Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2788, दिनांक 11.02.2019
VCD 2788, dated 11.02.2019
रात्रि क्लास 11.11.1967
Night Class dated 11.11.1967
VCD-2788-extracts-Bilingual

समय- 00.01-15.38
Time- 00.01-15.38

रात्रि क्लास चल रहा था – 11.11.1967. पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी ऊँचे ते ऊँचे बाप की कि इनसे ऊँचा तो कोई और है ही नहीं। तो पूछा – तो फिर क्या समझते हो? बताओ। किसी ने कहा – पुरुषार्थ करेंगे। पुरुषार्थ की बात नहीं। पुरुषार्थ का अर्थ कोई प्रतिज्ञा नहीं कहा जाता है। नहीं। यहाँ तो यानि बाप कहते हैं ना। यहाँ तो पवित्रता के ऊपर सारा मदार है। क्या? विश्व में विजय करनी है तो फिर मदार किस बात के ऊपर है? पवित्रता के ऊपर सारा मदार है। कैसी पवित्रता? एक बाप दूसरा न कोई। फिर उसमें नंबरवार हैं। कोई थोड़े समय के लिए एक बाप दूसरा न कोई; कोई लंबे समय के लिए एक बाप दूसरा न कोई। बाकि है तो सारी पवित्रता की बात। दुनिया की सबसे बड़ी पावर कौनसी है? दुनिया के सारे काम, अच्छे से अच्छे हों, पावरफुल से पावरफुल हों, कमजोर से कमजोर हों, खराब से खराब हों, कौनसी ताकत के आधार पर संपन्न होते हैं? हँ? पवित्रता के आधार पर।

देखो – कहते हैं रावण बड़ा राक्षस था। हँ? तो कौनसी पावर से इतना बड़ा बना? हँ? बताओ। हँ? कौनसी पावर से बड़ा बना?
(किसी ने कुछ कहा।) स्त्री की पावर से? अच्छा? इसलिए स्त्री को उठा लाया? हँ? मंदोदरी को, जिसकी बुद्धि मंद है, उसको उठा लाया? उससे पावर भरी जाती है? नहीं। उसको उठा लाया तो पावर गई। नहीं। जब उसने तपस्या की थी ना। हाँ। लंबे समय की आत्मिक स्थिति की तपस्या की तो उसे वो पावर मिल गई बाप से, आत्माओं के बाप से। क्या? प्योरिटी। जब तपस्या की तो एक की की या 2-4 की इकट्ठी की? हँ? एक। सारा मदार। शास्त्रकारों ने तो लिख दिया है ब्रह्मा का नाम। अब ब्रह्मा नामधारी तो अनेक हैं। वास्तव में ब्रह्मा की तपस्या की या एक ब्रह्मा की तपस्या की? हँ? परमब्रह्म की बात है। हाँ, तो उसको कहो एक बाप दूसरा न कोई क्योंकि प्रैक्टिकल रूप तो एक ही है ना। परमब्रह्म कहो, परमपिता कहो, तो बुलाते ही हैं। जिसको बुलाते हैं वो एक नाम से बुलाते हैं या दो नाम से बुलाते हैं? पतित-पावन आओ। पतित भी आओ और पावन भी आओ। पहले कौन आओ? हँ? पहले बुद्धि में कौन आता है? पहले बुद्धि में पावन आता है या पतित आता है? हाँ, पतित, तो उसका नाम पहले रख दिया, पतित। पावन बाद में प्रत्यक्ष होता है। आयकरके पराई दुनिया में, हँ, पराई किसकी? हँ? पर की। हँ? अपनी नहीं। स्व की नहीं। पराई माने पराशक्ति या अपराशक्ति? हँ? पराई माना? हँ? क्या लिखा? (किसी ने कुछ कहा।) पराई माने अपराशक्ति? हँ? हाँ, बात तो सही है। अ माने नहीं। और परा माने परे ते परे। जो परे ते परे नहीं है थोड़ी नीची है। तो पराई दुनिया में आयकरके और फिर पराए शरीर में। शरीर भी अपना नहीं। किसका पराया शरीर? हँ? प्रकृति को क्या कहेंगे? ये जो शरीर बनता है वो अपराशक्ति से बनता है कि पराशक्ति से बनता है? अपरा माने नीची जड़त्वमयी बुद्धि वाली।

तो बोला – पराई दुनिया में पराये शरीर में आओ। फिर भी देखो तो बुलाते कहाँ हैं? हँ? कहाँ बुलाते हैं? स्वर्ग में बुलाते हैं, अच्छी दुनिया में बुलाते हैं या नरक में बुलाते हैं? कहाँ बुलाते हैं? नरक में बुलाते हैं। हँ? अरे, कितना पावन! और उनको पतित दुनिया में बुलाते हैं कि बाबा इस पतित दुनिया में आओ। कैसी-कैसी पतित? हँ? कैसी-कैसी पतित? जानवरों से भी बदतर काम करने वाली। ऐसी पतित दुनिया में आओ। और फिर बहुत जनम के अंत के भी अंत के जनम में आओ। बहुत जनम कितने? 84 जनम। हँ? वानप्रस्थ अवस्था हुई तो बहुत जनम हो गए ना पूरे। हाँ। उसका भी अंत। तो 84 जनम में जो वानप्रस्थ अवस्था के बाद की बात हुई वो भी अंत। हँ? और उस अंत के भी अंत में। ये क्या हुआ? हँ? 60 साल के बाद जो हुआ वो अंत हुआ। हँ? और उसका भी अंत। कुछ समझ में नहीं आया।
(किसी ने कुछ कहा।) सौ साल? अरे, नहीं। जब सूक्षम शरीर धारण करता है तो क्या कहेंगे? सूक्षम स्टेज धारण करे तो सूक्षम स्टेज दो प्रकार की है। एक तो शरीर से सूक्षम। और दूसरा? आत्मा से भी? हाँ, आत्मा जो है देह में न फंसे।

तो अंत के भी अंत में आओ। बिल्कुल ही पतित। बिल्कुल ही पतित। कैसे? हँ? बिल्कुल माने कितना पतित? अरे? किसकी बात हो रही है बिल्कुल पतित? हँ? कल तो बताया मैं पतितन को राजा। हाँ, तो आदम। आदम का कनेक्शन कितनी मनुष्यात्माओं से है? 500-700 करोड़ मनुष्यात्माओं से कनेक्शन है। सभी उसके बच्चे हुए ना। तो बच्चे कनेक्शन में आते हैं कि नहीं बाप के? आते हैं। तो जो पतित बच्चे हैं, ज्यादा पुरुषार्थी, ऊंचे पुरुषार्थी हैं कि नीचे पुरुषार्थी हैं? हँ? बच्चे तो नंबरवार नीचे ही हैं ना। तो बताया बिल्कुल पतित। पतित से पतित के संग में आने वाली आत्मा जो आदम है उसको फिर ऐसा पावन; कैसी तरफ इशारा किया? ऐसा माने कैसा? लक्ष्मी-नारायण की तरफ, नारायण की तरफ इशारा किया ऐसा पावन बनाता है।

देखते हैं कि नीचे इनके कृष्ण है। हँ? ऊपर नारायण; क्या अंतर है? वो डायरेक्ट नर से नारायण। और नीचे? डायरेक्ट नहीं है। पहले प्रिंस कोई से पैदा हुआ और फिर उसके बाद, नीचे दिखाया गया है। कैसा नीचा? क्या नीचा काम करता? ऊपरवाला तो एक-दूसरे को देखता भी नहीं। ऊपर का जो लक्ष्मी-नारायण है वो नारायण लक्ष्मी को देखता है? लक्ष्मी नारायण को देखती है? आँखों से देखती है? देखेगी तो क्या हो जाएगा? क्या पाप हो जाएगा? हाँ, देखेगी तो व्यभिचारी बनी कि अव्यभिचारी बनी? क्या बनी? हँ? क्या बनी? हाँ, देखना तो किसको है? देखना है एक बाप को, आत्माओं के बाप को, जो आत्माओं का बाप कहता है कि भले संसार में कहते हैं देव-देव-महादेव, लेकिन वो भी पार्ट मैं बजाता हूँ। उसको देखती है। हाँ। तो देखो अंतर हुआ ना। नीचे जो कृष्ण खड़े हैं, राधा खड़ी है। और ऊपर जो लक्ष्मी-नारायण खड़े हैं, वो खड़े हैं तो उन्होंने, उनके करम में कुछ अंतर हुआ, पता चला? नहीं पता चला? हाँ, पता चला। वो नीचे वाले दूसरे को याद कर रहे हैं। उससे तो नीचा ही है ना। जो ऊँच ते ऊँच पार्टधारी आत्मा है उससे नीचा है। और उसी से जन्म लेती है फिर। तो अंतर हुआ ना। क्या अंतर हुआ? वो आँखें जो हैं इन्द्रियों से सुख लेती हैं राधा-कृष्ण की। और वो ऊपर जो खड़े हैं वो इन्द्रियों का भी सुख नहीं लेते।

तो जब बाबा बहुत क्लीयर करके बैठकरके समझाते हैं; देखो लक्ष्मी-नारायण के चित्र में बहुत क्लीयर करके समझाया ना कि सृष्टि की जो पहली सीढ़ी है ऊँच ते ऊँच और फिर उसके बाद जो दूसरी सीढ़ी है नीच वाली वो नीची कैसे बनी? हँ? हाँ, ऊपरवाली इन्द्रियों से भी परे की स्टेज का पुरुषार्थ करती है। और नीचे वाली? हाँ, इन्द्रियों से पुरुषार्थ करती है। तो सुख भोगती है इन्द्रियों का। तो फिर नीची हुई ना। इन्द्रियां तो नीचे ही ले जाती हैं। तो ऐसा श्रेष्ठ बनने के लिए हिम्मत भी तो चाहिए कि जो भी इन्द्रियां हैं शरीर में उनमें सबसे ऊँची इन्द्रिय कौनसी मानी जाती है शरीर में? आँखें। लेकिन और उसके बाद तो नंबरवार हैं ना। हँ? उसके नीचे कान हैं, फिर नाक है, फिर मुख है, फिर स्पर्श इन्द्रिय है, हाँ, फिर उसके बाद कर्मेन्द्रियां हैं, भ्रष्ट इन्द्रियां जिन्हें कहा जाता है। तो उन सबका संग छोड़करके एक का संग करें जो इन्द्रियातीत है। इन्द्रियों से सदा परे का पार्ट बजाने वाला।

तो ऐसा महावीरपना, महावीरनीपना चाहिए ना। महावीर और महावीरनी दोनों खड़े हैं ना। कौन? आदि नारायण और आदि लक्ष्मी। कायर क्यों बने? हँ? सन्यासियों को, जो दुनिया में सन्यासी हैं, वो भी तो त्याग करते हैं ना। लेकिन वो कायर हैं या क्या कहेंगे कायर नहीं है? वीर हैं? या महावीर हैं? क्या कहेंगे? अरे, वो तो कायर हो गए ना। क्या कायर हो गए? कि साथ ही छोड़ दिया कर्मेन्द्रियों से, ज्ञानेन्द्रियों से कर्म करना ही छोड़ दिया। समाधि में बैठ जाते हैं। एकदम निल में चले जाते हैं। ना हम ज्ञानेन्द्रियों से सहयोग लेंगे, न कर्मेन्द्रियों से सहयोग लेंगे। बस निल में चले जाते हैं। चले जाते हैं कि नहीं? हाँ। तो ये कायरपना हुआ ना। क्या? कि हम कुश्ती भी लड़े नहीं और हम बड़े भारी पहलवान दुनिया में साबित हो जाएं। हँ? जंगल में भाग जाएं। अरे? कोई कहे, कोई जेल में 10-20 साल निकला हुआ कोई कैदी कहे - हमने बीस साल ब्रह्मचर्य का पालन किया। तो पालन किया या मजबूरी? क्या कहेंगे? मजबूरी हुई ना। हाँ, मजबूरी हुई। ये तो कायरता की बात हो गई ना।

तो देखो, कायर क्यों बने? जबकि ये खटाऊ खुट्ट है। ये क्या हुआ? हँ? अरे, ये बड़े ते बड़ी कमाई है। हं? खटाऊपुट्ट माना? ये तो दिल खट्टा कर देने की सन्यासियों के लिए बात हो गई। अभी तक जन्म-जन्मान्तर जिसे सन्यासी ये कहते रहे; क्या? पक्का धारणा बन गई कि आग और कपूस इकट्ठे रहकरके, हँ, साथ रह नहीं सकते। आग जरूर लगेगी काम विकार की। तो अब उनसे ये कहा जाए कि नहीं, साथ भी रहो और मन-बुद्धि से अतीत भी हो जाओ, मन-बुद्धि से याद न आए संकल्पों में। तो ये दिल खट्टा करने वाली बात हो गई कि नहीं उनके लिए? नहीं हो गई? हो गई। तो सबसे जबरदस्त कमाई तो इसी में है। क्या? घर गृहस्थ व्यवहार में इन्द्रियों से करम भी करते रहो और मन-बुद्धि एक बाप में लगी रहे। क्या? इन्द्रियों के सुख में बुद्धि बिल्कुल न जाए।

A night class dated 11.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the first page was about the highest on high Father that there is none higher than Him. So, it was asked – So, then what do you think? Speak up. Someone said – We will make purusharth. It is not about purusharth. The meaning of purusharth is not said to be pledge (pratigya). No. Here the Father says, doesn’t He? Here everything is dependent upon purity. What? If you want to conquer the world, then what is it dependent on? Everything is dependent on purity. What kind of purity? One Father and none else. Then there are numberwise in it. Some follow ‘one Father and none else’ for some time; some follow ‘one Father and none else’ for a longer period. But the entire topic is about purity. Which is the biggest power in the world? On the basis of which power are all the tasks of the world, be it the best ones, be it the most powerful ones, be it the weakest ones, be it the worst ones, accomplished? Hm? On the basis of purity.

Look, people say that Ravan was a big demon. Hm? So, with which power did he become so big? Hm? Speak up. Hm? With which power did he become big?
(Someone said something.) Through the power of wife? Achcha? Is this why he picked up a wife? Hm? Did he pick up and bring Mandodari whose intellect is dull (mand)? Does one fill power through her? No. He lost the power when he brought her. No. When he had performed penance (tapasya), hadn’t he? Yes. He performed a penance of long term soul conscious stage, so he got that power from the Father, from the Father of souls. What? Purity. When he performed tapasya, did he do it for one or for 2-4 together? One. The entire basis. The writers of the scriptures wrote the name of Brahma. Well, there are many with the name Brahma. Actually, did he do the tapasya of Brahma or did he do tapasya of one Brahma? Hm? It is about Parambrahm. Yes, so, call him ‘one Father and none else’ because there is only one form in practical, isn’t it? Call him Parambrahm, call him Parampita (Supreme Father), he is definitely called. The one who is called, is he called by one name or by two names? O Patit-Pavaan (purifier of the sinful ones) come. Patit (sinful) also come and Paavan (pure) also come. Who should come first? Hm? Who comes to the intellect first? Does the pure one come to the intellect first or does the sinful one come? Yes, the sinful one; so, his name was placed first, patit. The pure one is revealed later on. After coming to the alien world; hm, whose alien (paraai)? Hm? Of alien (par). Not one’s own. Not of self (swa). Paraai means Paraashakti or Aparashakti? Hm? What is meant by Paraai? Hm? What did you write? (Someone said something.) Does Paraai means Aparashakti? Hm? Yes, the topic is correct. ‘A’ means no. And paraa means the farthest one. The one who is not the farthest one, is a little lower. So, after coming to the alien world and then in an alien body. The body is also not one’s own. Whose alien body? Hm? What will the nature (prakriti) be called? This body that is formed, is it formed through Aparashakti or through Paraashakti? Apara means the one with a lower, inert intellect.

So, it was said – Come in an alien world and alien body. Yet, look, where do you call? Hm? Where do you call? Do you call in heaven, do you call in a good world or do you call in hell? Where do you call? You call in hell. Hm? Arey, He is so pure! And you call Him in the sinful world that Baba come in this sinful world. How sinful? Hm? How sinful? The one which performs tasks worst than animals. Come in such sinful world. And then come in the last one of the last births of many births. How many are ‘many births’? 84 births. Hm? When you achieved the vaanprasth stage, then many births were completed, weren’t they? Yes. End of even that. So, the topic of post-vaanprasth stage in 84 births; end of even that. Hm? And in the end of even that end. What is this? Hm? Whatever happened after 60 years is the end. Hm? And even its end. You did not understand anything.
(Someone said something.) Hundred years? Arey, no. What will you say when he assumes a subtle body? When he assumes a subtle stage, then the subtle stage is also of two kinds. One is subtle through the body. And the other? Through the soul too? Yes, the soul should not be entangled in the body.

So, come in the end of even the end. Completely sinful. Completely sinful. How? Hm? Complete refers to how sinful? Arey? Whose topic is being discussed as completely sinful? Hm? It was mentioned just yesterday that I am the king of sinful ones. Yes, so Aadam. Aadam’s connection is with how many human souls? His connection is with 500-700 crore human souls. All are his children, aren’t they? So, do the children come in connection with the Father or not? They do come. So, are the sinful children more purusharthi, higher purusharthi or lower purusharthis? Hm? Children are numberwise lower only, aren’t they? So, it was told completely sinful. Aadam, the soul which comes in the company of the most sinful ones is then made such pure; towards whom was a gesture made? ‘Such’ refers to whom? A gesture was made towards Lakshmi-Narayan, towards Narayan that He makes him such pure.

You observe that below them is Krishna. Hm? Above is Narayan; what is the difference? He becomes direct Narayan from nar (man). And below? He is not direct. First he was born as a prince to someone and after that; he has been shown below. How lowly? What is the lowly task that he performs? The above one does not even see each other. The Lakshmi and Narayan above; does that Narayan look at Lakshmi? Does Lakshmi look at Narayan? Does she see through her eyes? What will happen if she sees? What is the sin that will be committed? Yes, if she sees, then did she become adulterous or non-adulterous? What did she become? Hm? What did she become? Yes, whom should we see? We have to see one Father, the Father of souls; that Father of souls says that although people say in the world ‘Dev-Dev-Mahadev’ but it is Me who plays that part as well. She sees Him. Yes. So, look, there is a difference, isn’t it? Krishna who is standing below, Radha is standing. And the Lakshmi and Narayan who are standing above; they are standing above; so, is there any difference in their actions? Could you find out? Couldn’t you find out? Yes, you found out. Those below ones are remembering someone else. He is lower than him, isn’t he? He is lower than the highest on high actor. And then it gets birth from him only. So, there is a difference, isn’t it? What is the difference? Radha and Krishna derive pleasure through the organs of eyes. And those who are standing above do not derive pleasure even from the organs.

So, when Baba sits and explains in a very clear manner; look, it was explained in a very clear way in the picture of Lakshmi-Narayan that the first highest on high step of the world and then the second lower step after that, how did it become lower? Hm? Yes, the above one makes a purusharth of a stage that is beyond even the organs. And the lower one? Yes, it makes purusharth through organs. So, it experiences pleasure of the organs. So, then it is lower, isn’t it? The organs take you down only. So, one also requires courage to become such righteous that among all the organs in the body which organ is considered to be the highest organ in the body? The eyes. But others after that are numberwise, aren’t they? Hm? Below them are the ears, then is the nose, then is the mouth, then the organ of touch, yes, after that there are the organs of action, which are called the unrighteous organs. So, by leaving the company of all of them, we should keep the company of one, who is beyond the organs (indriyaateet). The one who always plays a part of being beyond the organs.

So, you should have such bravery (in both genders), shouldn’t you? Mahaveer (the bravest man) and Mahaveerni (the bravest woman), both are standing, aren’t they? Who? Aadi Narayan and Aadi Lakshmi. Why should you become coward? Hm? The sanyasis of the world also renounce, don’t they? But are they cowards or would you not call them cowards? Are they brave? Or are they the bravest ones (Mahaveer)? What would you say? Arey, they are cowards, aren’t they? How are they cowards? They left the company through the organs of action; they stopped performing actions through the sense organs. They sit in Samadhi. They go into complete nil. Neither will we take help through the sense organs, nor will we take help through the organs of action. They just go into nil. Do they go or not? Yes. So, this is cowardice, isn’t it? What? That we shouldn’t even wrestle and we should get proved as a big wrestler in the world. Hm? We should run away to the jungle. Arey? Someone may say; a prisoner who has come out of the jail after 10-20 years may say – I practiced celibacy for twenty years. So, did he practice it or was it his compulsion? What would you say? It is a compulsion, isn’t it? Yes, it is a compulsion. It is a topic of cowardice, isn’t it?

So, look, why should you become cowards? When this is a Khataau Khutt. What is this? Hm? Arey, this is a very huge income. Hm? What is meant by Khataauputt? It is a topic that makes the hearts of the Sanyasis sour. For many births the Sanyasis continued to say; what? It had become their firm belief that fire and cotton cannot live together. The fire of lust will definitely start. So, well, if they are told that no, you should live together and become detached through mind and intellect, you should not get the thoughts [of each other] in the mind and intellect. So, is this a topic that makes their heart sour or not? Is it not? It is. So, the most vigorous income lies in this only. What? You should also continue to perform actions through the organs while living in the household and the mind and intellect should remain focused on one Father. What? The intellect should not at all be pulled towards the pleasure of the organs.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2789, दिनांक 12.02.2019
VCD 2789, dated 12.02.2019
रात्रि क्लास 11.11.1967
Night Class dated 11.11.1967
VCD-2789-extracts-Bilingual

समय- 00.01-18.40
Time- 00.01-18.40

रात्रि क्लास चल रहा था – 11 नवम्बर,1967. दूसरे पेज के अंत में 5-6 लाइन पहले बात चल रही थी – जो बच्चे यहाँ आए हैं, जरूर कुछ करके दिखलाने के लिए यहाँ आए हैं। और सच्ची कमाई तो इसको कहा जाता है 21 पीढ़ी। परन्तु बच्चे ये कोई कम से कम 50 पीढ़ी तो बहुत धनवान होकर रहते हैं। कोई लड़ाई-झगड़ा तो तब हो जबकि सूर्यवंशी के पीछे ये सब आवें। इस्लामी पहले आते हैं। अभी इस्लामी जब ये इस्लाम धर्म स्थापन करने के लिए आए, फिर उनको उस समय कोई प्रीसेप्टर नहीं कहा जाता है। जो भी और भी धरमपिताएं हैं, बुद्ध हैं, क्राइस्ट हैं, ये कोई भी प्रीसेप्टर्स नहीं हैं क्योंकि प्रीसेप्टर कहा जाता है सद्गुरु को जो सद्गति देवे। अब ये लोग तो आते ही हैं अपना धर्म स्थापन करने के लिए। उसके, उनके पीछे फिर सभी आत्माएं आती रहती हैं। खुद भी नीचे गिरते हैं जन्म-जन्मान्तर फिर कोई को सद्गति कैसे देंगे? सद्गति नहीं देते हैं। तो ये गुरु लोग नहीं हैं। ये सिर्फ धर्म स्थापन करने के लिए आते हैं। अपनी धारणाएं हैं इनकी स्पेशल। हाँ, नंबरवार प्योर तो हैं जरूर। परन्तु आते ही हैं धर्म स्थापन करने के लिए जो पीछे सभी आते जावें यहाँ। बाकि; 11.11.1967 की रात्रि क्लास का तीसरा पेज; बाकि सर्व की सद्गति दाता तो एक ही है। ये इतने ढ़ेर धरमपिताएं कैसे हो सकते? और जब सब तमोप्रधान बन जाते हैं, हर धरम के धरमपिताएं भी तमोप्रधान बन जाते हैं, उनके फालोअर्स भी, तब बाप आते हैं। तो वो कोई धर्मस्थापक गुरु नहीं हैं। नहीं। उनको प्रीसेप्टर्स नहीं कहा जाता है।

और सुप्रीम सोल बाप का पैगाम देने वाले पैगम्बर भी नहीं कहा जाता। क्योंकि पैगम्बर या मैसेन्जर उनको कहा जाता है, जो कोई का कुछ पैगाम लाकरके देवे। तो ये पैगम्बर या मैसेन्जर तो तुम बच्चे हो जो सबको पैगाम, सबको मैसेज भेज देते हो कि उस ऊँच ते ऊँच बाप को याद करो तो पावन बन जावेंगे। घर-घर में ये पैगाम तुमको देना है। और ये बात भागवत में भी लिखा है कि एक को भूल गए तो उन्होंने डुरोपा दिया भगवान को। ऐसे एक शास्त्र में लिखा है कि मुझे तो पैगाम ही नहीं मिला तो मैं कैसे समझूं कि आप आए हुए हो? ऐसे एक शास्त्र में है। तो इसलिए बाप कहते हैं तुम बच्चों को कि बाप का पैगाम देने वाले तो तुम बच्चे हो अभी सभी। जो घर-घर में, दर-दर में; दर दरवाजे को कहा जाता है ना। ये कहते हो अपन को आत्मा समझो। और अपन को आत्मा समझ बाप को याद करो। देहभान में रहेंगे तो देह के संबंधी याद आएंगे। बाप याद आएगा नहीं। तो आत्मा समझेंगी। अब ये है ही बाप का पैगाम। यही मैसिज है पहली-पहली कि अपन को बच्चे आत्मा समझो और मनमनाभव। और मेरे मन में समा जाओ। अब बताया कि मन तो मनुष्यों को होता है। सुप्रीम सोल बाप को तो चंचल मन नहीं होता है ना। तो जरूर कोई पावरफुल मन में प्रवेश करते होंगे। कहा ही जाता है कि मनुष्य सृष्टि का बीज आदम, एडम।

तो वो तो मनमनाभव संस्कृत में है। यानि देह के सभी धर्मों को छोड़ अपन को आत्मा समझ तुम जो नंगे आए हो, आत्मा ज्योतिबिन्दु बनके आए थे ना। देह तो नहीं थी। तो पहले प्योर थे। तो देह में आकरके फिर इम्प्योर बने हो। क्योंकि आत्मा तो अविनाशी है। और देह विनाशी है। तो विनाशी चीज़ इम्प्योर हुई ना। अभी प्योर बनने के लिए तुमको मुझे याद करना पड़ेगा। हँ? ऐसे नहीं सिर्फ अपन को आत्मा समझेंगे ज्योतिबिन्दु आत्मा हूँ तो प्योर बन जावेंगे। क्योंकि आत्मा में अनेक जन्मों का संग के रंग का खाद पड़ा है ना। तो फिर उस बाप को याद करो। तो अपन को आत्मा समझ सुप्रीम सोल बाप को पहले-पहले याद करके पावन बनें। तो सहज हो जाएगा ना। साकार में निराकार याद आएगा ना। नहीं तो सिर्फ निराकार को याद करेंगे, तो वो तो गीता में भी लिखा हुआ है, हँ, अव्यक्ता हि गतिः दुःखम् देहवद्भिः अवाप्यते।। (गीता 12/5) जो देहधारी मनुष्य हैं उनको अव्यक्त को याद करने में बहुत दुख सहन करना पड़ता है। तो मुझे याद करेंगे तो सतोप्रधान बन जावेंगे। और सतोप्रधान बनेंगे तो सतोप्रधान दुनिया में चले जावेंगे। सतोप्रधान दुनिया है वो अव्वल नंबर जिसे कहेंगे विश्व का राज्य।

तो ये भी तो समझते हैं कि श्री कृष्ण उनको कहा जाता है विश्व का महाराजन। परन्तु उनको हम लोग थोड़ेही कोई 100 या श्री-श्री 108 कहते हैं? नहीं कहते हैं। तो बस वो अपना पद बनाय लेते हैं सन्यासी लोग। वास्तव में तो श्री कृष्ण नंबरवन प्रिंस है ना। प्रिंस तो बच्चा हुआ ना। बाप तो नहीं हुआ। समझा ना? हाँ, ये कहेंगे कि सिर्फ इनसे संवत शुरु होता है। वो भी ये नहीं कहा इससे। क्या कहा? इनसे। इनसे माने दो आत्माएं हैं। एक है 16 कला संपूर्ण सतयुगी कृष्ण। और एक है सुप्रीम सोल बाप जो आत्मा है। उस आत्मा का बड़ा बच्चा आत्मा। क्योंकि इस दुनिया की जो भी आत्माएं हैं इस दुनिया में जन्म-जन्म पार्ट बजाने वाली वो तो सब भोगी हैं। ये तो एक ही सुप्रीम सोल है जो अभोक्ता है। इसलिए जो अभोक्ता है वो तो विश्व का मालिक नहीं बनता। हाँ। तो आत्माओं के बीच में जो नंबरवार आत्माएं हैं, भोगी आत्माएं, वो विश्व की बादशाही भोगती हैं।

बाकि शास्त्रों की वो बातें नहीं हैं कि टोकरी पर ले गया रखकरके। अरे, ये तो बुद्धि रूपी टोकरी है। कौन ले गया? हँ? कौन ले गया सतयुग में 16 कला संपूर्ण कृष्ण को? ये तो बुद्धि रूपी टोकरी है जिसमें रखकरके, हँ, इस विषय वैतरणी नदी के पार नई दुनिया 16 कला संपूर्ण स्वर्ग में ले गया। ये दुनिया विषय सागर कही जाती, विषय सागर कहो, विषय वैतरणी नदी कहो। तो वो जो उन्होंने लिख दिया है कि काली नदी यमुना को क्रॉस किया, ये सब झूठी बातें लिखी हुई हैं। कृष्ण को डर किसका होगा? हँ? कृष्ण जो 16 कला संपूर्ण बनते हैं; 16 कला संपूर्ण तो भगवान ही आकर बनाते हैं नर को नारायण जैसा। तो उनको डर काहे का? किसका डर हो सकता है? कहते हैं कंस का डर, फलाने का डर। अरे, ये तो सब दंत कथाएं हैं। हँ? और कृष्ण वरी फिर आठवें जनम में कैसे पैदा हो सकता है? हँ? वहाँ नई दुनिया के आदि में ही आठ-आठ बच्चे पैदा होंगे क्या? हँ? तो ये सब झूठी बातें हैं। क्या वहाँ कोई ऐसे व्यभिचारिणी थोड़ेही होती होगी, हँ, जो आठ-आठ बच्चे पैदा करे? सतयुग में तो तुमको हुकुम हुआ है एक बच्चा योगबल से और एक बच्ची। बस। वहाँ दो कभी होते ही नहीं हैं। कहाँ? जो दुनिया 16 कला संपूर्ण मैं स्थापन करता हूँ वहाँ पहली पीढ़ी में, हँ, इतने बच्चे थोड़ेही हो सकते हैं? तो कृष्ण जो सतयुग में जन्म लिया वो आठवां गर्भ में कैसे होगा? हँ? ये समझ की बात है ना।

यहाँ बहुत बाबा समझाते हैं ये सभी बातें। क्यों? क्योंकि ये सारे इस ड्रामा के आदि, मध्य, अंत को जो ये जानते हैं ना ये बैठकरके सब समझाते हैं। समझाते हैं कि ये जो तुम सुनते आये हो ये है सब भक्तिमार्ग, दुर्गतिमार्ग है। झूठी बातें सुनते आए हो। तो उन झूठों की बात ही क्या सुनने की है? हँ? गॉड फादर इज़ ट्रुथ कहा जाता है ना। सत्यम शिवम् सुन्दरम् कहा जाता है ना। सत चित आनन्द भी कहते हैं। तो बाप अभी ये बताते हैं ये हियर नो ईविल। हँ? सी नो ईविल। इनको देखना भी नहीं है। टॉक नो ईविल। इनसे बातें भी नहीं करनी है। हं? नहीं तो बहुत से हैं बच्चे, जो वाद-विवाद करने लग पड़ते हैं। तो बाप कहते हैं भक्तिमार्ग की कोई बातें नहीं सुननी है। वो तो सभी गिरने की बातें हैं।

A night class dated 11th November, 1967 was being narrated. In the end of the second page, just before the last 5-6 lines, the topic being discussed was – Those children who have come here have come here certainly to do something and show. And this is called the true income for 21 generations. But some children remain very wealthy for at least 50 generations. Any fighting and quarrel will take place only when all these come after the Suryavanshis. The Islamic people come first. Well, when the Islamic people came to establish Islam religion, then they are not called preceptors at that time. All other founders of religions, Buddha, Christ are not preceptors because Sadguru is called preceptor who causes sadgati (true salvation). Well, these people come only to establish their religion. All the souls keep on coming behind him, behind them. They themselves fall birth by birth, then how will they be able to give sadgati to anyone? They do not give sadgati. So, these are not gurus. They come just to establish the religion. They have their special inculcations. Yes, they are definitely numberwise pure. But they come only to establish a religion so that all could keep on coming behind them here. As for the rest; third page o the night class dated 11.11.1967. the bestower of true salvation upon everyone is only one. How can these numerous founders of religions be that? And when everyone becomes tamopradhan (degraded), when the founders and even followers of every religion become tamopradhan, then the Father comes. So, those founders of religions are not gurus. No. They are not called preceptors.

And they are not called the messengers (paigambar) who give the message (paigaam) of the Supreme Soul Father because those who bring and give some message of someone will be called Paigambar or messenger. So, it is you children who are Paigambar or Messenger who give paigaam, give message to everyone that if you remember that highest on high Father, then you will become pure. You have to deliver this message to every home. And this topic has been mentioned in the Bhaagwat also that when they forgot someone, then he complained to God. It has been written in a scripture that I did not get a message at all, so, how would I understand that You have come? It has been mentioned like this in a scripture. So, this is why the Father tells you children that you all children are now the ones who give the message of the Father. In every home, at every door (dar); door is called ‘dar’, isn’t it? You say – Consider yourselves to be souls. And consider yourselves to be souls and remember the Father. If you remain in body consciousness, then the relatives of the body will come to your mind. The Father will not come to your mind. So, you will consider yourselves to be souls. Well, this is the message of the Father. This is the first and foremost message that children, consider yourselves to be souls and Manmanabhav. And merge into My mind. Well, it was told that the human beings have mind. The Supreme Soul Father does not have an inconstant mind, does He? So, definitely He must be entering in a powerful mind. It is said that the seed of the human world is Aadam, Adam.

So, that Manmanaabhav is in Sanskrit. It means – Leave all the religions of the body and consider yourself to be a soul; you have come naked, you had come as a soul, a point of light, hadn’t you? You did not have a body. So, earlier you were pure. So, after coming to the body you became impure. It is because the soul is imperishable. And the body is perishable. So, a perishable thing is impure, isn’t it? Now you will have to remember Me to become pure. Hm? It is not as if you will become pure if you just consider yourselves to be souls that I am a point of light soul. It is because the alloy (khaad) of colour of company of many births has been added to the soul, hasn’t it been? So, then remember that Father. So, you should consider yourselves to be souls and first of all remember the Supreme Soul Father and become pure. Then it will become easy, will it not? The incorporeal within the corporeal will come to your mind, will He not? Otherwise, if you remember just the incorporeal, then that has been written in the Gita also, hm, Avyakt hi gatih dukkham dehvaddhi avapyate. (Gita 12/5) The bodily human beings have to tolerate a lot of sorrows in remembering the unmanifest (Avyakt). So, if you remember Me, then you will become satopradhan. And if you become satopradhan, then you will go to the satopradhan world. The number one satopradhan world is that which is called kingdom of the world.

You also understand that Shri Krishna is called the world emperor. But do we people call him 100 or Shri-Shri 108? We don’t say. So, that is it; those Sanyasis assign themselves these posts. Actually Shri Krishna is the number one Prince, isn’t he? Prince is a child, isn’t he? He is not the Father. Did you understand? Yes, it will be said that just the Era begins with these. That too it was not said ‘with this’. What was said? With these. These means that there are two souls. One is the Golden Age Krishna perfect in 16 celestial degrees. And one is the Supreme Soul Father who is the soul. The eldest child soul of that soul. It is because all the souls of this world which play their parts birth by birth are all bhogis (pleasure-seekers). It is the Supreme Soul alone who is abhokta (non-pleasure seeker). This is why the one who is abhokta does not become the master of the world. Yes. So, among the souls, the numberwise souls, the bhogi souls enjoy the emperorship of the world.

But those topics of the scriptures are not true that he took him on a basket. Arey, it is about the intellect-like basket. Who took? Hm? Who took the Krishna perfect in 16 celestial degrees to the Golden Age? It is the intellect-like basket on which he was placed and taken across this river of vices to the new world, the heaven perfect in 16 celestial degrees. This world is called an ocean of vices, call it Vishay saagar, call it Vishay vaitarni river. So, the topics that they have written that he crossed the black river Yamuna are false topics that have been written. Whom will Krishna fear? Hm? Krishna who becomes perfect in 16 celestial degrees; God Himself comes and makes you perfect in 16 celestial degrees, makes a nar (man) like Narayan. So, whom will he fear? Whom can he fear? It is said that he feared Kansa, he feared such and such person. Arey, all these are mythological stories. Hm? And how can Krishna be born in the eighth birth (i.e. as an eighth child)? Hm? Will eight children be born there in the new world in the beginning itself? Hm? So, all these are false topics. Will there be any such adulterous woman who gives birth to eight children? In the Golden Age you are ordered to give birth to one son and one daughter through the power of Yoga. That is it. There are never two there at all. Where? The world, perfect in 16 celestial degrees, that I establish, in the first generation there, hm, how can there be so many children? So, how can Krishna, who was born in the Golden Age, be in the eighth womb? Hm? This is a topic to be understood, isn’t it?

