Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2460, आडियो 2946, दिनांक 18.03.2018
VCD 2460, Audio 2946, Date 18.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2460-Bilingual

समय- 00.01-14.20
Time- 00.01-14.20


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.67. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी, मुरली की शुरुआत में बात थी – बच्चे बहुत हार खाते हैं माया से। माया से हार तो नहीं खाना चाहिए। ऐसे सर्वशक्तिवान उस्ताद मिले तो उस्ताद की श्रीमत पर चल अपना वर्सा तो ले लेना चाहिए ना। देखो, बाप डायरेक्ट कहते हैं। क्या? मुकर्रर रथ से कहते हैं, परमानेन्ट रथ के द्वारा। निराकार है ना। तो कहते हैं – तुम बच्चों को फिर से बेहद का सुख का वर्सा देने आया हुआ हूँ। पहले भी दिया था। पहले कब दिया था? हँ? नरक की दुनिया के बीच स्वरग का वर्सा दिया था। हँ? (किसी ने कुछ कहा) लम्बा-चौड़ा है। यज्ञ के आदि में क्या वर्सा दिया था? हँ? नरक की दुनिया कौनसी थी? क्या स्वर्ग का वर्सा दिया था? हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का 1947 में खून-खराबे का युद्ध शुरू हो गया था। उस खून-खराबे के बीच में, नरक की दुनिया के बीच में तुम बच्चे कराची में समंदर के किनारे बड़े आराम से बंग्ले में रहे पड़े थे। मुसलमान लोग कहते थे – ये तो खुदाई-खिदमतगार हैं। तो देखो, पाकिस्तान में, हिन्दुस्तान में खून की नदियाँ बह रही थीं 1947 में। और तुम बच्चे आराम से रहे पड़े थे।

अभी फिर बाप आया हुआ है। डायरेक्ट कहते हैं – ऐसे नहीं कोई टेम्पररी रथ के द्वारा कहते हैं। जिस तन में भी आता हूँ नाम क्या रखता हूँ? ब्रह्मा। परन्तु ब्रह्मा को तो पांच मुख दिखाते हैं। तो जरूर एक मुख डायरेक्ट हुआ, परमानेन्ट हुआ। बाकी मुख? हँ? बाकी मुख तो परमानेन्ट तो नहीं हुए ना। कभी उन मुखों के द्वारा बोलेंगे, कभी नहीं बोलेंगे, तो इनडायरेक्ट ही हुए ना। और फिर बाप के रूप में तो नहीं कहेंगे। बाप तो एक होता है या बाप भी अनेक हो सकते हैं? माताएं अनेक हो सकती हैं। लेकिन बाप तो एक ही होता है। एक परिवार का एक ही बाप। बच्चे अलग-अलग प्रकार के हो सकते हैं। तो प्रजापिता ब्रह्मा है परमानेन्ट रथ। उसके द्वारा डायरेक्ट कहते हैं – मैं तुम बच्चों को फिर से बेहद सुख का वर्सा देने आया हूँ। हद का वर्सा तो दुनिया में मिलता है। उसमें सुख भी है तो दुःख भी है। हद के देहधारी धरमपिताएं आते हैं तो हद का सुख का वर्सा देते हैं। बाप तो ऐसे सुख का वर्सा देते हैं जिसमें तुमको कोई दुःख नहीं होता है। हँ? होता है? नहीं होता है। वर्सा देने आया हुआ है। अभी दिया नहीं है।

तुमको बाप की श्रीमत पर भी चलना है। क्या? कब तक चलना है? जब तक तुमको बेहद का वर्सा मिले। और टीचर की मत पर भी चलना है। क्या? तुम्हारा बाप, तुम्हारा टीचर, और तुम्हारा सद्गुरु एक ही है या अलग-अलग हैं? एक ही परमानेन्ट रथ में बाप भी है, सुप्रीम टीचर भी है और सदगति करने वाला सद्गुरु भी है। तो उस एक की मत पर चलना है। बाप के बने हो। बाप पढ़ाय रहे हैं। कहते हैं कि पढ़ाई पूरी होगी तो पिछाड़ी में तुम बच्चों को साथ ले जाऊँगा। क्या? कहाँ ले जाऊंगा? हँ? शान्तिधाम की स्टेज में ले जाऊँगा। कौन कहते हैं? हँ? बाप कहते हैं। पिछाड़ी में साथ ले जाऊँगा। क्या? पिछाड़ी कब होगी? जब पढ़ाई पूरी होती है तो फिर पढ़ाई पूरी होने के बाद जब सृष्टि का पूरा शूटिंग का काल पूरा होता है तो पिछाड़ी हो जाती है। साथ ले जाऊँगा। कहाँ ले जाऊँगा? हँ? बताओ। जल्दी से एक शब्द में। कहाँ ले जाऊँगा? शान्तिधाम ले जाऊँगा। क्या? तुम्हारी आत्मा शान्तिधाम का अनुभव करेगी। ज्योति बिन्दु आत्मा कहाँ अनुभव करेगी? मैं शान्तिधाम में बैठी हूँ। अखण्ड ज्योति के बीच में बैठी हूँ। बच्चे कहेंगे – बहुत दूर ले जाएँगे, इतनी दूर! बाप कहते हैं – अरे, तुम खुद ही परमधाम को इस सृष्टि पर उतार लेंगे। क्या? वो शान्ति की स्टेज तुम खुद ही नीचे ले आएंगे। ये कितनी सीधी बातें हैं बच्चों को अच्छी तरह से समझने की हैं। तो आत्मा शान्त स्वरूप है तो कहाँ की वासी हुई? शान्तिधाम की वासी हुई ना। इस दुनिया में तो अभी घमासान है। इस दुनिया में शान्ति कैसे होगी? इस दुनिया की स्टेज से परे, इस दुनिया के मनन-चिंतन-मंथन से परे, जब तुम आत्मिक स्टेज में पहुँचते हो, तो शान्तिधाम का अनुभव करते हो।

बच्चों को अच्छी तरह से समझना है कि पुरुषार्थ करो। क्या करो? पुरष। शरीर रूपी पुरी में शयन करने वाली जो आत्मा है, वो ऐसे शरीर में रहे, ऐसे आराम से अनुभव करे जैसे कोई दुःख का नाम-निशान नहीं, अशान्ति का नामनिशान न रहे, तो कहेंगे पक्का पुरुषार्थी सौ परसेन्ट। शरीर रूपी पुर में भी रहे और मुक्त भी हो जाए दुःख-दर्दों से। और फिर जीवनमुक्ति का भी अनुभव करे। जीवन भी रहे, जीवित रहे शरीर से और सुख-शान्ति में रहे, दुःख-अशान्ति महसूस न करे। तो ऐसा पुरुषार्थ करो कि पढ़ाई पूरी हो और बाप के साथ शान्तिधाम में चले जाएं।

माया की मत पर यानी परमत पर। क्या? माया कैसी है? हँ? आत्मा की मत देने वाली है? स्वधर्म की मत देने वाली है या परधर्मों की मत देने वाली है? परधर्म कबसे आते हैं? परधर्म आते ही हैं द्वैतवादी द्वापरयुग से जब दो-दो धर्मपिता इस सृष्टि पर आना शुरू होते हैं। दो-दो की इस दुनिया में मतें चलती हैं। तब वसुधैव कुटुंबकम थोड़ेही कहेंगे कि सारी वसुधा एक कुटुम्ब हो गई। तब तो द्वैतवाद हो गया। अलग-अलग धर्म के परिवार स्थापन हो जाते हैं। तो परमत पर मत चलो। ये माया है। पराए धर्मपिताओं की मत देने वाली। पराए धर्मों की धारणाएं सिखाने वाली। क्या धारणाएं? भौतिकवादी धारणाएं। पंचभूतों को सत्य मानो। अरे! पंचभूतों से बना हुआ शरीर ही विनाशी है। तो हम विनाशी को क्यों मानें जब हमें अविनाशी बाप मिला हुआ है?

वो अविनाशी बाप हमारी आत्मा का बाप है। स्व का बाप है। स्वधर्म में रहना सिखाता है। स्व माने ही आत्मा। आत्मा के धर्म में रहें। तुम आत्मा हो। आत्मा को पहचानो। आत्मा ज्योतिबिन्दु है। आत्मा मन-बुद्धि और मन-बुद्धि में भरे हुए जो संस्कार हैं, स्वभाव हैं, उनसे भरपूर है। ये स्वभाव-संस्कार हर आत्मा में इस ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग पीरियड में भरे हैं। जैसे-जैसे भाव भरे हैं वैसा-वैसा उसे पार्ट बजाना पड़ता है। और उऩ्हीं भाव-स्वभाव संस्कारों के अनुसार मैं हर आत्मा के वर्ण का निश्चय कर देता हूँ, निश्चित कर देता हूँ। इसलिए गीता में लिखा है – चातुर्वर्ण्यम् मयासृष्टम् गुण कर्म स्वभावशः। (गीता 4/13) मैंने चार वर्णों की रचना की है। किस अनुसार? गुणों के अनुसार, कर्म के अनुसार, स्वभाव के अनुसार। क्या? ऐसे नहीं किए हैं। तुमने जैसे स्वभाव धारण किये मेरे आने पर भी, मेरे ज्ञान सुनाने पर भी तुमने जैसे स्वभाव-संस्कार धारण किये वैसा ही तुमको वर्ण में कनवर्ट होना पड़ता है। ये स्वभाव तुम्हारी प्रकृति है। तो बताया स्वधर्म पर चलो।

A night class dated 16.5.67 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page, in the beginning of the Murli was – Children suffer a lot of defeat at the hands of Maya. One should not be defeated by Maya. When you have such an Almighty trainer (ustaad), then you should follow the directions of the ustaad and obtain your inheritance, shouldn’t you? Look, the Father says directly. What? He says through the mukarrar rath, through the permanent Chariot. He is incorporeal, isn’t He? So, He says – I have come to give the unlimited inheritance of happiness to you children once again. I had given in the past as well. When did He give in the past? Hm? An inheritance of heaven was given amidst the world of hell. Hm?
(Someone said something.) It (the reply) is long and wide. Which inheritance was given in the beginning of the Yagya? Hm? Which was the world of hell? Was the inheritance of heaven given? The war of bloodshed had begun in 1947 between India and Pakistan. Amidst that bloodshed, amidst the world of hell, you children were living very comfortably in a bungalow on the shores of the ocean in Karachi. Muslims used to say – These are Khudai Khidmatgaars (God’s servants). So, look, rivers of blood were flowing in Pakistan, in India in 1947. And you children were living comfortably.

Now the Father has come again. He says directly – It is not as if He says through a temporary Chariot. Whichever body I enter, what do I name it? Brahma. But Brahma is shown to have five heads. So, definitely one head is direct, permanent. The remaining heads? Hm? The remaining heads are not permanent, aren’t they? Sometimes He will speak through those mouths and sometimes He may not. So, they are indirect only, aren’t they? And then He will not speak in the form of a Father. Is the Father one or can the Fathers be many? Mothers can be many, but the Father is only one. There is only one Father in one family. Children can be of different kinds. So, Prajapita Brahma is the permanent Chariot. He says directly through him – I have come to give you children the unlimited inheritance of happiness once again. Limited inheritance is received in the world. It includes happiness as well as sorrows. Limited bodily founders of religions come they give limited inheritance of happiness. The Father gives such inheritance of happiness in which you will not have any sorrows. Hm? Will you have? You don’t. He has come to give inheritance. He hasn’t given now.

You have to follow the Father’s Shrimat also. What? How long should you follow? Until you get the unlimited inheritance. And you have to follow the Teacher’s directions also. What? Is your Father, your teacher and your Sadguru one and the same or different? In the same permanent Chariot there is Father also, the Supreme Teacher also and the Sadguru also who causes sadgati (true salvation). So, you have to follow the directions of that one. You have become the Father’s children. The Father is teaching. He says that when the teaching is over, then I will take you children along with Me in the end. What? Where will I take? Hm? I will take you to the stage of the abode of peace. Who says? Hm? The Father says. I will take you in the end. What? When will the end come? When the studies are finished, then after the completion of the studies, when the entire shooting period of the world is completed, then the end arrives. I will take you along. Where will I take? Tell quickly in one word. Where will I take? I will take to the abode of peace. What? Your soul will experience the abode of peace. Where will the point of light soul experience itself to be? I am sitting in the abode of peace. I am sitting in the midst of the infinite light. Children will say – Will you take us very far away, so far away? The Father says – Arey, you yourselves will bring the Supreme Abode down to this world. What? You will bring down that stage of peace yourself. These are such simple topics for the children to understand nicely. So, when the soul is an embodiment of peace, then it is a resident of which place? It is a resident of the abode of peace, isn’t it? There is fighting going on in this world now. How will there be peace in this world? When you reach the soul conscious stage beyond the stage of the world, beyond the stage of thinking and churning of this world, then you experience the abode of peace.

Children should understand nicely that you have to make purusharth. What should you do? Purush. The soul that rests in the body like abode should remain in the body in such a way, should experience such comfort that there should not be any name or trace of sorrows, peacelessness; then he will be called hundred percent purusharthi. He should remain in the body like abode also and should become free from sorrows and pains as well. And then he should experience jeevanmukti (liberation in life) as well. There should be life also, one should be physically alive also and also be in happiness and peace; one should not experience sorrows and peacelessness. So, make such purusharth that as soon as the studies are over, you go to the abode of peace with the Father.

On the directions of Maya, i.e. others directions. What? How is Maya? Hm? Does it give the directions of the soul? Does she give the directions of the swadharma (religion of the self, i.e. soul) or does she give the directions of the others’ religions (pardharma)? When do other religions start? Other religions start only from the dualistic Copper Age when two founders of religions start coming to this world. The directions of two start in this world. Then it will not be called vasudhaiv kutumbkam that the entire vasudha (Earth) has become one kutumb (family). Then there will be dualism. Families of separate religions get established. So, do not follow others’ directions. This is Maya. The one who gives the directions of the unrelated founders of religions. She teaches the inculcations of unrelated religions. Which inculcations? Materialisitic inculcations. [She says] Accept the five elements to be true. Arey! The body made up of the five elements itself is perishable. So, why should we accept the perishable thing when we have found the imperishable Father?

That imperishable Father is the Father of our soul. He is the Father of self (swa). He teaches us to remain in swadharma (religion of the soul). Swa itself means soul. You should remain in the religion of the soul. You are a soul. Recognize the soul. The soul is a point of light. The soul is mind and intellect and is full of the sanskars, natures contained in the mind and intellect. These natures and sanskars (resolves) are recorded in every soul during the shooting period of this broad drama. As are the feelings contained in them, so is the part it has to play. And in accordance with the same natures and sanskars I decide, fix the class of every soul. This is why it has been written in the Gita – Chaaturvarnyam mayaasrishtam gun karma swabhavashah. (Gita 4/13) I have created the four classes. According to what? As per the attributes, as per the actions, as per the nature. What? You have not done so. As is the nature you have inculcated despite My arrival, as are the nature and sanskars that you have inculcated despite narration of knowledge by Me, you have to convert to the same kind of class. This nature (swabhaav) is your nature (prakriti). So, it was told that you should follow the swadharma.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2461, आडियो 2947, दिनांक 19.03.2018
VCD 2461, Audio 2947, Date 19.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2461-Bilingual

समय- 00.01-20.05
Time- 00.01-20.05


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – अच्छे से पुरुषार्थ करो क्योंकि माया से हार बहुत खाते हो। हँ? माया की मत पर चल पड़ते हो। माया का मतलब ये है – ‘मा’ माने नहीं; ‘आया’ माने आया। ये द्वैतवादी द्वापरयुग से ये माया बेटी ना आई होती तो अच्छा था। क्या? ये आती है तो क्या करती है? परमपुरुष शिव की कहो या इस दुनिया में, मनुष्यात्माओं के बीच में परमपुरुष प्रजापिता, आदम, एडम को कहो, आदि देव को कहो, उसकी जो अपराप्रकृति है, नीचे किस्म की प्रकृति; ‘प्र’ माने प्रकष्ठ, ‘कृति’ माने रचना। प्रकष्ठ रचना है। लेकिन है कैसी? ऊँची स्टेज वाली, आत्मिक स्थिति में रहने वाली नहीं है। क्योंकि आत्मा का सीधा कनेक्शन होता है ज्ञानेन्द्रियों से। वो है पराप्रकृति। पराकाष्ठा वाली प्रकृति। प्र-कृति का मतलब ही बता दिया, पहले भी बताया था; जैसे परिवार में पिता होता है, उसकी पहली रचना कौन होती है? (किसी ने कहा – माता।) माता। तो आत्माओं के हिसाब से कहो परमपिता तो उसकी भी पहली रचना भी है अव्वल नंबर और द्वयम नंबर की भी रचना है। लेकिन दोनों पत्नियाँ साथ-साथ। भेदभाव नहीं करता ज्यादा। दोनों को तरीके से चलाता है। तो वो कौन है? परमपुरुष शिव, आत्माओं का बाप; आत्मा माने पुरुष।

तो आत्माओं के बीच में जो परमपुरुष है उसकी पहले नंबर की रचना कौन? दूसरे नंबर की रचना कौन? और दोनों ही इकट्ठी रहती हैं। हँ? क्या? भेदभाव नहीं करता। तो वो बताओ वो कौन है? एक ही घर में रहती हैं। अरे, इसको कलम ही नहीं मिली बिचारे को। पराप्रकृति एक; अपराप्रकृति दो। अरे, घर कौनसा एक? मनुष्य सृष्टि का बाप। कौन? जिसमें, जिसकी गोद में दोनों पत्नियाँ हैं। राइट साइड की भी तो लेफ्ट साइड की भी। बताओ, वो एक बाप कौन जो दोनों पत्नियों को अपने एक ही घर में रखता है? बताओ-3।
(किसी ने कुछ कहा।) प्रजापिता; और मनुष्य सृष्टि का कौन? बाप। अरे! वो बाप हुआ या पत्नी हुआ? और घर कौनसा है जिस घर में दोनों पत्नियाँ रहती हैं और पति भी साथ में रहता है? (किसी ने कुछ कहा।) अह! विष्णु कौन? विष्णु तो देवता है। बाप तो देवता बनाने वाला है। हँ? नई सृष्टि बनती है तब उसको पालना करने वाला विष्णु होता है। और बाप तो सृष्टि रूपी परिवार; बच्चे परिवार होने से पहले होता है कि जब पालना होती है शुरू तब होता है? वो तो पहले से ही होता है। तो वो स्वरूप कौनसा जिसमें दोनों माताएं भी हैं प्रकृति रूपा? पराप्रकृति भी है आत्मिक स्टेज में रहने वाली। सार है पराप्रकृति का। और अपराप्रकृति भी है। उसका भी सार है। (किसी ने कुछ कहा।) त्रिमूर्ति? ये तीन मूर्तियाँ हो गईं। अभी तक दो ही माताएं थीं।

शिव तो निराकार है ही। शिवलिंग। उस शिवलिंग में दो माताओं का रूप कौन है? बताओ-3।
(किसी ने कुछ कहा।) दो माताओं का रूप। एक ही जलाधारी। जलाधारी कहाँ होती है शिवलिंग में? शिवलिंग अलग होता है; जलाधारी अलग होती है। ये क्या कर रहा है गड़बड़? अरे! दोनों माताओं का घर कौनसा है और बाप भी उस घर में है? जल्दी-जल्दी बताओ। बताते नहीं। बताएं कहाँ से? गूंगे बच्चे पैदा हुए हैं। रुद्र माला के मणके गूंगे होते हैं ना। लक्ष्मी और जगदम्बा भी तो माताएं काम है ना। तो जो शिवलिंग बताया ना, ये तो सही बताया। वो प्रैक्टिकल रूप तो है इस दुनिया में। लेकिन उसमें बाप कौन? और दोनों माताएं कौन? और वो सुप्रीम सोल बाप जिसकी स्मृति में प्रवेश कर जाता है वो कौन?

अरे! इस सृष्टि पर सुप्रीम सोल आता है ना। तो, आते ही जिसमें प्रवेश करता है पुरुष तन में, आदम में, तो उसका नाम क्या देता है?
(बाबा ने कुछ कहा।) परमब्रह्म। क्या नाम देता है? परमब्रह्म। वो इस दुनिया की ऊँचे से ऊँची हो गई। नाम क्यों दिया? काम निकालने के लिए नाम दिया। बाप को क्या चाहिए? क्या काम कराना है? परिवार की रचना करनी है, मनुष्य सृष्टि के परिवार की। वसुधैव कुटुम्बकम् की। और जो परिवार रचा है उसके लिए सबसे पहले तो माता चाहिए। पहली-पहली माता तो हो गई आत्मिक स्थिति वाली, ज्योतिबिन्दु स्थिति वाली, जो आदि में भी ज्योतिबिन्दु रूप स्थिति में होती है, आत्मिक स्टेज में होती है, देहभान में नहीं आती है और अंतिम जनम में भी देहभान में नहीं आती है। उसको देहभान का रस चाहिए ही नहीं। देख लो। नहीं समझ में आ रहा है? वो ही है पराप्रकृति आत्मिक रूप वाली। क्या? शिवलिंग, वो तो बताया, लेकिन शिवलिंग में जो ज्योतिबिन्दु है वो है पराप्रकृति चैतन्य, जिसमें जडत्व का, देह का भान ही नहीं है। क्या? स्वर्ग में पार्ट बजाती है तो वहाँ तो सब बिन्दु रूप आत्मा अपन को देवताएं समझते ही हैं। देहभान में आते ही नहीं। देह की स्मृति ही नहीं।

लेकिन जबसे द्वैतवादी द्वापरयुग शुरू होता है ढ़ाई हज़ार वर्ष के बाद, तो उस ढाई हज़ार वर्ष के बाद जो ऊपर में और-और धर्मों की धरमपिताओं की आत्माएं, उनके फालोअर्स आते हैं – इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, आदि, टाइम टू टाइम आते हैं ना। तो, उनमें जो पहला-पहला नंबर है, इब्राहिम है, धरमपिता, है ना। वो आता ही है जब द्वैतवादी द्वापरयुग की सृष्टि शुरू होनी होती है। है ना? तो उस द्वैतवादी सृष्टि में वो आते ही दो-दो धर्म, दूसरा धर्म शुरु कर देता है। हँ? तो उसकी बात भी लोग मानेंगे। बाप है ना। उस परिवार का, इस्लाम परिवार का बाप हो गया ना। तो जो भी पैदाइश होगी, उनके फालोअर्स कहो, बच्चे कहो, वो उसी की बात मानेंगे। तो एक तरह से राज्य भी उस परिवार में उसी का हो गया। तो दो राज्य हो गए ना। एक तो देवात्माओं का राज्य अब तक चल रहा था। क्या? स्वस्थिति वालों का, स्वधर्म वालों का। इन्होंने दूसरा धर्म शुरू कर दिया। क्या? देहधारी धरमपिता ने देह का धर्म शुरु कर दिया।

इनकी बुद्धि में ये नहीं आता है कि स्वर्ग में जो पैदाइश होती है सृष्टि की, जनसंख्या बढ़ती जाती है, सतयुग से त्रेता तक, अंत तक बढ़ती है ना जनसंख्या। तो उसमें ज्ञानइन्द्रियों से पैदाइश होती है बच्चों की। ज्ञानइन्द्रियों का आकर्षण होता है नंबरवार। जैसे इस शरीर में ऊँचे ते ऊँची इन्द्रियाँ हैं देह की? आँखें। फिर उसके बाद? उसके बाद उससे नीची कौन है?
(किसी ने कुछ कहा।) चल। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। कान का जो छेद है ना उससे ऊपर है पर्दा कान का। लेकिन आँख से नीचे। तो उसे श्रोत्रइन्द्रिय कहा जाता है। और फिर उससे नीचे है नाक। घ्राणेन्द्रिय – सूंघने वाली। फिर उससे नीचे है मुख। मुख में जिह्वा - स्वाद लेने वाली। हँ? और फिर उससे नीचे है उंज्ज्वलौट। क्या? सृष्टि पैदा करते हैं ना तो ज्ञानेन्द्रियों में ये सबसे नीचा। क्या करता है? स्पर्श करता है। क्या? चुंबन लेते हैं ना। तो स्पर्श होता है ना। स्पर्श का सुख अनुभव होता है कि नहीं? तो वो सुख से दैवी बच्चों की पैदाइश होती है। करते-करते, वो सुख भोगते-भोगते ज्ञानेन्द्रियों का, एक स्थिति ऐसी आती है कि ज्ञानेन्द्रियों का सुख का टाइम ढाई हज़ार वर्ष का, स्वस्थिति का टाइम खत्म हो जाता है। और इस सृष्टि में, वो ही जो पहले बताया – ब्राह्मण चोटी। क्या? पहला ब्राह्मण सो पहला देवता, सो पहला क्षत्रीय, वो ही पहला द्वैत कर्म करने वाला दैत्य बन जाता है। अपने आप नहीं बनता, उसको कोई उकसाता है। क्या? प्रेरित करता है। कौन प्रेरित करता है? वो ही अपराप्रकृति। शिवलिंग है ना। तो शिवलिंग में पराप्रकृति तो है आत्मिक स्टेज वाली। बिन्दु है ना। और अपराप्रकृति है जो लिंग बड़ा दिखाते हैं ना।

सोमनाथ मन्दिर में पत्थर का बड़ा लिंग दिखाते थे लाल-लाल। ये लाल-लाल क्यों? हर चीज़ पहले सात्विक होती है। और बाद में तामसी बन जाती है। इस दुनिया की चीज़ की बात है। बाकी इस दुनिया से परे जो परमधाम है, आत्मलोक है, आत्माओं के बाप का घर है, शिव का, वो तो एक ही जैसा रहता है। सदा सतधाम। उसमें कभी प्रकृति का प्रवेश नहीं होता। क्या? कौनसी प्रकृति? जो अपराप्रकृति है देहभान वाली, पांच जड़ तत्व – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश – जिनसे ये देह बनती है, वो वहाँ प्रवेश नहीं कर सकती। क्या? उसका जो बीज रूप स्वरूप है, जहाँ से इस सृष्टि की शुरुआत होती है, वो बीजरूप स्वरूप इसी सृष्टि में देह से रह जाता है। और उसी को कहते हैं ब्रह्म। क्या? क्या कहते हैं? ब्रह्म। कैसा ब्रह्म? जो देहभान की यादगार है। तो शिवलिंग में बिन्दु तो है आत्मिक स्टेज की यादगार। समझ में आया? और जो लिंग बना हुआ है पत्थर का, वो इस देह कहो, पत्थर कहो, मिट्टी कहो, वो मिट्टी से भी पत्थर बनता है, उसकी यादगार है।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was – Make nice purusharth because you get defeated by Maya a lot. Hm? You start following the opinion of Maya. Maya means – ‘Ma’ means ‘not’, ‘aaya’ means ‘came’. Had daughter Maya not come from the dualistic Copper Age it would have been better. What? What does she do when she comes? Call Him Parampurush Shiv or the Parampurush Prajapita, Aadam, Adam, Aadi Dev among the human souls, his Aparaprakriti, the lower kind of Prakriti; pra means prakashth (special), kriti means creation. She is a special creation. But how is she? She is not the one in a high stage, in a soul conscious stage because the direct connection of the soul is with the sense organs. She is Paraaprakriti. The Prakriti with an epitome (paraakaashthaa). The meaning of Pra-kriti itself was mentioned earlier also; for example, just as there is a Father in a family, who is his first creation?
(Someone said – Mother.) Mother. So, from the point of view of the souls if you speak of the Supreme Father, then He too has a number one creation and number two creation also. But both wives are together. He does not show much partiality. He manages both of them tactfully. So, who is he? The Parampurush Shiv, the Father of souls; the soul means purush.

So, who is the number one creation of the Parampurush among the souls? Who is the number two creation? And both live together. Hm? What? He does not differentiate. So, tell who is that? They live in the same house. Arey, this one did not got a pen. One is Paraaprakriti; second is Aparaprakriti. Arey, which is the one house? The Father of the human world. Who? The one on whose lap both the wives are sitting. One on the right side as well as the one on the left side. Tell, who is that one Father who keeps both the wives in the same house? Tell, tell, tell.
(Someone said something.) Prajapita; and what is he for the human world? Father. Arey! Is he the Father or the wife? Arey, which is the house in which both the wives also live and the husband also lives with them? (Someone said something.) Ah! Who is Vishnu? Vishnu is a deity. The Father is the maker of deities. Hm? When the new world is established, then the one who sustains him is Vishnu. And does the Father exist before the world like family, before the creation of children and family or does he exist when the sustenance of the family starts? He already exists. So, which is the form in which both the mothers in the form of Prakriti exist? There is Paraaprakriti also, who remains in a soul conscious stage. She is the essence of Paraaprakriti. And there is Aparaaprakriti as well. There is her essence also. (Someone said something.) Trimurti? These are the three personalities. So far there were only two mothers.

Shiv is already incorporeal. Shivling. Who is the form of two mothers in that Shivling? Tell, tell, tell.
(Someone said something.) Form of two mothers. One is Jalaadhaari. Where is Jalaadhaari in the Shivling? Shivling is separate; Jalaadhaari is separate. What is this bungling that you are doing? Arey! Which is the house of the two mothers and the Father is also present in that house? Tell soon. You don’t tell. How will you tell? You are born as dumb children. The beads of the Rudramala are dumb, aren’t they? Lakshmi and Jagdamba also perform the task of mothers, don’t they? So, the Shivling that you mentioned was correct. That is the practical form in this world. But who is the Father in it? And who are the two mothers? And who is the one in whose awareness that Supreme Soul Father enters?

Arey! The Supreme Soul comes in this world, doesn’t He? So, the male body, Aadam in which He enters soon after coming, what does He name him?
(Baba said something.) Parambrahm. Which name does He give? Parambrahm. He happens to be the highest on high in this world. Why was this name assigned? The name was assigned to get the task done. What does the Father require? Which task does He want to get accomplished? He has to create the family, the family of the human world. Of the world family (vasudhaiv kutumbkam). And first of all a mother is required for the family that He has created. The first and foremost mother is the one in soul conscious stage, the one in a point of light stage, who is in the point of light stage in the beginning also, remains in a soul conscious stage, does not enter in body consciousness and does not become body conscious even in the last birth. She does not require the pleasure of body consciousness at all. Look. Are you not able to understand? She is the Paraaprakriti, in soul form. What? You did mention Shivling, but the point of light in the Shivling is the living Paraaprakriti, which does not have any consciousness of the non-living, of the body. What? When she plays a part in the heaven, then there all the point like souls consider themselves to be deities. They do not enter in body consciousness at all. There is no awareness of the body at all.

But ever since the dualistic Copper Age commences after 2500 years, then after those 2500 years, the souls of the founders of other religions and their followers who come, Ibrahim, Buddha, Christ, etc. come from time to time, don’t they? So, the first and foremost number among them, Ibrahim, is a founder of religion, isn’t he? He comes only when the dualistic Copper Age world is to start. Isn’t it? So, as soon as he comes in the dualistic world he starts two religions, second religion. Hm? So, people will his views also. He is a Father, isn’t he? He is the Father of that family, the Islamic family, isn’t he? So, all those who are born, call them his followers, call them his children, they will believe him only. So, in a way, it is his rule in that family. So, two kingdoms emerged, didn’t they? One rule of the deity souls was going on so far. What? Of those in swasthiti (soul conscious stage), those in swadharma (religion of the self, i.e. soul). This one (Ibrahim) started another religion. What? The bodily founder of religion started the religion of the body.

