Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 18 May 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2704, दिनांक 18.11.2018
VCD 2704, Dated 18.11.2018
प्रातः क्लास 21.9.1967
Morning Class dated 21.9.1967
VCD-2704-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.50
Time- 00.01-17.50


प्रातः क्लास चल रहा था - 21.9.1967. सद्गुरुवार को पांचवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि झूठ लिखने से कितना नुकसान हो जाता है। गीता को खंडन करने से, सर्वव्यापी करने से भारत का सारा महत्व उड़ जाता है। परन्तु ड्रामा बना हुआ है। ऐसे नहीं कि अभी आते हैं बाबा सबको सद्गति करने तो फिर कोई सुधर जाएंगे, ये सब सुधर जाएंगे। ऐसे तो है नहीं। कि भारत की बात है कि भारत बच्ची बहुत ऊँचे ते ऊँचा खंड है। और भारत की महिमा अपरमपार है। हँ? भारत की महिमा अपरमअपार है? कि शिवबाबा की महिमा अपरमअपार है? हँ? जहाँ शिवबाबा आते हैं, जिसकी महिमा अपरमअपार कही जाती है, तो वो उसका जन्म इसमें है। किसमें? भारत में। बस। उनका, उनका कोई स्टाम्प नहीं है। किनका? हँ? किनका स्टाम्प नहीं है? हँ? हँ? उनका जनम भी नहीं होता। कुछ नहीं। और बाकि ये साधु-संत, महात्मा, फलाना, टीरा, ये, वो, माइयों का भी, फलाने का, उनका बहुत स्टैम्प बनाते हैं।

तो अभी कैसे उनको समझावें, हँ, जो इनका महत्व भी सबको मालूम पड़े। किनका महत्व? हं? भारत का। दुनिया में कोई को उनके महत्व का पता ही नहीं। अभी जैसे बाबा वाणी चलाते हैं ना। जाकरके जहाँ ये सोसाइटियां होती हैं, भारत के जो प्राचीन योग आश्रम हैं, बस, वहाँ ये हैं, वहाँ जो बस जाते हैं प्राचीन भारत का योग सिखलाने के लिए, अभी वो प्राचीन योग आश्रम नाम रखा है। वो तो कोई काम तो करके दिखाते नहीं। तो वो कोई सिखलाय ही नहीं सकते। जब तुम जाकरके वहाँ बताएंगे कि भारत क्या खंड है और खंडों के मुकाबले, तुम्हारे बताने से देखो भारत का मान हो जाएगा ना। और मान बढ़ेगा ना बच्ची। तो जानते तो हैं नहीं कि भारत का प्राचीन राजयोग ये भारत में ही सिखाया गया था। परन्तु किसने सिखाया? हँ? बताओ भाई। बाबा पूछते हैं। हँ? किसने सिखाया? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) शिवबाबा ने सिखाया? अच्छा! शिव बाप ने नहीं सिखाया? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) ओरिजिनल शिवबाबा ने सिखाया। हँ? अभी संगमयुग में कहेंगे ओरिजिनल शिवबाबा। शिव प्लस बाबा।

फिर इस सृष्टि में तो सदा कायम शिवबाबा बताया। तो वो ओरिजिनल नहीं हुआ? वो भी ओरिजिनल हुआ? झूठ। दो-दो बातें कर दी। ओरिजिनल तो एक ही होता है कि दो होते हैं? हँ? एक ही तो होता है ओरिजिनल। बाकि तो फिर डुप्लिकेट कापियाँ निकलती हैं। हँ? जब इब्राहिम आएगा तो बस सारी दुनिया ये समझेगी बस ये ही है ऊँचे ते ऊँचा इस सृष्टि में। समझेगी ना? इब्राहिम का मुकाबला कोई दुनिया में करेगा उस समय? उस समय? जब इब्राहिम आता है परमधाम से सृष्टि पर तो उसका मुकाबला कोई करता है? उसे कोई समझाय सकता है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) विक्रमादित्य के गुरु समझाय सकते हैं। फिर समझाया क्यों नहीं? कायके लिए नाक रगड़ गए? हँ? क्यों? दुनियाभर के शास्त्र-वास्त्र बनाने की क्या जरूरत? उसको समझाय देते तो इस्लाम धरम की बात चलती ही नहीं। क्या? कर्मेन्द्रियों से, भ्रष्ट इन्द्रियों से वो काम कर ही नहीं पाता। समझाया? हँ? हँ? अरे! अरब देश में भले खदेड़ा, खदेड़ा, तो उससे क्या होता है? वो जो बाते हैं वो यहाँ नहीं आती वो जो सुनाता है? हँ। तो उन बातों से प्रभावित हो गए। तो अकेले इब्राहिम की बात नहीं है। जो-जो भी धरमपिताएं जब-जब आए, उनका मुकाबला किसी ने इस दुनिया में, किसी ने नहीं कर पाया। तो? लोग क्या समझेंगे? ये भगवान ही है ना। हँ? तो, तो ऋषि-मुनियों ने अनुमान लगा लिया कि हाँ, ये तो भगवान ही है। हँ? जो इस दुनिया में धरमपिताएं आते हैं, अपना-अपना वर्चस्व उस समय जमाते हैं, तो भगवान ही उनमें प्रवेश करता है। ये भगवान के ही अवतार होते होंगे। अब उन्हें ये पता नहीं है कि ये तो दूसरे धर्म स्थापन हुए हैं। क्या? उन्होंने तो अपनी मनमत मिक्स की है।

भगवान ने जो सिखाया वो तो किसी को मालूम ही नहीं है। सिखलाया है ना बच्ची। हँ? भारत में भगवान ने सिखलाया। तो, जब नाम दिया भगवान। हँ? तो किसको कहें भगवान? निराकार ज्योतिबिन्दु को कहें भगवान या वो जिसमें प्रवेश करता है उसको कहें भगवान? क्योंकि भगवान तो हैविन स्थापन करता है। हँ? सुप्रीम गॉ़ड फादर, हैविनली गॉड फादर। और तो कोई नहीं स्थापन करता। भले इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, वगैरा आते हैं इस सृष्टि पर। और उनका मुकाबला दुनिया में कोई नहीं कर सकता। फिर भी वो कोई स्वर्ग स्थापन नहीं करते हैं। दुनिया तो फिर भी और ही दुख की दुनिया बनती जाती है।

तो कह दिया, लिख दिया शास्त्रों में कृष्ण ने राजयोग सिखाया। और वो भी किस कृष्ण को समझ लिया? हँ? सतयुग में, इस सृष्टि के आदि में समझा कि वो कृष्ण ही था जो सतयुग के आदि में जनम लेता है। जनम क्या लेता है? वो तो पता नहीं कहाँ से आ गया सागर में पीपल के पत्ते पर। किसी को पता चला कहाँ से आ गया? नहीं। तो ये सिखलाया है कि कृष्ण ने राजयोग सिखलाया। ये हठयोग, बताओ, फिर ये हठयोग कब आया और कहाँ से आया? हँ? फिर जबरियन लिख दिया कि सतयुग के 16 कला संपूर्ण, हँ, बच्चे ने सिखलाया, सो भी उसको छोटा बच्चा दिखाते हैं। हँ? छोटा बच्चा कैसे राजयोग सिखाएगा? राजयोग से तो इन्द्रियां कंट्रोल की जाती हैं। और छोटा बच्चा इन्द्रियों को कंट्रोल करना कैसे जानेगा? नहीं। ये सभी सन्यासियों के हद के योग हैं। क्या? किसके? सन्यासियों के? अच्छा? तो द्वापर के आदि में सन्यासी थे क्या? हँ? द्वापर के आदि में तो सन्यासी नहीं थे। वो सन्यासी तो आते ही हैं जब द्वापर का अंत होता है उस समय आते हैं। हँ? अंत के समय। और कलियुग से पहले आते हैं। क्या? कलियुग शुरू होने से पहले आते हैं। तो क्या ये बात सही है? उससे पहले सन्यास नहीं था?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। वास्तव में तो जो बौद्धी धरम पहले आया ना तो बौद्धियों में जब उन्होंने वो अपने रहने के लिए वो स्तूप वगैरा बनाए ना। तो उनमें सब बौद्धी स्त्रीयां, पुरुष इकट्ठे रहने लगे। और वहीं से व्यभिचार फैल गया। फिर वो कहीं छुपता तो है नहीं। वो जब पता चला तो बस उनको वैराग आ गया। बस, वहीं से ही सन्यास शुरू हो गया था। तो, हाँ, ये है कि उसका जो सन्यास का गहरा रूप जो है वो शंकराचार्य से आया।

तो बताया, ये जो शंकराचार्य वगैरा हैं ना, ये पढ़े हुए हैं, अच्छे पढ़े हुए हैं। और जो अक्सर करके फिलासफर कहलाते हैं, या जिनको ये आजकल तो विदेशों में डॉक्टरी, फिलॉसफी की उपाधि मिलती है ना तो जो बहुत शास्त्र पढ़े हुए हैं वो यहाँ आएं और सुधर जाएं अच्छी तरह से। हँ? कौन यहाँ आएं? हँ? यहाँ भारत के शंकराचार्य ने तो जबरदस्त हठयोग निकाला। लेकिन जो विदेशी फिलॉसफर आए, हँ, यहाँ आए ना। तो वो जिनको डॉक्टर की उपाधि मिलती है, हँ, वो तो बहुत शास्त्र पढ़े हुए हैं। जैसे मैक्समूलर है, आप्टे है, विलियन है और ये, ये क्या नाम, और भी हैं। तो उन्होंने तो बहुत शास्त्रों का अध्ययन किया और वो, वो अगर आएं यहाँ कहें कि मैंने तो सभी शास्त्र पढ़े हुए हैं। परन्तु नहीं। उन्होंने भले पढ़े हैं लेकिन बाप जो पढ़ाते हैं वो ही राइट है। हँ? बाकि पढ़े हुए ये सब रांग हैं। और भारत की आकरके बतावें। वो जो सबका लिट्रेचर पढ़ा हुआ है, शास्त्रकारों का बनाया हुआ, हँ, वो जब यहाँ आवें तो उनको पता चले कि सबका लिब्रेटर कौन है और गाइड कौन है? उनका जन्म होता है। ये बात उनकी बुद्धि में बैठे। तो बस वो उनके ही बात मानेंगे तो तीर्थ हुआ ना बड़े ते बड़ा। तीर्थ माने? तीर माने किनारा। थ माने स्थान। एक ठिकाने लगाने का स्थान। अभी तो अनेक धरम फैले हुए हैं। कोई कहते हैं काबा में जाओ। तो तुम किनारे के स्थान में लगेंगे। कोई कहते हैं येरूसेलम में जाओ। कोई कहते हैं, भारतवासी तो कहते हैं ढ़ेर सारी जगह बता दी। बद्रीनाथ जाओ, हँ, जगन्नाथ जाओ। जाने क्या-क्या बताय दिये। तो असली तीर्थ तो बाप आकरके बताते हैं। क्या? क्या हुआ बड़े ते बड़ा तीर्थ? हँ? कहाँ जाना है? बड़े ते बड़ा तीर्थ हुआ ये भारत।

A morning class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the fifth page on Thursday was that one suffers so much loss by writing lies. By negating the Gita, by making Him omnipresent the entire importance of India (Bhaarat) vanishes. But the drama has been made. It is not as if Baba comes now to cause everyone’s true salvation (sadgati), so then everyone will reform, all these will reform. It is not so. Daughter it is about Bhaarat that Bhaarat is the highest on high land. And India’s glory is immense. Hm? Is India’s glory immense? Or is ShivBaba’s glory immense? Hm? The place where ShivBaba comes, the one whose glory is said to be immense, then His birth is in this one. In what? In Bhaarat. That is it. He does not have any stamp. Who? Hm? Whose stamp is not available? Hm? Hm? He does not get birth as well. Nothing. And they make many stamps of these sages and saints, mahatmas, etc, of the ladies, etc.

So, how should we now explain to them so that everyone knows about the importance of this one? Whose importance? Hm? Of Bhaarat. Nobody in the world knows about its importance. Now just as Baba narrates Vani, doesn’t He? There are these societies, the ancient Yoga ashrams of India, that is it, they are there, they settle there to teach the Yoga of ancient India; now that ancient Yoga ashram name has been coined. They do not perform any task and show. So, nobody can teach that at all. When you go there and tell that what kind of a land is India in comparison to other lands, then after you tell, look, India will command so much respect, will it not? Daughter, its respect will increase, will it not? So, they do not know that the ancient rajyog of India was taught in India only. But who taught? Hm? Speak up brother. Baba asks. Hm? Who taught? Hm?
(Someone said something.) Did ShivBaba teach? Achcha! Didn’t Father Shiv teach? Hm? (Someone said something.) Original ShivBaba taught. Hm? Now it will be said original ShivBaba in the Confluence Age. Shiv plus Baba.

Then ShivBaba was mentioned to be ‘sadaa kaayam’ (permanent) in this world. So, is he not original? Is he also original? Lie. You spoke in two ways. Is the original one or two? Hm? Only one is original. All others are duplicate copies that emerge. Hm? When Ibrahim comes, then that is it; the entire world will understand that this one alone is the highest on high in the world. It will understand, will it not? Will anyone be able to counter Ibrahim at that time? At that time? When Ibrahim comes from the Supreme Abode to this world, then does anyone counter him? Can anyone explain to him? Hm?
(Someone said something.) Vikramaditya’s guru can explain. Then why didn’t he explain? Why did he rub his nose? Hm? Why? Where is the need to write all the scriptures, etc. of the world? Had he explained to him, then the topic of Islam would not have progressed at all. What? He would not have been able to work through the organs of action, through the unrighteous organs at all. Did he explain? Hm? Hm? Arey! Although he was driven away to the Arab country, what happens by that? Do his topics that he narrates not reach this place? Hm. So, they were influenced by his topics. So, it is not about Ibrahim alone. Whenever any founder of religion came, nobody in this world could counter him. So? What will the people think? He is God himself, isn’t he? Hm? So, so the sages and saints made a guess that yes, this one is God only. Hm? [They think that] When the founders of religions come in this world, when they exert their dominance at that time, then God Himself enters in them. They must be incarnations of God only. Well, they do not know that these are other religions that have been established. What? They have mixed the opinion of their mind.

Nobody knows as to what God taught. He has taught, hasn’t He daughter? Hm? God taught in India. So, when the name has been coined as God, hm, so who should be called God? Should the incorporeal point of light be called God or does the one in whom He enters be called God? It is because God establishes heaven. Hm? Supreme God Father, Heavenly God Father. Nobody else establishes. Although Ibrahim, Buddha, Christ, etc. come to this world and nobody can counter them in the world. However they do not establish heaven. Still the world goes on becoming a world of even more sorrows.

So, it was said, written in the scriptures that Krishna taught RajYoga. And that too which Krishna did they think of? Hm? In the Golden Age, in the beginning of this world, they thought that it was the same Krishna who gets birth in the beginning of the Golden Age. Does he get birth? Nobody knows where he came from on a fig leaf in the ocean. Did anyone know as to where did he come from? No. So, it has been taught that Krishna taught RajYoga. This hathyoga; tell, then when and where from did this hathyoga start? Hm? Then it has been forcibly written that the child of the Golden Age perfect in 16 celestial degrees taught; that too he is shown to be a small child. Hm? How will a small child teach RajYoga? The organs are controlled through rajyog. And how will a small child know about controlling the organs? No. All these are limited yogas of the sanyasis. What? Whose? Of the Sanyasis? Achcha? So, were there Sanyasis in the beginning of the Copper Age? Hm? There were no Sanyasis in the beginning of the Copper Age. Those Sanyasis come only when it is the end of the Copper Age; they come at that time. Hm? In the end. And they come before the Iron Age. What? They come before the beginning of the Iron Age. So, is this correct? Wasn’t there sanyas before that?
(Someone said something.) Yes. Actually, when Buddhism had come before that, then among the Buddhists, when they built Stupas, etc. for their residence, didn’t they? So, in them all the Buddhist women, men started living together. And adultery spread from there itself. Then that does not remain concealed anywhere. When it was known then they became detached. That is it; Sanyas started from there itself. So, yes, it is true that the deeper form of Sanyas came from Shankaracharya.

So, it was told that these Shankaracharyas, etc. are educated, well-educated. And those who are often called philosophers or those who get the title of Doctorate, Philosophy in the foreign countries now-a-days, so, those who have read a lot of scriptures should come here and reform nicely. Hm? Who should come here? Hm? Here the Shankaracharya of India invented a strong Yoga. But the foreign philosophers who came here; they came here, didn’t they? So, those who get the degree of Doctorate have read a lot of scriptures. For example, there is Max Mueller, Apte, Willian and this one and there are others as well. So, they have studied a lot of scriptures and if they come here and say that I have read all the scriptures, but no. Although they have read, yet whatever the Father teaches alone is right. Hm? All these other educated people are wrong. And they should come and tell about India. When those who have studied everyone’s literature, the literature written by the writers of the scriptures, when they come here then they will know that who is everyone’s liberator and guide? He gets birth. This topic should sit in their intellect. So, that is it; they will accept their topics alone; so, it is the biggest pilgrimage center (teerth), isn’t it? What is meant by teerth? Teer means shore. Th means place. A place which brings you to a destination. Now there are numerous religions spread all over. Some say – Go to Kaba; then you will reach the shore. Some say – Go to Jerusalem. Some say, Indians say; they have described numerous places. Go to Badrinath, go to Jagannath. They have described so many places. So, the Father comes and tells about the true teerth. What? Which is the biggest teerth? Hm? Where do you have to go? The biggest teerth is this Bhaarat.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 20 May 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2705, दिनांक 19.11.2018
VCD 2705, Dated 19.11.2018
प्रातः क्लास 21.9.1967
Morning Class dated 21.9.1967
VCD-2705-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.15
Time- 00.01-19.15


प्रातः क्लास चल रहा था - 21.9.1967. सद्गुरुवार को छठे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – सबसे बड़ा तीर्थ कौनसा हुआ? हँ? सबसे बड़ा तीर्थ हुआ, बताया कि बाप जो आकरके पढ़ाते हैं वो ही राइट है। बाकि सब रांग। वो भारत की आके बतावें। क्या बतावें? हँ? भारत के आदि, मध्य, अंत की हिस्ट्री आके बतावें। वो जो सबका लिबरेटर, गाइड है उनका जन्म होता है। जनम माने? हँ? जनम माने प्रत्यक्षता रूपी जनम होता है। वो भारत जो सारी दुनिया का बाप है और इस रंगमंच पर लगातार पार्ट बजाता है, परन्तु उसे पहचान तो कोई नहीं पाता। तो बताया- उनका जन्म होता है माना प्रत्यक्षता होती है। इसलिए भक्तिमार्ग में दिखाते हैं; क्या? हँ? कब कहते हैं राम नाम सत्य है? हँ? जब मरते हैं तब कहते हैं राम नाम सत्य है। तो साधारण मौत तो होती रहती है जन्म-जन्मान्तर। कौनसी मौत की बात है? हँ? जब सारी दुनिया की मौत होती है तब उनका जन्म होता है। माने? जनम माने प्रत्यक्षता होती है तब लोग समझते हैं कि राम नाम सत्य है। राम किसको कहा जाता है? राम बाप को कहा जाता है। कृष्ण बच्चे को कहा जाता है। तो बच्चे को तो प्रत्यक्ष किया भक्तिमार्ग में भी। क्या? क्या प्रत्यक्ष किया? गीता का भगवान कृष्ण है। हँ।

तो ये कोई नहीं जानता कि वो उनके ही जो तीर्थ हुआ ना। तीर्थ माने क्या बताया? तीर माने एक किनारे लगाने वाला; थ माने स्थान। बड़े ते बड़ा तीर्थ। हँ? कौनसा बताया? स्थूल रूप में क्या बताया? बड़े ते बड़ा तीर्थ है ये माउंट आबू। अब ये माउंट आबू बड़े ते बड़ा तीर्थ है। हँ? क्या कहा? नाम क्या रखा? काम के आधार पर नाम पड़ता है ना। क्या नाम रखा? हँ? माउंट आबू। जहाँ बदबू का आके सारा पहाड़ इकट्ठा हो जाए। कहाँ इकट्ठा हो जाता है? हँ? सारा पहाड़ कहाँ इकट्ठा हो जाता है? हँ? अरे, कोई आत्मा है, कोई स्थान है या नहीं है? स्थान का भी महत्व होता है। हँ? आत्माओं का स्थान है परमधाम। एक स्पेशल, एक कॉमन। और स्थान की बात हुई तो आत्माओं का स्थान है तो आत्माएं जो जीवात्मा बनती हैं उनका भी कोई स्थान होगा। तो उन जीवात्माओं का स्थान कौनसा हुआ? हँ? जहाँ आ बू। माना दुनिया की बदबू से भरी हुई पहाड़ जैसी आत्माएं आके इकट्ठी होती हैं। हं? पहाड़ जैसी आत्माएँ कौन? हँ? बीज रूप आत्माएं। हाँ, रुद्र माला। हँ? वो ही रुद्र माला की आत्माएं जहाँ इकट्ठी होती हैं, उनका बुद्धियोग कहाँ रहता है इकट्ठी होती हैं तो? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। बताया, ये बड़े ते बड़ा तीर्थ हुआ। माना आत्माओं का तीर्थ हुआ ब्रह्मलोक, परमब्रह्म। और तीर्थ हुआ परमब्रह्म। सबसे ऊंचे ते ऊंचा तीर्थ क्या? जहाँ आत्माएं जाकरके शांति का अनुभव करती हैं। तो वो तुम्हारा घर है। चैतन्य है या जड़ है? हँ? चैतन्य भी है।

तो वो तो मन्दिर चला गया बड़े ते बड़ा। हँ? कहाँ चला गया? हँ? वो मन्दिर तो चला गया। कहाँ से चला गया? बड़े ते बड़ा तीर्थ कहाँ बताया? कहाँ से चला गया? कोई स्थान बताया होगा ना। कौनसा स्थान बताते हैं बड़े ते बड़ा तीर्थ? अरे? अभी तो बताया माउंट आबू। हाँ। तो वो माउंट आबू में वो जो चैतन्य तीर्थ है तुम्हारा परमब्रह्म, वो तो चला गया। चला गया कि अभी है वहाँ? अरे? चला गया कि है? है? अरे, माउंट आबू में है? नहीं। चला गया। फिर भी, फिर भी तो प्लेस तो वो है ना जहाँ रहता था। हँ? हाँ। जहाँ सोमनाथ का मन्दिर है उज्जैन में। अरे! उज्जैन क्यों बता दिया? उज्जैन तो मध्य प्रदेश में। हँ? और बता दिया उज्जैन। क्योंकि इसलिए बता दिया कि वो ऊंचे ते ऊँचा जैन माने जिन्न जिसने इन्द्रियों को जीता, हँ, उसका फालोवर है इस जनम में, लास्ट जनम में जिसने इन्द्रियों को पूरा जीता। हँ? तो उसका वंशज हुआ। किसने जीता? क्या कहेंगे? हिन्दुओं में कहते हैं विष्णु। किसकी औलाद? पालनकर्ता विष्णु। हँ? या तो कह देते हैं भरत। भरण-पोषण करने वाला। तो वो तो चला गया। कहाँ चला गया? आखरी जनम में चला गया ना। फिर भी प्लेस तो है। वो चैतन्य तो चला गया। फिर वो चैतन्य जहाँ था, हँ, वो तो है ना। कहाँ है? पहले ये माउंट आबू गुजरात में था ना। कहाँ था? गुजरात में था, गुजरात का हिस्सा था कि राजस्थान, मध्य प्रदेश का हिस्सा था? कहाँ का हिस्सा था? हँ? हाँ। वो राजस्थान और मध्यप्रदेश भी, इनकी सीमा भी आपस में मिल हुई है। थोड़ी सी सीमा गुजरात की भी मिली हुई है।

तो बताया, वो प्लेस तो है ना माउंट आबू जहाँ सोमनाथ मन्दिर भी है। अच्छा? अरे, वो उज्जैन तो इलायका है। क्या? बड़ा लंबा-चौड़ा इलायका होता है। और वो जो गांव है जहाँ सोमनाथ मन्दिर बना उसको तो लोग भूल गए। ये बाबा भूल गए जहाँ वो मन्दिर है सोमनाथ का जिसको आकरके लूटा था। हँ? किसने आकरके लूटा था? हँ? कौनसे धरम वालों ने आके लूटा था? हँ? उस धरम के जिसने लूटा होगा उसके नाम के आगे मोहम्मद भी लिखा होगा। अपने बाप का नाम लिखेगा कि नहीं? हाँ। मोहम्मद गजनवी। तो उसने आके उसको लूटा। क्या? लूटा तो क्या किया? तो फिर जब लूट गया आदमी तो कुछ रह गया उसके पास? नहीं। बुद्धि खराब हो जाएगी ना। हँ? बुद्धि खराब हो जाएगी तो क्या करेगा? उल्टे काम करेगा कि अच्छे काम करेगा? हँ? हाँ। बहन हो, भतीजी हो, हँ, नीयत खराब करेगा कि नहीं? हाँ। तो लूट लिया माना क्या लूट लिया? मन-बुद्धि की जो पावर है मनुष्य में मनन-चिंतन-मंथन करने की कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, वो सारी ताकत लूट ली। अभी। फिर क्या हुआ? एक बार लूटा कि बार-बार लूटा? बार-बार लूटा।

अभी तुम बच्चे जानते हो ये कितनी, हँ, कितनी ऊँची धरमभूमि है! भूमि माने? धरणी। धारणा करने वाली। और काहे की भूमि? धरम की। हँ? जड़ धरणी कि चैतन्य भी? हाँ, चैतन्य भी। कितनी ऊँची धरमभूमि है। हँ? अरे! धरमभूमि तो इज्राइल भी है, हँ, है ना? मक्का मदीना भी है। हँ? हाँ। दूसरे धरम वालों की भी तो ऊँच ते ऊँच धरमभूमि होती है ना। लेकिन इन सबसे ऊँची धरमभूमि वो है जो सभी धरमवाले गायन करते रहते हैं। क्या? जन्नत। हँ? हैविन। स्वर्ग। तो वहाँ तो बड़ी ऊँची धारणाएं होती हैं रहने वालों की। क्या कहे जाते हैं? देव आत्माएं। देवताओं की भूमि। डीटीज़ प्लेस। तो धरमभूमि असली तो इसको कहा जाता है। किसको? जड़ जमीन को कहा जाता है धारणा की भूमि, जड़ जमीन धारणा करती है? धर्म माने धारणा। कि चैतन्य आत्मा? चैतन्य आत्मा है जिसको धरमभूमि कहा जाता है कि वो यहाँ जैसे धर्मात्मा रहते हैं ना। कहाँ? यहाँ धरणी में धर्मात्मा रहते हैं ना। हर धरम में कोई न कोई धर्मात्मा तो होते ही हैं। हँ? देखो, सिक्खों में भी वो काला चोंगा पहनते हैं, वो नीला, हँ, अकाली कह जाते हैं। तो वो होते हैं कि नहीं? उनका बड़े ते बड़ा मन्दिर है अमृतसर में। तो वहाँ अकालतख्त पे बैठते हैं। तो जैसे यहाँ धर्मात्मा होते हैं, हिन्दुओं में भी होते हैं। सन्यासी बड़े-बड़े मठ बनाकरके बैठे हुए हैं। धर्मात्मा कहे जाते हैं ना। धरम-करम की बातें। दुनियादारी तो उन्होंने छोड़ी हुई है।

तो ऐसे कोई भी जगह में नहीं रहते हैं जैसे इस धरमभूमि में रहते हैं। क्या कहा? कोई भी जगह में, और कोई जगह में नहीं रहते हैं जैसी इस धरमभूमि में। किस धरमभूमि में? कहाँ रहते हैं? भूल गया। हँ? माउंट आबू में। क्या? अभी नहीं रहते हैं। लेकिन कभी रहते तो थे ना। हाँ। तो इनको धरमभूमि कहा जाता है कि वो यहाँ जैसे धर्मात्मा रहते हैं। और जैसे माउंट आबू में रहते हैं ऊँच ते ऊँच तीर्थ स्थान। ऐसे कहीं नहीं रहते हैं। देखो, कितने तुम धर्मात्मा रहते हो। कहाँ? कहाँ? अरे? हाँ, वो ही माउंट आबू में। कितने तुम धर्मात्मा रहते हो। किनकी तरफ इशारा किया? वो ही जो संसार की बीजरूप आत्माएं हैं जो सृष्टि रूपी वृक्ष है उसकी जो बीजरूप आत्माएं हैं, डालियाँ नहीं; क्या? तना नहीं, जहाँ देवताएं रहते हैं। जड़ें भी नहीं। हँ? हाँ, जड़ों के भी बीज। कितने धर्मात्माएं हैं। हँ? वो ही सबसे बड़े धर्मात्माएं जब माउंट आबू में रहते हैं और फिर जब दुनिया में बिखर जाते हैं तो गिरते-गिरते क्या हाल होता है? धर्मात्मा से क्या बन जाते? बड़े ते बड़े पापात्मा बन जाते। अच्छा? अभी देखो तुम कितना धरम करते हो। क्या? अभी क्यों? और 5000 वर्ष में क्यों नहीं किया? हँ? अरे! वहाँ कोई धरम-करम सिखलाने वाला हमारा बाप, आत्माओं का बाप, शिव बाप था क्या? नहीं। वो तो आते ही हैं कलियुग के अंत और सतयुग के आदि में, पुरुषोत्तम संगमयुग में प्रत्यक्ष होते हैं। वो तो निराकार है। जरूर कोई साकार के द्वारा प्रत्यक्ष होता है।

तो देखो, अभी तुम धरम करते हो। हँ? बाप को सभी तन, मन, धन सभी दे देते हो। क्या धरम करते हो? हँ? कोई पापात्मा को नहीं देते हो। पापात्मा को देंगे तो क्या बनेंगे? पापात्मा बनेंगे। वो तो जन्म-जन्मान्तर करते आए। अभी तुमने ऊँच ते ऊँच धरम की स्थापना करने वाले बाप को पहचाना है। ऊँचे ते ऊँचा धरमस्थापक है ना। क्या है? अंग्रेज लोग क्या कहते हैं? हैविनली गॉड फादर। हैविन स्थापन करने वाला है ना। तो उसको तुमने पहचाना है कि वो है चोटी का ब्राह्मण। तो दान किसको दिया जाता है? शूद्रों को? हँ? शूद्रों को दान नहीं दिया जाता है। वैश्यों को भी नहीं। क्षत्रीयों को भी नहीं। नहीं। क्षत्रीय तो सबसे जास्ती दान करने वाले होते हैं। क्षत्रीय तो राजाएं होते हैं। नहीं। तुम तो दान देते हो ऊँच ते ऊँच ब्राह्मण चोटी को। हँ? हाँ, तुमने अभी पहचाना है ना। और जानकरके देते हो ना कि बिना जाने देते हो? हाँ, वो जो ऊँच ते ऊँच तीर्थ है, चैतन्य तीर्थ है ना, उसको तुम जानकरके तन, मन, धन, सभी दे देते हो। क्या? हाँ, और तो कोई भी ऐसा नहीं कि जानकरके कोई को देते हों। हँ? उनको पहचान के देते हों कि ये कौन है? पहचानते हैं? पहचान लेते हैं? पहचान लेते हैं कि ये ऊँच ते ऊँच धरमपिता है स्वर्ग स्थापन करने वाले, सुख की दुनिया बनाने वाले जहाँ दुख का नाम-निशान होता ही नहीं। जो ऊँच ते ऊँच है वो भी नहीं जानते। दूसरे धरम वाले जानते हैं? नहीं। कोई भी ऐसा नहीं जो जान करके देता हो सिवाय तुम्हारे।

A morning class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the sixth page on Thursday was – Which is the biggest pilgrimage center (teerth)? Hm? The biggest pilgrimage center is; it was told that whatever the Father comes and teaches alone is right. The rest is wrong. They should come and tell about India. What should they tell? Hm? They should come and tell the history of the beginning, middle and end of India. He, who is the liberator and guide of everyone, gets birth. What is meant by birth? Hm? Birth means revelation-like birth takes place. That Bhaarat, who is the Father of the entire world and plays his part on this stage continuously, but no one is able to recognize him. So, it was told that he gets birth, i.e. he is revealed. This is why it is shown on the path of Bhakti; what? Hm? When is it said – The name of Ram is true (Raam naam satya hai)? Hm? When someone dies, then they say – The name of Ram is true. So, ordinary death keeps on taking place birth by birth. Which death is it about? Hm? When the entire world dies, then he is born. What does it mean? When he is born, i.e. revealed, then people understand that the name of Ram is true. Who is called Ram? The Father is called Ram. The child is called Krishna. So, the child was revealed on the path of Bhakti as well. What? What was revealed? God of Gita is Krishna. Hm.

So, nobody knows that His teerth (pilgrimage center); what was described as teerth? Teer means the one which takes you to a shore; th means sthaan (place). The biggest pilgrimage center. Hm? Which one was mentioned? What was mentioned in a physical form? The biggest pilgrimage center is this Mount Abu. Well, this Mount Abu is the biggest pilgrimage center. Hm? What has been said? What was the name coined? The name is coined on the basis of the task performed, isn’t it? What was the name coined? Hm? Mount Abu. The place where the entire mountain of bad odour gathers. Where does it collect? Hm? Where does the entire mountain gather? Hm? Arey, is there a soul, a place or not? There is an importance of the place also. Hm? The place of souls is the Supreme Abode. One is special, one is common. And when we talk of the place, when there is a place of souls, then there must be a place of the souls which become jeevatmas (living souls). So, what is the place of those jeevatmas? Hm? Where aa (come) boo (bad odour). It means the mountain-like souls filled with bad smell of the world come and gather. Hm? Who are mountain-like souls? Hm? The seed form souls. Yes, the Rudramala. Hm? The place where the same souls of the Rudramala gather, where does their intellect remain focused when they gather? Hm?
(Someone said something.) Yes. It was told that this is the biggest pilgrimage center. It means that the pilgrimage center of the souls is the Brahmlok, the Parambrahm. And teerth is Parambrahm. What is the highest on high teerth? The place where the souls go and experience peace. So, that is your home. Is it living or non-living? Hm? It is living as well.

So, that biggest temple went away. Hm? Where did it go? Hm? That temple went away. From where did it go away? Where was the biggest pilgrimage center mentioned to be? From where did it go away? Some place must have been mentioned. Which place is mentioned to be the biggest pilgrimage center? Arey? Just now it was mentioned – Mount Abu. Yes. So, the living pilgrimage center, your Parambrahm in Mount Abu has gone. Has he gone or is he there now? Arey? Did he go or is he there? Is he there? Arey, is he in Mount Abu? No. He has gone. However, however, that place is there where he used to live. Hm? Yes. The place where there is the temple of Somnath in Ujjain. Arey! Why was it mentioned to be Ujjain? Ujjain is in Madhya Pradesh. Hm? And it was mentioned Ujjain. It was mentioned because that highest on high Jain, i.e. Jinn, who conquered the organs, hm, he is his follower in this birth, in the last birth, who conquered the organs completely. Hm? So, he is his descendent. Who conquered? What will be said? He is called Vishnu among the Hindus. Whose child? Sustainer Vishnu. Hm? Or they call him Bharat. The one who sustains. So, he went away. Where did he go? He went in the last birth, didn’t he? However the place is there. That living one went away. Then the place where that living one existed, that is there, isn’t it? Where is it? Earlier this Mount Abu was in Gujarat, wasn’t it? Where was it? It was in Gujarat; was it a part of Gujarat or was it a part of Rajasthan, Madhya Pradesh? Whose part was it? Hm? Yes. The borders of Rajasthan and Madhya Pradesh are also common. Some part of Gujarat’s border is also common.

So, it was told, that place Mount Abu is there, isn’t it where there is a temple of Somnath also. Achcha? Arey, that Ujjain is an area. What? An area is long and wide. And the village where the temple of Somnath was built was forgotten by the people. Baba forgot that the place where there is a temple of Somnath, which they came and looted. Hm? Who came and looted? Hm? People of which religion came and looted? Hm? That religion, the one who looted, his name must be prefixed by Mohammad. Will he write the name of his Father or not? Yes. Mohammad Gajanavi. So, he came and looted it. What? What did he do after looting? So, when a person looted, then did anything remain with him? No. His intellect will be spoilt, will it not be? Hm? What will he do if his intellect is spoilt? Will he perform opposite tasks or good tasks? Hm? Yes. Be it his sister, be it his niece, will his intention become bad or not? Yes. So, he looted, i.e. what did he loot? The power of the mind and intellect in a human being to think and churn that what should one do and what shouldn’t one do, all that power was looted. Now. What happened after that? Did he loot once or did he loot again and again? He looted again and again.

Now you children know that this is such a high land of religion (dharambhoomi). What is meant by bhoomi? Land (dharani). The one who inculcates. And land of what? Of religion. Hm? Is it non-living land or living as well? Yes, living as well. It is such a high land of religion! Hm? Arey! Israel is also a land of religion, isn’t it? There is Mecca, Medina as well. Hm? Yes. There is highest on high land of religion in respect of people of other religions as well, isn’t it? But the land of religion higher than all these which people of all the religions keep on singing. What? Jannat. Hm? Heaven. Swarg. So, the inculcations of those living there are very high. What are they called? Deity souls. The land of deities. Deities place. So, this is called the true land of religion. Who? The non-living land is called the land of inculcation. Does non-living land inculcate? Dharma means inculcation. Or is it a living soul? It is a living soul which is called the land of religion that religious souls live here, don’t they? Where? Religious souls live here on the Earth, don’t they? There are some or the other religious souls in every religion. Hm? Look, they wear black, blue robes among the Sikhs also; they are called the Akalis. So, do they exist or not? Their biggest temple is in Amritsar. So, they sit there on the Akaaltakht. So, just as there are religious souls here, there are among Hindus also. Sanyasis are sitting in big Maths (religious places). They are called Dharmatmas, aren’t they? They talk of religion and actions. They have left worldly affairs.

So, no such people live in any other place as in this religious land. What has been said? In any place, in any other place there are not such people as living in this religious land. In which religious land? Where do they live? You forgot. Hm? In Mount Abu. What? They do not live now. But they used to live at some point in time, didn’t they? Yes. So, this is called a religious land that religious souls live here. And the kind of people who live in Mount Abu, the highest on high pilgrimage center, do not live in any other place. Look, you remain so religious souls. Where? Where? Arey? Yes, in the same Mount Abu. You remain so religious souls. Towards whom was a gesture made? The same seed form souls of the world, who are seed form souls of the world tree, not the branches; what? Not the stem where the deities live; not even the roots. Hm? Yes, the seeds of the roots as well. You are so religious souls. Hm? When the same biggest religious souls live in Mount Abu and when they scatter in the world, then what is their condition while undergoing downfall? What do they become from religious souls? They become the biggest sinful souls. Achcha? Now look, you practice religion (dharma) so much. What? Why now? And why did you not practice in 5000 years? Hm? Arey! Did we have our Father, the Father of souls, Father Shiv there to teach us religion and actions? No. He comes only in the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age and is revealed in the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age). He is incorporeal. He is definitely revealed through a corporeal.

