there is the power of the elder daughter also. Children come under the control of the mother also; and if the eldest daughter also joins hands, then the control becomes better. So, that is all; in the entire world of Brahmins, be it Brahmins of any category, Brahmins of various categories are praised. The Brahmins who come under the control of the dualistic founders of religions from the Copper Age onwards; they are coloured by their company; except one. The Father who believes in vasudhaiv kutumbakam. She fights with him. He does not come under her control. So, what does she do? She fights a lot. She attacks a lot.

So, a fight takes place between Maya, her daughter and the Father. ... What? A fight takes place. And what happens in that fight? The entire world came on one side; the entire family of Brahmins, nine categories of Brahmins came on one side; except one Father everyone else came on one side. It happens like this in the beginning of the Yagya in the shooting period as well. The entire world is on one side and the Father is on the other side. Daughter Maya and Jagdamba, all the children, be it Brahmins of any category, all go to one side. Whatever happened in the beginning happens in the end as well. Just as the hundred years age of Parambrahm, the first Brahma is completed in 76, so, it happens again like this only. How? Just as it had happened in the beginning of the Yagya. The entire world of Brahmins was on one side, the other soul, the soul of Ram was on one side and all the Brahmins, the Brahmins of nine categories come together on the other side. Exactly after 40 years. It has been said for this – You children become satopradhan from tamopradhan in 40-50 years. So, it happens like this only from 76 to the end of 2016-17. Maya attacks in such a strong way by joining hands with the mother, by joining hands with all the children that the entire world is on one side, be it the world of seed-form souls, be it the world of base-like (aadhaarmoort) souls, be it the world of the roots, and be it the world of 500-700 crores, all the souls remain on one side and one soul is on the other side.

So, it was told, what happens after that? Then, will there be the rule of two or will there be the rule of one? On the one hand daughter Maya, who fights. And she took the mother, Jagdamba in her fist. So, in the family, in the world family only two remained powerful, were there not? So, whose writ will run? Will the writ of daughter Maya will run or will the writ of the mother run? Who is powerful? Hm? Whoever owns the stick owns the buffalo. Whoever has more power of violence will only survive. Only the violent ones will survive. So, who survives as the controller among both of them? Is it Jagdamba or daughter Maya? Hm? Daughter Maya attacks through vices. And the Earth like nature launches which kind of attack? She brings big earthquakes. So, will daughter Maya be able to confront her? She is unable to confront. So, it is that Jagdamba in the entire world of Brahmins who controls. So, the one who gains victory over Maya gains victory over the world. The first conqueror of the world is the Father. And the second conqueror of the world? Who? Jagdamba.

So, it was said conquer the Maya by controlling your mind. What happens if you control the thoughts of your mind in the remembrance of one? You conquer Maya. You will become conquerors of Ravana. If you conquer Maya, then the husband of Maya, i.e. Ravan can also be conquered. That is not a big issue because ten heads come together to become the form of Ravana. Five vices; definitely there will be some five vicious persons, big body conscious ones in the world. What? Lustful, wrathful, greedy; what? And body conscious. So, these are four only. One donkey is shown on the head of Ravana. It rolls in the dust, in the mud of body consciousness again and again. Second is the lustful one. Third is wrathful. And then greedy. So, if you conquer Ravana, you conquer the world. If you conquer Maya, you conquer the world. So, you are practicing this. Who was addressed as 'you'? You remain in the remembrance of one and practice conquering the entire world. Who said? To whom was it said? To whom did the Father say? Hm? You are doing. Did He say to a woman or a man? Hm? It is a female, is not it? Despite being a female, is she a bead of the rosary of Rudra or not? Hm? Jagdamba. Om Shanti.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2436, आडियो 2922, दिनांक 22.02.2018
VCD 2436, Audio 2922, Date 22.02.2018
रात्रि क्लास 5.4.1967
Night Class dated 5.4.1967
VCD-2436-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 0.01-21.00
Time- 0.01-21.00


रात्रि क्लास चल रहा था – 5.4.1967. पहले पेज के आदि में बात चल रही थी – वशीकरण मंत्र कौनसी आत्मा देती है? तुम बच्चे जानते हो कि राम यानि बाप आकरके तुम बच्चों को वशीकरण मंत्र देते हैं। किसलिए देते हैं? माया को जीत कर जगतजीत बनने के लिए। तो गोया मन वशीकरण से मायाजीत बने। माना पहले कभी मन माया से हार चुका है। तो जो हार चुका है उसको वशीकरण मंत्र देता है जीत पाने के लिए। और मन को भी वश में करना है कि नहीं? ये भी तो कहते हैं मन जीते जगतजीत। तो जरूर मन ने भी पहले क्या किया होगा? आत्मा के ऊपर जीत पाई होगी कि नहीं? नहीं? नहीं पाई होगी? जीत पाई होगी। तब तो कहते हैं मन को भी वश में करो। तो मन ने जीत पाई। किसके ऊपर जीत पा ली? आत्मा के ऊपर जीत पाली। कौनसी आत्मा के ऊपर जीत पा ली? जो सदैव आत्मा तो है। सृष्टि के आदि में भी परम पद रूप विष्णु रूप आत्मा है। परन्तु, जैसे ही बाप, आत्माओं का भी बाप, शिव बाप, जो कभी किसी के वशीभूत नहीं होता। होता है? वो वशीकरण मंत्र देते हैं। लेकिन राम बाप को कहा जाता है। कहने वाले दुनिया के लोग हैं या दुनिया से परे रहने वाला है? जो राम को बाप कहते हैं वो दुनिया के लोग हैं, दुनियावी आत्माएं हैं या दुनिया से परे रहने वाले? कौन कहते हैं राम बाप? हँ? अरे! जिनका बाप होगा वो ही कहेंगे ना। जो इस दुनिया से परे रहता है उसका तो बाप नहीं है?

तो जो सबका बाप है, जिसका कोई बाप नहीं, सुप्रीम फादर है, सुप्रीम सोल है, वो ही आकरके वशीकरण मंत्र देते हैं। और देते किसलिए हैं? हँ? और किसको देते हैं? हँ? सबको इकट्ठा देते हैं कि लेने वाले भी नंबरवार लेते हैं? नंबरवार लेते हैं। जो नंबरवार लेते हैं उनमें अव्वल नंबर कोई होगा, नहीं होगा? जो है अव्वल नंबर, अव्वल नंबर में वशीकरण मंत्र देता है; क्या मंत्र? क्या देता है? मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। तो वो कौनसी आत्मा देती है? जो सुप्रीम सोल है वो देती है, सुप्रीम अबोड में रहते हुए देती है या जब इस सृष्टि पर, मनुष्य सृष्टि के, मनुष्यात्माओं के बाप में प्रवेश करती है, तब देती है? तो जिसमें प्रवेश करती है उसी को मंत्र देती है – किसको जीतो? पहले किसको जीतो? हँ? मन को जीतो या माया को जीतो? पहले माया को नहीं। माया तो बेटी है उस बाप की। उस बाप ने ही जनम दिया है माया को। कौनसे युग में? हँ? द्वैतवादी द्वापरयुग में जन्म दिया। जन्म दिया ना। तो जिस माया को जन्म दिया है वो माया पहले किसके ऊपर अधिकार करती है? हँ? मन के ऊपर अधिकार करती है। और मन जो फर्स्ट भोगी आत्मा है उसको कंट्रोल करता है।

तो बताया इस वशीकरण मंत्र से रावणजीत बनो। रावण माने दस सिरों का संगठन। दस देह अभिमानी धरम इकट्ठे हो जाते हैं तामसी, तो रावण कहा जाता है। सारी दनिया पर रावण का राज्य हो जाता है। वो रावण को जन्म देने वाला कौन? वो ही मन। उस मन को बुद्धिमान कहेंगे? हँ? कहेंगे? नहीं कहेंगे? लेकिन गीता में तो कहा है बुद्धिमान नर अर्जुन। हँ? नरों में, मनुष्यों में अगर कोई बुद्धिमान है, तो कौन है? जिसने पहले-पहले भगवान को जाना वो ही बुद्धिमान है। लेकिन वो नर अर्जुन मन के कंट्रोल में आ जाता है। क्यों? क्योंकि संग के रंग में आते-आते, धरमपिताओं के फालोअर्स के संग के रंग में आते-आते अपने स्वरूप को भूल जाता है। तो वशीकरण मंत्र कैसे देते हैं? जब आत्माओं का बाप आते हैं तो पहले-पहले आत्मा का स्वरूप बताते हैं कि तुम देहभानियों की, देहअभिमानियों की औलाद नहीं हो, देह नहीं हो। तुम क्या हो? तुम तो आत्मा हो। और जब मनुष्य सृष्टि में जो मनुष्य सृष्टि का बीज बाप है, उसको ये पता चलता है कि मैं आत्मा हूँ, चैतन्य आत्मा, मैं देह नहीं हूँ, पाँच तत्वों का पुतला नहीं हूँ, तो जो देह की इन्द्रियाँ हैं; कितनी? पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ। पाँच श्रेष्ठ इन्द्रियाँ, पाँच भ्रष्ट इन्द्रियाँ। ये दस इन्द्रियाँ हैं। और स्थूल भी हैं। लेकिन उनको कंट्रोल करने वाला उनका और है - मन, ग्यारहवीं इन्द्रिय। वो बड़ा चंचल है। और वो मन जब तक किसी इन्द्रिय को सहयोग न दे तब तक कोई इन्द्रिय अपना, अपना रस नहीं ले सकती विषय भोगों का। तो मन ही प्रधान इन्द्रिय हो गया।

वो मन ही वास्तव में ब्रह्मा है, जिस ब्रह्मा के कंट्रोल में सारी दुनिया आ जाती है। ब्रह्मा मनुष्य रूप में दिखाते हैं या देखने में देवता रूप आता है? हँ? ब्रह्मा का जो रूप दिखाते हैं वो मनुष्य रूप है या देवता रूप दाढ़ी-मूँछ वाला है? माना विकारी है या निर्विकारी है? हँ? विकारों से भरा-पूरा है। पाँचों विकार। और ये पाँच विकार हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार – ये आधार बनते हैं, आधार लेते हैं पाँच तत्वों का – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। तो दस हो गये। ये दस रावण के रूप हैं। इनको भी जन्म देने वाला वो मन ब्रह्मा है। माना जो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ धर्म है सत्य सनातन धर्म जिसे कहा जाता है, वो सनत कुमार से धर्म स्थापन होता है। उस सनत कुमार का भी जन्मदाता कौन हुआ? जन्म देने वाला कौन हुआ? ब्रह्मा हुआ। सनत कुमार को किसने जन्म दिया? ब्रह्मा ने दिया ना। तो ब्रह्मा ने जो जन्म दिया, वो शूटिंग पीरियड में कब की बात है? आदि की बात है या मध्य की बात है? आदि की बात है? आदि में तो किसी ने पहचाना ही नहीं। पहचाना? नहीं पहचाना। सिर्फ ब्रह्मा ने जाना कि मेरा ब्रह्मा का पार्ट है। उनको साक्षात्कार हुआ था तो विश्वास हुआ। बाकी पहलौटी के बच्चे सनत, सनातन, सनन्दन, सनत कुमार, जो वायब्रेशन से पैदा होते हैं, मनसा सृष्टि, मानसी सृष्टि से, वो तो किसी को पता ही नहीं। तो पता कब चला? सेवेंटी सिक्स में। तो सेवेंटी सिक्स में वो बच्चे जो प्रत्यक्ष होते हैं चार कुमारों के रूप में, वो पहले गर्भ में आए होंगे या सीधे ही प्रत्यक्ष हो गए? गर्भ में आए होंगे। तो गर्भकाल उनका 76 से पहले या बाद में? पहले होगा।

तो जैसे ही ब्रह्मा दादा लेखराज शरीर छोड़ते हैं वैसे ही वो आत्मा प्रखर हो जाती है सूक्ष्म शरीर धारण करके। कौन? ब्रह्मा। और तीव्र वायब्रेशन वाली बन जाती है। इसलिए अव्यक्त वाणी में बोला है कि जो भूत-प्रेत आत्माएं सूक्ष्म शरीरधारी होती हैं वो वायब्रेशन को तीव्र गति से पकड़ती हैं। अगर कोई बंदा कोई खास दुःख के वायब्रेशन में फंसा हुआ है, मान लो, क्रोध के वायब्रेशन में फंसा हुआ है, या काम विकार के वायब्रेशन में फंसा हुआ है तो जो क्रोधी या कामी सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा होगी वो उसके वायब्रेशन को फट से पकड़ेगी और उसमें प्रवेश कर जाएगी। तो ये वायब्रेशन को पहले-पहले पकड़ने वाली आत्मा हुई; कौन? मन रूपी ब्रह्मा। ये जो मनुष्य सृ्ष्टि है, इसका पहले-पहले कनेक्शन है ब्रह्मा से। इसीलिए शिव बाप जो आत्माओं का बाप है, वो भी इस मनुष्य लोक, साकार में जब आते हैं तो जिस मनुष्य में प्रवेश करते हैं उसका नाम; पहले-पहले जिसमें प्रवेश करते हैं उसका नाम परमब्रह्म साबित हो जाता है। बड़े ते बड़ा ब्रह्मा। तो वो मन भी है और मन है कि पहले आत्मा है? हँ? पहले चलायमान मन है क्योंकि अपने को देह समझता है। फिर; क्योंकि नाम दिया ना ऊपरवाले ने ब्रह्मा, काम लेने के लिए। लेकिन वास्तव में तो सूक्ष्म मन है या शरीरधारी मनुष्य है? दादा लेखराज ब्रह्मा पुरुष थे या स्त्री थे? पुरुष थे। तो वो काम लेने के लिए, भले पुरुष तन है, काम लेने के लिए नाम रखा ब्रह्मा। ऐसे ही जो मनुष्य सृष्टि का बाप है, भल पुरुष रूप में था, फिर भी नाम रखा ब्रह्मा। ब्रह्मा माने? ब्रह्म – रहने का स्थान। माना जो भी बच्चे हैं वो कहाँ से निकलते हैं? माँ के पेट से निकलते हैं। उसे माँ ही तो कहते हैं। तो ये बेहद की मनुष्य सृष्टि है। इसमें भी जितने भी प्राणी जन्म लेते हैं उनका मूल कौन हुआ? माँ ब्रह्मा।

तो ब्रह्मा भी कोई चार हैं, पाँच हैं, एक का नाम तो ब्रह्मा नहीं है। तो जो अव्वल नंबर ब्रह्मा है, वो मन भी है। और जो ब्रह्मा है सो विष्णु भी है। जो ब्रह्मा सो विष्णु भी है, लेकिन विष्णु बनता कब है? जब उसे परिचय मिलता है आत्माओं के बाप से; क्या? कि तुम ज्योतिबिन्दु आत्मा हो। तो यज्ञ के आदि में परिचय मिला ज्योतिबिन्दु आत्मा का या मनुष्य सृष्टि के बाप को, कब परिचय मिला? बाद में या यज्ञ के आदि में? कब परिचय मिला? बाद में मिला। तो ब्रह्मा ने जब शरीर छोड़ा, सूक्ष्म शरीर धारण किया, उसके बाद की बात है। माने मनुष्य सृष्टि के बाप को आदि में परिचय नहीं मिला क्योंकि आदि में तो लाल लाइट के गोले को याद करते थे भगवान के रूप में। क्या? मनुष्य सृष्टि में यहूदी लोग भी लाल लाइट के गोले को याद करते थे। आग की ज्वाला को याद करते थे। और वेदों में भी अग्नि को ही सबसे पावरफुल देवता माना है। इन्द्र से भी ज्यादा पावरफुल है। तो अग्नि ज्योति स्वरूप है ना। ज्योति स्वरूप तो है लेकिन जितनी भी आत्मा रूपी ज्योति हैं, उन सबका कंट्रोलर नहीं है। क्या? सबका कंट्रोलर तो एक ही सुप्रीम सोल है। तो वो सुप्रीम सोल जब प्रवेश करता है मनुष्य सृष्टि के बाप में तो उस समय ये ज्ञान नहीं होता है। क्या? कि आत्मा ज्योतिबिन्दु है। ये ज्ञान तो बुद्धि की देवी ओमराधे मम्मा के द्वारा मिला कि जैसे आत्मा ज्योतिबिन्दु है, आत्माओं का बाप भी ज्योतिबिन्द होगा। तो परिचय पहली-पहली बार कब किसको मिलता है। और सिर्फ परिचय मिलने से ही काम नहीं बनता। जानने से ही काम नहीं बनता। प्रैक्टिकल में उस स्वरूप में स्थिर होने से काम बनेगा या सिर्फ जानने से काम बनेगा? तो प्रैक्टिकल में उस आत्मिक स्वरूप में, ज्योतिबिन्दु स्वरूप में स्थिर होना स्मृति के आधार पर वो मनुष्य सृष्टि के बाप का ही होता है।

A night class dated 5.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the first page was – Which soul gives the vashikaran mantra (the controlling mantra)? You children know that Ram, i.e. Father comes and gives the vashikaran mantra to you children. Why does He give? To conquer Maya and to become the conquerors of the world. So, it is as if you become conquerors of Maya by controlling the mind. It means that the mind has suffered defeat at the hands of Maya at some point of time in the past. So, the one who has suffered defeat is given vashikaran mantra to gain victory. And should you control the mind also or not? It is also said that if you conquer the mind you conquer the world. So, definitely what must have the mind also done earlier? Would it have conquered the soul or not? No? Would it not have? It would have gained victory. Only then is it said that control the mind also. So, the mind gained victory. It gained victory over whom? It gained victory over the soul. It gained victory over which soul? The one who is always a soul. It is a Supreme post-like, Vishnu-like soul in the beginning of the world. But, as soon as the Father, the Father of souls as well, the Father Shiv, who never gets controlled by anyone. Does He get controlled? He gives the vashikaran mantra. But the Father is called Ram. Are the speakers people of the world or is it the one who lives beyond this world? Are those who call Ram as Father the people of the world, worldly souls or are they the ones who live beyond the world? Who says Father Ram? Arey! Only those whose Father he is will say, will they not? Does the one who lives beyond this world have a Father?

So, the one who is everyone's Father, who does not have any Father, the one who is the Supreme Father, Supreme Soul, Himself comes and gives the vashikaran mantra. And why does He give? Hm? And whom does He give? Hm? Does He give simultaneously to everyone or do the takers take numberwise? They take numberwise. Among those who take numberwise, will there be anyone number one or not? The one who is number one, gives the vashikaran mantra at number one position; which mantra? Manmanaabhav. Merge into My mind. So, which soul gives that? The Supreme Soul gives; does it give while living in the supreme abode or does it give when it comes to this world, when it enters in the Father of the human world, the human souls? So, it gives the mantra to the one in whom it enters – What should you conquer? What should you conquer first? Hm? Should you conquer the mind or should you conquer Maya? Not Maya first. Maya is the daughter of that Father. That Father himself has given birth to Maya. In which Age? Hm? He gave birth in the dualistic Copper Age. He gave birth, did not He? So, the Maya whom He gave birth, whom does that Maya control first? Hm? She controls the mind. And the mind controls the first pleasure-seeking (bhogi) soul.

So, it was told – Become conquerors of Ravan through this vashikaran mantra. Ravan means the gathering of ten heads. When ten body conscious, degraded religions gather, then it is called Ravan. The entire world is ruled by Ravana. Who gives birth to that Ravana? The same mind. Will that mind be called intelligent? Hm? Will it be called? Will it not be called? But it has been said in the Gita – Intelligent man Arjun. Hm? If there is anyone intelligent among men, among human beings, then who is it? The one who recognized God first of all is intelligent. But that man Arjun comes under the control of the mind. Why? It is because while getting coloured by company, while getting coloured by the company of the followers of the founders of religions, he forgets his form. So, how does he give the vashikaran mantra? When the Father of souls comes, then first of all He reveals the form of the soul that you are not the children of the body conscious ones, you are not the bodies. What are you? You are a soul. And when the seed Father of the human world in the human world gets to know that I am a soul, a living soul, I am not a body, I am not an effigy of five elements, then the organs of the body; how many? Five sense organs, five organs of action. Five righteous organs, five unrighteous organs. These are the ten organs. And there are physical ones as well. But the one who controls them is someone else, the mind, the eleventh organ. It is very inconstant (chanchal). And unless that mind cooperates with an organ, no organ can seek its pleasure. So, the mind is the main organ.

That mind itself is actually Brahma; the Brahma, under whose control the entire world comes. Is Brahma shown in human form or is he visible in deity form? Hm? The form of Brahma that is depicted, is it a human form or a deity form with beard and moustache? Does it mean that he is vicious or viceless? Hm? He is full of vices. All the five vices. And these five vices are – lust, anger, greed, attachment, ego – these become the base (aadhaar); they take the support of the five elements – Earth, water, wind, fire, sky. So, they are ten in total. These are the ten forms of Ravan. The one who gives birth to them as well is Brahma. It means that the most righteous religion, which is called Satya Sanatan Dharma is established by Sanat Kumar. Who gives birth to that Sanat Kumar as well? Who gives birth? It is Brahma. Who gave birth to Sanat Kumar? Brahma gave birth, did not he? So, the birth that Brahma gave is about which time in the shooting period? Is it a topic of the beginning or of the middle? Is it a topic of the beginning? Nobody recognized at all in the beginning. Did they recognize? They did not recognize. Only Brahma got to know that my part is that of Brahma. He had visions, so he developed faith. As regards the first children, i.e. Sanat, Sanatan, Sanandan, Sanat Kumar, who are born through vibrations, through mental world (maanasi srishti), that is not known to anyone at all. So, when did they get to know? In seventy six. So, the children who are revealed in seventy six in the form of four Kumars, would they have entered first in the womb or were they revealed directly? They must have entered the womb. So, would their period of gestation (garbhkaal) be before 76 or after it? It will be before it.