It doesn’t occur in his intellect that the reproduction in heaven; the population keeps on increasing; the population keeps on increasing from the Golden Age to the Silver Age, till the end, doesn’t it? So, the children are born through the sense organs in it. There is numberwise attraction of the sense organs. For example, the highest on high organs in this body are the eyes. Then after that? Which one is lower than them?
(Someone said something.) Is it? (Someone said something.) Yes. The ear lobe is higher than the opening of the ear. But it is lower than the eyes. So, it is called the organ of hearing. And then below it is the nose. The organ of smell – the one which smells. Then below it is the mouth. There is tongue - the one which tastes. Hm? And below it is the lip. What? When reproduction takes place, then this is the lowest one among the sense organs. What does it do? It touches. What? People exchange kisses, don’t they? So, touching takes place, doesn’t it? Is the pleasure of touch experienced or not? So, divine children are born through that pleasure. While doing so, while experiencing pleasure of the sense organs, one such situation comes that the time for the pleasure of the sense organs for 2500 years, the time of swasthiti (stage of the soul) ends. And in this world, that which was mentioned earlier – Brahmin chotii. What? The first Brahmin becomes the first deity, the first Kshatriya; he himself becomes the first demon who performs dualistic actions. He does not become himself; someone incites him. What? Someone inspires. Who inspires? The same Aparaprakriti. It is Shivling, isn’t it? So, in the Shivling, the Paraaprakriti is in a soul conscious stage. She is a point, isn’t she? And Aparaprakriti is the big ling that is depicted, isn’t it?

A big red stone ling used to be depicted in the temple of Somnath. Why this red colour? Everything is initially pure. And later on it becomes degraded. It is about a thing of this world. But the Supreme Abode, the Soul World, the home of the Father of souls Shiv, which is beyond this world remains alike. It is always an abode of truth. Prakriti never enters in it. What? Which Prakriti? The Aparaprakriti, the body conscious one, the five elements – Earth, water, air, fire, sky – which form this body, cannot enter there. What? Its seed form, from where this world begins, that seed form remains in this world in the form of a body. And that itself is called Brahm. What? What is it called? Brahm. What kind of Brahm? It is a memorial of body consciousness. So, the point in Shivling is a memorial of the soul conscious stage. Did you understand? And the ling made up of stone is a memorial of this body, call it stone, call it soil, he becomes stone from soil also.


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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 31 Dec 2019

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2462, आडियो 2948, दिनांक 20.03.2018
VCD 2462, Audio 2948, Date 20.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2462-Bilingual

समय- 00.01-17.04
Time- 00.01-17.04


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. पहले पेज के मध्यांत के आदि में बात चल रही थी कि बच्चे बहुत गिरते हैं, माया से हार खाते हैं। तो उसका तरीका बताया कि माया की मत पर मत चलो। माया की मत पर चलते हो, तब ही हार खाते हो। धोखेबाज़ है। क्या? और वो माया की मत माने परमत। परमत क्यों? स्व माने आत्मा। स्वधर्म – आत्मा का धर्म। स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मो भयावह। (गीता 3/35) जो आत्मा का धर्म है माना आत्मा के बाप ने जो धर्म स्थापन किया; बिन्दु-बिन्दु आत्माएं हैं ना। इन बिन्दु-बिन्दु आत्माओं के बाप का नाम; क्या? शिव। वो नाम कभी नहीं बदलता। उनकी आत्मा का ही नाम शिव है।

दुनिया में पार्ट बजाने वाली एक ही आत्मा है जो ब्रॉड ड्रामा के शूटिंग पीरियड संगमयुग में ही पार्ट बजाती है। और उसका नाम शिव है। साकार शरीरधारी में प्रवेश करती है तो भी तीसरे नेत्र के रूप में सदा शिव कही जाती है। क्या कहते हैं उसको? सदा कल्याणकारी। माने बाकी दो नेत्र हैं वो कल्याणकारी नहीं हैं उतने सदा के लिए। लेकिन वो तीसरा नेत्र जो शिव की यादगार है, वो सदा शिव। कैसा दिखाते हैं? खड़ा नेत्र। इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने आता है तो अलर्ट होके खड़ा रहता है। क्या? ऐसे नहीं पड़ जाए, सो जाए, आराम करे। दरकार ही नहीं। आराम करने की तो उनको दरकार होती है जिनको देह होती है। देह थकती है। आत्मिक स्थिति में थकान थोड़ेही होती है। जैसे ब्रह्मवाक्य मुरली में है – तुम आत्मिक स्थिति में रहकरके आबू (रोड) से लेकरके माउंट आबू तक चढ़ते ही चले जाओ, चढ़ते ही चले जाओ पैदल, तुम थकोगे नहीं। तो क्यों नहीं थकोगे? हँ? क्योंकि आत्मिक स्थिति में रहकरके चढ़ने का काम किया ना।

तो ऐसे ही जो शिव है उसके थकने की बात नहीं। इसलिए ब्रह्मवाक्य है मुरली में – मेरी तो रात-दिन की सेवा है। क्या? तुम बच्चों की तरह, तुम जो आत्मा रूपी बच्चे हो ना, भोगी। मैं तो अभोक्ता हूँ। मेरे को सोने की दरकार नहीं। हाँ, ये है कि तुम बच्चों को भी नंबरवार अपने जैसा बनाता हूँ। जब तुम संपन्न आत्मिक स्थिति में टिक जाएंगे तो तुम भी निद्राजीत बन जावेंगे। फिर तुम भी राजवंशी बन रहे हो। हँ? इसलिए गीता में जिस अर्जुन के शरीर रूपी रथ में प्रवेश किया उसका नाम क्या रखा? गुडाकेश। क्या? गुड़ाक माने निद्रा। ईश माने स्वामी। निद्रा का स्वामी। हँ? तुम्हारे मतलब की बात है। क्या कहा? हँ? तो बोला। क्या बोला? कि एक अर्जुन की बात नहीं है। हँ? ये जो 108 रुद्रमाला के मणके गाए जाते हैं आत्मिक स्थिति की यादगार में रहने वाले, वो सब अर्जुन हैं। क्या? उन अर्जुन के शरीर रूपी रथों में मैं नंबरवार प्रवेश करके पार्ट बजाता हूँ। उनकी शरीर रूपी इन्द्रियों के घोड़ों को कंट्रोल करता हूँ, अपनी मन-बुद्धि रुपी लगाम के द्वारा। जिनकी मन-बुद्धि की लगाम, इन्द्रियों रूपी घोड़ों की मैं अपने बुद्धि रूपी हाथ में ले लेता हूँ।

तो बताया कि ये जो माया है ना। मैं इस सृष्टि पर आता हूँ तो इस सृष्टि पर आने पर ये माया भी काम करती है, और प्रकृति भी काम करती है। मैं जिस धाम का रहवासी हूँ वहाँ न प्रकृति है पांच तत्वों का संघात, और न ये माया रूपिणी है। तो जो माया मेरी बेटी है, जैसे कल बताया। वो माया बेटी अपनी मत चलाती है। लेकिन उसके झांसे में न आना। माया बेटी की मत पर चल पड़े तो अच्छी तरह से तुमको गुठ लेगी। पहले-पहले तो बड़ा आराम देती है ताकि तुमको विश्वास हो जाए। क्या? और बाद में? अच्छी तरह से रगड़ेगी। बहुत दुःख देगी। इसलिए क्या तरीका बताया कि माया से हार न खाओ? क्या बताया? माया की मत पर न चलो। माया की मत माने परमत। ये क्या बात हुई? पर तो देह को कहा जाता है। क्या? पांच जड़ तत्वों से बनी हुई जो देह है संघात, ये प्रकृति है आत्मा की। क्या? तो ये प्रकृति जो जड़त्वमयी है वो पर है।

माया कैसे पर हो गई? हँ? इस तरह पर हो गई कि जो बड़ी पावरफुल प्रकृति है; क्या? कब बनती है पावरफुल? स्वर्ग में पावरफुल बनती है कि नरक की दुनिया में पावरफुल बनती है? नर माना मनुष्यों की दुनिया में। मनुष्य उन्हें कहा जाता है जो अपने चंचल मन के कंट्रोल में रहते हैं। वास्तव में द्वापर के आदि में तो मनुष्य होते हैं। जैसे ऋषि मुनि सन्यासी वगैरा हुए, जिन्होंने मनन-चिंतन-मंथन करके बड़े-बड़े शास्त्र लिखे। उनमें सच्चाई भी थी। तो मनन-चिंतनशील थे ना। तो मन उनका उस समय सात्विक होता है। दुनिया की हर चीज़ पहले सात्विक, फिर सत्वप्रधान, फिर रजोप्रधान, फिर अति दुखदायी, तमोप्रधान बन जाती है। कोई भी चीज़ ले लो इस दुनिया की। चाहे चैतन्य प्राणियों को ले लो कोई को और चाहे जड़ वस्तुओं को ले लो। सबका यही हाल है। तो वो जो नर रूप में जो ऋषि-मुनि होते थे, भारत के वो भी, विदेश में नहीं, विदेशों में तो जो आत्माएं आकरके रूप धारण करती हैं; पहले धरमपिताएं आए, फिर उनके फालोअर्स। वो तो द्वापरयुग के आदि से ही दैत्य समझो। क्या? क्या? दिति माता की संतान दैत्य।

ये दिति माता कौन है? वास्तव में शास्त्रों में जो अपराप्रकृति है ना, पांच जड़ तत्वों का संघात, वो ही दिति है। जो देहभान को छोड़ ही नहीं पाती। क्या? वो अपराप्रकृति रूपी माता भगवान के संसर्ग-संपर्क में भी रहे और सबसे जास्ती लम्बे समय तक रहे, तो भी देहभान को नहीं छोड़ पाती। क्यों? उसके अन्दर स्वभाव-संस्कार ऐसा नूंधा हुआ है। क्या? जब तक देवताओं की सृष्टि में रहती है, जो हेविनली गॉड फादर की बनाई हुई दुनिया है, तब तक तो कंट्रोल में रहती है। अच्छे से दासी बनकरके देवताओं की सेवा भी करती है। सारा कार्य संपन्न करती है। क्या? वसुधैव कुटुम्बकम् का ढ़ाई हज़ार साल का। उसके बाद, अगला जो ढ़ाई हज़ार वर्ष का मनुष्यों का बनाया हुआ संसार आता है, जैसे इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, गुरु नानक; ये धरमपिताएं आते हैं ना। तो ये मन को कंट्रोल नहीं कर पाते हैं कभी पूरा। करते भी हैं तो नंबरवार करते हैं। और मन को कंट्रोल करना तो सिवाय परमपिता परमात्मा शिव के कोई सिखाता ही नहीं। और वो तो आता ही है कलियुग के अंत, सतयुग के आदि के पुरुषोत्तम संगमयुग पर आता है। तो नंबरवार आत्माएं पुरुषार्थ करती हैं। उनमें जो अव्वल नंबर है वो तो हीरो पार्टधारी मूर्तिमान शंकर, आदम, एडम कहा जाता है। बाकी जो आत्माएं हैं वो निराकारी स्टेज सौ परसेन्ट पकड़ ही नहीं पाती।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the end of the middle portion of the first page that children fall a lot; they are defeated by Maya. So, its method was told that you follow the opinion of Maya. You suffer defeat only when you follow the opinion of Maya. She is a cheat. What? And the opinion (mat) of Maya means others’ opinion (parmat). Why is it others’ opinion? Swa means soul. Swadharma means the dharma (religion) of the soul. Swadharme nidhanam shreyah pardharmo bhayaavah. (Gita 3/35) The religion of the soul, i.e. the religion that the Father of the soul had established; the souls are point-like, aren’t they? The name of the Father of these point-like souls; what? Shiv. That name never changes. The name of His soul itself is Shiv.

There is only one soul playing its part in the world which plays its part only in the shooting period of the broad drama, i.e. the Confluence Age. And His name is Shiv. Even if He enters in a corporeal bodily being, He is called Sadaa Shiv in the form of the third eye. What is He called? Forever benevolent. It means that the two eyes are not benevolent to that extent forever. But that third eye, which is the memorial of Shiv, that Sadaa Shiv. How is He depicted? Vertical eye. When He comes to play His part on this world stage, He remains standing alert. What? It is not as if He lies down, sleeps, rests. There is no need at all. Those who have a body require rest. The body becomes tired. There is not tiredness in soul conscious stage. For example, it has been mentioned in the Brahmavaakya Murli – Even if you keep on climbing, keep on climbing by walk from Abu (Road) to Mount Abu, you will not be tired. So, why will you not feel tired? Hm? It is because you performed the task of climbing while being in soul conscious stage did you not?

So, similarly, there is no question of Shiv getting tired. This is why there is a Brahmavaakya in Murli – My service continues day and night. What? Like you children, you soul like children, bhogi. I am abhokta. I need not sleep. Yes, I make you children also numberwise like Myself. When you become constant in perfect soul conscious stage then you will also become conquerors of sleep. Then you are also becoming rajvanshis (royals). Hm? This is why what was the Arjun’s body like Chariot named in the Gita? Gudaakesh. What? Gudaak means sleep. Eesh means lord. The Lord of sleep. Hm? It is a topic of your concern. What has been said? Hm? So, it was said; what has been said? It is not about one Arjun. Hm? All these 108 beads of Rudramala who are praised to live in soul conscious stage are Arjuns. What? I enter numberwise in those body-like chariots of those Arjuns and play My part. I control their organ-like horses of body through My mind and intellect like rein. I take their mind and intellect like rein of the organs like horses in My hand like intellect.

So, it was told that there is this Maya, isn’t it? When I come to this world, then after coming to this world, this Maya also works and Prakriti (nature) also works. The abode where I reside, there is neither Prakriti, the combination of five elements nor is there this Maya’s form. So, Maya who is my daughter, as it was told yesterday, that daughter Maya enforces her opinion. But do not get swayed by her. If you start following the opinion of daughter Maya, then she will take you under her control. In the beginning she gives you a lot of comfort, so that you develop faith. What? And later on? She will trouble you nicely. She will give you a lot of pains. This is why what was the method told to avoid getting defeated by Maya? What was mentioned? Do not follow the directions of Maya. Directions of Maya means others’ directions (parmat). What is this? Body is called ‘par’ (alien). What? The body made up of the five non-living elements is the soul’s Prakriti. What? So, this Prakriti, which is inert is ‘par’ (alien).

How is Maya ‘par’ (alien)? Hm? It is alien because the very powerful Prakriti; what? When does it become powerful? Does it become powerful in heaven or does it become powerful in the world of hell? In the world of nar, i.e. human beings. Those who remain under the control of their inconstant mind are called human beings (manushya). Actually there are human beings in the beginning of the Copper Age. For example, there have been sages, saints, sanyasis, etc, who wrote big scriptures by thinking and churning. They contained truth also. So, they were persons who think and churn, weren’t they? So, at that time their mind was pure (satwik). Everything in the world is initially satwik, then become satopradhan, then rajopradhan, then most sorrow-causing, tamopradhan. Take anything of this world. You may take any living beings or you may take any non-living things. The condition of all of them is like this. So, the sages and saints of India in the form of human beings, not of foreign countries; the souls that come in the foreign countries and assume their forms; initially the founders of religions came and then their followers. They are like demons from the beginning of the Copper Age itself. What? What? The children of Mother Diti, the Daityas (demons).

Who is this Mother Diti? Actually, the Aparaprakriti mentioned in the scriptures, the combination of five non-living elements is Diti who is unable to leave body consciousness at all. What? That Aparaprakriti like mother remains in the contact of God and remains in His contact for the longest period, yet it is unable to leave body consciousness. Why? Such nature and sanskar is recorded in her. What? As long as she remains in the world of deities, in the world established by the heavenly God Father, she remains under control. She becomes a maid and nicely serves the deities as well. She accomplishes the entire task. What? The task of Vasudhaiv Kutumbkam (one world family) for 2500 years. After that, the next world of 2500 years established by the human beings that arrives, for example, Ibrahim, Buddha, Christ, Guru Nanak; these founders of religions come, don’t they? So, they are never able to control the mind completely. Even if they do, they control numberwise. And nobody except the Supreme Father Supreme Soul Shiv teaches how to control the mind. And He comes only in the elevated confluence (Purushottam Sangamyug) of the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age. So, numberwise souls make purusharth. The number one among them is called the hero actor, personality Shankar, Aadam, Adam. All other souls cannot catch that incorporeal stage hundred percent at all.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 01 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2463, आडियो 2949, दिनांक 21.03.2018
VCD 2463, Audio 2949, Date 21.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2463-Bilingual

समय- 00.01-13.32
Time- 00.01-13.32


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. और पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी अंबाला पार्टी की जिसमें बताया कि आज तो अंबाला पार्टी आई है। हँ? किसको लाने वाली पार्टी? अंबा को लाने वाली पार्टी। तो इसमें कोई मुखिया होगा। उस मुखिया को बाबा ने याद किया। कहा – उस पार्टी में हमारा लाडला कितना याद करते रहते थे। हँ? किसको याद करते रहते थे? हँ? किसको याद करते रहते थे? ओहो! अंबा को याद करते रहते थे। बिचारा लाडला बच्चा बाप को तो जानता ही नहीं था। छोटा बच्चा है ना। बच्चा बुद्धि। वो बाप को क्या जाने? तो वो लाडला बच्चा बहुत याद करते रहते हैं। किसको याद करते रहते थे? अम्बा को।

फिर आया है। अभी फिर आया है। किसके पास आया है? हँ? पहले भी आया था यज्ञ के आदि में, तो अंबा को बहुत याद करता रहता था। क्योंकि पढ़ाई पढ़ाने वाली तो मुख्य अंबा ही थी। क्या? कौन पढ़ाई पढ़ाती थी बेहद के गांधीजी को? हँ? माताएं ही तो पढ़ाई पढ़ाती थीं। उनमें कोई मुख्य माता भी होगी। वो पढ़ाई पढ़ाती थी। उसमें, उस माता में बाबा प्रवेश भी करते थे। बोला है ना - दस वर्ष से रहने वाला, माने कोई पुरुष था। ब्रह्मवाक्य है ना। और, वो उस पुरुष के साथ कोई माता भी थी। हँ? उसमें बाबा प्रवेश करते थे। किसमें प्रवेश करते थे? माता में। माता में क्यों? उस समय कोई माता के साथ दूसरी माता भी तो थी। थी कि नहीं? थी। कौन माता थी? हँ? हँ? जो दादा लेखराज ब्रह्मा की बड़ी बहन थी ना, भागीदार की पहली पत्नी, हँ? लेकिन वो विकारी जीवन पसन्द नहीं करती थी। और फिर जब शिवबाबा ने प्रवेश किया तो बाबा कहते हैं मैं कन्याओं को क्या बना देता हूँ? माता बना देता हूँ। तो वास्तव में तो वो कन्या ही थी ना। विकार में बुद्धि जाती ही नहीं थी। विकारों में जिसकी बुद्धि लगे, मन-बुद्धि लगे तो हुआ विकारी। शंकरजी विष पीते हैं, है ना? लेकिन उनकी मन-बुद्धि विष पीने में लगी रहती है क्या? हँ? किसको याद करने में लगी रहती? शिवबाबा को याद करने में। तो बताओ – वो विषय-विकारों का सुख लेते थे क्या इन्द्रियों से? हँ? नहीं लेते थे। तो ऐसे ही वो माता भी थी। हँ? तो शंकरजी की बात तो संपन्न स्टेज की बताई जब उनका पुरुषार्थ पूरा होता है। अभी जो हिस्ट्री बता रहे हैं वो तो यज्ञ के आदि की ओम मंडली की हिस्ट्री बता रहे हैं।

तो उसमें जो माता थी ओरिजिनल, ब्रह्मा बाबा की बड़ी बहन और उनका भागीदार बहनोई; हँ? तो वो छोटी माता तो जैसे कन्या ही थी। क्या थी? हँ? कन्या ही थी। और कलकत्ते में जितने भी पुरुष रहते हैं। कोलकत्ता तो बड़ा वैश्यालय प्रसिद्ध है दुनिया का। तो दूसरी-दूसरी पत्नियां जरूर रखते हैं। अब उनको कहा जाता है वैश्याएं। विशियस कर्म करने वाली। पुरुषों को तो चाहिए। क्या? पुरुष हैं ना इस दुनिया में। क्या टाइटल दिया बाबा ने? हँ? दुर्योधन-दुःशासन। अरे क्या वो तो...। हाँ। दुर्योधन-दुःशासन। हँ? तो सब पुरुष दुर्योधन-दुःशासन। और कलकत्ते में तो खास रह ही नहीं सकते बिना उसके। तो जो प्रैक्टाइज़्ड हो उस काम में, वो तो चाहिए ही चाहिए। तो माता ने कहा, स्वीकृति दे दी कि हाँ, भई तुम दूसरी पत्नी ले आओ। हम उसको, जैसे पहले बताया ना, हम उसको छोटी बहन, अपनी बेटी की तरह रखेंगे, प्यार से रखेंगे, उसकी सेवा भी करेंगे। जैसे बाबा ने मुरली में डायरेक्शन दिया। क्या डायरेक्शन दिया? हँ? क्या डायरेक्शन दिया? कि कोई माताएं हैं, ज्ञान में चलती हैं, और वो पवित्र रहना चाहती हैं, तो पति को कहे तुम दूसरी पत्नी ले आओ, हम उसकी सेवा करेंगे। तो बस, रख ली। और घर में ही रहने लगी। तो, और बड़े प्यार से दोनों रहती थीं। जो ब्रह्मा बाबा की बड़ी बहन थी, वो उसको रिगार्ड भी देती थी क्योंकि बोलने में बड़ी होशियार थी। तो कलियुग में ऐसे ही हो जाता है। क्या? क्या हो जाता है? पंडित सोइ जोइ गाल बजावा। उसको बड़ा विद्वान मानते हैं लोग। तो वो बोलने में बड़ी होशियार थी। और नाम भी शास्त्रों मं पड़ा हुआ है वाक् देवी। वाक् माना वाचा की देवी। हँ?

तो वो वाचा की देवी उसको ब्रह्मा बाबा ने सारी बात उसके द्वारा कहलवाई गई साक्षात्कार की। तो ब्रह्मा बाबा ने, ब्रह्मा बाबा भी तो पुरुष थे। लम्बे-चौड़े, हट्टे-कट्टे, तो अब वो तो वैश्या, उसकी तो बुद्धि चंचल है, मन-बुद्धि; तो वो भागीदार, जिसकी उमर ज्यादा थी, वो उसमें से बुद्धि हटकरके, जब ब्रह्मा बाबा को देखा तो उनपे आसक्त हो गई। बस, हो गया। और उसके मुख से ब्रह्मा बाबा ने सुना तो कि हाँ, साक्षात्कारों का ये अर्थ बताया – मैं कृष्ण की आत्मा बनूंगा सतयुग में; साक्षात्कार तो ब्रह्मा बाबा को ही हुए थे, लेकिन ब्रह्मा बाबा को, वो बड़े अनुभवी तो थे ही, उनको पक्का निश्चय तो नहीं हुआ। फिर भी, भाषा के आधार पर तो मान लिया ना। हँ? और बाद में चले गए। सिंध, हैदराबाद वापस निकल गए होंगे। वहाँ सत्संग करने लगे। सत्संग करते-करते वहाँ ओम राधे आ गई। क्या? वाचा में बड़ी तीखी थी। और बुद्धि की भी तीखी थी। तो ब्रह्मा बाबा बस उस बच्ची को अव्वल नंबर ब्राह्मणी बनाया। क्या? और दोनों ही मिलकरके जब आए कलकत्ते में दुबारा तो छोटी माँ ने उनको सारी बात समझाई विस्तार से। क्योंकि छोटी माँ ने बात समझ ली थी। लेकिन ये नहीं बताया कि वास्तव में वो भागीदार है, वो बताने वाली जो आत्मा है, वो उसके द्वारा जो बताया गया तो वो ही तुम्हारा बताने वाला असली है। तो ब्रह्मा बाबा की तो बुद्धि पहले से किसके ऊपर थी? उसी बड़बोली माता के ऊपर।

तो वो माता को बहुत याद करते थे क्योंकि कलियुग के अंत की ये रीति-भीति है दुनिया की कि जो बहुत बोल-बोल करता है उसी को विद्वान मान लेते हैं। तो वो बड़बोली माता उनकी जगदम्बा हो गई, अम्बा हो गई। इसलिए बाबा ने कहा उस अंबाला पार्टी में, जो अम्बा को माननेवाली पार्टी है, उसमें हमारा लाडला कितना याद करते रहते थे। कौन लाडला? हमारा क्यों कहा? कल बताया ना। हमारा इसलिए कहा कि दो आत्माएं हैं। एक तो शिव सुप्रीम सोल प्रवेश है, और दूसरा शरीरधारी, जिसका रथ है। अर्जुन कहो, आदम कहो, शंकर कहो। तो दोनों आत्माएं एक मुख से बोल रही हैं इसलिए कहा हमारा लाडला। क्या? शिवबाबा का भी लाडला कौन हुआ? शिव का भी लाडला किसे कहेंगे? शंकर को? अरे, शंकर तो विनाश कर देता है दुनिया का। क्या? बाबा प्यार करना सिखाते हैं कि संघार करना सिखाते हैं? बाबा ने क्या किया? हँ? तो बाबा को मालूम है कि प्यार की प्रतिमूर्ति अगर है तो, तो तो ब्रह्मा ही बाबा कृष्ण बनेगा। बड़ा सलोना बच्चा होता है ना सतयुग के आदि । सारी दुनिया जिसको भगवान मान लेती है? हँ? दादा लेखराज ब्रह्मा की आत्मा जो सतयुग में जन्म लेती है कृष्ण के रूप में 16 कला संपूर्ण, उसी को भगवान माने बैठी है। तो ब्रह्मा बाबा को भी वो बच्चा पसन्द और जो मूर्तिमान शंकर वाली आत्मा है, सारी जगत का पिता, उसको भी वो ही बच्चा पसन्द। बहुत मीठा-मीठा बोलता है ना। उसकी मीठी-मीठी वाणी जो है वो मूर्तिमान शंकर को भी बड़ा पसन्द आती है। क्या? इसलिए बताया कि हमारा लाडला बच्चा उस पार्टी में कितना याद करते थे। किसको याद करते थे? अम्बा को। फिर आया है तो बाप को खुशी होती है।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. And the topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was about the Ambala Party, in which it was mentioned that the Ambala Party has come today. Hm? The party that brings whom? The party that brings Amba (mother). So, there must be a chief in it. Baba remembered that chief. He said – Our dear one in that party used to remember so much. Hm? Whom did he used to remember? Hm? Whom did he used to remember? Oho! He used to remember Amba. Poor dear child was not aware of the Father at all. He is a small child, isn’t he? A child like intellect. How can he know the Father? So, that dear child remembers a lot. Whom did he used to remember? Amba.

He has come again. He has come again now. To whom has he come to meet? Hm? He had come earlier also in the beginning of the Yagya, so, he used to keep on remembering Amba (mother) a lot because the main teacher was Amba only. What? Who used to teach the unlimited Gandhiji? Hm? It was the mothers who used to teach him knowledge. There must be a main mother also among them. She used to teach knowledge. Baba also used to enter in her, in that mother. It has been said, hasn’t it been that the one who was living together since ten years; i.e. there was a male. It is a Brahmavaakya, isn’t it? And there was a mother also with that male. Hm? Baba used to enter in her. In whom did He used to enter? In the mother. Why in the mother? At that time there was another mother also with that mother. Was she there or not? She was. Which mother was it? Hm? Hm? The one who was Dada Lekhraj’s elder sister, the first wife of the partner, wasn’t she? hm? But she did not used to like a vicious life. And then when ShivBaba entered, then Baba says – What do I make the virgins? I make them mothers. So, actually, she was a virgin only, wasn’t she? Her intellect did not used to think of vices at all. The one whose intellect, mind and intellect, thinks of vices, is a vicious person. Shankarji drinks poison, doesn’t he? But does his intellect remains engrossed in drinking poison? Hm? His intellect remains engrossed in remembering whom? In remembering ShivBaba. So, tell, did he used to obtain the pleasure of vices through the organs? Hm? He did not used to seek. So, similar was the case with that mother. So, the topic of Shankarji was of the perfect stage when his purusharth is completed. Now the history that He is telling is about the history of Om Mandali in the beginning of the Yagya.

So, the original mother among them was the elder sister of Brahma Baba and his partner was his brother-in-law. Hm? So, that junior mother was like a virgin only. What was she? Hm? She was a virgin only. And all the men who live in Calcutta; Calcutta is a very famous brothel of the world. So, they do keep extra wives. Well, they are called prostitutes (veshyaaen). Those who perform vicious actions. Men do require. What? There are men in this world, aren’t they? What title did Baba give them? Hm? Duryodhan-Dushasan. ........ Yes. Duryodhan-Dushasan. Hm? So, all men are Duryodhans-Dushasans. And especially in Calcutta, they cannot live without it. So, the one who becomes practiced in that task requires it under any circumstance. So, the mother said, she gave her consent that yes, brother, you can bring a second wife. I will, just as it was told earlier, I will keep her like my younger sister, like my daughter; I will keep her lovingly, I will also serve her, just as Baba has given direction in the Murli. Which direction did He give? Hm? Which direction did He give? That there are some mothers, they follow the path of knowledge and they want to lead a pure life, so, she should tell the husband that you bring a second wife, I will serve her. So, that is all; he kept. And she started living in the same house. So, and both used to live very lovingly. Brahma Baba’s elder sister used to give regard to her because she was very intelligent in speaking. So, it happens like this in the Iron Age. What? What happens? Pandit soi joi gaal bajawa (the one who speaks a lot is considered to be a scholar). People consider him to be a big scholar. So, she was very intelligent in speaking. And the name has also been mentioned in the scriptures as Vaak Devi. Devi of vaak, i.e. speech. Hm?

So, Brahma Baba conveyed the entire topic of visions through that Devi of speech. So, Brahma Baba; Brahma Baba was also a male. He was tall and sturdy, so, well, she was a prostitute, her intellect, her mind and intellect is inconstant; so, that partner, whose age was more; her intellect diverted from him and when she saw Brahma Baba she got attracted to him. That is all. And when Brahma Baba heard from her mouth, that yes, the meaning of visions was mentioned like this – I will become the soul of Krishna in the Golden Age; Brahma Baba himself had visions, but Brahma Baba was already very experienced, he did not have firm faith. Yet, on the basis of the language, he accepted, didn’t he? Hm? And later on he departed. He must have gone back to Sindh, Hyderabad. He started organizing satsangs (spiritual gatherings) there. While he was organizing satsangs, Om Radhey arrived there. What? She was very sharp in speech. And she had a sharp intellect as well. So, that is all, Brahma Baba made that daughter number one Brahmani. What? And when both of them came together to Calcutta again, then the junior mother explained the entire topic to them in detail because the junior mother had understood the topic. But she did not tell that actually it is that partner, the soul which narrated the topic, whatever was narrated through him, was actually told by him. So, Brahma Baba’s intellect was already thinking of whom? He was thinking of that mother who used to speak more.