Here Baba explains all these topics a lot. Why? It is because He knows the beginning, middle and end of this entire drama, doesn’t He? He sits and explains all this. He explains that all that you had been hearing is a path of Bhakti, a path of degradation. You have been listening to false topics. So, do you need to listen to the topics of those liars? Hm? It is said ‘God Father is truth’, isn’t He? He is called Satyam, Shivam, Sundaram, isn’t He? He is also called Sat, Chit, Anand. So, now the Father tells – Hear no evil. Hm? See no evil. You should not even see them. Talk no evil. You should not even talk to them. Hm? Otherwise there are many children who start arguing. So, the Father says – You should not listen to any topics of the path of Bhakti. All those are topics of downfall.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2790, दिनांक 13.02.2019
VCD 2790, dated 13.02.2019
प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning Class dated 12.11.1967
VCD-2790-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.00
Time- 00.01-17.00


आज का प्रातः क्लास है – 12 नवम्बर,1967. रविवार को रिकार्ड चला था – तुम्हें पाके हमने जहाँ पा लिया। जमीन तो जमीन, आसमां पा लिया। किसे पाके पा लिया? हँ? वो तथाकथित ब्रह्माकुमार-कुमारियां क्या कहेंगी किसे पाके पा लिया? (किसी ने कुछ कहा।) ऊपर को पा लिया? वो ऊपर पाने में आता है? कैसे पाने में आता है वो? हँ? वो कैसे प्राप्त किया जाता है? हाँ। कहेंगे ब्रह्मा बाबा दादा लेखराज ब्रह्मा के तन में सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु आया, हँ, तो हमने जाना। और सुप्रीम सोल ज्योति बिन्दु बाप कहते हैं ब्रह्मा के मुख से, दादा लेखराज के मुख से कि मेरे तो दो तरह के रथ हैं। मैं मुकर्रर रथ में मुकर्रर रूप से आता हूँ। और बाकि? बाकि वो मुकर्रर रथ के अलावा साक्षात् अगर देखना है तो थोड़े समय के लिए या ज्यादा समय के लिए नंबरवार और भी ब्रह्मा के मुखों में आता हूँ। क्योंकि शास्त्रों में यादगार तो बनी हुई है ना। क्या? ब्रह्मा को चार मुख दिखाते हैं, पांच मुख दिखाते हैं। चार मुख तो सदा ही दिखाते हैं। क्या मतलब हुआ? कि ब्रह्मा द्वारा जो सृष्टि रची जाती है, हँ, ये जो संसार रचा जाता है, चाहे स्वर्गीय सृष्टि हो या नरक की सृष्टि हो, जो ब्रह्मा द्वारा रची जाती है, उसमें जितने भी पार्टधारी आत्माएं हैं वो सब मूल रूप में ज्ञान किसका लेते हैं, कहाँ से लेते हैं? हँ? कहाँ से लेते हैं? अरे, लिखो भाई, बताओ किससे लेते हैं? प्रैक्टिकल में किससे लेते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, ब्रह्मा बाबा, दादा लेखराज से ही ज्ञान लेते हैं।

कोई कहे हम तो डायरेक्ट आए ज्ञान में, एडवांस में ही आ गए। हमने तो बेसिक नॉलेज ली ही नहीं। अरे, तो भी किसी से सुना तो होगा। और जिनसे प्रैक्टिकल में सुना, हँ, नहीं सुना? सुना। जिनसे प्रैक्टिकल में सुना उन्होंने कहाँ से सुना? ब्रह्मा बाबा से ही सुना होगा ना। नहीं तो उन्होंने जहाँ से सुना उनके गुरु ने कहाँ से सुना? तो भी कहां पहुँचेंगे? दादा लेखराज ब्रह्मा के मुख से सुना। तो सारी सृष्टि की मनुष्यात्माएं, चाहे मनुष्य सृष्टि की बीजरूप बाप की आत्मा ही क्यों न हो, हँ, ए टू ज़ेड जो भी आत्माएं, मनुष्यात्माएं हैं या देवात्माएं हैं, ऋषि-मुनि की आत्माएं हैं वो सब सुनती किससे हैं? ईश्वर का, साक्षात् ईश्वर का जो ज्ञान सुनती हैं वो दादा लेखराज ब्रह्मा से ही तो सुनती हैं। तो वो चार मुखों वाला दिखाय दिया है। चार मुख संगठित हैं। माना वो चार मुख अगर कहें कि ओम मंडली में थे या नहीं थे? वहाँ भी थे। और जब दादा लेखराज ब्रह्मा ने शरीर छोड़ा तो भी वहाँ थे। और शरीर छोड़ने के बाद सूक्षम शरीर धारण किया तो भी जो सूक्षम शरीरधारी आत्मा है, उसको भी तुम मात-पिता हम बालक तेरे, उस माता के जो वाक्य हैं दादा लेखराज वाली आत्मा के सूक्षम शरीर जो धारण किया ना गुल्ज़ार मोहिनी दादी के द्वारा। तो उनको मानेंगे या नहीं मानेंगे? मानेंगे। क्योंकि बाप तो इस सृष्टि पर आते ही हैं, क्या, किसके लिए? सारी मनुष्य सृष्टि की आत्माओं का कल्याण के लिए आते हैं या सिर्फ एक का कल्याण के लिए आते हैं? सारी मनुष्य सृष्टि की आत्माओं के लिए, कल्याण के लिए आते हैं।

लेकिन यहाँ तो बात है तुम्हें पाके हमने जहाँ पा लिया है। ये गीत तो फिल्मी गीतकारों ने गाया है बम्बई में। लेकिन लागू किसके ऊपर होता है? हँ? कोई है या नहीं है, हँ, जो कहे हमने जहाँ पा लिया है? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) हमने? माने शिव ने भी जहाँ पा लिया? शिव कहाँ जहाँ पाता है? हँ? अभी संगमयुग में कह दें शिवबाबा ने पा लिया है, तो शिवबाबा जिसको हम कहते हैं वो तो आत्मा तो शिव की है ना। न कि जो बाबा टाइटलधारी है उसकी आत्मा है? वो जहाँ पाती है? वो जहान को पाने के लिए थोड़ेही आती है? वो तो सारी जहाँ की जो भी प्राणीमात्र की आत्माएं हैं उनको सुख मिले। चाहे स्वरग की दुनिया मिले और चाहे जब वो आत्माएं आत्मलोक से उतरती हैं इस सृष्टि पर पार्ट बजाने के लिए तो पहली-पहली बार उन्हें सुख मिलेगा या नहीं मिलेगा? हाँ, सुख ही सुख मिलेगा। सभी आत्माओं को पहले जनम में तो सुख ही मिलता है। तो वो तो इसीलिए आया है इस संसार में; क्या? कि सब मेरे जो आत्मा रूपी बच्चे हैं ज्योति बिन्दु, बिन्दु, बिन्दु; बिन्दु को तो चाहे जितना छोटा सूक्षम बना दो; हँ? तो वो आत्मा निराकार कही जाती है जो आँखों से देखने में नहीं आती है वो सभी आत्माएं प्राणीमात्र की, हँ, इस सृष्टि पर किसलिए आती हैं? सुख लेने के लिए आती हैं। हाँ, तो वो सुख देने के लिए इस सृष्टि को, बनाने के लिए, ज्ञान देने के लिए आता है।

अकूट ज्ञान का भंडारी वो ही एक है आत्मा सुप्रीम सोल, जो कभी भी ज्ञान माने जानकारी सृष्टि की सच्ची-सच्ची क्या है उसको भूलती नहीं। क्यों नहीं भूलती? क्योंकि वो जन्म-मरण के चक्र में, शरीर में, अटैचमेन्ट में कभी आती ही नहीं। अटैचमेन्ट में आएगी तो फिर डिटैच नहीं हो पाएगी। और डिटैच नहीं हो पाएगी तो शरीर से जनम लेना पड़ेगा। तो वो तो कभी अटैचमेन्ट में आती ही नहीं; डिटैच ही रहती है। इस सृष्टि पर आती है। हँ? ऐसे नहीं बिन्दु फुदक-फुदक के पार्ट बजाता है या प्रेरणा देके पार्ट बजाता है। अरे, प्रेरणा ही देनी हो तो वो आत्मलोक में बैठे-बैठे प्रेरणा दे दे। ऐसे तो नहीं हो सकता। तो वो इस सृष्टि पर आती है तो कोई न कोई उसे मुख चाहिए ज्ञान सुनाने के लिए। क्या? ऐसे नहीं कि वो बिना ज्ञान के सद्गति हो जाएगी। हो जाएगी? हाँ। ऋते ज्ञानान् न मुक्ति। ये तो शास्त्रों में भी लिखा हुआ है ना कि बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं हो सकती।

तो जिसके लिए यहाँ बोला तुम्हें पाके हमने जहाँ पा लिया, वो सुप्रीम सोल निराकार ज्योतिबिन्दु है लेकिन पाके का मतलब क्या है? कैसे पा लिया? पाने का मतलब ही है कि बिन्दु को पा लिया तो कोई मतलब ही नहीं हुआ। जो ब्रह्माकुमार-कुमारियां समझते हैं हमने बिन्दु को पा लिया। कहें कि दादा लेखराज ब्रह्मा में पा लिया। अरे, पा लिया, फिर वो चला गया, फिर खो गया। कहीं पकड़ में नहीं आता। आता भी है तो थोड़े समय के लिए, हाँ, कुछ काल के लिए आया, फिर गुम हो गया। अभी, अभी धीरे-धीरे आना बिल्कुल ही बन्द हो गया कि चल रहा है? नहीं। वो तो सूक्षम शरीरधारी आत्मा है। सूक्षम शरीरधारी आत्माएं तो इस नरक की दुनिया में, हँ, कोई सदाकाल के लिए पार्ट थोड़ेही बजाती हैं? हँ? उनके ऊपर पापों का बोझा चढ़ता है, तो ज्यादा बोझा हो जाता है तो उस बोझे को कम करने के लिए उनका स्थूल शरीर छूट जाता है। तो वो आत्मा जो हैं सूक्षम शरीरधारी पापी आत्माएं पाप कर्म करने वाली। और पापी तो सभी बनते हैं इस सृष्टि पर एक मनुष्य आत्मा को छोड़करके। कौन? जो मुकर्रर रथधारी है। जिसका नाम शास्त्रों में लिखा हुआ है अर्जुन। अर्जुन माने? अर्जुन का नाम शास्त्रों में श्वेत भी दिया हुआ है। श्वेत माने? एकदम सफेद। धवल। क्या? धवल माने? एकदम श्वेत। कोई स्पॉट नहीं पाप का।

तो ऐसी आत्मा जो जन्म-जन्मान्तर इस सृष्टि पर रहती भी है, हीरो पार्टधारी के रूप में पार्ट भी बजाती है परन्तु कोई उसे पहचान? पहचान नहीं सकता। तो इसलिए वो कह देते हैं कहाँ रहता है? वहाँ रहता है। बहुत ऊँचे पहाड़ पे रहता है। किसी को मिलता नहीं। कोई ऋषि-मुनियों को मिलता होगा। तो साधु-सन्यासी कैलाश पर्वत पर अपने भक्तों के साथ चले जाते हैं। हाँ, क्योंकि ऐसे तो जा ही नहीं सकते। पैसा तो चाहिए वहाँ जाने के लिए। तो भक्तों का सहारा लेते हैं। चले जाते हैं। और लौकिक कोई आते हैं आहाहा हमने भगवान को पाके देख के आए, हमें शंकरजी महाराज मिले। झूठा ही बोल देते हैं। अरे, वो पहाड़ पे बैठने की बात थोड़ेही है। वो तो आत्मिक ऊँची स्टेज में बैठने की बात है। इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर शिव सुप्रीम सोल बाप जब आते हैं तो वो आत्मा इस सृष्टि पर जिसे आदम कहा जाता है हीरो पार्टधारी को वो आत्मा तन से, मन से, धन से, समय, सारा समय लगाकर, संपर्कियों की और संबंधियों की, देह के जो संबंधी होते हैं उनकी पावर लगाकर सिर्फ ईश्वरीय कार्य में ही तल्लीन रहती है। इसलिए उसका कार्य क्या है? उसका कार्य है इस सृष्टि पर आकरके जो अखूट ज्ञान का भंडार है वो सारी मनुष्यात्माओं को वितरित करना। उसमें भी जो मूल बात है वो है तुम ज्योतिबिन्दु आत्मा हो, तुम शरीर नहीं हो।

तो वो सुप्रीम सोल जो इस सृष्टि पर आता है और मुकर्रर रथ भी धारण करता है, सदाकाल के लिए जब तक इस सृष्टि पर उसे पार्ट बजाना है। कब तक पार्ट बजाना है? तब तक पार्ट बजाना है जब तक सत्य सनातन देवी-देवता धर्म की पूरी स्थापना न हो जाए। तो उनके द्वारा ही होगी। धरमपिता ही चाहिए। धर्म की धारणाओं की धारणा करने वाला पिता चाहिए या नहीं चाहिए? या सिर्फ माता से काम चल जाएगा? नहीं। पिता चाहिए। जितने भी धरमपिताएं आए इस सृष्टि पर पिता के रूप में आए ना। कि कोई माता के रूप में भी आया कि क्रिश्चियन धर्म, कि इस्लाम धर्म, कि मुस्लिम धर्म, कि सिक्ख धर्म स्थापन करने के लिए माता के रूप में आया हो। आया? नहीं आया ना। भले पुरुष चोले में ही आता है। क्या? पिता के रूप में। परन्तु बताया है वो आकरके बताय देता है कि बस जितने भी पिता रूपधारी हैं या पिता बनने वाले हैं वो सब पुरुष हैं दुर्योधन-दुःशासन। इसलिए उसे क्या चाहिए? उसे चाहिए धारणा शक्ति वाली जो, हँ, शिव की जो शक्ति है, उस शक्ति को जीवन में, प्रैक्टिकल जीवन में धारण कर सके। तो वो तो कन्याएं-माताएं ही हैं जो बाप बनने वाले पुरुष चोले में जो शक्ति होती है। चलो स्थूल शक्ति ही होती है वीर्य की। वो धारण करती है ना। कि कोई पुरुष धारण कर सकता है? हँ? पुरुष धारण करके बच्चा पैदा कर सकता है? अरे, ऐसी तो बातें हो ही नहीं सकतीं।

तो वो धरणी रूपी माता जो है वो चाहिए उसे। अब वो आता है पुरुष तन में। उस पुरुष तन में जो इस मनुष्य सृष्टि का, हँ, बड़े ते बड़ा बाप के रूप में पार्ट बजाने वाला हीरो पार्टधारी है। कि हीरोइन पार्टधारी है? हीरो पार्टधारी। तो जरूर पुरुष होगा। तो ये गीत जो है उसी आत्मा के लिए उन गीतकारों ने भाव-भंगिमा में भरके गाया। क्या? तुम्हें पाके हमने जहाँ पा लिया है। जहान माना? सारा विश्व, सारी दुनिया पा ली। कैसे पा ली? हँ? गाते रहते हैं या सिर्फ अनुभव करते हैं कि पा ली? हँ? क्या करते हैं? पा ली? पा ली और अभी भी पा ली या अनुभव प्रैक्टिकल में हो रहा है कि नहीं भी पा ली तो ये निश्चित है कि इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर वही आत्मा अनुभव करती है कि मैं ही पाने वाली अधिकारी हूँ उस सुप्रीम सोल बाप से कौनसा वर्सा? वो वर्सा जो निराकारी आत्मा को निराकारी वर्सा चाहिए। क्या चाहिए? निराकारी वर्सा क्या? अखूट ज्ञान का भंडार चाहिए।

Today’s morning class is dated 12th November 1967. The record played on Sunday was – Tumhe paake hamne jahaan paa liya. Jameen to jameen, aasmaan paa liya. (By getting you we have got the world. Not just the Earth, we have got the sky as well) By getting whom did you get? Hm? What would those so-called Brahmakumar-kumaris say – By getting whom did you get?
(Someone said something.) Did you get the above one? Can that above one be found? How can He be found? Hm? How can He be found? Yes. They will say that the Supreme Soul point of light came in the body of Brahma Baba Dada Lekhraj Brahma; then we found Him. And the Supreme Soul point of light Father says through the mouth of Brahma, through the mouth of Dada Lekhraj that I have two kinds of chariots. I come in a permanent manner in the permanent Chariot. And others? Apart from the permanent Chariot, if you want to see in practical, then I come in the mouths of numberwise other Brahmas also for some time or more time. It is because a memorial has been formed in the scriptures, hasn’t it been? What? Brahma is shown to have four heads, five heads. He is always shown with four heads. What is the meaning? That the world that is created through Brahma, this world that is created, be it the heavenly world or the world of hell, which is created through Brahma, in which from whom do all the actor souls obtain knowledge originally, from where do they obtain? Hm? From where do they obtain? Arey, write brother, tell, from whom do they obtain? From whom do they obtain in practical? (Someone said something.) Yes, they obtain from Brahma Baba, Dada Lekhraj only.

Someone may say that we have come directly in knowledge, in advance itself. We have not obtained basic knowledge at all. Arey, however you must have heard from someone. And the one from whom you heard in practical, hm, did you not hear? You heard. From the one he heard in practical, from whom did he hear? He must have heard from Brahma Baba only, did he not? Otherwise, the place from where he heard, where did his guru hear? Even then where will you reach? He heard through the mouth of Dada Lekhraj Brahma. So, the human souls of the entire world, be it the soul of the seed-form Father of the human world, hm, A to Z all the souls, human souls or deity souls, the souls of sages and saints, from whom do they all hear? The knowledge of God, practical God which they listen, they listen through Dada Lekhraj Brahma only. So, he has been shown to be having four heads. Four heads are united. Were those four heads present in Om Mandali or not? They were present there as well. And they were present even when Dada Lekhraj Brahma left his body. And after he left his body, when he assumed a subtle body, then the subtle bodied soul, to him also - you are my mother and Father, and I am your child, the sentences uttered by that mother, the soul of Dada Lekhraj assumed a subtle body through Gulzar Mohini Dadi, didn’t it? So, will you believe in him or not? You will. It is because the Father does come to this world, what, for whom? Does He come for the benefit of the souls of the entire human world or does He come for the benefit of just one? He comes for the benefit of the souls of the entire human world.

But here the topic is that we have got the world by getting you. The filmy composers have sung this song in Bombay. But to whom is it applicable? Hm? Is there anyone or not, hm, who says that we have got the world? Hm?
(Someone said something.) We? Does it mean that Shiv has also got? Does Shiv get the world? Hm? If we say now in the Confluence Age that ShivBaba has got, then the one whom we say ShivBaba, so that soul is of Shiv, isn’t it? Not the soul of the title holder of Baba? Does it get the world? Does it come to get the world? He desires that the souls of all the living beings of the entire world should get happiness. They may get the world of heaven or when those souls descend from the Soul World to play their parts in this world, then will they get happiness for the first time or not? Yes, they will get only happiness. All the souls get only happiness in the first birth. So, He has come to this world only for; what? So that all my soul-like children, the points of light, point, point; the point could be made however small; hm? So, that soul is called incorporeal which is not visible to these eyes; all those souls of the living beings, hm, why do they come to this world? They come to derive happiness. Yes, so, He comes to give that happiness to this world, to make the world, to give knowledge.

The inexhaustible stock-house of knowledge is only that one soul, the Supreme Soul which never forgets the knowledge, i.e. true information of the world. Why doesn’t it forget? It is because it never passes through the cycle of birth and death, never comes in the attachment of the body at all. If it comes into attachment, then it will not be able to detach. And if it is unable to detach [itself], then it will have to get birth through a body. So, it never comes into attachment at all; it remains detached only. It comes to this world. Hm? It is not as if the point jumps around and plays its part or that it plays its part by giving inspiration. Arey, if He has to give just inspiration, then He could give inspiration sitting in the Soul World. It cannot happen like this. When it comes to this world, then it requires a mouth to narrate knowledge. What? It is not as if true salvation will happen without knowledge. Will it happen? Yes. Ritey gyaanaan na mukti. It has been written in the scriptures also that liberation (mukti) is not possible without knowledge.

So, the one for whom it was said here that we have got the world by getting you, that Supreme Soul is incorporeal point of light, but what is the meaning of ‘getting’? How did you get? If the meaning of ‘getting’ is to get a point, then that doesn’t mean anything. The Brahmakumar-kumaris think that we have found the point. They may say that we found it in Dada Lekhraj Brahma. Arey, you found; then he departed; you lost. It cannot be grasped. Even if it can be grasped, it is for some time, yes, he came for a short period and then vanished. Now, now did he gradually stopped coming completely or is it continuing? No. He is a subtle bodied soul. Do the subtle bodied souls play a part forever in this world of hell? Hm? They accumulate burden of sins; so, when they gather more burden, then in order to reduce that burden they lose their physical body. So, those souls, the subtle bodied sinful souls which commit sins; And everyone becomes sinful in this world except one soul. Who? The permanent Chariot holder. His name has been written in the scriptures as Arjun. What is meant by Arjun? Arjun has also been named as ‘Shwet’ (white) in the scriptures. What is meant by Shwet? Completely white. Dhawal. What? What is meant by dhawal? Completely white. No spot of sin.

So, such soul which even lives in this world birth by birth, also plays its part as a hero actor, but does anyone recognize him? They cannot recognize. So, this is why they say that where does he live? He lives there. He lives on a very high mountain. He doesn’t meet anyone. He must be meeting some sages and saints. So, sages and saints go to the Mount Kailash along with their devotees. Yes, because they cannot go there simply. Money is required to go there. So, they take the support of the devotees. They go. And if anyone returns, aahaha, we found, saw God and came; we met Shankarji Maharaj. They speak lies. Arey, it is not about sitting on that mountain. It is about sitting in the spiritual high stage. When the Supreme Soul Father Shiv comes to this world stage, then that soul which is called Aadam in this world, the hero actor, that soul remains immersed in just Godly task through its body, mind, wealth, time, investing its entire time, investing the power of its contacts and relatives, the relatives of the body. This is why what is His task? His task is to come to this world and distribute the inexhaustible stock of knowledge to all the human souls. Even in that the main topic is that you are a point of light soul, you are not a body.

So, that Supreme Soul who comes to this world and also assumes a permanent Chariot forever until He has to play a part in this world; until when does He have to play His part? He has to play a part until the complete establishment of the true ancient deity religion takes place. So, it will take place through Him only. A founder of religion is required. Is the Father who imbibes the inculcations of dharma required or not? Or will the task be managed just with the mother? No. Father is required. All the founders of religions who come to this world came in the form of fathers, didn’t they? Or did anyone come in the form of a mother also that they came as a mother to establish Christianity, Islam, Muslim religion, Sikhism? Did anyone come? They did not come, did they? Although He comes in a male body only; what? In the form of a Father, but it has been told that He comes and tells that all the Father figures or those who become fathers, all those men are Duryodhans and Dushasans. This is why what does He require? He wants the one with the power of inculcation, hm, the one who could inculcate the power (shakti) of Shiv, in her life, in her practical life. So, it is those virgins and mothers only who [inculcate] that power contained in the male bodies which become fathers; okay, they have the physical power of veerya (semen); She holds that, doesn’t she? Or can any man hold? Hm? Can a man hold it and give birth to a child? Arey, such topics cannot be possible at all.

So, He requires that land-like mother. Well, He comes in a male body. In that male body, who is the hero actor playing a part as the biggest Father of this human world. Or is he a heroine actor? Hero actor. So, definitely he will be a male. So, this song was sung by those composers with emotions for that soul only. What? We got the world by getting you. What is meant by world (jahaan)? We got the entire world. How did you get? Hm? Do they just keep on singing or do they experience that they have got it? Hm? What do they do? Did they get? Did you get it and did you get it even now or do you experience in practical that even if you haven’t got it, it is definite that that very soul on this world stage experiences that I am entitled to obtain which inheritance from that Supreme Soul Father? That inheritance, the incorporeal inheritance which the incorporeal soul wants. What does it require? What incorporeal inheritance? It requires the inexhaustible store house of knowledge.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2791, दिनांक 14.02.2019
VCD 2791, dated 14.02.2019
प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning class dated 12.11.1967
VCD-2791-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.05
Time- 00.01-16.05


कल प्रातः क्लास चल रहा था – 12 नवम्बर,1967. रविवार को पहले पेज पर रिकार्ड चला था – तुम्हें पाके हमने जहाँ पा लिया है। जमीं तो जमीं, आसमां पा लिया है। अब जिनको अटूट निश्चय बैठ गया हो उन्होंने पाय लिया होगा। बाकि के लिए तो क्या कहेंगे? ओमशान्ति। फिर भी बाप कहते हैं मीठे-मीठे सीकिलधे बच्चे। 5000 वर्ष के बाद फिर से आय मिले हुए रूहानी बच्चों प्रति बाप बैठकरके समझाते हैं। बैठकरके समझाते हैं माना कोई शरीर में प्रवेश करके समझाते हैं। कौनसा बाप? बेहद का बाप। बेहद के ऐसे तो दो बाप हैं। एक आत्माओं का बाप। बिन्दु-बिन्दु ज्योतिबिन्दु आत्माओं का बाप ज्योतिबिन्दु शिव। निराकार आत्माओं का निराकार बाप। और दूसरा है मनुष्य सृष्टि का बाप जो सभी धर्मों में गाया हुआ है - आदम, एडम, आदि देव। तो कौनसा बाप समझाते हैं? हँ? इस मनुष्य सृष्टि का बाप है, हँ, जैसे मनुष्य सृष्टि में जो भी मनुष्यात्माएं हैं सब मन वाली हैं, चंचल मन वाली। हँ? चंचल मन एक जगह स्थिर तो होता नहीं। हँ? (बाबा ने किसी को कहा - पूछने पर बताओ।) जब एक जगह स्थिर ही नहीं होता तो अस्थिर मन वाली आत्माएं तो क्या समझावेंगी? वो तो एक ही सुप्रीम सोल बाप है जिसको मन ही नहीं है। मन की चंचलता होने का सवाल ही नहीं है।

तो वो ही बाप आकरके रूहानी बाप इस मनुष्य सृष्टि में आते हैं तो जिस तन में भी प्रवेश करते हैं उसका नाम ब्रह्मा रखते हैं। अब शास्त्रों में चित्रकारों ने चित्र तो सही दिखाय दिया। चार मुखों वाला ब्रह्मा। पंचमुखी ब्रह्मा भी कहते। लेकिन मोस्टली चार मुखों वाला ब्रह्मा ही दिखाया जाता है। कहते हैं पांचवां मुख था तो ऊर्ध्वमुखी लेकिन देह अभिमानी होने के कारण गालियां बकने लगा। तो उसको काट दिया। ऐसे शास्त्रों में लिखा हुआ है। अब रूहानी बाप कहते हैं मैं तो मुकर्रर रूप भी इस सृष्टि पर जब तक पार्ट बजता हूँ, मुकर्रर पार्ट बजाता हूँ। तो मुकर्रर पार्ट के लिए मुझे मुकर्रर शरीर भी चाहिए। अब वो शरीरधारी आत्मा देह अभिमानी हो या आत्माभिमानी। और जिनमें भी प्रवेश करते हैं देह अभिमानी तो सभी होते हैं। अगर देह अभिमानी न हों तो जिनका नाम ब्रह्मा देते हैं वो ब्रह्मा नामधारियों की पूजा होती ना। होती है क्या? नहीं। तो, तो एक ही ब्रह्मा है, परमब्रह्म, जिसे कहा जाता है, उसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं। हँ? उस रूहानी बाप उस तन के द्वारा समझाते हैं। अच्छा? सुनाते नहीं हैं? सुनाते भी हैं। पहले सुनाएंगे। बाद में ही तो समझाएंगे ना।

तो रूहानी बाप, बाप ने बच्चों को समझाया कि आत्माभिमानी बनकरके बैठो। जब तक आत्मा अभिमानी नहीं बनेंगे, देह अभिमानी रहेंगे तो मेरे को याद नहीं कर पाएंगे क्योंकि मैं तो सदा आत्माभिमानी, रूहानी स्टेज में रहता हूँ। मुझे तो देह है ही नहीं। और तुम बच्चों को तो जन्म-जन्मान्तर देह धारण की हुई है तो प्रैक्टिस पड़ी हुई है। तो अभी वो प्रैक्टिस भूलनी है देह अभिमान की। इसलिए कहते हैं देही अभिमानी बनो, आत्म अभिमानी बनो। क्योंकि बच्चों को समझाया गया है कि आत्मा अविनाशी है। और ये शरीर? शरीर जिन पांच तत्वों से बनता है जड़ तत्वों से वो तो रूप बदलते रहते हैं, विनाशी हैं। और आत्मा तो सदा ही ज्योति बिन्दु स्वरूप है। इस सृष्टि पर पार्ट भी बजाती है तो भी चैतन्य है, जड़त्वमयी तो नहीं है। परन्तु संग के रंग से जड़त्वमयी बन जाती है। कैसी आत्माओं के संग के रंग से? ऐसी आत्माओं के संग के रंग से जड़त्वमयी बन जाती है जो उस चैतन्य सदा शिव जो सदैव ही चैतन्य स्टेज में रहने वाला है उसको पहचान नहीं पाती। तो न पहचान पाने के कारण देहभान में रहती है। और देहभान में रहने से वो फिर वो देह की दुनिया का ही सुख भोगती हैं जिसे कहते हैं नरक की दुनिया। और स्वर्ग में तो देवताएं आत्मिक स्थिति में रहते हैं। क्योंकि उन देव आत्माओं ने ही जो आत्मिक स्थिति में रहने वाली आत्माएं हैं, उन्होंने जब बाप आया था कलप पूर्व में तो अपन को आत्मा समझा भी और आत्मा के बाप को बाप समझकरके याद भी किया। भले निराकार जो आत्मा है, देखने में नहीं आती, वो याद कैसे आएगी? तो ये समझा कि वो निराकार साकार शरीर में आकरके, हँ, मुकर्रर रूप से पार्ट बजाता है।

बाकि जो शरीरधारी ब्रह्मा हैं, चार मुख वाले, हँ, उनके गायन क्यों नहीं होता? इसलिए नहीं होता कि वो निराकार बाप को उस मुकर्रर शरीरधारी में पहचान नहीं पाते जल्दी। और जो पहचानते भी हैं, हँ, और पहचान करके सहयोगी भी बनते हैं तो वो तो ज्ञान सूर्य बाप के बच्चे सूर्यवंशी ही बन जाते। तो उनका शरीर और उनकी आत्मा दोनों विनाशी रहेंगी या अविनाशी हो जाएंगी? अविनाशी हो जाएंगी। इसलिए जो अविनाशी वस्तु है, हँ, माने अविनाशी आत्माएं जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आत्मा से और शरीर से भी लगातार पार्ट बजाती हैं शरीर से और आत्मा से तो वो अपन को समझो। क्या? कि हम अविनाशी आत्मा हैं अविनाशी पार्टधारी इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर। और शरीर तो विनाशी है जो जन्म-जन्मान्तर विनाश होता आया है। उसे छोड़ते आए हो, लेते आए हो। अभी क्या करना है? अभी वो आत्मा को बैठकरके बाप समझाते हैं। कौनसी आत्मा को? हँ? वो आत्मा को। कौनसी आत्मा को? वो आत्मा को समझाते हैं जो आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कभी भी शरीर को छोड़ती नहीं है। शरीर को भी नहीं छोड़ती और आत्मा को भूलती तो है, परन्तु बाप के याद दिलाने पर याद में भी रहती है। परन्तु प्रैक्टिस तो करनी पड़े ना। जन्म-जन्मान्तर की प्रैक्टिस है देह को याद करने की। तो वो, वो प्रैक्टिस एकदम तो नहीं हो जाती।

बच्चे जानते हैं कि ये बेहद का बाबा है। बाबा; कैसे? मनुष्य सृष्टि में मुकर्रर रथ में प्रवेश करता है तो बेहद का बाबा है। माने और जो बाबाएं के रूप में पार्ट बजाने वाले ग्रांडफादर्स के रूप में पार्ट बजाते हैं वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदाकाल पार्ट नहीं बजाते। हँ? और एक ही आत्मा है जो सदाकाल पार्ट बजाती है। तो बताया, हँ, वो ऊँचे ते ऊँचा भगवंत कहा जाता है। ऊँचे ते ऊँचा बाबा। हँ? बाबा ने समझाया कि और देवताओं को भगवंत नहीं कहा जा सकता है। क्यों? क्यों नहीं कहा जा सकता? क्योंकि इतने भाग्यवान बनते नहीं। कितने भाग्यवान? इतने भाग्यवान नहीं बनते जितना वो आत्मा आदम विश्व का बादशाह बनती है। ब्रह्मा को भी देवता कहा जाता है। विष्णु को भी देवता कहा जाता है। वो तो शंकर को भी देवता कहा जाता है। हँ? परन्तु ऊँचे ते ऊँचा फिर भगवंत कहा जाता है। तो शंकर को भगवंत कह सकते हैं क्या? नहीं कह सकते। क्यों? वो तो मिक्स पार्ट है या एक ही आत्मा का विश्वपिता के रूप में पार्ट है जगतपिता के रूप में? हाँ, मिक्स पार्ट है। तो वो मिक्स पार्ट जब तक शुद्ध आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच की हीरो पार्टधारी के रूप में इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सबको अनुभव न हो नंबरवार, तब तक उसे देवता ही क्या, हँ, मनुष्य ही कहेंगे ना। क्यों? शंकर मिक्स पार्ट है तो उसमें किसका-किसका पार्ट मिक्स है? अधूरा चन्द्रमा का पार्ट मिक्स है। हँ? संपूर्ण सोल जो सदा संपन्न है शिव का पार्ट मिक्स है। हँ? तीसरे नेत्र के रूप में दिखाते हैं ना। और जो शरीरधारी है उस आत्मा का भी पार्ट है। तो जो शरीरधारी है जब तक देहभान है तब तक उसे न देवता कहेंगे और न भगवंत कहेंगे। हाँ। आत्मिक स्थिति में स्थिर हो जाए और सारा संसार उसे पहचान ले कि ये है ऊँचे ते ऊँचा, महान ते महान देवता का पार्ट तब कहा जाएगा विश्वपिता। वो ऊँचे ते ऊँचा भगवंत हुआ।

तो बच्चों की बुद्धि में यही बात है। क्या? कि हम उस परमधाम में रहने वाले हैं। हँ? हम आत्माएं कोई सूक्षम शरीर धारण करने वाली आत्माएं नहीं हैं। क्यों? सूक्षम शरीर कौन धारण करती है? वो ही आत्माएं सूक्षम शरीर धारण करती हैं जिन्होंने, जिनके ऊपर पापों का बोझा बहुत चढ़ जाता है। तो ज्यादा फिर पाप का बोझा न चढ़े, इसलिए सूक्षम शरीर मिलता है। तो सूक्षम शरीर से न पाप बनेगा, न पुण्य बनेगा। जब तक साकार शरीर है तो पाप और पुण्य बनता है। तो हम बच्चे जो बाप के कैसे बच्चे हैं? इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पूरा 84 जन्म का आलराउंड पार्ट बजाने वाले हैं नंबरवार वो उस परमधाम के रहने वाले हैं। हँ? सूक्षम वतन के नहीं हैं। स्थूल वतन के रहने वाले तब तक हैं जब तक देह को नहीं भूला है। और देह को भूल जाएंगे तो कहाँ के वासी? परमधाम वासी। परमब्रह्मलोक के वासी।

Yesterday a morning class dated 12th November, 1967 was being narrated. The record played on the first page on Sunday was – Tumhe paake hamne jahaan paa liya hai. Jameen to jameen, aasmaan paa liya hai (By getting you we have got the entire world. Not just the land, but we have also got the sky). Well, those who have developed unbreakable faith must have got. What will be said for the rest? Om Shanti. However the Father says – Sweet, sweet, seekiladhey (found after a long time) children. The Father sits and explains to the spiritual children who have come and met again after 5000 years. ‘He sits and explains’ means that He enters in a body and explains. Which Father? The unlimited Father. There are two such unlimited fathers. One is the Father of souls. The Father of point-like, points of light souls, the point of light Shiv.The incorporeal Father of the incorporeal souls. And the other is the Father of the human world who is praised in all the religions – Aadam, Adam, Aadi Dev. So, which Father explains? Hm? He is the Father of this human world; hm, for example, all the human souls in the human world have a mind, an inconstant mind. Hm? The inconstant mind does not become constant at one place. Hm?
(Baba said to someone – Reply on being asked.) When it does not become constant at one place at all; then what will such souls with inconstant mind explain? There is only one Supreme Soul Father who does not have a mind at all. There is no question of inconstancy of the mind at all.

So, when the same Father, the spiritual Father comes to this human world, then whichever body He enters, He names him Brahma. Well, the artists have depicted the correct picture in the scriptures. Four-headed Brahma. They also say – Five-headed Brahma. But mostly four-headed Brahma only is depicted. It is said that the fifth head was indeed upward facing (oordhwamukhi), but because of being body conscious he started hurling abuses. So, it was cut off. It has been written so in the scriptures. Now the spiritual Father says – Until I play a part in this world in a permanent manner, I play a permanent part. So, I also require a permanent body to play a permanent part. Well, that embodied soul may be body conscious or soul conscious. And in whomsoever He enters, all are body conscious. If they are not body conscious, then the ones who are named Brahma, then those Brahma name-holders would have been worshipped, wouldn’t they have been? Are they worshipped? No. So, so, there is only one Brahma, who is called Parambrahm, He enters in a permanent manner in him. Hm? The spiritual Father explains through that body. Achcha? Doesn’t He narrate? He also narrates. First He will narrate. Only after that will He explain, will He not?

So, the spiritual Father, the Father explained to the children that sit as soul conscious ones. Unless you become soul conscious, if you remain body conscious, then you will not be able to remember Me because I am forever soul conscious, I remain in spiritual stage. I do not have a body at all. And you children have assumed bodies birth by birth; so, you are practiced. So, now you have to forget that practice of body consciousness. This is why He says – Become soul conscious because children have been explained that the soul is imperishable. And this body? The five elements, the non-living elements with which the body is formed keep on changing the form, are perishable. And the soul is forever point of light form. Even when it plays a part in this world, it is living, it is not inert. But it becomes inert through the colour of company. Through the colour of company of what kind of souls? It becomes inert through the colour of company of such souls which are unable to recognize that living Sadaa Shiv who remains in a living stage forever. So, because of not recognizing they remain in body consciousness. And because of being in body consciousness they then enjoy the pleasures of the bodily world only which is called a world of hell. And the deities remain in soul conscious stage in heaven because those deity souls only, which are the souls living in soul conscious stage, had considered themselves to be souls and also remembered the Father of soul as a Father when the Father had come Kalpa ago. Although the soul which is incorporeal, is invisible, how can it come to the mind? So, they thought that the incorporeal comes in a corporeal body and plays a part in a permanent manner.

As regards the bodily Brahmas with four heads, why aren’t they praised? They are not praised because they are unable to recognize that incorporeal Father in that permanent bodily being. And even those who recognize, hm, and become helpful after recognizing, then those children of the Sun of Knowledge, the Father become Suryavanshi (belonging to the Sun dynasty) only. So, will their body as well as their soul remain perishable or will they become imperishable? They will become imperishable. This is why the imperishable thing, hm, i.e. the imperishable souls, which play a continuous part on this world stage through the soul as well as the body, through the body as well as the soul, so, consider yourself to be that. What? That we are imperishable souls, imperishable actors on this world stage. And the bodies are perishable which have been perishing birth by birth. You have been leaving that, assuming that. What do you have to do now? Now the Father sits and explains to that soul. To which soul? To that soul. To which soul? He explains to that soul which never leaves the body on this world stage. It does not leave the body as well and it does forget the soul, but it also remains in remembrance when reminded by the Father. But one has to practice, will you not? You have the practice of remembering the body birth by birth. So, that practice will not go immediately.

Children know that this is unlimited Baba. Baba; how? He enters in a permanent Chariot in the human world; so He is an unlimited Baba. It means that others who play their parts as Babas, play their parts as grandfathers do not play a part forever on this world stage. Hm? And there is only one soul which plays a part forever. So, it was told that He is called the highest on high God. Highest on high Baba. Hm? Baba has explained that other deities cannot be called Bhagwant (God). Why? Why can’t they be called? It is because they do not become so fortunate (bhaagyavaan). How fortunate? They do not become as fortunate as that soul Aadam becomes the emperor of the world. Brahma is also called a deity. Vishnu is also called a deity. Shankar is also called a deity. Hm? But God is called highest on high. So, can Shankar be called God? He cannot be called. Why? Is that a mix part or is it the part of only one soul in the form of world Father? Yes, it is a mix part. So, as regards that mix part, until the pure soul is not experienced numberwise by everyone on this world stage as the hero actor, he will not be called a deity but just a human being, will he not be? Why? Shankar is a mix part; so, whose parts are mixed in him? The part of the incomplete Moon is mixed in it. Hm? The part of the complete soul, who is forever perfect Shiv is mixed in it. Hm? He is shown in the form of the third eye, isn’t He? And there is a part of the soul of the bodily being also. So, until the bodily being is in body consciousness, he will neither be called a deity nor God. Yes. When he becomes constant in soul conscious stage and when the entire world recognizes him that this is the part of the highest on high, greatest of all deity, then he will be called world Father. He is the highest on high God.

So, this very topic is in the intellect of children. What? That we are residents of that Supreme Abode. Hm? We souls are not the souls which assume a subtle body. Why? Who assumes a subtle body? The same souls, which accumulate a lot of burden of sins, assume subtle bodies. So, they get a subtle body so that they do not accumulate more burdens of sins. So, one will neither generate sins (paap), nor noble actions (punya) through a subtle body. Until the corporeal body exists, one generates paap and punya. So, we children who are what kind of children of the Father? We are the ones who play all round part of complete 84 births on this world stage numberwise; we are residents of that Supreme Abode. Hm? We do not belong to the Subtle Region. We are residents of the physical world until we have not forgotten the body. And when we forget the body, then we are residents of which place? We are residents of the Supreme Abode. We are residents of the Parambrahmlok.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2792, दिनांक 15.02.2019
VCD 2792, dated 15.02.2019
प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning class dated 12.11.1967
VCD-2792-extracts-Bilingual

समय- 00.01-25.03
Time-00.01-25.03


प्रातः क्लास चल रहा था – 12.11.1967. पहले पेज के अंतिम लाइन में बात चल रही थी – जो लौकिक बाप है ना, बेहद का लौकिक बाप; और ये है पारलौकिक बाप शिव सुप्रीम सोल। तो देखो, ये दोनों के बीच में, हँ, जो ऊँच-नीच का सवाल है ना। ऊँच कौन है और नीच कौन है? कहेंगे ऊँच है सुप्रीम सोल शिव। और नीच है जिसमें मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं वो नीच है। और नीच के बारे में नानक भी क्या कहते हैं? कहते हैं; 12.11.1967 की प्रातः क्लास का दूसरा पेज, रविवार। क्या कहते हैं याद आया? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) असंख्य चोर हरामखोर। तो उस लिस्ट में आएगा या नहीं ये नीच? हँ? आएगा तो जरूर। हँ? हराम का खाते हैं? खोर माने खाने वाला। हँ? क्या हराम का खाते हैं? हँ? क्या चोरी करते हैं? हँ? अरे, कुछ करते हैं कि नहीं चोरी? हँ? कुछ पता नहीं? अरे? अरे जल्दी बताओ। हँ? हाँ?