So, as soon as Brahma Dada Lekhraj leaves his body, that soul becomes powerful by assuming a subtle body. Who? Brahma. And it becomes the one with strong vibrations. This is why it has been said in the Avyakt Vani that the subtle bodied souls of ghost and devils catch the vibrations very fast. If any person is entangled in the vibrations of a particular sorrow, suppose, he is entangled in the vibrations of anger or is entangled in the vibrations of the vice of lust, then the wrathful or lustful subtle bodied soul will immediately catch that vibration and will enter in him/her. So, this is the soul which first of all catches the vibrations; who? The mind like Brahma. The connection of this human world is first of all with Brahma. This is why when the Father Shiv, the Father of souls also comes in this human world, when He comes in a corporeal form, then the human being in whom He enters He names him; the one in whom He enters first of all is proved to be Parambrahm. The highest Brahma. And he is a mind also; and is he a mind first or a soul first? Hm? First he is an inconstant mind because he considers himself a body. Then; Because the above one (God) named him Brahma in order to extract work from him. But actually is he a subtle mind or a bodily human being? Was Dada Lekhraj Brahma a male or a female? He was a male. So, in order to extract a work, even though it is a male body, in order to extract work, he was named Brahma. Similarly, although the Father of the human world was in a male form, yet he was named Brahma. What is meant by Brahma? Brahm – The place of residence. It means that where do all the children emerge from? They emerge from the mother's womb. She is called a mother (Maa) only. So, this is an unlimited human world. Who is the origin of all the living beings getting birth in it? Mother Brahma.

So, Brahmas are also four, five; Brahma is not the name of one. So, the number one Brahma is mind as well. And the one who is Brahma is Vishnu as well. Brahma is Vishnu as well; but when does he become Vishnu? When he gets the introduction from the Father of souls; what? That you are a point of light soul. So, did he, the Father of the human world get the introduction of the point of light soul in the beginning of the Yagya or when did he get the introduction? Later on or in the beginning of the Yagya? When did he get the introduction? He got later on. So, it is about a period when Brahma left his body, after he assumed a subtle body. It means that the Father of the human world did not get the introduction in the beginning because in the beginning, they used to remember a sphere of red light in the form of God. What? Yahudis (Zoroastrians) also used to remember a sphere of red light in the human world. They used to remember a flame of fire. And even in the Vedas fire has been considered to be the most powerful deity. He is more powerful than Indra. So, fire is a form of light, isn’t it? It is a form of light, but he is not the controller of all the souls like lights. What? The controller of everyone is only one Supreme Soul. So, when that Supreme Soul enters in the Father of the human world, then they do not have this knowledge. What? The soul is a point of light. This knowledge was received from the Devi of intellect Om Radhey Mama that just as the soul is a point of light, the Father of souls will also be a point of light. So, when does one get the introduction first of all? And the task is not complete just by receiving the introduction. The task is not performed just by knowing. Will the task be performed just by becoming constant in that form in practical or will the task be done just by knowing? So, it is the Father of the human world alone who becomes constant in that soul form in practical, becomes constant in that point of light form on the basis of remembrance.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 29 Nov 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
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मनुष्य सृष्टि का बाप जब आत्मिक रूप धारण करे, ज्योतिबिन्दु बने, तभी तो सुप्रीम सोल से मिले; मेल कैसे होगा? एक चींटी हो और एक हाथी हो, दोनों का मेल तो होगा नहीं। इसलिए समान होना पड़े मिलन मनाने के लिए। तो जो मनुष्य सृष्टि का बाप है जो अपन को देह समझता था वो आत्मिक स्थिति में स्थिर होता है; कब? तारीख? 5 दिसंबर बताई। अव्यक्त वाणी में 5 दिसम्बर तारीख बताई। वो है अव्यक्त बापदादा के मिलन की प्रैक्टिकल स्टेज। कौनसे सन् का? जिस सन् में ब्रह्मा बाबा ने शरीर छोड़ा उसी सन् में राम वाली आत्मा ज्ञान में आती है, बेसिक नॉलेज लेती है, जो ब्रह्मा ने ज्ञान दिया था कि जैसे आत्मा ज्योतिबिन्दु है, अणोणीयांसम् है। जो गीता में भी लिखा हुआ था। गीता का तो एक्सप्लेनेशन यज्ञ के आदि में ही हुआ था या मध्य में, अंत में हुआ? आदि में ही हो चुका था। अणोणीयांसम। आत्मा अणु रूप है। तो मम्मा ने ये बात बताई आत्मा अणु रूप है, तो आत्माओं का बाप भी अणु रूप ही है, ज्योतिबिन्दु स्वरूप। और वो ज्योतिबिन्दु आत्मा जो है वो वास्तव में, उसका बाप का कनेक्शन तब ही होगा जब वो अपने को देह समझना बंद करे और अपने को किस स्मृति में टिकाए? मैं ज्योतिबिन्दु आत्मा।

तो मनुष्य सृष्टि का बाप पहली-पहली बार आत्मिक स्टेज में टिकता है, ज्योतिबिन्दु स्वरूप में टिकता है प्रैक्टिस करके कि मैं देह नहीं हूँ, मैं वास्तव में ज्योतिबि्न्दु आत्मा हूँ। जो भृकुटि के मध्य में रहती है और भृकुटि के मध्य में आज भी परंपरा में जो है बिन्दी लगाई जाती है आत्मा की यादगार। और वो भृकुटि भरी-पूरी कुटि आत्मा के रहने का घर है इस शरीर में। जब वारंट निकलता है तो पुलिस कहाँ पकड़ती है जाके पहले? कहाँ पकड़ती है? घर में जाके पकड़ती है कि जंगल में, होटलों में जाके पकड़ती है कहीं? पहले कहाँ हलल डालेगी? घर में जाके। तो आत्मा को अगर पकड़ना है तो भृकुटि के मध्य में ज्योति बिन्दु आत्मा को याद करना और स्मृति में रहना ताकि ये पक्का हो जाए कि मैं शरीर नहीं हूँ, ज्योतिबिन्दु आत्मा हूँ। ये प्रैक्टिस पहले-पहले किसकी पक्की हुई? मनुष्य सृष्टि के बाप की। और वो तिथि तारीख भी बता दिया, सन भी साबित हो जाता है कि ब्रह्मा के शरीर छोड़ने के बाद जो बच्चा पहले-पहले आत्मिक स्थिति में जन्म लेता है वो बच्चा है मानसी सृष्टि का वायब्रेशन को पकड़ने वाला पहला बच्चा राम वाली आत्मा। तो साबित हो गया कि शिव बाप वशीकरण मंत्र देते हैं राम वाली आत्मा को। देते हैं कि वो राम वाली आत्मा प्रैक्टिस करके लेती है? क्या है? हँ? वो देते हैं? वो सिर्फ ज्ञान देते हैं; क्या? वो सिर्फ ज्ञान देते हैं कि आत्मा और परमात्मा का रूप क्या है? रहने का धाम क्या है बेहद में? और काम क्या है? वो क्या देते हैं? बाप है तो क्या देगा? वर्सा ही देगा। बाप हो और वर्सा ने दे तो बाप काहे का? तो वो आत्माओं का बाप है। आत्माएं निराकार हैं। निराकार आत्माओं का बाप निराकारी ज्ञान देता है। निराकारी ज्ञान का वर्सा।

तो ये जो निराकारी ज्ञान है वो कहाँ से शुरू होता? कि पहले अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा प्रैक्टिकल में स्मृति में धारण करो। यहाँ से वशीकरण मंत्र शुरू हुआ। और अपन को आत्मा समझ फिर आत्माओं के बाप को याद करो। जो किसी के वश में नहीं है। वो सबको वश में करने वाला है। इस मनुष्य सृष्टि का कोई प्राणीमात्र उसको वशीभूत नहीं कर सकता। तो कौन वशीकरण मंत्र दे सकता है? वो ही जो किसी के वश में नहीं है वो वशीकरण मंत्र देते हैं। किसलिए देते हैं? हँ? माया को जीतने के लिए बच्चों को वशीकरण मंत्र देते हैं राम वाली आत्मा के थ्रू। क्योंकि वशीकरण मंत्र है याद, योग। योग का जो मंत्र है मनमनाभव, वो देने वाला कौन हुआ प्रैक्टिकल में? आत्माओं का बाप या मनुष्य सृष्टि का बाप? मनुष्य सृष्टि का बाप। तो जो मनुष्य सृष्टि का बाप है वो वशीकरण मंत्र को प्रैक्टिकल में धारण करके मनुष्यात्माओं को देता है। और बताता है कि ये जो मन रूपी चन्द्रमा है, बड़ा चंचल है, कलाओं में क्षीण होता है और फिर कलाओं में वृद्धि भी उसके होती है, परन्तु ये मन सबका जन्मदाता है, सारी मनुष्य सृष्टि के सभी प्राणीमात्र का जन्मदाता। और वो अव्वल नंबर कौन है? अव्वल नंबर है ब्रह्मा नामधारियों में अव्वल नंबर परमब्रह्म।

वो मन भी है ब्रह्मा। और ब्रह्मा सो अव्वल नंबर विष्णु भी है। और वो ब्रह्मा के रूप में स्थापना करना, विष्णु के रूप में पालना करने वाला और शंकर भी है। शं माना शांति, कर माने करने वाला। सारी सृष्टि में शान्ति पैदा करने वाला। कैसे? आत्माएं सबसे जास्ती कौनसे विकार से अशान्त होती हैं? काम विकार से। प्राणीमात्र अशान्त होता है। कामना की पूर्ति नहीं होती है तो फिर क्रोध में आ जाते हैं। लेकिन कितने भी क्रोध में आ जाएं, कोई इस मनुष्य सृष्टि के प्राणीमात्र, वो सारे संसार का विनाश नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि हर आत्मा का अपना-अपना एक दायरा है। इब्राहिम का दायरा है, उतनी ही आत्माओं को स्थापना करेगा, उतनी ही आत्माओं की मन-बुद्धि में धर्म की स्थापना करेगा या प्रभाव में लेगा; उतनी ही आत्माओं का सत्यानाश करेगा। ये आत्मा रूपी सितारे हैं ना। धरणी के या आसमान के? कहाँ के सितारे हैं? आसमान के सितारे हैं? आत्मा रूपी, मनुष्यात्मा रूपी, प्राणीमात्र की आत्मा रूपी जो सितारे हैं, वो कहाँ-कहाँ के सितारे हैं? धरणी के सितारे हैं या आसमान के सितारे हैं? आसमान के सितारे तो जड़ हैं। वो तो उदाहरण देने के लिए हैं। लेकिन वास्तव में जो चैतन्य आत्मा रूपी सितारे हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाले, वो तुम बच्चे हो। लेकिन नंबरवार हो। सबका अपना-अपना दायरा है।

जब नई सृष्टि की स्थापना के लिए ह्यूज ड्रामा कहो, ह्यूज सृष्टि कहो, ह्यूज बेहद का सृष्टि रूपी मकान कहो, उसकी रचना हुई थी, तो उस समय ये चैतन्य ईंटें तैयार की गई। मकान बनाने के लिए ईंटें तैयार होती हैं। तो ये चैतन्य ईंटें तैयार हुईं। फाउण्डेशन डालते हैं तो क्या करते हैं? ईंटें ही डालते हैं या बड़े-बड़े पत्थर भी डालते हैं? बड़े-बड़े पत्थर भी डालते हैं। हाँ, कोई छोटे पत्थर, कोई बड़े पत्थर। ऐसे ही इस सृष्टि रूपी मकान में पहला-पहला फाउण्डेशन किसका पड़ता है? जो दुनिया का बड़े ते बड़ा पत्थरबुद्धि बनता है। कहाँ है वो पत्थर? माउंट आबू। माउंट आबू बड़ा पत्थर है कि उससे भी बड़ा पत्थर कोई और है? माउंट आबू तो है देहधारियों के रूप में जिन्होंने देह धारण कर रखी है, फिर तपस्या की है। लेकिन तपस्या करके जो आत्मिक स्टेज में स्थिर हो जाते हैं, वो कहाँ हैं? कहाँ? वो है जहाँ नार्थ इंडिया में स्वरग की स्थापना होती है। क्या? एवरेस्ट चोटी। क्या? वो सबसे ज्यादा पावरफुल है।

इसलिए बताया कि जब इस सृष्टि में सारी मनुष्यात्माएं, सारे प्राणीमात्र, विकारों की दलदल में डूबने लगते हैं, तो मैं, चोटी बच जाती है, उसी को पकड़ के खींचता हूँ। इसलिए ब्राह्मणों को चोटी दिखाते हैं। कोई अव्वल नंबर ब्राह्मण है जो चोटी के मुआफिक है। पहला ब्राह्मण सो पहला देवता, सो पहला क्षत्रीय, सो पहला वैश्य, सो पहला शूद्र। सो ही फिर पहला ब्राह्मण बनता है। तो उस ब्राह्मण आत्मा को पकड़ के खींचता हूँ। क्या? सारी सृष्टि जलमयी पंक में डूब गई; सारी सृष्टि में बाढ़ आएगी पानी की? बाढ़ आती है तो पानी कैसा हो जाता है? हँ? गंदला हो जाता है। कीचड जैसा हो जाता। सब डूबने उतराने लगते हैं, सबके शरीर छूटने लगते हैं। एक ही बचता है। तो दिखाया, उस एक को पकड़ के खींचता हूँ। तो कब खींचा? हँ? पहले-पहले कब खींचा? देह के रूप में खींचा या आत्मा के रूप में खींचा पकड़ के? देहधारी के रूप में था, पत्थरबुद्धि था, तब खींचा। कब खींचा? सौ साल के संगमयुग में कब खींचा? आदि में, मध्य में, अंत में? अंत में खींचा। आदि में देह थे। देह के आधार पर आदि में खींचा। तो आत्मा का परिचय तो उस समय नहीं मिला। फिर दादा लेखराज ब्रह्मा निमित्त बनते हैं मन। जो सृष्टि रूपी मकान का पहला-पहला फाउण्डेशन स्वर्ग का जो ढ़ांचा बना था, वो कब बना था? जड़ ढ़ांचा। जैसे मकान बनाते हैं ना। तो पहले दिमाग में बात आती है। खाका खींचते हैं। फिर उसका वो नमूना बनाते हैं झोंपड़ी जैसा कि ऐसा-ऐसा मकान बनाएंगे।

तो ब्राह्मणों की दुनिया में पहले-पहले वो जड़ ढ़ांचा कहाँ तैयार हुआ? इंडिया में तैयार हुआ था या पाकिस्तान में? पाकिस्तान में तैयार हुआ था। पाकिस्तान में इसका ढ़ांचा बना कि नरक की दुनिया बन गई थी, खून की नदियाँ बह रही थी 1947 में। और उस खून की नदियों के बीच में, समन्दर के किनारे, एक परिवार ऐसा भी था, जो बड़े आराम से रहा पड़ा था, जो ब्रह्मवाक्य है कि मैं नरक के बीच स्वर्ग स्थापन करता हूँ। तो वो जड़ ढ़ांचा कराची में तैयार हुआ। फिर, भारतवर्ष में आ गए। और जब भारतवर्ष में आ गए, आत्मा का ज्ञान मिला, तो आत्मा चैतन्य है तो ढ़ांचा भी कैसा बनेगा? हँ? कैसा बनेगा? जड़ बनेगा कि चैतन्य बनेगा? चैतन्य बनता है। तो 1969 में जब ब्रह्मा ने शरीर छोड़ा था, तो ब्रह्मा का पहला बच्चा आत्मिक स्टेज में धारण करता है। और स्वधर्म की स्थापना के निमित्त बनता है। स्व माने आत्मिक धर्म माने धारणा। जो गीता में लिखा है – स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मो भयावह। (गीता 3/35) अपने धर्म में मर जाना अच्छा। शरीर छोड़ देना अच्छा। लेकिन देह का धर्म परधर्म है। इसकी स्मृति में शरीर छोड़ना, इससे तो दुःख की दुनिया में जनम मिलता है। क्या? दैहिक स्मृति में कोई शरीर छोड़ेगा, देह के संबंधियों की याद में शरीर छोड़ेगा, देह के पदार्थों की याद में शरीर छोड़ेगा, तो वो जो आत्मा है, बहुत दुःखी होगी, क्योंकि पांच तत्वों का जो संघात है उसे प्रकृति कहा जाता है। क्या? और वो प्रकृति जब तामसी बनती है तो बहुत दुःखदायी हो जाती है। तो दुनिया का सबसे जास्ती दुःख होता है कब? जब प्रकृति माता सारे संसार को कंट्रोल करती है।

When the Father of the human world assumes a soul form, becomes a point of light, only then will he meet the Supreme Soul; how will they match? If one is an ant and one is an elephant, then both cannot match at all. This is why you have to become equal to meet. So, the Father of the human world, who used to consider himself to be a body becomes constant in soul conscious stage; when? Date? It was told 5th December. The date 5th December was mentioned in the Avyakt Vani. That is the practical stage of meeting of Avyakt BapDada. Of which year? The year in which Brahma Baba left his body, in the same year the soul of Ram enters the path of knowledge, obtains the basic knowledge, the knowledge which Brahma had given that just as a soul is a point of light, anoneeyaamsam which was written in the Gita as well. Was the explanation of the Gita given in the beginning of the Yagya or in the middle or in the end? It was given in the beginning itself. Anoneeyaamsam. A soul is in the form of an atom. So, Mama narrated this topic that the soul is atom-like; so, the Father of the souls is also atom-like only, a point of light form. And that point of light soul in reality; it will have connection with the Father only when it stops considering itself to be a body and makes itself constant in which awareness? I am a point of light soul.

So, the Father of the human world first of all becomes constant in the soul conscious stage, in the point of light form by practicing that I am not a body, I am actually a point of light soul which lives in the middle of the forehead between the eyebrows (bhrikuti) and there is a tradition even to this day that a bindi is applied as a memorial of the soul. And that bhrikuti, the occupied house (bhari-poori kuti) is the home for the soul in this body. When a warrant is issued, then where does the police go and catch first? Where does it catch? Does it go to someone's home and catch or does it go and catch in the jungle or hotels? Where will it search first? By going to the home. So, if you have to catch the soul, then remember the point of light soul in the middle of the bhrikuti and remain in remembrance so that it becomes sure that I am not a body, I am a point of light soul. Who firmed up this practice first of all? The Father of the human world. And that day and date was also mentioned, the year is also proved that after Brahma left his body, the child who gets birth in soul conscious stage first of all, that child is the first child, the soul of Ram who catches the vibrations of the thought-born world. So, it is proved that Father Shiv gives the vashikaran mantra to the soul of Ram. Does He give or does the soul of Ram take by practicing? What is it? Hm? Does He give? He gives just knowledge; What? He just gives knowledge as to what is the form of the soul and the Supreme Soul. What is His unlimited abode of residence? And what is His task? What does He give? When He is the Father, what would He give? He would give inheritance only. If there is a Father and if he does not give inheritance, then of what use is the Father? So, He is the Father of souls. The souls are incorporeal. The Father of the incorporeal souls gives incorporeal knowledge. The inheritance of incorporeal knowledge.

So, where does this incorporeal knowledge start? First inculcate yourself as a point of light soul in practical awareness. The vashikaran mantra started from here. And consider yourself to be a soul and then remember the Father of souls who is not under anyone's control. He controls everyone. No living being of this human world can control Him. So, who can give him the vashikaran mantra? The same one who is not under anyone's control gives him the vashikaran mantra. Why does He give? Hm? In order to enable children to conquer Maya, He gives the vashikaran mantra through the soul of Ram because the vashikaran mantra is remembrance, Yoga. Who gives the mantra of Yoga, i.e. manmanaabhav in practical? Is it the Father of souls or the Father of the human world? The Father of the human world. So, the Father of the human world inculcates the vashikaran mantra in practical and gives to the human souls. And tells that this mind like Moon is very inconstant, becomes weak in celestial degrees and then his celestial degrees also increase, but this mind is everyone's creator, the creator of all the living beings of the entire human world. And who is that number one? The number one is the number one Parambrahm among all those who hold the name Brahma.

That Brahma is the mind also. And he is Brahma who becomes number one Vishnu as well. And that establishment in the form of Brahma, the one who sustains in the form of Vishnu and he is Shankar as well. Shan means shaanti (peace), kar means doer. The one who establishes peace in the entire world. How? Due to which vice do souls become disturbed the most? Due to the vice of lust. The living beings become disturbed. If the desires are not fulfilled, then they become angry. But howevermuch angry they may become, nobody can destroy all the living beings of this human world, cannot destroy the entire world. Why? It is because every soul has its own area of influence (daayraa). There is an area of influence of Ibrahim; He will establish only that many souls; he will establish religion in the minds and intellects of that many souls or influence them; he will ruin that many souls only. These are souls like stars, aren't they? Of the Earth or of the sky? They are stars of which place? Are they the stars of the sky? The souls like, human souls like, souls of the living beings in the form of stars are stars of which place? Are they stars of the Earth or the stars of the sky? The stars of the sky are non-living. That is for giving examples. But actually the living star-like souls playing the parts on this world stage are you children. But you are numberwise. Everyone has his own area of influence.

When the huge drama, huge world, huge unlimited world like house was created for the establishment of the new world, at that time these living bricks were prepared. Bricks are prepared to build a house. So, these living bricks got ready. When a foundation is laid, what do they do? Do they put only bricks or do they add big stones also? They add big stones also. Yes, some are small stones, some are big stones. Similarly, whose foundation is laid first of all in this world like house? The one who becomes the biggest stone-like intellect of the world. Where is that stone? Mount Abu. Is Mount Abu the big stone or is there any stone bigger than that? Mount Abu is in the form of bodily beings, who have assumed a body and then performed tapasya. But where are those who become constant in soul conscious stage after performing tapasya? Where are they? It is the place where heaven is established in north India. What? Everest peak. What? It is the most powerful one.