So, he used to remember that mother a lot because it is a tradition of the world in the end of the Iron Age that the one who speaks a lot is accepted as a scholar. So, that talkative mother became his Jagdamba, mother. This is why Baba has said that our dear one, in that Ambala Party, which is a party that believes in the mother (Amba), used to remember so much. Which dear one (laadlaa)? Why was he called ‘our’? It was told yesterday, wasn’t it? He was called ‘ours’ because there are two souls. One is the Supreme Soul Shiv who has entered and the other is the bodily being to whom the Chariot belongs. Call him Arjun, call him Aadam, call him Shankar. So, both souls are speaking through one mouth, this is why it was said – Our dear one (hamaaraa laadlaa). What? Who is dear to ShivBaba also? Who will be called the dear one of Shiv also? Shankar? Arey, Shankar causes destruction of the world. What? Does Baba teach to love or to destroy? What did Baba do? So, Baba knows that if there is any embodiment of love, then it is Brahma Baba only who will become Krishna. He is a very beautiful child of the beginning of the Golden Age. The one whom the entire world considers to be God. Hm? It has considered the soul of Dada Lekhraj Brahma, who gets birth in the Golden Age in the form of Krishna who is perfect in 16 celestial degrees, as God. So, Brahma Baba also likes that child and the soul of embodied Shankar, the Father of the entire world also likes the same child. He speaks very sweetly, doesn’t he? That embodied Shankar also likes that sweet speech a lot. What? This is why it was told that our dear child used to remember so much in that party. Whom did he used to remember? Amba (mother). Now he has come again. So, the Father feels happy.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 02 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2464, आडियो 2950, दिनांक 22.03.2018
VCD 2464, Audio 2950, Date 22.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dataed 16.5.1967
VCD-2464-Bilingual

समय- 00.01-19.05
Time- 00.01-19.05

रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. पहले पेज के एकदम मध्यांत में बात चल रही थी कि बच्चे माया के वार से, कोई हैं जो हार तो नहीं खाते हैं, अनिश्चय बुद्धि की मौत मर तो नहीं जाते हैं, लेकिन बेहोश हो जाते हैं। और बेहोश हो जाते हैं तो पुरुषार्थ बन्द हो जाता है। श्वासें तो चलती रहती हैं। लेकिन जो श्रीमत है श्वासों श्वास याद करो, वो तो हो ही नहीं पाता। तो बताया कि माया रावण ने राम को बेहोश कर दिया। अब शास्त्रों में तो ऐसी बात नहीं है कि राम को बेहोश कर दिया। रामायण शास्त्र में तो ये लिखा है – राम के भाई को बेहोश कर दिया। तो अब ये बात शिव बाप की आत्मा ने बोली या ब्रह्मा की आत्मा ने बोली दादा लेखराज ने? हँ? हँ? ब्रह्मा ने बोली। अब शिवबाबा कहते हैं – ब्रह्मा जो कुछ बोलता है, चलो, मेरी वाणी के बीच में इंटरफियर करके बोलता है। तो भी मैं इसकी बोली हुई गलत बात को भी ठीक कर दूंगा। तुम चिंता मत करो। तुम सदैव ऐसे ही समझो कि ये डायरेक्शन, हँ, शिव बाबा का है।

अब सवाल है इस बात को कैसे ठीक कर देंगे? तो ठीक ऐसे कर देंगे कि हम ब्राह्मण बच्चे कहते हैं ना बिन्दु-3 आत्मा-2 सब? हँ? भाई-भाई। तो शिव ज्योतिबिन्दु तो, वो भी तो बिन्दु है। हँ? और उसके मुकाबले थोड़ा कम शक्तिशाली दूसरे नंबर का भी ज्योतिबिन्दु है या नहीं? कौन? अरे...। हँ? हाँ। राम। तो बिन्दु-बिन्दु भाई-भाई के रूप में कहें तो छोटा भाई हुआ ना। हँ? क्या हुआ? छोटा भाई। अब सवाल ये है कि शास्त्रों में तो उसका नाम लक्ष्मण रख दिया है। लक्ष्य को मारने वाला। तो ये बात भी ठीक ही तो है। लक्ष्मण कह दो। अव्वल नंबर में लक्ष्य को मारने वाला आत्मा राम है या नहीं? हँ? है। तो लक्ष्मण कह दो। कोई हर्जा थोड़ेही है। तो बाप कहते हैं उस बच्चे के लिए, शिव बाप ज्योतिबिन्दु कहते हैं उस बच्चे के लिए जो अव्वल नंबर में लक्ष्य को मार लेता है। क्या कहते हैं? दुनिया की ऐसी कोई बात नहीं जो तेरे पर लागू न होती हो। किसके ऊपर? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। जो राम वाली आत्मा है उसके ऊपर ये बात भी लागू होती है, लक्ष्मण वाली बात। समझ में आया कि नहीं?

तो वो राम वाली आत्मा लक्ष्मण का भी पार्ट बजाने वाली हो गई। माने कहने का तात्पर्य ये है कि वो राम वाली आत्मा इस मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष में बीज है। कैसा बीज? ऐसा बीज है जिसमें सारे मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष के पत्ते समाए हुए हैं। क्या? समाए हुए हैं कि नहीं? हँ? तो उन पत्तों में लक्ष्मण बच्चा भी होगा या नहीं होगा? हँ? तो बोला है गीता में। क्या? न अहम् तेषु ते मयि। (गीता 7/12) मैं उन 500-700 करोड़ मनुष्यात्मा रूपी पत्तों में नहीं हूँ लेकिन वो सब पत्ते मुझ बीज के अन्दर समाए हुए हैं। अगर नहीं समाए हुए होते तो बीज में से इतने पत्तों वाला वृक्ष निकला कहाँ से? हँ? इसलिए ठीक ही बोला। शिव बाप ने ब्रह्मा मुख से मुरली में ठीक ही बोला। क्या बोला? दुनिया की कोई ऐसी बात नहीं, कोई चीज़ नहीं जो तेरे पर लागू न होती हो। माने तू इस मनुष्य सृष्टि का बीज है ना। तो तेरे अन्दर तो सब कुछ है।

तो ब्रह्मा बाबा ने अगर कह दिया शिव की वाणी के बीच इंटरफियर करके कि राम को बेहोश कर दिया, हँ, तो शास्त्रों के अनुसार तो गलत कह दिया क्योंकि शास्त्रकारों की बुद्धि तो इतनी निराकारी स्टेज वाली है ही नहीं। तो बाबा ने उस बात को ठीक कर दिया। फिर ब्रह्मा बाबा ने मुख से खुद ही अपनी गलती को सुधार लिया। क्या? भई, राम को बेहोश कर दिया या, या फलाने को कर दिया। अच्छा, फिर वो ले आया संजीवनी बूटी। क्या? कौन ले आया? वो माने कौन? हँ? शास्त्रों में लिखा है हनूमान ले आया। लिखा है ना। जिसने मान-मर्तबे का हनन कर दिया। हर आत्मा में देह अहंकार होता है ना। तो देह अहंकार का कहो, मान-मर्तबे का कहो, हनन कर दिया माना मार दिया।

तो, ये हनूमान शास्त्रों में किसको कहा गया? हँ? हनूमान शास्त्रों में उसी आत्मा को कहा गया है जो पुरुषार्थी जीवन में बन्दरों जैसा पुरुषार्थ करता है। कैसा पुरुषार्थ करता? बन्दरों जैसा पुरुषार्थ। बन्दरों जैसा पुरुषार्थ क्या होता है? हँ? घड़ी-घड़ी विकार में जाना, घड़ी-घड़ी डिस्चार्ज होना। क्या? जब साकार शरीर था, तब भी ये ऐसे ही करता था। और जब साकार शरीर छूट गया, तो सूक्ष्म शरीर से जिसमें प्रवेश करता था, हँ, उसमें भी कुछ न कुछ, जब तक प्रवेश करने वाली आत्मा सूक्ष्म शरीरधारी और जिसमें प्रवेश किया है, वो शरीरधारी आत्माएं संपन्न न बनें तब तक कुछ न कुछ; क्या? प्वाइंट जीरो-2 वन परसेन्ट (.001%) तो डिस्चार्ज होता ही है। क्या? संपन्न आत्मा नहीं कहेंगे। क्यों? अमोघवीर्य का मतलब ही है – सदाकाल के लिए स्थिर हो जाना। कामेन्द्रिय पर पूरा ही जीत पा लेना। शक्ति क्षीण होने, पतित होने का कभी नाम-निशान भी पैदा न हो। जिसको शास्त्रों में विद्वानों ने कह दिया कि कमर के हिस्से में कुण्डलिनी शक्ति है। वो शक्ति सोई पड़ी रहती है। अज्ञान अंधकार। उसे अगर जागृत कर दिया जाए तो वो मस्तक की तरफ ऊपर चढ़ने की स्वभाव वाली बन जाती है। क्या? वो शक्ति फिर कभी नीचे नहीं आती। और वो शक्ति कोई है ही नहीं। यही ईश्वर की निरन्तर याद में रहते हुए जो शक्ति है उसको ऊपर चढ़ाने की बात है। क्या?

तो जो आत्मा इस बात में अव्वल नंबर वन जाती है, जिसे कहते हैं शिव के समान, जिसका नाम शिव के साथ जोड़ा जाता है। किसका नाम? एक शंकर ही है जिसका नाम शिव के साथ जोड़ा जाता है। तो वो शंकर वाली आत्मा अव्वल नंबर है। अपने देह अहंकार अर्थात् मान-मर्तबे को हनन करने वाली, चूर-चूर कर देती है। क्या? और कैसे चूर-चूर करती है? उसमें जो बन्दर बुद्धि आत्मा है ना दादा लेखराज ब्रह्मा की, वो उसमें प्रवेश होकरके बार-बार बन्दरपना करती है। और शंकर वाली आत्मा जब तक संपन्न नहीं बनी है तब तक शरीरधारी मूर्तिमान शंकर के ऊपर सवार होकर रहती है। क्या? और जब वो संपूर्ण बन जाती है शंकर वाली आत्मा तो फिर उसके ऊपर सवार हो जाती है। किसके ऊपर? हँ? उसे बन्दर कहो, शास्त्रों में उसे बैल भी कह दिया है; शिव बाबा ने बताया ब्रह्मा मुख से कि, इशारा दिया कि शंकर जब हाइ जम्प लगाते हैं तो बैल पर सवार हो जाते हैं। तो वो बैल रूपी दादा लेखराज ब्रह्मा आधीन हो जाता है। क्या? आधीन माने फिर जैसे चलाओ वैसे चलेगा।

तो वो हनूमान बन्दर दिखाया गया। क्या? वो हनूमान जिस शरीर में प्रवेश करता है, सूक्ष्म शरीर से, हँ, वो क्या ले आया? संजीवनी बूटी ले आया। कहाँ से ले आया? ऊँचे पहाड़ से। माने ऊँची स्टेज में जब वो आत्मा चढ़ती है शंकर की तरह, तो वो क्या ले आती है? संजीवनी। सं माने संपूर्ण, जीवन माने जीवन धारण करने वाली। बेहोशी को हटाने वाली बूटी ले आया।


A morning class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the fag end of the middle portion of the first page was that there are some children who do not suffer defeat at the hands of Maya, do not die the death of faithlessness (anishchaybuddhi), but do become unconscious. And when they become unconscious, their purusharth stops. The breathing does continue. But the Shrimat that you should remember in every breath is not followed. So, it was told that Maya Ravan made Ram unconscious. Well, it is not mentioned in the scriptures that Ram was made unconscious. It has been written in the scripture Ramayana – Ram’s brother was made unconscious. So, well, was this topic said by the soul of Father Shiv or was it said by the soul of Brahma, Dada Lekhraj? Hm? Brahma said. Now ShivBaba says – Whatever Brahma says, okay, he interferes in between my Vani and speaks. Yet, I will correct the wrong versions spoken by this one. You don’t worry. You always think that this direction is from ShivBaba.

Now the question is – How will He correct this topic? So, He will correct like this – We Brahmin children say that we all point-like souls are brothers. So, the point of light Shiv is also a point. Hm? And when compared to Him, is there a slightly less powerful number two point of light or not? Who? Arey....Hm? Yes. Ram. So, if we speak in terms of point like brothers, then he is a younger brother, isn’t he? Hm? What is he? Younger brother. Now the question is that he was named Lakshman in the scriptures. The one who achieves the target (lakshya). So, this topic is also correct, isn’t it? Call him Lakshman. Is Ram the soul number one in achieving the target or not? Hm? He is. So, call him Lakshman. There is no problem. So, the Father says for that child; point of light Father Shiv says for that child who becomes number one in achieving the target. What does He say? There is nothing in the world which is not applicable to you. To whom? Hm?
(Someone said something.) Yes. This topic, the topic of Lakshman is applicable to the soul of Ram also. Did you undersand or not?

So, that soul of Ram is also the one which plays the part of Lakshman. It means that the soul of Ram is the seed in this human world tree. What kind of a seed? It is such a seed in which all the leaves of the human world tree are merged. What? Are they merged in it or not? Hm? So, among those leaves will there be child Lakshman also or not? Hm? So, it has been said in the Gita. What? Na aham teshu te mayi. (Gita 7/12) I am not included among those 500-700 crore human souls like leaves, but those leaves are contained within Me the seed. Were they not contained, then where the tree with so many leaves emerge from? Hm? This is why it was said correctly. Father Shiv said correctly through the mouth of Brahma in the Murli. What did He say? There is nothing in this world, nothing which is not applicable to you. It means that you are the seed of this human world, aren’t you? So, everything is contained in you.

So, if Brahma Baba interfered in between Shiv’s Vani and said that Ram was made unconscious, hm, then as per the scriptures he said a wrong thing because the intellect of the writers of scriptures is not in so incorporeal stage. So, Baba corrected that topic. Then Brahma Baba himself corrected his mistake through his own mouth. What? Brother, Ram was made unconscious or someone else was made unconscious. Achcha, then he brought the Sanjivani Booti. What? Who brought? ‘He’ refers to whom? Hm? It has been written in the scriptures – Hanuman brought. It has been written, hasn’t it been? The one who abdicated his respect and position. Every soul has body consciousness, doesn’t it? So, he abdicated, i.e. killed his body consciousness, respect and position.

So, who was called Hanuman in the scriptures? Hm? The same soul who makes monkey like purusharth in his purusharthi life. What kind of purusharth does he make? Monkeys like purusharth. What is a monkey like purusharth? Hm? To indulge in lust again and again, and getting discharged again and again. What? He used to do like this even when there was a corporeal body. And when the corporeal body was gone, then the one in whom he used to enter through the subtle body, hm, even in him/her to some extent or the other, as long as the subtle bodied soul which enters and the one in whom it enters, those embodied souls become perfect to some extent or the other; what? He does get discharged .001%. What? He will not be called a perfect soul. Why? The meaning of Amoghveerya itself is – to become constant forever. To gain victory over the organ of lust completely. There should not be any name or trace of reduction of vigour, of becoming sinful. It has been called by the scholars in the scriptures that there is Kundalini power in the area around the waist. That power remains dormant. Darkness of ignorance. If you can awaken it, then it acquires the nature of rising upwards towards the forehead. What? Then that power never comes down. And that power is nothing else. It is the question of enabling the power acquired in the continuous remembrance of God to rise up. What?

So, the soul which becomes number one in this subject, which is called equal to Shiv, whose name is joined with Shiv. Whose name? It is Shankar alone, whose name is joined with Shiv. So, that soul of Shankar is number one. The one who abdicates his body consciousness, i.e. respect and position, breaks it into minute particles. What? And how does it crush it? The soul of Dada Lekhraj Brahma with monkey like intellect enters in him and acts like a monkey again and again. And as long as the soul of Shankar doesn’t become perfect, it rides on the bodily being, the corporeal Shankar. What? And when the soul of Shankar becomes perfect, then it rides on him. On whom? Hm? Call him monkey; he has been called a bull also in the scriptures; ShivBaba said through the mouth of Brahma, gave a hint that when Shankar makes a high jump, then he rides on the bull. Then that bull like Dada Lekhraj Brahma comes under control. What? Aadheen (controlled) means he will work as you wish.

So, that monkey Hanuman has been depicted. What? The body in which that Hanuman enters through his subtle body, hm, what did he bring? He brought the Sanjivani Booti (life giving herb). From where did he bring? From a high mountain. It means that when that soul climbs to the high stage like Shankar, then what does it bring? Sanjivani. Sam means complete (sampoorna), jeevan means life sustaining. He brought the herb that removes unconsciousness.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2465, आडियो 2951, दिनांक 23.03.2018
VCD 2465, Audio 2951, Date 23.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class 16.5.1967
VCD-2465-Bilingual

समय- 00.01-16.10
Time- 00.01-16.10


रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. दूसरे पेज की पहली लाइन में बात चल रही थी कि बच्चे, फिर-फिर माया से हार खा जाते हैं। तो बाप आर्डर देते हैं – सुंघाओ इनको संजीवनी बूटी। क्या? कल्प-कल्प हार खा जाते हैं। तो क्या करो? संजीवनी बूटी सुंघाओ। क्या है संजीवनी बूटी? हँ? तो फिर से सुरजीत हो जाएंगे, खड़े हो जाएंगे? कल बताया था संजीवनी बूटी पवित्रता की संजीवनी बूटी है। इसका प्रैक्टिकल रूप कौन है? पवित्रता का प्रैक्टिकल रूप है राम को धारण करने वाली। हँ? कौन धारण करता है? राधा। कौनसे राम को धारण करती है? त्रेता वाले राम को? नहीं। त्रेता वाला राम नहीं। जिसमें योगी लोग रमण करते हैं। रम्यते योगिनो यस्मिन इति राम। कौनसे योगी लोग रमण करते हैं? हँ? योगी साधारण भी होते हैं, योगी असाधारण भी होते हैं।

तो असाधारण योगी किन्हें कहें? हँ? कोई को पता नहीं। असाधारण योगी हुए धरमपिताएं; हँ? क्योंकि वो आत्माएं जो निराकार हैं, उस निराकार आत्माओं के बाप सुप्रीम सोल को अच्छी तरह से पकड़ते हैं नंबरवार। नंबरवार पकड़ते हैं। इसका मतलब अव्वल नंबर सौ परसेन्ट पकड़ता होगा। जो अव्वल नंबर है अल्लाह अव्वलदीन, पहले नंबर का धर्म का धरमपिता, वो अव्वल नंबर को पकड़ता है। सारा डीटेल पकड़ लेता है गहराई तक। और वो धरमपिताएं बाद में आते हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, चाहे उनके आधारमूर्त हों, चाहें उनकी बीजरूप आत्माएं हों, वो कम पहचानते हैं नंबरवार। कह देते हैं, नहीं पूरा पहचानते हैं, तो कह देते हैं – खुदा निराकार है; क्या करता है? हँ? अल्ला मियाँ ने ज़मीन बनाई, अल्ला मियाँ ने आफताब, सूर्य बनाया, अल्ला मियाँ ने चांद बनाया, अल्ला मियाँ ने समन्दर बनाया। पूछा जाता कैसे बनाया? ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है। हमारे धरमपिता ने जितना कुरान में लिखा है उतनी ही बात काफी है। नाराज़ हो जाते हैं। अरे, ज्ञान की बातों में नाराज़ होंगे क्या? तो देखो, दूसरा धरमपिता इस दुनिया में आता है, दो धरम, दो राज्य, दो भाषाएं, सब वास्तव में द्वैतवाद फैलाता है। उसका ही ये हाल है तो बाद में आने वाले धरमपिताओं का क्या हाल होगा? तो वो तो पूरा परिचय खुदा का कहो, अल्ला मियाँ का कहो, भगवान का कहो, दे ही नहीं सकते। तो कौन देता है?

वो देता है जो इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच का हीरो पार्टधारी, सारी मनुष्यात्माओं का जो साकारी रूप है, जिसको कहें आदम, सृष्टि का आदि पुरुष, अंग्रेजों में कहते हैं एडम; हिन्दुओं में कहते हैं आदि देव; जैनियों में कहते हैं आदिनाथ। तो वो जो शख्सियत है, सारी मनुष्यात्माओं का बीजरूप बाप, वो इसलिए पहचानता है कि पूर्व जन्मों में जन्म-जन्मान्तर उस आत्मा, हीरो पार्टधारी ने ऐसा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ हीरो का पार्ट बजाया है कि जब अल्ला मियाँ कहो, इस सृष्टि पर आता है निराकार, निराकार आत्माओं का निराकार बाप, बिन्दु-3 आत्माओं का बाप शिव ज्योतिबिन्दु, तो वो उसी बच्चे में प्रवेश करता है जो जन्म-जन्मान्तर बाप की स्मृति में रहता है। हँ? अभी द्वापर, कलियुग में कोई पूरी रीति जानता है सुप्रीम सोल बाप को? कोई नहीं जानता। फिर भी आत्मिक स्टेज तो रहती है नंबरवार क्योंकि सृष्टि के आदि में कहें, कौन है परम पदधारी, तो कहते हैं विष्णु। उसकी चार भुजाएं सहयोगी के रूप में दिखाई जाती हैं। सृष्टि के आदि काल से ही। जो विष्णु आदि में आत्मिक स्टेज में है, तो आदि सो अंत में भी आत्मिक स्टेज में ही रहता है। रहता है लेकिन अपने रूप को भूल जाता है। रूप को भूल जाता है कि मैं ज्योतिबिन्दु हूँ क्योंकि इस सृष्टि पर जैसे भारत में खास शंकराचार्य आए तो उन्होंने सबको भ्रमित कर दिया। हम सब आत्मा सो परमात्मा हैं। ये गीता में लिखा है अणोणीयांसम्। उस परमात्मा का स्वरूप अणु होता है। तो सब समझने लगे हमारी आत्मा सो परमात्मा। शंकराचार्य ने तो यहाँ तक समझ लिया शिवोहम्। मैं ही शिव हूँ।

तो ये जो हर आत्मा अपन को परमात्मा समझ बैठी, शिव समझ बैठी, शिव जब आते हैं उस मनुष्य तन में जो अंतिम जनम में भी विष्णु रूप होकर रहता है। विष्णु का मतलब? एक में लगाव। माना इस दुनिया में कलियुग के अंत में होता नहीं है कि स्त्री पुरुष मिलकर एक होकर रहते हों। वाचा से, कर्मणा से, द्ष्टि से, वृत्ति से, कुछ न कुछ टकराव होता है। लेकिन वो जो विष्णु रूप है आदि सो अंत वाला वो अंतिम जनम में भी आपस में स्वभाव-संस्कार मिलते हुए होते हैं। तो, लेकिन गल्ती क्या हो जाती है? अपन को ही भगवान समझ लेते हैं। अब वो सुप्रीम सोल उसी व्यक्तित्व में प्रवेश करता है जो भगवान जब आते हैं सुप्रीम सोल इस सृष्टि पर तो जो मत देते हैं, जो डायरेक्शन देते हैं, उस मत को जिसने सबसे जास्ती फालो किया अपने जीवन में, वो आत्मा संसार की सर्वश्रेष्ठ आत्मा घोषित हो जाती है सारी मनुष्यात्माओं के बीच में, 500-700 करोड़ मनुष्यों की सृष्टि होती है, 750 करोड़, उन सबके बीच में वो सर्वश्रेष्ठ घोषित हो जाता है। घोषित ही नहीं हो जाता, वो पूरे कल्प में माना सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, चारों युगों में श्रीमत के अनुकूल जितना चलता है, उतना और कोई मनुष्यात्मा उतना नहीं चल पाती।

तो पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर, पूर्व कल्प के आधार पर वो सुप्रीम सोल जब 5000 वर्ष का सृष्टि चक्र पूरा होता है तो उसमें प्रवेश कर जाता है, क्योंकि जानता है इस सृष्टि रूपी रंगमंच की यही श्रेष्ठ आत्मा है जिसने श्रीमत पर न चलने वाले जो नंबरवार धर्मपिताएं और उनके फालोअर्स हैं, उनसे टक्कर ली है। किसको सपोर्ट किया? हँ? टक्कर ली तो सपोर्ट किसको, किसके लिए किया? सुप्रीम सोल के लिए। सुप्रीम सोल की मत पर जो चलने वाले हैं उन सूर्यवंशियों को सपोर्ट करता रहा। बाकी जो नहीं चलने वाले, या दूसरे धरमपिताओं के मत पर चलने वाले और दूसरे धरमपिताएं अपनी चलाते हैं।

तो उसी आत्मा में, जो मनुष्य सृष्टि का बीजरूप, बाप के समान हीरो पार्टधारी है, प्रवेश करते हैं और प्रवेश करके, पता तो लगता नहीं कि प्रवेश किया या नहीं किया। ये खासियत है शिव सुप्रीम सोल की कि और आत्माएं प्रवेश करती हैं तो पता लग जाता है। नैन-चैन, चेहरा-मोहरा, बात-चीत बदल जाती है। और शिव जब प्रवेश करते हैं तो कोई को पता ही नहीं लगता, कब आया, कब चला जाता। तो उस मनुष्य सृष्टि के बीज आदम को भी पता नहीं लगता है क्योंकि वो तो अपनी ही भनक में रहता है शिवोहम्। क्या? तो बस। जो भी संगठन ओम मंडली में इकट्ठा होता है उनके साथ देह का संग का रंग लगाकर ये समझता है मेरे संग के रंग से सारी दुनिया सुधरेगी। तो उन आत्माओं में पहला नंबर कोई तो मनुष्यात्मा होगी। हँ? होगी या नहीं होगी? कौन? जो ओम मंडली में पहले-पहले संग का रंग लेने वाली बनती है। जल्दी बताया करो। एक शब्द में बताओ, समझ जाएंगे।
(किसी ने कुछ कहा।) जगदम्बा ऊपर-ऊपर जो ढ़ांचा होता है शरीर का, उसका संग लेती है कि उस ढ़ांचे के अन्दर जो असली चीज़ है उसका संग लेती है? हँ? कौनसी आत्मा है? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। उसका नाम पड़ता है राधा। हँ? रा माने राम; धा माने? धारण करे। कौनसे राम को धारण करे? जिसमें सभी योगी लोग रमण करते हैं, आनन्द करते हैं, खेल खेलते।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the first line of the second page was – Children suffer defeat at the hands of Maya again and again. So, the Father gives an order – Make them smell the Sanjivani booti (a life-giving herb). What? You suffer defeat every Kalpa. So, what should you do? Make them smell the Sanjivani booti. What is Sanjivani booti? Hm? So, will you become alive once, stand up once again? It was told yesterday that the Sanjivani booti is the life-giving herb of purity. Who is its practical form? The practical form of purity is the one who inculcates Ram. Hm? Who inculcates? Radha. Which Ram does she inculcate? Is it the Ram of the Silver Age? No. It is not the Ram of the Silver Age in whom the yogis wander. Ramyate yogino Yasmin iti Ram. Which yogis wander? Hm? Yogis are ordinary as well as extraordinary.

So, who should be called extraordinary yogis? Hm? Nobody knows. The extraordinary yogis are the founders of religions; hm? It is because they catch/grasp the Father of the incorporeal souls, the Supreme Soul nicely numberwise. They grasp numberwise. It means that someone grasps number one hundred percent. The number one, Allah Avvaldeen, the founder of the number one religion grasps the number one. He grasps the entire detail in depth. And those founders of religions come later on to this world stage, be it their base-like souls (aadhaarmoort), be it their seed form souls (beejroop), they recognize lesser numberwise. They say; when they do not recognize completely, they say – Khuda is incorporeal; what does He do? Hm? Allah Miyaan made land, Allah Miyaan made Aaftaab, i.e. the Sun, Allah Miyaan made the Moon, Allah Miyaan made the ocean. It is asked – How did He make? [They reply] There is no need to speak more. Whatever our founder of religion has written in the Koran is enough. They get angry. Arey, should they get angry on topics of knowledge? So, look, when the second founder of religion comes to this world, then he spreads two religions, two kingdoms, two languages, he spreads dualism in reality. When this is his condition, then what would be the condition of the founders of religions who come later on? So, they cannot give the complete introduction of Khuda, Allah Miyaan or God. So, who gives?

The one who is the hero actor of this human world stage, the corporeal form of all the human souls, who could be called Aadam, the first man of the world, who is called Adam by the Englishmen, Hindus call him Aadi Dev, Jains call him Aadinath. So, that personality, the seed form Father of all the human souls recognizes because that soul, the hero actor played such part of most righteous hero birth by birth in the past births that when the incorporeal Allah Miyaan, the incorporeal Father of the incorporeal souls, the point of light Shiv, the Father of the point like souls comes to this world, then He enters in the same child who remains in the remembrance of the Father birth by birth. Hm? Well, does anyone know the Supreme Soul Father completely in the Copper Age, Iron Age? Nobody knows. Yet, it remains in soul conscious stage numberwise because in the beginning of the world, who holds the supreme post; so they say Vishnu. His four arms are shown in the form of helpers (sahyogi) from the beginning of the world itself. The Vishnu who is in soul conscious stage in the beginning, he remains in a soul conscious stage in the beginning as well as in the end. He remains in such stage, but forgets his form. He forgets his form that I am a point of light because for example, when Shankaracharya came in this world, in India in particular, then he confused everyone. We all souls are Supreme Soul. It has been written in the Gita – Anoneeyaamsam. The form of that Supreme Soul is like an atom. So, everyone started thinking that our soul is the Supreme Soul. Shankaracharya thought to the extent that I am Shiv (Shivohum). I am Shiv.

So, every soul considered itself to be the Supreme Soul, considered itself to be Shiv; when Shiv comes in that human body which remains in the form of Vishnu even in the last birth. What is meant by Vishnu? Attachment in one. It means that in this world, in the end of the Iron Age, it does not happen that the wife and husband live as one. There is some or the other clash in words, in actions, in vision, in vibrations. But the form of Vishnu in the beginning as well as the end, they remain united in nature and sanskars even in the last birth. So, but what is the mistake that happens? They consider themselves to be God. Well, that Supreme Soul enters in the same personality; when God, the Supreme Soul comes and gives directions in this world; the one who followed those directions the most in his life, that soul is declared to be the highest soul of the world among all the human souls. There is a world of 500-700, 750 crore human beings; he is declared to be the highest one among all of them. He is not just declared; no other human soul is able to follow the Shrimat in the entire Kalpa, i.e. the four Ages of Golden Age, Silver Age, Copper Age and Iron Age.

So, on the basis of the actions performed in the past births, on the basis of the past Kalpa, when the world cycle of 5000 years is completed, then the Supreme Soul enters in him because He knows that this is the righteous soul of this world stage who has clashed with the numberwise founders of religions and their followers who do not follow the Shrimat. Whom did he support? Hm? When he clashed, then whom did he support and why? The Supreme Soul. He continued to support the Suryavanshis who follow the opinion of the Supreme Soul. Those who do not follow or those who follow the directions of the other founders of religion and the other founders of religions issue their own directions.