(किसी ने कुछ कहा।) कृष्ण मक्खन खाते हैं? कौनसा कृष्ण? हँ? कौनसा कृष्ण मक्खन खाते हैं? संगमयुगी कृष्ण मक्खन खाते हैं। ये चोरी करते हैं। अच्छा? जो संगमयुगी कृष्ण कहा जाता है उसका चोरी तो शरीर से ही की जाती है। तो जो शरीर रूपी रथ है उसको कंट्रोल करने वाला कौन है? हँ? कौन है? हँ? कहेंगे सुप्रीम सोल। तो जो कंट्रोल करने वाला है, हँ, तो वो कंट्रोल क्यों नहीं कर पाता, हँ, जो असंख्य चोरों की लिस्ट में आया हुआ है अव्वल नंबर वन? हँ? अरे, कोई कारण होगा ना। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) माँ को फ्री छोड़ना है? हँ? मन को फ्री छोड़ना है? मन को फ्री छोड़ना है? मन को फ्री छोड़ना है? अच्छा? मन रूपी घोड़े को कंट्रोल नहीं करना है? हँ? हाँ। चार ही घोड़े तो दिखाए गए हैं रथ में। चार हैं कि पांच हैं? चार घोड़े दिखाए गए। तो जो चार घोड़े रथ के दिखाए जाते हैं अर्जुन के वो चारों घोड़े कौनसे हैं मन रूपी घोड़े? हँ? हाँ। चार घोड़े हैं जो चार मुख वाला ब्रह्मा दिखाया जाता है। तो चार आत्माएं होंगी ना। तो उनकी बात नहीं है। वो कोई मुकर्रर रथधारी हैं? नहीं।

मुकर्रर रथधारी जो मन-बुद्धि रूपी आत्मा है वो तो ऊर्ध्वमुखी मुख दिखाया जाता है ना। तो वो ऊर्ध्वमुखी मुख जो दिखाया जाता है उसको असंख्यचोरों की लिस्ट में क्यों डाल दिया? नहीं बता पाएंगे। इसलिए डाल दिया कि वो भी संसार के सामने व्यक्त तो ऐसे ही करता है। क्या? तन, मन, धन सब तेरा। है ना? हाँ। जब तन तेरा कर दिया; तेरा माने किसका? निराकार का कर दिया तो वो फिर तन से किस चीज़ की चोरी करनी है? हँ? सुख की ना। तो सुख की जो चोरी करनी है उसमें सुख ज्ञानेन्द्रियों से भी लिया जाता है और? और कर्मेन्द्रियों से भी लिया जाता है। चलो कर्मेन्द्रियों के सुख को त्याग भी दे; हँ? त्याग दे। मान लो त्याग दिया। तो ज्ञानेन्द्रियों के सुख को त्याग देगा? हँ? त्यागेगा? हँ? आँख तो बहुत धोखेबाज है। उसको जल्दी त्याग पाएगा? अच्छा, चलो आँख को छोड़ दो। वो तो अव्वल नंबर। हाँ। और भी तो दूसरे ज्ञानेन्द्रियां हैं। कान हैं; हँ? वो बढ़िया-बढ़िया मोबाइल के गीत आते हैं ना। हाँ, वो ब्रह्मा बाबा मुरली में भी बजाते थे ना। हाँ, तो सुनने की दिल होती है कि नहीं? सुनता होगा कि नहीं? नहीं सुनता होगा? अरे, बताओ। हँ? सुनता होगा? अच्छा? कैसे? कैसे सुनता होगा? लाउडस्पीकर से सुनता होगा? मोबाइल से सुनता होगा कि टीवी से सुनता होगा? कैसे सुनता होगा? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) मन के अंदर? वो मन कोई ज्ञानेन्द्रिय वो नहीं है जो दस इन्द्रियों में देखी जाती है। हँ? वो तो मन की बात हुई ना स्मृति। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, चलो कानों से भी नहीं देखता हूँ। अच्छा? माताएं कभी-कभी बढ़िया-बढ़िया सुगंधित फूल ले आएं, सुगंधित चीज़ ले आएं, सेंट डाली हुई, हँ, खीर होती है ना उसमें सेंट डालने से कितनी सुगंधित हो जाती है। तो खाने की दिल होगी कि नहीं? खाएगा कि नहीं खाएगा? हँ? खाएगा? हाँ, अगर दिल होती है खाने की तो चोर है कि नहीं? हँ? अगर दिल जाती है वो सुगंधित खाने में या चलो कोई मीठी चीज़ खाने में, रसगुल्ला खाने में या कोई भी चीज़ ऐसी, हँ, तो चोर है या नहीं? दिल तो नहीं जानी चाहिए। हँ? हाँ।

तो बताया, असंख्यचोर, हरामखोर। उनकी संख्या नहीं गिनी जा सकती क्योंकि 500-700 करोड़ मनुष्यों की तो संख्या गिनी जा सकती है। हँ? गिनते हैं। 700, 750 करोड़ जो भी बताई है मनुष्य आत्माएं उनकी संख्या तो गिनी जाती है। लेकिन ये असंख्यचोरों की संख्या गिनी जा सकती है? नहीं। असंख्य पापी। पाप कर जाएं। असंख्य भांड खाएं। क्या? भांड क्या होता है? व्यभिचारी बनें। हँ? अरे, श्रीमत है; क्या? श्रीमत क्या है? श्रीमत क्या है? बच्चे सबसे अच्छा भोजन है; क्या? दाल-चावल और? और? और? और आलू। हाँ। तो उसके अलावा और कोई चीज़ पे दिल जाती है तो चोर की लिस्ट में हुआ कि नहीं? हँ? मुख चाहता है यहाँ बढ़िया चीज़ खाने को मिले तो चोर हुआ या नहीं? हाँ। चोर हुआ। असंख्य भांड खाते हैं। ऐसे-ऐसे बहुत कुछ नानक ने कहा। हँ? नानक? नाम क्यों दिया? ना न कहे। किस बात से? हँ? हाँ, सच्ची बात को मानने से ना न कहे। सच्ची बात है तो माननी चाहिए ना। हाँ। तो सच्ची बातों को कम से कम मानता है तो कौनसी लिस्ट में? पांडवों की लिस्ट में कि कौरवों की लिस्ट में कि यादवों की लिस्ट में? हँ? हाँ। पांच पांडवों की लिस्ट में ही कहेंगे।

तो बाप कहते हैं देखो तो मैं कहाँ से आया हुआ हूँ। कहाँ से आया हुआ हूँ? हँ? उस धाम से आया हुआ हूँ जहाँ आत्माओं को इच्छा मात्रम अविद्या। वहाँ इच्छा होती है? अरे, वहाँ कोई आत्मा को परमधाम में इच्छा होती है? इच्छा ही नहीं होती। न कर्मेन्द्रियां, न ज्ञानेन्द्रियां। हाँ। और मन भी? ग्यारहवीं इन्द्रिय? वो भी वहाँ नहीं होता। तो देखो मैं कहाँ से आया हुआ हूँ? हँ? और जहाँ से मैं आया हुआ हूँ वहाँ की जो स्टेज है, हँ, हाँ, और यहाँ आता हूँ तो भी वो ही स्टेज रहती है। तो देखो मेरे त्याग की कितनी पूजा होती है। सबसे जास्ती मेरी पूजा करते हैं; चलो गलतफहमी से करते हैं; मेरी करते हैं क्या? मेरी पूजा करते हैं क्या?
(किसी ने कुछ कहा।) उसकी करते हैं पूजा? हँ? अरे, उसको याद किया जा सकता है कि पूजा की जा सकती है? उसको तो याद किया जा सकता है। तो पूजा किसकी करते हैं? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, जिसमें प्रवेश करते हैं मुकर्रर रूप से उसके स्वरूप की जिसे जो ज्ञान के अखूट भंडार को लेकरके बाप समान स्टेज धारण करता है, निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, हाँ, उसकी पूजा करते हैं। तो असलियत को जानते हैं क्या? नहीं जानते। फिर भी ऐसे भावना है कि मेरी पूजा करते हैं निराकार की। हँ? हाँ, याद करते हैं; अरे, जो है ही निराकारी अति सूक्ष्म ते सूक्ष्म वो, वो चिंतन किया जा सकता है? हँ? चिंतन किया जा सकता है? अचिंत्य है कि चिंतन करने योग्य है? अचिंत्य है। फिर भी मैं जिस मुकर्रर रथ में आता हूँ, हँ, और जिस आत्मा के रथ में आता हूँ, देही; देह या देही? देही। देही माना देह को धारण करने वाली आत्मा के बाजू में बैठता हूँ तो उस आत्मा को याद करते हैं। हँ? वो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाती है या नहीं बजाती? बजाती है।

तो अभी मैं यहाँ क्या करने के लिए आया हूँ? हँ? क्या करने के लिए आया हूँ? अरे? ये जो गलत कर्म करने वाले हैं चोरी-चकारी करना छोड़ते ही नहीं हैं इनकी चोरी-चकारी छुड़ाने आया हूँ या नहीं आया हूँ? हँ? नहीं? हाँ, आया हुआ हूँ।

तो बस पहले तो बच्चों ने हुकुम फरमाया; क्या फरमाया? हँ? हे पतितों को पावन बनाने वाले बाबा आओ! कौन आओ? पतितों को पावन बनाने वाले, हँ, आत्माओं के बाप सुप्रीम सोल ज्योति बिन्दु आओ? नहीं। कौन आओ? बाबा आओ। अच्छा! बाबा तो तब ही कहा जाएगा, ग्रांडफादर, उनको बाबा कहा जाता है जब साकार शरीर में निराकार ज्योति बिन्दु शिव प्रवेश करे। अच्छा? तो बच्चों ने फरमाया है। हँ? पतितों को पावन करने वाले बाबा आओ। तो अब बताओ, मैं कहाँ आऊँ? हँ? कहते हैं ये पतित दुनिया में आओ। जो पतित कर्म करने वाले हैं ना चोरी-चकारी, मक्कारी, हँ, दुराचारी, इनमें आओ। अच्छा? तो अरे भई, पतित दुनिया में भी किसके, हँ, किसके तन में मुकर्रर रूप से आऊँ? हँ? और नहीं तो किसके-किसके शरीर में आऊँ? कहते हैं - हाँ, पतित शरीर में आओ। हँ? क्योंकि पावन में आएंगे, कोई सन्यासी होगा न कोई फर्स्टक्लास सन्यासी होते हैं ना। जैसे आदि शंकराचार्य था। फर्स्ट क्लास था, हँ, कि कोई थोड़ी नीची कैटागरी का था? फर्स्ट क्लास सन्यासी था। तो कहते हैं; क्या पतित शरीर में आऊँ? हाँ, पतित शरीर में आओ।

तो बाप आकरके कहते हैं बहुत जन्म के अंत के जनम के भी अंत में। ये क्यों कहते हैं ऐसे-ऐसे? हँ? बहुत जन्म कितने? हँ? बहुत जन्म हुए 84 जन्म। कब हुए? हँ? 84 जन्म हुए। हाँ। कहेंगे 36 में 84 जन्म हुए। तो बहुत जन्मों के अंत के। तो उसमें अंत कहेंगे कि भई ये बुड्ढा होना शुरू हो गया। साठ साल हो गए। वानप्रस्थ अवस्था शुरू हो गई। हँ? तो अंत उसी समय कहेंगे ना। हाँ, कि अंत समय आ गया भाई। अब तो ये जो पुराना चोला होने लगा। तो बताया बहुत जन्मों के अंत के जन्म के भी। क्या? उसके अंत में भी। तो कौनसा हुआ? हँ? ‘उसके अंत’ क्यों कहा? हाँ? बहुत जनम के अंत के। तो अंत हुआ सौ साल का ब्रह्मा की आयु पूरी हो जाए। हँ? चलो परमब्रह्म की ही सही, मुकर्रर रथधारी की। सौ साल की आयु पूरी हो; हाँ। तो कब होती है? हँ? हाँ, सन् 76 में होती है। और वो तो महाभारत शास्त्र में भी लिखा हुआ है; क्या? कि 32 वर्ष का वो जो शंकर का चोला होता है तो वो परमब्रह्म में लीन होने का काम उनका शुरू हो जाता है। परमब्रह्ममलीनमासी। ऐसे बोला हुआ है। तो ये तो हुई बात बहुत जन्मों के अंत की बात हुई। 76. है ना। और फिर उसके जनम के भी अंत में। अरे, उसका जनम का अंत क्या हुआ? हँ? जो परमब्रह्म का रूप पकड़ा उसका भी अंत क्या हुआ? परमब्रह्म का जो रूप पकड़ा, हँ, उसको कहेंगे कि पुरुषार्थ असली शुरू हुआ या वो बेसिक वाला ही पुरुषार्थ चल रहा है? असली पुरुषार्थ, हँ, अब शुरू हुआ। तो उसका भी अंत कब कहें? हँ?

वो भी मुरली में बताय दिया। तुम बच्चों को 40 से 50 वर्ष लगते हैं। हँ? किस बात में? हँ? तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने में। तो फिर अंत हुआ? कब कहें अंत? हाँ, असली अंत जो हुआ, हँ, उसको कहेंगे वानप्रस्थ अवस्था। वाणप्रस्थ माने? वाण माने वाणी। प्र माने प्रकष्ठ। स्थ माने स्थिर हो जाए। वाणी से प्रकष्ट रूप में स्थिर हो जाए। और कोई प्रश्न पूछे-पाछे तो? तो जवाब नहीं देगा? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) देगा? अच्छा? तो वानप्रस्थ कहा जाएगा? कहा जाएगा? हँ? तब तो वानप्रस्थ नहीं कहा जाएगा। वानप्रस्थ तो तब ही हो सकता है कि ऐसा मन का वायब्रेशन कंट्रोल करे कि कोई को प्रश्न पूछने की, क्या, हिम्मत ही न पड़े। जैसे ऋषि मुनियों का शास्त्रों में मिसाल दिया कि ऋषि-मुनियों का जो आश्रमों का वातावरण होता था पुराने जमाने में कैसा होता था? शेर बकरी भी एक घाट पानी पीने लग पड़ते थे। कहाँ शेर, खूंख्वार। और कहाँ सीधी-सादी गाय। वो चीर-फाड़ के खा नहीं जाएगा? लेकिन उसके मन का भी वायब्रेशन, हँ, आश्रम ऋषि-मुनियों के वायब्रेशन की तरह अहिंसक हो जाता था।

तो ऐसी अवस्था को कहेंगे, हाँ, जब वाणप्रस्थ अवस्था होती है तब मैं इनमें प्रवेश करके; क्या कहा? इनमें। इनमें क्यों कहा? हँ? अभी तो एक परमब्रह्म की बात कह रहे थे। फिर इनमें क्यों कहा? हँ? इनमें माना जो चार मुख ब्रह्मा के सामान्य रूप से दिखाए जाते हैं वो चारों मुखधारी ब्रह्मा की आत्माएं जो हैं, वो इसमें मर्ज होना शुरू करें। क्या? जो पाना था सो पा लिया। अब कछु पाना नाहि। तो वो टाइम कब होगा? कब कहें? हँ? हाँ। कहेंगे जब रुद्र माला के जो मणके हैं वो संपन्न बनें। क्या? और विजयमाला की तो पवित्र होने की बात ही न्यारी है। क्यों? कि वो तो पवित्र आत्माएं ही हैं पहले से। उनको ज्यादा ज्ञान सुनने की दरकार है या नहीं है? ज्यादा ज्ञान सुनने की दरकार नहीं है। जो पवित्र आत्माएं होती हैं उनको तो, हँ, प्रैक्टिकल जीवन होना चाहिए या इम्प्रैक्टिकल? क्या कहेंगे? प्रैक्टिकल होना चाहिए। माने अभी-अभी सुना और अभी-अभी किया। कथनी और करनी में अंतर नहीं होगा। होगा नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार। लेकिन उनमें भी कोई अव्वल नंबर और कोई? हाँ, बाद वाले नंबर। तो वो जो विजयमाला के दाने हैं, हँ, उनमें वो रुद्र माला के आत्माएं, हँ, मिक्स हो जाएं और प्रवृत्तिमार्ग की पक्की हो जाएं। पक्की हो जाएं। अगर पक्की होंगी तो फिर व्यभिचार में जाएंगी? हँ? पक्का प्रवृत्तिमार्ग व्यभिचार में जाएगा? फिर तो नहीं जाएगा। तो पक्का प्रवृत्तिमार्ग। हाँ। ज्ञानेन्द्रियों से भी व्यभिचार में न जाए और कर्मेन्द्रियों से तो जाने की बात ही नहीं। और मन से भी? मन से भी व्यभिचार में न जाए। मन भी चलायमान न हो। ऐसी स्टेज शरीर की या रथधारी आत्मा की बने। हाँ। तब क्या कहेंगे? तब पतित-पावन बनना असली रूप में शुरू होंगे या उससे पहले? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) उससे पहले नहीं? उससे पहले नहीं।

तो बताया – हाँ, तो बहुत जन्मों के अंत के जनम के भी अंत में। यानि जब वानप्रस्थ अवस्था हो जाए। बोलने की दरकार न रहे। मनसा के वायब्रेशन से ही हाँ, जो देखे, जो सुने, उसको पक्का 100 परसेन्ट निश्चय बैठ जाए कि मेरा बाप, हाँ, सुप्रीम सोल गॉड फादर आ गया। हाँ। तब मैं इनमें प्रवेश करके फिर तुम बच्चों को श्रृंगार करता हूँ।

A morning class dated 12.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the last line of the first page was – The lokik Father, isn’t he? The unlimited lokik Father; and this is the Paarlokik Father Supreme Soul Shiv. So, look, among both of these, hm, the question of high and low is there, isn’t it? Who is high and who is low? It will be said that the Supreme Soul Shiv is high. And the permanent Chariot in which He enters is low. And what does Nanak also say about the lowly? He says; Second page of the morning class dated 12.11.1967, Sunday. Did you recollect as to what he says? Hm?
(Someone said something.) Asankhya chor haraamkhor. So, will this lowly one come in that list or not? Hm? He will definitely be included. Hm? Does he eat illegally (haraam ka)? Khor means the one who eats. Hm? What does he eat illegally? Hm? What does he steal? Hm? Arey, does he steal something or not? Hm? You don’t know anything? Arey? Arey, speak up fast. Hm? Yes?

(Someone said something.) Does Krishna eat cream? Which Krishna? Hm? Which Krishna eats cream? The Confluence Age Krishna eats cream. This is the theft (chori) that he indulges in. Achcha? The one who is called the Confluence Age Krishna steals through the body only. So, who controls his body like Chariot? Hm? Who is it? Hm? It will be said – The Supreme Soul. So, the one who controls; hm, why can’t he, the number one, who has been included in the list of innumerable thieves (asankhya chor), control? Hm? Arey, there must be some reason, isn’t it? Hm? (Someone said something.) Should the mother (ma) be left free? Hm? Should the mind (man) be left free? Should the mind be left free? Should the mind be left free? Achcha? Shouldn’t the mind-like horse be kept under control? Hm? Yes. Only four horses have been shown in the Chariot. Are there four or five? Four horses have been shown in the Chariot. So, the four horses of Arjun which are shown, which are those four horses, the mind-like horses? Hm? Yes. There are four horses which are depicted as four headed Brahma. So, there will be four souls, will there not be? So, it is not about them. Are they permanent Chariot holders? No.

The permanent Chariot holder, the mind and intellect-like soul is shown to be upwards facing, isn’t it? So, why was that upward facing head (oordhwamukhi mukh) put in the list of innumerable thieves? You will not be able to tell. It was put because he too expresses before the world like this only. What? Body, mind, wealth, everything is yours. Is it not? Yes. When the body has been made ‘yours’ (tera). ‘Yours’ refers to whom? When it was given to the incorporeal, then what is to be stolen through the body? Hm? It is the pleasure, isn’t it? So, the pleasure that has to be stolen, in that the pleasure is derived through the sense organs also and? And it is derived through the organs of action also. Okay, one may renounce the pleasure of the organs of action also; hm? One may renounce. Suppose he has renounced. So, will he renounce the pleasure of the sense organs? Hm? Will he renounce? Hm? The eyes are very deceitful. Will he be able to renounce it soon? Achcha, okay, leave the eyes. They are number one. Yes. There are other sense organs as well. There are ears; hm? Nice songs are played on mobile, aren’t they? Yes, Brahma Baba used to play them during the Murli also, didn’t he? Yes, so, does the heart want to listen to them or not? Does he listen or not? Does he not be listen to them? Arey, speak up. Hm? Does he listen? Achcha? How? How does he listen? Does he listen through a loudspeaker? Does he be listen through the mobile or through TV? How does he listen? Hm? (Someone said something.) Within the mind? That mind is not a sense organ which is seen among the ten organs. Hm? That remembrance is a topic of the mind, isn’t it? Hm?
(Someone said something.) Yes, okay I don’t listen through the ears as well. Achcha? Mothers may sometimes bring nice, fragrant flowers, fragrant things, scented ones, hm, there is porridge, isn’t it? When you add scent to it, it becomes so fragrant. So, would you like to eat or not? Will he eat or not? Hm? Will he eat? Yes, if he feels like eating, then is he a thief or not? Hm? If his heart feels like eating that scented thing or okay eating any sweet thing, eating a rasgulla or any such thing, then is he a thief or not? His heart shouldn’t be pulled towards that. Hm? Yes.

So, it was told, asankhyachor, haraamkhor. They cannot be counted because the number of 500-700 crore human beings can be counted. Hm? They count. 700, 750 crore human souls which have been mentioned, their numbers are counted. But can the number of these asankhychor (innumerable thieves) be counted?? No. Innumerable sinful people. They commit sins. They eat innumerable bhaand. What? What is bhaand? Become adulterous. Hm? Arey, Shrimat is; what? What is the Shrimat? What is Shrimat? Children, the best food is; what? Pulses and rice and? And? And? And potato. Yes. So, if your heart is attracted towards any other things, then is he included in the list of thieves or not? Hm? If the mouth likes to get nice things to eat here, then is he a thief or not? Yes. He is a thief. They eat innumerable bhaand. Nanak has said many such things. Hm? Nanak? Why was the name coined? Naa na kahey (he shouldn’t say no). In which topic? Hm? He should not deny accepting the truth. If any topic is true, then he should accept, shouldn’t he? Yes. So, if he at least accepts the true topics, then he is part of which list? Is he in the list of Pandavas or in the list of Kauravas or in the list of Yadavas? Hm? Yes. He will be said to be in the list of the Pandavas only.

So, the Father says – Look, where have I come from? From where have I come? Hm? I have come from that abode where the souls are ichcha maatram avidya (no knowledge of desires). Does desire (ichcha) exist there? Arey, does any soul have any desire in the Supreme Abode? It doesn’t have any desire at all. Neither organs of action, nor the sense organs. Yes. And the mind also? The eleventh organ? That too doesn’t exist there. So, look, where have I come from? Hm? And the place from where I have come, the stage of that place, hm, yes, and even when I come here, the stage remains the same. So, look my sacrifice is worshipped so much. I am worshipped the most; okay, they worship out of misunderstanding; do they worship Me? Do they worship Me?
(Someone said something.) Do they worship Him? Hm? Arey, can He be remembered or can He be worshipped? He can be remembered. So, whom do they worship? (Someone said something.) Yes, the one in whom He enters in a permanent manner, they worship his form, who obtains the inexhaustible stock house of knowledge and assumes a stage equal to the Father, incorporeal, viceless, egoless, yes. So, do they know the reality? They do not know. However they have such feeling that they worship Me the incorporeal. Hm? Yes, they remember; arey, can the one who is incorporeal, most subtle of subtle, can one think about Him? Hm? Can one think about Him? Is He unthinkable (achintya) or thinkable? He is unthinkable. However, the permanent Chariot in which I come, hm, and the soul in whose Chariot I come, dehi; deh (body) or dehi? Dehi. I sit beside Dehi i.e. the soul which holds the body (deh); so, they remember that soul. Hm? Does it play a part on this world stage or not? It plays.

So, what have I come to do here now? Hm? What have I come to do? Arey? These people who perform wrong actions, do not refrain from stealing at all, have I come to stop them from stealing or not? Hm? No? Yes, I have come [to stop them].

So, that is it, first the children issued an order; what did they order? Hm? O Baba, the purifier of the sinful ones, come! Who should come? Should the purifier of the sinful ones, hm, the Father of souls, the Supreme Soul point of light come? No. Who should come? Baba, come. Achcha! He will be called Baba, grandfather only when; He is called Baba when the incorporeal point of light Shiv enters in a corporeal body. Achcha? So, children have ordered. Hm? O Baba, the purifier of the sinful ones! Come. So, now tell, where should I come? Hm? You say that come in this sinful world. Come in those who perform sinful actions like stealing, cheating, hm, those who perform evil actions. Achcha? So, arey, brother, even in the sinful world in whose body should I come in a permanent manner? Hm? And otherwise, in whose all bodies should I come? You say – Yes, come in a sinful body. Hm? It is because if He comes in a pure one, if there is a sanyasi, there are some first class sanyasis, aren’t there? For example, there was Aadi Shankaracharya. Was he first class or was he of slightly lower category? He was a first class Sanyasi. So, you say; should I come in a sinful body? Yes, come in a sinful body.

So, the Father comes and says in the end of the last birth of many births. Why does He say like this? Hm? Many births are how many? Hm? Many births are 84 births. When? Hm? 84 births have taken place. Yes. It will be said in 36 that 84 births have taken place. So, in the end of many births. So, its end will be said that brother, this one started becoming old. Sixty years are over. The vaanprasth stage started. Hm? So, the end will be said to be at that time only, will it not be? Yes, that the last time has arrived brother. Now this body has started becoming old. So, it was told – Even in the end of the last of many births. What? Even its end. So, which is that? Hm? Why was it said ‘its end’? Yes? Of the end of many births. So, end is when Brahma completes hundred years age. Hm? Okay, be it of Parambrahm only, of the permanent Chariot holder. Hundred years age should be completed; yes. So, when does it happen? Hm? Yes, it happens in 76. And that has been written in the Mahabharata scripture also; what? That 32 years old Shankar’s body, so, his task of merging into Parambrahm starts. Parambrahmleenmaasi (merging into Parambrahm). It has been said so. So, this is a topic of the end of many births. 76, isn’t it? And then in the end of his birth also. Arey, what is the end of his birth? Hm? What is the end of the form of Parambrahm that he achieved? The form of Parambrahm that he achieved, hm, will it be said for him that the true purusharth began or is the same purusharth of basic [knowledge] going on? The true purusharth, hm, started now. So, when will you say it is the end of that as well? Hm?

That has also been told in the Murli. You children take 40 to 50 years. Hm? In which topic? Hm? In transforming from tamopradhan to satopradhan. So, is it the end? When will you say it’s the end? Yes, the true end will be said to be the vaanprasth stage. What is meant by vaanprasth? Vaan means Vani (speech). Pra means prakasth (special). Sth means to become constant. He should become constant in special form through speech. And if anyone asks any questions? So, will he not give a reply? Hm?
(Someone said something.) Will he give? Achcha? So, will he be called vaanprasth? Will he be called? Hm? Then he will not be called vaanprasth. He can become vaanprasth only when he controls the vibrations of the mind in such a way that nobody can gather courage to raise a question at all. For example, an example of sages and saints has been given in the scriptures that how the atmosphere of the hermitages (ashrams) of sages and saints in the ancient times used to be? Lion and goat also used to start drinking water from the same source of water. On the one side is ferocious lion. And on the other side is the simple cow. Will it not tear her and eat? But even its mind’s vibrations used to become non-violent like the vibrations of the ashrams of sages and saints.

So, such stage will be called, yes, when the vaanprasth stage starts then I enter in these; what has been said? In these (inmay). Why was it said ‘in these’? Just now He was talking about one Parambrahm. Then why did He say ‘in these’? Hm? ‘In these’ means the four heads of Brahma which are depicted ordinarily; the souls of all those four heads of Brahma should start merging in this one. What? I have achieved whatever I had to achieve. Nothing else is to be achieved. So, when will that time come? When would we say? Hm? Yes. It will be said that when the beads of the Rudramala become perfect. What? And the topic itself of Vijaymala being pure is unique. Why? It is because they are already pure souls from the beginning. Do they need to listen to more knowledge or not? They need not listen to more knowledge. Should the pure souls have a practical life or impractical? What would you say? It should be practical. It means that just now you listen and just now you do it. There will not be any difference in words and deeds. It will be numberwise as per purusharth. But even among them someone is number one and someone? Yes, latter numbers. So, the souls of the Rudramala should mix with the beads of the Vijaymala and become firm on the path of household. They should become firm. If they are firm, then will they indulge in adultery? Hm? Will the firm path of household indulge in adultery? Then he will not indulge. So, firm path of household. Yes. He should not indulge in adultery through the sense organs also and there is no question of indulging [in adultery] through the organs of action at all. And through the mind also? He should not indulge in adultery even through the mind. The mind should not become inconstant, too. The body or the Chariot-holder soul should achieve such a stage. Yes. What will you say then? Will he start becoming purifier of the sinful ones (patit-paavan) in true form at that time or before that? Hm?
(Someone said something.) Not before that? Not before that.

So, it was told – Yes, so, in the end of the last birth of many births. It means that when the vaanprasth stage is reached. There should not be any need to speak. Just through the vibrations of the mind, yes, whoever sees, whoever listens, he should develop 100 percent firm faith that my Father, yes, the Supreme Soul God Father has come. Yes. Then I enter in these and then decorate you children.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2793, दिनांक 16.02.2019
VCD 2793, dated 16.02.2019
प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning class dated 12.11.1967
VCD-2793-extracts-Bilingual

समय- 00.01-22.36
Time- 00.01-22.36


प्रातः क्लास चल रहा था – 12.11.1967. रविवार को दूसरे पेज के मध्य में बात चल रही थी कि देहभान में रहने के कारण मनुष्य अपने को बिल्कुल भूल जाते हैं। देह का पद-मान-मर्तबा ही याद रहता है। कहते हैं मैं बैरिस्टर हूँ, प्रेसिडेंट हूँ, ये हूँ, वो हूँ। बाप कहते हैं तुम तो अपन को भी नहीं जानते, तो बाप को भी नहीं जानते। तो उनको कहा जाता है निर्धनके, आर्फन। हैं सभी बिगर बेहद के बाप को जानने वा रचना को और रचना के आदि, मध्य, अंत को जानने, उसको कहा जाता है, जो नहीं जानते हैं इनको तो नास्तिक। नास्तिक अर्थात् इस दुनिया में कोई के ऊपर आस्था नहीं। तो मैं आकर ऐसे आस्तिक, नास्तिकों को आस्तिक बनाता हूँ। कैसी आस्था वाला? एक के ऊपर आस्था दृढ़ कराता हूँ। तो ये कहते हैं हाँ, अभी तुम जानते हो कि हम बाप को भी जानते हैं। ये कहते हैं। बिल्कुल अच्छी तरह से जानते हैं।

हम जानते हैं कि कैसे वो ड्रामा के प्लैन अनुसार आते हैं। बाप तो कहेंगे हाँ, प्लैन तो है ना बच्चे। और उन गवर्मेन्ट्स को भी अपना-अपना प्लैन्स तो सबका होता है ना। जैसे गवर्मेन्ट का फाइव इयर प्लैन, कोई का आठ इयर प्लैन, दस इयर प्लैन। तो फिर बाप आकर कहते हैं भई मेरा वरी सबसे अच्छा प्लैन है। और बार-बार प्लैनिंग नहीं करता हूँ। कि बिचारे मनुष्यों को आदमशुमारी करनी होती है। तो कभी कमती कर लेते हैं। ज्यादा कर देते हैं। समझते हैं ये तो जन्मते जाएंगे और इतना अन्न तो पैदा नहीं कर सकेंगे। तो अभी क्या करें? पीछे देखो कितने उपाय करते हैं! मनुष्य के जन्म कम हों, पॉपुलेशन ज्यादा न बढ़े। अभी तो शायद टैक्स भी लगाएंगे। फिर तीन-चार-पांच के ऊपर बच्चे पैदा करेंगे तो उनको कहेंगे टैक्स लगाओ। बताओ। इनके ऊपर टैक्स लगाओ। हाँ, अभी टैक्स, अभी तो टैक्स-वैक्स का ये प्लैन नहीं चलता है। अभी तो बाप आते हैं। अभी देखो तुम दुनिया में फैमिली प्लैनिंग भी देखो। और ये बाप की फैमिली प्लैनिंग भी देखो। कितनी वंडरफुल प्लैनिंग है। वो तो बोल देते हैं कि हम दस, नौ बरस के अंदर यहाँ बाकि हम नौ लाख आदमी छोड़ेंगे। कौन कह देते हैं? वो। वो माने कौन? हँ? किसके लिए बताया? वो माने बाबा ने शंकर की तरफ इशारा किया। हँ? शंकर द्वारा विनाश गाया हुआ है। तो वो बोल देते हैं कि 9-10 बरस के अंदर 9 लाख आदमी छोड़ेंगे। छोड़ेंगे। बाकि सब फैमिली प्लैनिंग हो जाएगी। तो ये सभी शरीर छोड़करके और जाकरके मुक्तिधाम में पहुँचेंगे। देखो बिगर कोई मेहनत।

ये तो भक्ति है। भक्ति तो जो करते ही हैं। सभी मुक्ति के लिए करते हैं। जीवनमुक्ति के लिए नहीं करते हैं। सुख के लिए नहीं करते हैं। हाँ, शांति के लिए करते हैं। तो जभी भी कोई यहाँ आएंगे ऋषि-मुनि, सन्यासी, वगैरा-वगैरा जो भी आएंगे क्योंकि तमोप्रधान तो सब बन गए हैं ना। ये दुनिया तो नहीं जानती है कि जो भी ये साधु-सन्यासी, सेजस हैं या ये सभी जो ऋषि-मुनि हैं, हँ, चाहे देव आत्माएं हैं, सब इस सृष्टि में उतरते आए हैं नीचे। और सबकी कला कम होती जाती है। भोगी हैं तो सुख भोगते-भोगते आत्मा की शक्ति क्षीण होती जाती है। कभी भी किसी की कला थोड़ी ऊपर नहीं हो सकती कि डाटा ऊपर चला जावे। सीढ़ी ऊपर चढ़ जावें। ये तो हो ही नहीं सकता है। ये सीढ़ी तो जरूर नीचे उतरनी है। क्योंकि ये तो बनी-बनाई बन रही है ना। कल्प-कल्प का बना हुआ ड्रामा है। 12.11.67 की प्रातः क्लास का तीसरा पेज। तो इसको कहा ही जाता है प्री-आर्डिनेन्ट इम्पेरिशेबुल ड्रामा। माना ये ड्रामा में चेंज तो हो ही नहीं सकती। समझा ना। और ये बना-बनाया ड्रामा है। ऐसे नहीं कहेंगे किसी ने बनाया। अगर ये कहें किसी ने बनाया तो कहेंगे कब बनाया? तो ये तो बना-बनाया ड्रामा है। फिर से वो ही रिपीट करेगा ना बच्चे। तो फिर ये भगवान की महिमा क्यों करते हैं कि वो सर्वशक्तिवान ये है, वो है जबकि सब कुछ है ही ड्रामा के अंदर। तो फिर बाप तो कहेंगे कि मैं भी ड्रामा के अंदर बांधा हुआ हूँ। क्योंकि बाप को जब बुलावें तब तो नहीं आते हैं। क्यों नहीं आते हैं? क्योंकि उनको तो आना ही एक बार है ना। और कल्प के, कल्प-कल्प के पुरुषोत्तम संगमयुग में आना है। बार-बार तो नहीं आना है। और ये भी मजाल क्या है कि जो पुरुषोत्तम संगमयुग के एक सेकण्ड भी इधर या उधर हो जाए। नहीं। बिल्कुल एक्यूरेट टाइम पर आएगा।

तो वो मनुष्य तो बिचारे इस दुनिया के कुछ भी नहीं जानते हैं ना। किन बातों को? जो बातें बाप बैठकरके समझाते हैं। और बाप तो फिर कहते हैं कि मुझे तुम बुलाते ही हो। किसलिए बुलाते हो? हँ? तुम बुलाते हो कि हम पतितों को आकरके पावन बनाओ। अब पतित तो सभी हो। सन्यासी हों, उदासी हो। इतना चिन्मयानन्द, इतना शिवानन्द, फलाना ये नन्द, वो नन्द। ये भी सभी गंगाजी में टुबका खाते रहते हैं। टुबका खाते रहते हैं कि घुटका खाते रहते हैं? क्यों खाते रहते हैं? क्योंकि पतित हैं ना। अब स्नान-व्यान तो पतित ही करेगा ना। और गंगा अगर पतित-पावनी है तो पावन होने के लिए आएंगे स्नान करने। हैं तो पतित। तो पतित हैं, फिर भी तो घड़ी-घड़ी आते हैं ना स्नान करने। कोई एक बार से तो हो नहीं जाता है। और फिर ये तो जन्म-जन्मान्तर स्नान करने आते हैं। अभी देखो पावन तो कोई बनता ही नहीं है। हँ? ये तो सभी गपोड़े मारते रहते हैं। हँ? क्यों नहीं बनते पावन? हँ? शूटिंग कहाँ होती है? रिहर्सल तो इस संगमयुग पर होती है ना। अब वो जो पंडे-पुजारी हैं ना वो जिज्ञासुओं को लेकरके जाते हैं। हँ? वो भी तो शूटिंग यहाँ होती है ना। फालोअर्स को लेकरके जाते हैं। और ढ़ेर के ढ़ेर लाखों जाकर इकट्ठा होते हैं। वो है स्थूल पानी के स्नान की बात। स्थूल शरीर का स्नान कराते हैं। और यहाँ शूटिंग पीरियड में बाप क्या कराते हैं? ज्ञान स्नान कराते हैं आत्मा को। क्यों? समझते हैं गंगाजी पतित-पावनी है। उसमें स्नान करेंगे। हँ? तो क्या उनको बाप नहीं दिखाई पड़ता? हँ? बाप नहीं दिखाई पड़ता। अब जरूर पतित-पावनी गंगा तो है ही नहीं ना। और पतित-पावन तो बाप को कहते हैं, बुलाते हैं।

और क्या ये गंगाएं तो इस दुनिया में हैं ही हैं ना। फिर ये पावन बनाने वाली गंगा कहाँ से आई? हँ? वो तो दिखाते हैं कि शिव भगवान के सर के ऊपर से आई। हँ? अब सर के अंदर ज्ञान गंगा होती है कि पानी की गंगा होती है? अब तुम बच्चे तो इन बातों को समझाय सकते हो। और सबको समझाय सकते हो कि ये गंगा थोड़ेही पतित-पावनी है। हँ? ये गंगा पतितों को पावन इसलिए नहीं बनाय सकती, ये तो पानी है। हँ? पानी को बिलोएंगे तो कुछ अमृत निकलेगा, मक्खन निकलेगा? नहीं निकलेगा। अमृत निकला तो देवताएं अमर बने। तो ये तो पानी है, हँ, जिनमें कुछ भी नई बात नहीं निकल सकती। नई बात कब निकल सकती है? मनन-चिंतन-मंथन करें तो नई बात निकले। तो शास्त्रों में वो सागर-मंथन बहुत प्रसिद्ध है। हँ? अब ये नदियां तो, बरसात बरसती है, तो देखो कितनी बाढ़ आती है। और वो बरसात तो सतयुग से लेकरके बरसात बरसती आती है ना। और फिर वो कब तक बरसती रहती है? कलियुग के अंत तक बरसती रहती है। हँ? वो स्थूल जल की बरसात होती है। और यहाँ? यहाँ ज्ञान जल की बरसात होती है। कौनसे ज्ञान जल की? गंगा के ज्ञान जल की, पानी के जल की बरसात होती है या वो जो अमृत मंथन बताया, अमृत की बरसात होती है? हँ? तो देखो ये बरसात तो शूटिंग में भी चक्कर लगाती रहती है। हँ? और वो ब्रॉड ड्रामा में भी चक्कर लगाती रहती है स्थूल बरसात। तो ये बरसात तो पड़ती रहती है। और ये नदियां तो नीचे की ओर; ऊपर जाती हैं कि नीचे जाती हैं? नीचे की ओर बहती रहती हैं। हाँ, इतना जरूर है कि जब सतयुग है तो ये सभी नदियां कायदे अनुसार हो जाती हैं। हँ? कायदे अनुसार माने? क्या? नीचे की ओर नहीं बहती सतयुग में, त्रेता में, स्वर्ग में? हँ? हाँ, आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाती हैं; देह भान में नहीं जाती तो नीचे बहेंगी या स्थिर रहेंगी? हाँ।

अभी जो स्नान करने जाते हैं डूबते रहते हैं कि नहीं? हाँ, डूबते भी रहते हैं। शूटिंग कैसे होती है? कैसे शूटिंग होती है? देह भान में डूब जाते हैं कि नहीं? अरे, नदियों में स्नान करते हैं तो देहभान में डूबते हैं कि नहीं? डूबते हैं। बरसात जास्ती नहीं पड़े, बिल्कुल एक्यूरेट पड़े, ये तो अब ये हो ही नहीं सकता। हँ? और शूटिंग काल में भी? हो ही नहीं सकता। क्योंकि ये सभी हैं जितने भी साधु-सन्यासी, उदासी, जो भी हैं स्नान करने वाले, ये सब दास बन जाते हैं। क्या? दास माने? दास माने? अरे, कल बताया था, परसों क्या बताया था? मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा। तो ये गुलमई करने लग पड़ते हैं। और सभी; चाहे चैतन्य आत्माएं हों और चाहे ये पांच जड़ तत्व हों, ये सभी दास बन जाते हैं। किसके? हँ? कहाँ? ये रावण संप्रदाय की दुनिया में, हाँ, माया रावण के सभी दास बन जाते हैं। तो देखो फिर दास बनना भी पड़ता है। हँ? ब्रॉड ड्रामा में ही या शूटिंग पीरियड में भी? हँ? हाँ, शूटिंग पीरियड में भी दास बनना ही पड़ता है। हँ? वो दास को जैसे चलाएगी मालकिन वैसे ही चलेंगे ना। वैसे ही चलेंगे। तो देखो अभी कितना दास बनना पड़ता है! हँ? और कहाँ तक दास बनना पड़ता है! हँ?