This is why it was told that when all the human souls, all the living beings start drowning in the muck of vices in this world, then I, catch the choti (lock of hair at the back of the head) which remains and pull them. This is why Brahmins are shown to have a choti. There is a number one Brahmin who is like a choti. The first Brahmin becomes the first deity, the first Kshatriya, the first Vaishya, the first Shudra. He alone then becomes the first Brahmin. So, I catch that Brahmin soul and pull him. What? The entire world drowned in the inundation of muck; will the entire world be inundated by water? When floods occur, then how does the water become? Hm? It becomes dirty. It becomes like muck. Everyone starts drowning, everyone starts leaving their bodies. Only one survives. So, it was shown, I catch that one and pull. So, when did He pull? Hm? When did He pull first of all? Did He pull in the form of a body or did He catch in the form of a soul and pull him? He pulled him when he was in the form of a bodily being, had a stone-like intellect. When did He pull? When did He pull in the 100 years Confluence Age? In the beginning, middle or in the end? He pulled in the end. They were bodies in the beginning. He pulled in the beginning on the basis of the body. So, the introduction of the soul was not received at that time. Then Dada Lekhraj Brahma becomes instrumental as mind. When was the first and foremost foundation of the world like house, the structure of heaven formed? The inert structure. For example, a house is built, is not it? So, first the topic emerges in the intellect. A map is drawn. Then its sample is made like a hut that we will build the house like this.

So, where was that inert structure prepared first of all in the world of Brahmins? Was it prepared in India or in Pakistan? It was prepared in Pakistan. Its structure was built in Pakistan that the world had become a hell; rivers of blood were flowing in 1947. And amidst those rivers of blood, on the sea shores, there was one such family also which was living very comfortably, for which there is a Brahmavaakya (Godly sentence) that I establish heaven amidst hell. So, that inert structure was prepared in Karachi. Then, they came to the Indian region. And when they came to the Indian region, when they got the knowledge of the soul, then the soul is living, so, how will the structure also be built? Hm? How will it be formed? Will it become inert or a living one? It will become a living one. So, when Brahma left his body in 1969, then the first child of Brahma inculcates soul conscious stage. And becomes instrumental in establishing swadharma. Swa means spiritual dharma, i.e. dhaarana (inculcation). It has been written in the Gita – Swadharme nidhanam shreyah pardharmo bhayaavah (Gita 3/35). It is better to die in one's own religion. It is better to leave the body, but the religion of the body is an alien religion. To leave the body in its awareness leads you to get birth in the world of sorrows. What? If someone leaves his body in the remembrance of the body, if he leaves the body in the remembrance of the relatives of the body, if he leaves the body in the remembrance of the things related to the body, then that soul will become very sorrowful because the combination of the five elements is called prakriti (nature). What? And when that nature becomes degraded (taamsii), then it causes a lot of sorrows. So, when is the extreme sorrow of the world caused? It is when the Mother Nature controls the entire world.
(continued)
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 Nov 2019

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कौन हुई प्रकृति माता? जगदंबा। जगदंबा क्यों दुखी कर देती कंट्रोल करके? क्योंकि जगदंबा में क्या कमी है जो दुःखी कर देती? और भगवान में क्या विशेषता है जो भगवान स्वर्ग बना देता है, सुख की दुनिया बना देता? जगदम्बा रौरव नरक की दुनिया बना देती। और भगवान स्वर्ग से भी ऊँची स्टेज, अतीन्द्रिय सुख की दुनिया बना देता है, जो नरक की दुनिया के बीच में स्वरग की दुनिया स्थापन होती है? क्या खासियत है दोनों में? जगदम्बा जो है वो बुद्धि इतनी तीक्ष्ण नहीं होती। जड़त्वमयी बुद्धि होती है। और जगतपिता की? चैतन्य बुद्धि होती है। इसलिए बोला बुद्धिमान नर अर्जुन। मनुष्यों के बीच में अगर कोई बहुत सबसे जास्ती बुद्धिमान है तो कौन है? क्या नाम दिया? अर्जुन अर्थात् सदभाग्य का अर्जन करने वाला। बड़े ते बड़ा, अच्छे से अच्छा सच्चा भाग्य, सद्भाग्य किसका बनता है? जिस तन में परमात्मा नहीं परमपिता प्रवेश करता है। उसका नाम देते हैं भागीरथ। भाग्यशाली रथ। इसलिए गीता में अर्जुन का रथ दिखा दिया है। रथ माने शरीर रूपी रथ।

तो उस शरीर रूपी रथ के द्वारा वशीकरण मंत्र मिलता है सारी सृष्टि को। क्या? देने वाला वशीकरण मंत्र कौन? प्रैक्टिकल में देता है? प्रैक्टिकल में नहीं देता है। वो प्रवेश करता है और जिसमें प्रवेश करता है, वो स्वयं बनता है। क्या? क्या बनता है? इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर किसी के वश में न आने वाला बनता है। तब सारी सृष्टि को वशीकरण मंत्र नंबरवार देता है। तो गोया मन वशीकरण मंत्र से मायाजीत बने। कौन बने? मन। किसका मन? ये मनुआ बच्चा किसका है पहले? हँ? अरे, ब्रह्मा मन है तो किसका बच्चा है? परमात्मा का बच्चा हुआ ना। कैसी आत्मा? परमात्मा। सुप्रीम सोल को परमात्मा कहेंगे? क्यों? माने आत्माओं के बीच में परमात्मा। सुप्रीम सोल को किसी से टैली, टैली नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि टैली तो उनके साथ किया जाता है जो एक जैसी जाति के हों। क्या? एक जैसे हों तो टैली किया जाए। वो जो सुप्रीम सोल, सुप्रीम फादर है, उसको तो किसी से टैली नहीं कर सकते। वो तो अभोक्ता है, अकर्ता है। और इस दुनिया में कोई आत्मा नहीं है जो अभोक्ता हो और अकर्ता हो। इसलिए उसको तो टैली करने का सवाल ही नहीं।

तो जिसमें प्रवेश करता है, वो है इस मनुष्य सृष्टि का हीरो पार्टधारी। जितने भी आत्मा रूपी पार्टधारी हैं, उमें वो हीरो का पार्ट बजाने वाला है। इसलिए उसका जो मन है, उसको कंट्रोल करने की बात है। मन को कंट्रोल किया। वो मन पहली रचना है। क्या? कबसे? कौनसे युग से? मन अपनी चंचलता कबसे करना शुरू करता है? कौनसे युग से? द्वैतवादी द्वापरयुग से चंचलता करना शुरू करता है। उससे पहले सतयुग त्रेता में मन चंचलता नहीं करता। कंट्रोल में रहता है। तो मन रूपी मनुआ; मनुआ कहो, मुन्नु कहो, मुन्नु बच्चे, नन्हे-मुन्हे बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? तो वो मनुआ कंट्रोल में रहना चाहिए। रचना है ना। रचयिता के कंट्रोल में रहना चाहिए। बच्चा बाप के कंट्रोल में न रहे; छोटा है तब तो कंट्रोल में रहना ही पड़े क्योंकि नाबालिग है, बड़ा हो जाए और कंट्रोल से बाहर हो जाए; अरे, बाप को ही झापड़ मारने लगे, तो कंट्रोल हुआ या कंट्रोल से बाहर हो गया? बाहर हो गया। ऐसा होना चाहिए? हँ? नहीं होना चाहिए। लेकिन बाप क्या है, मोह में आकर फिर भी कहता है मेरा बच्चा, मेरा बच्चा, मेरा बच्चा। करता है कि नहीं? हँ? मेरा-मेरा करता रहता है। तो ये जो मेरा-मेरा है वो छुड़ाने के लिए ही वशीकरण मंत्र है। क्या?

ये मेरा-मेरा जो कहने वाला है वो कौन है? आत्मा ही तो कहती है मेरा। कब कहती है? जब देहभान में है, तब कहती है या आत्माभिमान में है तब कहती है? आत्माभिमान में है तो आत्माओं का मेरा तो आत्माओं का बाप, मेरा तो एक शिव। दूसरा कोई नहीं है आत्माओं का कल्याण करने वाला। देह समझते हैं तो देह की संतान जो होते हैं उनको समझ लेते हैं ये मेरे बच्चे हैं। लेकिन वो कोई भी काम आने वाले नहीं हैं। क्या? देह, देह के संबंधी, सब धोखेबाज़ हैं। इसलिए बताया, कि मन जो है ना ये वशीकरण मंत्र से मायाजीत बने। क्या? मन को कंट्रोल करने वाली बात है। रावणजीत बनें। माया कहते हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को। और काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तभी आते हैं जब पांच तत्वों का शरीर हो। तो उसको कहते हैं मंदोदरी। पांच तत्व – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश जड़ हैं या चैतन्य हैं? मंदबुद्धि वाले पांच तत्व हैं या तीक्ष्ण बुद्धि वाले हैं? मंदबुद्धि वाले हैं। तो ये जो मंदबुद्धि वाले पांच तत्व हैं ये हो गए उसकी पत्नी मंदोदरी। किसकी? माया की। तो माया जब चाहती है तब प्रकृति को अपने कंट्रोल में कर लेती है। अपनी मुट्ठी में कर लेती है। हाथ मिलाय लेती है। तो दोनों को जीतना है। प्रकृतिजीत भी बनना है और रावणजीत भी बनना है। मायाजीत।

तो तुम प्रैक्टिस कर रही हो। क्या? कोई बच्ची की तरफ बाबा ने इशारा किया। बच्ची सामने बैठी होगी। तो बच्ची के सामने बैठकरके इशारा किया कि तुम बच्ची प्रैक्टिस कर रही हो। क्या प्रैक्टिस कर रही हो? तुम्हारा ये जो मन है ना इसको मनमनाभव – मेरे मन में तिरोहित करो। और मायाजीत बनो। जिस माया ने तुम बच्ची को कंट्रोल कर लिया। क्या? माया कौनसी बच्ची को कंट्रोल करती है? सृष्टि में किसे दिखाते हैं? कहते हैं पार्वती की अम्मा मैना ने अपनी बच्ची को अपने कंट्रोल में रखा हुआ था। उसको, जिसको उसने पति चुना, उसके नज़दीक नहीं जाने देती थी। तो क्ंट्रोल कर लिया ना। तो क्या करना है उस बच्ची को? हँ? माया को; मैना; नाम क्यों रखा मैना? पति से जो भी डायरेक्शन मिले तो साफ इंकार; मैं ना करूंगी। अपनी बच्ची की शादी उस लंगोटिया के साथ नहीं करूंगी। अरे, जिन्दगी निभानी तुमको है, (या) बच्ची को निभानी है? जब उसको पसन्द आ गई तो उसकी पसन्द के अनुसार काम करे। तो उसका नाम ही पड़ता है मैना। तो तुम बच्ची अभी प्रैक्टिस कर रही हो। क्या? क्या प्रैक्टिस कर रही हो? मन को कंट्रोल करने की प्रैक्टिस कर रही हो जिसके लिए बाबा रोज़-रोज़ बच्चों को समझाते हैं कि मनमनाभव। मेरे मन में समा जा। कौन समझाते रहते हैं? बाबा या बाप आत्माओं का? समझाना कौन करता है और सुनाना कौन करता है? हँ? सुनाना करता है वो जो सिर्फ सुनता है। उसके अन्दर प्रवेश करके कोई आत्मा सुनाती है। वो सुनता है और सुनाता है। समझता कुछ नहीं। कौन? ब्रह्मा। और समझाता कौन है? हँ? जो खुद समझेगा वो दूसरों को समझाएगा या जो बेसमझ बच्चा है वो समझाएगा? इसलिए जो कृष्ण बच्चा है, उसकी पूजा बच्चे के रूप में होती है या समझदार के रूप में होती है? हँ? इन्नोसेन्ट बच्चा है। उसी रूप में उसकी पूजा होती है। कृष्ण के बड़े रूप की पूजा नहीं होती है।

तो बताया – बाबा रोज़-रोज़ बच्चों को समझाते रहते हैं कि मनमनाभव। क्या? मेरे मन में समा जा। इस दादा लेखराज के मन में न समा जा। या कोई भी धरमपिता के मन में न समा जा। क्या समझाते हैं? और कौन समझाते हैं? मनुष्य सृष्टि का बाप समझाते हैं। साकार है कि निराकार? वो साकार भी बनता है, निराकार भी बनता है। बाबा तब कहा जाता है जब देहधारी हो। तो ये संबंधी ऐसे हैं जो देह से कनेक्टेड हैं। लेकिन बाप का ये संबंध ऐसा है जो आत्माओं का बाप ही बनता है, दूसरा कोई संबंध नहीं बनता। तो ये मनमनाभव वशीकरण मंत्र है ये। क्या? कौन देता है? कौन आत्मा देती है? कौनसी आत्मा देती है – वो या ये? वो ये देती है जो खुद वश में करती है अपने मन को। अपने बच्चे को अपने कंट्रोल में करे। बच्चा कंट्रोल में ही नहीँ आए और कंट्रोल से बाहर बना रहे तो काम बिगड़ता रहेगा या सुधरेगा? बिगड़ता रहेगा। तो ये जो बच्चा है मनुष्य सृष्टि का, सतयुग के आदि से ही वो बच्चा जन्म लेता है। कौन हुआ? दादा लेखराज उर्फ कृष्ण की आत्मा उर्फ राजा विक्रमादित्य की आत्मा उर्फ दादा लेखराज की आत्मा। ये बच्चा बुद्धि आत्मा है। अपनी अकल नहीं है। राजा विक्रमादित्य को अपनी अकल थी कि शिवलिंग की पूजा करना है? हँ? अपनी अकल नहीं थी। उसके बाप ने उसको अकल दी। तो मन जो है वो चंचलता करता है। मन रूपी ब्रह्मा है, ये बच्चा है। ये बच्चा बुद्धि है और उसका बाप सालिमबुद्धि है, सगीरबुद्धि। वो है मनुष्य सृष्टि का बाप। जो मनुष्य सृष्टि का बाप है उसका कर्तव्य है अपने बच्चे को कंट्रोल में करना। नहीं तो बच्चा बिगड़ जाता है (अगर) कंट्रोल में न किया मोह में आकरके।

तो बताया – बाबा रोज़-रोज़ बच्चों को समझाते रहते हैं। क्या समझाते रहते हैं? मत मना भव। मेरे मन में समा जा। कब समा जा? कलियुग के अंत में जब तेरा मन चंचल है 16000 रानियों में, तब समा जा या जब मन अचल हो जाए, एक की स्मृति में टिक जाए, कर्मेन्द्रियों से करम करता भी रहे, तो भी कर्मेन्द्रियों के भोग को स्वीकार न करे। ऐसी स्टेज बन जाए मन की तब की बात है। ऐसे मन में समा जा। कैसे मन में समा जा? चंचल मन में समा जा या अचल मन में समा जा? अचल मन में समा जा।

तो बाबा इस बात के लिए रोज़ समझाते रहते हैं, वशीकरण मंत्र, तो अभी कौनसा वशीकरण मंत्र जपते रहें? हँ? वो है ना। मंत्र जपे तिलक लगे। भक्तिमार्ग में कहते हैं ना। तुलसीदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर। क्या? कौन चंदन घिसें? ज्ञान का सुगंधमय, सुगंध से भरा हुआ चंदन कौन घिसे? तुलसीदास। घिसे माना मंथन करे। कौन घिसे? नाम क्या दे दिया? तुलसीदास। किसका दास बन गया? अरे! तुलसी का दास बन गया या राधा का दास बन गया? हँ? तुलसी का दास बन गया। अरे! तुलसी जो है वो स्वयं दासी के रूप में आंगन में रहती है कि बेडरूम में रहती है? कहाँ रहती है? आंगन में रखी जाती है। तुलसी वृंदा का नाम है। वो वृंदा खुद ही भगवान का सेवा-सुश्रुषा छोड़करके, भगवान की बंदी बनकरके रहना छोड़ दिया और राक्षसराज जालंधर की पत्नी बन गई। उसे पसन्द कर लिया। वो तो खुद ही दासी बन जाती है राक्षसों की। तो उस तुलसी का दास बन गया। कौन? तुलसीदास। ये तुलसीदास कौन था? ब्रह्मवाक्य मुरली में बोला है- शास्त्रों में, अपने-अपने शास्त्रों में अपनी ही महिमा कर दी है। तो रामायण शास्त्र में कौनसी आत्मा ने अपनी महिमा की? राम वाली आत्मा ने महिमा कर दी। चाहे वो तुलसीकृत रामायण हो और चाहे वो वाल्मीकी रामायण हो द्वापरयुग की। जैसे ये इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, आदि द्वैतवादी धरमपिताएं आते हैं।

तो बताया – तुलसीदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर। रघु माने सूर्यवंश का जो वीर है, साक्षात सूर्य, ज्ञान सूर्य, भगवान ऊँच ते ऊँच, वो क्या करते हैं? जो तुलसीदास चंदन घिसते हैं, ज्ञान की मंथन-चिंतन करते हैं, उनका अपना बन जाता है ज्ञान। मंथन करेंगे तो अपना बनेगा। मंथन नहीं करेंगे तो अपना नहीं बनेगा। जैसे भोजन खाते हैं। चबाएंगे तो रस बनेगा। लार बुझेगी। और वो खून बनाएगा। खाना खा लिया और हडप गए अन्दर तो वो खून नहीं बनाएगा। ऐसे ही जो ईश्वर ने ज्ञान दिया है, अकूत ज्ञान के भण्डार में जो दिया है, सिर्फ सुन लिया, दूसरों को सुना दिया, उससे कुछ फायदा नहीं होगा। क्या करना है? जो दिया है उसका मंथन करना अन्दर-अन्दर। और मंथन कब चलता है? क्या? मंथन कब होता है? जब दूसरी आत्माओं के – यज्ञात् भवति। (गीता 3/14) क्या? सेवा करेंगे। यज्ञ सेवा जितनी हम करते हैं उतना मंथन खुद ही चलता है। चलाना नहीं पड़ता। यज्ञात् भवति भूतानि। यज्ञ सेवा जितनी करेंगे उतनी प्राणियों की उत्पत्ति होगी। उत्पत्ति कब होगी? जब मनन-चिंतन-मंथन करेंगे। तभी अपनी प्रजा बनेगी। क्या? प्रजा माने बच्चे। रचना। बाप को रचना रचने के लिए क्या करना पड़ता है? हँ? अरे! देह का मंथन करना पड़ता है ना। तब ही तो बच्चा पैदा होता है। ऐडी-चोटी की ताकत लगाता है मंथन करने के लिए। तभी पैदाइश होती है रचना की। तो ऐसे ही ये बेहद की बात है। ज्ञान का मनन-चिंतन-मंथन कब चलेगा? जब ईश्वरीय सेवा करेंगे। ईश्वरीय सेवा करने से प्राणियों का जन्म होता है। श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ प्राणी कौनसे हैं? ब्राह्मण धर्म के। ब्रह्मा से उत्पन्न होने वाले। उन ब्राह्मणों की रचना होती है। ओमशान्ति।

Who is mother nature? Jagdamba. Why does Jagdamba make you sorrowful by controlling? It is because - what is the weakness in Jagdamba that she makes you sorrowful? And what is the specialty in God that God establishes heaven, establishes a world of happiness? Jagdamba establishes raurav narak (extreme hell). And God establishes a stage higher than heaven, a world of supersensuous joy, so that a world of heaven is established in the midst of the world of hell? What is the specialty in both of them? Jagdamba's intellect is not so sharp. Its intellect is inert. And that of the world Father (Jagatpita)? His intellect is living. This is why it was said 'intelligent man Arjun'. If there is anyone most intelligent among the human beings, then who is it? What was the name given? Arjun, i.e. the one who earns good fortune. Who earns the biggest and best true fortune (sadbhaagya)? The body in which the Supreme Father enters and not the Supreme Soul. He is named Bhaagirath. Fortunate Chariot. This is why Arjun's Chariot has been depicted in the Gita. Chariot means body like Chariot.

So, the entire world gets the vashikaran mantra through that body like Chariot. What? Who gives the vashikaran mantra? Does He give in practical? He does not give in practical. He enters and the one in whom He enters becomes himself. What? What does he become? He becomes the one who doesn't come under anyone's control on this world stage. Then he gives the vashikaran mantra to the entire world numberwise. So, the mind should become conqueror of Maya through the vashikaran mantra. Who should become? The mind. Whose mind? To whom does this mind like child belong first? Hm? Arey, if Brahma is mind, then whose child is he? He is the child of the Supreme Soul, is not he? What kind of a soul? The Supreme Soul. Will the Supreme Soul be called Parmaatma? Why? It means the Supreme Soul among the souls. The Supreme Soul cannot be tallied with anyone. Why? It is because tallying is done between people belonging to one category. What? If they are alike, they can be tallied. The one who is the Supreme Soul, the Supreme Father cannot be tallied with anyone. He is abhokta (the one who does not enjoy any pleasure), akarta (non-doer). And there is no soul in this world who is abhokkta and akarta. This is why there is no question of tallying Him at all.

So, the one in whom He enters is the hero actor of this human world. He is the one who plays the hero's part among all the actor-like souls. This is why it is about controlling his mind. The mind was controlled. That mind is the first creation. What? Since when? From which Age? When does the mind start its inconstancy? From which Age? It starts becoming inconstant from the dualistic Copper Age. Before that the mind does not show inconstancy in the Golden Age and Silver Age. It remains under control. So, the mind like manua; call it manua, munnu, munnu child; what is there in your fist O little child? So, that mind should remain under control. It is a creation, is not it? It should remain under the control of the creator. If the child does not remain under the Father's control; when he is young, he has to remain under control because he is a minor; when he grows up, he goes out of control; arey, if he starts slapping the Father himself, then is he under the control or out of control? He is out of it. Should it happen so? Hm? It should not happen. But the Father, out of attachment says – My child, my child, my child. Does he say so or not? Hm? He keeps on saying 'mine, mine'. So, the vashikaran mantra is only to liberate you from this 'mine, mine'. What?