So, look, now you perform religious actions. Hm? You give everything including the body, mind and wealth to the Father. What is the religious action that you perform? Hm? You do not give to any sinful soul. What will you become if you give to a sinful soul? You will become a sinful soul. You have been doing that birth by birth. Now you have recognized the Father who establishes the highest on high religion. He is the highest on high founder of religion, isn’t he? What is he? What do the Britishers say? Heavenly God Father. He establishes heaven, doesn’t He? So, you have recognized him that he is the peak Brahmin. So, who is given a donation? To the Shudras? Hm? Donation is not given to the Shudras. Not even to the Vaishyas. Not even to the Kshatriyas. No. Kshatriyas are the ones who donate the most. Kshatriyas are kings. No. You give donation to the highest on high Brahmin choti. Hm? Yes, you have now recognized, haven’t you? And do you give after recognizing or without recognizing? Yes, you recognize that highest on high pilgrimage center, the living pilgrimage center and give him everything including the body, mind and wealth. What? Yes, there is nobody else who gives to someone after knowing. Hm? Do they recognize that who they are? Do they recognize? Do they recognize? Do they recognize that this is the highest on high founder of religion who establishes heaven, establishes the world of happiness where there is no name or trace of sorrows? They do not even know who is the highest on high. Do the people of other religions know? No. There is nobody except you who gives after recognizing.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 22 May 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2706, दिनांक 20.11.2018
VCD 2706, Dated 20.11.2018
प्रातः क्लास 21.9.1967
Morning Class dated 21.9.1967
VCD-2706-extracts-Bilingual

समय- 00.01-21.18
Time- 00.01-21.18


प्रातः क्लास चल रहा था - 21.9.1967. सद्गुरुवार को छठे पेज के मध्य में बात चल रही थी – ये बात शिव बाप ही बैठकरके बताते हैं कि बरोबर मेरी ही जनमभूमि है ना। हँ? मेरी जनमभूमि ये भारत है। मेरी ही है। ये क्या बात हुई? माने मेरे अलावा और किसी की नहीं है। इस जनमभूमि में मैं ही पहले-पहले प्रत्यक्षता रूपी जन्म लेता हूँ। और इसके बाद? हँ? इसके बाद? इसके बाद फिर कौन प्रत्यक्षता रूपी जन्म लेता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) वो तो ठीक है। आत्माओं का बाप और आत्माओं के बाप का बड़ा बच्चा साथ-साथ प्रत्यक्ष होते हैं। तो ये तो ठीक है कि सुप्रीम सोल बाप की जनमभूमि है। तो क्या और कोई आत्मा प्रत्यक्ष नहीं होती? कोई आत्मा प्रत्यक्षता रूपी जन्म नहीं लेती है और? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, लक्ष्मी लेती है। लेकिन किससे लेती है? हँ? नारायण से लेती है। कि शिव से लेती? अरे! शिव को तो अपनी भूमि ही नहीं है। भूमि है? भूमि माने मिट्टी। भूमि माने मिट्टी, धरणी। तो लक्ष्मी वाली आत्मा वो भूमि का हिस्सा हुई या नहीं हुई? हँ? हाँ। ये प्रकृति का हिस्सा तो है। कैसा हिस्सा है? अगर प्रैक्टिकल में कहें तो एक आत्मा धरणी भी हो जाए और बीज भी हो जाए, बाप भी हो जाए। तो सृष्टि बनेगी? नहीं बनेगी।

ये तो ठीक है कि मेरी प्रत्यक्षता होती है इस जनमभूमि के द्वारा तो मैं प्रत्यक्ष होता हूँ। ये जनमभूमि भी संसार में प्रत्यक्ष होती है। और मैं आकरके यहाँ इस शरीर में रहकरके सबकी सद्गति करता हूँ। हँ? और भारत को तो हैविन बना देता हूँ। ये क्या मतलब? भारत को तो। क्या कोई स्पेशलिटी हो गई? क्या? हँ? मैं किसको हैविन बना देता हूँ? हँ? भारत को तो हैविन बना देता हूँ। तो बोला, कोई मुरली में प्रूफ है? हँ? कोई प्रूफ नहीं? अरे? बाकि सारी धरती डूब जाती है। हाँ, वो तो डूब जाती है। कौन बचता है? हँ? ब्राह्मण चोटी बचता है। हँ? तो ब्राह्मण चोटी जो बचता है, शरीर और आत्मा दोनों से बचता है कि अकेला आत्मा या अकेला शरीर बचता है? दोनों बचता है। दोनों बचता है, इसका मतलब है कि धरणी भी है और? और चोटी भी है। ब्राह्मण चोटी आत्मा भी है। हाँ, तो इसको हैविन बनाता हूँ इसलिए पहले ही बता दिया ब्रह्मा मुख से। क्या? ये तुम्हारा बाप भी है, टीचर भी है और सद्गति देने वाला सद्गुरु भी है। और सद्गति तो हैविन में कही जाएगी या नरक में कही जाएगी? हँ? हैविन। हैविन माने जहाँ सुख ही सुख हो। तो तुम बच्चों के लिए सुख का हैविन बन गया। ये अभी जानते भी हो। अभी जानते हो। पहले नहीं जानते थे। क्या? कि हम हैविन यानि स्वर्ग के मालिक बनने यहाँ आते हैं। कहाँ आते हैं भई? हँ? कहाँ आते हैं? हँ? नकल मत करो इधर-उधर।
(किसी ने कुछ कहा।) हां, सनत; क्या? सन्मुख। सन्मुख आते हैं। शिव बाप आते हैं सन्मुख। हँ?

ये अब जानते भी हो कि हम हैविन, हँ, यानि स्वर्ग के मालिक बनने यहाँ आते हैं। हँ? यहाँ आकरके बैठें माउंट आबू में? स्थान में? माने जड़ जमीन में आके बैठें तब स्वर्ग के मालिक बनेंगे? वो तो ढ़ेर सारे बैठे होंगे। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जो चैतन्य में धरणी भी है और आत्मा भी है। हाँ, वो घर है हमारा। घर है कि नहीं? हाँ। तो जो-जो नंबरवार आत्मा बनेंगे, आकरके बैठेंगे इस घर में; कहाँ? परमब्रह्म घर हुआ ना। अम्मा भी तो है। तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे। नंबरवार बैठेंगे कि एक साथ? हँ? हाँ, नंबरवार। तो ऐसे बाप को जब तुम अच्छी तरह से याद करो। क्या? साधारण तरीके से याद करो तो, तो, तो क्या होगा? हाँ, तो जो पहले नंबर की पीढ़ी है असल सूर्यवंशी, उसमें तो नहीं आएंगे। हँ? पहले नंबर की जो पीढ़ी है, उसमें कौन-कौन हैं? कितनी कैटागरीज़ हैं? हँ? कैटागरीज़ तो होंगी। हँ? रुद्रमाला और विजयमाला - दो प्रकार के संगठन की आत्माएं हैं। तो रुद्रमाला का नंबर कब लगेगा आने के लिए? हँ? वो ठीक है। वो आत्मा तो बनते हैं। रुद्रमाला पहले आत्मा बनेगी ना। नंबरवार। हाँ, तपस्या पूरी होगी, नंबरवार आत्मा बनेंगे, लेकिन जो आत्मा बनेंगे तो वो जो संपन्न आत्मा बनती हैं, हँ, अपने-अपने ग्रुप की पूर्वज; पूर्वज तो संपूर्ण ही होता है ना। तो जो अपने-अपने ग्रुप की आत्मा बनती हैं, वो कितनी हैं? आठ। तो वो आठ भी नंबरवार यहाँ आकरके बैठेंगे ना। कहाँ? चैतन्य धाम में। हँ? परमब्रह्म है, माँ है, तो घर है ना आत्मा का।

तो अच्छी तरह से याद करो। और प्यार से याद करो। किसको? हँ? ऐसे बाप को। कैसे बाप को? बिन्दी बाप को? हँ? फिर कैसे बाप को याद करो? ऐसे बाप को। हँ? कैसे बाप को? हाँ, जो बाप मनुष्य सृष्टि का तो है, और परमानेन्ट भी है, लेकिन शिव समान बन गया। हँ? बनता है कि नहीं? तो जो शिव समान; पक्का है कि नहीं? हँ? पक्का है? अच्छा? तो ऐसे बाप को याद करो। और कैसे? साधारण, हँ, साधारण रीति नहीं। हँ? अच्छी रीति याद करो। तब ही तुमको देखकरके; हँ? क्या? तब ही तुमको देखकरके। क्या मतलब? जैसे तुम करम करेंगे तैसे तुमको देख कर और भी ऐसे करम करने लगेंगे। हँ? अच्छी तरह से याद करेंगे तो देखेंगे कि अरे, इन्होंने तो अच्छी तरह से याद किया तो ये तो बाप के सर के ऊपर बैठ गया। हँ? बाप ने इनको अपने से भी ऊँच चढ़ाय दिया। हाँ, तो दूसरे देखेंगे कि हाँ, बड़े को फालो करना है। ये बड़े हैं। हम फालो करेंगे तो हम भी ऊँच बनेंगे कि नहीं? हम भी ऊँच बनेंगे। तो तुमको देखकरके और भी करम करेंगे।

ये अलौकिक दिव्य कर्म इसको कहा जाता है। अलौकिक। इस लोक का करम नहीं है। क्या? अरे! इस लोक में तो कर्मेन्द्रियों से भी करम करते हैं और ज्ञानेन्द्रियों से भी कर्म करते हैं। तो ये इहलोक की बात है। लेकिन उसको अलौकिक दिव्य कर्म कहा जाता है। क्या? किसको? कि उन आठ ने उस एक को पहचाना नंबरवार। हँ? और वहाँ के वासी बने। बनेंगे कि नहीं? मन-बुद्धि से बनेंगे कि ज्ञानेन्द्रियों से बनेंगे कि कर्मेन्द्रियों से बनेंगे? हाँ। मन-बुद्धि से वहाँ के वासी बनेंगे ना। तो ये अलौकिक कर्तव्य, हँ, जो वो दुनियावाले और देखेंगे पुरुषार्थी, हाँ, वो देख करके और समझेंगे - ऐसा दिव्य कर्म हमको भी करना चाहिए। कैसा दिव्य कर्म? कैसा दिव्य कर्म? कर्मेन्द्रियों का, ज्ञानेन्द्रियों का या अरे, कर्मेन्द्रियों का, ध्यान से सुनो, कर्मेन्द्रियों का कर्म, ज्ञानेन्द्रियों का कर्म या ये तो लौकिक है या अलौकिक है? लौकिक है। अलौकिक मन-बुद्धि से कनेक्टेड है? हँ? मन और बुद्धि से कर्म होता है कि नहीं? हँ? होता है? मन-बुद्धि से कर्म हो जाता है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। याद तो है। लेकिन उसे करम कहेंगे?

बाबा तो कहते - शंकर क्या करता है? कुछ भी नहीं। हँ? तो कुछ भी नहीं करता क्या? हँ? याद करता है। तो ये कर्म नहीं है? हँ? करम है। फिर क्यों कह दिया कुछ भी नहीं करता? शंकर क्या करता है? कुछ भी नहीं। हँ? कहते हैं दुनियावाले देव-देव-महादेव। वो भी मैं हूँ। क्या कहा? हँ? बड़े फखुर से कहते हैं ये क्या है? ये तो पत्थर बना हुआ पड़ा है। हँ? इसकी बुद्धि में तो कुछ बैठता ही नहीं। इससे ज्यादा तो अच्छा जो इसके बाद आए हैं उनकी बुद्धि में बैठा है। बैठता है कि नहीं? बाद वालों को बैठता है, उनकी बुद्धि अच्छी है कि वो भी पत्थरबुद्धि बन गए? अरे! इसके बाद जो, हँ, इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर ज्ञानेन्द्रियों से, कर्मेन्द्रियों से पार्ट बजाते हैं, उनकी बुद्धि अच्छी है या इसकी बुद्धि अच्छी है? हँ? इसकी अच्छी है? हँ, हाँ, इसके बाद जो आए हैं, दूसरे-दूसरे ग्रुप आए हैं कि नहीं? देवताओं का ग्रुप आया। आया कि नहीं? सृष्टि रूपी रंगमंच पर आया ना। हँ? आया। तो देवता धरम का स्थापन करने वाला, हँ, उसका बाप भी आया होगा। है ना?

ऐसे ही, फिर और कौन आया? देवता धरम का स्थापन करने वाला बाप आया। फिर कौन आया? हँ? हाँ, कौन आया? फिर दूसरा कौन आया? हँ? अरे, चन्द्रवंश की स्थापना होती है कि नहीं त्रेता में? तो कौन आया जनम देने वाला? अरे? सूर्यवंशियों को जनम देने वाला सूर्य। तो चन्द्रवंशियों को जनम देने वाला कौन आया? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा? अरे, नाम है चन्द्रवंश। ब्रह्मा बाबा क्यों कहते हो? सूर्यवंश को जनम देने वाला सूर्य। तो सूर्य लिखेंगे ना। हँ? सूर्यवंशियों का बाप सूर्य। है ना। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। चन्द्रवंश है जो त्रेता में होता है उसको जनम देने वाला चन्द्रमा वाली आत्मा ही होगी ना। हाँ। तो कौन हुआ क्षत्रीयों का जन्मदाता? जो उतरती कला हुई ना। हाँ। तो उनको जन्म देने वाला कौन हुआ? हँ? बाप जन्म दे? ये तो अम्मा को पकड़ लेता है। दीवाना हुआ है अम्मा का। बाप रे। हत्। अरे, जनम कौन देता है? बाप देता है ना। हाँ। पक्का-पक्का कर लो। क्या? लिखकरके कान में लटका के बांध लो। गले में लटका लो। क्या? जनम देने वाला कौन होता है? बाप कि अम्मा? हाँ। (किसी ने कुछ कहा।) राम बाप। लो! त्रेता में राम बाप। अब त्रेता की बात हो रही है। सतयुगी सूर्यवंश की तो बात हो गई ना। हाँ। उसमें भी जो 16 कला संपूर्ण कृष्ण को जन्म दिया वो भी तो देवता ही था ना। तो देवता ने देवताओं को ही जनम दिया होगा। लेकिन उतरती कला के देवताओं को जन्म दिया होगा या चढ़ती कला के देवताओं को जन्म दिया? उतरती कला के देवताओं को जन्म दिया। देवता तो कहेंगे। हाँ। देवता तो कहेंगे। भले उतरती कला के देवता। बाकि सतयुग में भी तो पीढ़ियां होंगी ना। एक ही पीढ़ी थोड़े ही होगी। हाँ।

तो अब ये पक्का समझ में आ गया। क्या? इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर चन्द्रवंशियों का धरमपिता कौन हुआ? हाँ। ज्ञान चन्द्रमा; अगर ब्रह्मा बाबा भी कहो तो क्या लगाओ? ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा। एक्यूरेट बोलना चाहिए ना। हाँ। तो ज्ञान चन्द्रमा ब्रह्मा जो है वो चन्द्रवंशियों का बाप हुआ। हुआ ना? हाँ। और इसके बाद? उनका भी ग्रुप है। है ना। त्रेता में ग्रुप है ना। भले जो सतयुग में देवताएं बनते हैं उतरती कला के वो फिर त्रेता में भी आके जनम लेते हैं। है ना। लेते हैं ना? हाँ।

तो कहा - ये उतरती कला के ग्रुप हो गए दो। फिर त्रेता के बाद तो द्वैतवादी द्वापरयुग आ जाता है। वहाँ तो फिर एक राजा, एक धरम, एक भाषा, एक कुल, एक मत रहता ही नहीं क्योंकि जो धरमपिताएं आते हैं तो वो तो अपनी-अपनी चलाते हैं नई-नई बातें। हँ? और उनमें सार नहीं होता है। हँ? तो दुर्गति कराय देते हैं सृष्टि की। तो कौनसा ग्रुप आया? इस्लामी ग्रुप आया। तो अब तुम समझ गए ऐसे जो भी आएंगे धरमपिताएं और उनके फालोअर्स जो भी आत्माएं परमधाम से, आत्मलोक से उतरती हैं तो उनकी बुद्धि ज्यादा अच्छी होगी या जो मनुष्य सृष्टि का बाप है जो आखरी जनम में सबसे जास्ती पत्थरबुद्धि बन जाता है उसकी बुद्धि अच्छी होगी? हँ? हाँ। बाद वालों की बुद्धि अच्छी होगी। तो वो बाद वालों को अहंकार होगा ना – ए! तू बुड्ढा हो गया। तू चुपचाप बैठ। मेरी बात मान। कहेंगे कि नहीं? हँ? नहीं कहेंगे? हँ? हाँ कहेंगे ना। अरे, बुड्ढे, सठियाय गए तुम। लोग कहते हैं ना – अरे, ये तो सठियाय गया। साठ साल की उमर हो गई तो इसकी बुद्धि काम, काम नहीं करती। अच्छा। चलो भई कह लो। हँ? लेकिन ये तो जानते ही नहीं कहने वाले कि वो जो आत्मा है भले पत्थरबुद्धि बन गई, उसका आसरा किसने लिया? हँ? सुप्रीम सोल बाप ने आसरा लिया। हँ? तो साधारण आत्मा हुई? हँ? ये तो असाधारण आत्मा हो गई।

A morning class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the sixth page on Thursday was – Father Shiv Himself sits and tells that this is rightly My birth place (janambhoomi) only, isn’t it? Hm? This Bhaarat is My birth place. My only. What is this? It means that it is not of anyone else. I alone get the revelation like birth first of all in this place of birth. And after that? Hm? After that? Who gets revelation like birth after that? Hm?
(Someone said something.) That is correct. The Father of souls and the eldest son of the Father of souls are revealed together. So, it is correct that it is the birth place of the Supreme Soul Father. So, doesn’t any other soul get revealed? Doesn’t any other soul get revelation-like birth? (Someone said something.) Yes, Lakshmi gets. But in whom does she get? Hm? She gets from Narayan. Or does she get from Shiv? Arey! Shiv does not have His own land at all. Does He have a land? Land means soil. Land means soil, Earth. So, is the soul of Lakshmi a part of that land or not? Hm? Yes. She is indeed a part of nature. What kind of a part is she? If we speak in a practical sense, then if one soul becomes land as well as seed and Father, then will the creation take place? It will not.

It is correct that when I am revealed through this place of birth, then I am revealed. This place of birth is also revealed in the world. And I come and cause the true salvation of everyone while being in this body. Hm? And I make India heaven. What does it mean? India. What is the specialty? What? Hm? Whom do I make heaven? Hm? I make India heaven. So, it was said, is there any proof in the Murli? Hm? Is there no proof? Arey? The rest of the Earth submerges. Yes, that submerges. Who survives? Hm? The Brahmin peak (choti) survives. Hm? So, does the Brahmin choti who survives, survive through both body and soul or does the soul alone or does the body alone survive? Both survive. Both survive; it means the land as well as? As well as the peak. There is the Brahmin peak soul also. Yes, so, I make this one heaven; this is why it was told beforehand through the mouth of Brahma. What? This is your Father also, teacher also and Sadguru also who causes true salvation (sadgati). And will sadgati be said to have taken place in heaven or in hell? Hm? Heaven. Heaven means where there is only happiness. So, he became the heaven of happiness for you children. You know this now. You know now. You did not know earlier. What? That we come here to become the masters of heaven, i.e. swarg. Where do we come brother? Hm? Where do we come? Hm? Do not copy from here and there.
(Someone said something.) Yes, Sanat; what? Sanmukh (face to face). He comes face to face. Father Shiv comes face to face. Hm?

You now also know that we come here to become the master of heaven, i.e. swarg. Hm? Should you come and sit here in Mount Abu? In the place? Does it mean that we will become master of heaven when you come and sit on the inert land? Numerous people must be sitting there. Hm?
(Someone said something.) Yes, the one, who is land in living form as well as soul. Yes, that is our home. Is it our home or not? Yes. So, all those who become numberwise souls will come and sit in this home; where? Parambrahm is the home, isn’t he? He is the mother also. So, you will become the master of heaven. Will you sit numberwise or together? Hm? Yes, numberwise. So, when you remember such Father nicely; What? What will happen if you remember in an ordinary way? Yes, then you will not come in the number one generation, the true Suryavanshi. Hm? Who all are included among the number one generation? How many categories are there? Hm? There will be categories. Hm? Rudramala (rosary of Rudra) and Vijaymala (rosary of victory) – There are souls of two kinds of gathering. So, when will the number (turn) of Rudramala’s arrival come? Hm? That is correct. They do become souls. Rudramala will become soul first, will it not? Numberwise. Yes, when the tapasya finishes, you will become numberwise souls; but those who become souls, then the ones who become perfect souls, the ancestors of their individual groups; ancestors are perfect only, aren’t they? So, what is the number of those who become souls of their individual groups? Eight. So, those eight will also come and sit here numberwise, will they not? Where? In the living abode. Hm? If there is Parambrahm, mother, then it is the home of the soul, isn’t it?

So, remember nicely. And remember lovingly. Whom? Hm? Such Father. What kind of a Father? The point-like Father? Hm? Then what kind of a Father should you remember? Such Father. Hm? What kind of a Father? Yes, the Father who does belong to the human world and is permanent also, but became equal to Shiv. Hm? Does he become or not? So, the one who is equal to Shiv; is he firm or not? Hm? Is he firm? Achcha? So, remember such Father. And how? Not in an ordinary, hm, ordinary manner. Hm? Remember nicely. Only then after seeing you; Hm? What? Only then, after seeing you. What does it mean? As are the actions you perform, watching you others will also start performing such actions. Hm? If you remember well, then it will be seen that arey, these people remembered well, so, this one sat on the Father’s head. Hm? The Father made him climb higher than himself. Yes, so, others will see that yes, we have to follow the elder one. These are elder ones. If we follow, then will we also become high or not? We will also become high. So, others will also perform actions by seeing you.

This is called alokik divine action. Alokik. It is not the action of this world (lok). What? Arey! In this world you perform actions through the organs of action as well as the sense organs. So, it is about the other world (ihlok). But that is called alokik, divine action. What? Which one? That those eight recognized that one numberwise. Hm? And became residents of that place. Will they become or not? Will they become through mind and intellect or through sense organs or through organs of action? Yes. They will become residents of that place through the mind and intellect, will they not? So, these alokik acts will be seen by the people of the world and the purusharthis, yes, they will see and understand – we should also perform such divine actions. What kind of divine actions? What kind of divine actions? Of the organs of action, of the sense organs or arey, of the organs of action; listen carefully; actions performed through the organs of action, actions performed through the sense organs – are these lokik or alokik? They are lokik. Is alokik connected with the mind and intellect? Hm? Does one perform actions through the mind and intellect or not? Hm? Does one perform? Does one perform actions through the mind and intellect? Hm?
(Someone said something.) Yes. You do remember. But will that be called an action?

Baba says – What does Shankar do? Nothing. Hm? So, does he not do anything? Hm? He remembers. So, is this not an action? Hm? It is an action. Then why was it said that he does not do anything? What does Shankar do? Nothing. Hm? People of the world say – Dev-Dev-Mahadev. I am that as well. What has been said? Hm? They say very proudly – What is this? This one has become a stone. Hm? Nothing sits in his intellect at all. It has sit more in the intellect of those who have come after this one. Does it sit or not? Does it sit in the latter ones, is their intellect good or have they also developed a stone-like intellect? Arey! Is their intellect of those who play a part on this world stage through the sense organs, through the organs of action after this one good or is the intellect of this one good? Hm? Is the intellect of this one good? Hm, yes, those who have come after this one; have other groups come or not? The group of deities came. Did it come or not? It came on the world stage, didn’t it? Hm? It came. So, the Father of the one who establishes the deity religion must have also come. Is it not?

Similarly, then who else came? The Father who establishes the deity religion came. Who came next? Hm? Yes, who came? Then who else came? Hm? Arey, is the Moon dynasty (Chandra vansh) established in the Silver Age or not? So, who came to give birth? Arey? The one who gives birth to the Suryavanshis is the Sun. So, who came to give birth to the Chandravanshis? Hm?
(Someone said something.) Brahma Baba? Arey, the name is Chandravansh. Why do you say Brahma Baba? The one who gives birth to the Suryavansh (Sun dynasty) is the Sun. So, you will write the Sun, will you not? Hm? The Father of the Suryavanshis is the Sun. Isn’t it? (Someone said something.) Yes. There is the Moon Dynasty that exists in the Silver Age; the one who gives birth to it will be the soul of the Moon only, will it not be? Yes. So, who gives birth to the Kshatriyas? The celestial degrees decreased, did they not? Yes. So, who gives birth to them? Hm? Should the Father give birth? This one catches the mother. He is a fan of the mother. O Father! Damn. Arey, who gives birth? The Father gives birth, doesn’t he? Yes. Decide firmly. What? Write and hang around your ears, tie it. Hang it around your neck. What? Who is the one who gives birth? Father or mother? Yes. (Someone said something.) Father Ram. Look! Father Ram in the Silver Age. Now the topic of the Silver Age is being discussed. The topic of the Golden Age Sun dynasty is over, isn’t it? Yes. Even in that the one who gave birth to the Krishna perfect in 16 celestial degrees was also a deity only, wasn’t he? So, a deity must have given birth to the deities. But would he have given birth to deities with descending celestial degrees or would he have given birth to the deities with rising celestial degrees? He gave birth to the deities with descending celestial degrees. They will be called deities. Yes. They will indeed be called deities. Although they are deities with descending celestial degrees. But there will be generations in the Golden Age also, will there not be? Will there be only one generation? Yes.

So, now you have understood this firmly. What? Who is the founder of the religion of the Chandravanshis on this world stage? Yes. The Moon of knowledge. Even if you say Brahma Baba, then what should you add? Brahma, the Moon of knowledge. You should speak accurately, shouldn’t you? Yes. So, the Moon of knowledge Brahma is the Father of the Chandravanshis. He is, isn’t he? Yes. And after that? They also have a group, don’t they? There is, isn’t it? There is a group in the Silver Age, isn’t it? Although those who become deities with descending celestial degrees in the Golden Age, they then come and get birth in the Silver Age also, don’t they? They get birth, don’t they? Yes.

So, it was said – These are the two groups of the descending celestial degrees. Then after the Silver Age, the dualist Copper Age starts. Then one king, one religion, one language, one clan, one opinion doesn’t remain at all there because the founders of religions who come, they start their new topics. Hm? And they do not contain any essence. Hm? So, they cause the degradation of the world. So, which group arrived? Islamic group arrived. So, now you have understood that all such founders of religions who will come and their follower souls who descend from the Supreme Abode, the Soul World, will their intellect be better or will the intellect of the Father of the human world, who develops the most stone-like intellect in the last birth be better? Hm? Yes. The intellect of the latter ones will be better. So, those latter ones will have ego, will they not? O! You have grown old. You sit quietly. Obey me. Will they say or not? Hm? Will they not say? Hm? Yes, they will say, will they not? Arey, old man, you have grown old. People say, don’t they? Arey, this person has grown old. He has crossed sixty; so, his intellect does not work. Achcha. Okay brother, you may say. Hm? But the speakers don’t know that that soul, although it has developed a stone-like intellect, who has taken his support? Hm? The Supreme Soul Father has taken his support. Hm? So, is he an ordinary soul? Hm? This one is an extraordinary soul.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 24 May 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2707, दिनांक 21.11.2018
VCD 2707, Dated 21.22.2018
प्रातः क्लास 21.9.1967
Morning Class dated 21.9.1967
VCD-2707-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.40
Time- 00.01-16.40


प्रातः क्लास चल रहा था - 21.9.1967. सद्गुरुवार को छठे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी अलौकिक दिव्य कर्म की। अलौकिक दिव्य कर्म इसको कहा जाता है कि तुमको देख करके और भी ऐसे निकलेंगे। ऐसे ही कर्म करेंगे। कैसे? जैसे तुमने समझा है ऐसे बाप को। वो हमारा बाप भी है, टीचर भी है, घर भी है, स्वर्ग भी है। याद में तुम अलौकिक दिव्य कर्म करेंगे। कर्म तो आत्मा करती है ना। तो आत्मा वो कर्म ज्ञानेन्द्रियों की याद में करेगी या कर्मेन्द्रियों की याद में करेगी? हँ? याद आया? किसकी याद में करेगी? आत्मा खुद तो मन-बुद्धि है ना। हँ? तो आत्मा तो याद करेगी भूल करके। कर्मेन्द्रियों का भी भूल जाए और ज्ञानेन्द्रियों का भी भूल जाए। आत्मा को आत्मा का बाप ही याद आए। हाँ, ये है कि आत्मा का बाप इस सृष्टि पर आकरके जो दिव्य जन्म लेता है वो कौनसे तन के द्वारा दिव्य जन्म लेता है? वो हुई उसकी दिव्य जन्म भूमि। तो ऐसे बनेंगे तो वो भी जानेंगे।

और ऐसे-ऐसे निकलेंगे दिव्य कर्म करने वाले। बच्चे निकलेंगे ना जो ये जाकरके सब चित्र वगैरा ले जाएंगे। हँ? ये सब चित्र कौनसे ले जाएंगे? जड़ चित्र ले जाएंगे क्या? चैतन्य चित्र ले जाएंगे क्योंकि भई ये चित्र थोड़े अच्छे भी तो बनें ना। हँ? अच्छे? किसे अच्छे कहा जाएगा? जड़ चित्रों को या चैतन्य चित्रों को? तो ये चित्र बने अच्छे-अच्छे तो ले जाएंगे। ले जाने में कोई हर्जा थोड़ेही है। ये स्टीमर में भरा। वाह। हँ? ये कौन बोला? ऊपरवाला बोला कि इन चित्रों को स्टीमर में भर दो? हँ? कौन बोला? अरे? हाँ, ब्रह्मा बाबा बोला। इन चित्रों को स्टीमर में भर दो। क्योंकि बाबा की बुद्धि में तो वो जड़ चित्र ही बैठे हुए हैं। हाँ, तो भर करके ये ले जाएंगे। समझा ना। तो स्टीमर लेकरके जहाँ-जहाँ स्टीमर खड़ा रहे, बीच में कहीं खड़ा होगा ना। तो वहाँ ये चित्र लगा देंगे। जैसे रेल में मुसाफिरी करते हैं तो वो उतरकरके बड़े-बड़े स्टेशन पर ये लोग कितना भाषण वगैरा करते हैं।

तो फिर ये समझ लो कि इतने तक तुम्हारी सर्विस होने की है जो ये सभी लेकरके अनेक बनेंगे बच्ची। क्या? क्या बनेंगे? हँ? ऐसे चित्र अनेक बनेंगे। थोड़ेही नहीं बनेंगे। कैसे चित्र? हँ? जड़ चित्र? नहीं। चैतन्य चित्र अनेक बनेंगे। ढ़ेर बनेंगे। ऐसे मत समझो कि ऐसे नहीं निकलेंगे। हाँ। हँ? ऐसे। ऐसे माने कैसे? लक्ष्मी-नारायण जैसे बहुत निकलेंगे। उदारचित्त निकलेंगे। हँ? अब ये किसने बोला? उदारचित्त निकलेंगे। जड़ चित्र? हँ? कैसे चित्र निकलेंगे? चैतन्य चित्र उदारचित्त निकलेंगे। हुंडी सकारने वाले सांवलशाह की हुंडी जो ऐसे-ऐसे तुम कर्तव्य करेंगे तो तुम्हारी हुंडी भरती जाएगी। बाहर में जाएंगे, दिखाएंगे। सब जगह में दिखलाएंगे। तो सबको मालूम तो पड़े ना। क्या मालूम पड़े? हँ? कि ये कौन हैं? इस सृष्टि में बाहर जाएंगे तो बाहर तो विदेशी लोग होंगे ना। हँ? हाँ, विदेशी धरमखंड वाले होंगे। तो उनको मालूम पड़े कि ये कौन हैं तो ये इतना पुरानी दुनिया को बदलकरके नई दुनिया कैसे स्थापन करते हैं? हँ? दूसरे धरम वालों ने तो अपने-अपने धरमपिताओं को देखा है। हँ? वो उन धरमपिताओं के चित्रों में, चैतन्य चित्रों में और जो तुम चित्र ले जावेंगे प्रदर्शनी करने के लिए उनमें कोई अंतर होगा या नहीं होगा? हँ? क्योंकि उन धरमपिताओं के भी जो चैतन्य चित्र थे वो ट्रांसपेरेन्ट तो थे ना। ट्रान्सपेरेन्ट थे? नहीं। अरे? लो! क्राइस्ट के चेहरे को ध्यान से देखो। गुरु नानक को देखो। बुद्ध को देखो। उनके चेहरे में ट्रांसपेरेंसी दिखाई देती है कि नहीं देती? हाँ। लेकिन तुम जो चित्र ले जावेंगे उन चित्रों जैसी ट्रांसपेरेन्सी तो और कहीं इस दुनिया में हो ही नहीं सकती।

देखो, ये नॉलेज वंडरफुल है। जिस नॉलेज के आधार पर ये चित्र तैयार होते हैं। नहीं तो, तुम बच्चे भी तो घोर अंधियारे में थे ना। हँ? थे कि नहीं? हाँ। तुम समझते थे कि इस दुनिया में क्योंकि विदेशी धरमपिताओं से उनके फालोअर्स से प्रभावित हो गए थे ना। तो समझते थे उस दुनिया में पार्ट बजाने वाले वो ही बड़े अच्छे हैं। हँ? तो पहले तुम भी कुछ नहीं जानते थे। ऐसे तुच्छ बुद्धि थे। अभी तो तुमने जाना है कि तुम जानते हो कि हम सारे विश्व को हैविन बनाएंगे। हँ? उन विदेशियों के धरमपिताओं ने कोई सारे विश्व को हैविन बनाया क्या? हँ? जिस देश में आए उस देश में शुरु-शुरुआत में बड़ा अच्छा-अच्छा; फिर बाद में? बाद में जल्दी वो भी तमोप्रधान बन जाते। हँ? बजाय हैविन के फिर क्या दिखाई पड़ता? नरक ही दिखाई देता। हैल बन जाता है। समझा ना? और तुम तो जानते हो कि अभी ये तो विश्व हैविन बन जाएगी। बाकि हां, बाकि जो नहीं बनेंगे हैविन में जाने लायक वो जाकर मुक्तिधाम में रहेंगे।

तो देखो, तुम्हारे ऊपर ये बातें समझाने की कितनी जिम्मेवारी है। हँ? तुमको ये अथार्टी रखी जाती है ना। हँ? बाप भी अथार्टी है। क्या अथार्टी है? किस बात की? हँ? ये जो नॉलेज है ना ईश्वरीय नॉलेज, इस ईश्वरीय नॉलेज की, सृष्टि के आदि, मध्य, अंत की अथार्टी है। हँ? और बाप भी अथार्टी। कौन-कौनसा बाप? सुप्रीम सोल बाप, वो तो है ही अथार्टी। सदाकाल की या अल्पकाल की? हँ? वो तो सदाकाल की अथार्टी है। लेकिन सदाकाल कोई पार्ट बजाता है क्या इस सृष्टि पर? नहीं। और तुम तो इस सृष्टि पर लगातार नंबरवार पार्ट बजाते हो। तुमको भी सर्वशक्तिवान अथार्टी बनना है। हँ? कि बन गए? बनना है। तो बाप के बच्चे भी तो वो ही बनेंगे ना। कौन? जो सर्वशक्तिवान की अथार्टी बनाए। तो सब शक्ति तो तुमको काहे से मिलेगी? हँ? हाँ। उस एक को याद करने से मिलेगी। तो तुम सबको जो अथार्टी मिलेगी, हँ, सारी दुनिया को हैविन बनाने की अथार्टी, ज्ञान की भी अथार्टी, वो अथार्टी मिलती है इस ज्ञान से; हँ? किस ज्ञान से? जो सुप्रीम सोल बाप आकरके इस सृष्टि पर देते हैं। इसलिए बाप को आलमाइटी यानि सर्वशक्तिमान और अथार्टी यानि सभी वेदों, ग्रंथों, शास्त्रों का ये सारा ज्ञान जानते हैं। हँ? हाँ, इसलिए इनको भी अथार्टी कहा जाता है। किनको भी? अरे, किसकी तरफ इशारा किया? हँ? साकार की तरफ इशारा किया जिस साकार मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं, उनको अथार्टी कहा जाता है। शास्त्रों की अथार्टी। हँ?

21.9.67 की प्रातः क्लास का सातवां पेज, दूसरी लाइन। कितने उमंग में रहना चाहिए बच्चों को। क्या? कि इस दुनिया में जो विद्वान, पण्डित, आचार्य हैं, वो तो शास्त्रों की ही अथार्टी हैं। हँ? और तुमको कौन मिला? जो शास्त्रों की भी अथार्टी हो और ईश्वर जो आकरके अखूट ज्ञान का भंडार देते हैं उसकी भी अथार्टी। तो देखो, तुमको तो बहुत उमंग में रहना चाहिए। कितना तुम्हारे मुख से सिवाय रत्नों के और कुछ भी नहीं निकलना चाहिए। हँ? शास्त्रों में रतन भरे हैं कि पत्थर भरे हैं? वो ही। क्या-क्या पत्थर भरे हैं? हँ? अरे, शास्त्रों में क्या-क्या पत्थर भरे? परमात्मा सर्वव्यापी है। हँ? है कि नहीं? ये पत्थर हुआ ना। हाँ। और वो परमात्मा इस सृष्टि पर आकरके दस अवतार लेता है; 22 अवतार लेता है, 24 अवतार लेता है। हाँ। कहते हैं, फिर कहते हैं सर्वशास्त्र शिरोमणि गीता। और उसमें भगवान का नाम डाला हुआ है। तो श्रीमदभगवद्गीता कहते हैं। और शास्त्रों को तो श्रीमत भगवत नहीं कहते। कहते हैं क्या? नहीं कहते। तो, और वो भगवद्गीता भी जो तुम्हें मिल रही थी भक्तिमार्ग में, वो भी किसकी बनाई हुई? हँ? विकारी मनुष्यों की बनाई हुई। हँ? तो उसमें रतन होंगे क्या? हँ? नहीं। उसमें भी रतन तो नहीं हो सकते। मिक्स होगा ना। हाँ। कुछ भी नहीं। तो कुछ भी नहीं निकलना चाहिए तुम्हारे मुख से सिवाय ईश्वरीय ज्ञान के दिये हुए रतनों के।

A morning class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the sixth page on Thursday was about alokik divine actions. Alokik divine action is said to be when others also emerge by observing you. They will also perform similar actions. How? Just as you have understood such Father. He is our Father also, teacher also, home also, heaven also. You will perform alokik, divine actions in remembrance. The soul performs actions, doesn’t it? So, will the soul perform those actions in the remembrance of sense organs or will it perform in the remembrance of the organs of action? Hm? Did you recollect? In whose remembrance will it perform? The soul itself is mind and intellect, isn’t it? Hm? So, the soul will remember by forgetting. If should forget the organs of action as well as the sense organs. The soul should remember only the Father of the soul. Yes, it is correct that the divine birth that the Father of souls gets after coming to this world, through which body does He get the divine birth? That is His divine place of birth. So, if you become like this, then they will also know.

And such ones who perform divine actions will emerge. Children will emerge who will go and take all the pictures, etc. Hm? Which all of these pictures will they take? Will they take the non-living pictures? They will take the living pictures because brother, these pictures should get a little nice, should they not? Hm? Nice? What will be called nice? Is it the non-living pictures or the living pictures? So, if these pictures become nice, then they will take. There is no objection in taking. They will load in the steamer. Wow! Hm? Who said this? Did the above one ask to load these pictures on the steamer? Hm? Who said? Arey? Yes, Brahma Baba said. Load these pictures in the steamer. It is because the same non-living pictures are contained in Baba’s intellect. Yes, so they will load and take these. Did you understand? So, take the steamer and wherever the steamer stops; it will stop somewhere in between, will it not? So, these pictures will be displayed there. For example, when you travel by rail (train), then they bring them down to the big stations and these people deliver so many lectures, etc.