So, He enters in the same soul, the seed form of the human world, the hero actor equal to the Father and after entering, one does not know whether He entered or not. This is the specialty of the Supreme Soul Shiv that when other souls enter then you get to know. The eyes, the face, the conversation changes. And when Shiv enters, then nobody gets to know as to when He entered and when He departs. So, that seed of the human world, Aadam also does not get to know because he remains in his own ego, Shivohum (I am Shiv). What? So, that is all. All the gathering that takes place in Om Mandali, he applies the colour of company of his body and thinks that the entire world will reform through the colour of my company. So, there must be a human soul who is number one among those souls. Hm? Will it be or will it not be? Who? The one who becomes the one who takes the colour of company in the Om Mandali first of all. Tell quickly. Tell in one word, we will understand.
(Someone said something.) Does Jagdamba take the colour of company of the external structure of the body or does she take the company of the true thing inside? Hm? Which soul is it? (Someone said something.) Yes. She is named Radha. Hm? Ra means Ram; What is meant by dha? The one who inculcates (dhaaran karey). Inculcates which Ram? The one in whom all the yogis wander, experience joy, play games.
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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2466, आडियो 2952, दिनांक 24.03.2018
VCD 2466, Audio 2952, Date 24.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2466-Bilingual

समय- 00.01-15.46
Time- 00.01-15.46

रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. दूसरे पेज की तीसरी लाइन में बात चल रही थी – जो बच्चे हार खाते हैं, उनको संजीवनी बूटी सुंघाओ। तो फिर खड़े हो जाएंगे। और ये कितने होते हैं संजीवनी बूटी सूंघने वाले? हँ? कोई संख्या है? हाँ। ढ़ेर के ढ़ेर। क्योंकि आखरीन तो इस मनुष्य सृष्टि में जो भी मनुष्य मात्र हैं, सबको ये पवित्रता की बूटी सूंघनी ही होती है और सब खड़े हो जाते हैं पुरुषार्थ में। जब ड्रामा पूरा होता है ना। तो जो भी एक्टर्स हैं, क्या करते हैं? हँ? गिर जाते हैं कि खड़े हो जाते हैं? खड़े हो जाते हैं। अच्छे-अच्छे बच्चों को भी कभी माया कुछ न कुछ ऐसे प्वाइंट से हराय देती है। फिर बाप को बड़ा तरस पड़ता है। बहुत तरस पड़ता है। बच्चे होते हैं ना। उनको इतना तो नहीं रहता है। क्या नहीं रहता? हँ? धर्मपिताएं हैं, उनको भी तो बच्चे होते हैं ना। वो भी बच्चे हैं बाप के, धर्मपिताएं भी। तो उनको इतना नहीं रहता है जितना इस मनुष्य सृष्टि के बाप को रहता है। बाबा अनुभवी होते हैं। वाह! ये हमारे बच्चे कोई एक थोड़े ही हैं बच्ची। हँ? सैंकड़ों हैं। सैंकड़ों बच्चे हैं ना। हज़ारों बच्चे हैं। हँ? जिस बच्ची के सामने बैठा बोला; किसने बोला? हँ? हज़ारों बच्चे? हँ? ब्रह्मा ने बोला। हज़ार भुजाएं हैं ना ब्रह्मा की। हाँ, उनमें सैंकड़ों बच्चे ऐसे हैं जो घड़ी-घड़ी मूर्छित होते हैं। फिर उनको संजीवनी बूटी सुंघानी पड़ती है। कोई तो बिल्कुल मूर्छित हो जाते हैं। तो उनको संजीवनी बूटी दी जाती है कि बच्चे गफलत नहीं करो।

अपने बेहद के बाप से अभी वर्सा लेंगे ना। हँ? कौनसे बाप से? हँ? बेहद के तो दो बाप हैं। आत्माओं का बाप, जो अखूट ज्ञान का भण्डार है, और दूसरा है मनुष्य सृष्टि का बाप। तो मनुष्य सृष्टि का बाप से अभी वर्सा लेंगे ना। अभी लेंगे तो कल्प-कल्प पाते रहेंगे। और अभी राजाई का वर्सा न लिया, कंट्रोलिंग पावर का वर्सा न लिया, तो फिर ऐसे ही कल्प-कल्प नहीं पाएंगे। तो तुम बच्चे जानते हो। क्या जानते हो? कि हम कहाँ बैठे हैं? ये पाठशाला है। हँ? सामान्य पाठशाला नहीं। गीता पाठशाला। क्या? भगवान ने आकरके जो ज्ञान का गीत गाया, वो गीता पाठशाला है। ये वो ही बाबा की पाठशाला है। वो ही माना कौनसी? हँ? वो ही कहके कौनसी पाठशाला याद दिलाई? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। हँ? आदि में जो ओम मंडली में गीता के गहरे-गहरे अर्थ बताते थे ना। तो वो ही गीता पाठशाला है। इसमें देखो, ऐसी कोई पाठशाला थोड़ेही होती है। क्योंकि दुनिया में वो जो सतसंग होते हैं, सन्यासियों वगैरा के, उनको कोई पाठशाला थोड़ेही कहा जाता है। हँ? उनको तो नाम रख दिया है ऐसे ही सतसंग। वो कोई सत होता है? हँ? वो सन्यासियों में कोई सच्चा होता है? हँ? क्यों? उनमें सच्चा क्यों नहीं हो सकता? हँ? अरे गीता में तो लिखा है – नासतो विद्यते भावो ना भावो विद्यते सतः। (गीता 2/16) जो सत है उसका कभी इस संसार में अभाव नहीं होता। और वो सन्यासी तो? हँ? बीच में ही आते हैं, फिर चले जाते हैं। हँ? पूरे सृष्टि के चक्र में चक्कर लगाते हैं क्या? रहते हैं क्या? रहते हैं? हँ? वो सन्यासी तो रहते नहीं। तो सत कहाँ हुए? जो असत है वो टिकता नहीं है। हँ? और जो सत है वो सदा टिकाऊ रहता है।

तो वो नाम रख देते हैं सत्संग। तो असली बात तो यहाँ की है, जहाँ इस मनुष्य सृष्टि में भले महाविनाश हो जाए कल्पांतकाल में फिर भी वो सत इस सृष्टि पर ज़रूर रहता है। कौन है? हँ? जो इस सृष्टि पर वो सत, उसका कभी अभाव होता ही नहीं। उसको कहते हैं शिवबाबा। ब्रह्मवाक्य मुरली में भी क्या बोला वेदवाक्य? हँ? बोला है – इस सृष्टि पर सदाकाल कोई चीज़ होती नहीं। सदा कोई चीज़ कायम नहीं रहती। सदा कायम तो एक शिवबाबा ही है। क्या? शिवबाबा। ऐसे नहीं कहा शिव बाप। हँ? शिव बाप माने? आत्माओं का बाप, जिसका नाम आत्मा का ही शिव है। वो बाप ही है आत्माओं का। दूसरा कोई संबंध नहीं है। हाँ, वो जब इस सृष्टि पर आता है, हँ, आत्मलोक छोड़करके सुप्रीम अबोड से, तो फिर जिस मनुष्य तन में, हीरो पार्टधारी में प्रवेश करता है तो क्या होता है? हँ? इस सृष्टि पर, हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ; जब साकारी सृष्टि पर आता है मनुष्य सृष्टि के साकार बाप में, तो उसको आप समान बनाता है; हँ? और सब संबंध निभाता है। इसीलिए तो गीता में लिखा है – ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता 4/11) जो मुझे जिस संबंध से याद करता है मैं उसको उसी संबंध से साथ देता हूँ। क्या? भावना अपनी-अपनी है। क्योंकि एम आब्जेक्ट सन्यासियों का तो कोई है नहीं। और यहाँ तो? यहाँ तो एम आब्जेक्ट है। क्या? कि नर से नारायण बनना है। नारी से लक्ष्मी बनना है। उन सन्यासियों के सत्संग में कोई ये थोड़ेही बताते हैं कि तुम ये सत्संग करोगे, रोज़ सुनोगे तो तुम नर से नारायण बन जाओगे, देवता बन जाओगे। नहीं।

उस सत्संग का उन्होंने नाम झूठा रख दिया है – सतसंग। अरे! सच्चा सतसंग तो ये है। क्या? ये माने? किसका संग? सत का संग। हँ? इस सृष्टि पर जो सदा सत है, कभी लुप्त नहीं होता है वो एक ही पार्टधारी आत्मा है। कौन? जिसको कहते हैं शिवशंकर भोलेनाथ। हँ? उसकी यादगार में गांव-गांव में, शहर-शहर में, सारी दुनिया की खुदाइयों में वो शिवलिंग मिला है ना। हँ? क्या नाम दिया? शिवलिंग। हँ? शिव तो निराकार है, ज्योतिबिन्दु है, उस बिन्दु की तो लंबाई-चौड़ाई माप होता ही नहीं। गीता में क्या लिखा? अप्रमेय। (गीता 11/17) क्या? उसकी माप, माप नहीं है बिन्दु। बिन्दु में माप होता है? लम्बाई-चौड़ाई होती है? नहीं। तो इतना सूक्ष्म है कि कोई चिंतन भी नहीं कर सकता। क्या? अति सूक्ष्म का कोई चिंतन करे? थोड़ा बड़ा रूप हो तो याद आए। अचिंत्य है। हँ? तो इसीलिए आखरी महाविनाश में जो निराकार को मानने वाले धरमपिताएं हैं वो भी थक जाते हैं। फिर क्या करते? कोई साकार को, साकार का चिंतन करते हैं। हँ? कौन साकार? जो सदा सत है इस सृष्टि पर। कौन? एक शिवबाबा। बाबा क्यों कहा? वो निराकारी स्टेज वाला शिव भी है, हँ, ज्योतिबिन्दु भी है और साकार भी है। तो सत के संग के साथ एम-आब्जेक्ट है। क्या? क्या एम-आब्जेक्ट है? हँ? जो सत है उसकी एम-आब्जेक्ट है – सत कौन है? हँ? शिवबाबा। शिव बाबा जो विश्व का मालिक बनता है, हँ, सारे विश्व की बादशाही लेता है तो वो क्या देगा? हँ? धनवान बाप होगा तो धन देगा। हँ? मल्टीमिलियनेयर होगा तो मल्टीमिलियन का वर्सा देगा। ये बाप क्या है? विश्व का मालिक। तो क्या देता है? हँ? वो विश्व की बादशाही देता है। हँ? बादशाही माने राजाई।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third line of the second page was – Make those students who suffer defeat to smell the Sanjiavani Booti (the herb of life). So, they will stand up once again. And how many smell the Sanjivani Booti? Hm? Is there any number? Yes. Numerous because ultimately all the human beings in this human world have to smell this herb of purity and everyone stands up in purusharth when the drama is about to be over, don’t they? So, what do all the actors do? Hm? Do they fall or do they stand up? They stand up. Sometimes Maya defeats even the nice children on some or the other such point. Then the Father feels pity. He feels very pity. They are children, aren’t they? They do not have that much. What do they not have? Hm? There are founders of religions; they too have children, don’t they? They, the founders of religions too are children of the Father. So, they do not have as much as the Father of this human world has. Baba is experienced. Wow! These our children are not one, daughter. Hm? There are hundreds. There are hundreds of children, aren’t there? There are thousands of children. Hm? The daughter in front of whom He said; who said? Hm? Thousands of children? Hm? Brahma said. There are a thousand arms of Brahma, aren’t there? Yes, among them hundreds of children are such that they fall unconscious every moment. Then they have to be made to smell the Sanjivani Booti. Some fall unconscious completely. So, they are given the Sanjivani Booti that children – Do not commit mistakes.

You will obtain the inheritance from your unlimited Father now, will you not? Hm? From which Father? Hm? There are two unlimited fathers. The Father of souls, who is an inexhaustible store house of knowledge. And the other is the Father of the human world. So, now you will obtain the inheritance from the Father of the human world, will you not? If you obtain now, then you will keep on obtaining every Kalpa. And if you do not obtain the inheritance of kingship now, if you do not obtain the inheritance of controlling power, then you will similarly not obtain every Kalpa. So, you children know. What do you know? That where are we sitting? This is a school. Hm? It is not an ordinary school. Gita pathshala (Gita school). What? It is the Gita pathshala of the song (geet) of knowledge that God came and sang. It is the same school (pathshala) of Baba. ‘The same’ means which one? Hm? Which school did He remind of by uttering ‘the same’? Hm?
(Someone said something.) Yes. Hm? In the beginning, deep meanings of the Gita used to be narrated, weren’t they? So, it is the same Gitapathshala. Look, there is no such Gitapathshala in this because those Satsangs (spiritual gatherings) of the Sanyasis, etc. in the world cannot be called a pathshala (school). Hm? They have simply been named Satsang. Is it Sat (truth)? Hm? Is there anyone true among those Sanyasis? Hm? Why? Why cannot anyone be true among them? Hm? Arey, it has been written in the Gita – Nasato vidyate bhaavo na bhavo vidyate satah (Gita 2/16) There is never a dearth of truth in this world. And those Sanyasis? Hm? They come in between and then depart. Hm? Do they pass through the entire world cycle? Do they remain? Do they remain? Hm? Those sanyasis do not remain. So, are they true? The untruth does not sustain. Hm? And the truth remains sustainable forever.

So, they name it Satsang. So, the actual topic is of this place, where in this human world, even if mega-destruction takes place in the end of the Kalpa, yet, that truth definitely remains in this world. Who is it? Hm? There is never any dearth of that truth in this world at all. He is called ShivBaba. What has been said in the Brahmavaakya Murli, Vedvaakya also? Hm? It has been said - There is nothing forever in this world. There is nothing permanent. It is ShivBaba alone who remains forever. What? ShivBaba. It was not said – Father Shiv. Hm? What is meant by Father Shiv? The Father of souls whose soul’s name itself is Shiv. He is just a Father of the souls. There is no other relationship. Yes, when He comes in this world, hm, after leaving the Soul World, the Supreme Abode, then whichever human body, the hero actor in whom He enters, then what happens? Hm? In this world; hm?
(Someone said something.) Yes; when He comes to this corporeal world, in the corporeal Father of the human world, then He makes him equal to Himself; hm? And He maintains all the relationships. This is why it has been written in the Gita – Ye yatha maam prapadyante taamstathaiv bhamyaham. (Gita 4/11) I give company to anyone through the same relationship through which he remembers Me. What? Each one has his own feelings because the sanyasis do not have any aim-object. And here? Here, there is an aim-object. What? That you have to become Narayan from nar (man). You have to become Lakshmi from naari (woman). In the satsangs (gatherings) of those Sanyasis, it is not told that if you attend this satsang, if you listen daily, then you will become Narayan from nar, become deities. No.

They have named that Satsang falsely as Satsang (company of truth). Arey! This is the true Satsang. What? This refers to what? Whose company (sang)? The company of truth (sat). Hm? The one who is forever truth in this world, never vanishes, is only one actor soul. Who? The one who is called Shivshankar Bholenath. Hm? His memorials, the Shivlings have been found in every village, every city in the excavations all over the world, haven’t they been? Hm? What was the name coined? Shivling. Hm? Shiv is incorporeal, point of light; there is no length, breadth, measurement for Him at all. What has been written in the Gita? Aprameya. (Gita 11/17) What? There is no measurement of the point. Is there any measurement of point? Is there any length or breadth? No. So, He is so subtle that nobody can even think of it. What? Can anyone think of the minutest thing? If the form is slightly bigger, then it can come to the mind. He is unthinkable (achintya). Hm? So, this is why in the last mega-destruction (mahaavinaash), the founders of religions who believe in the incorporeal also become tired. Then what do they do? Some think of the corporeal. Hm? Which corporeal? The one who is forever true in this world. Who? One ShivBaba. Why was it said Baba? That Shiv in an incorporeal stage is also present, hm, the point of light is also present and the corporeal is also present. So, there is aim-object along with the company of truth. What? What is the aim-object? Hm? There is an aim-object of the truth; who is truth? Hm? ShivBaba. ShivBaba, who becomes the master of the world, hm, obtains the emperorship of the entire world; so, what would He give? Hm? If a Father is wealthy, he would give wealth. Hm? If he is multimillionaire, he will give the inheritance of multi-millions. What is this Father? Master of the world. So, what does he give? Hm? He gives the emperorship of the world. Hm? Emperorship means kingship.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 06 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2467, आडियो 2953, दिनांक 25.03.2018
VCD 2467, Audio 2953, Date 25.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2467-Bilingual

समय- 00.01-15.35
Time- 00.01-15.35

रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. दूसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – राजा हो इस दुनिया में, कलियुग के अंत में या प्रजा हो, यथा राजा तथा प्रजा सब भ्रष्टाचारी। एक भी श्रेष्ठ इन्द्रियों से आचरण करने वाला नहीं। जैसे स्वर्ग में देवताएं होते हैं, सुखदायी, श्रेष्ठ इन्द्रियों से आचरण करने वाले होते हैं, ऐसा इस द्वापरयुग से जो दुनिया द्वैतवादी तैयार होती है देहधारी धर्मपिताओं के द्वारा नंबरवार, उसमें जो भी राजा बनते हैं, जिस धरम में भी, जिस धरमखण्ड में भी वो कोई भी ऐसे नहीं हैं जो श्रेष्ठ इन्द्रियों से आचरण करने वाले हों। भ्रष्ट इन्द्रियों में भी जो सबसे भ्रष्ट इन्द्रिय है, सबसे जास्ती दुःखदायी है कामेन्द्रिय, काम महाशत्रु है, गीता में भी बोला ना। तो वो उसी इन्द्रिय से भ्रष्ट आचरण करते हैं। भ्रष्ट आचरण क्या होता है? दुःख देना। श्रेष्ठ आचरण क्या होता है? सुख देना। तो हाँ, भ्रष्टाचारी दुनिया में सब भ्रष्टाचारी।

इस कांटों के फॉरेस्ट में, ये दुनिया कांटों का जंगल है; कबसे? जैसे कांटा लगता है ना। कितना दुःख-दर्द होता है। ऐसे जब संतान पैदा की जाती है तो जो कन्या है उसको कितना न दुःख होता होगा। ऐसे कांटा लगाते हैं जो इस दुनिया के बबूल के कांटे भी उतना दुःख नहीं देते। तो ये कांटों का फॉरेस्ट है। मनुष्यात्माएं तो क्या, हर प्राणी मात्र कांटा लगाने वाला है। इस कांटों के जंगल में तुमने आकरके फूल का जन्म लिया है। क्या? औरों ने आकरके जन्म नहीं लिया। तुम आए हो बाप के पास जन्म लेने के लिए पहले-पहले। क्या? तुमने माने? जो रुद्र ज्ञान यज्ञ रचा गया यज्ञ के आदि में, जिसका नाम ही है अविनाशी रुद्र ज्ञान यज्ञ। कैसा रुद्र? अविनाशी रुद्र। हँ? रुद्र शंकरजी को कहते हैं ना। तो कहते हैं शास्त्रों में शंकर का, शरीर का कभी नाश होता ही नहीं। वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर ऐसा हीरो पार्टधारी है जो सदा कायम रहता है। हँ?

तो इस कांटों के जंगल में तुमने आकरके जन्म लिया है। आकरके। किसके पास आकरके? हँ? रुद्र ज्ञान यज्ञ में तो पहले महारुद्र होगा ना। हँ? रुद्र ज्ञान यज्ञ नाम क्यों पड़ा? क्योंकि रुद्र के द्वारा आरंभ होता है ना प्रैक्टिकल में। तो जिस महारुद्र के द्वारा इस ज्ञान यज्ञ का फाउण्डेशन पड़ा है वो महारुद्र के तुम प्रैक्टिकल बच्चे हो। रुद्र गण। क्या? जिनकी याद, जिनकी यादगार रुद्राक्ष के मणके कहे जाते हैं। हँ? वो रुद्राक्ष के मणके, वो बीज कौनसे देश में मिलते हैं? हँ? नेपाल देश में। वो भी यादगार देश है। जब भगवान इस सृष्टि पर आते हैं कलियुग के अंत में, सतयुग के आदि के संगम में, ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग पीरियड में आते हैं, उस समय पहले-पहले तुम रुद्रगणों की रचना करते हैं। क्या? नंबरावार पुरुषार्थ अनुसार। तो तुमने आकरके नंबरवार। आकरके। क्या? किसके पास आकरके? हँ? वो महारुद्र जिसमें शिव आकरके प्रवेश करते हैं उसके पास आकरके तुमने जन्म लिया है। काहे का जन्म लिया है? कांटों का या फूल का? हँ? फूल का जन्म लिया है। फूल क्या? फूल बहुत हल्का होता है। तो वो सुप्रीम सोल बाप उस महारुद्र का पार्ट बजाने वाले में आकरके तुमको तुम्हारी आत्मा का परिचय देते हैं। क्या? कि तुम हल्की-फुल्की ज्योतिबिन्दु आत्मा हो। तुम शरीर नहीं हो। तो जितना हल्का होगा उतना सुखदायी। और जितना भारी होगा उतना वजनीली, दुखदायी होगा।

तो जैसे तुमने आकरके जन्म लिया तो फूल बने। हँ? और किसके द्वारा फूल बने? हँ? अभी तुम फूल बने हो, इस पुरुषोत्तम संगमयुग में, शूटिंग काल में, तो किसके द्वारा फूल बने हो? हँ? द्वारा। मीडिया कौन बना? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) नहीं। तुम फूल बने हो, तुमने जन्म लिया है, तो जो रुद्र गण होते हैं वो; बड़े ते बड़ा रुद्रगण महारुद्र। शंकर को यज्ञोपवीत दिखाते हैं या नहीं दिखाते हैं? हँ? दिखाते हैं ना। तो ब्राह्मण हुआ या शूद्र हुआ? ब्राह्मण। तो चोटी का ब्राह्मण है। पहला-पहला ब्राह्मण। उस ब्राह्मण में, चोटी के ब्राह्मण में वो शिव, आत्माओं का बाप, सुप्रीम सोल प्रवेश करते हैं पहले-पहले और उसे; क्या? नाम देते हैं। क्या नाम देते हैं? हँ? ब्रह्मा। चूंकि ब्रह्मा नामधारियों में वो परे ते परे स्टेज वाला ब्रह्मा है, इसलिए उसको शास्त्रों में परमब्रह्म कहा गया। क्या? कहते हैं ना गुरुर्ब्रह्मा गुर्रर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुर्साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरुवै नमः। तो, जैसे दादा लेखराज ब्रह्मा पुरुष शरीर में शिव प्रवेश करते हैं तो नाम देते हैं ब्रह्मा। फिर बाद में कोई ब्रह्माकुमार-कुमारी उनका नाम नहीं लेता दादा लेखराज। क्या कहता है? ब्रह्मा बाबा। तो ऐसे ही इस ज्ञान यज्ञ के आदि में जब इस ब्राह्मणों के संगठन का नाम था ओम मंडली, हँ, तो नाम दिया परमब्रह्मा। ऊँचे ते ऊँचा, परे ते परे स्टेज में रहने वाला ब्रह्मा। उस ब्रह्मा के द्वारा तुम क्या बने? हँ? एक ही अक्षर से पता चल जाता है – ब्राह्मण बने। ब्रह्मा की औलाद ब्राह्मण। शिव के फालोअर्स शैव। विष्णु के फालोअर्स वैष्णव। एक मात्रा बढ़ती है ना फालोअर्स या बच्चे के अर्थ में। तो तुम पहली-पहली, हँ, पीढ़ी के ब्राह्मण बने। कैसे साबित होता है ब्राह्मण? ब्रह्मा की औलाद हुए तो ब्राह्मण।

नंबरवार ब्राह्मण हैं। उनका संगठन भी है। संसार में प्रसिद्ध है रुद्रमाला। हँ? उसमें लेफ्ट साइड के भी मणके हैं तो राइटियस साइड के भी मणके। इस दुनिया के बीज हैं। ये बीज रूप आत्माओं की दुनिया की माला है। माला माने संगठन। तो उस माला के तुम आत्मा रूपी मणके हो। हँ? जब तुम आकरके बाप के पास वो मणके बने आत्मा रूपी, हँ, तो क्या हुआ? फूल बन गए। क्या? पहले शूद्र थे। क्या थे? शूद्र थे। फिर क्या बन गए? ब्राह्मण बन गए। गीता में बोला है ना। मैं आता हूँ तो चातुर्वर्ण्यम मयासृष्टम गुणकर्म स्वभावशः। (गीता 4/13) गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर तुम इस शूटिंग पीरियड में जैसा-जैसा पार्ट बजाते हो, उस पार्ट के अनुसार वैसा ही काम के आधार पर तुम्हारी जाति का नाम, वर्ण का नाम पड़ जाता है – ब्राह्मण वर्ण, क्षत्रीय वर्ण, विशियस वैश्य वर्ण या क्षुद्र कर्म करने वाला शूद्र।

तो देखो, बाबा द्वारा तुम क्या बन गए? ब्राह्मण बन गए। किन्तु ये जो दुनिया है, भले तुम ब्राह्मण बन गए, जिस दुनिया में तुम रहते हो, वो क्या है? हँ? क्या है? कांटों का जंगल है। कांटों के जंगल में तुम रहते हो। हँ? फॉरेस्ट आफ थार्न्स के बीच में रहते हो। एक दो को दुख ही देते रहते हैं इस कांटों के जंगल में। मनुष्यों से लेकरके राक्षसों की इस दुनिया में कलियुग के अंत में एक भी प्राणीमात्र नहीं है जो काम विकार की कामेन्द्रिय से दुःख का फाउण्डेशन न डालता हो। क्या? बच्चे की पैदाइश अगर आरंभ में ही दुःख होगा तो मध्य और अंत में भी दुःख ही का जनम मिलता है। तो बस एक ही तुम हो जो कांटों से फूल बनाने वाले हो। क्या? तुम एक ही रुद्रगण हो रुद्र नामधारी जो इस कांटों के जंगल को क्या बनाते हो? कांटों से फूल बनाते हो। बनाते हो ना? तो उसके निमित्त तुम बनते हो। कांटों से फूल बनाने के लिए अव्वल नंबर निमित्त तुम बनते हो। फूल बनाने वाले हो इस दुनिया को, दुनिया के प्राणीमात्र को। क्योंकि अभी क्या हो गया? ये बगीचा हो गया तुम ब्राह्मणों का। क्या? बगीचा कैसे बनता है? कांटों का जंगल कैसे बनता है? कांटों का जंगल बनता है जब बरसात नहीं होती है, पानी नहीं मिलता है, तो जंगल बन जाता है। और पानी मिलता है तो सरसब्ज़ हो जाता है, बगीचा बन जाता है। ये स्थूल पानी की बात नहीं है, स्थूल जल की बात नहीं है। यहाँ तो ज्ञान जल की बात है। तो तुमको ज्ञान जल से बाप आकर सींचते हैं। तो तुम कांटों के जंगल के बीच में भी क्या बन गए? हँ? बगीचे के फूल बन जाते हो।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the second page was – Be it a king (raja) or the subjects (praja) in this world, in the end of the Iron Age, like the king all the subjects are also unrighteous. Not a single person acts through righteous organs. For example, there are deities in the heaven, they give happiness, they act through righteous organs; such dualistic world gets ready from the Copper Age by the bodily founders of religions numberwise; all those who become kings in it, in any religion, in any religious land, there is none who acts through the righteous organs. Even among the unrighteous organs, the most unrighteous organ, which causes maximum sorrows is the organ of lust; it has been said in the Gita also that lust is the biggest enemy, is not it? So, they act through that organ only. What is unrighteous act? To give sorrows. What is righteous act? To give happiness. So, yes, everyone is unrighteous in the unrighteous world.

In this forest of thorns; this world is a jungle of thorns; since when? For example, when one gets pricked by a thorn one feels so much pain and sorrow. Similarly, when a child is given birth, then the virgin must be experiencing so much pain. They prick with such thorns that even the thorns of the Babool tree of the world do not cause as much pain. So, this is a forest of thorns. Not just the human souls, but every living being pricks with a thorn. In this jungle of thorns you have come to be born as a flower. What? Others did not come and get birth. You have come to the Father to get birth first of all. What? You refers to whom? The Rudra Gyan Yagya that was created in the beginning of the Yagya, whose name itself is imperishable Rudra Gyan Yagya; what kind of Rudra? Imperishable Rudra. Hm? Shankarji is called Rudra, is not he? So, it is said in the scriptures that Shankar, his body is never destroyed. He is such hero actor on this world stage who remains permanently. Hm?

So, you have come and taken birth in this jungle of thorns. Come and. By coming near whom? Hm? There will first be Maharudra in the Rudra Gyan Yagya, will he not be? Hm? Why was the name Rudra Gyan Yagya coined? It is because it is started by Rudra in practical, is not it? So, the Maharudra through whom the foundation of this Gyan Yagya was laid, you are practical children of that Maharudra. Rudra gan. What? Their memorials are called the beads of Rudraksh. Hm? In which country are those beads, seeds of Rudraksh found? Hm? In Nepal. That is also a memorial country. When God comes in this world, in the confluence of the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age, when He comes in the shooting period of the broad drama, at that time first of all He creates you Rudragans. What? Numberwise as per your purusharth. So, you came and numberwise. Came and. What? By coming to whom? Hm? You have come to the Maharudra, in whom Shiv comes and enters and have got birth. Which birth have you taken? As thorns or as flowers? Hm? You have been born as flowers. How is a flower? A flower is very light. So, that Supreme Soul Father comes in the one who plays the part of Maharudra and gives you the introduction of your soul. What? That you are a light, point of light soul. You are not a body. So, the lighter you are the more happiness you will give. And the heavier you are, the more sorrows you will give.

So, just as you came and got birth and became a flower. Hm? And through whom did you become a flower? Hm? Now you have become a flower in this Purushottam Sangamyug, in the shooting period; so, through whom have you become a flower? Hm? Through. Who became the media? Hm? (Someone said something.) No. You have become a flower. You have got birth; so, the Rudragans; the biggest Rudragan is the Maharudra. Is Shankar shown to wear yagyopavit (sacred thread) or not? Hm? They show, don't they? So, is he a Brahmin or a Shudra? A Brahmin. So, he is the highest Brahmin. The first and foremost Brahmin. That Shiv, the Father of souls, the Supreme Soul enters in that Brahmin, the highest Brahmin first of all and then; what? Names him. Which name does He assign to him? Hm? Brahma. Since he is the Brahma with the highest stage among all those who hold the name Brahma; this is why he has been called Parambrahm in the scriptures. What? It is said – Gururbrahma Gururvishnu Gururdevo Maheshwarah. Gurursaakshaat Parambrahm tasmai shri Guruvai namah. So, for example, when Shiv enters in the male body of Dada Lekhraj Brahma, then He names him Brahma. Then, later on, no Brahmakumar-kumari utters his name as Dada Lekhraj. What does he say? Brahma Baba. So, similarly, in the beginning of this Gyan Yagya, when the name of this gathering of Brahmins was Om Mandali, hm, then he was named Parambrahma. The Brahma who lives in the highest, farthest stage. What did you become through that Brahma? Hm? It can be known from just one word – you became a Brahmin. Brahma's children Brahmins. Followers of Shiv – Shaiv. Followers of Vishnu – Vaishnav. One syllable increases in the sense of followers or children. So, you became the Brahmins of the first and foremost, hm, generation. How are Brahmins proved? When you became the children of Brahma, then you became Brahmins.

Brahmins are numberwise. Their gathering is also present. Rudramala is famous in the world. Hm? There are beads on its left side as well as beads on its righteous side. They are the seeds of this world. This is a rosary of the world of seed form souls. Rosary means gathering. So, you are souls like beads of that rosary. Hm? When you came to the Father and became the soul like bead, hm, then what happened? You became flowers. What? You were Shudras earlier. What were you? You were Shudras. Then, what did you become? You became Brahmins. It has been said in the Git - When I come, then Chaaturvarnyam mayaasrishtam gunkarma swabhaavashah. (Gita 4/13) As is the part that you play on the basis of your virtues, actions and nature in this shooting period, then as per that part, on the basis of the tasks performed, the name of your caste, class is assigned – Brahmin class, Kshatriya class, vicious Vaishya class or Shudras who perform lowly actions.