Who's this who says 'mine, mine'? It is the soul itself who says 'mine'. When does it say? Does it say when it is in body consciousness or does it say when it is in soul consciousness? When you are in soul consciousness, then 'mine' for the souls is the Father of souls; One Shiv is mine. There is none else who causes the benefit of the souls. When you consider yourself to be a body, then you consider the children of the body to be your children. But none of them are not going to prove useful. What? The body, the relatives of the body, everyone is a cheat. This is why it was told that the mind should become a conqueror of Maya through this vashikaran mantra. What? It is about controlling the mind. One should become conqueror of Ravan. Lust, anger, greed, attachment, ego is called Maya. And lust, anger, greed, attachment, ego emerge only when there is a body made up of the five elements. Then it is called Mandodari. Are the five elements – Earth, water, air, fire, sky inert or living? Do the five elements have a weak intellect (mand buddhi) or a sharp intellect? They have a weak intellect. So, these five elements with a weak intellect are his wife Mandodari. Whose? Of Maya. So, whenever Maya wishes it brings the nature under its control. She takes her into her fist (mutthi). She joins hands with her. So, one has to conquer both of them. One has to become conqueror of Prakriti as well as conqueror of Ravan. Conqueror of Maya.

So, you are practicing. What? Baba pointed towards a daughter. The daughter must be sitting in the front. So, while sitting in front of the daughter He gave a hint that daughter, you are practicing. What are you practicing? Merge your mind in My Mind – Manmanaabhav. And become conqueror of Maya. The Maya who controlled you daughter. What? Which daughter does Maya control? Who is shown in the world? It is said that Parvati's mother Maina had kept her daughter under her own control. She did not used to allow her to go near the one whom she had chosen as her husband. So, she controlled her, did not she? So, what should that daughter do? Hm? Maya; Maina; why was the name 'Maina' coined? Whatever direction is received from the husband, she says a blunt no. I will not do (mai naa karungi). I will not solemnize the marriage of my daughter with that person who wears a loin cloth (langotiya). Arey, are you supposed to spend life with him or is your daughter supposed to spend? When she has liked him, then she should do as per her liking. So, her name itself is coined as Maina. So, daughter, you are now practicing. What? What are you practicing? You are practicing to control the mind for which Baba explains to the children everyday – Manmanaabhav. Merge into My mind. Who keeps on explaining? Baba or the Father of souls? Who explains and who narrates? Hm? Narration is done by the one who just listens. A soul enters into him and narrates. He listens and narrates. He does not understand anything. Who? Brahma. And who explains? Hm? Will the one who understands himself explain or will the foolish child explain? This is why is child Krishna worshipped in the form of a child or in the form of an intelligent person? Hm? He is an innocent child. He is worshipped in the same form. Krishna is not worshipped in a grown-up form.

So, it was told – Baba keeps on explaining everyday – Manmanaabhav. What? Merge into My mind. Do not merge into the mind of this Dada Lekhraj. Or do not merge into the mind of any founder of religion. What does He explain? And who explains? The Father of the human world explains. Is he corporeal or incorporeal? He becomes corporeal as well as incorporeal. He is called Baba when he is a bodily being. So, these relatives are such that they are connected with the body. But this relationship of the Father is such that He becomes the Father of souls only; no other relationship is established with Him. So, this Manmanaabhav is a vashikaran mantra. What? Who gives? Which soul gives? Which soul gives – That one or this one? It is given by the one who controls his own mind. Someone tries to control his child. If the child doesn't come under his control at all and remains out of control, then will the task keep on spoiling or will it improve? It will keep on spoiling. So, this child of the human world, that child keeps on getting birth from the beginning of the Golden Age itself. Who is it? The soul of Dada Lekhraj alias the soul of Krishna alias the soul of King Vikramaditya alias the soul of Dada Lekhraj. This is a soul with a child-like intellect. He does not have his own intelligence. Did King Vikramaditya have his own intelligence that he should worship Shivling? Hm? He did not have his own wisdom. His Father gave him the wisdom. So, the mind shows inconstancy. The mind like Brahma is a child. This one has a child-like intellect. And his Father is grown-up, mature. He is the Father of the human world. It is the duty of the Father of the human world to control his child. Otherwise, if he does not control him out of attachment, then the child spoils.

So, it was told – Baba keeps on explaining to the children everyday. What does He keep on explaining? Mat manaa bhav. Merge into My mind. When should you merge? Should you merge in the end of the Iron Age when your mind is inconstant in 16000 queens or is it about the time when the mind becomes unshakeable, when it becomes constant in the remembrance of one, when it keeps on performing actions through the organs of action and yet it does not experience the pleasure of the organs of action? It is about such time when the mind achieves such a stage. You should merge your mind in such a mind. In what kind of a mind should you merge? Should you merge into the inconstant mind or in an unshakeable mind? You should merge into an unshakeable mind.

So, Baba keeps on explaining everyday for this topic, vashikaran mantra; so, which vashikaran mantra should we keep on chanting now? Hm? It is that, is not it? One should chant the mantra and get the tilak applied. It is said on the path of Bhakti, isn’t it? Tulsidas chandan ghisein tilak det Raghubir (Tulsidas rubs the sandalwood and Raghubir applies the tilak). What? Who rubs the sandalwood? Who rubs the fragrant sandalwood full of nice smell? Tulsidas. Rubs means churns. Who rubs? What was the name given? Tulsidas. Whose daas (servant) did he become? Arey! Did he become the servant of Tulsi or did he become the servant of Radha? Hm? He became the servant of Tulsi. Arey! Does Tulsi herself live in the courtyard of a house in the form of a maid or does she live in the bedroom? Where does she live? She is placed in the courtyard (aangan). Tulsi is the name of Vrinda. That Vrinda herself left serving God, left being the person of God and became the wife of demon king Jalandhar. She liked him. She herself becomes the maid of demons. So, he became the servant of that Tulsi. Who? Tulsidas. Who was this Tulsidas? It has been said in Brahmavaakya Murli - People have praised themselves in the scriptures. So, in the scripture Ramayana which soul praised itself? The soul of Ram praised [itself]. Be it the Ramayana written by Tulsi[das] or be it the Ramayana written by Valmiki in the Copper Age. Just as these dualistic founders of religions like Ibrahim, Buddha, Christ, etc. come.

So, it was told – Tulsidas rubs the sandalwood and Raghubir applies the tilak. Raghu means the brave man of the Sun dynasty, the Sun Himsef, the Sun of Knowledge, the highest on high God; what does He do? The sandalwood that Tulsidas rubs; he thinks and churns the knowledge; the knowledge becomes his own; when you churn, it will become yours. If you do not churn, then it will not become yours. For example, you eat food; if you chew it, it will become juice. The saliva will mix and it will make blood. If you eat food and gobble it in, then it will not make blood. Similarly, the knowledge that God has given, whatever He has given in the inexhaustible storehouse of knowledge, if you just listen, narrate to others, then it will not cause any benefit. What do you have to do? Whatever you have been given should be churned inside. And when does churning take place? What? When does churning take place? When, for the other souls – Yagyaat bhavati (Gita 3/14) What? When you serve them. The more we serve the Yagya, the more the churning takes place automatically. You don't have to churn. Yagyaat bhavati bhootaani. The more you serve the Yagya, the more living beings will be born. When will the creation take place? When you think and churn. Only then will your praja (subjects) be created. What? Praja means children. Creation. What does the Father have to do to create? Hm? Arey! He has to churn the body, is not it? Only then is a child born. He uses the power from his heel to his head to churn. Only then does the creation take place. So, similarly, this is an unlimited topic. When will thinking and churning of knowledge take place? When you do Godly service. Living beings are born by doing Godly service. Who are the most righteous living beings? Those of Brahmin religion. Those who are born from Brahma. Those Brahmins are created. Om Shanti.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2437, आडियो 2923, दिनांक 23.02.2018
VCD 2437, Audio 2923, date 23.02.2018
रात्रि क्लास 5.4.1967
Night Class dated 5.4.1967
VCD-2437- Bilingual

समय- 00.01-19.43
Time- 00.01-19.43


रात्रि क्लास चल रहा था – 5.4.1967. पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – मनमनाभव यानी वशीकरण मंत्र। कैसा मंत्र? वश में करने वाला मंत्र। माना? वश में करना माना बेवश बनना। और ये वश में करना, वशीभूत करना, ये आत्माओं का काम है, जो भोगी हैं, या जो सदा अभोक्ता है, उसका काम है? किसका काम है? दोनों तरह की आत्माएं हैं। इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर भी पार्ट बजाती हैं। एक है अभोक्ता, अक्षर, कभी भी क्षरित न होनेवाली। इस दुनिया में भी आके पार्ट बजाती है तो भी क्षरित नहीं होती। दूसरी हैं क्षर। वो गीता में भी बोला है – क्षर माना क्षरित होने वाली। पतित होने वाली। शक्ति क्षीण करने वाली। तो जो शक्ति क्षीण करने वाली हैं, क्षर हैं, वो सब भोगी हैं। और भोग सौ परसेन्ट स्वस्थिति में रहकर किया जा सकता है या देहभान में रहकर किया जा सकता है? सौ परसेन्ट स्वस्थिति में रहकर किया जाए, तो वो तो एक के लिए ही संभव है। वो सौ परसेन्ट स्वस्थिति में रहता है और सौ परसेन्ट अभोक्ता है। उसे भोग करने की दरकार ही नहीं। भोग करने वाला जरूर वश में करेगा। स्वतंत्र बनेगा, स्वतंत्र बनाएगा कि स्वतंत्र बनना चाहेगा? लेकिन जब तक स्वतंत्र रहेगा तब तक स्वतंत्र रखना पड़े। और जब वशीभूत करेगा, उनको वश में करेगा, तो प्राकृतिक नियम है, उसको भी वश में आना पड़ेगा।

तो एक ही आत्मा है जो कभी किसी को वशीभूत नहीं करती। परतंत्र नहीं बनाती। क्या नाम है? स्वतंत्र रहो, स्वतंत्र रहने दो। इसलिए इस सृष्टि पर आता भी है सुप्रीम सोल, तो सभी आत्माओं को स्वतंत्र छोड़ता है। चाहो तो मेरी बात मानो, चाहे? चाहे न मानो। कोई दबाव नहीं। बाकी जो भोगी आत्माएं हैं, सब ऐसी ही हैं। जो वशीभूत होती हैं और वश में करना चाहती हैं। इसलिए वो क्षरित होने वाली हैं। परन्तु क्षरित होने वाली आत्माओं में भी एक आत्मा ऐसी है, जब अक्षर इस सृष्टि पर आता है, अभोक्ता इस सृष्टि पर आता है, तो दूसरों को वश में करना, भूलना चाहती है, भूलने का पुरुषार्थ करते हैं, और भूल ही जाती हैं। 500-700 करोड़ मनुष्यात्माओं से लेकर गिनती में आने वाली 700-750 करोड़ मनुष्यात्माएं भी हैं। लेकिन एक ही ऐसी आत्मा है जो उस परमपुरुष परमपिता सुप्रीम सोल के पूरे कनेक्शन में आ पाती है। इसलिए वो भी सदाकाल के लिए तो नहीं कि भूत-भविष्य-वर्तमान, सदाकाल के लिए अभोक्ता बन जाए, लेकिन कुछ काल के लिए बनती है या नहीं बनती है? जैसे कोई भी धरमपिताएं आए तो उनका कार्यकाल ज्यादा से ज्यादा सौ साल। सौ साल के अन्दर वो अपने धर्म की स्थापना कर देते हैं। ऐसे ही जो सुप्रीम सोल सदैव स्वस्थिति में रहने वाला सदा शिव है, वो भी इस सृष्टि पर आता है तो सौ साल के अन्दर ही स्वधर्म की स्थापना करता है। स्व क्या है? आत्मा। आत्मिक धर्म की स्थापना करता है, देह धर्म की नहीं। देह विनाशी, देह के धर्म भी विनाशी। आत्मा अविनाशी तो आत्मा का जो धर्म है, स्वधर्म, वो भी अविनाशी।

लेकिन ये सृष्टि जो है वो अकेली आत्मा से नहीं बनती है पूर्ण। क्या? ये सृष्टि अकेली आत्मा से तो नहीं चलेगी। सृजन करने के लिए सृष्टि में दो चाहिए। क्या? एंटीसैक्स भी चाहिए कि नहीं चाहिए? तो वो सुप्रीम सोल जो सदा शिव है, स्वस्थिति में रहने वाला है, वो भी इस सृष्टि में आता है तो भोगी आत्माओं के बीच में ऐसी आत्मा चुनता है, जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर होते हुए भी, जब तक उसके आने का टाइम होता है, तब तक आत्मिक स्थिति में रहती है। क्या? परमपद जिसे कहा गया है इस सृष्टि रूपी रंगमंच में वो कहते हैं विष्णुपद। नो विष एट आल। विषहीन। अंतिम जनम तक भी विष नहीं होता। माना ऐसी आत्मिक स्थिति धारण करके रहता है कि कैसे? इस भक्तिमार्ग की दुनिया में भी ऐसे धर्म संप्रदाय हैं या नहीं जो सिर्फ एक लिंग को मानते रहे? और ये परंपरा, जबसे वेद बने, तबसे चलती रही। क्या? वेदवाणी ये कहती है एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति। इस संसार में एक ही सद्; सद् माने सच्चा; विप्रा माने ब्राह्मण; एक ही सच्चा ब्राह्मण हैं, जो अनेक प्रकार से गाया हुआ है।

ब्राह्मण किसे कहते हैं? ब्राह्मण उसे कहते हैं जो पहली बार तो छी-छी गर्भ से जन्म लेता है। इस दुनिया में कोई भी बच्चा पैदा होता है तो छिछरे के साथ जन्म लेता है या शुद्ध बच्चा जन्म लेता है? कोई भी प्राणीमात्र हो। हँ? शुद्ध जन्म लेता है? छिछरे के साथ जन्म लेता है। तो जन्म लेता है तो पहला जन्म है ब्राह्मण का जो गंदगी के साथ होता है। फिर ब्राह्मण सच्चा तब कहा जाता है जब उसका दूसरा जन्म माना जाता है – द्विज। द्वि माने दो। ज माने जन्म। दूसरा जन्म लेता है तब उसे कहा जाता है द्विज। माने दूसरा जन्म कौनसा? गर्भ से जन्म लिया हुआ शरीर ही नहीं। उस शरीर में यज्ञोपवीत धारण करे। क्या बोल दिया? यज्ञ। आज के यज्ञों की बात नहीं है। द्रव्य स्वाहा करते हैं, घी, अनाज, वगैरा-वगैरा। नहीं।

सृष्टि के आदिकाल में जब वो अक्षर सुप्रीम सोल आया था, सदा शिव जिसे कहते हैं, वो स्वयं तो किसी को वशीभूत नहीं करता, स्वयं किसी के वश में आता भी नहीं। लेकिन जिसमें प्रवेश करता है वो सबसे बड़ा वशीकरण मंत्र लेने वाला है। वशीभूत करने वाला। ऐसी योग की शक्ति अपने अन्दर उत्पन्न करता है। किससे योग लगाकर? जिससे योग लगाकर दुनिया के बड़े-बड़े धरमपिताएं – इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, आदि, इतनी बड़ी सल्तनत को वश में करने वाले, उन निराकारी स्टेज में रहकरके, निराकारी शिव को याद करके, भले कितनी भी कठिनाई हो, तो भी उस कठिन स्टेज में भी, उस निराकार एक शिव आत्मा को याद करके पावर लेते हैं। कौनसी पावर? हँ? याद की पावर। लेकिन वो उस सुप्रीम सोल को याद नहीं करते। न जानते हैं, न पहचानते हैं जो सदा शिव कहा जाता है। लेकिन वो जिसमें प्रवेश करता है साकार तनधारी मनुष्य सृष्टि के बीज में, उसको पहचान लेते हैं। कब? जब वो निराकारी स्टेज धारण करता है। तो भी उनमें इतनी शक्ति आ जाती है कि इतनी दुनिया की बड़ी-बड़ी जेनरेशन को कंट्रोल कर लेते हैं। अपने पक्ष में कर लेते हैं।

वो धरमपिताओं ने भी कभी वो वशीकरण मंत्र लिया होगा कि नहीं? जिसको योगबल कहते हैं। क्या है वशीकरण मंत्र? आत्मा की शक्ति है, जिस आत्मा में मन-बुद्धि रहती है, मन-बुद्धि की शक्ति वो आत्मा ऐसी शक्तिशाली हो जाए कि वायब्रेशन की शक्ति से ही अनेकों को चेंज कर दे वायब्रेशन से। हाँ, कोई में ये ताकत कम होती है, कोई में ज्यादा होती है। मिसाल के तौर पर जैसे नेहरूजी थे। उनके पीछे से लोग बहुत बुराई भी करने वाले थे। लेकिन जब सामने आकरके भाषण करते थे, तो उनके वायब्रेशन में आकरके सारी ही जेनरेशन उस समय तो उनके पक्ष में ही हो जाती थी। तो ये कौनसी पावर हुई? हँ? आत्मा की दृष्टि की पावर कहें, वो कर्मेन्द्रियों की पावर कहें या मन-बुद्धि के वायब्रेशन की पावर कहें? तो इसको कहा जाता है विज्ञान। वि माने विशेष, ज्ञान माने ज्ञान। वो सुप्रीम सोल क्या देता है? ज्ञान देता है या विज्ञान देता है? कौनसी पावर देता है? ज्ञान की पावर देता है। देखा जाए तो वो ज्ञान की पावर सर्वोपरि पावर है। परन्तु प्रैक्टिकली अभ्यास में लाई जाए तब ही सर्वोपरि पावर बन सकती है। इसलिए गीता में कहा है – न हि ज्ञान सदृशम पवित्रम इहि विद्यते। (गीता 4/38) इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कोई भी चीज़ नहीं। दूध है, घी है, पवित्र है, प्योर है तो ज्यादा ताकतवर होगा या मिक्सचरिटी है तो ज्यादा पावरफुल होगा? पवित्रता में ताकत होती है।

तो जो सिर्फ एक से ही सुनता है, एक की ही बात मानता है, एक की ही चलाई हुई बातों पर चलता है, वो इस संसार में सबसे जास्ती पावर धारण कर लेता है। इतनी आत्मा रूपी बैटरी में शक्ति धारण करता है कि एक, दो, चार, दस, बीस जन्म तो क्या, पूरे चौरासी के चक्र में वो ज्ञान की शक्ति काम करती है। जो ज्ञान सिर्फ एक से मिलता है। एक ही आत्मा सौ परसेन्ट सच्चा ज्ञान देने वाली है। ज्ञान कहा ही जाता है सत्य का ज्ञान। इसीलिए उस सुप्रीम सोल गॉड फादर को अंग्रेज लोग गॉड इज़ ट्रुथ कहते हैं। ये भी कहते हैं ट्रुथ इज़ वन।

A night class dated 5.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle of the first page was – Manmanaabhav, i.e. vashikaran mantra. What kind of mantra? The mantra that enables you to control. What does it mean? To control means to become independent. And to control, to influence, is it the task of souls, who are pleasure seekers or is it the task of the one who is forever abhokta (non-pleasure seeking)? Whose task is it? There are both types of souls. They also play their part on this world stage. One is abhokta, akshar, the one who never gets discharged. Even when it comes in this world and plays its part, it does not get discharged. The others are kshar (those who get discharged). It has been said in the Gita also – Kshar means those who get discharged. Those who become sinful. Those whose power is discharged. So, all those whose power weakens, get discharged are all bhogis. And can one seek pleasure while remaining in hundred percent swasthiti (stage of the soul) or in body consciousness? If it is done while being in hundred percent swasthiti, then it is possible only for one. He remains in hundred percent swasthiti and is hundred percent abhokta. There is no need for him to seek pleasure at all. The one who seeks pleasure will definitely control. Will he become free and make others free or would he like to become free? But as long as he remains free he will have to keep others free. And when he controls, when he controls them, then there is a natural rule that he too will have to come under someone's control.

So, there is only one soul which never controls anyone, never makes anyone subordinate. What is the name? Be free and let others be free. This is why even when the Supreme Soul comes to this world, He leaves all the souls free. If you wish you may obey Me and if you wish? You may not obey Me. There is no pressure. As regards the bhogi (pleasure seeking) souls, all are like this only, who get controlled and want to keep under control. This is why they are the ones who get discharged. But even among the souls which get discharged, there is one such soul that, when the Akshar comes to this world, when the Abhokta comes to this world, then it wants to control others, it wants to forget, it tries to forget and forgets. There are 500-700 crore human souls and also 700-750 crore human souls also which are included in counting. But there is only one such soul which is able to come in complete connection with that Parampurush Supreme Father Supreme Soul. This is why it also does not become abhokta for past, future and present, forever, but does it become for some time or not? For example, whichever founder of religion came, their tenure was at the most hundred years. They establish their religion within hundred years. Similarly, the Supreme Soul, the SadaaShiv, who always remains in swasthiti, when He too comes in this world, then He establishes swadharma within hundred years only. What is swa? Soul. He establishes the spiritual religion, not the religion of the body. The body is destructible; the religions of the body are also destructible. When the soul is imperishable, then the religion of the soul, the swadharma is also imperishable.