अभी कोई देखे कितनी फ्लड्स होती है! हँ? नदियों में बाढ़ आती है ना। हँ? तो पानी शुद्ध होता है? नहीं। कैसा होता है? हँ? देह अभिमान की मिट्टी से भरपूर पानी बहता है। और ये बाढ़ तो सब जगह होती है ना। ऐसे नहीं कि कोई ये बाढ़ भारत में ही होती है। नहीं। कभी कहाँ किस देश में, कभी कहाँ किस देश में। कभी देखो तूफान कितने आते हैं! हँ? तूफान आते हैं। बरसात देखो! हँ? कभी टाइफून। क्या कहते? साइक्लोन। देखो! तो वहाँ दुनिया कोई खाली थोड़ेही होती है। हँ? इतने साइक्लोन आते रहते हैं, इतनी बाढ़ आती रहती है, अकाल पड़ते रहते हैं। हँ? क्या? बोड़मबोड़ भी होती रहती है तो कोई आबादी कम हो जाती है क्या? नहीं। दुनिया खाली नहीं होती। तो फिर बाप समझाते हैं और वो भी तुम बच्चों के लिए समझाते हैं, हँ, कि मैं ही स्वरग की स्थापना करता हूँ।

A morning class dated 12.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the second page on Sunday was that because of being in body consciousness human beings forget themselves completely. They remember the post, respect and position of the body only. They say that I am a Barrister, I am a President, I am this, I am that. The Father says – You do not even know yourself; so, you do not know the Father as well. So, they are called nirdhanke, orphans. All are without the knowledge of the unlimited Father or the creation and the beginning, middle and end of the creation; those who do not know are called atheists (naastik). Naastik means that there is no faith (aastha) on anyone in this world. So, I come and transform such atheists into theists (aastik). One with what kind of faith? I enable the faith on One strong. So, this one says, yes, now you know that we know the Father also. We say this. We know very well.

We know that how He comes as per the drama plan. The Father will say, yes, there is a plan, isn’t it children? And those governments also have their individual plans, don’t they? For example, government’s five year plan, someone has an eight year plan, ten year plan. So, then the Father comes and says – Brother, My plan is the best one. And I do not indulge in planning again and again. Poor human beings have to make a census. So, sometimes they count less, sometimes they count more. They think that these people will keep on getting birth and we will not be able to produce food grains to that extent. So, what should we do now? Later, look, they take so many measures so that the number of human births reduces, population does not increase. Now perhaps they will impose tax as well. Then if someone gives birth to more than three, four, five children, then they will be asked to impose a tax. Tell. Impose tax on them. Yes, well tax, now this plan of tax, etc. is not fruitful. Now the Father comes. Now look, you also look at the family planning in the world. And look at this family planning of the Father also. It is such a wonderful planning. They say that we will leave nine lakh men here within ten, nine years. Who says? They. Who are they? Hm? For whom was it said? ‘They’ means that Baba pointed towards Shankar. Hm? Destruction through Shankar is famous. So, they say that we will leave 9 lakh men within 9-10 years. We will leave. All others will undergo family planning. So, all these will leave the bodies and reach the abode of liberation (muktidhaam). Look, without any hard work.

This is Bhakti. People definitely do Bhakti. All do [Bhakti] for mukti (liberation). They do not do for jeevanmukti (liberation in life). They do not do for happiness. Yes, they do for peace. So, whenever any sage, saint, sanyasi, etc. comes here because everyone has become tamopradhan, haven’t they? This world doesn’t know that all these sages, sanyasis, sages or these sages and saints, be it the deity souls, all have been undergoing downfall in this world. And everyone’s celestial degree goes on decreasing. When they are bhogis (pleasure-seekers), then while enjoying pleasures, the soul’s power keeps on decreasing. Nobody’s celestial degree can rise a little that the data goes up or they climb up the Ladder. This cannot be possible at all. They have to definitely climb down the Ladder. It is because whatever has already been fixed is being made. It is a an already fixed drama of every Kalpa. Third page of the morning class dated 12.11.67. So, this is called pre-ordinant (pre-ordained) imperishable drama. It means that there cannot be any change in this drama at all. Did you understand? And this is a pre-ordained drama. It will not be said that anyone has made it. If we say that anyone has made it, then they will say when was it made? So, this is a pre-ordained drama. Children, it will repeat the same thing, will it not? So, then why do people praise God that He is Almighty, He is this, He is that when everything is within the drama? So, then the Father will say that I am also bound within the drama. It is because the Father doesn’t come when He is called. Why doesn’t He come? It is because He has to come only once, will He not? And He has to come in the Purushottam Sangamyug (elevated Confluence Age) of Kalpa, Kalpa, Kalpa. He doesn’t have to come again and again. And it is impossible that even a second of Purushottam Sangamyug changes from here to there. No. It will come at the completely accurate time.

So, those poor human beings of this world do not know anything, do they? Which topics? The topics which the Father sits and explains. And then the Father says that you call Me only. Why do you call? Hm? You call that come and make us sinful ones pure. Well, all of you are sinful. Be it the Sanyasis, be it the Udaasis. Such Chinmayanand, such Shivanand, such and such Nand, that Nand. All these people keep on taking a dip in the Gangaji. Do they keep on taking a dip or do they keep on getting duped? Why do they keep on getting duped? It is because they are sinful, aren’t they? Well, only a sinful one will bathe [in the rivers], will he not? And if the Ganges is purifier of the sinful ones (patit-paavan), then they will come to bathe in it to become pure. They are sinful. So, they are sinful, yet, they come to bathe again and again, don’t they? It does not get accomplished in one attempt. And then they come to bathe birth by birth. Now look, nobody becomes pure at all. Hm? Everyone keeps on boasting. Hm? Why don’t they become pure? Hm? Where does the shooting take place? The rehearsal takes place in this Confluence Age, doesn’t it? Well, those Pandey-Pujaris (guides and priests) take the seekers (jigyaasu). Hm? That shooting also takes place here, doesn’t it? They take the followers. And numerous lakhs go and gather. That is a topic of bathing in physical water. They bathe their physical body. And here in the shooting period what does the Father enable you to do? He enables the soul to bathe in knowledge. Why? They think that Gangaji is the purifier of the sinful ones. They bathe in it. Hm? So, isn’t the Father visible to them? Hm? The Father is not visible. Well, the Ganges is not the purifier of the sinful ones, is she? And people call the Father as purifier of the sinful ones and call Him.

And these Gangeses do exist in this world, don’t they? Then where did this Ganges which makes you pure emerge from? Hm? They show that she came from above the head of God Shiv. Hm? Well, does the Ganges of knowledge exist within the head or does the Ganges of water exist in the head? Now you children can explain these topics. And you can explain to everyone that this Ganges is not a purifier of the sinful ones. Hm? This Ganga cannot make the sinful ones pure because it is water. Hm? If you churn the water, will any nectar, cream emerge? It will not emerge. When the nectar emerged then the deities became imperishable. So, this is water from which no new topic can emerge. When can a new topic emerge? New topic will emerge when you think and churn. So, that churning of ocean is famous in the scriptures. Hm? Well, these rivers, when it rains, then big floods occur. And that rainfall has been taking place from the Golden Age itself, hasn’t it been? And until when does that rainfall keep on taking place? It keeps on raining till the end of the Iron Age. Hm? That is a rainfall of physical water. And here? Here the rainfall of knowledge takes place. Which water of knowledge? Does the rainfall of the water of knowledge of Ganga takes place or does the rainfall of water take place or does the rainfall of nectar, which was mentioned as the churning of nectar, take place? Hm? So, look, this rainfall keeps on revolving during the shooting also. Hm? And the physical rain keeps on revolving in the broad drama as well. So, this rainfall keeps on taking place. And these rivers go downwards; do they go downwards or upwards? They keep on flowing downwards. Yes, one thing is sure that when it is the Golden Age, then all these rivers flow as per rules. Hm? What is meant by as per rules? Don’t they flow downwards in the Golden Age, Silver Age, heaven? Hm? Yes, they become constant in soul conscious stage. If they do not become body conscious, will they flow downwards or will they remain constant? Yes.

Do the people who go to bathe [in rivers] keep on drowning or not? Yes, they also keep on drowning. How does the shooting take place? How does the shooting take place? Do people get drowned in body consciousness or not? Arey, when people go to bathe in the rivers, then do they get drowned in body consciousness or not? They drown. If the rainfall is not excess, if it is accurate, this cannot be possible now. Hm? And even in the shooting period? It cannot happen at all. It is because all these sages, saints, udasis, all those who bathe, become servants (daas). What? What is meant by daas? What is meant by daas? Arey, it was told yesterday, day before yesterday; what were you told? Mai gulaam, mai gulaam tera (I am your slave, I am your slave). So, you start this slavery. And all; be it the living souls and be it these five inert elements, all these become servants. Whose? Hm? Where? In this world of Ravana community, yes, everyone becomes the servant of Maya Ravan. So, look, then one has to become servant as well. Hm? In the broad drama only or in the shooting period also? Hm? Yes, one has to become a servant in the shooting period as well. Hm? The servants will act exactly in the same way as the landlady (maalkin) wants them to act, will they not? They will act like that only. So, look, now you have to become such servants! Hm? And how far do you have to become servants? Hm?

Now someone should see how many floods occur! Hm? Floods occur in the rivers, don’t they? Hm? So, is the water pure? No. How is it? Hm? Water full of the mud of body consciousness flows. And this flood occurs everywhere, doesn’t it? It is not as if this flood occurs in India only. No. Sometimes it occurs in some country and sometimes in some other country. Sometimes look so many cyclones occur! Hm? Cyclones come. Look at the rains! Hm? Sometimes typhoon. What do they say? Cyclone. Look! So, does the world there become vacant? Hm? So many cyclones keep on occurring, floods keep on occurring, droughts keep on occurring; hm? What? Inundation also keeps on happening. So, does the population decrease? No. The world does not become empty. So, then the Father explains and that too He explains for you children, hm, that I alone establish heaven.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2794, दिनांक 17.02.2019
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प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning class dated 12.11.1967
VCD-2794-extracts-Bilingual

समय- 00.01-20.26
Time- 00.01-20.26


प्रातः क्लास चल रहा था – 12.11.1967. शनिवार को चौथे पेज के मध्य में बात चल रही थी – इस कलियुगी दुनिया में एक कैसे हो सकते हैं जब तक ये कलियुगी है दुनिया या कलियुगी शूटिंग है ब्राह्मणों की तब तक एक तो नहीं हो सकते हैं। हाँ, एक होना है ज़रूर। परन्तु जब अनेक खतम हों तब एक हो। एक तो होगा जरूर। तो वो होने का है जरूर। कौन? क्या होने का है जरूर? वो एक है होने का ज़रूर। स्थापना हो रही है। हो रही है। हुई नहीं है। हँ? हुई नहीं है तो हिलना-डुलना हो रहा है या स्थापना हो गई? हँ? अब अनेक तो जाएगा। सभी मिलकरके एक थोड़ेही हो सकते हैं। तो ये बिल्कुल ही जैसे सिम्पुल बात है कि सब मिलकरके एक हो जाएं। इम्पासिबुल है। ये जो ऐसे कहते हैं ना बबूल से कोई बेर मांगे; हँ? ये बैर की बात समझते हो? हाँ, बबूल से बैर मिल सकते हैं? तो ऐसे ही ये बाप से भी मांगना। हँ? ये बाप से मांगना। हे भगवंत! ये शांति हो। तो बाप कहेंगे ये शांति कोई यहाँ हो तो नहीं सकेगी। बाकि हां, शांति स्थापन करने मैं आया हुआ हूँ जरूर। और वो भी एक धरम की। हँ? एक धरम की स्थापना करूंगा तो फिर कौन चाहिए? हँ? अभी तो अनेक धरम हैं। तो उन अनेक धर्मों में जो फालोअर्स हैं उन अनेक धर्मों के कोई न कोई धरमपिताएं भी होंगे जरूर।

तो ज़रूर आया हुआ हूँ एक धरम की स्थापना करके अनेक धर्म का विनाश ज़रूर होएगा। और ये कल्प-कल्प हर 5000 वर्ष होता ही है। तो बिचारे पूछते हैं विनाश? अरे! पर आया हुआ हूँ ना। ये बात जानें। तो बाप कहते हैं अभी एक को जानने से। हँ? एक को जानने से तुम लोग सब उस एक को सब जान जाएंगे। हँ? क्या? सब किससे जान जाएंगे? उस एक से सब जान जाएंगे जब एक को जानेंगे। फिर बाकि जानने का कुछ रहेगा ही नहीं। हँ? क्या? गीता में भी क्या लिखा है? दो ही का ज्ञान है। किसका-किसका? हँ? रथ का और सारथि का। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का। क्षेत्र शरीर को कहा जाता है। तो ज़रूर कोई धरम स्थापन होता है तो धर्म की स्थापना करने वाला कोई एक क्षेत्र रूपी शरीर होता है ना। तो उस एक से सब जान जावेंगे। पूछने का कुछ रहेगा ही नहीं।

तो देखो बाबा समझाते हैं। जबकि बच्ची को ये मालूम पड़ा कि बाबा आ गया है। हँ? नॉलेजफुल आ गया है। देखो, एकदम नॉलेजफुल आ गया है। तो जब वो आया तो वो क्या करेंगे? आया तो क्या करेंगे? नॉलेजफुल आया तो वो जरूर फुल नॉलेज देंगे ना। और फुल नॉलेज देंगे तो फिर बाकि तो नॉलेज की दरकार ही नहीं है। समझा ना? तो देखो, बाप आकरके तुम बच्चों को इतनी नॉलेज देते हैं। इतना समझाते हैं। इतना अपना परिचय और रचना के आदि, मध्य, अंत का परिचय देते। अपना परिचय क्या देते हैं? हँ? इतना। इतना क्या अपना परिचय देते हैं? हँ? क्या-क्या बात बताते? कहते हैं नाम, रूप, गुण, धाम, सब तो बताते हैं। हँ? बेसिक वालों से पूछेंगे तो क्या बताएंगे? हँ? नाम बताएंगे शिव। शिव का क्या मतलब? कहेंगे शिव माना कल्याणकारी। तो परिचय हुआ ना। किसका कल्याणकारी? हँ? सारी दुनिया का कल्याणकारी। तो सारी दुनिया में जो भी हैं मनुष्य मात्र; हँ? सिर्फ मनुष्य मात्र या पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े सब आत्माओं का कल्याणकारी? कहेंगे सबका कल्याणकारी।

तो परिचय मिला ना। हँ? क्या परिचय मिला? हँ? उनका नाम शिव है। अच्छा, फिर रूप क्या है? रूप है बिन्दी। फिर उनकी रचना क्या है? बिन्दु की रचना? बिन्दु तो निराकार। बिन्दु की कोई लम्बाई-चौड़ाई तो होती नहीं। तो फिर उनकी रचना क्या हुई? हँ? क्या कहेंगे रचना? हँ? वो क्या रचना रचते हैं? शिव?
(किसी ने कुछ कहा।) बिन्दु रचते हैं? अच्छा? बिन्दु रचा जाता है? रचा जाता है? बिन्दु रचा तो नहीं जाता। हाँ, पहचान दी जाती है, हँ, कि तुम बच्चे जो अपन को अभी तक देह समझे बैठे थे, वो देह नहीं हो। बिन्दु हो आत्मा। रूप तुम्हारा बिन्दु है। तुम्हारी बिन्दु आत्मा का बाप का भी रूप बिन्दु है। तो तुम्हारा रूप जो निराकार बिन्दु है, हँ, तुम बच्चों का, तो तुम बच्चे कोई रचना रचते हो या नहीं रचते हो इस दुनिया में? हँ? क्या रचना रचते हो? बिन्दु? क्या रचते हो? हँ? और बिन्दु अकेले तो नहीं हो। सिर्फ बिन्दु हो? नहीं। शरीर के साथ कहेंगे ये ज्योतिबिन्दु आत्मा साथ में काम करती है। तो फिर जो रचना रचेंगे वो वैसी ही रचना रचेंगे ना। आत्मा भी हो और देह के साथ हो।

तो फिर तुम जिसे बाप कहते हो कि बाप आया हुआ है अपना परिचय देते हैं तो कैसे परिचय देते हैं? वो शिव बाप परिचय कैसे देते हैं बिन्दु? हँ? बिन्दु परिचय। बिन्दु में से आवाज़ निकलती है? हँ? परिचय देते हैं। तो जो परिचय देते हैं जिसका; अपना तो परिचय दिया। शिव ज्योति बिन्दु। तो जो रचना रचते हैं उसका परिचय देते हैं तो उसका नाम। रचना किसे कहें? हँ? बाप का नाम तो जान लिया शिव। तो रचना का नाम? हँ? रचना का नाम क्या कहेंगे?
(किसी ने कुछ कहा।) रचना का नाम शिव बाबा कहेंगे? कैसे? शिवबाबा कैसे? शिव चाचा क्यों नहीं? शिव ताऊ? हँ? बाबा तो ग्रांडफादर को कहा जाता है। और ग्रांड फादर तब कहा जाता है जब वो ग्रांड सन हो। नहीं? ग्रांडसन हो, सन भी हो। हाँ। तो अपना परिचय जो देते हैं कि मैं शिव ज्योतिबिन्दु हूँ ये कम्प्लीट परिचय है? परिचय देंगे कैसे बिना मुख के? हँ? मुख होगा तभी तो परिचय देंगे। तो जिस मुख में प्रवेश करते हैं वो सत मुख कहा जाए कि असत मुख कहा जाए? सत+मुख; दोनों को मिलाते हैं तो कहा जाता है सन्मुख। क्या? सत और प्लस मुख, दोनों को मिलाते हैं, मेल हो गया तो क्या कहेंगे? सन्मुख। तो जिस मुख के द्वारा परिचय देते हैं वो सन्मुख या विमुख? हँ? क्या कहेंगे? वो रचना तो हुई ना। रचना; सत बाप है, सदा सत है शिव तो झूठ रचना रचेंगे क्या? हँ?

कहते हैं मैं अपना भी परिचय देता हूँ और रचना के आदि, मध्य, अंत का भी परिचय देता हूँ। तो रचना जो रचते हैं उसका आदि, मध्य, अंत होता है? उसका आदि होता है? हँ? अंत होता है? अरे? तो फिर परिचय कैसे देते? और कौन परिचय देते? परिचय देने वाला कौन? और किसका परिचय देते? हँ?
(किसी ने कुछ कहा।) स्वयं का परिचय तो पा लिया ना मैं ज्योतिबिन्दु हूँ। हँ? ज्योतिबिन्दु हूँ। मेरा नाम शिव है। सदा शिव। ऐसे तो नहीं कि आज शिव कल शिव नहीं रहेगा। आज कल्याणकारी, कल नहीं रहेगा। वो तो परिचय दिया। हँ? तो जो रचना रचते हैं वो जैसा बाप होगा वैसी ही तो रचना होगी। कैसी? हँ? आज कल्याणकारी कल अकल्याणकारी? ऐसे हो जाएगा? हँ? नहीं? तो कौन कैसे रचना रचते? क्या है रचना? उसका आदि क्या है और अंत क्या है? बड़ी मुसीबत में पड़ गए। हँ? उसका आदि और अंत है? मेरा आदि है? शिव, जिसका नाम शिव ज्योति है, सदा शिव है और वो उसका आदि, मध्य, अंत है? उसका भी आदि, मध्य, अंत नहीं। तो जो रचना रचते हैं उसका आदि, मध्य, अंत होगा? हँ? उसका भी तो नहीं होगा। तो शास्त्रों में दिखाया है कि सृष्टि रूपी रंगमंच पर एक ही पार्टधारी है शंकर के रूप में, हँ, जिसका न आदि है, न मध्य है, और न किसी को अंत का पता है। तो उसका परिचय देते हैं।

तो परिचय कोई को मिला होगा। हँ? कोई को मिला भी होगा कि नहीं मिला होगा? हँ? अभी तो 80 साल हो गए। परिचय किसी को मिला या नहीं मिला? क्या कहेंगे? किसको मिला? जिसको परिचय मिला हो; कहते हैं – हाँ, मिला। तो हमें भी बता दो। हम भी उससे दरियाफ्त कर लें, हँ, कि हाँ, भई परिचय मिला। ऐसे शंकर जी महाराज का जिनका न आदि होता है न अंत होता है न मध्य होता है। हँ? मिला? किसको मिला? अरे, कौन कहेगा हमको मिला? हँ? अभी तो बोला – उस एक को सब जान जाएंगे तो बाकि कुछ जानने को नहीं रहेगा। जब जानने को ही कुछ नहीं रहेगा तो फिर वार्तालाप या प्रश्नोत्तर करने को रहेगा? हँ? वो भी नहीं रहेगा। तो किसने जान लिया? अरे? जान लिया या नहीं जान लिया? हँ? क्या कहेंगे? हँ? हाँ, ये बात तो जरूर बाबा ने बोल दी; हँ? क्या? कि शंकर का पार्ट ऐसा वंडरफुल है जो तुम बच्चे भी समझ न सको। तो बच्चों में जरूर कोई ऐसा बच्चा होगा जो समझ सके। हँ? नहीं होगा? हँ? होगा। तो कौन कहता है होगा? हमें तो पता नहीं चला। हँ? होगा तो हमें भी बताओ। हम भी थोड़ा मिले-जुलें, हँ, अपना समाधान करें, ढ़ेर सारे प्रश्न हैं, हँ, सृष्टि के आदि, मध्य, अंत के। हँ? 84 जन्मों की, 84 जन्मों के हिसाब-किताब का पता तो चले। हँ? जब तुम ये जान जाते हो। क्या? क्या जान जाते हो? हँ? तो बाप जानते हैं कि बच्चे, हँ, तुम सब आपेही जान जाएंगे मेरे द्वारा। क्या? मेरे द्वारा। द्वारा माना? बिन्दी द्वारा? द्वारा फिर किसे कहा जाए? शिव ज्योतिबिन्दु द्वारा जान जाएंगे? किसके द्वारा जान जाएंगे? हँ? जरूर वो निराकार ज्योति शिव, सदा शिव जिसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करें उसके द्वारा जान जाएंगे। क्योंकि मैं आया हुआ ही हूँ तुमको नॉलेजफुल बनाने। तुमको कोई प्रश्न पूछने की फिर दरकार ही नहीं है।

A morning class dated 12.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fourth page on Saturday was – How can people unite in this Iron-Aged world until this world is Iron-Aged or until the Iron-Aged shooting of Brahmins is taking place, it cannot be united. Yes, they have to definitely unite. But when diversity ends then unity will take place. Unity will definitely take place. That is definitely going to happen. Who? What is certainly going to happen? That unity is definitely going to take place. Establishment is taking place. It is taking place. It hasn’t taken place. Hm? When it hasn’t taken place, then are people shaking or has establishment taken place? Hm? Now diversity will end. Everyone cannot unite. So, this is completely simple thing that everyone unites. It is impossible. People say that someone should seek ber (berry fruit) from Babool (a tree famous for its thorns); Hm? Do you understand this topic of ber? Yes, can you get ber from Babool? So, similar is this seeking from the Father. Hm? This seeking from the Father. O God! Let there be peace. So, the Father will say – This peace cannot happen here. But yes, I have definitely come to establish peace. And that too [establishment] of one religion. Hm? I will establish one religion; so, then who is required? Hm? Now there are many religions. So, there are many followers of those numerous religions; and there will definitely be founders of those numerous religions.

So, I have definitely come to establish one religion and the destruction of many religions will definitely take place. And this definitely happens every Kalpa, every 5000 years. So, poor people ask about destruction. Arey! But I have come, haven’t I? You should know this. So, the Father says – Now, by knowing One; Hm? By knowing One you all people will know that one. Hm? What? Through whom will all know? All will know through that one, when they know one. Then nothing will remain to be known at all. Hm? What? What has been written in the Gita as well? The knowledge is about two things only. What all? Hm? About the Chariot and the charioteer. Of the kshetra (field) and khetragya (occupier of the field). The body is called kshetra (field). So, definitely when a religion is established then there is a field-like body of the one who establishes the religion, isn’t it? So, all will know through that One. There will be nothing to be asked.

So, look, Baba explains. While daughter has come to know that Baba has come; Hm? The knowledgeful one has come. Look, completely knowledgeful one has come. So, when He has come, then what will He do? What will He do when He has come? When the knowledgeful one has come, then definitely He will give full knowledge, will He not? And when He gives full knowledge then there is no need for other knowledge at all. Did you understand? So, look, the Father comes and gives you children so much knowledge. He explains so much. He gives His own introduction and the introduction of the beginning, middle and end of the creation. What is the introduction that He gives about Himself? Hm? So much. What is the introduction that He gives so much? Hm? What all topics does He narrate? He says that I narrate everything including the name, form, virtues, abode. Hm? If you ask those who follow basic [knowledge], what will they tell? Hm? They will tell the name is Shiv. What is the meaning of Shiv? They will say – Shiv means benevolent. So, it is an introduction, isn’t it? Whose benevolent? Hm? Benevolent for the entire world. So, all the human beings in the entire world; hm? Benevolent for just human beings or for all the souls of animals, birds, worms and insects as well? It will be said that He is benevolent for everyone.

So, you got the introduction, didn’t you? Hm? What introduction did you receive? Hm? His name is Shiv. Achcha, then what is the form? The form is point. Then what is His creation? Creation of the point? Point is incorporeal. A point does not have any length and breadth. So, then what is His creation? Hm? What would be said to be His creation? Hm? What creation does He create? Shiv?
(Someone said something.) Does He create a point? Achcha? Is a point created? Is it created? A point is not created. Yes, an introduction is given that you children who had considered yourself to be a body until now are not that body. You are a point, a soul. Your form is a point. The form of the Father of you point-like souls is also a point. So, your form, which is incorporeal point, of you children, then do you children create any creation or not in this world? Hm? What creation do you create? Point? What do you create? Hm? And you are not a point alone. Are you just a point? No. It will be said that this point of light soul works along with the body. So, then the creation that you create will be a likewise creation, will it not be? There should be a soul as well as a body.

So, then the one whom you call as Father that the Father has come, gives His introduction, so, how does He give His introduction? How does that Father Shiv, the point give His introduction? Hm? Introduction of the point. Does sound emerge from a point? Hm? He gives introduction. So, the one whose introduction He gives; He gave His introduction. Shiv the point of light. So, the creation that He creates, He gives his introduction, so his name. What will be called the creation? Hm? You have come to know the Father’s name as Shiv. So, the name of the creation? Hm? What will be the name of the creation called?
(Someone said something.) Will the name of the creation be called ShivBaba? How? How ShivBaba? Why not Shiv Chacha (younger brother of Father)? Shiv Taau (elder brother of Father)? Hm? A grandfather is called Baba. And he is called a grandfather when there is a grandson. No? There should be a grandson as well as a son. Yes. So, the introduction of Himself that He gives that I am a point of light Shiv, is this complete introduction? How will He give introduction without a mouth? Hm? He will give introduction only when there is a mouth. So, the mouth in which He enters, will that mouth be called a true mouth (sat mukhh) or a false mouth (asat mukhh)? Sat+Mukhh; when both are brought together, then it is called sanmukh. What? Sat and plus mukhh, both are brought together, when both meet, then what will you say? Sanmukh. So, the mouth through which He gives introduction, is it sanmukh or vimukh (against the mouth)? Hm? What will you say? That is a creation, isn’t it? Creation; When Shiv is a true Father, forever truth, then will He create a false creation? Hm?

He says that I give My introduction as well as the introduction of the beginning, middle and end of the creation. So, the creation that He creates, does it have a beginning, middle and end? Does it have a beginning? Hm? Does it have an end? Arey? So, then how does He give the introduction? And who gives the introduction? Who gives the introduction? And whose introduction does He give? Hm?
(Someone said something.) You got the introduction of the self that I am a point of light, didn’t you? Hm? I am a point of light. My name is Shiv. Forever Shiv. It is not as if today He is Shiv and He will not remain Shiv tomorrow. He is benevolent today and will not remain tomorrow. He gave that introduction. Hm? So, the creation that He creates, the creation will be exactly like the Father. How? Hm? Today benevolent and tomorrow non-benevolent? Will it happen like this? Hm? No? So, who creates what kind of creation? What is the creation? What is its beginning and what is the end? You have got entangled in a big difficulty. Hm? Does He have a beginning and an end? Do I have a beginning? Shiv, the one whose name is Shiv Jyoti (light), Sadaa Shiv and does He have a beginning, middle and end? He too does not have a beginning, middle and end. So, will the creation that He creates have a beginning, middle and end? He too will not have. So, it has been shown in the scriptures that there is only one actor in the form of Shankar on the world stage, who neither has a beginning, nor a middle, nor does anyone know about his end. So, He gives his introduction.

So, someone must have received the introduction. Hm? Would anyone have received or not? Hm? Now 80 years have passed. Did anyone receive the introduction or not? What would you say? Who received? The one who received; People say – Yes, we have received. So, tell me also. I will also request him, hm, that yes, brother you received the introduction. Of such Shankarji Maharaj, who does not have a beginning, middle or end. Hm? Did you receive? Who received? Arey, who will say that we received? Hm? Just now it was said that if everyone knows that One, then there will not be anything to be known. When there will not be anything to be known, then will there be any scope for discussions or questions and answers? Hm? That will not remain as well. So, who came to know? Arey? Did you know or not did you not know? Hm? What would you say? Hm? Yes, Baba has definitely said this topic; hm? What? That Shankar’s part is so wonderful that even you children will not be able to understand. So, there will definitely be a child among the children who could understand. Hm? Will he not be there? Hm? He will be. So, who might be saying so? I did not know. Hm? If there is any such person, then tell me as well. Let me also meet him, clear my doubts, I have numerous questions regarding the beginning, middle and end of the world. Hm? Let me know about the 84 births, about the karmic accounts of 84 births. Hm? When you know this. What? What do you get to know? Hm? So, the Father knows that children, you will know automatically through Me. What? Through Me. What is meant by through? Through a point? Then who will be called ‘through’? Will you know through the point of light Shiv? Through whom will you know? Hm? Definitely the one in whom that incorporeal light Shiv, Sadaa Shiv enters permanently, you will know through him. It is because I have come only to make you knowledgeful. Then there will not be any need for you to ask any question at all.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2795, दिनांक 18.02.2019
VCD 2795, dated 18.02.2019
प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning class dated 12.11.1967
VCD-2795-extracts-Bilingual

समय- 00.01-14.53
Time- 00.01-14.53


प्रातः क्लास चल रहा था – 12.11.1967. रविवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – और बाबा ने पूछा कि शिव की बायोग्राफी को जानते हो? क्योंकि बायोग्राफी को जानेंगे तो फालो करेंगे। तो शिव की बायोग्राफी को जानते हो? कौन जानते हो? तुम आत्मा। नंबरवार तो जानते हो। अभी कि भविष्य में जान जाते हो? हँ? कहेंगे जान जाते हो। तो तुम तो फिर नॉलेजफुल ठहरे ना। और दुनिया की मनुष्यात्माओं को तो नहीं कहेंगे नॉलेजफुल। क्यों? क्योंकि एक को जाना तो सबको जाना। किस एक को जाना? हँ? हाँ। उस एक को जाना जो अखूट ज्ञान का भंडार, हँ, मुकर्रर रथ में प्रवेश करके पार्ट बजाता है। तो मुकर्रर रथधारी को कहा जाता है शिवबाबा। हँ? क्योंकि उसमें शिव प्रवेश है। शिव कहा जाता है निराकार आत्माओं के निराकार बाप ज्योतिबिन्दु शिव को। वो तो सदैव ज्योतिबिन्दु निराकार ही है ना। तो बताया – निराकार की बायोग्राफी होती है क्या? निराकार आत्मा जब कोई साकार शरीर में मुकर्रर रथ में प्रवेश करे तो बायोग्राफी बनेगी। तो बताया वो बायोग्राफी को तुम बच्चे जानने वाले नॉलेजफुल ठहरे। जबकि शिव की नॉलेज है, को जानते हो। तो क्या कहेंगे?

तो तुम तो उनसे भी, हँ, बाबा कहते हैं बरोबर मैं तुमको अपने से भी ऊपर बनाता हूँ। हँ? अपने से भी ऊपर बनाता हूँ? अपने माने? बिन्दी से ऊपर? हँ? बिन्दी से ऊपर नहीं। वो सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु जिस मुकर्रर रथधारी में, व्यक्तित्व में प्रवेश करती है, हँ, उसको विश्व का मालिक बनाती है, हँ, किस आधार पर? किस आधार पर विश्व का मालिक बनाती है? हँ? क्या बनती है विश्व का मालिक? अगर विश्व का मालिक बने तो उससे तो ऊँचा कोई होता ही नहीं। तो विश्व का मालिक जब सुप्रीम सोल बाप नहीं बनता तो बच्चा कैसे बनेगा? हँ? बनेगा? बनेगा? अच्छा? लंगोटिया नहीं पहनेगा? विश्व का मालिकपना लेगा कि लंगोटिया पहने हुए दिखाया जाता है? हँ? माना बाप की परंपरा डाली हुई है तो उसपे चलेगा या नहीं चलेगा? हँ? बच्चों को देगा मान-मर्तबा या खुद लेगा? हँ? हाँ, सुप्रीम सोल बाप आकरके बच्चों को मान-मर्तबा देते हैं। कहते हैं बच्चे – आई एम युअर मोस्ट ओबिडियंट सर्वेन्ट। कौनसे बच्चे? आप समान जो ज्योतिबिन्दु आत्मा बनके दिखाएं। उनका ओबिडियन्ट सर्वेन्ट हूँ।

तो बाप के चलाई हुई परंपरा पर जो बच्चा होगा, बड़ा बच्चा तो जरूर चलेगा। क्योंकि बड़े बच्चे को, जितनी भी राजाइयां हुई हैं परम्परा में बड़े बच्चे को राजाई मिलती चली आई है। तो वो जरूर बाप को फालो करेगा। तो क्या फालो करे? हँ? हाँ। वो जिन बच्चों को तैयार करे तो उन बच्चों को अपने सर के ऊपर चढ़ा के रखे। दिखाया जाता है शंकर के सर के ऊपर आठ चढ़े हुए हैं। क्या? आठ चढ़े हुए देखे? आठ मणके हैं। आठ ऐसी आत्माएं हैं जो हाँ, अष्ट मूर्ति कही जाती हैं। और शिव तो मूर्ति नहीं बनता। हँ? तो किसको फालो करके अष्ट मूर्ति बनती हैं? हँ? जो अव्वल नंबर मूर्ति है, हँ, जिसको शंकर के रूप में दुनिया समझती है। हँ? कहा जाता है विश्व का मालिक, विश्व का बादशाह, विश्वनाथ, जगन्नाथ। लेकिन क्या वो बनता है? हँ? जगन्नाथ में देखा क्या बनता है? हँ? वो ही दाल, चावल, कढ़ी। और कुछ मालपुआ बनते हैं क्या? नहीं। तो किसके लिए इतना करता है? हँ? किसके लिए करता है? बच्चों के लिए करता है।

तो बताया- तुमको अपने से भी ऊँच बनाता हूँ। ऊपर। ऊपर बनाता हूँ माने सर के ऊपर रखता हूँ। तुमको मालिक बनाता हूँ। मैं थोड़ेही मालिक बनता हूँ? हँ? आठ दिशाओं का मालिक मैं बनता हूँ? हँ? दिखाया जाता है भक्तिमार्ग में, हँ, ईश्वर के रूप में शंकर का जो रूप है वो ईषाण कोण में उत्तर पूर्व की दिशा में दिखाते हैं। लेकिन क्या वो मालिकाना लेता है? लेता है या बीच में दिखाया जाता है? वो ही चक्कर में दिखाते हैं ना अष्ट देवों को। और बीच में किसको दिखाते हैं? हाँ, बीच में वो हीरा दिखाते हैं। तो हीरा, जो हीरा है, वो पत्थर होता है या पारस होता है? हीरा तो वास्तव में पत्थर ही होता है। और शिव को तो पत्थर नहीं कहेंगे। हँ? वो जिसमें प्रवेश करता है वो अंत तक इस सृष्टि में जब तक टोटल विनाश न हो जाए महाविनाश। सामान्य विनाश तो दुनिया में होता ही रहता है। सब शरीरों का विनाश होता है। महाविनाश माने सारे शरीरों का विनाश। तो उस समय वो तमोप्रधान होता है या सतोप्रधान होता है? वो मूर्ति? तमोप्रधान होती है।

तो बताया कि मैं मालिक नहीं बनता हूँ। शिव बाप कहते हैं – मैं मालिक नहीं बनता हूँ। तो मेरा जो बड़ा बच्चा है मेरे को फालो करने वाला वो कैसे मालिकाना लेगा? लेगा? नहीं लेगा। हाँ, लोग कहते हैं; क्या कहते हैं? विश्वनाथ। हँ? जगन्नाथ। वो कहना एक अलग बात है और प्रैक्टिकल जीवन में, हँ, प्रैक्टिकल जीवन में उस रूप को, उस स्वरूप को धारण करना ये अलग बात है। तो बाप खुद नहीं बनते हैं दिशाओं के मालिक। क्या करते हैं? बच्चों को बनाते हैं। कितनी दिशाएं? इस दुनिया में तो आठ दिशाएं हैं। ऊपर की कोई दिशा होती है क्या? ऊपर तो कुछ होता ही नहीं। आकाश। क्या होता है? शून्य। तो मैं शून्य हूँ तो मेरा बड़ा बच्चा भी क्या बन जाता है? क्या बनता है? शून्य बन जाता है। और वो शून्य को क्या मालिकाना मिलेगा? मालिकाना मिलेगा क्या? हाँ? क्या? फुदुक-फुदुक के मालिकाना डंडा बजाएगा क्या? नहीं। वो भी कौन बजाता है? वो भी धरमराज गाया हुआ है। कौन है धरमराज, धरम का राजा? हँ? हाँ। कहते हैं दादा लेखराज ब्रह्मा की आत्मा ही, हँ, धरम का राजा का पार्ट, धर्मराज युधिष्ठिर नाम कह दो। हँ? भले शरीर भी छूट जाता है; हँ? स्थूल शरीर छूट जाता है ना। तो भी युद्ध में स्थिर रहता है या नहीं रहता है? स्थिर रहता है। तो नाम रख दिया है युधिष्ठिर।

और इस सृष्टि में जो सृष्टि वृक्ष है उसका भी नाम रख दिया है अश्वत्थ वृक्ष। अश्व माने मन रूपी घोड़ा। कैसा मन? मन कैसा होता है? बन्दर की तरह चंचल होता है ना। हाँ। तो वो बन्दर। हाँ। जो अर्जुन के ऊपर भी, रथ के ऊपर, हाँ, ध्वजा में बैठा हुआ दिखाया गया है। कपि। कपिध्वज कहते हैं ना अर्जुन को। हाँ। तो वो उसके ऊपर भी सवार होके पार्ट बजाता है। क्या? क्या पार्ट बजाता है? वो तो बिन्दी बन गया। वो बिन्दी क्या करेगा? करेगा कुछ? हँ? शंकर क्या करता है? कुछ भी नहीं। पार्ट कौन बजाता है फिर? विनाश का पार्ट कौन बजाता है? हँ? और जो धर्मराज के रूप में डंडा बजाने का पार्ट कौन बजाता है? अरे, वो ही बजाएगा, जो बहुत प्यार करेगा वो डंडा भी बजाएगा। हँ? तो कहते हैं ब्रह्मा बाबा ने दुनिया में जितना प्यार दिया उतना दुनिया में किसी ने नहीं दिया। कोई ब्रह्माकुमार-कुमारी बेसिक का हो, एडवांस का हो, ये नहीं कह सकता कि ब्रह्मा बाबा ने हमको तुर्स आँख से भी देख करके दुख दिया। कोई कहेगा? कोई नहीं कह सकता। तो जो प्यार करेगा, हँ, प्यार करेगा, तो फिर वो उल्टा पार्ट नहीं बजाएगा? हँ? अरे, दुनिया में जितनी भी भोगी आत्माएं हैं एकदम ऊँचे ते ऊँचा सतोप्रधान पार्ट भी बजाती हैं, फिर ऐसा भी कोई जनम आता है जिसमें सबसे नीच ते नीच पार्ट बजाती हैं। तो जो प्यार करता है बहुत वो फिर मार भी बहुत देता है।

तो बताया – मैं मालिक नहीं बनता हूँ। हँ? मैं बरोबर तुमको अपने से ऊँचा क्योंकि तुम जानते हो मेरी भी जीवन कहानी जानते हो। क्या कहा? हँ? ‘भी’ क्यों लगा दिया? हँ? बायोग्राफी को जानते हो ना। और इतनी अच्छी तरह से जानते हो; बोलते हैं मनुष्य भारतवासी- कितना भूखवसर हैं। भूख का भी बसर। और बसर का भी भूख। क्या कहा? भूख किसे कहते हैं? भूसा को। और बसर किसे कहते हैं? दाने को। तो दोनों मिलकर क्या कहा जाता है? भूखबसर। तो कौन हुआ? हँ? छिलका कौन हुआ? भूसा कह दो। हँ? जो छिलका भी है और, हँ, छिलका माने भूसा भी है। और फिर शरीर धारण करता है कि नहीं? शरीर भी धारण करता है। तो भूखबसर हुआ ना। तो भूख का भी बसर। और बसर का भी भूख। उसको कहते हैं भूखबसर। उसको। भूख कोई काम में नहीं आता है। क्या? ये देह अभिमान का जो छिलका है ना ये भूख है। ये भूसा है। जानवरों को सिर्फ भूसा खिलाया जाए तो उनको ताकत आएगी? नहीं ताकत आएगी। हरा चारा खिलाना पड़ेगा ना। हाँ। तो भूख में कोई ताकत नहीं। कोई काम में नहीं आता है। हँ? बसर कोई काम में नहीं आता है। हाँ। नहीं, नहीं, बसर कोई काम में आता है। बसर माने दाना। हँ? जो अन्न है ना। अन्न का दाना कहते हैं ना। वो काम में आता है।

तो बताया तो मनुष्य को कभी-कभी कह देते हैं – तुम तो कोई भूखबसर हो। यानि बसर का भी भूख हो। क्या? दाने का भी क्या हो? छिलका हो। जैसे धान होता है ना। वो धान में अच्छा कड़क छिलका होता है कि नहीं? पावरफुल छिलका होता है ना। हाँ। तो क्योंकि वो तो फेंक दिया जाता है। हँ? फेंक दिया जाता है या रखा जाता है? हँ? फेंक दिया जाता है कि रखा जाता है? हाँ, बताया - बाहर में फेंक दिया जाता है ना। हाँ। तो मनुष्य जब इतने भूखबसर बन जाते हैं तब बाप भी आकरके उनको इतना ऊँच बनाते हैं। किनको? भूख बसर को। ये क्या बात हुई? बाप आकरके, हँ, बाप आकरके भूखबसर को इतना ऊँच बनाते हैं? हँ? भूख और बसर दोनों को बनाते। तो कौनसे भूखबसर को बनाते हैं इतना ऊँचा? हँ? जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं वो मुकर्रर रथधारी आत्मा भूख भी है शरीर से और बसर भी है, दाना भी है, ताकत भी है। तो देखो बनाते हैं। फिर बनाना चाहिए ना। हँ? पढ़ना चाहिए ना। हँ? क्या करना? बनाना भी चाहिए और पहले बनेंगे कि पहले बनाना शुरू कर देंगे? हाँ, पहले बनना चाहिए ऐसा भूखबसर जो अपने काम में भी आए जन्म-जन्मान्तर और दूसरी आत्माओं के भी, विश्व आत्माओं के काम में आए, कल्याण के काम में आए। और अभी बनना भी तो अभी है।

A morning class dated 12.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the fifth page on Sunday was – And Baba asked that do you know the biography of Shiv? It is because you will follow Him if you know His biography. So, do you know Shiv’s biography? Who knows? You soul. You know numberwise. [Do you know] Now or do you know in future? Hm? It will be said that you will know. So, you are then knowledgeful, aren’t you? Other human souls of the world will not be called knowledgeful. Why? It is because if you know one, then you know everyone. Which one did you know? Hm? Yes. You knew that one who is an inexhaustible storehouse of knowledge, hm, and plays His part by entering in the permanent Chariot. So, the permanent Chariot-holder is called ShivBaba. Hm? It is because Shiv has entered in him The incorporeal Father of incorporeal souls, the point of light Shiv is called Shiv. He is forever point of light, incorporeal only, isn’t He? So, it was told – Does an incorporeal have a biography? A biography will be formed when the incorporeal soul enters in a corporeal body, in a permanent Chariot. So, it was told that you children are knowledgeful who know that biography when you have the knowledge of Shiv, when you know Him, what would you be called?