So, look, what did you become through Baba? You became Brahmins. But as regards this world, although you became Brahmins, what is the world where you live? Hm? What is it? It is a jungle of thorns. You live in the forest of thorns. Hm? You live amidst forest of thorns. They keep on giving sorrows in this jungle of thorns. In this world consisting of human beings to demons there is not even a single living being in the end of the Iron Age who does not lay the foundation of sorrows through the organ of lust of the vice of lust. What? In the process of reproduction, if there is sorrow in the beginning itself, then you get the birth of sorrows in the middle and the end also. So, it is you alone who make flowers from thorns. What? You are the only Rudragans with the name Rudra who transform this jungle of thorns to what? You transform thorns to flowers. You make, don't you? So, you become instrumental for it. You become number one instrumental to make flowers from thorns. You are the ones who make this world, the living beings of this world as flowers because what has it become now? This is a garden of you Brahmins. What? How does it become a garden? How does it become a jungle of thorns? It becomes a jungle of thorns when there is no rainfall, when it doesn't get water, then it becomes a jungle. And when it gets water it becomes green, it becomes a garden. It is not about physical water. Here it is about the water of knowledge. So, the Father comes and irrigates you with the water of knowledge. So, what did you become even amidst the jungle of thorns? Hm? You become flowers of garden.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2468, आडियो 2954, दिनांक 26.03.2018
VCD 2468, Audio 2954, Date 26.03.2018
रात्रि क्लास 16.5.1967
Night Class dated 16.5.1967
VCD-2468-Bilingual

समय- 00.01-21.20
Time- 00.01-21.20

रात्रि क्लास चल रहा था – 16.5.1967. दूसरे पेज के अंतिम लाइन में बात चल रही थी –कि कोई नहीं समझते हैं तो भी किसको समझाना होता है, उनको एकदम, फट से बोलो, परमपिता परमात्मा की पहचान बताओ कि इनसे तुम्हारा क्या संबंध है? बोलेंगे बाप है। तो बाप से तो वर्सा मिलेगा ना। बाप से जन्म मिलता है आदि में। और अंत में वर्सा मिलता है। और ये तो बेहद का बाप है ना। हद का बाप हद की प्रापर्टी देगा। और ये बेहद का बाप तो बरोबर स्वर्ग का वर्सा देगा ना। अंग्रेजों में गाया हुआ है ना हैविनली गॉड फादर। और वो हैविनली गॉड फादर कहता भी क्या है? आकरके कहता है बच्चे अब देह सहित देह के जो भी तुम्हारे संबंध हैं, उनको छोड़करके अपन को आत्मा निश्चय करो। कि तुम ज्योतिबिन्दु आत्मा हो। भरी-पूरी भृकुटि में रहने वाली आत्मा हो। अभी देहभान को छोड़ो। और देहीअभिमानी बनो। देही माना ही आत्मा। देह को धारण करने वाली। देही अभिमानी बनो और मेरे को याद करो। अभी तक बुद्धि में बैठा था कि हम देह हैं, तो देह तो विनाशी है ना। आज है और कल नहीं होगी। रुह तो अविनाशी है ना। सोल को अविनाशी कहते हैं ना। तो मैं आत्माओं का बाप हूँ। आत्माएं अविनाशी तो बाप भी अविनाशी। तो मेरे को याद करो।

तुम्हारे जो धरमपिताएं हैं, वो भी देह अभिमानी। देह की इन्द्रियों का आचरण करना सिखाया। उनमें भी जो भ्रष्ट कर्म करने वाली भ्रष्ट इन्द्रियां हैं उनका आचरण करना सिखाया। मैं तो आत्मा हूँ ना। मुझ सुप्रीम सोल को देह तो नहीं है ना। अपनी देह नहीं है। तो तुम मेरे को याद करेंगे तो तुम्हारे सब विकर्म विनाश हो जाएंगे। क्योंकि विपरीत कर्म किये ही जाते हैं भ्रष्ट इन्द्रियों से। किसके विपरीत? जो आत्माओं के बाप ने बताया रास्ता, गीता ज्ञान का रास्ता, आत्मिक स्थिति में रहने का रास्ता, स्वधर्म में टिकने का रास्ता उससे विपरीत चले गए। अभी अपन को आत्मा समझ आत्मा के बाप को याद करेंगे तो देह से किये हुए जो भी विपरीत कर्म हैं, वो सब नष्ट हो जाएंगे। और सब कोई वर्सा लेंगे। आत्माओं के बाप से, आत्मा बनेंगे, आत्मिक स्थिति में टिकेंगे तो वर्सा लेंगे। बाकि कोई कम टिकते हैं, कोई जास्ती टिकते हैं, ये तो अपने-अपने पुरुषार्थ के ऊपर है। पुरुषार्थ माना ही शरीर रूपी पुरी में शयन करने वाली जो आत्मा है उस आत्मा के लिए जो प्रयास किया जाए, प्रयत्न किया जाए, देह के लिए नहीं। देह की प्राप्ति के लिए नहीं। देह इसी जनम में खत्म हो जाएगी। और आत्मा सदाकाल रहेगी। तो ये सदाकाल की प्राप्ति का पुरुषार्थ करना है। फिर जितना जो श्रीमत पर चलते रहेंगे, कदम-कदम पर चलते रहेंगे, वो तो धोखा नहीं खाएंगे। एक कदम पर श्रीमत पर चलेंगे, दूसरा कदम उठाएंगे, परमत पर चलेंगे, मनमत पर चलेंगे, तो धोखा खा जावेंगे।

अभी ढ़ाई हज़ार साल से जबसे ये देहअभिमानी धरमपिताएं आए, इन्होंने देहभान के कर्म करना सिखाए, तो धोखा ही खाते आए हो ना, नीचे ही गिरते आए हो ना। तो रिस्पांसिबुल बन जाते हैं। जिन्होंने धोखा खिलाया वो भी रिस्पांसिबुल बनते हैं; जो बार-बार जन्म-जन्मान्तर धोखा खाते आए हैं वो भी रिस्पांसिबुल। ये है कि श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कौन है उस मनुष्य सृष्टि के हीरो पार्टधारी को पहचानो। उस श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ की मत पर चलो, तो तुम्हारे पाप नहीं होंगे। क्योंकि जो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ है, बनता है, वो मेरी मत पर ही बनता है। नहीं तो औरों के संग के रंग में आने से गिरता है।

और यहाँ तो बाप के साथ धरमराज भी है। धारणाओं का राजा। तो मेरे हाथ में है धरमराज। मेरा राइट हैण्ड है। क्या? राइट हैण्ड माने? अच्छे से काम करने वाला। तो वो देखते हैं, धरमराज देखते हैं, ऐसे नहीं समझना कि अभी नहीं देखते हैं। जैसे मैंने इन आँखों का लोन लिया है, ऐसे धरमराज भी इन आँखों से देखते हैं। जिस मनुष्य तन में मैं प्रवेश करता हूँ, उन्हीं आँखों से देखते हैं कि आत्माओं का बाप, इन आत्माओं को मत देते हैं। तो जो उस मत पर चलते हैं, फिर तो उनका खाता उलटी तरफ जाएगा ही। नहीं चलते हैं तो नहीं जाएगा। तो अभी तो ढ़ाई हज़ार वर्ष से परमत पर चलते-चलते, देहधारियों की मत पर चलते-चलते दुःख का खाता बनाया। दुनिया में दुःख बढ़ता ही गया ना। तो अभी अपना सुख का खाता जमा करना है। क्या? सत्वप्रधान से जो सदा सत्व, सत्व की दुनिया में रहने वाला है, सतधाम का रहने वाला है, उस सतधाम के रहने वाले, सुप्रीम अबोड में रहने वाले बाप, आत्माओं के बाप से सुख का रास्ता मिलता है। तो अभी मिल रहा है ना। तो अपने सुख को जमा करना है। दुख का जो ‘न’ है ना, उसको चुक्तू करना है। क्या? पास्ट का क्या करना है? चुक्तू करना है। पास्ट में जो पाप कर्म हुए हैं मनमत पर चलने से, और देहधारी मनुष्यों की परमत पर चलने से, उन पाप के खाते को चुक्तू करना है। कैसे करेंगे? एक की मत पर चलने से चुक्तू होगा। एक है सच्चा ज्ञान देने वाला। बाकी इस दुनिया में हैं सब अज्ञान अंधकार में ले जाने वाले।

तो मैं निराकार निराकार आत्माओं का बाप जिस साकार हीरो पार्टधारी के तन में आया हुआ हूँ, और कल्प-कल्प आता हूँ, जिस साकार में सदा निराकार प्रवेश करता है, तो साकार और निराकार दोनों के मेल को बाबा कहा जाता है। भक्तिमार्ग में भी कहते आए हो ना शिवबाबा। किसको कहते आए हो? उसी को कहते आए हो शिवलिंग को, जिसका सात्विक रूप सोमनाथ मन्दिर में दिखाया गया था। भक्तिमार्ग भी चार अवस्थाओं से पसार होता है। सत्वप्रधान, सत्वसामान्य, रजो और तमो। तो जो शिवलिंग की पूजा हुई है द्वापर के आदि में सात्विक रूप पूजा जाता था क्योंकि उसमें स्पष्ट रूप से आत्मिक स्थिति की यादगार हीरा दिखाया गया जो स्वयं प्रकाशित है, ज्योतिर्मय और निराकार की यादगार। निराकार आत्माओं के बाप निराकार शिव को याद किया, तो जिसने अव्वल नंबर में याद किया वो बाप समान बन जाता है, शिव समान बन जाता है। इसीलिए शिव का नाम उस शरीरधारी कहो, मूर्तिमान कहो, शंकर के साथ जोड़ा जाता है। उसको तुम कहते आए हो ढ़ाई हज़ार वर्ष से भक्तिमार्ग में शिवबाबा। अर्थात् उसमें निराकार ज्योति है बिन्दु के रूप में जो हीरे के रूप में दिखाया क्योंकि वो हीरो पार्टधारी भी है। मनुष्य सृष्टि पर भले गुप्त पार्ट बजाता है, कोई पहचान नहीं पाता, फिर भी, सब पार्टधारियों के बीच में श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ जन्म-जन्मांतर पार्ट बजाने वाला है।

तो वो हीरा उसी की यादगार है। बाकी शिव क्यों कहते हैं? इसीलिए कहते हैं कि मेरा तो विरुद है – मैं जब इस सृष्टि पर आऊँगा तो तुम आत्मा रूपी बच्चों को नंबरवार आप समान बनाके जाऊँगा। तो जो अव्वल नंबर में मेरे समान निराकारी स्टेज वाला बनता है; निराकारी का मतलब है – नो संकल्प एट आल, सिवाय इस शिव ज्योतिबिन्दु की याद के। इसलिए गीता में भी कहा है – न हि असंन्यस्तसंकल्पः योगी भवति कश्चन्। (गीता 6/2) ये कैसे हो सकता है कि जिसने अपने समस्त संकल्पों को त्याग नहीं किया है उसे योगी नहीं कहा जा सकता। क्या? अपने सारे संकल्पों जो जन्म-जन्मान्तर एक के संकल्प न मिले दूसरे से, वो सारे संकल्पों को एक श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ हीरो पार्टधारी के संकल्प में तिरोहित कर देना। जैसे समन्दर से एक चुल्लू पानी लिया जाए और उसे उसी में मिला दिया जाए तो वो क्या कहा जाएगा? सागर हो गया ना। तो बाबा की मत पर चलने से तुम्हारे पाप भस्म हो जावेंगे। क्योंकि जिस साकार को तुम बाबा कहते हो, जिसकी यादगार शिवलिंग बनाई जाती है, जो शिवलिंग भक्तिमार्ग में ढाई हज़ार साल से सारी दुनिया में, भारत के गांव-गांव, शहर-शहर में यादगार बनी हुई है, दुनिया में खुदाइयाँ हुई हैं, उनमें सबसे पुरानी लिंग मूर्ति ही मिली है।

तो वो सार्वभौम मूर्ति संसार में वो ही भगवान के प्रैक्टिकल पार्ट की यादगार है। उसमें जो लिंग है, कहा जाता है शिवलिंग लेकिन मेरा नाम शिव है। मेरा नाम कभी बदलता नहीं। मेरी आत्मा का ही नाम शिव है। तुम बच्चे भी आत्मा हो, लेकिन तुम्हारी आत्मा का नाम नहीं होता। क्योंकि तुम तो शरीर से जन्म लेकर जन्म-जन्मान्तर पार्ट बजाते आए। इसलिए तुम सबके शरीरों का नाम पड़ता है। और वो शरीर से जैसे काम करते वैसी यादगार शास्त्रों में तुम्हारा नाम पड़ा। तो जो शिवलिंग नाम पड़ा हुआ है वो शिव का लिंग नहीं है। शिव को तो शरीर रूपी इन्द्रियां होती ही नहीं। तो लिंग इन्द्रिय कहाँ से होगी? हाँ, शिव समान 100 परसेन्ट जो निराकारी बनता है पुरुषार्थ करके उसके लिए कहा जाता है शिवलिंग। अर्थात् उसका जो शरीर है वो आत्मा की ही तरह अविनाशी बन जाता है। जैसे आत्मा अविनाशी शरीर भी अविनाशी। इस सृष्टि चक्र में सबके शरीर महाविनाश में कल्पांतकाल में नष्ट हो जाते हैं, लेकिन उसका शरीर नष्ट नहीं होता। क्यों नहीं होता? क्योंकि शरीर से, शरीर की कर्मेन्द्रियों से उसने मुझ निराकार की स्मृति में रहकर ऐसे पार्ट बजाया है कि उसे देह की, देह की कर्मेन्द्रियों की, देह की कर्मेन्द्रियों से जो भोग का रस मिलता है वो रस उसने लिया ही नहीं। इसलिए वो देह विनाशकाल में भी अविनाशी बन जाती है। इसलिए वो साकार निराकार का मेल शिवलिंग शिवबाबा कहा जाता है। जिस शिवबाबा की यादगार शिवलिंग है वो शिवबाबा इस समय प्रैक्टिकल चैतन्य में पार्टधारी है। उसकी मत पर चलने से तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप चुक्तू हो जावेंगे।

A night class dated 16.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last line of the second page was – Even if nobody understands, if you have to explain to anyone, then tell them immediately – Give the introduction of the Supreme Father Supreme Soul that what is your relationship with Him? They will say – He is our Father. So, you will get inheritance from the Father, will you not? You get birth from the Father in the beginning. And you get inheritance in the end. And this is the unlimited Father, is not He? Limited Father will give limited property. And this unlimited Father will definitely give the inheritance of heaven, will he not? It is sung among the Englishmen – Heavenly God Father. And what does that Heavenly God Father say? He comes and says – Children, now leave all your relationships of the body including your body and consider yourself to be a soul that you are a point of light soul. You are a soul living in the middle of the forehead (bhari-poori bhrikuti). Now leave the body consciousness. And become soul conscious (dehi abhimaani). Dehi itself means soul. The one which assumes the body. Become soul conscious and remember Me. Till now your intellect was under the impression that we are bodies; so, body is perishable, is not it? It is present today and it will not be present tomorrow. Soul is imperishable, is not it? Soul is called imperishable, is not it? So, I am the Father of souls. When the souls are imperishable, then the Father is also imperishable. So, remember Me.

Your founders of religions are also body conscious. They taught to act through the organs of the body. Even among them, they taught to act through the unrighteous organs, which perform unrighteous actions. I am a soul, am I not? I, the Supreme Soul do not have a body, do I? I do not have a body of My own. So, if you remember Me, then all your sins will be burnt because the opposite actions are performed only through the unrighteous organs. Opposite to what? The path that the Father of souls narrated, the path of the knowledge of the Gita, the path of being in a soul conscious stage, the path of being constant in the swadharma; you went against it. Now, if you consider yourself to be a soul and remember the Father of souls, then all the opposite actions performed through the body will be destroyed. And everyone will obtain the inheritance. If you become a soul, if you become constant in soul conscious stage, then you will obtain inheritance from the Father of souls. But some become constant to a lesser extent, some become constant to a greater extent; this is dependent on one's own purusharth. Purusharth itself means that the soul which rests in the body like abode (puri), whatever effort is made for that soul, not for the body, not for the attainments related to the body, the body will end in this birth itself. And the soul will remain forever. So, you have to make purusharth for the attainments forever. Then the more someone follows the Shrimat, the more someone follows Shrimat at every step, they will not get cheated. If you take one step in accordance with Shrimat and the second step on others' direction (parmat) or on the direction of your own mind (manmat), then you will be cheated.

Ever since these body conscious founders of religions came since 2500 years, they taught to perform actions under the influence of body consciousness; so, you have been getting cheated only, you have been falling down only, haven't you? So, you become responsible. Those who made you get cheated also become responsible; those who have been getting cheated birth by birth are also responsible. You should recognise the most righteous one on this world stage, the hero actor of the human world. If you follow the directions of that most righteous one, then you will not accrue sins because the one who becomes the most righteous one becomes by following My directions only. Otherwise, he falls on getting coloured by others' company.

And here Dharmaraj is also there along with the Father. The king of dharana (inculcation). So, Dharmaraj is in My hands. He is My right hand. What? What is meant by right hand? The one who works nicely. So, he observes, Dharmaraj observes; do not think that he does not observe now. Just as I have taken the loan of these eyes, similarly, Dharmaraj also sees through these eyes. The human body in which I enter, he sees through these very eyes that the Father of souls gives directions to these souls. So, the account of those who follow those directions will definitely go in an opposite direction. If they do not follow it, then it will not go. So, now, while following the directions of others, while following the directions of bodily beings since 2500 years you accrued the account of sorrows. The sorrows went on increasing, did they not? So, now you have to accumulate your account of happiness. What? You get the path of happiness from Satwapradhan, from the Father of souls, who always lives in the world of satwa (purity), the abode of truth, the resident of the supreme abode. So, now you are getting it, aren't you? So, you have to accumulate your happiness. You have to settle the 'minus' of sorrows. What? What should you do to the past? You have to settle. You have to settle the sinful actions that you have performed in the past by following others' opinions and the opinions of bodily human beings. How will you do that? It will be settled by following the directions of one. One gives the true knowledge. All others in this world take you to the darkness of ignorance.

So, the corporeal hero actor's body in which I, the incorporeal, the Father of incorporeal souls have entered and come every Kalpa, the corporeal in which the forever incorporeal one enter, then the combination of corporeal and incorporeal is called Baba. You have been telling on the path of Bhakti also – ShivBaba. Who have you been calling? You have been calling the same Shivling, whose pure form was shown in the temple of Somnath. The path of Bhakti also passes through four stages. Satwapradhan, satwasaamaanya, rajo and tamo. So, the Shivling which was worshipped in the beginning of the Copper Age, was a pure form to be worshipped because the memorial of soul conscious stage, the diamond, which is self-luminous, form of light and a memorial of the incorporeal was depicted in it clearly. He remembered Shiv, the incorporeal Father of the incorporeal souls; so, the one who was number one in remembering Him becomes equal to the Father, becomes equal to Shiv. This is why the name of Shiv is joined with that bodily being, the personality Shankar. You have been calling him as ShivBaba since 2500 years, i.e. there is incorporeal light in the form of a point in it which was depicted in the form of a diamond because he is also a hero actor. Although He plays an incognito part in the human world, nobody is able to recognize, yet, he plays the most righteous part among all actors birth by birth.

So, that diamond is a memorial of that one only. But why is it called Shiv? It is said so because it is My promise that when I come to this world, then I will make you souls like children numberwise equal to Myself and go. So, the one who becomes number one in developing an incorporeal stage like Me; incorporeal means – No thoughts at all except the remembrance of this point of light Shiv. This is why it has been said in the Gita also – Na hi asanyastsankalpah yogi bhavati kashchan. (Gita 6/2) How can it be possible that the one who hasn't renounced his entire thoughts cannot be called a yogi? What? To merge all the thoughts of oneself, such thoughts which do not match each other birth by birth, to merge all those thoughts in the thought of one most righteous hero actor. For example, if you take a palm full of water from the ocean and then mix it with the same ocean again, then what will it be called? It became an ocean, did not it? So, by following Baba's directions your sins will be burnt because the corporeal whom you call Baba, whose memorial is formed as a Shivling, the Shivling which has been built as a memorial in the entire world, in every village, every city of India since 2500 years on the path of Bhakti; in the excavations conducted in the world, the most ancient thing found in them was an idol of ling only.

So, that universal idol in the world is the memorial of the practical part of God. The ling in it is called Shivling, but My name is Shiv. My name never changes. The name of My soul itself is Shiv. You children are also souls, but your souls doesn’t have name because you have been getting birth through a body and have been playing your parts birth by birth. This is why you all get names based on your bodies. And as are the tasks performed through those bodies, so are the names you get in the memorial scriptures. So, the name Shivling is not Shiv’s ling (phallus). Shiv does not have body like organs at all. So, how will He have an organ of phallus? Yes, the one who becomes 100 percent incorporeal like Shiv by making purusharth is called Shivling, i.e. his body becomes imperishable like the soul. Just as the soul is imperishable, the body is also imperishable. In this world cycle the bodies of everyone are destroyed in the mega destruction that takes place in the end of the cycle (Kalpa), but his body is not destroyed. Why isn’t it destroyed? It is because he has played such part through his body, through the organs of action of the body while being in My remembrance, the incorporeal one that he has not drawn the pleasure that you draw from the body, from the organs of action of the body at all. This is why that body becomes imperishable even in the period of destruction. This is why the combination of that corporeal and incorporeal, i.e. Shivling is called ShivBaba. ShivBaba, whose memorial is the Shivling, that ShivBaba is an actor in living form now in practical. By following His directions your sins of many births will be burnt.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 08 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2469, आडियो 2955, दिनांक 27.03.2018
VCD 2469, Audio 2955, Daate 27.03.2018
प्रातः क्लास 17.5.1967
Morning class dated 17.5.1967
VCD-2469-Bilingual

समय- 00.01-15.15
Time- 00.01-15.15

आज का प्रातः क्लास है - 17.5.1967. रिकार्ड चला है – भोलेनाथ से निराला। गौरीनाथ से निराला कोई और नहीं। ऐसा बिगड़ी को बनाने वाला कोई और नहीं। है तो फिल्मी गीत। हँ? फिल्में जब बनना शुरु हुई थी तब फिल्मी दुनिया के सतोप्रधान काल का गीत है या फिल्मी दुनिया के जवानी का गीत है या फिल्मी दुनिया की बुढ़ापे का गीत है? सतोप्रधान स्टेज का गीत है। दुनिया की हर चीज़, चाहे व्यक्ति हो, वस्तु हो, मकान हो, सागर हो, नदी हो, पहाड़ हो, सब चार अवस्थाओं से गुज़रते हैं। मुख्य हैं प्रकृति की तीन अवस्थाएं – सत, रज, तम। ये सारी सृष्टि ही प्र-कृति – प्र माने प्रकष्ठ, कृति माने रचना है। किसकी रचना है? हैविनली गॉड फादर सुप्रीम सोल की रचना है। वो आता है; क्योंकि आता है ना। इसलिए मुसलमान लोग कहते हैं खुदा। खुद आता है। कोई के बुलाने से नहीं आता। चाहे हिन्दू मन्दिरों में बैठ कितना ही बुलाएं, झांझ-मजीरा बजाएं, चाहे मुसलमान कितना ही चिल्लाएं, ऊपर को मुँह करके। चाहे गिरजाघर में क्रिश्चियन्स कितनी ही प्रार्थनाएं करें, और गुरुद्वारों में तो संगत बजती ही रहती है, तो कितना कुछ भी करें, भक्तिमार्ग में बुद्धि भटकाते रहतें, भगाते रहें; नाम ही है भक्ति। फिर भी मानवीय हिस्ट्री कहती है कि वो बुलाने से नहीं आता है। कौन? हैविनली गॉड फादर, जो हैविन की रचना करने वाला है। वो खुद आता है।

कब आता है? इस दुनिया में भी कोई बाप होते हैं, बच्चे मकान में बहुत दुःखी हो जाते हैं, मकान बहुत पुराना, दुखदायी हो जाता है, बहुत ही कम्प्लेन्ट्स आती हैं बच्चों की, तो बाप नया मकान बनाता है। पहले साज़-सामान रखने के लिए एक कमरा तो पहले जरूर बनाएगा। सारा साज़-सामान जब इकट्ठा हो जाए तो पुराने मकान को तोड़ देता है। तो वो खुदा कब आता है? खुद ही आता है लेकिन कब आता है? जब ये सृष्टि रूपी मकान इस सृष्टि की चौथी अवस्था कलियुग के अंत में अति पुराना हो जाता है, दुखदायी हो जाता है, तामसी बन जाता है। हर मनुष्यात्मा, हर प्राणीमात्र जब दुख ही दुख ज्यादा भोगता है; सुख अगर है तो क्षणभंगुर। तो देखो, वो खुदा, जिसे कहते हैं अल्लाह, जिसका मतलब होता है ऊँचे ते ऊँचा। क्या? अब ऊँचे ते ऊँचा की बात आती है तो इस साकारी दुनिया में ऊँच और नीच होते हैं। भेदभाव होता है। निराकारी दुनिया, जिसे खुदा का धाम अर्श कहते हैं, सोलवर्ल्ड कहते हैं, सुप्रीम एबोड, वहाँ तो सब ज्योतिबिन्दु-बिन्दु आत्माएं किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं। सब एक जैसे। तो इस दुनिया की बात है। क्या? अल्लाह मियाँ।

अब वो धरमपिता इस सृष्टि पर आए ढाई हज़ार वर्ष के अन्दर, इब्राहिम से लेकर महर्षि दयानन्द तक भी कहें, आर्य समाज के स्थापक। वो सब देह को महत्व देने वाले धरमपिताएं हैं। देह, जो पंचभूतों से बनती है। माते! समझा? क्या समझा? भौतिकवादी दुनिया को मानने वाले हैं और भौतिकवादी दुनिया बनाने वाले हैं पंच भूतों की। उसी को प्रिफरेंस देते हैं। वो भूल जाते हैं कि जन्नत के रचयिता हैविनली गॉड फादर ने तो सुख ही सुख की दुनिया बनाई थी। जहाँ दुख का नाम-निशान नहीं होता। कहते भी हैं हैविन, पैराडाइज़, जन्नत, स्वर्ग। हिन्दू लोग भी कहते हैं स्वर्ग। लेकिन ये नहीं जानते कि स्वर्ग किसे कहा जाता है। स्व माने ही आत्मा। कहते हैं स्वधर्मे निधनम् श्रेयः परधर्मो भयावह। (गीता 3/35) आत्मा के धर्म में टिकना बहुत श्रेष्ठ है।

आत्मा का धरम क्या है? अरे आत्मा है ही आत्मलोक की रहने वाली। शान्तिधाम की रहने वाली। तो शान्त स्वरूप ही होगी ना ओरिजिनल रूप में। तो ये बात ढ़ाई हज़ार वर्ष से, जबसे धर्मपिताएं आए, दूसरे-दूसरे धर्मों के वो इस बात को नहीं जानते कि हम देह हैं या देह के अलावा कुछ और हैं। क्योंकि देह तो विनाशी है। आज है, कल नहीं रहेगी। लेकिन देह में रहने वाली जो देह को धारण करने वाली देह को चलाने वाली, जो राजा के रूप में आत्मा है, वो तो सारे शरीर की इन्द्रियों का कंट्रोलर है ना। तो कहां रहती होगी? उत्तमांग कहते हैं। क्या? मस्तक। माथा। नेपाली लोगों ने नाम रखा है ना। क्या? सागरमाथा। तो मस्तक में भी जो खास स्थान है, जो आत्मा संपन्न और संपूर्ण है, अपने में ही, उसका भी स्थान भी ऐसा ही होना चाहिए। तो उसको कहा जाता है – भरी पूरी भृकुटि। उस भृकुटि में वो आत्मा इस शरीर में निवास करती है। लेकिन है क्या?

वो आत्मा ज्योति है। प्रकाश की ज्योति। ज्ञान प्रकाश की ज्योति। खास कर मनुष्यों में; मनुष्य नाम ही इसलिए पड़ता है कि वो मनन-चिंतनशील होता है। मन वाला होता है। मनु की औलाद कहा जाता है। तो वो आत्मा ज्योति स्वरूप है। उसकी ज्योति के कनेक्शन में सबसे नज़दीक रहने वाली इन्द्रियाँ कौनसी हैं शरीर की? आँखें। तो जो सबसे नज़दीक रहेगा वो सबसे जास्ती संग का रंग लेगा कि नहीं लेगा? तो वो आँखें ज्योति से भरपूर हैं। ज्योति है आँखों में तब तक आँखें देखती हैं। और जब वो आत्मा रूपी ज्योति उड़ जाती है तो आँखों की ज्योति खत्म, बटन जैसी आँखें हो जाती हैं। सब अनुभव करते हैं। लेकिन इस बात पर गहराई से विचार कोई नहीं कर पाता। क्योंकि ये विचार करने वाली बीज रूप आत्मा तो मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष में पहला नंबर बीज ही होगा ना। और इस मनुष्य सृष्टि का बीज हिन्दू, मुसलमान, और ईसाई या जो भी फालोअर्स हैं, धरम हैं, सब उसे मानते हैं, सृष्टि का आदि पुरुष कौन। नाम भी वैसा ही लेते हैं आदम। क्या? हिन्दुओँ में कहते हैं आदि देव। कैसा आदि देव? महादेव। देवताओं की सृष्टि जो हैविन में आकरके वो अल्लाह रचता है, प्रैक्टिकल में अल्लाह कहा जाता है क्योंकि जिस आदम में प्रवेश करता है उसके द्वारा ऊँच ते ऊँच कर्म करके दिखाता है। काम के आधार पर ही नाम पड़ते हैं शास्त्रों में।

Today's morning class is dated 17.5.1967. The record (song) played is – Bholenath se niraalaa. Gaurinath se niraalaa koi aur nahi. Aisa bigdi ko banaane vala koi aur nahi. (There is none as unique as Bholenath. There is none as unique as Gaurinath. There is none who solves problems like Him). It is a filmy song. Hm? Is it a song of the satopradhan (pure) period of the filmy world, when films began to be produced or is it a song of the youth of film world or is it a song of the old age of the film world? It is a song of the satopradhan (pure) stage. Everything of the world, be it a person, be it a thing, be it a house, be it an ocean, be it a river, be it a mountain, everything passes through four stages. Main are the three stages of nature – Sat, raj, tam. This entire world is Pra-kriti – Pra means special (prakashth), kriti means creation. Whose creation is it? It is the creation of the heavenly God Father Supreme Soul. He comes; Because He comes, doesn't He? This is why Muslims call Him Khuda. He comes Himself (khud). He does not come on being called by anyone. The Hindus may call Him to any extent sitting in the temples; they may play jhaanjh-majeera (musical instruments); the Muslims may shout to any extent looking upwards. The Christians may pray to whatever extent in the Churches and the sangat (prayer) is sung continuously in the Gurudwaras; so, whatever they may do, they may keep on wandering their intellect on the path of Bhakti; the name itself is Bhakti. Yet, the human history says that He does not come on being called. Who? The Heavenly God Father, who creates heaven. He comes Himself.

When does He come? There are some fathers in this world also, when the children become very sorrowful in the house, when the house becomes very old, sorrowful, when children make a lot of complaints, then the Father builds a new house. First he will definitely build a room to keep the materials. When all the materials are collected, then he demolishes the old house. So, when does He come Himself? He comes Himself, but when does He come? When this world like house becomes very old, sorrowful, degraded in the fourth stage of the world, i.e. Iron Age, when every human soul, every living being experiences more sorrows; even if there is happiness it is momentary. So, look, that Khuda, who is called Allah, whose meaning itself is highest on high. What? Well, when the topic of the highest on high emerges, then there are high and low in this corporeal world. There is partiality. The incorporeal world, which is called the abode of Khuda, Arsh, the Soul World, Supreme Abode; all the souls are like points of light there; there is no partiality with anyone. All are alike. So, it is about this world. What? Allah Miyaan.