But this world does not become complete just by a single soul. What? This world cannot be run just by a single soul. In order to procreate two are required in the world. What? Is anti-sex also required or not? So, that Supreme Soul, who is Sadaashiv, remains in swasthiti; when He too comes to this world, then He chooses such a soul among the bhogi souls, who, despite being on this world stage, until the time for His arrival comes, it remains in a soul conscious stage. What? The one which has been called Parampad (the supreme post) on this world stage, they call it Vishnupad (the post of Vishnu). No vish (poison) at all. Devoid of poison. There is no poison even until the last birth. It means that he remains in such soul conscious stage that how? In this world of the path of Bhakti also are there such religious communities or not which have been believing only in one ling? And this tradition continued ever since the Vedas were written. What? Vedvani say that – Ek sadvipra bahudha vadanti (Truth is one; wise men talk of it in different ways.) There is only one truth in this world; Sad means true; Vipra means Brahmin; there is only one true Brahmin, who has been praised in different ways.

Who is called a Brahmin? The one who gets birth through the dirty womb for the first time. Whenever a child is born in this world, does he get birth along with dirt or is a clean child born? Be it any living being. Hm? Does he get a pure birth? He is born with dirt. So, when he is born, it is the first birth of a Brahmin, which is along with dirt. Then he is called a true Brahmin when he is considered to be born for the second time – Dwij. Dwi means two. Ja means birth. When he gets a second birth, then he is called Dwij. It means that which is the second birth? Not just the body born through a womb. He should hold the yagyopavit in that body. What has been said? Yagya. It is not about today's yagyas. They sacrifice materials, ghee, grains, etc. etc. No.

In the initial period of the world, when that akshar Supreme Soul had come, the one who is called Sadaashiv, He Himself does not control anyone; nor does He come under anyone's control. But the one in whom He enters is the one who receives the biggest vashikaran mantra. The one who controls. He generates such power of Yoga in himself. By having Yoga with whom? The one, by having Yoga with whom, the big founders of religions in the world – Ibrahim, Buddha, Christ, etc. who control such a big Sultanate by being in that incorporeal stage, by remembering incorporeal Shiv, howevermuch difficulty it may involve, yet even in that difficult stage, they obtain power by remembering that one incorporeal soul Shiv. Which power? Hm? The power of remembrance. But they do not remember that Supreme Soul. Neither do they know, nor do they recognize the one who is called Sadaa Shiv. But they recognize the one in whom He enters, in the corporeal bodily being, in the seed of the human world. When? When he achieves that incorporeal stage. Yet, they get such power that they control the big generations (populations) of the world. They take them on their side.

Did those founders of religions obtain that vashikaran mantra at any point of time or not which is called the power of Yoga? What is the vashikaran mantra? It is the power of the soul; the soul which consists of the mind and intellect; that power of mind and intellect; the soul should become so powerful that it could change many through its power of vibrations. Yes, some have this power to a lesser extent and some to a greater extent. For example, there was Nehruji. Many people also used to criticize him at his back. But when he used to come in front of them and deliver lectures, then under the influence of his vibrations, the entire generation (population) used to turn into his favour at that time. So, which is this power? Hm? Should it be called the power of the drishti of soul, should it be called the power of the organs of action or should it be called the power of the vibrations of the mind and intellect? So, this is called science (vigyaan). Vi means vishesh (special), gyaan means knowledge. What does that Supreme Soul give? Does He give knowledge or science? Which power does He give? He gives the power of knowledge. If you see, the power of knowledge is the highest power. But it can become the highest power only when it is brought into practice practically. This is why it has been said in the Gita – Na hi gyaan sadrisham pavitram ihi vidyate. (Gita 4/38). There is nothing as pure as knowledge in this world. There is milk, there is ghee; will it be more powerful when it is pure or will it be more powerful when there is mixturity in it? There is more power in purity.

So, the one, who listens only from one, obeys the words of only one, follows the words of only one inculcates the maximum power in this world. He inculcates such power in the soul like battery that not just one, two, four, ten, twenty births, but that power of knowledge works throughout the cycle of 84 births. That knowledge is received only from one. Only one soul gives hundred percent true knowledge. The knowledge of truth itself is called knowledge. This is why that Supreme Soul God Father is called as 'God is truth' by the Englishmen. It is also said 'Truth is God'.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2438, आडियो 2924, दिनांक 24.02.2018
VCD 2438, Audio 2924, date 24.02.2018
रात्रि क्लास 5.4.1967
Night Class dated 5.4.1967
VCD-2438- Bilingual

समय- 00.01-18.28
Time- 00.01-18.28


रात्रि क्लास चल रहा था – 5 अप्रैल, 1967. पहले पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – अभी पुरुषोत्तम संगमयुग में जबकि पुरुष रूप जो भी आत्माएं हैं पार्ट बजाने वाली, उनके बीच में उत्तम-उत्तम आत्माओं के प्रत्यक्ष होने का टाइम है। पुरुषोत्तम संगमयुग कहा जाता है वो पुरुषोत्तम युग का समय अभी है। तो अभी कौनसा मंत्र जपते रहें? मनमनाभव। वशीकरण मंत्र जपते रहें कि कितनी आत्माएं मेरे आत्मा रूपी सितारे में हैं। कहते हैं ना एक-एक सितारे में दुनिया बसी हुई है। तो मुझ आत्मा रूपी सितारे में कितनी आत्माएं हैं। किनको-किनको मुझे प्रजा के रूप में वशीभूत करना है। ऐसी कंट्रोलिंग पावर धारण करनी है जो उन आत्माओं के बीच, उस दुनिया के बीच, मैं ही उनका सर्वश्रेष्ठ, सबसे जास्ती कंट्रोलर, वशीभूत करने वाला बनूं। ये मंत्र मुख से जपने की बात नहीं है। जैसे भक्त लोग मुख चलाते रहते हैं राम-4. नहीं। वो अन्दर से ये मनन-चिंतन-मंथन चलता रहे। इस वशीकरण मंत्र को अपने मन में कैसे जल्दी से जल्दी निरन्तर धारण करूँ।

ये मंत्र है। क्या? वो गाते हैं। नार्थ भारत में तो बहुत ही गाते हैं। जहाँ ईश्वर प्रत्यक्षता रूपी जन्म लेता है। चाहे शंकर महादेव के रूप में जन्म लेता है, प्रत्यक्ष होता है, चाहे मनुष्य सृष्टि के राम बाप अयोध्या में प्रत्यक्ष होता है। चाहे मथुरा में। कहाँ? मथ उरा। उर जांघ को कहते हैं। जांघ को मथा जाता है तो क्या होता है? मिलेट्री में जब चयन करते हैं, मिलेट्रिमेन्स का तो जांघ को दबा-दबा के देखते हैं इसको उत्तेजना आती है कि नहीं इन्द्रियों में। तो नाम दे दिया है मथुरा। उर रूपी जांघ को मथने का जो बेहद का स्थान संगम में बना; वो कोई स्थूल मथुरा की बात नहीं है। संगमयुगी बेहद कृष्ण की बात है, जो स्वयं शरीरधारी है। परन्तु उसमें तो काम विकार रूपी सर्प जो सतयुग से साकार में इस सृष्टि पर प्रत्यक्ष होता है, कृष्ण के रूप में, उसे सारी दुनिया, खास भारतवासी समझते हैं कि बड़ा विकारी था। 16000 रानियाँ रखता था। ढ़ेर के ढ़ेर बच्चे थे। अब उस कृष्ण की तो बात ही नहीं है। है संगमयुगी कृष्ण की बात जिसमें वो भक्तों का सतयुग का कृष्ण आदि का प्रवेश करके इस संगमयुगी कृष्ण के शरीर को कंट्रोल करता है। इसलिए उसको नागों के राजा के रूप में दिखाते हैं महादेव के गले में। गले पड़ गया। वासुकि। अर्थ क्या हुआ?

वसु माने धन-संपत्ति का दाता। स्वयं धन-संपत्तिवान। कौनसी धन-संपत्ति? हँ? ज्ञान की धन-संपत्ति। अखूट ज्ञान की धन-संपत्ति का देने वाला। कौन देने वाला? अखूट ज्ञान की धन-संपत्ति देने वाला तो वास्तव में वो निराकार ज्योतिबिन्दु है जो निराकारी ज्ञान की अखूट धन-संपत्ति देता है। परन्तु क्या वो देता है और लेता है? हँ? अगर देने वाला है तो लेने वाला भी होगा। न वो किसी को कुछ देता है, न किसी से कुछ लेता है। वो तो है ही अकर्ता, अभोक्ता। तो लेने-देने का सवाल कहाँ पैदा होता? वो निराकार शिव ज्योतिबिन्दु जिस साकार मनुष्य तन में प्रवेश करता है अर्थात् आदम, एडम, हिन्दुओं में आदि देव, जैनियों में आदिनाथ जिसे कहा जाता है, इस सृष्टि के प्रथम पुरुष में प्रवेश करता है तब वो प्रैक्टिकल में देने वाला बनता है। क्या? ज्ञान धन देने वाला वसुदेव बनता है और वसुदेव का बच्चा वासुदेव। एक मात्रा पुत्र के अर्थ में, फालोअर के अर्थ में बढ़ जाती है। जैसे ब्रह्मा का पुत्र ब्राह्मण। विष्णु का पुत्र वैष्णव। शिव का पुत्र शैव। पुत्र कहो, फालोअर कहो। बच्चा बाप को फालो करे तो बाप का बच्चा है। बाप को फालो नहीं करता, दूसरों को फालो करता है, दूसरे की बातों को मानता है, दूसरों की परंपराओं पर चलता है, तो ओरिजिनल बच्चा है, बाप का ओरिजिनल खून उसमें बहता है या मिक्स हो गया? जरूर कहेंगे मिक्स हो गया।

तो बताया – तुलसीदास चंदन घिसैं – ये कल बताया था कि तुलसीदास कौनसी आत्मा है। ब्रह्मवाक्य में ही बता दिया, मुरली में कि अपने-अपने शास्त्रों में अपनी-अपनी महिमा कर दी है। संगमयुग में जो पार्ट बजाया और जो महिमावंत कार्य किया, किसी ने सौ परसेन्ट, किसी ने परसेन्टेज में, वैसे-वैसे नाम धारण किये, पार्ट बजाया, और वो ही पार्ट की कथा-कहानियाँ अपने शास्त्रों में लिख दी। तो तुलसीदास कौन हुआ? हँ? राम हुआ? कृष्ण हुआ? कौन हुआ? गणेश हुआ? राम हुआ। रम्यते योगिनो यस्मिन इति राम। जिसमें, जिसकी याद में योगी लोग; क्या कहा? रमण करते हैं; क्या करते हैं? आनन्द मनाते हैं; खेल खेलते। खेल में तो आनन्द आता है ना। तो ये ऐसा खेल है जिसमें अतीन्द्रिय सुख मिलता है। मन-बुद्धि का सुख मिलता है। कर्मेन्द्रियों से भी ऊँचा सुख है ज्ञानेन्द्रियों का, देवताओं का। और देवताओं से भी ऊँचा सुख है संगमयुग में जब कलियुग के अंत और सतयुग के आदि में ईश्वर इस सृष्टि पर आता है। क्यों ईश्वर कहा जाता? ईश माना शासनकर्ता। वर माना श्रेष्ठ। उससे ज्यादा श्रेष्ठ शासन करने वाला कोई आत्मा नहीं। वो आत्मा जब इस सृष्टि पर आकर शासन करती है ब्रह्मा के तन में प्रवेश करके, तो सब सुखी होते हैं संपर्क-संसर्ग में आने वाले। कोई दुःख का किसी भी इन्द्रिय से अनुभव नहीं करता।

जैसे माँ की गोद में बच्चा सुख का ही सुख का अनुभव करता है, ऐसे ही है वो ब्रह्मा। ब्रह्म माने बड़ी और मा माने माँ। संसार की बड़े ते बड़ी माँ। तो उसकी गोद में तो बच्चे सुखी ही अनुभव करेंगे। और उनमें भी वो बच्चे जो मुख से निकली हुई वाणी को ग्रहण करते हैं। गोद के बच्चे तो होते ही हैं। लेकिन मुख से निकली हुई वाणी का अनुसरण करते हैं जीवन में वो हैं मुख वंशावली ब्रह्मा के कहें, ईश्वर के डायरेक्ट बच्चे। क्योंकि ईश्वर, जिसे शिव कहा जाता है, सदा कल्याणकारी, सदा शिव, वो इस सृष्टि पर आता है; जिस साकार तन के द्वारा वो परमब्रह्म का पार्ट बजाता है, जिससे ऊँची कोई माँ नहीं होती, तो उस परमब्रह्म के द्वारा अतीव सुख देता है। कब? जब वो परमब्रह्म भी इस संसार में प्रत्यक्षता रूपी जन्म ले। क्योंकि प्रत्यक्ष होने से पहले बच्चा गर्भ में गुप्त होता है, गुप्त पार्ट बजाता है। तो शुरुआत तो कहें गुप्त। लेकिन प्रत्यक्षता रूपी जन्म जब ये बच्चे का होता है तो गुप्त थोड़ेही रहता। मुहल्लेवाले, पड़ौस वाले, गांव वाले, जनपद वाले, दुनिया के लोग पहचानते हैं, जान जाते हैं। देखने से मालूम पड़ेगा कि हाँ, बच्चा पैदा हुआ। तो ऐसे ही वो परमब्रह्म इस सारे संसार में प्रत्यक्ष होता है। उसको कहा जाता है प्रैक्टिकल में परमेश्वर। परम ईश्वर। शासन करने वाला तो है। श्रेष्ठ शासन करने वाला है। लेकिन जितने भी दुनिया में शासनकर्ता राजाएं हुए हैं, सतयुग से लेकर कलियुग के अंत तक, उन सबमें, प्रैक्टिकल में श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाला। शिव किसी को कंट्रोल नहीं करता। प्रैक्टिकल में शरीर धारण करता है तो जो शरीर है जिस आत्मा का, उसका नाम पड़ता है।

तो जो प्रैक्टिकल ईश्वर का पार्ट है, वही राम वाली आत्मा है। मनुष्य सृष्टि का बीज, महान योगी। उसको कहते हैं योगीश्वर। योगियों का शासनकर्ता। श्रेष्ठ शासनकर्ता। तो वो ही आत्मा द्वापर के आदि में वाल्मीकी बनकर रामायण बनाती है। वो ही आत्मा जन्म लेते-लेते द्वापर, कलियुग के मध्य में आकरके तुलसीदास का पार्ट बजाती है और अपने ही संगमयुग की कथा-कहानी जीवन चरित्र लिखती है। जिसको कहा जाता है रामायण। राम अयन। अयन माने घर। किसका घर? राम का घर। जैसे कहते हैं नारायण। वो ही आत्मा सतयुग में नारायण, सतयुग आदि में नारायण होती है। कहते हैं ना – हे कृष्ण नारायण वासुदेव। वही संगमयुगी कृष्ण है, वो ही पुरुषोत्तम संगमयुगी नारायण है।

वो आत्मा कलियुग के मध्यांत में आकरेक रामायण का रचयिता बनती है – तुलसीदास चंदन घिसैं। चंदन घिसें माने? ज्ञान का मनन-चिंतन-मंथन करती है और उस घिसे हुए चंदन से क्या होता है? रघुवीर। रघु माने ज्ञान का सूर्य। रघु सूर्य को कहते हैं। सूर्य के रूप में जो आत्मा सदा डिटैच रहने वाली है इस संसार सागर से, वो है असली सूर्य। और वो इस सृष्टि पर आकरके जिस मनुष्य तन में प्रवेश करती है वो है ज्ञान की ऊँची-ऊँची लहरें मारने वाला ज्ञान का सागर। अगाध सागर। किसलिए अगाध? कि उसकी गहराई का कोई भी नापतोल नहीं कर सका। इतना ज्ञान में गहरी जाती है। जैसे शिव त्रिकालदर्शी है, ऐसे ही इस मनुष्य सृष्टि में वो राम वाली आत्मा जो मनुष्य सृष्टि का बीज है, मनुष्यात्माओं में सबसे बड़ा बच्चा है शिव का, वो अपने बाप से, शिव से अखूट ज्ञान का भण्डार ले लेती है। और प्रैक्टिकल में लेती है पुरुषोत्तम संगमयुग में जबकि बाप कहते हैं सुप्रीम सोल गॉड फादर कि मेरे पास जितना ज्ञान था वो सारा ज्ञान तुमको दे दिया। अभी मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं रहा। माना पूरा ज्ञान का वर्सा उस प्रैक्टिकल पार्टधारी को जब मिल जाता है तो शिव बाप जो असली ज्ञान सूर्य है वो उसे विश्व की बादशाही का तिलक दे देता, राजाई का तिलक दे देता।

A night class dated 5th April, 1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the first page was – Now in the Purushottam Sangamyug, it is the time for the best (uttam) souls playing their parts among the purush-like souls to get revealed. It is called Purushottam Sangamyug. It is now the time for Purushottam Yug. So, which Mantra should we now keep on chanting? Manmanaabhav. We should keep on chanting the vashikaran mantra that how many souls are connected with my star like soul. It is said that there is a world in each star, is not it? So, how many souls are associated with Me, the soul like star. Who all am I supposed to control in the form of praja (subjects)? I have to inculcate such controlling power that I should become the best, the biggest controller among those souls, amidst that world. This Mantra is not supposed to be chanted orally just as the devotees keep on chanting through their mouth ‘Ram, Ram, Ram, Ram'. No. This thinking and churning should continue inside. How should I inculcate this vashikaran mantra in my mind as quickly as possible?

This is a Mantra. What? They sing. They sing a lot in north India where God gets revelation like birth, whether He gets birth, gets revealed in the form of Shankar Mahadev or whether He gets revealed in Ayodhya as the Father Ram of the human world or whether it is in Mathura. Where? Math ura. Thigh is called ur. What happens when the thigh is massaged? When selections are made for the military, of the militarymen, then they press their thighs and check whether his organs get aroused or not? So, the name has been coined as Mathura. The unlimited place which became instrumental in the Confluence Age to churn the thigh like ur. It is not about any physical Mathura. It is about the unlimited Confluence Age Krishna, who is himself a bodily being. But the lust like snake, which is revealed in the form of Krishna who is revealed in this world in corporeal form from the Golden Age; the entire world, especially the Indians think that he was very lustful. He used to keep 16000 queens. He had a lot of children. Well, it is not about that Krishna at all. It is about the Confluence Age Krishna, in whom that Golden Age Krishna of the devotees from the beginning enters and controls the body of this Confluence Age Krishna. This is why he is shown in the form of the king of snakes around the neck of Mahadev. He entwined around the neck. Vasuki. What does it mean?

Vasu means the giver of wealth and property. He himself is possessor of wealth and property. Which wealth and property? Hm? The wealth and property of knowledge. The giver of inexhaustible wealth and property of knowledge. Who is the giver? Actually the giver of the inexhaustible wealth and property of knowledge is that incorporeal point of light, who gives the inexhaustible wealth and property of incorporeal knowledge. But does He give and take? Hm? If He is a giver then He will be a taker as well. Neither does He give anything to anyone nor does He takes anything from anyone. He is a non-doer (akarta), non-pleasure-seeker (abhokta). So, where does the question of taking and giving arise? The corporeal human body in which that incorporeal point of light Shiv enters, i.e. in Aadam, Adam, Aadi Dev among the Hindus, the one who is called Aadinath by the Jains, when He enters in the first man of this world, then He becomes a giver in practical. What? He becomes the Vasudev who gives the wealth of knowledge and the child of Vasudev is Vasudev. In the sense of son, in the sense of a follower, one syllable increases. For example, Brahma's son Brahmin. Vishnu's son Vaishnav. Shiva's son Shaiv. Call him son, call him follower. If a child follows his Father, then he is the Father's child. If he does not follow the Father, if he follows others, if he believes the words of others, if he follows the traditions of others, then is he an original child, does the original blood of the Father flow in him or does it get mixed? It will definitely be said that it was mixed up.

So, it was told – Tulsidas chandan ghisein. It was told yesterday that which soul is Tulsidas. It was told in the Brahmavaakya itself, in the Murli that they have praised themselves in their own scriptures. The part that they played in the Confluence Age and the praiseworthy task that they performed; someone performed hundred percent, someone in percentage; they assumed names and played parts accordingly and they wrote the stories of the same parts in their scriptures. So, who is Tulsidas? Hm? Was it Ram? Was it Krishna? Who was it? Was it Ganesh? It was Ram. Ramyate yogino yasmin iti Ram. The one in whom, the one in whose remembrance the yogis; what has been said? Enjoy (raman kartey hain); what do they do? They enjoy; play games. One enjoys while playing, doesn't one? So, this is such a game in which one gets supersensuous joy. One gets the happiness of mind and intellect. The joy of sense organs of deities is higher than the joy of the organs of action. And the joy higher than that of the deities is in the Confluence Age when God comes in this world in the end of the Iron Age and in the beginning of the Golden Age. Why is He called Ishwar? Ish means governor (shaasankarta). Var means righteous. There is no soul which rules in a more righteous manner than him. When that soul comes in this world and rules by entering the body of Brahma, then all those who come in His contact becomes happy. Nobody experiences sorrow through any organ.

Just as a child experiences only comfort in the lap of the mother, similar is the case with that Brahma. Brahm means senior and ma means mother. The senior most Mother of the World. So, the children will experience only happiness in her lap. And even among them, those children who receive the speech narrated through the mouth; they are children of the lap; but those who follow the speech narrated through the mouth in their life are the mouth born progeny of Brahma or call them the direct children of God because God, who is called Shiv, forever benevolent, Sadaa Shiv, He comes in this world; the corporeal body through which He plays the part of Parambrahm; there is no mother higher than him; So, He gives extreme happiness through that Parambrahm. When? It is when that Parambrahm also gets revelation like birth in this world because before revelation a child is incognito in the womb, plays an incognito part. So, we can say he is incognito in the beginning. But when this child gets revelation like birth, then he does not remain incognito. The people of the lane, the neighbours, the people of the village, the people of the district, and the people of the world recognize him, know him. On seeing one can know that yes, a child has been born. So, similarly, that Parambrahm is revealed in the entire world. He is called Parmeshwar (God) in practical. Param Eeshwar. He does govern. He governs in a righteous way. But all the governing kings who existed in the world, from the Golden Age to the end of the Iron Age, among all of them, he plays a righteous part in practical. Shiv does not control anyone. He assumes a body in practical. So, the soul to whom that body belongs gets the name.