So, you, when compared to Him as well, hm, Baba says I definitely make you higher than Me. Hm? Do I make you higher than Me? What is meant by Me? Higher than a point? Hm? Not higher than a point. The permanent Chariot-holder, the personality in which that Supreme Soul, point of light enters, He makes him the master of the world on the basis of what? On the basis of what does it make him master of the world? Hm? Does He become the master of the world? If He becomes master of the world, then there is nobody higher than Him at all. So, when the Supreme Soul Father does not become the master of the world, then how will the child become? Hm? Will he become? Will he become? Achcha? Will he not wear underwear (langotiya)? Will he obtain the ownership of the world or is he shown wearing an underwear? Hm? Does it mean that will he follow the tradition started by the Father or not? Hm? Will he give respect and position to the children or will he grab it himself? Hm? Yes, the Supreme Soul Father comes and gives respect and position to the children. He says – Children, I am your most obedient servant. Which children? Those who become point of light soul like Himself and show. I am their obedient servant.

So, the son, the eldest son will definitely follow the tradition started by the Father. It is because the eldest son, in all the kingships that have existed, the eldest son has been receiving the kingship. So, he will definitely follow the Father. So, what should he follow? Hm? Yes. The children whom he prepares, he should keep those children on his head. It is shown that eight have climbed on to the head of Shankar. What? Did you see the eight having climbed up? There are eight beads. There are eight such souls who, yes, are called the asht moorty. And Shiv does not become a moorty (personality). Hm? So, by following whom do the eight personalities get ready? Hm? The number one personality, hm, who is considered to be in the form of Shankar by the world. Hm? He is called master of the world, emperor of the world, Vishwanath (Lord of the world), Jagannath (Lord of the world). But does he become? Hm? Did you see what is cooked in Jagannath (a temple in Eastern India)? Hm? The same pulses, rice, kadhi. And do they prepare any sweets? No. So, for whom does he do so much? Hm? For whom does he do? He does for the children.

So, it was told – I make you greater than Myself. Above. I make you higher means that I keep you on my head. I make you a master. Do I become a master? Hm? Do I become the master of eight directions? Hm? It is shown on the path of Bhakti, hm, Shankar’s form in the form of Ishwar (God) is shown in the north-eastern direction in the Eeshaan kon (angle/corner). But does he take the ownership/mastership? Does he take or is he shown in the center? The eight deities are shown in the circle, aren’t they? And who is shown in the center? Yes, that diamond is shown in the center. So, the diamond, is the diamond a stone or is it an elixir (paaras)? The diamond is actually a stone only. And Shiv will not be called a stone. Hm? The one in whom He enters, that person, in this world till the end, until the total destruction, the mega destruction (mahaavinaash) takes place; ordinary destructions keep on taking place in the world. All the bodies are destroyed. Mega destruction means the destruction of all the bodies. So, at that time is he tamopradhan (impure) or satopradhan (pure)? That personality? It is impure.

So, it was told that I do not become master. Father Shiv says – I do not become a master. So, how will My eldest son, who follows Me take the mastership? Will he take? He will not take. Yes, people say; What do they say? Vishwanath (Lord of the world). Hm? Jagannath (Lord of the world). That utterance is a different aspect and assuming that form in the practical life, hm, in the practical life is a different aspect. So, the Father does not become the master of directions Himself. What does He do? He makes the children. How many directions? There are eight directions in this world. Is there any upward direction? There is nothing above. Sky. What exists there? Zero. So, when I am a zero, then what does My eldest son also become? What does he become? He becomes zero. And what mastership will that zero get? Will he get mastership? Yes? What? Will he display the stick of ownership by jumping around? No. Who uses that as well? He too is praised as Dharamraj. Who is Dharamraj, the king of inculcation (dharma ka raja)? Hm? Yes. It is said that the soul of Dada Lekhraj Brahma itself plays the part of king of inculcation, call him by the name Dharmaraj Yudhishthir. Hm? Although he loses his body; hm? He loses his physical body, doesn’t he? Yet, does he remain constant in war (yuddh) or not? He remains constant. So, the name has been coined as Yudhishthir.

And in this world, the world tree has also been named Ashwatth Vriksh (Ashwatth tree). Ashwa means mind-like horse. What kind of mind? How is the mind? It is inconstant like a monkey, isn’t it? Yes. So, that monkey. Yes. It has been shown sitting on Arjun, on the Chariot, yes, on the flag. Kapi (monkey). Arjun is called Kapidhwaj, isn’t he? Yes. So, he plays a part by riding on him as well. What? What part does he play? He became a point. What will that point do? Will it do anything? Hm? What does Shankar do? Nothing. Then who plays the part? Who plays the part of destruction? Hm? And who plays the part of using the stick in the form of Dharmaraj? Arey, the same person will use; the one who loves a lot will use the stick as well. Hm? So, it is said that nobody in the world gave as much love as Brahma Baba gave. Be it any Brahmakumar-kumari of basic, of advance, he cannot say that Brahma Baba gave me sorrow by looking at me with an angry eye. Will anyone say? Nobody can say. So, the one who loves, hm, if he loves, then will he not play an opposite part? Hm? Arey, all the bhogi souls in the world play completely highest on high pure part also; then one such birth also comes in which they play the lowest on low part. So, the one who loves a lot, beats a lot as well.

So, it was told – I do not become a master. Hm? I rightly make you higher than Myself because you know My biography (jeevan kahaani) also. What has been said? Hm? Why was ‘also’ added? Hm? You know the biography, don’t you? And you know so well; people, the residents of India say - There are so many bhookhvasar. Basar of bhookh as well. And bhookh of basar as well. What has been said? What is bhookh? Bhoosa (hay). And what is basar? Grain. So, what are both of them collectively called? Bhookhbasar. So, who is it? Hm? Who is the peel? Call it hay (bhoosa). Hm? The one who is a peel as well and, hm, he is peel, i.e. hay also. And then does he assume a body or not? He assumes a body as well. So, he is bhookhbasar, isn’t he? So, basar of bhookh as well. And bhookh of basar as well. He is called bhookhbasar. He. Bhookh (hay) is not useful. What? This peel of body consciousness is bhookh (hay). This is hay. If the animals are fed with just hay, will they get strength? They will not get strength. You will have to feed green fodder, isn’t it? Yes. So, there is no strength in hay. It does not prove to be of any use. Hm? Grain (basar) does not prove to be of any use. Yes. No, no, grain proves useful. Basar means grain. Hm? Food grain is there, isn’t it? You say grain of food, don’t you? That proves useful.

So, it was told that human beings sometimes say that you are bhookhbasar. It means that you are bhookh of basar as well. What? What are you of the grain also? You are a peel. For example, there is paddy (dhaan, i.e. rice with peel), isn’t it? Is the peel of paddy very stiff or not? It is a powerful peel, isn’t it? Yes. So, it is because that is thrown away. Hm? Is it thrown away or is it kept? Hm? Is it thrown away or is it kept? Yes, it was told – It is thrown outside, isn’t it? Yes. So, when human beings become so bhookhbasar, then the Father also comes and makes them so high. Whom? Bhookhbasar. What is this? Does the Father come, hm, does the Father come and make the bhookhbasar so high? Hm? He makes both bhookh and basar. So, which bhookhbasar does He make so high? Hm? The permanent Chariot in which He enters, that permanent Chariot-holder soul is both bhookh (hay) through his body and he is basar also, grain also, strength also. So, look, He makes. Then you should make, shouldn’t you? Hm? You should study, shouldn’t you? Hm? What should you do? You should make as well; and will you become first or will you start making first? Yes, first you should become such bhookhbasar which proves useful for yourself also birth by birth and which proves useful for other souls also, for the souls of the world also, which proves useful in their benefit. And now you have to become now.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2796, दिनांक 19.02.2019
VCD 2796, dated 19.02.2019
प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning class dated 12.11.1967
VCD-2796-extracts-Bilingual

समय- 00.01-17.10
Time- 00.01-17.10


प्रातः क्लास चल रहा था – 12.11.1967. रविवार को छठे पेज के मध्य में बात चल रही थी – आत्मा एक शरीर छोड़ती है, दूसरा लेती है तो नाम, रूप, देश, काल, सब बदल जाते हैं। तो नाम, रूप, फीचर्स, वगैरा एक-दूसरे से मिल नहीं सकते। ऐसी जब बात है तो ज़रूर कुछ बना-बनाया ड्रामा है। बार-बार रिपीट होता रहता है। कोई भी शरीर नाम-रूप से कोई डिफरेंट बन जावे यानि जो मिला हुआ है पार्ट तो अभी इस बात को भी समझना है। ये जन्म-जन्मान्तर डिफरेंट क्यों फीचर्स बनते रहते हैं? हँ? क्यों बनते हैं? क्योंकि भिन्न-भिन्न आत्माओं का संग का रंग लगता है। तो जैसे माता के पेट में, गर्भ में बच्चा पलता है उस समय वो जिस स्वरूप को याद करती है, अगर अपने ही में स्थिर है तो बच्चे का रूप मां के जैसा होगा। और बाप को याद करेगी तो बच्चे का रूप बाप जैसा होगा मिलता-जुलता। नहीं तो किसी और को याद करेगी तो और रूप भी ऐसा ही हो जाता है। तो संग के रंग की बलिहारी हुई ना। मन-बुद्धि की बात है ना।

देखो, बाबा बहुत अच्छी तरह से समझाते हैं कि बच्चे ये जो तुम्हारी छोटी सी आत्मा है ना तो ये तो अब सभी को पक्का है ना ये चमकता है सितारा भृकुटि में। अजब सितारा है। कौनसा सितारा है? भई, आत्मा रूपी सितारा है। अच्छा? सितारा किसको कहा जाए? भई सितारा क्या होता है? देखा है तुमने सितारा? बहुत छोटा एकदम छोटा। तो इतना छोटा भी होता है कोई सितारा जो इन आँखों से देखने में नहीं आता है। अभी जो चीज़ इन आँखों से देखी ही न जाए, देख ही नहीं सकते। और उसमें आत्मा के 84 जन्मों का इतना पार्ट भरा हुआ है। हँ? इतना लंबा-चौड़ा चक्कर मैक्जिमम और मिनिमम भी। कोई के कम जन्म होते हैं। कोई के ज्यादा होते हैं। तो बाबा कहते हैं मिनिमम जन्म लेना तो ये कॉमन बात हो गई। वो तो बहुत लेते हैं। हँ? और जो मैक्जिमम जन्म लेने वाले हैं उनकी संख्या, हँ, थोड़ी होगी कि बहुत होंगे? थोड़ा हो गया। बाकि मैक्जिमम चक्कर 84 जन्म का। और वो कभी एंड नहीं होता है। अब बताओ ये आत्मा रूपी रिकॉर्ड और वो रिकॉर्ड तो दुनियावी तो टूट-फूट जाते हैं। और ये इतनी छोटी सी आत्मा का रिकॉर्ड जिसमें कोई-कोई में मैक्सिमम 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। तो क्या कहें? ये वंडरफुल बात नहीं है तो क्या है?

तो ये सभी वंडरफुल बातें जाननी चाहिए। तो जब वंडरफुल ऐसी बातें जान जाते हो तो कहेंगे दि वंडर आफ दि वर्ल्ड है ही सतयुग। खुद गाते हैं ना। वो मनुष्यों के बनाए हुए वंडर्स। सात वंडर्स। सेवेन वंडर्स आफ दि वर्ल्ड। कहते हैं ना। वो चाइना वाले कहते हैं चाइना की दीवाल, फलाना, टीरा, ताजमहल। अरे, क्या धूलछाईं। अरे, पर वंडर आफ दि वर्ल्ड तो तुम अभी वर्सा पाते हो। वो है। और तुम जो वर्सा पाते हो उसके बाद जो सतयुग में वर्सा पाते हैं वो तो नीचे नंबर वाले हैं। और हैं कितने? हँ? कितने हैं? हँ? कहते हैं तुम पाते हो, तुम बच्चे बहुत हो ना। तो 16 कला संपूर्ण वर्सा तो पाते हो ना। पाते हो। लेकिन तुम्हारे नीचे जो पीढ़ियां जन्म लेती हैं वो कितनी पीढ़ियां हैं? 7 पीढ़ियां सतयुग में और हैं। तो दुनियावालों ने भी जो मनुष्यों ने सात वंडर्स बनाए वो सात ही क्यों बनाए? उन्होंने भी तुम बच्चों को फालो किया है। तुम्हारा है ऊँचे ते ऊँचा स्वर्ग, हँ, हैविन, पैराडाइस। अब वो नंबरवार आत्माएं हैं, नंबरवार पीढ़ियां हैं। वो पैराडाइस में आने वाले भी नंबरवार हैं। तो बस इससे वंडर आफ दि वर्ल्ड दूसरा तो दुनिया में कोई होता ही नहीं।

तो देखो बाप कहते हैं मैं तुमको कितना ऊंच बनाता हूँ। हँ? और वो लोग? वो लोग तो कहाँ नीचे एकदम पाताल में। हँ? हाँ। और तुम भी संग के रंग में आकरके कहाँ एकदम पाताल में जाते हो। फिर मैं आता हूँ तो पाताल से तुमको कहाँ आकाश में चढ़ा देता हूँ। तो तुम बच्चों को तो कितनी खुशी होनी चाहिए। क्यों? क्योंकि दुनिया के जो और धरमपिताएं हैं और उनके फालोअर्स हैं वो इतना ऊँचा आकाश में थोड़ेही चढ़ते हैं जितना तुम ऊँचाई में जाते हो। हँ? और तुम तो फिर इतनी ऊँचाई में जाते हो कि जो गायन है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो इन गोप-गोपियों से पूछो। इन माने कितने? हँ? कितने गोप-गोपियां? शास्त्रों में गाया हुआ है। हँ? 16108 गोप-गोपियों से पूछो। हँ? तो ज़रूर वो राजयोग सीखने वाले होंगे। और जिन्होंने नहीं सीखा वो प्रजावर्ग में चले गए साढ़े चार लाख में। अतीन्द्रिय सुख तो वो भी भोगेंगे ना। भोगेंगे तो। लेकिन प्रजा का सुख और, हँ, और राजघराने का सुख, कुछ अंतर तो होगा ना। हँ? क्या अंतर होगा? जो राजघराने में राजयोग सीखने वाली आत्माएं हैं वो सिर्फ एक ही जनम तक उनका सीमित है कि जन्म-जन्मान्तर का है? जन्म-जन्मान्तर का। और जो प्रजावर्ग में आने वाली आत्माएं हैं जिन्होंने राजयोग सीखा ही नहीं, हँ, और राजयोग सीखने के लिए पवित्रता को धारण किया ही नहीं तो वो तो फिर प्रजावर्ग में ही जाएंगी जन्म-जन्मान्तर या राजघराने में जन्म लेंगी? नहीं लेंगी।

तो तुम बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए। और तुम्हारा नाम भी रख दिया - गोप-गोपियां। क्यों? क्योंकि तुम जो संग का रंग लेते हो वो किसका लेते हो? जास्ती से जास्ती ऊँच ते ऊँच का संग का रंग लेते हो। तो वो गुप्त रूप में लेते हो। दुनिया जानती है? हँ? गुप्त रुप में लेते हो। दुनिया तो नहीं जानती। तो तुम्हारा नाम ही है गोप-गोपियां। तुम्हारा पुरुषार्थ गुप्त, तुम्हारा दान गुप्त, तुम्हारा मान गुप्त। मान-मर्तबा सब गुप्त। तो जिसको बाप से ये ज्ञान मिल रहा है और फिर वो इतना ऊँच पद पाया है; कितना ऊंच पद? हँ? एक-दो जन्म का या जन्म-जन्मान्तर का? हाँ, जन्म-जन्मान्तर का। हैं तो नंबरवार। हाँ। तो तुमने तो अति ऊँच ते ऊँच, अरे, कभी किसको अपने में भी याद न हो कि हमको ये बनना है लक्ष्मी-नारायण। और तुमको बाप आकरके बताया। अरे, तुम तो ये बनने वाले हो। हँ? तो तुम्हारी बुद्धि में आया ना कि हम ये बनने वाले हैं। क्या? लक्ष्मी-नारायण बनने वाले हैं। हाँ। तो अब लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। हैं तो नंबरवार।

अब चाहिए तो माला में अव्वल नंबर। लेकिन नंबरवार पढ़ाई पढ़ते हैं तो फिर 108 की माला है। हं? ऊँच ते ऊँच माला आठ की। फिर 108 की। हँ? तो अब तुम चाहिए तो आठ में आओ, चाहे तो फिर 108 में आओ। हाँ, फिर, हँ, अपना नंबर अच्छी तरह से पकड़ो। क्या? अभी पक्का कर लो। क्या? कि हमें, कि हमने क्या लक्ष्य लिया? क्या बनना है? माला में दाईं ओर का मणका बनना है, बाईं ओर का बनना है, ऊपर का बनना है, नीचे का बनना है, बीच का बनना है? पर तुम मेहनत भी क्या करते हो ये भी तो देखो। हँ? कोई बाबा उठवाते हैं क्या कोई चीज़ तुम्हारे से भारी-भारी? हँ? क्या खेत-वेत में तुमसे फावड़ा चलवाते हैं? हँ? ऐसा तो कुछ नहीं करवाते कि बहुत मेहनत हो। बाबा सिर्फ कहते हैं। क्या? हँ? कि जो तुम उठते हो, बैठते हो, घूमते हो, फिरते हो; अरे वो तुम जो भी करते हो। और पायखाने में जाते हो। अरे, बाथरूम में स्नान करते हो। सिर्फ क्या करो? कम कार डे, दिल यार डे। क्योंकि मैं तुम्हारा नंबरवन यार हूँ ना। हँ? यार? माने माशूक हूँ ना। हँ? तो तुम एक के आशिक बनते हो। मैं माशूक। एक माशूक और इतने ढ़ेर सारे आशिक। तो नंबर बनेंगे या नहीं बनेंगे? हँ? नंबर तो बनेंगे। और ये भी बात है कि मैं आधा कल्प का माशूक हूँ। हँ? क्योंकि भक्तिमार्ग में तुम आधा कल्प तुम आत्माएं मुझे याद फरमाते रहते हो ना। हँ? मैं आता तो टाइम पर ही हूँ। टाइम बिगर थोड़ेही आऊँगा। और तुम माशूक हो आधा कल्प के। तुम सब आत्माएं आधा कल्प की माशूक हो। और सब भाई बाप के बच्चे ठहरे। बाप को थोड़ेही याद करते रहते हो।

तो मैं तो आता हूँ अपने टाइम पर। और बार-बार नहीं आता हूँ। जैसे शास्त्रों में लिख दिया है दशावतार; दस बार अवतार लेता हूँ। बाईस बार, 24 अवतार। हँ? जैन धरम वाले भी मानते हैं 24 अवतार। हिन्दू लोग भी मानते हैं 24 अवतार। मैं बार-बार आता हूँ क्या अवतार लेकरके? अवतार माने ऊपर से नीचे अवतरण करना। मैं तो एक ही बार आता हूँ। दस बार नहीं आता हूँ जो दशावतार बहुत गाए हुए हैं। हँ। 12.11.67 की प्रातः क्लास का सातवां पेज। फिर तुम आशिकों को ये माशूक अपने जैसा गोरा बनाते हैं। अपने जैसा कैसा? जैसे मैं आत्मा सदैव निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी हूँ, वैसे तुमको भी, हाँ, निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, गोरा बनाता हूँ। हँ? गोरा बनाता हूँ तो सत्वप्रधान हुए, सत हुए या तमोप्रधान हुए? सत्वप्रधान। तो सुंदर बनाते हैं ना। अब देखो, तुमने देवताओं के चित्र तो देखे हैं ना। ये देवी-देवताओं के चित्रों में आँखों में कितनी रूहानियत, कितना आकर्षण दिखाते हैं। हँ? तो तुम इन लक्ष्मी-नारायण जैसा सुंदर बन रही हो ना। आत्मा सुंदर बनती है तो इन्द्रियां सारी, हाँ, सारी सुंदर बन जाती हैं। आत्मा प्योर हो जाएगी तो तुमको शरीर और शरीर की इन्द्रियां भी सारी ऐसी ही मिलेंगी जैसी आत्मा। हाँ। जैसा बीज वैसा झाड़। तो सब कुछ प्योर मिल जाएगा। अभी देखो कितना अच्छा क्लीयर बैठकरके समझाता हूँ।

A morning class dated 12.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the sixth page on Sunday was – When the soul leaves one body, takes up another [body], then the name, form, country (place), time, everything changes. So, the name, form, features, etc. cannot match with each other. When this is the case, then definitely the drama is pre-ordained. It keeps on repeating again and again. A body can become different in name and form, i.e. the part that has been assigned; so, now this topic has to be understood, too. Why do the features keep on becoming different birth by birth? Hm? Why do they become? It is because you get coloured by the company of different souls. So, for example, when a child gets sustained in the abdomen, womb of the mother, then whichever form she remembers at that time, if she is constant in her own form, then the child’s form will be like the mother. And if she remembers the Father, then the form of the child will be similar to the Father. Otherwise, if she remembers someone else, then the form also becomes accordingly. So, it is the importance of the colour of company, isn’t it? It is a topic of the mind and intellect, isn’t it?

Look, Baba explains very nicely that children, now you all know firmly that your small soul is a shining star in the middle of the forehead (bhrikuti). It is a unique star. Which star is it? Brother, it is a star-like soul. Achcha? Who is called a star? Brother, what is a star? Have you seen a star? Very small, completely small. So, a star is so small also that it is not visible to these eyes. Well, the thing that is not visible to these eyes, you cannot see at all. And such part of 84 births of the soul is recorded in it. Hm? Such a long and wide cycle, maximum as well as minimum. Some have fewer births. Some have more births. So, Baba says – It is a common topic to get minimum births. Many get that. Hm? And those who are to get maximum births, will their number be less or more? It will be less. But the maximum cycle is of 84 births. And that never ends. Well, tell, this is the soul-like record and those worldly records break. And this record of such a small soul, in which there is a part of maximum 84 births recorded in some of them. So, what should we say? If it isn’t wonderful, then what is it?

So, you should know all these wonderful topics. So, when you know such wonderful topics then it will be said that the wonder of the world is the Golden Age. You yourselves sing, don’t you? Those are wonders made by the human beings. The seven wonders. Seven wonders of the world. People say, don’t they? Those Chinese people say the wall of China, such and such thing, Taj Mahal. Arey, what is it? Just dust. Arey, but now you obtain the inheritance of wonder of the world now. That is it. And the inheritance that you obtain, after that those who obtain inheritance in the Golden Age are those with lower numbers. And how many are there? Hm? How many are there? Hm? He says that you obtain; you children are many, aren’t you? So, you obtain the inheritance perfect in 16 celestial degrees, don’t you? You obtain. But the generations which get birth below you are how many generations? There are seven more generations in the Golden Age. So, the seven wonders that the people of the world, the human beings also created, why did they make only seven? They too have followed you children. Yours is the highest on high swarg, hm, heaven, paradise. Well, those are numberwise souls, numberwise generations. Those who come in paradise are also numberwise. So, that is it; there is no wonder of the world better than this in the world at all.

So, look, the Father says – I make you so great. Hm? And those people? Those people are below, in complete nether world (paataal). Hm? Yes. And you too get coloured by the company and go to the complete nether world. Then, when I come, I make you rise from the nether world to the sky. So, you children should feel so happy. Why? It is because other founders of the religions and their followers do not climb so high in the sky as you climb. Hm? And then you reach such heights that it is sung that if you want to ask about super sensuous joy, then ask these Gopes and Gopies. ‘These’ refers to how many? Hm? How many Gopes and Gopies? It is sung in the scriptures. Hm? Ask the 16108 Gopes and Gopies. Hm? So, definitely they must be the learners of rajyog. And all those who haven’t learnt went into the subjects category among the four and half lakhs. They will also experience super sensuous joy, will they not? They will indeed experience. But there must be some difference between the happiness of the subjects and the happiness of the royal clan, will there not be? Hm? What will be the difference? The souls which learn rajyog in the royal clan, are they limited to just one birth or is it for many births? For many births. And the souls which come in the subjects category, who haven’t learnt rajyog at all, hm, and haven’t inculcated purity at all to learn rajyog, then will they come in the subjects (praja) category only birth by birth or will they get birth in the royal clan? They will not.

So, you children should feel very happy. And you have also been named – Gopes and Gopies. Why? It is because in whose company do you get coloured? You get coloured the most by the company of the highest on high. So, you obtain in an incognito form. Does the world know? Hm? You obtain in incognito manner. The world doesn’t know. So, your name itself is Gopes and Gopies. Your purusharth is incognito, your donation is incognito, your respect is incognito. Respect and position, everything is incognito. So, those who are getting this knowledge from the Father and then they have obtained such a high post; how high post? Hm? Of one or two births or of many births? Yes, for many births. You are indeed numberwise. Yes. So, you have the highest on high; arey, nobody remembers that I have to become this Lakshmi-Narayan. And the Father came and told you. Arey, you are going to become this. Hm? So, it occurred in your intellect, didn’t it that we are going to become this. What? We are going to become Lakshmi-Narayan. Yes. So, now we become Lakshmi-Narayan. You are numberwise.

Well, you want to be number one in the rosary. But when you study the knowledge numberwise, then there is a rosary of 108. Hm? The highest on high rosary is of eight. Then of 108. Hm? So, now if you want you may come in eight, then if you want you may come in 108. Yes, then, hm, catch your number nicely. What? Ensure it now. What? That, what is the goal that we have set? What do you have to become? Do you have to become bead of the right side in the rosary, do you have to become bead of the left side, do you have to become the upper bead, the lower bead, the middle bead? But you also look at the hard work that you do. Does Baba make you to lift any heavy thing? Hm? Does He make you to till the fields? Hm? You are not made to do any such thing that involves a lot of hard work. Baba just says. What? Hm? That you stand up, you sit, you roam, you move; arey, whatever you do. And you go to the wash room. Arey, you go to bathe in the bathroom. What should you just do? Kam kaar de, dil yaar de (The hands should be busy at the task, the heart should be busy in the friend.) It is because I am your number one friend, am I not? Hm? Friend? It means that I am your beloved (maashook), am I not? Hm? So, you become the lover (aashik) of one. I am the beloved. One beloved and so many lovers. So, will the numbers be decided or not? Hm? The numbers will be decided. And there is another topic that I am a beloved since half a Kalpa. Hm? It is because you souls have been remembering Me for half a Kalpa on the path of Bhakti, don’t you? Hm? I come at My time only. Will I come when it is not the time? And you have been lovers since half a Kalpa. All of you souls are lovers since half a Kalpa. And all the brothers are children of the Father. Do you keep on remembering the Father?

So, I come at My time. And I do not come again and again. For example, it has been written in the scriptures – Dashaavataar (ten incarnations). I incarnate ten times. Twenty two times, 24 incarnations. Hm? The followers of Jainism also believe in 24 incarnations. Hindus also believe in 24 incarnations. Do I come again and again by incarnating? Incarnation (avatar) means coming down from up above. I come only once. I do not come ten times that the ten incarnations are sung a lot. Hm. Seventh page of the morning class dated 12.11.67.Then this beloved makes you lovers fair like Himself. How like Himself? Just as I am a soul, forever incorporeal, viceless, egoless, similarly, I make you also, yes, incorporeal, viceless, egoless, fair. Hm? When I make you fair, then are you satwapradhan, sat or tamopradhan? Satwapradhan. So, He makes you beautiful (sundar), doesn’t He? Now look, you have seen the pictures of the deities, haven’t you? So much spirituality, so much attraction is depicted in the eyes of the deities in the pictures. Hm? So, you are becoming beautiful like these Lakshmi and Narayan, aren’t you? When the soul becomes beautiful, then all the organs, yes, all of them become beautiful. When the soul becomes pure, then you will get the body and all the organs of the body just like the soul. Yes. As is the seed so is the tree. So, you will get everything pure. Now look I sit and explain so nicely and in a clear way.

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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2797, दिनांक 20.02.2019
VCD 2797, dated 20.02.2019
प्रातः क्लास 12.11.1967
Morning class dated 12.11.1967
VCD-2797-extracts-Bilingual

समय- 00.01-16.55
Time- 00.01-16.55


आज का प्रातः क्लास है – 12.11.1967. रविवार को सातवें पेज के मध्य में बात चल रही थी कि कृष्ण को काला बनाय दिया है। काला मुंह कर दिया है। तो ये ग्लानि हुई ना बच्ची। ये बच्चा ऐसा फर्स्ट क्लास, 16 कला संपूर्ण। समझा ना? देखने से ही मनुष्य ठहर भी नहीं सकते। और फिर वो तो 16 कला संपूर्ण कृष्ण जिसका नाम गीता में डाल दिया है। वास्तव में वो 16 कला संपूर्ण कृष्ण की तो बात ही नहीं। वो आत्मा तो कलाओं में बंधी हुई है ना। लेकिन बाप तो ज्ञान सूर्य है ना। और सूर्य तो कलाओं में बंधा हुआ नहीं होता है। तो बाप तो जब इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर आते हैं शिव सुप्रीम सोल तो आप समान बनाते हैं ना। तो जिसे आप समान बनाएंगे, गीता में भी लिखा हुआ है मैं आता हूँ तो सूर्य को पहले ज्ञान देता हूँ। तो आप समान सूर्य बनाया ना। तो वो सतयुगी कृष्ण की बात नहीं है 16 कला संपूर्ण की। वो बात है पुरुषोत्तम संगमयुग में कलियुग के अंत और सतयुग के बीच में कि जब बाप आते हैं सुप्रीम सोल, तो जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं, हँ, तो योग बल के द्वारा उसमें सिद्धि इतनी प्राप्त होती है कि कशिश ही कशिश होती है। जो देखे, जो सुने उसके दिल से निकले कि मेरा बाप आ गया; सारी दुनिया का बाप आ गया। तुम बच्चों ने ये देखा भी है। साक्षात्कार भी किये हैं।

तो बाप बैठकरके ये सभी बातें एकदम ड्रामा के आदि, मध्य, अंत सब तुमको समझाते रहते हैं। बेहद का ड्रामा है ना सृष्टि रूपी रंगमंच। अभी समझाते हैं। तो क्या पढ़ाई पढ़ाते हैं? क्या पढ़ाकर समझाते हैं? शास्त्र वगैरा पढ़ाते हैं? नहीं। शास्त्र तो सब मनुष्यों के लिखे हुए हैं ना। ऋषि-मुनि भी मनुष्यों को कहेंगे ना। दाढ़ी-मूंछ वाले थे ना। दाढ़ी-मूंछ वालों को नर ही कहा जाता है। तो नर निर्मित शास्त्र हुए। अब कहाँ नर! और कहाँ भगवान! देवताओं से भी ऊँच! तो भगवान जो बताएगा वो तो देव आत्माएं भी नहीं बताय सकतीं। और जो देव आत्माएं बताएंगी वो ऋषि-मुनि नहीं बताय सकते। और ऋषि-मुनि जो बताएंगे वो आज के विद्वान, पंडित, आचार्य तो बिल्कुल ही नहीं बताय सकते क्योंकि चाहे देव आत्माएं हों, चाहे ऋषि-मुनि हों, सब नर ही तो हैं। नर क्या बनाता है? नरक ही तो बनाता है ना इस दुनिया को। एक बाप ही है सुप्रीम सोल जो इस सृष्टि पर आकरके मुकर्रर रथ में, हँ, नरक को स्वर्ग बनाने का रास्ता बताते हैं।

तो कहता हूँ - तुम बच्चों ने जो साक्षात्कार किये और अभी जो समझाते हैं वो कोई शास्त्र पढ़करके नहीं समझाते हैं मनुष्यों के लिखे हुए। नहीं। अरे, ये शिवबाबा वरी शास्त्र कहाँ से पढ़ेंगे? हँ? तुम बच्चे अभी संगमयुग में किस आत्मा को शिवबाबा कहते हो? हँ? देहधारी को शिवबाबा कहते हो क्या? अरे, नहीं। वो तो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सबसे नीच ते नीच पार्ट बजाने वाली आत्मा हुई। क्या? जैसे सारी दुनिया; क्या? मूर्ख बन जाती है, उल्लू बन जाती है, हँ, ऐसे जिस मुकर्रर रथ में मैं प्रवेश करता हूँ वो तो पत्थरबुद्धि बन जाता है। तो वो पत्थरबुद्धि थोड़ेही समझाता है। हँ? उसमें जो शिव सुप्रीम सोल की, सदा शिव की आत्मा प्रवेश करती है वो समझाती है। अब वो तो परमधाम का वासी, ऊँच ते ऊँच धाम का सदाकाल का वासी वहाँ शास्त्र कहाँ से आए जो बैठकरके पढ़ेगा, लिखेगा? आएंगे? नहीं।

तो भई, हाँ, इनके लिए कहेंगे। किनके लिए? इसके लिए नहीं कहा। क्या कहा? इनके लिए। इनके लिए माने? कौन-कौन? हाँ, एक तो जो मुकर्रर रथ है उसके लिए। और दूसरा जो टेम्परेरी रथ है जिसमें चार मुख दिखाए जाते हैं चार मुखों वाला ब्रह्मा। तो वो दादा लेखराज वाले ब्रह्मा की बात हुई कि उनके साथ जो और मुखधारी ब्रह्मा हैं ना वो सब मिलककरके एक हो जाते हैं। तो जैसे रावण के मुख इकट्ठे कर दिये जाते हैं ऐसे ब्रह्मा के मुख भी इकट्ठे कर दिये जाते हैं। तो ज़रूर एक ही भाषा बोलेंगे क्या? हँ? चारों मुख एक ही भाषा बोलेंगे कि अलग-अलग बोलेंगे? अरे, रावण के दस सिर हैं तो दस सिर अलग-अलग बात बोलेंगे कि एक ही बात बोलेंगे? हँ? अलग-अलग ही तो बोलेंगे ना। हाँ। तो अलग-अलग बातें होंगी तो अलग-अलग मतें हो जाएंगी। अलग-अलग मतें हो जाएंगी तो फिर आपस में खट्ट-पट्ट होगी।