So, then understand that your service is to take place to the extent that all these will be taken and many will be prepared daughter. What? What will be prepared? Hm? Many such pictures will get ready. A few will not be prepared. What kind of pictures? Hm? Non-living pictures? No. Many living pictures will get ready. Numerous pictures will get ready. Do not think that such ones will not emerge. Yes. Hm? Such ones. Such ones refer to which kind? Many like Lakshmi-Narayan will emerge. Broadminded ones (udaarchitt) will emerge. Hm? Well, who said this? Broadminded ones will emerge. Non-living pictures? Hm? What kind of pictures will emerge? Living pictures, broadminded ones will emerge. Those who fill the Hundi (donation box), those who fill Saanwalshaah’s Hundi; if you perform such actions, then your Hundi will go on filling. They will go outside and show. They will show everywhere. So that everyone should get to know, should they not? What should they know? Hm? That who are they? When they go outside in this world, then there will be foreigners outside, will they not be? Hm? Yes, those who belong to the foreign religious lands will be there. So, they should know that who are these people who transform such old world and establish a new world? Hm? People belonging to the other religions have seen their own founders of religions. Hm? Will there be any difference between the pictures of those founders of religions, those living pictures and the pictures that you will carry to exhibit or not? Hm? It is because the living pictures of those founders of religions were transparent, were they not? Were they transparent? No. Arey? Look! Look at the face of Christ carefully. Look at Guru Nanak. Look at Buddha. Is there any transparency in their faces or not? Yes. But the pictures that you will carry, the transparency of those pictures cannot be found anywhere else in this world at all.

Look, this knowledge is wonderful. These pictures are prepared on the basis of this knowledge. Otherwise, you children were also in complete darkness, were you not? Hm? Were you or were you not? Yes. You used to think that in this world because you were influenced by the foreign founders of religions and their followers, were you not? So, you used to think that those who used to play a part in that world are very nice. Hm? So, earlier you also did not used to know anything. You had such low intellect. Now you have come to know that you know that we will make the entire world heaven. Hm? Did those founders of foreign religions make the entire world heaven? Hm? The country in which they came, it was very nice in the beginning in that country; then later on? Later on soon they also become tamopradhan. Hm? Instead of heaven what is visible? Hell is visible. It becomes a hell. Did you understand? And you know that now this world will become a heaven. But yes, those who do not become worthy of going to heaven will go and live in the abode of liberation.

So, look, you have such a responsibility of explaining these topics. Hm? You are given this authority, aren’t you? Hm? The Father is also an authority. What authority is He? Of what? Hm? He is an Authority of this knowledge, the Godly knowledge, this Godly knowledge of the beginning, middle and end of the world. Hm? And the Father is also an Authority. Which all Father? The Supreme Soul Father; He is anyways an Authority. Is He forever or temporary? Hm? He is forever Authority. But does He play a part forever in this world? No. And you play a part continuously numberwise in this world. You also have to become almighty authority. Hm? Or have you become? You have to become. So, they alone will become the Father’s children also, will they not? Who? Those who were made the authority of the almighty. So, how will you get all the powers? Hm? Yes. You will get by remembering that one. So, the authority that you all will get, the authority to make the entire world heaven, the authority of knowledge as well, you get that authority through this knowledge; hm? Through which knowledge? The knowledge that the Supreme Soul Father comes and gives in this world. This is why the Father is almighty, i.e., sarvashaktivaan and authority, i.e. knows the knowledge of all the Vedas, books, scriptures. Hm? Yes, this is why this one is also called authority. Who also? Arey, towards whom was a gesture made? Hm? A gesture was made towards the corporeal that the corporeal permanent Chariot in which He enters is called authority. The authority of scriptures. Hm?

Seventh page, second line of the morning class dated 21.9.67. Children should have so much enthusiasm. What? That the scholars, pundits, teachers of this world are an authority of scriptures only. Hm? And who have you found? The one who is an authority of the scriptures as well as an authority of the inexhaustible store house of knowledge that God comes and gives. So, look, you should remain in so much enthusiasm. Nothing except gems should emerge from your mouth. Hm? Are the scriptures filled with gems or stones? The same. What all stones are contained in them? Hm? Arey, what all stones are filled in the scriptures? The Supreme Soul is omnipresent. Hm? Is it or not? This is a stone, isn’t it? Yes. And that Supreme Soul comes to this world and takes ten incarnations, 22 incarnations, 24 incarnations. Yes. They say; then they say that the highest gem among all the scriptures is the Gita. And the name of God has been inserted in it. So, it is called the Shrimadbhagwadgita. Other scriptures are not called Shrimat Bhagwat (God’s directions). Do they say? They don’t say. So, and that Bhagwatgita that you were getting on the path of Bhakti was penned by whom? Hm? It was penned by the vicious human beings. Hm? So, will it contain gems? Hm? No. There cannot be gems in it as well. It will be mix, will it not be? Yes. Nothing. So, nothing except gems given in Godly knowledge should emerge from your mouth.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 26 May 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2708, दिनांक 22.11.2018
VCD 2708, Dated 22.11.2018
प्रातः स 21.9.1967
Morning Class dated 21.9.1967
VCD-2708-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.14
Time- 00.01-16.14


प्रातः क्लास चल रहा था - 21.9.1967. सद्गुरुवार को सातवें पेज के मध्य की तीसरी लाइन में बात चल रही थी कि विलायत से बहुत लोग आते हैं। हँ? किसलिए आते हैं? भारत में आते हैं ना। तो उनको गाइड मिलता है समझाने के लिए, दिखाने के लिए। और उनका उदाहरण क्यों दिया? उनका उदाहरण तुमको समझाने के लिए दिया, हँ, कि जहाँ अभी तुमको ले जाने वाले हैं; हँ? तुम भी क्या हो? तुम डबल विदेशी हो या नहीं हो? हाँ। डबल विदेशी तो हो। तो तुमको भी तो गाइड चाहिए ना। हँ? तो कहाँ ले जाने हैं? अभी तुमको कहाँ ले जाने वाले हैं? हँ? जहाँ अभी तुमको ले जाने वाले हैं उसका भी तुमको साक्षात्कार हो गया है बुद्धि से। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) परमधाम। हाँ, परमधाम न कहो, ब्रह्मलोक कहो। क्या? क्या कहो? ब्रह्मलोक। ब्रह्मलोक माने? वो थोड़ेही समझते हैं ऋषि-मुनि सन्यासी लोग कि वो जो कहते हैं ब्रह्मलोक, वो तो उसे भगवान समझ लेते हैं। भगवान है? हँ? ब्रह्मलोक भगवान है? नहीं। नहीं। भगवान कैसे है? परमेश्वर थोड़ेही है? परम माने बड़े ते बड़ा; ईश्वर माने ईश्वर। है? कि रहने का स्थान है? रहने का स्थान है।

तो जहाँ तुमको अभी जाना है रहने के स्थान में; तुमको माने किनको? हँ? हम आत्मा को जहाँ जाना है उसका तुमको साक्षात्कार हो गया बुद्धि से। हँ? तो क्या साक्षात्कार किया? कि वो हमारा क्या है? घर है। हँ? जैसे जो भी आत्माएं होती हैं ना। शरीर छोड़ती हैं। तो कहाँ जाती हैं? शरीर छोड़ने के बाद कहाँ जाती हैं? हँ? अपने घर में जाती हैं ना। कौनसा घर होता है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) आबू पर्वत? क्या? हँ? अरे? शरीर छोड़ती हैं तो कहाँ जाती हैं? गरभ में जाती हैं। अरे? किसके गरभ में? चींटी के गरभ में कि हाथी के गरभ में? हँ? कहाँ जाती? गरभ तो सभी प्राणियों का होता है। कहाँ जाती है आत्मा? हँ? हाँ, जहाँ जाती हैं, वहाँ मां के गरभ में जाती हैं। अपने अम्मा के गरभ में जाती हैं। जहाँ उनके हिसाब-किताब है वहीं उनको जाके जनम लेना है। तो तुम्हारा हिसाब-किताब कहां है? हँ? कहाँ जाके प्रत्यक्षता होगी? वो घर पहुँचेंगे; क्या? तुम्हारी आत्मा ज्योतिबिन्दु उस घर में पहुँचेगी, हँ, परमब्रह्म बड़ी अम्मा; परम माने? बड़ी अम्मा कि छोटी अम्मा? बड़ी अम्मा? वो तो समझ गए तुम। कहाँ जाना है? अभी बच्चा समझ गया हमें परमब्रह्म में जाना है। छोटी अम्मा के यहाँ नहीं जाना। छोटी अम्मा में बड़ी अम्मा में अंतर होता है कि नहीं? हँ? होता है? हाँ।

तो तुम्हारा घर है वो। नहीं तो जो मुक्ति वाले हैं मुक्ति पाने वाले। तुम तो जीवनमुक्ति पाने वाले हो। अंतर क्या है? वो जीवन में रहते मुक्ति नहीं पाते हैं। और तुम? इस जीवन में रहते-रहते, इस शरीर में रहते-रहते तुम इस शरीर से, बंधन से मुक्त हो जाते हो। शरीर यहीँ पड़ा हुआ है। आत्मा अलग से देख रही है कि हाँ, शरीर पड़ा हुआ है। हँ? और जिसमें चाहोगे उसमें प्रवेश कर जाओगे। जैसा बाप वैसे? वैसे बच्चे। हाँ, तो तुमको तो जीवनमुक्ति मिलती है। और उनको? कल बताया था ना। उनको जीवनमुक्ति थोड़ेही मिलती है। क्या मिलता है? मुक्ति मिलती है। तो उनमें अव्वल नंबर कौन बताया? हँ? हाँ, उनमें अव्वल नंबर, हाँ, ब्रह्मा तो, लेकिन दादा लेखराज ब्रह्मा। तो उनकी संख्या कितनी है? हँ? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) साढ़े चार लाख कम, जो मुक्ति में जाएंगे? वो तो कहता साढ़े चार लाख। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, साढ़े चार लाख कम 700-750 करोड़। क्या कहा? साढ़े चार लाख कम। कौनसे कम? हाँ? हाँ, तुम्हारे जैसे। बड़ी अम्मा को मानने वाले। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) छोटी अम्मा को मानने वाले? कहता छोटी अम्मा को मानने वाले। अच्छा? हँ? कौनसे घर में जाएंगे? अरे, बड़े ते बड़ी अम्मा के घर जाएंगे कि छोटी-छोटी, छोटी से छोटी अम्मा; क्यों? छोटी से भी छोटी अम्मा। फिर उससे भी छोटी अम्मा। फिर उससे भी छोटी अम्मा। चार अम्माएं हैं छोटी-छोटी। हँ? कौनसी अम्मा के घर जाएंगे? परमब्रह्म के घर। अच्छा?

तो अब कैसे, किसकी कैसट सुनेंगे? हँ? हँ? किसकी कैसट सुनेंगे? परमब्रह्म की कैसट सुनेंगे। यहाँ नहीं है कहीं। परमब्रह्म जहाँ कहीं होगा। अभी तो परमब्रह्म है क्या? प्रत्यक्ष हुआ? अभी लो, तो जाओगे कहाँ से? आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो उसको मालूम पड़ जाता है कौनसे अम्मा के गर्भ में जाना है? पता ही नहीं चला? हँ? छोटी अम्मा का पता चला ना? हाँ। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) होगा अभी। अभी पता नहीं चला है आत्माओं को। अभी मन-बुद्धि रूपी आत्मा को पता नहीं चला है परमब्रह्म कौन है? ऐसे ही कह देते हैं वो है, वो है, वो है दिखाने के लिए। है ना?

तो मुक्तिवाले जो हैं वो नहीं समझते हैं कि हम कोई ब्रह्म तत्व में जा रहे हैं, निवास करेंगे वहाँ। जानते ही नहीं। तुम तो जानते हो। जिसको क्या कहते हैं? जिसको कहते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे। ऐसे नहीं कि वो अम्मा ही है। क्या? अम्मा ही है या पिता भी है? हाँ। उसकी तो गांव-गांव में, शहर-शहर में और विदेश-विदेश में, देश-विदेश में खुदाइयां हुईं तो उनमें वो लिंग मूर्ति मिली ना। हँ? तो वो बाप भी है, हँ, और अम्मा भी है। अम्मा साकार और बाप छोटी सी बिन्दी। हँ? अम्मा माने धरणी। धरणी माता कहा जाता है ना। तो धरणी में वो अति सूक्षम बीज आके जुड़ता है। तो मात-पिता जिसको कहते हैं; समझ गए ना? माता भी है और पिता भी है। तो कहते हैं वो जो मुक्ति पाने वाले वो किसको नहीं जानते। न माता को जानते न पिता को जानते। तुमने तो जाना। जाना ना? हाँ। याद आता है? हँ? पक्का याद आता है कि कोई दूसरा याद आता है?
(किसी ने कुछ कहा।) दोनों याद आते हैं। ये, ये व्यभिचारी याद करता है। हँ? एक को याद नहीं करता। एक पर्सनालिटी को याद करता है कि दो को? दो पर्सनालिटी को याद करता? व्यभिचारी है? अच्छा? कहता है मैं व्यभिचारी बनके रहूंगा। दो को याद करना है कि एक को याद करना है? हँ? दो को याद करना है? अरे? एक को याद करना? दो को याद करना? एक को याद करना? और? दो को क्या करना? कान खुजला ले पहले।

अच्छा, जो कुछ भी नहीं जानते मुक्ति वाले उनको क्या कहते हैं? हँ? जो कुछ भी नहीं जानते। न माता को जानते हैं, न पिता को जानते हैं। तुम तो जानते हो हमारा माता-पिता एक ही है पर्सनालिटी। है ना? तो कहते हैं ना त्वमेव माता च पिता त्वमेव। हाँ, जो कुछ भी नहीं जानते तो उनको कहते हैं ईडियट। जट बुद्धि। क्या कहते हैं? जट। हाँ। जाट बुद्धि होते हैं ना। वो उधर होते हैं ना। कहाँ? ये, हँ, कौनसा वो प्रदेश है? हाँ। हरियाणा। हरियाणा में जाट बहुत होते हैं। क्या? तो बाबा ने कहा वो जो नहीं जानते हैं मात-पिता को तो उनको कहते हैं जाट बुद्धि। जट बुद्धि कहके चिढ़ाते हैं ना। ऐ जट बुद्धि। अच्छा! तो इसलिए तुम बच्चों को भी कहा जाता है। क्या कहें? हँ? अगर नहीं समझा है तो याद भी नहीं करेंगे। हँ? कोई दूसरे को याद करेंगे। तो कहेंगे तुमको क्या कहा जाता है? जट बुद्धि। वो जल्दी पहचाना। मैं तो पक्का जट बुद्धि हूँ। वाह भैया। क्या कहेंगे तुमको? हँ? बोलो-बोलो। हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) भुट्टू? हाँ। ये भी ठीक है। भुट्टू। जट बुद्धि। हाँ। ईडियट। तो कहेंगे कि आत्मा जट है। हँ? इसकी मन-बुद्धि रूपी आत्मा में कुछ भी बैठता नहीं है। ये रथ को चलाय नहीं जानते एकदम। क्या? जो जटबुद्धि हैं ना। ये रथ को कैसे चलाना है उसको एकदम चलाना जानते ही नहीं। हँ? अच्छा? तो क्या जगन्नाथपुरी में बिहार वालों से जाके पूछना पड़ेगा कि रथ को कैसे चलाते हैं? हँ? भाई मालूम कैसे चलाते हैं? बिहार; वो बिहार वाले नहीं। हाँ। क्या? जगन्नाथपुरी कहाँ है? अरे हाँ, उड़ीसा में। उड़ीसा में, वो उड़ीसा वाले हैं ना जगन्नाथपुरी में रथ को चलाते हैं। तो क्या करते रहते हैं? गालियाँ देते हैं। हरामजादा, उल्लू का पट्ठा, समझ में नहीं आता इसको। हँ? बड़ी तंग करता है। इतना भारी रथ हो गया। कैसे खींचें? लकडबुद्धि का रथ। क्या? लकड़ी का रथ होता है कि पत्थर का होता है? कि वो पारस, पारस पत्थर होता है? लकड़ी का।

तो देखो जो रथ को नहीं चलाय सकती आत्मा तो उसको क्या कहेंगे? जट बुद्धि। कुछ भी नहीं समझते कैसे चलाते हैं? अभी तो बाप तुमको आत्म अभिमानी बनाय देते हैं। हँ? और ये माया क्या करती है? क्या? नाम क्या है इसका? मा माने नहीं। आया माने आया। ये माया मेरे पास न आई होती तो बहुत अच्छा था। क्या? इसने सारी बुद्धि मेरी खराब, खराब कर दी। समझा कि नहीं? क्या? हँ? ये माया क्या करती है? बुद्धि भुट्टू बनाय देती है। ईडियट बनाय देती है। तो माया आत्मा अभिमानी से देह अभिमानी बनाय देती है। देखो, बनाय दिया ना। अरे! अपन से पूछो अपने दिल से माया ने भुट्टू बनाय दिया ना कि पक्का निश्चय हो गया 100 परसेन्ट? कि कौन है माता और कौन है पिता? भक्तामार्ग में गाते हैं तुम्हीं हो माता, तुम्हीं पिता हो। अरे, अरे! इतने से क्या बन जाते हो? हँ? कितना फर्क हो जाता है! आत्माभिमानी और देह अभिमानी दोनों में कितना फर्क हो जाता है!

तो हमको, हँ, हमको जो इतना आत्माभिमानी बनाकरके सुखी बनाते हैं; कितना सुखी बनाते हैं? हँ? कितना सुखी बनाते हैं? अरे, इस दुनिया में तो 500-700 करोड़ जो भी मनुष्य आत्माएं हैं वो सब आखरीन तो आत्मा बनेंगी ना। लेकिन हमको कितना?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, हमको कलातीत आत्माभिमानी बनाते हैं। अतीन्द्रिय सुख भोगने वाला। जो मुक्ति भोगने वाली आत्माएं हैं ना वो अतीन्द्रिय सुख नहीं भोग सकती। हाँ, देवात्माएं हैं तो ज्ञानेन्द्रियों का सुख भोगती हैं। और राक्षसी आत्माएं हैं, तो बस उनको क्या याद आता रहेगा? क्या याद आएगा? हाँ। कर्मेन्द्रियों का सुख। कर्मेन्द्रियों में जो सबसे पावरफुल है ना कामेन्द्रिय उसका सुख बहुत याद आएगा। और तुमको तो कितना सुखी बनाते हैं। समझा कि नहीं समझा? कितना? कि न कर्मेन्द्रियों की दरकार, न ज्ञानेन्द्रियों की। उनसे भी ऊपर कौनसा सुख? मन-बुद्धि का अतीन्द्रिय सुख।

A morning class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the third line of the middle of the seventh page on Thursday was that many people come from abroad. Hm? Why do they come? They come in India, don’t they? So, they get a guide to explain, to show round. And why was their example given? Their example was given to explain to you that the place where you are going to be taken; hm? What are you as well? Are you double foreigners or not? Yes. You indeed are double foreigners. So, you also want a guide, don’t you? Hm? So, where are you to be taken? Where are you going to be taken now? Hm? The place where you are going to be taken, you have had visions of that place also through your intellect. Hm?
(Someone said something.) The Supreme Abode. Yes, do not call it the Supreme Abode; call it the Brahmlok (abode of Brahm). What? What should you call? Brahmlok. What is meant by Brahmlok? Those Sages, Saints and Sanyasis who utter Brahmlok, do not understand; they consider it to be God. Is it God? Hm? Is the ‘abode of Brahm’ God? No. No. How is it God? Is it the Supreme God (Parmeshwar)? Param means the biggest; Ishwar means God. Is it? Or is it a place of residence? It is a place of residence.

So, the place where you have to go now; to the place of residence; whom does ‘you’ refer to? Hm? You have had visions through the intellect of the place where we souls have to go. Hm? So, what vision did you have? That what is it for us? It is [our] home. Hm? Just as all the souls leave their bodies, so, where do they go? Where do they go after leaving the body? Hm? They go to their home, don’t they? Which is the home? Hm?
(Someone said something.) Mount Abu? What? Hm? Arey? When they leave the bodies, where do they go? They go to the womb. Arey? In whose womb? In the womb of an ant or in the womb of an elephant? Hm? Where do they go? All the living beings have a womb. Where does the soul go? Hm? Yes, the place where it goes, it goes to the mother’s womb. It goes to its mother’s womb. They have to get birth wherever they have karmic accounts. So, where is your karmic account? Hm? Where will you be revealed? You will reach that home; what? Your point of light soul will reach that home, hm, Parambrahm, the senior mother; what is meant by Param? Senior mother or the junior mother? Senior mother? You have understood that. Where do you have to go? Now the child has understood that we have to go to the Parambrahm. We don’t have to go to the junior mother’s place. Is there any difference between the junior mother and the senior mother or not? Hm? Is there? Yes.

So, that is your home. Otherwise, those who are to achieve mukti (liberation); you are the ones who achieve jeevanmukti (liberation in life). What is the difference? They do not achieve liberation while being alive. And you? You become free from this body, from the bondage while leading this life, while being in this body. The body is lying here itself. The soul is seeing separately that yes, the body is lying. Hm? And you will be able to enter in whomsoever you wish to enter. As is the Father so are the children. Yes, so you get jeevanmukti. And they? It was told yesterday, wasn’t it? They do not get jeevanmukti. What do they get? They get mukti. So, who was mentioned to be number one among them? Hm? Yes, the number one among them, yes, it is indeed Brahma, but Dada Lekhraj Brahma. So, what is their number? Hm? Hm?
(Someone said something.) Four and a half lakh less, who will achieve mukti? That one says four and a half lakhs. (Someone said something.) Yes, four and a half lakh less 700-750 crores. What has been said? Four and a half lakh less. Which ones less? Yes? Yes, like you. Those who believe in the senior mother. Hm? (Someone said something.) Or is it those who believe in the junior mother? He says – those who believe in the junior mother. Achcha? Hm? Which home will you go? Arey, will you go to the home of the senior most mother or the small, small, smallest mother; why? Smaller than the small mother. Then a mother smaller than her. Then a mother smaller than her. There are four small mothers. Hm? Which mother’s home will you go? Parambrahm’s home. Achcha?

So, now how, whose cassette will you listen? Hm? Hm? Whose cassette will you listen? You will listen to the cassette of Parambrahm. He is not here anywhere. Wherever Parambrahm is present. Is Parambrahm present now? Has he been revealed? Now, then where will you go from? When the soul leaves its body, then does it get to know as to which mother’s womb it has to enter? Did you not know at all? You came to know about the junior mother, didn’t you? Yes. Hm?
(Someone said something.) You will know now. The souls haven’t yet come to know. Now the mind and intellect like soul has not come to know as to who is Parambrahm? They simply say that it is he, it is he, it is he, just to show off. Is it not?

So, those who are to achieve mukti do not understand that we are going to the Brahm tatwa and we will go and live there. They do not know at all. You know. What is it called? It is called – You are my parents and we are your children. It is not as if she is mother alone. What? Is she mother alone or a Father as well? Yes. It ling idols have been found in every village, every city and within the country and abroad, in the excavations that have been conducted within the country and abroad. Hm? So, he is the Father as well as the mother. The mother is corporeal and the Father is a small point. Hm? Mother means Earth. Earth is called mother, isn’t it? So, that very subtle seed comes and joins the Earth. So, the one who is called the mother and the Father; did you understand? He is he mother as well as the Father. So, it is said that those who are to achieve mukti do not know anyone. Neither do they know the mother nor do they know the Father. You have come to know. You have come to know, haven’t you? Do you recollect? Hm? Do you recollect firmly or does anyone else come to your mind?
(Someone said something.) Both come to the mind. This one remembers in an adulterous manner. Hm? He does not remember one person. Does he remember one personality or two? Does he remember two personalities? Is he adulterous? Achcha? He says that I will remain adulterous. Should you remember two or should you remember one? Hm? Do you have to remember two? Arey? Should you remember one? Should you remember two? Should you remember one? And? What should you do to two? Prick your ear first.

Achcha, what are those who achieve mukti and do not know anything called? Hm? Those who do not know anything. Neither do they know the mother nor do they know the Father. You know that our mother and Father is only one personality. Isn’t it? So, people say, don’t they? Twamev mata ch pita twamev (You are my mother as well as Father). Yes, those who do not know anything are called idiots. Jatbuddhi (someone having a dull head). What do they say? Jat. Yes. People have Jat-like intellect, don’t they? They live that side, don’t they? Where? This, hm, which is that province? Yes. Hariyana. There are a lot of Jats in Hariyana. What? So, Baba has said that those who do not know the mother and the Father are called Jatbuddhi. People tease someone as Jatbuddhi, don’t they? O Jatbuddhi! Achcha! So, this is why you children are also called. What should be said? Hm? If you haven’t understood then you will not even remember. Hm? You will remember someone else. So, it will be said that what are you called? Jatbuddhi. That one recognized soon. I am a firm Jatbuddhi. Wow brother! What will you be called? Hm? Speak up, speak up. Hm?
(Someone said something.) Bhuttu (fool)? Yes. This is also correct. Bhuttu. Jatbuddhi. Yes. Idiot. So, it will be said that the soul is Jat. Hm? Nothing sits in the mind and intellect like soul of this one. This one does not know how to drive the Chariot at all. What? Those who are Jatbuddhi, aren’t they? They do not know at all as to how to drive the Chariot. Hm? Achcha? So, will those from Bihar have to be asked in Jagannathpuri that how is the Chariot driven? Hm? Brother, do you know how they drive? Bihar; Not those from Bihar. Yes. What? Where is Jagannathpuri? Arey, yes, in Orissa. In Orissa, those from Orissa pull the Chariot in Jagannathpuri. So, what do they keep on doing? They curse him. Haraamzaada (illegal son), Ullu ka pattha (fool), this one does not understand. Hm? He troubles a lot. The Chariot has become so heavy. How should we pull? The Chariot of the one with wood-like intellect. What? Is the Chariot of wood or of stone? Or is it paaras, paaras (elixir) stone? Of wood.

So, look, if a soul cannot drive its Chariot then what will it be called? Jatbuddhi. They do not understand anything as to how is it driven. Now the Father makes you soul conscious. Hm? And what does this Maya do? What? What is its name? Ma means no. Aaya means came. It would have been very good if this Maya wouldn’t have come to me. What? It has spoilt my entire intellect. Did you understand or not? What? Hm? What does this Maya do? It makes the intellect bhuttu. It makes it idiot. So, Maya makes you body conscious from soul conscious. Look, it made you, didn’t it? Arey, ask yourself, your heart that Maya made you bhuttu, didn’t it or have you developed 100 percent firm faith as to who is the mother and who is the Father? It is sung on the path of Bhakti that you alone are my mother and you alone are my Father. Arey, arey! What do you become from that? Hm? There arises such a difference! There is so much difference between a soul conscious person and a body conscious person!

So, we, hm, the one who makes us so soul conscious and happy; how happy does He make us? Hm? How happy does He make us? Arey, all the 500-700 crore human souls in this world will ultimately become souls, will they not? But how much will we?
(Someone said something.) Yes, He makes us kalaateet (beyond celestial degrees) soul conscious. The one who enjoys super-sensuous joy (ateendriy sukhh). The souls which achieve mukti cannot enjoy super-sensuous joy. Yes, if they are deity souls, they enjoy the pleasure of the sense organs. And if they are demoniac souls, then what will they keep on remembering? What will they remember? Yes. The pleasure of the organs of action. The one that is most powerful among the organs of action, the organ of lust, they will remember its pleasure a lot. And you are made so joyful. Did you understand or not? How much? That there is neither a need for the organs of action nor the sense organs. Which joy is higher than that? The super-sensuous joy of the mind and intellect.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 28 May 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2709, दिनांक 23.11.2018
VCD 2709, Dated 23.11.2018
प्रातः क्लास 21.9.1967
Morning Class dated 21.9.1967
VCD-2709-extracts-Bilingual

समय- 00.01-25.10
Time- 00.01-25.10


प्रातः क्लास चल रहा था - 21.9.1967. सतगुरुवार को आठवें पेज के मध्य से पहले बात चल रही थी – वो जैसे गोर्मेन्ट होती हैं, वैसे तुम्हारी भी ये गवर्मेन्ट है। हँ? वो तो दुनिया में अनेक गोर्मेन्ट हैं। और ये एक गवर्मेन्ट। वो गोर्मेन्ट्स भी एक-दो को प्राइज़ देती है। तुम बच्चों को प्राइज़ मिलती है। किनको? हँ? बोला था ना – आज से 40 साल पहले बोला था अव्यक्त वाणी में कि मेले की प्राइज़ दीदी-दादियाँ देंगी। और बापदादा, जो मददगार बने हैं बच्चे, उनको प्राइज़ देते हैं। और वो प्राइज़ दुनिया के मुकाबले इतनी बड़ी प्राइज़ तो और तो कोई दे ही नहीं सकता। हँ? तो वो, वो प्राइज़ बताया कि आगे चलके डिक्लेयर हो जावेगी। तो कौनसी प्राइज़ डिक्लेयर हुई? हँ? जो आज से चालीस साल पहले अव्यक्त वाणी में बोली थी। (किसी ने कुछ कहा।) बस तीन प्राइज़ मिलेंगे बोला था? हँ? दो नहीं? हाँ। बताया, ब्रह्मा, बाप; और? बाप तो जगतपिता बनने वाला है। और ब्रह्मा? जगतमाता। और तीसरा? हँ? तीसरा कौन? जिसको जगतमाता कहते हैं वो जगतमाता एक आत्मा ही है या शरीर के साथ भी है? क्योंकि शरीर के बिगर तो कोई काम इस दुनिया में होता नहीं है। तो ज़रूर बाप के विशेष मददगार कौन हैं? शिव बाप के? हँ? शिव बाप इस सृष्टि पर आते हैं तो जिस साकार तन का आधार लेते हैं तो वो आधार आत्मा ही है या शरीर भी है? शरीर भी है, आत्मा भी है। तो शरीर तो माता हो गया। हँ? और आत्मा? आत्मा क्या हुई? माता कहो, बच्ची कहो, शिवबाबा के लिए तो बच्चे ही हैं ना।

तो, तो एक बाप हो गया आत्मिक रूप में सुप्रीम सोल और वो देहभान के रूप में माता भी हो गई। और आत्मिक रूप में बच्चा भी हो गया। तो एकदम मूल रूप में तो कहें, कि इस सृष्टि में जो विशेष मददगार आत्माएं बनती हैं। कौनसी आत्माएं बनती हैं? तीन। कौन-कौन? एक-एक अक्षर लिख दो। हँ? ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। आत्माओं में? हं? मददगार बनते हैं सारी सृष्टि की तीन आत्माएं। हँ? देर लगाई। एक शिव आत्माओं का बाप। सारी सृष्टि के मददगार हैं कि नहीं? हँ? भले एक को तैयार करते हैं। हँ? अकूट ज्ञान का भंडार का जो वर्सा है वो भले एक को देते हैं। हँ? अब वो अकूट ज्ञान का भंडार चैतन्य आत्मा लेगी या जड़ शरीर लेगा? चैतन्य आत्मा। तो चैतन्य आत्मा तो बाप का बच्चा हो गया। हँ? और जो बच्ची है वो तो किसको कहेंगे? हं? बाप तो दो का ही आधार लेते हैं ना। प्रकृति के दो रूप हैं ना। बाप तो वास्तव में पुरुष है। क्योंकि इस सृष्टि में बाप जैसा पुरुष; पुरुष माने? हँ? पुरुष माने कठोर या कोमल? लूज़? कठोर। तो बाप जैसा, सुप्रीम सोल बाप जैसी तो कोई आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर नहीं है कि जो सदा स्ट्रिक्ट रहती हो। स्ट्रिक्ट का मतलब ये नहीं कि कोई वाचा से स्ट्रिक्ट हो जाती है या मनसा से स्ट्रिक्ट हो जाती है या जिस शरीर में प्रवेश करती है उसकी कर्मेन्द्रियों से स्ट्रिक्ट हो जाती है। नहीं। स्ट्रिक्ट का मतलब जो भी आत्मिक नियम, कानून हैं आत्मा के उनमें मजबूत। तो, आत्माओं की जो दुनिया है उसके तो नियम, कानून जरूर अलग होंगे। और देहधारियों की जो दुनिया है उसमें, वो तो क्या हो गई? पक्की प्रकृति हो गई।

तो प्रकृति के दो रूप बताए। एक तो वो जो श्रेष्ठ है। वो प्रकृति भी उसी सुप्रीम सोल की बनाई हुई है जिसे पराप्रकृति कहा। कौन है? अरे, लक्ष्मी तो बाद में आती है। वो जिस तन में आता है उसमें माता तो है ही शरीर के रूप में। और आत्मा भी तो है। बाप का बच्चा है कि नहीं? हँ? कि शरीर को बच्चा बनाएंगे? शरीर को तो, इन्द्रियों को कंट्रोल किया जाता है। तो बाप भी है। बच्चा भी हो गया। बच्ची भी हो गई। परन्तु जो बच्चा और बच्ची हो गई वो तो एक ही हुए ना। हँ? पर्सनालिटी कहेंगे क्योंकि इस दुनिया में तो पर्सनालिटी के बिगर तो काम होता ही नहीं है। शरीर क्या है? अर्जुन का रथ क्या है? हँ? समझदार है या आत्मा है? हाँ, प्रकृति तो है लेकिन प्रकृति दो प्रकार की बताई। प्र माने प्रकष्ठ। कृति माने रचना। तो जिस आत्मा को ज्ञान सुनाते हैं वो आत्मा प्रकष्ठ रचना नहीं है? कि पहले से बनी-बनाई है? रचना रची जाती है या पहले से रची हुई होती है? हँ? रची जाती है ना। तो रची जाती है इसका मतलब पहले नहीं थी ना। पहले क्या थी? पहले तो वो भी पत्थर थी, लक्कड़ थी, हँ, क्या थी? हाँ। चैतन्य तो नहीं कहेंगे। चैतन्य बुद्धि कहेंगे? नहीं कहेंगे। तो वो आत्मा जो है जिसको प्रकष्ट रूप से कृति बनाया ज्ञान सुना करके वो हो गई; क्या? पराप्रकृति। ऊँच ते ऊँच।

और फिर कर्मेन्द्रियां और ज्ञानेन्द्रियों से जो शरीर बनता है वो भी तो परिवर्तन होना चाहिए सृष्टि पर ही। हँ? अगर वो पक्का परिवर्तन नहीं होगा सौ परसेन्ट तो इस सृष्टि पर सत कोई रहेगा? हँ? सत सदाकाल होता है कि कभी होता है कभी नहीं होता? चलो। वो जो शरीरधारी है जिसमें प्रवेश करते हैं उसमें आत्मा तो सदाकाल है ही। वैसे भी आत्मा अविनाशी होती है। लेकिन यहाँ तो पार्ट बजाने की बात है ना। तो आत्मा भी पार्टधारी है। शरीर भी पार्टधारी है। और सदाकाल? सदाकाल का पार्टधारी। बाकि जितने शरीर हैं वो सदाकाल पार्टधारी इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर चैतन्य रूप में नहीं हैं। कुछ न कुछ जड़त्वमयी बुद्धि बन जाती है कुछ न कुछ टाइम के लिए। तो जैसे कहा कि इस सृष्टि में पर्सनालिटी चाहिए। और पर्सनालिटी दो चाहिए या एक चाहिए? क्योंकि शिव बाप को तो इस सृष्टि पे रहना ही नहीं है। रहना है? क्यों नहीं रहना? हँ? क्योंकि, हाँ, क्योंकि वो तो इस सृष्टि पर अगर रहे, हँ, तो गिनती में आ जाएगा ना। हँ? और गिनती में आवे तो क्या होता है? हँ? सो चक्कर में भी आए। और चक्कर में आवे तो सारा भूल जावे। भूल जावे कि नहीं? हाँ। तो वो तो चक्कर से न्यारा है। तो इस सृष्टि पर आता है तो जो इस सृष्टि पर आत्मा तो है चलो अविनाशी, लेकिन शरीर क्या, जिस शरीर के द्वारा आत्मा को पार्ट बजाना है, वो भी इस चक्कार में अविनाशी होना चाहिए या नहीं होना चाहिए? हँ? लेकिन पत्थर है, लक्कड है। तो अविनाशी बनने के लिए क्या करना पड़े? हँ? उसमें भी वो पावर आनी चाहिए ना आत्मा की। हाँ। जैसे शिव है, कल्याणकारी है, तो वो शरीरधारी, शरीर भी ऐसा होना चाहिए जो इस सृष्टि पर सदा कल्याणकारी रहे।

चलो, ये तो एक व्यक्तित्व की बात हो गई। लेकिन सृष्टि तो एक व्यक्तित्व से नहीं चलेगी। तो; हँ? तो दो चाहिए। और दो में भी, दोनों; कहते तो हैं बाबा, शिवबाबा ये तो कहते हैं ज्ञानी तू आत्मा मुझे विशेष प्रिय है। ज्ञानी तो आत्मा ही बनेगी। कि शरीर बनेगा? नहीं। और जो कन्याएं-माताएं होती हैं तो वो तो देह का ओना ज्यादा रहता है। तो कन्याओं-माताओं में से भी कोई ऐसी निकलनी चाहिए ना जो आत्मा जो पुरुष है इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदाकाल पार्टधारी उस आत्मा की तरह ही इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर उस बाप की जो पावर है शिव बाप की जिसके लिए वो आके ज्ञान सुनाता है। हँ? वो पावर धारण (करे)। कौनसी पावर? पवित्रता की पावर। और पुरुष तो सब दुर्योधन-दुशासन बता दिये। शिव बाप ने क्या बोला? पुरुष सब? सब दुर्योधन-दुशासन। तो इसमें जिस तन में प्रवेश करते हैं उस तनधारी आत्मा भी क्या हो गई? दुर्योधन-दुशासन हो गई।

तो पवित्रता को धारण करने वाली धारणा शक्ति, धरणी जिसे कहा जाता है। धरणी माने? हाँ, मिट्टी का अंश ज्यादा होगा कि नहीं होगा? अरे! ये धरणी है। इसमें कौनसा अंश ज्यादा है? पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। पांच तत्वों में से कौनसा ज्यादा है? हँ? बताओ। कौनसा तत्व ज्यादा है?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। पृथ्वी में कौनसा तत्व? मिट्टी। हाँ। मिट्टी ही मिट्टी। है ना। हाँ। अब जो इस पृथ्वी पर मिट्टी है वो मिट्टी भी एक तरह की है कि अनेक प्रकार की है? हँ? अनेक प्रकार की मिट्टी है। तो उस मिट्टी में भी किस मिट्टी को चुनता है? हँ? चुनता नहीं है। ऊपरवाला चुनता है कि नीचे वाला चुनता है? (किसी ने कुछ कहा।) ऊपरवाला चुनता है? हँ? उसने एक को चुना या दो को चुना? वो एकदम निवृत्ति और टोटल सौ परसेन्ट अव्यभिचारी है या व्यभिचारी है? हँ? वो तो टोटल सौ परसेन्ट अव्यभिचारी। वो तो एक को चुनता है। हँ? ठीक है ना।

उसी को दुनिया ने फालो किया। फिलम वालों ने भी। मैंने तुझे चुन लिया, तू भी मुझे चुन। हँ? सुन, सुन, सुन बेटा सुन। बेटा है तो दुर्योधन-दुशासन बना पड़ा है। सुने कहाँ से? तो क्या करना पड़े? हँ? ऐसा ज्ञान सुनाता है जिससे बुद्धि में बैठता है कि हाँ, भई मेरा चोला तो पुरुष है। पुरुष का चोला है ना। और पुरुष चोले को ही शिव ने निमित्त बनाया। और, शिव ने जिस चोले को निमित्त बनाया उसका जो क्या नाम सैम्बुल, वो तो नहीं पूजा जाता। उसको तो सिर्फ याद किया जा सकता है। निराकार को याद किया जा सकता है कि पूजा की जा सकती है? याद किया जा सकता है। तो उसका जो सैम्बुल है इस दुनिया में, जो उस सैम्बुल को कोई जानता नहीं है। तो वो सैम्बुल जो है वो मिट्टी का है या उस सैम्बुल में जो बताया कि मेरे लिंग की ही पूजा होती है। हँ? तो वो जो लिंग है वो मिट्टी है या चैतन्य समझदार है? हँ? मिट्टी है। और ये आर्गन्स सारे क्या हैं? मिट्टी ही तो हैं ना। हँ? मिट्टी है। तो जो लिंग पूजा जाता है इस सृष्टि में, वो जिस अर्जुन के रथ में आया उसका शरीर रूपी रथ मिट्टी। और उस मिट्टी में जो पुरुष रूप है उस पुरुष रूप में ही प्रवेश करता है।

सवाल ये है कि वो दुर्योधन-दुशासन जैसी मिट्टी में क्यों प्रवेश करता है? हँ? जबकि शिव स्वयं एवर प्योर है तो इस सृष्टि पर जो एवर प्योर आत्मा हो जन्म-जन्मान्तर की, उसमें ही प्रवेश करना चाहिए ना। हँ? तो उसमें क्यों नहीं प्रवेश करता? हँ? हाँ, वो जानता है कि इस सृष्टि पर तो जो चैत शक्ति है; चैतन्य शक्ति माने बुद्धि। बुद्धि जानकारी जिसको मिलती है जिस बुद्धि को कहते हैं निर्णय शक्ति, परख शक्ति। तो जो परख सके कि बिन्दु-3 आत्माएं ढेर सारी हैं उनमें सुप्रीम सोल भी बिन्दु। तो उस बिन्दु को पहचान सके। तो वो जो जड़ शरीर है या जड़ शरीर का वो जो आर्गन है जिस आर्गन को वो ढूंढ़ करके प्रवेश करता है; हँ? तो वो क्या ज्ञान को धारण करेगा? शरीर धारण करेगा, मिट्टी धारण करेगी? नहीं। ज्ञान को धारण पूरा कौन कर पाएगा? आत्मा या मिट्टी? आत्मा। तो वो आत्मा; जैसे शिव स्वयं पुरुष है; पुरुष माने आत्मा। और जिसमें प्रवेश करता है वो वास्तव में तो पुरुष परमानेन्ट तो नहीं है अभी। पुर माने शरीर रूपी पुरी। और ष माने शयन करने वाला। तो क्या वो शरीर रूपी पुरी में आराम से सदाकाल शयन करने वाला है? हँ? है? है? हँ? इस अंतिम जनम में कहेंगे कि आराम से शयन करने वाला है? नहीं।
(किसी ने कुछ कहा।) हो, होगा। इसीलिेए तो आया है। हो जाए भविष्य में इसीलिए तो आया है। लेकिन उसके लिए उसे पवित्र मिट्टी चाहिए माने शरीर रूपी रथ चाहिए या आत्मा चाहिए चैतन्य? पुरुष चाहिए? पुरुष ही चाहिए।

तो वो पुरुष तन में प्रवेश करता है और उस पुरुष तन के द्वारा उस इन्द्रिय को ही अपना सैम्बुल समझ करके बताता है कि मेरा जो लिंग है, सैम्बुल, हँ, जिसमें मैं प्रवेश करता हूँ, बस, इसी को मैं आप समान बना देता हूँ। तो जो शरीर है वो भी निराकारी बनता है या नहीं है? शरीर।
(किसी ने कुछ कहा।) शरीर? जो पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश पांच तत्वों का बना हुआ है। वो भी निराकारी बनता है? बनता है या नहीं बनता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, लाइट माने? लाइट पकड़ में आएगी? हँ? पकड़ में नहीं आएगी। तो निराकारी हुई या साकारी हुई? हँ? निराकारी। तो जो निराकारी है वो निराकारी तब बनेगी शरीर रूपी मिट्टी, हाँ, जब वो चैतन्य जो है, जिसमें प्रवेश किया है, जो लिंग रूपधारी है। क्या? वो स्त्री चोले का सैम्बुल नहीं है, लिंग रूपधारी है, उसको ज्ञान सुनाकरके ये बुद्धि में बैठा दे कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कोई धरणी भी ऐसी होनी चाहिए प्रैक्टिकल में पार्ट बजाने वाली जो सदा काल; क्या? अव्यभिचारी रूप के स्वरूप को धारण करके पार्ट बजाय सके।

A morning class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed just before the middle portion of the eighth page on Thursday was – Just as there is that government, you too have this your government. Hm? There are numerous governments in the world. And this is one government. Those governments give prize to each other. You children get prize. Who? Hm? It was said, wasn’t it? It was told 40 years before this day in an Avyakt Vani that the prize for fairs will be given by the Didi-Dadis. And BapDada gives prizes to the children who have become helpers. And that prize, when compared to the world, nobody else can give such a big prize at all. Hm? It was mentioned that that prize will be declared in future. So, which prize was declared? Hm? That which was said 40 years before this day in an Avyakt Vani.
(Someone said something.) Was it said that just three prizes will be received? Hm? Not two? Yes. It was told – Brahma, Father; and? The Father is going to become the Father of the world (Jagatpita). And Brahma? Mother of the World (Jagatmata). And third? Hm? Who is the third? The one, who is called Jagatmata, is that Jagatmata just a soul or is she with a body also? It is because no task in this world is undertaken without a body. So, definitely who are especially helpful to the Father? To Father Shiv? Hm? When the Father Shiv comes to this world, then the corporeal body whose support He takes, is that support just a soul or a body as well? It is body as well as soul. So, the body is mother. Hm? And the soul? What is the soul? Call it the mother, call it the daughter, for ShivBaba they are children only, aren’t they?