So, the practical part of God is the soul of Ram. The seed of the human world, a great yogi. He is called Yogishwar. The governor of the yogis. A righteous governor. So, the same soul becomes Valmiki and pens Ramayana in the beginning of the Copper Age. The same soul, while getting rebirths, plays the part of Tulsidas when it reaches the middle of the Iron Age and writes his own life story, biography of the Confluence Age, which is called Ramayana. Raam ayan. Ayan means house. Whose house? Ram's house. For example, it is said Narayan. The same soul is Narayan in the Golden Age, in the beginning of the Golden Age. It is said – Hey Krishna Narayan Vasudev. He alone is the Confluence Age Krishna; He alone is the Purushottam Sangamyugi Narayan.

That soul becomes the writer of Ramayana in the end of the middle portion of the Iron Age. Tulsidas chandan ghisein. What is meant by 'chandan ghisein'? It thinks and churns the knowledge and what happens with that rubbed sandalwood? Raghuvir. Raghu means Sun of Knowledge. Sun is called Raghu. The soul which always remains detached from this ocean like world in the form of the Sun is the real Sun. And the human body in which He enters after coming to this world is the ocean of knowledge who creates high waves of knowledge. The immeasurable ocean. Why is it immeasurable? Nobody could measure its depth. It goes so deep into the knowledge. Just as Shiv is Trikaaldarshi (knower of past, present and future), similarly that soul of Ram, which is the seed of the human world, the eldest son of Shiv among the human souls in this human world, he obtains the inexhaustible stock of knowledge from his Father, from Shiv. And he obtains in practical in the Purushottam Sangamyug when the Father, the Supreme Soul, God Father says that I have given you the entire knowledge that I had. Now there is nothing left with Me to give you. It means that when the practical actor gets the entire inheritance of knowledge, then the Father Shiv, who is the actual Sun of Knowledge applies the tilak of emperorship, the tilak of kingship of the world to him.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 04 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2439, आडियो 2925, दिनांक 25.02.2018
VCD 2439, Audio 2925, dated 25.02.2018
प्रातः क्लास 5.4.1967
Morning class 5.4.1967
VCD-2439- Bilingual

समय- 00.01-16.05
Time- 00.01-16.05


प्रातः क्लास चल रहा था – 5 अप्रैल, 1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी कि अपनी-अपनी कथा-कहानियां संगमयुगी जीवन की शास्त्रों में लिख दी हैं जिनमें तुलसीदास की बात बताई कि वो राम की आत्मा ज्ञान का चंदन घिसती है, मनन-चिंतन-मंथन करती है। और जितना-जितना मनन-चिंतन-मंथन करती है उसी हिसाब से रघुवीर अर्थात् भगवान उसे विश्व की बादशाही का तिलक दे देते हैं। अभी संगमयुग में ये, नहीं, मन वशीकरण का भी कहाँ है? ये तो ऐसे ही श्लोक है एक। तो किसी ने कुछ कहा – वशीकरण है मनमनाभव। अब मनमनाभव – याद करो बाप को। कौनसे बाप को याद करो? जो कहने वाला है मनमनाभव – मेरे मन में समा जा, जो सोचने-विचारने का मन आत्माओं के बाप सुप्रीम सोल को तो है नहीं। वो जिसमें प्रवेश करता है वो चलायमान मन वाला है। और उसी बड़े बच्चे, बड़ा पार्ट बजाने वाली आत्मा को सुप्रीम सोल बाप मंत्र देते हैं पहले-पहले कि मन को वश में करो। मन एकाग्र करो। तो जो एकाग्र करता है उसी को सब फालो करते हैं। किसी ने कुछ कहा। तो वशीकरण है मनमनाभव। अर्थात् मेरे मन की जो निर्संकल्प स्थिति है, उस स्थिति में ही समा जा।

अब मनमनाभव। याद करो बाप को। ये है बड़ी मुश्किलात। क्यों? जैसे गीता में कहा है अर्जुन से – अर्जुन ने पूछा, ये मन तो बड़ा चंचल है। इसे कैसे कंट्रोल करें? तो भगवान ने कहा – ये इसमें कोई संशय नहीं है कि मन बहुत मुश्किल से कंट्रोल में आता है। परन्तु उस मुश्किल को भी सहज करने वाला भगवान कहा जाता है। वो आता ही है सहज राजयोग सिखाने। जिसको मनुष्य गुरुओं ने कितना कठिन कर दिया है। कठिन-कठिन शरीर के आसन लगाओ, श्वांस रोको। एक टांग पे खड़े हो जाओ। क्या-क्या बात बनाय दी। अभी बाप कहते हैं – निराकार ज्योतिबिन्दु याद नहीं आता है क्योंकि जन्म-जन्मान्तर की आदत पड़ी हुई है साकार संबंधियों को याद करने की। तो मैं पहचान देता हूँ कि मैं तो निराकार हूँ परन्तु मेरा साकार स्वरूप कौन है जिसमें गीता के प्रवेष्टुम शब्द के अनुसार मैं प्रवेश करने योग्य हूँ, प्रवेश करता हूँ? और प्रवेश करके तुम्हारी मुश्किलात को सहज कर देता हूँ। तुम्हारी आदत पड़ी हुई है ना जन्म-जन्मान्तर साकार को याद करने की। तो जिस साकार में प्रवेश करता हूँ उसको पहचानो। पहचान भी देता हूँ और जो पहचानते हैं, जानते हैं, मानते हैं, उस साकार के मुख से निकली मत पर चलते हैं, तो वो उनके लिए सहज हो जाता है। क्योंकि उन्हें वो बड़ा रूप साकार याद आता है।

जो बड़ा साकार रूप है उस शरीर की रग-रग में त्रिकालदर्शिता का ज्ञान भर जाता है। ज्ञान की ही रोशनी कही जाती है। ऐसे नहीं जैसे मनुष्यों ने गीता में लिख दिया है कि हज़ार सूर्यों से भी ज्यादा तेजोमय है। तो ऐसा ज्ञान स्वरूप है। तो उस बड़े रूप को भी याद करो, जो लाल लाइट के रूप में दिखाया जाता है, जिसकी यादगार सोमनाथ मन्दिर में लाल लाइट का गोल पत्थर था ना, जिसे लिंग कहा जाता। परन्तु उस लिंग में, वो सदा निराकार सदाशिव प्रवेश करता है और उसके संग के रंग से वो भी बाप समान बन जाता है। निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बन जाता है साकार स्वरूप भी। तो तुम्हारी निराकारी याद को, जो मुश्किल है लगातार याद करना, उसको सहज कर देता है। सो भी बाप कहे कि गृहस्थ व्यवहार में रहकरके, उठते, फिरते, चलते, हूबहू जैसे आशिक-माशूक को याद करते हैं, जिनका इतना नाम गाया जाता है, मुसलमानों में लैला-मजनू, शीर-फराद, कितने नाम हैं, वैसे ही तुमको रूहानी बाप को याद करना है, जो रूहानी स्टेज में टिका हुआ है। बाकी सब हैं जिस्मानी बातें। इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच में एक ही आत्मा पार्टधारी है आदि से अंत तक जो रूहानी स्टेज में रहने वाली है, जिसकी प्रैक्टिस संगमयुग में ही की। बाकियों ने इतनी प्रैक्टिस नहीं की है। फाउण्डेशन इतना पक्का नहीं पड़ता।

वो दुनियावी आशिक-माशूक भी जिस्मानी। और ये तो बिल्कुल कॉमन है। वो अनकॉमन है। और ये तो और ही कॉमन है। क्यों? क्योंकि तुमने इसको भक्तिमार्ग में अनेक जन्म याद किया है। भक्तिमार्ग में याद करते रहते हैं ना जन्म-जन्मान्तर। सभी आशिक उस एक को याद करते हैं। 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएं सभी उस भगवान की आशिक हैं. वो एक ही माशूक है। बाकी सब आशिक हैं। तो जो आशिक हैं उनको याद करने के लिए कहते हैं, याद करते हैं। और जो याद करते हैं तो कोई मुफ्त में थोड़े ही किसी को याद करते हैं। हँ? कोई को रसगुल्ला याद आता है तो क्या मुफ्त में याद आता है? हँ? ऐसे ही याद आ जाता है? अरे खाया है, तो याद आता है। मीठा लगा है, सुगंधित है तो याद आता है। तो मुफ्त में कोई नहीं याद करता। जरूर कब आता जरूर है। और उससे मिलते जरूर हैं। आशिक माशूक को न मिले तो आशिक ने माशूक से ये योग लगाकर क्या किया? ये ऐसा माशूक है जिस पर ऊँच ते ऊँच आत्मा जो पार्टधारी है, जिससे ऊँच कोई भी आत्मा नहीं है, जिस आत्मा का नाम ही है शिव। उसको शरीर नहीं होता। तो वो भी उसके ऊपर आशिक होकर आते इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर। तो इस माशूक से योग लगाकर क्या किया? हँ? क्या किया? सारी मानवीय सृष्टि का जो भी आत्मा रूपी एक्टर्स हैं, सारी वसुधा के रहने वाले एक्टर्स सबका परिवार तैयार किया। अगर न मिले तो परिवार तैयार होता?

वो ऊँच ते ऊँच आशिक, इस दुनिया में पार्ट बजाने वाली आत्माओं में ऊँचे से ऊँचा आशिक कौन? हँ? निराकार या कोई साकार? भोगी आत्मा या अभोक्ता आत्मा? कौन? पहला-पहला आशिक है। और कोई देश के ऊपर आशिक होकर नहीं आता। कौनसे देश के ऊपर आशिक होकर आता है? भारत देश। जो जन्म-जन्मान्तर भा माने ज्ञान की रोशनी में रत, लगा रहता है। तो उससे आकर न मिले तो क्या ये संसार रूपी परिवार चलेगा? तुम्हें नहीं फालतू को जाना। तो भक्तिमार्ग में भी तो आशिक-माशूक की बात है ना। कहते हैं ना ज्ञान, भक्ति, और वैराग। तो ज्ञान वो एक से ही आता है। जो जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है। इसलिए त्रिकालदर्शी है। और सभी आत्माएं जन्म-मरण के चक्र में आती हैं। इसलिए पूर्वजन्म की बात भूल जाती है। तो वो एक ही है जिसके पास त्रिकालदर्शिता का ज्ञान है। और सदा ज्ञानी है। उस एक से ही ज्ञान आता है। ज्ञान माने जानकारी। किस बात की जानकारी? झूठ की जानकारी या सत्य की जानकारी? सत्य को ही ज्ञान कहा जाता है। तो ज्ञान मिलता है तो भक्ति क्या होती है? छूट जाती है। भक्ति नहीं छूटी है, कोई न कोई अंश रहता है, इससे साबित है, पूरा ज्ञान नहीं मिला। तो देखो, भक्तिमार्ग में भी आशिक-माशूक की बातें होती हैं। तो ज्ञान मार्ग में तो कितनी गहराई होनी चाहिए।

A morning class dated 5th April, 1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was that people have written their own stories of the Confluence Age life in the scriptures; among them the topic of Tulsidas was mentioned that the soul of Ram rubs the sandalwood of knowledge, thinks and churns. And the more it thinks and churns, accordingly Raghuvir, i.e. God applies the tilak (vermillion mark) of emperorship of the world on him. Now, in the Confluence Age, is the mind under control? This is just a shloka (hymn). So, someone said – The vashikaran is Manmanaabhav. Now Manmanaabhav – Remember the Father. Remember which Father? The one who says – Manmanaabhav – Merge into My mind, the Supreme Soul Father of souls does not possess the mind which thinks. The one in whom He enters has an inconstant mind. And it is to that eldest child, the soul which plays a big part that the Supreme Soul Father gives the mantra first of all that control your mind. Concentrate your mind. So, everyone follows the one who concentrates [his mind]. Someone said something. So, the mantra to control is Manmanaabhav, i.e. merge into My thoughtless stage of My mind.

Now Manmanaabhav. Remember the Father. This is a big difficulty. Why? For example, it has been said to Arjun in the Gita – Arjun asked, this mind is very inconstant. How should I control it? So, God said – There is no doubt in it that mind comes under control with a great difficulty. But the one who transforms that difficulty into ease is called God. He comes only to teach easy Rajyog which the human gurus have made so difficult. Perform difficult asanas of the body, hold your breath. Stand on one leg. What all topics have they created. Now the Father says – The incorporeal point of light does not come to the mind because a habit has been developed since many births to remember the corporeal relatives. So, I give the introduction that I am incorporeal but which is My corporeal form, in which I am capable of entering and do enter as per the word 'praveshtum' in the Gita? And after entering I turn your difficulty into ease. You have developed a habit to remember the corporeal since many births. So, recognize the corporeal in which I enter. I also give the introduction and those who recognize, know, accept, and follow the directions which emerge from the mouth of that corporeal, so, that becomes easy for them because that big form, the corporeal comes to their mind.

The knowledge of the three aspects of time (trikaaldarshita) is filled in every hair follicle (rag-rag) of the body of the big corporeal form. It is called light of knowledge. It is not as if human beings have written in the Gita that He is more luminous than a thousand Suns. So, He is such an embodiment of knowledge. So, remember that big form also which is shown in the form of a red light, whose memorial is shown as a round stone of red light in the Somnath temple, which is called ling. But in that ling, that forever incorporeal SadaaShiv enters and through His colour of company he too becomes equal to the Father. The corporeal form also becomes incorporeal, viceless, egoless. So, He makes your incorporeal remembrance, which is difficult to remember continuously, easy. That too, the Father says that while leading a household life, while standing up, while moving, exactly in the same way as a lover and beloved remember each other, who are so famous among the Muslims as Laila-Majnu, Sheer-Farad; there are so many names; similarly you have to remember the spiritual Father, who is constant in the spiritual stage. All others are physical topics. There is only one soul actor on this human world stage from the beginning to the end which becomes constant in spiritual stage, which it practiced in the Confluence Age. All others did not practice so much. The foundation itself is not laid so strongly.

Those worldly lover (aashik) and beloved (maashook) are also physical. And this is very common. That is uncommon. And this is even more common. Why? It is because you have remembered this one on the path of Bhakti since many births. You remember for many births on the path of Bhakti, don't you? All the lovers remember that One. All the 500-700 crore human souls are the lovers of that God; He is the only beloved. All others are lovers. So, the lovers are asked to remember; they remember. And those who remember do not remember anyone simply. Hm? If a rasgulla (a sweet) comes to the mind of someone, does it come simply? Hm? Does it come to the mind simply? Arey, it comes to the mind because you have eaten it. You found it to be sweet; it is fragrant; so, it comes to the mind. So, nobody remembers anyone simply. Definitely He comes certainly at some point in time. And you definitely meet Him. If a lover does not meet the beloved, then what did the lover gain by remembering the beloved? This is such a beloved that the highest on high actor soul, there is no soul higher than Him, the name of that soul is Shiv. He does not have a body. So, He too becomes his lover and comes to this world stage. So, what did He do by having Yoga with this beloved? Hm? What did He do? He prepared the family of all the actor-like souls of the entire human world, all the actors living on the entire Earth. If He does not meet, then how would the family be formed?

That highest on high lover; among the souls playing their parts in this world, who is the highest on high lover? Hm? Incorporeal or any corporeal? Is it a bhogi (pleasure-seeking) soul or an abhokta (non-pleasure seeking) soul? Who? He is the first and foremost lover. He does not come as the lover of any other country. He comes as the lover of which country? India (Bhaarat). The one who remains busy (rat) in the light (bha) of knowledge since many births. So, will this world like family continue if He does not come and meet him? You should not go into wasteful matters. There is a topic of lover and beloved on the path of Bhakti also, is not it? It is said – Gyan (knowledge), Bhakti and vairaag (detachment). So, knowledge comes from one only. The one who does not pass through the cycle of birth and death. This is why He is Trikaaldarshi. All other souls pass through the cycle of birth and death. This is why they forget the topics of the past birth. So, He is the only one who possesses the knowledge of all the three aspects of time. And He is forever knowledgeable. Knowledge comes from Him alone. Knowledge means information. Information of what? Information of untruth or information of truth? Truth itself is called knowledge. So, when knowledge is received, then what happens to Bhakti? It goes away. If the Bhakti hasn't gone, if there is any trace of it, then it proves that he hasn't received complete knowledge. So, look, there are topics of lover and beloved on the path of Bhakti as well. So, there should be so much depth on the path of knowledge.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2440, आडियो 2926, दिनांक 26.02.2018
VCD 2440, Audio 2926, date 26.02.2018
रात्रि क्लास 5.4.1967
Night Class dated 5.4.1967
VCD-2440-Bilingual

समय- 00.01-17.04
Time- 00.01-17.04


रात्रि क्लास चल रहा था – 5 अप्रैल, 1967. पहले पेज के अंत में बात चल रही थी –यहाँ जो पुरुषार्थ करते हो, वो व्यर्थ नहीं जाता है। रावण राज्य में सब व्यर्थ जाता है। और यहाँ इस समय यदि तुम कदम उठाते हो तो जितना जो फिर पुरुषार्थ जास्ती करेगा, ये कोई व्यर्थ जाएगा क्या? ना। प्रारब्ध ही प्रारब्ध बनेगी। और एक जन्म की नहीं, अनेक जन्मों की प्रारब्ध बनेगी। वो तुम जो प्रदर्शनी में सर्विस करते हो, अपना प्रारब्ध बनाया ना। पहले-पहले ये बात बाप ने समझाय दी है – जो भगत होंगे ना उनको भी समझाना पड़े। पूछो - अभी भगत कैसे हो? तो पूछना पड़ता है। दूसरा पेज। उनको ये समझा करके कि भई इनको कभी याद करते हो? तो वो भी पूछने से मालूम पड़ जाएगा कि ये भगत है। अच्छा, जिनकी भक्ति करते हो उनको कबसे जानते हो? इनको कोई और भी भक्ति करते हैं? इसकी भक्ति करते हो ना।

अच्छा, कोई से भी पूछ सकते हो – तुम भक्ति करते हो? क्योंकि बच्चे तो ये बात जानते हैं कि जो भी भक्ति करते हैं वो दुर्गति को पाते हैं। तो पूछ लेने से कि भगत किसकी भक्ति करते हो जो दुर्गति को पाते जाते हो? ये भी तो पूछ सकते हो ना। क्योंकि इस समय में तुम बच्चों ने ही जाना है, सिर्फ तुम जानते हो कि भक्तों को भगवान आया है। किसलिए आया है? भक्ति का फल देने के लिए। और भक्ति का फल देने के लिए ही यहाँ आया है। यहाँ माने कहाँ? भारत में आया है। क्योंकि दुनिया में विदेशों के लोग तो इतने भक्त बनते नहीं हैं। भारत के लोग ही भक्त बनते हैं जास्ती। जितने भक्त यहाँ भारत में होते हैं उतने और कोई भी नेशनलिटी में नहीं होते। जितने भारतवासी भगत बनते हैं। इसका कारण क्या है? भारत में ही इतने भगत क्यों होते हैं? क्योंकि सुनी-सुनाई बातों पर भागते रहते हैं। जिसने जो सुनाया, भागना शुरू। तो, अनेकों की सुनी-सुनाई बातों पर, कभी इधर, कभी उधर भक्ति करने के लिए बुद्धि भागती रहती है। अब उनको सीढ़ी तो उतरनी ही है। चढ़ने की तो बात ही नहीं। और सीढ़ी उतरने में भी उनको समय लगता है।

देखो तो सही – ये भारतवासी लोग भक्ति भी बहुत करते हैं। ये तो समझते हो बच्चे कि विदेशी लोग कोई आधा कल्प इतनी भक्ति थोड़ेही करते हैं। कोई भी इतना भक्ति करता होगा? कोई भी नहीं। भले भक्त तो बहुत हैं। विदेशों में दूसरे-दूसरे धर्मों में भी भक्त तो बहुत हैं। सभी धर्मों में भगत हैं। परन्तु कभी कोई ने सुना? किसको मालूम है कि भक्ति कबसे शुरू होती है? ये तो कोई को नहीं मालूम। अच्छा। अच्छा ये बताते हैं कि भला चलो स्वर्ग इस समय का है। कोई कुछ बताते हैं, कोई कुछ बताते हैं, इस समय का है। अब इस हिसाब से वो, वो बिचारा कह ही नहीं सकता कि भक्ति कबसे शुरू होती है। और यहाँ तो हिसाब है ना पूरा। कबसे भक्ति किया? आधा कल्प भक्ति किया। आधा कल्प ज्ञान की प्रालब्ध। क्या? ज्ञान का सार है स्वस्थिति। और स्वस्थिति से स्वर्ग। कितना? आधा कल्प। तो आधा कल्प स्वर्ग में देवता बन कर रहे। भक्ति में भटकने की बात ही नहीं।