तो बताया ये शास्त्र-वास्त्र ये इनके लिए हैं। ‘इनके लिए’ माने खास जो ब्रह्मा कहा जाता है चार मुखों का समुच्चय, समुदाय, हँ, संगठन, हाँ, उस आत्मा के लिए बताया। और दूसरा उस आत्मा के लिए बताया जो मुकर्रर रथधारी है। तो इनके लिए कहा। इनके लिए कहेंगे कि ये शास्त्र पढ़े हुए हैं। कौन? दादा लेखराज ब्रह्मा भी शास्त्र पढ़ा हुआ और मुकर्रर रथधारी भी शास्त्र पढ़ा हुआ है। अब शिवबाबा कहां से शास्त्र पढ़ेंगे? हँ? शिवबाबा वो परमधाम का वासी इस दुनिया में भी रहता है तो वो बुद्धि से कहाँ रहता है? परमधाम में रहता है या इस पतित दुनिया में बुद्धि लगी रहती है? हँ? लगी रहती है? नहीं। तो वो शास्त्र कहाँ से पढ़ेंगे? अरे, पढ़ेंगे कोई? अच्छा, तो अभी तो यहाँ आया हुआ है ना। कहाँ? इस शास्त्रों की, शास्त्रकारों की दुनिया में आया हुआ है ना। आया हुआ है। आया हुआ है तो बताओ शिवबाबा कभी शास्त्र पढ़ते हैं? हँ? पढ़ते हैं? हँ? शिवबाबा कभी शास्त्र नहीं पढ़ते। कौन पढ़ता है फिर? जिस तन में, चाहे टेम्परेरी रथ हो, हँ, अभी तो नहीं है। अभी है? अभी तो सूक्षम शरीरधारी हो गया, हवा बन गया हवा। है ना। बताया ना कल। हवा का पुत्र हनूमान। हाँ। तो, तो वो जो हनूमान है प्रैक्टिकल में ना शरीरधारी कोई होगा ना। हाँ, पूंछडीवाला। हाँ। पूंछडी देखी उनकी? अरे, पूंछडी नहीं देखी? नहीं। हाँ, पूंछडी वाला, बड़ी लंबी पूंछडी है। हाँ।

तो बताया, वो शास्त्रों में लिखा हुआ है। इतनी लंबी पूंछडी है जो उसमें सारी लंका के जितने सुंदर-सुंदर वस्त्र थे ना शरीर रूपी। आहाहा। वो सारे ही छांट-छांट के बांधे गए। और उसमें, क्या? हाँ, तेल डाल दिया। तेल डारि पट बांधि कर पावक देव भगाए। ऐसे रावण ने आर्डर दे दिया कि वो सारे वस्त्र बांध दो, हँ, और क्या करो? तेल डाल दो। घी नहीं। तेल माने? शुद्ध चीज़ कौनसी होती है? हँ? घी, घृत शुद्ध होता है। और वो भी गऊ का घृत हो तो और ही शुद्ध। भैंस का नहीं उतना। हां। तो घृत जो है वो नहीं। तेल। तेल माने? तेल सस्ता होता है कि घी सस्ता होता है? तेल तो बहुत सस्ता होता है। और फिर मिट्टी का तेल डाला हो, देह अभिमान की मिट्टी जिसमें ज्यादा भरी हुई हो, ऐसा तेल डाला हो, तो वो तो जल्दी आग पकड़ता है। भभ्भर-3, जलेगा कि नहीं? हाँ। तो देखो, वो शास्त्र ये पढ़ते हैं। कौन? वो ही पवन सुत हनूमान। उसको मुकर्रर रथ कह दो। ये पढ़ते हैं शास्त्र। हाँ। अथवा वो सूक्षम शरीरधारी आत्मा वो भी साथ में पढ़ती होगी। प्रवेश करेगी तो पढ़ेगी ना। हाँ।

तुमने देखा है? हँ? देखा है शिवबाबा को? कोई शास्त्र उठाते हैं? नहीं। नहीं ना। हँ? शिवबाबा शास्त्र नहीं उठाते? तो फिर कौन उठाता है? हँ? शिवबाबा नहीं उठाते शास्त्र तो कौन उठाता है? अरे, मुकर्रर रथधारी शास्त्र उठाता होगा कि शिवबाबा पढ़ता होगा शास्त्र? उसे पढ़ने की दरकार है? वो तो त्रिकालदर्शी है। वो तो जन्म-मरण के चक्कर में ही नहीं आता। जब जन्म-मरण के चक्कर में ही नहीं आता है। वो तो सब कुछ जानता होगा ना। जन्म-मरण के चक्कर में आने वाले तो सब भूल जाते हैं मनुष्य मात्र। भूल जाते हैं कि नहीं? हाँ। वो शिव जो है वो तो जन्म-मरण के चक्कर में आता ही नहीं है। हाँ, ब्रह्मा दादा लेखराज के, जो चार मुखों वाला ब्रह्मा है ना, उसके हाथ में जरूर शास्त्र दिखाते हैं। तो वो जो हनूमान को जन्म देने वाला बन गया। क्या? हवा बन गया ना सूक्षम शरीरधारी। तो वो दोनों पढ़ते हैं। बाप और बेटा दोनों शास्त्र पढ़ते होंगे। लेकिन शिवबाबा तो शास्त्र नहीं पढ़ते।

वो तो तुम बच्चों को शास्त्र पढ़करके नहीं समझाते हैं। शास्त्र पढ़करके समझाते हैं? जितने भी धरमपिताएं आए उन्होंने कोई अपने-अपने जो उनके धरम में शास्त्र बनाए गए हैं, वो मोबाइल नहीं, क्या नाम, हाँ, बाइबिल, बाइबिल और ये क्या नाम ये गीता, धम्मपद और ये गुरु ग्रंथ साहब, ये कभी हाथ में लेके सुनाए? नहीं। उन्होंने तो ओरली सुनाया या शास्त्रों को पढ़के सुनाया? नहीं। न शास्त्र लिखे और न शास्त्र पढ़करके सुनाए। तो जो ऊँच ते ऊँच धरमपिता होगा, ऊँच ते ऊँच सत्य सनातन धरम की स्थापना करने वाला होगा वो क्या शास्त्र पढ़ेगा? नहीं। हाँ, ओरली समझाते हैं। और रोज समझाते हैं ओरली। और नई-नई बातें समझाते हैं। ऐसे नहीं पुरानी शास्त्रों की बातें पढ़-पढ़के सुनाते हों जैसे विद्वान, पंडित, आचार्य लोग सुनाते रहते हैं। शास्त्र पढ़ते रहते हैं। वो सन्यासी होते हैं ना। खूब शास्त्र पढ़ते हैं और फिर मंडलेश्वर बनके बैठ जाते हैं। हँ? और फिर वो ही शास्त्रों की पुरानी-पुरानी बातें, हाँ, अपने प्रवचन में सुनाते रहते हैं। तो ऐसे कोई शिवबाबा नहीं सुनाते हैं। न कोई धरमपिताएं इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट आकरके सुनाते हैं।

तो ये सूर्यवंशी, चंद्रवंशी राज्य स्थापन करते हैं। क्या? अभी क्या है? अभी रावण राज्य है ना। कि सूर्यवंशियों, चंद्रवंशियों का राज्य है? हाँ, अभी तो ये रावण राज्य है। हँ? तो रावण राज्य में किसम-किसम के अच्छे-अच्छे चित्र बनाए हैं समझाने के लिए। हँ? जड़बुद्धि वालों ने जड़ चित्र बनाए होंगे। हँ? जैसे भक्तिमार्ग में वो भक्त लोग हुए हैं ना। तो उन्होंने पत्थर की मूर्तियां बनाई ना। जड़ थी या चैतन्य थी? पत्थर की मूर्तियां बनाई। हाँ। और कागज़ के चित्र भी बनाते रहते हैं। तो शूटिंग तो यहाँ होती है ब्राह्मणों की दुनिया में। क्या? कि जड़त्वमयी बुद्धि वाले जो ब्राह्मण हैं ना नीची कुरियों में जाने वाले, वो क्या करते हैं? जड़ चित्र तैयार करते हैं। हँ? और तैयार कौन कराता है? हँ? तैयार वो ही शास्त्र पढ़ने वाला। कौन? जो हवा बन गया सूक्षम शरीरधारी। हँ? क्या नाम? दादा लेखराज ब्रह्मा की आत्मा। हाँ। उनसे पूछा जाता है ऐसा करें? तो हां, बच्चे करो। चित्र बनाओ, छपाओ। तो बताया ये जो चित्र बने हैं वो समझाने के लिए बने हैं। किनको समझाने के लिए? जड़ चित्र पर जड़त्वमयी बुद्धि वाले समझेंगे या जो चैतन्य बुद्धि वाले होंगे वो जड़ चित्रों से समझेंगे? क्या? जो चैतन्य बुद्धि होंगे वो जो चैतन्य चित्र देखा और दो शब्द कानों से सुने और वो फट से क्या तुरत दान महाकल्याण। खटाक से बुद्धि में उनके बैठ जाता है। तो बताया, अरे, भई ये रावण राज्य है। ये कोई सूर्यवंशियों, चंद्रवंशियो, हँ, का राज्य नहीं है।

Today’s morning class is dated 12.11.1967. The topic being discussed in the middle of the seventh page on Sunday was that Krishna has been made dark (black). His face has been made black. So, this is defamation, isn’t it daughter? This child is such first class, perfect in 16 celestial degrees. Did you understand? Human beings cannot restrain themselves just by seeing [him]. And then the name of Krishna, who is perfect in 16 celestial degrees, has been inserted in the Gita. Actually, it is not a topic of that Krishna perfect in 16 celestial degrees at all. That soul is bound in celestial degrees, isn’t it? But the Father is the Sun of Knowledge, isn’t He? And the Sun is not bound in celestial degrees. So, when the Father, the Supreme Soul Shiv comes to this world stage, He makes you equal to Himself, doesn’t He? So, the one whom He makes equal to Himself; it has been written in the Gita also that when I come, I first give knowledge to the Sun. So, He made him Sun, equal to Himself, didn’t He? So, it is not the topic of that Golden Age Krishna who is perfect in 16 celestial degrees. That is a topic about the Purushottam Sangamyug, i.e. between the end of the Iron Age and the Golden Age that when the Father, the Supreme Soul comes, the permanent Chariot in which He enters, then through the power of Yoga he achieves such success (siddhi) that there will be only attraction. Whoever sees, whoever listens, it should emerge from his heart that my Father has come; the Father of the entire world has come. You children have seen this also. You even had visions.

So, the Father sits and keeps on explaining all these topics and everything about the beginning, middle and end of the drama. This world stage is an unlimited drama, isn’t it? He explains now. So, what knowledge does He teach? Does He read and explain? Does He teach scriptures, etc.? No. All the scriptures have been written by the human beings, haven’t they been? Sages and saints will also be called human beings, will they not be? They had beard and moustache, didn’t they? Those with beard and moustache are called men only. So, these are scriptures created by men. Well, on the one side is man and on the one side is God! Greater than the deities! So, even the deity souls will not be able to narrate whatever God narrates. And sages and saints cannot narrate whatever the deity souls will narrate. And today’s scholars, pundits, teachers can not at all narrate whatever the sages and saints narrate because be it the deity souls, be it the sages and saints, all are men only. What does a man (nar) make? He makes this world a hell (narak) only, doesn’t he? It is only one Father, the Supreme Soul who comes to this world in a permanent Chariot and shows the path of transforming the hell to heaven.

So, I say – the visions that you children had and whatever I explain now, I do not explain by reading the scriptures written by the human beings. No. Arey, how will this ShivBaba read the scriptures? Hm? Which soul do you children call as ShivBaba now in the Confluence Age? Hm? Do you call any bodily being as ShivBaba? Arey, no. That is a soul which plays the lowest on low part on this world stage. What? For example, the entire world; what? It becomes a fool, it becomes an owl (fool), hm, such permanent Chariot in which I enter, it develops a stone-like intellect. So, does that stone-like intellect explain? Hm? The Supreme Soul Shiv, the soul of Sadaa Shiv which enters in him explains. Well, He is a resident of the Supreme Abode, a permanent resident of the highest on high Abode; where do scriptures emerge there which He will sit and read, write? Will they emerge? No.

So, brother, yes, it will be said for these. For whom? It was not said ‘for this one’. What was said? For these. What is meant by ‘for these’? Who all? Yes, one is for the permanent Chariot. And secondly the temporary Chariot in which four heads are shown, the four-headed Brahma. So, it is a topic of that Dada Lekhraj Brahma that the other heads of Brahma unite with him. So, just as the heads of Ravan are made to unite, similarly Brahma’s heads are also made to unite. So, will they definitely speak one language? Hm? Will all the four heads speak the same language or different languages? Arey, there are ten heads of Ravan, so will the ten heads speak different topics or will they speak the same topic? Hm? They will speak different topics only, will they not? Yes. So, if the topics are different, then the opinions will be different. When the opinions are different, then there will be clashes with each other.

So, it was told that these scriptures, etc. are for these. ‘For these’ means it was said especially for the soul of Brahma, the combination, the community, the gathering of four heads. And secondly, it was said for that soul which is the permanent Chariot holder. So, it was said for these. It will be said for these that these have read these scriptures. Who? Dada Lekhraj Brahma has also read scriptures and the permanent Chariot holder has also read scriptures. Well, how will ShivBaba read scriptures? Hm? ShivBaba is a resident of the Supreme Abode; even when He lives in this world, where does He live through His intellect? Does He live in the Supreme Abode or does His intellect remain engaged in this sinful world? Hm? Does it remain engaged? No. So, how will He read scriptures? Arey, will He read any [scripture]? Achcha, so He has now come here, hasn’t He? Where? He has come in this world of scriptures, the writers of the scriptures, hasn’t He? He has come. He has come; so, tell, does ShivBaba ever read scriptures? Hm? Does He read? Hm? ShivBaba never reads scriptures. Then who reads? In whichever body, be it the temporary Chariot, hm, it is not present now. Is it present now? Now he has become subtle body holder, he became air. Is it not? It was told yesterday. Hanuman is the son of air. Yes. So, so, that Hanuman in practical, there must be a bodily being, isn’t it? Yes, the one with a tail. Yes. Did you see his tail? Arey, haven’t you seen his tail? No. Yes, the one with a tail; he has a very long tail. Yes.

So, it was told, that has been written in the scriptures. It is such a long tail that all the beautiful body-like clothes of Lanka; aahaha. All those clothes were selected and tied. And in it; what? Yes, oil was put. Tail daari pat baandhi kar paavak dev bhagaaye. Ravan issued such order to tie all those clothes and what should you do? Put oil over it. Not ghee. What is meant by oil? What is a pure thing? Hm? Ghee, ghrit is pure. And that too if it is cow’s ghee, it is purer. That of buffalo is not [pure] to that extent. Yes. Not that ghrit. Oil. What is meant by oil? Is oil cheaper or is ghee cheaper? Oil is very cheap. And then if kerosene (mitti ka tel), which is filled more with the soil of body consciousness, when such oil is added, then it catches fire quickly. Bhabhbhar-3; will it burn or not? Yes. So, look, these read that scripture. Who? The same son of air, Hanuman. Call him the permanent Chariot. These read the scriptures. Yes. Or that subtle bodied soul must also be reading together. When it enters, it will read, will it not? Yes.

Have you seen? Hm? Have you seen ShivBaba? Does He hold any scripture? No. He doesn’t, does He? Hm? Doesn’t ShivBaba hold a scripture? So, then who holds? Hm? If ShivBaba doesn’t hold the scripture, then who holds? Arey, does the permanent Chariot holder hold the scripture or does ShivBaba read the scripture? Does He need to read? He is Trikaaldarshi. He doesn’t pass through the cycle of birth and death at all. When He doesn’t pass through the cycle of birth and death at all; He must be aware of everything, isn’t He? Those who pass through the cycle of birth and death, the human beings forget everything. Do they forget or not? Yes. That Shiv does not pass through the cycle of birth and death at all. Yes, scriptures are definitely depicted in the hands of Brahma, Dada Lekhraj, the four-headed Brahma, isn’t he? So, he who became the one who gives birth to Hanuman. What? The subtle bodied one became air, didn’t he? So, both of them read. The Father and son, both of them must be reading. But ShivBaba doesn’t read scriptures.

He does not read the scriptures and explain to you children. Does He read the scriptures and explain? All the founders of religions who came, did they ever hold in their hands and narrate the scriptures that were prepared in their religions, that mobile, no, what do you call it, yes, Bible, Bible and what do you call it, this Gita, Dhammapad and this Guru Granth Sahib? No. Did they narrate orally or did they read out the scriptures? No. Neither did they write scriptures, nor did they read out the scriptures. So, will the highest on high founder of religion, will the one who establishes the highest on high Sanatan religion read scriptures? No. Yes, He explains orally. And He explains orally daily. And He explains newer topics. It is not as if He reads the topics of the old scriptures and narrate just like the scholars, pundits, acharyas keep on narrating. They keep on reading scriptures. There are those Sanyasis, aren’t they? They read a lot of scriptures and then sit as Mandaleshwars. Hm? And then they keep on narrating the same old topics of the scriptures, yes, in their lectures. So, ShivBaba doesn’t narrate like this. Neither do founders of religions like Ibrahim, Buddha, Christ come and narrate.

So, He establishes this Suryavanshi, Chandravanshi kingdom. What? What is it now? Now it is the kingdom of Ravan, isn’t it? Or is it a rule of the Suryavanshis, Chandravanshis? Yes, now it is the kingdom of Ravan. Hm? So, a variety of nice pictures have been prepared to explain in the kingdom of Ravan. Hm? Those with inert intellect must have prepared inert pictures. Hm? Just as there have been devotees (bhakt) on the path of Bhakti. So, they have prepared idols of stone, haven’t they? Were they non-living or living? They prepared idols of stone. Yes. And they also keep on preparing pictures on papers. So, the shooting takes place here in the world of Brahmins. What? That the Brahmins with inert intellect, who go to the lower categories, what do they do? They prepare non-living pictures. Hm? And who get them prepared? Hm? The same person who reads the scriptures gets them prepared. Who? The one who became air, the subtle bodied one. Hm? What is his name? The soul of Dada Lekhraj Brahma. Yes. If he is asked should we do like this? So, yes, children, do. Prepare pictures, get them printed. So, it was told that these pictures which have been prepared have been prepared for explaining. To explain to whom? Will those with inert intellect understand through non-living pictures or will those who have a living intellect understand through non-living pictures? What? Those who have a living intellect will as soon as they see the living picture and as soon as they listen to two words through their ears, they will donate immediately and cause great benefit (turat daan mahakalyaan). It sits in their intellect immediately. So, it was told – Arey, brother, this is a kingdom of Ravan. This is not a kingdom of Suryavanshis, Chandravanshis.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
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प्रातः क्लास चल रहा था – 12.11.1967. रविवार को आठवें पेज के मध्य में बात चल रही थी – बाबा के पास कुमार और कुमारी होते हैं। बाबा उनकी भी शादी कराते हैं। हँ? कहाँ की बात बताई? हँ? बेसिक की बात बताई या एडवांस की बात बताई? हँ? बेसिक की बात बताई। अच्छा? माना? माना बाबा कुमार-कुमारियों की शादी एडवांस में नहीं कराते? हँ? नहीं कराते? कराएंगे। जब देखेंगे कि हाँ, ऐसी पवित्र मन-बुद्धि मनसा के वायब्रेशन बन रहे हैं तब कराएंगे। हँ? कि पहले ही करा दें? जिनका-जिनका पहले ही करा दिया, मन पवित्र हुआ नहीं, हँ, और कराने वाले का पवित्र हुआ? जो निमित्त बना साकार शरीर से दादा लेखराज ब्रह्मा उनका मन पवित्र कहें? उनका भी नहीं कहेंगे। क्योंकि मन जीते जगतजीत हो जाते हैं। तो निमित्त के ऊपर सारा मदार रहता है। निमित्त माने साकार। ऐसे ही एडवांस में बाबा उनकी शादी कराते हैं, हँ, गंधर्वी विवाह कराते हैं, जो मन से कैसे बन जाते? मामेकम् याद करो। अव्यभिचारी बन जाते हैं।

तो बाबा कहते हैं कि ऐसे हमारे पास हैं। समझा ना? हँ। मर्ज रूप में हैं सब या इमर्ज रूप में हैं? हाँ, कहेंगे मर्ज रूप में हैं। ऐसे नहीं है कि नहीं हैं हमारे पास। बस एक दफा जब यहाँ आते हैं ना। कहाँ? हँ? एक दफा यहाँ माने कहाँ? बाबा के पास। हँ? बेसिक ज्ञान में बाबा के पास या एडवांस ज्ञान में बाबा के पास? हँ? एडवांस ज्ञान में तो साकार बाबा के पास तब ही कहेंगे जब, जब पूरे निश्चयबुद्धि बनेंगे कि अधूरे निश्चयबुद्धि बनेंगे? हँ? बीच-बीच में संशय आते रहेंगे तो निश्चयबुद्धि कहेंगे? हँ? संशयबुद्धि क्या होता है? विनश्यते। अब जब विनश्यते की स्टेज में हैं तो थोड़ेही कहेंगे कि ये पक्का हो गया कि ये पवित्र बनेंगे ही बनेंगे। तो, तो जब यहाँ आते हैं; यहाँ का मतलब क्या हुआ? हँ? यहाँ माना बाबा के पास आते हैं। कहते हैं ना जो बाबा के पास आते हैं तो पास में बैठने वाले को क्या कहा जाता है? उपासना करने वाला। उप माने नज़दीक। आसन माने आसन मार के बैठे। तो नज़दीक में आसन मार के बैठे तो शरीर से या मन-बुद्धि से, दिल से? हँ? हाँ, बुद्धि से भी और दिल से भी। तो जब यहाँ आते हैं तो पवित्र माना पवित्र फिर कोई अपवित्रता की बात नहीं। फिर भी अगर कोई खराब होते हैं तो फिर वो अपना सत्यानाश कर लेंगे।

किसी ने कहा – नहीं बाबा। परन्तु अगर कहीं भी पैर डगमगा गया तो मैं आपको ऐसे तरीके से पुकारूंगा जैसे द्रौपदी ने श्री कृष्ण भगवान को पुकारा था। वो द्रौपदी थी और मैं। बाबा ने कहा – वो द्रौपदी थी और मैं कन्हैया हूँ उसका। हँ? किसने बोला? हँ? बाबा ने बोला। उसका भी वस्त्र हरण हुआ था। ‘भी’ माना? हँ? द्रौपदी का भी वस्त्र हरण हुआ था। ‘भी’ क्यों लगा दिया? हाँ, औरों का भी वस्त्र हरण हुआ था। तो हरण हुआ था ना। तो बाप ने उसको 21 साड़ियां दी। माना 21 जेनरेशन के लिए, हँ, उनको वर दिया। जैसे कि भई, भई तुम कभी अब नंगे नहीं होंगे। ये वरदान दिया। हँ? तो ये बाप ने तो समझाया कि देवताएं तो कभी नंगे होते ही नहीं हैं। हँ। किसी ने कहा – इस प्रकार मैं भी कह रहा हूँ कि अगर मुझको भी कहीं कोई मेनका, उर्वशी मिल गई और मेरा वस्त्र हरण करने की उसने कोशिश की; उल्टी बात बताता है; वस्त्र हरण दुर्योधन-दुःशासन रूपी पुरुष करते हैं, हँ, या स्त्री चोला धारिणी करती है? हँ? हाँ। उल्टी बात बताई। उसने मेरा वस्त्र हरण करने की कोशिश की तो मैं आपको पुकारूंगा। ये बोलता ‘मैं पुकारूंगी’ तो भी ठीक था। अब बोलता है ‘पुकारूंगा’। बाबा ने कहा – अरे, कह तो दिया बच्चों को। हँ? पहले ही पहले बताय दिया।

मीठे-मीठे सीकिलधे यानि 5000 वर्ष के बाद फिर से चक्कर लगाकरके मिलने वाले। 84 का चक्कर लगाकरके। अभी फिर मिले। हँ? अभी है फिर वापस जाने की तैयारी। और भावी टारे नहीं टरै। हँ? यानि तुम जरूर ही ज्ञान उठाएंगे। ज्ञान उठाएंगे और जाएंगे ऊपर। जरूर जाएंगे। इस बात में कभी भी कोई दूसरी बात हो ही नहीं सकती क्योंकि सबको ऊँची स्टेज में जाना जरूर है। देखते हो विनाश भी सामने खड़ा है बिल्कुल। हँ? विनाश है माउथ फाड़करके खड़ा हुआ है एकदम। तो वंडर खाएंगे ना बच्ची। अभी यहीं खड़ा होकरके विचार करो कि हम कहाँ खड़े हैं? हँ? हम संगमयुग पर खड़े हैं। हँ? कलियुग का अंत होने वाला और सतयुग की आदि होने वाली। दोनों के बीच में खड़े हैं। और इस तरफ में है। हँ? इस तरफ में क्या है? कलियुग। और उस तरफ में है सतयुग। तो देखो फर्क कितना है। कलियुग पापी युग और सतयुग पुण्यात्मा देवताओं का युग। कहाँ किये उन्होंने पुण्य? हँ? सतयुग में? नहीं। यहाँ संगमयुग में पुण्य किये ना। तो उसका उजूरा वहाँ मिल जाता है।

तो बाबा ने बताया कि बाबा ने तो हम सो का अर्थ बताय दिया ना। हम ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। अभी तो हम ब्राह्मण ही हैं ना। तो हम सो फिर देवता बनेंगे। फिर? फिर क्या बनेंगे? हँ? नहीं पता? फिर क्षत्रीय बनेंगे। क्षत्रीय माने? क्षात्र तेज वाले। सीढ़ी का चित्र देखा? झाड़ का चित्र देखा ना। हँ? उसमें छत्रछाया लक्ष्मी-नारायण को सतयुग में दिखाई है या त्रेता में छत्रछाया दिखाई है राम-सीता को? हँ? कहाँ दिखाई है? त्रेता में दिखाई। वहाँ क्यों दिखाई? क्या कारण? हँ? वहाँ किसलिए दिखाई? हाँ, इसलिए दिखाई कि वहां दो कलाएं कम हो जाती हैं आत्माओं की। तो जहाँ 16 कला संपूर्ण हैं वहाँ तो कहेंगे अच्छे देवताएं ही हैं। हँ? और नीचे गिर गए दो कला तो फिर कंट्रोल करने की जरूरत पड़े कि नहीं फिर? हाँ। तो कंट्रोल करने के लिए फिर, हाँ, राजाई। राजाई माने शासन। शासन को ही तो राजाई कहा जाता है ना। तो वो शासन करने की जो शिफ्त है वो मैं अभी देता हूँ तुम बच्चों को। क्या? कैसे देता हूँ? हँ? मैं क्या देता हूँ? अरे, मैं तो अखूट ज्ञान का भंडारी हूँ ना। तो ज्ञान का भंडार देता हूँ ना। हँ? क्या ज्ञान? वो ज्ञान का भंडारी वो ज्ञान देता है कि सृष्टि रूपी रंगमंच पर तुमको वो क्षात्र तेज कहाँ से मिलेगा? क्षात्र तेज क्या? किस बात की छत्रछाया? हँ? छत्रछाया योगबल की। क्या?

मैं ज्ञानी हूँ या मुझे योगी कहेंगे? शिव को क्या कहेंगे? हाँ। शिव तो ज्ञानी है। अखूट ज्ञान का भंडारी है। हँ? थियोरेटिकल ज्ञान सुनाता है ना। कि प्रैक्टिकल? हँ? हाँ। तो ज्ञान को प्रैक्टिकल धारण करना माना; क्या? प्रैक्टिकल तब ही हो सकता है जब ज्ञान के सार को पकड़ लिया जाए। ज्ञान किसे कहा जाता है? ज्ञान माने क्या?
(किसी ने कुछ कहा।) जानकारी। किस बात की जानकारी? ये तो ठीक बताया कि जानकारी। किस बात की जानकारी? हँ? हाँ? किस बात की जानकारी? (किसी ने कुछ कहा।) 84 जन्मों की जानकारी? अच्छा? 84 जन्मों की जानकारी, हँ, 84 जन्मों की जानकारी से जो भी आत्माएं हैं उनको राजाई करने की शिफ्त मिल जाएगी? हँ? काहे से मिलेगी? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) देवता बनूंगा? कैसे देवता बनूंगा? शिव तो भगवान है। वो तो देवता तो नहीं है। देवता ही देवता बनाएगा। धनवान धनवान बनाएगा। हँ? वकील वकील बनाएगा। अरे, जो जैसा होगा वैसा ही बनाएगा ना। हँ? तो कौन देवता बनाएगा? हँ? हाँ, मैं क्या जानकारी देता हूँ? हाँ, मैं जानकारी देता हूँ कि मैं किसमें मुकर्रर रूप से प्रवेश करता हूँ। इस बात की ही खास जानकारी है। वो बात जो विद्वान, पंडित, आचार्यों ने जो गीता लिखी है ना उसमें भी यही बात लिखी हुई है। क्या? ज्ञान किस बात का? ज्ञान है क्षेत्र माने शरीर और क्षेत्रज्ञ, शरीर के जानकार का। कौनसे शरीर के जानकार का? टेम्परेरी? टेम्परेरी नहीं। जो मुकर्रर रथ है उसकी जानकारी का ज्ञान ही ज्ञान कहा जाता है। ज्ञान माने किस बात का ज्ञान? झूठ का? हँ? काहे का ज्ञान? हँ? सत का ज्ञान। तो सत किसे कहेंगे? जो सदाकाल हो वो सत या कभी-कभी हो और कभी न हो वो सत? कौन है सत? कैसे पता चलेगा कौन है सत? हँ? अपने-अपने 84 जन्मों की जानकारी तो बाद में होगी। पहले तो उस सत स्वरूप की जानकारी हो जो इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदा सत है। सदा पार्ट बजाने वाला है या बीच में पार्ट कट हो जाता है? सदा पार्ट बजाता है।

तो उस सत को जानेंगे, तो सत को जो धारण करने वाली है उसे सती कहा जाता है। क्या कहा जाता है? सत को धारण करने वाली सती कहा जाता है। तो सती और सत दोनों की जोड़ी हुई कि नहीं? हाँ, जोड़ी हुई। सती जो है उसको क्या कहेंगे? सत की सजनी कहेंगे? संबंध क्या हुआ? सत और सती। दोनों की जोड़ी हो गई। तो तुम बच्चों को क्या कहते हैं कि शिवबाबा जिसे कहा जाता है वो है एक साजन। हँ? और बाकि सब हैं? बाकि सब क्या हैं? बाकि सब सजनियां। सब सीताएं। तो जो भी सीताएं हैं वो नंबरवार ही होंगी ना। हँ? ज्यादा छत्रछाया किसको मिलेगी? हँ? हाँ, जो अव्वल नंबर में सत को धारण करने वाली होगी उसी को सबसे जास्ती सुरक्षा माने छत्रछाया। किस बात की छत्रछाया? हँ? अरे, छत्रछाया है ही योगबल की। योगबल माने याद का बल। जिसके ऊपर ज्यादा मेहरबानी होती है उसको ज्यादा याद किया जाता है ना। नहीं? हाँ। जिससे ज्यादा लव होता है उसको ज्यादा याद किया जाता है। तो ये तो किसके द्वारा याद करने की बात है मूल रूप में? हँ? मूल रूप में मुकर्रर रथधारी जो सत है इस संसार में उसकी बात है।

तो नंबरवार हो जाते हैं। कैसे नंबरवार? जो जितने अव्यभिचारी, हँ, एक जनम के नहीं, अनेक जन्मों के जितने अव्यभिचारी मन-बुद्धि से, ज्ञानेन्द्रियों से, कर्मेन्द्रियों से उतनी उनको पावर योगबल की जन्म-जन्मान्तर मिलती रहती है। किससे? किससे मिलती रहती है? शिव ज्योतिबिन्दु निराकार से? हँ? कौनसी पावर चाहिए? ज्ञान चाहिए 84 जन्मों में, 63 जन्मों में या वो जिसे ऊर्जा कहते हैं; हँ? जैसे करेंट है ना। ये यंत्र है। तो उन यंत्रों में करेंट आता है तो यंत्र काम करता है। तो ये शरीर क्या है? ये भांति-भांति के जो शरीर हैं ये क्या हैं? हँ? भांति-भांति की योनियों के जो समुदाय हैं उनके जो शरीर हैं वो क्या हैं? यंत्र हैं ना। तो वो यंत्र कैसे चलते हैं? हँ? हाँ, वही योग की ऊर्जा, वो ही पावर। किससे मिलती है? हँ? जन्म-जन्मान्तर मिलती है। किससे मिलती है? किससे मिलती है? वो ही योग के एक भंडारी से जिसे योगेश्वर कहा जाता है। क्या?

अब भक्तिमार्ग में उन्होंने तीन-तीन योगीश्वर दिखाय दिये। हँ? फिर दुनिया के जो कलियुगी दुनिया के लोग हैं उनका भी नाम रख दिया ज्ञानेश्वर, हँ, योगेश्वर। अरे, इस दुनिया में योगेश्वर, ज्ञानेश्वर, ज्ञानियों के ईश्वर कहाँ से आ जाएंगे? ज्ञानियों का ईश्वर तो एक ही अखूट ज्ञान का भंडारी है जो जनम-मरण के चक्कर में, क्या, नहीं आता है। और वो तो सदा शिव है। क्या? सदा निराकार है, निर्विकारी है, निरहंकारी है, अभोक्ता है, अकर्ता है और अगर्भा है। गर्भ से जन्म नहीं लेता। तो जो गर्भ से जन्म लेने वाली भोगी आत्माएं हैं उनको फिर वो योग का जो भंडार है, योग की ऊर्जा है कहाँ से मिलती है? हँ? हाँ, जरूर इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कोई वो भंडार है योगीश्वर जिसे शास्त्रों में कहा गया है। तीन-तीन, चार-चार योगीश्वर शास्त्रों में बताय दिये वो बात नहीं कि सनत कुमार को भी योगीश्वर बताय दिया, हँ, और कृष्ण को भी योगीराज बताय दिया योगियों का राजा। और शंकर को भी योगीराज बनाय दिया। अरे, शंकर जिसे कह दिया तो संकरण हुआ या नहीं हुआ? मिक्स हुआ या प्योर हुआ? तो प्योरिटी में पावर होगी? सारी पावर कहाँ से आती है? पवित्रता से आती है। पवित्रता को कह दो योगबल।

तो ऐसी पवित्रता शरीरधारी आत्मा के द्वारा जो शरीरधारी आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर सदा सत है। तो उस सत से, हाँ, इस पुरुषोत्तम संगमयुग में जो भी बीजरूप आत्माएं हैं उन बीजरूप आत्माओं में वो भंडार नंबरवार भर जाता है जिन्हें कहते हैं रुद्राक्ष। क्या? रुद्रगण। क्या? वो बाप के डायरेक्ट बच्चे हुए ना। बीज के बच्चे कैसे होंगे? बीज के बच्चे बीज ही होंगे। ज्ञान के बीज ज्ञान के बीज ही होंगे। और योग के जो, योग का जो बीज होगा, योगीश्वर माने बाप होगा, योगियों का राजा होगा उसके बच्चे भी योगी होंगे या नहीं होंगे? योगी होंगे। तो ऐसे जो जन्म-जन्मान्तर के ज्ञानी और योगी बच्चे हैं उन बीजरूप आत्माओं में वो पावर पुरुषोत्तम संगमयुग में भर जाती है। और अपने लिए, सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए, अपने जन्म-जन्मान्तर के रथ के लिए, शरीर रूपी रथ के लिए या बीज है तो बीज से पैदाइश होती है? हाँ। हरेक का अपना-अपना वो संसार रूपी वृक्ष है जिसे कहते हैं ना एक-एक सितारे में क्या होता है? दुनिया होती है। तो ऐसे ये बीजरूप आत्माएं जो रुद्राक्ष के मणके रुद्रगण हैं मेरे डायरेक्ट बच्चे वो सारी पावर भरते हैं। किसके द्वारा भरते हैं? किसके द्वारा भरते हैं? अरे? किसके द्वारा भरते हैं? हाँ, वो योग की पावर भरते हैं एक योगीश्वर के द्वारा। तो वो योगीश्वर जो है इसी सृष्टि रूपी रंगमंच पर पुरुषोत्तम संगमयुग में, माना कलियुग के अंत और सतयुग के आदि में जो पुरुषार्थी बीज रूप आत्माएं हैं सारी सृष्टि की उनमें वो पावर नंबरवार भर जाती है।

A morning class dated 12.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the middle of the eighth page on Sunday was – There are Kumars and Kumaris with Baba. Baba gets them also married. Hm? A topic of which place was mentioned? Hm? Was the topic of basic [knowledge] mentioned or was the topic of advance [knowledge] mentioned? Hm? The topic of basic [knowledge] was mentioned. Achcha? What does it mean? Does it mean that Baba doesn’t get the Kumars and Kumaris married in advance [knowledge]? Hm? Doesn’t He get them married? He will. When He observes that yes, such pure vibrations of mind and intellect are getting formed, He will get them married. Hm? Or should He get them married before that? All those whose marriage was already solemnized, their mind did not become pure, hm, and did the mind of the enabler become pure? The one who became instrumental through the corporeal body, Dada Lekhraj Brahma, should his mind be said to be pure? His [mind] too will not be said [to be pure]. It is because when one conquers the mind, then one conquers the world. So, everything depends on the instrument (nimitt). Nimitt means corporeal. Similarly, Baba gets those people married in advance [party], hm, solemnizes Gandharvi marriage, who become of what kind through the mind? Remember Me alone. They become non-adulterous (avyabhichari).

So, Baba says that such people are with us. Did you understand? Hm. Is everyone in merge form or in emerge form? Yes, it will be said that they are in merge form. It is not as if such persons are not available with us. That is it; when they come here once, don’t they? Where? Hm? ‘Once here’ means which place? With Baba. Hm? With Baba in basic knowledge or with Baba in advance knowledge? Hm? It will be said ‘with corporeal Baba in advance knowledge’ only when, when you become complete nishchaybuddhi (having faith in ShivBaba) or incomplete nishchaybuddhi? Hm? Will you be called nishchaybuddhi when you keep on getting doubts in between? Hm? What happens to sanshaybuddhi? He gets destroyed. Well, when they are in the stage of getting destroyed, then will it be said that it has become firm that they will definitely become pure? So, so, when they come here; what is the meaning of ‘here’? Hm? ‘Here’ means that they come to Baba. It is said that those who come to Baba, then what is said for those who sit close? The one who worships (upaasana). Up means close. Aasan means one who sits in an asana (yogic posture). So, if he sits in an asana close by, so, is it through the body or through the mind and intellect or through the heart? Hm? Yes, through the intellect also and through the heart also. So, when they come here then pure means pure; then there is no topic of impurity. However, if anyone becomes bad, then they ruin themselves.

Someone said – No, Baba. But if the leg shakes somewhere, then I will call you in such a manner as Draupadi had called God Shri Krishna. She was Draupadi and I. Baba said – She was Draupadi and I am her Kanhaiyya. Hm? Who said? Hm? Baba said. She was also disrobed. What is meant by ‘also’? Hm? Draupadi was also disrobed. Why was ‘also’ added? Yes, others were also disrobed. So, she was disrobed, wasn’t she? So, the Father gave her 21 sarees. It means that He gave her a blessing for 21 generations. Just as brother, brother, you will never become naked now. He gave this boon. Hm? So, this Father has explained that the deities never become naked at all. Hm. Someone said – In this manner I am also telling that if I too get any Menaka, Urvashi anywhere and if she tries to disrobe me; he speaks in an opposite manner; Do Duryodhan-Dushasan like men disrobe [women] or does a female bodied person disrobe [a man]? Hm? Yes. An opposite topic has been mentioned. If she tries to disrobe me, then I will call you. Had he said ‘I will call (pukaarungi) [in a feminine sense]’ it would have been correct. Now he says ‘I will call’ (pukaaroonga) [in a masculine sense]. Baba has said – Arey, it was told to the children. Hm? It was told beforehand.

Sweet, sweet, seekiladhey, i.e. those who meet after 5000 years after passing through a cycle. After passing through the cycle of 84. You have met now again. Hm? Now it is a preparation for going back. And bhaavi taarey nahi tarai (the destiny cannot be avoided). Hm? It means that you will definitely grasp the knowledge. You will grasp the knowledge and go up. You will definitely go. There cannot be any other topic in this topic at all because everyone has to definitely go to a high stage. You see that destruction is also staring at you definitely. Hm? Destruction is staring at you with its mouth wide completely open. So, you will wonder, will you not daughter? Now you stand here itself and think as to where are we standing? Hm? We are standing at the Confluence Age. Hm? The Iron Age is going to end and the Golden Age is going to begin. We are standing in between both of them. And we are on this side. Hm? What is on this side? The Iron Age. And there is Golden Age on that side. So, look there is so much difference. The Iron Age is a sinful Age and the Golden Age is the Age of noble souls, deities. Where did they perform noble acts? Hm? In the Golden Age? No. They performed noble acts here in the Confluence Age, didn’t they? So, they get its returns there.