So, one is a Father in soul form, the Supreme Soul and in the form of body consciousness he is the mother as well. And in a soul form he is a child as well. So, if we say in completely original form that those who become especially helpful in this world. Which souls become [helpful]? Three. Who all? Write one alphabet each. Hm? Brahma, Vishnu and Shankar. Among the souls? Hm? Three souls become helpful to the entire world. Hm? You were late. One is Shiv, the Father of souls. Is He helpful to the entire world or not? Hm? Although He prepares one. Hm? Although He gives the inexhaustible stock house of knowledge to one; hm? Well, will a living soul take that inexhaustible stock house of knowledge or will the inert body take? The living soul. So, the living soul is the Father’s child. Hm? And who will be called the daughter? Hm? The Father takes the support of two, doesn’t He? There are two forms of nature, aren’t there? The Father is actually male. It is because a male (purush) like the Father in this world; what is meant by male? Hm? Does male mean strict or delicate? Loose? Strict. So, there is no soul like the Father, like the Supreme Soul Father on this world stage who remains strict forever. Strict doesn’t mean that someone becomes strict through words or becomes strict through mind or becomes strict through the organs of action of the body in which He enters. No. Strict means strong in the spiritual rules, laws of the soul. So, the rules, laws of the world of the souls will definitely be different. And in the world of bodily beings, what is it? It is firm nature.

So, two forms of nature (prakriti) were mentioned. One is the one who is righteous. That Prakriti, who was mentioned to be Paraaprakriti has also been readied by the same Supreme Soul. Who is she? Arey, Lakshmi comes later on. The body in which He comes, in that the mother is in the form of a body. And there is the soul also. Is he the Father’s child or not? Hm? Or will you make the body a child? The body, the organs are controlled. So, he is the Father also. He is the son also. He is the daughter also. But the son and the daughter are one and the same, aren’t they? Hm? They will be called a personality because no task in this world is undertaken without a personality. What is the body? What is Arjun’s Chariot? Hm? Is it intelligent or a soul? Yes, it is indeed nature, but nature (prakriti) was mentioned to be of two kinds. Pra means prakashth (special). Kriti means creation. So, the soul whom He narrates the knowledge, is that sou not a special creation? Or is it already made? Is a creation created or is it already created? Hm? It is created, isn’t it? So, it is created means that it did not exist earlier, did it? What was it earlier? Earlier it was also a stone, wood; hm? What was it? Yes. It will not be called living (chaitanya). Will it be said to have a living intellect? It will not be called. So, that soul which was made a creation in a special manner by narrating knowledge is; what is it? Paraaprakriti. Highest on high.

And then the body which is made up of the organs of action and the sense organs should also transform in this world itself. Hm? If that is not transformed firmly, hundred percent, then will anyone be sat (true) in this world? Hm? Does truth remain forever or does it remain for some time and doesn’t remain for some time? Okay. That bodily being in which He enters, it contains the soul forever. Even otherwise the soul is imperishable. But here it is about playing the part, isn’t it? So, the soul is also an actor. The body is also an actor. And forever? Forever actor. All other bodies do not remain on this world stage in living form as forever actors. They develop inert intellect to some extent or the other for some or the other time. So, for example, it was said that a personality is required in this world. And are two personalities required or is one required? It is because Father Shiv doesn’t have to remain in this world at all. Does He have to remain? Why doesn’t He have to remain? Hm? It is because, yes, it is because if He remains in this world then He will also be included in the counting, will He not be? Hm? And if He is included in the counting, then what happens? Hm? Then He will have to pass through the cycle also. And if He passes through the cycle, then He will forget everything. Will He forget or not? Yes. So, He is beyond the cycle. So, when He comes in this world, then the soul in this world is imperishable, but is the body, the body through which the soul has to play a part, should it also be imperishable in this cycle or not? Hm? But it is a stone, a wood. So, what will have to be done to become imperishable? Hm? It should also get the power of the soul, shouldn’t it? Yes. For example, there is Shiv, He is benevolent; so, that bodily being, the body should also be such that it remains benevolent forever in this world.

Okay, this is a topic of the personality. But the world will not work with one personality. So; Hm? So, two are required. And even among the two; both; Baba, ShivBaba does say that I especially like the knowledgeable souls. The soul alone will become knowledgeable. Or will the body become? No. And the virgins and mothers have more consciousness of the body. So, one such person should emerge among the virgins and mothers also, who inculcates the power of knowledge of the Father, the Father Shiv on this world stage like the soul, the purush, who is forever an actor on this world stage for whom He comes and narrates the knowledge. Hm? Which power? The power of purity. All other men were described to be Duryodhans and Dushasans. What did Father Shiv say? All men are? All are Duryodhans and Dushasans. So, this one, this body in which He enters, what is the soul of that body also? It is Duryodhan and Dushasan.

So, the power of inculcation (dhaarnaa shakti) who inculcates the purity, who is called the land (dharani). What is meant by dharani? Yes, will it have more part of soil or not? Arey! This is land. Which part is more in it? The Earth, water, air, fire and sky. Which one is more among the five elements? Hm? Speak up. Which element is more?
(Someone said something.) Yes. Which element in the Earth? Soil. Yes. Soil and just soil. Is it not? Yes. Well, the soil on this Earth, is that soil also of one kind or of many kinds? Hm? It is soil of many kinds. So, even in that soil, which soil does He choose? Hm? He doesn’t choose. Does the above one choose or does the below one choose? (Someone said something.) Does the above one choose? Hm? Did He choose one or did He choose two? Is He completely nivritti (single) and total hundred percent avyabhichaari (non-adulterous) or is He vyabhichaari (adulterous)? Hm? He is total hundred percent avyabhichaari. So, He chooses one. Hm? It is correct, isn’t it?

The world followed him only. The filmmakers also. I have chosen you; you too choose me. Hm? Listen, listen, listen, son, listen. The son has become Duryodhan-Dushasan. How will he listen? So, what will he have to do? Hm? He narrates such knowledge that it sits in his intellect that yes, brother, my body is male. It is a male body, isn’t it? And it is the male body only which Shiv made instrumental. And the body which Shiv made instrumental, his symbol is not worshipped. He can only be remembered. Can the incorporeal be remembered or can He be worshipped? He can be remembered. So, His symbol in this world, nobody knows that symbol. So, that symbol is of mud or it was told about that symbol that My ling alone is worshipped. Hm? So, is that ling soil or is it living, intelligent? Hm? It is soil (mitti). And what are all these organs? They are soil only, aren’t they? Hm? They are soil. So, the ling that is worshipped in this world, the Chariot of Arjun in whom He came, his body like Chariot is soil. And the purush-form in that soil, He enters in that purush-form only.

The question is that why does He enter in Duryodhan-Dushasan like soil? Hm? When Shiv Himself is ever pure, then He should enter only in the ever pure soul of many births in this world, shouldn’t He? Hm? So, why doesn’t He enter in him? Hm? Yes, He knows that the living power in this world; living power means intellect. The one who gets intellect, i.e. information, the intellect which is called the power of decision-making, the power of discerning; so, the one who could discern that there are numerous point-like souls; among them the Supreme Soul is also a point. So, he should be able to recognize that point. So, that inert body or the organ of that inert body, the organ, which He searches and enters; hm? So, will that inculcate the knowledge? Will the body inculcate, will the soil inculcate? No. Who will be able to inculcate the knowledge completely? The soul or the soil? The soul. So, that soul; just as Shiv Himself is male (purush); Purush means soul. And the one in whom He enters is not permanently male in reality now. Pur means the body like abode. And sh means the one who rests. So, does he rest forever comfortably in the body like abode? Hm? Is he? Is he? Hm? Will it be said that he rests comfortably in this last birth? No.
(Someone said something.) He will. This is why He has come. He has come only to ensure that he becomes in future. But for that does He require a pure soil, i.e. body like Chariot or does He require living soul? Does He require a soul? He requires a soul only.

So, He enters in a male body and through that male body, He considers that organ to be His symbol and tells that My ling, the symbol, in which I enter, that is it, I make it equal to Myself. So, does the body also become incorporeal or not? The body.
(Someone said something.) The body? That which is made up of the Earth, water, air, fire, sky, the five elements. Does that also become incorporeal? Does it become or not? Hm? (Someone said something.) Yes, what is meant by light? Can the light be grasped? Hm? It will not be grasped. So, is it incorporeal or corporeal? Hm? Incorporeal. So, the one who is incorporeal, the body like soil will become incorporeal only when the living one in whom He has entered, who is ling form. What? He is not a symbol of the female body, he is ling form, He should narrate knowledge to him and make it sit in the intellect that there should be one such land (dharani) on this world stage playing part in practical who forever; what? The one who could inculcate the form of the non-adulterous form and play its part.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 30 May 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2710, दिनांक 24.11.2018
VCD 2710, Dated 24.11.2018
प्रातः क्लास 21.9.1967
Morning Class dated 21.9.1967
VCD-2710-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.12
Time- 00.01-15.12


प्रातः क्लास चल रहा था - 21.9.1967. सतगुरुवार को आठवें पेज के मध्य से कुछ पहले बात चल रही थी कि जितना मददगार बनते हैं उतनी ही प्राइज़ आपेही पाते हैं। विन करते हो ना। ये पुरुषार्थ कर रहे हैं ना बच्चे। क्या पुरुषार्थ कर रहे हैं? दौड़ी पहनते हैं। हँ? ऐसे-ऐसे दुनिया में, ये तो दुनिया है ना, दो चाहिए ना। तो दुनिया में दौड़ी पहनते हैं तो दो टांग बांध देते हैं। हँ? दोनों टांगें बांधी। माने एक की लेफ्ट टांग और एक की राइट टांग। दौड़ी पहनते हैं मिला करके। हँ? तुम लोगों ने स्कूल में देखा है ना। नहीं देखा? हाँ। तो वो तो है स्थूल पढ़ाई। हद की पढ़ाई। और ये है बेहद की पढ़ाई। तो तुम लोग ये स्कूल में, कौनसे स्कूल में? बेहद के स्कूल में क्या करते हो? हँ? क्या करते हो? टांगें मिलाय देते हो। लो। हँ? क्रिश्चियन लोग हाथ मिलाते हैं कि टांगें मिलाते हैं? क्रिश्चियन लोग तो हाथ मिलाते हैं। टांगें कहाँ मिलाते हैं? हँ? तो बाबा भी यहाँ कहते हैं कि ये जो गाड़ी है ना। कौनसी गाड़ी? शरीर रूपी गाड़ी है ना। ये दौड़ी भरती है। हँ? इसमें आत्मा है। तो आत्मा कदम से कदम मिलाकरके दौड़ी भरती है याद की यात्रा में। हँ? कदम माने? बुद्धि रूपी पांव। हँ।

तो बाबा पूछते हैं। तुम्हारा दूसरा फीता कौन है? हँ? इसको मुसाफिर कहा जाता है। किसको? हँ? स्त्री का मुसाफिर कहा जाता है। तो ये क्या दोनों ही मुसाफिर ठीक से चलते हैं? हँ? कि एक दाईं ओर भागता है एक बाईं ओर भागता है? दो टांग मिलाते हैं ना। तो दायीं ओर इधर भागे और बाईं ओर उधर भागे। हँ? अरे, साथ-साथ भागना चाहिए ना। लेकिन ऐसे क्यों? तो ठीक चलते हैं? पूछा। दोनों ही इकट्ठे हैं? हँ? फिर पूछा – गाड़ी का दोनों ही फीता इकट्ठा चलते हैं? तुम्हें क्या मुसीबत पड़ी इकट्ठा चलते हैं कि नहीं चलते हैं? तुम अपना फीता देखो। हँ? उनका फीता कौनसा है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) उनका फीता। किनका? उनका; उनका माने कौन बोल रहा है ये? हँ? गाड़ी के दोनों (फीते)। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ऊपरवाला बोलता है। तो ऊपरवाले का गाड़ी कौनसी है? हँ? ऊपरवाले की गाड़ी उसके साथ रहती होगी। उसका नाम गाड़ी का? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ब्रह्मा। हँ? परमब्रह्म। हँ। तो इकट्ठा चलते हैं? वो परमपिता और वो परमब्रह्म। हँ? बच्चों से पूछते हैं। अपना पहले देखें ना। क्या? इकट्ठे चलते हैं? हँ? बच्चों से कहते हैं – इकट्ठा चलेंगे तो खिट-खिट नहीं होगी। अच्छा। खिट-खिट नहीं होगी? माने? वो आगे चलके खिट-खिट नहीं होगी। अभी इसका मतलब खिट-खिट हो रही है कि नहीं? अरे? आगे के लिए बताया (कि) इकट्ठा चलेंगे तो खिट-खिट नहीं होगी। और अभी क्या हो रहा है? हँ? खिट-खिट हो रही है।

अगर एक लंगड़ा, हँ, रुद्रमाला में क्या होते हैं? हँ? लंगड़े होते हैं। और एक लूला। क्या? लूला माने? हाँ, साथ कौनसा निभाता है - हाथ कि टांग? हाथ (और) टांगे साथ निभाता है। तो एक लूला। साथ कैसे निभाए? लूला हो गया। हँ? क्या मतलब हुआ? हँ? लंगड़ा लूला का मतलब क्या हुआ? लंगड़ा का मतलब हुआ याद की यात्रा में दौड़ नहीं सकता क्योंकि लंगड़ा है। और एक लूला। लूला माने? भाई तुमको हम सहयोग दे नहीं सकते। तुम जो चाहते हो वो सहयोग हम नहीं दे सकते। तो लूला हो गया। सहयोग हाथ से दिया जाता है ना। हाँ। अच्छा, लूले को फीता दे दो। हँ? एक फीता हुआ। तो, तो ये गाड़ी हुई ना। हँ? ये गाड़ी घर-घर में होती है। समझ में आ रहा है? हाँ। ये गाड़ी घर-घर में होती है। हँ? दो होते हैं तो बड़े सुख से चले जाते हैं। हँ? क्योंकि वो समझते हैं, अच्छी तरह से समझते हैं कि भई हमारा प्रवृत्तिमार्ग है। कैसी मार्ग? प्र माने प्रकष्ट। और वृत्ति गोल हो गई तो क्या हो गई? वृत्ति। हँ। तो प्रवृत्तिमार्ग है।

प्रवृत्तिमार्ग के थे। हँ? तो अभी अपवित्र मार्ग के बन गए। क्या? ये कबकी बात बताई ‘थे’? कबकी बात बताई प्रवृत्तिमार्ग के थे पक्के? हँ? फिर? फिर अपवित्र बन गए। माने प्रवृत्ति टूट गई। कब थे प्रवृत्तिमार्ग के पक्के? नई दुनिया में प्रवृत्तिमार्ग के पक्के थे। और यहाँ अपवित्र बन गए।
(किसी ने कुछ कहा।) संगम में? अरे! द्वापरयुग के शुरुआत से ही जबसे ये कौन आया? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, इब्राहिम आया तो प्रवृत्ति उन्होंने तोड़ना सिखाय दी। क्योंकि वो तो हैं ही टूटी हुई प्रवृत्ति के। इस्लामियों की प्रवृत्ति होती है क्या पक्की? हँ? एक छोड़ी दूसरी की, दूसरी छोड़ी तीसरी की। चार-चार कर लेते हैं। तो अब अपवित्र प्रवृत्तिमार्ग के बन गए। कहाँ? इस पुरानी दुनिया में प्रवृत्तिमार्ग कैसा हो गया? सुख का कि दुख का? दुख का। भई, एक छोड़ेगा, हँ, छोड़ के चला जाएगा तो दूसरे को दुख होगा कि नहीं? हाँ, दुख होता है। तो अपवित्र प्रवृत्तिमार्ग के बन गए।

अभी बाप आया हुआ है। हँ? कौन आया हुआ है? हँ? बाप आया हुआ है। वो कैसा है? हँ? वो प्रवृत्तिमार्ग का है कि निवृत्तिमार्ग का है? हँ? बताओ, लिखो। एक अक्षर लिखो।
(किसी ने कुछ कहा।) प्रवृत्ति मार्ग का? अच्छा? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। उसकी पावर जो है ना, हँ? पुरुष है ना परमपुरुष, तो उसके अंदर जो पावर है ना। कौनसी पावर है? हँ? स्थूल पावर है कि सूक्षम पावर है? हँ? सूक्षम। क्या सूक्षम पावर है? हँ? उसके अंदर सूक्षम पावर है - अकूट ज्ञान का भंडार भर गया। तो वो अपने पास तो रख नहीं सकता। तो फिर वो, वो चुड़िया देखी ऊपरवाली? हाँ, तो वो ढ़ूंढती है। आत्मा है ना। तो ढ़ूंढती है। तो ढूंढने से तो उसको, वो तो त्रिकालदर्शी, उसको तो जल्दी मिल जाता है। तो वो बाप आया हुआ है प्रवृत्ति बनाने अपनी, तो फटाक से बनाय लेता है ना। हाँ। बनाय लेता है। हाँ। प्रवेश किया और प्रवेश करते ही, जिसमें प्रवेश किया वो तो पुरुष कि स्त्री? पुरुष, प्रजापिता। मनुष्य सृष्टि का बाप। लेकिन उसको फट से क्या बनाय दिया? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, परमब्रह्म बनाय दिया। अम्मा बनाय दिया। हाँ। अरे, वो तो भगवान है ना। स्त्री को पुरुष। पुरुष को स्त्री बनाय देते हैं। अपने मतलब की चीज़। अच्छा।

तो बाप आया हुआ है अभी फिर से तुमको; कैसी प्रवृत्ति बनाता है अपनी? पक्की प्रवृत्ति बनाता है कि कच्ची बनाता है? पूरा काम करके छोड़ता है कि अधूरा छोड़के चला जाता है? हँ? क्या करता है? हाँ। पक्की प्रवृत्ति। किसके साथ? हँ? पहली के साथ कि दूसरी के साथ कि तीसरी के साथ कि चौथी के साथ कि पांचवीं के साथ? अरे, किसके साथ? हाँ।
(किसी ने कुछ कहा।) लेफ्टिस्ट के साथ? क्या है लिखा? हँ? पहली। वो मुकर्रर रथ पकड़ लिया। पकड़ लिया तो पकड़ लिया। फिर छोड़ने वाला आखिर तक है नहीं। तो अभी ये बाप आया हुआ है ऐसा। कैसा? प्रवृत्तिमार्ग का कितना? 100 परसेन्ट पक्का बाप आया हुआ है। हँ? और किसमें आया हुआ है? अरे, किसमें आया हुआ है? जिसमें आया हुआ है; (किसी ने कुछ कहा।) परमब्रह्म में कहाँ आया? वो तो प्रजापिता में आया। परमब्रह्म काम निकालने के लिए नाम दे दिया। है ना। बाद में दिया कि पहले ही से था? नाम दे दिया। तो जिसमें बाप आया हुआ है, जिसके साथ प्रवृत्ति बनाई। हँ? बनाई ना। बनाई ना होती तो फिर क्यों दुनिया गाती तुमेव माता च पिता? तुम्हीं हो माता, तुम्हीं पिता हो। तो बाप पक्की प्रवृत्ति निभाने वाला आया हुआ है। फिर तुमको फिर से प्रवृत्तिमार्ग का पक्का बनाता है।

A morning class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed a little before the middle portion of the eighth page on Thursday was that the more you become helpful, the more you get the prize automatically. You win, don’t you? Children are making this purusharth, aren’t they? What purusharth are they making? They run the race. Hm? Like this in the world; this is a world, isn’t it? Two are required aren’t they? So, when people run a race in the world, they tie two legs. Hm? Two legs are tied. It means the left leg of one person and the right leg of another person. They run the race together. Hm? You have seen in the school, haven’t you? Haven’t you seen? Yes. So, that is physical education. It is a limited education. And this is an unlimited education. So, you people in this school; in which school? What do you do in the unlimited school? Hm? What do you do? You join the legs. Look. Hm? Do the Christians join hands or do they join legs? The Christians join their hands. Do they join their legs? Hm? So, Baba also says here that this is a vehicle, isn’t it? Which vehicle? It is a vehicle-like body, isn’t it? It runs. Hm? It contains the soul. So, the soul first matches the step with step and runs the race in the journey of remembrance. Hm? What is meant by step? The leg-like intellect. Hm.

So, Baba asks. What is your second thread (feeta)? Hm? This one is called a traveler (musaafir). Who? Hm? It is called a wife’s [co-] traveler. So, do both the travelers walk properly? Hm? Or does one run towards the right and the other towards the left? Two legs are joined, aren’t they? So, if the right one runs this side and the left one runs there. Hm? Arey, they should run together, shouldn’t they? But why is it so? So, do they walk properly? It was asked. Are both of them together? Hm? It was again asked – Do both the threads (wheels) run together? What is your problem whether they walk together or not? You check your thread. Hm? What is their thread? Hm?
(Someone said something.) Their thread. Whose? Their (unka); ‘unka’ means who is speaking? Hm? Both [threads] of the vehicle. (Someone said something.) Yes, the above one speaks. So, which is the above one’s vehicle? Hm? The vehicle of the above one must be with Him. What is the name of that vehicle? (Someone said something.) Yes, Brahma. Hm? Parambrahm. Hm. So, do they walk together? That Supreme Father and that Parambrahm. Hm? He asks the children. They should first check themselves, shouldn’t they? What? Do they walk together? Hm? He tells the children – If you walk together, there will not be any trouble (khit-khit). Achcha. Will there be no trouble? What does it mean? There will not be any problem in future. Does it mean that there is trouble now or not? Arey? It was told for future that if you walk together, there will not be any problem. And what is happening now? Hm? You are facing problems.

If one is lame, hm, what are people in the Rudramala (rosary of Rudra)? Hm? They are lame (langdaa). And one is one armed (loola). What? What is meant by loola? Yes, which one maintains the company – Is it the hand or the leg? Hand and legs maintain the company. So, one is loola. How will he maintain the company? He became loola. Hm? What does it mean? Hm? What is meant by langdaa and loola? Langdaa means that he cannot run in the journey of remembrance because he is lame. And one is loola. What is meant by loola? Brother, I cannot extend cooperation to you. I cannot give you the help that you want. So, he became loola (one armed). Assistance is given through the hands, isn’t it? Yes. Okay, give the thread to the loola. Hm? He is one thread. So, so, this is a vehicle, isn’t it? Hm? This vehicle exists in each home. Do you understand? Yes. This vehicle exists in every home. Hm? When there are two, they tread very happily. Hm? It is because they understand; they understand nicely that brother, ours is a path of household (pravrittimarg). What kind of path? Pra means prakasht (special). And vritti (occupation) became a circle, so, what did it become? Vritti. Hm. So, it is a path of household.

You belonged to the path of household. Hm? So, now you have become part of the impure path. What? A topic of which time was mentioned by uttering ‘belonged’? Which time was mentioned by uttering ‘you belonged to the firm path of household’? Hm? Then? Then you became impure. It means that the household broke. When were you firm on the path of household? You were firm on the path of household in the new world. And you became impure here.
(Someone said something.) In the Confluence Age? Arey! From the beginning of the Copper Age itself ever since who came? Hm? (Someone said something.) Yes, when Ibrahim came then he taught you to break the household. It is because they belong to the broken household only. Do the Islamic people have a firm household? Hm? They leave one and adopt the second one; they leave the second one and adopt the third one. They adopt up to four. So, now you have become part of the impure path of household. Where? In this old world how has the path of household become? One of happiness or one of sorrows? One of sorrows. Brother, if one leaves, hm, if one leaves and goes, then will the other one feel sorrowful or not? Yes, they feel sorrowful. So, you became part of the impure path of household.

Now the Father has come. Hm? Who has come? Hm? The Father has come. How is He? Hm? Does He belong to the path of household or to the path of renunciation? Hm? Speak up. Write. Write one alphabet.
(Someone said something.) To the path of household? Achcha? (Someone said something.) Yes. His power, isn’t it? The Parampurush (The Supreme Soul) is a male, isn’t He? So, the power contained in Him; which power is contained in Him? Hm? Does He have physical power or subtle power? Hm? Subtle. What subtle power does He have? Hm? There is a subtle power in Him – He is filled with inexhaustible stock house of knowledge. So, He cannot keep it with Himself. So, then, then did you see that bird (chudiya) above? Yes, so it searches. It is a soul, isn’t it? So, it searches. So, by searching; He is Trikaaldarshii (knower of the past, present and future); He finds him easily. So, that Father has come to establish His household; so, He sets up immediately, doesn’t He? Yes. He sets up. Yes. He enters and as soon as He enters; is the one in whom He enters a male or a female? Male, Prajapita. The Father of the human world. But what did He make him immediately? (Someone said something.) Yes, He made him Parambrahm. He made him a mother. Yes. Arey, He is God, isn’t He? Female to male. He transforms a male to female. A thing of his liking. Achcha.

So, the Father has come now to make you again; what kind of a household does He set up for Himself? Does He set up a firm household or a weak household? Does He perform His task completely or does He leave it unfinished? Hm? What does He do? Yes. Firm household. With whom? Hm? With the first one or with the second one or with the third one or with the fourth one or with the fifth one? Arey, with whom? Yes.
(Someone said something.) With a leftist? What did you write? Hm? First. He caught the permanent Chariot. When He caught He caught firmly. Then He is not going to leave him till the end. So, now such a Father has come. How? To what extent on the path of household? 100 percent firm Father has come. Hm? And in whom has He come? Arey, in whom has He come? The one in whom He has come; (Someone said something.) Did He come in the Parambrahm? He came in Prajapita. The name Parambrahm was assigned just to extract the work. Is it not? Was it assigned later or was it there from the beginning? The name was coined. So, the one in whom the Father has come, with whom the household was set up. Hm? It was set up, wasn’t it? Had it not been established, then why would the world have sung ‘you are my mother and Father’? You alone are my mother and you alone are my Father. So, the Father who maintains the firm household has come. Then He makes you firm on the path of household once again.
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 01 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2711, दिनांक 25.11.2018
VCD 2711, Dated 25.11.2018
रात्रि क्लास 21.9.1967
Night Class dated 21.9.1967
VCD-2711-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.08
Time- 00.01-20.08


आज का रात्रि क्लास है - 21.9.1967. बच्चियां तो नहीं जानती हैं। इतनी बातें तो नहीं जानती हैं क्योंकि अखबारें नहीं पढ़ती हैं। और ये बच्चे पढ़ते हैं, सुनते हैं। बहुत कुछ बाहर की बातें सुनते हैं क्योंकि इनकी मन-बुद्धि रूपी आत्मा बच्चियों के मुकाबले बहुत बाहर में रहती है। बाहर में माने? हाँ, बाबा की जो ज्ञान की दुनिया है, उस दुनिया के अलावा जो बाहर की दुनिया है, वो तो भौतिकवादी है ना। तो वहाँ बुद्धि बहुत रहती है बच्चों की। और ये बच्चियां अंदर में रहने वाली। कहाँ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। बाप जो मनसा सृष्टि का वायब्रेशन बनाने जा रहे हैं उस ज्ञान के वायब्रेशन में रहने वाली। तो फर्क हो जाता है ना दुनियावी समाचार सुनने में।

आजकल तो जो कांग्रेसी हैं ना; हँ? आजकल माने? सन् 67 की बात है ना। सन् 67 में भारत में कौन कांग्रेसी मुखिया प्राइम मिनिस्टर गद्दी पे बैठा था? यथा राजा तथा प्रजा हो जाती है। हँ? इंदिरा गांधी। तो आजकल तो कांग्रेसियां हैं ना। ये बहुत करके बाहर घूमती रहती हैं। क्या? कौनसी रेसियाँ? कांव-कांव की रेस मचाने वाली कांग्रेसियां। सोसाइटी की सेवा के लिए भी घूमती रहती हैं। अब दुनिया में इधर-उधर घूमती रहेगी बुद्धि तो चारों ओर से निमंत्रण भी मिलते हैं। मिलते रहते हैं। और ये कभी-कभी रिलीजियस की कान्फ्रेन्स भी होती है। हँ? और एक कान्फ्रेन्स होती है वेजिटेरियन कान्फ्रेन्स। क्या? वेजिटेबल ही वेजिटेबल खाओ। शुद्ध वेजिटेरियन। क्या? हाँ। वो भी कान्फ्रेन्स होती है। मैंने आज उनका पढ़ा नहीं। किसने बोला? ब्रह्मा बाबा ने बोला कि मैंने। मैं भी पुरुष हूँ ना। तो बोला जैसे बच्चे हैं वैसे मेल मैं भी हूँ। तो मेरी बुद्धि भी तो बाहर घूमती है ना। सब पुरुष दुर्योधन-दुःशासन हैं। बाहर की दुनिया में बुद्धि मंडराती रहती है। तो उनका आज मैंने अखबार नहीं पढ़ा। वो जो सारा लिखत है ना उनकी, कान्फ्रेन्स करने वाले जो निमंत्रण भेज देते हैं कि हमारी कान्फ्रेन्स में आकर शामिल हो जाओ।

तो ये जो वेजिटेरियन्स होते हैं ना, हँ, तो जो इनकी कान्फ्रेन्स होती है, कान में फुर्र करके अंश डालते हैं ना, अपनी-अपनी बातें डालते तो हैं। तो इनकी जो कान्फ्रेन्स है वो जरूर वो फिर जो वेजिटेबल्स से ज्यादा प्रेम करते हैं उन वेजिटेरियन्स के लिए ही कहेंगे ना। किसके लिए कहेंगे? हँ? हाँ। कि वेजिटेरियन बनना अच्छा है। क्या? वेजिटेबल। क्या, क्या कहते हैं? वेजिटेरियन क्या खाते हैं? वेजिटेबल ज्यादा खाते होंगे ना। तो वेजिटेबल खाना बहुत अच्छा है। वो ही खाना बनाना और खाना अच्छी बात है। ये सब गुण दिखलाएंगे। किस बात के? वेजिटेरियन्स के। कोई मांसाहारी बातें थोड़ेही बताएंगे? तो ये करेंगे। और वो करेंगे। और निमंत्रण भी उनका कुछ आता रहता है।

तो बाप ने ये रमेश बच्चे को लिखा था। हँ? कौनसे धरम का हैड? हँ? हाँ, दुनिया में जो भी धरम फैले हुए हैं, तो ये धरम वृक्ष है ना धर्मों का; वैरायटी धर्मों का ये कल्प वृक्ष है। कल्प वृक्ष कहो; हँ? गीता में इसका क्या नाम दिया? अश्वत्थ वृक्ष कहो। अश्व; अश्व माने मन रूपी घोड़ा। और इत्थ माने स्थिर हो जाए। तो जब मन रूपी घोड़ा स्थिर हो जाएगा तो अश्वत्थ वृक्ष में जितने भी धर्म हैं; हैं ना? और उनका मन रूपी घोड़ा जब स्थिर हो जाएगा तो दुनिया कैसी बन जाएगी? अव्वल नंबर के धरम वाली बनेगी या फड्डी नंबर बनेगी? हाँ, अव्वल नंबर के धरम वाली बन जाएगी। अव्वल नंबर धर्म कौनसा है? वो इस्लामी कहते हैं ना, मुसलमान कहते हैं ना – अल्लाह अव्वलदीन। तो ये बातें समझाने के लिए बाबा ने ये कल्प वृक्ष का चित्र बनवाया है ना। अनेक धर्मों की बातें उसमें बताई गई हैं।

तो उसमें बाबा की नजर वो धरम के ऊपर गई। मुख्य धरम तो चार ही हैं। हँ? कौन-कौनसे? देवी-देवता सनातन धर्म। इस्लाम धर्म, बौद्धी धर्म, क्रिश्चियन धर्म। तो आज की दुनिया में सबसे ज्यादा मान-मर्तबा कौनसे धरम का है दुनिया में? क्रिश्चियन्स का ज्यादा है। उनमें भी जो बड़े धोखेबाज क्रिश्चियन्स हैं ना, बहुत झूठे हैं। क्या? कैसे? कहते हैं धरम-धरम, धरम-करम। धरम-करम की बातों का दिखावा भी करेंगे। लेकिन जिनकी धरम की बातों का दिखावा करेंगे, उस धरम के पिता का दिखावा करेंगे, उसी को धोखा दे देंगे। उन धोखेबाजों में अव्वल नंबर बाबा ने कौनसी आत्मा चुनी? अरे? लिखो।
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, माया की नगरी बम्बई नगरा का क्या रमेश भाई। तो उसकी जो इस जनम की घरवाली है ना जो उसकी बुद्धि में घूमती है। उसका नाम क्या है मालूम है? हाँ। ऊषा रानी। वो उस धरम का इस दुनिया का बीज है ना। क्या? बीज कहें कि जड़ कहें? जड़ कहें। हाँ। आधार है। क्योंकि जो ऊपर से धरमपिताएं आते हैं ना सुप्रीम एबोड से या अर्श से तो वो रूहें धरमपिताओं की पहले-पहले जिसमें प्रवेश करती हैं क्योंकि सोलवर्ल्ड से आते हैं तो सोल वर्ल्ड में तो सुप्रीम सोल बैठा हुआ रहता है। वहाँ तो सब आत्माएं कैसी होंगी? सत्वप्रधान ही होंगी ना।

तो वो सत्वप्रधान आत्माएं इस दुनिया में आती हैं ना। तो वो गर्भ से जन्म तो ले सकती हैं? नहीं ले सकती हैं। तो उनको कोई आधार लेना पड़ता है। कैसा आधार लेना पड़ता है? और किनका लेना पड़ता है? पता नहीं वो धर्मपिताओं की आत्माओं को कैसे पता चल जाता है या ड्रामा में उनका पार्ट ऐसा नुंधा हुआ है कि वो देवी-देवता सनातन धर्म की जो आत्माएं थीं ना, स्वर्ग में देवताएं थी, सतयुग त्रेता में, राम-कृष्ण की दुनिया में, ऊँचे-ऊँचे वो ही देवता माने जाते हैं ना। तो उन्हीं आत्माओं में से जो आत्माएं उतरते-उतरते सतयुग से त्रेता में, त्रेता से सतयुग 16 कला संपूर्ण, त्रेता में 14 कला संपूर्ण, द्वापर में 8 कला संपूर्ण और कलियुग में 4 कलाएं शुरू में और अंत में आज के टाइम पर तो जीरो कलाएं हैं।