तो वो भक्त लोग आधा कल्प भी भक्ति का कहें, तो वो सतयुग को देंगे कितने लाखों वर्ष। तो त्रेता को तो दूसरे-दूसरे लाखों वर्ष। द्वापर को तीसरे लाखों। कलियुग तो चालीस हज़ार वर्ष कह देते। तो अब भक्ति कबसे शुरू हुई? ये तो कोई को अर्थ पता नहीं है। एकदम मुँझे हुए हैं। जैसे ज्ञान का सारा सूत मुँझा हुआ है। जब सूत ही बहुत मुँझा हुआ हो जाता है तो फिर सूत को तोड़ना पड़ता है। माना अनेक धर्मों का अनेक प्रकार का ज्ञान, सारा उलझ गया। तो फिर क्या करना पड़े? सब धर्मों के ज्ञान का खंडन करना पड़े, तोड़ना पड़े। क्योंकि कभी कोई की ताकत नहीं होती जो उनको समझाय सके। शिव के ऊपर भी ये कहें – गिरिधर कविराय। ये ज्ञान का सूत बहुत मुँझा हुआ है। सो इस सूत को बाप के बिगर कोई सुलझाय नहीं सकता, समझाय नहीं सकता। तो जो सूत मुँझा हुआ है ना इनका ये क्या हो रहा है बिचारे? ये लड़ाई, ये झगड़ा, ये फैमिन। और स्वर्ग में तो ये भला सब कुछ, कुछ नहीं। ये लड़ाई-झगड़ा, फैमिन, इनकी भी समझ कुछ नहीं कि क्यों होते हैं? क्यों बढ़ते जाते हैं? तो बरोबर कोई भी नहीं समझ सकते। तो बाबा आकरके अच्छी तरह से इन अनेक प्रकार के धर्मों के द्वारा चलाए गए ज्ञान के सूत को तोड़ते हैं। और तुमको तोड़-तोड़ करके समझाते हैं। अच्छी तरह से सब समझाते कि इनको तोड़ना क्यों जरूरी है? सो तो जो बच्चे समझेंगे वो ही दूसरों को समझाय सकेंगे। अभी जितना जो बच्चे समझें वो ही समझाय सकें। तो ये भी अनेक देह के धर्मों को खण्डन करने की युक्तियाँ हैं। किसको समझाने की अच्छी युक्ति होती है। तो झट समझाय देते हैं। और जो नहीं पढ़े हैं, जिनको युक्ति नहीं है, वो नहीं समझाय सकते। तो मत्था तो ये मारते हो जैसे।

तो ये तो समझते हो बरोबर बाबा कहते हैं ना कि दिन में जो सुनते हो, रात में समझो। ये जो कुछ भी सारी दुनिया आज दिन में ये जो चली; ये सारा ड्रामा अनुसार ही चली है। अभी सो भी सभी जानते हैं। हम जानते हैं ना कि अभी जो कुछ हुआ एक्यूरेट ड्रामा के प्लैन अनुसार हुआ। क्योंकि बच्चों को ये भी तो अच्छी तरह से मालूम है ना कि ड्रामा में जो कुछ भी चलता है ड्रामा के प्लैन अनुसार। ये हम सब जानते हैं। और हम पुरुषार्थ भी करते हैं ड्रामा प्लैन अनुसार। ड्रामा के प्लैन अनुसार बाप भी कहते हैं कि ड्रामा में जब होता है तब ही मैं आता हूँ। और आकरके तुमको पुरुषार्थ कराता हूँ। क्या कराता हूँ? किसके लिए कराता हूँ? देह की प्राप्ति अर्थ नहीं कराता हूँ। पुरुषार्थ कराता हूँ। पुरुष माने आत्मा के अर्थ कराता हूँ। देह का कनेक्शन तो एक जनम से है। और आत्मा का कनेक्शन? अनेक जन्मों से है। तो पुरुषार्थ करो। तुम कहेंगे कि नहीं। ड्रामा के वश में जो हमारा पुरुषार्थ होगा सो होगा। तो बोलो – नहीं-नहीं, ये कायदा नहीं है। तुमको मैं राय देता हूँ। जो मैं राय देता हूँ उस पर चलना पड़े क्योंकि ड्रामा अनुसार तो होता है। परन्तु ड्रामा के आगे क्या है? ड्रामा के आगे मत भी तो खड़ी है ना। श्रीमत। जो ड्रामा को भी बदल देती है। तो मेरी मत पर चलो। ड्रामा-ड्रामा न करते रहो। ड्रामा है – पास्ट में जो हुआ सो क्या? पास्ट में जो हुआ सो ड्रामा। बाकी भविष्य के लिए ड्रामा एप्लाइ नहीं करना। मैं जैसे मत देता हूँ वैसे चलो।

A night class dated 5th April, 1967 was being narrated. The topic being narrated in the end of the first page was – The purusharth that you make here does not go waste. Everything goes waste in the kingdom of Ravan. And here at this time if you take steps, then whatever purusharth someone makes, will it go waste? No. You will get fruits only. And you will get fruits not just for one birth, but for many births. That service which you do in exhibitions, you earned fruits, did not you? First of all the Father has explained the topic – Those who are devotees will also have to be explained. Ask – Now, how are you the devotees now? So, you have to ask. Second page. After explaining to them that brother, do you ever remember him? So, it will be known that this one is a devotee when you ask him. Achcha, since when do you know the one whose Bhakti you do? Does anyone else also perform his Bhakti? You perform the Bhakti of this one, don't you?

Achcha, you can ask anyone – Do you do Bhakti? It is because children know that all those who do Bhakti suffer degradation. So, you can ask – O devotee, whose Bhakti do you perform that you keep on suffering degradation? You can ask this also, cannot you? It is because at this time you children have only known; you alone know that God of the devotees has come. Why has He come? He has come to give the fruits of Bhakti. And He has come here only to give the fruits of Bhakti. ‘Here’ refers to which place? He has come in Bhaarat (India) because the people of foreign countries in the world do not become devotees to that extent. It is the people of India only who become devotees more. No nationality has as many devotees as there are here in India. People [of other nations] do not become devotees as much as the Indians become. What is the reason? Why are there so many devotees in India only? It is because they keep on wandering on hearsay. They start running behind whatever anyone narrates. So, on the basis of the topics heard from many, the intellect keeps on running sometimes here, sometimes there to do Bhakti. Now they are bound to come down the Ladder. There is no question of climbing up the Ladder. And they also take time to come down the Ladder.

Just look, these Indian people do a lot of Bhakti. You understand children that the foreigners do not perform so much Bhakti for half a Kalpa. Does anyone do so much Bhakti? None. Although there are a lot of devotees. There are a lot of devotees in other religions in the foreign countries as well. There are devotees in all the religions. But did anyone ever hear? Does anyone know that when does Bhakti start? Nobody knows this. Achcha. Achcha, it is told that okay, heaven is of this time. Some say something, some say something; it is of this time. Now, this way, that poor fellow cannot tell at all that when does Bhakti start. And here there is complete account, is not it? Since when did you do Bhakti? You did Bhakti for half a Kalpa. For half a Kalpa there were fruits of knowledge. What? The essence of knowledge is swasthiti (soul conscious stage). And swasthiti leads to heaven. For how long? Half a Kalpa. So, you have been deities in heaven for half a Kalpa. There is no question of wandering in Bhakti at all.

So, even if you consider Bhakti to continue for half a Kalpa, those devotees would give lakhs of years to the Golden Age (Satyug), a few lakhs for the Silver Age (Treta), a few lakhs for the Copper Age (Dwapar). They say that the Iron Age (Kaliyug) is of forty thousand years. So, well, since when did Bhakti begin? Nobody knows this meaning. They are completely confused. It is as if the entire thread of knowledge is tangled. When the thread is very much tangled, then the thread has to be broken. It means that the different kinds of knowledge of different religions have become tangled. So, then what will you have to do? You will have to impair, break the knowledge of all the religions because nobody has the power to explain to them. For Shiv also it will be said – Giridhar Kaviray. This thread of knowledge is very much tangled. So, nobody except the Father can untangle, explain this thread except the Father. So, their thread which is tangled; what is happening to the poor fellows? This fighting, this quarrelling, this famine. And nothing of these sorts happens in heaven. They also don't understand why these fights, quarrels, famines take place? Why do they keep on increasing? So, definitely nobody can understand. So, Baba comes and breaks nicely the thread of knowledge given by these different kinds of religions. And He explains to you giving the minute details. He explains everything nicely that why it is necessary to break them? It is only those children who understand will be able to explain. Well, children can explain only to the extent they have understood. So, these are the tacts to counter the various religions of the body. If there is a nice way to explain anyone, then they explain immediately. And those who haven't studied, those who do not know the tacts, cannot explain. So, it is as if you break your heads.

So, you understand that Baba says correctly that whatever you listen during the day time, understand in the night. Whatever this entire world acted during the day time, it acted as per the drama only. Now everyone knows about it. We know, don't we that whatever happened now happened accurately as per the drama plan because children know this very well now that whatever happens in the drama happens as per the drama plan. We all know this. And we also make purusharth as per the drama plan. The Father also says as per drama plan that I come only when it is destined in the drama. And I come and enable you to make purusharth. What do I enable? For whom do I enable? I do not enable for the sake of the body. I enable you to make purusharth. I enable for the sake of purush, i.e. soul. The connection of the body is with one birth. And the connection of the soul? It is with many births. So, make purusharth. You will say – No. We will make whatever purusharth we can make as per drama. So, tell – No, no, this is not the rule. I give you advice. You have to follow whatever advice I give because it does happen as per drama, but what is ahead of drama? The direction (mat) is also standing in front of the drama, is not it? Shrimat, which changes the drama as well. So, follow my direction. Do not keep on uttering 'drama, drama'. Drama is – Whatever happened in the past is drama. But do not apply drama to future. Act as per the directions that I give.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2441, आडियो 2927, दिनांक 27.02.2018
VCD 2441, Audio 2927, Date 27.02.2018
रात्रि क्लास 5.4.1967
Night Class 5.4.1967
VCD-2441-Bilingual

समय- 00.01-21.00
Time- 00.01-21.00


रात्रि क्लास चल रहा था – 5 .4.1967. चौथे पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी – ये जो तुम्हारा तूफान है वो अंत तक चलेगा। हँ? और तूफान लाने वाले कौन हैं? सुप्रीम सोल शिव है या जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करता है वो है या उसी मुकर्रर रथ में जो ज्ञान चन्द्रमा कहो, वासुकि नाग कहो, प्रवेश करता है। तो ये तीन आत्माएं हो गईं एक ही शरीर रूपी रथ में। तो तूफानों से निकालने का काम कौन करता है और तूफान लाने का काम कौन करता है? हँ? एक है – सदा शिव तीसरा नेत्र जो भृकुटि के मध्य में दिखाते हैं। निरंजन, निराकार, अकर्ता, अभोक्ता, जन्म-मरण के चक्र से न्यारा। तीसरा नेत्र शिव। शिव नेत्र कहते हैं उसको। है तो आत्मा ज्योति बिन्दु ही। और वो जिस भरी-पूरी कुटि में प्रवेश करता है, भृकुटि में, वो शरीर रूपी भरी-पूरी कुटि भाग्यशाली रथ कहा जाता है। हीरो पार्टधारी है ना। तो भाग्यशाली तो होगा ही। तो वो, वो भाग्यशाली रथ वाली आत्मा क्योंकि शिव को तो अपना रथ होता नहीं। वो तो भाग्यशाली रथ में प्रवेश करता है। तो दो आत्माएं हो गईं। और तीसरी आत्मा और है जो मस्तक में दिखाई जाती है। सर में कहो या कहो बुद्धि रूपी पेट में दिखाई जाती है। पेट में कौन प्रवेश करता है? बच्चा प्रवेश करता है।

और बच्चा कहाँ जन्म लेता है? जहाँ जीत वहाँ जन्म। तो जरूर कोई आत्मा है जिसने पूर्व जनम में, जो शंकर पार्टधारी है ना त्रिमूर्ति में, पहले तो ब्रह्मा है, बाद में शंकर पार्टधारी। तो वो शंकर पार्टधारी आत्मा पूर्वजनम में मनुष्य थी या शंकर महादेव थी? मनुष्य थी। और वो मनुष्य भी पतिततम विकारी मनुष्य था या निर्विकारी कहेंगे? हँ? विकारी था। तो जिनको भावना के आधार पर साक्षात्कार हुए, वो ब्रह्मा वाली आत्मा उस विकारी को बार-बार मना करती थी कि विकार में न जाओ। लेकिन वो नहीं मानता था। जैसे कि धोबीघाट चलाया हुआ हो। तो वो विकारी रहा या निर्विकारी हो गया? हँ? क्योंकि शुरुआत में, यज्ञ की आदि में ज्ञान तो था नहीं। ज्ञान से गति-सद्गति होती है। संपूर्ण ज्ञान नहीं था। अधूरा ज्ञान था। तो गति-सद्गति होने का तो सवाल ही नहीं। तो वो आत्मा विकारों में ही फेल हो गई। निर्विकारी नहीं बनी। और दादा लेखराज ब्रह्मा की आत्मा ने विकारों के मामले में उस व्यक्ति से जीत पा ली। तो कहाँ जन्म होगा? जहाँ जीत; किसके ऊपर जीत? वो जो आदि यज्ञ में बहुत विकारी था, उसके ऊपर जीत पाई। तो वो आत्मा जब शरीर छोड़ गई, यज्ञ में, तो दुबारा जन्म लेके आती है यज्ञ में। और ब्रह्मा बाबा निमित्त बनते हैं सारे ब्राह्मण संगठन को चलाने के लिए। तो एक तरफ ब्रह्मा शरीर छोड़ते हैं और उसी वर्ष वो फेल होने वाली राम वाली आत्मा ज्ञान यज्ञ में आ जाती है।

तो ब्रह्मा को तो दिखाते हैं; शास्त्रों में दाढ़ी-मूँछ वाला दिखाते हैं ना। कि क्लीन का भी दिखाते हैं? दाढ़ी-मूँच वाला। उससे साबित होता है कि पुरुषार्थी जीवन में शरीर छोड़ने से पहले ब्रह्मा ने ऐसा पुरुषार्थ नहीं किया जो विष्णु या शंकर की तरह क्लीन शेव निर्विकारी देवता बन पाते। नहीं किया ना। तो देहभान टूटा नहीं क्योंकि जैसे माँ होती है ना। देहभान में आकरके बच्चों को गोद में डाल के खूब हिलोरे देती है। चिपकती रहती है। ऐसे ही ब्रह्मा ने अपने जीवन में क्या किया? क्या किया बच्चों के साथ? बच्चों को या बच्चियों को गोद में लेकरके खूब देहअभिमान का प्रदर्शन किया। तो बच्चों के संग का रंग लगेगा या नहीं लगेगा? लगा। अति का देहअभिमान बढ़ गया। वो ही देह अभिमान जब कलियुग का अंत होने को आता है और सारी दुनिया में रावणराज्य फैला होता है तो रावण के दस सिर रूपी मुखों के ऊपर कंट्रोल करने वाला किसको दिखाते हैं? गधा। वो ही देह अभिमानी गधा कलियुग का अंत आने पर देहअभिमान के रूप में सवार हो जाता है, सौ परसेन्ट सवार। किसके ऊपर? हँ? दस सिर हैं ना। तो 10 सिरों में अव्वल नंबर सिर कौनसा? हँ? काम विकार।

काम विकार भी दो प्रकार से होता है। एक, कामेन्द्रिय से काम विकार एक के साथ भोगना होता है। उसको कहते हैं एक नारी सदा ब्रह्मचारी। और दूसरा होता है अनेकों के साथ व्यभिचार में जाना। तो जब इब्राहिम वाली आत्मा आती है वो व्यभिचार का पार्ट बजाती है। और काम विकार की शुरुआत कौन करता? जैसे मुस्लिम ग्रंथों में लिखा हुआ है – शायद कुरान में ही लिखा हुआ हो कि आदम और हव्वा विकार में गए। हव्वा ने आदम को बरगलाया और फिर प्रैक्टिकल में काम किसने किया? आदम ने काम किया। तो बरगलाने वाले का ज्यादा पाप बना या प्रैक्टिकल करने वाले का ज्यादा पाप बना? हँ? अरे, बरगलाने वाला बरगलाता है तो मत बरगलावे में आओ। आप्शन है ना। तुम्हारी इच्छा है आओ, ना आओ। लेकिन वो आ गया। क्यों आ गया? क्योंकि पुरुष की कमजोरी होती है औरत। वो बच नहीं पाता। तो वो हो गया काम विकार का आरंभकर्ता। कौन? हँ? वो ही राम वाली आत्मा जो यज्ञ के आदि में फेल हो गई थी। और काम विकार आता कब है? हँ? स्त्री देहअभिमानी होती है या पुरुष देहअभिमानी होता है? हँ? स्त्री। तो स्त्री ने आक्षेप किया, देह अभिमान ने आक्रमण किया। स्त्री रूपिणी देह अभिमान ने, देह अभिमानी ने आक्रमण किया और वो काम विकार का सिर, रावण का पहला सिर तैयार हुआ। इसलिए कहते हैं काम देव को भस्म किया। काम देव अपने अंदर की चीज़ है या कोई बाहर का देवता है? हँ? अंदर की चीज़ है ना।

तो ब्रह्म वाक्य मुरली में आया – राम फेल हो गया। हँ? राम वाली आत्मा रावण बनती है आखरीन। क्या? रावण के सिर बहुत बनते हैं। लेकिन अति का सौ परसेन्ट रावण कोई नहीं बन पाता। तो कौनसी आत्मा बनती है? जो मनुष्य सृष्टि का बीज है वो ही रावण बनता है। सारे संसार को विनाशकाल में रुलाता है। सब रोते हैं। बहुत बड़ा रावण हुआ। रावयते लोकान् इति रावण। जो लोगों को रुलाता है; लोक माने संसार को, सारे संसार को रुलाता है, वो ही सबसे बड़ा रावण हुआ। लेकिन रावण के ऊपर कौन सवार होता है? गधा। वो गधा कौन हुआ? देह अभिमान का गधा कौन हुआ? हँ? ईव। हव्वा। तो वो देहअभिमान भी तूफान लाता है। और काम विकार भी, जिसे कामदेव कहें, साक्षात काम देव, वो भी तूफान लाता है। तो ऐसे नहीं भगवान परीक्षा लेता है तूफानों से। जो ओरिजिनल ऊँचे ते ऊँच आत्मा है सुप्रीम सोल, वो तो तूफानों से निकालने वाला है। बाकि ये दो आत्माएं हैं – एक मुकर्रर शरीरधारी, जिसमें वो शिव प्रवेश करता है, शरीरधारी की आत्मा। और दूसरा? ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा। वो घड़ी-घड़ी देहअभिमानी बनता रहता है। जैसे गधे को कितना भी स्नान ज्ञान कराके, स्वच्छ कराओ वो धडाक से देहभान की मिट्टी में लोट जाता है।

तो काम विकार का, काम विकार की उत्पत्ति करने वाला कौन हुआ? ऐसे तो कोई भी विकार की उत्पत्ति करने वाला वो ही है। लेकिन खास काम विकार की उत्पत्ति करने वाला कौन हुआ? देह अभिमानी गधा। वो वासुकि नाग के रूप में उस मुकर्रर शरीरधारी के तन में, खास करके गले में लिपटा ही रहता है। तो बताया; हँ? ये तुम्हारा; तुम्हारा माने किसका? एक का या एक से ज्यादा का? तेरा माने एक का। अंग्रेजी में कहते हैं दाउ (thou); और तुम्हारा माने कम से कम दो का। तो वो दो ये हुए। एक हुआ दादा लेखराज वाली आत्मा साक्षात देहअभिमान, जिसे मुसलमानों ने हव्वा कहा और अंग्रेजों ने एडम कहा। ना, ईव कहा। और दूसरा? आदम या अंग्रेजी भाषा में एडम या हिन्दुओं में जिसे आदि देव शंकर कहते हैं। तो ये, एक मूर्तिमान शंकर और दूसरा? शंकर तो ज्ञान सागर हो गया। ज्ञान सागर जो धरणी को तीन तरफ, तीन गुना, तीनों ओर से अपने में समा के रखता है। धरणी माता हो गई, सागर पिता हो गया और उन दोनों का बच्चा उपग्रह चन्द्रमा हो गया। तो वो ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा और ये पिता आदिदेव शंकर दोनों की आत्मा को शिव ने बताया कि तुम्हारा ये तूफान अंत तक चलेगा। दोनों का। जब तक सृष्टि का अंत हो तब तक ये तूफान चलता रहेगा।

A night class dated 5.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the fourth page was – Your storms will continue till the end. Hm? And who brings the storms? Is it the Supreme Soul Shiv or is it the one in whom He enters in a permanent manner or is it the Moon of knowledge, the snake Vasuki who enters in that permanent Chariot? So, these are three souls in the same body like Chariot. So, who performs the task of extracting from the storms and who performs the task of causing storms? Hm? One is the Sadaashiv netra, the third eye, which is shown in the middle of the bhrikuti (between the brows on the forehead). Stainless (niranjan), incorporeal (niraakaar), non-doer (akartaa), non-pleasure seeker (abhokta), beyond the cycle of birth and death. The third eye Shiv. He is called the Shivnetra. He is indeed a point of light soul only. And the bhrikuti (area between the eyebrows on the forehead) in which He entres, that body like hut is called the fortunate Chariot. He is a hero actor, is not he? So will indeed be fortunate. So, that soul of the fortunate Chariot; because Shiv does not have His own Chariot. He enters in the fortunate Chariot. So, there are two souls. And there is a third soul also which is shown in the forehead. It is depicted in what you may call head or the intellect like womb. Who enters in the womb? A child enters.