Well, those founders of religions came to this world within 2500 years, from Ibrahim to Maharshi Dayanand, the founder of Arya Samaj. All those founders of religions are those who give importance to the body. The body, which is made up of the five elements. Mother! Did you understand? What did you understand? They believe in the materialistic world and build the materialistic world of five elements. They give preference to that only. They forget that the heavenly God Father, the creator of heaven had established a world of happiness only where there was no name or trace of sorrows. It is also said – Heaven, paradise, jannat, swarg. Hindus also say swarg. But they do not know as to what is called heaven (swarg). Swa itself means soul. It is said – Swadharme nidhanam shreyah pardharmo bhayaavah. (Gita 3/35) It is very righteous to become constant in the religion of the soul.

What is the religion of the soul? Arey, the soul itself is a resident of the Soul World, resident of the abode of peace. So, it will be an embodiment of peace only in the original form. So, since 2500 years, ever since the founders of other religions came, they did not know whether we are a body or something else other than the body because the body is perishable. It exists today and it will not exist tomorrow. But the soul in the form of a king which lives in the body, which assumes the body, runs the body, is the controller of the organs of the entire body, is not it? So, where must it be living? It is called uttamaang (highest organ). What? Mastak, maatha (forehead). The Nepalis have coined a name, haven't they? What? Sagarmatha (Mount Everest). The special place even in the forehead, the soul which is perfect and complete in itself, its place should also be like this only. So, that is called bhari-poori kuti, bhrikuti. That soul resides in this body in that bhrikuti. But what is it?

That soul is a flame. A flame of light. A flame of light of knowledge. Especially among human beings (manushya); The name manushya itself is coined because he thinks and churns. He possesses mind. He is called the progeny of Manu. So, that soul is a form of light. Which organs of the body live closest in connection with that light? The eyes. So, will the one who lives closest get coloured by the company the most or not? So, those eyes are full of light. The eyes see as long as there is light in the eyes. And when that light like soul flies away, then the light of the eyes vanishes, the eyes become like buttons. Everyone experiences. But nobody is able to think over this topic deeply because the seed form soul which thinks will be the number one seed in the human world tree, will it not be? And the seed of this human tree is accepted by the Hindus, the Muslims and the Christians or their followers, all the religions that who is the first man of the world? The name is also uttered accordingly – Aadam. What? Hindus call him Aadi Dev. What kind of Aadi Dev? Mahadev. The world of deities, the heaven which Allah comes and establishes; He is called Allah in practical because the Aadam in whom He enters, He performs highest actions and shows. The names in the scriptures are coined only on the basis of the tasks performed.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 09 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba's Murli
वीसीडी 2470, आडियो 2956, दिनांक 28.03.2018
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प्रातः क्लास 17.5.1967
Morning Class dated 17.5.1967
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समय- 00.01-22.02
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प्रातः क्लास चल रहा था - 17.5.1967. रिकार्ड चला था – भोलेनाथ से निराला, गौरीनाथ से निराला कोई और नहीं। ऐसा बिगड़ी को बनाने वाला कोई और नहीं। तो ये भोलेनाथ भोली-भाली आत्माओं को, जो विधर्मी हों, विदेशी हों, धरमपिताओं की चुंगुल में फंस जाते हैं, उनको अपने कंट्रोल में ले लेता है ताकि इधर-उधर न जा सकें। जैसे, शादी होती है तो साजन-सजनी का संबंध होता है, तो सजनी की नाक में नथनिया डाल दी जाती है। ऐसे ही आत्माओं का बाप शिव बाप इस सृष्टि पर आते हैं और जिस भारत पर फिदा होकर आते हैं; भारत देश भी है, और भारत आत्मा भी है। तो जो भारत है, जिसे गीता में अर्जुन कहा, भरत की संतान भारत, जैसे ब्रह्मा की संतान ब्राह्मण। ऐसे ही भरत का अर्थ है - जो भरण पोषण करता है। हँ? सारे संसार का भरण-पोषण करने वाला विष्णु कहा जाता है। विष्णु माने नो विष एट आल। वो विष्णु अपनी पवित्रता की पावर से भरणपोषण करता है।

सारे ही विश्व वसुधैव कुटुम्बकम क्योंकि कल्पांतकालीन महाविनाश में तो सारी दुनिया ही, सारी दुनिया के मनुष्यमात्र एक बाप के कंट्रोल में आ जाते हैं। सब मनमनाभव। तो अव्वल नंबर भोलेनाथ कौन हुआ? हँ? किसको कहेंगे? भोलेनाथ शिव को कहेंगे। शिवबाबा नहीं कहा जाता। जो शिवबाबा है इस सृष्टि पर सदा कायम हीरो पार्टधारी वो भी अंतिम जनम में जाकरके क्या होता है? हँ? आधीन हो जाता है। किसके? रावण के आधीन। क्योंकि रावण राम की सीता, जो शक्ति स्वरूपिणी है, राम की शक्ति को ही उठा ले जाता। क्या? हर मनुष्यात्मा में, आत्मा में प्योरिटी की पावर सबसे बड़ी पावर। और वो प्योरिटी की पावर आती है ईश्वरीय ज्ञान से, ईश्वर के साथ योग लगाने से। तो सवाल है कि जो भी आत्माएं हैं बिन्दु-3, शिव भी आत्मा है, तो भोली कौन है और उन भोलों का नाथ कौन है, नाथने वाला? हँ? भोली आत्माएं हैं जो गीता में बताई गई हैं क्षर – क्षरित होने वाली। हँ? शक्ति क्षीण होती रहती है। और जिसकी शक्ति क्षीण नहीं होती, वो तो भोला नहीं हुआ। हँ? तो शिव है भोलेनाथ। भोलों को कंट्रोल में कर लेने वाला। नाथ डालने वाला आत्मिक स्वरूप में। लेकिन आत्मिक स्वरूप में देखेंगे तब तो ठीक है – यही एक आत्मा है जो जन्म-मरण के चक्र में न आने से, त्रिकालदर्शी होने से ज्ञान अर्थात् सत्यता की सबसे जास्ती पावर है उस सुप्रीम सोल शिव में। लेकिन वो जो पावर है ज्ञान की वो इस संसार में कैसे डिस्ट्रिब्यूट हो? उसको तो शरीर ही नहीं है, मुख ही नहीं है। तो उसे इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर क्या चाहिए? हँ? वो शरीर रूपी रथ चाहिए जो सृष्टि के अंत में जाकरके एकदम संग के रंग में आकरके पत्थरबुद्धि बन जाता है। क्योंकि ये जो संग का रंग है ना। अच्छे ते अच्छे के संग का रंग लगे तो ऊँचा उठे। और नीचे का संग लगे, नीच का, तो नीचे गिरेगा।

तो सृष्टि रूप रंगमंच पर शिव आता है 5000 वर्ष के ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग कराने डायरेक्टर के रूप में पर्दे के पीछे रहने वाला और वो 5000 वर्ष के ड्रामा की कम्प्लीट शूटिंग हो जाती है। आत्माएं जो संग के रंग में आकरके बिगड़ जाती हैं, तामसी बन जाती हैं, उनको सात्विक बनाके वापिस चला जाता है। तो चैतन्य आत्माओं को ज्ञान सुनाकर, उनमें भी मनुष्यात्माओं को, मनुष्यों में भी तीन प्रकार की मनुष्यात्माएं। एक तो सृष्टि वृक्ष की बीज; दूसरी, सृष्टि वृक्ष की जड़ें, आधार और तीसरी, जिन्हें तनों और टालियाँ, जिन्हें टाल-टालियाँ कहा जाता है। तो सबसे जास्ती संख्या किसकी होगी? टाल-टालियों में जो पत्ते हैं, उनकी ढ़ेर सारी संख्या। तो, जड़ें भी ढ़ेर की ढ़ेर होती हैं, लेकिन पत्तों जितनी नहीं। तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जब आता है तो सबका सद्गति दाता कहा जाता है। एक भी आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कल्पांतकाल में नहीं रहती जिसकी सद्गति न हो। सब दुर्गति में, सब दुःखी, परेशान। जब चतुर्थ विश्वयुद्ध में एटमिक विस्फोट होते हैं तो सब परेशान।

तो सबकी मुक्ति, जीवनमुक्ति, आत्माओं को देने वाला है। मुक्ति काहे से? देह के बंधन से, देह के संबंधियों से, देह के पदार्थों से, इनमें मन-बुद्धि अटक जाती है; मन-बुद्धि को ही आत्मा कहा जाता है ना। तो, जो सभी आत्माओं की मन-बुद्धि फंस जाती है, उनको ज्ञान मिलेगा तो मुक्ति होगी। कहते भी हैं – रिते ज्ञानान न मुक्ति। लेकिन किसके ज्ञान से मुक्ति? एक ईश्वर के ज्ञान से मुक्ति। और बाकी जितने भी ज्ञान सुनाते हैं, वो सब बंधन में डालते। क्यों? चाहे देवताएं हों, चाहे मनुष्यात्माएं हों, चाहे राक्षस हों, सब देह का सुख लेने वाले भोगी। देह की इन्द्रियों से सुख लेते हैं। तो नीचे गिरते जाते हैं। इसका मतलब देह में फंसते हैं ना। तो जो पांच तत्वों की देह है, इसमें आसक्ति हो जाती है आत्माओं की। लेकिन इस परंपरा की शुरुआत कहां से हुई? हँ? कहीं से तो हुई होगी। कहाँ से हुई? शिव ज्योतिबिन्दु, वो तो आसक्ति में आता ही नहीं। वो तो सूर्य है, ज्ञान सूर्य। किसी से अटैचमेन्ट है ही नहीं। तो ये शुरुआत कहाँ से होती है अटैचमेन्ट की? हँ? अरे? इसका, आसक्ति का आरंभ करने वाली कौन आत्मा? आत्मा।
(किसी ने कुछ कहा।) ये द्वापर तो समय का नाम है।

शिव को चाहिए क्या? सृष्टि रचना रचने के लिए, सृष्टि रचना रचने के लिए क्या चाहिए? माता चाहिए। और माता धरणी को कहा जाता है। धरणी माने धारणा शक्ति। धारण करने की ताकत। तो जो ज्ञान सूर्य शिव है, 5000 वर्ष का नाटक पूरा होता है, तो जो मनुष्य सृष्टि की बीज रूप आत्मा है, उस 5000 वर्ष के ड्रामा को क्रॉस करने वाली, तो उसके आदि-मध्य-अंत को जानने वाला वो ही सुप्रीम गॉड फादर शिव, जो अभोक्ता है, और उसे क्या चाहिए? हँ? उसे तो धरणी चाहिए, माता चाहिए। और धरणी होती है पांच तत्वों का संघात। क्या? धरणी में; धरणी माता कही जाती है ना। धरती माता। वो जड़ धरणी और ये है आत्मा रूपी धरणी। तो वो धरणी दो प्रकार की है। एक है स्वदेशी। और एक है विदेशी। विधर्मी कहो।

तो वो परमपुरुष को चाहिए प्रकृति। माना प्रकष्ठ कृति। माना देह चाहिए, शरीर चाहिए। इसलिए वो अर्जुन के शरीर रूपी रथ में प्रवेश करता है कंट्रोल करने के लिए। क्या? इस मनुष्य सृष्टि का जो बीजरूप बाप है आदम, वो आत्मा भी है और शरीर भी है। लेकिन शरीर तो है ही पांच जड़ तत्वों का संघात। वो बीज है तो सार रूप में होगा। और आत्मा भी पत्थरबुद्धि बन गई। क्या? आत्मा भी देहअभिमानियों के संग के रंग में आते-आते वो जो आदम है, मनुष्य सृष्टि का बाप वो सब धर्मों का बाप है ना। धर्मपिताओं का भी बाप है। तो सबको राजाई का वर्सा देने वाला है। बाप क्या देता है? कुछ देता है कि नहीं? हँ? वो मनुष्य सृष्टि का बेहद का बाप है, तो बेहद की राजाई देता है। फिर शिव क्या करता है? हँ? शिव अखूट ज्ञान का भण्डार है। तो वो आकरके सिर्फ सत्य का ज्ञान देता है। गॉड इज़ ट्रुथ। अखूट ज्ञान का भण्डार। खूटने वाला नहीं। सारा ही कोई निकाल ले तो भी पूरा ही बचता है। जो शास्त्रों में लिखा – पूर्णमिदं पूर्णमदः। तो वो जिसमें प्रवेश करता है ज्ञान का बीज डालने के लिए वो हो गई धरणी माता।

A morning class dated 17.5.1967 was being narrated. The record played is – Bholenath se niraalaa, gaurinath se niraala koi aur nahi. Aisa bigdi ko banaane vala koi aur nahi. (There is none as unique as Bholeynath, Gaurinath. There is no one who corrects the wrongs as He does) So, this Bholeynath takes under His control the innocent souls, be it the vidharmi souls or the videshi souls, who get entangled by the founders of religions so that they cannot go here and there. For example, when marriage takes place and a relationship of husband and wife is established, then a nose ring (nathaniya) is pierced in the nose of the wife. Similarly, when the Father of souls, Shiv comes in this world and the Bhaarat to whom He loses His heart and comes; Bhaarat is a country as well as a soul. So, Bhaarat, who was called Arjun in the Gita, Bharat's child Bhaarat, for example, Brahma's child Brahmin. Similarly, Bharat's meaning is – The one who sustains (jo bharan-poshan karta hai). Hm? The one who sustains the entire world is called Vishnu. Vishnu means no vish (poison) at all. The Vishnu who sustains through his power of purity.

The entire world is a family (vasudhaiv kutumbkam) because in the mega-destruction at the end of the Kalpa, the entire world, the human beings of the entire world come under the control of one Father. All become Manmanaabhav. So, who is number one Bholeynath? Hm? Who will be called? Shiv will be called Bholeynath. ShivBaba is not called so. What does even ShivBaba, the hero actor, who remains permanently in this world, become in the last birth? Hm? He becomes subservient (aadheen). To whom? Subservient to Ravan because Ravan abducts Ram's Sita, who is an embodiment of Shakti, Ram's Shakti. What? The power of purity in every human soul, in every soul is the biggest power. And that power of purity comes from Godly knowledge, by having Yoga with God. So, the question is - among all the point-3 like souls, Shiv is also a soul; so, who is bholi (innocent) and who is the naath (lord) of those innocent ones, the one who controls them (naathne vala)? Hm? Innocent souls are the ones which have been described in the Gita as Kshar – the ones which get discharged. Hm? Their power keeps on decreasing. And the one whose power does not get decreased is not innocent. Hm? So, Shiv is Bholeynath. The one who controls the innocent ones. The one who controls them in soul form. But, it is correct if you see in soul form. This is the only soul which because of not passing through the cycle of birth and death, because of being Trikaaldarshi, that Supreme Soul Shiv possesses the most power of knowledge, i.e. truth. But how that power of knowledge should be distributed in this world? He does not have a body at all, mouth at all. So, what does He require on this world stage? Hm? He requires that body-like Chariot which develops a stone-like intellect in the end of the world after getting coloured by company because as regards this colour of company, if you get coloured by the company of the best, then you will rise and if you get coloured by the company of a lowly person, then you will fall.

So, Shiv comes to this world stage to enable the shooting of the broad drama of 5000 years in the form of a Director who remains behind the curtains and the complete shooting of the 5000 years drama takes place. He purifies the souls, which get spoilt by being coloured by company, become degraded and then goes back. So, by narrating knowledge to the living souls, the human souls and even among the human beings, there are three kinds of human souls. One is the seeds of the world tree; the second are the roots, the base of the world tree, and the third, who are called the stems and branches, called the branches and sub-branches. So, whose number will be the maximum? The leaves in the branches and sub-branches will numerous. So, the roots are also numerous, but not as many as the leaves. So, when He comes in this world stage, then He is called the bestower of true salvation upon everyone (sarva ka sadgatidaataa). There does not remain even a single soul, who does not achieve sadgati in the end of the Kalpa on this world stage. Everyone is degraded, everyone is sorrowful, disturbed. When the atomic explosions take place in the fourth world war, then everyone is disturbed.

So, He is the giver of mukti (liberation), jeevanmukti (liberation in life) to everyone, to the souls. Liberation from what? From the bondage of the body, from the relatives of the body, from the things related to the body; the mind and intellect gets entangled in them; the mind and intellect itself is called a soul. So, when the mind and intellect of all the souls is entangled, then they will be liberated when they get knowledge. It is also said – Ritey gyaanaan na mukti (there is no liberation without knowledge). But mukti (liberation) through whose knowledge? Liberation through the knowledge of one God. All others who narrate knowledge put you in bondage. Why? Be it the deities, be it the human souls, be it demons, everyone is a pleasure-seeker, who derive pleasure from the body. They derive pleasure from the organs of the body. So, they keep on falling. It means they get entangled in the body, don't they? So, the souls develop attachment in the body made up of the five elements. But where did this tradition begin? Hm? It must have started from somewhere. Where did it start? The point of light Shiv doesn't develop attachment at all. He is the Sun, the Sun of Knowledge. There is no attachment with anyone at all. So, where does this attachment begin? Hm? Arey? Which soul starts this, the attachment (aasakti)? Soul.
(Someone said something.) This Dwapar (Copper Age) is the name of time.

What does Shiv need? What is needed to create the world? Mother is required. And Earth (dharani) is called mother. Dharani means dharana shakti (power of inculcation). The power of inculcation. So, the Sun of Knowledge Shiv, when the 5000 years drama is about to be over, then the seed form soul of the human world, who crosses that 5000 years drama; then the one who knows its beginning, middle and end is the same Supreme God Father Shiv, who is abhokta and what else does He require? Hm? He wants an Earth, a mother. And the Earth is a combination of five elements. What? In the Earth; the Earth is called mother, is not she? Mother Earth. That is a non-living Earth and this is a soul-like Earth. So, that Earth is of two kinds. One is Swadeshi (indigenous). And one is videshi (foreigner). Call her vidharmi.

So, that Parampurush requires Prakriti. It means prakashth kriti (special creation). It means He requires a body. This is why He enters Arjun's body like Chariot to control it. What? The seed form Father of this human world, i.e. Adam is a soul as well as a body. But the body itself is a combination of the five non-living elements. When he is a seed, he will be in an essence form. And the soul also became stone-like intellect. What? The soul also, while being coloured by the company of the body conscious ones; that Adam, the Father of the human world is a Father of all the religions, is not he? He is the Father of the founders of religions as well. So, he gives the inheritance of kingship to everyone. What does the Father give? Does he give anything or not? Hm? He is the unlimited Father of the human world, so he gives unlimited kingship. Then what does Shiv do? Hm? Shiv is an inexhaustible stock house of knowledge. So, He comes and gives only the knowledge of truth. God is truth. He is an inexhaustible stock house of knowledge. It is not going to exhaust. Even if anyone extracts the complete stock, yet, He is left with complete. It has been written in the scriptures – Poornamidam poornamadah. So, the one in whom He enters to sow the seed of knowledge is the Mother Earth.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 10 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2471, आडियो 2957, दिनांक 29.03.2018
VCD 2471, Audio 2957, Date 29.03.2018
प्रातः क्लास 17.5.1967
Morning Class dated 17.5.1967
VCD-2471-Bilingual

समय- 00.01-26.56
Time- 00.01-26.56

प्रातः क्लास चल रहा था - 17.5.1967. रिकार्ड चल रहा था – भोलेनाथ से निराला, गौरीनाथ से निराला कोई और नहीं। हँ? कितने नाथ बता दिये? हँ? नथनिया डालने वाले कितने नाथ बता दिये? (किसी ने कहा – दो।) हाँ। दो आत्माएं कि दो शरीरधारी? हँ? आत्मा। एक है निराकार सदैव। और दूसरा है सदा साकार। और दोनों ही निराले हैं। क्या? जो सदा निराकार है, ज्योतिबिन्दु है, कभी देह के आकर्षण में नहीं आता। हँ? निराकारी स्टेज में ही रहता है। वो जितनी भी बिन्दु-बिन्दु आत्माएं हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली, सबसे निराला है। हँ? अच्छा! तो उसके लिए बोला ‘भोलेनाथ से निराला कोई और नहीं’। फिर दूसरी बार फिर बोला – दूसरा नाम भी बोल दिया। हँ? पहला नाम जो बोला, जो निराकारी स्टेज का नाम है, या निराकारी स्टेज होते हुए भी साकार में प्रवेश करके पार्ट बजाता है। हँ? साकार में प्रवेश करके पार्ट बजाता है। जैसे गीता में लिखा है ना – प्रवेष्टुम। मैं प्रवेश करने योग्य हूँ। तो जिसमें प्रवेश करता है, प्रवेश करने वाले के मुकाबले, जिसमें प्रवेश करता है, वो बराबर भोला है या नंबर दो का भोला है? हँ? हाँ, नंबर दो का माल है। कह देते हैं भक्त लोग शिव-शंकर भोलेनाथ, भोले, लेकिन एक विशेषण और लगाते हैं, शिव-शंकर भोले-भाले, शिव नाम पहले, शंकर नाम बाद में। और जो विशेषण लगाते हैं उसमें भी भोले पहले, भाला बाद में। क्या? भाला माने छोटा-मोटा कांटा नहीं। बबूल का कांटा बहुत बड़ा होता है। हँ? और दुनिया में जो, जो बहुत दुःख देते हैं उनको बड़ा कांटा कहा जाता है।

अब बताओ, आज की दुनिया में सबसे जास्ती दुःखदायी हडकम्प फैलाने वाला कौनसा देश है? एक अक्षर लिखो। हँ। अमेरिका। तो, जो हडकम्प फैलाने वाला हुआ, ये किसकी औलाद होगा? ऊपरवाला जो निराकार रहता है सदैव उसकी औलाद होगा या जिसमें प्रवेश करता है, जो निराकार भी बन जाता है और पत्थरबुद्धि साकार भी होता है। तो ये अमेरिका देश जो है किसकी औलाद है? हँ? आदम की औलाद है। जो मनुष्य सृष्टि का आदि पुरुष है, हँ, जिसे हिन्दुओं में आदि देव भी कहते हैं, त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः। हँ? तो उसकी औलाद क्यों? निराकार शिव की औलाद क्यों नहीं? क्योंकि वो आदम ही सृष्टि के आदि में सतोप्रधान और सृष्टि के अंत में जब चौथी अवस्था में पहुँचता है सत, रज, तम, प्रकृति के संसर्ग-संपर्क में, संबंध में आते-आते एकदम तमोप्रधान हो जाता है। तो उसी की औलाद होगा। कौन? महाशक्ति अमेरिका। तो दुनिया के हिसाब से तो अमेरिका महाशक्ति है। उसका नाम ही है आ-मेरे-का। हँ? प्रश्न चिह्न लग गया ना। मेरे हो क्या? माने ये किसने पूछा? ऊपरवाले ने पूछा। शिव ने पूछा। हँ? निराकार ज्योतिबिन्दु, जिसे मुसलमान कहते हैं खुदा, उसने पूछा – मेरे हो क्या? हँ? तो क्या जवाब आएगा? मेरे हो या माया के हो? हँ? माया रावण के हो? तो क्या जवाब आएगा? कहेगा – हाँ। जो माया रावण बनता है तमोप्रधान, मैं उसकी औलाद हूँ। कौन है माया रावण?

कहते हैं जो मनु्ष्य सृष्टि का बीज है वो ही बाप है। राम बाप को कहा जाता है। बाकी ऊपरवाले को राम नहीं कहेंगे। क्यों? क्योंकि वो सारी सृष्टि के सामने ऐसा पार्ट नहीं बजाता है जो उसे राम कहा जाए। क्योंकि राम कहा ही जाता है – रम्यते योगिनो यस्मिन इति राम। जिसमें योगी लोग रमण करते हैं, वो राम होता है। तो ये योगी तो बहुत होते हैं। हँ? राजयोग सीखते हैं और राजयोगी बनकर राजाई लेते हैं जन्म-जन्मान्तर की। तो वो निराकार में रमण करते हैं या साकार में रमण करते हैं? हँ? हाँ, दुनिया के जितने भी योगी हैं ढ़ेर के ढ़ेर, हँ, वो सब साकार में रमण करते हैं। क्योंकि आदत पड़ी हुई है, बुद्धि का योग लगाने की, मन-बुद्धि से लगन लगाई जाती है ना। तो आदत पड़ी हुई है जन्म-जन्मान्तर की। क्या? साकार को याद करने की कि निराकार को याद करने की? हँ? साकार को याद करने की आदत पड़ी हुई है।

तो जब महाविनाश का टाइम कल्पांत में आता है तो उस समय सब आत्माओं को परिचय तो मिलता है। क्या? कि मैं किसकी संतान हूँ? वास्तव में कौन है मेरा बाप? तो मनुष्य सृष्टि में जितने भी मनुष्य मात्र हैं, सबकी बुद्धि में बैठ जाता है कि वो आदम ही मेरा बाप है। आदम माने? आदिनाथ जिसे जैनियों में कहते हैं। आदि देव कहते हैं। अंग्रेजों में एडम कहते हैं। है ना। तो वो ही मेरा बाप है। कहते हैं निराकार मेरा बाप है। लेकिन प्रूफ प्रमाण नहीं दे सकते कि वो निराकार क्या करता है? कैसा रूप है? हँ? उसके बारे में, उसके जीवन चरित्र के बारे में डीटेल नहीं बता पाते। तो दुनिया के सभी मनुष्य मात्र उस आदम को ही, क्या, क्या मान लेते? अपना बाप मान लेते है। क्योंकि उसी बाप से वर्सा मिलना है। क्या? कोई भी प्रकार की राजाई मिलेगी, मान लो, परिवार के मुखिया बनते हैं, परिवार के बच्चों को जन्म देने वाले, तो उनकी राजाई भी चलती है मुखिया की; नहीं चलती? चलती है। तो किसी भी तरीके से योग लगाएंगे, तो उन्हें कंट्रोलिंग पावर, कुछ न कुछ राजाई मिलेगी। और वो राजाई उन्हें उस राम से ही मिलती है। क्या? जिसमें योगी लोग रमण करते हैं।

अब सवाल पैदा होता है, उस आदम को किससे मिलती है? हँ? तो वो योगियों के हुजूम के बीच में तो है लेकिन अव्वल नंबर का योगी है। क्या? आत्माएं हैं ना। तो जो भी मनुष्यात्माएं हैं, उन मनुष्य आत्माओं के बीच में बड़ा भाई है, और आत्माओं में जो सबका बाप है, जिसका कोई बाप नहीं, सुप्रीम फादर कहते हैं, गॉड फादर, उसका बच्चा है। आदम जो है वो नंबर दो का राम कहें कि नंबर वन का राम कहें? हँ? नंबर वन का राम कहें। क्योंकि वो नंबर वन राम एक ही आत्मा है जो सदा निराकारी स्टेज में रहने वाले बापों के बाप को याद कर सकता है सौ परसेन्ट। क्या? बाकी कोई भी आत्मा नहीं है जो सौ परसेन्ट याद करके सौ परसेन्ट बाप समान बने। ब्रह्मवाक्य मुरली में है ना - मैं आता हूँ तो तुम बच्चों को नंबरवार आप समान बनाता हूँ। तो जो बच्चे शिव बाप समान निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनते हैं उनमें अव्वल नंबर जो कहा जाता है उसे मुसलमान कहते हैं अल्लाह अव्वलदीन। अल्लाह ने आकरके; अल्लाह माने ऊँचे ते ऊँचा, ऐसी आत्मा, ऐसी रूह जो ऊँच ते ऊंच पार्ट बजाने वाली है रंगमंच पर। ऐसे नहीं ऊपर बैठी रहती है आत्मलोक में। नीचे आती भी है और अव्वल नंबर का पार्ट बजाती है।

तो वो अव्वल नंबर आत्मा जो है कैसे पार्ट बजाती है अव्वल नंबर का? हँ? अपने को गुप्त रखना अच्छा है या अपने का दिखावा करना अच्छा है? हँ? गुप्त रखना अच्छा है। हँ? जैसे आज की गवर्मेन्ट है प्रजातंत्र राज्य में। कोई राजा तो है नहीं। और कुछ है भी राजाई दो-पांच वर्ष की तो वो अल्पकाल की राजाई भी उन्हें प्रजा से मिलती है या भगवान से मिली? किससे मिलती है? प्रजा से मिलती है। और प्रजा में ज्यादा ताकत होती है कि राजा में ज्यादा ताकत होती है? राजाओं में ज्यादा ताकत होती है। क्योंकि राजा बनाने वाला वो ही है। कौन? राम, जिसके लिए नार्थ इंडिया में माताएं आज भी गाती हैं गीत – राजा एक राम, भिखारी सारी दुनिया। राजा एक राम। अरे, किस बात की भिखारी? हँ? किस बात की भिखारी? डॉक्टर बनाने की भिखारी? इंजीनियर बनाने की भिखारी? हँ? वकील बनाने, जज बनाने की भिखारी? अरे, ये तो कुछ भी नहीं है। वो तो बनाता है राजा। जो दुनिया में कोई भी मनुष्यात्मा कितने भी हुजूम को कंट्रोल करने वाला कंट्रोलर हो, इब्राहिम ही क्यों न हो, अरे, इब्राहिम भी छो़ड़ो, बुद्ध, क्राइस्ट को छोड़ो। क्राइस्ट भी 200-250 करोड़ क्रिश्चियन्स का बाप है, उसे अपना बाप मानते हैं वो लोग। दुनिया की आबादी 500-700 करोड़ और 250 करोड़ क्रिश्चियन्स का ही बाप है क्राइस्ट। लेकिन वो तो कुछ भी नहीं। ये सारी दुनिया तो ब्रह्मा से उत्पन्न हुई है। क्या? जिस ब्रह्मा से पैदा हुई तो वो ब्रह्मा सारी दुनिया का क्या हुआ? बाप हुआ ना।

तो ब्रह्मा को भी राजाई किससे मिलती है? हँ? ब्रह्मा का भी कोई बाप है या नहीं है? ब्रह्मा का भी बाप, क्योंकि एक ब्रह्मा तो है नहीं। ब्रह्मा नामधारी तो 4-5 गाए हुए हैं। चतुर्मुखी ब्रह्मा, पंचमुखी ब्रह्मा। तो जो ब्रह्मा के मुख से वेदवाणी निकली और वो वेदवाणी, तीन वेद निकले; ऋगवेद, ऋक माने सच्चा। तो बाकी वेद कैसे हो गए? नंबरवार हुए ना। ऋगवेद, सामवेद, अथर्ववेद। तो ये जो वेद हैं वो भी, इनको, इनको त्रिगुणातीत नहीं कहेंगे। क्या? ये जो वेद हैं ना, सत, रज, तम – इनसे भरे पूरे हैं। इनसे जो दुनिया निकली है ना वो सत्वप्रधान देवताओं की दुनिया भी निकली है। रजोप्रधान दैत्यों की दुनिया भी निकली है; क्या? रजोप्रधान नाम क्यों पड़ा? कि जबसे रजस धर्म शुरू हुआ स्त्रीयों में; क्या? रजोनिवृत्ति जिसे कहते हैं; तो रजोप्रधान हो गया। देहभान वाली बात। और बाद में आता है तमोगुण। तो ये दनिया तमोगुणी भी बनती है। और इस दुनिया में जितने भी पैदा होते हैं चारों युगों में, चार वर्ण की आत्माएं – सतयुग में देवता वर्ण, जो ब्राह्मण सो देवता कहे जाते हैं; त्रेता में क्षत्रीय; द्वापर में वैश्य; और कलियुग में शूद्र। तो चारों वर्णों का कोई रचयिता होगा या नहीं होगा बाप? कि ब्रह्मा ही होगा अम्मा? ब्रह्म माने बड़ी, मा माने माँ। हँ? अरे! चार वर्ण जो रचे गए हैं दुनिया में तो चार वर्णों का रचयिता बाप कोई होगा या नहीं होगा? या ब्रह्मा ही है जिसके मुख से वेद निकले? हँ?