तो वो रमेश बच्चा बाप को, बाबा को याद आया। वो रमेश बच्चा जो है ना जो क्रिश्चियन धर्म का वो बीज है, जो सबसे पावरफुल है। कैसे पावरफुल? आज क्रिश्चियन्स में जो दो ग्रुप हो गए। एक वो आस्तिक हैं। थोड़ा धरमपिता को, धर्म ग्रंथ को और धरम के जो गिरिजाघर हैं बने हुए उनको मानते हैं। और दूसरा ग्रुप ऐसा है; कैसा? वो किसी को, किसी को नहीं मानते। न आत्मा को मानते, न परमात्मा को मानते, न धरमपिता को मानते। न धर्मग्रंथ को मानते। बाइबल को मानते हैं वो? नहीं। बिल्कुल भी नहीं। विश्वास ही नहीं। तो वो पावरफुल कैसे? हँ? क्या कारण है? हँ? क्योंकि वो ही रमेश वाली आत्मा जो है ना, अंतिम जनम में ऐसा धोखेबाज क्रिश्चियन बनती है; समझ गए कैसा धोखेबाज? जो इस जनम में उन्होंने धरम की धारणा धारण करने के लिए अपना धर्म का मुखिया कहो, बाप कहो, ब्रह्मा बाबा को बनाया ना, उसको ही धोखा दे दिया। मालूम है ना क्या धोखा दे दिया? हाँ। सारा प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय अपनी मुट्ठी में ले लिया। क्या करके? हँ? वर्ल्ड रिनिवल ट्रस्ट नाम की संस्था रजिस्टर्ड गोर्मेन्ट से भ्रष्टाचारी गोर्मेन्ट से रजिस्टर्ड कराके और उसमें अपने फेवर की जो आत्माएं हैं ना विधर्मी-विधर्मी, इस्लाम धर्म की हों, क्रिश्चियन धर्म की हों, हँ, उन विदेशी धर्म की जो फालोअर्स बनते हैं, उनको अपने फेवर में ले लिया और बस सारी संस्था को अपने कंट्रोल में कर लिया। तो ऐसा बॉम्ब फोड़ा; बॉम्ब समझ गए उनके हाथ में कौनसा था? हँ? क्या बॉम्ब? ब्रह्मा बाबा की बुद्धि में ऐसा बॉम्ब फूटा; बात छुपती थोड़ेही है। कोई न कोई तो बताय देते हैं ना। तो बाबा को जब पता चला कि रमेश बच्चे ने कुमारका दादी से मिलके, जिस कुमारिका दादी को बाबा बहुत मान-मर्तबा देते थे, हँ, और कुमारिका दादी ने दूसरी बहनों, माताओं से मिलकरके ये संगठन बनाके उसमें अपने साइन करके और बाबा की बुद्धि में वो बॉम्ब फोड़ दिया। बस बाबा को तो; ब्रह्मा बाबा का क्या हुआ? हार्ट फेल हो गया।

तो ऐसे हैं ये क्रिश्चियन्स। वो आधारमूर्त आत्माएं जो ब्रह्मा से पढ़ाई पढ़के ब्राह्मण बनते हैं; पता है कौनसी कुरी के ब्राह्मण? हँ? अरे, सतयुग में भी देवताएं होंगे तो पीढ़ी दर पीढ़ी नीची उतरती कला के होंगे ना? हँ? और ब्राह्मण तो वो ही बनते हैं जो पहले ब्रह्मा की औलाद बने। तो ब्रह्मा की जो औलाद ब्राह्मण बनते हैं वो भी नौ कुरी के ब्राह्मण होते हैं। तो अव्वल नंबर कुरी के तो ज्ञान सूर्य की संतान सूर्यवंशी हुए। हँ? जो राम वाली आत्मा गाई जाती है। और उसके बच्चे, हँ, बताओ ऊँची स्टेज में कौनसा नक्षत्र है, हँ, जो सूर्य के बाद पृथ्वी वासियों को ज्यादा रोशनी देता है? हाँ। चन्द्रमा। तो वो जो चन्द्रवंशी हैं ना, हाँ, वो ही चन्द्रमा; कौनसा चन्द्रमा? जो जगतपिता शंकर के माथे पर दिखाया जाता है। क्या? माथे पर ही सवार रहता होगा। नहीं रहता होगा? हाँ, माथे पे सवार रहता है। और उन्होंने उसे, उसको बड़े प्यार से आओ भैया, आओ, तुम हमारे सर माथे पर बैठो, अगले जनम में तो हमारे बच्चा बनने वाले हो 16 कला संपूर्ण कन्हैया लाल की जय। हाँ। तो बस, हाँ, वो दूसरी पीढ़ी हो गई सतयुग में देवताओं की। और तीसरी पीढ़ी कौनसी होगी? हाँ, देवता धरम के बाद कौनसा धरम आता है इस दुनिया में? इस्लाम धर्म। हँ? और इस्लामियों के बाद? बौद्धी धर्म। बौद्धी धर्म भी तो भारत वासियों का है ना। भारत के हैं ना। और इसके बाद जो आखरी मुख्य धर्म है, वो कौनसा? हँ? क्रिश्चियन धर्म। और इन चारों धर्मों के चार सहयोगी धरम भी हैं। उनके भी धरमपिताएं हैं। हैं ना। तो वो तो सहयोगी हैं ना। तो जैसे कि वो ही मुख्य धर्मों में मिक्स होके रहते हैं।

तो बताया कि हर धर्म में ग्रुपबाजी हो जाती है। जैसे-जैसे दुनिया नीचे उतरती जाती है वैसे-वैसे अपने मठ, पंथ, संप्रदाय बनाते ही रहते हैं। तो क्रिश्चियन्स में तो पता चला कौनसे दो मुख्य ग्रुप हो गए? हँ? एक आस्तिक। और एक? नास्तिक। तो बताओ, जो भारतवासी विदेशी धर्मों में कन्वर्ट हुए हैं, हँ, भारतवासी देवताएं ही कन्वर्ट हुए ना। देवात्माएं कन्वर्ट हो गईं। तो क्यों कन्वर्ट हो गईं? क्योंकि जो देवात्माएं होती हैं वो कमजोर होती हैं। हँ? और जो ये जो राक्षसी आत्माएं हैं ना द्वैतवादी द्वापरयुग से इस सृष्टि पर आती हैं द्वापरयुग से। नाम ही है दो पुर। दो धर्म, दो राज्य, दो भाषाएं, दो कुल, दो-दो मतें। दो-दो से चार। चार-चार से आठ। बस बढ़ते ही रहते हैं। तो ये द्वैतवादी दैत्यों की दुनिया में वो देवात्माएं कन्वर्ट हो जाती हैं। अब समझ में आ गया ना भारतवासी ही क्यों कन्वर्ट होते हैं? दूसरे धरम के क्यों नहीं कन्वर्ट होते? हँ? क्योंकि जो दूसरे धरम आते हैं ना इस्लाम धर्म, बौद्धी धर्म, क्रिश्चियन धर्म, ये राक्षसी धर्म हैं। क्या? राक्षस जो होते हैं ना। सुखदायी होते हैं? दुखदायी? हँ? दुनिया में उनके आने से दुख ही बढ़ता है।

Today’s night class is dated 21.9.1967. Daughters do not know. They do not know so many topics because they do not read newspapers. And these children read, hear. They listen to many things about outside because their mind and intellect like soul remains outside to a great extent when compared to the daughters. Outside refers to what? Yes, the outside world excluding the world of knowledge of Baba; that is materialistic, isn’t it? So, the intellect of the children remains there a lot. And these daughters live inside. Where? Hm?
(Someone said something.) Yes. Those who live in the vibrations of knowledge that the Father is going to create through the world of thoughts. So, there is difference in listening to the worldly news, isn’t it?

Now-a-days the Congressmen are there, aren’t they? Hm? What is meant by now-a-days? It is a topic of 1967, isn’t it? Which Congress chief sat on the throne of Prime Minister in India in 67? As is the king, so are the subjects. Hm? Indira Gandhi. So, now-a-days there are Congresswomen (Congresiyaan), aren’t there? They mostly keep on roaming outside. What? Which resiyaan? Congressiyaan, who run the race of crowing. They also keep on roaming for the service of the society. Well, when the intellect keeps on roaming here and there in the world, then they also get invitations from everywhere. They keep on getting. And sometimes the conference of religious minded ones is also organized. Hm? And one conference is vegetarian conference. What? Eat just vegetables. Pure vegetarians. What? Yes. That conference is also organized. I did not read about them. Who said? Brahma Baba said that I. I am also a male, am I not? So, he said – Just as there are children, I am also a male. So, my intellect also roams outside, doesn’t it? All men are Duryodhans and Dushasans. The intellect keeps on wandering in the outside world. So, I did not read about them in the newspaper today. All their entire write-up, the invitation that the organizers of the conferences send that come and attend our conference.

So, these vegetarians, in their conferences; they put some traces (ansh) hurriedly (furr karke) in the ears (kaan me), don’t they? They do insert their own topics. So, these conferences will be said to be definitely for those vegetarians who love the vegetables more, will they not be? For whom will they be said? Hm? Yes. It is good to become vegetarians. What? Vegetable. What? What do they say? What do the vegetarians eat? They must be eating more vegetables, don’t they? So, it is very good to eat vegetables. It is good to cook the same food and to eat the same. They will display all these virtues. In what aspect? Of vegetarians. Will they narrate non-vegetarian topics? So, they will do this. And they will do that. And we keep on receiving their invitations also.

So, the Father had written to this child Ramesh. Hm? Head of which religion? Hm? Yes, all the religions that are spread all over the world; so, this is a tree of religions, isn’t it? This is a Kalpa tree of variety religions. Call it Kalpa vriksha; hm? What has it been named in the Gita? Call it Ashwatth tree. Ashwa; ashwa means horse-like mind. And itthh means ‘should become stable’. So, when the horse-like mind becomes stable, then all the religions in the Ashwatthh tree; there are, aren’t they? And when their horse-like mind becomes stable, then how will the world become? Will it become a world of number one religion or of bogus numbers? Yes, it will become a world of number one religion. Which is the number one religion? Those Islamic people say, don’t they? The Muslims say, don’t they? Allah Avvaldeen. So, Baba has got this picture of the Kalpa tree prepared to explain these topics, hasn’t He? The topics of many religions have been mentioned in it.

So, Baba’s eyes turned towards that religion. There are only four main religions. Hm? Which all? Ancient deity religion. Islam, Buddhism, Christianity. So, which religion commands the maximum respect and position in today’s world? Christians command more. Even among them, the deceitful Christians are very false. What? How? They speak about religion and noble actions. They also show-off topics of religion and noble actions. But the topics of religion which they show off, they show off the Father of that religion and dupe the same Father. Among those deceivers which soul did Baba choose as number one? Arey? Write.
(Someone said something.) Yes, Brother Ramesh of Maya’s city, Bombay city. So, his wife of this birth who revolves in his intellect. Do you know what her name is? Yes. Usha Rani. He is the seed of that religion in this world, isn’t he? What? Should we call him the seed or the root? Call him a root. Yes. He is the base (aadhaar). It is because the founders of religions who come from above, from the Supreme Abode or from Arsh, then the ones in whom those souls of founders of religions enter first of all because when they come from the Soul World, then the Supreme Soul remains sitting in the Soul World; how will all the souls be there? They will be satwapradhaan only, will they not be?

So, those satwapradhan souls come to this world, don’t they? So, can they get birth through the womb? They cannot. So, they have to take support of a base. What kind of a base do they have to adopt? And whose base do they have to adopt? It is not known how the souls of those founders of religions get to know or their part is fixed in the drama in such a way that the souls belonging to the ancient deity religion who were deities in the heaven, in the Golden Age and the Silver Age, in the world of Ram and Krishna, they are considered to be the high deities, aren’t they? So, from among those souls only, the souls which, while descending from the Golden Age to the Silver Age, from the Silver Age; they are perfect in 16 celestial degrees in the Golden Age, perfect in 14 celestial degrees in the Silver Age, 8 celestial degrees in the Copper Age and 4 celestial degrees in the beginning of the Iron Age and there are zero celestial degrees in today’s time in the end.

So, that child Ramesh came to the mind of the Father, Baba. That child Ramesh, the seed of Christian religion is most powerful. How is he powerful? Today there are two groups among the Christians. One is those theists. They believe a little in the founder of the religion, their religious scripture and the Churches of their religion. And the other group is such; how? They do not believe in anyone, in anyone. Neither do they believe in the soul, nor the Supreme Soul, nor the founder of their religion. Neither do they believe in their religious scripture. Do they believe in the Bible? No. Not at all. They do not have faith at all. So, how are they powerful? Hm? What is the reason? Hm? It is because the same soul of Ramesh becomes such deceitful Christian in the last birth; Did you understand what kind of deceiver? In this birth in order to inculcate the inculcation of his religion he duped the chief of his religion, call him his Father, he made Brahma Baba [as his Father] didn’t he? So, he deceived him only. Do you know how he deceived him? Yes. He took the entire Prajapita Brahmakumari Ishwariya Vishwa Vidyalaya in his grips. By doing what? Hm? By getting registered the institution named World Renewal Trust with a registered government, with an unrighteous government and he took the vidharmi souls in his favour, be it those from Islam, be it those from Christianity and those who become followers of those religions, he took them in his own favour and took the entire institution in his control. So, he exploded such bomb; Did you understand which bomb did he have in his hands? Hm? Which bomb? Such a bomb exploded in Brahma Baba’s intellect; does any topic remain hidden? Someone or the other informs, isn’t it? So, when Baba came to know that child Ramesh in connivance with Kumarika Dadi, the Kumarika Dadi whom Baba used to give a lot of position and respect, hm, and Kumarika Dadi joined hands with other sisters, mothers and formed this gathering and affixed her signature on it and exploded that bomb in Baba’s intellect. That is it; Baba; what happened to Brahma Baba? He suffered a heart failure.

So, the Christians are like this. Those base-like souls, who study knowledge from Brahma and become Brahmins; do you know they are Brahmins of which category? Arey, there will be deities in the Golden Age also; so, they will have decreasing celestial degrees generation by generation, will they not? Hm? And only those who become Brahma’s children first become Brahmins. So, the children of Brahma who become Brahmins, they too are Brahmins of nine categories. So, those who belong to the number one category, the children of the Sun of Knowledge are the Suryavanshis. Hm? The soul of Ram is praised. And his children, hm, tell, which is that constellation (nakshatra) in a high stage, which gives more light to the residents of the Earth after the Sun? Yes. The Moon. So, those who are the Chandravanshis (descendents of the Moon), yes, the same Moon; which Moon? The one who is shown on the forehead of Shankar. What? He must be riding on the forehead only. Doesn’t he? Yes, he remains seated on the forehead. And he said to him very lovingly, come brother, come, you come and sit on my head, forehead; you are going to become my child in the next birth, perfect in 16 celestial degrees; victory to Kanhaiyyalal. Yes. So, that is it; yes, that is the second generation of deities in the Golden Age. And which will be the third generation? Yes, which religion comes after the deity religion in this world? Islam religion. Hm? And after Islamic people? Buddhism. Buddhism also belongs to the residents of India, doesn’t it? They belong to India, don’t they? And after this, the last main religion; which one is that? Hm? Christianity. And there are four helper religions of these four religions as well. There are founders of those religions also. There are, aren’t they? So, they are helpers, aren’t they? So, it is as if they remain mixed in the same main religions.

So, it was told that there is groupism in every religion. As the world goes on declining, they keep on establishing their own sects, sub-sects and communities. So, did you know which the two main groups among the Christians are? Hm? One is theists. And one? Atheists. So, tell, the residents of India who converted to the foreign religions; it is the residents of India, the deities only who converted, didn’t they? The deity souls converted. So, why did they convert? It is because the deity souls are weak. Hm? And the demoniac souls, who come to this world from the dualist Copper Age, from the Copper Age (Dwaparyug); the name itself is 'do pur' (two abodes). Two religions, two kingdoms, two languages, two clans, two opinions. Two give rise to four. Four give rise to eight. That is it; they keep on increasing. So, in this world of dualist demons, those deity souls convert. Did you now understand as to why the residents of India alone convert? Why do people of other religions don’t convert? Hm? It is because the other religions which arrive, Islam, Buddhism, Christianity, these are demoniac religions. What? There are demons, aren’t there? Are they givers of happiness? Givers of sorrows? Hm? When they arrive in the world, the sorrows only increase.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 03 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2712, दिनांक 26.11.2018
VCD 2712, Dated 26.11.2018
रात्रि क्लास 21.9.1967
Night Class dated 21.9.1967
VCD-2712-extracts-Bilingual

समय- 00.01-21.05
Time- 00.01-21.05


रात्रि क्लास चल रहा था - 21.9.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – वैष्णवपंथियों की। कहते हैं हम विष्णुवंशी हैं। वैष्णव हैं माना विष्णु की संतान हैं। परन्तु विष्णुवंशी कहा किसे जाता है? हँ? विष्णुवंशी तो उन्हें कहा जाता है कि जो लक्ष्मी-नारायण कम्बाइन्ड बनते हैं, स्वभाव-संस्कार से एक बन जाते हैं, हँ, उनकी वंशावली में जो पैदा होते हैं लक्ष्मी और नारायण से उन्हें कहा जाता है विष्णुवंशी। ये विष्णुवंशी अपने को कैसे कहते हैं? मूत पलीती होते रहते हैं। क्या वेजिटेरियन होने से विष्णुवंशी हो जाते हैं? हँ? वेजिटेबल खाने से थोड़ेही विष्णुवंशी बन जाएंगे? बताया – विष्णु किसको कहा जाता है वो उनको समझाना पड़ेगा। समझा? ये नहीं कहा उनको। ये कहा इनको समझाना पड़ेगा। उनको तो बाद में समझाएंगे। इनको समझाना। इनको माने? बाबा का इनको कहने का मतलब क्या है? उन वैष्णववंशियों को नहीं। (किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा को समझाना पड़े? वाह भैया! पहले ब्रह्मा बाबा समझेंगे? अरे! जो विष्णुवंशी बने ही नहीं हैं साकार शरीर से वो विष्णुवंशी बनेंगे? हँ? उनसे माथा खपाते रहो बच्चाबुद्धि, वो तो बच्चा ही बुद्धि रहेंगे देवताएं। हँ? कौनसे लक्ष्मी-नारायण? वो तो ढ़ेर हैं। एक लक्ष्मी-नारायण? उनमें से पता नहीं कौनसा एक पकड़ लो? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? पहला लक्ष्मी-नारायण? कहाँ? सतयुग में? अरे, लिखो सत्य लक्ष्मी-नारायण। सत्य लक्ष्मी नहीं। सत्य नारायण।

सत्यनारायण जब डबल बनते हैं, बनते हैं ना। तो दोनों मिलकरके जब एक होते हैं, फिर उनसे जो पैदा होते हैं, ऐसे नहीं रुद्रमाला हैं ठन-ठन गोपाल। अम्मा कोई है ही नहीं। शरीर धारण करने वाली। है? हँ? अम्मा कहीं काशी अम्मा है ना। वो काशी अम्मा है कि बीज है? पापी है? पुरुष है? आत्मिक दृष्टि से देखेंगे तो रुद्रमाला का मणका है ना। जन्म-जन्मान्तर का कौनसा संस्कार है? पुरुष संस्कार है ना। तो पुरुष-पुरुष थोड़ेही नई सृष्टि पैदा करेंगे? हँ? तो जो रुद्र माला के मणके जो समझे बैठे हैं कि हम हैं वैष्णववंशी। तो हैं? नहीं। अरे, विष्णुवंशी तो तब बनेंगे जब लक्ष्मी और नारायण दोनों; क्या होगा? हँ? स्वभाव-संस्कार से एक हो जाएंगे।

तो ये बात उनको समझानी पड़े; इनको समझानी पड़े कि ये जो विष्णुपुरी है, उनमें ये जो विष्णुवंशी हैं, हँ, लक्ष्मी और नारायण; और उनकी संतान; उनसे पैदा हों। उनके द्वारा संसार में प्रत्यक्षता रूपी जन्म हो। तो, तो कहेंगे देवी-देवता पक्के वैष्णव। क्या? नंबरवार वैष्णव नहीं। पक्के वैष्णव। और दूसरा कोई हो ही नहीं सकता। दूसरे से मतलब क्या है? हँ? दूसरे से मतलब क्या? हँ? दूसरा माने जो भी सतयुग में और लक्ष्मी-नारायण बनते हैं सेकण्ड, थर्ड, फोर्थ, एट्थ; उनको क्या नहीं कहेंगे? उनको वो पक्का वैष्णव नहीं कहेंगे। क्यों? वो कोई विष्णु की संतान थोड़ेही हैं। जैसे आज के ब्राह्मण हैं। कहते हैं हम ब्राह्मण हैं। अरे, ब्राह्मण का अर्थ तो समझो। किसकी औलाद होते हैं ब्राह्मण? ब्राह्मण। किसकी औलाद हुए? हँ? अरे, ब्रह्मा की औलाद हुए ना। तो ब्रह्मा की जब औलाद हुए तो फिर तुम ब्रह्मा की औलाद हो? हँ? उन ब्राह्मणों से पूछो जो कहते हैं अपने को हम ब्राह्मण हैं। या उन ब्राह्मणों से पूछो जो टेम्पररी ब्रह्मा की औलाद बने। तो क्या तुम पक्के ब्राह्मण हो? हँ? कि पक्के ब्रह्मा से पैदा होंगे तब पक्के ब्राह्मण बनेंगे? हँ? पक्का ब्रह्मा कौन? पक्का ब्रह्मा कौन? हँ? पक्का ब्राह्मण; पक्का ब्रह्मा। पक्का ब्रह्मा परमब्रह्म। हँ? परम माने बड़े ते बड़ा। ऊँचे ते ऊँचा। महान ते महान। उससे महान कोई अम्मा होती ही नहीं। कोई हो नहीं सकती दूसरी। सिवाय देवी और देवताओं के; क्या? देवी। देवी नाम क्यों धरा? हँ? देवी और देव। ये नाम क्यों धरा? कल बताया ना – क्या काम किया जो देवी और देव? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, दे दिया।

तो किसने सब कुछ दे दिया? हँ? दे किसने दिया? सब कुछ दे दिया।
(किसी ने कुछ कहा।) फिर वो ही लक्ष्मी-नारायण। ढ़ेर सारे लक्ष्मी-नारायण। हँ? हाँ, सत्य नारायण ने दे दिया। क्या दे दिया? और किसको दे दिया सत्यनारायण ने? सत्य नारायण ने किसको दे दिया? और क्या दे दिया? क्या है उनके पास जो उन्होंने दिया? अरे, बताओ ना। (किसी ने कुछ कहा।) तन दे दिया? किसको? ऊपर वाले को दे दिया? तो ऊपरवाले के साथ विष्णु बन जाए। अरे! ऊपरवाले के साथ विष्णु बन जाएंगे? (किसी ने कुछ कहा।) ऊपरवाले को ज्ञान दे दिया? हाँ। क्या दे दिया? हँ? ऊपरवाले को तन दे दिया? धन नहीं दिया? हँ? धन मकान तो नहीं दिया? हँ? धन मकान दे दिया? अच्छा? (किसी ने कुछ कहा।) जब कुछ भी नहीं, जो कुछ भी नहीं था सब दे दिया? जब था ही नहीं तो दे क्या दिया? हँ? जो कुछ भी था वो सब दे दिया। किसको दे दिया? तो ऊपरवाले, ऊपरवाले के साथ क्या फिर परिवार बनेगा? हँ? नई दुनिया बनेगी? फिर? विष्णु कब कहा जाएगा? वैष्णव वंशी? वैष्णववंशी परिवार कब पैदा होगा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) लक्ष्मी-नारायण दोनों? तो कैसे होंगे लक्ष्मी-नारायण दोनों? (किसी ने कुछ कहा।) जब लक्ष्मी-नारायण मिलके चलें। मिलके कैसे चलें? हं? लक्ष्मी को मोह होता है। लक्ष्मी क्यों, जो भी कन्याएं-माताएं होती हैं, जिसके साथ जिंदगी बिताती हैं उनके साथ मोह होता है कि नहीं? नहीं होता है? मोह होता है। तो वो मोह तो फिर उनका टूटा नहीं। मोह सकल व्याधिन कर मूला। जितने भी दुख-दर्द हैं उन सबका मूल है। क्या? मोह।

तो वो देव कैसे बने? क्या दे दिया? और किसको दे दिया? देव के लिए तो कहेंगे उन्होंने तो पहले ही शिव को दिया सब कुछ। उनके पास तो कुछ देने को रहा ही नहीं। क्या रहा? जब दे दिया; पूरा तन दे दिया, माने तन की याद ही नहीं रखी। दे दिया तो याद क्यों आएगी? चालाकी करना है वापस दे दो थोड़ा? हँ? अरे, कम से कम थोड़ा तो दे दो काम लायक। हँ? ये अंग दे दो, वो अंग दे दो। कुछ काम आएगा। दे दो ना। नहीं? अच्छा? तो नई सृष्टि कैसे बनेगी? हँ? बुद्धि से बनेगी? कैसे बनेगी? माने नारायण ने कुछ नहीं दे दिया किसी को जो नई सृष्टि बने। क्या? जो धरणी है ना माता, वो धरणी देहभान नहीं छोड़ पाती है। क्या? धरणी। धरणी माने माता। तो क्या राधा वाली आत्मा माता नहीं बनती है? हँ? बनती है या नहीं बनती है? बनती है। तो फिर देहभान छोड़ती है तभी बनती है कि पहले ही बन जाती है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) छोड़ती है। कैसे छोड़ती है? छोड़ती? कैसे छोड़े देह अभिमान? हँ? देह अभिमान छोड़ने का क्या तरीका? (किसी ने कुछ कहा।) जब योगिनी माँ से मिलेंगे। गुरुजी पहले खुद तो देहभान छोड़ दें। रुद्रमाला के मणकों का देह भान छोड़ेगा, छूटेगा? जन्म-जन्मान्तर का पुरुष का संस्कार है। हँ?

अरे! जवाब नहीं दिया?
(किसी ने कुछ कहा।) एक अम्मा को छोड़के दूसरी अम्मा पे कूद पड़ा। हँ? योगिनी माता समझाएगी? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ। मन-बुद्धि दे दिया? अरे, मन दे दिया तो फिर तो कुछ रहता ही नहीं है। जहाँ हमारा मन होगा, वहाँ तो सब कुछ चला जाएगा। (किसी ने कुछ कहा।) नारायण से मिलेंगे। कैसे मिलेंगे? लगाव तो लगा हुआ है जिन देहधारी संबंधों में। प्रैक्टिकल जीवन में जिनके साथ रहते हैं; क्या? उनको तो छोड़ नहीं पाते। हँ? सबसे ज्यादा सामाजिक, समाज को पकड़ के रखने वाले पुरुष होते हैं या माताएं होती हैं? हाँ, माताएं होती हैं। माताएं जो हैं वो नहीं छोड़तीं। इसीलिए दुनिया में देखा जाता है सन्यासी पुरुष तो बन जाते हैं लेकिन माताएं तो सन्यासी बनती हैं? नहीं बनती हैं। तो इसका मतलब जो है कि कन्याएं और माताएं वो देह का संबंध छोड़ नहीं पातीं। पुरुष तो छोड़ के चले जाते हैं। भले मन से तो याद करते रहते हैं। मन से नहीं छूटता। लेकिन देह से तो खींच-खांच के छुटकारा कर लेते हैं हठपूर्वक।

तो जो उनका, काशी मां का नाम बताया। काशी मां क्या जिस समाज में रहती है; काशीनाथ तो चले गए, मन-बुद्धि से भी ऊपर जाएंगे। हँ? कि सन्यास होने के बाद फिर लौट के आ जाते हैं? हँ? फिर तो जब दूसरी शूटिंग होगी तब देखा जाएगा। अभी ये शूटिंग तो पूरी करो। हाँ। तो देखेंगे, कि ऊपर से, ऊपरवाला देखेगा कुछ कमी रह गई है तो फिर दुबारा शूटिंग करना शुरू कर देगा। तो काशी मां की जो बात बताई तो वो जिस, जहाँ रह रहे हैं, जिस समाज में उसको छोड़ेंगे? हँ? उनको जिम्मेवारी नहीं मिली हुई है? क्या? अरे? जैसे ओम राधे को जिम्मेवारी मिली थी ना। क्या? जिम्मेदारी है पालना की। कन्याओं-माताओं को पालने की जिम्मेवारी है कि नहीं? तो पुरुष तो अपने भाग जाते हैं। हाँ।
(किसी ने कुछ कहा।) बाबा कहेंगे तो छोड़ेंगे। चलो, ये तो बच्चा है, छोड़ेगा। हँ। हाँ। तो बाबा भई क्यों कहेंगे? बाबा किसलिए आये हैं? बाबा देह और देह के संबंधियों से बुद्धियोग तुड़वाने आये हैं या बाबा कहें कि छोड़ के चले आओ? हँ? तुड़वाने आए हैं। जो तुड़वाने आया है वो पहले खुद तोड़ेगा तब दूसरों से कहेगा तो ठीक है या आप गुरुजी बैंगन खाएं दूसरे को तरकीब सिखाएं कि भई बैंगन नहीं खाना चाहिए, बादी होता है। दर्द करेगा शरीर में। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हँ? हाँ, पहले अपने ऊपर पक्का करना चाहिए, तब दूसरों को गुरु बनके बैठना चाहिए। है ना।

तो चलो काशी मां का इतना तो है कि भई कि जिसको, जो जीवन में साथ निभाने वाली बात है शरीर से, हँ, पवित्रतापूर्वक वो तो साथ निभाने में कुछ कमी रह गई क्या? नहीं कमी रह गई। तो साथ निभाने में कमी नहीं रह गई देह के आधार पे। और मनसा में? हँ? मनसा में कमी रहती है? सही?
(किसी ने कुछ कहा।) मनसा में कोई कमी नहीं? अच्छा? मन-बुद्धि में कोई कमी नहीं रहती? परिवार की जब पालना करनी है और दुनियाभर की समस्याएं आती हैं बाल-बच्चों की ओर से तो समस्याओं को समाधान करने के लिए किसी का सहारा नहीं लेना पड़ता है? निराधार हैं? नहीं। निराधार वो भी नहीं। और निराधार, जो कहते हैं निराधार तो हमारी अम्मा बनेगी। तो वो भी निराधार होती है क्या? वो तो और ही ज्यादा। हँ? हाँ। कम से कम काशी माँ ने इतना तो प्रूफ दिया ही कि भई अम्मा मर गई, एडवांस में आई, तो अम्मा आई और सामने ही मर गई कि हाँ भई, अब तो गई। हँ? मर गई। अरे, वापस आने वाली है? ये समझ में आ गया वापस आएगी? हँ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) ब्रह्मा बाबा? ब्रह्मा बाबा क्या? अरे, माँ थी ना एडवांस पार्टी में। तो बाबा के पास से गई ना। बाप के पास गई जो पालना करने वाला था परिवार में। वहाँ से गई और ये भी पता चल गया कि हाँ, शादी भी कर ली। हाँ, पता चल जाता है ना। वो त्यागपत्र आया ना। तो पता चल गया ना। तो जब पता चल गया तो भी काशी माँ ने क्या मोह माँ का छोड़ दिया कि नहीं छोड़ा? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) थोड़ा-थोड़ा रह गया? हँ, तुम्हारा भला हो। अरे, छोड़ दिया तभी तो रहेगी। हँ? छोड़ दिया ना मोह। मोह छोड़ दिया। और वो? जिनकी स्पेशल अम्मा है, वो देहधारियों का मोह छोड़ पाते हैं? हँ? नहीं छोड़ पाते। नहीं छोड़ पाते तो काशी माँ को समझाना पड़ता है। क्या? जिस बात में एक्सपर्ट हैं वो बात समझाएंगी ना। हाँ, अम्मा मरे तो हलुआ खाओ। वो तो काशी माँ के ऊपर लागू हो गया। हाँ।

A night class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was about the Vaishnavpanthis (followers of Vaishnavite sect). They say that we are descendents of Vishnu (Vishnuvanshi). We are Vaishnav means that we are children of Vishnu. But who are called Vishnuvanshi? Hm? Those who become Lakshmi-Narayan combined, become one by nature and sanskars, those who are born through Lakshmi and Narayan in their genealogy are called Vishnuvanshi. How do these people call themselves Vishnuvanshi? They keep on becoming moot-paleeti (those who indulge in lust). Does one become Vishnuvanshi by becoming vegetarian? Hm? Will one become Vishnuvanshi by eating vegetables? It was told – They will have to be explained as to who is called Vishnu. Did you understand? It was not said ‘unko’ (them). It was said – These (inko) will have to be explained. They will be explained later on. Explain to these. What is meant by ‘these’ (inko)? What does Baba mean to say when He utters ‘inko’? Not those Vaishnavvanshis.
(Someone said something.) Will Brahma Baba have to be explained? Wow brother! Will Brahma Baba understand first? Arey! Will those who haven’t become Vishnuvanshis through their physical body become Vishnuvanshi? Hm? Keep on spoiling your head with those having a child-like intellect (bachchabuddhi); those deities will remain bachchabuddhi only. Hm? Which Lakshmi-Narayan? They are numerous. One Lakshmi-Narayan? Who knows which one you will grasp? (Someone said something.) Hm? The first Lakshmi-Narayan? Where? In the Golden Age? Arey, write true Lakshmi-Narayan. Not true Lakshmi. True Narayan.

When Satyanarayan becomes double; he becomes, doesn’t he? So, when both of them become one; then those who are born from them, it is not like the Rudramala which is penniless (than-than-gopal). They don’t have any mother who assumes a body. Do they have? Hm? Is mother Kashi the mother? Is that Kashi mother or seed? Is she sinful? Is she male? If you observe from a spiritual point of view, she is a bead of the Rudramala, isn’t she? Which resolve (sanskar) does she have since many births? She has male sanskars, doesn’t she? So, will two men give birth to the new world? Hm? So, the beads of the Rudramala, who think themselves to be Vaishnavvanshi; so, are they? No. Arey, they will become Vishnuvanshi when Lakshmi and Narayan, both; what will happen? Hm? When they become one through nature and sanskars.

So, they will have to be explained this topic; they will have to be explained that the Vishnuvanshis in this abode of Vishnu, hm, Lakshmi and Narayan; and their children; they should be born from them. They should get revelation like birth in the world. So, so, it will be said that they are firm Vaishnav deities. What? Not numberwise Vaishnavs. Firm Vaishnavs. There cannot be anyone else at all. What is meant by anyone else? Hm? What is meant by anyone else? Hm? Anyone else means all those who become other Lakshmi-Narayans in the Golden Age, the second, third, fourth, eighth; what will they not be called? They will not be called firm Vaishnavs. Why? They are not Vishnu’s children. For example, today’s Brahmins. They say that we are Brahmins. Arey, understand the meaning of Brahmin. Whose children are the Brahmins? Brahmins. Whose children are they? Hm? Arey, they are Brahma’s children, aren’t they? So, when they are Brahma’s children, then are you Brahma’s children? Hm? Ask those Brahmins who call themselves Brahmins. Or ask those Brahmins who became the children of temporary Brahma. So, are you firm Brahmins? Hm? Or will they become firm Brahmins when they are born from the firm Brahma? Hm? Who is the firm Brahma? Who is the firm Brahma? Hm? Firm Brahmin; firm Brahma. Firm Brahma Parambrahm. Hm? Param means the biggest one. The highest on high. Greatest of all. There is no mother greater than her. There cannot be anyone else at all. Except for Devis (female deities) and Devatas (male deities); what? Devi. Why was the name Devi coined? Hm? Devi and Dev. Why was this name coined? It was told yesterday, wasn’t it? What was the task they performed that they got the name Devi and Dev?
(Someone said something.) Yes, they gave (de diya).

So, who gave everything? Hm? Who gave? He gave everything.
(Someone said something.) Again the same Lakshmi-Narayan. [There are] numerous Lakshmi-Narayans. Hm? Yes, Satya (true) Narayana gave. What did he give? And to whom did Satya Narayana gave? To whom did Satya Narayana give? And what did he give? What does he possess that he gave? Arey, speak up, will you not? (Someone said something.) Did he give the body? To whom? Did he give to the above one? So, he became Vishnu along with the above one. Arey! Will he become Vishnu along with the above one? (Someone said something.) Did he give knowledge to the above one? Yes. What did he give? Hm? Did he give body to the above one? Did he not give wealth? Hm? Did he give wealth, house? Hm? Did he give wealth, house? Achcha? (Someone said something.) When he does not have anything, when did he did not have anything, then did he give everything? What did he give when he did not have anything at all? Hm? He gave all that he had. To whom did he give? So, will he establish a family with the above one? Hm? Will the new world be established? Then? When will he be called Vishnu? Vaishnav Vanshi? When will the Vaishnavvanshi family be born? Hm? (Someone said something.) Both Lakshmi and Narayan? So, how will both Lakshmi and Narayan be? (Someone said something.) When Lakshmi and Narayan tread together. How can they tread together? Hm? Lakshmi has attachment. Why Lakshmi, all the virgins and mothers, with whomsoever they spend their life, do they have attachment for them or not? Don’t they have? They have attachment. So, then their attachment did not break. Moh sakal vyaadhin kar moola (Attachment is the root cause for all the diseases.) It is the root cause of all the sorrows and pains. What? Attachment.

So, how did he become Dev? And whom did he give? For the ‘Dev’ it will be said that he already gave everything to Shiv. He does not have anything else to give at all. What remained? When he already gave; when he gave the entire body, i.e. he did not keep the awareness of the body at all. When he gave, then why will he get its thoughts? Should he show cleverness that give me back a little? Hm? Arey, at least give something to manage my task. Hm? Give this organ, give that organ. It will prove a little useful. Give me, will you not? No? Achcha? So, how will the new world be established? Hm? Will it be established through the intellect? How will it be established? It means that Narayan did not give anything to anyone to establish the new world. What? The mother Earth, that Earth is unable to leave the body consciousness. What? The Earth. Earth means mother. So, doesn’t the soul of Radha become a mother? Hm? Does it become or doesn’t it become? It becomes. So, then does it become only when it leaves the body consciousness or does it become beforehand? Hm?
(Someone said something.) It leaves. How does it leave? Does it leave? How should it leave body consciousness? Hm? What is the method of leaving body consciousness? (Someone said something.) When she meets Mother Yogini. Guruji should first leave the body consciousness. Will the beads of the Rudramala leave the body consciousness? They have male sanskars since many births. Hm?

Arey! You haven’t given a reply?
(Someone said something.) He left one mother and jumped to another mother. Hm? Will the Mother Yogini explain? (Someone said something.) Yes. Did she give the mind and intellect? Arey, when he gave the mind, then nothing else remains at all. Wherever your mind is, everything will go there. (Someone said something.) You will meet Narayan. How will you meet? There is attachment in the bodily relationships. The ones with whom he lives in his practical life; what? He is unable to leave them. Hm? Is it the men or the mothers who hold on to the society the most? Yes, it is the mothers. Mothers are unable to leave. This is why it is seen in the world that the men become sanyasis (renunciates) but do the mothers become sanyasis? They do not become. So, it means that the virgins and mothers are unable to leave the relationship of the body. Men leave and go away. Although they keep on remembering through the mind. They are unable to leave through the mind. But they are able to free themselves physically obstinately.

So, her name, Mother Kashi’s name was uttered. The society in which Mother Kashi lives; Kashinath (Lord of Kashi) went away; he will go up through his mind and intellect also. Hm? Or does he return after renunciation (sanyas)? Hm? Then, when another shooting takes place, then it will be seen. Now complete this shooting. Yes. So, it will be seen that from above, the above one will see if there is any shortcoming, then He will start the shooting once again. So, the topic of Mother Kashi that was mentioned, the place, the society where she is living, will she leave it? Hm? Does she not hold any responsibility? What? Arey? Just as Om Radhey had a responsibility, didn’t she? What? The responsibility is of sustenance. Does she have the responsibility of sustaining the virgins and mothers or not? So, men run away. Yes.
(Someone said something.) They will leave if Baba asks them to. Okay, this one is a child, he will leave. Hm. Yes. So, brother, why will Baba say? Why has Baba come? Has Baba come to break the connection of your intellect with the body and body’s relatives or will Baba ask you to leave and come? Hm? He has come to break. The one who has come to break, will it be correct if he tells others after he has broken himself or is it correct if the Guruji eats brinjal himself and teaches others that brother, you should not eat brinjal; it causes flatulence (baadi). It will cause pain in the body. Hm? (Someone said something.) Hm? Yes, first he should apply it firmly to himself; then he should sit as others’ guru. Is it not?