So, Baba told that Baba has told us the meaning of ‘ham so’ (we become that), hasn’t He? We become deities from Brahmins. Now we are Brahmins only, aren’t we? So, we will then become deities. Then? Then what will we become? Hm? Don’t you know? Then we will become Kshatriyas. What is meant by Kshatriya? Those with the luster of a Kshatriya (kshaatra tej). Have you seen the picture of the Ladder? You have seen the picture of the Tree, haven’t you? Hm? Has the canopy been shown over Lakshmi-Narayan in the Golden Age or has the canopy been shown over Ram-Sita in the Silver Age? Hm? Where has it been shown? It has been shown in the Silver Age. Why has it been shown there? What is the reason? Hm? Why was it shown there? Yes, it was shown because two celestial degrees of the souls are reduced there. So, the place where the people are perfect in 16 celestial degrees it will be said that there are nice deities only. Hm? And when you fall two celestial degrees, then will there be any need to control or not? Yes. So, in order to control then yes, kingship. Kinship means governance. Governance itself is called kingship, isn’t it? So, I bestow that specialty of governance upon you children now. What? How do I give? Hm? What do I give? Arey, I am an inexhaustible storehouse of knowledge, am I not? So, I give the store house of knowledge, don’t I? Hm? What knowledge? That store house of knowledge gives the knowledge of the source from which you will get that luster of a Kshatriya (kshaatra tej) on this world stage. What is Kshaatra tej? Canopy (chhatrachhaya) of what? Hm? The canopy of the power of Yoga. What?

Am I knowledgeful or will I be called a yogi? What will Shiv be called? Yes. Shiv is knowledgeable. He is a stock-house of inexhaustible knowledge. Hm? He narrates theoretical knowledge, doesn’t He? Or practical? Hm? Yes. So, to inculcate the knowledge in practical means; what? Practical can be only when you grasp the essence of knowledge. What is meant by knowledge? What is meant by knowledge?
(Someone said something.) Information. Information of what? You said correctly that it is information. Information of which topic? Hm? Yes? Information of which topic? (Someone said something.) Information of 84 births? Achcha? Information of 84 births, hm, will all the souls get the specialty of kingship through the information of 84 births? Hm? How will they get? Hm? (Someone said something.) Will I become a deity? How will I become a deity? Shiv is God. He is not a deity. A deity alone will make others a deity. A wealthy person will make someone wealthy. Hm? A lawyer will make someone a lawyer. Arey, one will make someone like himself only, will he not? Hm? So, who will make a deity? Hm? Yes, what information do I give? Yes, I give information as to in whom do I enter in a permanent manner. The information is especially about this topic. That topic which has been written even in the Gita that has been written by scholars, pundits and teachers (acharyas), hasn’t it been written? What? Knowledge of which topic? Knowleldge is; Kshetra, i.e. the body and Kshetragya, the one who is knowledgeable about the body. Knowledgeable about which body? Temporary? Not temporary. The knowledge of the permanent Chariot itself is called knowledge. Knowledge means knowledge of which topic? Of lies? Hm? Knowledge of what? Hm? The knowledge of truth. So, what will be called truth? Is that which is forever the truth or is that which exist sometimes and doesn’t exist sometimes the truth? Who is truth? How will you know who is truth? Hm? You will get the information of your individual 84 births later on. First you should get the information of that true form which is forever truth on this world stage. Does he play a part forever or does his part (role) get cut in between? He plays a part forever.

So, if you know that truth (sat), then the one who holds that truth is called Sati. What is she called? The one who holds the truth is called Sati. So, is it a couple of Sati and Sat or not? Yes, it is a couple (Jodi). What will Sati be called? Will she be called the wife (sajani) of Sat (truth)? What is their relationship? Sat and Sati. Both of them happen to be a couple. So, what are you children told that the one who is called ShivBaba is one Saajan (husband). Hm? And all others are? What are all others? All others are wives (sajaniyaan). All are Sitas. So, all the Sitas will be numberwise only, will they not be? Hm? Who will get more shade of canopy? Hm? Yes, the one who holds the truth at number one position will get the most protection, i.e. canopy. Canopy of what? Hm? Arey, the canopy itself is of the power of Yoga. Power of Yoga means the power of remembrance. The one with whom we are more pleased will be remembered the more, will he not be? No? Yes. The one whom you love more is remembered more. So, this is about remembering through whom in original form? Hm? Originally it is a topic of the permanent Chariot-holder, the one who is truth in this world.

So, you are numberwise. How numberwise? The more someone is avyabhichaari (non-adulterous), hm, not for one birth, those who have been avyabhichaari through mind and intellect, through the sense organs, through the organs of action since many births keep on getting the power of Yoga birth by birth. From whom? From whom do they keep getting? From the point of light incorporeal Shiv? Hm? Which power do you want? You want knowledge in 84 births, in 63 births or that which is called energy (oorja)? Hm? For example, there is current, isn’t it? This is a machine (yantra). So, when current passes through those machines, then the machine works. So, what is this body? What are these different kinds of bodies? Hm? What are the bodies of the community of different kinds of species? They are machines, aren’t they? So, how do those machines work? Hm? Yes, the same energy of Yoga, the same power. From whom do they get? Hm? They get birth by birth. From whom do they get? From whom do they get? From the same one stock-house (bhandari) of Yoga, who is called Yogeshwar. What?

Well, they have shown three Yogishwars on the path of Bhakti. Hm? Then the people of the world, the Iron Age world have also been named Gyaneshwar, hm, Yogeshwar. Arey, how will Yogeshwar, Gyaneshwar, the God of knowledgeable ones emerge in this world? The God of the knowledgeable one is only one inexhaustible stock-house of knowledge who does not pass through the cycle of birth and death. And He is Sadaa Shiv. What? He is forever incorporeal, viceless, egoless, non-pleasure-seeker (abhokta), non-doer (akarta) and agarbha (one who does not get birth through a womb). He does not get birth through the womb (garbh). So, the bhogi souls which get birth through the womb, from where do they get the store house of Yoga, the energy of Yoga? Hm? Yes, there is definitely a stock house on this world stage, who is called Yogishwar in the scriptures. Three, four Yogishwars have been described in the scriptures; it is not that topic that Sanat Kumar has also been described as Yogishwar, hm, and Krishna has also been mentioned as Yogiraj, the king of Yogis. And Shankar has also been made Yogiraj. Arey, is the one who has been called Shankar, hybrid or not? Is he mix or pure? So, will there be power in purity? Where does entire power come from? It comes from purity. Call purity as the power of Yoga.

So, such purity through the embodied soul; the embodied soul which is forever truth on this world stage. So, through that truth, yes, in this Purushottam Sangamyug, all the seed-form souls are filled with that stock numberwise and are called Rudraksh. What? Rudragan. What? They are direct children of the Father, aren’t they? How will the children of the seed be? The children of seed will be seeds only. Seeds of knowledge will be seeds of knowledge only. And the one who is the seed of Yoga, the Yogishwar, i.e. Father, the one who is the king of yogis, will his children also be yogis or not? They will be yogis. So, those who are knowledgeable (gyaani) and yogi children since many births, those seed form souls are filled with that power in the Purushottam Sangamyug. And is it for oneself, just for one’s own selfishness, for one’s Chariot of many births, for the body-like Chariot or if he is the seed, then does creation take place through the seed? Yes. Each one has its individual world-like tree for which it is said that what exists in each star? There is a world. So, similarly, these seed form souls, which are the beads of Rudraksh, the Rudragans, My direct children, they fill themselves with the entire power. Through whom do they fill? Through whom do they fill? Arey? Through whom do they fill? Yes, they fill the power of Yoga through one Yogishwar. So, [through] that Yogishwar, on this world stage, in the Purushottam Sangamyug, i.e. in the end of the Iron Age and in the beginning of the Golden Age the purusharthi seed form souls of the entire world get filled with that power numberwise.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2799, दिनांक 22.02.2019
VCD 2799, dated 22.02.2019
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समय- 00.01-25.26
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आज का रात्रि क्लास है – 12.11.1967. किसी बहन ने कहा – अक्सर करके सवेरे सवा पांच बजे क्लास होता है। वहाँ पर जो आवें उस बहन के सेंटर में। बाबा ने कहा – सवेल में? तो किसी ने कहा – हाँ। जिज्ञासु आया होगा बहन के साथ। अच्छा? रात में नहीं? सवेल में? किसी ने कहा – सवेरे-सवेरे। अरे, बच्ची, रात में होता है क्लास? तो कोई ने कहा – वहाँ रात में नहीं होता है। क्लास होता ही नहीं है? तो कोई ने कहा – नहीं। होता होगा। भाई लोग का कुछ थोड़ा। फिर दूसरे भाई ने कहा – कोई आते हैं भाई लोग। अच्छा! थोड़े से आते हैं। तो भाई ने कहा – हाँ, थोड़े से आते हैं। तो कोई ने कहा कि आधा क्लास जैसे कि झुटके में चलता है। बाबा ने बोला – आधा क्लास एकदम? तुम लोग तो कमाल किया है। किसी ने कहा – तो कहती है बहनजी ने कहा। तो कितनी आती हैं? पचास आती हैं? किसी भाई ने कहा – 40-50 होंगी। तो फिर पच्चीस वरी कैसे? पीछे तुमने तो बोला; इसमें भरा। तो किसी ने कहा – नहीं। अभी भरा। झुटके ये बंद होवें। तो उसके लिए कोई युक्ति सुनाएंगे ना। उनको ईनाम मिल जाए। मिलेगा। तुम लोगों ने बहुत कोशिश की है। लेकिन गीत चलाय देते हैं।

देखो – ये इनमें से निकाल देना। अभी किसी को भी ऐसे बताओ नहीं। नेष्ठा में कह करके किसको भी नहीं बिठाओ। क्योंकि वो बैठते हैं ना खास जिस बात में, तो फिर माया उनको चक्कर लगाती है। तुम तो बाबा नेष्ठा के लिए समझाय दिया है – कि उठो, बैठो, घूमो-फिरो, खाना पकाओ। बाबा कहे ना – कम कार डे जरूर। और दिल यार डे। यानि अपनी जो आत्मा है तो दिल आत्मा में है ना। तो बाबा कहेंगे – अच्छा, आत्मा को तो बाप को याद करना है। बाकि काम करते रहो। उठते-बैठते याद करते रहो। बाकि जो ये बैठ करके, हँ, जबरदस्ती बैठते हो ना, तो फिर माया भी जबरदस्ती करती है। तो फिर झुलाती है। हँ? कैसे? कैसे झुलाती है?
(किसी ने कुछ कहा।) हाँ, झुटका खाते हैं। मुंडी नीचे झुक जाती है। तो किसी ने कहा – काम के टाइम। बाबा ने बीच में बोल दिया – तो ये इनकी भूल है। यानि बहुत जगह में निष्ठा-निष्ठा की एक हावी हो गई है अक्सर करके बहुतों में। तो रात को दो-दो घंटा, चार-चार घंटा, पांच-पांच घंटा, सारी रात निष्ठा में बिठाय देते हैं। तो फिर क्या होगा? हँ? क्या होगा? सारी रात बिठाएंगे तो वो झुटका आएगा ना। तो किसी भाई ने कहा – बाबा, निष्ठा तो नींद के लिए ही कहते हैं ना। तो दरअसल में नींद नहीं है। उसकी डेफिनेशन में फर्क है।

बाबा ने बोला – ये होते हैं। ड्रिल में सामने बैठते हैं। ये तो ये माशूक को देखना चाहिए ना। अरे, आँखें बंद करके कैसे माशूक को देखेंगे? कभी देखेंगे कोई? यहाँ तो माशूक सन्मुख है। तो जब सन्मुख है तो आँखें खोल करके बैठना होता है। हँ? और जहाँ सन्मुख नहीं है, हँ, तो जबरदस्ती आँखें बंद करके वो निष्ठा में बैठने की क्या दरकार है? समझा ना? यानि यहाँ तो माशूक आया हुआ है ना। और तुम सब आशिक हो। आशिक और माशूक ऐसे थोड़ेही बंद करके आँखें बंद करके जाते हैं। नहीं। वो तो फिर अंधे हो गए। ये जो सन्यासी लोग हैं वो तो आँखें बंद करके बैठते हैं। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है स्त्रीयों को नहीं देखते हैं। फिर तो आँखें बंद कर लेते हैं। बाकि आँखें बंद करना, बाबा तो बहुत दफा समझाया है कि आँखें बंद करके कोई कभी नहीं बैठे। परंतु किनको टेव पड़ जाती है, हेर पड़ जाती है। या समझो बाबा को नहीं देखना चाहते होंगे। किनकी बुद्धि का योग शिवबाबा से है। तो इनसे आँखें बंद करेंगे ना। जैसे कोई का कृष्ण से प्यार है। तो जिनका कृष्ण से प्यार है वो राम के आगे आँखें बंद करके बैठेंगे ना। हँ? और राम से प्यार होगा तो कृष्ण के आगे आँखें बंद करके बैठेंगे। ये पहचान है। क्या? हँ? क्या पहचान बताई? हँ? कि जिससे प्यार होगा वो सामने होगा तो आँखें खुल जाएंगी। दुगनी। और दूसरा कोई बैठ जाएगा सामने तो फिर तो झुटका आना चाहिए कि नहीं? हँ? हाँ, झुटका आएगा। आँखें बद करके बैठेंगे। ऐसे भी होते हैं। यहाँ भी ऐसे हैं। जिनका शिवबाबा से प्यार होगा ना, हँ, वो ब्रह्मा के आगे आँखें बंद करके बैठेंगे। हँ? ये क्या बात हुई? ब्रह्मा बाबा में शिवबाबा नहीं आता है क्या? नहीं आता क्या? शिवबाबा ब्रह्मा बाबा में आता या नहीं आता? क्या कहें? हँ? कि शिव बाप आता? कौन आता? और शिवबाबा से प्यार होगा तो ज़रूर आँखें खोल करके बैठेंगे शिवबाबा के सामने।

किंतु शिवबाबा तो सामने देखता है ना अभी। क्योंकि अभी तो शिवबाबा को आँखें हैं ना। अभी। हँ? अभी सन् 67 में शिवबाबा को इसके अंदर आँखें हैं ना अभी। अभी माने? अभी हैं। आगे पता नहीं एक साल के बाद होंगी या नहीं होंगी। अभी तो हैं। ऐसे तो नहीं है कि अभी आँखें नहीं हैं। कोई कहेंगे आँखें अभी नहीं हैं शिवबाबा को? अभी माना 67 में। हँ। बाबा कहते हैं मैं इसमें प्रवेश करता हूँ। हँ? किसमें? ब्रह्मा बाबा में, दादा लेखराज में प्रवेश करता हूँ और मैं सबको देखता हूँ। यानि देख रहा हूँ यहाँ। ये कहते हैं कि मैं देखता हूँ कि जैसे नहीं देखता हूँ। शिवबाबा कहते हैं कि मैं इनको देखता हूँ। है ना? ये कहते हैं, देखते हैं, कहते हैं, मैं देखते हुए भी मैं जैसे नहीं देखता हूँ। क्योंकि ये बुद्धि में बैठ गया है कि ये जो कुछ भी इन आँखों से देखा जाता है वो अब सभी विनाश हो जाने का है। तो इसलिए इन आँखों को क्या देखकरके करें? क्या? कौनसी आँखों को? बाबा के सामने, ब्रह्मा बाबा के सामने जो भी बैठे हुए हैं उनकी आँखों को देखकरके क्या करूँ? सब खलास हो जावेंगे। तो भी बाबा आँखें खोलकरके तो जरूर बैठेंगे ना। कि बाबा भी आँखें बंद करके बैठेंगे? बैठेंगे आँखें बंद कब कभी गद्दी पर यहाँ। यहाँ बैठकरके कोई आँखें बंद करके बैठे। तो ये तो कायदे के बिल्कुल ही विरुद्ध है। या टीचर के ही पढ़ावे पढ़ता है, पढ़ाता है ना बच्चे। टीचर अगर आँखें बंद करेंगे तो कहेंगे अरे, झुटका उनको भी आते हैं। टीचर को भी झुटका आते हैं। कहेंगे ना।

तो टीचर तो कभी भी आँखें बंद करके बैठेंगे नहीं। ये पढ़ाते हैं ना बच्चे। और तुम पढ़ते हो। तो न पढ़ने वाले को आँखें बंद करनी है। और न पढ़ाने वाले को आँखें बंद करनी है। क्योंकि पढ़ने वाले को तो कोई किताब-विताब तो नहीं देते हैं। 12.11.67 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। भल लिखते हैं। अगर लिखते भी हैं पर ये जो लिखने वाले हैं ना उनको भी ऐसी प्रैक्टिस चाहिए जो बाबा को यहाँ देखते रहें और, और हाँ, ये हाथ चलते रहें। ये कैसे होगा? देखें बाबा को और हाथ यहाँ चलते रहें तो गड़बड़ नहीं करेंगे? आँखें इधर करके लिखा। हँ? अगर आँखें इधर करके लिखा तो भी नापास हो जाते हैं। नहीं। ऐसे नहीं। लिखना है तो जहाँ लिखना है कलम से कागज़ के ऊपर, वहाँ देखना है। और दिल? और दिल यार दे। कम कार डे। बाकि बाबा ने कहा उनको माशूक को तो देखता रहे।

तो ये सभी कायदे हैं जो समझने चाहिए बच्चों को। क्योंकि इनको तो ज़रूर देखना है ना। हँ? क्योंकि मोस्ट बिलवेड है। इसको थोड़ेही कोई आँखें बंद करना है। किसको? बाबा को। ये तो फिर बेअदबी हुई। और ही इन्सल्ट हो गया। आँखें बंद करके कोई बैठे माशूक के आगे जो आते ही हैं इनमें बैठकरके। अभी उनको तो कभी नींद न आएगी ना। नींद नहीं आएगी ना। और शिव को तो कभी नींद नहीं आएगी। क्योंकि वो तो सदा जागती ज्योति है। हँ? हाँ। तो उनको कभी नींद नहीं आएगी। अगर नींद आएगी, टीचर को अगर नींद आए तो बिचारा ये क्या बैठ करेगा? हँ? क्या करेगा? हँ? ताली बजाएगा। क्या करेगा? आहाहाहा। ताली बजाएगा ना। हाँ। कि हमको तो नींद आती ही थी और शिवबाबा को भी नींद आ रही है। तो इन दोनों को गद्दी पर बैठकरके कभी भी झुटका वगैरा नहीं आएंगे। किन दोनों को? हँ? किन दोनों को बैठकर? हँ? शिव को और शिव जिस तन में बैठकरके पढ़ाते हैं या क्या नाम बच्चों को देखते हैं तो इन दोनों को कभी झुटका वगैरा नहीं आएंगे। और फिर ये जो स्टूडेन्ट्स हैं, कभी भी तुम नहीं देखेंगे कि कोई मास्टर बैठकरके पढ़ावे और स्टूडेन्ट बैठकरके झुटका खावे। ये भी नहीं हो सकता है क्योंकि मास्टर तो घड़ी-घड़ी प्रश्न पूछता है। हँ? हिसाब पूछेगा। ये पूछेगा, वो पूछेगा।

तो ज़रूर बहुत कोई बिरले होंगे बिल्कुल ही जठर। कोई ऐसे स्टूडेन्ट होंगे। वो पिछाड़ी में बैठकरके झुटका खाएंगे। नहीं तो क्लास में बैठकरके झुटका कोई खावे ये तो कायदा ही नहीं है। स्टूडेन्ट्स झुटका नहीं खाय सकेंगे। और बैंच के ऊपर। हाँ, यहाँ झुटका खा सकते हो। वहां तो यहाँ से जाकरके; अभी तो यहाँ ही करेंगे ना। बैंच-वैंच खाएंगे झुटका। तो क्या होगा? बैंच भी गिरेगी और खुद भी? खुद भी गिर जाएंगे। आगे सामने गिरेंगे। बैंच पर बैठे ना। तो तुम तो यहाँ नीचे बैठे हो। हँ? यहाँ तो फिर और धरती से भी जाकरके लगेंगे। क्या? अगर झुटका खाएंगी, धरती पे बैठे हो, झुटका खाया और गहरी नींद आई तो क्या माथा कहाँ टकराएगा? हाँ, जमीन में टकराएगा। तो भी तुमको पता नहीं पड़ेगा कि हमारा माथा जमीन में टकराय गया। इतना गहरी नींद में! हँ? अच्छा? तो धरती से लगे तो गिर पड़े। हँ? बैठे तो एकदम ऐसे होगा। स्टूडेंट अक्सर करके ये विवेक कहता है कि जो स्टूडेन्ट हैं वो झुटका नहीं खाएंगे। क्योंकि उनको तो पढ़ना है ना। तो पढ़ाई में अटैन्शन देना है। तो यहाँ भी तुम बच्चों को अटैन्शन प्लीज़। तो तुम लोग का क्या होगा? हँ? ऐसे कहेंगे अटैन्शन प्लीज़ तो बुद्धि का योग बाप की तरफ में चला जाएगा। हाँ। ये घड़ी-घड़ी टीचर को, जैसे बाबा समझाया ना कि जब यहाँ आके बैठते हो क्योंकि नई बात है ना। और जरा गहरी बात है कि घड़ी-घड़ी कहते रहेंगे। क्या? कि हाँ, आत्माभिमानी होकर बैठो। देह अभिमानी होके बैठते हैं तो ज़रूर झुटका आता है। देह अभिमानी नहीं होकरके बैठना है।

Today’s night class is dated 12.11.1967. A sister said – Mostly, the class takes place in the morning at 5.15 AM. Whoever comes there to the center of that sister; Baba said - In the morning? So, someone said – Yes. A student must have come along with the sister. Achcha? Not in the night? In the morning? Someone said – Early morning. Arey, daughter, does the class take place in the night? So, someone said – It does not take place there in the night. Doesn’t the class take place at all? So, someone said – No. It must be taking place. Something for the brothers. Then another brother said – Some brothers come. Achcha! A few come. So, the brother said – Yes, a few come. So, someone said that half the class takes place in sleep. Baba said – Almost half of the class? You people have done wonder. Someone said – So, she says – The sister said. So, how many [ladies] come? Do fifty [ladies] come? A brother said – there must be 40-50. So, then how are there twenty five? Later you said; it was recorded in this. So, someone said – No. It was recorded now. This sleeping [in the class] should stop. So, He will narrate some tactics for that; will He not? They will get a prize. They will get. You people have tried a lot. But you play the song.

Look, remove this from this. Now don’t tell anyone like this. Do not ask anyone to sit in neshtha (a kind of meditation). It is because when they especially sit in a topic, then Maya makes them revolve. Baba has explained to you for neshtha that you may stand up, sit, go around, cook food. Baba says, doesn’t He? Kam kaar de jaroor (the hands should be definitely busy in work) Aur dil yaar de (and the heart should be with the friend). It means that your soul; so, the heart is in the soul, isn’t it? So, Baba will say – Achcha, the soul has to remember the Father. As for the rest, you keep on doing your work. While standing and sitting keep on remembering [the Father]. As regards the way you sit, hm, you sit forcibly, then Maya also forces herself upon you. So, then she dangles you. Hm? How? How does she dangle you?
(Someone said something.) Yes, you bow your head down in sleep. Your head bows down. So, someone said – At the time of work. Baba said in between – So, this is the mistake of this person. It means that at many places there is a habit of nishtha mostly among many. So, they make them sit in nishtha for up to two hours, four hours, five hours in the night or throughout the night. So, then, what will happen? Hm? What will happen? If you make them sit throughout the night, then they will sleep, will they not? So, a brother said – Baba the word nishtha is used for sleep only, isn’t it? So, actually it is not sleep. There is a difference in its definition.

Baba said – This happens. They sit in the front in drill. They should see the beloved (maashook), shouldn’t they? Arey, how will you see the maashook with your eyes closed? Will anyone ever see? Here the maashook is face to face. So, when He is face to face, then you have to sit with your eyes open. Hm? And where He is not face to face, hm, then where is the need to sit in nishtha by forcibly closing the eyes? Did you understand? It means that the maashook has come here, hasn’t He? And you all are aashik (lovers). Do the lovers and beloveds go with their eyes closed? No. They then happen to be blind. These Sanyasis sit with their eyes closed. It is because sometimes it happens that they do not see the women. Then they close their eyes. But as regards closing the eyes, Baba has explained many times that nobody should ever sit with his/her eyes closed. But some people become habituated. Or you may think that they do not want to see Baba. The connection of some people’s intellect is with ShivBaba. So, they will close the eyes in front of this one, will they not? For example, someone loves Krishna. So, those who love Krishna will sit with their eyes closed in front of Ram, will they not? Hm? And if they love Ram, then they will sit with their eyes closed in front of Krishna. This is the indication. What? Hm? What is the indication mentioned? Hm? That if someone loves someone, and if he is in front of him, then the eyes will open up. Double. And if anyone else sits in front of them, then should they sleep or not? Hm? Yes, they will sleep. They will sit with their eyes closed. There are such persons also. There are such persons here as well. Those who love ShivBaba will sit with their eyes closed in front of Brahma. Hm? What is this? Doesn’t ShivBaba come in Brahma Baba? Doesn’t He come? Does ShivBaba come in Brahma Baba or not? What should we say? Hm? That Father Shiv comes? Who comes? And if there is love for ShivBaba, then they will definitely sit with their eyes open in front of ShivBaba.

But ShivBaba sees in the front now, doesn’t He? It is because ShivBaba has eyes now, doesn’t He? Now. Hm? Now in 67 ShivBaba has eyes within this one now, doesn’t He? What is meant by now? He has now. In future, who knows whether he will have or not have after a year? He has now. It is not as if he doesn’t have eyes now. Will anyone say that ShivBaba doesn’t have eyes now? Now means in 67. Hm. Baba says that I enter in this one. Hm? In whom? I enter in Brahma Baba, in Dada Lekhraj and I see everyone. It means that I am seeing here. This one says that I see as if I don’t see. ShivBaba says that I see this one. Is it not? This one says, sees, and says; I do not see despite seeing. It is because it has sit in the intellect that whatever is seen through these eyes is now going to be destroyed. So, this is why what should I do by seeing these eyes? What? Which eyes? What should I do by seeing the eyes of all those who are sitting in front of Baba, Brahma Baba? All will perish. Yet Baba will definitely sit with His eyes open, will He not? Or will Baba also sit with His eyes closed? Will He ever sit here with His eyes closed on the seat (gaddi)? If anyone sits here with his eyes closed, then this is completely against the rule. Or if he studies only when the teacher teaches; He teaches, doesn’t He children? If the teacher closes his eyes, then it will be said that arey, he too sleeps. The teacher also sleeps. They will say, will they not?

So, the teacher will never sit with his eyes closed. This one teaches, doesn’t he children? And you study. So, neither should those who have to study close their eyes. Nor the teacher should close his eyes. It is because those who study are not given any book, etc. Second page of the night class dated 12.11.67. Although they write. Even if they write; but these people who write also need such practice that they continue to see Baba here and, and yes, these hands should continue to work. How will this happen? They should see Baba and if their hands keep on working here, then will they not commit any mistake? You turned your eyes this side and wrote. Hm? Even if you turned your eyes this side and write, you fail. No. Not so. If you want to write, then wherever you have to write with a pen on the paper, you should see there. And the heart? The heart should be with the friend. The hands should be at work. Baba has said that you should continue to see the maashook (beloved).

So, all these are the rules which the children should understand. It is because this one has to definitely observe, will he not? Hm? It is because he is the most beloved. This one doesn’t have to close his eyes. Who? Baba. This would then be disrespect. It is an even more insult. To sit with one’s eyes closed in front of the beloved who comes sitting in this one. Well, that one will never get sleep, will He? He will not get sleep, will He? And Shiv will never get sleep. It is because He is forever an awakened light (jaagti jyot). Hm? Yes. So, He will never get sleep. If He gets sleep, if the teacher gets sleep, then what will this poor one sit and do? Hm? What will he do? Hm? He will clap. What will he do? Aahaha. He will clap, will he not? Yes. That I was anyways feeling sleepy and ShivBaba is also feeling sleepy. So, both of these will never feel sleepy while sitting on the guddi (seat). Who both? Hm? Who both, while sitting? Hm? Shiv and the body in which Shiv sits and teaches or when He observes the children then both these will never feel sleepy, etc. And then these students, you will never see that a Master sits and teaches and the student sits and sleeps. This too cannot be possible because the Master keeps on asking questions again and again. Hm? He will ask the calculation. He will ask this, he will ask that.

So, definitely there will be some rare ones who are completely jathar (dull-headed). There will be some such students. They will sit at the back and sleep. Otherwise, it is against the rule to sit in the class and sleep. Students cannot sleep. And on the bench. Yes, you can sleep here. There, after going from here; Now you will do here only, will you not? You will sleep on the bench. So, what will happen? The bench will also fall; and you too? You yourself will also fall. You will fall in the front. You sat on the bench, didn’t you? So, you are sitting below [on the ground] here. Hm? Here you will go and fall on the Earth. What? If you sleep, if you are sitting on the ground, if you doze-off and if you go into deep sleep, then where will your forehead touch? Yes, it will touch the ground. Still you will not know that my forehead has touched the ground. In such deep sleep! Hm? Achcha? So, as soon as you touch the ground you fall. Hm? If you sit it will happen completely like this. Students; mostly wisdom says that the students will not sleep. It is because they have to study, don’t they have to? So, you should pay attention to studies; So, here too you children should pay attention please. Then what would happen to you people? Hm? If you say ‘attention please’ then the connection of the intellect will go towards the Father. Yes. Every moment, the teacher; for example, Baba explained, didn’t He that when you come and sit here, because it is a new topic, isn’t it? And it is a slightly deeper topic that He will keep on telling every moment. What? That yes, sit in soul consciousness. If you sit in body consciousness, then you definitely feel sleepy. You should not sit in body consciousness.

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
Note: This is just a draft. For the complete text, Audio and Video of the above VCD please visit – www.adhyatmik-vidyalaya.com
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arjun
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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

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शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2800, दिनांक 23.02.2019
VCD 2800, dated 23.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
Morning class dated 13.11.1967
VCD-2800-extracts-Bilingual

समय- 00.01-19.05
Time- 00.01-19.05


आज का प्रातः क्लास है – 13.11.1967. रिकार्ड चला है – भोलेनाथ से निराला, गौरीनाथ से निराला कोई और नहीं। किसका-किसका नाथ बताया? भोलेनाथ और गौरीनाथ। क्या भोला और क्या गौरी? हँ? आत्मा ही भोला, भोली आत्मा, और आत्मा ही गोरी। अच्छा? काली आत्मा हो तो नाथ नहीं? हँ? काली आत्मा का नाथ नहीं? (किसी ने कुछ कहा।) अच्छा? वो तमोप्रधान में प्रवेश करता है (कि) सतोप्रधान में आता है? काले में आता है या गोरे में आता है? आता तो काले में है। हँ? पर ये नहीं कहेंगे कि काले को नाथ लिया। कहेंगे? हँ? काला है तो साबित होता है कि नाथ नहीं है, कंट्रोल में तो नहीं है। नाक में नकेल डाल दी जाए तो वो कंट्रोल से बाहर जाएगा? हँ? नहीं जाएगा। इसलिए कहा भोलानाथ। और गौरीनाथ। हँ। एक को नाथता है या 2-4 को इकट्ठा नाथ लेता है? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, लेकिन नाम तो दो बोले। भोलेनाथ और गौरीनाथ। हँ? एक नाम बोला क्या? फिर? तो माना जिसको नाथ लेते हैं, उसको भोली आत्मा तो कहेंगे ही क्योंकि भोलों का ही भगवान है। भोली-भोली आत्माएं जिन्हें सारी दुनिया ठग लेती है तो उनको बचाने के लिए ठगत से, हँ, वो आता है। लेकिन उससे ज्यादा निराला कोई है नहीं।

अभी तो ये मधुबन है। और मधुबन कहा ही तब जाता है जब गायन है कि मधुबन में मुरलिया बाजे। बच्चों को मालूम हुआ कि मधुबन में श्री कृष्ण की मुरली नहीं बजती थी। क्यों? भोलेनाथ की ही बजती थी। माना श्री कृष्ण भोलों का नाथ नहीं है? नहीं? अच्छा? स्यानों को कंट्रोल करता है श्री कृष्ण? अच्छा? हाँ, कहते हैं श्री कृष्ण को 16 कला संपूर्ण। वो कोई को नाथता है क्या? नहीं। हाँ, वो आत्मा भी अंतिम जनम में नीचे गिरती है तो वो भी तो नंबरवार भोलों की लिस्ट में ही आती है या बड़ा भगत बनती है? बाबा तो कहते हैं भगत बड़े ठगत। हँ? तो कृष्ण के लिए नहीं कहेंगे कि कोई उनकी मुरली बजती थी। श्री कृष्ण को तो भोलेनाथ कोई कह ही नहीं सकता कि भोलों को नाथने वाला। और यही आदि, मध्य, अंत; किसका? हँ? रचयिता का और रचना का। कौन रचयिता? हँ? सृष्टि साकार है तो रचयिता भी साकार है। और रचयिता की रचना भी साकार है।

तो इन दोनों का राज़ समझाय रहे हैं। कौन-कौन दोनों? हँ? रचयिता का भी राज़ और रचना का भी राज़। अच्छा? अपना राज़ नहीं समझाय रहे हैं? हँ? जो समझाय रहे हैं उनका कोई अपना राज़ नहीं है? हँ? राज़ है या नहीं है? अरे? बच्चे तो भोलेनाथ के सामने बैठे हैं। और जब सामने बैठे हैं, हँ, सामने बैठे हैं तो अच्छी तरह से निश्चय में बैठे हैं। अच्छी तरह से। हँ? अच्छी तरह से निश्चय में बैठे हैं सामने? अच्छा तरह से क्या होता है और हल्की तरह से क्या होता है? अच्छी तरह से सामने बैठे हैं माने अंदर से भी और बाहर से भी। दोनों रीति से सामने बैठे हैं।

तो निश्चय में हैं कि बरोबर वो भोलानाथ कहो; ऐसे तो शिवबाबा के नाम तो बहुत रख दिये हैं। ये तो उनकी विशेषता हुई - भोलानाथ। ये विशेषण का नाम है। और ये नाम रखते हैं एक के ऊपर या ढ़ेरों के ऊपर? ये एक के ऊपर नाम रखा है। क्या? भोलानाथ। कौन एक? हँ? आत्माओं का बाप या मनुष्यों का बाप? कहेंगे आत्माओं का बाप। हँ? ये नाम भोलानाथ रखा है आत्मा के ऊपर? आत्मा का तो एक ही नाम है। क्या? उनका नाम तो शिव ही है। हाँ, जब प्रवेश करते हैं तो भोलानाथ। अनेकों नाम हैं। तो बोलते तो फिर भी बाबा ही हैं ना। शिवबाबा। क्योंकि बाबा नाम बहुत मीठा है। हँ? बाबा नाम मीठा है या परमपिता मीठा है? दोनों का नाम बताया। परमपिता मीठा है या बाबा नाम मीठा है? हँ? परमपिता मीठा नहीं है? हँ? हाँ, वो तो चिंतन में ही नहीं आता, अचिंत्य है। और उसको तो याद करने में ही बुद्धि बार-बार, हँ, तिरकती है। तो जब साकार में प्रवेश करता है और प्रवेश करने के बाद जब समझाता है, सुनाता है, तो बहुत मिठास से समझाता है। हँ? पहले किस रूप में समझाता है जो मीठा कहा जाए? जरूर कहेंगे माता की मीठी लोरी होती है बच्चों के लिए। तो मीठा हुआ ना।

तो समझाने वाला तो बाप ही है ना। तो बाप ने समझाया कि लौकिक बाप को कभी परमपिता नहीं कहेंगे। हँ? ये जो प्रजापिता है ये भी इस लोक का है या अलोक, सूक्ष्मवतन का है या पार लोक का है? ये भी लौकिक हुआ ना। तो ये लौकिक बाप को कभी भी परमपिता नहीं कहेंगे। और कोई भी बाप को, कोई भी लौकिक हो, हँ, कोई भी जन्म-जन्मान्तर का, उसको परमपिता नहीं कहा जाता। क्योंकि ये कायदा ही नहीं है कभी कि कोई भी जनम के पिता को या सारी मनुष्य सृष्टि के पिता को, हँ, जो लौकिक ही है, उसको परमपिता कहा जाए। क्योंकि उसका भी तो पिता वो ही है। है। जब परमपिता कहेगा तो जैसे कि आत्मा कहती है। हँ? आत्मा कहती है? परमात्मा नहीं कहती? परमात्मा कहता है कि नहीं? नहीं? परमात्मा नहीं कह सकता परमपिता? कह सकता है कि नहीं कह सकता? हँ? अरे क्यों नहीं? वो भी तो आत्मा है। अरे, आत्माओं के बीच में परम पार्टधारी है लेकिन आत्मा तो है ना। तो कहती है। और सच्चे-सच्चे पिता को कहते हैं। क्यों? क्योंकि बाकि जितने पिता हैं इस दुनिया में ए टू ज़ेड, हँ, वो भले आदि में सच्चे हों लेकिन बाद में माया उनको क्या बनाय देती? सबको माया झूठा बनाय देती। हँ? क्यों? कैसे? क्योंकि भोगी आत्माएं हैं ना। भोग भोगते-भोगते सच्चाई से, सत्य से क्या बन जाती? तामसी, झूठी बन जाती।

तो सच्चा-सच्चा परमपिता तो, हँ, जो बापों का बाप जिसका कोई बाप नहीं, उसी को कहते हैं। क्योंकि वो तो पिता हमेशा ही है। वो कभी माता या कोई दूसरा संबंध बनता है आत्माओं का बाप? वो तो बनता ही नहीं। हर एक जनम-मरण में जो पिता हैं वो आते ही हैं। हँ? लेकिन ये? ये तो तुरीया है सब पिताओं के मुकाबले। हँ? ये जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते हैं। सब बच्चे जब बड़े होते हैं तो उस परमपिता को याद करते हैं। बड़े होते हैं तब याद करते हैं? छोटे नहीं याद करते? हँ? छोटे याद कर सकते हैं कि नहीं? छोटे कब और बड़े कब? उसमें भी बेहद की बात है क्या? हाँ, छोटे बच्चों को उतनी पहचान; छोटे बच्चे होते हैं मां के गोद में पलने वाले उनको पहचान होती है बाप की? नहीं होती। तो जब बड़े बच्चे होते हैं, समझदार होते हैं तो बाप की पहचान होती है।

तो उस परमपिता को याद करते हैं। उस परमपिता को? क्यों? हाँ, ब्रह्मा बाबा के तन में वो परमपिता नहीं बोल रहा था? हँ? लेकिन ब्रह्मा बाबा के तन में जो समझदार होगा वो परमपिता को याद करेगा? हँ? याद करेगा? नहीं। तो लौकिक पिता तो हर जनम में नया मिलता है। हाँ, और ये जो लौकिक बापों के बीच जो ये लौकिक है सब लौकिक का बाप; कौन? मनुष्य सृष्टि का बाप। ये हर जनम में नया मिलता है क्या? हाँ, जिनको भी मिलेगा तो वो पुराना ही कहेंगे या नया कहेंगे? क्या कहेंगे? हाँ, पुराना ही कहेंगे। और ये बाप सुप्रीम सोल परमपिता? हँ? ये तो हर जनम में माना कल्प के बाद मिलते हैं ना। तो क्या कहेंगे? पुराना है या नया है? नया ही मिलते हैं। और वो तो पुराना ही चले आते हैं, जो भी लौकिक बाप होते हैं। पिता-पिता कहते ही आते हैं।

और नाम भी उनका एक ही रखा जाता है, हँ, परमपिता का। क्या नाम? हँ? एक ही नाम है; क्या? शिव। और पूजा भी एक ही की होती रहती है। पूजा एक की, शिव की होती रहती है? हँ? भक्तिमार्ग में समझते हैं कि हम शिव की पूजा करते हैं। लेकिन शिव को तो याद कर सकते हैं। पूजा कर सकते हैं? नहीं। हाँ, शिव की याद होती है। पूजा तो किसकी होती है? बड़े रूप की होती है या छोटे रूप की? तो पूजा भी जो होती है वो एक ही बड़े रूप की होती है। जन्म-जन्मान्तर करते आए ना भक्तिमार्ग में। तो वो एक जो है जिसकी पूजा होती है तो जिस मूर्ति में पूजा करते हैं लिंग मूर्ति में या मूर्तिमान शंकर में पूजा करते हैं तो वो एक की ही पूजा होती है ना क्योंकि साकार बन गया तो पूजा बनने योग्य हुआ या नहीं हुआ? लेकिन वो कहते हैं मैं तो पूजा लेता ही नहीं हूँ। जब लेता ही नहीं हूँ तो होती किसकी रहती है? हँ? वो, वो भोग लगाएंगे, हँ, स्नान कराएंगे; भोग लगाते हैं, थाली-वाली जमाते हैं कि नहीं? हाँ, जमाते हैं। तो फिर किसकी करते हैं? बिन्दु, मुझ निराकार की करते ही नहीं हैं? नहीं। करते तो एक की ही हैं लेकिन जिस एक की करते हैं वो बाप समान, सुप्रीम सोल के समान निराकारी जब बन जाता है उस समय की करते हैं। बाद में जब ये सृष्टि में जन्म-जन्मान्तर भोग भोगते-भोगते आत्माएं नीचे गिरती हैं तो उनकी पूजा करते हैं क्या? उनकी करते हैं? उनकी नहीं करते।

Today’s morning class is dated 13.11.1967. The record played is – Bholeynath se nirala, Gaurinath se nirala koi aur nahi (nobody is more unique than Bholeynath, Gaurinath). Whose naath (lord) was he mentioned to be? Bholeynath and Gaurinath. What bhola (innocent) and what gauri (fair)? Hm? The soul itself is bhola, innocent soul and the soul itself is gori (fair). Achha? Is He not the naath (lord) if the soul is dark? Hm? Is He not the lord of the dark soul?
(Someone said something.) Achcha? Does He enter in tamopradhan (degraded one) or in satopradhan (pure)? Does He come in a dark one or in a fair one? He does come in a dark one. Hm? But it will not be said He controlled the dark one. Will it be said? Hm? When someone is dark, then it proves that he is not the lord, he is not under control. If a nose-pin is fitted in the nose, then will he go out of control? Hm? He will not go. This is why it was said – Bholanath. And Gaurinath. Hm. Does He control one or does He control 2-4 simultaneously? Hm? (Someone said something.) Yes, but two names were uttered. Bholeynath and Gaurinath. Hm? Was one name uttered? Then? So, it means that the one whom He controls, will be called an innocent soul only because He is the God of innocent ones only. The innocent souls whom the entire world dupes He comes to save them from the deceivers. But there is nobody more unique than Him.