बाप है ब्रह्मा का। और ब्रह्मा दादा लेखराज का बाप वो ही है जो यज्ञ के आदि में ओम मण्डली का संगठन था, उसका जो मुखिया पीयू कहा जाता था, उसके मुख से उनके साक्षात्कारों का रहस्य मिला था। किसको? ब्रह्मा को, दादा लेखराज। तो जिससे ज्ञान का बीज मिला वो ही बाप हुआ ना। लेकिन मारे अहंकार के; अम्मा है ना, अम्मा में अहंकार तो आता है - देखो-३ मेरे ऊपर फिदा हुआ। क्या? अम्मा में क्या आता है? अहंकार आता है। देह के रूप का अहंकार आता है कि क्या आता है? हँ? देह के पांच तत्वों से बनी जो देह है, वो रूप जब निखरता है ना तो उसका बड़ा अहंकार आता है। तो वो ही, ब्रह्मा तो वैसे भी लम्बे-चौड़े, हट्टे-कट्टे, फर्स्टक्लास, जैसे राजाओं जैसा व्यक्तित्व दिखाई पड़ता था। तो ब्रह्मा जैसी आत्मा, उससे जो सारी सृष्टि निकली, उसकी वेदवाणी से, वो सारी की सारी सृष्टि सत्वप्रधान, सतोसामान्य, रजो, और तमो वाली होती है। चाहे कलियुग के दुखदायी शूद्र वृत्ति के लोग क्यों न हों, नीच वृत्ति के; क्या? वो भी उसी ब्रह्मा की संतान।

तो जैसे सब धरमपिताओं में सबसे पावरफुल धरमपिता कौन हुआ देहअभिमानी? हँ? जल्दी।
(किसी ने कुछ कहा।) लेकिन प्रजापिता के मुख से वेद तो नहीं निकले। हँ? प्रजापिता के मुख से वेद निकले क्या? ब्रह्मा। प्रजापिता के मुख से वेद नहीं निकले। ओम मंडली में आदि में गीता के श्लोकों के अर्थ विस्तार में बताते थे। क्या? इसका मतलब है कि पुराने ते पुराना शास्त्र है श्रीमद भगवद गीता शास्त्र। शास्त्र माने शासन करने का विधान। ऊँचे ते ऊँचा विधान। विधि-विधान। कौन आत्मा बनाती है? शिव की आत्मा; क्या? वो शिव है गीता का भगवान। आत्मिक रूप में। लेकिन गीता तो माता है। बिना माताओं के भगवान कैसे प्रत्यक्ष होगा? तो जो गीता माता हुई अव्वल नंबर वो कौन हुई? हँ? जिसके मुख से ब्रह्मा बाबा को सुनकरके निश्चय बैठ गया। हँ? तो वो पराप्रकृति जो है वो ही हो गई माता। है ना? पराप्रकृति माता। अपराप्रकृति - तीसरे नंबर की माता। क्या? अव्वल नंबर जिसमें शिव प्रवेश करता है पहली-पहली बार वो हो गया परमब्रह्म। हँ? और दूसरी बार, जिसने सुना भी और समझा भी, वो हो गई दूसरे नंबर की माता। और उस दूसरी माता के सहज संपर्क में आने वाली जो माता थी, जिसे एक दूसरे से बहुत प्यार भी था, तो वो हो गई तीसरे नंबर की माता। हँ? और चौथे नंबर की? चौथे नंबर की माता कौन हुई? (किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा? हां। और पांचवें नंबर की माता कौन हुई? ओम राधे। ओम राधे को पांचवें नंबर में क्यों डाल दिया? वो तो कन्या थी। पवित्रता में ज्यादा थी ब्रह्मा बाबा से। थी तो ज्यादा लेकिन पीछे-पीछे किसके चलती थी? ब्रह्मा के पीछे चलती थी। थी। नंबर नीचे चला गया। फालो करना चाहिए ना। ऊँच ते ऊँच को कि नीच को? ऊँच ते ऊँच को करना चाहिए फालो।

A morning class dated 17.5.1967 was being narrated. The record played was – Bholeynath se nirala, Gaurinath se nirala koi aur nahi (There is none as unique as Bholeynath, Gaurinath). Hm? How many ‘naths’ (lords) were mentioned? Hm? How many naaths were mentioned who put the nose-ring (nathaniya)?
(Someone said – Two.) Yes. Two souls or two bodily beings? Hm? Soul. One is forever incorporeal. And the other is forever corporeal. And both are unique (niraaley). What? The one who is forever incorporeal, point of light, never gets attracted by the body. Hm? He remains only in the incorporeal stage. He is unique among all the point like souls playing their parts on this world stage. Hm? Achcha! So, it was said for Him ‘Bholeynath se nirala koi aur nahi.’ Then, it was said once again – Another name was also mentioned. Hm? The first name that was mentioned, which is a name of the incorporeal stage or He plays a part by entering in a corporeal despite being in an incorporeal stage. Hm? He plays a part by entering in the corporeal. For example, it has been written in the Gita, isn’t it – Praveshtum. I am worth entering. So, the one in whom He enters, when compared to the one who enters, the one in whom He enters, is he equally innocent (bhola) or number two innocent? Hm? Yes, he is number two material. The devotees say – Shiv Shankar Bholeynath, bholey, but they add one more adjective – Shiv Shankar Bholey-Bhaaley. The name Shiv is first; the name Shankar is later on. And even in the adjective that they add ‘bholey’ is first and ‘bhala’ later on. What? ‘Bhaala’ does not mean a small thorn. The thorn of a Babool tree is very big. Hm? And those who give a lot of sorrows in the world are called a big thorn.

Now tell, which country spreads the maximum sorrow-causing uproar in the world? Write one word. Hm. America. So, the one which spreads uproar will be whose progeny? Will he be always the progeny of the above one, who remains incorporeal forever or of the one in whom He enters, the one who becomes incorporeal as well as corporeal with stone-like intellect. So, whose child is this country America? Hm? It is the child of Aadam who is the first man (aadi purush) of the human world, hm, who is also called Aadi Dev among the Hindus; twamadidevah purushah puraanah. Hm? So, why his child? Why not the child of incorporeal Shiv? It is because when that Aadam, who is satopradhan (pure) in the beginning of the world and himself reaches the fourth stage in the end of the world, sat, raj, tam, when he becomes completely tamopradhan (degraded) while coming in contact, in relationship with the nature, then it must be his child only. Who? Superpower America. So, from the point of view of the world America is a super power. Its name itself is Aa-merey-Copper Age. Hm? A question mark was put, wasn’t it? Are you mine (merey ho kya)? Who asked this question? The above one asked. Shiv asked. Hm? The incorporeal point of light, whom the Muslims call Khuda, asked – Are you mine? Hm? So, what will be the reply? Are you Mine or do you belong to Maya? Hm? Do you belong to Maya Ravan? So, what would be the reply? He will say – Yes. I am the child of the one who becomes Maya, Ravan, tamopradhan. Who is Maya Ravan?

It is said that the seed of the human world himself is the Father. The Father is called Ram. The above one will not be called Ram. Why? It is because He does not play such part in front of the entire world that he could be called Ram because Ram is said to be the one – Ramyate yogino Yasmin iti Ram – The one in whom the Yogis wander is Ram. So, these yogis are many. Hm? They learn Rajyog and obtain kingship of many births by becoming a Rajyogi. So, do they wander in the incorporeal or in the corporeal? Hm? Yes, all the numerous yogis of the world, hm, wander in that corporeal because they are habituated to have connection of Yoga through the intellect; devotion is established through the mind and intellect, isn’t it? So, they are habituated since many births. What? To remember the corporeal or to remember the incorporeal? Hm? There is a habit of remembering the corporeal.

So, when the time of mega-destruction arrives in the end of the Kalpa, then at that time the souls do get the introduction. What? [That] whose child am I. Actually who is my Father? So, it sits in the intellect of all the human beings of the human world that that Aaadam himself is my Father. What is meant by Aadam? The one who is called Aadinath among the Jains. He is called Aadi Dev. He is called Adam among the Britishers. Isn’t he? So, he is my Father. They say that the incorporeal is my Father. But they cannot give even a single proof as to what that incorporeal does. What is his form? Hm? They are unable to give details about him, about his life. So, what do all the human beings of the world consider that Aadam himself to be? They consider him to be their Father because they are to receive inheritance from that Father only. What? Whatever kind of kingship they receive, suppose, they become head of a family, those who give birth to the children in a family, so, the head also rules, doesn’t he? He does. So, if they have Yoga in any manner, then they will definitely get some or the other controlling power. And they get that kingship from that Ram only. What? The one in whom the yogis wander.

Now the question arises – From whom does that Aadam receive? Hm? So, he is indeed among the group of yogis, but he is number one yogi. What? There are souls, aren’t there? So, he is the elder brother among all the human souls and he is the child of the one who is Father of all the souls, who doesn’t have any Father, who is called the Supreme Father, God Father. Should Aadam be called the number two Ram or number one Ram? Hm? He will be called number one Ram because there is only one soul who is number one Ram, who can remember hundred percent the Father of fathers who remains in an incorporeal stage forever. What? There is no other soul who remembers Him hundred percent and becomes hundred percent equal to the Father. It is mentioned in the Brahmavaakya Murli – When I come, I make you children numberwise equal to Myself. So, the number one among the children, who become incorporeal, viceless and egoless like the Father Shiv, is called Allah Avvaldeen by the Muslims. Allah came and; Allah means highest on high, such soul, which plays the highest part on the stage. It is not as if He sits above in the Soul World. It also comes down and plays number one part.

So, how does that number one soul play number one part? Hm? Is it better to keep oneself incognito or is it better to show-off oneself? Hm? It is better to keep oneself incognito. Hm? For example, today’s government in the democratic (prajaatantra) State. There is no king. And even if there is a kingship of two-five years, then do they get that temporary kingship also from the subjects or did they get it from God? From whom do they get? They get it from subjects. And is there more power in the subjects (praja) or is there more power in kings? There is more power in kings because it is He who makes kings. Who? Ram, for whom the mothers in north India sing even to this day – Raja ek Ram, bhikhaari saari duniya (One Ram is King, the rest of the world is a beggar). Only one Ram is king. Arey, beggar in which sense? Hm? Beggar in which sense? Is it a beggar seeking to make them doctors? Is it a beggar seeking to make them engineers? Hm? Is it a beggar seeking to make them advocates, judges? Arey, this is nothing. He makes you a king. There might be any human soul in the world, a controller controlling any number of gatherings, be it Ibrahim; arey, leave alone Ibrahim also, leave alone Buddha, Christ also. Christ is also a Father of 200-250 crore Christians. They consider him to be their Father. But he is nothing. This entire world is born from Brahma. What? The Brahma from whom it has been born, what is that Brahma for the entire world? He is a Father, isn’t he?

So, from whom does even Brahma get his kingship? Hm? Is there any Father of Brahma as well or not? There is Brahma’s Father as well because there isn’t one Brahma. 4-5 are praised as persons with the title Brahma. Four-headed Brahma, five-headed Brahma. So, the mouth of Brahma from which the Vedvani emerged, and that Vedvani; three Vedas emerged; Rigveda, Rik means true. So, how are the remaining Vedas? They are numberwise, aren’t they? Rigveda, Samveda, Atharvaveda. So, even these Vedas will not be called Trigunaateet (beyond the three attributes of sat, raj, tam). What? These three Vedas are full of Sat, Raj, Tam, aren’t they? The world that emerged from them, hasn’t it? The world of Satwapradhan deities has also emerged. The world of rajopradhan deities has also emerged; what? Why was the name Rajopradhan coined? Ever since the rajas dharma (menstruation) started among the women; what? It is called rajonivritti (menstruation), so it became rajopradhan. It is a topic of body consciousness. And later on comes the tamogun. So, this world becomes tamoguni (impure/degraded) as well. And all those who are born in this world in the four Ages, the souls of four classes – Deity class in the Golden Age, who are called Brahmins converted to deities; Kshatriyas in the Silver Age; Vaishyas in the Copper Age; and Shudras in the Iron Age. So, will there be any creator, Father of the four classes or not? Or will Brahma alone will be the mother? Brahm means senior, ma means mother. Hm? Arey! The four classes which have been created in the world, so, will there be a creator, Father of the four classes or not? Or is there Brahma alone from whose mouth the Vedas emerged? Hm?

There is a Father of Brahma. And Brahma, Dada Lekhraj’s Father is the same person who was the head of the gathering of Om Mandali in the beginning of the Yagya, who used to be called Piu; he got the secret of his visions through his mouth. Who? Brahma, Dada Lekhraj. So, the one from whom he got the seed of knowledge is the Father, isn’t he? But due to ego; he is the mother, isn’t he? The mother feels egotistic – Look, look, look, he is attracted to me. What? What does the mother feel? She feels egotistic. Does she feel egotistic over her body’s form or anything else? Hm? She feels very egotistic of the body made up of the five elements, when its beauty increases. So, he; even otherwise Brahma was tall and sturdy, healthy, first class; it used to appear just like the personality of the kings. So, the entire world that emerged from Brahma like soul, from his Vedvani, that entire world is satwapradhan, satosaamaanya, rajo and tamo. Be it the sorrow-causing people of Shudra nature of the Iron Age with lowly attitude; what? They too are the children of the same Brahma.

So, who is the most powerful body conscious founder of religion among all the founders of religions? Hm? Quick.
(Someone said something.) But Vedas did not emerge from the mouth of Prajapita. Hm? Did the Vedas emerge from the mouth of Prajapita? Brahma. The Vedas did not emerge from the mouth of Prajapita. In the Om Mandali, in the beginning, meanings of the shlokas (hymns) of the Gita used to be explained in detail. What? It means that the oldest scripture is Shrimad Bhagwad Gita scripture (shaastra). Shaastra means the code of governance. The highest on high law (vidhaan). The law (vidhi-vidhaan). Which soul frames it? The soul of Shiv; what? That Shiv is the God of Gita in soul form. But Gita is the mother. How will God be revealed without mothers? So, who is the number one Mother Gita? Hm? The one, on hearing whose words Brahma Baba developed faith. Hm? So, that Paraaprakriti itself is the mother. Isn’t she? Mother Paraaprakriti. Aparaprakriti – The number three mother. What? The one in whom Shiv enters at first number, for the first time is the Parambrahm. Hm? And the second time, the one who heard as well as understood is the number two mother. And the mother who was in easy contact with that second mother, who also loved each other a lot, so she happened to be the number three mother. Hm? And the number four? Who is the number four mother? (Someone said something.) Brahma Baba? Yes. And who is the number five mother? Om Radhey. Why was Om Radhey put at fifth number? She was a virgin. She was ahead of Brahma Baba in purity. She was ahead, but whom did she used to follow? She used to follow Brahma. She used to. Her number (rank) went down. Should she follow the highest on high or the lowest one? She should follow the highest on high.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2472, आडियो 2958, दिनांक 30.03.2018
VCD 2472, Audio 2958, Date 30.03.2018
प्रातः क्लास 17.5.1967
Morning Class dated 17.5.1967
VCD-2472-Bilingual

समय- 00.01-15.33
Time- 00.01-15.33

प्रातः क्लास चल रहा था - 17.5.1967. रिकार्ड चल रहा था – भोलेनाथ से निराला। मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चों ने ये गीत सुना। हँ? कैसे बच्चों ने सुना? मीठे-मीठे बच्चों ने सुना। हँ? कौनसे बच्चों ने सुना? मीठे-मीठे? अरे! मीठे-मीठे हैं या झूठ बोल रहे हो? हँ? मीठे-मीठे लगते हैं? हँ? जैसे मधु और कैकल राक्षस थे ना। तो वो बड़े राक्षस का नाम, बड़े भाई का नाम मधु रख दिया, शहद जैसा मीठा। ऐसे मीठे हैं? हँ? नहीं हैं? तो मीठे-मीठे क्यों कह रहे? ये बाबा झूठ क्यों बोलते? मीठे-मीठे। हँ? झूठ नहीं बोलते। बाबा तो हर आत्मा रूपी ज्योतिबिन्दु का जो सात्विक पार्ट है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, वो सतोप्रधान स्टेज देखते हैं। वो वर्तमान की बच्चों की, आत्मा रूपी बच्चों की तामसी स्टेज नहीं देखते। इसलिए बोला मीठे-मीठे सीकिलधे। इसीलिए सीकिलधे शब्द लगा दिया। बहुत सिक-सिक से मिलते हैं। कोई बच्चे खो जाते हैं ना माँ-बाप के। और बहुत लम्बे समय के बाद मिलते हैं, तो बड़ा प्यार उमड़ पड़ता है। तो वो प्यार किस समय की याद दिलाता है? हँ? जिस समय बिछुड़े थे, कितने मीठे-मीठे थे। तो सीकिलधे बच्चों ने ये गीत सुना। क्या? भोलेनाथ से निराला, एक बात। और दूसरा, गौरीनाथ से निराला कोई और नहीं। दो हैं या एक है? दो हैं। एक पर्सनालिटी नहीं है? हँ? माना दो आत्माएं हैं। अर्जुन का रथ है ना। पुरुषार्थ का अर्जन करने वाला। तो उसमें आत्मा भी है अर्जुन और उसका शरीर रूपी रथ भी है। उस रथ में वो सारथि भगवान शिव। तो दो आत्माओं की बात है। एक रथी वाली आत्मा और दूसरी सारथि वाली आत्मा।

तो बताया, ऐसा बिगड़ी को, हँ, सुधरी हुई बनाने वाला और कोई दुनिया में नहीं है। हँ? किसकी बिगड़ी को? हँ? जिसमें प्रवेश करता है, वो तो सबसे जास्ती बिगड़ जाता है। हँ? और वो जो बिगड़ा हुआ है, जिसे कहा जाता है मूर्तिमान शंकर, आदम, वो प्रैक्टिकल में जिसका आधार लेता है; किसका आधार लेता है? हँ? किसका आधार लेता है? हँ? वो एक ही शब्द लिख दो। मूर्तिमान शंकर किसका आधार लेता है? मूर्त मान शंकर वाली; अमूर्त नहीं। अमूर्त तो शिव है, जिसकी मूर्ति नहीं है। मूर्तिमान शंकर किसका आधार लेता है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) पार्वती का आधार लेता है पहले? झूठ ही झूठ बोल देते हो। गौरी का आधार लेता है पहले-पहले? हँ? प्रैक्टिकल में किसका आधार लेता है? अरे? जगदम्बा का आधार लेता है, जो अंतिम जनम में महाकाली के रूप में प्रत्यक्ष होती है। हँ? सबसे जास्ती बिगड़ती कौन है? हँ? महागौरी कही जाने वाली लक्ष्मी जिसकी पूजा पहले होती है देवियों के बीच, हँ, जिसे महागौरी कहते हैं या अंतिम पूजा लेने वाली महाकाली, जिसकी नौवीं मूर्ति के रूप में पूजा होती है? ज्यादा कौन बिगड़ती है? हँ? जगदम्बा जब तामसी बनती है महाकाली, तो ज्यादा बिगड़ती है। फिर महागौरी, गौरीनाथ क्यों कह दिया? इसलिए कह दिया कि उसके संस्कार, जब जो गोरी पार्ट बजाने वाली आत्मा लक्ष्मी की है, उसके साथ स्वभाव-संस्कार मिलकर एक हो जाते हैं, तो लक्ष्मी तो क्या महालक्ष्मी बन जाती है। जिसकी पूजा दीपावली पर, महालक्ष्मी की पूजा दिखाई जाती है।

तो देखो व्यक्तित्व एक ही है। एक ही व्यक्तित्व के द्वारा शिव की आत्मा, मूर्तिमान शंकर वाली आत्मा की बिगड़ी बनाने वाली है। और फिर जो शंकर की आत्मा है, अर्जुन की आत्मा कहें, आदम वो जब सुधर जाता है तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर किसकी बिगड़ी को संभालता है? जिसने बहुत पाप कर लिए। सारी सृष्टि की असुर संघारिणी गाई हुई है। गला काटती जाती, काटती जाती, काटती जाती। क्योंकि कलियुग के अंत में सब असुर बन जाते हैं। राक्षसी स्वभाव वाले। तो ऐसों को भी, बिगड़ी हुई आत्मा वालों को भी अव्वल नंबर ही क्यों न हो, हँ, वो गौरी; महाकाली को भी क्या बना देता? महागौरी बना देता। तो ये एक ही व्यक्तित्व है पर्सनालिटी जिसमें दो आत्माएं काम करती हैं। हँ? और दोनों ही बिगड़ी को बनाने का काम करती हैं। तो ये बच्चों ने ये गीत सुना। इन दो आत्माओं के अलावा, जिन्हें आत्मिक रूप में देखा जाए तो कहा जाता है बापदादा। क्या? बाप माने? आत्माओं का बाप, जिसका कोई बाप नहीं। और दादा, जो शिव के बच्चे निराकार आत्माएं भाई-भाई हैं, बिन्दु-बिन्दु आत्मा भाई-भाई, उनमें जो बड़ा बच्चा है, हँ, आदम, मनुष्य सृष्टि का बीज, वो। तो वो दादा हो गई। भाइयों के बीच में बड़ा भाई माने दादा। दादा क्यों नाम पड़ा? काम किया होगा। हँ? छोटे भाई उसकी बात नहीं मानते, नहीं सुधरते, तो फिर दादागिरी दिखाता है। दुनिया में इसने जितनी दादागिरी कोई आत्मा ने नहीं दिखाई होगी। धरमपिता ने भी नहीं। इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट ने भी नहीं। क्या? ऐसी दादागिरी दिखाता है कि सबको मानना पड़ता है – हाँ, ये हमारा बाप समान दादा है।

तो शिव को भोलेनाथ कहा जाता है। क्या कहा? वास्तव में भोलों का नाथ कौन हुआ? भोली आत्माएं जो बीज रूप आत्माएं हैं मनुष्य सृष्टि की, जिन्हें रुद्र माला का गण कहा जाता है, रुद्र गण, रुद्र माला के मणके के रूप में पूजी जाती, वो गायन है जिनका, तो वो शिव उन बीजरूप आत्माओं का बीजरूप बाप है। वो है भोला। हँ? और नाथ किसका है? जो भोली-भोली आत्माएं हैं उनका नाथ है। और फिर ये जो कहते हैं डमरू बजाते हैं; क्या? अरे डमरू किसके आगे बजाया जाता है? हाथी के आगे? हँ? बन्दर के आगे डमरू बजाया जाता है। तो रामायण में जो रावण के साथ युद्ध दिखाते हैं, बन्दर की सेना दिखाते हैं ना। तो बन्दर जैसे बहुत विकारी बन जाते हैं। पांचों विकारों में इतना जास्ती विकारी कोई प्राणी इस दुनिया में नहीं बनता जितना बन्दर बनता है। तो वो बन्दरों के आगे डमरू बजाते हैं। क्या? डमरू क्या करता है? लेफ्ट साइड, राइट साइड दोनों तरफ बजता है। क्या? जब काला काम करते हैं, तमोप्रधान बन जाते हैं बन्दर, तो वैसा पार्ट बजाता। जब सात्विक बन जाते हैं तो वैसा पार्ट बजाता। सात्विक बनाने की बात आती है तो वैसी ज्ञान की बातें सुनाता। तो डमरू बजाते हैं। कहते हैं ना, दोनों तरफ डमरू बजाते हैं। अभी डमरू तो बन्दर के आगे ही बजाया जाता है ना। माना जो भी इस दुनिया के ह्यूमन बीइंग्स हैं वो कैसे बन गए? जब बन्दरों जैसे स्वभाव-संस्कार वाले बन जाते हैं, तो उनके आगे डमरू बजाते हैं। कौन बजाते हैं? हँ? बन्दरों में जो सबसे बड़ा बन्दर बन जाता है; कहते हैं कि जो बड़ा बन्दर होता है वो कभी पकड़ में नहीं आता। क्या? गवर्मेन्ट कोशिश करती है ना बन्दरों को पकड़ने की। तो वो बड़ा बन्दर पकड़ में नहीं आता। गवर्मेन्ट के लोग समझते हैं अरे, हम तो महाशक्तिशाली हैं। हम पकड़ के दिखाएंगे। लेकिन वो नहीं पकड़ में आता।

तो बताया, डमरू ऐसे बन्दरों के आगे बजाते हैं। होते हैं ना बन्दर। वो ऐसे बन्दर होते हैं। ऐसे-ऐसे बजाए जाते हैं। क्या? कैसे-कैसे बजाए जाते हैं? इस तरफ भी, इस तरफ भी। हाँ। तो इस समय में जो कुछ भी डमरू बजाते हैं; इस समय माना किस समय? हँ? जब शिव ईश्वर इस सृष्टि पर आते हैं, जब ये सृष्टि खूब तमोप्रधान बन जाती है कलियुग के अंत में, कल्पांतकाल में, हँ, तो उस समय कलियुग के अंत और सतयुग के आदि के पुरुषोत्तम संगमयुग पर आते हैं और आकरके क्या करते हैं? इन बन्दरों के सामने डमरू बजाते हैं।

Morning class dated 17.5.1967 was being narrated. The record played was – Bholeynath se nirala. Sweet, sweet, long lost and now found children heard this song. Hm? What kind of children heard? Sweet, sweet children heard. Hm? Which kind of children heard? Sweet, sweet? Arey! Are they sweet, sweet or are you speaking lies? Hm? Do they appear sweet, sweet? Hm? For example, Madhu and Kaikal were demons, weren’t they? So, the senior demon, the elder brother was named Madhu, as sweet as honey. Are they so sweet? Hm? Aren’t they? So, why are you telling sweet, sweet? Why does this Baba speak lies? Sweet, sweet. Hm? He does not speak lies. Baba observes the pure part, the satopradhan stage of every soul like point of light on this world stage. He does not observe the present degraded stage of the children, the soul like children. This is why it was said – Sweet, sweet, long lost and now found (seekiladhey). This is why the word seekiladhey was added. They meet very lovingly. Some parents lose some of their children, don’t they? And when they meet after a very long time, then a lot of affection emerges. So, that love reminds them of which time? Hm? They were so sweet when they were separated. So, seekiladhey children heard this song. What? Bholeynath se nirala (stranger than Bholeynath) is one topic. And the other, Gaurinath se nirala koi aur nahi (there is none as unique as Gaurinath). Are there two or one? There are two. Are they not one personality? Hm? It means there are two souls. it is a Chariot of Arjun, isn’t it? The one who earns purusharth. So, it has the soul of Arjun also and his body like Chariot also. That charioteer God Shiv in that Chariot. So, it is about two souls. One is the soul of the rider of the Chariot (rathi) and the other is the soul of the charioteer (saarathi).

So, it was told, there is none else in the world who corrects the wrong in such manner. Hm? Whose wrongs? Hm? The one in whom He enters spoils the most. Hm? And the spoilt one, who is called personified Shankar, Aadam; the one whose support he takes in practical; whose support does he take? Hm? Whose support does he take? Hm? Write that one word only. Whose support does the personified (moortimaan) Shankar take? Moort means Shankar; not amoort (without a personality). Shiv is amoort, the one who does not have a personality. Whose support does the personified Shankar take? Hm?
(Someone said something.) Does he take the support of Parvati first? You speak lies only. Does he take the support of Gauri first of all? Hm? Whose support does he take in practical? Arey? He takes the support of Jagdamba, who is revealed in the form of Mahakali in the last birth. Hm? Who spoils the most? Hm? Lakshmi, who is called Mahagauri, who is worshipped first among the Devis, hm, who is called Mahagauri or the one who receives the last worship, i.e. Mahakali, who is worshipped in the form of ninth personality? Who is spoilt more? Hm? When Jagdamba, Mahakali becomes degraded then she is spoilt more. Then, why was it said Mahagauri, Gaurinath? She was called so because when her sanskars, when her nature and sanskars become like those of Lakshmi, who plays a fair part, she becomes not just Lakshmi, but Mahalakshmi. Her worship, Mahalakshmi’s worship is depicted on Dipawali.

So, look, the personality is only one. The soul of Shiv corrects the wrongs of the soul of personified Shankar through the same personality. And then the soul of Shankar, call him the soul of Arjun, Aadam, when he reforms, then whose wrongs does he correct on this world stage? The one who has committed a lot of sins. She is famous as the destroyer of demons of the entire world. She goes on cutting, goes on cutting, goes on cutting the heads because in the end of the Iron Age everyone becomes a demon with demoniac nature. So, what does he make even such ones, such spoilt souls, be it the number one soul, hm, that Gauri; what does He make even Mahakali (the darkest one)? He makes her Mahagauri (the fairest one). So, it is only one personality in which two souls work. Hm? And both of them perform the task of correcting the wrongs. So, the children have heard this song. Except these two souls, who, when seen in soul form, are called BapDada. What? What is meant by Father? The Father of souls, who does not have any Father. And Dada, the children of Shiv, the incorporeal souls, brothers, point like souls who are brothers, the eldest child among them, hm, Aadam, the seed of the human world. So, he happens to be Dada. The elder brother among the brothers, i.e. Dada. Why was the name Dada coined? He must have performed a task. Hm? If the younger brothers do not listen to him, do not reform, then he shows his 'big brother' attitude (dadagiri). No soul in the world must have shown as much Dadagiri as this one has showed. Not even any founder of religion. Not even Ibrahim, Buddha, Christ. What? He shows such Dadagiri that everyone has to accept – Yes, this is our brother equal to the Father.

So, Shiv is called Bholeynath (lord of the innocent ones). What has been said? Who is the lord of the innocent ones in reality? Shiv is the seed-form Father of the innocent souls, who are seed form souls of the human world, who are called the gans of the Rudramala, the Rudragan, who are worshipped, praised in the form of the beads of the Rudramala, those seed-form souls. He is bhola (innocent). Hm? And whose lord (naath) is He? He is the lord of the innocent souls. And then it is said that He plays damru (a musical instrument like a small drum). What? Arey, in front of whom is the damru played? In front of the elephant? Hm? Damru is played in front of the monkey. So, the war with Ravana which is depicted in the Ramayana; an army of monkeys is depicted, isn’t it? So, they become very vicious like a monkey. No living being in this world becomes as vicious in the five vices as the monkey becomes. So, He plays the damru in front of those monkeys. What? What does a damru do? It produces sound from both sides – left side, right side. What? When they perform dark actions, when they become tamopradhan monkeys, then He plays such part. When they become pure, then He plays a part accordingly. When the topic of purification arises, then He narrates the topics of knowledge accordingly. So, He plays the damru. It is said, isn’t it that He plays damru on both sides. Now damru is played in front of the monkeys only, isn’t it? It means that how have all the human beings of this world become? When they develop monkey like nature and sanskars, then He plays damru in front of them. Who plays? Hm? The one who becomes the biggest monkey among the monkeys; it is said that the big monkey is never caught. What? Government tries to catch the monkeys. So, that big monkey doesn’t get caught. People in the government think – Arey, we are super powerful. We will catch and show. But he cannot be caught.