So, okay, as regards Mother Kashi, it is correct that brother, as regards the topic of maintaining relationship with someone in life physically, with purity, was there any shortcoming in maintaining that relationship? There was no shortcoming. So, there was no shortcoming on the basis of the body. And in the mind? Hm? Is there any shortcoming in the mind? Correct?
(Someone said something.) Is there no shortcoming in the mind? Achcha? Is there no shortcoming in the mind and intellect? When she has to sustain the family and when she faces a plethora of problems on account of the children, then doesn’t she have to take anyone’s support to solve the problems? Is she without any support (niraadhaar)? No. She too isn’t without any support. And as regards being without support, those who say that our mother will become niraadhaar, so, is she also niraadhaar? And she is even more. Hm? Yes. At least Mother Kashi gave a proof that brother when the mother died, when she entered the path of advance [knowledge], so, the mother came and she died in front of her that yes brother, she has departed now. Hm? She died. Arey, is she going to return? Did she understand that she is going to return? Hm? Hm? (Someone said something.) Brahma Baba? What Brahma Baba? Arey, there was a mother in Advance Party, was she not there? So, she went away from Baba, didn’t she? So, she went away from the Father who was sustaining the family. She went from there and it also came to be known that yes, she has got married as well. Yes, one comes to know, doesn’t one? Her resignation letter arrived, didn’t it? So, you came to know, didn’t you? So, when you came to know then did Mother Kashi also leave the attachment of the Mother or not? Hm? (Someone said something.) Did she have some attachment? Hm, God bless you. Arey, she can survive only when she left [attachment]. Hm? She left the attachment, didn’t she? She left the attachment. And she? The ones, whose special mother she is, are they able to leave the attachment of those bodily beings? Hm? They are unable to leave. They are unable to leave. So, Mother Kashi has to explain. What? She will explain the topic she is expert in, will she not? Yes, eat Halua (a sweet) even when the mother dies. That applied to Mother Kashi. Yes.
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 05 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2713, दिनांक 27.11.2018
VCD 2713, Dated 27.11.2018
रात्रि क्लास 21.9.1967
Night Class dated 21.9.1967
VCD-2713-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.45
Time- 00.01-16.45


रात्रि क्लास चल रहा था - 21.9.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी। किसकी बात चल रही थी? वैष्णवपंथियों की बात चल रही थी। वो अपन को कहते हैं हम वैष्णव हैं। अरे, पक्के वैष्णव तो देवी-देवताएं थे सतयुग में जिसे स्वर्ग कहा जाता है। त्रेता में भी सेमी देवताएं थे। वो भी वैष्णव थे। क्यों? क्या बताया? शास्त्रों में जो नाम हैं ना देवी-देवता। अर्थ है ना। देवी माने? देने वाली। लेने वाली नहीं। हाँ। क्या? दुनिया के मजे लेने वाली तो फिर क्या हुई? हँ? चलो। छोड़ दो। (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, देना बैंक है। वो तो नाम की देना बैंक है। असली बैंक तो ब्राह्मणों की दुनिया में बनेगी। हँ? ये तो भ्रष्टाचारी गोर्मेन्ट। उनकी बैंक कैसी होगी उनके अंडर में चलने वाली? वो बैंकें भी तो भ्रष्टाचारी ही होंगी ना। ये नाम दे दिया है। ऐसे जैसे इन वेजिटेरियन्स ने नाम दे दिया है पक्के वैष्णव हम हैं। लट्टू। वैष्णव किसे कहा जाता है? विष्णु की संतान। क्या? ब्राह्मण किसे कहा जाता है? ब्रह्मा की संतान। एक मात्र बढ़ती है ना फालोअर में। बच्चे के अर्थ में। तो देखो, अभी इस दुनिया में कहेंगे वैष्णव तो कोई भी नहीं है। हैं? नहीं। हाँ। क्योंकि वो तो वेजिटेरियन की बात इसमें नहीं है। किसमें? देवी-देवता सनातन धरम में। जो भगवान ने आकरके देवी-देवताएं बनाए थे। क्या बनाए थे? नर अर्जुन को नारायण जैसा बनाया था ना। नारी लक्ष्मी को, वो नारी द्रौपदी को क्या बनाया था? हँ? लक्ष्मी जैसा, नारायणी जैसा बनाया था ना।

तो इन देवताओं में, जो पक्के वैष्णव थे जिन्हें भगवान ने बनाया था, उनमें ये वेजिटेरियन की बात इसमें नहीं है। क्या? क्यों? क्योंकि वेजिटेरियन में तो वो प्याज वगैरा भी खा जाते हैं। खा जाते हैं। नाम क्या रखा? पी आज। अरे, आज पी लो। फिर जब आएगा तब देखा जाएगा। क्या कहा? होता है कि नहीं? हाँ। तो वेजिटेरियन में प्याज वगैरा खा जाते हैं। एक हद के वेजिटेरियन और एक बेहद के वेजिटेरियन। हाँ, सिर्फ मांस-मदिरा, शायद थोड़ी बहुत मांस-मदिरा भी होगी। अरे, हद के वैष्णवों में कहते हैं वैष्णव। कभी-कभी, जैसे ब्राह्मण होते हैं ना आज की दुनिया में, तो मांस-मदिरा खा जाते हैं कि नहीं? हाँ। तो वैसे ही वो मांस-मदिरा भी होगी शायद। पता नहीं बाबा ने देखी नहीं है। अनुमान लगाय दिया कि मांस भी खाते होंगे। क्या? मांस जानते हैं किसे कहते हैं? बेहद में मांस क्या होता है? बेहद में मांस होता है देह अभिमान को सुख लेना, देह का, इन्द्रियों का सुख लेना, उसको क्या कहेंगे? मांस। तो मांस-मदिरा भी होगी। हाँ। ये मच्छी वगैरा, ये सभी नहीं खाते होंगे। क्या? हँ? मच्छी वगैरा खाते होंगे? नहीं खाते होंगे। बाबा ने अनुमान लगाया कि मच्छी वगैरा नहीं खाते होंगे। क्यों? मच्छी में क्या खास बात होती है? हं? अरे, बदबू आती है ना। नहीं आती? हाँ, बदबू आती है व्यभिचार की। वो बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। छोटी मछली बड़ी मछली को खा जाती है। खा जाती है कि नहीं? हाँ। तो बस। शायद वो वैष्णव लोग वो हद की मछलियां नहीं खाते। हाँ, बेहद के तो, बेहद के खाते होंगे कि नहीं? हाँ, जरूर खाते होंगे। कोई फर्स्टक्लास होंगे तो नहीं खाते होंगे। हाँ।

तो जो प्याज खा जाते हैं, मांस-मदिरा भी होगी शायद। मच्छी नहीं खाते होंगे। उनको वेजिटेरियन कहा जाता है। या वैष्णव कहा जाता है। कहा जाना बात अलग और प्रैक्टिकल में होना बात अलग। तो उन वेजिटेरियन्स की कान्फुर्रेन्स होती है। क्या? क्या करते हैं वो? कान में फुर्र करके बात डालते हैं। कोई दूसरा ना सुन ले। जैसे गुरुजी महाराज होते हैं ना। हाँ, हद के गुरु भी होते हैं और बेहद के गुरु भी होते हैं। होते हैं कि नहीं? हाँ, होते हैं। माताजी को पता है। हाँ, वो जो बेहद के गुरु होते हैं वो ‘किसी को बताना नहीं’। क्या? कान में मंत्र फूंक देते हैं। उसको कहते हैं कानफुर्रेन्स। क्योंकि वो लोग जानेंगे जो वैष्णव नहीं हैं। हँ? जो वैष्णव नहीं हैं और वो तो खूब मांस-मदिरा-मच्छी खाते हैं, भारत में ही हैं ना। हाँ। तो वो सुनेंगे तो वो तो नाराज़ हो जाएंगे। हाँ। तो इसलिए कान में फुर्रेन्स कर देते हैं।

कान्फ्रेन्स होती है तो उनको ये समझाना है जाकरके कि वैष्णव हैं, वो जो पैराडाइज़ में रहते हैं। क्या? पैराडाइज़ तो जानते हो ना। तुम तो अंग्रेज आदमी हो। हँ? तुम्हारा ही अक्षर, शब्द है पैराडाइज़। नहीं तो मुसलमानों को समझाना हो तो उनका शब्द क्या है? जन्नत। हाँ। तो वेजिटेरियन को, उनको कहा जाता है; किनको? जो, हँ, किनको? अभी बताया ना। जो सतयुग में, त्रेता में दुनिया की, आधी दुनिया स्वर्ग होती है और आधी दुनिया नरक, राक्षसों की होती है। देवताएं हैं अद्वैतवादी। माने एक को मानने वाले। अ माने नहीं। द्वैत माने दूसरे को नहीं मानते। और जो राक्षसी दुनिया में, नरक की दुनिया में, हँ, आज से ढ़ाई हज़ार वर्ष पहले से इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट आए, इन्होंने ये जो नरक की दुनिया बनाई, क्योंकि नर हैं ना, मनुष्य हैं ना। तो उस दुनिया में ये जो वैष्णव होते हैं वो अपन को वैष्णव कहते हैं। वास्तव में होते नहीं हैं। क्यों? कारण बताया? क्यों नहीं होते हैं? क्योंकि वो देवी-देवताओं जैसे तो होते ही नहीं। देवी-देवताएं कोई मांस-मदिरा खाते हैं क्या? नहीं। भारत में कहीं भी देख लो, जाओ मंदिरों में, देवी-देवताओं के मंदिरों में, हाँ, वो थर्ड क्लास, फोर्थ क्लास, फिफ्थ क्लास, नाइन्थ क्लास, वो महाकाली की बात नहीं करना। हाँ, वो तो थर्ड क्लास जो ब्राह्मण बनते हैं ना शूटिंग पीरियड की संगमयुगी दुनिया में वो जाकरके वो मांस-मदिरा खाते हैं। आओ भैया, हमारे पास मांस बहुत है, मछली हैं हम मत्स्यावतार। क्या? आओ, तुम खूब खाओ। हाँ।

तो डरती है ना मछली। पहले तो डरती थी। जब छोटी थी तो बहुत डरती थी। कि काहे बात से? हँ? हाँ, छोटी-छोटी मछलियाँ होती हैं ना समुन्दर में, वो बंगाल वाले बहुत खाते हैं। उन्हें मालूम है कि छोटी-छोटी मछलियां खा जाती हैं। तो वो मत्स्यावतार को डर रहता है। क्या? हँ, कि हमको कोई खा जाएगा। है ना। तो जो शास्त्रकारों ने मत्स्यावतार दिखाया है ना वो उसमें वो मत्स्यावतार और जिस राजा ने अपने बुद्धि रूपी कमंडल में रखा ना, उसके कमंडल में पहुंच गई। अंजलि में ले लिया। देखा कि वो छोटी सी मछली है। तो उन्हें कही – हमें बचा लो। हँ? उन्होंने अपने कमंडल में, बुद्धि रूपी कमंडल में डाल लिया। तो मछली कहती है कि अब, ठीक है, कमंडल में डाल दिया। अब तो मैं जल्दी-जल्दी बड़ा, अभी तक तो मुझे डर लग रहा था; क्या? हाँ, मछलियां कोई बड़ी वाली खा जाएंगी। लेकिन अब तो मैं आपकी सुरक्षा में आ गई हूँ। आपका तो नाम ही है सत्यव्रत जी महाराज। क्या नाम है? सत्य का व्रत लेने वाले महाराज। जैसे सत्य हरिश्चन्द्र थे। थे ना? हाँ। तो हाँ, तो वो ही सत्य हरिश्चन्द्र की जनम लेने वाली आत्मा हैं। और सतयुग में सत्य हरिश्चन्द्र थे। अब जनम लेते 84 के चक्कर में, अब आकरके सत्यव्रत महाराज बने जहाँ बंगाल में मछलियां बहुत खाते हैं। और बहुत समंदर में से पकड़ते हैं। नदी, गंगाजल में, गंगाजी में से पकड़ते हैं। तो मुझे बहुत डर लगता है। क्या? कि जो या तो बड़े-बड़े मगरमच्छ खा जाएंगे। और उनसे भी बच गई तो ये बंगाली जो हैं ना। आहाहा, ये तो बहुत मछलियां खाते हैं। ये खा जाएंगे।

तो वो उसने कहा। किसने? हाँ, मत्स्यावतार ने कहा – हमें ये खा जाएंगे। आप हमें कमंडल में ले चलो। बढ़ूंगी तो मैं जल्दी-जल्दी। तो वो बढ़ गई। तो उन्होंने बड़े मटके में डाला। उसमें भी बढ़ गई। तो फिर उन्होंने ले जाकरके एक बड़े हौदे में बनाया। जहाँ दिल्ली में सीलमपुर था ना। वहाँ मछलियों की बीज बोया गया था। बड़े-बड़े तालाब बनाए गए थे। क्या? हाँ, वहाँ कोई बीज रूप मछलियां भी होगी। होगी ना? हाँ। तो पहले बनाए थे। अभी तो बिगाड़ दिये। ये गोर्मेन्ट हैं, रोज़-रोज़ बातें बदलती रहती है। तो वो मछली बहुत डरती थी कि मेरे को खा जाएंगे। अब ये समझने की बात है। क्या? कि ज्यादा मांस किसमें होता है? कौनसे जानवर में बहुत मांस होता है? मछली में मांस बहुत होता है। छोटी मछली हो, चाहे बड़ी मछली हो। व्हेल मछली हो, हँ, और सील मछली हो। हड्डी बहुत थोड़ी। हँ? थोड़ी सी हड्डी। तो जो मांसखोर हैं वो बहुत खाते हैं। हँ? हद के मांसखोर, वो तो ये वैष्णव आज की दुनिया के हो गए। और बेहद के मांसखोर? भगवान जब आते हैं संगमयुग में तो जिन बीजरूप आत्माओं को पैदा करते हैं ना, रुद्रमाला के मणके कहे जाते हैं ना बीज। रुद्र की माला है ना। माला माने संगठन। तो उस संगठन में जितने भी हैं वो सब मांसखोर। बेहद का मांस जानते तो हो ना। समझा कि नहीं? हाँ। चलो कभी तन से नहीं खाते होंगे, इन्द्रियों से नहीं खाते होंगे। मन में तो, मन में तो खाते ही हैं। दृष्टि से खाते रहते हैं। खाते कि नहीं? हाँ। तो कहेंगे, उनको वेजिटेरियन कहेंगे? न हद वालों को कहेंगे न बेहद वालों को कहेंगे।

अरे, वैष्णव तो कहा जाता है देवी-देवताओं को। तो जो आज अपन को वैष्णव कहते हैं, हँ, जिनको वैष्णव कहा जाता है। दुनिया भी कहती है वैष्णव हैं। वेजिटेरियन खाते हैं। तो उनकी कान्फ्रेन्स हो रही है। है ना? तो उनको ये समझाना है। किनको? हद वालों को पहले समझाना है कि बेहद वालों को? किसको समझाना है? बेहद वालों को। बेहद वालों को समझाना है। जाकरके समझाएंगे कि वैष्णव हैं जो सच्चे-सच्चे वो तो पैराडाइज़ में रहते हैं। कहाँ रहते हैं? पैराडाइज़ में। पैराडाइज़ शब्द क्यों बोला? समझाने के लिए। अंग्रेज होगा ना तो पैराडाइज़ जल्दी समझेगा। हाँ, तो बताया - तुम तो क्रिश्चियन हो। हँ? इसलिए हम तुम्हारी भाषा में थोड़ा-थोड़ा हम भी भाषा जानते हैं तुम्हारी। तो पैराडाइज़ में ये रहते हैं। कौन? सच्चे, पक्के वैष्णव। तो पक्का बनना है वैष्णव कि कच्चा वैष्णव बनना है? क्या बनना है? पक्का वैष्णव। और वो हैं आदि सनातन देवी-देवता धरम वाले। क्या? देवी-देवता शब्द क्यों लगाय दिया? अरे, सनातन धरम तो आज हमने सुना बहुत। देवी-देवता सनातन धर्म। ये क्या बात हो गई? अरे, अभी तो बताया - भगवान आते हैं तो नर अर्जुन और नारी द्रौपदी को क्या बनाते हैं? हँ? सतयुग का नर से नारायण बनाते हैं। देवी-देवताएं थे ना नारायण और नारायणी। तो कौनसा धरम स्थापन किया भगवान ने? हँ? तुम उन्हें भगवान को कहते हो हैविनली गॉड फादर। तो हैविनली गॉड फादर ने जरूर हैविन स्थापन किया होगा ना। हाँ। देवी-देवता धर्म स्थापन किया। हिन्दुओं में कहते हैं देवी-देवता धर्म। आप लोग कहते हैं डीटीज़। है ना? हाँ। तो देवी-देवता धरम वाले जो थे वो ही सच्चे कहे जाएंगे सनातन। सनातन माने पुराने। पुराने जमाने की बात है देवी-देवताओं की जो सतयुग में ही थे सच्चे-सच्चे।

A night class dated 21.9.1967 was being narrated. A topic was being discussed in the middle of the first page. Which topic was being discussed? The topic of Vaishnavpanthis was being discussed. They call themselves Vaishnav. Arey, the deities were firm Vaishnav in the Golden Age, which is called heaven. Even in the Silver Age, there were semi-deities. They were also Vaishnav. Why? What has been said? The names in the scriptures – Devi-devata (deities). There is a meaning, isn’t it? What is meant by Devi? Giver, not taker. Yes. What? If she enjoys the pleasures of the world, then what is she? Hm? Okay. Leave it.
(Someone said something.) Yes, there is a Dena Bank. That is a Dena Bank for namesake. The true Bank will be formed in the world of Brahmins. Hm? This is an unrighteous government. How will be the banks working under them? Those Banks will also be unrighteous only, will they not be? This name has been assigned. Just as these vegetarians have assigned a name that we are firm Vaishnav. Lattu. Who is called a Vaishnav? Vishnu’s child. What? Who is called a Brahmin? Brahma’s child. One syllable is increased in the sense of a follower. In the sense of a child. So, look, now it will be said that there is no Vaishnav in this world. Is there? No. Yes. It is because the topic of vegetarian is not there in this one. In what? In the ancient deity religion. God had come and prepared deities. What did He prepare? He had made man Arjun as Narayan, didn’t He? What did He make woman Lakshmi, no, woman Draupadi? Hm? He had made her like Lakshmi, Narayani, hadn’t He?

So, there is no topic of vegetarian among these deities, who were firm Vaishnavs, whom God had prepared. What? Why? It is because in case of vegetarians, they eat onion (pyaaj), etc. also. They eat. What is the name coined? Pee aaj (drink today). Arey, drink today. We will see when the time comes. What has been said? Does it happen or not? Yes. So, the vegetarians eat onion, etc. One is vegetarians in a limited sense and one is vegetarians in an unlimited sense. Yes, just meat and wine; perhaps there must be some meat and wine also. Arey, among the limited Vaishnavs they say Vaishnav. Sometimes, just as there are Brahmins in today’s world; so, do they eat meat and drink wine or not? Yes. So, similarly, there must perhaps be that meat and wine as well. It is not known; Baba has not seen. He made a guess that they must be eating meat as well. What? Do you know what is meant by meat? What is meat in an unlimited sense? Meat in an unlimited sense is to seek the pleasure of body consciousness, to seek the pleasure of the body, the organs; What will that be called? Meat. So, there must be meat and wine as well. Yes. They must not be eating this fish, etc. What? Hm? Do they eat fish, etc.? They must not be eating. Baba made a guess that they may not be eating this fish, etc. Why? What is the specialty in fish? Hm? Arey, it gives out bad smell, doesn’t it? Doesn’t it? Yes, it gives out the bad smell of adultery. That big fish gobbles up the small fish. The small fish eats the big fish. Does it eat or not? Yes. So, that is it. Perhaps those Vaishnav people do not consume the fishes in a limited sense. Yes, do they eat in an unlimited sense or not? Yes, they must be definitely eating. If some are first class, they must not be eating. Yes.

So, those who eat onions, perhaps consume meat, wine also. They must not be eating fish. They are called vegetarians. Or they are called Vaishnav. To be called is a different issue and to be in practical is a different issue. So, there is a kaannfurrence (conference) of vegetarians. What? What do they do? They put words in the ear (kaan). Nobody else should listen. For example, there are Gurujis Maharaj, aren’t there? Yes, there are limited Gurus as well as unlimited gurus. Do they exist or not? Yes, they do exist. Mataji knows. Yes, the unlimited gurus say ‘do not tell anyone’. What? They whisper the mantra in the ear. That is called kaanfurrence. It is because those people who are not Vaishnav will know. Hm? Those who are not Vaishnav and they eat a lot of meat, wine, fish. They exist in India only, don’t they? Yes. So, if they listen, they will get angry. Yes. So, this is why they whisper in the ear.

Whenever conferences are organized then you should go there and explain to them that the Vaishnavs live in Paradise. What? You know Paradise, don’t you? You are Englishmen. Hm? Paradise is your word only. Otherwise, if you wish to explain to the Muslims, then what is their word? Jannat. Yes. So, they are called vegetarians; who? Those; hm, who? It was told just now, wasn’t it? In the world of the Golden Age and the Silver Age; half the [period of] world is heaven and half the [period of] world is hell, of demons. Deities are monist (adwaitwaadi). It means those who believe in one. 'A' means no. 'Dwait' means those who do not believe in others. And in the demoniac world, in the world of hell, 2500 years before this day, Ibrahim, Buddha came; they created a world of hell (narak) because they are men (nar), human beings (manushya), aren’t they? So, in that world the Vaishavs call themselves Vaishnav. But they are not in a real sense. Why? What was the reason mentioned? Why aren’t they? It is because they are not like the deities at all. Do the deities eat meat and drink wine? No. Look anywhere in India, go to the temples, to the temples of the deities, yes, do not talk of that third class, fourth class, fifth class, ninth class, that Mahakali. Yes, those who become third class Brahmins in the shooting period in the Confluence Age world go and eat meat and drink wine. Come brother, we have a lot of meat; we are fishes, incarnations of fish. What? Come; you can eat a lot. Yes.

So, the fish fears, doesn’t it? Initially it used to fear. When it was very small, it used to fear a lot. Which topic [did she used to fear]? Hm? Yes, there are small fishes in the ocean; those Bengalis eat a lot. They know that small fishes eat. So, that incarnation of fish (matsyaavataar) fears. What? Hm, that someone will eat me up. Is it not? So, the incarnation of fish that the writers of scriptures have shown, in that the incarnation of fish and the king who kept it in his intellect-like kamandal (pot shaped water bottle with a handle), she reached his kamandal. He [first] took her in his palm (anjali). He saw that it is a small fish; she told him - save me. Hm? He put her in his kamandal, intellect-like kamandal. So, the fish says that now it is okay; he put her in the kamandal. Now I am growing fast; till now I was fearing that; what? Yes, some big fishes may eat me. But now I have come in your protection. Your name itself is Satyavratji Maharaj. What is the name? Maharaj who has taken the vow (vrat) of truth (satya). Just as there was the true Harishchandra. He existed, didn’t he? Yes. So, yes, it is the same soul of true Harishchandra which has taken birth. And there was true Harishchandra in the Golden Age. Now while getting rebirth in the cycle of 84, now you have become Satyavrat Maharaj where people eat a lot of fishes in Bengal. And they catch them a lot from the ocean. They catch them from the river, from the water of the Ganges, from Gangaji. I fear a lot. What? That big crocodiles may gobble me. And even if I am saved from them, then these Bengalis are there, aren’t they? Aahaha, they eat a lot of fishes. These people will eat me.

So, she said that. Who? Yes, the incarnation of fish said – These people will eat me up. You take me in your kamandal. I will grow fast. So, she grew. So, he put her in a big pot. She grew in that as well. So, then he put her in a big sump. The place where Seelampur is located in Delhi, isn’t it? There the seeds of fish were sown. Big ponds were created. What? Yes, there must be some seed-form fishes also there. They must be there, must they not be? Yes. So, earlier they had built. Now they have destroyed them. These governments keep on changing their words every day. So, that fish used to fear a lot that they will eat me up. Well, this is a topic to be understood. What? That who contains more meat? Which animal contains more meat? Fish has more meat. Be it a small fish or a big fish. Be it a whale fish and be it a seal fish. The bones are very less. Hm? Very little bone. So, those meat-eaters (maanskhor) eat that a lot. Hm? The meat-eaters in a limited sense; the Vaishnavs of today’s world have become that. And what about the meat-eaters in an unlimited sense? When God comes in the Confluence Age, then the seed-form souls whom He gives birth; the seeds are called the beads of Rudramala, aren’t they? It is a rosary of Rudra, isn’t it? Rosary means gathering. So, all those who exist in that gathering are meat-eaters. You know about the meat in an unlimited sense don’t you? Did you not understand? Yes. Okay, you must not be eating through the body, you must not be eating through the organs. You do eat in the mind. You keep on eating through the vision. Do you eat or not? Yes. So, it will be said; will they be called vegetarians? Neither the limited ones, nor the unlimited ones will be called [vegetarians].

Arey, it is the deities who are called Vaishnavs. So, those who call themselves Vaishnavs today, those who are called Vaishnavs. The world also says that they are Vaishnavs. They eat vegetarian food. So, their conference is being organized. Is it not? So, they have to be explained this. Who? Should the limited ones be explained first or the unlimited ones? Who should be explained? The unlimited ones. The unlimited ones have to be explained. You will go and explain to them that the true Vaishnavs live in Paradise. Where do they live? In Paradise. Why was the word Paradise uttered? To explain. If someone is a Britisher, he will understand Paradise easily, will he not? Yes, so it was told – You are Christians. Hm? That is why we explain in your language; we too know your language a little. So, these people live in Paradise. Who? The true, firm Vaishnavs. So, should you become firm Vaishnavs or weak Vaishnavs? What do you have to become? Firm Vaishnavs. And they belong to the Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma. What? Why was the word Devi-Devata added? Arey, we have heard about Sanatan Dharma a lot today. Devi-Devata Sanatan Dharma. What is this? Arey, it was told just now – When God comes, what does He transform man Arjun and woman Draupadi to? Hm? He makes them Narayan of the Golden Age from man. Narayan and Narayani were deities, weren’t they? So, which religion did God establish? Hm? You call God as Heavenly God Father. So, the Heavenly God Father had definitely established heaven, hadn’t He? Yes. He established the deity religion. Among the Hindus they say Deity religion. You call them deities. Is it not? Yes. So, those who belonged to the deity religion will alone be called the true ancient ones (sanaatan). Sanaatan means old. The topic of the true deities, who existed only in the Golden Age, is a topic of the bygone era.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 07 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2714, दिनांक 28.11.2018
VCD 2714, Dated 28.11.2018
रात्रि क्लास 21.9.1967
Night Class dated 21.9.1967
VCD-2714-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.01
Time- 00.01-15.01


रात्रि क्लास चल रहा था - 21.9.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि जो दुनिया में अपन को वैष्णव कहते हैं, उनको बताना है कि वैष्णव तो उन्हें कहा जाता है जो विष्णु को फालो करते हैं। जैसे जैन उन्हें कहा जाता है जो जिन्न को फालो करते हैं। ब्राह्मण उन्हें कहा जाता है जो ब्रह्मा को फालो करते हैं। और शैव उन्हें कहा जाता है जो शिव को फालो करते हैं। शिव को पहचानेंगे, हँ, शिव के बताए हुए रास्ते पर चलेंगे तो फालो करेंगे। तो जो सच्चे वैष्णव पक्के-पक्के हैं, विष्णु की औलाद कहो, विष्णु के पक्के फालोअर कहो, वो तो विषय सागर में गोते नहीं खाते हैं। हँ? जो विष है वो तो बता दिया ना किसे कहा जाता है? हँ? ऐसे नहीं कि कोई सांप का विष पीने को ही विष कहा जाता है। हाँ, जो व्यभिचार है ना; (किसी ने कुछ कहा।) काम विकार, वो तो ठीक है। सारी दुनिया काम विकार में आसक्त है। काम विकार अलग बात। लेकिन व्यभिचार का मतलब ही है पराई स्त्री और पर पुरुष से इन्द्रियों का सुख लेना। उसको कहा जाता है व्यभिचार।

और ये व्यभिचार देवताओं में नहीं होता। कल भी बताया था कि राधा की दृष्टि कृष्ण में डूबती है, कृष्ण की दृष्टि राधा में। माने ज्ञानेन्द्रियों से भी व्यभिचार नहीं करते हैं वो। और ये तो दुनिया रजोप्रधान दुनिया है, द्वापरयुग से। और रजोप्रधान दुनिया में तो रज वृत्ति शुरू हो जाती है कन्याओं-माताओं में। और शुरू करने के निमित्त तो दुर्योधन-दुशासन ही बनते हैं। क्योंकि इस दुनिया में तो सब पुरुष इन विधर्मी धरमपिताओं के आने से, उनसे प्रभावित होने से सारे ही पुरुष मात्र दुष्ट युद्ध करने वाले बन गए हैं। दुष्ट युद्ध करना माना दुःशासन बनना। कन्याओं-माताओं के साथ तो खास दुष्ट युद्ध करते हैं। और फिर जब उनकी नहीं चलती है, कोई ऐसी होती हैं सीता की तरह कि रावण बीस बार भी प्रयत्न करे लेकिन सीता उनके कंट्रोल में नहीं आती है। तो जब देखते हैं कि कुछ नहीं चलती है तो फिर व्यभिचार में घुस पड़ते हैं। तो उसको कहा जाता है विषय सागर। विशियस, वैश्य।

तो देवताएं थे वास्तव में जिनको कहें वो हिंसक नहीं थे। वो विषय सागर में गोते नहीं खाते थे। अर्थात् विषियस नहीं बनते। वाइसलैस हैं। अर्थात् विकारी नहीं बनते हैं। क्योंकि उनको तो जो भ्रष्ट इन्द्रियां हैं, उनसे आचरण ही नहीं करना होता है। तो उनको वैष्णव कहा जाता है। और उन विष्णु की और वैष्णवपंथियों की रचना किसने की? वो विष्णु लोक किसने बनाया? जिसने बनाया वो स्वयं भी; क्या? हिंसक होगा? हँ? दुष्ट युद्ध करने वाला होगा? दुष्ट युद्ध कहते हैं बाहुबल चलाना। भ्रष्ट इन्द्रियों का उपयोग करना। तो ये वृत्ति इस दुनिया में विधर्मी धरमपिताओं के आने से शुरू हुई है ढ़ाई हज़ार साल से। उससे पहले ढ़ाई हज़ार साल जो राम-कृष्ण की दुनिया थी सतयुग-त्रेता में वो दुनिया तो परमपिता परमात्मा शिव ने बनवाई थी क्योंकि वो परमपिता परमात्मा शिव, वो तो निराकारी स्टेज धारण करता है सदाकाल की। और जब इस सृष्टि पर आता है तो निराकार वो ज्योति, जिसे कल बताया बिन्दु, जैसे आत्माएं बिन्दु होती हैं ऐसे ही आत्माओं का बाप सुप्रीम सोल परमपिता भी बिन्दु। बिन्दु की लंबाई-चौड़ाई नहीं होती। इसलिए उसको निराकार कहा जाता है। इतना सूक्ष्म हो सकता है कि इन आँखों से तो क्या, जो विज्ञान के यंत्र हैं, उनसे भी पकड़ में नहीं आते।

तो वो जो शिव निराकार है जो इस सृष्टि पर जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता है, वो इस सृष्टि पर आकरके; उसको तो जन्म-मरण के चक्र में न आने से तीनों कालों का ज्ञान है ना। तो वो इस सृष्टि रूपी चक्र में सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग का जो चार अरों का चक्र है इसकी सारी गहराई को जानता है। उसके अनुसार उसमें जो अखूट ज्ञान का भंडार है वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आकरके इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदाकाल पार्ट बजाने वाली आत्मा, जिसे आदम, एडम या शंकर कहा जाता है, जिसका नाम महाभारत में अर्जुन भी रख दिया है, हँ, अर्जन करने वाला। क्या अर्जन करने वाला? हँ? धन-संपत्ति स्थूल नहीं। हँ? जो ईश्वरीय ज्ञान की संपत्ति है वो अर्जन करने वाला। उस ईश्वरीय ज्ञान संपत्ति के आधार पर वो योगबल की पावर प्राप्त करता है। कौन? हँ? एक अक्षर।
(किसी ने कुछ कहा।) आदम। आदि देव। और वो जो योगबल की पावर प्राप्ति होती है शिव बाप से योग लगाने से, याद करने से, क्योंकि वही एक आदि पुरुष है जो इस सृष्टि का रंगमंच का हीरो पार्टधारी है। तो वो शिव के ज्ञान को अच्छी तरह से पूरा समझ जाता है। और समझकरके जिस शिव को आज तक कोई नहीं जान पाया। भले मन्दिरों में जाके शिव की पूजा करते हैं। उनसे पूछा जाए ये शिव कौन है? क्यों पूजा करते हो? ये तो पत्थर रखा हुआ है। तो कहते हैं - भगवान है। अरे, भगवान एक होता है गॉड इज़ वन या राम भी भगवान, फिर कृष्ण भी भगवान, फिर गणेश भी भगवान, फिर हनूमान भी भगवान, फिर देवियां भी भगवान, फिर व्यास भी भगवान। अरे, ढ़ेर सारे भगवान। तो फिर बात बताते हैं, हाँ, भगवान तो सर्वव्यापी है। अरे, अरे, भगवान जब सर्वव्यापी होगा तो तुम याद किसको करोगे? हँ? एकव्यापी होगा, हँ, ऊँच ते ऊँच एक होगा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाला तो उसे तो याद किया जा सकता है। अनेकों को कैसे याद करोगे? बुद्धि भ्रमित नहीं हो जाएगी? हं? बुद्धि चलायमान हो जाएगी ना। एकाग्र तो नहीं होगी।

तो बताया कि वो शिव जो प्रवेश करने योग्य है; जैसे भूत-प्रेत प्रवेश कर जाते हैं तो वो क्यों नहीं प्रवेश कर सकता? भूत-प्रेतों को सूक्ष्म शरीर है। लेकिन उसको तो सूक्षम शरीर भी नहीं है। क्या? तीन प्रकार के शरीर होते हैं आत्मा को। एक ये स्थूल शरीर जो आँखों से देखने में आता है। दूसरा भूत-प्रेतों का वो शरीर जो सूक्षम होता है लाइट का। और तीसरा वो शरीर है जो हर आत्मा निराकारी स्टेज को धारण कर लेती है। एकदम ज्योतिबिन्दु बन जाती है और निराकारी लोक में जाकरके आराम करती है। जैसे आदमी सारा दिन काम करके थक जाता है ना। तो थकता कौन है? शरीर कि आत्मा? आत्मा थकती है। तो ऐसे ही सृष्टि रूपी रंगमंच पर चार युगों में पार्ट बजाते-बजाते कोई भी आत्मा, चाहे कम पार्ट बजाया हो, दो युगों का पार्ट बजाया, एक युग का पार्ट बजाया हो, एक ही जन्म का पार्ट बजाया हो, थक जाती है तो उसे रेस्ट चाहिए। वो रेस्ट देने के लिए, मुक्ति देने के लिए संसार से उस परमपिता परमात्मा शिव को, जो त्रिकालदर्शी है, तीनों काल का ज्ञाता है, उसे आना पड़ता है।

वो आकरके बताता है कि तुम अपन को पहले-पहले ज्योतिबिन्दु आत्मा समझो। ज्योतिबिन्दु आत्मा पक्का करेंगे तो तुम्हें जो आत्माओं का बाप है वो भी स्थिरतापूर्वक याद आएगा। और अपनी आत्मा के स्वरूप में ही स्थिर होने की प्रैक्टिस नहीं कर पाएंगे; क्या? दस सेकण्ड, बीस सेकण्ड, साठ सेकण्ड, दो मिनट, आधा घंटा, या कोई ज्यादा पावरफुल आत्मा है तो लगातार भी करेगा। करेगा कि नहीं? तो बताया कि जो लगातार करेगा तो वो तो बाप समान ज्योति बिन्दु पहले बना ना। और पहले बना तो बाप के नज़दीक पहुंचा या दूर रहा? सुप्रीम सोल बाप के नज़दीक पहुँचा। तो जो नज़दीक पहुँचेगा वो कुछ प्राप्ति ज्यादा करेगा या कम करेगा? ज्यादा प्राप्ति करेगा। तो वो जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच का हीरोपार्टधारी; कौन? हँ? अभी बताया आदम, एडम, आदि देव, हँ, जैनी लोग कहते हैं आदिनाथ। तो वो शिव बाप समान स्टेज धारण करता है।

A night class dated 21.9.1967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was that those who call themselves Vaishnav should be told that those who follow Vishnu are called Vaishnav. For example, those who follow Jinn are called Jain. Those who follow Brahma are called Brahmins. And those who follow Shiv are called Shaiv. If you recognize Shiv, if you follow the path shown by Shiv, then you will follow Him. So, those who are true, firm Vaishnavs, call them the children of Vishnu, call them the firm followers of Vishnu, they do not dive in the ocean of vices. Hm? You have been told as to what is called poison (vish)? Hm? It is not as if drinking the poison of a snake alone is called Vish. Yes, the adultery
(Someone said something.) The vice of lust; that is okay. The entire world is immersed in the vice of lust. The topic of the vice of lust is different. But the meaning of adultery itself is to seek the pleasure of organs through an unrelated woman and an unrelated man. That is called adultery (vyabhichaar).

And this adultery does not exist among the deities. It was told yesterday also that Radha’s eyes look only at Krishna and Krishna’s eyes only at Radha. It means that they do not indulge in adultery even through the sense organs. And this world is a rajopradhan world from the Copper Age. And in the rajopradhan world the raj vritti starts among the virgins and mothers. And it is the Duryodhans and Dushasans who become instrumental in starting it. It is because in this world due to the arrival of these vidharmi founders of religions, because of being influenced by them, all the men have become those who wage a wicked war (dusht yuddh). Waging a wicked war means to become Dushasan. They especially wage a wicked war against the virgins and mothers. And then when they are unable to do as they wish; there are some women like Sitas that even if Ravan makes an effort twenty times, yet Sita doesn’t come under their control. So, when they see that they are unable to anything as per their wishes, then they indulge in adultery. So, that is called an ocean of vices. Vicious, vaishya.

So, the deities existed in reality for whom it could be said that they were not violent. So, they did not used to dive in the ocean of vices, i.e. they do not become vicious. They are viceless, i.e. do not become vicious. It is because they do not have to act through the unrighteous organs. So, they are called Vaishnav. And who created that Vishnu and Vaishnavpanthis (followers of Vishnu)? Who made that abode of Vishnu? The one who made will himself also be; what? Will he be violent? Hm? Will he be someone who wages a wicked war? Wicked war means to use physical power. To use the unrighteous organs. So, this attitude started since 2500 years in this world after the arrival of the vidharmi founders of religions. Before that the world of Ram and Krishna in the Golden Age and the Silver Age which was created by the Supreme Father Supreme Soul Shiv because that Supreme Father Supreme Soul Shiv assumes an incorporeal stage forever. And when He comes in this world then that incorporeal light, which was mentioned yesterday to be a point; just as the souls are points, similarly the Father of souls, the Supreme Soul, the Supreme Father is also a point. A point doesn’t have length and breadth. This is why it is called incorporeal. It can be so subtle that leave alone these eyes, it cannot be grasped even through the instruments of science.