Now this is Madhuban. And Madhuban is said to be only when it is praised that flute (Murli) is played in Madhuban. Children came to know that Shri Krishna’s flute used not to be played in Madhuban. Why? Only that of Bholeynath used to be played. Does it mean that Shri Krishna is not the lord of the innocent ones? No? Achcha? Does Shri Krishna control the wise ones? Achcha? Yes, Shri Krishna is called ‘perfect in 16 celestial degrees’. Does he control anyone? No. Yes, when even that soul falls in the last birth, is it also included in the list of numberwise innocent ones or does it become a big devotee (Bhagat)? Baba says that Bhagat (devotees) are big thagat (deceivers). Hm? So, it will not be said for Krishna that his flute used to be played. Nobody can call Shri Krishna as Bholeynath, the one who controls the innocent ones. And this beginning, middle and end; whose? Hm? Of the Creator and the creation. Whose creation? Hm? When the world is corporeal, then the Creator is also corporeal. And the creation of the Creator is also corporeal.

So, He is explaining the secret of both of these. Who both? Hm? The secret of the Creator as well as the creation. Achcha? Is He not explaining the secret of Himself? Hm? Does the one who explains have no secret of His own? Hm? Does He have a secret or not? Arey? Children are sitting in front of the Bholeynath. And when they are sitting in the front, hm, when they are sitting in the front, then they are sitting with faith in a good manner. In a good manner. Hm? Are they sitting with faith in a good manner in the front? What is ‘in a good manner’ and what is ‘in a light manner’? ‘Sitting in a good manner in the front’ means from the inside as well as outside. They are sitting in the front in both manners.

So, you have faith that correctly that Bholanath; ShivBaba has been given many names. This is His specialty – Bholanath (lord of the innocent ones). This is the name of an adjective (visheshan). And is this name coined for one or for many? This name has been coined for one. What? Bholanath. Who one? Hm? The Father of souls or the Father of human beings? It will be said – The Father of souls. Hm? Has this name Bholanath been coined for the soul? The soul has only one name. What? His name is only Shiv. Yes, when He enters then He is Bholanath. He has many names. So, however they call Him Baba only, don’t they? ShivBaba. It is because Baba name is very sweet. Hm? Is Baba name sweet or is the Supreme Father sweet? Both the names were mentioned. Is the Supreme Father sweet or is the name ‘Baba’ sweet? Hm? Isn’t the Supreme Father sweet? Hm? Yes, He cannot be thought over at all, He is unthinkable (achintya). And the intellect keeps on shaking again and again in remembering Him. So, when He enters into a corporeal being and after entering when He explains, narrates, then He explains very sweetly. Hm? In which form does He explain first that He could be called sweet? It will definitely be said that the sweet lullaby of the mother is for the children. So, He is sweet, isn’t He?

So, the one who explains is the Father only, isn’t He? So, the Father has explained that the lokik Father will never be called the Supreme Father. Hm? Does this Prajapita also belong to this abode (lok) or alok (non-abode), the Subtle Region or to the Paar-lok (the farthest abode)? This one is also lokik, isn’t he? So, this lokik Father will never be called the Supreme Father. And no other Father, be it any lokik one, hm, of any birth, he is not called the Supreme Father. It is because it is not the rule at all that a Father of any birth or the Father of the entire human world, who is lokik only be called the Supreme Father. It is because his Father is also that one only. Is. When he says ‘Supreme Father’, then it is as if the soul says. Hm? Does the soul say? Doesn’t the Supreme Soul say? Does the Supreme Soul say or not? No? Can’t the Supreme Soul say ‘Supreme Father’? Can he say or can’t he say? Hm? Arey, why not? He too is a soul. Arey, He is the supreme actor among the souls, but he is a soul, isn’t he? So, it says. And they say for the truest Father. Why? It is because all the fathers in this world, A to Z, hm, they may be true in the beginning, but later on what does Maya make them? Maya makes everyone false. Hm? Why? How? It is because they are bhogi souls, aren’t they? While experiencing pleasures truthfully, what does it become from truth? It becomes degraded, false.

So, the truest Supreme Father is said to be, hm, the Father of fathers, who does not have any Father. It is because He is always a Father. Does He, the Father of souls ever become a mother or does He establish any other relationship? He does not become at all. Every Father passes through the cycle of birth and death. Hm? But this one? This one is unique when compared to all the Fathers. Hm? He does not pass through the cycle of birth and death. When all the children grow up, then they remember that Supreme Father. Do they remember when they grow up? Don’t the young ones remember? Hm? Can the young ones remember or not? When is someone young and when is someone old? Is there an unlimited sense even in that? Yes, the young ones do not have that much knowledge; there are young children who get sustained in the mother’s lap, do they recognize the Father? They don’t. So, when the children grow up, when they become wise, then they recognize the Father.

So, you remember that Supreme Father. That Supreme Father? Why? Yes, wasn’t that Supreme Father speaking through the body of Brahma Baba? Hm? But will the one who is wise remember the Supreme Father in the body of Brahma Baba? No. So, you get a new worldly (lokik) Father in every birth. Yes, and this lokik one among the lokik fathers, the Father of all the lokik ones; who? The Father of the human world. Do you get this one anew in every birth? Yes, whoever gets, will they call him old only or a new one? What will you call? Yes, he will be called old only. And this Father, the Supreme Soul, Supreme Father? Hm? This one is found in every birth, i.e. after a Kalpa, isn’t He? So, what will you say? Is He old or new? You get Him anew. And all those lokik fathers are old ones only. You keep on saying Father, Father only.

And He, the Supreme Father is given only one name. Which name? Hm? He has only one name; what? Shiv. And only one is continued to be worshipped. Is one, Shiv continued to be worshipped? Hm? People think on the path of Bhakti that we worship Shiv. But Shiv can be remembered. Can they worship? No. Yes, Shiv is remembered. Who is worshipped? Is the big form worshipped or is the small form worshipped? So, worship also takes place for the one big form only. You have been doing (worship) birth by birth on the path of Bhakti, didn’t you? So, that one who is worshipped, so, the idol, the ling idol or the personified Shankar in whom He is worshipped, so, only that one is worshipped because when He became corporeal, then did He become worshipworthy or not? But He says that I do not accept worship at all. When I do not accept at all, then who is continued to be worshipped? Hm? They, they will offer Bhog, hm, bathe Him; they offer Bhog; do they decorate the plate or not? Yes, they decorate. So, then for whom do they do? Don’t they do for the point, Me the incorporeal at all? No. They indeed worship one, but the one whom they worship, they worship when he becomes incorporeal, equal to the Father, equal to the Supreme Soul. Later on, when the souls suffer downfall while experiencing pleasures birth by birth in this world, then do they worship them? Do they worship him? They do not worship them.

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2801, दिनांक 24.02.2019
VCD 2801, dated 24.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
Morning class dated 13.11.1967
VCD-2801-Bilingual-Part-1

समय- 00.01-15.54
Time- 00.01-15.54


प्रातः क्लास चल रहा था – 13.11.1967. सोमवार को दूसरे पेज के मध्यादि में बात चल रही थी – दुनिया में वहाँ रहते हो तो वहाँ तो इतनी याद नहीं पड़ेगी जब तलक रोज़ सुबह-सवेरे में शुरुआत में और अंत में घड़ी-घड़ी ब्राह्मणी उठे। अब ये तो तुम बच्चों को मालूम है कि ब्राह्मणी कहती है वहाँ कि आत्मा को याद करके बैठो। अपन को आत्मा समझ करके बैठो। फिर जब भाषण बंद करती है, या मुरली पढ़करके पूरी करती है फिर भी कह देती है। या तो बाबा को यहाँ भी कह देना पड़े और आने से ही कह देना पड़े अपन को आत्मा समझ करके बैठो। जब मुरली बंद करे तभी भी याद करके फिर भी कहे कि आत्मा समझ करके बैठो। तो वो शायद वहाँ बच्चों को वो जो ब्राहमणी है जब मुरली सुनावे तो फिर पहले-पहले शुरुआत में कहे आत्मा हो करके अपन को समझ करके बैठो। क्योंकि तुम बाप से वर्सा लेते हो। अभी संगमयुग में बाप से बेहद का वर्सा मिलता है। पर अभी इस युग की महिमा और बाप की महिमा नहीं समझेंगे, देह समझते रहेंगे तो बाप को याद नहीं कर सकेंगे। न वर्सा मिलेगा। तो इसलिए उनको आदि और मध्य भी हो सके तो बहुत ही अच्छा है बीच में क्योंकि ये है सबसे ऊँची सब्जेक्ट। क्या? आत्मिक स्थिति में स्थित होने की। और इस पर ध्यान देना है सबको। और ये तो यहाँ आते ही हैं मधुबन में। तो ये समझते हैं कि बरोबर शिवबाबा बैठकरके समझाते हैं। जब मधुबन में नहीं हैं तो बहुत डिफिकल्ट है घड़ी-घड़ी अपन को आत्मा समझना। उठते-बैठते ऐसी ऐसी टेव पड़ जाए, तो अपन को आत्मा ही समझे। जैसे कि शुरुआत से अपन को आत्मा ही समझते रहते।

तो है तो बहुत डिफिकल्ट। क्योंकि बच्चे समझते हैं मुख से नहीं बोलते। ऐसे भी नहीं कि बाबा है तो घड़ी तो बड़ी ये सब्जेक्ट ऊँची है और उसमें ये घड़ी-घड़ी हमको भूल जाता है। अगर हमको न भूले भी और हम अपने को आत्मा ही समझते रहें, सोने वक्त भी आत्मा ही समझकरके सोवे। तो स्वप्न भी बहुत अच्छे आवेंगे। ऐसे नहीं कि नहीं आएंगे। स्वप्न भी बहुत अच्छे आएंगे क्योंकि हल्का हो जावेगा ना। जब स्कूल जाएंगे तो हल्के हो जाएंगे। अभी सब जब यहाँ की बातें सब भूल जाएंगे तो ज़रूर नई बात याद आएगी। तो फिर समाचार लिखेंगे क्या-क्या होता है नींद में। कोई सपने आए, तूफान आए या क्या हुआ क्योंकि कुछ न कुछ तो होता है ना। क्योंकि तुम जागती ज्योति बन जाती हो याद करते-3 बहुत हल्के हो जावेंगे। क्योंकि इतना जो भारी बोझा है जन्म-जन्मान्तर का सिर के ऊपर, हँ, देह भान का, शरीर का तो उनको भूला जाता है ना। और ये कोई थोड़ी चीज़ थोड़ेही भूलते हैं। 63 जन्मों का हिसाब-किताब देहभान का। हँ? मन डेढ़ का और गुना मन कर दो। और सुना तो होगा वजन इसमें आत्मा में कितना वजन होगा? देखो, कितनी ये शरीर भारी है। इसका कितना बोझा है! तो अभी इनको हम हल्का कैसे करें? तो ज़रूर पुरुषार्थ करना पड़े कि हम हल्के हो जावें। हँ? आत्मा के अर्थ ही करना पड़े ना। उसे ही पुरुषार्थ कहा जाता है। क्योंकि हमको ये देह का दुंब लेकरके अब जाना तो नहीं है। वापस में जावेंगे तो देह का दुंब लेकर जावेंगे? तो पहले-पहले ये पक्का याद करके बैठें क्योंकि हमको ये दुंब लेकरके नहीं जाना है वापस।

तो पहले-पहले पक्का ख्याल करके बैठें। क्योंकि जैसे ऐरोप्लेन भी उड़ते हैं ना तो देखो कितना बड़ी बॉडी, मशीनरी कितना अंदर है छोटी। और ऐरोप्लेन की बॉडी इतनी बड़ी। हँ? अगर थोड़ा भी, जरा भी कुछ मशीनरी में गड़बड़ हो जाती है तो फिर धाड़ से नीचे गिर पड़ते हैं। तो ये तुम्हारी जो मशीनरी है ना, हँ, ये जो देह की, हँ, जो देह को चलाने वाली मशीनरी है ना मन-बुद्धि रूपी आत्मा ये बिल्कुल ही, हँ, तो ये देह तो बिल्कुल ही भूल जाना है एकदम। क्योंकि जहाँ जाना है वहाँ से हम नंगे आए थे और नंगे जाना है। हँ? ये तो मनुष्य गाते भी बहुत हैं। और उठते-बैठते जन्म-जन्मान्तर गाते जरूर हैं कि भई नंगे आए हैं और नंगे जाना है। अभी नंगे कौन आए हैं और कौन जाएंगे? तो वो तो ऐसे ही गायन सुन लिया है। तो आत्मा को तो बहुत भारी समझते हैं। हाँ, कहते हैं आत्मा के लिए कि जरूर नंगे आए। देखो कहते कैसे सीधा हैं हम नंगे आए, नंगा जाना है। तो जैसे बात कोई होती है शरीर की। होती है क्या? नहीं। आत्मा माना देह की बात ही नहीं। हम आत्मा और आए भी बरोबर हैं आत्माएं परमधाम से। और आए भी नंगे जरूर हैं। शरीर इतना बड़ा भारी। तो लेकरके तो नहीं आए ना इसे। हँ? तो ये आई भी कितना छोटी! आत्मा ऊपर से आई। 13.11.1967 की प्रातः क्लास का तीसरा पेज। तो ये भी जो बैठकरके विचार करे फिर रिपीट करे। तो बातें बहुत पुरानी। नंगे आए नंगे जाना है। पर नंगे का अर्थ अभी बाप ने समझाया है अच्छी तरह से कि भई ये तो बहुत छोटी चीज़ है। जो आकरके इस दुंब में पड़ती है।

बाबा ने समझाया ना बहुत डॉक्टरों ने कोशिश की है कि इनको हम देखें कि ये क्या चीज़ है? इतनी सूक्ष्म है जो एकदम रुक भी नहीं सकते हैं। और ऐसे भी नहीं हो सकते हैं कि भले सब चीज़ों के लिए बांध लेते हैं, शीशे के, उनमें बनाय करके एकदम, एकदम बंद कर देते हैं कि यहाँ से निकले नहीं यहाँ से। तो जानवरों को तो बंद करके भी रख सकते हैं। मर जाए तो कोई हर्जा नहीं। पर मनुष्यों को तो बंद नहीं कर सकते ना। हँ? मनुष्य की तो हवा बंद कर देवे तो वो वहाँ ही वो साथ ही खतम हो जावे। भले कोई ने ऐसे भी किया हुआ होगा। चलो, परंतु आत्मा सिवाय दिव्य दृष्टि के देखी भी नहीं जाती है। देखो कितनी महीन चीज़ है! अब इतनी महीन चीज़ का उनका वजन कर सकते हैं क्या? कुछ नहीं। बस सिवाय स्टार चमकता है भृकुटि के बीच में वंडरफुल सितारा। अभी वंडरफुल की बात भी तो बाप ने समझाई ना अच्छी तरह से। कितना वंडरफुल है! कितना छोटा है! और फिर कितना उनमें पार्ट भरा हुआ है! तो ये भी बैठकरके चिंतन करे। ये तो अनेक जन्मों का पार्ट भरा हुआ है इस आत्मा रूपी रिकार्ड में।

तो मनुष्य कितनी अच्छी तरह से समझें कि हमारी आत्मा कितनी छोटी है। खास करके तुम बच्चों के लिए और तुम बच्चों में भी जो अच्छी तरह से धारणा करते हैं और अच्छी तरह से भी जो अच्छी तरह से सबको समझाते रहते हैं, क्योंकि 84 जन्म भी तुम्हारे में, हाँ, तुम्हारे में से कोई-कोई तो ऐसे होंगे कि नहीं लेते होंगे। हाँ, मैं आता हूँ ये तो पक्का निश्चय करेंगे। और ये पक्का निश्चय करने वाले सभी तो नहीं होंगे ना। नहीं। और वो तो बहुत होंगे जो पीछे भी आएंगे। तो यहाँ तो बात ही है पहले-पहले नंबर की। तो उस पहले-पहले नंबर में जाने के लिए कितना अभ्यास करना चाहिए अच्छी तरह से। ऐसे-ऐसे अभ्यास करते रहें तो फिर ये देह का भान टूट जावे। बाकि आत्मा समझ-3 के और शरीर सारी यानि शरीर आप मुए पीछे मर गई दुनिया। ऐसे तो कहते हैं ना। तो शरीर जो अगर इनको शरीर छोड़ते-3 शरीर को अकेला-3 अब ये तो बड़ा अच्छा सबक पढ़ना पढ़े बच्चों को। क्या? क्या? कि अकेला आए थे और अकेला जाना है। अभी ये बाप बैठकरके समझाते हैं। हम मनुष्य तो यहाँ फिरते रहते हैं। (क्रमशः)

A morning class dated 13.11.1967 was being narrated. The topic being discussed in the beginning of the middle portion of the second page on Monday was – When you live in the world there, you will not be able to remember [Me] that much until everyday early in the morning, in the beginning and in the end the Brahmani gets up again and again. Well, you children know that the Brahmani says there that you should remember the soul and sit. Consider yourself to be a soul and sit. Then, when she stops the lecture or when she completes reading the Murli, she says again. Or Baba has to tell here as well and He has to say as soon as He comes that you consider yourselves to be souls and sit. When He stops narrating the Murli He reminds that you consider yourself to be soul and sit. So, perhaps there, when that Brahmani narrates the Murli to the children, then first of all in the beginning she should say that consider yourself to be souls and sit. It is because you obtain inheritance from the Father. Now you get unlimited inheritance from the Father in the Confluence Age. But now if you do not understand the glory of this Age and the Father’s glory, if you continue to consider yourself to be a body, then you will not be able to remember the Father. Neither will you get inheritance. So, this is why in the beginning and if possible in the middle also it is very good, in between [to remind about the soul] because this is the highest subject. What? To become constant in the soul conscious stage. And everyone has to pay attention to this. And these come here in Madhuban only. So, they think that correctly ShivBaba sits and explains. When they are not in Madhuban, then it is very difficult to consider yourself to be a soul every moment. While standing and sitting you should develop such habit that you consider yourself to be a soul only just as you have been considering yourself to be a soul from the beginning itself.

So, it is very difficult. It is because children think that we do not speak through the mouth. It is not that when there is Baba, this is a very high subject and in it we forget this every moment. Even if we do not forget and if we continue to consider ourselves to be souls; we should consider ourselves to be a soul even when going to sleep. Then the dreams that you get will also be very good. It is not as if you will not get. The dreams that you get will also be very good because you will become light, will you not? When you go to the school you will go in a light stage. Well, when you forget all the topics of this place, then definitely you will remember a new topic. So, then you will write the news that what all happens in the sleep. Did you get dreams, did you face storms or whatever happened because something or the other happens, doesn’t it? It is because you become enlightened lamps; you become very light while remembering. It is because you have to forget such heavy burden of body consciousness, of the body that you have on your head since many births, will you not? And do you forget a little thing? There is karmic account of body consciousness of 63 births. Hm? Of one and a half man (a measure of weight) and multiply it with man. And you must have heard about the weight that what is the weight of this soul? Look, this body is so heavy. It is so heavy! So, how can we make it lighter now? So, definitely we will have to make purusharth so that we become light. Hm? We will have to do for the sake of the soul only, will we not? That itself is called purusharth. It is because we don’t have to now take this tail of the body with us. When we go back, then will we take the tail of the body? So, first of all we should remember this firmly and sit because we don’t have to carry this tail with us back.

So, first of all you should sit with this firm thought. It is because just as aeroplanes also fly, don’t they? So, look, it has such a big body and the machinery inside is so small. And the body of the aeroplane is so big. Hm? Even if a little, even a minor mistake takes place in the machinery, then it falls down immediately. So, your machinery of this body, the machinery that runs the body, this mind and intellect like soul is completely, hm, so, you have to forget this body completely. It is because the place where we have to go, we had come naked from that place and we have to go naked. Hm? The human beings sing this a lot. And while standing and sitting they do sing birth by birth that brother we have come naked and we have to go naked. Well, who have come naked and who will go [naked]? So, they have just heard the praise. So, they consider the soul to be very heavy. Yes, they say for the soul that we had definitely come naked. Look, they say straight forward that we had come naked and we have to go naked. So, there is a topic of the body. Is it there? No. The soul means that there is no topic of the body at all. We are souls and we souls have correctly come from the Supreme Abode. And we have definitely come naked. The body is so heavy. So, we have not brought it, have we? Hm? So, this has come in such a small form! The soul came from above. Third page of the morning class dated 13.11.1967. So, you should sit and think about this and then repeat it. So, the topics are very old. We had come naked and we have to go naked. But now the Father has explained nicely the meaning of naked that brother this is a very small thing which comes and falls in this tail (body).

Baba has explained, hasn’t He that doctors have tried a lot that we should see what this thing is. It is so subtle that it cannot stop immediately. And it cannot also be possible that although they tie all other things; they make [a box] of glass and close it completely, completely so that it does not get out of that from here. So, they can keep animals in confinement. Even if it dies it does not matter. But human beings cannot be confined, can they be? Hm? If you stop the supply of air to the human being, then he will die there itself. Although someone must have done like this also. Okay, but the soul cannot be seen except for divine vision. Look, it is such a minute thing. Well, can that minute thing be weighed? Nothing. That is it; a star, a wonderful star shines in the middle of the forehead. Now the Father has explained nicely the topic of the wonderful one also, hasn’t He? It is so wonderful! It is so small! And then so much part is recorded in it! So, you should sit and think about this as well. The part of many births is recorded in this soul-like record.

So, the human beings should understand so nicely that our soul is so small. Especially for you children and even among you children, those who inculcate well and nicely those who keep on explaining to everyone nicely because among you, yes, even among you there will be such ones who do not get 84 births also. Yes, you will have firm faith that I come. And everyone will not develop this firm faith, will they? No. And those who come later on will be many. So, here the topic itself is about the first and foremost number. So, in order to achieve that first number (rank) you should practice so well. If you keep on practicing like this, then this body consciousness will break. But while considering yourself to be a soul and the entire body, i.e. body; when you die, then later the world dies. People say like this, don’t they? So, the body, while leaving this body alone, well this is a very good lesson that the children have to study. What? What? That we had come alone and we have to go alone. Now this Father sits and explains. We human beings keep on moving here. (continued)

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Re: Extracts of PBK Murlis - as narrated to the PBKs

Post by arjun »

शिवबाबा की मुरली
ShivBaba’s Murli
वीसीडी 2801, दिनांक 24.02.2019
VCD 2801, dated 24.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
Morning class dated 13.11.1967
VCD-2801-Bilingual-Part-2

समय- 15.55-33.34
Time- 15.55-33.34


ये तो बाप ये स्कूल में बैठकरके स्कूल में ऐसे भी कोई-कोई ये-ये बातें कभी कोई नहीं समझाते हैं। कभी नहीं। भले गाते रहते हैं अकेला आया, अकेला जाना, नंगा आया, नंगा जाना। तो उनसे अर्थ ही दूसरा निकाल लेते हैं। फिर देखो नंगा अर्थ क्या निकाल लेते हैं? हँ? क्या? वो बहुत नंगे हो गए। नागा बाबा बन गए। नागे भी होते हैं ना। तो नंगे भी बहुत हो गए। हँ? जैन धरम में कितने नंगे बाबा! और हिंदुओं में भी। और वहाँ जाते हो ना यहाँ कुंभ के मेले पर तो देखो कितने नंगे आते हैं! हँ? अभी ये अक्षर कहाँ से आया? हँ? क्यों? ये क्यों नंगे बने हैं? तो वो समझते हैं नंगे आए थे, नंगे जाना है। अरे, नंगी तो आत्मा आई ना। ये नंगे कोई शरीर तो थोड़ेही आए? तो वो नागे बन जाते हैं। तो मनुष्यों ने अर्थ का अनर्थ कर-करके सभी सत्यानाश कर दिया। और ये सभी होना है ज़रूर। कल्प-कल्प होता आया। जो कुछ भी कुछ हुआ है ये, बच्चे जानते हैं, हँ, कि फिर भी ये सभी नंगे सन्यासी फलाना, टीरा और ये नागे लोग; हँ?

ऐसी एक कौम भी होती है उनकी भी राजाई है। हाँ। जिनके साथ गोर्मेन्ट फैसला कर रही है। भई लड़ो नहीं। कौनसा लैंड? हँ? आसाम में कोई नाम है?
(किसी ने कुछ कहा।) नागालैंड? हाँ। उसकी भी एक पहाड़ी सल्तनत है। पहाड़ी क्यों? हँ? इसकी शूटिंग कहाँ होती है? हाँ। शूटिंग कैसे होती है? उन्होंने तो भई स्थूल पहाड़ बनाया है। है क्या ऊँची बात? ऊँची स्टेज की बात है ना तुम बच्चों की जो आत्मिक स्थिति में ऊँचे जाते हो, ऊँचे रहते हो। तो तुम्हारी है असली पहाड़ी सल्तनत। अभी उनकी कोई है नहीं। कहते हैं सल्तनत है। और है भी छोटी। हँ? उनकी भी छोटी और तुम्हारी भी? तुम्हारी भी छोटी। कि बहुत ज्यादा है? हाँ। थोड़े हैं। और वो भी जंगल में, पहाड़ों पर, पहाड़ों के बीच में। हँ? तो देखो कहाँ-कहाँ ये लोग रहते हैं पहाड़ों में, जंगलों में। और तुम कहाँ रहते हो? हँ? तुम तो ऊँची स्टेज के जैसे पहाड़ी स्टेज पर रहते हो। जैसे उन्होंने शिवबाबा के मंदिर कहाँ बनाए? ऊँचे टीले पर बनाते हैं या तो पहाड़ पर बनाते हैं। और जंगलों में। हाँ। शमशान क्या है? जैसे जंगल ही तो है। जंगल का मतलब जहाँ दुनियावी लोग तो होते नहीं। तो तुम ऐसी स्टेज में जाते हो। हँ? एकांतवासा न झंगड़ न झांसा।

हाँ, देखो ऐसे तो अनेक प्रकार के मनुष्य होते हैं। देखो दुनिया में डाकू भी कोई कम थोड़ेही हैं। डाकू भी बहुत हो जाएं, और वो भी कहाँ रहते हैं? हँ? कहाँ रहते हैं? वो भी जंगलों में रहते हैं। देखो दक्षिण भारत में कौनसा प्रसिद्ध है? वीरप्पन डाकू। हँ? वो गोर्मेन्ट भी उसको कई साल तक पकड़ ही नहीं सकी। पकड़ सकी? अरे, नहीं पकड़ सकी। हाँ। तो अभी? अभी देखो रहते कौन हैं? हँ? वो आत्मा इस शरीर के साथ क्या-क्या करती है, वो तो तुमने जाना है। सतयुग में तो ऐसी बातें कभी कान से कोई सुनी भी नहीं, हँ, कि वहाँ कोई डाकू होते हैं या फलाना होते हैं। या टीरा कोई। तो झट कैसे बैठकरके बाप सारे सृष्टि के आदि, मध्य, अंत का तुमको बैठकरके समझाते हैं बच्चों को। और घड़ी-घड़ी ये भी समझाते हैं कि बच्चे अपन को आत्मा समझो। बाकि ये जो कुछ भी है भक्तिमार्ग के चित्रों के जो समझाया बच्चों ने कि तुम बच्चों को तो ये पक्का मालूम हुआ कि हम बस ऊँचे ते ऊँचा एक ही भगवंत है जिसको हम अभी-अभी याद करते हैं। पीछे कहां भी चले जावें। हँ? अगर चले जावें तो भले नीचे आवें।

ये सूक्षम वतन में तो कोई हिस्ट्री जाग्राफी की कोई बात ही नहीं होती है। जरा भी नहीं। पिचकरी भी नहीं। क्योंकि ये तो सब हैं ही साक्षात्कार की बातें। 13.11.67 की प्रातःक्लास का चौथा पेज। दूसरी लाइन। सूक्षम वतन का तो सिर्फ साक्षात्कार है। वहाँ सूक्षम वतन में हम आत्माएं निवास करते हैं। हँ? हाँ, कोई स्थूल शरीर छोड़करके और कोई, हां, अंतःवाहक शरीर से मनन-चिंतन-मंथन में रह करके। हां। और वो हमारा घर जो है वो तो ब्रह्मतत्व है। वहाँ हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि हमारा निवास स्थान वो परमधाम है। और वो भी तो ठीक है ना बच्चे। अच्छा, ये पक्का है कि हम वहां रहते हैं। बाकि सूक्षम वतन में कौन रहते हैं? वो तो कोई का नाम निकालकरके बतावें। नहीं, वो सिर्फ साक्षात्कार है। फिर हैं स्थूल वतन में रहने की बातें। नहीं तो बाबा ने बहुत डीटेल में समझाया है। हँ? ये शंकर का एका, विष्णु का एका, ब्रह्मा का एका। अरे, ब्रह्मा भी तो यहाँ का है ना। हँ? कोई ब्रह्मा भी सूक्षम वतन में थोड़ेही रखा है। वो तो, हँ, वो तो जभी वो फरिश्ता बन जाते हैं फिर उनका भी वो नाम है फरिश्ता। हँ? तो फिर उनका साक्षात्कार करते हैं। बाकि वहाँ तो कोई कारोबार कुछ नहीं चलता। कारोबार है अगर; हँ? कहाँ है? कारोबार है अगर; मूल वतन और सूक्षम वतन, स्थूल वतन। परन्तु ये तो सूक्षम वतन तो साक्षात्कार मात्र है। सूक्षम वतन माना ही साक्षात्कार।

तो इसलिए बाप कहते हैं कि ये तो समझाना होता है मनुष्यों को। नहीं तो वो बोलेंगे वाह, ये तो सूक्षम वतन को भी उड़ाय दिया। ये तो बिल्कुल ही कोई नया धर्म निकला है। अरे, पर ये नया धर्म तो है ना बच्चे। आदि सनातन देवी-देवता धर्म। नया ही तो है क्योंकि किसको मालूम थोड़ेही है, हँ, कि ये युग भी नया है और नई दुनिया आनी है। नए युग और नई दुनिया का तो लाखों वरष को वो ऊपर ले गए। तो बिचारों को तो मालूम तो कुछ भी नहीं है पड़ता। देखो, एक तो तुम बच्चों को ये वंडर लगना चाहिए कि ये आयु जो कल्प की ली गई है लाखों वरष, ये तो देखो कितना लंबा-चौड़ा गपोड़ा है। अथाह गपोड़ा है। कहाँ लाखों वर्ष! और कहाँ सिर्फ 5000 वर्ष! तो ये तो नई बात सुनते हो ना तुम बच्चे।

देखो नई बातें सुनते-सुनते भी वृद्धि को पाते रहते हैं। और वो दिन आगे चलकरके आएगा जो लाखों हो जावेंगे। हँ? क्या? ये सेंटर्स लाखों की तादाद में खुल जावेंगे। और सब-सब जगह में। हँ? सभी भाषाएं तुमको सीखनी पड़ेंगी। हँ? या जो-जो भाषाएं सीखे हुए हैं वहाँ-वहाँ सेन्टर खुलेंगे और एक भी भाषा वाला कोई समझ जाएंगे तो दूसरे को भी समझाते रहेंगे। क्योंकि एक से तो वृद्धि हो जाती है ना। हँ? तो एक भी होगा ना क्योंकि भारत में तो ढ़िंढोरा पिटवाना है और जरूर ढ़िंढोरा पिटवाना है। पीछे कोई न कोई प्रकार से अखबार के कोई न कोई प्रकार के। तो टाइम इतना समझना चाहिए। हमको टाइम है कि जो हम सब जगह जाएंगे जरूर। हँ? सब जगह? इंडिया में और सारी दुनिया में। हँ? हाँ। सारी दुनिया में जाएंगे जरूर। जाकरके संदेश वरी अपने भाइयों को संदेश देंगे कि बाबा आया हुआ है। हँ। तो भाइयों को कैसे संदेश देंगे? देंगे ना बच्चे। जाकरके देंगे। क्योंकि तुम्हारी बुद्धि में रहेगा ही ये कि हम आत्माओं को यानि भाइयों को जाकरके संदेश देवें। फिर आत्मा-आत्मा भाई-भाई करते रहना। हाँ। ये सब पीछे यानि जो-जो भी जाएंगे, हँ, इस ज्ञान में। सभी तो नहीं जाएंगे ना बच्चे। हँ? जो सर्विसेबल होंगे वो ही जाएंगे। तो भाई-भाई करके थोड़ा विचार तो करो कि कितने को हमको, हँ, पैगाम देने का है। पैगाम देने से ही सिर्फ बाबा कहते हैं कि सिर्फ कान पर उनके आवाज़ जावे कि भई बेहद का बाबा आया हुआ है। और वो सुन लेवें। हँ? अरे, तभी भी प्रजा बन जावेगी। क्या? तुम इतना सुनाय देंगे। क्या? कि बेहद का बाबा आया हुआ है। तो भी तुम्हारी प्रजा बन जावेगी। ओमशान्ति। (समाप्त)

This Father sits in this school and nobody ever explains these topics like this in a school. Never. Although they keep on singing – I have come alone, I have to go alone, I have come naked, I have to go naked. So, they derive some other meaning out of it. Then look, what meaning do they derive from ‘naked’? Hm? What? Many of them have become naked. They became Naga Baba (a sect of Sanyasis among Hindus who remain naked). There are Nagas also, aren’t they? So, many have become naked as well. Hm? There are so many naked Babas in Jain religion. And even among the Hindus. And you go there to the fair of Kumbha, so, look, so many naked [sanyasis] come. Hm? Well, where did this word emerge from? Hm? Why? Why did they become naked? So, they think that they had come naked, they have to go naked. Arey, it is the soul which came naked, didn’t it? Is it the bodies which came naked? So, they become naked. So, human beings have misinterpreted words and ruined everything. And all this is definitely bound to happen. It has been happening every Kalpa. Whatever has happened, children know that again all these naked Sanyasis, etc. and these Nagas; hm?

There is one such community also; they too have a kingship. Yes. The government is taking a decision with them. Brother, do not fight. Which land? Hm? Is there a name in Assam?
(Someone said something.) Nagaland? Yes. It also has a mountainous Sultanate. Why mountainous? Hm? Where does its shooting take place? Yes. How does the shooting take place? Brother, they have built a physical mountain. What is the high topic? It is a topic of high stage of you children, who go high in the soul conscious stage, live high, don’t you? So, yours is the true mountainous Sultanate. Well, it is not theirs’. And it is a small one too. Hm? Theirs’ is also small and yours’ also? Yours’ also is small. Or is it very big? Yes. There are a few. And that too in the jungle, on the mountains, amidst mountains. Hm? So, look, these people live at such and such places in the mountains, in the jungles. And where do you live? Hm? You live in a high stage like a mountainous stage. For example, where did they build the temples of ShivBaba? They build it either on a high plateau (teela) or on a mountain. And in the jungles. Yes. What is a cremation ground (shamshaan)? It is like a jungle only. Jungle means the place where worldly people don’t exist. So, you go to such high stage. Hm? Ekantvasa na jhangad na jhansa (living in solitude without any problems).

Yes, look, there are many kinds of human beings. Look, are the dacoits any less in the world? Dacoits are also many; and where do they too live? Hm? Where do they live? They too live in the jungles. Look, who is famous in South India? Dacoit Veerappan. Hm? Even the government could not catch him for many years. Could it catch him? Arey, it couldn’t catch. Yes. So, now? Now look, who lives? Hm? You have come to know as to what all that soul does with this body. We have never heard such topics through our ears that there are dacoits or such and such persons in the Golden Age. Or someone. So, the Father sits and immediately explains to you children about the beginning, middle and end of the entire world. And He also explains every moment that children, consider yourself to be a soul. As regards the pictures of the path of Bhakti that children have explained that you children have come to know firmly that we remember only one highest on high God now. Later we may go anywhere. Hm? If we go, we may come down.

There is no topic of history, geography in the Subtle Region. Not even a little. Not even a trace. It is because all these are topics of vision. Fourth page of the morning class dated 13.11.67. Second line. There is only vision of the Subtle Region. We souls live there in the Subtle Region. Hm? Yes, some [do so] by leaving the physical body and some, yes, [do so] by being in thinking and churning through the inner subtle body (antahvaahak shareeer). Yes. And our home is Brahm tatwa. We all know well that there our place of residence is that Supreme Abode. And that is also correct, isn’t it children? Achcha, it is firm that we live there. But who lives in the Subtle Region? You may bring out someone’s name and tell. No, that is just vision. Then are the topics of living in the physical world. Otherwise, Baba has explained in very detail. Hm? This is Shankar’s eka, Vishnu’s eka, Brahma’s eka. Arey, Brahma also belongs to this place, doesn’t he? Hm? Is Brahma also in the Subtle Region? He, hm, he, when he becomes an angel (farishta), then his name is also angel. Hm? So, then you have his vision. But there is no business there. If there is a business; hm? Where? If there is a business; Soul World and Subtle Region, physical world. But this Subtle Region is just a vision. The Subtle Region itself means vision.

So, this is why the Father says that you have to explain this to the human beings. Otherwise, they will say, wow, they have made even the Subtle Region to vanish. This is a completely new religion that has emerged. Arey, but this is a new religion, isn’t it children? Aadi Sanatan Devi-Devata Dharma. It is new only because nobody knows that this Age is also new and a new world is to arrive. They have taken the New Age and the new world lakhs of years away. So, poor fellows don’t know anything. Look, on the one hand you children should wonder that this duration of the Kalpa that has been mentioned as lakhs of years, look, this is such a big bluff. It is an immeasurable bluff. On the one hand are lakhs of years and on the other hand are just 5000 years. So, you children hear this new topic, don’t you?

Look, while listening to newer topics the number keeps on increasing. And that day will come in future when you will grow to lakhs in strength. Hm? What? These centers will open in lakhs. And in all the places. Hm? You will have to learn all the languages. Hm? Or whatever languages you have learnt, the centers will open at those places and even if one person of that language understands, then he will keep on explaining to others also. It is because the numbers grow from one, don’t they? Hm? So, even if there is one person, because you have to beat the trumpet in India and you have to definitely beat the trumpet. Later though one method or the other, through one way or the other through newspapers. So, you should understand the time. We have time that we will certainly go to all the places. Hm? All the places? In India and in the entire world. Hm? Yes. You will definitely go to the entire world. You will go and give message to your brothers that Baba has come. Hm. So, how will you give the message to the brothers? You will give children, will you not? You will go and give. It is because it will remain in your intellect that we should go and give the message to the souls, i.e. brothers. Then you continue to consider souls as brothers. Yes. Later all these, i.e. whoever goes to [follow] this knowledge. All will not come, will they children? Hm? Only those who are serviceable will go. So, while considering them as brothers, just think that we have to give message to so many. Baba says that just by giving message, just if the sound enters their ears that brother, the unlimited Baba has come. And they should listen to that. Hm? Arey, even then the praja (subjects) will get ready. What? You will narrate this much. What? That the unlimited Baba has come. Even then your praja will get ready. Om Shanti. (End)

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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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