And where does a child get birth? One gets birth wherever one gains victory. So, definitely there is a soul who, in the past birth; the actor Shankar in the Trimurti; first there is Brahma and then later on there is the actor Shankar. So, was the actor Shankar’s soul a human being in the past birth or was it Shankar Mahadev? It was a human being. And was that human being also a most sinful vicious human being or will he be called viceless? Hm? He was vicious. So, the one who had visions on the basis of his feelings, that soul of Brahma used to stop that vicious person again and again that you don't indulge in lust. But he did not used to accept. It was as if he has started a dhobighat (laundry). So, did he remain vicious or did he become viceless? Hm? It is because in the beginning, in the beginning of the Yagya there was not much knowledge. It is through knowledge only that gati (liberation) and sadgati (true salvation) is caused. There wasn't complete knowledge. It was incomplete knowledge. So, there is no question of happening of gati-sadgati. So, that soul failed in vices. It did not become viceless. And the soul of Dada Lekhraj gained victory over that person in the matter of vices. So, where will he be born? Wherever he gains victory; Victory over whom? He gained victory over the one who was very vicious in the beginning of the Yagya. So, when that soul left its body in the Yagya, then it re-enters the Yagya. And Brahma Baba becomes instrumental in running the entire Brahmin gathering. So, on the one hand Brahma leaves his body and in the same year, that soul of Ram who fails, enters the Gyan Yagya.

So, Brahma is depicted; he shown to have beard and moustache in the scriptures, is not he? Or is he shown to be clean [shaven] also? He possesses beard and moustache. It proves that in the purusharthi life, before leaving the body, Brahma did not make such purusharth that he could become clean shave viceless deity like Vishnu or Shankar. He did not make, did he? So, his body consciousness was not broken because just as there is a mother, is not she? Out of body consciousness, she takes the child in her lap and dangles him/her a lot. She keeps on coming close. Similarly, what did Brahma do in his life? What did he do with the children? He took the sons or daughters in his lap and exhibited his body consciousness a lot. So, will he be coloured by the company of the children or not? He was. His body consciousness increased extremely. The same body consciousness; when the Iron Age is about to end and when there is the kingdom of Ravan in the entire world, then, who is shown to control the ten heads of Ravan? Donkey. The same body conscious donkey rides in the form of body consciousness when the Iron Age is about to end; he rides hundred percent. On whom? Hm? There are ten heads, aren’t there? So, which head is number one among the ten heads? Hm? The vice of lust.

The vice of lust is also of two kinds. One is to enjoy pleasure of lust through the organ of lust with one. That is called 'ek naari sadaa brahmachaari' (the man who remains loyal to his wife throughout the life is like a celibate person). And the other is to indulge in adultery with many. So, when the soul of Ibrahim comes, it plays the part of adultery. And who starts the vice of lust? For example, it has been written in the Muslim scriptures – Perhaps it is written in Koran that Aadam and Havva indulged in lust. Havva misled Aadam and then who performed the task in practical? Aadam performed the task. So, will the person who misled accrue more sins or will the one who did in practical accrue more sins? Hm? Arey, if a person misleads you, then do not get misled. There is an option, is not it there? It is your wish, you may or you may not [be misled]. But he was misled. Why was he misled? It is because the weakness of a man is a woman. He cannot save himself. So, he happens to be the starter of the vice of lust. Who? Hm? The same soul of Ram, who failed in the beginning of the Yagya. And when does the vice of lust come? Hm? Is a woman body conscious or is a man body conscious? Hm? A woman. So, the woman interfered, body consciousness attacked. Body consciousness in the form of a female, a body conscious person attacked and that head of the vice of lust, the first head of Ravan got ready. This is why it is said that the deity of desire (kaam dev) was destroyed. Is Kaamdev something within ourselves or is it an external deity? Hm? It is an inner thing, is not it?

So, it was mentioned in the Brahmavaakya Murli – Ram failed. Hm? The soul of Ram becomes Ravan ultimately. What? Many become the heads of Ravan. But nobody is able to become extreme, hundred percent Ravan. So, which soul becomes? The seed of the human world himself becomes Ravan. He makes the entire world to cry in the time of destruction. Everyone cries. He happens to be a very big Ravan. Ravayate lokaan iti Ravan. The one who makes people cry; the one who makes the lok, i.e. world, the entire world to cry is the biggest Ravan. But who rides on the Ravan? Donkey. Who is that donkey? Who is the donkey of body consciousness? Hm? Eve. Havva. So, that body consciousness also causes a storm. And the vice of lust also, whom you may call the deity of desire (kaamdev), practical Kaamdev, it also causes storm. So, it is not as if God tests you through storms. The original highest on high soul, the Supreme Soul is the one who takes you out of storms. As regards these two souls – One is the permanent bodily being, in whom that Shiv enters, the soul of the bodily being. And the other? The Moon of knowledge Brahma. He keeps on becoming body conscious every moment. Just as, even if you make the donkey bathe in the water of knowledge to any extent, you may clean it, but it will immediately go and roll in the soil of body consciousness.

So, who happens to be the one who gives birth to the vice of lust? In a way, it is he alone who gives birth to any vice. But who gives birth especially to the vice of lust? The body conscious donkey. He remains entwined around the neck of that permanent bodily being's body in the form of Vasuki snake. So, it was told; hm? This yours; 'Yours' refers to whom? To one or to more than one? Yours means 'of one'. It is said in English – Thou; and yours means at least two. So, these are those two. One is the soul of Dada Lekhraj, the body consciousness incarnate, whom the Muslims called Havva and Englishmen called Adam, no, they called her Eve. And the other? Aadam or Adam in English language or the one who is called Aadi Dev Shankar among the Hindus. So, this, one personality Shankar and the other? Shankar is the ocean of knowledge. The ocean of knowledge who surrounds the Earth from three sides, three fold, from three sides. The Earth happens to be the mother, the ocean happens to be the Father and the child of both of them is the satellite Moon. So, that Moon of knowledge Brahma and this Father Aadidev Shankar, both these souls were told by Shiv that your storms will continue till the end. Of both. This storm will continue until this world comes to an end.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2442, आडियो 2928, दिनांक 28.02.2018
VCD 2442, Audio 2928, date 28.02.2018
रात्रि क्लास 5.4.1967
Night Class dated 5.4.1967
VCD-2442-extracts-Bilingual

समय- 00.01-13.17
Time- 00.01-13.17


रात्रि क्लास चल रहा था – 5.4.1967. चौथे पेज के मध्य में बात चल रही थी – कृष्ण बच्चा, जिसकी पूजा करते हैं, भले 16 कला संपूर्ण है, परन्तु बनाया किसने 16 कला संपूर्ण? वो तो भगवान ही बनाने वाला है। भगवान ही राजयोग सिखा करके आत्मा को संपन्न स्टेज में ले जाते हैं। तो गायन चला आता है भगवान ने नर को नारायण बनाया गीता ज्ञान देकर। अब जिसने ज्ञान दिया, उसको ही ज्ञान, जिसने ज्ञान दिया उसको तो भूल गए, क्योंकि सतयुग आदि से पहले क्या था किसी को पता नहीं। तो कृष्ण का ही नाम डाल दिया भगवान। और फिर लिख दिया कि द्वापर के अंत में कृष्ण ने आके जन्म लिया आत्मा ने। वहाँ भी 16 कला संपूर्ण दिखाय देते हैं। अरे कलियुग, द्वापर में तो शास्त्रों में तो आठ कलाएं दिखाई हैं फिर ये दूसरी-दूसरी बात क्यों शुरू कर दी? तो कलियुग के अंत में कृष्ण को भगवान बनाके दिखाते हैं कि भगवान ने पापी कलियुग की स्थापना कर दी। कितनी विसंगतियां हैं। वास्तव में जिस बच्चे कृष्ण की पूजा करते हैं वो तो सृष्टि के आदिकाल का बच्चा है जो चित्रों में दिखाते हैं चरित्र की यादगार। कि भव सागर में पीपल का पत्ता पड़ा हुआ है और उसमें कृष्ण गर्भमहल में आराम से आत्मिक स्थिति का अंगूठा चूस रहा है। तो बच्चे को बाबा कैसे कह दिया? बच्चे को तो जन्म देने वाला बड़ा होना चाहिए। इसलिए ये रांग बात है।

ये शिवबाबा कहते हैं - मैं पतित पावन हूँ। पतितों को पावन बनाने वाला मैं हूँ। जो पतित कलाहीन बन जाते हैं उनको आकरके नर से नारायण जैसा 16 कला संपूर्ण सतयुग का पहला देवता बनाता हूँ। तो शास्त्रों में ये भी कहते हैं और कीर्तन में भी गाते हैं – हे कृष्ण नारायण वासुदेव। अर्थात् ये एक ही आत्मा का नाम है जो सतयुग के आदि में नारायण बनता है परन्तु जन्म किससे लेता है, ये बात भूल गए। जो जन्म देने वाला उसका बाप है। तो कृष्ण को कोई पतित-पावन कहते ही नहीं हैं। कहते किसको हैं? गायन किसका है पतित पावन सीताराम? जो सीताराम का गायन है वो सीताराम वाली आत्मा ही सतयुग से पहले शूटिंग पीरियड संगमयुग में, कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के 100 वर्ष के टाइम में पतित से पावन बनने का पुरुषार्थ करती है। और जब पावन बनते हैं तो वो ही रामवाली आत्मा पावन बनकरके बाप समान बन जाती है। आत्माओं का बाप है शिव। और उन आत्माओं के बीच में जो भोगी आत्माएं हैं, बड़ा बच्चा है राम वाली आत्मा जो मनुष्य सृष्टि का बीज है। मनुष्य सृष्टि का बीज वो ही वास्तव में सतयुग आदि को आरंभ करने वाला बीज है।

जैसे ब्रॉड ड्रामा में जो चार सीन हैं – सतयुग, त्रेता द्वापर, कलियुग – इन चारों सीन्स को आरंभ करने वाला वो हीरो पार्टधारी है, मनुष्य सृष्टि का बीज, जो सबका आदि पिता कहा जाता है। जगतपिता कहा जाता है। जगतम पितरम् वंदे पार्वती परमेश्वरौ। ऐसे शास्त्रों में मान्यता है ना। तो वो ही पतित से पावन बनता है। बनाता कौन है? बनाता है जो त्रिकालदर्शी है, अखूट त्रिकालदर्शी, जो कभी भी अज्ञानी बनता ही नहीं। हँ? बनता है? वो जो जन्म-मरण के चक्र में ही नहीं आता तो अज्ञानी नहीं बनता। और वो राम वाली आत्मा तो जन्म-मरण के चक्र में आती है। परन्तु मनुष्य सृष्टि का बीज है। इसलिए वो बीज में परमपिता परमात्मा शिव जो निराकारी, निर्विकारी, अभोक्ता, अकर्ता है आत्मा, जिसका अपना शरीर ही नहीं है जो कर्म करे। तो वो प्रवेश करता है। गीता में लिखा है कि मैं प्रवेष्टुम, प्रवेश करने योग्य हूँ। जैसे भूत-प्रेत आत्माएं प्रवेश कर जाती हैं, देखने में नहीं आतीं, तो ऐसे ही वो भूत-प्रेत आत्माओं से भी उच्च कोटि की आत्मा पावरफुल, वो है शिव। उसका सूक्ष्म शरीर भी नहीं होता। उसको कहा जाता है कारण शरीर। क्या? वो कारण शरीर तब कहा जाता है जब साकार शरीर में प्रवेश करते हैं। वो सृष्टि का कारण बनता है। अगर वो बीज ही न हो तो सृष्टि भी, सृष्टि रूपी वृक्ष भी पैदा नहीं होगा।

तो कृष्ण को कोई पतित-पावन नहीं कहते हैं जो 16 कला संपूर्ण सतयुग का कृष्ण है या द्वापर में जिसको डाल दिया, द्वापर के अंत में। वो कोई पतितों को पावन बनाने वाला नहीं है। वास्तव में पावन देवताएं तो सतयुग में होते हैं 16 कला संपूर्ण, 14 कला संपूर्ण, द्वापर में जहाँ 8 कलाएं भी अंत में खतम हो जाती हैं उसे पावन युग कैसे कहेंगे? वहाँ कोई पावन बनके कैसे पैदा होगा? तो ये अक्षर उन कृष्ण के पुजारियों को चुभेगा कि अरे! हमारे कृष्ण बच्चे को तो, इतना सलोना बच्चा, इतना बढ़िया भगवान देखने में आता है, छोटे-छोटे बच्चे अच्छे, देखने में अच्छे लगते, जानवरों के भी बच्चे अच्छे लगते हैं। तो फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या? तो ये अक्षर उनको चुभेगा कि हमारा कृष्ण बच्चा भगवान ही नहीं रहा। वो रचना हो गया। रचयिता भगवान कोई और है। तो गीता वाला जो होगा, क्योंकि गीता में कृष्ण का नाम डाला हुआ है। भले गीता में लिखा हुआ है कई जगह श्री भगवानुवाच। कृष्ण भगवानुवाच कहीं नहीं लिखा है। तो भी वो समझते हैं कि कृष्ण ही भगवान है। तो उनको इतना अन्दर से चुभेगा एकदम कि अई ऐसी बात सुनाई जो दिल में लग गई। जैसे कोई तीखा बाण लगता है तो घाव कर देता है। इतना घाव कर देता है कि प्राण ही छोड़ देते। तो ऐसे ही उनका देहभान खत्म हो जाता है। और फिर वो कोई जास्ती प्रश्न उत्तर नहीं करते हैं। बस निश्चय हो गया कि इनको भगवान ही पढ़ाते हैं क्योंकि भगवान की बातों का जवाब कौन देगा सिवाय भगवान के? कृष्ण भगवान है तो कृष्ण भगवान ने गीता में तो बताया नहीं कि मैं कैसे भगवान हूँ? और ये बताते हैं तो जरूर ये भगवान के बच्चे हैं।

अच्छी तरह से ये तो बताते हैं और मंत्र भी बताते हैं। क्या? भगवान आकरके क्या मंत्रणा देते हैं वो मंत्र भी बताते हैं। क्या करो? मामेकम् याद करो। माना जो निराकार आत्माओं का निराकार बाप शिव है ज्योतिबिन्दु, जो सदैव ही बिन्दु रूप स्टेज में स्थित रहता है, स्वस्थिति में सदा शिव है, वो बताते हैं कि मेरा मन नहीं है। जो मैं संकल्प विकल्प चलाऊं, मनन-चिंतन-मंथन करूं। मेरे तो जन्म ही नहीं हैं जिनके बारे में मैं मनन-चिंतन-मंथन करूं। मैं तो अविनाशी आत्मा हूँ। मैं देह का जन्म लेता ही नहीं। तो मैं मंत्र कैसे बताऊंगा कि मामेकम् याद करो? एक बिन्दु को याद करो। पता कैसे चलेगा? जितनी भी आत्माएं सब बिन्दी-बिन्दी तो हैं तो कौनसी बिन्दी को याद करें? विशेषता तो कुछ पता नहीं चलेगी कि वो स्पेशल बिन्दी कौन जो भगवान है। तो बताया कि वो फिर इतना नहीं करेगा तिर्र-तिर्र, प्रश्नों की बौछार नहीं करेगा। नतमस्तक हो जाएगा। बुद्धि झुकाय देगा। ये क्यों कहते हो? अरे! फलाना क्यों? ना, क्योंकि भगवान इनको पढ़ाते हैं ना। और इनसे जास्ती इनको कौन होगा? तो बताओ कृष्ण तो 16 कला संपूर्ण बनने वाला है, बनाने वाला तो उससे ऊँचा होगा ना। कलातीत होगा ना। गाया भी जाता है कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। हँ? जो कलाओं से अतीत है वो क्या होगा? हँ? वो तो सबका कल्याणकारी होगा। 16 कला संपूर्ण बनने वाले देवताओं का भी कल्याण करने वाला होगा। तब तो वो 16 कला संपूर्ण बने। और कल्पांतकारी। कल्प का अर्थात् कलियुग का अंत करने वाला भी होगा।

A night class dated 5.4.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fourth page was – Child Krishna, who is worshipped, is although perfect in 16 celestial degrees, yet who made him perfect in 16 celestial degrees? It is God Himself who makes. God Himself teaches Rajyog and takes the soul to a perfect stage. So, a saying is famous that God transformed a man (nar) to Narayan by giving the knowledge of the Gita. Well, you forgot the one who gave knowledge because nobody knows what existed before the beginning of the Golden Age. So, Krishna's name has been inserted as God. And then it has been written that Krishna's soul came in the end of the Copper Age and got birth. Even there he is shown to be perfect in 16 celestial degrees. Arey, it is depicted in the scriptures that there were eight celestial degrees in the Iron Age and Copper Age, then why did you start these other topics? So, in the end of the Iron Age Krishna is shown as God that God established a sinful Iron Age. There are so many discrepancies. Actually, the child Krishna who is worshipped is a child of the beginning of the world who is shown as a memorial of his acts in the pictures that there is a fig leaf in the ocean of world (bhav saagar) and Krishna is suckling his thumb of soul consciousness comfortably in the womb like palace in it. So, how was a child called Baba? The one who gives birth to the child should be a grown up person. This is why it is a wrong topic.

This ShivBaba says – I am purifier of the sinful ones (patit-paavan). I purify the sinful ones. I come and transform those who become sinful, devoid of celestial degrees from man to the first deity of the Golden Age, i.e. Narayan, who is perfect in 16 celestial degrees. So, it is said in the scriptures also and sung in the prayer songs also – He Krishna Narayan Vasudev, i.e. it is the name of only one soul, who becomes Narayan in the beginning of the Golden Age, but they have forgotten that from whom does he get birth. The Father who gives birth to him. So, Krishna is not called the purifier of the sinful ones by anyone. Who is called? Who is praised as 'Patit-paavan Sita-Ram'? It is sung for Sita-Ram that the souls of Sita and Ram themselves, during the shooting period in the Confluence Age before the Golden Age, during the 100 years time between the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age make purusharth to become pure from sinful. And when they become pure, then the same soul of Ram becomes pure and becomes equal to the Father. The Father of souls is Shiv. And among those souls, the bhogi (pleasure-seeking) souls, the eldest child is the soul of Ram who is the seed of the human world. The seed of the human world himself is actually the seed who starts the Golden Age.

For example, there are four scenes of the broad drama – the Golden Age, the Silver Age, the Copper Age, and the Iron Age – the one who starts these four scenes is that hero actor, the seed of the human world, who is called the first Father of everyone. He is called the Father of the world. Jagatam pitaram vandey paarvati parmeshawarau. It is believed so in the scriptures, is not it? So, He himself becomes pure from sinful. Who makes? The one who is Trikaaldarshi, inexhaustible Trikaaldarshi, who never becomes ignorant at all. Hm? Does He become? The one who does not pass through the cycle of birth and death at all does not become ignorant. And that soul of Ram passes through the cycle of birth and death. But he is the seed of the human world. This is why the Supreme Father Supreme Soul Shiv, who is incorporeal, viceless, abhokta (non-pleasure seeking), akarta (non-doer) soul, who does not have a body of His own at all to perform actions, enters in that seed. It has been written in the Gita that I am capable of entering, Praveshtum. Just as souls of ghosts and devils enter, are invisible, similarly a soul who is of a higher category, more powerful than those souls of ghosts and devils is Shiv. He does not have a subtle body as well. That is called Kaaran shariir (causal body). What? That causal body is called so when He enters in a corporeal body. He becomes the cause for creation. If that seed itself does not exist then the world, the world tree will not be born either.

So, the Krishna of the Golden Age, who is perfect in 16 celestial degrees or the one who has been put into Copper Age, in the end of the Copper Age is not called the purifier of the sinful ones. He is not the purifier of the sinful ones. Actually pure deities are in the Golden Age, perfect in 16 celestial degrees, 14 celestial degrees; How will the Copper Age, where even the eight celestial degrees vanish at its end, be called a pure Age? How will anyone be born as a pure one there? So, these words will pinch the worshippers of Krishna that arey! Our child Krishna, such an attractive child; he appears to be such nice God; small children appear so nice; the young ones of animals also appear so nice. So, then the human beings are a class apart! So, these words will pinch them that our child Krishna did not remain God. He became a creation. Creator God is someone else. So, the follower of the Gita; because the name of Krishna has been inserted in the Gita. Although it has been written at many places in the Gita - Shri Bhagwaanuwach (God speaks). It has nowhere been written – Krishna Bhagwaanuwaach (God Krishna speaks). Still they think that Krishna himself is God. So, it will pinch them so much from inside completely that such a topic has been narrated that it has pinched the heart. For example, if a sharp arrow hits, it causes injury. It causes such injury that some fall dead. So, similarly their body consciousness ends. And then they do not give replies to many questions. They just developed the faith that God alone teaches them because who except God will give reply to the questions of God? If Krishna is God, then God Krishna hasn't told in the Gita that in what manner I am God. And these people say that definitely these are the children of God.

He tell these things nicely and tells the mantra also. What? He also tells the mantra that what the advice (mantrana) is that God gives. What should you do? Remember Me alone. It means that the incorporeal point of light Father Shiv of the incorporeal souls who always remains constant in a point-like stage, the one who is Sadaashiv in swasthitii (soul consciousness), tells that I don't possess mind to create good or bad thoughts, to think and churn. I do not get any births at all that I think and churn about it. I am an imperishable soul. I do not get physical birth at all. So, how will I narrate a Mantra that remember Me alone, remember one point? How will you know? All the souls are point-like; so, which point should we remember? You will not know the specialty that which is that special point which is God. So, it was told that then he will not shoot a volley of questions. He will bow down. He will bow his intellect. Why do you say this? Arey! Why that? No, because God teaches them, doesn’t He? And who else will be more than Him for them? So, tell that Krishna is going to become perfect in 16 celestial degrees; the maker will be higher than him, will he not be? He will be beyond celestial degrees, will He not be? It is also sung – Kalaateet kalyaan kalpaantkaari (the one who is beyond celestial degrees, benevolent and the one who brings the world cycle to an end). He will be the one who causes benefit to even the deities who become perfect in 16 celestial degrees. Only then will they become perfect in 16 celestial degrees. And kalpaantkaari. He will also be the one who brings the Kalpa (world cycle) to an end, i.e. the Iron Age to an end.

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