So, that incorporeal Shiv, who does not pass through the cycle of birth and death in this world, after coming to this world; as He does not pass through the cycle of birth and death, He has knowledge of all the three aspects of time, doesn’t He? So, He knows the entire depth of all the four parts of the cycle, i.e. the Golden Age, Silver Age, Copper Age and the Iron Age in this world cycle. As per Him the inexhaustible stock house of knowledge that is contained in Him, He comes to this world stage and the soul which plays a part forever on this world stage, who is called Aadam, Adam or Shankar, whose name has also been coined in the Mahabharata as Arjun, the one who earns (arjan karne wala). What does he ear? Hm? Not physical wealth and property. Hm? He earns the property of Godly knowledge. On the basis of that property of Godly knowledge, he achieves that power of Yoga. Who? Hm? One word.
(Someone said something.) Aadam. Aadi Dev. And that power of Yoga that is achieved by having Yoga with the Father Shiv, by remembering Him because He is the only one Aadi Purush who is the hero actor of this world stage. So, he understands Shiv’s knowledge nicely and completely. And after understanding it, the Shiv whom nobody could know till date. Although people go to the temples and worship Shiva. If they are asked as to who is this Shiv? Why do you worship Him? This is a stone that you have placed. So, they say – He is God. Arey, is God one, ‘God is one’ or is Ram also God, then Krishna is also God, then Ganesh is also God, then Hanuman is also God, then the Devis are also Gods, then Vyas is also God. Arey, numerous Gods. Then they tell the topic that yes, God is omnipresent. Arey, arey, when God is omnipresent, then whom will you remember? Hm? If He is present in one, hm, if he is highest on high one playing a part on this world stage, then He can be remembered. How will you remember many? Will not the intellect be confused? Hm? The intellect will become inconstant, will it not? It will not be focused.

So, it was told that that Shiv who is capable of entering; just as ghosts and devils enter, then why can’t He enter? Ghosts and devils have a subtle body. But He doesn’t have even a subtle body of His own. What? There are three kinds of bodies of a soul. One is this physical body, which is visible to these eyes. Second is that body of the ghosts and devils which is subtle, made up of light. And the third one is that body which every soul achieve its incorporeal stage. When it becomes completely point of light and goes and rests in the incorporeal abode; for example, when a man works the entire day and becomes tired, doesn’t he? So, who becomes tired? The body or the soul? The soul becomes tired. So, similarly, while playing a part in the four Ages on the world stage any soul, whether it has played less part, whether it has played part for two Ages, whether it has played part for one Age, whether it has played part for only one birth, when it becomes tired, it needs rest. In order to give that rest, in order to give liberation from the world, that Supreme Father Supreme Soul Shiv, who is Trikaaldarshi, the knower of all the three aspects of time, has to come.

He comes and tells that you first of all consider yourself to be a point of light soul. If you firmly believe yourself to be a point of light soul, then the Father of you souls will also come to your mind firmly. And you will not be able to practice becoming constant in the form of your soul; what? Ten seconds, twenty seconds, sixty seconds, two minutes, half an hour or if someone is a more powerful soul, then he will do it continuously as well. Will he do or not? So, it was told that the one, who does continuously then he became a point of light equal to the Father first, didn’t he? And when he became first, then did he reach near the Father or did he remain far? He reached near the Supreme Soul Father. So, will the one who reaches close achieve more attainments or less attainment? He will achieve more attainments. So, that hero actor of this world stage; who? Hm? It was told just now Aadam, Adam, Aadi Dev, hm, Jains call him Aadinath. So, he assumes a stage equal to the Father Shiv.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 09 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2715, दिनांक 29.11.2018
VCD 2715, Dated 29.11.2018
रात्रि क्लास 21.9.1967
Night Class dated 21.9.1967
VCD-2715-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.24
Time- 00.01-16.24


रात्रि क्लास चल रहा था - 21.9.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – जो अपन को वेजिटेरियन कहते हैं वो होते हैं वैष्णव। उनको वैष्णव कहा जाता है। परन्तु विष्णु की संतान को वैष्णव कहा जाता है। और विष्णु की संतान तो विष्णुपुरी में ही होंगे ना। तो विष्णुपुरी को तो वैकुण्ठ कहा जाता है। और वो विष्णुपुरी तो विषियस काम करने वालों की नहीं होती है जो विषय सागर में गोते खाते हों। वो तो विषियस बनते ही नहीं। वाइसलैस हैं। कहा ही जाता है; उनके बच्चों को भी कहा जाता है - सर्वगुण संपन्न, 16 कला संपूर्ण, संपूर्ण अहिंसक, मर्यादा पुरुषोत्तम। तो फिर वो जो 16 कला संपूर्ण बनने वाले लक्ष्मी-नारायण हैं उनकी वंशावली में वो ही 16 कला संपूर्ण हुए तो उनको बनाने वाला तो उनसे ऊँचा होगा ना। वो उनको कहा जाता है विष्णु। तो विष्णु की संतान हुए वैष्णव। क्योंकि वो हैं वाइसलैस विष्णुपुरी के। या कहें लक्ष्मी-नारायण की डायनेस्टी। तो वो जो डायनेस्टी है वो डैनास्टी सच्ची वैष्णव है। सारी डैनास्टी सतयुग की है। तो वहाँ सच्चे वैष्णव होते हैं। कहा ही जाता है सतयुग।

इस सतयुग की स्थापना सत्य बाप ही आकरके करते होंगे। उनकी कहानी भी गाई जाती है, कथा गाई जाती है घर-घर में सत्य नारायण। बाकि जिनकी कथा गाई जाती है, वो तो उस समय की बात है जब इस चार युगों के ह्यूज ड्रामा की शूटिंग हुई थी, रिहर्सल हुई थी कलियुग के अंत और सतयुग के आदि में। तो बाप ने आकरके, शिव बाप ने जो गीता ज्ञान सुनाया, उस गीता ज्ञान के आधार पर जो राजयोग सिखाया, उस राजयोग से वो ऐसे नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बने जिनके संस्कार-स्वभाव मिलकरके एक हो जाते हैं, अर्थात् कोई भी प्रकार का लड़ाई-झगड़ा, मारामारी नहीं। न कर्मेन्द्रियों से, न वाचा से, न मनसा से। मनसा के संकल्पों में भी कोई टकराहट नहीं। किन्तु आज की दुनिया के वैष्णव अपने दिल पर हाथ रख करके पूछें, हँ, पति-पत्नी में कोई घर में ऐसा है जहाँ टकराहट न होती हो। कहते हैं हम वैष्णव हैं, वैष्णववंशी हैं। तो वो वैष्णववंशी तो बिल्कुल कॉमन बात हो गई। और जो परमपिता परमात्मा शिव आकरके स्थापन करते हैं कलियुग के अंत में, हँ, नई दुनिया, नया सतयुग बनाते हैं तो वो तो एकदम अनकॉमन है।

और वो वैष्णव बनानेवाला बाप शिवबाबा कहा जाता है। हँ? शिवबाबा कहा जाता है। बाबा कैसे? बाबा तो ग्रैण्डफादर को कहा जाता है। और, शिव तो निराकार ज्योतिबिन्दु, हँ, ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। तो वो निराकार जो अकर्ता, अभोक्ता और अजन्मा है, वो तो बिन्दु आत्मा है ना। प्योर बिन्दु आत्मा है या देहभान का अंश है? थोड़ा है? नहीं। वो तो एकदम बिन्दु-बिन्दु आत्माएं जो भी हैं प्राणीमात्र की, चाहे वो देवताएं हों स्वर्ग के, सतयुग-त्रेता के और चाहे वो द्वैतवादी द्वापरयुग के अनेक भाषाओं वाले, अनेक धरम वाले, अनेक मतों वाले, अनेक राज्यों वाले दैत्य हों, जो आपस में भी लड़ते रहते हैं। हँ? और देव आत्माओं से भी लड़ते हैं। तो वो जो दुनिया है जो भगवान ने नई दुनिया बनाई थी, उसको द्वैतवादी थोड़ेही कहा जाता है। उनको तो देवताओं की अद्वैत दुनिया कहा जाता है। अ माने नहीं, द्वैत माने दो-दो धर्म, दो-दो राज्य, दो-दो भाषाएं, दो-दो मत, दो-दो कुल नहीं होते हैं। हँ? वहाँ जो भी डैनास्टी चलती है लक्ष्मी-नारायण की सतयुग में या त्रेता में राम की भी जो डैनस्टी चलती है उस डायनस्टी में घर-घर में एका होता है क्योंकि यथा राजा तथा प्रजा। राजा-रानी ही जब विष्णु संप्रदाय के हैं; कैसे हैं? विष्णु। विष्णु माने नो विष एट आल। विषय वासना का नाम-निशान नहीं। तो उनको बनाने वाला या बनाने की तरकीब सिखाने वाला जो शिव है वो तो कैसे होगा? हँ? क्या होगा? आत्मा होगा या देहभान वाला होगा? नहीं। वो तो सदा शिव कहा जाता है।

शिव का अर्थ ही है कल्याणकारी। सदा कल्याणकारी या कभी कल्याणकारी कभी नहीं कल्याणकारी? सदा कल्याणकारी। सदा का मतलब? क्या सतयुग-त्रेता, द्वापर, कलियुग में कल्याणकारी? नहीं। वो तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर प्रैक्टिकल शरीर से पार्ट ही नहीं बजाता। अगर्भा है। देवताएं भी गर्भ से जन्म लेते। हँ? द्वैतवादी द्वापरयुग में जो अनेक धर्म आ जाते हैं, अनेक भाषाओं, अनेक राज्य वाले, अनेक धरम वाले, द्वैतवादी द्वापरयुग में दैत्य कहे जाते हैं ना। तो उस दुनिया में तो होता ही है देह अभिमान। क्योंकि जो धरमपिताएं आते हैं इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट, वो भी देह अभिमानी होते हैं। क्या? देह की जो भ्रष्ट इन्द्रियां हैं उनसे सुख लेने के जन्म-जन्मान्तर के आदी, आधीन हैं। आदी हुए पड़े हैं। उनको कोई भगवान ने डायरेक्ट आकरके थोड़ेही पढ़ाया था? क्या? राजयोग का ज्ञान। तो जो ज्ञान का भंडारी है, अखूट ज्ञान का भंडारी; हँ? क्या गाते हैं उसके लिए? हँ? शास्त्रों में गाते हैं - पूर्णमिदं पूर्णमदः पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवा वशिष्यते। उसका ज्ञान कभी खूटता नहीं। क्यों? क्योंकि जिन देहधारी धरमपिताओं में देहभान होता है उनको देह का संग का रंग लगता है। क्या? देह जो है ना पांच तत्वों की बनी हुई, ये प्रकृति का चोला है। क्या? प्रकृति तीन गुणों से भरी पूरी है। सत्वप्रधान, सतोसामान्य, रजो और तमो।

तो भगवान ने जो दुनिया बनाई थी वो तो है ही सदा सत्। क्या कहते हैं? सत्यम् शिवम् सुन्दरम्। तो वो अजन्मा निराकार शिव ज्योति बिन्दु जब इस सृष्टि पर, जिसकी यादगार सोमनाथ मन्दिर में बिन्दु ज्योति की यादगार पत्थर के बड़े लिंग में हीरा ज्योतिर्मय दिखाया गया था। वो भी यादगार है, ओरिजिनल नहीं। क्या? क्या कहेंगे? डुप्लिकेट या ओरिजिनल? नहीं। वो तो इस सृष्टि पर आता ही नहीं है। जब आता ही नहीं है तो वास्तव में तो उसकी पूजा भी नहीं होती है। और वो तो स्वयं कहता है - मैं न पूज्य बनता हूँ, न पुजारी बनता हूँ। हँ? तुम बच्चे जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर भोग भोगते हो सुख का वो, क्या, पूज्य भी बनते हो और पुजारी भी बनते हो। मैं अगर पूज्य बनूं देवता, तो मेरे को भी शरीर लेना पड़ेगा क्योंकि देवताएं तो भोगवादी होते हैं। सुख भोगते हैं कि नहीं भोगते हैं? स्वर्ग में सुख भोगते हैं। अखूट स्वर्ग। पहले जनम में तो अखूट सुख होता है। 16 कला संपूर्ण कहा जाता है। उससे तो ऊँची कलाएं चन्द्रमा की भी नहीं कही जाती। कहते हैं चन्द्रमा में अमृत होता है। हँ? अमृत पीकरके देवताएं क्या बने? अमर बन गए। लंबी-लंबी आयु होती थी और अपनी स्वेच्छा से शरीर छोड़ते थे। नहीं तो इस दुनिया में कोई मृत्यु चाहता है? कोई मृत्यु नहीं चाहता। सब घबड़ाते हैं मृत्यु से। हँ? लेकिन देवताएं तो स्वेच्छा से जैसे कपड़ा उतारा जाता है ना तो ऐसे ही ये शरीर रूपी वस्त्र उतार देते हैं।

तो ऐसी दुनिया सतयुग की बनाने वाला कब आता है? कलियुग के अंत में आता है और कलियुग के अंत में जो महाविनाश होता है क्योंकि प्रैक्टिकल में देखा जाता है कि कलियुग के अंत में ही एटमिक एनर्जी तैयार होती है ना, जिन्हें मिसाइल्स कहा जाता है। शास्त्रों में उनको मिसाइल की जगह मूसल बोल दिया है। अब वो मूसल कह दो। लेकिन वो मूसल कोई लोहे के, पेट में से नहीं निकले थे। ये तो बुद्धि रूपी पेट है। इस बुद्धि रूपी पेट में से वो मिसाइल्स निर्माण हुए थे। किसने बनाए? वो ही वृष्णवंशी यादवों ने, जिन यादवों के लिए लिखा हुआ है कि बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली होते थे। हँ? ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं वाले होते थे। और बड़े मांसखोर और शराबी होते थे। तो वो कोई दूसरे नहीं हैं। ये यूरोपवासी यादव हैं जिन्हें क्रिश्चियन कहा जाता है। जिन्होंने वो मिसाइल्स बनाके तैयार किये हुए हैं एटमिक एनर्जी। और ऐसी पावरफुल एटमिक एनर्जी बनाई है और वो एक देश में नहीं, आज दुनिया के अनेक देशों में वो एटमिक एनर्जी खुले आम बनी हुई है।

A night class dated 21.91967 was being narrated. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was – Those who call themselves vegetarians are Vaishnavs. They are called Vaishnavs. But children of Vishnu are called Vaishnav. And children of Vishnu will exist in the abode of Vishnu only, will they not be? So, the abode of Vishnu is called Vaikunth. And that abode of Vishnu is not of those who perform vicious tasks, those who dive in the ocean of vices. They do not become vicious at all. They are viceless. They are called; their children are also called – perfect in all the virtues, complete in 16 celestial degrees, completely non-violent, highest among souls in following the code of conduct (Maryadas purushottam). So, when in the genealogy of those Lakshmi and Narayan who become perfect in 16 celestial degree are themselves perfect in 16 celestial degrees, then their maker would be higher than them, will he not be? He is called Vishnu. So, Vishnu’s children are Vaishnav. It is because they belong to the viceless abode of Vishnu. Or you may say the dynasty of Lakshmi-Narayan. So, that dynasty is a dynasty of true Vaishnavs. The entire dynasty belongs to the Golden Age. So, there are true Vaishnavs there. It is called the Golden Age.

The true Father Himself must be coming and establishing this Golden Age. His story is also praised, sung in every home as Satya Narayan. As regards the one whose story is sung, it is about that time when the shooting, the rehearsal of this huge drama of four Ages was done in the end of the Iron Age and the beginning of the Golden Age. So, the Father came, the knowledge of the Gita which the Father Shiv narrated, on the basis of that knowledge of the Gita, the rajyog that He taught, through that rajyog they became such Narayan from nar (man) and Lakshmi from naari (woman) whose natures and sanskars become one, i.e. there is no kind of fight, quarrel, bloodshed. Neither through the organs of action, nor through words, nor through mind. There is no clash even through the thoughts of the mind. But the Vaishnavs of today’s world should place their hand on their heart and ask, is there any home where there is no clash between a husband and wife. They say that we are Vaishnav, Vaishnavvanshi. So, that Vaishnavvanshi is a very common topic. And the new world, the new Golden Age that the Supreme Father Supreme Soul Shiv comes and establishes in the end of the Iron Age that is completely uncommon.

And that Father, the maker of Vaishnavs is called ShivBaba. Hm? He is called ShivBaba. How is He Baba? A grandfather is called Baba. And Shiv is an incorporeal point of light, hm, He is called Jyotirling. So, that incorporeal, who is akarta (non-doer), abhokta (non-pleasure seeker) and ajanma (one who does not get birth) is a point like soul, isn’t He? Is He a pure soul or does He have any trace of body consciousness? Is there a little? No. So, all the point-like souls of all living beings, be it the deities of the heaven, of the Golden Age and the Silver Age and be it the demons with numerous languages, numerous religions, numerous opinions, numerous kingdoms of the dualist Copper Age, who keep on fighting with each other as well. Hm? And they keep on fighting with the deity souls as well. So, that world, the new world which God had created is not called dualist. That is called a monist (adwait) world of deities. ‘A’ means ‘no’; dwait means two religions, two kingdoms, two languages, two opinions, two clans. Hm? Whatever dynasty of Lakshmi-Narayan that exists in the Golden Age or the dynasty of Ram also that exists in the Silver Age, in that dynasty there is unity in each home because as is the king, so are the subjects. When the king and queen themselves belong to the Vishnu community; how are they? Vishnu. Vishnu means no vish (poison) at all. There is no trace of lust. So, how will their maker or the one who teaches the method of making them, i.e. Shiv be? Hm? What will He be? Will He be a soul or someone with body consciousness? No. He is called SadaaShiv.

The meaning of Shiv itself is benevolent. Forever benevolent or sometimes benevolent and not benevolent sometimes? Forever benevolent. What is meant by forever? Benevolent in the Golden Age, Silver Age, Copper Age, Iron Age? No. He doesn’t play a part through the practical body on this world stage at all. He is agarbha (one who doesn’t enter in a mother’s womb). The deities also get birth through a mother’s womb. Hm? The numerous religions which emerge in the dualist Copper Age, those with numerous languages, numerous kingdoms, numerous religions are called demons in the dualist Copper Age, aren’t they? So, in that world there is just body consciousness. It is because the founders of religions like Ibrahim, Buddha, Christ, who come are also body conscious. What? They are habituated, subservient to seeking pleasure through the unrighteous organs of the body since many births. They are habituated. Did God come and teach them direct? What? The knowledge of rajyog. So, the storehouse of knowledge; the inexhaustible storehouse of knowledge; hm? What is sung for Him? Hm? It is sung in the scriptures – Poornamidam poornamadah poornaat poornamudachyate. Poornasya poornamaadaay poornameva vashishyate. His knowledge never exhausts. Why? It is because the bodily founders of religions who have body consciousness get coloured by the company of the body. What? The body made up of the five elements is a dress of the nature (prakriti). What? Prakriti is full of three attributes. Satwapradhan, satosaamaanya, rajo and tamo.

So, the world that God had created is forever true. What do people say? Satyam Shivam Sundaram. So, when that ajanma incorporeal Shiv, the point of light, comes to this world, whose memorial, the memorial of the point of light was depicted in the temple of Somnath in the form of luminous diamond on a big stone ling. That is also a memorial, not original. What? What will be said? Duplicate or original? No. He doesn’t come to this world at all. When He doesn’t come at all, then actually He is not worshipped as well. And He Himself says – I neither become worship worthy nor a worshipper. Hm? You children who enjoy Bhog of pleasures on this world stage, you become worship worthy as well as worshippers. If I become a worship worthy deity then I will also have to assume a body because deities are pleasure seekers (bhogwaadi). Do they enjoy pleasures or not? They enjoy pleasures in heaven. Inexhaustible heaven. In the first birth there is inexhaustible happiness. It is called perfect in 16 celestial degrees. The celestial degrees of the Moon are also not said to be higher than that. It is said that there is nectar in the Moon. Hm? What did the deities become after drinking the nectar? They became eternal. They used to be long-lived and they used to leave their body voluntarily. Otherwise, does anyone wish to die in this world? Nobody wants to die. Everyone fears death. Hm? But deities leave this body like dress voluntarily just as someone undresses.

So, when does the maker of such world of the Golden Age come? He comes in the end of the Iron Age and the mega-destruction that takes place in the end of the Iron Age because it is seen in practical that the atomic energy gets ready in the end of the Iron Age only, which are called missiles. In the scriptures they have been called moosal instead of missiles. Well, call it those moosal. But those moosals made up of iron had not emerged from the abdomen. It is this intellect-like abdomen. Those missiles were manufactured from this intellect-like abdomen. Who had manufactured? The same Vrishnavanshi Yadavas; the Yadavas for whom it has been written that they used to be very prosperous. Hm? They owned high rise buildings. And they used to be non-vegetarians and drunkards. So, they are not anyone else. It is the European Yadavas who are called Christians. They have prepared those missiles and the atomic energy. And they have created such powerful atomic energy and not just in one country; today that atomic energy is openly manufactured in many countries of the world.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 11 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2716, दिनांक 30.11.2018
VCD 2716, dated 30.11.2018
रात्रि क्लास 21.9.1967
Night Class dated 21.9.1967
VCD-2716-extracts-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-14.47
Time- 00.01-14.47


आज का रात्रि क्लास है - 21.9.1967. पहले पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि जो देवताओं की डिनायस्टी होती है उसे कहेंगे सच्चा वैष्णव और वेजिटेरियन तो बिल्कुल कॉमन बात है। जो कहते हैं कि हम वेजिटेरियन हैं, वैष्णव हैं, तो वो तो अनकॉमन है। और वो वैष्णव बनाने वाला बाप, शिव बाबा उनके बगैर तो वैष्णव कोई बन ही नहीं सकते हैं। तो ये अगर जाकरके समझावें कि पैराडाइज़ में कौन राज्य करते थे, वो पक्के वैष्णव हैं। फिर ये जो आदि सनातन देवी-देवता धरम वाले कहे जाते हैं क्योंकि वो ही उनकी निर्विकारी वाइसलैस वर्ल्ड है। तो जो वाइसलैस वर्ल्ड है वो कोई भी प्याज वगैरा तो नहीं खाते हैं। और न उनको कोई भक्तिमार्ग में ऐसा प्याज वगैरा का भोग लगाया जाता है। उनकी महिमा भी ऐसे ही कही जाती है निर्विकारी, संपूर्ण निर्विकारी। तो देवी-देवताओं को कोई भी ऐसी वस्तु भोग में नहीं लगाई जाती है। निर्विकारी भी कहा जाता है। और उनको कोई भी वस्तु प्याज, वगैरा तो कुछ भी नहीं।

तो ये बातें सिर्फ तुम बच्चे ही सिद्ध करके बताते हो। उनको बताते हो कि वेजिटेरियन का अर्थ क्या है? वास्तव में वेजिटेरियन कौन होते हैं। यहाँ तो तुम्हारी जो भी वेजिटेरियन कान्फ्रेन्स वगैरा हैं और उनमें जो बहुत ही लिस्टें देते हो, तो वो तो कोई भी नहीं गिने जाते हैं। उनको मालूम पड़े कि वैष्णव या वेजिटेरियन किनको कहा जाता है। ऐसे दुनिया में उनका मान तो बहुत है। और वो तो विश्व के मालिक, जो वेजिटेरियन सच्चे थे, वैष्णव थे, वो तो विश्व के मालिक, पैराडाइज़ के मालिक थे। या कहें स्वर्ग के मालिक थे, बहिश्त के। तो ये सब कुछ समझाना है। अच्छी तरह से। 21.9.67 की वाणी का दूसरा पेज। तो वो ये बातें समझें ना कि ये भारत में ही थे। और कोई खंड में ऐसे कोई वैष्णव नहीं बनते हैं। क्योंकि और खंडों में तो विष्णुलोक बनता ही नहीं। तो वहाँ तो बिल्कुल होते ही नहीं हैं।

तो भारत की महिमा करते हैं ना बच्चे। फिर साथ-साथ में ऐसी भी महिमा करते हैं कि ये वैष्णव बनाने वाला तो शिव बाबा ही है। उनका ही जनम भारत में होता है। क्योंकि वहाँ ये शिव जयंती मनाते हैं। तो वो ही आकरके ये आदि सनातन देवी-देवता धर्म की या वैष्णव धरम की स्थापना करते हैं। कोई भी मनुष्य गुरु या मनुष्य धरमपिताएं नहीं करते हैं। नहीं। हाँ, इनकारपोरियल ही आकरके निराकारी, निर्विकारी बनाते हैं। वो निराकारी गॉड फादर है ना। तुमको भी निराकारी बनाते हैं। और फिर निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनते हो। तो ऐसे वो वैष्णव देवता कहे जाते हैं। सिद्ध करके बताना है। फिर उनमें ये भी बताना है कि जब बाप आते हैं सुप्रीम सोल, आत्माओं का बाप, तो वो भारत में ही आते हैं। और कोई देशों में नहीं आते हैं। और वो है ही लिब्रेटर, गाइड। ऐसे नहीं कि उनका जनम नहीं होता है। जनम तो होता है। दिव्य जन्म होता है। और भारत में ही उनका दिव्य जन्म होता है। और ऐसे नहीं कि भारतवासियों की ही सद्गति करते हैं। जो भी दुनिया में मनुष्य मात्र हैं, सबकी सद्गति करते हैं।

सिवाय उनके जो देवी-देवता बनते हैं, पूरी सद्गति तो और किसी की हो ही नहीं सकती है। क्योंकि जो भी धर्म स्थापन वगैरा होते हैं, क्योंकि ब्राह्मण धरम भी तो है। तो ब्राह्मण धरम के बारे में भी सिद्ध करके इनको बताना है कि ब्राह्मण धर्म है। वो भी आकरके शिवबाबा स्थापन करते हैं। फिर ये है कि नंबरवार ब्राह्मण बनते हैं। और जो फर्स्ट कुरी के, सेकंड कुरी के ब्राह्मण बनते हैं उनको ब्राह्मण सो देवता बनाते हैं। और फिर ये जो नॉलेज पूरी नहीं ले सकते हैं जो बाप आकर देते हैं, हँ, तो वो फिर सेकंड कैटागरी, क्षत्रीय बन जाते हैं, दो कला कम वाले बन जाते हैं। तो उनमें सारा ये जाकरके समझावें। देवताओं में भी सेमी देवता बनते हैं।

तो ये जो चित्र हैं तुम्हारे पास उनको लेकरके उनमें योग की जो बातें हैं वो उठावें और देवें कि इस योगबल से जो बाप आकरके सिखाते हैं उससे इतने और ऐसे ये वैष्णव बनते हैं। ये एब्सोल्यूटली प्योर आत्मा बनती है उन द्वारा। किनके द्वारा? हँ? उन द्वारा जो कम्पलीट देवता बनते हैं। तो दे आल आर वन। यथा राजा तथा प्रजा सब ऐसे ही। परन्तु उनका सबका पोजीशन आदि है, आदि सनातन देवी देवता धरम वाली आत्माओं में। परन्तु जो क्षत्रीय बनते हैं उनका तो कम हो जावेगा। तो फिर मुख्य पार्ट तो हीरो-हीरोइन का पार्ट है। क्योंकि वो विष्णु का राज्य भी लेते हैं। तो देखो राज्य लेते भी हैं, फिर पूरा गंवाते भी हैं अंतिम जनम में। देखो, अब ये गंवाए हुए राज्य हैं ना। और अभी फिर वो ले रहे हैं।

तो बाप हैविनली गॉड फादर जो हैविन स्थापन करते हैं, पैराडाइज़ बनाते हैं, तो उस पैराडाइज़ के लिए तो वो आकरके ये योग सिखाते हैं। इसमें कोई ऐसे होते हैं सीखने वाले जो पवित्र नहीं बनते हैं। कोई तो फिर स्त्री-पुरुष पवित्र रहते हैं। क्योंकि ये भी बात है कि भारत के ही स्त्री और पुरुष पवित्र थे। उस पैराडाइज़ में और फिर स्वर्ग में भी, और त्रेता में भी पवित्र गृहस्थ आश्रम था। देखो, ये चित्र हैं ना। देवताओं की यादगार मूर्तियां रखी हैं ना। तो पवित्र थे तो उनकी पूजा की जाती है। फिर वो 84 जन्म लेते-लेते सुख भोगते-भोगते अपवित्र बनते हैं। तो फिर वो 84 का चक्र भी उनको समझाय सकते हो इन वैष्णव पंथियों को क्योंकि ये सब बातें समझाने के लिए उनसे टाइम तो लेना ही पड़ता है कि अगर समझाना (समझना) चाहते हो तो अच्छी तरह से समझो। क्योंकि यहाँ इस भारत में हम ही सिर्फ हैं इस नई दुनिया के रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अंत को जानते हैं। पास्ट में जो होकरके गए हैं ऋषि-मुनि वगैरा कोई भी और फिर ये देवताएं भी। इनमें से कोई भी त्रिकालदर्शी नहीं थे। क्योंकि ये ऋषि-मुनि भी या वो देवताएं भी रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अंत को नहीं जानते। ये तो समय यही है सिर्फ जब सुप्रीम सोल बाप आकरके अपना परिचय देते हैं और ब्रह्मा के तन से सब कुछ समझाते हैं। और हम तो उस ब्रह्मा के ही ब्राह्मण हैं बच्चे डायरेक्ट क्योंकि हम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ ही तो हैं। तो हम कोई इस समय का जबकि प्रजापिता ब्रह्मा के एडॉप्टेड चिल्ड्रेन हैं तो एडॉप्टेड हैं तो वो ही सुनते हैं डायरेक्ट। तो वो कोई दुनिया की नॉलेज नहीं है। कौनसी नॉलेज है? ईश्वरीय नॉलेज। डायरेक्ट ईश्वर आकरके रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अंत की जो नॉलेज है वो सब समझाते हैं। तो ऐसी-ऐसी बातें बच्चों को बहुत अच्छी तरह से समझाना है। (क्रमशः)

Today’s night class is dated 21.9.1967. The topic being discussed in the end of the middle portion of the first page was that the dynasty of deities will be called true Vaishnav and as regards vegetarian, that is a very common topic. People say that we are vegetarians, Vaishnav, so, that is uncommon. And the Father, ShivBaba who makes you Vaishnav, nobody can become Vaishnav without Him. So, if you go and explain that who used to rule in Paradise; they were firm Vaishnavs. Then these who are said to belong to the Aadi Sanaatan Devi-Devata Dharma because that is their viceless world. So, in the viceless world nobody eats onion, etc. And neither are they offered Bhog of such onion, etc. on the path of Bhakti. They are also praised as viceless, completely viceless. So, no such thing is offered to the deities in Bhog. They are also called viceless (nirvikaari). And they are not offered anything like onion, etc.

So, only you children prove these topics. You tell them as to what is the meaning of vegetarian. Actually who are vegetarians? Here you organize vegetarian conference, etc. and you issue a lot of lists in it; so, they are not counted among them. They should know as to who are called Vaishnavs or vegetarians. They have a lot of respect in the world. And they are called the masters of the world; those who were true vegetarians, Vaishnavs were masters of the world, masters of Paradise. Or we may say that they were masters of swarga, bahisht (heaven). So, all this should be explained nicely. Second page of the Vani dated 21.9.67. So, they should understand these topics that they existed in India alone. Nobody becomes such Vaishnav in any other land. It is because the abode of Vishnu is not established in any other land at all. So, they do not exist there at all.

So, children, people praise India, don’t they? Then along with this they praise that it is ShivBaba alone who makes us such Vaishnavs. He alone is born in India. It is because this Shivjayanti (birth day of Shiv) is celebrated there. So, He Himself comes and establishes this Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma or the Vaishnav Dharma. No human guru or human founder of religion establishes. No. Yes, the incorporeal one Himself comes and makes us incorporeal, viceless. He is incorporeal God Father, isn’t He? He makes you also incorporeal. And then you become incorporeal, viceless, egoless. So, such Vaishnavs are called deities. You have to prove and tell. Then you should also tell that when the Father, the Supreme Soul, the Father of souls comes, He comes only in India. He doesn’t come in any other country. And He is a liberator, a guide. It is not as if He is not born. He is born. He gets a divine birth. And He gets a divine birth only in India. And it is not as if He causes the true salvation of the residents of India alone. He causes the true salvation of all the human beings in the world.

Except those who become deities, nobody else can achieve complete true salvation (sadgati) at all because all the religions that are established because there is Brahmin religion as well. So, you should prove and tell them about the Brahmin religion also that there is a Brahmin religion. It is ShivBaba who comes and establishes that as well. Then it is true that you become numberwise Brahmins. And those who become Brahmins of first category, second category are made deities from Brahmins. And then those who are unable to obtain this knowledge completely which the Father comes and gives, they then become second category, Kshatriyas, having two celestial degrees less. So, you should go and explain all this among them. Even among the deities some become semi-deities.

So, these pictures that you have you should take them and raise the topic of Yoga among them and tell them that so many people become Vaishnav like this through the power of Yoga that the Father comes and teaches. The soul becomes absolutely pure through them. Through whom? Hm? Through those who become complete deities. So, they all are one. As is the king so are all the subjects. But they all have position, etc. among the souls of Aadi Sanatan Devi-Devata Dharam. But those who become Kshatriyas will achieve less. So, then the main part is the part of hero-heroine because they obtain the kingdom of Vishnu as well. So, look, they obtain the kingdom also and then also lose it completely in the last birth. Look, these are now lost kingdoms, aren’t they? And now they are obtaining them again.

So, the heaven, the Paradise that the Father, the Heavenly God Father establishes, so, He comes and teaches this Yoga for that Paradise. Among the learners some are such that they do not become pure. And then some women and men lead a pure life because it is also true that the women and men of India alone were pure. In that Paradise and in Swarg (heaven) as well; and there was a pure grihasth ashram (hermitage like household) in the Silver Age as well. Look, these pictures exist, don’t they? The memorial idols of deities are kept, aren’t they? So, they were pure, so, they are worshipped. Then while getting 84 births, while enjoying pleasures, they become impure. So, then you can explain the cycle of 84 births also to them, to these Vaishnavpanthis because you have to seek time from them to explain all these topics that if you want to explain (understand), then understand nicely. It is because here in this India it is we alone who know the Creator of the new world and the beginning, middle and end of the creation. None of these sages, saints, etc. and these deities also who have been in the past. None of them were Trikaaldarshii (knower of all the three aspects of time). It is because these sages, saints or those deities also do not know the Creator and the beginning, middle and end of the creation. This is the only time when the Supreme Soul Father comes and gives His introduction and explains everything through the body of Brahma. And we are direct Brahmin children of that Brahma only because we are Brahmakumar-kumaris only. So, at this time when we are Prajapita Brahma’s adopted children, so we are adopted, so we listen that only direct. So, that is not worldly knowledge. Which knowledge is it? Godly knowledge. Direct God comes and explains all the knowledge of the Creator and the beginning, middle and end of the creation. So, children should explain such topics very nicely. (Continued)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 13 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2716, दिनांक 30.11.2018
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VCD-2716-extracts-Bilingual-Part-2

समय- 14.48-36.19
Time- 14.48-36.19


जो बाबा का सर्विसेबुल बनना चाहते हैं और सर्विसेबल बनेंगे तो ऊँच पद पावेंगे। तो ये बातें उनको बहुत नोट करनी होती हैं पाइंट्स ज्ञान के। और फिर उन्हीं प्वाइंट्स से समझ करके सर्विस भी करनी पड़ती है। और फिर ये नहीं कि सर्विस की और रिजल्ट कुछ भी नहीं सुनाया। सर्विस की रिजल्ट भी बाबा को भेज देनी है। इतने इतनों को हमने समझाया। और इतने-इतने निकले और इतने-इतने रेगुलर स्टूडेन्ट बने। क्योंकि जब तक बाबा के पास कोई का सबूत नहीं आता है सर्विस का तो वो बाप के, बापदादा के दिल पर नहीं चढ़ते हैं। अगर जाते भी हैं क्लास में रेगुलर समझो तो भी कोई ऐसे नहीं है कि दिल पर चढ़ सकते हैं जब तक ईश्वरीय सेवा में न लगें, समझें और समझाए। तो जो दिल पर नहीं चढ़ते हैं, सिर्फ वे हैं जो सर्विस नहीं करते। चढ़ते सिर्फ वो ही हैं अच्छी तरह से क्योंकि जो दिल पर चढ़ेंगे वो तख्त पर भी बैठेंगे। फालो करेंगे। तो जो सर्विस का सबूत बताते रहेंगे वो दिल पर चढ़ते रहेंगे। बाकि कोई सर्विस का सबूत ही नहीं होगा तो दिल पर कैसे चढ़ेंगे? सो भी सर्विस भी अच्छी सर्विस हो।

और वो सर्विस तो बहुत ईज़ी है। क्योंकि इस सर्विस में सुनने में, सुनाने में, समझने में, समझाने में कोई बहुत तकलीफ नहीं है। परन्तु वो माया भी तो बड़ी प्रबल है कि बच्चों को सर्विस करने नहीं देती है। समझे ना? तुम सर्विस करते हो, योग की यात्रा करते हो। योगबल ये तो तुम सारे विश्व को पावन बनाते हो। तो इसमें माया तो विघन डालेगी ना। क्यों? क्यों विघन डालेगी? क्योंकि तुम सर्विस करते हो। तो जिनकी सर्विस होती है, होशियार बनते हैं, दूसरों की सेवा करते हैं, तो वो स्वर्ग में आ जावेंगे कि माया की नगरी में आ जावेंगे? हाँ। तो वो तो विघन डालेगी। क्योंकि वो माया तो पतित बनाने वाली है। तो उनकी फिर लड़ाई होती है। हँ? वो पतित बनाके नरक में ले जाती है। और तुम पावन बनवाके स्वर्ग में भेज देते हो। तो फिर वो विघन डालती है।

तो बरोबर ये बड़ी मेहनत की बात है समझाना, करना। 21.9.1967 की रात्रि क्लास का तीसरा पेज। तो ये सर्विस करना, समझना, समझाना, नोट करना, और फिर आदि, मध्य, अंत का सृष्टि का ज्ञान सुनाना और उन्हें निकालना कि वो आप समान बनें, सर्विसेबुल बनें, बड़ी मेहनत है एकदम। क्योंकि कोई सर्विस करते हैं तो एकदम देहभान में रहके सर्विस करते हैं। तो डिससर्विस हो जाती है। याद की यात्रा में रहें तो बहुत सर्विस हो। और याद में बड़ी मेहनत है। इसमें बड़ी मेहनत चाहिए क्योंकि चाहते तो हैं कि हम बापदादा के दिल पर चढ़ें। सदैव विचार सागर मंथन करते रहें, नए-नए प्वाइंट्स निकालें। तो ये सब बातें बच्चों के लिए हैं। ऐसे नहीं सिर्फ एक के लिए है। नहीं। शास्त्रों में आता है ना, कि कोई भी हों, आत्माएं तो सब हैं ना। हँ? राक्षसी हों, दैवी आत्माएं रही हों, ये ज्ञान तो सबके लिए है। सबको मुक्ति, जीवनमुक्ति का वर्सा लेना है।

तो बाबा को तो शिवबाबा कहते हैं मुझे तो विचार सागर मंथन नहीं करना है। हँ? शिवबाबा कहते हैं कि शिव बाप कहते हैं? शिव बाप कहते हैं? अच्छा? शिवबाबा नहीं कहते हैं? झूठ बोल दिया? हँ? शिवबाबा जब कहा जाता है तो उसमें साकार शरीर धारण करने वाली आत्मा भी तो बाबा है ना। तो दो आत्माएं हुईं। तो कहेंगे कि शिव को विचार सागर मंथन नहीं करना है क्योंकि वो भले साकार में प्रवेश करते हैं, शिवबाबा कहे जाते हैं। तो उनकी आत्मा तो विचार सागर मंथन नहीं करेगी ना। क्योंकि उनमें तो सदाकाल त्रिकालदर्शी और वो तो कोई पढ़ाई नहीं पढ़ती है आत्मा। पढ़ती है? हँ? वो तो पढ़ाई पढ़ाती है। सुप्रीम टीचर है ना। तो क्योंकि पढ़ाई पर तो तुम हो। हँ? और सारी दुनिया को तो तुम पढ़ाने वाले हो ना। हमारे पास तो, हमारी आत्मा में तो ये जो ड्रामा के प्लैन अनुसार, हँ, जो हमको पढ़ना है; किसने बोला? हँ? ब्रह्मा बाबा ने बोला कि ड्रामा प्लैन अनुसार जो हमको पढ़ना है, तुमको सो हम पढ़ाय रहा हूँ। हम पढ़ाय रहा हूँ। कौन? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ। बाकि पढ़ने वाले तुम हो। पुरुषार्थ तुम बच्चों को करना है। तो ये तो अविनाशी टीचर है ना बच्चे। इनका ज्ञान भी अविनाशी है। और तुम्हारा? तुम्हारा ज्ञान तो जनम बाइ जनम जैसे-जैसे सुख भोगते जाते हो ताकत कम होती जाती है। तो अविनाशी बाप भी है, वो टीचर भी है, क्योंकि इनका न कोई बाप है, न इनका टीचर है, न इनका कोई गुरु है। किनका? हं? ये जो कहते हैं अपन को वेजिटेरियन, वैष्णव हैं वो उनका तो न कोई बाप, न कोई टीचर, न गुरु। और तो तुम बच्चों में सबका बाप भी है, टीचर भी है, गुरु भी है, तो शरीर भी है। तो इन लोगों को कोई विचार सागर मंथन नहीं करना है। और तुम बच्चों को तो विचार सागर मंथन करना है कि कैसे सर्विस को बढ़ावें, क्या-क्या करें, कैसे-कैसे बाबा को क्या-क्या मदद करें।

और बाकि विनाश तो होना ही है। ये पैसे वैसे तो कोई के काम में आने वाले नहीं हैं क्योंकि जानते हो कि वो जो गाया जाता है फालो फादर, तो फालो फादर ये सदाकाल की बात तो नहीं है। कभी-कभी की बात है। कबकी बात है? ये अभी संगमयुग की बात है। तो यहाँ फादर ने क्या किया? हँ? कुटुम्ब भी था, परिवारवाले थे, तो वो झट बाप को कहा, चलो। वो परिवार वाले अपनी जानें, अपनी तकदीर जगाएंगे। तो जिसको खाना-पीना होगा तो खाते-पीते रहें। तो फिर बच्चों की तो कोई परवाह नहीं। बाकि हाँ, जो बच्चियां हैं उनकी संभाल की जाती है। हँ? तो इसलिए कहा जाता है कि बच्ची कोई अगर रह सकती है तो फिर ज्ञान में चले। पवित्र नहीं रह सकती है तो उसकी शादी करानी पड़े। और नहीं करावेंगे, ज्ञान में नहीं चलती है, पसन्द नहीं करती है तो कहीं खराब हो जाएगी। बाकि जो ज्ञान में चलने वाले बाप हैं बच्चों के, उनको अपने बच्चों की शादी नहीं करानी है। बच्ची ज्ञान में नहीं चलती है तो करानी है। तो फिर जो बच्चों की शादी नहीं करानी है वास्तव में और वो ज्ञान में नहीं चलते हैं तो फिर उनको क्या कहना होता है? हँ? उनको कहना होता है तुम्हें खाना-पीना है तो जाओ। पैसे कमाओ और फिर जाकरके शादी करो, खाओ, पीयो, मौज उड़ाओ। अपना घर भी बनाओ। माना मैं घर बनाने के लिए तुम्हें पैसे देने वाला नहीं हूँ। मेरे साथ तो पतित नहीं रह सकते हैं। कौन कहे? हँ? जो लौकिक बाप हैं, बाल-बच्चे हैं, बच्चे ज्ञान में नहीं चलते हैं तो उनको ऐसे बोलना चाहिए। हँ? साफ बोल दो – मेरे साथ कोई भी पतित नहीं रह सकते हैं। मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं जानूं। क्योंकि अभी ये तो बहुत ही मेहनत है। क्योंकि ये लोकलाज, कुल की मर्यादा, उसको तो एकदम छोड़ना है ना। तभी तो गाली खाई ना इतनी। कितनी गाली खाई? ये तो लोकलाज की बातें हैं। कुल की मर्यादा, ये खोनी पड़ती है ना। मीरा ने भी तो कहा ना – छाड जई कुल की कालिका, कुल की कानिका न करे कोई।

तो वो इतनी ताकत बनी रहे ये तो बहुत मुश्किल है किसी। तो फिर सिर्फ उनको कहा जाता है भई बच्चे को कि नहीं, ये सभी फिर क्या कहेंगे बिरादरी वाले? ये चाचे, मामे, काके, ये सब क्या कहेंगे फलाने-फलाने। तो यहाँ तो बच्चों को समझाया था ना। जिन-जिन भाइयों को लखपति बनाया, समझा ना? बड़ों को, भाइयों को लखपति बनाया, छोटे भाई, और जब देखा ये बात, वो भी दुश्मन बन गए एकदम। हमारी बात को समझा ही नहीं। समझा ना? वो भी पंचायत की तरफ हो गए। अरे, भाईवार किसको कारखाना बना के दिया, पिछाड़ी में और घर बैठे बाबा उनको सब कुछ देते थे, बिल्कुल हाफ पार्टनर से भी, हाफ पार्टनरशिप भी घर में बनाकरके बैठे देते थे। बोला – जाओ, घर में जाके बैठो। क्योंकि उनमें तो इतना खरीददारी का खिर ही नहीं था। तो वो भी ऐसा उनको पैसे घर बैठे-बैठे दिये। देखो, वो भी लोक-लाज में आकरके दुश्मन बन गए। समझा ना?