So, it was told, damru is played in front of such monkeys. There are monkeys, aren’t there? They are such monkeys. They are played like this. What? In what manner are they played? On this side also and on this side also. Yes. So, whatever damru is played at this time; this time refers to which time? Hm? When God Shiv comes in this world, when this world becomes very tamopradhan in the end of the Iron Age, in the end of the Kalpa, hm, then at that time He comes at the Confluence Age (Purushottam Sangamyug) of the end of the Iron Age and beginning of the Golden Age and what does He do after coming? He plays the damru in front of these monkeys.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2473, आडियो 2959, दिनांक 31.03.2018
VCD 2473, Audio 2959, Date 31.03.2018
प्रातः क्लास 17.5.1967
Morning Class dated 17.5.1967
VCD-2473-Bilingual

समय- 00.01-18.00
Time- 00.01-18.00

प्रातः क्लास चल रहा था - 17.5.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – वो दुनिया में जो साठ साल की अवस्था के बाद, घर-गृहस्थ छोड़करके वानप्रस्थ लेते हैं, वो भले कहते हैं वानप्रस्थ, परन्तु जो अर्थ है वानप्रस्थ का – वाण माने वाणी, प्र माने प्रकष्ठ, स्थ माने स्थित होना। माने प्रकष्ठ रूप से वाणी से परे की स्टेज में स्थित होना। तो वो तो हो ही नहीं पाते हैं। वाणी से प्रकष्ठ रूप में स्थित होना तो तब ही संभव है जब देह का बंधन न हो, और आत्मा निर्बंधन होकरके वाणी से परे धाम जिसे कहा जाता है, वानप्रस्थ धाम, निराकारी धाम, ब्रह्म लोक, अंग्रेज लोग कहते हैं आत्मलोक, सुप्रीम एबोड। मुसलमान कहते हैं अर्श, जो खुदा का घर है। यहाँ खुदा के बच्चे। खुदा खुद रूह है, आत्मा है, तो बच्चे भी आत्मा हैं। रूह का रूप बिन्दु, अति सूक्ष्म तो रूह के बाप का रूप भी, खुदा का रूप भी ज्योतिबिन्दु। बिन्दु की लम्बाई-चौड़ाई थोड़ेही होती है। वो तो इतना सूक्ष्म है अणोणीयांसम। गीता में कहा। तो उसका जो घर है, आत्माओं के बाप का, रूहों के बाप का, और बच्चों का, रूह की स्टेज यानी बिन्दु रूप में टिके हुए जो बच्चे हैं उनका भी घर है। वो है वाणी से परे। क्यों? क्योंकि वहाँ तो देह होती ही नहीं है। वहाँ पांच तत्व ही नहीं होते हैं। पांच तत्वों से परे छठा तुरीया तत्व है जिसके मुकाबले कोई तत्व नहीं है। स्वयं प्रकाशित तत्व है। कैसा प्रकाश? जैसा अग्नि का प्रकाश होता है। तो वहाँ तो जा ही नहीं सकते हैं।

साधु-सन्यासी जो कहते हैं कि हम वानप्रस्थी हो गए। क्योंकि सद्गति दाता यानी वानप्रस्थ में ले जाने वाला तो एक ही है। कौन एक? जो सदा वाणी से परे रहता है। वाणी के बंधन में नहीं आता। कोई कितनी भी वाणी चलाए उससे प्रभावित नहीं होता। वाणी तो क्या दृष्टि से भी प्रभावित नहीं होता। सुनी-सुनाई बातों से तो प्रभावित होने का सवाल ही नहीं। तो जो किसी से प्रभावित नहीं होता, वो है सुप्रीम सोल, सुप्रीम गॉड फादर, जिसके रहने का स्थान है वाणी से परे धाम, ब्रह्म लोक, सतधाम। अभी वो बाबा मत देंगे। क्या? अभी माने कभी? इसी संगमयुग में। अभी माने कभी? इसी संगमयुग में। जैसे और धरमपिताओं ने सौ साल के अन्दर अपने धर्म की स्थापना की, ऐसे ही स्वधर्म की स्थापना करने वाला वो स्वस्थिति में सदा टिकने वाला सदा शिव जब इस सृष्टि पर आता है तो सौ साल के अन्दर ही पुरानी दुनिया को नई दुनिया बनाता है, नरक को स्वर्ग बनाता है। तो अभी का मतलब क्या हुआ? अभी माने संगम में ही। वो परमपिता सुप्रीम गॉड फादर मत देंगे। क्या मत देंगे? कि वाणी से परे धाम कौनसा है जहाँ वाणी का कोई गम नहीं। वहाँ देह ही नहीं। तो मुख और जिह्वा भी नहीं। तो वाणी कैसे होगी?

उस सतधाम में रहने वाला सत्य बाप जिसे खुदा कहा जाता है, क्योंकि खुद आता है। बुलाने से तो आता नहीं। तो जब भी आता है नरक को स्वर्ग बनाने इस दुनिया में तो वो आकरके मत देंगे। माने जिस समय ये वाणी चल रही है, उस समय मत नहीं दे रहे हैं वानप्रस्थ होने की। क्या? मत देंगे माना भविष्य में, वर्तमान में या पास्ट की बात? भविष्य की बात। समझा ना? जैसा-जैसा जो होगा उसको वैसी ही मत देंगे। माने? जैसा-जैसा जो होगा? माना देव आत्मा होगा, स्वर्ग में जन्म लेने वाली आत्मा होगी, स्वर्ग के सुख भोगने वाली आत्मा होगी, हँ, देव किसे कहा जाता है? देने की इच्छा वाला। लेने की इच्छा करने वाला नहीं। तो ऐसी देवआत्मा होगी तो उसको देवआत्मा की मत देंगे। हँ? देव कौन बनते हैं? जो पक्के ब्राह्मण बनते हैं, सो ही देवता बनते हैं। हँ? कच्चे ब्राह्मण तो 16 कला संपूर्ण बनेंगे ही नहीं। तो उन्हें पक्का देवता थोड़ेही कहा जाएगा। वो तो ब्राह्मण भी ब्रह्मा की औलाद बनते हैं तो नीची कुरी के ब्राह्मण बनते हैं। शास्त्रों में ब्राह्मणों की नौ कुरियाँ गाई हुई हैं ना। तो इसी तरह जो क्षत्रीय कुल की आत्माएं होंगी, क्षात्र तेज वाली होंगी, भगवान की छत्रछाया के नीचे पलने वाली होंगी डायरेक्ट, तो उनको वैसी मत देंगे। वैश्य कुल की होंगी, विशियस कर्म करने वाली क्योंकि द्वैतवादी द्वापरयुग से धर्मपिताएं आते हैं तो कामेन्द्रियों से विशियस कर्म करते हैं। क्या? विषय विकार भोगते हैं। तो उनको वैसी मत देंगे। फिर जो कलियुग में शूद्र वर्ण की आत्माएं आती हैं; कहाँ से आती हैं? वहीं सतधाम से, आत्मलोक से, रूहानी दुनिया जिसे कहा जाता है। रूहों का बाप। वो ही खुदा। तो उस खुदा के घर से जो आत्माएं आती हैं द्वापरयुग में विषियस कर्म करने वाली कर्मेन्द्रियों से, उनको वैसी मत देंगे कि वो श्रेष्ठ वैश्य बनें।

फिर कलियुग में जो होंगी वो तो शूद्र; तुलसीदास ने भी क्या कहा? कलियुग के मध्यांत में तुलसीदास आए। उन्होंने तब ही बोल दिया – भये वर्णसंकर सबै। सब शूद्र हो गए। कोई ब्राह्मण, देवता, क्षत्रीय नहीं बचा। तो जो जैसी-जैसी आत्मा होगी, उसको वैसी ही मत देंगे। कोई कहेंगे कि - नहीं बाबा, हम तो अपना ये घरबार लेकरके यहाँ आकरके बैठते हैं। हँ? क्या? हम नीची कुरी के ब्राह्मण क्यों बनें? हम तो यहाँ भगवान सन्मुख पार्ट बजाय रहा है, हम तो डायरेक्ट लेंगे। बोलता है। कौन बोलता है? ब्रह्मा बाबा। नहीं, तुम्हारा समय नहीं है। क्या? ब्रह्मा बाबा ऐसा क्यों बोलता है कि तुम्हारा समय नहीं है? हँ? अरे? जिनको सरेन्डर कर लिया, उनका समय है? और दूसरों का समय नहीं है? प्रैक्टिकल पार्ट बजाने वाले भगवान के पास बैठने का समय नहीं है उसको? कहते हैं – तुमको श्रीमत नहीं मिलती है। फिर? तो कौन कहते हैं वास्तव में ये बात? हँ? कौन बोलता कि नहीं, तुम्हारा समय नहीं है कि बाप के सन्मुख आकरके बैठो, डायरेक्ट पढ़ाई पढ़ो। हँ? तुमको श्रीमत नहीं मिलती है कि घरबार छोड़करके आकर बैठो। ये कौन कहता है? हँ? बोलता। माने कौन बोलता? ब्रह्मा बोलता? अच्छा? ब्रह्मा अगर बोलता तो दूसरे बच्चों को क्यों सरेन्डर करके रख लिया? शिव बाप बोलता। क्या बोलता? कि अभी वो पार्ट चालू नहीं हुआ है। क्या? वो श्रीमत देने वाला श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ पार्टधारी; क्या? जो संसार में श्रेष्ठ-श्रेष्ठ, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ, उससे श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाला कोई इस दुनिया में प्रैक्टिकल है ही नहीं। वो हीरो पार्टधारी, वो अभी मत नहीं दे रहा है। क्या कहा? अभी मत देने वाला मुख से कौन है?

श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ पार्टधारी दादा लेखराज ब्रह्मा को कहें? हँ? क्या प्रूफ कि उनको नहीं कह सकते? हँ? प्रूफ है कि भक्तिमार्ग में भी ब्रह्मा की पूजा नहीं होती है। कोई पूजा नहीं करता। वो पूजनीय नहीं है। क्या? भगवान तो पूजनीय है। अरे! भगवान तो क्या, भगवान जिन्हें बनाता है देवता, नर से नारायण जैसा, वो भी पूजनीय बनते हैं। और ब्रह्मा तो दाढ़ी-मूँछ वाला विकारी मनुष्य है। उसकी तो मूर्तियाँ भी नहीं बनाई जाती, उसके मन्दिर भी नहीं बनाए जाते। तो वो कैसे श्रेष्ठ हो गया? हँ? वो तो योगी भी नहीं है। भोगी है। हँ? जो राजयोग सीखते हैं भगवान से वो तो योगी बनते हैं। हँ? भोग वासनाएं त्याग देते हैं। तो वो श्रीमत देने वाला कैसे हो गया श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ? क्या? कौन देगा श्रीमत? जो पहले खुद श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बने तब दूसरों को श्रीमत दे। तो बताया, तुमको अभी श्रीमत नहीं मिलती है। क्या? तुम्हारा अभी समय नहीं है श्रीमत लेने का। देखेंगे, नहीं, ये तो छूटा हुआ है; क्या? आगे चलके ये बात देखेंगे। क्या देखेंगे? कि ये निर्बंधन है। इसके ऊपर कोई बंधन नहीं है। जो बंधन वाला पंछी होता है वो ऊँची उड़ान भर सकता है? भर ही नहीं सकता। तो निर्बंधन देखेंगे तो यहाँ बैठने की परमीशन देंगे। और निर्बंधन कौन बनते हैं? जब पुरुषोत्तम संगमयुग में ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग कराने के लिए, हँ, आत्माओं का बाप शिव आते हैं, तो निर्बंधन वो बनते हैं जिन्होंने पूर्वजनम में दूसरों को बांधा-बूंधी न की हो। क्या? स्वतंत्र रहो और स्वतंत्र रहने दो। नाक पकड़ के किसी को न चलाया हो, कान पकड़ के। सबको कर्म करने की स्वतंत्रता दी हो।

A morning class dated 17.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was – In that world, people renounce their household and enter into vaanprastha after attaining the age of sixty years; although they say vaanprastha, but the meaning of vaanprastha Vaan means Vani (speech), pra means prakashth (special), stha means to become constant (sthit hona). It means – to become constant in a stage beyond the stage of speech in a special manner. So, they are unable to do that. To become constant in a stage beyond speech in a special manner is possible only when there is no bondage of the body, and the soul becomes free from bondages and goes to a place which is said to be beyond speech, vaanprasth dhaam, incorporeal abode, Brahm lok, Englishmen call it the Soul World, the supreme abode. Muslims call it Arsh, which is Khuda’s (God’s) home. Here, the children of Khuda. Khuda Himself is a soul, a spirit, so, the children are also souls. The form of a soul is a point, very minute, so the form of the soul’s Father, form of Khuda is also a point of light. There is no length and breadth of a point. He is so subtle – Anoneeyaamsam. It has been said in the Gita. So, His home, the home of the Father of souls and that of the children; it is also the home of those children, who have become constant in a soul’s stage, i.e. point form. That is beyond speech (Vani). Why? It is because the body does not exist there at all. The five elements do not exist there at all. There is a sixth unique element beyond the five elements which cannot be compared to any other element. It is a self-luminous element. What kind of light? It is like the light of the fire. So, they cannot go there at all.

Sages and saints say that we have become vaanprasthis because the bestower of true salvation upon everyone, i.e. the one who takes you to vaanprastha is only one. Who is that one? The one who always remains beyond speech. He does not enter into the bondage of speech. One may speak to any extent, He is not influenced by him. Not just speech, but He is not influenced even by the vision. There is no question at all of being influenced by hearsay. So, the one who is not influenced by anyone is the Supreme Soul, the Supreme God Father, whose place of residence is the abode beyond speech, the Brahm lok, the Satdhaam (abode of truth). Now that Baba will give directions. What? Now refers to which time? In this very Confluence Age. Now refers to which time? In this very Confluence Age. Just as other founders of religions established their religion within hundred years; similarly, when the one who establishes the swadharma, the one who always remains constant in swasthiti comes to this world, then He transforms the old world to new world, hell to heaven within 100 years. So, what is the meaning of ‘now’? 'Now' means in the Confluence Age itself. That Supreme Father Supreme God Father will give directions. Which directions will He give? That which is that abode beyond the stage of speech where there is no sorrow of speech. There is no body at all there. So, there is no mouth and tongue as well. So, how will there be any speech?

The true Father, who lives in that true abode, who is called Khuda because He comes Himself (khud). He does not come on being called. So, whenever He comes to this world to transform the hell to heaven, then He will come and give directions. It means that the time when this Vani is being narrated, at that time He was not giving directions about becoming vaanprasth. What? He will give directions; does it mean in future or at present or is it about the past? It is a topic of the future. Did you understand? Whatever kind of person someone is, He will give directions accordingly. What does it mean? Whatever kind of person someone is? It means that if someone is a deity soul, if someone is a soul which gets birth in the heaven, if someone is a soul which experiences the happiness of heaven, hm; who is called ‘dev’ (deity)? The one who desires to give. The one who doesn’t wish to take. So, if someone is such a deity soul, then he will be given directions fit for deity souls. Hm? Who becomes deities? Those who become firm Brahmins become deities. Hm? Weak Brahmins will not become perfect in 16 celestial degrees at all. So, they will not be called firm deities. When those Brahmins also become the children of Brahma, then they become Brahmins of lower category. Nine categories of Brahmins are praised in the scriptures, aren’t they? So, similarly, the souls of the Kshatriya clan, with the lustre of Kshatriyas, those who receive direct sustenance under God’s canopy, they will be given directions accordingly. If someone belongs to the Vaishya clan, which performs vicious actions because when founders of religions come from the dualistic Copper Age, then they perform vicious actions through the organs of lust. What? They experience vicious pleasures. So, they will be given directions accordingly. Then the souls of Shudra class come in the Iron Age; from where do they come? They come from the abode of truth, from the Soul World, which is called the spiritual world. The Father of souls. He is the same Khuda. So, the souls which come from the home of that Khuda in the Copper Age and perform vicious actions through the organs of action, they will be given directions accordingly so that they become righteous Vaishyas.

Then those which are in the Iron Age will be Shudras; What did Tulsidas also say? Tulsidas came in the end of the middle portion of the Iron Age. He told at that time itself – Bhaye varnasankar sabai. Everyone became Shudras. Nobody remained Brahmins, Deities, Kshatriyas. So, as is the soul, so shall be the directions given to them. Some will say – No, Baba, we will come with our household and sit here. Hm? What? Why should we become Brahmins of lower category? God is playing His part face to face; we will obtain directly. He speaks. Who speaks? Brahma Baba. No, it is not your time. What? Why does Brahma Baba say that this is not your time? Hm? Arey? Is it the time for those who were allowed to surrender? And is it not the time for others? Does he not have time to sit with God, who plays His part in practical? He says – You do not get Shrimat. Then? So, who says this topic actually? Hm? Who says that no, this is not your time that you come and sit face to face with the Father and study direct knowledge? Hm? You do not get Shrimat to leave the household and come and sit (here). Who says this? Hm? Says. It means who says? Does Brahma say? Achcha? If Brahma says, then why did he allow other children to surrender? Father Shiv speaks. What does He say? [He says] That that part has not yet started. What? That giver of Shrimat, the most righteous actor. What? There is no one in this world in practical who is more righteous than the one who plays the most righteous part in the world at all. That hero actor is not giving directions now. What has been said? Who is giving directions through the mouth now?

Should Dada Lekhraj Brahma be called the most righteous actor? Hm? What is the proof that he cannot be called? Hm? The proof is that Brahma is not worshipped on the path of Bhakti as well. Nobody worships. He is not worshipworthy. What? God is worshipworthy. Arey! Not just God, those who are made deities, Narayan from nar (man) by God also become worshipworthy. And Brahma is a vicious human being with beard and moustache. His idols are also not sculpted; his temples are also not constructed. So, how did he become righteous? Hm? He is not even a yogi. He is a bhogi. Hm? Those who learn rajyog from God become yogis. Hm? They renounce pleasures. So, how can he be the most righteous one to give Shrimat? What? Who will give Shrimat? The one who himself becomes most righteous can give Shrimatto others. So, it was told that you do not get Shrimat now. What? It is not your time to obtain Shrimat now. It will be seen, no, this one is free; what? This will be seen in future. What will be seen? That this one is free from bondages (nirbandhan). This one does not have any bondage. Can a bird with bondages fly high? He cannot fly at all. So, when it is observed that someone is free from bondages, then he/she will be given permission to sit here. And who becomes free from bondages? When Father Shiv comes to enable the shootingof the broad drama in the Purushottam Sangamyug, then those who haven’t bound others in the past births become free from bondages (nirbandhan). What? Be free and let others be free. The one who hasn’t made any one to act by holding him by his nose, his ears. The one who has given freedom to everyone to perform actions.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 14 Jan 2020

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2474, आडियो 2960, दिनांक 01.04.2018
VCD 2474, Audio 2960, Date 01.04.2018
प्रातः क्लास 17.5.1967
Morning Class dated 17.5.1967
VCD-2474-Bilingual

समय- 00.01-15.46
Time- 00.01-15.46


प्रातः क्लास चल रहा था - 17.5.1967. दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी – भक्त लोगों से पूछना है – तुम भगवान को सर्वव्यापी क्यों कह देते हो जबकि जानते हो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आबादी लगातार बढ़ती जाती है? सतयुग के आदि से लेकर कलियुग के अंत तक प्राणी मात्र की संख्या में बढ़ोतरी ही होती है। तो ये पार्ट बजाने वाली आत्माएं इस पांच तत्वों की दुनिया में आकरके पंच तत्व का शरीर धारण करती है, तो कहीं बाहर से आती हैं ना। जहाँ से आती हैं उसे तुम कहते हो सुप्रीम एबोड, अर्श, परमधाम, ब्रह्मलोक। तो उस ब्रह्मलोक से जहाँ से आती हैं उस लोक का कोई मुखिया होगा ना। जो मुखिया है वो ब्रह्म महततत्व का मुखिया है और आत्माओं का भी मुखिया है। जो बिन्दु-4 निराकार आत्माएं ब्रह्म लोक में पड़ी रहती हैं। नंबरवार इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आती हैं। कल्प पूर्व में जब ब्रॉड ड्रामा की शूटिंग होती है तो जिसने जैसा ज्ञान उठाया, जिसने जैसा पुरुषार्थ किया, उस परमब्रह्म को, परमब्रह्म में रहने वाली आत्माओं ने नंबरवार पुरुषार्थ किया ना। तो जिस क्रम से पुरुषार्थ किया, उसी क्रम से उनको भेज देते हैं। तो भेजने वाला कोई एक हुआ ना। जो एक हुआ, वो भी इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर बीज ही कहा जाएगा।

मनुष्य सृष्टि में मनुष्य ही मुख्य है प्राणी। तो मनुष्य सृष्टि का जो बीज है उसको आदि पुरुष, आदम, एडम कहा जाता है। वो सारी मनुष्य सृष्टि का पिता है। परन्तु जब पिता बनता है तब तो पत्थर बुद्धि हो जाता है। आत्मा जैसे पथराय जाती है। तो, जो ब्रह्म लोक है, आत्माओं का लोक, बिन्दु-बिन्दु निराकार आत्माओँ का लोक है, उस लोक का जो मुखिया आत्मा है, सबसे जास्ती निराकारी स्टेज में रहने वाली है, और जन्म-मरण के चक्र से भी न्यारी है, गर्भ से उसका जन्म कभी होता ही नहीं, वो आत्मा इस सृष्टि पर आती है, और उसी मुकर्रर रथ में प्रवेश करती है जो सारी मनुष्य सृष्टि का बीज है। जिसको हिन्दू लोग कहते हैं त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः। पुराने ते पुराना पुरुष है इस सृष्टि रूपी रंगमंच का। तो साबित होता है ना कि एकव्यापी है या अनेकव्यापी है, सर्वव्यापी है? जब भेज देते हैं तो ऊपर में रहने वाला है ना। सबको भेज देते हैं। और जब सब आत्माओं को भेज देते हैं, तो अगर आत्माओं में कोई मुखिया है, उसको भेजेंगे तो उसकी जो संस्था है; सं माने संपूर्ण, स्थ माने स्थिर रहने वाली। जो उस मुखिया के स्वरूप में जो भी स्थिर रहने वाले हैं उन आत्माओं को भी तो भेजना पड़ेगा ना।

अब इस सृष्टि के मुखियाएं नंबरवार हैं। दुनिया में जितने भी धर्म हैं, नंबरवार आने वाले धरमपिताएं हैं, वो अपनी-अपनी धार्मिक संस्थाओं के मुखिया हैं। उनको पहले भेजते हैं। फिर उनके फालोअर्स को भी भेजते हैं। उन-उन धरमपिताओं की बनाई हुई संस्था में उन फालोअर्स का आत्मा कहो, मन-बुद्धि कहो, विशेष आस्था है। तो उनकी संस्था हो गई। संस्था का मतलब ही है – सं माने संपूर्ण, स्था माने स्थायी; निश्चयबुद्धि रहते हैं। तो भेजेंगे ना संस्था वालों को भी। तो सबसे आएंगे उन-उन संस्थाओं के मुखिया। जैसे सूर्य है, सारी दुनिया का मुखिया है। ग्रह नक्षत्रों का भी मुखिया है। और इस पृथ्वी पर, जहाँ जीवन है, आत्माएं आकर जीवन धारण करती हैं, पांच तत्वों का शरीर लेती हैं, जीव आत्मा कही जाती हैं, तो सबका पोषण करता है। सूर्य का प्रकाश सबका पोषण करता है ना। परन्तु वो सूर्य तो जड़ है। ये तो ज्ञान सूर्य की बात है। ज्ञान कोई जडत्वमयी नहीं होता है। ज्ञान तो चैतन्य आत्मा में होता है। तो इस मनुष्य सृष्टि में वो मनुष्य सृष्टि के बाप को भी आकरके पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बनाता है अपने संग के रंग से। तो वो इस सारी सृष्टि का जैसे ज्ञान सूर्य हो गया। जैसे सूर्य ग्रह, नक्षत्र, सितारों, उपग्रह, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश और जो भी प्राणीमात्र हैं, सबसे डिटैच होकर रहता है। सूर्य कोई में अटैच होके रहता है क्या? सूर्य की कोई में आसक्ति नहीं। नहीं आसक्ति है तो भी सबको प्रकाश देता है। ऐसे ही वो ज्ञान सूर्य शिव है। जो भी ज्योतिबिन्दु-बिन्दु आत्माएं हैं प्राणीमात्र की, मनुष्यमात्र की, देवात्माओं की, राक्षसी आत्माओं की, उन सब आत्माओं का, बिन्दु-बिन्दु निराकार आत्माओं का निराकार बाप है।

वो गीता में अक्षर कहा गया है। एक ही आत्मा है। जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आकर पार्ट भी बजाती है साकार शरीर के द्वारा, भले गर्भ से जन्म नहीं लेती, परन्तु गीता में तो लिखा है प्रवेष्टुम्। मैं प्रवेश करने योग्य हूँ। तो मनुष्य सृष्टि को जो भी हीरो पार्टधारी, बीज रूप आत्मा है उसमें परमानेन्ट्ली प्रवेश करती है। और आत्माओं का मुखिया है। परन्तु जब शरीर रूपी रथ में प्रवेश करती है तो जिस शरीर में प्रवेश करती है, उस शरीर का जो मालिक है; कौन? आदम, मनुष्य सृष्टि का बीज बाप। बीज को बाप कहा जाता है ना। तो उस बीज को आप समान बनाती है। माना पत्थरबुद्धि से संग के रंग के द्वारा कहा जाता है कि आप समान निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी ज्योतिबिन्दु आत्मा बना देती है। परन्तु क्या वो निराकार ज्योतिबिन्दु सुप्रीम सोल बनाने वाला है? बनाता है? हँ? अगर बनाता है कहें, तो और जो ज्योतिबिन्दु आत्माएं हैं, बिन्दु-बिन्दु आत्मा-आत्मा भाई-भाई, वो तो कहेंगे कि ये, ये तो पार्शलटी हो गई। तो वो किसी को बनाता नहीं है। वो सिर्फ आकरके इस सृष्टि पर अजन्मा होने के कारण, सारी सृष्टि का ज्ञान होने के कारण अपना, जिसमें प्रवेश करता है उसका और सारी सृष्टि के प्राणीमात्र का ज्ञान दे देता है। जानकारी देता है। बाकि वो बनाता करता किसी को नहीं है। इसलिए अकर्ता गाया हुआ है। अभोक्ता गाया हआ है। क्योंकि जो भोगेगा; सुख भोगेगा, दुःख भोगेगा, तो उसका उजूरा भी प्राप्त करेगा। सुख भोगेगा, सुख लेगा कोई के द्वारा तो उसे सुख देना पड़ेगा। दुःख देगा तो दुःख लेना पड़ेगा। लेकिन वो तो अनासक्त है। सदैव इस सृष्टि पर आते हुए, पार्ट बजाते हुए भी अनासक्त है। इसलिए वो अभोक्ता है। और उसे अक्षर कहा है गीता में। एक ही मात्र आत्मा है जो कभी क्षरित नहीं होती शक्ति से। कौनसी शक्ति? आत्मभाव की शक्ति।

A morning class dated 17.5.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the second page was – You should ask the devotees – Why do you call God omnipresent when you know that the population on this world stage is increasing continuously? The number of living beings has been increasing from the beginning of the Golden Age to the end of the Iron Age. So, these souls which play part by coming to this world of five elements and acquire a body made up of five elements, then they come from somewhere outside, don’t they? The place from where they come, you call it Supreme Abode, Arsh, Paramdhaam, Brahmlok. So, there must be a head of that Brahmlok from where they come, will there not be? The head is the head of the supreme element Brahm and He is the head of the souls as well, the point like incorporeal souls which remain lying in the Brahmlok. They come to this world stage numberwise. Kalpa ago, when the shooting of the broad drama takes place, then whoever grasped whatever kind of knowledge, whoever made whatever kind of purusharth, that Parambrahm, the souls living in the Parambrahm made numberwise purusharth, didn’t they? So, in whichever order they made purusharth, in the same order they are sent. So, there is someone who sends, isn’t it? The one who sends will also be called the seed on this world stage.

Human being himself is the main living being in the human world. So, the seed of the human world is called Aadi Purush, Aadam, Adam. He is the Father of the entire human world. But when he becomes the Father, then he develops a stone-like intellect. It is as if the soul becomes a stone. So, the chief soul of the Brahmlok, the abode of souls, the abode of the point-like incorporeal souls, who remains in the incorporeal stage more than anyone else and is also beyond the cycle of birth and death, is never born through the womb, that soul comes to this world and enters in the same permanent Chariot which is the seed of the entire human world, whom the Hindus call – Twamaadidevah purushah puraanah. He is the oldest man of this world stage. So, it proves whether He is ekvyaapi (present in one) or anekvyaapi (present in many), sarvavyaapi (present in all)? When He sends, then He is the one who lives above, doesn’t He? He sends everyone. And when He sends all the souls, then if there is any chief of the souls, and if he is sent, then his institution (samstha), sam means sampoorna (complete), stha means the one who remains constant. The souls, which remain constant in the form of that chief (mukhiya) will also have to be sent, will they not be?

Well, the heads of this world are numberwise. All the religions in the world and the founders of the religions who come numberwise are the heads of their religious institutions. They are sent first. Then their followers are sent. The soul or mind and intellect of those followers have special faith in the institution established by those founders of religions. So, that is their institution (sanstha). Sanstha means – San, i.e. sampoorna, stha means permanent (sthaayi); they remain nishchaybuddhi (constant faith). So, those running the institution will also be sent, will they not be? So, first of all the heads of those institutions will come. For example, there is the Sun; he is the head of the entire world. He is the head of the planets and constellations also. And on this Earth, where there is life, souls come and assume life, assume the body made up of five elements; they are called jeevaatmaa; so, it sustains everyone, doesn't it? The light of the Sun sustains everyone, doesn’t it? But that Sun is non-living. This is about the Sun of Knowledge. Knowledge is not inert. Knowledge is contained only in a living soul. So, in this human world, He comes and transforms even the intellect of the Father of the human world also from stone-like (pattharbuddhi) to elixir-like (paarasbuddhi) through the colour of His company. So, it is as if he is like the Sun of Knowledge of this entire world. Just as the Sun remains detached from the planets, constellations, stars, satellites, Earth, water, air, fire, sky and all the living beings. Does the Sun remain attached to anyone? The Sun does not have attachment in anyone. Even if it does not have any attachment, yet it gives light to everyone. Similar is that Sun of Knowledge Shiv. He is the incorporeal Father of all the points of light like souls of the living beings, the human beings, the deity souls, the demoniac souls.

He has been called ‘akshar’ in the Gita. There is only one soul which comes to this world stage and plays a part also through the corporeal body, although it does not get birth through the womb, yet it has been written in the Gita – Praveshtum. I am worthy of entering. So, it enters permanently in the hero actor, the seed form soul of the human world. And He is the chief of souls. But when He enters in the body like Chariot, then the body in which He enters, the owner of that body; who? Aadam, the seed Father of the human world. The seed is called the Father, isn’t he? So, He makes that seed equal to Himself. It means that it transforms him from a stone-like intellect to incorporeal, viceless, egoless point of light soul equal to Himself through His colour of company. But is that incorporeal point of light Supreme Soul the maker? Does He make? Hm? If we say that He makes, then the other points of light souls, point-like souls, brothers will say that this is partiality. So, He does not make anyone. He just comes to this world and being ajanma, because of having the knowledge of the entire world, the one in whom He enters, He gives his knowledge and gives the knowledge of the living beings of the entire world. He gives information. But He does not make anyone. This is why He is called Akarta (non-doer). He is praised as Abhokta (the one who doesn't seek pleasures) because the one who experiences, if he experiences happiness, if he experiences sorrows, then he will also receive its fruits. If he experiences happiness, obtains happiness through someone, then he will have to give him happiness. If he gives sorrows, he will have to receive sorrows. But He is detached. Despite coming to this world, despite playing His part He is always detached. This is why He is abhokta. And He has been called Akshar in the Gita. His is the only soul whose power is never discharged. Which power? The power of soul consciousness.

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