तो यहाँ कोई दुश्मनी से कोई डरना थोड़ेही होता है यहाँ? जिनको बाप का हाथ मिल गया, और शिवबाबा जिनकी तरफ हो गया, जो मालिक बनते हैं विश्व के, बाप मालिक बनाते हैं, तो उनके लिए फिर क्या कोई की परवाह करना? कोई भी परवाह थोड़ेही रखी जाती है? तो बस, फिर इस बात में ये हिम्मत रखनी चाहिए। तुमको मास्टर भी ऐसे पूछेगा ना बच्ची। हँ? ये बच्ची पढ़ाई पढ़ती है दुनिया की। तो पूछेगा मास्टर तुमको बैरिस्टर बनने का नशा है ना? एकदम ऊँच पद पाना है; जज बनना है ना? या कोई डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ते हैं तो टीचर पूछेगा सर्जन बनने का है ना। तो जो भी बैरिस्टर बनने वाले होंगे, पढ़ाई पढ़ते होंगे, सर्जन बनने वाले होंगे, सभी को नशा तो होगा ना। और जो ऊँचा एग्जाम देते हैं आई.सी.एस., उन आई.सी.एस. वालों को भी नशा होगा। और ये फिर तुम्हारा है नारायणी नशा। हँ? नर से नारायण बनने का नशा। तो ये तो फिर बच्चों को ज़रूर होना चाहिए। जब उनको एक जनम के पाई पैसे का नशा इतना चढ़ता है तो तुम तो जन्म-जन्मान्तर के राजाएं बनते हो। तुमको तो ये नशा जरूर होना चाहिए। क्योंकि यहाँ आते ही हो। किसलिए आते हो? नर से नारायण बनने के लिए आते हो। तो नारायणी नशा होना चाहिए ना। तो बाबा सब बच्चों से पूछते हैं - नारायणी नशा है? हँ? नारायणी नशा, लक्ष्मी का नशा। बात तो एक ही है। लक्ष्मी का हो वा नारायण का हो। अच्छा, रूहानी स्वीट चिल्ड्रेन प्रति रूहानी बाप व दादा का यादप्यार, गुडनाइट। (समाप्त)

Those who wish to become Baba’s serviceable and if you become serviceable, then you will achieve a high post. So, they should note these topics, the points of knowledge a lot. And then after understanding the same points you also have to do service. And then it is not that you do service and did not report any result. You should also send the result of service to Baba. We explained to these many people. And these many people emerged and these many people became regular students. It is because until Baba receives the proof of someone’s service, then they do not find a place in the Father’s, BapDada’s heart. Even if they go to the class regularly, then it is not as if they can find a place in the heart until they start doing Godly service, until they understand and explain. So, those who do not find a place in the heart is only those who do not do service. Only those [who do service] find a place nicely because only those who find a place in the heart will sit on the throne as well. They will follow. So, those who keep on showing the proof of service will keep on finding a place in the heart. But if there is no proof of service at all, then how will they find a place in the heart? That too the service should be good service.

And that service is very easy. It is because there is not much difficulty in listening, narrating, understanding, explaining in this service. But that Maya is also very strong that she does not allow children to do service. Did you understand? You do service; you perform the journey of Yoga. You make the entire world pure through this power of Yoga. So, Maya will create obstacles in it, will it not? Why? Why will it create obstacles? It is because you do service. So, those whose service is done, become clever, render service to others, then will they come in heaven or will they come in Maya’s city? Yes. So, she will create obstacles. It is because Maya makes you sinful. So, then they wage a war. Hm? She makes you sinful and takes you to hell. And you make them pure and send them to heaven. So, then she creates obstacles.

So, definitely this is a topic of lot of hard work to explain, etc. Third page of the night class dated 21.9.1967. So, to do this service, to understand, to explain, to note, and then to narrate the knowledge of the beginning, middle and end of the world and to make them emerge that they become equal to yourself, become serviceable is very hard, completely. It is because when some do service, they do service by remaining in complete body consciousness. So, disservice takes place. If they remain in the journey of remembrance, then a lot of service will take place. And there is a lot of effort involved in remembrance. A lot of hard work is required in this because you do want to find a place in BapDada’s heart. You should always keep on churning the ocean of thoughts; you should cause newer points to emerge. So, all these topics are for the children. It is not as if they are just for one. No. It is mentioned in the scriptures, isn’t it, that whoever it may be, all are souls, aren’t they? Hm? Be it the demoniac ones, be it those who have been divine souls, this knowledge is for everyone. Everyone has to obtain the inheritance of mukti, jeevanmukti.

So, Baba, ShivBaba says that I don’t have to churn the ocean of thoughts. Hm? Does ShivBaba say or does Father Shiv say? Does Father Shiv say? Achcha? Doesn’t ShivBaba say? Did He speak a lie? Hm? When it is said ShivBaba, then in it the soul which assumes the corporeal body is also Baba, isn’t it? So, there are two souls. So, it will be said that Shiv doesn’t have to churn the ocean of thoughts because although He enters in the corporeal, He is called ShivBaba. So, His soul will not churn the ocean of thoughts because He is forever Trikaaldarshii and that soul doesn’t study any knowledge. Does it study? Hm? It teaches knowledge. He is the Supreme Teacher, isn’t He? So, because you are studying. Hm? And you teach the entire world, don’t you? I, My soul, as per the drama plan, hm, whatever I have to study; who said? Hm? Brahma Baba said that as per the drama plan, whatever I have to study, I am teaching you. I am teaching. Who? Hm?
(Someone said something.) Yes. It is you who are studying. You children have to make purusharth. So, this is an imperishable teacher, isn’t He children? His knowledge is also imperishable. And yours? Your knowledge keeps on decreasing birth by birth as and when you keep on enjoying pleasures, the strength keeps on decreasing. So, He is the imperishable Father as well as a Teacher because this one does not have either a Father or a teacher; nor does He have any guru. Who? Hm? These people who call themselves vegetarians, Vaishnavs, they neither have any Father, nor teacher, nor guru. And all of you children have a Father also, teacher also, guru also and you have a body as well. So, these people do not have to churn the ocean of thoughts. And you children have to churn the ocean of thoughts as to how should we increase the service, what all should we do, in what all ways should we help Baba.

As regards destruction, it is bound to happen. This money etc. is not going to be of any use because you know that it is sung that ‘follow Father’, so, as regards ‘follow Father’, it is not a topic forever. It is a topic of sometimes. It is a topic of which time? It is a topic of the present Confluence Age. So, what did the Father do here? Hm? He had a family also; he was a family man; so, he told the Father immediately, let’s go. Let the members of that family worry about themselves; I will awaken my fortune. So, those who have to eat and drink may continue to eat and drink. So, then there is no worry about the children. But yes, the daughters are safeguarded. Hm? So, that is why it is said that if a daughter can follow she should follow the path of knowledge. If she cannot remain pure, then she has to be married off. And if her marriage is not solemnized, if she doesn’t follow the path of knowledge, if she doesn’t like it, then she may get spoilt somewhere. But as regards such fathers of sons, who follow the knowledge, should not solemnize the marriage of their sons. But if the daughter doesn’t follow the knowledge then her marriage should be solemnized. So, then the sons whose marriages should not be solemnized, then what should they be told? Hm? They have to be told that if you want to eat and drink, then go. Earn money and go and get married, eat, drink, enjoy. Set up your own home. It means that I am not going to give you money for building a house. Sinful ones cannot live with me. Who should say? Hm? The lokik fathers should tell those children, the sons who do not follow the path of knowledge. Hm? Tell clearly – No sinful ones can live with me. I don’t know anything about them. It is because now this is very hard. It is because this public honour (loklaaj), honor of the clan (kul ki Maryadas) has to be renounced immediately, shouldn’t it be? Only then did he suffer so many abuses, didn’t he? How many abuses did he suffer? These are topics of public honour (loklaaj). You have to lose the respect of the clan, don’t you? Meera also said – Chaad jai kul ki kaalika, kul ki kaanika na karey koi. (I have left the honor of the clan)

So, it is very difficult for anyone to maintain that strength. So, then they alone, the sons are told that brother that no, then what will all these members of the clan say? What will these paternal uncles (chaachey), maternal uncles (maamey), paternal uncles (kaakey), etc. say? So, here the children were explained, weren’t they? All those brothers whom I had made lakhpati (owner of a lakh of rupees); did you understand? I made the elder ones, brothers lakhpati, the younger brothers, and when they saw this topic, they too became enemies immediately. They did not understand my words at all. Did you understand? They also sided with the panchaayat (village heads). Arey, I established a factory for a brother later on and Baba used to give him everything while he was sitting at home; more than a half partner; he used to be given half partnership even while he was sitting at home. I told him – Go and sit at home. It is because he did not have the tact of buying anything at all. So, they were given money while they were sitting at home. Look, even those persons became enemies due to the fear of losing public honour. Did you understand?

So, do we have to fear anyone’s enmity here? Those who have found the Father’s hand and the one with whom ShivBaba has sided, the one who becomes the master of the world; the Father makes you master; so, then why care for someone for His sake? Does one care for anything? So, that is it; then you should show this courage in this topic. The master will also ask you like this, will he not daughter? Hm? This daughter teaches the knowledge of the world. So, the master will ask – Do you have the intoxication of becoming a Barrister? You have to achieve a completely high post; you have to become a Judge, will you not? Or if someone studies medicine, the teacher will ask – You want to become a surgeon, don’t you? So, those who have to become Barristers must be studying, those who have to become Surgeons will have the intoxication, will they not? And those who appear for a higher exam, ICS, those ICS persons will also have intoxication. And then this is your Narayani intoxication. Hm? The intoxication of becoming Narayan from nar (man). So, then the children should definitely have this. When they feel so intoxicated with pie-paise of one birth, then you become kings of many births. You should definitely have this intoxication. It is because you come here only because; why do you come? You come only to become Narayan from nar (man). So, you should have the Narayani intoxication, shouldn’t you? So, Baba asks all the children – Do you feel the Narayani intoxication? Hm? Narayani intoxication, the intoxication of Lakshmi. The topic is one and the same. Be it of Lakshmi or be it of Narayan. Achcha, remembrance, love, good night of spiritual Father and Dada to the spiritual, sweet children. (End)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun » 15 Jun 2021

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2717, दिनांक 01.12.2018
VCD 2717, Dated 01.12.2018
रात्रि क्लास 03.10.1967
Night Class dated 03.10.1967
VCD-2717-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.44
Time- 00.01-22.44


आज का रात्रि क्लास है - 3.10.1967. जनम-जन्मांतर पदमपति बनने के लिए, भविष्य के लिए हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। तो श्रीमत पर पुरुषार्थ कर रहे हैं ना। हँ? श्रीमत माने? श्रेष्ठ की मत पर पुरुषार्थ कर रहे हैं। इस दुनिया में फिर श्रेष्ठ किसे कहें? श्रेष्ठ की मत पर चल रहे हैं या श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ की मत पर चल रहे हैं? हँ? किसकी मत पर चल रहे हैं? क्योंकि, हां, इस संसार में श्रेष्ठ तो कोई है ही नहीं। श्रेष्ठ तो तब कहें जब मनसा, वाचा, कर्मणा भ्रष्ट इन्द्रियों की याद भी ना आए। कब कहें? हँ? हाँ। तो बताया कि आत्मिक स्टेज बनेगी तब कहेंगे किसी की श्रेष्ठ मत, श्रेष्ठ बुद्धि बनी है। तो क्या 24 घंटे की आत्मिक स्थिति बन जाएगी जल्दी? हँ? हँ? बन जाएगी? हँ? अगर ज्ञान मिल जाए कि हम आत्मा ज्योति बिन्दु हैं, भृकुटि के मध्य में ज्योति बिन्दु आत्मा है, तो मालूम हो जाने से ही क्या आत्मिक स्थिति में कोई टिक जाएगा? हँ? क्योंकि 63 जन्म की तो आदत पड़ी हुई है। पहले अपनी देह याद आती है फिर संबंधियों की। जिन संबंधियों से इन्द्रियों का जो योग जोड़ा है, तो उनकी याद आती है। (बाबा ने किसी को कहा – जब पूछें तब बताओ ना।) तो 63 जन्म की आदत एकदम छूटेगी क्या? देह को याद करने की आदत पड़ी हुई है।

तो बताया कि प्रैक्टिस करनी है। हँ? और ये प्रैक्टिस करने के लिए क्या करें? हँ? काम-धंधा करते हैं तो बुद्धि काम-धंधे में जाती है। हँ? खुश हो रहा है? हँ? और बैठके याद करते हैं तो बाबा कहते हैं कि बैठ के याद नहीं करना है। हँ? काम करते, चलते-फिरते, याद करने की प्रैक्टिस करनी है। अगर करना ही है बैठके याद तो अमृतवेला तो कोई काम-धंधा नहीं होता है। और उस समय वायुमंडल भी अच्छा होता है। तो अमृतवेला बैठकरके, वो भी ऐसे नहीं कि अमृतवेला बारह, एक बजे के बाद अमृतवेला होता है क्योंकि विदेशियों के अनुसार तो जो पश्चिमी देश हैं ना, तो वहाँ तो सूरज कै बजे उगता है? हँ? यहाँ के बारह बजेंगे तो वहाँ? हँ? अमेरिका में सूरज उगेगा। तो, उनके लिए तो, उनकी बुद्धि तीखी है। वो तीखी बुद्धि से उन्होंने ये पक्का कर लिया कि सूरज उगना कब शुरु होता है? क्या सवेरे को उगना शुरु होता है? नहीं। सूरज का उगना तो रात्रि के बारह बजे से ही उगना शुरु हो जाता है। और फिर रात्रि के 12 बजे से सुबह 6 बजे तक सूर्य ऊपर की ओर आता है या पृथ्वी के उस पार ही बना रहता है? हाँ। ऊपर की ओर आना शुरू होता है। तो कहेंगे कि वो ही अमृतवेला हुआ।

तो बताया कि बहुत में बहुत करके कोई बहुत दम लगाए, प्रैक्टिस करे तो बारह, एक बजे के बाद वायुमण्डल अच्छा होता है क्यंकि जो भूत-प्रेतानी आत्माएं हैं ना जो अकाले मौत से शरीर छोड़ती हैं, वो मंडराती रहती हैं। और वो ज्यादातर विकारी आत्माएं ही होती हैं। तो ज्यादा पाप कर्म करती हैं, हँ, कामी होती हैं, क्रोधी होती हैं ज्यादातर, लोभी होती हैं। तो वो आत्माएं अपनी हविश पूरी करने के लिए, पूर्व जन्म में उनकी हविश पूरी नहीं हुई और वो हविश में ही शरीर छोड़ दिया, तो वो हविश पूरी करने के लिए कोई न कोई में प्रवेश करते रहते हैं। जिनके साथ उनका पूर्व जन्म का हिसाब-किताब होगा उन्हीं में प्रवेश करते हैं। तो फिर जिनमें प्रवेश करेंगे उनकी बुद्धि खराब कर देते हैं। तो बताया कि बारह, एक बजे के बाद उन आत्माओं का थोड़ा प्रेशर कम होता है। तो उस समय अमृतवेला कहा जाएगा। सूर्योदय से पहले ही अमृतवेला कहा जाता है।

तो ये तो हद का अमृतवेला है। हँ? बेहद का भी अमृतवेला होगा ना। बेहद का अमृतवेला तब कहेंगे जब वो निराकार आत्माओं का बाप निराकार ज्योतिबिन्दु शिव, जो कभी जन्म-मरण के चक्कर में नहीं आता है, इसलिए वो सदा त्रिकालदर्शी है। कभी भी उसका ज्ञान खूटता नहीं है। तो वो इस सष्टि पर तब ही आता है, जब इस सृष्टि पर बेहद का अंधियारा बढ़े, हँ, या हद का अंधियारा बढ़े? हँ? बेहद का इस सृष्टि पर अज्ञान अंधकार छा जाता है तब वो इस सृष्टि पर आता है। तो उसे ही कहेंगे ना श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ। हँ? अब वो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ फिर आकरके पुरुषार्थ करने का, कराने का तरीका तो बताता है ना। जिसे कहते हैं गीता ज्ञान। हँ? ज्ञान का गीत है उसका। अब जो भी कवि होते हैं उनके गीत को सब कोई गहराई से समझ पाता है क्या? हाँ।

तो बताया कि जब मैं आता हूँ तो जैसे भूत-प्रेतों का कोई मुकर्रर अपना नंबरवार शरीर होता है, तो ऐसे ही उस सुप्रीम सोल बाप का भी इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, हँ, कोई अपना मुकर्रर रथ होता है जिसमें वो परमानेन्ट प्रवेश करता है। और उसके अलावा और भी हैं। इसलिए शास्त्रों में ब्रह्मा के पांच मुख दिखाए हैं। हँ? चार मुख जो हैं वो चार दिशाओं की तरफ हैं। और एक मुख ऊपर की ओर। लेकिन जिस, जो मुख ऊपर की ओर है उसे वो पहचानता होगा क्या सुप्रीम सोल शिव? हँ? जरूर पहचानता होगा। ऊपर की ओर का मतलब ही ये है कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कोई तो आत्मा है, हँ, जो सुप्रीम सोल बाप के आने तक, हँ, हाँ, उसकी बुद्धि कुछ न कुछ औरों के मुकाबले ज्यादा उस एक में ही लगी रहती है जिसको धरमपिताएं भी समझते हैं कि वो सुप्रीम एबोड का रहने वाला है, हँ, अर्श का रहने वाला है, परमधाम वासी है, आत्माओं के लोक का वासी है, तो गुरु नानक ने किधर इशारा किया? ऊपर की ओर इशारा किया। तो वो इस सृष्टि पर आता है। माने ऊपर से नीचे आता है माने अवतार लेता है। हँ। तो उसको तो अपना शरीर ही नहीं है। हँ? अगर अपना शरीर होता तो जन्म-मरण के चक्कर में आना पड़ता। तो वो फिर इस सृष्टि पर आकरके कैसे गीत, ज्ञान का गीत सुनाएगा? हँ? तो उसे तो नंबरवार शरीरों का आधार लेना पड़े ना।

तो जो शास्त्रों में गाया हुआ है, चित्र बने हुए हैं, हँ, चित्रकारों ने पहले अजंता, एलोरा, एलिफेंटा आदि की गुफाओं में चित्र बनाए थे, और उन चित्रों की व्याख्या शास्त्रकारों ने ऋषि-मुनियों ने की। तो उनको साक्षात्कार हुए। उन साक्षात्कारों के आधार पर उन्होंने ये जाना कि जिन शरीर रूपी रथों में खास करके वो सुप्रीम सोल शिव बाप प्रवेश करते हैं वो पांच हैं। तो उन्होंने पांच ब्रह्मा के मुख इकट्ठे कर दिये। अब ये नहीं उनकी बुद्धि में आया कि पांच मुख का भी कोई आदमी होता होगा क्या? हँ? हो सकता है उन्होंने साक्षात्कार में ही पांच मुख वाला देखा हो ब्रह्मा। तो पांच मुख वाला बनाय दिया। फिर उनकी बुद्धि में आया कि पांचों तो सच्चे नहीं हो सकते, ऋषि-मुनियों की बुद्धि में आया, नंबरवार ही सच्चे होंगे ना। तो सबसे सच्चा कौनसा मुख होगा? तो इतना तो जान लिया कि जिसका मुख ऊपर की ओर है वो जरूर सच्चा होगा। है ना? हाँ।

कोई का पूरब की ओर है। पूरब से सूरज निकलता है ना। तो ज्ञान सूर्य भी किधर से निकलता होगा? पूर्वीय देशों से आता होगा ना। हाँ। जैसे वो जापान के लोग हैं ना। तो क्या समझते हैं? जापान के लोगों का पक्की धारणा ये है कि हम सूर्यवंशी हैं। क्यों? कि जो स्थूल सूर्य उगता है ना तो सबसे पहले वो किरणें जो उत्तर-पूर्व से आती हैं ना, वहां से सूरज पहले-पहले किरणें कहाँ डालता है? हँ? हाँ, पूर्वी देश जो कहे जाते हैं, उनमें एशिया का पूर्वी हिस्सा है ना। तो उसमें पहली-पहली किरण, हँ, किनके ऊपर, कौनसे देश के ऊपर? हाँ, जापान देशवासियों के ऊपर पड़ती है। तो वो जो शास्त्रों में लिखा हुआ था भारत के शास्त्रों में और विदेशी शास्त्रकारों ने भी यहाँ आकरके शास्त्रों का अध्ययन किया तो उनकी बुद्धि में भी यही बैठा कि हाँ, कोई जो स्थूल सूर्य है, हो सकता है वो ही भगवान का रूप हो। तो जापानियों की बुद्धि में भी बैठ गया कि हाँ, हम सूर्यवंशी हैं। क्योंकि हम ही तो पहले सूर्यवंशी हैं ना। तो वास्तव में ऐसी बात नहीं है। वो जो स्थूल सूर्य की बात है। ये सूरज, ये चांद, ये सितारे, ये पृथ्वी, ये सागर, ये पहाड़, ये नदियां, ये पोखरे, तालाब, ये तो सब जड़ हैं। हँ? जड़ में कोई चैतन्य आत्मा होती है क्या? नहीं। हाँ, इस सृष्टि रूपी रंगमंच के चैतन्य आत्मा रूपी सितारे ज़रूर हैं। जो भी मनुष्य मात्र हैं ना उनमें वो चैतन्य आत्मा जरूर काम करती है। और वो चैतन्य आत्मा की रोशनी आँखों में से निकलती है। जब तक वो ज्योति आत्मा की मनुष्य में है तब तक वो जीवित है, प्राणी है। माने प्राण वायु लेता है, छोड़ता है। और जब वो आत्मा निकल जाती है, तो प्राणवायु निकल जाती है। कहते हैं मर गया। जड़ शरीर रह गया।

तो बताया कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर ही कोई आत्माएं हैं जो नंबरवार इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाती हैं। कहाँ से आकर? हाँ, उसी, उसी लोक से आती हैं जहाँ से परमपिता परमात्मा सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर इस सृष्टि पर हैविन बनाने के लिए आता है। क्योंकि यही एक सृष्टि, पृथ्वी ऐसी है जहाँ जीव-जंतु और मनुष्य रहते हैं। बाकि ऐसे नहीं है कि और जो जड़ नक्षत्र हैं, ग्रह हैं, उपग्रह हैं, उनमें कोई जीव-जंतु रहते हैं। वो तो जड़ हैं ना। हँ? वास्तव में ये जीवन जो है वो कहाँ है? इस पृथ्वी पर है, धरणी पर है। तो धरणी भी कोई चैतन्य होगी ना। हं? वो धरणी जिसमें ये क्या कहते हैं, कौनसा अंश ज्यादा है? मिट्टी। है ना। तो कहेंगे कि मिट्टी में, धरणी में, वो मिट्टी का अंश उठा लो मुट्ठी में तो क्या उसमें आकाश है या नहीं है? आकाश, वैक्यूम है उसमें। मिट्टी के अंदर वैक्यूम भी है कुछ न कुछ। जल है या नहीं है? जल भी है। कुछ न कुछ नमी जरूर रहती है। और आग? अग्नि भी है। हवा? हवा भी है। तो वो पांचों जड़ तत्व जो हैं वो पृथ्वी में और पृथ्वी की जो मिट्टी है उसमें मौजूद रहते हैं कण-कण में। तो कहने का मतलब है कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर भी, हँ, कोई पृथ्वी का पार्ट बजाने वाली आत्मा भी होगी या चैतन्य कि नहीं होगी? हँ? क्योंकि धरती के सितारे हैं ये। धरती का चन्द्रमा है। कोई धरती का सूरज भी होगा। और धरती का बड़े ते बड़ा पहाड़ भी होगा।

तो ऋषियों-मुनियों की बुद्धि में ये बात नहीं आई कि जो हमने सूर्य की इतनी महिमा की है वेदों में क्योंकि पुराने ते पुराने तो वेद ही हुए ना। तो वो सूर्य कोई हमारी तरह चैतन्य होगा। हँ? उन्होंने समझा वो ही सूर्य होगा जो चैतन्य बनके आता होगा। तो ये तो बात पक्की हो गई कि ये ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी, सितारे और ये चांद, ये सब जो रोशनी ले रहे हैं, किससे ले रहे हैं? हँ? वो जो जड़ रोशनी है किससे ले रहे हैं? सूर्य से ले रहे हैं ना। तो इस सृष्टि पर भी जो ज्ञान की रोशनी देने वाला कोई जरूर चैतन्य मनुष्य होगा। क्या? जिस चैतन्य मनुष्य में वो सुप्रीम सोल जो ओरिजिनल सूर्य है; क्या? सूर्य का बच्चा क्या होगा? हँ? सूर्य का बच्चा सूर्य जैसा ही तो होगा ना। फिर उसका बच्चा जो होगा वो थोड़ा कम होगा। कहने का मतलब ये है कि वो उँच ते ऊँच आत्मा जो है, सुप्रीम सोल हैविनली गॉड फादर इस सृष्टि पर आता है तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर उस आत्मा रूपी सितारे को पकड़ता है जिसके आसपास सारे सितारे, ग्रह, नक्षत्र घूमते हैं। बताओ कौनसा सितारा है? हँ? नहीं मालूम? ध्रुव तारा। हाँ।

Today’s night class is dated 03.10.1967. In order to become multimillionaire (padampati) birth by birth, we are making purusharth for future. So, we are making purusharth on Shrimat, aren’t we? Hm? What is meant by Shrimat? We are making purusharth on the directions of the righteous one (shreshth). Who will be called the righteous one in this world? Are we following the directions of the righteous one or are we following the directions of the most righteous one? Hm? Whose directions are we following? It is because there is nobody righteous in this world at all. Someone will be called righteous when one does not remember the unrighteous organs in the mind, words and actions. When will you be called [righteous]? Hm? Yes. So, it was told that when you develop soul conscious stage, then it will be said that someone has developed a righteous opinion, righteous intellect. So, will you develop soul conscious stage soon for 24 hours? Hm? Hm? Will you develop? Hm? If you get the knowledge that we souls are points of light, we are points of light souls in the middle of the forehead, then does one become constant in the soul conscious stage just by knowing? Hm? It is because one has been habituated since 63 births. First one remembers his own body, then the relatives. One remembers the relatives with whom we have established connection of the organs.
(Baba said to someone – Speak whenever you are asked to.) So, will you be able to get rid of the habit of 63 births immediately? You have been habituated to remembering the body.

So, it was told that you have to practice. Hm? And what should we do to practice this? Hm? When we pursue work and occupation, then the intellect goes into the work and occupation. Hm? Are you feeling happy? Hm? And when you sit and remember, then Baba says that you should not sit and remember. Hm? You should practice remembering while working, while walking and moving. If you do want to remember while sitting, then you don’t have any work or occupation at Amrit Vela (pre-dawn period). And at that time the atmosphere is also good. So, while sitting at Amrit Vela, that too it is not as if Amrit Vela is after 12 midnight or after 1 PM because as per the foreigners, the western countries, at what time does the Sun rise there? Hm? When it is 12 midnight here, and there? Hm? The sun rises in America. So, for them, their intellect is sharp. With their sharp intellect they have decided firmly as to when does the Sun rise? Does it start rising in the morning? No. The Sun starts rising from 12 O’clock in the night itself. And then does the Sun rise upwards from 12 midnight to 6 AM or does it remain across the Earth only? Yes. It starts rising upwards. So, it will be said that it is Amrit Vela.

So, it was told that at the most, if someone tries hard, practices, then the atmosphere is good after 12, 1 PM because the ghost and devilish souls which leave their bodies due to untimely death keep on wandering. And they are mostly vicious souls only. So, they commit more sins; hm; they are mostly lustful, wrathful, greedy. So, in order to fulfill their evil desires (havish), those souls; their eveil desires of the past births have not been fulfilled and they left their bodies with those evil desires, then in order to fulfill those evil desires they keep on entering in someone or the other. They enter only in those with whom they have karmic accounts of past births. So, then the ones in whom they enter, they spoil their intellects. So, it was told that after 12, 1 PM, the pressure of those souls is slightly lesser. So, at that time it will be called Amrit Vela. It is called Amrit Vela before sunrise only.

So, this is an Amrit Vela in a limited sense. Hm? There must be an unlimited Amrit Vela also, will there not be? The unlimited Amrit Vela is said to be at a time when that Father of incorporeal souls, the incorporeal point of light Shiv, who never enters into the cycle of birth and death and is therefore forever Trikaaldarshi (knower of past present and future). His knowledge never exhausts. So, does He come to this world only when the unlimited darkness increases in this world or when the limited darkness increases? Hm? He comes to this world when this world is covered by the darkness of ignorance. So, He will be called the most righteous one, will He not be? Hm? Well, that most righteous one comes and reveals the method of making, enabling purusharth, doesn’t He? That is called the knowledge of the Gita. Hm? His is a song of knowledge. Well, does everyone understand the songs of all the poets deeply? Yes.

So, it was told that when I come, then just as ghosts and devils have a permanent numberwise body of their own, so, similarly that Supreme Soul Father also has a permanent body of His own on this world stage in which He enters in a permanent manner. And He has others apart from that one also. This is why Brahma has been shown to have five heads in the scriptures. Hm? Four heads are in four directions. And one head is upwards. But the head that is upwards, does the Supreme Soul Shiv recognize him? Hm? He definitely recognizes him. Upwards itself means that there is a soul on this world stage which, until the arrival of the Supreme Soul Father, yes, his intellect remains focused in that one alone to some extent or the other when compared to others, for whom the founders of religions also understand that he is the resident of the Supreme Abode, hm, resident of Arsh, resident of the Paramdhaam, resident of the abode of souls; so, in which direction did Guru Nanak make a gesture? He pointed upwards. So, He comes to this world. It means that He comes down from above, i.e. takes incarnation (avatar). Hm. So, He does not have a body of His own at all. Hm? If He had a body of His own, then He would have to pass through the cycle of birth and death. So then how will He come to this world and narrate the song, the song of knowledge? Hm? So, He has to take the support of the numberwise bodies, will He not have to?

So, it has been sung in the scriptures, pictures have been made, hm, the artists had prepared the pictures in the caves of Ajanta, Ellora, Elephanta, etc. initially. And the interpretation of those pictures was made by the writers of the scriptures, the sages and saints. So, they had visions. On the basis of those visions they came to know that the body like chariots in whom especially that Supreme Soul Father Shiv enters are five. So, they brought together five heads of Brahma. Well, it did not strike their intellect that does there exist any man with five heads? Hm? It is possible that they saw a Brahma with five heads in the visions. So, they made him to have five heads. Then it struck their intellect that all the five cannot be true; it occurred in the intellect of the sages and saints that they will be numberwise true, will they not be? So, which head will be the truest one? So, they did come to know that the one whose face is upwards will definitely be true. Is it not? Yes.

Someone is towards the East. The Sun rises from the East, doesn’t it? So, from where does the Sun of Knowledge also rise? He must be coming from the Eastern countries, mustn’t he be? Yes. For example, those Japanese are there, aren’t they? So, what do they think? The Japanese people firmly believe that we belong to the Sun dynasty. Why? It is because when the physical Sun rises, so, the rays first of all come from the north East, don’t they? Where does the Sun throw its rays from there first of all? Hm? Yes, the countries which are said to be Eastern countries, which includes the eastern part of Asia, isn’t it? So, the first and foremost ray, hm, on whom, on which country? Yes, it falls on the residents of the country Japan. So, whatever was written in the scriptures, in the scriptures of India and the foreign writers of scriptures also came here and studied those scriptures, then it sat in their intellect also that yes, the physical sun may be the form of God. So, it sat in the intellect of the Japanese also that yes, we belong to the Sun dynasty. It is because we are the first Suryavanshis, aren’t we? So, actually, it is not so. That is about the physical sun. This Sun, this Moon, these stars, this Earth, this ocean, these mountains, these rivers, these ponds, these lakes, all these are non-living. Hm? Is there a living soul in the non-living thing? No. Yes, there are definitely living soul-like stars of this world stage. That living soul definitely works in all the human beings. And the light of that living soul emerges from the eyes. Until that light of the soul is in a human being he is alive, he is a living being (praani). It means that he inhales and exhales the life-giving air (praan vaayu). And when that soul departs, then the life-giving air departs. People say that he has died. The non-living body remains.

So, it was told that there are some souls on this world stage itself which play a numberwise part on this world stage. Coming from where? Yes, they come from the same, the same abode, from where the Supreme Father, Parmatma, Supreme Soul, Heavenly God Father comes to establish heaven in this world. It is because this is the only world, Earth where living beings and human beings live. It is not as if living beings live in the other non-living constellations, planets, satellites. They are non-living, aren’t they? Hm? Actually where does this life exist? It exists on this Earth, on this land. So, there must be a living land also. Hm? That land which contains more trace of what? Soil. It contains, doesn’t it? So, it will be said that in the soil, in the Earth, if you pick up a part of that soil in your fist, then does it contain sky or not? It contains the sky, vacuum. There is vacuum also in the soil to some extent or the other. Is there water or not? There is water as well. There is humidity to some extent or the other. And fire? There is fire also. Air? There is air also. So, all those five non-living elements are in the Earth. And they exist in every particle of the soil of the Earth. So, it means that on this world stage, hm, will there be a living soul that plays the part of the Earth also or not? Hm? It is because these are the stars of the Earth. There is a Moon of the Earth. There must be a Sun of the Earth as well. And there must be a biggest mountain of the Earth as well.

So, it did not occur in the intellects of the sages and saints that the Sun whom we have praised so much in the Vedas because it is the Vedas alone which are the oldest aren’t they? So, that Sun must be someone living like us. Hm? They thought that the one who comes in living form must be the Sun. So, one thing is sure that from whom are these planets, satellites, constellations, Earth, stars and this Moon is obtaining light? Hm? From whom are they obtaining the non-living light? They are obtaining from the Sun, aren’t they? So, there must be a living human being in this world who gives the light of knowledge. What? In that living human being that Supreme Soul, who is the original Sun; what? What will be the Sun’s child? Hm? The Sun’s child will be like the Sun only, will he not be? Then his child will be a little lesser. It means that when the highest on high soul, the Supreme Soul, Heavenly God Father comes to this world, then He catches that soul like star on this world stage around whom all the stars, planets, constellations revolve. Tell, which star is it? Hm? Don’t you know? Pole star (dhruv tara). Yes.

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